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Engineer and futurist Nikola Tesla: भविष्य देखने वाला एक वैज्ञानिक- निकोला टेस्ला

Engineer and futurist Nikola Tesla: सन् 1856 में जन्मे निकोला टेस्ला बचपन से ही अलग थे. उन्हें दुनिया वैसी नहीं दिखती थी जैसी औरों को दिखती थी. टेस्ला के दिमाग में हमेशा अजीब-सी रोशनियां और चिंगारियां तैरते रहते थे. लोग कहते थे. “ये लड़का पागल है.”

निकोला टेस्ला ने दुनिया का परिचय AC (Alternating Current) से कराया. वही करंट जो आज हमारे घरों को रोशन करता है. उन्होंने ऐसा Tesla Coil बनाया, जिस से बिजली बिना तारों के हवा में नाच सकती थी. टेस्ला ने ही हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर को सच बनाया. जिस से बहते पानी की ताकत से शहर जगमगाने लगे. टेस्ला ने एक्सरे पर प्रयोग किए, रेडियो पर काम किया (हालांकि इस का श्रेय बाद में मारकोनी ले गए), और यहां तक कि वायरलेस लाइट और दूसरे ग्रहों से संपर्क तक के सपने देखे थे.

150 साल पहले लोगों को टेस्ला की बातें काल्पनिक लगती थीं. पर आज, जब हम रोबोटिक्स, AI, वायरलेस पावर और स्पेस कम्युनिकेशन की बात करते हैं, तो लगता है टेस्ला ने सचमुच समय से बहुत आगे झांक लिया था.

निकोला टेस्ला को दुनिया अक्सर “भविष्य का आदमी” कहती है और सच भी यही है क्योंकि उन्होंने भविष्य सिर्फ देखा ही नहीं, बल्कि उसे अपनी कल्पनाओं से आकार भी दिया. Engineer and futurist Nikola Tesla.

Highways of India: दौड़ते पहियों पर जलती चिताएं

Highways of India: अक्टूबर माह में देश के हाईवे पर तीन भयंकर बस हादसे हुए. हाईवे पर तेजी से दौड़ती बसें अचानक आग का गोला बन गईं और उन में बैठे यात्री जो अपने गंतव्य पर पहुंचने के सपनों में खोए हुए थे, अचानक धूंधूं कर जल उठे. अपनी सीट से उठ कर भागने तक का मौका नहीं मिला. दौड़ती बस में अनेकों चिताएं एकसाथ जल उठीं.

देश के हाईवे बड़ी तेजी से डेथवे में तब्दील हो रहे हैं. समाज को उच्च वर्ग और निम्न वर्ग में बांटने वाले इन हाईवे पर आप को बैलगाड़ी, रिक्शा, साइकिल, स्कूटर जैसे वाहन नजर नहीं आएंगे. इन पर दिखेंगी मंहगी, तेज रफ़्तार चमचमाती कारें, लग्जरी बसें और बड़े बड़े ट्रक. दूरदूर तक पैदल आदमी का नामोनिशान नहीं. कहीं कोई पुलिस बूथ, स्वास्थ्य केंद्र, फायर स्टेशन, पीने के पानी का नल या आग लगने की स्थिति में पानी की व्यवस्था, शौचालय कुछ भी तो इन हाईवे पर नहीं हैं.

नतीजा यह कि दुर्घटना होने पर पीड़ितों को तुरंत कोई मदद नहीं मिलती है. दो वाहनों की टक्कर हो जाए या बस अथवा कार में आग लग जाए तो कोई बचाने वाला नहीं होता. जख्मी लोग सड़क पर तड़पतड़प कर मर जाते हैं, पूरी की पूरी कारबस जल कर राख हो जाती हैं मगर घंटों बाद तक कोई मदद नहीं पहुंच पाती हैं.

भारत में अक्टूबर माह में दस दिन के भीतर तीन भयानक बस हादसों में 46 लोगों की जानें चली गईं. आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में 24 अक्टूबर की सुबह एक बाइक से टकराने के बाद कावेरी ट्रैवल्स की बस में आग लग गई,  हैदराबाद से बेंगलुरु जा रही कावेरी ट्रैवल्स की इस बस में 20 लोग अपनी सीट पर ही जल कर मर गए. बस में 40 से ज्यादा यात्री सवार थे, चिन्ना टेकुरा गांव में एक बाइक से टकराने के तुरंत बाद बस आग का गोला बन गई. आग लगने के बाद बस का दरवाजा भी जाम हो गया, जिस से यात्री बाहर नहीं निकल पाए. कोई 12 लोग खिड़कियों से कूदकर बचे, तो कुछ इमरजैंसी द्वार से निकलने में सफल हुए.

जांच के बाद यह सामने आया कि यह बस हाल ही में बिना अनुमति के सीटिंग कोच से स्लीपर कोच में बदली गई थी और इसे संदिग्ध दस्तावेजों के साथ राज्यों के बीच चलाया जा रहा था.

बस को दो मई 2018 को दमन और दीव में खरीदा गया था. बाद में 29 अप्रैल 2025 को इस का रजिस्ट्रेशन ओडिशा के रायगड़ा आरटीओ में जी बिजया लक्ष्मी के नाम पर ट्रांसफर किया गया, मगर जांच अधिकारियों ने यह पता गलत पाया. दस्तावेजों के मुताबिक बस के पास वैध फिटनेस सर्टिफिकेट (31 मार्च 2027 तक), बीमा और रोड टैक्स थे, लेकिन जांच में पता चला कि यह बस मूल रूप से सीटर कोच के रूप में पंजीकृत थी और बिना किसी अनुमति के इसे स्लीपर बस में बदला दिया गया था, वह भी बिना सुरक्षा मानकों का पालन किए हुए. क्योंकि यह स्लीपर बस थी, लिहाजा जिस समय हादसा हुआ अधिकांश यात्री सोए हुए थे.

यात्रियों से भरी इस बस में बड़ी संख्या में मोबाइल फोन की बैटरियां भी ले जाई जा रही थीं. माना जा रहा है आग लगने के बाद इन बैटरियों में भयानक विस्फोट हुआ और पूरी बस एकदम से धधक उठी.

इस से कुछ दिन पहले, राजस्थान में जैसलमेर जा रही एक बस थैयात गांव के पास आग की लपटों में घिर गई, जिस में 26 लोगों की जान चली गई और 15 गंभीर रूप से घायल हो गए. राजस्थान के जैसलमेर में केके ट्रैवल्स की एक प्राइवेट बस, जिसे हाल ही में नौन एसी से एसी में बदला गया था, जैसलमेर से जोधपुर जाते समय आग की चपेट में आ गई. यह हादसा थैयात गांव के पास हुआ, जो जैसलमेर शहर से करीब 10 किलोमीटर दूर है.

आग बस के अगले हिस्से में लगी, जिस के बाद सभी निकास द्वार स्वयं जाम हो गए. इस से यात्री अंदर फंस गए. फोरैंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL), परिवहन विभाग और पुणे के सैंट्रल इंस्टीट्यूट औफ रोड ट्रांसपोर्ट (CIRT) की टीमों ने जांच में पाया कि एयर कंडीशनिंग सिस्टम में शौर्ट सर्किट के कारण गैस लीक हुई थी.

इस ने खिड़की पर लगे पर्दों और सीट कुशन को आग लगा दी. पीछे की सीटों पर बैठे यात्रियों के पास भागने का कोई रास्ता नहीं था. आगे ड्राइवर के केबिन में घुस कर कुछ लोगों ने अपनी जान बचाई. बस से 19 शव बरामद हुए, जिन में तीन बच्चे शामिल थे. इलाज के दौरान 75 वर्षीय यात्री हुसैन खान की भी मौत हो गई.

26 अक्टूबर को आगरा एक्सप्रेसवे पर एक डबल डेकर बस धूधू कर जल उठी. इस में 39 यात्री सवार थे, मगर गनीमत है कि दिन का वक्त था, लिहाजा समय रहते सभी बस से निकल भागने में सफल हुए. दिल्ली से गोंडा जा रही इस बस के टायरों से काकोरी स्थित टोल प्लाजा के पास चिंगारियां निकलने लगी क्योंकि ड्राइवर ने रास्ते में कहीं भी बस नहीं रोकी थी. सड़क के साथ टायरों के लगातार घर्षण से अंततः टायर जल उठे.

ड्राइवर ने धुंआ उठते देखा तो बस रोक कर यात्रियों को उतारा. बस में रखे अग्निशामक यंत्र से आग बुझाने की कोशिश की गई मगर यंत्र काम नहीं कर रहा था. इस के बाद ड्राइवर बस को उसी हालत में चला कर टोल प्लाजा के निकट लाया ताकि आग बुझाने के लिए पानी मिल सके, मगर वहां भी पानी का कोई इंतजाम नहीं था. थोड़ी ही देर में पूरी बस आग का गोला बन गई. फायर ब्रिगेड सूचना देने के 50 मिनट बाद घटनास्थल पर पहुंची, जब बस पूरी तरह जल कर  चुकी थी. वजह यह कि दमकल की गाड़ियों ने उस हाईवे पर पहुंचने के लिए गलत रूट पकड़ लिया था.

देश के हाईवे लोगों के लिए डेथ वे बनते जा रहे हैं. भारत की सड़कों पर हर दिन जो मौतें हो रही हैं, वो किसी राष्ट्रीय आपदा से कम नहीं हैं. सड़कें जो किसी भी देश के लिए विकास की पहचान होती हैं, भारत के लिए विनाश का सामान बन गई हैं. लोगों के समय की बचत और तेज रफ्तार की सोच के तहत जिन हाईवेज का निर्माण हुआ है वे अब मौत का दूसरा नाम बन गए हैं. हर साल लगभग 1.7 लाख से अधिक लोगों की जान सड़क दुर्घटनाओं में जाती है, जिन में से बड़ी संख्या राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर होती है.

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, कुल सड़क हादसों में से लगभग 35-40% दुर्घटनाएं हाईवे पर होती हैं. जबकि देश की कुल सड़क लंबाई में हाईवे का हिस्सा मात्र 5% से भी कम है. इस से साफ है कि मौत का सब से बड़ा जाल इन्हीं तेज रफ्तार सड़कों पर फैला है. इन हादसों का सब से बड़ा कारण है – ओवरस्पीडिंग. नयानया पैसा आते ही लोग नई लखदख गाड़ियां ले कर हवा से बातें करने के लिए हाईवे पर निकल जाते हैं. यहां उन को रोकने के लिए न ट्रैफिक पुलिस है, न स्पीड ब्रेकर और न लोगों की भीड़.

नतीजा अंधाधुंध गाड़ियां दौड़ती हैं. बहुत सारे एक्सीडेंट उन किशोरवय के लड़कों द्वारा हो रहे हैं, जिन के मांबाप ने अपने पैसों का दिखावा करने के लिए गाड़ी चलाने में अनट्रेंड बेटों के हाथों में स्टेयरिंग थमा दिए हैं कि लो जाओ जी लो अपनी जिंदगी. यह सोचे बिना कि वे अपने बच्चों को मौत की राह पर भेज रहे हैं.

हाईवे पर एक्सीडेंट की दूसरी बड़ी वजह है थके हुए या शराब पीकर वाहन चलाने वाले ड्राइवर. जब ये हाईवे नहीं थे और बसें शहरों और गांवों के बीचे से हो कर गुजरती थीं तब जगह जगह खुले ढाबों के आगे बसें रुकती थीं, सवारियां और ड्राइवर उतर कर चाय नाश्ता करते थे, फ्रेश होते थे, कुछ देर आराम करके फिर यात्रा शुरू करते थे. इस तरह ड्राइवर और बस दोनों को आराम मिल जाता था. हाईवे बनने के बाद दूरदूर तक रुकने और फ्रेश होने का कोई स्थान नहीं है. ड्राइवर थके हुए रहते हैं, थकान दूर करने के लिए लगातार नशा भी करते हैं, नतीजा एक्सीडेंट.

देश की मोदी सरकार चीन, जापान और सिंगापुर का सपना जनता को दिखा कर लगातार हाईवे का निर्माण कर रही है, मगर उन देशों की तरह हमारे हाईवे पर सड़क सुरक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर का नामोनिशान नहीं है. न कट, न लाइट, न स्पीड ब्रेकर, न पेट्रोलिंग. चालकों का अव्यवस्थित ट्रैफिक सेंस जैसे ओवरटेकिंग और गलत साइड से आना यहां आम बात है.

इमरजेंसी मेडिकल रिस्पांस इतनी जर्जर है कि घटना की जानकारी ही घंटों बाद होती है और उस के कई घंटों बाद एम्बुलैंस पहुंचती है जब तक घायल जल्दी सड़क पर तड़पतड़प कर दम तोड़ चुके होते हैं. देश में सिर्फ सड़कें बढ़ रही हैं, सुरक्षा का नामोनिशान नहीं है.

मोदी सरकार “भारतमाला” जैसी योजनाओं के तहत हजारों किलोमीटर हाईवे बना रही है, लेकिन सड़क सुरक्षा पर खर्च अब भी न के बराबर है. सड़क चौड़ी होने से हादसे कम नहीं होते, सुरक्षित ड्राइविंग कल्चर और निगरानी से होते हैं. इस के लिए हर हाईवे पर स्पीड कैमरा, ब्लैक स्पौट मैपिंग और रीयलटाइम मौनिटरिंग अनिवार्य होनी चाहिए, जो नहीं है. ट्रक और बस चालकों को सुरक्षा प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, जो नहीं दिया जाता है. हर 20–30 किमी पर इमरजेंसी हेल्प सेंटर और मेडिकल यूनिट होनी चाहिए, जो देश के किसी हाईवे पर नहीं है.

भारत के हाईवे आज विकास का प्रतीक नहीं, बल्कि लापरवाही और व्यवस्था की नाकामी का आईना बन चुके हैं. जब तक “सड़क सुरक्षा” को “सड़क निर्माण” जितना महत्व नहीं मिलेगा, तब तक ये हाईवे नहीं, “डेथ वे” ही बने रहेंगे. Highways of India.

Birthday Story in Hindi: श्वेता ने गाल पर चुंबन जड़ते हुए क्यों कहा, ‘‘हैप्पी बर्थडे, दादीमां’’?

Birthday Story in Hindi: ‘‘हैप्पी बर्थडे, आज भोर में दादीमां की नींद खुल गई थी. पास ही दादाजी गहरी नींद में सो रहे थे. कुछ दिन पहले ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा था. अब ठीक थे, लेकिन कभीकभी सोते समय नींद की गोली खानी पड़ती थी. दादाजी को सोता देख दादीमां के होंठों पर मुसकान दौड़ गई. आश्वस्त हो कर फिर से आंखें बंद कर लीं. थोड़ी देर में उन्हें फिर से झपकी आगई.

अचानक गाल पर गीलेपन का एहसास हुआ. आंख खोल कर देखा तो श्वेता पास खड़ी थी.

गाल पर चुंबन जड़ते हुए श्वेता ने कहा, ‘‘हैप्पी बर्थडे, दादीमां.’’

‘‘मेरी प्यारी बच्ची,’’ दादीमां का स्वर गीला हो गया, ‘‘तू कितनी अच्छी है.’’

‘‘मैं जाऊं, दादीमां? स्कूल की बस आने वाली है.’’

श्वेता ने दादाजी की ओर देखते हुए कहा, ‘‘कैसे सो रहे हैं.’’

दादीमां को लगा कि सच में दादाजी बरसों से जाग रहे थे. अब कहीं सोने को मिला था.

सचिन ने प्रवेश किया. हाथ में 5 गुलाबों का गुच्छा था. दादीमां को गुलाब के फूलों से विशेष प्यार था. देखते ही उन की आंखों में चमक आ जाती थी.

चुंबन जड़ते हुए सचिन ने फूलों को दादीमां के हाथ में दिया और कहा, ‘‘हैप्पी बर्थडे.’’

‘‘हाय, तू मेरा सब से अच्छा पोता है,’’ दादीमां ने खुश हो कर कहा, ‘‘मेरी पसंद का कितना खयाल रखता है.’’

सचिन ने शरारत से पूछा, ‘‘दादीमां, अब आप की कितनी उम्र हो गई?’’

‘‘चल हट, बदमाश कहीं का. औरतों से कभी उन की आयु नहीं पूछनी चाहिए,’’ दादीमां ने हंस कर कहा.

‘‘अच्छा, चलता हूं, दादीमां,’’ सचिन बोला, ‘‘बाहर लड़के कालिज जाने के लिए इंतजार कर रहे हैं.’’

दादीमां आहिस्ता से उठीं, खटपट से कहीं दादाजी जाग न जाएं. वह बाथरूम गईं और आधे घंटे बाद नहा कर बाहर आ गईं और कपड़े बदलने लगीं.

बेटे तरुण ने नई साड़ी ला कर दी थी. दादीमां वही साड़ी पहन रही थीं.

‘‘हाय मां,’’ तरुण ने अंदर आते हुए कहा, ‘‘हैप्पी बर्थडे. आज आप कितनी सुंदर लग रही हैं.’’

‘‘चल हट, तेरी बीवी से सुंदर थोड़ी हूं,’’ दादीमां बहू के ऊपर तीर छोड़ना कभी नहीं भूलती थीं.

‘‘किस ने कहा ऐसा,’’ तरुण ने मां को गले लगाते हुए कहा, ‘‘मेरी मां से सुंदर तो तुम्हारी मां भी नहीं थीं. तुम्हारी मां ही क्यों, मां की मां की मां में भी कोई तुम्हारे जैसी सुंदर नहीं थीं.’’

‘‘चापलूस कहीं का,’’ दादीमां ने प्यार से चपत लगाते हुए कहा, ‘‘इतना बड़ा हो गया पर बात वही बच्चों जैसी करता है.’’

‘‘अब तुम्हारा तो बच्चा ही हूं न,’’ तरुण ने हंस कर कहा, ‘‘मैं दफ्तर जाने के लिए तैयार हो रहा हूं. पापाजी को क्या हो गया? अभी तक सो रहे हैं.’’

‘‘सो कहां रहा हूं,’’ दादाजी ने आंखें खोलीं और उठते हुए कहा, ‘‘इतना शोर मचा रहे हो, कोई सो सकता है भला.’’

‘‘पापाजी, आप बहुत खराब हैं,’’ तरुण ने शिकायती अंदाज में कहा, ‘‘आप चुपकेचुपके मांबेटे की खुफिया बातें सुन रहे थे.’’

‘‘खुफिया बातें कान में फुसफुसा कर कही जाती हैं. इस तरह आसमान सिर पर उठा कर नहीं,’’ दादाजी ने चुटकी ली.

‘‘क्या करूं, पापाजी, सब लोग कहते हैं कि मैं आप पर गया हूं,’’ तरुण ने दादाजी को सहारा देते हुए कहा, ‘‘अब आप तैयार हो जाइए. वसुधा आप लोगों के लिए कोई विशेष व्यंजन बना रही है.’’

‘‘क्यों, कोई खास बात है क्या?’’ दादाजी ने प्रश्न किया.

‘‘पापाजी, कोई खास बात नहीं, कहते हैं न कि सब दिन होत न एक समान. इसलिए सब के जीवन में एक न एक दिन तो खासमखास होता ही है,’’ तरुण ने रहस्यमयी मुसकान से कहा.

‘‘तू दर्शनशास्त्र कब से पढ़ने लगा,’’ दादाजी ने कहा.

‘‘चलता हूं, पापाजी,’’ तरुण की आंखें मां की आंखों से टकराईं.

क्या सच ही इन को याद नहीं कि आज इन की पत्नी का जन्मदिन था जिस ने 55 साल पहले इन के जीवन में प्रवेश किया था? अब बुढ़ापा न जाने क्या खेल खिलाता है.

डगमगाते कदमों से दादाजी ने बाथरूम की तरफ रुख किया. दादीमां ने सहारा देने का असफल प्रयत्न किया.

दादाजी ने झिड़क कर कहा, ‘‘तुम अपने को संभालो. देखो, मैं अभी भी अभिनेता दिलीप कुमार की तरह स्मार्ट हूं. अपना काम खुद करता हूं. काश, तुम मेरी सायरा बानो होतीं.’’

दादाजी ने बाथरूम का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. अंदर से गाने की आवाज आ रही थी, ‘अभी तो मैं जवान हूं, अभी तो मैं जवान हूं.’

दादीमां मुसकराईं. बिलकुल सठिया गए हैं.

बहू वसुधा ने कमरे में आते ही कहा, ‘‘हाय मां, हैप्पी बर्थडे,’’ फिर उस की नजर साड़ी पर गई तो बोली, ‘‘तरुण सच ही कह रहे थे. इस साड़ी में आप खिल गई हैं. बहुत सुंदर लग रही हैं.’’

‘‘तू भी कम नहीं है, बहू,’’ यह कहते समय दादीमां के गालों पर लाली आ गई.

जातेजाते वसुधा बोली, ‘‘मां, मैं खाना लगा रही हूं. आप दोनों जल्दी से आ जाइए. गरमागरम कचौरी बना रही हूं.’’

दादीमां का बचपन सीताराम बाजार में कूचा पातीराम में बीता था. अकसर वहां की पूरी, हलवा, कचौरी और जलेबी का जिक्र करती थीं. जिस तरह दादीमां बखान करती थीं उसे सुन कर सुनने वालों के मुंह में पानी आ जाता था.

वसुधा मेरठ की थी और उसे ये सारे व्यंजन बनाने आते थे. दादीमां को अच्छे तो लगते थे लेकिन उस की प्रशंसा करने में हर सास की तरह वह भी कंजूसी कर जाती थीं. शुरूमें तो वसुधा को बुरा लगता था. लेकिन अब सास को अच्छी तरह पहचान लिया था.

थोड़ी देर बाद दादाजी और दादीमां बाहर आ कर कुरसी पर बैठ गए. उन के आने की आवाज सुन कर वसुधा ने कड़ाही चूल्हे पर रख दी.

सूजी का मुलायम खुशबूदार हलवा पहले दादीजी ने खाना शुरू किया. कचौरी के साथ वसुधा ने दहीजीरे के आलू बनाए थे.

दादाजी 2 कचौरियां खा चुके थे.

दादीमां ने दादाजी से हलवे की तारीफ में कहा, ‘‘शुद्ध घी में बनाया है न… बना तो अच्छा है लेकिन हजम भी तो होना चाहिए.’’

‘‘अरे वाह, तुम ने तो और ले लिया,’’ दादाजी ने निराश स्वर में कहा.

उन दोनों की बातें सुन कर वसुधा हंस पड़ी, ‘‘पापा, मैं फिर बना दूंगी.’’

दिल का दौरा पड़ जाने से दादाजी को काफी परहेज करना व करवाना पड़ता था.

दिन में दादीमां की दोनों बहनों व उन के परिवार के लोग फोन पर जन्मदिन की बधाई दे रहे थे. उन के भाईभाभी का कनाडा से फोन आया. बहुत अच्छा लगा दादीमां को. वह बहुत खुश थीं और दादाजी मुसकरा रहे थे.

रात को तो पूरा परिवार जमा था. बेटी और दामाद भी उपहार ले कर आ गए थे. खूब हल्लागुल्ला हुआ. लड़के-लड़कियां फिल्मी धुनों पर नाच रहे थे. तरुण अपने बहनोई से हंसीमजाक कर रहा था तो वसुधा अपनी ननद के साथ अच्छेअच्छे स्नैक्सबना कर किचन से भेज रही थी. बस, मजा आ गया.

‘‘दादीमां, आप का बर्थडे सप्ताह में कम से कम एक बार अवश्य आना चाहिए,’’ सचिन ने दादीमां से कहा, ‘‘काश, मेरा बर्थडे भी इसी तरह मनाया जाता.’’

दादीमां ने अचानक कहा, ‘‘आज मुझे सब लोगों ने बधाई दी. बस, एक को छोड़ कर.’’

‘‘कौन, मां?’’ तरुण ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘यह गुस्ताखी किस ने की?’’ सचिन ने कहा.

‘‘इन्होंने,’’ दादीमां ने पति की ओर देख कर कहा.

दादाजी एकदम गंभीर हो गए. ‘‘क्या कहा? मैं ने बधाई नहीं दी?’’

दादाजी अभी तक गुदगुदे दीवान पर सहारा ले कर बैठे थे कि अचानक पीछे लुढ़क गए. शायद धक्का सा लगा. ऐसे कैसे भूल गए. सब का दिल दहल गया.

‘‘हाय राम,’’ दादीमां झपट कर दादाजी के पास गईं. लगभग रोते हुए बोलीं, ‘‘आंखें खोलो. मैं ने ऐसा क्या कह दिया?’’

दादाजी को शायद फिर से दिल का दौरा पड़ गया, ऐसा सब को लगा. दादीमां की आंखें नम हो गईं. उन्होंने कान छाती पर लगा कर दिल की धड़कन सुनने की कोशिश की. एक कान से सुनाई नहीं दिया तो दूसरा कान छाती पर लगाया.

‘‘हैप्पी बर्थडे,’’ दादाजी ने आंखें खोल कर मुसकरा कर कहा, ‘‘अब तो कह दिया न.’’

‘‘यह भी कोई तरीका है,’’ दादीमां ने आंसू पोंछते हुए कहा. अब उन के होंठों पर हंसी लौट आई थी.

सब हंस रहे थे.

‘‘तरीका तो नहीं है,’’ दादाजी ने उठते हुए कहा, ‘‘लेकिन याद तो रहेगा न.’’

‘‘छोड़ो भी,’’ दादीमां ने शरमा कर कहा.

‘‘वाह, इसे कहते हैं 18वीं सदी का रोमांस,’’ सचिन ने ताली बजाते हुए कहा.

फिर तो सारा घर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. Birthday Story in Hindi.

Most Popular Story in Hindi: चुभन- शादी के समय मात्र बी.ए. पास थी

Most Popular Story in Hindi: ‘‘कभी तो संतुष्ट होना सीखो, मीना, कभी तो यह स्वीकार करो कि हम लाखों-करोड़ों से अच्छा जीवन जी रहे हैं. मैं मानता हूं कि हम बहुत अमीर नहीं हैं, लेकिन इतने कंगाल भी नहीं हैं कि तुम्हें हर पल बस, रोना ही पड़े.’’

सदा की तरह मैं ने अपना आक्रोश निकाल तो दिया लेकिन जानता हूं, मेरा भाषण मीना के गले में आज भी कांटा बन कर चुभ गया होगा. क्या करूं मैं मीना का, समझ नहीं पाता हूं, आखिर कैसे उस के दिमाग में मैं यह सत्य बिठा पाऊं कि जीवन बस, हंसीखुशी का नाम है.

पिछले 3 सालों से मीना मेरी पत्नी है. उस की नसनस से वाकिफ हूं मैं. जो मिल गया उस की खुशी तो उस ने आज तक नहीं जताई, जो नहीं मिल पाया उस का अफसोस उसे सदा बना रहता है.

मैं तो हर पल खुश रहना चाहता हूं. जीवन है ही कितना, सांस आए तो जीवन, न आए तो मिट्टी का ढेर. खुश होने को भी समय नहीं मिलता मुझे. और मीना, पता नहीं कैसे रोनेधोने को भी समय निकाल लेती है.

‘‘बचपन से ऐसी ही है मीना,’’ उस की मां ने कहा, ‘‘पता नहीं क्यों हर पल नाराज सी रहती है. जब देखो भड़क उठना उस के स्वभाव में ही है. हर इनसान का अपनाअपना स्वभाव है, क्या करें?’’

‘‘हां, और आप ने उसे कभी सुधारने की कोशिश भी नहीं की,’’ अजय ने उलाहना दिया, ‘‘बच्चे को सुधारना मातापिता का कर्तव्य है लेकिन आप ने उस की गलत आदतों को मान कर सिर्फ बढ़ावा ही दिया.’’

‘‘नहीं, अजय, ऐसा भी नहीं है,’’ सास बोली थीं, ‘‘संतुष्ट ही रह जाती तो शादी के बाद पढ़ती कभी नहीं. शादी के समय मात्र बी.ए. पास थी. अब एम.ए., बी.एड. है और आगे भी पढ़ना चाहती है. संतुष्ट नहीं है तभी तो…’’

‘‘उस की इसी जिद में मैं पिस रहा हूं. अपनी पढ़ाईलिखाई में उसे मेरा कोई भी काम याद नहीं रहता. मुझे अपना काम भी स्वयं ही करना पड़ता है. कपड़ों से ले कर नाश्ते तक. घर जाओ तो एक कप चाय की उम्मीद पत्नी से मुझे नहीं होती.

‘‘मैं तो मीना के पास होने पर खुश होता हूं और वह रोती है कि शादी की अगर जिम्मेदारी न होती तो और भी ज्यादा अंक आ सकते थे. अरे, शादी की ऐसी कौन सी जिम्मेदारी उस पर है, जरा पूछो उस से. मीना का बड़ा भाई मेरा दोस्त भी है. कभीकभार उस से शिकायत भी करता हूं.

‘‘कुछ लोग संसार में बस, रोने के लिए ही आते हैं. उन्हें चैन से खुद तो जीना आता नहीं, सामने वाले को भी चैन से जीने देना नहीं चाहते. तुम मीना को कुछ दिन के लिए अपने घर ले जाओ. एम.एड. करना चाहती है. वहीं पढ़ाओ उसे, मेरी जिम्मेदारी उस पर भारी पड़ रही है,’’ एक दिन मैं ने उस के भाई से कह ही दिया.

‘‘क्या कह रहे हो, अजय?’’ विनय ने हैरानी जाहिर की तो मैं हाथ से छूट गए ऊन के गोले की तरह खुलता ही चला गया.

‘‘मेरी तो समझ में नहीं आता कि आखिर मीना चाहती क्या है. पढ़ना चाहती थी तो पढ़ती रहती, शादी क्यों की थी? 3 साल हो गए हैं हमारी शादी को पर परिवार बढ़ाना ही नहीं चाहती, क्या बुढ़ापे में संतान के बारे में सोचेगी? विनय, मेरी जगह तुम होते तो क्या यह सब सह पाते?

‘‘अच्छीखासी तनख्वाह है मेरी, मगर नहीं, हर समय यही रोना ले कर बैठी रहती है कि उसे भी काम करना है इसलिए और पढ़ना चाहती है. एम.ए., बी.एड. कर के कौन सा तीर मार लिया जो अब एम.एड. करने की ठानी है. दरअसल, उस का चाहा क्यों नहीं हुआ यह शिकायत उस की आदत है और यह हमेशा ही रहेगी. बीत जाएगा उस का भी और मेरा भी जीवन इसी तरह चीखतेचिल्लाते.’’

विनय चुप था. क्या कहता? जाहिर सा था उस का भी हावभाव.

‘‘मैं जानता हूं, वापस ले जाना इस समस्या का हल नहीं है, कुछ दिन को ही ले जाओ. आजकल उस का रोनाधोना जोरों पर है, उसे समझा पाना मेरे बस से बाहर होता जा रहा है.’’

विनय सकपका रहा था. यह सबकुछ सुनने के बाद बोला, ‘‘ठीक है, कल इतवार है, मैं सुबह आ जाऊंगा. शाम तक तुम दोनों के पास रहूंगा. तुम चिंता मत करो. भाई हूं, उसे मैं समझाऊंगा.’’

दूसरी सुबह अभी हम नाश्ता करने ही वाले थे कि विनय ने दरवाजा खटखटा दिया. मीना बड़े भाई को देख कर भी उखड़ी ही रही.

‘‘यहां स्टेशन पर किसी काम से आया था. सोचा, आज का दिन तुम दोनों के साथ बिताऊंगा, लेकिन तुम्हारा तो चेहरा लटका हुआ है. नाश्ता नहीं किया है मैं ने, तुम खिला दोगी न?’’

कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई मीना पर. एक मेहमान के लिए ही सही, स्वाभाविक मुसकान भी चेहरे पर नहीं आई. जी में आया, पता नहीं क्या कर दूं. मेरे भैयाभाभी आए थे तो भी यही तमाशा किया था मीना ने.

‘‘मीना, मैं तुम से ही बात कर रहा हूं. यह क्या तरीका है घर आने वाले का स्वागत करने का?’’

विनय के व्यवहार पर तनिक चौंकी थी मीना. सदा नाजनखरे उठाने वाला भाई क्या इस तरह भी बोल

सकता है.

‘‘रहने दीजिए न आप, बात ही क्यों कर रहे हैं मुझ से,’’ तुनक कर दरवाजे से हट गई मीना और विनय अवाक् कभी मेरा मुंह देखे और कभी जाती हुई बहन का.

विनय के चेहरे पर अपमान के भाव तो कम उभरे आत्म- ग्लानि के भाव ज्यादा थे. अपना ही सोना खोटा हो तो किसे दोष देता विनय. मेरे वे शिकायती शब्द असत्य नहीं हैं यह स्पष्ट था. मेरी परेशानी भी कम न होगी वह समझ रहा था.

‘‘मां बीमार हैं, मीना. चलो, मैं तुम्हें लेने आया हूं.’’

‘‘मुझे कहीं नहीं जाना,’’ यह कह कर वह जाने लगी तो विनय ने बांह पकड़ रोकना चाहा, तब मीना बड़े भाई का हाथ झटक कर बोली, ‘‘मुझे तो एम.एड. में दाखिला चाहिए.’’

‘‘एम.एड. में दाखिला लेने के लिए क्या बदतमीजी करना जरूरी है?’’ विनय बोला, ‘‘तुम्हें तो छोटेबड़े का भी लिहाज नहीं है. जब पढ़लिख कर बदतमीजी ही सीखनी है तो तुम बी.ए. पास ही अच्छी थीं.’’

विनय के शब्द तनिक कड़वे हो गए थे जिन पर मुझे भी अच्छा नहीं लगा था. मीना मेरी पत्नी है. कोई उस पर नाराज हो, मैं भी तो यह नहीं चाहता.

‘‘मीना, तुम अपने होशोहवास में तो हो. तुम बच्ची नहीं हो जो इस तरह जिद करो. अपने घर के प्रति भी तुम्हारी कोई जिम्मेदारी बनती है.’’

‘‘मैं ने अपनी कौन सी जिम्मेदारी नहीं निभाई. मन मार कर वहीं तो रह रही हूं जहां आप ने ब्याह दिया है.’’

काटो तो खून नहीं रहा मुझ में और साथ ही विनय में भी. मानो वह मुझ से नजर चुरा रहा हो.

‘‘मुझे आप के साथ कहीं नहीं जाना. कह दीजिएगा मां से कि अब यहीं जीनामरना है, बस…’’

‘‘कैसी पागलों जैसी बातें कर रही हो. अजय जैसा अच्छा इनसान तुम्हारा पति है. जैसा चाहती हो वैसा ही करता है, और क्या चाहिए तुम्हें?’’

मैं कमरे से बाहर चला गया. आगे कुछ भी सुनने की चाह मुझ में नहीं थी. कुछ भी सुनना नहीं चाहा मैं ने. क्या सोच कर विनय को बुलाया था पर उस के आ जाने से तो सारा विश्वास ही डगमगा सा गया.

तंद्रा टूटी तो पता चला काफी समय बीत चुका है. शायद दोपहर होने को आ गई थी. विनय वापस जाने को कंधा हिला रहा था.

‘‘मीना को साथ ले जा रहा हूं. तुम अपना खयाल रखना.’’

और मीना बिना मुझ से मिले, विदा लिए, बिना कोई बात किए ही चली गई. नाश्ता उसी तरह मेज पर रखा रहा. मीना ने मेरी भूख के बारे में भी नहीं सोचा. भूखा रहना तो मेरी तब से मजबूरी है जब से उस के साथ बंधा हूं. कभीकभी तरस भी आता है मीना पर.

हमारे बीच कभी कोई सेतु बना ही नहीं. संतान होती तो भी कोई धागा बंध जाता हमारे बीच मगर मीना तो संतान के नाम से भी दूर भागती है. लेकिन आज जो कानों में पड़ा उस के पीछे मात्र पढ़ाई की जिद नहीं लगती, लगता है आवरण के भीतर कुछ और भी है. कोई ऐसी अतृप्त इच्छा, कोई ऐसी अपूर्ण चाह जिस का बदला शायद वह मेरी अवहेलना कर मुझ से ले रही है.

मीना चली गई तो ऐसा लगा जैसे चैन आ गया है मुझे. अपनी सोच पर अफसोस भी हो रहा है कि मैं मीना को बहुत चाहता हूं फिर उस का जाना प्रिय क्यों लग रहा है? ऐसा क्यों लग रहा है कि शरीर के किसी हिस्से में समाया मवाद बह गया और पीड़ा से मुक्ति मिल गई. जिस के साथ पूरी उम्र गुजारने की सोची उसी का चला जाना वेदना क्यों नहीं दे रहा मुझे?

कुछ दिन बीत गए. विनय हर 2-3 दिन पर फोन कर के मेरा हाल पूछ लेता. कभी रात मेरे पास ही रुक जाता मानो बहन ने जो देखभाल कभी नहीं की उसे भाई पूरा करने का प्रयास कर रहा है.

एक शाम मैं ने विनय को समझाना चाहा, ‘‘मेरी वजह से तुम क्यों अपने परिवार से दूर रह रहे हो, विनय, चारू भाभी को बुरा लगेगा.

‘‘तुम्हारी भाभी ने ही तो कहा है कि मैं तुम्हारे साथ रहूं और फिर तुम मेरा परिवार नहीं हो क्या? हैरान हूं मैं अजय, मीना का व्यवहार देख कर. वह सच में बहुत जिद्दी है. मैं भी पहली बार महसूस कर रहा हूं…तुम बहुत सहनशील हो अजय, जो उसे सहते रहे. तुम्हारी जगह यदि मैं होता तो शायद इतना लंबा इंतजार न करता.

‘‘अजय, सच तो यह है कि अपनी बहन का बचपना देख कर मुझे अपनी पत्नी और भी अच्छी लगने लगी है. दोनों में जब अंतर करता हूं तो पाता हूं कि चारू समझदार और सुघड़ पत्नी है. मीना जैसी को तो मैं भी सह नहीं पाता.

‘‘अकसर ऐसा होता है अजय, मनुष्य उस वस्तु से कभी संतुष्ट नहीं होता जो उस के पास होती है. दूसरे की झोली में पड़ा फल सदा ज्यादा मीठा लगता है. चारू की तुलना मैं सदा मीना से करता रहा हूं, मां ने भी अपनी बहू का अपमान करने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी. चारू मीना जितना पढ़लिख नहीं पाई क्योंकि शादी के बाद हम उसे क्यों पढ़ातेलिखाते? बी.ए. पास है, बस, ठीक है. मीना को तुम ने मौका दिया तो हम ने झट उसे चारू से बेहतर मान भी लिया पर यह कभी नहीं सोचा कि मीना की इच्छा का मान रखने के लिए तुम कबकब, कैसेकैसे स्वयं को मारते रहे.’’

‘‘चारू भाभी की अवहेलना मैं ने भी अकसर महसूस की है. मीना के जाने से मेरा भी भला हो रहा था और चारू भाभी का भी. मैं भी सुख की सांस ले रहा हूं और चारू भाभी भी.

‘‘कैसी है मीना, तुम ने बताया नहीं. क्या घर वापस नहीं आना चाहती? क्या मेरी जरा सी भी याद नहीं आती उसे?’’

‘‘पता नहीं, मुझ से तो बात भी नहीं करती. चारू से भी कटीकटी रहती है.’’

‘‘किसी के साथ खुश भी है वह. तुम बुरा मत मानना, विनय. कहीं ऐसा तो नहीं कि उस के जीवन में कोई और है या था…कहीं उस की शादी जबरदस्ती तो नहीं की गई?’’

मैं ने सहसा पूछा तो विनय के माथे पर कुछ बल पड़े फिर सामान्य हो कर और गहरा गए.

‘‘मैं ने मां से इस बारे में भी पूछा था.  तुम मेरे मित्र भी हो, अजय, तुम्हारे साथ जरा सी भी नाइंसाफी मैं सह नहीं सकता क्योंकि पिछले 6-7 साल से मैं तुम्हें जानता हूं कि तुम्हारा चरित्र सफेद कागज के समान है. कोई तुम्हारी भावना का अनादर क्यों करे? मेरी बहन भी क्यों? जहां तक मां का विचार है वह तो यही कहती हैं कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है.’’

‘‘तो आज मैं आ जाऊं उसे वापस ले आने के लिए? आखिर, कुछ तो इस समस्या का समाधान होना ही चाहिए. मीना मेरी पत्नी है, कुछ तो मुझे भी करना होगा न.’’

विनय की आंखें भर आईं. उस ने मेरा हाथ कस कर पकड़ लिया. संभवत: उसे भी यही एक रास्ता सूझ रहा होगा कि मैं ही कुछ करूं.

दूसरी सुबह मैं अपनी ससुराल पहुंच गया. पूरे 15 दिन बाद मैं मीना से मिलने वाला था.

सड़क की मरम्मत का काम चल रहा था. पूरे रास्ते पर कंकर बिछे थे इसलिए स्कूटर घर से बहुत दूर ही खड़ा करना पड़ा. पैदल ही घर तक आया इसीलिए मेरे आने का किसी को भी पता नहीं चला.

मैं घर के आंगन में खड़ा था. मां और भाभी दोनों रसोई में व्यस्त थीं. उन्होंने मुझे देखा नहीं. चुपचाप सीढि़यां चढ़ कर मैं ऊपर मीना के कमरे के पास पहुंचा और पति के अधिकार के साथ दरवाजा धकेला मैं ने.

‘‘चारू, तुम जाओ. मैं ने कहा न मुझे भूख नहीं है…

‘‘जानती हूं तुम्हारी चापलूसी को सभी को मेरे खिलाफ भड़काती हो…अनपढ़ गंवार कहीं की…तुम जलती हो मुझ से.’’

मीना की यह भाषा सुन कर मैं हक्काबक्का रह गया. आहट पर ही इतनी बकवास कर रही है तो आमनेसामने झगड़ा करने में उसे कितनी देर लगती होगी. कैसी औरत मेरे पल्ले पड़ गई है जिस का एक भी पहलू मेरे गले से नीचे नहीं उतरता.

‘‘चारू भाभी क्यों जलेगी तुम से? ऐसा क्या है तुम्हारे पास, जरा बताओ तो मुझे. तुम तो मानसिक रूप से कंगाल हो.’’

काटो तो खून नहीं रहा मीना में. मेरा स्वर और मेरी उपस्थिति की तो उस ने कल्पना भी न की होगी. अफसोस हुआ मुझे खुद पर और सहसा अपना आक्रोश न रोक पाने पर.

‘‘चारू भाभी से अच्छे व्यवहार जैसा कुछ है तुम्हारे पास? तुम तो न अपने मांबाप की सगी हो न भाईभाभी की. न ससुराल में तुम्हें कोई पसंद करता है न मायके में. यहां तक कि पति भी तुम से खुश नहीं है. ऐसा कौन है तुम्हारा जो तुम से प्यार कर के खुद को धन्य मानता है? तुम तो अपनी एम.ए., बी.एड. की डिगरी पर इतराती हो जिस का मूल्य बाजार में 1,000-1,500 रुपए से ज्यादा नहीं है.’’

सन्न रह गई मीना. शायद यह आईना उसे मैं ही दिखा सकता था. आंखें फाड़फाड़ कर वह मुझे देखने लगी.

‘‘धन्य मानो स्वयं को जो तुम्हें इतना चाहने वाले भाईभाभी मिले हैं, नाज उठाने वाले मांबाप मिले हैं और हर जिद पूरी करने वाला पति मिला है जो अपनी हर इच्छा मार कर भी तुम्हारी जिद पूरी करता है.

‘‘तुम तो बस, यही चाहती हो कि हर कोने में तुम्हारा ही अधिकार हो. मायके का यह कमरा हो या ससुराल का घर, हर इनसान बस, तुम्हारे ही चाहने पर कुछ चाहे या न चाहे. मीना, यह भी जान लो कि इनसान का हर कर्म, हर व्यवहार एक दिन पलट कर वापस आता है. इतना जहर न बांटो कि हर दिशा से बस, जहर ही पलट कर तुम्हारे पास वापस आए.’’

रो पड़ा था मैं यह सोच कर कि कैसे इस पत्थर को समझाऊं. सामने खिड़की के पार मजदूर बच्चे खेल रहे थे, हाथ पकड़ कर मैं मीना को खिड़की के पास ले आया और बोला, ‘‘वह देखो, सामने उन बच्चों को. सोच सकती हो वे कैसी गरमीसर्दी सह रहे हैं. कूलर की ठंडी हवा में चैन से बैठी हो न, सोचो अगर उन्हीं मजदूरों के घर तुम्हारा जन्म होता तो आज यही जलते कंकर तुम्हारा बिस्तर और यही पत्थर तुम्हारी रोजीरोटी होते तब कहां होते सब नाजनखरे? यह सब चोंचले तभी तक हैं जब तक सब सहते हैं.

‘‘तुम विनय की पत्नी का इतना अपमान करती हो, आज अगर वह तुम्हें कान से पकड़ कर बाहर निकाल दे तब कहां जाएगी तुम्हारी यह जिद, तुम्हारा लड़नाझगड़ना. क्यों मेरे साथसाथ इन सब का भी जीना हराम कर रखा है तुम ने?’’

अपना अनिश्चित भविष्य देख कर मैं घबरा गया था शायद, इसीलिए जैसे गया था वैसे ही लौट आया. किसी को मेरे वहां जाने का पता भी न चला.

विनय बारबार फोन कर के ‘क्या हुआ, कैसे हुआ’ पूछता रहा. क्या कहूं मैं उस से? कैसे कहूं कि मेरी पत्नी उस की पत्नी का अपमान किस सीमा तक करती है.

शाम ढल आई. इतवार की पूरी छुट्टी जैसे रोते शुरू हुई थी वैसे ही बीत गई. रात के 8 बज गए. द्वार पर दस्तक हुई. देखा तो हाथ में बैग पकड़े मीना खड़ी थी. क्या सोच कर उस का स्वागत करूं कि घर की लक्ष्मी लौट आई है या मेरी जान को घुन की तरह चाटने वाली मुसीबत वापस आ गई है.

‘‘तुम?’’

बिना कुछ कहे मीना भीतर चली गई. शायद विनय छोड़ कर बाहर से ही लौट गया हो. दरवाजा बंद कर मैं भी भीतर चला आया. दिल ने खुद से प्रश्न किया, कैसे कोई बात शुरू करूं मैं मीना से? कोई भी तो द्वार खुला नजर नहीं आ रहा

था मुझे.

हाथ का बैग एक तरफ पटक वह बाथरूम में चली गई. वापस आई तब लगा उस की आंखें लाल हैं.

‘‘चाय पिओगी या सीधे खाना ही खाओगी? वैसे खाना भी तैयार है. खिचड़ी खाना तुम्हें पसंद तो नहीं है पर मेरे लिए यही आसान था सो 15 दिन से लगभग यही खा रहा हूं.’’

आंखें उठा कर मीना ने मुझे देखा तो उस की आंखें टपकने लगीं. चौंकना पड़ा मुझे क्योंकि यह रोना वह रोना नहीं था जिस पर मुझे गुस्सा आता था. पहली बार मुझे लगा मीना के रोने पर प्यार आ रहा है.

‘‘अरे, क्या हुआ, मीना? खिचड़ी नहीं खाना चाहतीं तो कोई बात नहीं, अभी कुछ अच्छा खाने के लिए बाजार से लाते हैं.’’

बात को हलकाफुलका बना कर जरा सा सहज होने का प्रयास किया मैं ने, मगर उत्तर में ऐसा कुछ हो गया जिस का अनुभव मैं ने शादी के 3 साल बाद पहली बार किया कि समर्पित प्यार की ऊष्मा क्या है. स्तब्ध रह गया मैं. गिलेशिकवे सुनसुन कर जो कान पक गए थे उन्हीं में एक नई ही शिकायत का समावेश हुआ.

‘‘आप मुझे लेने क्यों नहीं आए इतने दिन? आज आए भी तो बिना मुझे साथ लिए चले आए?’’

‘‘तुम वापस आना चाहती थीं क्या?’’

हैरान रह गया मैं. बांहों में समा कर नन्ही बालिका सी रोती मीना का चेहरा ऊपर उठाया. लगा, इस बार कुछ बदलाबदला सा है. मुझे तो सदा यही आभास होता रहता था कि मीना को कभी प्यार हुआ ही नहीं मुझ से.

‘‘तुम एक फोन कर देतीं तो मैं चला आता. मुझे तो यही समझ में आया कि तुम आना ही नहीं चाहती हो.’’

सहसा कह तो गया मगर तभी ऐसा भी लगा कि मैं भी कहीं भूल कर रहा हूं. मेरे मन में सदा यही धारणा रही जो भी मिल जाए उसी को सरआंखों पर लेना चाहिए. प्रकृति सब को एकसाथ सबकुछ नहीं देती लेकिन थोड़ाथोड़ा तो सब को ही देती है. वही थोड़ा सा यदि बांहों में चला आया है तो उसे प्रश्नोत्तर में गंवा देना कहां की समझदारी है. क्या पूछता मैं मीना से? कस कर बांहों में बांध लिया. ऐसा लगा, वास्तव में सबकुछ बदल गया है. मीना का हावभाव, मीना की जिद. कहीं से तो शुरुआत होगी न, कौन जाने यहीं से शुरुआत हो.

तभी फोन की घंटी बजी और किसी तरह मीना को पुचकार कर उसे खुद से अलग किया. दूसरी तरफ विनय का घबराया सा स्वर था. वह कह रहा था कि मीना बिना किसी से कुछ कहे ही कहीं चली गई है. परेशान थे सब, शायद उन्हें यह उम्मीद नहीं थी कि वह मेरे पास लौट आएगी. मेरा उत्तर पा कर हैरान रह गया था विनय.

उलटे वह मुझे ही लताड़ने लगा कि पिछले 4-5 घंटे से मीना तुम्हारे पास थी तो कम से कम एक फोन कर के तो मुझे बता देते.

उस के 4-5 घंटे घर से बाहर रहने की बात सुन कर मैं भौचक्का रह गया क्योंकि मीना मेरे पास तो अभी आई है.

एक नया ही सत्य सामने आया. कहां थी मीना इतनी देर से?

उस के मायके से यहां आने में तो 10-15 मिनट ही लगते हैं. मीना से पूछा तो वह एक नजर देख कर खामोश हो गई.

‘‘तुम दोपहर से कहां थीं मीना, तुम्हारे घर वाले कितने परेशान हैं.’’

‘‘पता नहीं कहां थी मैं.’’

‘‘यह तो कोई उत्तर न हुआ. अपनी किसी सहेली के पास चली गई थीं क्या?’’

‘‘मुझ से कौन प्यार करता है जो मैं किसी के पास जाती. लावारिस हूं न मैं, हर कोई तो नफरत करता है मुझ से…मेरा तो पति भी पसंद नहीं करता मुझे.’’

फिर से वही तेवर, वही रोनापीटना, मगर इस बार विषय बदल गया सा लगा. मन के किसी कोने से आवाज उठी कि पति पसंद नहीं करता उस का कारण भी तुम जानती हो. जब इतना सब पता चल गया है तुम्हें तो क्या यह पता नहीं चलता कि पति की पसंद कैसे बना जाए.

प्रत्यक्ष में धीरे से मीना का हाथ पकड़ा और पूछा, ‘‘मीना, कहां थीं तुम दोपहर से?’’

मेरे गले से लग पुन: रोने लगी मीना. किसी तरह शांत हुई, उस के बाद जो उस ने बताया उसे सुन कर तो मैं दंग ही रह गया.

मीना ने बताया कि घर की चौखट लांघते समय समझ नहीं पाई कि कहां जाऊंगी. आप ने सुबह ठीक ही कहा था, मेरी जिद तब तक ही है जब तक कोई मानने वाला है. मेरे अपने ही हैं जो मेरी हर खुशी पूरी करना चाहते हैं. 4 घंटे स्टेशन पर बैठी आतीजाती गाडि़यां देखती रही…कहां जाती मैं?

विस्मित रह गया मैं मीना का चेहरा देख कर. सत्य है, जीवन से बड़ा कोई अध्यापक नहीं और इस संसार से बड़ी कोई पाठशाला कहीं हो ही नहीं सकती. सीखने की चाह हो तो इनसान यहां सब सीख लेता है. निभाना भी और प्यार करना भी. यह जो सख्ती विनय के परिवार ने अब दिखाई है वही बचपन में दिखा दी होती तो मीना इतनी जिद्दी कभी नहीं होती. हम ही हैं जो कभीकभी अपना नाजायज लाड़प्यार दिखा कर बच्चों को जिद्दी बना देते हैं.

‘‘एक बार तो जी में आया कि गाड़ी के नीचे कूद कर अपनी जान दे दूं. समझ नहीं पा रही थी कि मैं कहां जाऊं,’’ मीना ने कहा और मैं अनिष्ट की सोच कर ही कांप गया.

पसीने से भीग गया मैं. ऐसी कल्पना कितनी डरावनी लगती है. मेरी यह हालत देख कर मीना बोली, ‘‘अजय, क्या हुआ?’’ और वह मेरी बांह पकड़ कर हिला रही थी.

‘‘अजय, आप मेरी बात सुन कर परेशान हो गए न. जो सच है वही तो बता रही हूं…आज जो सब हुआ वही तो…’’

मैं ने कस कर छाती में भींच लिया मीना को. मीना जोश में आ कर कोई गलत कदम उठा लेती तो मेरी हालत कैसी होती. मैं ऐसा कैसे कर पाया मीना के साथ. 15 दिन तक हालचाल भी पूछने नहीं गया और आज सुबह जब गया भी तो यह भी कह आया कि मीना का पति भी मीना से प्यार नहीं करता. रो पड़ा मैं भी अपनी नादानी पर. एक नपातुला व्यवहार तो मैं भी नहीं कर पाया न.

‘‘अजय, आप पसंद नहीं करते न मुझे?’’

‘‘मुझे माफ कर दो, मीना, मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए था.’’

‘‘आप ने अच्छा किया जो ऐसा कहा. आप ऐसा नहीं कहते तो मुझे कुछ चुभता नहीं. कुछ चुभा तभी तो आप के पास लौट पाई.

‘‘मैं जानती थी, आप मुझे माफ कर देंगे. मैं यह भी जानती हूं कि आप मुझ से बहुत प्यार करते हैं. आप ने अच्छा किया जो ऐसा किया. मुझे जगाना जरूरी था.’’

हैरानपरेशान तो था ही मैं, मीना के शब्दों पर हक्काबक्का और स्तब्ध भी. स्वर तो फूटा ही नहीं मेरे होंठों से. बस, मीना के मस्तक पर देर तक चुंबन दे कर पूरी कथा को पूर्णविराम दे दिया. जो नहीं हुआ उस का डर उतार फेंका मैं ने. जो हो गया उसी का उपकार मान मैं ने ठंडी सांस ली.

‘‘मैं एक अच्छी पत्नी और एक अच्छी मां बनने की कोशिश करूंगी,’’ रोतेरोते कहने लगी मीना और भी न जाने क्याक्या कहा. अंत भला तो सब भला लेकिन एक चुभन मुझे भी कचोट रही थी कि कहीं मेरा व्यवहार अनुचित तो नहीं था. Most Popular Story in Hindi.

Hindi Comedy Story: बाबापंथी- धोखा देते पोंगा पंडित

Hindi Comedy Story: एक सज्जन मुंह में पान चबाते हुए बोले, ‘‘अंधभक्ति का चोला ओढ़े इतनी जनता आती कहां से है, जबकि जिस से भी पूछो, सब कहेंगे कि हम तो अंधभक्त नहीं हैं, हम तो आंख खोल कर बाबाओं पर भरोसा करते हैं.’’

पान बेचने वाले दुकानदार ने कहा, ‘‘कोई धर्म कभी पाखंड का साथी नहीं होता, न ही मर्यादाहीन. फिर ये नईनई उपजें कहां से हो जाती हैं, जो भक्तों की श्रद्धा पर ही चोट कर जाती हैं. आंखें कितनी भी खोल कर रखो, जब अंतर्मन पर ही पट्टी बंधी है तो क्या खुलेंगी आंखें. भक्ति में इतनी शक्ति है कि बाबा गए अंदर तो भक्तों का शुरू हो जाता है तांडव बाहर. फिर वे न देखते आसपास, फिर मिटाते हैं वही जो वस्तुएं होती हैं खास.’’

वे सज्जन थोड़ा मुसकराए और बोले, ‘‘अच्छी भक्तों की बात उड़ाई, मुझे एक किस्से की याद दिलाई. कुछ समय पहले एक बाबा जेल गए थे, वहां का थानेदार ही उन का भक्त निकला और सारी सुधसुविधाएं जेल में दे दीं. अब बाबाजी भक्तों के लिए जेल में हैं, लेकिन हैं आराम से. ज्ञान बांटते हैं बाकी कैदियों को और जेल में भक्त जुटाते शान से. कुछ महीनों में बेल मिल जाती है, तो घर पर आराम से छुट्टियां बिताते हैं, कुछ तो जा कर विदेश भी घूम आते हैं. न्याय व्यवस्था की कमी सब को ले डूबी. बस, उभर पाए ये बाबा हैं, जो भक्तों को मोहजाल में फंसा ले जाते हैं.’’

आसपास के खड़े हुए व्यक्तियों के चेहरे पर एक मुसकान छा गई जैसे उन के मन की बात बिना बोले ही मैदान में आ गई.

फिर उस सज्जन व्यक्ति की नजर दुकानदार की दुकान में रखे पान के मसालों पर पड़ी, तो पाया कि बाबा इलायची, बाबा लौंग, बाबा 300, बाबा 120, बाबा पानमसाला, लक्खमी गुलकंद, चमनबहार और बाबाओं का हो गया पान पर भी अधिकार.

पैसे देने के लिए जैसे ही जेब में हाथ डाला, केसरिया नोट पहले हाथ में आया. पान चबाया और बाबा के पोस्टर लगे खंभे पर नीचे ही पीक डाला.

फिर सज्जन बोले, ‘‘दान एक ऐसा पुण्य का काम है, जिसे सभी करना चाहते हैं. और आजकल कुछ लोगों ने धर्म को पैसा कमाने का एक साधन समझ लिया है और बखूबी इस का इस्तेमाल भी कर रहे हैं. भूल जाते हैं वे कि भगवा एक रंग नहीं, बल्कि एक सचाई है. जिस का रंग जब चढ़ता है, तो सूर्य सा अलग चमकता है और जब उतरता है तो भक्तों के भरोसे को तोड़ कर तो सफेद रंग ही सजता है.

सूर्य में 7 रंग होते हैं, फिर भी सफेद रंग ही दिखता है, बाकी 6 रंग इंद्रधनुष की छटा में सिमट जाते हैं. सफेद रंग तो शांति का प्रतीक है, चाहे घर में हो, शरीर पर हो या…, अलग ही दिखता है.

दुकानदार बोला, “भाई साहब, शांति मिलना भी समय की बात है. शांति की तलाश में लोग बाबाओं की शरण में जाते हैं, उन्हें शांति मिले या न मिले, लेकिन बाबाओं को असीम शांति और भरपूर लक्ष्मी मिलती है जिस से उन की जिम्मेदारी बन जाती है अपनी दुकान को यों ही चलाते रहने की. अब दुकान नहीं चलेगी तो कमाई कैसे मिलेगी. आप ने अभी पान खाया, मेरा फर्ज बन गया अच्छा पान बनाने का. फिर चाहे आप पीक कहीं भी थूको, बाबा की कृपा से, मुझे क्या. मेरी दुकान तो चल रही है.”

सज्जन बड़ी गंभीरता से बोले, “सही बात है. दुकान खोली है तो चलानी भी पड़ेगी. आदमी भले ही कहे कि हम तो अंधविश्वासी नहीं हैं, लेकिन जब परेशान होता है या कोई अपना दुखी है, तब इन्हीं बाबाओं की याद आती है और आदमी को पता भी नहीं लगता कि वह कब अंधविश्वास में फंस गया है.

“सनातन कभी छलकपट का साथी नहीं था. सच है जो वह सामने आना ही है एक दिन, कितना भी रामनाम जपो. सच होगा तो श्रद्धा कायम रहेगी भक्तों की वरना भक्तों का भरोसा जब उठता है, बाबा तब जेल में दिखता है.”

दुकानदार बोला, “सही बात है. मेरी दुकान में फायदा है, कंपनी का नाम भले बाबा हो, लेकिन धोखाधड़ी नहीं मिलेगी. यहां पान के साथसाथ देशदुनिया की खबर भी मुफ्त में मिलेगी.” Hindi Comedy Story.

Family Story in Hindi: एक ही नाव पर सवार- महिमा ने करुणा से क्या छीना था?

Family Story in Hindi: अभीअभी मंथन का फोन आया था. उस के फोन ने करुणा के मन के पट खोल दिए, जिन से आए झोंके के साथ करुणा अतीत में उड़ चली. वह दिन आज भी उस के मानस पटल पर अंकित है, जब मंथन और 2 बच्चों, अंकित और संचित सहित सुखद संसार था उस का. तब उसे क्या पता था कि सुख के जिन सतरंगी रंगों में वह सराबोर है, वे इतने कच्चे हैं कि काली घटा की एक झड़ी ही उन्हें धो देगी. पर, सच सामने आ ही गया.

एक दिन मंथन सारे बंधन तोड़ कर महिमा के मोहपाश में बंध गया. जिस घने वृक्ष की छाया में वह अपने नन्हेमुन्ने 2 बच्चों के साथ निश्चिंत और सुरक्षित थी, जब वह वृक्ष ही उखड़ गया तो खुले आकाश के नीचे उसे कड़ी धूप और वर्षा का सामना तो करना ही था.

कुछ दिन तो इस आघात के प्रहार से सुधबुध खोए हाथ पर हाथ धरे बैठी करुणा महिमा को कोसती रही, जिस ने उस का सर्वस्व छीन लिया था. फिर जीवनयापन का प्रश्न सामने आया. मम्मीपापा थे नहीं और भैया सुदूर आस्ट्रेलिया में बस गए थे. मात्र स्नातक, अनुभवहीन को नौकरी मिलना आसान न था. ऐसे में उस की बचपन की सहेली रुचि उस का संबल बनी. उसी की प्रेरणा और सहयोग से अपनी एकमात्र पूंजी आभूषण बेच कर उस ने एक बुटीक खोला.

धीरेधीरे उस के कौशल और परिश्रम से बुटीक सफलतापूर्वक चलने लगा, जिस से उस की माली हालत तो मजबूत हो गई, पर प्यार और विश्वास की छत के अभाव में घर अधूरा ही रहा.

बच्चे जब भी पापा के लिए मचलते, करुणा महिमा को शापित करती जिस ने इन निश्छल बच्चों से उन के पापा की छत्रछाया छीन ली थी.

उस का दिन बच्चों के पालनपोषण और बुटीक के कार्यों में कब बीत जाता, उसे पता ही न चलता, पर रात्रि के अंधकार में जब वह शैय्या पर लेटती तो अनायास ही यह कल्पना कि मंथन की बांहों में महिमा होगी, उसे विचलित कर देती और वह अपमान और घृणा से झुलसती हुई तपती शैय्या पर करवटों में ही रात काट देती. उसे मंथन का प्यार, मनुहार और प्रणय याद आता. उसे विश्वास ही न होता कि जो व्यक्ति उस पर इतना आसक्त था वह कैसे इतनी दूर चला गया.

वह इसी निष्कर्ष पर पहुंचती कि सुदर्शन और उच्च पदासीन मंथन को महिमा ने अपने तिरियाचरित्तर से फंसा लिया होगा, पर उस की आस का दीप अभी बुझा न था. उस में एक लौ अभी भी प्रज्वलित थी, जो मंथन के लौटने का विश्वास दिलाती थी. इसी आशा में वह आएदिन उपवास करती, मन्नतें मानती. उस की तो बस, एक ही आकांक्षा थी, महिमा को पराजित कर मंथन को वापस पाना.

करुणा को स्वयं के दुख और संघर्ष तो प्रताड़ित करते ही थे, पर उन से भी अधिक कष्ट उसे तब होता, जब लोग अपनी उत्सुकता शांत करने हेतु तरहतरह के विचित्र, व्यक्तिगत प्रश्न पूछते और सहानुभूति के आवरण में उस के घावों पर नमक छिडक़ते.

करुणा का स्वाभिमान इन बातों से लहूलुहान हो जाता था, पर किसी को चुप कराना उस के वश में न था. अत: वह खून का घूंट पी कर रह जाती थी और उस के मन का दबा आक्रोश महिमा के प्रति उस की घृणा को और भी बढ़ा देता था.

उस ने एक बार महिमा को समारोह में देखा था. मंथन और महिमा एकदूसरे का हाथ थामे घूम रहे थे. लज्जित तो मंथन और महिमा को होना चाहिए था, जो अवैध संबंधों का पोषण कर के समाज के नियमों का उल्लंघन कर रहे थे, पर लोगों की उत्सुकता भरी नजरें और महिमा की गर्वमिश्रित मुसकान को सहना करुणा के वश में न था. अत: वह बीच में ही घर लौट आई, पर उस दिन महिमा की विजय दृष्टि का जो दंश उस के दिल में चुभा, वह निरंतर टीसता रहा.

कालचक्र निर्बाध गति से घूमता रहा. करुणा के तप और परिश्रम से अंकित और संचित क्रमश: कंप्यूटर कोर्स और एमबीए करने पूना और अहमदाबाद चले गए. अब करुणा शहर की प्रतिष्ठित ड्रैस डिजाइनर थी, पर अति व्यस्त दिनचर्या में भी उस टीस से वह उबर न पाई थी.

एक दिन करुणा सूट की डिजाइन बनाने में लीन थी, तभी फोन घनघना उठा. किसी ग्राहक का फोन होगा, सोच कर उस ने रिसीवर उठाया. उधर से आते स्वर ने उस के दिल की धड़कनें बढ़ा दीं. आज वर्षों बाद उसे मंथन ने फोन किया था. उस की आवाज पहचानने में करुणा को एक क्षण भी न लगा.

आज मंथन की आवाज में विशेष प्रेम और आत्मीयता थी. उस नेे कहा, ‘‘करुणा, मैं जानता हूं कि क्षमायोग्य नहीं हूं, पर यदि तुम मुझे क्षमा कर दो तो मैं घर लौटना चाहता हूं.’’

करुणा कुछ क्षण तो विमूढ़ सी रह गई. उस के कंठ से शब्द ही न फूटे, फिर चौंक कर बोली, ‘‘इस घर के द्वार तो तुम्हारे लिए सदा ही खुले थे, तुम ही न आए.’’

यह सुन कर मंथन उत्साहित हो गया. बोला, ‘‘करुणा, तुम महान हो. मैं तो डर रहा था कि तुम मुझे दुत्कार दोगी. पर, सच मानो तो आज भी मैं तुम्हें दिल से प्यार करता हूं और तुम्हारे बिना नहीं रह सकता.’’

यही वे शब्द थे, जिन्हें सुनने को करुणा वर्षों से तरस रही थी. उस के मस्तिष्क में महिमा की गर्वमिश्रित मुसकान घूम गई. महिमा पर विजय के एहसास ने मंथन के प्रति सारे गिलेशिकवे मिटा दिए. उस ने निश्चित किया कि आज वह स्वयं जा कर मंथन को लाएगी, जिस से अपनी आंखों से महिमा को पराजित देख सके.

शाम तक करुणा की मित्रमंडली उस की विजय उद्घोषणा सुन चुकी थी. वह सब को बता देना चाहती थी कि मंथन प्यार तो उसी को करता है.

जब घड़ी ने 5 बजाए, तो वह चौंक कर उठी और एक बार दर्पण में स्वयं का निरीक्षण किया और अपने यत्न से संवारे रूप पर स्वयं ही मोहित हो कर वर्षों से प्रतीक्षित विजय अभियान पर चल पड़ी.

करुणा अपनी गाड़ी स्वयं चला कर मंथन के बताए पते पर पहुंची. मंथन बाहर ही खड़ा बेचैनी से उस की प्रतीक्षा कर रहा था. पर, करुणा को तो महिमा का पराजित रूप देखना था. लिहाजा, वह स्वयं ही अंदर चली गई.

हताश महिमा निढाल सी बैठी थी. उस के सूजे लाल नेत्र उस की व्यथा का वर्णन कर रहे थे. करुणा को देखते ही महिमा रो पड़ी, ‘‘करुणाजी, मैं आप की अपराधी हूं. पर, सच मानिए, जब मैं ने मंथन से संबंध बनाए तब मुझे पता भी न था कि यह विवाहित हैं और जब पता चला तो बहुत देर हो चुकी थी. मुझ पर दया करिए और मंथन को मत ले जाइए.’’

‘‘क्यों…?’’ इस पर करुणा ने व्यंग्य से कहा, ‘‘तुम ने तो मेरा घर उजाड़ दिया और आज जब मेरे पति घर लौटना चाहते हैं, तो तुम मुझ से दया की आस कर रही हो.’’

‘‘यह सच है कि मैं मंथन के प्यार में अंधी हो गई थी, पर जब मुझे पता चला कि वह विवाहित हैं, तो मैं ने उन से दूर जाने का निर्णय ले लिया था. तब मंथन स्वयं ही हठ कर के मेरे पास आए थे और तब मैं निर्बल पड़ गई. मेरे स्वार्थ का ही मुझे आज दंड मिल रहा है. अब आप यदि मंथन को ले गई, तो मैं सड़क पर आ जाऊंगी…’’ महिमा सिर झुका कर बोली और अंदर जा कर 5-6 साल की अपनी बच्ची को ले आई, जो बोल भी नहीं सकती थी.

तब करुणा को पता चला कि मंथन और महिमा की मूकबधिर बेटी है और कंपनी के किसी आर्थिक घोटाले में मंथन की नौकरी भी चली गई है.

महिमा की विजय पताका फहरा कर गिर गई. अब उसे समझ में आया कि अचानक मंथन को उस के प्रति प्यार क्यों उमड़ा. अभी कुछ देर पहले जिस मंथन पर उसे प्यार आ रहा था, उस के चेहरे का आवरण गिर गया और स्वार्थ व नीचता का जो घिनौना रूप उस के सामने जो खुल कर आया, उसे देख कर करुणा ने मुंह फेर लिया.

जिस महिमा को नीचा दिखाने का उस ने वर्षों से सपना संजोया था, अब वह उसे स्वयं को प्रतिरूप लगी और उस बच्ची की याचना करती आंखों में उसे उस दिन के सहमेसिकुड़े अंकित और संचित दिखे. आज उसे अनुभव हुआ कि वह और महिमा तो एक ही नाव पर सवार हैं, जिन्हें डुबोने वाला मंथन है. वह व्यर्थ ही वर्षों से महिमा से घृणा करती रही. सच तो यह है कि मंथन न उसे प्यार करता है और न महिमा को, वह तो बस, स्वयं को प्यार करता है और निजी सुविधानुसार प्यार का पात्र चुन लेता है.

करुणा के हृदय में जागृत प्रेमस्रोत हिमखंड बन गया. वह दृढ़ता से खड़ी हुई और बोली, ‘‘महिमा, अगर तुम्हारी आंखें खुल गई हों तो चलो, मैं तुम्हें अपने बुटीक में काम दे कर जीवनयापन योग्य बना दूंगी.’’

फिर वह मंथन की ओर देखती हुई बोली, ‘‘आज के बाद हमारी नाव डुबोने वाला डूबेगा, हम नहीं.’’

महिमा वास्तविकता के धरातल पर आ चुकी थी. अत: अपने भविष्य की सुरक्षा हेतु वह तुरंत करुणा के साथ चल दी. मंथन अविश्वास से लुटा हुआ उन्हें जाते हुए देखता रहा.
……….

फेसबुक पोस्ट : करुणा का हंसताखेलता परिवार महिमा ने तहसनहस कर दिया था. उस ने करुणा का पति मंथन जो उस से छीन लिया था. दुख की मारी करुणा ने किसी तरह खुद को संभाला और अपनी जिंदगी को पटरी पर लाई. फिर अचानक एक दिन मंथन का फोन आया और करुणा गदगद हो गई. वह लौट पर मंथन की ओर. पर उस की मुराद पूरी हुई? Family Story in Hindi.

Family Story in Hindi: कविता- अपनी ही पत्नी कि हत्या करने पर क्यों मजबूर हुआ विभाष?

Family Story in Hindi: विभाष ने पक्का निश्चय कर लिया कि भले ही उसे नौकरी छोड़नी पड़े, लेकिन अब वह दिल्ली में बिलकुल नहीं रहेगा. संयोग अच्छा था कि उसे नौकरी नहीं छोड़नी पड़ी. मैनेजमेंट ने खुद ही उस का लखनऊ स्थित ब्रांच में ट्रांसफर कर दिया.

विभाष के लिए यह दोहरी खुशी इसलिए थी, क्योंकि उस की पत्नी लखनऊ में ही रहती थी. ट्रांसफर का और्डर मिलते ही विभाष जाने की तैयारी में जुट गया, उस ने पैकिंग शुरू कर दी. वह एकएक कर के सामान बैग में रख रहा था. उस के पास एक दरजन से भी ज्यादा शर्ट थीं. उन्हें रखते हुए उसे अंदाजा हो गया कि उस के पास लगभग हर रंग की शर्ट है. लेकिन उन में नीले रंग की शर्टें कुछ अधिक ही थीं. क्योंकि अवी यानी अवनी को नीला रंग ज्यादा अच्छा लगता था.

शुरूशुरू में जब वह अवनी से मिलने जाता था, हमेशा नई शर्ट पहन कर जाता था. अवनी उस के सिर के बालों में अंगुलियां फेरते हुए कहती थी, ‘‘विभाष, नीली शर्ट में तुम बहुत स्मार्ट लगते हो.’’

अवनी के बारबार कहने की वजह से ही नीला रंग उस की पसंद बन गया था. शर्टों को देखतेदेखते उस ने अपना हाथ सिर पर फेरा तो उसे अजीब सा लगा. वह अपना घर खाली कर रहा था, वह रसोई का सारा सामान समेट चुका था. फ्रीज में रखा जूस और ब्रेड भी खत्म हो गई थी. डाइनिंग टेबल पर रखी फलों की टोकरी भी खाली थी.

सब चीजों को खाली देख कर उस से अपने भरे हुए बैग की ओर देखा. उस के मन में आया कि घर खाली करने में वह जितना समय लगाएगा, उसे उतनी ही देर होगी. अभी उस के बहुत काम बाकी था, जिस के लिए उसे काफी दौड़भाग करनी थी.

अभी उस ने बैंक का अपना खाता भी बंद नहीं कराया था. लेकिन इस के लिए वह परेशान भी नहीं था. क्योंकि उस में कोई ज्यादा रकम नहीं थी. थोड़े पैसे पडे़ थे. लेकिन एक बार बैंक मैनेजर से मिलने का उस का मन हो रहा था. बैंक मैनेजर से ही नहीं, अवनी से भी. दिल्ली आ कर उस ने नोएडा में अपनी नौकरी जौइन की थी. तब फाइनेंस मैनेजर गुप्ताजी ने उसे बैंक के खासखास कामों की जिम्मेदारी सौंप दी थी, जो उस ने बखूबी निभाई थी.

विभाष की कार्यकुशलता देख कर ही उसे बैंक के बड़े काम सौंपे गए थे. बैंक मैनेजर मि. शर्मा से उस की अच्छी पटती थी. शर्माजी ने ही उस का परिचय अवनी से कराया था. इस के बाद बैंक के कामों को ले कर उस की अवनी से अकसर मुलाकात होने लगी, जो धीरेधीरे बढ़ती गई.

विभाष और बैंक अधिकारी अवनी की ये मुलाकातें जल्दी ही दोस्ती में बदल गईं. कभीकभी दोनों बैंक के बाहर भी मिलने लगे. उन की इन मुलाकातों में अवनी की अधिक उम्र, 3 साल के बेटे की मां होना और विधवा होने के साथसाथ लोगों की कानाफूसी भी आड़े नहीं आई. उन की दोस्ती और प्यार गंगा में तैरते दीए की तरह टिमटिमाता रहा.

मजे की बात यह थी कि दोनों का एक शौक मेल खाता था, कौफी पीने का. उन्हें जब भी मौका मिलता, अट्टा मार्केट स्थित कौफीहाउस में कौफी पीने पहुंच जाते. कौफी पीते हुए दोनों न जाने कितनी बातें कर डालते. उन में मनीष की यादें भी होती थीं. मनीष यानी अवनी का पति.

ध्रुव की मस्ती का खजाना भी कौफी की सुगंध में समाया होता था. मनीष के साथ शादी और उस की छोटीछोटी आदतों का विश्लेषण भी कौफी की मेज पर होता था. कभीकभी दोनों चुपचाप एकदूसरे को ताकते हुए कौफी की चुस्की लेते रहते.

उस समय दोनों के बीच भले ही मौन छाया रहता, लेकिन दिल कोई मधुर गीत गाता रहता. अवनी के गालों पर आने वाली लटों को विभाष एकटक ताकता रहता. उन लटों से वह कब खेलने लगा उसे पता ही नहीं चला.

मनीष की बातें करते हुए अवनी के चेहरे पर जो भाव आते, वे विभाष को बहुत अच्छे लगते थे. ऐसे में एक दिन उस ने कहा भी था, ‘‘अवनी, तुम्हारी बातों और आंखों में बसे मनीष को मैं अच्छी तरह पहचान गया हूं. लेकिन अब तुम्हारे जीवन में विभाष धड़कने लगा है.’’

यह सुन कर अवनी की आंखों में अनोखी चमक आ गई थी. उस ने कहा था, ‘‘विभाष, मेरी और मनीष की शादी घर वालों की मरजी से हुई थी. पर हमारे प्यार के लय में लैला मजनूं जैसी धड़कनें थीं.’’ यह कहतेकहते उस की आवाज गंभीर हो गई थी. उस ने आगे कहा था, ‘‘मेरा ध्रुव मेरे लिए मनीष के प्यार की भेंट है. अब वही मेरे जीवन का आधार है.’’

विभाष की शादी कुछ दिनों पहले ही हुई थी. उस की पत्नी लखनऊ यूनिवर्सिटी से बीएड कर रही थी. इसलिए वह विभाष के साथ दिल्ली नहीं आ सकी थी. वैसे भी यहां विभाष की नईनई नौकरी थी. वह यहां अच्छी तरह जम कर, अपना फ्लैट ले कर पत्नी को लाना चाहता था.

अब उसे पत्नी के बिना एक पल भी रहना मुश्किल लगने लगा था. एक दिन अवनी ने उस से पूछा भी था, ‘‘तुम यहां से पत्नी के लिए क्या ले जाओगे?’’

जवाब देने के बजाए विभाष अवनी को एकटक ताकता रहा. उसे इस तरह ताकते देख अवनी खिलखिला कर हंसते हुए बोली, ‘‘अरे मेरे बुद्धू राम, तुम यहां से जा रहे हो तो पत्नी के लिए कुछ तो ले जाओगे. उसे क्या पसंद है?’’

‘‘उसे रसगुल्ला बहुत पसंद है.’’ विभाष ने कहा.

अवनी और जोर से हंसी, किसी तरह हंसी को रोक कर उस ने कहा, ‘‘अरे रसगुल्ला तो पेट में जा कर हजम हो जाएगा. तुम्हें नहीं लगता कि कोई ऐसी चीज ले जानी चाहिए, जो महिलाओं को अच्छी लगती हो.’’

विभाष को असमंजस में फंसा देख कर अवनी मुसकरा कर रह गई. कुछ दिनों बाद अवनी ने एक बढि़या सी हरे रंग की साड़ी ला कर विभाष को देते हुए कहा, ‘‘इसे अपनी पत्नी के लिए ले जाइए, उन्हें बहुत अच्छी लगेगी.’’

विभाष कुछ देर तक उस साड़ी को हैरानी से देखता रहा. उस के बाद अवनी पर नजरें जमा कर पूछा, ‘‘तुम्हें कैसे पता चला कि यह रंग मेरी पत्नी को बहुत पसंद है?’’

‘‘तुम्हारी बातों से.’’ अवनी ने सहज भाव से कहा.

थोड़ी देर तक विभाष कभी साड़ी को तो कभी अवनी को देखता रहा. वह अवनी की दी गई भेंट को लेने से मना नहीं कर सकता था, इसलिए साड़ी ले कर अपने औफिस बैग में रख ली. धीरेधीरे दोनों में नजदीकियां बढ़ती गईं. यह नजदीकी कोई और रूप लेती, उस के पहले ही विभाष ने वह समाचार ‘प्रेमिका के लिए पत्नी की हत्या’ पढ़ा. ऐसे में उस का घर ही नहीं जिंदगी भी बिखर सकती थी.

वह भूल गया था कि यहां रह कर वह अवनी से दूर नहीं रह सकता. इसीलिए उस ने वापस जाने का निर्णय लिया था. उस के बौस उस के काम से खुश थे. इसलिए उसे अपने लखनऊ स्थित औफिस में शिफ्ट कर दिया था. इस तरह उस की नौकरी भी बची रहती और वह अपनी पत्नी के पास भी पहुंच जाता.

उस ने अलमारी से अवनी द्वारा दी गई साड़ी निकाली. कुछ देर तक साड़ी को देखने के बाद उस ने जैसे ही बैग में रखी, डोरबेल बजी. कौन हो सकता है. उस ने सब के पैसे तो दे दिए थे. अपने जाने की बात भी बता दी थी.

उस ने दरवाजा खोला तो सामने अवनी को खड़ा देख हैरान रह गया. वह इस वक्त आ सकती है, उसे जरा भी उम्मीद नहीं थी, इसीलिए वह उसे अंदर आने के लिए भी नहीं कह सका. अवनी उस का हाथ पकड़ कर अंदर ले आई. विभाष उसे देखने के अलावा कुछ कह नहीं सका.

अवनी के अंदर आते ही जैसे एक तरह की सुगंध ने उसे घेर लिया. उस सुगंध ने उस के मन को ही नहीं, बल्कि देह को. खास कर आंखें को घेर लिया था. उस का मन अभी भी मानने को तैयार नहीं था कि अवनी उस के कमरे में उस के साथ मौजूद है. जबकि अवनी उस का हाथ थामे उस के समने खड़ी थी.

सुगंध उस की आंखों में भरी थी, जो मन को लुभा रही थी. क्योंकि अवनी एक मस्ती भरे झोंके की तरह थी. वह कब खुश हो जाए और कब नाराज, अंदाजा लगाना मुश्किल था. तभी उसे कुछ दिनों पहले की बात याद आ गई.

अचानक एक दिन अवनी ने कौफी पीने जाने से मना कर दिया था. ऐसा क्यों हुआ, विभाष अंदाजा भी नहीं लगा सका. उस ने भी अवनी से कौफी पीने चलने का आग्रह नहीं किया. कुछ कहे बगैर वह वहां से चला गया. जहां वह हमेशा कौफी पीता था, वहीं गया.

अवनी ने कौफी पीने से मना कर दिया था, इसलिए कौफी पीने का उस का भी मन नहीं हुआ. आखिर में बगैर कौैफी पिए ही वह घर लौट आया. विभाष इतना ही सोच पाया था कि अवनी रसोई के पास आ कर बोली, ‘‘कौफी है या वो भी खत्म कर दी?’’

अब तक विभाष को घेरने वाली मनपसंद सुगंध हट गई थी. उस ने आंखें झपकाते हुए कहा, ‘‘नहीं…नहीं, कौफी की शीशी अपनी जगह पर रखी है.’’

कहता हुआ विभाष अवनी के पीछेपीछे किचन में आ गया. उस ने किचन की छोटी सी अलमारी से सारा सामान समेट लिया था.

लेकिन कौफी की शीशी और चीनी रखी थी. उस में से कौफी की शीशी निकाल कर अवनी के हाथ में रख दी. अवनी कौफी बनाने लगी तो वह बाहर आ गया. अवनी कौफी के कप ले कर कमरे में आई तो विभाष वहां नहीं था. उसे कौफी की सुगंध बहुत पसंद थी. वह वहां से चला गया, यह सोचते हुए अवनी कौफी से निकलती भाप को देखती रही.

पलभर बाद विभाष हांफता आया तो उस के हाथों में मोनेको और मेरी गोल्ड बिस्किट के पैकेट थे. अवनी ने कहा, ‘‘आज तो बिना बिस्किट के भी चल जाता.’’

‘‘जो आदत है, वह है. उस के बिना कैसे चलेगा?’’ विभाष ने कहा.

‘‘तुम्हारे बिना तो अब चलाना ही पड़ेगा.’’ अवनी ने कहा.

इसी के साथ दोनों की नजरें मिलीं, जैसे बिना गिरे कोई चीज व्यवस्थित हो जाए. उसी तरह उन की नजरें व्यवस्थित हो गई थीं. अवनी ने पूछा, ‘‘अभी तुम्हारी कितनी पैकिंग बाकी है?’’

‘‘लगभग हो ही गई है.’’

‘‘तो आज आखिरी बार साथ बैठ कर कौफी पी लेते हैं.’’ कहते हुए अवनी कौफी के दोनों कप ले कर बालकनी में आ गई. वहां पड़ी प्लास्टिक की कुरसी पर बैठते हुए अवनी ने कहा, ‘‘तुम्हें यहां आए कितने दिन हुए?’’

विभाष ने कौफी की चुस्की लेते हुए कहा, ‘‘करीब 1 साल.’’

‘‘मुझे अच्छी तरह याद है. तुम्हें यहां आए 11 महीने 10 दिन हुए हैं.’’ अवनी ने कहा.

विभाष ने कोई जवाब नहीं दिया. क्योंकि वह जानता था कि बैंक अधिकारी अवनी का जोड़नाघटाना गलत नहीं हो सकता. अवनी ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘तुम जब भी आए, अपनी जानपहचान को गिनो तो एक लंबा अरसा हो गया, लेकिन देखा जाए तो यह कोई बहुत लंबा अरसा भी नहीं है.

‘‘तुम्हारे आने से जिंदगी जीने के लिए मुझे एक साथी मिल गया था. मैं मनीष की यादों के साथ जी रही थी और आज भी जी रही हूं. पर तुम से दोस्ती होने के बाद हमारी यानी मेरी और मनीष की यादों का बुढापा जाता रहा. हम कितनी बार कौफी हाउस में साथसाथ बैठे, ध्रुव को ले कर पार्क में बैठे. वहां बैठ कर डूबते सूरज को साथसाथ देखते रहे. कितने मनपसंद काम साथसाथ किए.’’

‘‘अवनी, तुम यह बातें इस तरह बता रही हो, जैसे कविता पढ़ रही हो.’’ विभाष ने कहा. उसे अवनी के मुंह से यह सब कहना अच्छा लग रहा था.

‘‘अपनी दोस्ती भी तो एक कविता की ही तरह है.’’ अवनी ने आंख बंद कर के कहा.

‘‘मुझे लगता है कि अपनी इस दोस्ती को कविता की ही तरह रखना है तो हमारा अलग हो जाना ही ठीक है.’’

इतना कह कर अवनी खड़ी हो गई. विभाष ने उस का हाथ थाम कर कहा, ‘‘मैं तुम्हारी बात को ठीक से समझ नहीं सका. जरा अपनी बात को इस तरह कहो कि समझ में आ जाए.’’

‘‘विभाष, तुम ने मुझे जितने भी दिन दिए, वे मेरे लिए यादगार रहेंगे. मैं ने तुम्हें अपने मन मंजूषा में संभाल कर रख लिया है. यह थोड़ा मनपसंद समय और लंबा खिंचता तो उसे समय की नजर लग सकती थी. उस में न जाने कितनी झूठी सच्ची बातों और घटनाओं का टकराव होता. तुम्हारी शादी अनीशा से हुई है. तुम सुख से उस के साथ अपना जीवन व्यतीत करो. मैं अपनी जिंदगी मनीष की यादों और ध्रुव को पालने- पोसने में बिता लूंगी.

‘‘वादा करो कि तुम मुझे कभी ईमेल नहीं करोगे. जब कभी मेरी याद आए, अनीशा का हाथ पकड़ कर अस्त होते सूर्य को देखना और प्यार की छोटीछोटी कविताएं पढ़ कर सुनाना. अपना जीवन सुखमय बनाना.’’ इतना कह कर अवनी ने विभाष के गाल पर हल्के से चुंबन करते हुए कहा, ‘‘विभाष, मुझे तो प्यार की मीठी कविता होना है, महाकाव्य नहीं.’’ Family Story in Hindi.

Family Story in Hindi: वो खतरनाक मुस्कान!

Family Story in Hindi: उस कौफी शाप में बैठी मैं बड़ी देर से दरवाजे के बाहर आते जाते कदमों को देख रही थी. कदमों को पढ़ना भी एक कला है. दिल्ली की बसों या मेट्रो में लोगों के चेहरों को पढ़ना भी मेरी आदत में शुमार है. मैं चेहरे देख कर व्यक्ति के व्यवहार, पीड़ा या खुशी का अंदाजा लगाते हुए आराम से अपना सफर तय करती हूं. उस रोज मन बड़ा उदास सा था, इसलिए दोपहर बाद कौफी हाउस में आकर बैठ गई थी. नजरें कौफी हाउस के दरवाजे पर अटक गईं. दरवाजे के पार एक जोड़ी कदम सफेद चूड़ीदार में चहकते हुए जा रहे थे. कदमों में आवारगी का पुट था. पंजों पर उछल-उछल कर चलने के क्रम से पता चलता था कि इन कदमों को धारण करने वाली युवती काफी प्रसन्नचित्त है. नई-नई जवानी की मदहोशी में मुब्तिला, भविष्य की चिंताओं से मुक्त कदम…. तभी साड़ी में लिपटे कुछ हल्के और थके कदम सामने से गुजरे.

पुरानी सी मटमैली बैली में फंसे कदम. सुस्त चाल गवाह थी कि जीवन का बोझ ढोते-ढोते इन कदमों की जिम्मेदारियां इस उम्र में भी कम नहीं हुई हैं. अपनी ख्वाहिशों को मार कर बच्चों के भविष्य और खुशियों के लिए जीवन अर्पण करने वाली शायद आज भी सुबह से शाम दफ्तर और घर के बीच खट रही है. इतने में एक जोड़ी कदम दूसरी जोड़ी के साथ नजर आए. ये कदम बहुत उल्लासित से थे. थिरकन का भाव लिए हुए. ये कदम दूसरे कदम से कुछ लिपट लिपट कर चल रहे थे. जरूर ये पति पत्नी हैं. एक दूसरे के प्यार में डूबे हुए. तभी एक जोड़ी कदम कौफी शाप के दरवाजे से भीतर आते नजर आए. गोरे गोरे, सलोने कदम… काले रंग की सैंडल में… बेहद खूबसूरत.

पास आते इन कदमों पर मेरी नजरें गड़ गईं. सलीके से कटे हुए नाखून, साफ और गुलाबी रंगत लिए हुए एड़ियां, पैरों का शेप देख कर ही अंदाजा हो गया कि व्यक्ति का कद छह फुट के करीब है. ये कदम मेरी ही ओर बढ़ते आ रहे हैं. आते-आते यह कुछ दूरी पर रुक गये और फिर सामने वाली टेबल पर थम गये. मेरी नजरें बड़ी देर तक इन कदमों से लिपटी रहीं. फिर दिल चाहा कि नजरें उठा कर इन खूबसूरत कदमों के स्वामी की शक्ल देखूं. मैंने नजरें उठायीं. सामने वाली टेबल पर वह बैठा था. सफेद कुर्ता और नीली जींस. गजब की पर्सनेलिटी. गोल खूबसूरत चेहरा, गोरी रंगत, भूरे बाल, तीखी मूछें और काली घनेरी पलकों वाली बड़ी-बड़ह आंखें. वह जरूर किसी सम्मानित और संस्कारी परिवार का व्यक्ति है, मेरी धारणा बनी. उसकी टेबल पर बेयरा कौफी का प्याला रख गया था. वह धीरे-धीरे कौफी सिप करने लगा. तभी उसने अपनी जेब से एक सफेद लिफाफा निकाल कर खोला.

अन्दर से एक कागज निकाला और पढ़ने लगा. मेरी नजरें उसके चेहरे से हटने को तैयार नहीं थीं. उसके होंठों पर मुस्कान तैर रही थी. यह जरूर इसका नियुक्ति पत्र होगा. ऐसी मुस्कान तो तभी चेहरे पर दिखती है. या फिर उसकी प्रेमिका का पत्र… जिसकी कल्पना ने उसके चेहरे की रंगत को और दमका दिया था. उसने पत्र वापस लपेट कर लिफाफे में डाला और टेबल पर रख कर कौफी सिप करने लगा. मैं अभी उसके बारे में अपनी धारणा को और विस्तार दे रही थी, कि अचानक वह उठ कर दरवाजे की ओर चल दिया.

अरे… उसका पत्र तो टेबल पर ही रह गया. मैं उसकी टेबल की तरफ झपटी कि उसका पत्र उठा कर उसे पकड़ा दूं. टेबल से पत्र उठाया, मगर एक क्षण में मेरे जहन में यह विचार कौंधा कि पत्र को खोल कर देखूं. आखिर इसमें ऐसा क्या था जिसको पढ़ कर वह इतना खुश था. मैं उसकी टेबल पर बैठ गई. लिफाफा खोल कर पत्र निकाला. वहां सफेद कागज पर अखबार की छोटी सी कटिंग चिपकी थी, उसकी फोटो के साथ, लिखा था – आतंकी संगठन हिजबुल के आतंकी उस्मान की तलाश में दिल्ली क्राइम ब्रांच की टीम कश्मीर रवाना… Family Story in Hindi.

Most Popular Story in Hindi: सहारा- क्या मोहित अपने माता-पिता का सहारा बना?

Most Popular Story in Hindi: अपने बेटेबहू के घर छोड़ कर अलग हो जाने के बाद मुझे यह एहसास बहुत सता रहा है कि मैं ने आप दोनों के साथ बहुत गलत व्यवहार किया है. अपनी बेटी को समझाने के बजाय मैं उसे भड़का कर हमेशा ससुराल से अलग होने की राय देती रही. अब मुझे अपने किए की सजा मिल गई है, बहनजी…आप मुझे आज माफ कर दोगी तो मेरे मन को कुछ शांति मिलेगी.’ पश्चात्ताप की आग में जल रही मीना ने जिस वक्त आरती से आंसू बहाते हुए क्षमा मांगी थी उस वक्त उमाकांत और महेश भी उस कमरे में ही उपस्थित थे.

जब आरती ने मीना को गले से लगा कर अतीत की सारी शिकायतों व गलतफहमियों को भुलाने की इच्छा जाहिर की तो भावविभोर हो उमाकांत और महेश भी एकदूसरे के गले लग गए थे.

आरती और महेश ने मीना और उमाकांत को अपने घर से 3 दिन बाद ही विदा किया था.

‘तुम ऐसा समझो कि अपनी बेटी की ससुराल में नहीं, बल्कि अपनी सहेली के घर में रह रही हो. तुम से बातें कर के मेरा मन बहुत हलका हुआ है. मुझे न कमर का दर्द सता रहा है न बहूबेटे के गलत व्यवहार से मिले जख्म पीड़ा दे रहे हैं. तुम कुछ ठीक होने के बाद ही अपने घर जाना,’ आरती की अपनेपन से भरी ऐसी इच्छा ने मीना को बेटी की ससुराल में रुकने के लिए मजबूर कर दिया था.

आने वाले दिनों में दोनों दंपतियों के बीच दोस्ती की जड़ें और ज्यादा मजबूत होती गई थीं. पहले एकदूसरे के प्रति नाराजगी, नफरत और शिकायतों में खर्च होने वाली ऊर्जा फिर आपसी प्रेम को बढ़ाती चली गई थी.

‘‘मां, आप के साथ क्यों नहीं आई हैं?’’ अलका के इस सवाल को सुन उमाकांत अतीत की यादों से झटके के साथ उबर आए थे.

‘‘कुछ देर में वे आती ही होंगीं. इसे फ्रिज में रख आ,’’ उमाकांत ने रसमलाई का डिब्बा अलका को पकड़ा दिया.

वे सब लोग जब कुछ देर बाद गरमागरम चाय का लुत्फ उठा रहे थे तब एक बार फिर घंटी की आवाज घर में गूंज गई.

दरवाजा खुलने के बाद अलका और मोहित ने जो दृश्य देखा वह उन के लिए अकल्पनीय था.

मोहित की मां आरती ने अलका की मां मीना का सहारा ले कर ड्राइंगरूम में प्रवेश किया. बहुत ज्यादा थकी सी नजर आने के बावजूद वे दोनों घर आए मेहमानों को देख कर खिल उठी थीं.

मोहित ने तेजी से उठ कर पहले दोनों के पैर छुए और फिर मां की बांह थाम ली. मीना के हाथ खाली हुए तो उन्होंने अपनी बेटी को गले लगा लिया.

अलका उन से अलग हुई तो राहुल अपनी दादी की गोद से उतर कर भागता हुआ नानी की गोद में चढ़ गया. सब के लाड़प्यार का केंद्र बन वह बेहद प्रसन्न और बहुत ज्यादा उत्साह से भरा हुआ नजर आ रहा था.

‘‘इस बार 2 कप चाय मैं बना कर लाता हूं,’’ उमाकांत ने अपना कप उठाया और चाय का घूंट भरने के बाद रसोई की तरफ चल पड़े.

उन की जगह चाय बनाने के लिए अलका रसोई में जाना चाहती थी पर आरती ने उस का हाथ पकड़ कर रोक लिया. Most Popular Story in Hindi.

Hindi Female Friendship Story: स्वरूपिनी- निहारिका चेन्नई से कौन-सी खूबसूरत याद लेकर आई?

Hindi Female Friendship Story: निहारिका अपने भाई के साथ चेन्नई गई तो उसे अपनी बचपन की दोस्त स्वरूपिनी मिली. अपनी दोस्ती की याद में जिस टौय कार को इन दोनों ने इतने साल संजो कर रखा था उस का राज वर्षों बाद खुला. क्या था वह राज? मैं यानी निहारिका दिल्ली में रहती हूं और यहां एक कंपनी में काम करती हूं. 2 साल ही हुए हैं मुझे नौकरी मिले हुए. पहले के एक साल कोरोना के चलते मैं वर्क फ्रौम होम कर रही थी.

अब एक साल से मुझे रोजाना ऑफिस आना पड़ता है. यों तो मुझे अपना काम बहुत पसंद है पर आज-कल इस में मेरा मन नहीं लग रहा. आज भी बड़े बेमन से ऑफिस आई और अपनी सीट पर बैठ गई. मन तो लग नहीं रहा था, बस, ऐसे ही थोड़ा-बहुत काम कर के लंच टाइम तक का वक्त गुजारा. लंच होते ही मैं खुश हो गई कि चलो आधा दिन तो निकल गया, तभी मेरे भैया का फोन आ गया. वो नोएडा में रहते हैं. वे मेरे सगे भाई नहीं हैं. मेरी मौसी के बेटे हैं पर प्यार मुझसे सगी बहन से भी ज्यादा करते थे. मैंने फोन उठाया और बातें करते-करते पूरा लंच ब्रेक ही खत्म होने को आया. फोन रखते हुए भैया ने पूछा, ‘‘सुन छोटी, मैं अगले हफ्ते चेन्नई जा रहा हूं. वहां कुछ काम है. तू अगर इतनी बोर हो रही है तो चल मेरे साथ. काम खत्म होने के बाद मैं तुझे चेन्नई घुमा दूंगा. वैसे भी अगले हफ्ते वीकैंड के साथ फ्राइडे का भी ऑफ है. पहले दिल्ली आ कर तुझे ले लूंगा, फिर साथ में चलेंगे. फ्राइडे मॉर्निंग जाएंगे, सनडे इवनिंग तुझे घर पर छोड़ दूंगा.’’ ‘‘भैया, चलना तो मैं भी चाहती हूं पर मम्मी-पापा पता नहीं मानेंगे या नहीं. यहीं आस-पास की बात होती तो कोई बात नहीं. चेन्नई थोड़ी दूर है और आप तो जानते ही हैं कि वे मेरी कितनी ज्यादा चिंता करते हैं.’’ ‘‘उन से तो मैंने पहले ही बात कर ली है, छोटी. वे मान गए हैं,’’ भैया ने कहा. ‘‘थैंक्यू सो मच, भैया तो फिर अगले हफ्ते चलते हैं.’’ उस रात को जब मैं अपने घर की बालकनी में खड़ी थी, तब ही उस का ध्यान आया.

वह भी तो चेन्नई से ही थी मेरी सबसे अच्छी दोस्त पर एक दिन बस इस चीज को मुझे पकड़ा कर यूं अचानक ही चली गई. कितनी याद आती है आज भी, जब उसके बारे में सोचती हूं. तभी तो आज तक इसे अपने बैग से लगाए घूम रही हूं. आज चेन्नई के बारे में बात होते ही उससे जुड़ी सारी यादें ताजा हो गईं. जब वहां जाऊंगी तो उसकी कितनी याद आएगी. यह सब सोचते हुए और उस चीज को पकड़े हुए कब बालकनी के सोफे पर सो गई, पता ही न चला. अगले हफ्ते बुधवार को ही भैया आ गए और शुक्रवार की सुबह हम चेन्नई के लिए रवाना हो गए. करीब 12 बजे हम चेन्नई पहुंच गए. एयरपोर्ट पर ही भैया के नाम की नेमप्लेट लिए एक शख्स खड़ा था. वह हमें एक बहुत ही सुंदर से रिजॉर्ट में ले गया. रिजॉर्ट आते वक्त मैंने समंदर और बीच देखे थे. मैंने तभी भैया से कहा था कि यहां हम जरूर आएंगे.

रिजॉर्ट में आते ही भैया के ऑफिस से फोन आया और मुझे वहां छोड़ कर वे अपने काम पर चले गए. मैंने उस के बाद रिजॉर्ट घूमा और शाम तक वहां पास में ही एक बुक कैफे में बुक्स पढ़ती रही. तभी भैया का फोन आया कि उन का काम खत्म हो गया है और वे मेरा रिजॉर्ट के गेट पर इंतजार कर रहे हैं. मैं थोड़ी देर में ही वहां पहुंच गई और हम उस बीच पर जाने के लिए निकल पड़े, जो सुबह यहां आते समय देखा था. उस बीच के पास ही बहुत सुंदर मेला भी लगा हुआ था. मैं वहां से कुछ सामान ले रही थी, तभी पीछे से एक आवाज आई, ‘‘रानी… रानी, सुनो. वहीं रहो, मैं आ रही हूं.’’ यह सुन कर मैं हैरान हो गई कि मुझे कौन इस नाम से बुला रहा है. यह नाम तो मेरा कोई भी नहीं जानता और दादी के अलावा तो कोई भी इस नाम से मुझे बुलाता भी नहीं है. ये नाम तो भैया को भी शायद ही पता होगा.

मैं अभी सोच ही रही थी कि वही आवाज फिर पीछे से आई. मैंने पीछे की ओर मुड़ कर देखा तो एक थोड़ी हैल्थी-सी लड़की मेरी तरफ जल्दी-जल्दी चलती हुई आ रही है और मुझे रुकने के लिए कह रही है. जैसे ही वो मेरे पास आई तो मैंने पूछा कि आप कौन हैं? ‘‘मुझे पहचान नहीं पाई हो क्या तुम?’’ मैंने कहा, ‘‘नहीं.’’ ‘‘देखो, तुम्हारे बैग पर जो चीज लगी है, वैसी ही मेरे पास भी है.’’ यह देख कर तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ, क्योंकि वह कोई आम चीज तो है नहीं कि सब के पास हो या किसी भी दुकान पर आसानी से मिल जाए. यह तो केवल 2 ही हैं. एक, उस के पास और एक मेरे पास.

अभी मैं सोच ही रही थी कि उस ने पूछा, ‘‘क्या सोच रही हो?’’ ‘‘कुछ नहीं,’’ और कहा, ‘‘स्वरूपिनी, तुम इतने सालों बाद…’’ ‘‘हां, मैं तुम्हारी दोस्त स्वरूपिनी. अब पहचान गई न मुझे. विश्वास ही नहीं हो रहा कि तुम इतने सालों बाद कैसे? और तुम ने मुझे पहचान कैसे लिया?’’ ‘‘बस, इस चीज के ही कारण. मैंने तुम्हें भीड़ में भी पहचान लिया. मैं बहुत बार दिल्ली में वहां पर गई थी, जहां हम पहले रहते थे. पर पता चला कि तुम भी कहीं और चली गई हो.’’ ‘‘हां, तुम्हारे वहां से अचानक जाने के बाद मेरे मम्मी-पापा ने भी कहीं और घर ले लिया था.’’ तभी स्वरूपिनी बोली, ‘‘याद है तुम्हें कि हम बचपन में साथ में कितना खेलते थे?’’ ‘‘हां, पर तुम्हारे पापा ने अचानक ट्रांसफर ले लिया था, क्योंकि तुम्हारे दादा की तबीयत ठीक नहीं रहती थी और तुम्हें वहां उन के पास जाना पड़ा था.’’

‘‘हां, इस वजह से अप्पा ने अपना ट्रांसफर हमारे होमटाउन चेन्नई में लिया था. ‘‘देखो, उस के बाद आज मिलना हुआ है,’’ तभी स्वरूपिनी ने पूछा, ‘‘वैसे, तुम बताओ रानी कि तुम यहां चेन्नई में क्या कर रही हो?’’ तभी मैंने उसे भैया से मिलवाया. ‘‘इनके साथ इन के काम के लिए और थोड़ा घूमने के लिए आई थी.’’ स्वरूपिनी ने तभी वक्त देखा और कहा कि, ‘‘देख रानी, मुझे अभी जाना होगा. कल ऐसा कर तू घर आ जा. पूरा दिन वहां आराम से बात करेंगे.’’ मैंने कहा, ‘‘नहीं, तुम ही रिजॉर्ट आ जाना. मुझे यहां की भाषा नहीं आती तो तुम्हारे घर आने में दिक्कत होगी और भैया को भी अपने काम से जाना है. इसलिए तुम रिजॉर्ट आ जाना.’’ उसे मैंने रिजॉर्ट का पता दिया और कहा कि चलो, कल मिलते हैं. मुझे तो अभी भी ये यकीन नहीं हो रहा था कि मुझे अपनी सबसे अच्छी दोस्त से वापस मिलना हो पाया है. अगले दिन वक्त से पहले ही स्वरूपिनी रिजॉर्ट पहुंच गई. आते ही उसने सबसे पहले मेरी अपने अम्मा-अप्पा से वीडियो कॉल पर बात करवाई. फिर बातों का सिलसिला शुरू हो गया. पिछले 15 वर्षों की बातें सब आज एक-दूसरे को बता रहे थे. बातों ही बातों में स्वरूपिनी ने पूछा कि इतने सालों में तुम ने मुझे फोन क्यों नहीं किया? मैंने कहा कि तुम्हारा नंबर ही कहां था. उस सुबह जब मैं स्कूल बस का इंतजार कर रही थी, मेरे पास तुम भागी-भागी आई थीं.

मुझे यह टॉय कार थमा कर और इतना ही कह कर चली गई कि तुम्हारे अप्पा ने तुम्हारे शहर चेन्नई में ही ट्रांसफर ले लिया है और तुम्हें अभी जाना पड़ रहा है. ‘‘हां रानी, उससे एक रात पहले दादा की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई थी. तभी अप्पा ने अचानक चेन्नई ट्रांसफर होने का फैसला किया. हम जरूरत का सामान लेकर अगली सुबह चेन्नई के लिए निकल पड़े.’’ ‘‘अच्छा रानी, तुम ने इतने वर्षों में मुझे एक बार भी फोन नहीं किया. याद नहीं किया क्या मुझे’’ ‘‘मैंने कहा न कि तुम्हारा नंबर नहीं था मेरे पास.’’ ‘‘क्या बात कर रही हो, रानी? नंबर तो मैं तुम्हें दे कर गई थी.’’ ‘‘तुम मुझे बस यह टॉय कार पकड़ा कर गई थीं.’’ ‘‘हां तो इसी में तो था न मेरा नंबर.’’ ‘‘इस छोटी-सी टॉय कार में?’’ ‘‘हां बाबा, इस में. तुम ने इसे खोल कर कभी देखा नहीं क्या?’’ ‘‘क्या यह खुलती भी है?’’ ‘‘हां, तुम्हें याद होगा, जब मेरे अप्पा ने नई गाड़ी ली थी, तब उस शोरूम के मालिक ने उस गाड़ी की जैसी मुझे 2 टॉय कारें भी दी थीं. ये लाल वाली मैंने तुम्हें दी थी और हरी वाली मेरे पास है. यह देखो.’’

‘‘हां, यह तो मुझे पता है पर यह खुलती है, यह मुझे पता नहीं है.’’ ‘‘हां, इसलिए तो इस में अपना नंबर मैंने एक परची में लिख कर रख दिया था और तुम्हें इस को पकड़ा कर चली गई थी. सोचा कि तुम्हें जैसे ही मेरा नंबर मिल जाएगा, तुम मुझे फोन कर लोगी, रानी.’’ ‘‘मुझे तो इतने वर्षों में पता ही नहीं चला कि यह टॉय कार खुलती भी है.’’ ‘‘लाओ, अपनी गाड़ी मुझे दो. मैं खोल कर दिखाती हूं.’’ स्वरूपिनी ने जैसे ही उसे खोला. उस में से एक छोटी-सी परची निकली, जिस पर उस ने अपना नंबर लिख रखा था. उस ने कहा कि यह वही नंबर है, जो उस ने कल रात मुझे दिया था. ‘‘पता है रानी, तुम्हारे फोन का मैंने कितना इंतजार किया, इसलिए आज तक अपना नंबर मैंने नहीं बदला.’’ ‘‘मुझे माफ करना स्वरूपिनी, मुझे नहीं पता था कि इस गाड़ी में ही तुम्हारा नंबर है. पता है, तुम्हारे जाने के बाद तो कोई दोस्त भी नहीं बना पाई. पता होता कि तुम्हारा नंबर इस में ही है तो इतने वर्ष तुम्हारा इंतजार करने के बजाय तुम्हें रोज फोन कर के घंटों बात करती.’’ ‘‘छोड़ो रानी, जो होना था हो गया. अब हम कभी भी एक-दूसरे से दूर नहीं जाएंगे. अब हम कहीं भी रहें पर एक-दूसरे के संपर्क में रहेंगे.’’

‘‘मेरा तो वैसे भी अपने पति के काम के सिलसिले में दिल्ली आना-जाना लगा ही रहता है. हम तब मिल भी लिया करेंगे.’’ मैं स्वरूपिनी की ये सब बातें सुन कर रोने लग गई तो वो कहने लगी कि चलो, अब जो हो गया उसे छोड़ दो. अब तो हम मिल ही गए न. फिर हम यूं ही और काफी देर तक बातें करते रहे. आज इस बात को 3 वर्ष हो गए हैं. अब मैं और स्वरूपिनी रोज ही बात करते हैं. अब जब भी वो दिल्ली आती है, मुझसे मिले बिना नहीं जाती. सच में मेरी चेन्नई की यह यात्रा तो बहुत ही यादगार रही. इस ने मुझे मेरी वर्षों पुरानी दोस्त से जो मिला दिया और मुझे अब यह भी तो समझ आ गया था कि क्यों उस सुबह वह मुझे टॉय कार दे कर गई थी. मैं आज भी भैया को धन्यवाद बोलती हूं कि वे मुझे अपने साथ चेन्नई ले गए, वरना मैं तो शायद कभी भी अपनी दोस्त से दोबारा मिल ही न पाती. Hindi Female Friendship Story.

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