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Romantic Story in Hindi: मिसेज मेघना राघव गुप्ता- खेल सरनेम का

Romantic Story in Hindi: खूबसूरत और खिलीखिली सी मेघना औफिस में सब के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है. जब से शाखा में मेघना ने ज्वाइन किया है, तब से ही पुरुषों को गुलाब और महिलाओं को कांटे की अनुभूति दे रही है. अरे नहीं भई, मेघना कोई फैशनपरस्त आधुनिक बाला नहीं है, जो अपने विशेष परिधानों से सब का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करे, वह तो कंधे तक कटे बालों की पोनी बनाए, कभी आरामदायक सूट तो कभीकभार जींस और शार्ट कुरती में नजर आने वाली आम सी लड़की है, लेकिन उस की बड़ीबड़ी कजरारी आंखें… उफ्फ, किसी को भी अपने भीतर बंदी बना लें.

मेघना का रंग बेशक गोरा नहीं है, लेकिन सलोना अवश्य है. ठीक वैसा ही जैसा सावन में काले बादलों का होता है. मनोहारी… सम्मोहक और अपनी तरफ खींचने वाला…

सिर्फ रूप और लावण्य ही नहीं, बल्कि एक अन्य कारण भी है, जो सब को मेघना की तरफ खींचता है. वो है उस का नाम… नहीं नहीं, नाम नहीं, बल्कि उपनाम… दरअसल, मेघना अपने नाम के साथ कोई उपनाम या जाति यानी सरनेम नहीं लगाती. भला आज के समय में भी ऐसा कहीं होता है भला? जब गलीगली में जातिधर्म के नाम पर लोग बंट रहे हैं, ऐसे में किसी साधारण आदमी का अपनी जाति के प्रति मोह नहीं दिखाना कोई साधारण बात तो नहीं.

स्टाफ की महिला कार्मिकों ने अपने तमाम प्रयास कर देख लिए, लेकिन मजाल है कि मेघना अपनी जाति के बारे में कोई सच उगल दे.

“आप को मेरी जाति में इतना इंटरेस्ट क्यों है? क्या मेरा खुद का होना काफी नहीं है?” अकसर ऐसे ही प्रतिप्रश्न दाग कर मेघना सामने वाले को बोलती बंद करने की कोशिश करती थी, लेकिन जनसाधारण की बोलती किसी पालतू तोते की जबान है क्या, जिसे आसानी से नियंत्रित कर के जब चाहो तब बंद किया जा सके? जितने मुंह उतनी बातें… शाखा में मेघना का सरनेम उस से कहीं अधिक चर्चा का विषय होने लगा था.

यह एक राष्ट्रीयकृत बैंक की मुख्य शाखा थी, जो जयपुर महानगर में स्थित थी. मेघना की पहली पोस्टिंग यहां सहायक ब्रांच मैनेजर के रूप में हुई थी. मृदु स्वभाव की मल्लिका मेघना हर समय अपने चेहरे पर आभूषण की तरह मुसकान सजाए हर ग्राहक का काम बड़ी तत्परता से निबटाती और दबाव के पलों में भी अपनेआप को सहज और सामान्य बनाए रखती. यह विशेषता भी उस के व्यक्तित्व की गरिमा को सवाया करती थी.

ब्रांच में काम करने वाली अन्य महिलाओं के लिए मेघना एक पहेली की तरह थी, जिसे बूझना तो सब चाहते थे, लेकिन शुरुआत करने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पा रहा था. एक दिन नव्या ने जरा साहस दिखाया. वह मेघना की हमउम्र भी थी, इसलिए भी उसे मेघना के आवरण में घुसपैठ करने में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी. लेनदेन के समय के बाद के कुछ सुस्त पलों में मेघना अपने मोबाइल फोन में व्यस्त थी, तभी नव्या उस के पास आई और बोली, “हेलो मेघना, तुम तो यहां नई हो ना? जयपुर घूमा क्या?” नव्या ने बात की शुरुआत करते हुए आत्मीयता दिखाई.

“घूम लेंगे. जयपुर कहां भागा जा रहा है. और वैसे भी जब 2-3 साल यहीं रहना है, तो फिर जल्दी क्या है?” मेघना ने उदासीनता से कहा, तो नव्या थोड़ी निराश हुई.

“कल छुट्टी है, चलो तुम्हें गोविंद देव के दर्शन करवा लाती हूं,” नव्या ने प्रस्ताव दिया, लेकिन मेघना ने कहीं और बिजी होने की कह कर नव्या का प्रस्ताव ठुकरा दिया.

2 दिन बाद बैंक की महिला मंडली में यही हौट टौपिक था.

“अरे, मंदिर में जाने की हिम्मत ही नहीं हुई होगी उस की. मुझे तो पहले से ही उस की जाति पर शक था,” मिसेज कपूर ने दावा किया.

“लेकिन, आजकल मंदिर में कहां कोई किसी से जातिधर्म पूछता है?” नव्या ने मिसेज कपूर की बात का विरोध किया.

“नहीं पूछता, लेकिन कहते हैं ना कि चोर की दाढ़ी में तिनका. मन ही नहीं माना होगा उस का, इसलिए खुद से ही मना कर दिया,” मीनाक्षी ने भी अपना तर्क रखा.

“कल उसे लंच पर अपने साथ बिठाते हैं, तभी कुछ पता चलेगा उस के बारे में,” नव्या ने फैसला सुनाया और सभा बरखास्ता हो गई.

अगले दिन नव्या ने कहीं और लंच पर जाने की बात कह कर एक बार फिर से महिला मंडली का प्रस्ताव खारिज कर दिया.

महिलाओं को ये उन का भारी अपमान लगा. सब ने मिल कर मेघना के खिलाफ मोरचा खोल दिया. एक तरह का असहयोग आंदोलन चलने लगा था औफिस में.

“हेलो फ्रेंड्स, कल मेरे घर पर एक छोटी सी गेट टुगेदर है. आप सब इंवाइटेड हो,” मेघना ने औफिस छोड़ने से पहले घोषणा की, तो सब का चौंकना लाजिमी था.

मेघना को तो किसी ने जवाब नहीं दिया, लेकिन सब के भीतर गहरी उथलपुथल मची हुई थी. इस में कोई शक नहीं था.
सब ने मिल कर मेघना की पार्टी अटेंड करने का फैसला किया. किसी की सचाई बाहर लाने के लिए इतना तो करना ही पड़ेगा ना?

तय समय पर पूरा महिला स्टाफ मेघना के घर मौजूद था. मेघना ने भी आगे बढ़ कर बहुत ही आत्मीयता के साथ उन का स्वागत किया और अपने पूरे परिवार से मिलवाया.

मेघना के परिवार में उस के मम्मीपापा और एक छोटी बहन थी. यह गेट टुगेदर मेघना के मम्मीपापा की शादी की सालगिरह का था.
मेघना जब अन्य मेहमानों में व्यस्त हो गई, तो महिला मंडली उस के घर का अवलोकन करने लगी. दीवार पर लगी बाबा साहेब अंबेडकर की तसवीर देखते ही मिसेज कपूर चौंक गईं. वे नव्या और अन्य महिलाओं को लगभग खींचती हुई सी वहां ले कर आईं.

“ये देखो, मैं न कहती थी कि यह लड़की उस जाति की है,” मिसेज कपूर ने आंखें नचाते हुए कहा. वे अपनी सफलता का श्रेय किसी दूसरे को नहीं लेने देना चाहती थीं. सब ने आंखें फाड़फाड़ कर देखा. वे कभी तसवीर तो कभी मेघना को देख रही थीं.

“शक तो मुझे भी हुआ था, जब ये सब से घुलनेमिलने में आनाकानी करती थी. फिर मुझे लगा कि शायद नई है, इसलिए संकोच करती है. अब पता चला इस के संकोच का कारण. हिम्मत ही नहीं होती होगी सच का सामना करने की,” नव्या ने अपनी दलील रखी.

“अब तो सबकुछ सामने है. क्या अब भी यहां कुछ खानापीना करोगी? वापस चलें क्या?” मीनाक्षी ने कहा. सब एकदूसरे की तरफ देखने लगे. आखिर सब को यों अकारण वहां से ना जाना ही सही लगा और फिर सब की सब महिलाएं एक कोने में कुरसी ले कर बैठ गईं.

“अरे, आप लोग यहां कोने में क्यों बैठी हैं? कुछ लीजिए ना?” कहते हुए मेघना ने उन के सामने सौफ्ट ड्रिंक से भरे गिलासों वाली ट्रे कर दी. सब ने एकदूसरे की तरफ देखा, लेकिन गिलास की तरफ हाथ किसी ने भी नहीं बढ़ाया. किसी ने गला खराब होने, तो किसी ने ठंडे से एलर्जी को कारण बताया. हालांकि असल कारण से मेघना अनजान नहीं थी, इसलिए उस ने भी अधिक आग्रह नहीं किया.

खाना टेबल पर लगने की आहट होते ही महिलाओं का दल देरी होने का बहाना बनाते हुए वहां से खिसक लिया.

असली कहानी तो अब शुरू होती है. मेघना की जाति का आभास होते ही अब औफिस में उस का बायकट शुरू हो गया. न उसे लंच टाइम में इनवाइट किया जाता और ना ही उस के साथ अन्य किसी प्रकार की अंतरंगता रखी जा रही थी. औफिशियल काम के लिए जरूरी बातचीत के अतिरिक्त उन में आपस में कोई संवाद भी नहीं होता. सिर्फ नव्या ही थी, जो मेघना और शेष महिलाओं के बीच बातचीत का सेतु बनी हुई थी.

इन सब के बावजूद भी मेघना सब की बातों का मुख्य केंद्र अभी भी बनी हुई थी. कारण था उस की सहज मुसकान और बैंक के ग्राहकों में उस की बढ़ती लोकप्रियता. जो भी ग्राहक मेघना के काउंटर पर जाता, वह संतुष्ट हो कर ही लौटता था. नतीजा ये हुआ कि बैंक ने अपने स्थापना दिवस पर कुछ कर्मठ कर्मचारियों को संभाग स्तर पर सम्मानित करने का निर्णय लिया, जिन में से एक नाम मेघना का भी था.

कहना न होगा कि इस समारोह के बाद मेघना का सामाजिक दायरा और भी अधिक बढ़ गया. उस के मोबाइल में फोन नंबरों की सूची और भी अधिक लंबी हो गई और सोशल मीडिया पर आने वाले संदेशों के कारण उस के मोबाइल पर घड़ीघड़ी मैसेज अलर्ट भी पहले से कुछ अधिक बजने लगे, जिन्हें मजबूरन उसे साइलेंट करना पड़ा.

मेघना का लंच टाइम खाने के साथसाथ मिस्ड काल्स और मैसेज का जवाब देने में बीतने लगा. वैसे भी औफिस में उस के अधिक दोस्त तो थे नहीं, इसलिए वह ये काम बड़ी आसानी से कर पा रही थी. फोन पर बात करती हुई मेघना भी पूरे स्टाफ की निगाहों में रहती थी. फोन पर बात करते समय उस के चेहरे के हावभाव से हर कोई अपनी तरफ से कयास लगाता कि वह किस से बात कर रही होगी.

“आज तो मेघना मैडम के चेहरे की ललाई बता रही है कि बातचीत किसी बेहद दिल के करीब व्यक्ति से हो रही है,” एक दिन नव्या ने अंदाजा लगाया.

“हो सकता है. आखिर शादी की उम्र तो हो ही चली है. और अब तो नौकरी भी सेटल है. कोई न कोई मिल गया होगा,” मिसेज कपूर ने मुंह टेढ़ा करते हुए अपना मत रखा.

“होगा कोई भीम आर्मी का सिपाही,” मीनाक्षी के इतना कहते ही एक मिलजुला ठहाका गूंज गया.

“चलो, फाइनली मेघना को एक सरनेम तो मिलेगा,” कह कर नव्या ने ठहाके को आगे बढ़ाया.

नव्या चूंकि मेघना की हमउम्र थी, इसलिए भी उस के भीतर चल रहे परिवर्तनों को आसानी से समझ सकती थी. इन दिनों उसे महसूस हो रहा था मानो मेघना प्रेम में है. उस ने मेघना को बाथरूम में किसी के साथ वीडियो चैट करते देखा था. हालांकि नव्या उस व्यक्ति का चेहरा नहीं देख पाई थी, क्योंकि उस की आंखों के सामने मोबाइल की पीठ थी. मेघना का चेहरा उस के सामने था और उसी की भावभंगिमा से वह अंदाजा लगा पाई थी कि यह कोई प्रेमालाप चल रहा है. जैसे ही मेघना की निगाह नव्या से टकराई, उस ने झेंपते हुए वीडियो बंद कर दिया था.

“आज मैडम रंगेहाथों पकड़ी गई. अभीअभी बाथरूम में लाइव टेलीकास्ट देख कर आ रही हूं,” नव्या ने जैसे ही यह बम फोड़ा, हर तरफ अफरातफरी मच गई. सब की जिज्ञासा चरम पर पहुंच गई, लेकिन नामपता मालूम न होने के कारण यह एटम बम टांयटांय फिस्स हो गया.

ये वार चाहे खाली गया हो, लेकिन इस घटना ने नव्या को जासूस बना दिया. अब वह हर समय मेघना पर निगाह रखने लगी, लेकिन मेघना ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली थीं, वह नव्या को हवा भी नहीं लगने दे रही थी.

“अब यार शादीवादी कर लो. तुम कहो तो देखें तुम्हारे लिए कोई?” एक दिन नव्या ने मेघना को छेड़ा.

“हांहां, क्यों नहीं. जरूर देखो. दोस्त लोग नहीं देखेंगे तो फिर और कौन देखेगा?” मेघना ने भी मुसकरा कर उत्तर दिया.

“कैसा लड़का चाहती हो अपने लिए?” नव्या ने पूछा.

“बिलकुल वैसा ही जैसा तुम अपने लिए उचित समझती हो,” कह कर मेघना ने नहले पर दहला मारा.

“यार, दिल की बात कहूं तो मुझे सांगानेर ब्रांच वाला मैनेजर राघव गुप्ता बहुत जमता है. क्या पर्सनैलिटी है यार. देखते ही दिल धक से हो जाता है, लेकिन तुम्हारे लिए… दरअसल, पता नहीं वह तुम्हारी जाति की लड़की से… मेरा मतलब समझ रही हो ना?” नव्या कहतेकहते रुकी, फिर टुकड़ोंटुकड़ों में अपनी बात पूरी की. उस की बात खत्म होते ही मेघना ठहाका लगा कर हंस पड़ी.

“बात तो तुम्हारी सही है दोस्त, लेकिन पूछने में हर्ज ही क्या है?” मेघना ने कहा और नव्या को हक्कीबक्की छोड़ अपनी सीट पर चल दी.

दिन गुजरते रहे, समय बीतता रहा… आजकल मेघना हर दिन पहले से अधिक निखरी और तरोताजा नजर आने लगी थी. एक दिन उस की उंगली में सोने की अंगूठी देख कर नव्या चहक उठी.

“अरे वाह, तुम तो छुपी रुस्तम निकली. कौन है वो किस्मत वाला?” नव्या ने उत्सुकता से पूछा. मेघना केवल मुसकरा दी. उन का शोर सुन कर मीनाक्षी और मिसेज कपूर भी वहां आ गईं. वे भी मेघना की अंगूठी को छू कर देखने लगी. सोने की अंगूठी में जड़ा हीरा उन में जलन पैदा कर रहा था.

“जरूर बताएंगे और मिलवाएंगे भी. जरा सांस तो ले मेरे यार… जरा सब्र तो कर दिलदार…” मेघना ने खिलखिला कर कहा और अपनी सीट की तरफ बढ़ गई.

एक दिन दोपहर को बैंक का लेनदेन समय समाप्त होने के बाद मेघना ने सब को हाल में इकट्ठा किया. सब ने देखा उस के हाथ में मिठाई का डब्बा था. मेघना ने एकएक कर सब को मिठाई खिलाई और शेष डब्बा वहां रखी टेबल पर रख दिया. मेघना रहस्यमई मुसकान के साथ सब को मिठाई खाते हुए देख रही थी.

“अब मिठाई का राज खोल भी दो. किस खुशी में मुंह मीठा करवाया जा रहा है?” बैंक मैनेजर ने पूछा.

“इस की शादी पक्की हो गई होगी,” मिसेज कपूर ने अंदाजा लगाते हुए कहा, तो मेघना के होंठों की मुसकान और भी अधिक चौड़ी हो गई. इतनी अधिक कि उस की सफेद दंतपंक्ति झिलमिलाने लगी.

“आप ने सही अनुमान लगाया मिसेज कपूर. अगले सप्ताह शनिवार को मेरी शादी है. आप सब लोगों को जरूर आना है,” कहती हुई मेघना के चेहरे का गुलाबी रंग किसी से छिपा नहीं था.

मेघना ने एक बैग में से शादी के कार्डों का बंडल निकाला और एकएक कर सब के हाथों में थमाती गई. जैसे ही मेघना ने मिसेज कपूर को कार्ड दिया, उन्होंने लपक कर उसे थाम लिया और सब से पहले होने वाले वर का नाम पढ़ने लगी.

“राघव गुप्ता, बैंक मैनेजर, सांगानेर ब्रांच…” नाम देखते ही उन की आंखें आश्चर्य से चौड़ी हो गईं. उधर नव्या और मीनाक्षी का भी यही हाल था. मेघना अब भी मुसकरा रही थी.

“यदि आप अनुमति दें तो मैं आज जरा जल्दी घर जाना चाहती हूं, मुझे शादी के लिए शापिंग करनी है.”

मेघना ने बैंक मैनेजर से आग्रह किया. उन के हां के इशारे के बाद मेघना महिला मंडली की तरफ मुड़ी और कहा, “आशा करती हूं कि आप लोगों को मेरे यहां खानेपीने में कोई परेशानी नहीं होगी. अब तो मैं मिसेज मेघना राघव गुप्ता होने जा रही हूं,” मेघना ने कहा और सब को धन्यवाद कहती हुई बैंक से बाहर निकल गई.

सब मिसेज मेघना राघव गुप्ता को जाते हुए अवाक देख रही थीं. Romantic Story in Hindi.

Hindi Family Story: हार- इस खेल में कौन हारा और कौन जीता?

Hindi Family Story: आबादी इतनी बढ़ गई है कि सड़क के दोनों किनारों तक शनीचरी बाजार सिमट गया है. चारों ओर मकान बन गए हैं. मजार और पुलिस लाइन के बीच जो सड़क जाती है, उसी सड़क के किनारे शनीचरी बाजार लगता है. तहसीली के बाद बाजार शुरू हो जाता है, बल्कि कहिए कि तहसीली भी अब बाजार के घेरे में आ गई है.

शनीचरी बाजार के उस हिस्से में केवल चमड़े के देशी जूते बिकते हैं. यहीं पर किशन गौशाला का दफ्तर भी है. अकसर गौशाला मैनेजर की झड़प मोचियों से हो जाती है. मोची कहते हैं कि उन के पुरखे शनीचरी बाजार में आ कर हरपा यानी सिंधोरा, भंदई, पनही यानी जूते बेचते रहे. तब पूरा बाजार मोचियों का था. जाने कहां से कैसे गौसेवक यहां आ गए. अगर सांसद के प्रतिनिधि आ कर बीचबचाव न करते तो शायद दंगा ही हो जाता.

लेकिन सांसद का शनीचरी बाजार में बहुत ही अपनापा है इसलिए मोचियों का जोश हमेशा बढ़ा रहता है. अपनापा भी खरीदबिक्री के चलते है. सांसद रहते दिल्ली में हैं, मगर हर महीने तकरीबन 25-30 जोड़ी खास देशी जूते, जिसे यहां भंदई कहा जाता है, दिल्ली में मंगाते हैं.

भंदई के बहुत बड़े खरीदार हैं सांसद महोदय. मोची तो उन्हें पहचानते ही नहीं, क्योंकि वे खुद तो आ कर भंदई नहीं खरीदते, पर उन के लोग भंदई खरीद कर ले जाते हैं.

गौशाला चलाने वाले भी सांसद का लिहाज करते हैं. आखिर उन्हीं की मेहरबानी से गौशाला वाले नजदीक की बस्ती जरहा गांव में 20 एकड़ जमीन जबरदस्ती कब्जा सके थे.

किशन गौशाला शहर के करीब बसे जरहा गांव में है. इस गौशाला में सांसद कई बार जा चुके हैं. पहले गौशाला वालों ने 10 एकड़ जमीन गांव के किसानों से खरीदी. वहां कुछ गायों को रखा. कृष्ण जन्माष्टमी के दिन एक कार्यक्रम हुआ था, जिस में सांसद चीफ गैस्ट बने थे. सरपंच के दोस्तों ने दही लूटने का कमाल दिखाया, फिर अखाड़े का करतब हुआ.

गांव वाले बहुत खुश हुए कि चलो गांव में गौमाता के लिए एक ढंग का आसरा तो बना. सांसद ने उस दिन गांव के मोचियों को भी इस समारोह में बुलाया. जरहा गांव शहर से सट कर बसा है. गौशाला का दफ्तर शहर में है और गौशाला है जरहा गांव में.

दफ्तर के पास जरहा गांव, बोरिद, अकोली के मोची चमड़े का सामान बेचने शनिवार को आते हैं, पर बाकी दिन वे गांव में भंदई बनाते हैं. जाने कब से यह सिलसिला इसी तरह चल रहा है.

लेकिन जब से सांसद भोलाराम भंदई खरीद कर दिल्ली ले जाने लगे हैं, तभी से मोचियों का कारोबार कुछ नए रंग पर आ गया है. ऊपर से सांसद ने अपनी सांसद निधि से जरहा गांव में मोची संघ के लिए पिछले साल 3 लाख रुपए दिए थे. वे गांवगांव में अलगअलग मंचों के लिए सांसद निधि से खूब पैसे देते हैं, मगर इन दिनों मंचों की धूम है.

इस इलाके में दलितों की तादाद ज्यादा?है, इसलिए सांसद अपने हिसाब से अपना भविष्य पुख्ता करते चल रहे हैं. मोची मंचों का भी लगातार फैलाव हो रहा है, तो गौशाला का भला हो रहा है.

गौशाला के कर्ताधर्ता सब दूसरे राज्य के हैं. वे शहर के जानेमाने कारोबारी हैं. सब ने थोड़ाथोड़ा पैसा लगा कर 10 एकड़ जमीन ले ली और किशन गौशाला खोल कर गांव में घुस गए. वहां 2 दुकानें भी अब इसी तबके की खुल गई हैं. एक स्कूल भी जरहा गांव में चलता है, जिसे किशनशाला नाम दिया गया है.

इस स्कूल में सभी टीचर सेठों के  जानकार लोग हैं. सांसद सेठों और मोचियों में बराबर से इज्जत बनाए हुए हैं. सब को पार लगाते हैं, चूंकि सब उन्हें पार लगाते हैं.

लेकिन इधर जब से बाबरी मसजिद ढही है, जरहा गांव में दूसरा दल भी हरकत में आ गया है. सेठ सांसद के विरोधी दल को पसंद करते हैं. जिले में 2 ही झंडे असर में हैं, तिरंगा और भगवा. 2 ही चिह्न यहां पहचाने जाते हैं, पंजा और कमल.

गौप्रेमी सभी सेठ कमल पर विराजने वाली लक्ष्मी मैया के भगत हैं, वहीं मोची, लुहार, धोबी, कुम्हार, कुर्मी,  तेली, इन्हीं जातियों की तादाद इस इलाके में ज्यादा है, इसीलिए आजादी के बाद कांग्रेस को भी इलाके के लोगों ने अपना समर्थन दिया. लेकिन जब से बाबरी मसजिद को ढहा कर जरहा गांव का नौजवान गांव लौटा है, कमल की नई रंगत देखते ही बन रही है.

लेकिन सांसद भोलाराम परेशान नहीं होते. वे जानते हैं कि सेठों को इस लोक पर राज करने के लिए धंधा प्यारा है और परलोक सुधारने के लिए है ही किशन गौशाला. दोनों के फायदे में है कि वे कभी भोलाराम का दामन न छोड़ें.

ये भोलाराम भी कमाल के आदमी हैं. एक बड़े किसान के घर में पैदा हुए. मैट्रिक पास कर आगे पढ़ना चाहते थे, लेकिन उन के पिताजी ने पैरों में बेड़ी पहनाने की ठान ली.

शादी की सारी तैयारी हो गई, लेकिन बरात निकलने के ठीक पहले दूल्हा अचानक ही गायब हो गया और प्रकट हुआ दिल्ली में. यह बात साल 1946 की है. सालभर में भोलाराम ने दिल्ली के एक बडे़ अखबार में अपने लिए जगह बना ली.

भोलाराम दल के लोग तो चुनाव के समय रोरो कर यह भी बताते हैं कि भोलारामजी तब रिपोर्टिंग के लिए गांधीजी की अंतिम प्रार्थना सभा में भी गए थे. नाथूराम ने जब गोलियां चलाईं, तो गांधीजी ‘हे राम’ कह कर भोलारामजी की गोद में ही गिरे थे.

भोलाराम के खास लोग तो यह भी कहते हैं कि भोलारामजी का खून से सना कुरता आज भी गांधी संग्रहालय में हैं. जिसे देखना हो दिल्ली जा कर देख आए.

इलाके के लोगों में वह कुरता देखने की कभी दिलचस्पी नहीं रही. भोलाराम लगातार आगे बढ़ते गए और दिल्ली में एक नामी पत्रकार हो गए.

एक दिन इंदिरा गांधी ने उन्हें इस इलाके का सांसद बना दिया. इस इलाके के लोग नेताओं की बात नहीं टालते.

इंदिरा गांधी ने पहली चुनावी सभा में कहा, ‘‘यह इलाका भोलेभाले लोगों का है. यहां भोलाराम ही सच्चे प्रतिनिधि हो सकते हैं.’’

इंदिरा गांधी से आशीर्वाद ले कर भोलाराम भी उस दिन जोश से भर गए. उन्होंने मंच पर ही कहा, ‘‘इंदिरा गांधी की बात हम सभी को माननी है. अगर विरोधियों के भालों से बचना है, तो भोले को समर्थन जरूर दीजिए.’’

भोले और भाले का ऐसा तालमेल इंदिरा गांधी को भी भा गया. उन्होंने मुसकरा कर भोलाराम को और अतिरिक्त अंक दे दिया.

तब से लगातार 5 बार भोलाराम ही यहां के सांसद बने. वे इलाके के बड़े लोगों की बेहद कद्र करते हैं, इसीलिए भोलाराम की बात भी कोई नहीं टालता.

महीनाभर पहले शनीचरी बाजार में हंगामा मच गया. हुआ यह कि भोलाराम अपने टोपीधारी विशेष प्रतिनिधि के साथ बाजार आए. चैतराम मोची की दुकान बस अभी लगी ही थी कि दोनों नेता उस के आगे जा कर खड़े हो गए.

चैतराम ने इस से पहले कभी भोलाराम को देखा भी नहीं था. वह केवल साथ में आए गोपाल दाऊ को पहचानता था.

गोपाल दाऊ ने ही चैतराम को भोलाराम का परिचय दिया. खादी का कुरतापाजामा और गले में लाल रंग का  गमछा.

भोलाराम तकरीबन 70 बरस के हैं, मगर चेहरा सुर्ख लाल है. चुनाव जीतने के बाद उन का सूखा चेहरा लाल होता गया और वे 2 भागों में बंट गए.

भोलाराम दिल्ली में रहते तो सूटबूट पहनते. गले में लाल रंग का गमछा तो खैर रहा ही. दिल्ली में रहते तो दिल्ली वालों की तरह खातेपीते, लेकिन अपने संसदीय इलाके में मुनगा, बड़ी, मछरियाभाजी, कांदाभाजी ही खाते.

अपने इलाके में भंदई पे्रमी सांसद भोलाराम को सामने पा कर चैतराम को कुछ सूझा नहीं. भोलाराम ने उस के कंधे पर हाथ रख दिया.

चैतराम ने भोलाराम के पैरों में अपने हाथों की बनी भंदई रख दी. भंदई छत्तीसगढ़ी सैंडल को कहते हैं. मोची गांव में मरे मवेशियों के चमड़े से इसे बनाते हैं. सूखे दिनों की भंदई अलग होती है, जबकि बरसाती भंदई अलग बनती है.

अपने हाथ की बनी भंदई पहने देख भोलाराम के सामने चैतराम झुक गया. भोलाराम ने कहा, ‘‘भाई, मुझे पता लगा है कि तुम्हीं मुझे भंदई बना कर देते हो, इसलिए मिलने चला आया. इस बार 100 जोड़ी भंदई चाहिए.’’

‘‘100 जोड़ी…’’ चैतराम का मुंह खुला का खुला रह गया.

भोलाराम ने कहा, ‘‘हां, 100 जोड़ी. दिल्ली में अपने दोस्तों को तुम्हारे हाथ की भंदई बहुत बांट चुका हूं. इस बार विदेशी दोस्तों का साथ होने वाला है.

‘‘मैं जब भी विदेश जाता हूं, तो वहां भंदई पर सब की नजर गड़ जाती है. सोचता हूं कि इस बार एकएक जोड़ी भंदई उन्हें भेंट करूं. बन जाएगी न?’’

चैतराम ने पूछा, ‘‘कब तक चाहिए मालिक?’’

‘‘2 महीने में.’’

‘‘2 महीने में… मालिक?’’

‘‘हांहां, 2 महीने में तुम्हें देनी है. मैं खुद आऊंगा तुम्हारे गांव में भंदई ले जाने के लिए.’’

‘‘मालिक, गांवभर के सारे मोची मिलजुल कर बनाएंगे. मैं गांव जा कर सब को तैयार करूंगा.’’

‘‘तुम जानो तुम्हारा काम जाने. मुझे तो भंदई चाहिए बस.’’

इतना सुनना था कि पास में दुकान लगाए उसी गांव के 2 और मोची एकसाथ बोल पड़े, ‘‘दाऊजी, आप की मेहरबानी से सब ठीकठाक है. हम सब मिल कर बना देंगे भंदई.

‘‘मगर मालिक, ये गौशाला वाले गांव में 20 एकड़ जमीन पर कब्जा कर के बैठ गए हैं. पिछले 2 साल से यहां के किसान अपने जानवरों को रिश्तेदारों के पास पहुंचाने लगे हैं.

‘‘हुजूर, यह जगह जानवरों के चरने के लिए थी, मगर सेठ लोगों ने घेर कर कब्जा कर लिया है.

‘‘2 साल से हम सब लोग फरियाद कर रहे हैं, पर कोई सुनता ही नहीं. अब आप आ गए हैं, तो कुछ तो रास्ता निकालिए. छुड़ाइए गायभैंसों के लिए उस 20 एकड़ जमीन को. गौशाला के नाम से सेठ लोग गाय के चरने की जगह को ही लील ले गए साहब. अजब अंधेर है.’’

भोलाराम को इस बेजा कब्जे की जानकारी तो थी, मगर वे यही सोच रहे थे कि सेठ लोग सब संभाल लेंगे. यहां तो पासा ही पलट सा गया है. भंदई का शौक अब उन्हें भारी पड़ रहा था. फिर भी उन्होंने चैतराम को पुचकारते हुए कहा, ‘‘मैं देख लूंगा. तुम लो ये एक हजार रुपए एडवांस के.’’

‘‘इस की जरूरत नहीं है मालिक,’’ हाथ जोड़ कर चैतराम ने कहा.

‘‘रख लो,’’ भोलाराम ने कहा.

चैतराम ने रखने को तो अनमने ढंग से एक हजार रुपए रख लिए, मगर सौ जोड़ी भंदई बना पाना उसे आसान नहीं लग रहा था.

गांव जा कर उस ने अपने महल्ले के लोगों को इकट्ठा किया. 4 लोगों ने 25-25 जोड़ी भंदई बनाने का जिम्मा ले लिया. चैतराम का जी हलका हुआ.

लेकिन सेठों को भी खबर लग गई कि गांव के मोची किशन गौशाला का विरोध सांसद भोलाराम से कर रहे थे. वे बहुत भन्नाए. उन्होंने गांव के अपने पिछलग्गू सरपंच, पंच और कुछ खास लोगों से बात की और गांव में बैठक हो गई. सरपंच ने मोची महल्ले के लोगों के साथ गांव वालों को भी बुलवाया.

सरपंच ने कहा, ‘‘देखो भाई, आज की बैठक बहुत खास है. गाय की वजह से बैठी है यह सभा.’’

चैतराम ने कहा, ‘‘मालिक, गाय का चारागाह सब गौशाला वाले दबाए बैठे हैं. चारागाह नहीं रहेगा, तो गौधन की बढ़ोतरी कैसे होगी?’’

चैतराम का इतना कहना था कि बाबरी मसजिद तोड़ने गई सेना में शामिल हो कर लौटे जरहा गांव का एकलौता वीर सुंदरलाल उठ खड़ा हुआ. उस ने कहा, ‘‘वाह रे चैतराम, तू कब से हो गया गौ का शुभचिंतक?’’

सुंदरलाल का इतना कहना था कि चैतराम के साथ उस के महल्ले के सभी लोग उठ खड़े हुए. उस ने कहा, ‘‘मालिक हो, मगर बात संभल कर नहीं कर सकते. हम मरे हुए गायभैंसों का चमड़ा उतारते हैं, आप लोग तो जीतीजागती गाय की जगह दबाने वालों के हाथों खेल गए.’’

ऐसा सुन कर सुंदरलाल सिटपिटा सा गया. तभी भोलाराम दल के एक जवान रामलाल ने कहा, ‘‘राजनीति करो, मगर धर्म बचा कर. आदिवासियों को गाय बांटने का झांसा तुम लोग देते हो और गांव की जमीन, जिस में गाएं चरती थीं, उसे पैसा ले कर बाहर से आए सेठों को भेंट कर देते हो.’’

सुंदरलाल ने कहा, ‘‘100 जोड़ी भंदई के लिए गायों को जहर दे कर मरवाओगे क्या…?’’

उस का इतना कहना था कि ‘मारोमारो’ की आवाज होने लगी और लाठीपत्थर चलने लगे. गांव में यह पहला मौका था, जब बैठक में लाठियां चल रही थीं.

3 मोचियों के सिर फट गए. चैतराम का बायां हाथ टूट गया. अखबार में खबर छप गई. सांसद भोलाराम ने जरहा गांव का दौरा किया. उन्होंने मोचियों से कहा, ‘‘तुम लोग एकएक घाव का हिसाब मांगने का हक रखते हो. यह गुंडागर्दी नहीं चलेगी. मैं सब देख लूंगा.’’

भाषण दे कर जब भोलाराम अपनी कार में बैठ रहे थे, तभी उन्हीं की उम्र के एक आदमी ने उन्हें आवाज दे कर रोका. भोलाराम ने पूछा, ‘‘कहो भाई?’’

उस आदमी ने कहा, ‘‘भोला भाई, अब आप न भोले हैं, न भाले हैं. मैं पहले चुनाव से आप का संगी हूं. जहां भाला बनना चाहिए, वहां आप भोला बन जाते हैं. जहां भोला बनना चाहिए, वहां भाला, इसलिए सबकुछ गड्डमड्ड हो गया.‘‘भाई मेरे कोई जिंदा गाय की राजनीति कर रहा है, तो कोई मरी हुई गाय की चमड़ी का चमत्कार बूझ रहा है. हैं दोनों ही गलत. मगर हमारी मजबूरी है कि 2 गलत में से एक को हर बार चुनना पड़ता है. इस तरह हम ही हर बार हारते हैं.’’ Hindi Family Story.

Best Social Story in Hindi: लाडो का पीला झबला- परिवार और प्यार की कहानी

Best Social Story in Hindi: सुबह सुबह ही शाहिस्ता ने सोहेल से कहा, ‘‘आज वक्त निकाल कर अपने लिए नई पतलून ले आइए. अब तो रफू के धागे भी जवाब दे चुके हैं.’’ सोहेल ने बड़ी बुलंद आवाज में कहा, ‘‘बेगम का हुक्म सिरआंखों पर. आज तो दिन भी बाजार का.’’

हर जुमेरात पर शहर के छोर पर नानानानी पार्क के पास वाली सड़क पर बाजार लगता था. सोहेल ने जल्दीजल्दी अपना काम खत्म कर के बाजार का रुख कर लिया. दिमाग में हिसाब चालू था. 2 ईद गुजर चुकी थीं, उसे खुद के लिए नया जोड़ा कपड़ा लिए हुए. इस बार 25 रुपए बचे हैं, महीने के हिसाब से… पूरे 12 किलोमीटर चलने के बाद बाजार आ ही गया. शाम बीतने को थी. अंधेरा हो चुका था. बाजार ट्यूबलाइट और बल्ब की रोशनी से जगमगा रहा था.

सोहेल ने अपनी जेब की गहराई के मुताबिक दुकान समझी और यहांवहां नजर दौड़ाने लगा. अचानक उस की नजर एक तरफ सजे हुए झबलों पर पड़ी. नीले, लाल, हरे, पीले और बहुत से रंग. दुकानदार ने सोहेल को कुछ पतलूनें दिखाईं. मोलभाव शुरू हुआ. 20 रुपए की पतलून तय हुई.

सोहेल ने पूछा, ‘‘भाई, बच्चों के वे रंगबिरंगे झबले कितने के हैं?’’ दुकानदार ने कहा, ‘‘25 के 3. कोई मोलभाव नहीं हो पाएगा इस में.’’सोहेल ने जेब से पैसे निकाले और 3 झबले ले लिए. 12 किलोमीटर चल के घर आतेआते रात काफी हो चली थी.

घर का दरवाजा खटखटाते ही शाहिस्ता ने दरवाजा तुरंत खोला, मानो वह दरवाजे से चिपक कर ही खड़ी थी. सोहेल ने पूछा, ‘‘हमारी लाडो सो गई क्या?’’

 

शाहिस्ता ने जवाब दिया, ‘‘वह तो कब की सो गई. मैं तो तुम्हारी नई पतलून का इंतजार कर रही थी.’’ सोहेल ने हंसते हुए जवाब दिया, ‘‘बेगम, आप का इंतजार और लंबा हो गया.’’

शाहिस्ता ने पैकेट खोला और उस में से निकले 3 झबले. उस ने बिना कुछ कहे खाना निकालना सही समझा. खाना लगा कर उस ने सिलाई मशीन में तेल डाला, काला धागा निकाला और पुरानी पतलून को रफू करने लगी.

सोहेल ने खाना खाते हुए मुसकरा कर कहा, ‘‘लाडो के ऊपर पीला झबला तो बड़ा ही खूबसूरत लगेगा. क्यों शाहिस्ता…’’ शाहिस्ता ने दांतों से धागा काटते हुए कहा, ‘‘लो, तुम्हारी पतलून फिर से तैयार हो गई.’’ Best Social Story in Hindi. 

Family Story in Hindi: पीठ पीछे- दिनेश के सम्मुख कैसा सच सामने आया?

Family Story in Hindi: दिनेश हर सुबह पैदल टहलने जाता था. कालोनी में इस समय एक पुलिस अफसर नएनए तबादले पर आए हुए थे. वे भी सुबह टहलते थे. एक ही कालोनी का होने के नाते वे एकदूसरे के चेहरे पहचानने लगे थे. आज कालोनी के पार्क में उन से भेंट हो गई. उन्होंने अपना परिचय दिया और दिनेश ने अपना. उन का नाम हरपाल सिंह था. वे पुलिस में डीएसपी थे और दिनेश कालेज में प्रोफैसर.

वे दोनों इधरउधर की बात करते हुए आगे बढ़ रहे थे कि तभी सामने से आते एक शख्स को देख कर हरपाल सिंह रुक गए. दिनेश को भी रुकना पड़ा. हरपाल सिंह ने उस आदमी के पैर छुए. उस आदमी ने उन्हें गले से लगा लिया.

हरपाल सिंह ने दिनेश से कहा, ‘‘मैं आप का परिचय करवाता हूं. ये हैं रामप्रसाद मिश्रा. बहुत ही नेक, ईमानदार और सज्जन इनसान हैं. ऐसे आदमी आज के जमाने में मिलना मुश्किल हैं.

‘‘ये मेरे गुरु हैं. ये मेरे साथ काम कर चुके हैं. इन्होंने अपनी जिंदगी ईमानदारी से जी है. रिश्वत का एक पैसा भी नहीं लिया. चाहते तो लाखोंकरोड़ों रुपए कमा सकते थे.’’ अपनी तारीफ सुन कर रामप्रसाद मिश्रा ने हाथ जोड़ लिए. वे गर्व से चौड़े नहीं हो रहे थे, बल्कि लज्जा से सिकुड़ रहे थे.

दिनेश ने देखा कि उन के पैरों में साधारण सी चप्पल और पैंटशर्ट भी सस्ते किस्म की थीं. हरपाल सिंह काफी देर तक उन की तारीफ करते रहे और दिनेश सुनता रहा. उसे खुशी हुई कि आज के जमाने में भी ऐसे लोग हैं.

कुछ समय बाद रामप्रसाद मिश्रा ने कहा, ‘‘अच्छा, अब मैं चलता हूं.’’ उन के जाने के बाद दिनेश ने पूछा, ‘‘क्या काम करते हैं ये सज्जन?’’

‘‘एक समय इंस्पैक्टर थे. उस समय मैं सबइंस्पैक्टर था. इन के मातहत काम किया था मैं ने. लेकिन ऐसा बेवकूफ आदमी मैं ने आज तक नहीं देखा. चाहता तो आज बहुत बड़ा पुलिस अफसर होता लेकिन अपनी ईमानदारी के चलते इस ने एक पैसा न खाया और न किसी को खाने दिया.’’ ‘‘लेकिन अभी तो आप उन के सामने उन की तारीफ कर रहे थे. आप ने उन के पैर भी छुए थे,’’ दिनेश ने हैरान हो कर कहा.

‘‘मेरे सीनियर थे. मुझे काम सिखाया था, सो गुरु हुए. इस वजह से पैर छूना तो बनता है. फिर सच बात सामने तो नहीं कही जा सकती. पीठ पीछे ही कहना पड़ता है. ‘‘मुझे क्या पता था कि इसी शहर में रहते हैं. अचानक मिल गए तो बात करनी पड़ी,’’ हरपाल सिंह ने बताया.

‘‘क्या अब ये पुलिस में नहीं हैं?’’ दिनेश ने पूछा. ‘‘ऐसे लोगों को महकमा कहां बरदाश्त कर पाता है. मैं ने बताया न कि न किसी को घूस खाने देते थे, न खुद खाते थे. पुलिस में आरक्षकों की भरती निकली थी. इन्होंने एक रुपया नहीं लिया और किसी को लेने भी नहीं दिया. ऊपर के सारे अफसर नाराज हो गए.

‘‘इस के बाद एक वाकिआ हुआ. इन्होंने एक मंत्रीजी की गाड़ी रोक कर तलाशी ली. मंत्रीजी ने पुलिस के सारे बड़े अफसरों को फोन कर दिया. सब के फोन आए कि मंत्रीजी की गाड़ी है, बिना तलाशी लिए जाने दिया जाए, पर इन पर तो फर्ज निभाने का भूत सवार था. ये नहीं माने. तलाशी ले ली. ‘‘गाड़ी में से कोकीन निकली, जो मंत्रीजी खुद इस्तेमाल करते थे. ये मंत्रीजी को थाने ले गए, केस बना दिया. मंत्रीजी की तो जमानत हो गई, लेकिन उस के बाद मंत्रीजी और पूरा पुलिस महकमा इन से चिढ़ गया.

‘‘मंत्री से टकराना कोई मामूली बात नहीं थी. महकमे के सारे अफसर भी बदला लेने की फिराक में थे कि इस आदमी को कैसे सबक सिखाया जाए? कैसे इस से छुटकारा पाया जाए? ‘‘कुछ समय बाद हवालात में एक आदमी की पूछताछ के दौरान मौत हो गई. सारा आरोप रामप्रसाद मिश्रा यानी इन पर लगा दिया गया. महकमे ने इन्हें सस्पैंड कर दिया.

‘‘केस तो खैर ये जीत गए. फिर अपनी शानदार नौकरी पर आ सकते थे, लेकिन इतना सबकुछ हो जाने के बाद भी ये आदमी नहीं सुधरा. दूसरे दिन अपने बड़े अफसर से मिल कर कहा कि मैं आप की भ्रष्ट व्यवस्था का हिस्सा नहीं बन सकता. न ही मैं यह चाहता हूं कि मुझे फंसाने के लिए महकमे को किसी की हत्या का पाप ढोना पड़े. सो मैं अपना इस्तीफा आप को सौंपता हूं.’’ हरपाल सिंह की बात सुन कर रामप्रसाद के प्रति दिनेश के मन में इज्जत बढ़ गई. उस ने पूछा, ‘‘आजकल क्या कर रहे हैं रामप्रसादजी?’’

हरपाल सिंह ने हंसते हुए कहा, ‘‘4 हजार रुपए महीने में एक प्राइवेट स्कूल में समाजशास्त्र के टीचर हैं. इतना नालायक, बेवकूफ आदमी मैं ने आज तक नहीं देखा. इस की इन बेवकूफाना हरकतों से एक बेटे को इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में छोड़ कर आना पड़ा. अब बेचारा आईटीआई में फिटर का कोर्स कर रहा है.

‘‘दहेज न दे पाने के चलते बेटी की शादी टूट गई. बीवी आएदिन झगड़ती रहती है. इन की ईमानदारी पर अकसर लानत बरसाती है. इस आदमी की वजह से पहले महकमा परेशान रहा और अब परिवार.’’ ‘‘आप ने इन्हें समझाया नहीं. और हवालात में जिस आदमी की हत्या कर इन्हें फंसाया गया था, आप ने कोशिश नहीं की जानने की कि वह आदमी कौन था?’’

हरपाल सिंह ने कहा, ‘‘जिस आदमी की हत्या हुई थी, उस में मंत्रीजी समेत पूरा महकमा शामिल था. मैं भी था. रही बात समझाने की तो ऐसे आदमी में समझ होती कहां है दुनियादारी की? इन्हें तो बस अपने फर्ज और अपनी ईमानदारी का घमंड होता है.’’ ‘‘आप क्या सोचते हैं इन के बारे में?’’

‘‘लानत बरसाता हूं. अक्ल का अंधा, बेवकूफ, नालायक, जिद्दी आदमी.’’ ‘‘आप ने उन के सामने क्यों नहीं कहा यह सब? अब तो कह सकते थे जबकि इस समय वे एक प्राइवेट स्कूल में टीचर हैं और आप डीएसपी.’’

‘‘बुराई करो या सच कहो, एक ही बात है. और दोनों बातें पीठ पीछे ही कही जाती हैं. सब के सामने कहने वाला जाहिल कहलाता है, जो मैं नहीं हूं. ‘‘जैसे मुझे आप की बुराई करनी होगी तो आप के सामने कहूंगा तो आप नाराज हो सकते हैं. झगड़ा भी कर सकते हैं. मैं ऐसी बेवकूफी क्यों करूंगा? मैं रामप्रसाद की तरह पागल तो हूं नहीं.’’

दिनेश ने उसी दिन तय किया कि आज के बाद वह हरपाल सिंह जैसे आदमी से दूरी बना कर रखेगा. हां, कभी हरपाल सिंह दिख जाता तो वह अपना रास्ता इस तरह बदल लेता जैसे उसे देखा ही न हो. Family Story in Hindi.

Hindi Family Story: आलू वड़ा- दीपक मामी की हरकतों से क्यों परेशान था?

Hindi Family Story: ‘‘बाबू, तुम इस बार दरभंगा आओगे तो हम तुम्हें आलू वड़ा खिलाएंगे,’’ छोटी मामी की यह बात दीपक के दिल को छू गई. पटना से बीएससी की पढ़ाई पूरी होते ही दीपक की पोस्टिंग भारतीय स्टेट बैंक की सकरी ब्रांच में कर दी गई. मातापिता का लाड़ला और 2 बहनों का एकलौता भाई दीपक पढ़ने में तेज था. जब मां ने मामा के घर दरभंगा में रहने की बात की तो वह मान गया.

इधर मामा के घर त्योहार का सा माहौल था. बड़े मामा की 3 बेटियां थीं, मझले मामा की 2 बेटियां जबकि छोटे मामा के कोई औलाद नहीं थी.

18-19 साल की उम्र में दीपक बैंक में क्लर्क बन गया तो मामा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. वहीं दूसरी ओर दीपक की छोटी मामी, जिन की शादी को महज 4-5 साल हुए थे, की गोद सूनी थी.

छोटे मामा प्राइवेट नौकरी करते थे. वे सुबह नहाधो कर 8 बजे निकलते और शाम के 6-7 बजे तक लौटते. वे बड़ी मुश्किल से घर का खर्च चला पाते थे. ऐसी सूरत में जब दीपक की सकरी ब्रांच में नौकरी लगी तो सब खुशी से भर उठे.

‘‘बाबू को तुम्हारे पास भेज रहे हैं. कमरा दिलवा देना,’’ दीपक की मां ने अपने छोटे भाई से गुजारिश की थी.

‘‘कमरे की क्या जरूरत है दीदी, मेरे घर में 2 कमरे हैं. वह यहीं रह लेगा,’’ भाई के इस जवाब में बहन बोलीं, ‘‘ठीक है, इसी बहाने दोनों वक्त घर का बना खाना खा लेगा और तुम्हारी निगरानी में भी रहेगा.’’

दोनों भाईबहनों की बातें सुन कर दीपक खुश हो गया.

मां का दिया सामान और जरूरत की चीजें ले कर दोपहर 3 बजे का चला दीपक शाम 8 बजे तक मामा के यहां पहुंच गया.

‘‘यहां से बस, टैक्सी, ट्रेन सारी सुविधाएं हैं. मुश्किल से एक घंटा लगता है. कल सुबह चल कर तुम्हारी जौइनिंग करवा देंगे,’’ छोटे मामा खुशी से चहकते हुए बोले.

‘‘आप का काम…’’ दीपक ने अटकते हुए पूछा.

‘‘अरे, एक दिन छुट्टी कर लेते हैं. सकरी बाजार देख लेंगे,’’ छोटे मामा दीपक की समस्या का समाधान करते हुए बोल उठे.

2-3 दिन में सबकुछ सामान्य हो गया. सुबह साढ़े 8 बजे घर छोड़ता तो दीपक की मामी हलका नाश्ता करा कर उसे टिफिन दे देतीं. वह शाम के 7 बजे तक लौट आता था.

उस दिन रविवार था. दीपक की छुट्टी थी. पर मामा रोज की तरह काम पर गए हुए थे. सुबह का निकला दीपक दोपहर 11 बजे घर लौटा था. मामी खाना बना चुकी थीं और दीपक के आने का इंतजार कर रही थीं.

‘‘आओ लाला, जल्दी खाना खा लो. फेरे बाद में लेना,’’ मामी के कहने में भी मजाक था.

‘‘बस, अभी आया,’’ कहता हुआ दीपक कपड़े बदल कर और हाथपैर धो कर तौलिया तलाशने लगा.

‘‘तुम्हारे सारे गंदे कपड़े धो कर सूखने के लिए डाल दिए हैं,’’ मामी खाना परोसते हुए बोलीं.

दीपक बैठा ही था कि उस की मामी पर निगाह गई. वह चौंक गया. साड़ी और ब्लाउज में मामी का पूरा जिस्म झांक रहा था, खासकर दोनों उभार.

मामी ने बजाय शरमाने के चोट कर दी, ‘‘क्यों रे, क्या देख रहा है? देखना है तो ठीक से देख न.’’

अब दीपक को अजीब सा महसूस होने लगा. उस ने किसी तरह खाना खाया और बाहर निकल गया. उसे मामी का बरताव समझ में नहीं आ रहा था.

उस दिन दीपक देर रात घर आया और खाना खा कर सो गया.

अगली सुबह उठा तो मामा उसे बीमार बता रहे थे, ‘‘शायद बुखार है, सुस्त दिख रहा है.’’

‘‘रात बाहर गया था न, थक गया होगा,’’ यह मामी की आवाज थी.

‘आखिर माजरा क्या है? मामी क्यों इस तरह का बरताव कर रही हैं,’ दीपक जितना सोचता उतना उलझ रहा था.

रात खाना खाने के बाद दीपक बिस्तर पर लेटा तो मामी ने आवाज दी. वह उठ कर गया तो चौंक गया. मामी पेटीकोट पहने नहा रही थीं.

‘‘उस दिन चोरीछिपे देख रहा था. अब आ, देख ले,’’ कहते हुए दोनों हाथों से पकड़ उसे अपने सामने कर दिया.

‘‘अरे मामी, क्या कर रही हो आप,’’ कहते हुए दीपक ने बाहर भागना चाहा मगर मामी ने उसे नीचे गिरा दिया.

थोड़ी ही देर में मामीभांजे का रिश्ता तारतार हो गया. दीपक उस दिन पहली बार किसी औरत के पास आया था. वह शर्मिंदा था मगर मामी ने एक झटके में इस संकट को दूर कर दिया, ‘‘देख बाबू, मुझे बच्चा चाहिए और तेरे मामा नहीं दे सकते. तू मुझे दे सकता है.’’

‘‘मगर ऐसा करना गलत होगा,’’ दीपक बोला.

‘‘मुझे खानदान चलाने के लिए औलाद चाहिए, तेरे मामा तो बस रोटीकपड़ा, मकान देते हैं. इस के अलावा भी कुछ चाहिए, वह तुम दोगे,’’ इतना कह कर मामी ने दीपक को बाहर भेज दिया.

उस के बाद से तो जब भी मौका मिलता मामी दीपक से काम चला लेतीं. या यों कहें कि उस का इस्तेमाल करतीं. मामा चुप थे या जानबूझ कर अनजान थे, कहा नहीं जा सकता, मगर हालात ने उन्हें एक बेटी का पिता बना दिया.

इस दौरान दीपक ने अपना तबादला पटना के पास करा लिया. पटना में रहने पर घर से आनाजाना होता था. छोटे मामा के यहां जाने में उसे नफरत सी हो रही थी. दूसरी ओर मामी एकदम सामान्य थीं पहले की तरह हंसमुख और बिंदास.

एक दिन दीपक की मां को मामी ने फोन किया. मामी ने जब दीपक के बारे में पूछा तो मां ने झट से उसे फोन पकड़ा दिया.

‘‘हां मामी प्रणाम. कैसी हो?’’ दीपक ने पूछा तो वे बोलीं, ‘‘मुझे भूल गए क्या लाला?’’

‘‘छोटी ठीक है?’’ दीपक ने पूछा तो मामी बोलीं, ‘‘बिलकुल ठीक है वह. अब की बार आओगे तो उसे भी देख लेना. अब की बार तुम्हें आलू वड़ा खिलाएंगे. तुम्हें खूब पसंद है न.’’

दीपक ने ‘हां’ कहते हुए फोन काट दिया. इधर दीपक की मां जब छोटी मामी का बखान कर रही थीं तो वह मामी को याद कर रहा था जिन्होंने उस का आलू वड़ा की तरह इस्तेमाल किया, और फिर कचरे की तरह कूड़ेदान में फेंक दिया.

औरत का यह रूप उसे अंदर ही अंदर कचोट रहा था.

‘मामी को बच्चा चाहिए था तो गोद ले सकती थीं या सरोगेट… मगर इस तरह…’ इस से आगे वह सोच न सका.

मां चाय ले कर आईं तो वह चाय पीने लगा. मगर उस का ध्यान मामी के घिनौने काम पर था. उसे चाय का स्वाद कसैला लग रहा था. Hindi Family Story.

Best Family Story in Hindi: दुनिया पूरी- जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आया जहां सबकुछ रुक गया

Best Family Story in Hindi: मेरी पत्नी का देहांत हुए 5 वर्ष बीत गए थे. ऐसे दुख ख़त्म तो कभी नहीं होते, पर मन पर विवशता व उदासीनता की एक परत सी जम गई थी. इस से दुख हलका लगने लगा था. जीवन और परिवार की लगभग सभी जिम्मेदारियां पूरी हो चुकी थीं. नौकरी से सेवानिवृत्ति, बच्चों की नौकरियां और विवाह भी.

ज़िंदगी एक मोड़ पर आ कर रुक गई थी. दोबारा घर बसाना मुझे बचकाना खयाल लगता था. चुकी उमंगों के बीज भला किसी उठती उमंग में क्यों बोए जाएं.  अगर सामने भी चुकी उमंग ही हो, तो दो ठूंठ पास आ कर भी क्या करें. मुझे याद आता था कि एक बार पत्नी और अपनी ख़ुद की नौकरी में अलगअलग पोस्टिंग होने पर जाने के लिए अनिच्छुक पत्नी को समझाते हुए मैं ने यह वचन दे डाला था कि मैं जीवन में कभी किसी दूसरी औरत से शरीर के किसी रिश्ते के बारे में होश रहने तक सोचूंगा भी नहीं.

पत्नी का निधन इस तरह अकस्मात दिल का दौरा पड़ने से हुआ कि दोबारा कभी अपने वचन से मुक्ति की बात ही न आ सकी. उस के जाने के बाद यह वचन मेरे लिए पत्थर की लकीर बन गया. मैं तनमन से दुनियाभर की स्त्रियों से हमेशा के लिए दूर हो गया.

कुछ साल बीते, शरीर में एक अजीब सा ठहराव आ गया. एक जड़ता ने घर कर लिया. किताबों में पढ़ा कि इंसान के लिए किसी दूसरे इंसान का जिस्म केवल ज़रूरत ही नहीं, बल्कि एक औषधि है. हर बदन में एक प्यास बसती है जिस का सावन कहीं और रहता है. एकदूसरे को छूना, किसी से लिपटना जीवन की एक अनिवार्य शर्त है, मौत को पास आने से रोकने के लिए एक इम्युनिटी है. यह घर्षण एक जीव वैज्ञानिकता है. और तब, मुझे लगा कि मैं हर कहीं, हर किसी को छूने की कोशिश करता हूं.

मुझे महसूस होता कि किसी समय पति के जीवित न रहने पर किसी स्त्री को उस के साथ ही सती होने के लिए विवश करना या उस का पति के साथ ही जल मरना कैसा व क्या रहा होगा. वह पितृसत्तात्मक समाज था, इसलिए मरने की शर्त केवल स्त्री के लिए थी, पुरुष तुरंत दोबारा विवाह कर लेते थे. मैं अपने वचन के चलते इस से उबरना चाहता था.

जल्दी ही मुझे लगने लगा कि महिलाओं से दूर रहते हुए भी मुझे किसी इंसान से बात करते हुए उसे छू लेना, जरा सी पहचान पर उसे गले लगा लेना, घूमते हुए हाथ पकड़ लेना, बैठते हुए आत्मीयता से उस से सट जाना बहुत जीवनभरा है. मेरे शरीर में इस से स्पंदन आ जाता. जीने की इच्छा बलवती होती. बदन में एक लय आ जाती. अच्छी तरह रहने का मन होता. मैं न जाने क्याक्या सोचने लगा. क्या मैं किसी मंदिर में खड़ा हो कर संकेत रूप में ही पत्थर के ईश्वर को साक्षी मान कर अपना वचन तोड़ दूं? नहीं. यदि मेरी पत्नी जीवित होती तो मैं शायद ऐसा करने का साहस भी जुटा लेता पर अब उस के जाने के बाद नहीं. यह अपराध है.

मैं पुरुष शरीर का ही सान्निध्य और साहचर्य पाने में भलाभला सा महसूस करने लगा. अब मैं इस दिशा में सोचता. इस में किसी तरह की अंतरंगता मुझे भाती. लेकिन मेरे मन के स्वाभाविक तर्क़ मुझे रोकते. अपने हमउम्र लोगों का साथ मुझे खीझभरा लगता. वे हमेशा ऐसी बातें करते कि मेरी आमदनी कितनी है, मेरी जायदाद की कीमत कितनी है, मेरे पास भविष्यनिधि के स्रोत क्या हैं, मेरे मकान या ज़मीन का बाज़ार मूल्य कितना है. इन सवालों से उकता कर मैं उन से दूरी बना लेता.

मेरा ध्यान बच्चों की ओर जाता. लेकिन उन से किसी किस्म की आत्मीयता पनपने से पहले मैं सोचता कि ये इन के जिंदगी बनाने, कैरियर बनाने के दिन हैं, इन का ध्यान भविष्य बनाने पर ही रहे और यह सोचता हुआ मैं उन से पर्याप्त दूरी रखता. लेकिन जल्दी ही मैं ने देखा कि 18 से ले कर 25 साल तक की उम्र के लोगों में मेरी दिलचस्पी रहती है. यह वर्ग मुझे एक विवश, असहाय सा वर्ग नज़र आता. इस की विवशता मुझे कई कारणों से आकर्षित करती. यह उम्र ऐसी थी कि मातापिता से अपने ख़र्च के पैसे मांगना भाता नहीं और अपनी आमदनी का कोई जरिया होता नहीं. यह उम्र ऐसी थी कि किसी साथी की ज़रूरत महसूस होती थी और शादी की बात घर में इसलिए नहीं चलती थी कि अभी कोई नौकरी नहीं.

मैं शाम के समय खाना खाने के बाद सड़क पर अकेला ही टहल कर घर लौट रहा था कि गेट के पास मैं ने एक लड़के को खड़े देखा. लड़का एक पेड़ के नीचे अपनी बाइक खड़ी कर के उसी के सहारे खड़ा था. लड़के की उम्र लगभग 21-22 वर्ष रही होगी और वह बारबार घड़ी देखता, शायद किसी के इंतज़ार में था. मैं दरवाज़े से भीतर दाख़िल होने ही लगा था कि हलकी बूंदाबांदी शुरू हो गई. पेड़ के नीचे खड़े होने पर भी बारिश से पूरी सुरक्षा नहीं थी, लड़का कुछ भीगने लगा.

मैं ने इंसानियत के नाते उस से कहा, ‘भीग क्यों रहे हो, भीतर आ जाओ.’

लड़का झट से मेरे पीछेपीछे चला आया. कमरे का ताला खोल कर मैं ने भीतर की लाइट जलाई, तो लड़के ने कुछ संकोच से पूछा, ‘अकेले रहते हैं अंकल?’  ‘हां,’ कह कर मैं ने लड़के को सोफे पर बैठने का इशारा किया.

वह कुछ सहज हो कर उत्साहित हुआ, फिर बोला, ‘मैं सामने वाली बिल्डिंग में एक आंटी को डांस सिखाने आता हूं.’

‘अच्छा,’ मुझे उस की बात दिलचस्प लगी.

‘उन्होंने मुझे 7 बजे का समय दिया हुआ है, पर कभी समय पर घर नहीं आ पातीं,’ वह कुछ मायूसी से बोला.

‘क्या तुम किसी डांस स्कूल में नौकरी करते हो? मैं ने पूछा.

‘नहीं अंकल, मैं तो कालेज में पढ़ता हूं, पर जहां से मैं ने ख़ुद डांस सीखा था, उन्हीं कोच सर ने मुझे यह ट्यूशन दिलवाई है. मेरा थोड़ा ख़र्च निकल जाता है. डांस स्कूल का समय दिन का है, तब ये आंटी आ नहीं पातीं,’ वह बोला.

‘वो आंटी क्या जौब करती हैं, जो रोज़ देर से घर आती हैं? फ़िर उन्होंने तुम्हें यह समय दिया ही क्यों?’ मैं ने सहज ही कहा.

‘जौब नहीं करतीं, हाउसवाइफ हैं. देर तो उन्हें वैसे ही हो जाती है. कभी शौपिंग में, तो कभी सोशल विजिट्स में,’ लड़का बोला.

मैं ने देखा कि लड़का पर्याप्त संजीदा और शिक्षित था, स्मार्ट भी.

लड़का उस दिन तो थोड़ी देर बाद चला गया, किंतु अब वह कभीकभी मेरे पास आने लगा. जब भी वह फुरसत में होता, चला आता. एकदूसरे के बारे में काफ़ीकुछ जान लेने के बाद हमारे बीच काफ़ी बातें होतीं.

वह मुझ से कहता, ‘अंकल, पहले 15-16 साल की उम्र में लोगों की शादी हो जाती थी, और अब देखिए, 30 साल तक के लड़केलड़कियां कुंआरे घूम रहे हैं. क्या आप को नहीं लगता कि इस उम्र तक शरीर को दूसरे किसी शरीर की चाहत तो रहती ही होगी? क्या शरीर यह बात समझता है कि अभी हमारे मालिक की नौकरी नहीं लगी है तो मुझे दबसिकुड़ कर रहना है, सूखे ठूंठ की तरह.’

मैं उस की बात अच्छी तरह समझ गया क्योंकि यह वही बात थी जो मेरे मन में भी आती ही थी.

‘क्या यह हमारा अपराध है? वह कहता.

मैं उस की बात से सहमत होते हुए भी उसे समझाने लगता, ‘लेकिन शादी के विकल्प भी तो हैं?’

लड़का अब एकाएक थोड़ा खुल गया, बोला, ‘अंकल, कौन सा विकल्प ऐसा है जिसे समाज गलत या अपराध नहीं मानता, बताइए कोई एक? शरीर में मल, मूत्र, लार, कफ बनते हैं तो निकाल कर फेंकने ही पड़ते हैं.’

बात करतेकरते हम दोनों और नज़दीक आ जाते.

मैं अपने अकेलेपन से त्रस्त तो था ही, एक दिन बैठेबैठे मेरे मन में आया कि क्यों न मैं भी डांस सीख लूं? ठीक है कि अब इस उम्र में मुझे कोई कैरियर नहीं बनाना, कहीं प्रस्तुति नहीं देनी, पर अपने मन की ख़ुशी और तन की व्यस्तता का एक उपाय तो यह है ही.

दोचार दिन बीते होंगे कि लड़के को डांस का एक ट्यूशन और मिल गया. यह ट्यूशन मेरा ही था. अब वह सप्ताह में 2 दिन मुझे भी डांस सिखाने लगा. फ़िर रोज़ दरवाज़ा बंद कर के तेज़ संगीत की आवाज़ में मैं लगभग एक घंटे तक अकेले ही उस के सिखाए स्टैप्स दोहराता. एक ही कालोनी में पासपास 2 स्टूडैंट्स होने का यह लाभ उसे भी हुआ कि उस का समय अब इंतजार में खराब नहीं होता था. उस की आमदनी भी दोगनी हो गई. दोनों में से जिस के घर की लाइट्स उसे जली दिखाई देती थीं, वहां वह पहले चला जाता था. इस उम्र के मेरे जैसे नए विद्यार्थी के साथ उसे बहुत मज़ा आता. दोनों झूम कर नाचते. नाचतेनाचते दोनों इतना थक कर चूर हो जाते कि… और सारी थकान उतर जाती.

डांस के बाद थक कर हम दोनों गुरुशिष्य निढाल हो जाते और 10-15 मिनट तक दोनों एकदूसरे से लिपटे पड़े रहते.

एक दिन इसी अवस्था में पड़े हुए देख कर उस ने मेरी ओर अचरज से देखा और बोला, ‘क्या ढूंढ रहे हैं अंकल? लगता है जैसे आप का कुछ खो गया है?’ कहता हुआ वह चेहरे पर कोई रहस्यमय मुसकान ले कर उठ गया. कुछ देर में वह वापस चला गया.

कभीकभी वह कहा करता था कि डांस की क्लास खत्म होते ही हमारा गुरुचेले का रिश्ता खत्म हुआ. आप बड़े हैं, थक गए होंगे, लाइए आप के पांव दबा दूं? मैं कहता कि तुम भी तो दिनभर की मेहनत के बाद थक जाते होगे, लाओ तुम्हारी क़मर को कुछ आराम दूं.

पहले तो लड़के को इस बात पर घोर आश्चर्य हुआ था कि मैं अब इस उम्र में डांस सीखूंगा लेकिन जल्दी ही उस ने समझ लिया कि बुढ़ापे में आदमी मजबूर सा हो जाता है. उसे कोई नचाने वाला हो, तो कितना भी नाच ले.

एक दिन एक चमत्कार हुआ. मैं बैठा ही था कि दरवाजे की घंटी बजी. दरवाजा खोला तो सामने एक महिला खड़ी थी. एकाएक मैं उसे पहचाना तो नहीं किंतु ऐसा लगा जैसे शायद ये वही हैं जो मेरे डांसटीचर से डांस सीखती हैं. मैं ने अकसर सड़क पर आतेजाते उन्हें देखा ज़रूर था.

अभिवादन के बाद मैं ने उन्हें बैठाया. वे इधरउधर देखते हुए कुछ संकोच से बोलीं, ‘अभी अभिनव का फ़ोन आया था, वही कोरियोग्राफर सर.’

‘ओह, अच्छा, मुझे पता नहीं था कि उन का नाम अभिनव है,’ मैं ने कहा.

‘जी उन्होंने कहा है कि आज उन्हें कुछ देर हो जाएगी, तो…’

‘क्या वो नहीं आएंगे?’ मुझे लगा कि महिला कुछ झिझक रही हैं.

‘नहीं, नहीं, वे देर से आएंगे पर उन्होंने कहा कि मैं तब तक कुछ ऐसे वो स्टैप्स आप को सिखा दूं जो वो मुझे सिखा चुके हैं, क्योंकि वास्तव में वो 2 लोगों के युगल डांस के स्टैप्स हैं, इसलिए अकेलेअकेले समझ में भी नहीं आते,’ उन्होंने कुछ संकोच से कहा.

यह मेरे लिए सुखद आश्चर्य था. कुछ मिनट बाद मैं और वो अपरिचित महिला एक तेज़ धुन पर एकसाथ डांस कर रहे थे. मैं जल्दी ही उन के बताए स्टैप्स सीख गया था और अब हम दोनों ही सुविधाजनक ढंग से साथ में नाच रहे थे.

मुझे महिला की अगवानी की हड़बड़ी में शायद यह भी ध्यान नहीं रहा था कि मैं ने दरवाजा बंद नहीं किया है. हम नाचतेनाचते मनोयोग से घूम कर पलटे तो देखा कि अभिनव, हमारा डांस टीचर, सामने खड़ा ताली बजा रहा था.

‘वाह, वाह, ऐक्सीलैंट,’ उस ने कहा तो हम दोनों अचकचा कर रुक गए.

हम तीनों ने एकसाथ चाय पी, जिसे वो महिला ही मेरी रसोई में जा कर बना कर लाई थीं.

अभिनव ने मुझे बताया कि डांस मन की ख़ुशी का प्रदर्शन भी है, आप दोनों इतने नज़दीक रहते हुए भी एकदूसरे से मिले नहीं, जबकि दोनों को ही डांस का शौक़ है. अब से मैं आप को सिखाऊंगा अलगअलग, पर दिन में एक बार किसी भी समय आप लोग एकसाथ प्रैक्टिस किया करेंगे.

मानो, अब से हमारी ज़िंदगी ही बदल गई. अब हम समाज से शिकायतें नहीं करते थे, कि अकेले समय ही नहीं कटता. हम अब ऐसे मित्र बन गए थे कि दिन में एक बार आधे घंटे के लिए मिलते थे, पर उस आधे घंटे की प्रतीक्षा कई घंटों तक रहती. ऐसा लगता था कि तनमन में बने बांध में अब ठहरा पानी हमें तंग नहीं करता था. वह बह कर न जाने कहां ओझल हो जाता था.

मुझे बरसों पहले मुंबई के एक मुशायरे में सुनी पंक्तियां अकसर याद आ जाती थीं- ‘दूर सागर के तल में, बूंदभर प्यास छिपी है, सभी की नज़र बचा कर, वहीं जाता है पानी…’

अब कभीकभी रात को सोने से पहले मैं सोचता था कि अगर रात को सपने में मेरी पत्नी आई और उस ने यह पूछा कि आप के साथ दोपहर को कौन होता है? तो मैं उसे बता दूंगा कि उस से मेरा कोई लेनादेना नहीं है, वह तो मेरी क्लासफैलो है.  हम साथ में एक ही टीचर से पढ़ते हैं और होमवर्क में एकदूसरे की मदद करते हैं. Best Family Story in Hindi.

Family Story in Hindi: थप्पड़- मामू ने अदीबा के साथ क्या किया?

Family Story in Hindi: शाम ढलने को थी. इक्कादुक्का दुकानों में बिजली के बल्ब रोशन होने लगे थे. ऊन का आखिरी सिरा हाथ में आते ही अदीबा को धक्का सा लगा कि पता नहीं अब इस रंग की ऊन का गोला मिलेगा कि नहीं.

अदीबा ने कमरे की बत्ती जलाई और अपनी अम्मी को बता कर झटपट ऊन का गोला खरीदने निकल पड़ी.

जातेजाते अदीबा बोली, “अम्मी, ऊन खत्म हो गई है, लाने जा रही हूं, कहीं दुकान बंद न हो जाए.”

अम्मी ने कहा, “अच्छा, जा, पर जल्दी लौट आना, रात होने वाली है.”

लेकिन यह क्या. जहां सिर्फ दुकान जाने में ही आधा घंटा लगता है, वहां से ऊन खरीद कर आधा घंटा से पहले ही अदीबा वापस आ गई… यह कैसे?

मां ने बेटी के चेहरे को गौर से देखा. बेटी का चेहरा धुआंधुआं सा था और उस की सांसें तेजतेज चल रही थीं.

“क्या हुआ अदीबा, ऊन नहीं लाई?”

अदीबा ने रोते हुए अपनी अम्मी को जो आपबीती सुनाई तो अम्मी के होश उड़ गए.

अदीबा की आपबीती सुन कर अम्मी गुस्से से आगबबूला हो उठीं और उस नामुराद आदमी को तरहतरह की गालियां देने लगीं.

कुछ देर बाद जब अम्मी का गुस्सा ठंडा हुआ, तो उन्होंने कहना शुरू किया, “अब तुझे क्या बताऊं बेटी, यह मर्द जात होती ही ऐसी है. उन की नजरों में औरत का जिस्म बस मर्द की प्यास बुझाने का जरीया होता है.

“मेरे साथ भी ऐसा हो चुका है. वह भी एक दफा नहीं, बल्कि कईकई दफा,”
इतना कह कर अम्मी अपने पुराने दिनों के काले पन्ने पलटने लगीं…

अम्मी ने अदीबा को बताया, “जब मैं 5वीं जमात में थी, तब एक दिन मदरसे के मौलवी साहब ने मुझे अपने पास बुलाया और अपनी गोद में बिठा कर वे मेरे सीने पर हाथ फेरने लगे. वे अपना हाथ चलाते रहे और मुझे बहलाते रहे.

“मैं मासूम थी, इसलिए उन की इस गंदी हरकत को समझ न सकी. उन की इस गलत हरकत की वजह से मेरा सीना दर्द करने लगा था…”

हैरान अदीबा ने पूछा, “फिर क्या हुआ अम्मी?”

“उस जमाने में गलत और सही छूने का पता तो बड़े लोगों को भी ज्यादा नही था, मैं तो भला बच्ची थी. बहरहाल, छुट्टी मिलते ही मैं रोते हुए घर गई और अपनी अम्मी से सबकुछ साफसाफ बता दिया.

“फिर क्या था… अब्बू ने न सिर्फ मौलवी साहब की जबरदस्त पिटाई की, बल्कि उन्हें मदरसे से बाहर भी निकलवा दिया.

“इसी तरह एक बार, एक दिन मेरे दूर के रिश्ते के मामू अपनी 5 साल की बेटी के साथ हमारे घर मेहमान बन कर आए. वे तोहफे में ढेर सारी मिठाइयां और फल लाए थे.

“अपने रिश्ते के भाई की खातिरदारी में मेरी अम्मी ने मटन बिरयानी और चिकन कोरमा बनाया था. सब ने खुश हो कर खाया.

“अरसे बाद मिले भाईबहन अपने पुराने दिनों को याद करते रहे और मैं मामू की बेटी के साथ देर रात तक उछलकूद करती रही…”

यह बतातेबताते जब अदीबा की अम्मी सांस लेने के लिए ठहरीं, तो अदीबा ने बेसब्री से पूछा, “फिर क्या हुआ अम्मी?”

अम्मी ने कहना जारी रखा, “जैसे कि हर बच्चा आने वाले मेहमान के बच्चों के साथ सोना पसंद करता है, वैसा ही मैं ने भी किया और अपनी हमउम्र दोस्त के साथ मामू के बिस्तर पर ही सो गई.

“रात के किसी पहर में मेरी नींद तब खुली, जब मुझे एहसास हुआ कि मेरे तथाकथित मामू मेरी सलवार की डोरी खोल रहे हैं.

“मेरा हाथ फौरन सलवार की डोरी पर चला गया. डोरी खुल चुकी थी. मेरा हाथ अपने हाथ से टकराते ही तथाकथित मामू ने अपना हाथ तेजी से खींच लिया. मैं डर गई और जोरजोर से चिल्लाने लगी.

“यह चिल्लाना सुन कर मेरी अम्मी अपने कमरे से भागीभागी आईं और दरवाजा पीटने लगीं.

“तथाकथित मामू ने उठ कर दरवाजा खोला और अम्मी को देखते ही कहा, ‘अदीबा सपने में बड़बड़ा रही है…’

“अम्मी फौरन हालात की नजाकत भांप गईं और मेरा हाथ पकड़ कर अपने साथ ले चलीं. एक हाथ से सलवार पकड़े मैं थरथर कांपती उन के साथ चल पड़ी. इस बीच उन मामू की बेटी भी जाग चुकी थी और सारा तमाशा हैरत से देख रही थी.

“उस हादसे के बाद से हमेशाहमेशा के लिए उन तथाकथित मामू से हमारे परिवार का रिश्ता खत्म हो गया.”

अदीबा ने जोश में कहा, “अच्छा हुआ, बहुत अच्छा हुआ. ऐसे गंदे लोग रिश्तेदार के नाम पर बदनुमा दाग होते हैं.”

अम्मी जब यादों के झरोखों से वापस लौटीं, तो फिर कहने लगीं, “छोड़ो, अब इस किस्से को यहीं दफन करो वरना जितने मुंह उतनी बातें होंगी. लड़कियां सफेद चादर की तरह होती हैं, जिन पर दाग बहुत जल्दी लग जाते हैं, जो छुड़ाने से भी नहीं छूटते, इसलिए भूल कर भी किसी से इस बात का जिक्र मत करना.”

दरअसल, ऊन खरीदने के लिए जाते समय रास्ते में अदीबा को दूर के एक रिश्तेदार मिल गए थे. वे बातें करते हुए साथसाथ चलने लगे और चंद मिनटों में ही कुछ ज्यादा ही करीब होने की कोशिश करने लगे. अदीबा फासला बढ़ा कर चलना चाहती और वे फासला घटा कर चलना चाहते.

पहले तो वे अदीबा के साथ सलीके से बातचीत करते रहे, लेकिन जैसे ही गली में अंधेरा मिला, तो वे अपनी असलियत पर उतर आए.

उन का हाथ बारबार किसी न किसी बहाने अदीबा के सीने को छूने लगा. अदीबा उन की नीयत भांप गई, फिर बिना लिहाज के एक जोरदार थप्पड़ उन के चेहरे पर रसीद कर दिया कि वे बिलबिला उठे.

इस के बाद अदीबा ऊन का गोला खरीदने का इरादा छोड़ कर बीच रास्ते से ही घर वापस लौट आई.

बड़े मियां इस अचानक होने वाले हमले के लिए बिलकुल तैयार नहीं थे. उन के कानों में अचानक सीटियां सी बजने लगीं और आंखों के सामने गोलगोल तारे नाचने लगे. उन्होंने बिना इधरउधर देखे सामने वाली पतली गली से निकलना मुनासिब समझा.

यही वजह थी कि अदीबा जब घर में दाखिल हुई, तो उस का चेहरा धुआंधुआं था और सांसें तेजतेज चल रही थीं.

बहरहाल, इस तरह मांबेटी की बातचीत में कई परतें और कई गांठें खुलती चली गईं. Family Story in Hindi.

Hindi Family Story: हमारी भागीदारी- बाजार से लाए कपड़े के क्या रहस्य थे?

Hindi Family Story: सामान के बैगों से लदीफदी नेहा जब बाजार से घर लौटी तो पसीने से लथपथ हो रही थी. उसे पसीने से लथपथ देख कर उस की मां नीति दौड़ कर उस के पास गईं और उस के हाथ से बैग लेते हुए कहा,” एकसाथ इतना सारा सामान लाने की जरूरत क्या थी? देखो तो कैसी पसीनेपसीने हो रही हो.”

” अरे मां, बाजार में आज बहुत ही अच्छा सामान दिखाई दे रहा था और मेरे पास में पैसे भी थे, तो मैं ने सोचा कि क्यों ना एकसाथ पूरा सामान खरीद लिया जाए… बारबार बाजार जानाआना भी नहीं पड़ेगा.”

“बाजार में तो हमेशा ही अच्छाअच्छा सामान दिखता है. आज ऐसा नया क्या था?”

“आज कुछ नहीं था, पर 4 दिन बाद तो है ना,” नेहा ने मुसकराते हुए कहा.

“अच्छा, जरा बताओ तो 4 दिन बाद क्या है, जो मुझे नहीं पता. मुझे भी तो पता चले कि 4 दिन बाद है क्या?”

“4 दिन बाद दीवाली है मां, इसीलिए तो बाजार सामानों से भरा पड़ा है और दुकानों पर बहुत भीड़ लगी है.”

“तब तो तुम बिना देखेपरखे ही सामान उठा लाई होगी?” नीति ने नेहा से कहा.

“मां, आप भी ना कैसी बातें करती हैं? अब इतनी भीड़ में एकएक सामान देख कर लेना संभव है क्या? और फिर दुकानदार को भी अपनी साख की चिंता होती है. वह हमें खराब सामान क्यों देगा भला?”

“चलो ठीक है. बाथरूम में जा कर हाथपैर धो लो, फिर खाना लगाती हूं,” नीति ने बात खत्म करने के लिए विषय ही बदल दिया.

खाना खा कर नेहा तो अपने कमरे में जा कर गाना सुनने लगी और नीति सामान के पैकेट खोलखोल कर देखने लगी.

उन्होंने सब से पहले कपड़े के पैकेट खोलने शुरू किए. कपड़े के प्रिंट और रंग बड़े ही सुंदर लग रहे थे.

नीति ने सलवारसूट का कपड़ा खोल कर फर्श पर बिछा दिया और उसे किस डिजाइन का बनवाएगी, सोचने लगी. अचानक उस की निगाह एक जगह जा कर रुक गई. उसे लगा जैसे वहां का कपड़ा थोड़ा झीना सा है. कपड़ा हाथ में उठा कर देखा तो सही में कपड़ा झीना था और 1-2 धुलाई में ही फट जाता.

नीति नेहा के कमरे में जा कर बोली,” कैसा कपड़ा उठा कर ले आई हो? क्या वहां पूरा खोल कर नहीं देखा था?”

“मां, वहां इतनी भीड़ थी कि दुकानदार संभाल नहीं पा रहा था. सभी लोग अपनेअपने कपड़े खोलखोल कर देखने लगते, तो कितनी परेशानी होती. यही तो सोचना पड़ता है ना.”

“ठीक है. वहां नहीं देख पाई चलो कोई बात नहीं. अब जा कर उसे यह कपड़ा दिखा लाओ और बदल कर ले आओ. अगर यह कपड़ा ना हो, तो पैसे वापस ले आना.”

नीति की बात सुन कर नेहा झुंझला कर बोली, “आप भी न मां, पीछे ही पड़ जाती हैंं. अभी थोड़ी देर पहले ही तो लौटी हूं बाजार से, अब फिर से जाऊं? रख दीजिए कपड़ा, बाद में देख लेंगे.”

“तुम्हारा बाद में देख लेंगे कभी आता भी है? 3 महीने पहले तुम 12 कप खरीद कर लाई थींं, उन में से 2 कप टूटे हुए थे. अभी तक वैसे ही पड़े हैं. लाख बार कहा है तुम से कि या तो दुकान पर ही चीज को अच्छी तरह से देख लिया करो और या फिर जब घर में आ कर देखो और खराब चीज निकले तो दुकानदार से जा कर बोलना बहुत जरूरी होता है. जाओ और बोलो, उसे बताओ कि तुम ने अच्छी चीज नहीं दी है.”

“ठीक है मां, मैं बाद में जा कर बदल लाऊंगी,” कह कर नेहा मन ही मन बुदबुदाई,”अच्छी मुसीबत है. अब मैं कभी कुछ खरीदूंगी ही नहीं.”

नेहा के पीछेपीछे आ रही मां नीति ने जब उस की बात सुनी, तो उन्हें बहुत गुस्सा आया. उन्होंने गुस्से में नेहा से कहा, “एक तो ठीक से काम नहीं करना और समझाने पर भड़क कर कभी न काम करने की बात करना, यही सीखा है तुम ने.”

“मां, अब दो कपड़ों के लिए मैं बाजार जाऊंगी और फिर वहां से आऊंगी भी तो टैक्सी वाले को कपड़ों से ज्यादा पैसा देना पड़ेगा. यह भी समझ में आता है आप को?”

“नहीं आता समझ… और मुझे समझने की जरूरत भी नहीं है, क्योंकि मैं तो दुकान पर ही सारी चीजें ठीक से देख कर रुपएपैसे का मोलभाव कर तब खरीदती हूं.

“तुम्हारी तरह बिना देखे नहीं उठा लाती और अगर कभी ना भी देख पाऊं तो वापस जा कर दुकानदार को दिखाती हूं और खराब चीज बदलती हूं या पैसे वापस लेती हूं.”

“मां, क्या फर्क पड़ता है एक या दो चीजें खराब निकलने से. अब दुकानदार भी कितना चैक करेगा?”

“कितना चैक करेगा का क्या मतलब है? अरे, उस का काम है ग्राहकों को अच्छा सामान देना. सब तुम्हारी तरह नहीं होते हैं, जो ऐसे ही छोड़ दें. इस तरह तो उस की इतनी बदनामी हो जाएगी कि कोई उस की दुकान पर पैर भी नहीं रखेगा.”

“नहीं मां, ऐसा कुछ नहीं होगा. उस की दुकानदारी ऐसे ही चलती रहेगी, आप देखना.”

“क्यों नहीं चलेगी? जब तेरे जैसे ग्राहक होंगे, लेकिन इस का असर क्या पड़ेगा, यह सोचा है. धीरेधीरे सारे दुकानदार चोरी करना सीखेंगे, खराब सामान बेचेंगे और अपनी गलती भी नहीं मानेंगे.

“आज जो बेईमानी है, भ्रष्टाचार का माहौल बना है ना, इस के जिम्मेदार हम ही तो हैं,” नीति ने गुस्से में कहा.

” कैसे? हम कैसे हैं उस के जिम्मेदार? बताइए ना…”

“तो सुनो, हम गलत काम को प्रोत्साहित करते हैं जैसे तुम बाजार गई हो और कोई सामान खरीद कर ले आए. घर आ कर जब सामान को खोल कर देखा तो सामान खराब निकला. तुम ने उस को उठा कर एक ओर पटका. दूसरा सामान खरीद लिया. अब दुकानदार को कैसे पता चलेगा कि सामान खराब है?

“मान लो, उसे पता भी है, पर फिर भी वह जानबूझ कर खराब सामान बेच रहा हो तो… जब जिस का पैसा बरबाद हो गया, उसे चिंता नहीं है तो दुकानदार को क्या और कैसे दोष दे सकते हैं?”

“मां, सभी दुकानदार तो ऐसा नहीं करते हैं न.”

“अभी नहीं करते तो करने लगेंगे. यही तो चिंता की बात है. इस तरह तो उन का चरित्र ही खराब हो जाएगा. हम हमेशा दूसरों को दोष देते हैं, पर अपनी गलती नहीं मानते.”

“अच्छा मां, अगर दुकानदार न माने तो…?”

“हां, कभीकभी दुकानदार अड़ जाता है. बहुत सालों पहले एक बार मैं परदे का कपड़ा खरीदने गई. कपड़ा पसंद आने पर मैं ने 20 मीटर कपड़ा खरीद लिया. घर आ कर कपड़ा अलमारी में रख दिया. 2 दिन बाद मैं ने जब परदे काटने शुरू किए, तो बीच के कपड़े में चूहे के काटने से छेद बने हुए थे. मैं उसी समय कपड़ा ले कर बाजार गई और दुकानदार को कपड़ा दिखाया. उस ने कपड़ा देखा और कहा, “हमारी दुकान में चूहे नहीं हैं. आप के घर पर चूहे होंगे और उन्होंने कपड़ा काटा होगा… मैं कुछ नहीं कर सकता.”

“मैं ने कहा, “चूहे मेरे घर में भी नहीं हैं. कोई बात नहीं, अभी पता चल जाएगा. आप पूरा थान मंगवा दीजिए. अगर वह ठीक होगा, तो मैं मान जाऊंगी.”

नौकर थान ले कर आया. जब थान खोला गया, तो उस में भी जगहजगह चूहे के काटने से छेद बने थे.

“अब तो दुकानदार क्या कहता, उस ने चुपचाप हमारे पूरे पैसे लौटा दिए.

“अगर मैं कपड़ा वापस करने नहीं जाती, तो दुकानदार अच्छा कपड़ा दिखा कर खराब कपड़ा लोगों को देता जाता. अगर सभी लोग यह ध्यान रखें, तो वे खराब सामान लेंगे ही नहीं, तो दुकानदार भी खराब सामान नहीं बेच पाएगा.

“हम अफसरों और नेताओं को गाली देते हैं, पर यह नहीं सोचते कि जब तक हम बरदाश्त करते रहेंगे, तब तक सामने वाला हमें धोखा देता रहेगा. जिस दिन हम धोखा खाना बंद कर देंगे, धोखा देने वाले का विरोध करेंगे, गलत को गलत और सही को सही सिद्ध करेंगे, उसी दिन से लोग गलत करने से पहले सौ बार सोचेंगे अपनी साख बचाने के लिए. बेईमानी करना छोड़ देंगे और तब ईमानदारी की प्रथा चल पड़ेगी,” इतना कहतेकहते नीति हांफने लगी.

मां को हांफता देख कर नेहा दौड़ कर पानी लाई और बोली, “मां, आप बिलकुल सही कह रही हैं. हमें मतलब उपभोक्ताओं को जागरूक बनना बेहद जरूरी है. जब तक हम अपने अधिकारों के प्रति ध्यान नहीं देंगे, तब तक हमें धोखा मिलता रहेगा.”

“ठीक है बेटी, अब इस बात का खुद भी ध्यान रखना और दूसरों को भी समझाना.”

“जी… मैं अभी वापस दुकान पर जा कर दुकानदार से कपड़ा बदल कर लाती हूं,” इतना कह कर नेहा बाजार चली गई, तो नीति ने चैन की सांस ली. Hindi Family Story.

Best Hindi Kahani: आईना- गरिमा ने कैसे दिखाया आईना?

Best Hindi Kahani: सामान से लदीफंदी मैं घर पहुंची तो बरामदे में ही मैं ने मम्मी को इंतजार करते पाया. अरे मम्मी, आप कब आईं? न फोन, न कोई खबर, मैं ने मम्मी के पैर छूते हुए उन से पूछा.

अचानक ही प्रोग्राम बन गया, कहते हुए मम्मी ने मुझे गले लगा लिया.

रामू, रामू, जरा चाय बनाना, मैं ने नौकर को आवाज दे कर चाय बनाने को कहा.

तुम्हारे नौकर तो बहुत ट्रेंड हैं. मेरे आते ही चायपानी, सब बड़ी स्मार्टली करा दिया, मम्मी बोलीं.

बातबात में अंगरेजी के शब्दों का इस्तेमाल करना मम्मी के व्यक्तित्व की खासियत है. डाई किए कटे बाल, कानों में नगों वाले हीरे के टाप्स, गले में सोने की मोटी चेन में चमकता पेंडेंट, अच्छे मेकअप से संवरी उन की सुगठित काया सामने वाले पर अच्छा असर डालती है.

मैं ने प्रशंसा से मम्मी की ओर देखा, बादामी रंग पर हलके सतरंगी फूलों वाली साड़ी उन के गोरे तन पर फब रही थी. ड»ाइवर सामान मेज पर रख कर चला गया था.

मम्मी, मैं बाजार से यह सामान लाई हूं, आप तब तक देखिए, मैं जरा हाथमुंह धो कर आती हूं, कहती हुई मैं बाथरूम में चली गई.

हांहां, तुम फ्रेश हो कर आ जाओ, मम्मी ने कहा.

मैं हाथमुंह धो कर आई तो मैं ने देखा मेरे आने तक रामू मम्मी के सामने चाय के साथसाथ पकौड़ी की प्लेट भी लगा चुका था. मुझे देखते ही मम्मी बोलीं, गरिमा, साडि़यां तो बहुत सुंदर हैं, लेकिन ये इतने सारे छोटेछोटे बाबा सूट किस के लिए लाई हो? मम्मी पूछ तो मुझ से रही थीं पर उन की नजर हाथ में पकड़ी सोने की पतली चेन का निरीक्षण कर रही थी.

इतने सारे कहां, मम्मी? सिर्फ 5 सेट कपड़े हैं. भैरवी को बेटा हुआ है न, उसी के लिए लाई हूं, मैं ने बताया.

अरे हां, याद आया. मैसेज तो आया था. मैं ने भी बधाई का टेलीग्राम भेज दिया था, मम्मी बोलीं.

अच्छा किया, मम्मी, भैरवी को अच्छा लगा होगा. मैं भैरवी के घर जाने की ही तैयारी कर रही हूं. परसों इतवार है. मैं ने 2 दिन की छुट्टी ले ली है. आज रात में ललितपुर से आदर्श यहां आ जाएंगे, कल सुबह यहां से निकलने का प्रोग्राम है. अब…, उत्साह से मैं बोलती ही जा रही थी.

चलो अच्छा है, आदर्श से भी मुलाकात हो जाएगी. मुझे भी कल मानिर््ंाग में ही वापसी निकलना है, मम्मी बोलीं.

अरे, ऐसी क्या जल्दी है. हम लोग अपना प्रोग्राम थोड़ा बदल लेंगे. भैरवी के घर पहुंचने में सिर्फ 4 घंटे ही तो लगते हैं. और फिर अपनी गाड़ी से जाना है, जब चाहें निकल लेंगे. इतने दिनों बाद तो आप आई हैं, पकौड़ी खाते हुए मैं बोली.

नहीं भाई, मेरा प्रोग्राम तो एकदम डेफिनेट है. ठीक 7 बजे हम लोग यहां से निकल जाएंगे. ठंडेठंडे में कानपुर पहुंच जाएंगे, मम्मी ने कहा.

हम लोग? यानी आप के साथ और भी कोई आया है? मैं ने चौंकते हुए पूछा.

हमारी महिला समिति को मेरठ में एक ‘इनक्वायरी’ करनी थी. तुम यहां पोस्टेड हो और मेरी सहेली सुलभा देशमुख की बेटी भी यहीं झांसी में मैरिड है. 2 मेंबर्स की टीम आनी थी, अच्छा चांस था. बस, हम दोनों ने वाøलटियर कर दिया. रास्ते में इनक्वायरी का काम निबटाया. आज का दिन और एक रात अपनीअपनी बेटियों के साथ बिताएंगे और कल ईवनिंग में 5 बजे समिति की मीटिंग में अपनी जांच रिपोर्ट दे देंगे. अब समिति की गाड़ी तो आनी ही थी, सो बिना खर्चे के बच्चों से मिलना हो गया, कहती हुई मम्मी खिलखिला कर हंस पड़ीं.

चाय का स्वाद अचानक मेरे मुंह में कसैला हो गया. जाने क्यों, मम्मी का यह व्यावहारिक रूप मुझे कभी रास नहीं आया था. मैं मम्मी से मतलब निकालने की कला नहीं सीख सकी थी. केवल यही क्यों, मैं तो मम्मी से कुछ भी नहीं पा सकी थी. गोरी रंगत और तीखे नैननक्श के साथ लंबी कद- काठी और गठीले शरीर की स्वामिनी की कोख से मैं, सांवली रंगत, साधारण नाकनक्श और सामान्य कदकाठी की संतान पैदा हुईघ्थी.

मैं ने अपने पिता की छवि पाई थी. केवल रंगरूप में ही नहीं, स्वभाव भी मुझे पिता का ही मिला था. बचपन से ही मैं डरपोक, शांतिप्रिय, एकांत प्रेमी और पढ़ाकू थी. एकांत प्रेमी और पढ़ाकू होना शायद मेरी मजबूरी थी. गुजरा हुआ अतीत मुझ पर हावी होता जा रहा था.

रूपगर्विता मम्मी का मन, साधारण व्यक्तित्व वाले पति को कभी स्वीकार नहीं सका था.घ्पति को छोड़ पाना मम्मी के वश में भी नहीं था, आर्थिक मजबूरियां थीं. परंतु मुझ जैसी कुरूप संतान उन पर बोझ थी. लेकिन मजबूरी यहां भी दामन थामे खड़ी थी. अपनी ही संतान को कहां फेंकें? सामाजिक बंधन थे. लिहाजा उन्हें मेरी परवरिश का अनचाहा बोझ उठाना पड़ा. इस जिम्मेदारी को अंजाम भी दिया परंतु वात्सल्य की मिठास से मेरी झोली खाली ही रह गई. उसी शाख पर खिले दूसरे 2 सुंदर फूल मम्मी की प्रतिच्छाया थे. मम्मी का सारा प्यार उन्हीं पर निछावर हो गया.

मेरे प्रशासनिक सेवा में चयन की खुशी मम्मी की आंखों में चमकी थी. घर की उपेक्षित लड़की अचानक मम्मी की नजर में महक्कवपूर्ण हो गई थी.घ्मुझे मम्मी में यह बदलाव अच्छा लगा था, किंतु यहां भी छोटी बेटी के प्रति मम्मी का प्रेम उन पर हावी हो गया था और उन्हें यह अफसोस होने लगा था कि यदि ग्लोरी की शादी अब होती तो उसे भी प्रशासनिक अधिकारी पति मिल जाता.

बचपन में मम्मी की सहेलियां जब भी घर आतीं, मम्मी मुझे हमेशा रसोई में घुसा देतीं. नाश्तापानी बनाने की सारी मेहनत मैं करती किंतु ट्रेन में सजा कर ले जाने का काम हमेशा मेरी अनुजा ग्लोरी का ही होता. उम्र के साथसाथ मैं ने इस सत्य को स्वीकार लिया और खुद ही लोगों के सामने जाने से कतराने लगी. धीरेधीरे मैं एकांतप्रिय होती चली गई. अपने अकेलेपन को भरने के लिए मैं ज्यादा से ज्यादा पढ़ने लगी जिस से मैं पूरी तरह पढ़ाकू ही बन गई.

ग्लोरी, मेरी अनुजा का यह नाम भी मम्मी का रखा हुआ था जो मम्मी का अंगरेजी प्रेम दरशाता है. अपनी इसी खिचड़ी भाषा, शिष्ट श्रृंगार और सामाजिक संगठनों से जुड़ कर मम्मी खुद को उच्च वर्ग का दरशाती हैं. ग्लोरी मेरी सगी बहन है, किंतु वह मम्मी की कार्बन कापी. अधिकार से अपनी बात मनवाना और हर जगह छा जाना उस की फितरत में है.

गरिमा, गरिमा, मम्मी की आवाज से मैं वापस वर्तमान में आ गई.

अरे, क्या सोचने लगी थी? बैठेबैठे सपनों में खो जाने की तेरी आदत अभी गई नहीं. इतनी देर से पूछ रही हूं, कुछ बोलती क्यों नहीं? मम्मी ने कहा.

ये, क्या पूछ रही थीं, मम्मी? मैं ने सवाल के जवाब में खुद ही सवाल कर डाला.

यह गुलाबी साड़ी कितने रुपए की है? मैं ग्लोरी के घर जाने वाली हूं. सोच रही हूं यह गुलाबी साड़ी ग्लोरी पर अच्छी लगेगी, उसे दे दूं, वाणी में मिठास घोलते हुए मम्मी बोलीं.

ग्लोरी पर तो सारे रंग अच्छे लगते हैं. ये साडि़यां तो मैं भैरवी के लिए लाई हूं. अपने लिए लाई होती तो मैं जरूर दे देती, मैं ने कहा.

क्या? ये सब, मतलब ये सारा सामान तुम भैरवी को देने के लिए लाई हो? मम्मी की आंखें आश्चर्य से फटी रह गईं.

हां, मम्मी, भैरवी की पहली संतान को आशीर्वाद देने जा रहे हैं हम लोग, मैं ने कहा.

अरे, तू होश में तो है? इतने सारे कपड़े, 5 साडि़यां, रजाईगद्दा, चादर, खिलौने, क्या तूने उस का पूरा ठेका ले रखा है? और, जरा सा बच्चा सोने की चेन का क्या करेगा? फैली नजरों से मम्मी मुझे देख रही थीं.

मम्मी, कैसी बात कर रही हैं आप? भैरवी की यह पहली संतान है, मैं ने कहा.

कैसा क्या? तेरे भले की बात कर रही हूं. पहला बच्चा है तो क्या, कोई अपना घर उजाड़ कर सामान देता है किसी को? मम्मी ने कहा.

छोडि़ए मम्मी, जो आ गया सो आ गया, कह कर मैं ने इस अप्रिय प्रसंग को खत्म करना चाहा.

छोडि़ए कैसे? तुम फुजूलखर्ची छोड़ो और ऐसा करो, बहुत मन है तो बच्चे के कपड़ों के साथ एक साड़ी और मिठाई दे दो, बाकी सब वापस रख दो. हो जाएगा सगुन, कहते हुए मम्मी ने आदतन अपना हुकम सुना दिया.

मम्मी, ग्लोरी के पहली बेटी होने पर लगभग इतना ही सामान भिजवाया था आप ने. तब मैं टे»øनग में ही थी, पैसों की भी तंगी थी, परंतु उस समय आप को यह सब फुजूल- खर्ची नहीं लगी थी, मुझे अब गुस्सा आने लगा था.

ग्लोरी तेरी सगी बहन है, उसे दिया तो क्या, सभी को बांटती फिरोगी, मम्मी बोलीं.

भैरवी कोई गैर नहीं, मेरी सगी ननद है. जैसी ग्लोरी वैसी भैरवी, मैं ने कहा.

बहन और ननद में कोई फर्क नहीं है क्या? मम्मी भी गुस्से में आ गई थीं.

नहीं, कोई फर्क नहीं है. एक को मेरी मां ने जन्म दिया है तो दूसरी को मेरी सासू मां ने. एक ही प्यार का नाता है, मैं बोली.

तेरा तो दिमाग खराब हो गया है, कोई फर्क नहीं दिखता, मम्मी खीज उठीघ्थीं.

वैसे फर्क तो है, मम्मी, कुछ सोचती हुई मैं बोल पड़ी.

चलो, तुम्हारी समझ में तो आया, मम्मी खुश हो गईं.

भावना और परवरिश में फर्क है, अभी मैं ने अपनी बात स्पष्ट करना शुरू ही किया था कि रामू अदब से सामने आ कर खड़ा हो गया और बोला, मैडम, खाना लग गया है.

ठीक है, चलिए मम्मी, खाना खाते हैं. आप तो सुबह की निकली होंगी, मैं उठते हुए बोली. इस अप्रिय संवाद के खत्म होने से मैं ने चैन की सांस ली.

हां, सुबह 6 बजे ही हम लोग कानपुर से चल दिए थे. सीधे मोठ पहुंचे. 2 घंटे वहां लगे. 11 बजे मोठ से चलना शुरू किया और सीधे झांसी, कहते हुए मम्मी भी उठ खड़ी हुईं.

खाना खा कर हम दोनों पलंग पर लेट गईं. घरपरिवार का हालचाल बतातेबताते मम्मी अचानक बोल पड़ीं, अरे, गरिमा, जो सामान वापस करना है, अपने ड»ाइवर को बोल दो, वापस कर आएगा, नहीं तो तुम लोग 3 दिन के लिए चले जाओगे. इस दौरान शापकीपर का सामान क्यों पता बिक ही जाए. जब लेना नहीं है तो बेचारे का नुकसान क्यों कराया जाए.

कौन सा सामान? कुछ समझ नहीं सकी. लिहाजा बोल पड़ी.

अरे, वही जो तुम भैरवी के लिए उठा लाई थीं, मम्मी ने कहा.

मम्मी, क्यों वही बात फिर से शुरू कर रही हैं? मेरे लहजे में शिकायत थी.

मतलब, तुम सामान वापस नहीं कर रही हो? मम्मी अविश्वास से मेरी तरफ देख रही थीं.

नहीं, मम्मी, आप भला नहीं कर रही हैं. आप हमें स्वार्थी बनाने का प्रयास कर रही हैं, मैं स्पष्ट शब्दों में बोल उठी.

गरिमा? गुस्से से मम्मी की आवाज कांप गई.

मैं ने मम्मी का हाथ अपने हाथ में ले लिया और धीरे से बोली, मम्मी, मुझे मालूम है मेरी बात आप को ठेस पहुंचा रही है. इस विषय में मैं ने हमेशा टालना चाहा है. जब तक बात मेरे तक थी, मैं ने कोई विरोध नहीं किया, अपनेआप में सिमटती चली गई. लेकिन आप की दखल का असर अब हमारी गृहस्थी पर भी होने लगा है. ग्लोरी का बिखरता दांपत्य आप की ऐसी सीखों का ही नतीजा है. अभी भी समय है मम्मी, खुद को रोक लीजिए. आप ने तो समाजसुधार का बीड़ा उठा रखा है. फिर अपनी बेटियों का घर क्यों…

मेरी बात बीच में काटती हुई मम्मी मेरा हाथ झटक कर बैठ गईं और गुस्से से बोलीं, तुम कहना क्या चाहती हो? मेरी फूल जैसी ग्लोरी को वे लोग सुखी नहीं रख रहे हैं और उस के लिए दोषी मैं हूं? मैं तुम लोगों को स्वार्थी बना रही हूं? मैं तुम लोगों का भला नहीं चाहती? और तेरे साथ मैं ने क्या किया जो तू चली गई? पढ़ालिखा कर प्रशासनिक अधिकारी बना दिया, यही न? आज सी.डी.ओ. बनी सब पर रोब झाड़ती घूम रही है. हमेशा की डरीसहमी रहने वाली लड़की, आज मां से ही जवाबसवाल कर रही है, मम्मी की आंखें अंगारे बरसा रही थीं.

मम्मी, प्लीज, शांत हो कर मेरी बात सुनिए, मैं ने नरम पड़ते हुए कहा.

अच्छा, अभी भी सुनने को कुछ रह गया है क्या? मम्मी झल्लाईं.

प्लीज मम्मी, मुझे मालूम है आप हमारा बुरा नहीं चाहतीं. अपनी लाड़ली ग्लोरी का बुरा तो आप सोच भी नहीं सकतीं øकतु अनजाने में ही आप भले के चक्कर में ऐसा कुछ कर जाती हैं जो आप के न चाहते हुए भी आप की संतान का बुरा कर बैठता है. मेरे और ग्लोरी के सुखी भविष्य के लिए मेरी बात सुन लीजिए, मैं ने उन्हें समझाते हुए कहा.

शायद मेरी बात मम्मी को कुछ समझ आ रही थी या फिर ग्लोरी की बिखरती गृहस्थी को संवारने की इच्छा से मम्मी मेरी बात सुनने को तैयार हो गई थीं. मैं समझ नहीं पा रही थी कि उन नजरों में क्या था.

क्या कहना चाहती हो, बोलो, मम्मी के सपाट शब्दों में कोई भाव नहीं था.

मैं दुविधा में थी. मम्मी अपलक मेरी ओर देख रही थीं. थोड़ी देर हमारे बीच खामोशी पसरी रही, फिर मैं ने बोलना शुरू किया, मेरी बात का गलत अर्थ मत लगाइएगा, मम्मी.

हां, बोलो, मम्मी की तटस्थता बरकरार थी.

मम्मी, अभी आप ने मुझे बहन और ननद में फर्क करने की सलाह दी थी जिसे मैं ने मानने से मना कर दिया, क्योंकि निश्छल और निस्वार्थ प्यार क्या होता है, मैं ने अपनी शादी के बाद ही जाना है. पति का प्यार ही नहीं, मां का प्यार, बहन का प्यार…, मैं कहती चली गई.

अरे, हम प्यार नहीं करते क्या? मम्मी की तटस्थता टूटी. उन के स्वर में आश्चर्य था.

जरूर करती हैं, लेकिन ग्लोरी और भैया से कम. मैं बचपन से ही काली मोटी रही हूं, मैं ने कहा.

गरिमा, रंगरूप तो भगवान का दिया है, मम्मी बोलीं.

हां, लेकिन आप तीनों के व्यवहार से मेरी कुरूपता मुझ पर हावी होती गई. नतीजतन, मैं हीनभावना से घिरती गई. किसी से बात करने का आत्मविश्वास मुझ में नहीं रहा, मैं ने मम्मी से अपने मन की हकीकत बयान की.

अरे, कैसी बात कर रही हो? ऐसा कुछ कभी नहीं हुआ, मम्मी बोलीं.

लेकिन अतीत की कसैली यादें मुझ पर हावी थीं. मैं अपनी ही रौ में बोले जा रही थी, मम्मी, याद है मैं जब हाईस्कूल में थी, स्कूल में हमारी फेयरबेल पार्टी थी. मैं बहुत उत्साहित थी. आप की एक साड़ी मैं ने उस खास मौके पर पहनने के लिए कई दिन पहले से अलग निकाल रखी थी. उस दिन, जब मैं ने उसे पहनने के लिए निकाला तो ग्लोरी ने टोका था, ‘दीदी, तुम दूसरी साड़ी पहन लो. यह साड़ी मैं परसों पिकनिक में पहन कर जाऊंगी.’

‘नहीं, आज तो मैं यही साड़ी पहनूंगी. इतने दिनों से मैं ने इसे तैयार कर के रखा है. तुम्हें पहनना है तो तुम भी पहन लेना. मैं इसे गंदा नहीं करूंगी,’ मैं ने भी जिद कीघ्थी.

‘दीदी, तुम जो कुछ भी पहनती हो, कोई भी रंग तुम्हारे ऊपर खिलता तो है नहीं, बेकार की जिद मत करो,’ कहते हुए ग्लोरी ने साड़ी मेरे हाथ से ले ली थी. मैं खड़ी की खड़ी रह गई थी.

मम्मी, आप के सामने ग्लोरी मुझे इस तरह अप्रिय शब्दों में अपमानित कर के चली गई और आप कुछ नहीं बोली थीं.

अरे, तुम इतनी छोटी सी बात अब तक दिल से लगाए बैठी हो, गरिमा? मम्मी अचंभित सी मुझे देख रही थीं.

यह आप के लिए छोटी घटना होगी मम्मी, लेकिन उस दिन के बाद से मैं ने कभी भी ग्लोरी और भैया की बराबरी नहीं की. मैं सब से कटती चली गई. अपने रंगरूप के कारण जो आत्मविश्वास मैं ने खो दिया था वह मुझे वापस मिला अपनी शादी के बाद.

आई.ए.एस. की ट्रेनिंग के दौरान मुझे आदर्श मिले, जो सिर्फ नाम के ही नहीं विचारों के भी आदर्श हैं. आदर्श को जीवनसाथी में रूप की नहीं, गुणों की तलाश थी और हम परिणय सूत्र में बंध गए. ससुराल जाते हुए मैं बहुत आशंकित थी øकतु मेरी सारी आशंकाएं निर्मूल साबित हुईं. ससुराल में सब ने मेरा खुले मन से स्वागत किया. मेरा ससुराल सचमुच ‘घर’ था, जहां सब को एकदूसरे की भावनाओं का खयाल था, मेरी छोटीछोटी बातों की तारीफ होती. मैं किसी को रूमाल भी ला कर देती तो वे लोग एकदम खिल जाते. वे कहीं भी जाते तो मेरे लिए कुछ न कुछ जरूर लाते. तब मुझे अपने भाईबहन याद आते, जो सिर्फ अधिकार से लेना जानते हैं.

गरिमा, वे तुम से छोटे हैं, मम्मी ने उन का पक्ष लेते हुए कहा.

मम्मी, आप ने हमेशा उन का पक्ष लिया है. इसीलिए वे जिद्दी हो गए हैं. मां होने का अर्थ हमेशा बच्चों की कमी पर परदा डालना नहीं होता बल्कि उन्हें सही राह दिखाना होता है. मम्मी, वे यदि छोटे हैं तो भैरवी भी तो छोटी ही है, लेकिन उस ने मुझे सही अर्थों में छोटी बहन का प्यार दिया. ‘प्यार’ शब्द का अर्थ मैं ने इस परिवार में आ कर जाना है. प्यार में कोई लेनदेन नहीं होता, बस, प्यार होता है. बिना मेरी कमियों की तरफ इशारा करे भैरवी ने मेरे बालों की स्टाइल, मेरा पहनावा सब बदलवा दिया. मैं इस नई स्टाइल में काफी स्मार्ट लगने लगी जिस से मुझे मेरा खोया हुआ आत्मविश्वास वापस मिला. मैं भैरवी की आभारी हूं. उस के लिए कुछ भी करने का मेरा मन करता है. जितना सामान मैं भैरवी को दे रही हूं, इस से कहीं ज्यादा ही वह बेटे के होने पर लाई थी और ग्लोरी के लिए मैं ने क्या नहीं किया और वह क्या लाई थी, आप से भी छिपा नहीं है, मैं ने शिकायती अंदाज में कहा.

गरिमा… मम्मी बोलीं.

नहीं मम्मी, मुझे गलत मत समझिए. मैं नहीं चाहती कि ग्लोरी मुझे कुछ दे, लेकिन ग्लोरी को देना सिखाइए. उस की सुखी गृहस्थी के लिए यह जरूरी है, मैं ने कहा.

मुझे आज पता चला तुम अपने दिल में अंदर ही अंदर इतना कुछ छिपाए हुए थीं. आज अचानक तुम्हारी दर्द की परतें खुलने लगीं तो मैं… मम्मी बोलीं.

मम्मी की बात बीच में काटते हुए मैं बोली, मेरा छोडि़ए, मम्मी, जो अकेला बीता, वह मेरा बचपन था और वह बीत चुका है. मेरा वर्तमान खुशियोें से भरा है. मेरा दांपत्य बहुत सुखी है और आज आप को अपनी गृहस्थी में दखल देने से पहले ही रोक कर मैं ने बिखराव की पहली आहट पर ही विवेक का पहरा बिठा दिया है. ग्लोरी यही नहीं कर सकी है, मैं ने कहा.

मतलब… गरिमा साफसाफ कहो, क्या कहना चाह रही हो तुम. मुझे तुम्हारी बात समझ में नहीं आई. मैं ग्लोरी के लिए बहुत øचतित हूं, मम्मी ने कहा.

मेरी छोटी बहन के प्रति उन की ममता उमड़ रही थी. ग्लोरी के लिए उन का चिंतित होना बहुत ही स्वाभाविक था. अब उन की आंखों में अपरिचित सा भाव दिखाई दे रहाघ्था.

अतीत चलचित्र सा मेरे मानस पटल पर उभर रहा था. परिवार की सब से छोटी,  सब की लाड़ली बेटी ग्लोरी का हित मम्मी के लिए सदैव सर्वोपरि रहा है.

पापा के गहरे मित्र ने अपने बड़े बेटे, अक्षय का रिश्ता मेरे लिए भेजा था. दहेज विरोधी इतना संपन्न परिवार, उस पर  प्रोबेशनरी अफसर लड़का. बस, मम्मी की दुनियादारी का ज्ञान उन की कोमल भावनाओं पर हावी हो गया और मम्मी ने यह रिश्ता ग्लोरी के लिए तय कर लिया. पापा के अलावा और किसी ने कोई विरोध नहीं किया. हमेशा की तरह पापा झुक गए और बड़ी के कुंआरी रहते छोटी बेटी का ब्याह हो गया. ससुराल से लौटी ग्लोरी अपनी कुंआरी बड़ी बहन की भावनाओं को समझे बिना अपने वैवाहिक जीवन के खट्टेमीठे अनुभव सुनाती रही.

ग्लोरी की कोई गलती नहीं थी. उस ने दूसरे की भावनाओं को समझना सीखा ही नहीं था और न ही उसे सिखाया गया.

गरिमा, गरिमा, क्या कह रहीं थीं तुम? एकदम चुप क्यों हो गईं? मम्मी के टोकने से मैं फिर वर्तमान में लौट आई.

मम्मी, दूसरे की भावना को समझना हर ब्याही लड़की के लिए बहुत जरूरी होता है. हरेक को पापा जैसा सहनशील पति और परिवार नहीं मिलता. दूसरे की भावना को समझे बिना ससुराल में कोई भी लड़की तालमेल नहीं बिठा सकती. अब से ही सही, ग्लोरी को सही राह दिखाइए, मैं ने मम्मी से कहा.

मौन हुई मम्मी मेरी तरफ देख रही थीं. शायद वह मेरी बातों की सचाई तौल रही थीं.

मम्मी.

हां, मम्मी का स्वर बहुत धीमा था.

मम्मी, याद है आप को, जब हम लोग पहली बार ग्लोरी के घर गए थे. कितना दौड़दौड़ कर वह सब काम कर रही थी और कितना खुश थी, लेकिन एकांत मिलते ही आप ने उसे समझाया था…‘ग्लोरी, सारा काम तुम ही करोगी क्या? अपनी ननद को भी करने दो. और साड़ी के पल्ले को पिन से बालों में क्यों रोक रखा है? अरे, पल्ला सिर से गिरता है तो गिरने दो. अभी से अपने पैर जमाना स्टार्ट करो. नहीं तो बहू के बजाय नौकरानी बन कर रह जाओगी,’ मैं ने मम्मी को याद दिलाते हुए कहा.

सिर हिलाती हुई मम्मी बोलीं, याद है, सब याद है, लेकिन लाख समझाने पर भी ग्लोरी कहां कुछ कर पाई. रोजरोज की खिटखिट से बेचारी परेशान रहती है. समझ में नहीं आता, उस के लिए क्या करूं. अक्षय हैं कि अलग रहने के लिए तैयार ही नहीं हैं, मम्मी के स्वर में ग्लोरी के प्रति गहरी हमदर्दी थी.

मम्मी, आप की उस दिन की वह सलाह ग्लोरी के परिवार के बिखराब की पहली दस्तक थी, जिस की आहट ग्लोरी नहीं सुन सकी थी, मैं ने कहा.

क्या…? मम्मी फटीफटी आंखों से मेरी तरफ देख रही थीं.

मम्मी, जब किसी परिवार में कोई बाहरी व्यक्ति दखल देने लगता है तो उसी पल उस परिवार का बिखराव तय हो जाता है, मैं ने मम्मी को समझाते हुए कहा.

बाहरी?…मैं, मैं ग्लोरी के लिए बाहरी व्यक्ति हो गई? मम्मी चौंक कर बोलीं.

हां, मम्मी. यही कड़वी सचाई है, इसे स्वीकार कीजिए. देखिए, ग्लोरी का घरपरिवार वही है, ग्लोरी वहां रह रही है और वही बेहतर समझ सकती है, उसे वहां कैसे रहना चाहिए. परंतु वह अपने विवेक से नहीं, आप के बताए रास्ते पर चलती है. इसी लिए अपनी शादी के 4 साल बाद भी वह अपने परिवार को पूरी तरह अपना नहीं पाई है.

कुछ पल के मौन के बाद मम्मी बोलीं तो उन की आंखें नम हो आई थीं, ग्लोरी बहुत भोली है, वह कुछ समझ नहीं पाती.

मम्मी, आप उस का भला चाहती हैं तो उसे उस के हाल पर छोड़ दीजिए. अक्षय हैं न उसे राह दिखाने के लिए. मम्मी, अक्षय अच्छा लड़का है और सब से बड़ी बात यह कि वह ग्लोरी को बहुत प्यार करता है. एक बार उसे उस के हाल पर छोड़ कर देखिए.

तुम…शायद तुम ठीक कह रही हो. मैं…मैं…तो उस का, कहतेकहते गला भर आया था. उन की आंखों से गरम आंसू टपक पड़े.

मम्मी, मुझे माफ कर दीजिए, मैं बहुत ज्यादा बोल गई. मैं आप को दुखी नहीं करना चाहती थीं, कहते हुए मेरा भी गला भर आया था.

मम्मी ने आगे बढ़ कर मुझे अपने सीने से लगा कर कहा, नहीं, गरिमा, आज तुम ने मुझे सही आईना दिखाया है. मैं ने कभी इस नजरिए से नहीं सोचा था.

जाने कब तक हम मांबेटी एकदूसरे से लिपटी आंसू बहाती रहीं. दिल के तार दिल से जुड़ते गए और उस खारे जल के साथ मन की परतों में छिपे सारे गिलेशिकवे बह गए.

अब मन का आईना धुल कर चांदी सा चमकने लगा था मानो नवप्रभात के आगमन की सूचना दे रहा हो. Best Hindi Kahani.

Best Family Story in Hindi: सोने की चिड़िया- सुहासिनी को हुआ अपनी भूल का एहसास

Best Family Story in Hindi: बड़े से मौल में अपनी सहेली शिखा के साथ चहलकदमी करते हुए साड़ी कार्नर की ओर बढ़ गई थी सुहासिनी. शो केस में काले रंग की एक साड़ी ने उस का ध्यान आकर्षित किया पर सेल्स- गर्ल की ओर पलटते ही वह कुछ यों चौंकी मानो सांप पर पांव पड़ गया हो.

‘‘अरे, मानसी तुम, यहां?’’ उस के मुंह से अनायास ही निकला था.

‘‘जी हां, मैं यहां. कहिए, किस तरह की साड़ी आप को दिखाऊं? या फिर डे्रस मेटीरियल?’’ सेल्स गर्ल ने मीठे स्वर में पूछा था.

‘‘नहीं, कुछ नहीं चाहिए मुझे. मैं तो यों ही देख रही थी,’’ सुहासिनी के मुख से इतना भी किसी प्रकार निकला था.

मानसी कुछ बोलती उस से पहले ही सुहासिनी बोल पड़ी, ‘‘मानसी, क्या मैं तुम से कुछ देर के लिए बातें कर सकती हूं?’’

‘‘क्षमा कीजिए, मैम, हमें काम के समय व्यक्तिगत कारणों से अपना स्थान छोड़ने की अनुमति नहीं है. आशा है आप इसे अन्यथा नहीं लेंगी,’’ मानसी ने धीमे स्वर में उत्तर दिया था और अपने कार्य में व्यस्त हो गई थी.

‘‘क्या हुआ? इस तरह प्रस्तरमूर्ति बनी क्यों खड़ी हो? चलो, जल्दी से भोजन कर के चलते हैं. लंच टाइम समाप्त होने वाला है,’’ शिखा ने उसे झकझोर ही दिया था और मौल की 5वीं मंजिल पर स्थित रेस्तरां की ओर खींच ले गई थी.

‘‘क्या लोगी? मैं तो अपने लिए कुछ चाइनीज मंगवा रही हूं,’’ शिखा ने मीनू पर सरसरी निगाह दौड़ाई थी.

‘‘मेरे लिए एक प्याली कौफी मंगवा लो और कुछ खाने का मन नहीं है,’’ सुहासिनी रुंधे गले से बोली थी.

‘‘बात क्या है? कैंटीन में खाने का तुम्हारा मन नहीं था इसीलिए तो हम यहां तक आए. फिर अचानक तुम्हें क्या हो गया?’’ शिखा अनमने स्वर में बोली थी.

‘‘साड़ी कार्नर के काउंटर पर खड़ी सेल्सगर्ल को ध्यान से देखा तुम ने?’’

‘‘नहीं. मैं ने तो उस पर ध्यान नहीं दिया. मैं दुपट्टा खरीदने लगी थी पर तुम ने तो उस से बात भी की थी और उसे ध्यान से देखा भी था.’’

‘‘ठीक कह रही हो तुम. मेरे मनमस्तिष्क पर इतनी देर से वही छाई हुई है. पता है कौन है वह?’’

‘‘नहीं तो.’’

‘‘वह मेरी ननद मानसी है, शिखा.’’

‘‘क्या कह रही हो? वह यहां क्या कर रही है?’’

‘‘साडि़यों के काउंटर पर साडि़यां बेच रही है और क्या करेगी.’’

‘‘पर क्यों?’’

‘‘यही तो जानना चाहती थी मैं पर उस ने तो बात तक नहीं की.’’

‘‘बात नहीं की तो तुम उसे गोली मारो. क्यों अपनी जान हल्कान कर रही हो. वैसे भी तुम तो उस घर को 3 वर्ष पहले ही छोड़ चुकी हो. जब पीयूष ही नहीं रहा तो तुम्हारा संपर्क सूत्र तो यों भी टूट चुका है,’’ शिखा ने समझाया था.

‘‘संपर्क सूत्र तोड़ना क्या इतना सरल होता है, शिखा? उस समय पीयूष का संबल छूट जाने पर मैं कुछ भी सोचनेसमझने की स्थिति में नहीं थी. मातापिता, भाईभाभी ने विश्वास दिलाया कि वे मेरे सच्चे हितैषी हैं और मैं अपनी ससुराल छोड़ कर उन के साथ चली आई थी. उन्हें यह डर सता रहा था कि पीयूष के बीमे और मुआवजे आदि के रूप में जो 20  लाख रुपए मिले थे उन्हें कहीं मेरे ससुराल वाले न हथिया लें.’’

‘‘उन का डर निर्मूल भी तो नहीं था, सुहासिनी?’’

‘‘पता नहीं शिखा, पर मेरे और पीयूष के विवाह को मात्र 3 वर्ष हुए थे. परिवार का बड़ा, कमाऊ पुत्र हादसे का शिकार हुआ था…उन पर तो दुखों का पहाड़ टूटा था…मैं स्वयं भी विक्षिप्त सी अपनी 2 वर्ष की बेटी को सीने से चिपकाए वास्तविकता को स्वीकार करने का प्रयत्न कर रही थी. ऐसे में मेरे परिवार ने क्या किया जानती हो?’’

‘‘क्या?’’

‘‘मेरे दहेज की एकएक वस्तु वापस मांग ली थी उन्होंने. मेरी सास ने विवाह में उन्हें दी गई छोटीमोटी भेंट भी लौटा दी थी. सिसकते हुए कहने लगीं, ‘मेरा बेटा ही चला गया तो इन व्यर्थ की वस्तुओं को रख कर क्या करूंगी?’ पर जब मैं अपनी बेटी टीना को उठा कर चलने लगी तो वे तथा परिवार के अन्य सदस्य फफक उठे थे, ‘मत जाओ, सुहासिनी और तुम जाना ही चाहती हो तो टीना को यहीं छोड़ जाओ. पीयूष की एकमात्र निशानी है वह. हम पाल लेंगे उसे. वैसे भी वह तुम्हारे भविष्य में बाधक बनेगी.’’’

‘‘तो तुम ने क्या उत्तर दिया था, सुहासिनी?’’

‘‘मैं कुछ कह पाती उस से पहले ही बड़ी भाभी ने झपट कर टीना को मेरी गोद से छीन लिया था और टैक्सी में जा बैठी थीं. मैं निशब्द चित्रलिखित सी उन के पीछे खिंची चली गई थी.’’

‘‘जो हुआ उसे दुखद सपना समझ कर भूल जाओ सुहासिनी. उन दुख भरी यादों को याद करोगी तो जीना दूभर हो जाएगा,’’ शिखा ने सांत्वना दी थी.

‘‘जीना तो वैसे ही दूभर हो गया है. तब मैं कहां जानती थी कि धन के लालच में ही मेरा परिवार मुझे ले आया था. छोटे भाई सुहास ने कार खरीदी तो मुझ से 2 लाख रुपए उधार लिए थे. वादा किया था कि वर्ष भर में सारी रकम लौटा देंगे पर लाख मांगने पर भी एक पैसा नहीं लौटाया. अब तो मांगने का साहस भी नहीं होता. सुहास उस प्रसंग के आते ही आगबबूला हो उठता है.’’

‘‘चल छोड़ यह सब पचड़े और थोड़ा सा चाऊमीन खा ले. भूख लगी होगी,’’ शिखा ने धीरज बंधाया था.

‘‘मैं लाख भूलने की कोशिश करूं पर मेरे घर के लोग भूलने कहां देते हैं. अब बडे़ भैया को फ्लैट खरीदना है. प्रारंभिक भुगतान के लिए 10 लाख मांग रहे हैं. मैं ने कहा कि सारी रकम टीना के लिए स्थायी जमा योजना में डाल दी है तो कहने लगे, खैरात नहीं मांग रहे हैं, बैंक से ज्यादा ब्याज ले लेना.’’

‘‘ऐसी भूल मत करना, तुम्हें अपने लिए भी तो कुछ चाहिए या नहीं. मुझे नहीं लगता उन की नीयत ठीक है,’’ शिखा ने सलाह दी थी.

‘‘मुझे तो पूरा विश्वास है कि मेरे प्रति उन का पे्रेम केवल दिखावा है. टीना बेचारी तो बिलकुल दब कर रह गई है. हर बात पर उसे डांटतेडपटते हैं. मैं बीच में कुछ बोलती हूं तो कहते हैं कि तुम टीना को बिगाड़ रही हो.’’

‘‘तुम्हारे मातापिता कुछ नहीं कहते?’’

‘‘नहीं, वे तो अपने बेटों का ही पक्ष लेते हैं. जब से मैं ने बड़े भैया को फ्लैट के लिए 10 लाख देने से मना किया है, मां मुझ से बात तक नहीं करतीं,’’ सुहासिनी के नेत्र डबडबा गए थे.

‘‘क्यों अपने को दुखी करती है, सुहासिनी. अलग फ्लैट क्यों नहीं ले लेती. मैं ने तो पहले भी तुझे समझाया था. क्या नहीं है तेरे पास? सौंदर्य, उच्च शिक्षा, मोटा बैंक बैलेंस. दूसरे विवाह के संबंध में क्यों नहीं सोचती तू?’’

‘‘मेरे जीवन में पीयूष का स्थान कोई और नहीं ले सकता और मैं टीना के लिए सौतेला पिता लाने की बात सोच भी नहीं सकती.’’

‘‘इसीलिए तुम ने योगेश जैसे योग्य युवक को ठुकरा दिया?’’ शिखा ने अपना चाऊमीन समाप्त करते हुए कहा था.

‘‘नहीं, मैं खुद दूसरा विवाह नहीं करना चाहती. यों भी उसे मुझ से या टीना से नहीं मेरे पैसे और नौकरी में अधिक रुचि थी.’’

‘‘चलो, ठीक है, तुम सही और सब गलत. बहस में तुम से कोई जीत ही नहीं सकता,’’ शिखा ने पटाक्षेप करते हुए बिल चुकाया और दोनों सहेलियां मौल से बाहर आ गईं.

कार्यालय में व्यस्तता के बीच भी मानसी का भोलाभाला चेहरा सुहासिनी की आंखों के सामने तैरता रहा था.

5 बजते ही सुहासिनी अपना स्कूटर उठा कर मौल के सामने आ खड़ी हुई. उसे अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी. कुछ ही देर में मानसी आती नजर आई थी.

‘‘अरे, भाभी, आप अभी तक यहीं हैं? आप तो मुझे देख कर बिना कुछ खरीदे ही लौट गई थीं?’’ मानसी ने उसे देख कर नमस्कार की मुद्रा में हाथ जोड़ दिए थे.

‘‘मैं तब से यहीं नहीं हूं, मैं और मेरी सहेली शिखा यहां लंच के लिए आए थे. मैं कार्यालय से यहां फिर से केवल तुम्हारे लिए आई हूं. चलो बैठो, कहीं बैठ कर बातें करेंगे,’’ सुहासिनी ने अपने स्कूटर की पिछली सीट की ओर इशारा किया था.

‘‘नहीं भाभी, मेरी बस छूट जाएगी. देर हो जाने पर मां बहुत चिंता करने लगती हैं,’’ मानसी संकुचित स्वर में बोली थी.

‘‘बैठो मानसी, मैं तुम्हें घर तक छोड़ दूंगी,’’ सुहासिनी का अधिकारपूर्ण स्वर सुन कर मानसी ना नहीं कह सकी थी.

‘‘अब बताओ, तुम्हें मौल में सेल्सगर्ल की नौकरी करने की क्या आवश्यकता पड़ गई?’’ रेस्तरां में आमने- सामने बैठते ही पूछा था सुहासिनी ने.

‘‘समय हमेशा एक सा तो नहीं रहता न भाभी. पीयूष भैया का सदमा पापा सह नहीं सके. पक्षाघात का शिकार हो गए. जो कुछ भविष्य निधि मिली उन के इलाज और अमला दीदी के विवाह में खर्च हो गई. पेंशन से फ्लैट की कि स्त दें या घर का खर्च चलाएं. उस पर रोहित भैया की डाक्टरी की पढ़ाई. रोहित भैया पढ़ाई छोड़ कर नौकरी करने जा रहे थे. मैं ने ही कहा कि मैं तो प्राइवेट पढ़ाई भी कर सकती हूं. रोहित भैया ने पढ़ाई पूरी कर ली तो पूरे परिवार का सहारा बन जाएंगे. इसीलिए नौकरी कर ली. 7 हजार भी बड़ी रकम लगती है आजकल,’’ पूरी कहानी बताते हुए रो पड़ी थी मानसी.

‘‘इतना सब हो गया और तुम लोगों ने मुझे सूचित तक नहीं किया. एकदम से पराया कर दिया अपनी भाभी को?’’ सुहासिनी के नेत्र डबडबा आए थे.

‘‘पराया तो आप ने कर दिया, भाभी. भैया क्या गए आप भी हमें भूल गईं और जैसे ही आप घर छोड़ कर गईं मां तो बिलकुल बुझ सी गई हैं. सदा एक ही बात कहती हैं, ‘मैं ने सुहासिनी को अपनी बहू नहीं बेटी समझा था पर उस ने तो पीयूष के बाद पलट कर भी नहीं देखा.’ टीना को देखने को तड़पती रहती हैं. उस के जन्मदिन पर बधाई देना चाहती थीं पर पापा ने मना कर दिया. कहने लगे, आप सोचेंगी कि पैसे के चक्कर में बच्ची को बहका रहे हैं ससुराल वाले,’’ मानसी किसी प्रकार अपने आंसू रोकने का प्रयत्न करने लगी थी.

सुहासिनी ने खाने के लिए जो हलकाफुलका, मंगाया था वैसे ही पड़ा रहा. चाय भी ठंडी हो गई पर दोनों में से किसी ने छुआ तक नहीं.

‘‘मुझे घर छोड़ दो, भाभी. मां सदा यही सोचती रहती हैं कि कहीं कुछ अशुभ न घट गया हो,’’ मानसी उठ खड़ी हुई थी.

सुहासिनी मानसी को बाहर से ही छोड़ कर चली आई थी. घर के अंदर जा कर किसी का सामना करने का साहस उस में नहीं था. वैसे भी कहीं एकांत में बैठ कर फूटफूट कर रोने का मन हो रहा था उस का. अनजाने में ही कैसा अन्याय हो गया था उस से.

पीयूष की पत्नी होने के नाते ही उसे मुआवजा मिला था. उसी के स्थान पर नौकरी मिली थी और वह सारे बंधन तोड़ कर मुंह फेर कर चली आई थी.

‘‘लो, आ गईं महारानी,’’ सुहासिनी को देखते ही मां ने ताना कसा था.

‘‘क्यों, क्या हुआ? आप इतने क्रोध में क्यों हैं,’’ सुहासिनी ने पूछ ही लिया था.

‘‘पूछ रही हो तो सुन भी लो. तुम दिन भर गुलछर्रे उड़ाओ और हम तुम्हारी बिटिया को संभालें, यह हम से नहीं होगा.’’

‘‘आप को लगता है कि मैं गुलछर्रे उड़ा कर आ रही हूं? टीना आप से नहीं संभलती यह तो आप ने कभी कहा नहीं. आप कहें तो स्कूल के बाद के्रच में डाल दूंगी,’’ सुहासिनी सीधेसपाट स्वर में बोली थी.

‘‘तो डाल दो न. मना किस ने किया है. अब अम्मां की सेवा करने की नहीं करवाने की उम्र है,’’ बड़े भैया चाय पीते हुए बोले थे और बड़ी भाभी हंस दी थीं.

‘‘मुझे भी एक प्याली चाय दे दो, बहुत थक गई हूं,’’ सुहासिनी ने बात का रुख मोड़ना चाहा था.

‘‘बना लो न बीबी रानी. आज मैं भी बहुत थक गई हूं. वैसे तुम थीं कहां अब तक? आफिस तो 5 बजे बंद होता है और अब तो 7 बजने वाले हैं.’’

‘‘मानसी मिल गई थी, उस से बातें करने में देर हो गई.’’

‘‘मानसी कौन?’’ बड़ी भाभी पूछ बैठी थीं.

‘‘अरे, वही मन्नो, इस की छोटी ननद. वह क्या लेने आई थी तुझ से?’’ मां बिफर उठी थीं.

‘‘कुछ लेने नहीं आई थी. मैं ने ही उसे मौल में देखा था. बेचारी आरोहण के साड़ी कार्नर में सेल्सगर्ल क ा काम करती है.’’

‘‘मां, आप नहीं जानतीं, वहां तो अलग ही खिचड़ी पक रही है. हम ने फ्लैट के लिए केवल 10 लाख मांगे तो मना कर दिया. वहां जाने कितने लुटा कर आई है,’’ अब बड़े भैया भी क्रोध में आ गए थे.

‘‘ठीक है. मेरा पैसा है, जैसे और जहां चाहूंगी खर्च करूंगी,’’ सुहासिनी ने ईंट का जवाब पत्थर से दिया था.

‘‘फिर यहां क्यों पड़ी हो? वहीं जा कर रहो जहां पैसा लुटा रही हो.’’

‘‘भैया…’’ सुहासिनी इतने जोर से चीखी थी कि घर में हलचल सी मच गई थी.

‘‘चीखोचिल्लाओ मत. माना कि तुम बहुत धनी हो. पर घर में रहना है तो नियमकायदे से रहना होगा. नहीं तो जहां सींग समाएं वहां जाने को स्वतंत्र हो तुम,’’ बड़े भैया अपना निर्णय सुना कर भीतर अपने कमरे में चले गए. सुहासिनी पत्थर की मूर्ति बनी वहीं बैठी रही थी.

तभी अंदर से टीना के रोने की आवाज आई.

‘‘टीना कहां है?’’ सुहासिनी के मुख से अनायास ही निकला था.

‘‘अंदर सो रही है. थोड़ी चोट लग गई है. बड़ी जिद्दी हो गई है. बारबार सीढि़यां चढ़उतर रही थी कि फिसल गई. सिर और चेहरे पर चोट आई है,’’ मां ने अपेक्षाकृत सौम्य स्वर में कहा था.

सुहासिनी लपक कर कमरे में गई और टीना को गोद में उठा लिया. टीना उस के कंधे से लग कर देर तक सिसकती रही थी. सुहासिनी चुपचाप अपने आंसू पीती रही थी.

कुछ ही देर में माथे पर किसी स्पर्श का अनुभव कर वह पलटी थी. मां बड़े प्यार से उस के माथे और कनपटी पर मालिश कर रही थीं.

‘‘भैया की बात का बुरा मान गई क्या बेटी?’’

‘‘नहीं मां, तकदीर ने जो खेल मेरे साथ खेला है उस में भलाबुरा मानने को बचा ही क्या है?’’

‘‘मां हूं तेरी, इतना भी नहीं समझूंगी क्या? इसीलिए तो तुझे यहां ले आई थी. आंखों के सामने रहेगी तो संतोष रहेगा कि सबकुछ ठीकठाक है. सब तुझे बरगलाने का प्रयत्न करेंगे पर तू विचलित मत होना, थकहार कर सब चुप हो जाएंगे.’’

‘‘पर मां, वहां से इस तरह आना कुछ ठीक नहीं हुआ. आप को पता है क्या पीयूष के पिता को पक्षाघात हुआ है…परिवार मुसीबत में है. उन्हें मेरी आवश्यकता है.’’

‘‘कुत्ते की दुम को चाहे कितने दिनों तक दबा कर रखो निकालने पर टेढ़ी ही रहेगी. तू ने वहां जाने की ठान ली है तो जा पर थोड़े ही दिनों बाद रोतीगिड़गिड़ाती हुई मत आना,’’ मां पुन: क्रोधित हो उठी थीं.

सुहासिनी ने टीना की देखभाल के लिए छुट्टी ले ली थी पर घर में अजीब सी चुप्पी छाई हुई थी मानो सुहासिनी से कोई अपराध हो गया हो.

एक सप्ताह बाद सुहासिनी प्रतिदिन की भांति तैयार हो कर आई थी. उस की सहेली शिखा भी आ गई थी.

‘‘आज टीना भी स्कूल जा रही है क्या?’’ मां ने पूछा था.

‘‘नहीं मां, आज हम दोनों पीयूष के घर जा रहे हैं, अपने घर. मां, हो सके तो मुझे क्षमा कर देना. उन लोगों को इस समय मेरी आवश्यकता है,’’ सुहासिनी ने घर में सभी के गले मिल कर विदा ली थी और बाहर खड़ी टैक्सी में जा बैठी थी. सुहासिनी की मां जहां खड़ी थीं वहीं सिर पकड़ कर बैठ गई थीं.

‘‘देखो मां, तुम्हारी सोने की चिडि़या तो फुर्र हो गई. क्यों दुखी होती हो. पराया धन ही तो था. पराए घर चला गया,’’ व्यंग्यपूर्ण स्वर में बोल कर भैया ने ठहाका लगाया था जिस की कसैली प्रतिध्वनि देर तक दीवारों से टकरा कर गूंजती रही थी. Best Family Story in Hindi.

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