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Hindi Family Story : शगुन का लिफाफा

Hindi Family Story : अगर मुझ से कोई पूछे कि इस दुनिया में विवाह के दिनों का सब से मुश्किल काम क्या है तो आजकल मेरे मुंह से एक आह सी निकल जाती है, मैं कहती हूं, दूल्हादुलहन को स्टेज पर जा कर शगुन का लिफाफा देने से ज्यादा मुश्किल कुछ नहीं है.

पिछले हफ्ते जिस शादी में गई, उस की याद रातों को जगा जाती है. हम पतिपत्नी पास के ही एक रिसौट्र्स में एक रिसैप्शन में गए थे. कोरोना ने कई दावतें मारी थीं, कई खुशियां अपनों के बिना मजबूरी में मना ली गई थीं. इस त्रासदी की लंबी परेशानियों के बाद यह पहला इस तरह का फंक्शन था, बहुत से दोस्त वहां मिलने वाले थे. अति उत्साहित सी मैं भी सजधज कर वहां पहुंची. खूबसूरत से रिसौट्र्स की मनमोहक सजावट बाहर से ही बता रही थी कि बढ़िया पार्टी होने वाली है.

पर हाय, कहां गया पुराना जमाना, जब किसी शादी में जाने पर घर का कोई सदस्य हाथ जोड़ कर स्वागत करता था, मेहमान को स्पैशल फील होता था, यहां तो एक बंदा नहीं, और अंदर गए तो एक बहुत ज्यादा लंबी लाइन दिखी, जिस के आगेपीछे किसी और चीज पर नजर जा ही नहीं पा रही थी, लटके चेहरे, थकी, उबाऊ बौडी लैंग्वेज वाले लोगों की बेचैन लाइन, शानदार बने स्टेज पर खड़े दूल्हा, दुलहन, दोनों के परिवार तक पहुंचने के लिए लालायित लोग.

उस लाइन को देख कर हम ने एकदूसरे को देखा, पति कुछ कहें, इस से पहले मैं ने बाजी मारी, ‘न… यह नहीं हो पाएगा. मैं इस लाइन में नहीं खड़ी होने वाली.”

हम ने इधरउधर नजर डाली, एक दोस्त दिखा, देखते ही बोला, ‘मैं ने तो आते ही बबलू को लाइन में लगा दिया था, वो देखो, सुरेश की बेटी पिंकी भी लाइन में लगी है, वे दोनों खाना खा रहे हैं, बस ऐसे ही काम चलाना पड़ रहा है.”

मैं ने कहा, “भाई साहब, हम क्या करें… हमारे साथ तो कोई पिंकी, बबलू नहीं.”

“फिर तो भाभीजी, आप लोग एकएक कर के खा लो, और दूसरा लाइन में लगा रहे.”

“अरे, खाने का क्या है, खा ही लेंगे. ये तो सब स्टेज पर हैं, इन से तो मिलना ही मुश्किल लग रहा है, स्टेज पर गए बिना इन लोगों को पता भी नहीं चलेगा कि हम आए भी हैं. बड़ी मुश्किल है.”

“हां, आसान तो नहीं है. हम तो आते ही लाइन में लग गए थे.’’

इतने में हमारी बेटी झिलमिल का फोन आ गया, “आप लोग ठीक से पहुंच गए, मम्मी?”

“मुझे तुम पर बहुत गुस्सा आ रहा है, औरों के बच्चे देखो. आ कर कैसे अपने पेरेंट्स की हैल्प कर रहे हैं, एक तुम हो कि घर में ही हो, पर साथ में नहीं आई, कुछ हैल्प हो जाती!”

“अरे, आप दोनों अपने सर्किल में शादी की पार्टी में गए हो, मुझ से वहां क्या हैल्प चाहिए थी?”

“अरे, आ कर कम से कम लाइन में लग जाती.”

“क्या…? कौन सी लाइन में…?”

मुझे अचानक लगा कि अब झिलमिल को कुछ भी कहूंगी तो बस अपना मजाक ही बनवाऊंगी. मैं ने कहा, ‘‘कुछ नहीं, घर आ कर बात करते हैं.’’

हम दोनों को भीड़ से बहुत ही परेशानी होती है, हम उस जगह जाते ही नहीं, जहां हमें इस तरह की भीड़ दिख जाती है. आधा ग्राउंड तो चेयर्स से भरा था, मैं ने कहा, “इतनी चेयर्स रखी  हैं, पर इन पर लोग बैठ ही नही रहे, बेचारे लाइन में खड़े रह कर शगुन का लिफाफा दे कर ऐसे घर भागेंगे कि आ कर गलती कर दी. चलो, हम बैठ कर सोचते हैं कि इस मुसीबत के पलों से कैसे निबटा जाए.”

“हद करती हो, किसी के बच्चे की पार्टी है, तुम्हें ये मुसीबत की घड़ी लग रही है.”

“न भाई, अपना तो जोश ठंडा हो गया, कोई दोस्त भी दिख रहा है तो बस या तो जल्दीजल्दी खाने में लगा है या लाइन में है. मैं तो सोच कर आई थी कि सब के साथ थोड़ी बातें करेंगे, बैठेंगे, यहां तो माहौल ऐसा है कि सब के जीवन का उद्देश्य इस समय है कि बस स्टेज तक पहुंच जाएं, बाकी सब चीजें भाड़ में जाएं.”

“क्या करें…? घर चलें…? कहीं रास्ते में डिनर कर लेंगे.”

“और शगुन का लिफाफा…”

“किसी दिन इन के घर ही चल कर दे आएंगे.”

अपने काम की बात सुनी तो पीछे खड़ा परिचित फौरन हम पतिपत्नी के आइडिया पर बीच में कूद पड़ा, “हां यार, ऐसा ही करते हैं, इन के घर जा कर शगुन दे आएंगे. पर, खाना खा लेते हैं.”

हम दोनों ने आंखों ही आंखों में ‘हां’ किया, अब खाने की लाइन देखी, यह लाइन शगुन वाली से छोटी  थी. हम ने इस लाइन में खड़े होने की हिम्मत की, पता नहीं एक महिला को किस बात की जल्दी थी, उस ने मेरे पीछे से हाथ बढ़ा कर अपनी प्लेट में सब्जी इस तरह से ली कि मुझे लगा, मेरी गरदन पर पीछे सब्जी का कुछ गीलापन है, मैं ने उसे पलट कर जरा घूरा, वो कहीं और देखने लगी, मुझे उस की जल्दबाजी पर गुस्सा आया था. मैं ने उस से साफसाफ पूछ लिया, “मेरी गरदन पर आप की प्लेट से कोई सब्जी लगी है?”

“जरा सी. मैं टिश्यू पेपर से साफ कर देती हूं,” कह कर उस ने मेरी ‘हां’ या ‘ना’ का इंतजार ही नहीं किया, जो भी निशान रहा होगा, झट से पोंछ दिया. मन में सोचा, ‘भई, तुम्हें इतनी जल्दी क्यों मची है, आगे खड़ी महिला का सुंदर ब्लाउज तुम्हें न दिखा…? उस पर गिर जाता तो…?’ फिर अपनेआप ही बोली, “सौरी, जरा शगुन वाली लाइन में खड़े होने की जल्दी है, पति को लाइन में खड़ा कर के आई हूं.”

उस के यह कहते ही मेरा मन उस के प्रति करुणा से भर गया. मैं ने उसे फौरन माफ कर दिया. मैं ने ‘इट्स ओके’ कहते हुए उसे एक प्यारी स्माइल दी. खाना खा कर हम ने फिर एक ठंडी सांस ले कर शगुन वाली भीड़ को देखा, अब तक हमारा आइडिया वायावाया घूम कर काफी लोगों को शांत कर गया था कि जिस का मनोबल कम है, जिस में जोश कम है, वह घर जा कर शगुन आराम से बाद में दे देगा. इतने में मेजबान दोस्त की बहन की नजर बहुत दूर से हम पर पड़ी, उस ने वहां से हाथ हिलाया, हम ने यहां से. उस ने स्टेज पर आने का इशारा किया, हम ने लाइन दिखाते हुए दूर से हाथ जोड़ दिए और इशारा किया कि बाद में मिलेंगे.

चंट बहन फौरन समझ गई कि लोग इस तरह जाने लगे, तो कहीं भाई का नुकसान न हो जाए, हमारे पास लपकी आई, मुझ से गले मिली, “आओ, चलो स्टेज पर.”

मैं ने कहा, “घर पास ही है, बाद में जा कर शगुन दे दूंगी. देखो मीता, इस लाइन में तो मैं खड़ी नहीं होने वाली. या एक काम करो, तुम यह लिफाफा रखो, हमारी तरफ से शगुन दे देना और बता देना कि हम आए थे.”

“अच्छा, चलो, मैं तुम्हें स्पैशल ऐंट्री दिलवाती हूं.”

“कैसे…?”

“अरे यार, एक सेकंड का काम है. जिस तरफ से लोग स्टेज से उतर रहे हैं, तुम लोग उधर से मेरे साथ आ जाओ, शगुन अपने हाथ से दो और वहीं सब से मिलो, फोटो खिंचवाओ, आओ.”

मुझे उस की यह चंट बहन नहीं, इस समय वह मुझे मुश्किलों से उबारने वाली देवदूत सी बहन लगी. हम उस के पीछेपीछे चल पड़े और वह बड़े आराम से हमें उतरने वाली साइड से स्टेज पर ले गई, मेजबान दोस्त अब कहीं जा कर गले मिले, हम ने शगुन का लिफाफा दिया, फाइनली इस लिफाफे का बोझ हमारे दिल से कम हो पाया था. हमारा संघर्ष खत्म हो गया था, पर हमें इस तरह से स्टेज पर जाते देख लाइन में खड़े लोगों ने नाराजगी भरा शोर सा मचाया. हम जल्दी से स्टेज से उतर कर अपनी राह हो लिए, मन में आया, ‘ऐ लोगो, कभी कहीं और भी गलत बातें देख आवाज उठा लिया करो. सब जगह चल रही धांधलेबाजी देख चुप रहते हो, यहां भी फिर चुप ही रहो, अपनी बारी आई तो जरा सी भी गलत बात बरदाश्त नहीं हुई.

हुंह, मैं इठलाती सी किला फतेह जैसी भावना से पति के साथ वापसी के लिए कार में बैठ गई.

“क्या सोच रही हो…?”

“भारत लाइन प्रधान देश बनता जा रहा है, कभी नोटबंदी की लाइन, कभी राशन की लाइन, शादी में शगुन की लाइन, खाने की लाइन, बस की लाइन… शादी के कार्ड में अब अकाउंट नंबर भी देने चाहिए, जिस से लोग कम से कम शादी में आ कर कुछ तो ऐंजौय कर लें, शगुन सीधे अकाउंट में डाल देना चाहिए. आजकल पेटीएम है, फोन पे है, कितना कुछ तो है. यह लाइन खत्म होनी चाहिए.”

“तुम और तुम्हारे आइडिया,” हंसते हुए कह कर उन्होंने कार स्टार्ट कर दी थी, पर आप बताइए कि यह आइडिया अच्छा है न. Hindi Family Story :

Hindi Family Story : लोग क्या कहेंगे

Hindi Family Story : दरवाजे की घंटी की आवाज सुनते ही सुलोचना हड़बड़ा कर खड़ी हो गई.

‘’इतनी देर हो गई बातों में, समय का पता ही न चला. 6 बज गए और यह आ गए.’’

उन के साथ बैठी प्यारी ननद गीता ने आखें नचा कर कहा,”तो क्या हो गया? 6 ही तो बजे हैं, आप सब तो 9 बजे खाना खाने वालों में से हो.’’

“वह तो ठीक है लेकिन आज राजेश सीमा को ले कर आने वाला जो है. मैं ने तो अभी तक कोई तैयारी भी नहीं की है.”

राजेश सुलोचना का इकलौता लड़का है जो 5 साल पहले इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर हैदराबाद नौकरी करने चला गया था और 6 महीने पहले ही ट्रांसफर ले कर अपने शहर इंदौर वापस आया था.

उस की उम्र 27 वर्ष की हो चुकी थी और न सिर्फ सुलोचना और उन के पति बल्कि उन के सभी रिश्तेदार और पड़ोसी राजेश के लिए एक पत्नी की तलाश में लगे हुए थे.

आजकल के बच्चों के विचारों से वाकिफ सुलोचना और मनोहरलाल राजेश पर अपनी पसंद नहीं लादना चाहते थे और इस कारण जब राजेश ने उन के सुझाए 10-12 प्रस्तावों को मना कर दिया तो उन्हें उन्होंने उस से सीधी तरह उस की अपनी पसंद के बारे में पूछ लिया.

राजेश ने बताया कि वह यहीं इंदौर में उस के औफिस में काम करने वाली अपनी जूनियर सीमा को पसंद करता है लेकिन अभी तक उस ने सीमा से इस बारे में कोई बात नहीं की है. सुलोचना ने राजेश को कहा कि वह सीमा को घर ले कर आए. यह पिछले हफ्ते की ही बात थी और आज राजेश सीमा को ले कर घर आ रहा था.

आज ही सवेरे सुलोचना की ननद गीता भी 3 महीने बाद भोपाल से आई थी और अपनी प्यारी भाभी के पिछले 3 महीनों का हिसाब विस्तारपूर्वक लेने में लगी हुई थी.

गीता सुलोचनाजी के पति मनोहरलाल की लाङली 8 साल छोटी बहन थी. सुलोचना, मनोहर लाल और राजेश के अलावा घर में सुलोचना की सास मनोरमा देवी भी रहती थीं. मनोरमा देवी ने काफी तकलीफों का सामना करते हुए मनोहरलाल और गीता का पालनपोषण किया था. वह बेहद मेहनती और दिखावेबाजी से दूर रहने वाली महिला थी. घर के सभी सदस्य उन का बहुत सम्मान करते थे.

सीमा के आने की बात सुनते ही गीता देवी तुरंत नहाने और तैयार होने को चल पड़ी और सुलोचना देवी ने किचन की राह संभाली.

किचन में सारा काम बिखरा पड़ा था. औफिस से घर आए पति को चाय बना कर देना भी आवश्यक था और यह सब करतेकरते घड़ी में 6:30 बज गए. सुलोचना फिर से बाहर ड्राइंगरूम में आई और सामान थोड़ा सजाया. फिर किचन की तरफ बढ़ी ही थी कि दरवाजे की घंटी फिर से बज गई.

दरवाजे पर राजेश एक शालीन संकोची दिखने वाली लड़की के साथ खड़ा था,”नमस्ते आंटी,” लड़की ने मीठी आवाज में सुलोचना का अभिनंदन किया.

“नमस्ते बेटी. अंदर आओ, अंदर आओ,” कहते हुए सुलोचना ने सीमा को बैठने का इशारा किया और राजेश से बोली,”अरे बेटा, रोज तो 7:15 – 7:30 घर आते हो, आज 6:45 बजे ही पहुंच गए. क्या सीमा को घर लाने की इतनी जल्दी थी?”

“नहीं, यह बात नहीं, रोज तो मैं शेयर टैक्सी से आता हूं पर आज सीमा के साथ इस की स्कूटी पर निकल पड़ा इसलिए जल्दी पहुंच गया.”

सीमा को देख कर सुलोचना को राजेश की पसंद पर गर्व हो आया. सीमा दिखने में तो आकर्षक थी ही उस की बातचीत और कपड़े पहनने के लहजे से शालीनता स्पष्ट नजर आ रही थी. सुलोचना सीमा से उस की पढाई, शौक और घरपरिवार के बारे में बात करने लगी. हालांकि सीमा काफी खुशमिजाजी से ही बात कर रही थी फिर भी सुलोचना को पता नहीं क्यों उस के चेहरे पर कई बार गंभीरता के लक्षण आतेजाते नजर आए, खासकर जब सुलोचना उस के परिवार के बारे में पूछ रही थी.

मनोहरलाल और गीता ने ड्राइंगरूम में प्रवेश किया और राजेश ने सीमा से उन का परिचय कराना आरंभ किया.
सुलोचना झटपट किचन में जा कर नाश्ते की तैयारी में लग गई.

कढ़ाई में समोसे डालने के बाद सुलोचना ने मिक्सी में चटनी पीसना शुरू किया ही था कि चीं… चीं…की आवाज के साथ मिक्सी बंद हो गई .

सुलोचना ने झल्लाते हुए मनोहरलाल को आवाज लगाई,”अजी जरा बिल्डिंग के इलैक्ट्रीशियन को तो बुलाओ, यह मिक्सी फिर से खराब हो गई.”

“अभी पिछले हफ्ते ही तो ठीक करवाई थी,” मनोहर लाल बोले,”अभी शाम को 7:00 बजे इलैक्ट्रिशियन कहां से मिलेगा. अब तो मिक्सी कल ही ठीक होगी.”

“पर बिना चटनी के तो समोसे का कोई मजा ही नहीं आएगा,” सुलोचना का मुंह लटक गया,”बेटा राजेश, तू एक बार देखेगा क्या?”

“मम्मी, आप को तो पता ही है कि यह सब काम मुझ से नहीं होते. आप चिंता न करो आप के हाथ के समोसे तो इतने बढ़िया होते हैं कि हम बिना चटनी के तो क्या बिना तले ही खा लेंगे.”

सुलोचना ने सीमा की ओर देखा और कहा,”इन दोनों बापबेटों से घर का कोई काम कहो तो इन का जवाब ऐसा ही होता है. हमारी बिल्डिंग का इलैक्ट्रिशियन भी बहुत ढीला काम करता है. चलो, अब टोमैटो सौस के साथ ही समोसे खा लेंगे.” यह सुन कर सीमा उठ खड़ी हुई और बोली, “आंटी, मैं एक बार देखूं ?”

“अरे नहीं बेटी, यह तो बिजली मिस्त्री का काम है. मिक्सी भी कितनी पुरानी है, कब से बदलने की सोच रही हूं.”

“कोई बात नहीं आंटी, एक बार मुझे देखने तो दीजिए,” सीमा ने किचन में पड़ा चाकू उठाया और तार के जले हुए हिस्से को साफ करने में जुट गई. उसे यह करता देख राजेश ने कहा “बहुत बढ़िया, तुम्हें यह काम भी आता है यह तो मुझे पता
ही न था. हमारी आयरन पर भी जरा एक नजर डाल लो.”

सीमा ने मुसकराते हुए कहा, “जरूर मैं वह भी कर दूंगी पर फिलहाल आप मुझे एक स्क्रूड्राइवर और थोड़ा टेप खोज कर दीजिए.” जब तक राजेश स्क्रूड्राइवर खोज कर लाता सीमा ने मिक्सी को उठा कर देखा और कहा “आंटी तार जलने में न तो मिक्सी का दोष है और ना इलैक्ट्रिशियन का. इस के हवा के सारे छेद बंद हो गए हैं और इस वजह से मिक्सी गरम हो कर खराब हो जा रही है. कोई पुराना टूथब्रश मिलेगा क्या?”

5 मिनट के अंदर सीमा ने तार का जला हुआ हिस्सा वापस जोड़ दिया और मिक्सी की पूरी सफाई कर डाली,“लीजिए, आंटी आप की मिक्सी फिर से सेवा में हाजिर है.”

सुलोचना ने जैसे ही मिक्सी का बटन दबाया मिक्सी चल पड़ी. “अरे मिक्सी की आवाज भी बहुत कम हो गई, बहुत बढ़िया.”

“और क्या आंटी, आज के जमाने में इतनी बढ़िया मिक्सी नहीं मिलती. आप इस का वजन तो देखो असली तांबे के तारों से इस की मोटर बनी है,”अपनी प्यारी मिक्सी की तारीफ सुन कर सुलोचना प्रसन्न हो गई. “चलो बेटी तुम बाहर सब के
साथ बैठो, मैं अभी आती हूं.”

“नहीं आंटी, मैं भी आप का साथ देती हूं. मुझे भी समोसे बनाना आ जाएगा,” सीमा के हाथों में गजब की फुरती थी और सुलोचना के बताए तरीके से उस ने फटाफट समोसे बना डाले. दोनों नाश्ते की प्लेटें ले कर बाहर आईं.

राजेश जा कर मनोरमा देवी को बुला लाया और सभी ने अच्छे से नाश्ता किया. मनोरमा देवी ने सीमा से बातें तो थोड़ी ही कीं लेकिन उसे लगातार देखती जरूर रहीं.

“अच्छा आंटी, 8:00 बज गए हैं, मैं चलती हूं. आप सभी के साथ बातों में सवा घंटा कैसे निकल गया पता ही न
चला.”

“क्या खाना नहीं खाओगी, सीमा?”

“नहीं आंटी, खाना तो मेरा घर पर तैयार पड़ा होगा. फिर कभी प्रोग्राम
बनाती हूं,” सब को नमस्कार कर सीमा निकल पड़ी.

सीमा के जाने के बाद सुलोचना और गीता ने एकसाथ उस की बढ़ाई करनी शुरू कर दी. वास्तव में दोनों ने अपनी आंखों से सीमा की कुशलता और सुंदरता को देख लिया था और अभी तक उन्होंने राजेश के लिए जितने भी रिश्ते देखे थे उन की तुलना में सीमा उन्हें बहुत ही बेहतर लगी.

गीता ने कहा,”दोनों की जोड़ी बहुत अच्छी बन पड़ेगी मनोहर भैया, अब तो चट मंगनी पट ब्याह कर डालो.”

उन की बातें सुनकर राजेश ने कहा,”बुआजी, मैं आप को सीमा के बारे में कुछ और भी बताना चाहता हूं. ऐसा करें हम डिनर के बाद बात करते हैं, नहीं तो दादी को सोने में देर हो जाएगी.”

राजेश की बात सुन कर सुलोचना और गीता चकरा गए फिर भी उन्होंने कहा,”ठीक है, तुम लोग चेंज कर के आओ. 9:00 बजे खाना टेबल पर तैयार रहेगा.”

खाना बनाते बनाते सुलोचना और गीता देवी के दिमाग में प्रश्न ही प्रश्न चक्कर लगा रहे थे. एक बात तो स्पष्ट थी कि बात गंभीर ही है और राजेश दादी के सामने इस विषय पर चर्चा नहीं करना चाहता है. खाने का काम 9:30 बजे पूरा हुआ और मनोरमा देवी अपने कमरे में चली गई.

“हां बेटा राजेश, बोलो क्या सरप्राइज़ दे रहे हो ?” मनोहरलाल ने जबरन अपने चेहरे पर मुसकान लाते हुए वातावरण को हलका करने की चेष्टा की हालांकि उन का मन भी अंदर से धकधक कर रहा था कि राजेश पता नहीं क्या बात बताने वाला है. वास्तव में राजेश ने जो कहा वह सुन कर सब का दिमाग घूम गया.

राजेश ने कहा, “मां सीमा एक विधवा है. आज से 2 साल पहले इस का विवाह यहीं इंदौर में धूमधाम से एक व्यवसायी परिवार में हुआ था. देर रात तक विवाह की रस्में पूरी करने के बाद बारात सवेरे ग्वालियर पहुंची. बहू का ग्रहप्रवेश करवाया गया. बाराती अपनेअपने सामान को सजाने में जुट गए और लड़कियां सीमा से बातें करने में.

सीमा का पति भी वहीं बारबार आजा रहा था और लड़कियां उस का मजाक उड़ा रही थीं,“अरे भैया कुछ देर हम भी तो बातें कर लें, आप के पास तो यह हमेशा रहने वाली है, आप को इतनी क्या जल्दी है?”

इतने में सीमा की सास ने सीमा के पति को आवाज दी,”अरे बेटा, शादी की मिठाई ले कर ज्ञानदेव बाबा के आश्रम चला जा.”

उस परिवार में ज्ञानदेव बाबा को जीताजागता देवता माना जाता था और घर का हर काम उन के आदेशों पर ही होता था.

“मां, मैं तो बहुत थका हुआ हूं. क्या अभी जाना जरूरी है? शाम को तो सीमा को ले कर वहां बाबा का आशीर्वाद लेने जाना ही है.”

सीमा की सास ने गरम होते हुए कहा,”और अगर ज्ञानदेव बाबा को पता चल गया कि बारात सवेरे आई लेकिन मिठाई उन के यहां शाम को पहुंची है तो क्या वह बासी मिठाई पर नजर भी डालेंगे? बैठ जा मुन्नू के पीछे मोटरसाइकिल पर और मिठाई पहुंचा कर आजा.”

पीछे से लड़कियों ने आवाज लगाई,”हां ताई, भैया को तो भाभी से बातें करनी है इसलिए इन्हें आलस आ रहा है.”

सीमा का पति झेंपते हुए मिठाई के थैले ले कर अपने चचेरे भाई के पीछे मोटरसाइकिल पर बैठ गया. घंटे बाद दरवाजे पर काफी आवाज हुई. जब लोगों ने दरवाजे पर पुलिस को खड़ा देखा तो सब के होश गुम हो गए.
पता चला कि आधी नींद में मोटरसाइकिल चलाता हुआ मुन्नू ज्ञानदेव बाबा के आश्रम के बाहर एक ट्रक से टकरा गया था.

मुन्नू बुरी तरह घायल हो गया था और सीमा का पति जिस ने अपनी नवविवाहिता पत्नी की शक्ल तक ठीक से नहीं देखी थी, आश्रम के दरवाजे के सामने निर्जीव पड़ा था. घर में हाहाकार मच गया. चारों ओर रोनेधोने की आवाज गूंजने लगी. सीमा तो यह खबर सुनते ही बेहोश हो गई. जब उसे होश आया तो उस के आसपास कोई नहीं था. किसी ने यह देखने की जरूरत नहीं समझी कि सीमा पर क्या गुजर रही होगी.

दोपहर तक सीमा कमरे में एक जिंदा लाश की तरह पड़ी रही. करीब 3:00 बजे उस के भाई ने कमरे में कदम रखा. भाई को देखते ही सीमा चीख कर भाई से लिपट गई और फूटफूट कर रोने लगी. पता चला कि सीमा के पति की मृत्यु की खबर मिलते ही सीमा के ससुर ने उन के घर फोन किया और कहा कि वह आ कर
सीमा को ले जाएं.

रोतीबिलखती सीमा जब घर से निकल रही थी तब घर का कोई सदस्य न तो उसे संभालने आया न किसी के मुंह से उस के लिए सहानुभूति के 2 शब्द निकले. गनीमत यही थी कि किसी ने उसे कोसा नहीं, कम से कम उस के सामने तो नहीं कुछ नहीं कहा.

अगले दिन सीमा की ससुराल वालों ने उस का सारा सामान वापस भेज दिया और हमेशा के लिए रिश्ता खत्म कर लिया. सुनने में आया कि ज्ञानदेव बाबा ने इस हादसे की जिम्मेदारी सीमा के सिर पर थोपी थी नकि सीमा की सास की बेवकूफी पर जिस ने बच्चों को जिद कर कर बाबा को मिठाई पहुंचाने भेजा था जबकि वह पूरी रात सोए नहीं थे और थके हुए थे.

धीरेधीरे सीमा ने खुद को संभाला. किसी तरह उसे अच्छी कंपनी में नौकरी मिल गई जिस से उस का समय गुजरने लगा और बीती बातों को भूलने में मदद मिली. अकलमंद और मेहनती तो वह थी ही, जल्दी ही कंपनी में उसका कंफर्मेशन भी
हो गया. कहते हैं न कि समय सब घावों को भर देता है. राजेश जब हैदराबाद से इंदौर वापस आया तो संयोगवश उस की पोस्टिंग उसी डिपार्टमैंट में हुई जहां सीमा काम करती थी. वह सीमा की मेहनत से बहुत प्रभावित हुआ क्योंकि सीमा अकेले ही उस के 2 मातहतों के जितना काम कर लेती थी और उसे कभी सीमा के काम में गलतियां नहीं मिलीं.

काम के मामले में सीमा से उस की रोज ही बात हो जाती थी. धीरेधीरे उसे सीमा अच्छी लगने लगी और वह उसे भावी जीवनसंगिनी के रूप में देखने लगा. तब तक उसे भी सीमा के जीवन का यह अध्याय पता नहीं था. जब उस ने सीमा के प्रोमोशन की सिफारिश एचआर डिपार्टमैंट से की तब उसे सीमा के जीवन में घटी इस दुर्घटना का पता चला.

यह सब बता कर राजेश ने कहा, “पापा, मम्मी, बुआजी, अब निर्णय आप के हाथों में है. मुझे जो कुछ पता था वह मैं ने आप को साफसाफ बता दिया है. बाकी आप किसी भी तौर पर देखें तो सीमा मेहनती है, गुणवती है और मुझे बहुत पसंद भी है. उस का छोटा सा परिवार उस से बहुत स्नेह करता है और उस के भाईभाभी उसे बहुत अच्छी तरह रखते हैं. उस
पर दूसरी शादी करने का परिवार वालों की तरफ से कोई दबाव नहीं है और आर्थिक रूप से भी वह स्वतंत्र है.”

“नहीं बेटा, यह तू क्या कह रहा है. यह कैसे हो सकता है?” सुलोचना और गीता दोनों के मुंह से यही शब्द साथ साथ निकले.

गीता ने कहा,”हमारा इकलौता बेटा एक विधवा से शादी करेगा? अरे बेटा दुनिया में लड़कियों की क्या कमी है? मैं एक से एक रिश्ते तेरे लिए खोज कर लाऊंगी. मानती हूं कि सीमा बहुत सुंदर भी है और गुणवती भी, लेकिन दुनिया में और भी ऐसी लड़कियां मिलेंगी और वह भी कुंआरी.”

सभी ने मनोहरलाल की तरफ देखा तो उन का चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था. उन्होंने लगभग गुर्राते हुए कहा,”हरगिज नहीं, यह कभी नहीं होगा. तुझे कुछ हो गया तो?“ मनोहरलाल का रुख गीता और सुलोचना से भी ज्यादा कड़ा था.

“पर पापा…“ राजेश कुछ कहना चाहता था पर उस की बात काटते हुए मनोहरलाल बोले, “और तुम ने यह सोचा है नालायक कि मां क्या कहेगी? मां की उम्र का पता है तुझे? अगर यह बात उन्होंने सुन भी ली तो उन की तबीयत बिगड़ सकती है. अगर उन्हें कुछ हो गया तो मैं अपने हाथों से तेरा गला दबा दूंगा.”

“अरे आप धीरे तो बोलिए. आप की आवाज से ही मांजी की नींद खुल जाएगी,” सुलोचना ने कहा.

राजेश और गीता कुछ बोलने लगे इतने में मनोरमा देवी के कमरे का दरवाजा खुला. सभी लोग बोलतेबोलते चुप हो गए.

“राजेश इधर मेरे कमरे में आओ. तुम सब यहीं बैठो और हमारा इंतजार करो,” मनोरमा देवी ने बहुत पहले की कड़क आवाज में जब यह कहा तो किसी के मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला.

करीब 15 मिनट बाद मनोरमा देवी राजेश के साथ बाहर निकलीं और आ कर सब के साथ सोफे पर बैठ गईं. राजेश के चेहरे पर कोई भाव नहीं थे. गीता, सुलोचना और मनोहरलाल एकटक मनोरमा देवी की ओर देख रहे थे.

मनोरमा देवी ने कहा,“ राजेश की शादी सीमा के साथ ही होगी. मुझे यह जान कर बहुत खुशी है कि राजेश ने अपने लिए बिलकुल उपयुक्त पत्नी खोज ली है, जो हम सब मिल कर भी कभी न कर पाते.”

“मां आप क्या कह रहे हो?” मनोहरलाल बोले “आप को पता है सीमा एक विधवा है? हम एक विधवा को बहू बना कर लाएं, यह कैसे हो सकता है? लोग क्या कहेंगे? आप दुनिया की बातें, शगुनअपशगुन, रीतिरिवाज का कुछ तो खयाल करो,” मांबेटे के विरोधी विचार देख सुलोचना और गीता को चुप रहने में ही भलाई लगी.

मनोहरलाल की बात सुन कर मनोरमा देवी 2 मिनट बिलकुल शांत रहीं. इस के बाद उन्होंने जो कहा वह घर के सभी सदस्यों के लिए राजेश की बातों से भी ज्यादा चौंकाने वाला था, “ बेटा, मनोहर तू भी एक विधवा मां की संतान है.”

मां की बात सुन कर मनोहरलाल को लगा कि मनोरमा देवी अपने खुद के बारे में बोल रही हैं.

“मां, पिताजी का 72 वर्ष की उम्र में निधन हो गया था तो वह बिलकुल अलग बात है.”

“नहीं बेटा, मैं यह नहीं कह रही. मैं आज तुझ से जो कहने वाली हूं यह सचाई मैं तुझे अपने जीतेजी नहीं बताने वाली थी. पर आज मुझे बोलने पर मजबूर होना पड़ा नहीं तो तुम बहुत बड़ा अनर्थ कर बैठते.”

“कैसा अनर्थ, कैसी सचाई? मां, तुम क्या कह रही हो मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा?” गीता के मुंह से बरबस निकल पड़ा. मनोरमा देवी ने कहा, “तुम सब विमला चाची के बारे में क्या जानते हो?”

विमला मनोरमा की देवरानी थी और उन का घर में अकसर आनाजाना लगा रहता था. बचपन से ही मनोहरलाल और गीता ने उन को स्नेह की प्रतिमूर्ति के रूप में जाना था. मनोरमा देवी के दोनों बच्चों से वह उतना ही स्नेह करती थीं जितना अपने बच्चों से.

“बेटा ,तुम्हारी चाची बनने से पहले विमला का एक विवाह और हुआ था और सीमा की ही तरह शादी के कुछ दिनों बाद उस का पहला पति बीमार हो कर गुजर गया. यह बात आज से 55 वर्षों पहले की है. विमला तुम्हारे दादाजी के घनिष्ठ मित्र की पुत्री थी और उस का दुख देख कर उन्होंने तुम्हारे चाचाजी से उस का पुनर्विवाह करने का निर्णय लिया.

घर के सदस्यों ने जब उन का विरोध किया तब उन्होंने भूख हड़ताल कर दी और 3 दिनों तक अन्न का एक दाना भी मुंह में नहीं लिया. आखिरकार घर वालों को उन की बात माननी पड़ी और विमला तुम्हारी चाची बन कर हमारे घर आ गई. बहुत थोड़े ही समय में विमला ने अपने अच्छे व्यव्हार से घर में सभी को अपना बना लिया और हमारा परिवार बहुत
अच्छे से चलने लगा. हमारी चिंता के विपरीत 1-2 सालों में ही लोगों ने इस बात को आयागया कर दिया.

विमला को मुझ से थोड़ा ज्यादा ही लगाव था क्योंकि जब तुम्हारे दादाजी ने इस रिश्ते का प्रस्ताव किया था तब पूरे घर में सिर्फ मैं ने इस का समर्थन किया था और तुम्हारे चाचा को भी इस के लिए प्रेरित किया था. शादी के 2 साल बाद विमला ने तुम्हें जन्म दिया.

मेरी गोद तब तक सूनी ही थी हालांकि मेरी शादी को 5 वर्ष हो चुके थे. अस्पताल से घर आने के बाद विमला सीधे मेरे पास आई और तुम्हें मेरी गोद में डाल दिया. मैं चकित हो कर उस की तरफ देखने लगी. बहुत मना भी किया पर विमला ने मेरी एक न मानी. उस के बाद विमला की 2 संताने और हुईं और मैं ने भी गीता के रूप में संतानसुख प्राप्त किया. तो बेटा, अब यह बताओ तुम्हें विमला चाची में क्याक्या खामियां, दोष और गलतियां दिखाई पड़ती हैं? तुम तो
उन्हें बचपन से देखते आ रहे हो. क्या तुम्हें कभी यह लगा कि विमला की वजह से तुम्हारे चाचा पर या तुम बच्चों पर किसी किस्म की आंच आई है? तुम्हें तो पता है कि तुम्हारा ब्लड ग्रुप इतना रेयर है कि लाखों में एक इंसान ही तुम्हें खून दे सकता है. जब तुम्हें कालेज में चोट लगी थी तब विमला ने 2 बोतल खून दे कर तुम्हारी जान बचाई थी. नहीं तो पूरे मध्य प्रदेश में डोनर खोजतेखोजते बहुत देर हो जाती. क्या तुम ने कभी सोचा कि उन का खून तुम से इतनी आसानी पूर्वक कैसे मैच कर गया?”

मनोहर लाल, गीता और सुलोचना के मुंह से कोई शब्द नहीं निकला. राजेश सोफे से उठ कर अपनी दादी के पावों के पास बैठ गया और तीनों की तरफ देखने लगे. मनोहर लाल उठे और अपने कान पकड़ते हुए बोले,“मां, आज आप ने मुझे बहुत बड़ी गलती करने से बचा लिया. आप जो कह रही हैं वही होगा. दुनिया की मुझे कुछ नहीं पड़ी, जो जिसे जो कहना है वह कहता रहे. सीमा ही इस घर में बहू बन कर आएगी. हमें उस के जीवन में घटी दुखद घटना के बारे में उसे एक शब्द भी कभी नहीं कहना है.”

मनोरमा देवी ने कहा, “एक और बात बेटा, अभी जो कुछ मैंने तुम्हें बताया वह राज हमारे बीच में ही रहे. तुम में से कोई इस का जिक्र विमला से कभी न करना और न ही विमला के प्रति तुम्हारे व्यवहार में कोई परिवर्तन आए.”

मनोहरलाल जोरजोर से सिर हिला कर सहमति जता रहे थे क्योंकि शब्द उन के गले में अटक गए थे. गीता और सुलोचना की आंखों से जारजार आंसू बह रहे थे पर यह आने वाली खुशियों के स्वागत के आंसू थे. Hindi Family Story :

Hindi Social Story : धैर्यवान बनने के 7 नायाब नुसखे

Hindi Social Story : जीवन के हर क्षेत्र में धैर्यवान लोग ही आगे बढ़ते हैं. शेयर मार्केट हो या नौकरी का मार्केट, धैर्य के अभाव में कुछ हासिल नहीं होता. एक शेयर हो सकता है कि 3 वर्षों तक हिले ही न. जो धैर्य नहीं रख सकते वे इसे निकाल देंगे. शेयर को निकालते ही वह चढ़ना शुरू हो जाता है. तीनचार साल की तैयारी में प्रतिस्पर्धी मुश्किल से यूपीएससी निकाल पाते हैं. कईकई तो इस से अधिक समय तक साधना करते हैं. जो बीच में धैर्य खो देते हैं वे असफल हो जाते हैं.

विवाह के लिए जीवनसाथी के रूप में अच्छे मैच के लिए भी बहुत धैर्य रखना पड़ता है वरना सालोंसाल मन को जो पसंद नहीं उसी से ताउम्र काम चलाने को एक शख्स मजबूर होता है.

आखिर धैर्य की वह पाठशाला है कहां जहां आमजन इस गुण को तराशें. यह कहीं और नहीं है, हमारे ही आसपास रोजमर्रा की चीजों व घटनाओं में विद्यमान है. कुछ बानगियां हैं.

आप अपने कंप्यूटर को हर बार जब चालू करते हैं तो यह काफी वक्त लेता है. डिस्पले आएगा कि ’डोंट शट डाउन, अपडेटस आर अपलोडिंग’, आप थोड़ा धैर्यवान बन कर थोड़ा और इंतजार करते हैं. यह फिर संदेश देता है कि ’अपडेटस 30 प्रतिशत कंपलीट, डोंट स्विच औफ’.  फिर यह थोड़ी ही देर में बढ़ कर 50, फिर 70 व फिर 98 प्रतिशत कंपलीट दिखाने लगता है. आप सोचते हैं कि अपडेटस का काम खत्म और अब कंप्यूटर शुरू हुआ, लेकिन यह फिर से पुराना राग अलापने लगता है कि ’अपडेटस आर अपलोडिंग, प्लीज वेट’. और फिर ‘बैक टू स्क्वैयर वन’ की तर्ज पर मात्र 30 प्रतिशत कंपलीट  डिस्प्ले होने लगता है. यह एक तरह से आप को धैर्य का पाठ पढा़ना चाह रहा है.

दुनिया में बहुत तनाव है. लोगों में धैर्य नहीं बचा है. दरअसल, कंप्यूटर बनाने वाली कंपनियां भी अनजाने में ही उपयोगकर्ता में धैर्य के गुण को बढ़ाने का काम अपनी स्वार्थसिद्धि के साथ ही साथ कर गई हैं. आखिर हर कंपनी को सीएसआर के रूप में अपने कुछ सामाजिक दायित्वों का निर्वहन वैसे भी  करना ही है.

राजनीतिक दल भी इसी तरह से आम मतदाता को धैर्यवान बनाते हैं. वोट मांगने द्वारेद्वारे आते हैं. लेकिन एक बार जब सत्ता सुंदरी कब्जे में आ गई, फिर वोटर को अपने नेता से मिलने के लिए एक तरह से समय की भीख सी मांगनी पड़ती है. उसे उन के बंगले पर ’मंत्री जी प्रवास पर हैं’ का बोर्ड मुंह चिढ़ाता है. यदि वे हों भी मंत्रालय में, तो बैठक में रहते हैं या फिर किसी अन्य जरूरी काम में व्यस्त रहते हैं. उसे घंटों इंतजार करना पड़ता है. मतदाता यह समझता नहीं. इस तरह से वे धैर्य का गुण, जो कि जिंदगी में सफल होने के लिए बहुत जरूरी है, विकसित करने का विराट कार्य करते हैं. यह सच्ची जनसेवा है. मतदाता को इस के लिए उन का धन्यवाद अदा करना चाहिए.

हमारे सिनेमा ने भी हमें धैर्यवान बनाने का बीड़ा अलग तरह से उठा रखा है. असल मूवी शुरू होने के पहले के ट्रेलर आप को दनादन झेलने पड़ते हैं. एकदो के बाद आप सोचते हैं कि बस, अब सैंसर बोर्ड का बहुप्रतीक्षित पलक झपकते गायब होने वाला काला सफेद सर्टिफिकेट स्क्रीन पर दिखेगा. गंगाधर को आज तक यह समझ नहीं आया कि कलर मूवी का सर्टिफिकेट आज तक कलर्ड क्यों नहीं हुआ. उस के बाद, बस, आप की वो हिट मूवी. पर तीसरा व चौथा ट्रेलर किसी फिल्म का या उत्पाद का विज्ञापन आ जाता है. अब आप सोचते हो कि हो गया. लेकिन 5वीं विज्ञापन फिल्म आप को हिट करती है. सातआठ विज्ञापनों के बाद ही आप की पसंदीदा मूवी, अब इंतजार की घड़ियां समाप्त हुईं, की तर्ज पर आती है. सिनेमा वालों का यह  एक तरह का अपना सीएसआर है दर्शकों में धैर्य का गुण विकसित करने का.

धैर्य के गुण को विकसित करने का एक और तरीका है कि आप लोक सेवा आयोग की परीक्षा दें. आप प्रारंभिक देंगे तो 3 बार उस की तारीख बढ़ेगी. एक बार पेपरआउट होने पर, दूसरी बार पेपर में गलत प्रश्न आने के चलते कोर्ट में याचिका लगने पर और तीसरी बार किसी अन्य कारण से. देरी का कारण तो अपनेआप पैदा हो जाएगा. तो, दोतीन साल तो प्रारंभिक परीक्षा देने में निकल जाएंगे. फिर मुख्य की तारीख ही नहीं आएगी क्योंकि किसी पेंच के कारण प्रारंभिक का परिणाम अटका रहेगा और आप को बेरोजगारी का झटका लगता रहेगा. सालछहमाह और ऐसे ही निकल जाएंगे. फिर मुख्य परीक्षा 2 बार टलेगी. उस का परिणाम भी 2 बार टलेगा. कहीं आरक्षण का या डोमिसाइल का पेंच फंस जाएगा, तो मुख्य का परिणाम अटक जाएगा. इस तरह हो गए होंगे 3 साल. तब तक बाद की 2 और परीक्षाओं का भी कुछकुछ शेडयूल शुरू हो गया होगा. पता ही नहीं चलेगा कि कौन सी पहले हो रही और कौन सी बाद में.

धैर्यवान बनने का एक और आसान देशी तरीका है. यातायात जाम में फंस जाएं, इस के लिए वह सड़क चुनें जहां कि अकसर जाम लगता हो. यहां एक एक इंच आगे बढ़ने में जो मशक्कत करनी होगी, जो तूतूमैंमैं होगी उस से आप खुद धैर्यवान बन जाएंगे. हां, एक बार, 2 बार नहीं, ऐसी सड़क से आप रोज गुजरें. आप में कूटकूट कर धैर्य का गुण विकसित हो जाएगा.

अभी की पीढी़ बहुत धैर्यवान होती जा रही है, खासकर वे जिन के कोई अपने दूसरी लहर में कोरोना से संक्रमित हुए हों. तो ये कैसे धैर्यवान बन गए. औक्सीजन बैड लेने या सिंपल बैड लेने को इन को पच्चीसों अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़े. रोज सुबह से शाम हो जाए, तब मुश्किल से कहीं बैड मिले, वरना एक बैड पर ही 2 मरीज हो गए. इस शर्त पर कि औक्सीजन सिलैंडर आप अपने कंधे पर या कंधा मजबूत न हो तो लुढ़का कर ले जाओ. फैक्ट्री से खुद भरवा कर लाओ. वहां जो आदमी दोपहर में लाइन में लगा, तो दूसरे दिन शाम तक नंबर आया. सोचिए, कितने अधिक धैर्यवान होंगे ये लोग. परंतु भाईसाहब, वह क्या दौर था, यमराज की डिक्शनरी में धैर्य नहीं रहता, वह तो पलक झपकते आ जाता था.

किसी स्पैशल ट्रेन में किसी यात्री से ’आप की यात्रा शुभ हो’ कहें. वह पहले 4 घंटे लेट होगी. 4 घंटे तो इस के लिए  सब से कम हैं. फिर  6 व 8 घंटे हो जाएगी. फिर 10, फिर 14 और आखिरकार असीमित लेट हो कर कैंसिल ही हो जाएगी. तो आखिर, धैर्य का गुण आप में कैसे विकसित न होगा.

धीरज पत्नी भी सिखाती हैं. पत्नी के साथ वैवाहिक या ऐसे ही किसी कार्यक्रम में जाएं. यकीन मानिए, आप को तैयार हुए आधा घंटा, फिर एक घंटा हो चुका होगा लेकिन पत्नी अभी तैयार होने की तैयारी ही चल रही होगी. साड़ी, ज्वैलरी छांट रही होगी, अपने गेसुओं को ड्राअर से सुखा रही होगी. इस में आप की जान सूख रही होगी तो सूख जाए. वैसे भी, शादीशुदा आदमी जिम्मेदारियों के बोझ में चुसे आम सा 2 बार साल में ही हो जाता है. आप को कौन सोलहश्रंगार करना होता है. और फिर आप के पास सोलहश्रंगार के लिए है क्या? आप उन की समस्या भी तो समझिए. ऐसे माह में कम से कम तीनचार मौके हो जाएं तो आप इतने धैर्यवान बन जाएंगे कि क्या बताएं. वैसे, आप इस अनुभव से दोचार हो चुके होंगे. जरूरत है तो इसे थोड़ा और निखारने की. आप के घर के पास सिनेप्लैक्स हो, तो आप तो तैयार हो कर मूवी देखने चले जाएं, लौट के आने के बाद भी उसे 15 मिनट और लगेंगे. इस तरह से धैर्य का अभ्यास करने से मौकेबेमौके आप को काफी सहारा मिलेगा. वैसे, एक बात है जिस ने विवाह कर लिया है वह धैर्यवान अपनेआप बन जाता है. कैसे? हमेशा पत्नी ही बोलती है, आप को मौका नहीं मिल पाता है. आप बोलना चाहें कि वह बोलने लगती है. आप मन मसोस कर रह जाते हैं. इस तरह आप अपनेआप धैर्यवान बन जाते हैं.

धैर्यवान बनने के 7 उपाय हो गए हैं. एक और उपाय बोनस के तौर पर आप की खिदमत में पेश है. बेवजह के कार्य से ही किसी सरकारी अधिकारी से मिलने चले जाएं. अपने साथ करीब दोचार घंटे का फालतू समय ले कर जाएं क्योंकि आप फालतू में जिन से मिलने जा रहे हो, वे फालतू नहीं हैं. पहली बार तो वे मिलेंगे ही नहीं, दौरे पर होंगे. दूसरी बार स्वास्थ्य लाभ के कारण वे घर में हो सकते हैं. तीसरी बार किसी जरूरी मीटिंग में होंगे. जिस दिन अगर होंगे तो वे जनसुनवाई कर रहे होंगे. लेकिन आप की सुनवाई नहीं होगी.

हम खालिस प्रेमी हैं तो धैर्य की चलतीफिरती पाठशाला के बारे में बताना बहुत जरूरी है. उन सरकारी अधिकारी महोदय को आप हलका करवाने को बाहर भर ले जाएं. वे यहांवहां इतना सूंघासांघी करते रहेंगे कि आप परेशान हो जाओगे. रास्ते में पड़ने वाले सारे चौपहियादोपहिया पर अपना ककड़ी सा पैर उठाएंगे. आप को लगेगा कि अब हलके होने ही वाले हैं. लेकिन कहां, वे तो अभी मिनी वाश में बिजी हैं. बहुत बड़ी जिम्मेदारी इन की पूछ पर है. सारी गाड़ियों में फिर मिनी वाश सेवा. आप को वे इतना यहां से वहां घुमाएंगे कि आप थक जाओगे. तब कहीं यदि उन का मन आप की तकलीफ महसूस कर पसीज गया तो वे पिछवाड़े को अदा से झुका कर हलके होंगे. एक डौगी धैर्य सिखाने की ये चलतीफिरती पाठशाला हैं.

आइडिया तो गंगाधर के पास और भी हैं, बाकी फिर कभी! Hindi Social Story :

Hindi Family Story : सीमा रेखा – निर्मला के किस रूप से परिवार वाले हक्के बक्के रह गए ?

Hindi Family Story : समधिन निर्मला के व्यवहार से दिवाकर इतने प्रभावित हुए थे कि रूपा को अपने बेटे के लिए झट पसंद कर लिया. लेकिन विवाह के बाद जब निर्मला का ऐसा रूप उन के सामने आया कि वह हक्केबक्के रह गए.

समधिन की बात सुन कर दिवाकर सकते में आ गए. नागिन की तरह फुफकार कर निर्मला बोली, ‘‘आप लोग मेरी बेटी को तरहतरह से तंग करते हैं. मैं ने बेटी का ब्याह किया है, उसे आप के हाथों बेचा नहीं है. मेरी बेटी अब आप के घर नहीं जाएगी.’’

दिवाकर ने पिछले साल ही अपने बड़े बेटे मुकुल की शादी पटना से सटे इस कसबे के निवासी गुलाबचंद की बड़ी बेटी रूपा से की थी. लड़की देखने आए तो गुलाबचंद और निर्मला के व्यवहार से इतना प्रभावित हुए थे कि आननफानन में रिश्ते के लिए ‘हां’ कर दी थी.

रूपा भी साधारण तौर पर नापसंद करने लायक नहीं थी. साफ रंग, छरहरा शरीर, नैननक्श भी ठीक ही थे. उस समय वह बीए की परीक्षा की तैयारी कर रही थी. दिवाकर को भी पढ़ीलिखी लड़की की ही तलाश थी सो रूपा हर तरह से उन लोगों को जंच गई. मुकुल को भी पसंद आई.

शादी बिना दानदहेज के बड़ी धूमधाम से हुई. बाजेगाजे और पूरे वैवाहिक कार्यक्रम की वीडियोग्राफी  हुई. रूपा के ससुराल आने पर दिवाकर ने एक शानदार प्रीतिभोज का आयोजन किया था.

दिवाकर को इस रिश्ते के लिए सब से अधिक लड़की की मां के व्यवहार और उन्मुक्तता ने प्रभावित किया था. कसबे के माहौल में ऐसी गृहिणियां भी हो सकती हैं, दिवाकर की कल्पना में भी नहीं था. गुलाबचंद दब्बू किस्म के मर्द लगे पर ऐसा ही होता है. दब्बू किस्म के मर्दों की पत्नियां मुखर होती हैं.

लेकिन दिवाकर को निर्मला से इस तरह से बातचीत या ऐसे तेवर की उम्मीद नहीं थी.

पिछले 2 महीने से नाराज हो कर आने के बाद रूपा मायके में थी. दिवाकर ने सोचा था पटना का अपना काम निबटाने के बाद समधी से मिल कर रूपा की विदाई के बारे में बात कर लेंगे. सीधे लौट जाने पर गुलाबचंद और निर्मला को बुरा लगने वाली बात होती. लेकिन समधिन के तीखे स्वर और तीखी बातों ने दिवाकर को बेचैन कर दिया. असहजता महसूस करते हुए बोले, ‘‘क्या कह रही हैं आप, समधिनजी?’’

‘‘मैं ठीक कह रही हूं दिवाकरजी,’’ निर्मला बोली, ‘‘आप ने मेरी बेटी को ले जा कर पिंजरे में बंद कर दिया. ऊपर से कई तरह की पाबंदियां कि यह मत करो, वैसा मत पहनो, ऐसे मत खाओ, उधर मत जाओ. वह क्या जानवर है जो गाय समझ कर गोशाला में खूंटे से बांध दी? इस पर हमें ही दोषी ठहराते हैं कि बच्चों पर हमारा कंट्रोल नहीं है.’’

दिवाकर को अब समझ में आया कि समधिन का गुस्सा उन की उस बात पर है जो उन्होंने गुलाबचंद से, जब वह रूपा को लाने गए थे, कही थी.

शादी के बाद ससुराल आई रूपा की चालढाल और व्यवहार से दिवाकर संतुष्ट नहीं थे. रूपा घर के अदब व कायदों को मानने को राजी नहीं थी. वह उसे बंदिश लगते थे. दिवाकर रूढि़वादी नहीं थे परंतु अमर्या- दित आजादी और खुलापन उन्हें पसंद नहीं था.

मुकुल की मां की सोच बहू के बारे में पारंपरिक थी. बहू सुशील और मृदुभाषी हो. घरगृहस्थी का काम जाने, बड़ों का सम्मान करे, हमेशा हंसती- मुसकराती रहे और अपने व्यवहार से घर में खुशियां बिखेरे.

रूपा उन की बहू की उस तसवीर से बिलकुल अलग थी. वह देर रात तक टीवी पर सिनेमा व धारावाहिक देखती. देर से सो कर उठती. उठने के बाद उसे बेड टी चाहिए थी. रसोई का नाम सुनते ही उस का सिर दर्द करने लगता. वह सिर्फ मुकुल को अपना समझती थी. घर के बाकी किसी सदस्य से उसे कोई मतलब नहीं था.

दिवाकर ने रूपा को बेटी की तरह मानते हुए हर तरह से समझाने की कोशिश की कि बेटी, यह तुम्हारा घर है, तुम इस घर की बड़ी बहू हो. घर की जिम्मेदारियों को समझो. लेकिन रूपा में जरा भी परिवर्तन नहीं हुआ. दिवाकर को लगा कि उन्होंने निर्मला की बाहरी चमक से प्रभावित हो कर भारी भूल की, भीतर झांक कर तह तक जाने का प्रयास नहीं किया.

फिर भी दिवाकर को विश्वास था कि रूपा समय के साथ धीरेधीरे इन बातों और अपनी जिम्मेदारियों को समझने लगेगी. आखिर बच्ची ही तो थी. उस से इतनी जल्दी प्रौढ़ता की उम्मीद करना भूल होगी. फिर जिस घर में उन्मुक्तता का वातावरण हो और जहां मातापिता ने अपनी संतानों को जिम्मेदारियों का पाठ न पढ़ाया हो, बेटियों को बेटी और बहू का अंतर न समझाया हो वहां ऐसा होना बहुत स्वाभाविक है. इस में दोष रूपा का नहीं उस के मातापिता का है.

इसी बीच एक घटना घट गई. रूपा के छोटे भाई राजेश ने मां के डांटने पर अपने कपड़ों पर तेल छिड़क कर आग लगा ली थी. सतर्कता के कारण वह बच गया लेकिन यह भयंकर हादसा हो सकता था.

गुलाबचंद रूपा को लेने आए तो बातों ही बातों में दिवाकर कह बैठे, ‘‘भाई साहब बुरा मत मानिएगा, आप के घर में बच्चों पर आप का नियंत्रण नहीं है.’’

असल में दिवाकर का इशारा रूपा की ओर था जिसे समझा कर वह हार चुके थे और हर तरह का प्रयत्न कर के भी परिवार की धारा में नहीं ला पा रहे थे.

यह बात गुलाबचंद निर्मला को कह देंगे और वह इस का इतना बुरा मान जाएंगी दिवाकर ने सोचा भी नहीं था. लेकिन निर्मला ने जब तेवर और तैश से इसे दोहराया तो जैसे दिवाकर का आत्मसम्मान जाग उठा. क्षण भर को यही खयाल जागा कि यह औरत उन्हें भी गुलाबचंद समझती है क्या. गुलाबचंद उस की धौंस सह सकते हैं. उन पर क्यों धौंस जमाएगी यह औरत?

विवाद वहीं उत्पन्न होता है जहां व्यक्ति सीमा रेखा का उल्लंघन करता है. दिवाकर को लगा निर्मला अपनी पारिवारिक सीमा लांघ कर उन की पारिवारिक व्यवस्था में दखल देने की ज्यादती कर रही है. वह बोल उठे, ‘‘सचमुच आप के घर में किसी पर किसी का नियंत्रण नहीं है. सभी अपने मन के हैं. बड़ों की इज्जत की किसी को परवा नहीं है. राजेश ने आग लगा ली. गनीमत थी सिर्फ थोड़ा सा पैर जला. बड़ा हादसा हो जाता तो क्या होता?’’

दिवाकर ने यह भी समझाने के लिए कहा था परंतु निर्मला को यह बात उस की सत्ता को चुनौती और व्यंग्य सी लगी. वह तिलमिला उठी.

उसी समय गुलाबचंद वहां आ गए. दिवाकर ने गुलाबचंद से कहा, ‘‘भाई साहब, मैं पटना अपने किसी काम से आया था तो आप लोगों से मिलने भी चला आया. रूपा को आए 2 महीने हो गए हैं. आप कब उसे विदा करेंगे?’’

‘‘यह क्या बोलेंगे?’’ निर्मला तमतमाए स्वर में बोली, ‘‘मैं कह चुकी हूं कि मेरी बेटी अब उस घर में कभी नहीं जाएगी.’’

‘‘आप एक बात भूल रही हैं, समधिनजी,’’ दिवाकर कुरसी छोड़ कर खड़े हो गए और समझाते हुए बोले, ‘‘रूपा अब हमारे घर की बहू है. उस पर आप का नहीं, हमारा हक बनता है. आप अपने अहं को बेटी के भविष्य से जोड़ कर अच्छा नहीं कर रही हैं. ठंडे दिमाग से सोच कर देखिएगा. मैं जा रहा हूं लेकिन अब मैं या मुकुल रूपा को विदा कराने नहीं आएंगे. आप लोगों की इच्छा होगी तो बेटी भेज दीजिएगा या फिर सारी जिंदगी अपने घर पर ही रखे रहिएगा.’’

निर्मला ने चीख कर कहा, ‘‘हां, हम उसे सारी जिंदगी रखेंगे पर आप के घर कभी नहीं भेजेंगे.’’

दिवाकर निर्मला की बात सुनते हुए भी अनसुनी कर बाहर निकल गए.

दिवाकर के जाने के बाद निर्मला थके हुए योद्धा की तरह धम से सोफे पर बैठ गई. उसे लगा कि दिवाकर नाम के इस मर्द का दर्प आज उस ने चूर कर दिया है पर दूसरे ही पल ऐसा महसूस हुआ कि नहीं, इस जंग में वह जीत नहीं सकी. और इस के लिए गुलाबचंद को दोषी मानते हुए वह उन पर बरस पड़ी, ‘‘दिवाकर इतनी बड़ीबड़ी बातें कह गए और आप को कुछ बोलते नहीं बना?’’

‘‘मैं क्या कहता? तुम तो बोल ही रही थीं,’’ गुलाबचंद ने सफाई दी.

‘‘आप मर्द हैं या माटी का लोंदा? वह आदमी आप की पत्नी का अपमान कर गया और आप चुपचाप उस का चेहरा देखते रहे.’’

गुलाबचंद ने देखा कि निर्मला बहुत नाराज है और अपनी आदत के अनुसार जो भी उस के सामने पड़ेगा उसी पर झल्लाएगी, इसलिए वहां से हट जाना ही उचित समझा.

गुलाबचंद के जाने के बाद निर्मला ने तेज स्वर में रूपा को आवाज दी, ‘‘रूपा…’’

‘‘आई, मम्मी…’’ के साथ ही रूपा बगल के कमरे से निकल कर सामने आ गई.

निर्मला ने सीधे रूपा की ओर देखा. उस की मांग में सिंदूर भरा हुआ था. वह गुस्से में तिलमिला कर बोली, ‘‘मैं ने तुझे सिंदूर लगाने को मना किया है न, तू मानती क्यों नहीं?  जा, जा कर सिंदूर धो दे.’’

रूपा वहां से चली आई.

रूपा पसोपेश में थी, क्या करे, क्या न करे. इस बार सास और पति से झगड़ कर गुस्से में आई थी. मम्मी को रोरो कर उस ने सारा हाल बताया था और यह भी कहा था कि वह उस घर में नहीं जाना चाहती. मम्मी ने भी कहा था वह उस घर में नहीं जाएगी और उन्होंने सिंदूर लगाने को मना किया था. रूपा ने तब मम्मी के कहने पर सिंदूर पोंछ दिया था पर बालों में कंघा करते वक्त अनायास ही उस के हाथ सिंदूर की डिबिया और मांग तक पहुंच जाते.

रूपा अभी ऊहापोह में ही थी कि उसे अपनी छोटी बहन गुडि़या की आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘क्या चिंता कर रही हो, दीदी? मम्मी ने कहा है मांग का सिंदूर धो दो तो धो डालो. तुम भी तो यही चाहती हो.’’

गुडि़या, रूपा की तरह उन्मुक्त और लापरवा नहीं बल्कि गंभीर प्रवृत्ति की थी. 12वीं कक्षा में पढ़ती थी. पापा से बहुत कम ही बातें करती थी. हां, छोटे भाइयों से बहुत स्नेह रखती थी.

रूपा ने कहा, ‘‘मैं तय नहीं कर पा रही हूं गुडि़या कि इस समय मुझे क्या करना चाहिए.’’

‘‘क्यों?’’ गुडि़या ने करीब आ कर कहा, ‘‘तुम्हारा तो उस घर में दम घुटता है. उस घर के सभी लोग तुम पर अत्याचार करते हैं. तुम पर तरहतरह की बंदिशें लगाते हैं. वह घर है या जेलखाना. बचपन से मम्मी से आजादी का पाठ पढ़ा है तुम ने. फिर तुम उस जेलखाने में कैसे रह सकती हो?’’

‘‘जेलखाना तो सचमुच ही है परंतु…’’

‘‘परंतु क्या, दीदी?’’ गुडि़या ने रूपा की बात को बीच में काटते हुए कहा, ‘‘यही मौका है. बंधन तोड़ कर बाहर निकल आओ और आजाद पंछी की तरह घूमो. इस सिंदूर में क्या रखा है? शादी तो एक धोखा है, पवित्र धोखा. आत्मा के बंधन के नाम पर धोखा. असल में यह औरतों को मर्दों का गुलाम बनाने का फंदा है. है न दीदी?’’

‘‘तुम ठीक कह रही हो, गुडि़या,’’ रूपा को लगा गुडि़या उस का समर्थन कर रही है पर अगले ही पल गुडि़या का जवाब सुन कर वह चकरा गई.

‘‘मेरी बात मानोगी, दीदी. तुम अभी ही ससुराल वापस चली जाओ. वही तुम्हारा घर है. हम बेटियों के लिए मांबाप का घर शादी के पहले तक ही होता है, शादी के बाद ससुराल ही हमारा अपना घर होता है. तुम अपने आसपास देखो, कहीं दिखाई पड़ता है ऐसा कि शादी के बाद बेटी पिता के घर पर रह रही है.’’

रूपा को कुछ उत्तर देते न बना.

‘‘सच तो यह है दीदी कि मम्मी तुम्हारे कष्टों के लिए यह रिश्ता नहीं तोड़ रहीं, अपने अहं की तुष्टि के लिए तोड़ रही हैं. उन्हें आप के ससुर का कहना बुरा लगा है. मम्मी को तो तुम जानती ही हो और मैं भी. जरा सोचो दीदी, रिश्ता टूटने से उन का क्या बिगड़ेगा? लड़के वाले हैं. जीजाजी की दूसरी शादी हो जाएगी पर तुम्हारा क्या होगा? तुम्हें शादी के बंधन में नहीं बंधना हो तो अलग बात है. वरना परित्यक्ता का दाग तो लग ही जाएगा. फिर मुकुल जीजाजी या उन के घर वाले जालिम हैं ऐसा तो नहीं लगता और मैं भी तो तुम्हारे ससुराल हो आई हूं.’’

‘‘मुझे उन की पाबंदियों वाली बातें बरदाश्त नहीं होतीं,’’ रूपा ने अपना पक्ष रखने की नीयत से कहा.

‘‘ठीक है, तुम्हें उन की नसीहत, उन की सीख अच्छी नहीं लगती. और इसी को तुम ने अत्याचार का नाम दे कर बारबार मम्मी से शिकायत की है लेकिन जब मम्मी डांटती हैं तो कैसे बरदाश्त कर लेती हो?’’

‘‘तुम कहना चाहती हो गुडि़या, मुझे ससुराल लौट जाना चाहिए?’’

‘‘हां, दीदी, इसी में हम सब की भलाई है,’’ गुडि़या ने कहा, ‘‘इस से तुम्हारी इज्जत और जिंदगी बर्बाद होने से बच जाएगी. दोनों परिवारों की इज्जत रह जाएगी. यदि ऐसा नहीं हुआ तो मेरी शादी नहीं हो पाएगी.’’

‘‘वह कैसे?’’ रूपा ने विस्मय से पूछा.

‘‘जिस परिवार की बेटी साधारण समस्याओं के लिए पति और ससुराल छोड़ कर पिता के घर में बैठी हो उस परिवार में कौन रिश्ता जोड़ने आएगा?’’ गुडि़या ने कहा.

‘‘लेकिन मम्मी…’’

‘‘मम्मी की परवा मत करो, दीदी, तुम अपना भविष्य देखो. मम्मी भी तो किसी घर की बेटी हैं. वह क्यों नहीं रहीं अपने मायके में जो तुम्हारी ससुराल छुड़ाना चाहती हैं.’’

रूपा ने आश्चर्य से गुडि़या को देखा कि इतनी छोटी सी लड़की और इतनी समझदारी, इतना ज्ञान कहां से आया उस के पास.

‘‘एक बात तुम्हें और बताती हूं, दीदी, लड़का हो या लड़की, उम्र के साथ जिम्मेदारियां भी बदलती हैं और उसी के साथ विचार भी. आज मम्मी जींस पहनें तो अच्छा लगेगा? बोलो न, अच्छा लगेगा?’’

रूपा ने तात्पर्य न समझते हुए भी कहा, ‘‘नहीं.’’

‘‘ठीक उसी तरह बहू के लिबास में मर्यादा की मांग की जाए तो बुरा क्यों लगना चाहिए? तुम तो सलवारकमीज ही पहनती रहीं. मुझे जींस पसंद है परंतु शादी के बाद बहू की मर्यादा वाला लिबास ही पहनूंगी.’’

गुडि़या और भी कुछ कहती पर रूपा अपने भीतर चल रहे मंथन में डूब गई.

अगली सुबह रूपा मम्मी के सामने आई तो निर्मला ने अवाक् हो कर उसे देखा. वह ससुराल की साड़ी पहने और शृंगार किए हुए थी. मांग में सिंदूर दमक रहा था. निर्मला चीख उठी, ‘‘यह क्या किया तू ने? मैं ने तुझे सिंदूर धो देने को कहा था.’’

‘‘पति के जीवित रहते सिंदूर नहीं धो सकती,’’  रूपा ने साहस कर के कहा.

‘‘कौन पति? कैसा पति?  मर गया तेरा पति.’’

‘‘मम्मी, ऐसा मत कहिए. मैं ससुराल जाने के लिए आप से अनुमति लेने आई  हूं.’’

‘‘क्या? ससुराल जाएगी. दिमाग फिर गया है तेरा?’’

‘‘दिमाग तो पहले फिरा हुआ था, मम्मी,’’ बगल के कमरे से निकल कर गुडि़या सामने आ गई, ‘‘तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि दीदी अपने घर जा रही हैं. इस के साथ ही महीनों से चला आ रहा दोनों परिवारों के बीच का तनाव खत्म हो जाएगा.’’

‘‘तू चुप रह, बड़ी समझदार हो गई है. मेरी कोख से जन्मी मुझी को सबक सिखा रही है,’’ निर्मला गरजीं.

‘‘तुम चाहे जितना बिगड़ लो, मम्मी, दीदी अब यहां नहीं रहेंगी, अपनी ससुराल जाएंगी, आज और अभी.’’

‘‘देखती हूं कौन ले जाता है इसे,’’ निर्मला चीखीं.

‘‘पापा ले कर जाएंगे, और यदि पापा नहीं ले गए तो मैं दीदी को छोड़ कर आऊंगी.’’

निर्मला अपना गुस्सा नहीं रोक सकी. उठ कर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया गुडि़या के गाल पर. फिर उस की गरदन पकड़ कर झकझोरने लगी, ‘‘नालायक, मुझे जवाब देती है.’’

रूपा गुडि़या को छुड़ा कर निर्मला के सामने सीधी खड़ी हो गई. उस की आंखों में आज तेज था. निर्मला की आंखों में देखते हुए बोली, ‘‘बस कीजिए, मम्मी. हद हो गई. मैं बच्ची नहीं बालिग हूं. अपने बारे में सोचनेसमझने और फैसला लेने का मुझे पूरा हक है. मैं ने ससुराल वापस जाने का फै सला कर लिया है और जाऊंगी ही. मुझे कोई नहीं रोक सकता.’’

निर्मला गश खा कर धम से सोफे पर बैठ गई. कल दिवाकर के साथ बहस की जंग में जीती थी या हारी थी, ठीकठीक नहीं मालूम पर आज अपनी सत्ता और अहं के युद्ध में पूरी तरह परास्त हो गई थी वह. Hindi Family Story :

Hindi Kahani : इंसानियत का तकाजा – डर को इंसानियत पर हावी न होने देती महिला की कहानी

Hindi Kahani : सुबह व्यस्तताओं में गर्त हो कर उगते सूरज से नजरें चुरा रही थी. सिंदूरी सुबह अपने चढ़ते यौवन की ओर छवि को आकर्षित करती रही, लेकिन अपने प्रेमी मन के बावजूद उस के हाथ नाश्ते को सरंजाम देने  में लगे रहे. बैकयार्ड में बने छोटे से झरने का कलरव और वहां पानी पीती व जलक्रीड़ा करतीं चिड़ियों के सुरीले सुरों के पार छवि के कान बैडरूम में सोती ढाई साल की सिया पर लगे थे. सिया की एकएक करवट पर ध्यान धरे छवि बीचबीच में मुसकरा कर एक नज़र अपने किचन की खिड़की से झांकती सूरज की उस किरण पर भी डाल लेती जो शरारती बच्चे सी उस के चेहरे से अठखेलियां कर रही थी.

जुलाईअगस्त ही साल के वो महीने होते हैं जब कनाडा के इस ठंडेतरीन शहर कैलगरी में सूरज की किरणें गरमाहट के कुछ दिनों का तोहफा इस शहर की झोली में भी डाल देती हैं जब यहां भी खिड़कीदरवाजे खोल कर रखे जा सकते हैं और खुली फिजा का आनंद लिया जा सकता है. वरना, यह शहर ज्यादातर बर्फ की सफेद चादर में लिपटा ही रहता है.

रजत को औफिस भेज कर छवि ने अपने लिए चाय का पानी गैस पर रखा ही था कि सिया की  कुनमुनाने की आवाज उस के कानों में पड़ी. गैस मंदी कर के वह बैडरूम की तरफ जाती सीढ़ियों की ओर बढ़ी, तभी दरवाजे की घंटी बज उठी.

सीढ़ियों के बीचोंबीच खड़ी वह बड़बड़ाई-

‘सुबहसुबह कौन आ गया? यहां तो बिना फोन किए कोई नहीं आता. जरूर ये क्रिश्चियनिटी वाले होंगे या फिर चैरिटी वाले’ और जल्दी से सिया को गोद में उठा कर दरवाजे की ओर लपकी.

दरवाजा खोलने पर उस ने आठनौ साल की बच्ची का हाथ थामे एक ब्लैक (अफ्रीकन मूल की) महिला    को सामने खड़े पाया.

उस लंबीतगड़ी महिला को सामने खड़ी देख छवि थोड़ा सावधान हो गई और उसे पिछले हफ्ते अपनी सहेली से हुई बात याद हो आई, जिस ने बताया था कि- आजकल शहर में ब्लैक औरतों का कोई गैंग आया हुआ है. उस कि सदस्य सड़कों पर रास्ता पूछने के बहाने औरतों को रोकती हैं और चैन, ईयररिंग आदि खींच कर भाग जाती हैं. घरों में भी सेल्सवुमन बन कर या किसी और बहाने से घुस जाती हैं और औरत को अकेली पा कर उस पर अटैक कर देती हैं व ज्वैलरी, कैश आदि ले भागती हैं और ये सभी घटनाएं भारतीय मूल की महिलाओं के साथ ही ज्यादा घट रही हैं.

‘भारतीय ही क्यों?’ छवि ने पूछा था.

‘तो बाइस कैरेट गोल्ड ज्वैलरी और कौन पहनता है यहां? हम ही लोग न. और हमारे ही घरों में ज्यादा ज्वैलरी मिल भी जाती है. वरना व्हाइट लोग तो चौदह कैरेट से आगे बढ़ते नहीं. फिर वैडिंग रिंग और ज्यादा से ज्यादा चैन के इलावा इन के पास गोल्ड होता भी नहीं है.

इस बातचीत के याद आते ही छवि ने “हमें कुछ नहीं चाहिए” कहते हुए दरवाजा बंद कर लिया. बंद होते  दरवाजे से छवि को उस स्त्री की आवाज सुनाई दी-

“अरे नहींनहीं, मैं कोई सेल्सपर्सन नहीं हूं. मुझे तो अपनी बेटी को उस का घर दिखाना था.”

बेटी को उस का घर. क्या मतलब है इस बात का, छवि ने सोचा और दरवाजे पर चैन चढ़ा कर पूछा-

“कौन सा घर दिखाना है और क्यों?” जरा से खुले दरवाजे के सामने आ कर वह बोली.

“मेरा नाम बरा है और ये मेरी बेटी ली है. क्या मैं आप से दो मिनट बात कर सकती हूं?” वह महिला बड़े नरम और सभ्य लहज़े में बोली.

“कहिए,” उस ने  बिना दरवाजा खोले, चैन लगे दरवाजे की झिरी से झांक कर बेज़ारी से कहा.

“जी, आप से पहले हम लोग इस घर में रहते थे. ली इसी घर में पैदा हुई थी. यहीं उस ने अपना पहला कदम रखा और यहीं अपना पहला शब्द बोला था. हम यहां से गुजर रहे थे तो मैं ने ली को ये सब बातें बताई. सब जानने पर उस ने घर में वह जगह देखने की इच्छा जाहिर की जहां उस ने अपना पहला कदम रखा, जिस फर्श पर वह घुटनों के बल चली थी, पहली चोट खाई थी और जहां उस ने पहली बार मोम बोला था.”

सिया को गोदी में उठाए वह एक तरफ ली की आंखों से झांकती मासूम जिज्ञासा को देख रही थी तो दूसरी ओर अपने हलकेफुलके 50 किलो के वजूद और अपनी नन्ही सी सिया को. सामने खड़ी उस 6 फुट की हट्टीकट्टी महिला को देख कर और अपनी सहेली की बात को याद कर छवि सोच में पड़ी रही.

उस की आंखों से झांकती शंका और असमंजसता को समझते हुए बरा ने कहा–

“मैं समझती हूं, आप को हमें अंदर आने देना ठीक नहीं लग रहा होगा. कोई बात नहीं, लेकिन यदि आप दरवाजा खोल देतीं तो मैं यहीं बाहर से ही ली को घर दिखा देती.”

अब दरवाजा खोलने की बात पर उस की शंका फिर सिर उठाने लगी. उस के अंदर बैठा कोई कह रहा था- ‘तू अपनी तरफ देख, मुश्किल से 5 फुट की है. 50 किलो भी वज़न नहीं है तेरा. इस का एक घूंसा तुझे रास्ते से ही नहीं, इस दुनिया से भी हटा सकता है. फिर सिया कि भी तो सोच’.

बरा की बातों से झांकती ममता को नज़रअंदाज कर के उस ने “सौरी” बोलते हुए दरवाजा बंद कर लिया.

असमंजसता अभी तक उस के दिलदिमाग पर छाई थी. क्या उस ने सही किया?

अपना और सिया का नाश्ता लगा कर वे दोनों नाश्ता करने बैठे, तो सिया अपनी तोतली ज़बान में पूछ बैठी, “ममा, आनती को अंदर क्यों नहीं बुलाया? आप तो हर आनती को चाय पिलाती हो न?”

“हां बेटा, पिलाती तो हूं,” वह शर्मिंदगी से बोली.

“मम्मा, इछ आनती के छात तो दीदी बी आई थी. मम्मा मुझे दीदी के छात खेलना है. दीदी को बुलाओ न.”

उस की सारी समझदारी सिया के इन मासूम सवालों के सामने सिर झुकाए खड़ी थी. वह सोच रही थी कि ‘एक इंसान दूसरे से इतना भयभीत क्यों है? आज भी संसार में अच्छे लोगों की संख्या बुरों से बहुत ज्यादा हैं, फिर भी हम सब में बुराई को ही पहले देखते हैं. क्या बुराई का साम्राज्य बुरे लोगों के कारण आबाद है या हम शरीफ़ों में बैठे डर के कारण? इस डर और दहशत में दबे मातापिता क्या कभी बच्चों को सिखा पाएंगे कि निडर बनो.’

छवि और उस का पति रजत शादी के एक साल बाद ही यहां कनाडा के कैलगरी शहर में रहने आ गए थे और अभी 4 वर्षों पहले ही उन्होंने यह घर खरीदा था. सिया इसी घर में पैदा हुई. छवि की प्रैगनैंसी का एकएक पल, सिया को इस घर में पहली बार ले कर आने का दिन, उस की एकएक हरकत, एकएक शरारत का यह घर उतना ही साक्षी रहा है जितना कि वह खुद और रजत.

यह इस परदेस में उन का पहला आशियाना है. इस को सजानेसंवारने में उस ने अपनी जेब से ज्यादा अपनी भावनाएं खर्च की हैं.

हर जगह उन की यादें बिखरी पड़ी हैं. हर चीज के पीछे एक कहानी है. उन की सिया का इस दुनिया में यह पहला घर है.

तो क्या यही भावनाएं, यही लगाव बरा और ली का भी होगा इस घर के लिए?

तो क्या बरा सच बोल रही थी? क्या पता. यों भी इस देश में प्रौपर्टी की खरीदबेच रियलेटर के द्वारा ही की जाती है. खरीदने और बेचने वाले का कभी एकदूसरे से पाला ही नहीं पड़ता.

छवि अपने दिल और दिमाग के बीच चलते सवालजवाबों के झंझावात से जूझ रही थी. कभी रजत की हिदायतें याद आतीं तो कभी सहेली की बातें.

फिर वह सिया की ओर देखती जो मासूम से सवाल अपनी आंखों में लिए अभी भी उस की ओर देखते हुए कह रही थी- “मम्मा, दीदी को बुलाओ न.”

क्या करूं, खोल दूं दरवाजा? वैसे भी वह बाहर से ही तो देखना चाहती है. बाहर से भला क्या बिगाड़ लेगी. मैं भी सिया को ले कर बाहर ही खड़ी हो जाऊंगी’. यह सोचते हुए उस ने दरवाजा खोल दिया. लेकिन बरा और ली वहां नहीं थीं. वह दौड़ कर बाहर आई और सामने बिछी सड़क पर इधरउधर नजरें दौडाने लगी. तभी उस ने अपने घर को निहारते हुए 2 जोड़ी कदमों को धीरेधीरे जाते देखा. वे कदम जो चल तो आगे रहे थे, लेकिन बढ़ पीछे रहे थे.

छवि ने उन्हे आवाज दी और इशारे से बुलाया. उस का इशारा पाते ही बरा और ली, दोनों तेजी से वापस आ गईं.

उस ने अपने घर का दरवाजा पूरा खोल दिया और बरा बाहर से ही ली को ड्राइंगरूम दिखाते हुए बताने लगी- “ली. तुम ने अपना पहला कदम इस जगह पर रखा था और एक बार स्क्रौल करते हुए तुम मेरे पीछे पीछे यहां तक आ गई थी (उस ने मेन गेट के तुरंत बाद वाली जगह की ओर इशारा किया जहां फर्श का लैवल थोड़ा लो था) और जोर से गिर पड़ी थी. यह जो दीवारों पर येलो कलर है न, यह भी तुम्हारी पसंद का है. मैं ने खुद पेंट किया था.”

मैं सिया को गोद में लिए वहीं खड़ी उन की बातें सुन रही थी और उन के चेहरे पर आतेजाते अनगिनत भावों को देखते हुए उन के उस घर में रहनेसहने, घूमनेफिरने की कल्पना कर रही थी. अचानक बरा पूछ बैठी- “क्या ऊपर के राइट साइड के बैडरूम का पिंक कलर और लेफ्ट साइड के बैडरूम का ब्लू कलर भी वैसा ही है या आप ने बदल दिया है?”

“जी, जी हां,” मैं जैसे सोते से जागी, “हां, वैसा ही है. ब्लू को हम ने गेस्टरूम बनाया है. पिंक सिया को पसंद है, इसलिए वह उस का रूम है.”

“रिएली, सिया को भी पिंक पसंद है? ली का भी फेवरेट कलर पिंक ही है. इसीलिए हम ने उस का रूम खुद पिंक पेंट किया था,” वह खुशी से बोली और एक लंबी सांस खींच कर उस ने ऊपर की ओर नजर दौड़ाई. लेकिन घर का डिजाइन कुछ ऐसा था कि नीचे खड़े हो कर ऊपर के रूम्स देखना असंभव था. ली की एड़ी पर उचकउचक कर अपना बैडरूम देखने की असफल कोशिश जारी थी.

उन की आंखों से झांकती जिज्ञासा और उत्सुकता देख एक पल को छवि के अंदर जैसे कुछ बदल सा  गया, जैसे इंसानियत ने डर को हरा दिया, जैसे शंका का स्थान विश्वास ने ले लिया.

अचानक अपनी गोद में सिया को उठाए वह अंदर दाखिल हुई और पूरे आत्मविश्वास के साथ बोली-

“इट्स ओके, बरा एंड ली. तुम दोनों अंदर आ कर घर देख सकती हो.”

“आर यू श्योर?” वे दोनों आंखों में आश्चर्य और चेहरे पर खुशी छलकाती हुई पूछ रही थीं.

“यस, आई एम श्योर”. जैसे अंदर बैठा कोई कह रहा था डर को इंसानियत पर हावी मत होने दो, छवि, इंसान हो, इंसानियत को समझो.

कानों तक खिंची मुसकराहट लिए दोनों ने उस के घर में प्रवेश किया और अपने घर के कोनेकोने में घूमघूम कर अपनी झोली को पुरानी यादों से मालामाल कर लिया. छवि के आग्रह पर एकएक जूस का गिलास पिया और आंखों में आंसू लिए उस के गले लग कर बरा बोली– “यू इंडियंस आर वन्डरफुल एंड बिग हर्टेड पीपल. मैं ने इतने बड़े दिल और इतने खुले दिल वाले लोग पहले कभी नहीं देखे. मैं आप को कभी नहीं भूलूंगी. मेरी बेटी का जो बचपन यहां बीता था उस में आप की उदारता ने अनमोल इज़ाफ़ा कर के उसे अविस्मरणीय बना दिया. आप की बेटी का जीवन खुशियों से और साथ आप जैसे लोगों से भरा रहे.

सिया के लिए ढेर सारे आशीर्वाद बरसाती उन आंखों में मुझे एक बहुत प्यारी सी दोस्त नज़र आई और मैं ने उस से विदा ले कर, मुसकराते हुए शान से अपनी प्रिंसैस की ओर देखा जिस के चेहरे पर एक नई दीदी के मिलने की धूप खिली थी. Hindi Kahani :

Hindi Family Story : नहले पे दहला – पूर्णिमा क्यों मनु को सबक सिखाना चाहती थी ?

Hindi Family Story : पूर्णिमा तुझे मनु याद है?’’ मां ने खुशी से पूछा.

‘‘हां,’’ और फिर मन ही मन बोली कि अपने बचपन के उस इकलौते मित्र को कैसे भूल सकती हूं मां, जिस के जाने के बाद किसी और से दोस्ती करने को मन ही नहीं किया.

‘‘मनु वापस आ रहा है… किसी बड़ी कंपनी का मैनेजर बन कर…’’

‘‘मनु ही नहीं राघव और जया भाभी भी आ रहे हैं,’’ पापा ने उत्साह से मां की बात काटी.

‘‘मैं ने तो राघव से फोन पर कह दिया है कि जब तक आप का अपना घर पूरी तरह सुव्यवस्थित नहीं हो जाता तब तक रहना और खाना हमारे साथ ही होगा.’’

‘‘तो उन्होंने क्या कहा?’’

‘‘कहा कि इस में कहने की क्या जरूरत है? वह तो होगा ही. बिलकुल नहीं बदले दोनों मियांबीवी. और मनु भी पीछे से कह रहा था कि पूर्णिमा से पूछो कुछ लाना तो नहीं है. तब भाभी ने उसे डांट दिया कि पूछ कर कभी कुछ ले कर जाते हैं क्या? बिलकुल उसी तरह जैसे बचपन में डांटा करती थीं.’’

‘‘और मनु ने सुन लिया?’’ पूर्णिमा ने खिलखिला कर पूछा.

‘‘सुना ही होगा, तभी तो डांट रही थीं और इन सब संस्कारों की वजह से उस ने यहां की पोस्टिंग ली है वरना अमेरिका जा कर कौन वापस आता है,’’ पापा ने सराहना के स्वर में कहा. यह सुन कर पूर्णिमा खुशी से झूम उठी. बराबर के घर में रहने वाले परिवार से पूर्णिमा के परिवार का रातदिन का उठनाबैठना था. वह और मनु तो सिर्फ सोने के समय ही अलग होते थे वरना स्कूल जाने से ले कर खेलना, होमवर्क करना या घूमने जाना इकट्ठे ही होता था. आसपास और बच्चे भी थे, लेकिन ये दोनों उन के साथ नहीं खेलते थे. फिर अचानक राघव को अमेरिका जाने का मौका मिल गया. जाते हुए दुखी तो सभी थे, मगर कह रहे थे कि जल्दी लौट आएंगे पी.एचडी. पूरी होते ही. मौका लगा तो बीच में भी एक चक्कर लगा लेंगे.

लेकिन 20 बरसों में आज पहली बार लौटने की बात की थी. उस समय संपर्क साधन आज की तरह विकसित और सुलभ नहीं थे. शुरूशुरू में राघव फोन किया करते थे. नई जगह की मुश्किलें बताते थे यह भी बताते रहते कि जया और मनु लता भाभी और पूर्णिमा को बहुत याद करते हैं. लेकिन नए परिवेश को अपनाने के चक्कर में धीरेधीरे पुराने संबंध कमजोर हो गए. 10 बरस पहले का दुबलापतला मनु अब सजीलारोबीला जवान बन गया था. वह पूर्णिमा को एकटक देख रहा था.

‘‘ऐसे क्या देख रहा है? पूर्णिमा ही है यह,’’ लता बोलीं.

‘‘यही तो यकीन नहीं हो रहा आंटी. मुझे समझ में नहीं आ रहा कि मुटल्ली पूर्णिमा इतनी पतली कैसे हो गई?’’

‘‘वह ऐसे कि तेरे साथ मैं हरदम खाती रहती थी. तेरे जाने के बाद उस गंदी आदत के छूटते ही मैं पतली हो गई,’’ पूर्णिमा चिढ़ कर बोली.

‘‘यानी मेरे जाने से तुझे फायदा हुआ.’’

‘‘सच कहूं मनु तो पूर्णिमा को वाकई फायदा हुआ,’’ महेश ने कहा, ‘‘तेरे जाने के बाद यह किसी और से दोस्ती नहीं कर सकी. किताबी कीड़ा बन गई, इसीलिए प्रथम प्रयास में आईआईएम अहमदाबाद में चुन ली गई और आज इन्फोटैक की सब से कम उम्र की वाइस प्रैजीडैंट है.’’

‘‘अरे वाह, शाबाश बेटा. वैसे महेश, फायदा मनु को भी हुआ. यह भी किसी से दोस्ती नहीं कर रहा था. भला हो सैंडी का… उस ने कभी इस की अवहेलना का बुरा नहीं माना और दोस्ती का हाथ बढ़ाए रखा. फिर उस के साथ यह भी सौफ्टवेयर इंजीनियर बन गया,’’ राघव बोले.

‘‘वरना इसे तो राघव अंकल की तरह काले कोट वाला वकील बनना था और मुझे भी वही बनाना था,’’ पूर्णिमा बोली. ‘‘अच्छा हुआ अंकल आप अमेरिका चले गए.’’ सब हंस पड़े. फिर लता बोलीं, ‘‘क्या अच्छा हुआ, यहां रहते तो तू आज तक कुंआरी नहीं होती.’’

‘‘वह तो है लता,’’ जया ने कहा, ‘‘खैर अब आ गए हैं तो हमारा पहला काम इसे दुलहन बनाने का होगा. क्यों मनु?’’

‘‘बिलकुल मम्मी, नेक काम में देर क्यों? चट मंगनी पट शादी रचवाओ ताकि भारतीय शादी देखने के लालच में सैंडी भी जल्दी आ जाए.’’

‘‘यही ठीक रहेगा. इसी बहाने सभी पुराने परिजनों से एकसाथ मिलना भी हो जाएगा,’’ राघव ने स्नेह से पूर्णिमा के सिर पर हाथ फेरा, ‘‘चल तैयार हो जा बिटिया, सूली पर झूलने को.’’

पूर्णिमा ने कहना तो चाहा कि सूली नहीं अंकल, मनु की बलिष्ठ बांहें कहिए. फिर धीरे से बोली, ‘‘अभी तो हम सब को इतने सालों की जमा पड़ी बातें करनी हैं अंकल… आप को यहां सुव्यवस्थित होना है, उस के बाद और कुछ करने की सोचेंगे.’’ ‘‘यह बात भी ठीक है, लेकिन बहू के आने से पहले उस की सुविधा और आराम की सही व्यवस्था भी तो होनी चाहिए यानी बहू के गृहप्रवेश से पहले घर भी तो ठीक हो. और भी बहुत काम हैं. तू नौकरी पर जाने से पहले मेरे कुछ काम करवा दे मनु,’’ जया ने कहा.

‘‘मुझे तो कल से ही नौकरी पर जाना है मम्मी पूर्णिमा से करवाओ जो करवाना है.’’

‘‘हां, पूर्णिमा तो बेकार बैठी है न. नौकरी पर तो बस मनु को ही जाना है,’’ पूर्णिमा ने मुंह बनाया, ‘‘मगर आप फिक्र मत करिए आंटी, आप को मैं कोई परेशानी नहीं होने दूंगी.’’

‘‘उस का तो सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि सब से बड़ी परेशानी तो पूर्णिमा आप स्वयं ही हैं,’’ मनु ने चिढ़ाया, ‘‘आप काम में लग जाइए, सारी परेशानी दूर हो जाएगी.’’

‘‘लो, हो गया शुरू मनु महाराज का अपने अधकचरे ज्ञान का बखान,’’ पूर्णिमा ने कृत्रिम हताशा से माथे पर हाथ मारा. यह देख सभी हंस पड़े.

‘‘इतने बरस एकदूसरे से लड़े बगैर दोनों ने खाना कैसे पचाया होगा? ’’ लता बोलीं.

‘‘सोचने की बात है, झगड़ता तो खैर सैंडी से भी हूं, लेकिन अंगरेजी में झगड़ कर वह मजा नहीं आता, जो अपनी भाषा में झगड़ कर आता है,’’ मनु कुछ सोचते हुए बोला.

पूर्णिमा को यह सुनना अच्छा लगा. मनु का लौटना ऐसा था जैसे पतझड़ और जाडे़ के बाद एकदम बहार का आ जाना और वह भी इतने बरसों के बाद. होस्टल में अपनी रूममैट को कई बार पढ़ते हुए भी गुनगुनाते सुन कर वह पूछा करती थी कि पढ़ाई के समय यह गानाबजाना कैसे सूझता है, सेजल? तो वह कहती थी कि जब तुम्हें किसी से प्यार हो जाएगा न तब तुम इस तरह गुनगुनाने लगोगी.

सेजल का कहना ठीक था, आज पूर्णिमा का मन गुनगुनाने को ही नहीं झूमझूम कर नाचने को भी कर रहा था. उस के बाद प्रत्यक्ष में तो किसी ने पूर्णिमा की शादी की बात नहीं की थी, लेकिन जबतब लता और महेश लौकर में रखे गहनों और एफडी वगैरह का लेखाजोखा करने लगे थे. राघव ने भी आर्किटैक्ट बुलाया था, छत की बरसाती तुड़वा कर बहूबेटे के लिए नए कमरे बनवाने को. मनु को नए परिवेश में काम संभालने में जो परेशानियां आ रही थीं, उन्हें मैनेजमैंट ऐक्सपर्ट पूर्णिमा बड़ी सहजता से हल कर देती थी. अब मनु हर छोटीबड़ी बात उस से पूछने लगा था. वह अपने काम के साथ ही मनु के काम की बातें भी इंटरनैट पर ढूंढ़ती रहती थी. एक शाम उस ने मनु को फोन किया कि उसे जो जानकारी चाहिए थी वह मिल गई है. अत: उस का विवरण सुन ले.

‘‘मैं औफिस से निकल चुका हूं पूर्णिमा, तुम भी आने वाली होंगी. अत: घर पर ही बात कर लेंगे,’’ मनु ने कहा.

‘‘मैं तो घंटे भर बाद निकलूंगी.’’

‘‘ठीक है, फिर मिलते हैं.’’

लेकिन जब वह 2 घंटे के बाद घर पहुंची तो मम्मीपापा और अंकलआंटी बातों में व्यस्त थे. मनु की गाड़ी कहीं नजर नहीं आ रही थी.

‘‘मनु कहां है?’’ पूर्णिमा ने पूछा.

‘‘अभी औफिस से नहीं आया,’’ सुनते ही पूर्णिमा चौंक पड़ी कि इतनी देर रास्ते में तो नहीं लग सकती, कहीं कोई दुर्घटना तो नहीं हो गई. मगर तभी मनु आ गया.

‘‘बड़ी देर कर दी आज आने में?’’ जया ने पूछा.

‘‘वह ऊपर के कमरों के ब्लू प्रिंट्स सैंडी को भेजे थे न… उस की टिप्पणी के साथ आर्किटैक्ट के पास गया था. वहीं देर लग गई. अब कल से काम शुरू हो जाएगा.’’

पूर्णिमा यह सुन कर हैरान हो गई कि जिसे उन कमरों में रहना है उसे तो ब्लू प्रिंट्स दिखाए नहीं और सैंडी को भेज दिए. फिर पूछा, ‘‘सैंडी आर्किटैक्ट है?’’

‘‘नहीं, मेरी ही तरह सौफ्टवेयर इंजीनियर है.’’

‘‘तो फिर उसे ब्लू प्रिंट्स क्यों भेजे?’’

‘‘क्योंकि उसे ही तो रहना है उन कमरों में.’’

‘‘उसे क्यों रहना है?’’ पूर्णिमा ने तुनक कर पूछा.

‘‘क्योंकि वही तो इस घर की बहू यानी मेरी बीवी है भई.’’

‘‘बीवी है तो साथ क्यों नहीं आई?’’ पूर्णिमा अभी भी इसे मनु का मजाक समझ रही थी.

‘‘क्योंकि वह जिस प्रोजैक्ट पर काम कर रही है उसे बीच में नही छोड़ सकती. काम पूरा होते ही आ जाएगी. तब तक ऊपर के कमरे भी बन जाएंगे और नए कमरों में बहू का गृहप्रवेश धूमधाम से करवाने की मम्मी की ख्वाहिश भी पूरी हो जाएगी.’’

पूर्णिमा को मनु के शब्द गरम सीसे की तरह जला गए. उस ने अपने मातापिता की तरफ देखा. वे भी हैरान थे. ‘‘कमाल है भाभी, सास बन गईं और हमें भनक भी नहीं लगी,’’ महेश ने उलहाने के स्वर में कहा.

‘‘यह कैसे हो सकता है महेश भैया…’’

‘‘हम अभी तक वर्षों पुरानी बातें करते रहे हैं,’’ राघव ने जया की बात काटी, ‘‘इस बीच खासकर अमेरिका में क्या हुआ, उस के बारे में हम ने बात ही नहीं की.’’

‘‘मगर मैं ने तो पहले दिन ही कहा था कि मुझे बहू के गृहप्रवेश से पहले घर ठीकठाक चाहिए.’’

‘‘हम ने समझा आप हमारी बेटी के लिए कह रही हैं,’’ लता ने मन ही मन बिसूरते हुए कहा.

‘‘विस्तार से इसलिए नहीं बताया कि बापबेटे ने मना किया था कि अमेरिका में क्या करते थे या क्या किया बता कर शान मत बघारना…’’

‘‘सफाईवफाई क्या देनी मम्मी, सब को अपनी शादी का वीडियो दिखा देता हूं लेकिन डिनर के बाद,’’ मनु ने बात काटी, ‘‘तू भी जल्दी से फ्रैश हो जा पूर्णिमा.’’

‘‘मुझे तो खाने के बाद कुछ जरूरी काम करना है. मम्मीपापा को दिखा दे. मुझे सीडी दे देना. फुरसत में देख लूंगी.’’

‘‘मेरी शादी की सीडी है पूर्णिमा तुम्हारे औफिस की फाइल नहीं, जिसे फुरसत में देख लोगी,’’ मनु ने चिढ़ कर कहा, ‘‘जब फुरसत हो आ जाना, दिखा दूंगा. चलो, मम्मी खाना लगाओ, भूख लग रही है.’’

पूर्णिमा के परिवार की तो भूख मर चुकी थी, लेकिन नौकर के कई बार कहने पर कि खाना तैयार है, सब जा कर डाइनिंग टेबल के पास बैठ गए.

तभी मनु आ गया, ‘‘ओह, आप खाना खा रहे हैं, मैं फिर आता हूं.’’

‘‘अब आया है तो बैठ जा, खाना हो चुका है,’’ पूर्णिमा बोली.

‘‘अभी किसी ने खाना शुरू नहीं किया और तू कह रही है कि हो चुका. खैर, खातेखाते जो सुनाना है सुना दे,’’ मनु पूर्णिमा की बगल की चेयर पर बैठ गया.

लता और महेश ने चौंक कर एकदूसरे की ओर देखा. ‘‘क्या सुनना चाहते हो?’’ लता स्वयं नहीं समझ सकीं कि उन के स्वर में व्यंग्य था या टीस.

‘‘वही जो सुनाने को पूर्णिमा ने मुझे फोन किया था.’’

‘‘ओह, राजसंस का फीडबैक? काफी दिलचस्प है और वह इसलिए कि उन्होंने अभी तक किसी राजनेता का संरक्षण लिए बगैर अपने दम पर इतनी तरक्की की है.’’

‘‘यानी उन के साथ काम किया जा सकता है?’’

‘‘उस के लिए उन लोगों के विवरण देखने होंगे जो उन के साथ काम कर रहे हैं. चल तुझे पूरी फाइल दिखा देती हूं,’’ पूर्णिमा ने प्लेट सरकाते हुए कहा.

‘‘पहले तू आराम से खाना खा. बगैर खाना खाए टेबल से नहीं उठते. वह फाइल मुझे मेल कर देना. अभी चलता हूं,’’ मनु ने उठते हुए कहा.

‘‘क्यों सैंडी को फोन करने की जल्दी है?’’ लता ने पूछा.

‘‘नहीं आंटी, सैंडी तो अभी औफिस में होगी. वह आजकल ज्यादातर समय औफिस में ही रहती है ताकि काम पूरा कर के जल्दी यहां आ सके. हमें भी ऊपर के कमरे बनवाने में जल्दी करनी चाहिए. पापा को अभी यही समझाने जा रहा हूं,’’ फिर सभी को गुडनाइट कह कर मनु चला गया.

‘‘यह तो ऐसे व्यवहार कर रहा है जैसे कुछ हुआ ही नहीं है,’’ लता ने मुंह बना कर कहा. ‘‘सच पूछो तो मनु या उस के परिवार के लिए तो कुछ भी नहीं हुआ है और हमारे साथ भी जो हुआ है वह हमारी अपनी सोच, खुशफहमी या गलतफहमी के कारण हुआ है,’’ महेश ने कहा, ‘‘राघव या जया भाभी ने तो प्रत्यक्ष में ऐसा कुछ नहीं कहा. मनु ने तुझ से अकेले में कभी ऐसा कुछ कहा पूर्णिमा?’’

पूर्णिमा ने इनकार में सिर हिलाया.

‘‘आप ठीक कह रहे हैं, गलतफहमी तो हमें ही हुई है. सैंडी को भी तो हम सब लड़का समझते रहे,’’ लता बुझे स्वर में बोलीं, ‘‘लेकिन अब क्या करें?’’

‘‘राघव के परिवार के साथ सामान्य व्यवहार और पूर्णिमा के लिए रिश्ते की बात,’’ महेश का स्वर नर्म होते हुए भी आदेशात्मक था.

पूर्णिमा सिहर उठी, ‘‘नहीं पापा…मेरा मतलब है बातवात मत करिए. मैं शादी नहीं करना चाहती.’’

‘‘साफ कह मनु के अलावा किसी और से नहीं और उस का अब सवाल ही नहीं उठता. मुझे तो लगता है कि न तो राघव और जया भाभी ने तुझे कभी अपनी बहू के रूप में देखा और न ही मनु ने भी तुझे एक हमजोली से ज्यादा कुछ समझा. क्यों लता गलत कह रहा हूं?’’

‘‘अब तो यही लगता है. मनु की असलियत तो पूर्णिमा को ही पता होगी,’’ लता बोलीं.

पूर्णिमा चिढ़ गई, ‘‘या तो हंसीमजाक करता है या फिर अपने काम से जुड़ी बातें. इस के अलावा और कोई बात नहीं करता है.’’

‘‘कभी यह नहीं बताया कि वहां जा कर उस ने तुझे कितना याद किया?’’

‘‘कभी नहीं, अगर ऐसा लगाव होता तो संपर्क ही क्यों टूटता? मनु वहां जा कर जरूर सब से अलगथलग रहा होगा, क्योंकि जितनी अंगरेजी उसे आती थी उस से न उसे किसी की बात समझ आती होगी न किसी को उस की. सैंडी को भी अमेरिकन चालू लड़कों से यह बेहतर लगा होगा, इसलिए दोस्ती कर ली,’’ पूर्णिमा कुछ सोचते हुए बोली.

‘‘यह तो तूने बड़ी समझदारी की बात कही पूर्णिमा,’’ महेश ने कहा, ‘‘अब थोड़ी समझदारी और दिखा. डा. शशिकांत की तुझ में दिलचस्पी किसी से छिपी नहीं है, लेकिन तू उन्हें घास नहीं डालती. हालात को देखते हुए मनु नाम की मृगमरीचिका के पीछे भागना छोड़ कर डा. शशिकांत से मेलजोल बढ़ा ताकि हम भी राघव और जया भाभी को यह कह कर सरप्राइज दे सकें कि हम ने तो पूर्णिमा के लिए बहुत पहले से लड़का देख रखा है, बस किसी को बताया नहीं है. अब आप की बहू आ जाए तो रिश्ता पक्का होने की रस्म पूरी कर दें.’’ ‘‘हां, यह होगा नहले पे दहला पापा,’’ पूर्णिमा के मुंह से निकला. Hindi Family Story :

Best Hindi Poetry : मेरी कविता – “मैं बेचारा तन्हा अकेला”

Best Hindi Poetry :

मेरी कविता :

“मैं बेचारा तन्हा अकेला”

मैं बेचारा तन्हा अकेला

भीगी राहों पर

ढूँढ रहा, खुद को, कहीं.

सड़कें भीगीं, शहर धुंधला,

आसमान में घना कोहरा.

भीगे आँखों से छलके

यादों की धार,

हर बूँद में गूँजे तेरा प्यार.

शहर की भीड़ में, मैं खुद से पूछता,

अपनी परछाई से ही अब मैं रूठता.

पत्थरों में चमक, पर दिल में अँधेरा,

टूटे सपनों सा लगता जीवन

खोया है कुछ, या पाया सवेरा?

मैं मुस्कुराता नहीं मगर,

हार भी मानता नहीं

सपनों की राख से,

गढ़ता कोई सितारा

  • बाल कृष्ण मिश्रा

Best Hindi Poetry :

Emotional Struggle : अपेक्षाओं का अंधकार

Emotional Struggle :

लेखक – इंजीनियर अजय कुमार बियानी, इंदौर – हम जिस समाज में जी रहे हैं, वहाँ रिश्तों की चमक धीरे-धीरे उम्मीदों की धुंध में खोती जा रही है। हर रिश्ता अब किसी न किसी “तुला” पर तोला जा रहा है — कोई वेतन की, कोई प्रतिष्ठा की, कोई रूप-रंग की, तो कोई जाति और पद की। प्रेम, सादगी और अपनापन जैसे शब्द अब किसी पुराने ग्रंथ की शोभा बनकर रह गए हैं। यही तो वह “अपेक्षाओं का अंधकार” है, जो आज हर घर में, हर माँ-बाप की सोच में और हर शादी-ब्याह के रिश्ते में धीरे-धीरे फैल चुका है।

कभी विवाह जीवन के दो आत्माओं का मिलन माना जाता था। आज वह एक डील बन गया है — “कितना कमाता है?”, “कौन सी कंपनी में है?”, “फ्लैट है या नहीं?”, “कार कौन-सी है?”। इन सवालों के जवाब ही अब तय करते हैं कि रिश्ता बनेगा या नहीं। मानो इंसान नहीं, निवेश चुना जा रहा हो।

समाज का यह चेहरा देखकर मन पूछता है — क्या अब गुण, संस्कार, और चरित्र का मूल्य समाप्त हो गया है? क्या अब सच्चा इंसान केवल तब तक योग्य है जब तक उसकी सैलरी स्लिप चमकदार हो?

शादी के लिए वर-वधू नहीं, अब “प्रोजेक्ट” देखे जाते हैं। माता-पिता “बजट” तय करते हैं, फिर “मार्केट सर्वे” शुरू होता है। रिश्तेदार “सुझाव समिति” बन जाते हैं — कोई कहता है “इतनी पढ़ाई की है तो दामाद आईएएस से कम न हो”, कोई कहता है “लड़की गोरी हो, लंबी हो, संस्कारी भी हो पर मॉडर्न दिखे”। नतीजा यह कि खोज इंसान की नहीं, आदर्श पैकेज की होती है।

ऐसे में, रिश्ते का सार — प्यार, समझ और साथ — पीछे छूट जाता है। जो बचता है, वह है दिखावे की परत और तुलना का विष।

आज “साँवला रंग” दोष है, “खेती” अपराध है, “ईमानदारी” कमजोरी है। बेटी वालों के लिए दामाद अब “हीरा” होना चाहिए, भले बेटी में कितनी भी खामियाँ क्यों न हों। और बेटे वालों के लिए बहू “आधुनिक” हो लेकिन “संस्कार” भी न छूटे — यानी दोनों दुनियाओं का मिश्रण, जो शायद अब किसी प्रयोगशाला में भी न बने।

कुंडली, जाति, धर्म, नौकरी, पैकेज — सब कुछ परखने के बाद भी जब रिश्ता नहीं टिकता, तब लोग कहते हैं — “क़िस्मत खराब थी।” नहीं, क़िस्मत नहीं, दृष्टि खराब थी। जब इंसान को इंसान नहीं, उसकी हैसियत से मापा जाएगा, तो रिश्ते टूटेंगे ही।

आज की पीढ़ी आत्मनिर्भर है, शिक्षित है, और निर्णय लेने में सक्षम भी। लेकिन इसी स्वतंत्रता ने रिश्तों में एक नया “संघर्ष” पैदा कर दिया है। अब प्रेम भी “प्रैक्टिकल” हो गया है — अगर नौकरी स्थायी नहीं, तो रिश्ता भी अस्थायी। भावनाओं की जगह “फाइनेंशियल सिक्योरिटी” ने ले ली है।

कभी-कभी लगता है कि हम तकनीकी रूप से आगे बढ़े हैं, पर भावनात्मक रूप से बहुत पीछे रह गए हैं। पहले माँ-बाप कहते थे — “लड़का अच्छा इंसान होना चाहिए।” अब वही कहते हैं — “अच्छा इंसान बाद में, पहले अच्छा पैकेज।” यही तो अपेक्षाओं का अंधकार है — जहाँ रिश्ते नहीं, लाभ गिने जाते हैं।

यह अंधकार सिर्फ विवाह तक सीमित नहीं रहा। यह अब हर रिश्ते में झलकता है — दोस्ती में, पड़ोस में, यहाँ तक कि परिवार में भी। भाई-भाई में संपत्ति का हिसाब, मित्रता में स्वार्थ की गणना, और बच्चों में माता-पिता की “रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट” सोच। जब हर भावना को अपेक्षाओं की रोशनी में देखा जाएगा, तो सच्चाई का अंधेरा गहराएगा ही।

समाज में बदलाव की ज़रूरत है, लेकिन उससे पहले दृष्टिकोण में बदलाव की। विवाह कोई सौदा नहीं — यह जीवन की साझेदारी है। जब हम रिश्ते को प्रेम, आदर और समझ से जोड़ते हैं, तभी वह टिकता है। लेकिन जब उसे प्रतिष्ठा, पद और पैसों से बाँधते हैं, तो वह टूट जाता है।

माँ-बाप को यह समझना होगा कि उनकी बेटी कोई “संपत्ति” नहीं है जिसे सर्वोच्च बोली लगाने वाले को सौंपना है, और बेटा कोई “इन्वेस्टमेंट” नहीं है जिससे सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ेगी। दोनों ही भावनाएँ हैं, दोनों ही इंसान हैं — और दोनों की खुशियों का आधार प्रेम और समानता होना चाहिए, न कि आर्थिक गणित।

जब तक समाज “कितना कमाता है” के बजाय “कैसा इंसान है” पूछना नहीं सीखेगा, तब तक यह अंधकार दूर नहीं होगा। जब तक हम “कितना सुंदर है” की जगह “कितना सच्चा है” देखना नहीं शुरू करेंगे, तब तक रिश्ते असफल रहेंगे।

जीवन का असली सौंदर्य सरलता में है, और रिश्तों का आधार विश्वास में। हर रिश्ता तभी खिलता है जब उसमें अपेक्षाएँ कम और अपनापन अधिक होता है।

कभी एक पल ठहरिए — अपने आस-पास देखिए। कितने रिश्ते केवल “शर्तों” के कारण खत्म हुए हैं, और कितने केवल “सच्चाई” के कारण बचे हैं। उत्तर आपके भीतर है।

रिश्ते को मत जोड़ो प्रतिष्ठा और पैसों से,

शादी इंसान से करो, न कि उसकी हैसियत से।

यदि हम यह समझ जाएँ कि हर व्यक्ति अपनी जगह पूर्ण है, तो शायद यह “अपेक्षाओं का अंधकार” भी धीरे-धीरे मिट जाएगा — और रिश्तों की रोशनी फिर से उजियारा फैलाएगी। Emotional Struggle :

Hindi Family Story : कड़वी गोली – बरामदे का पिछला कोना गंदा देख कर क्यों बड़बड़ा रही थी मीना ?

Hindi Family Story : बरामदे का पिछला कोना गंदा देख कर मीना बड़बड़ा रही है. दोष किसी इनसान का नहीं, एक छोटे से पंछी का है जिसे पंजाब में ‘घुग्गी’ कहते हैं. किस्सा इतना सा है कि सामने कोने में ‘घुग्गी’ के एक जोड़े ने अपना छोटा सा घोंसला बना रखा है जिस में उन के कुछ नवजात बच्चे रहते  हैं. अभी उन्हें अपने मांबाप की सुरक्षा की बेहद जरूरत है.

नरमादा दोनों किसी को भी उस कोने में नहीं जाने देना चाहते क्योंकि उन्हें लगता है कि हम उन के बच्चे चुरा लेंगे या उन्हें कोई नुकसान पहुंचाएंगे. काम वाली बाई सफाई करने गई तो चोंच से उस के सिर के बाल ही खींच ले गए. इस के बाद से उस ने तो उधर जाना ही छोड़ दिया. मीना घूंघट निकाल कर उधर गई तो उस के सिर पर घुग्गी के जोड़े ने चोंच मार दी.

‘‘इन्हें किसी भी तरह यहां से हटाइए,’’ मीना गुस्से में बोली, ‘‘अजीब गुंडागर्दी है. अपने ही घर में इन्होंने हमारा चलनाफिरना हराम कर रखा है.’’

‘‘मीना, इन की हिम्मत और ममता तो देखो, हमारा घर इन नन्हेनन्हे पंछियों के शब्दकोष में कहां है. यह तो बस, कितनी मेहनत से अपने बच्चे पाल रहे हैं. यहां तक कि रात को भी सोते नहीं. याद है, उस रोज रात के 12 बजे जब मैं स्कूटर रखने उधर गया था तो भी दोनों मेरे बाल खींच ले गए थे.’’

रात 12 बजे का जिक्र आया तो याद आया कि मीना को महेश के बारे में बताना तो मैं भूल ही गया. महेश का फोन न मिल पाने के कारण हम पतिपत्नी परेशान जो थे.

‘‘सुनो मीना, महेश का फोन तो कटा पड़ा है. बच्चों ने बिल ही जमा नहीं कराया. कहते हैं सब के पास मोबाइल है तो इस लैंडलाइन की क्या जरूरत है…’’

बुरी तरह चौंक गई थी मीना. ‘‘मोबाइल तो बच्चों के पास है न, महेश अपनी बातचीत कैसे करेंगे? वैसे भी महेश आजकल अपनेआप में ही सिमटते जा रहे हैं. पिछले 2 माह से दोपहर का खाना भी दफ्तर के बाहर वाले ढाबे से खा रहे हैं क्योंकि सुबहसुबह खाना  बना कर देना बहुओं के बस का नहीं है.’’

मीना के बदलते तेवर देख कर मैं ने गरदन झुका ली. 18 साल पहले जब महेश की पत्नी का देहांत हुआ था तब दोनों बेटे छोटे थे, उम्र रही होगी 8 और 10 साल. आज दोनों अच्छे पद पर कार्यरत हैं, दोनों का अपनाअपना परिवार है. बस, महेश ही लावारिस से हैं, कभी इधर तो कभी उधर.

एक दिन मैं ने पूछा था, ‘तुम अपनी जरूरतों के बारे में कब सोचोगे, महेश?’

‘मेरी जरूरतें अब हैं ही कितनी?’

‘क्यों? जिंदा हो न अभी, सांस चल रही है न?’

‘चल तो रही है, अब मेरे चाहने से बंद भी तो नहीं होती कम्बख्त.’

यह सुन कर मैं अवाक् रह गया था. बहुत मेहनत से पाला है महेश ने अपनी संतान को. कभी अच्छा नहीं पहना, अच्छा नहीं खाया. बस, जो कमाया बच्चों पर लगा दिया. पत्नी नहीं थी न, क्या करता, मां भी बनता रहा बच्चों की और पिता भी.

माना, ममता के बिना संतान पाली नहीं जा सकती, फिर भी एक सीमा तो होनी चाहिए न, हर रिश्ते में एक मर्यादा, एक उचित तालमेल होना चाहिए. उन का सम्मान न हो तो दर्द होगा ही.

महेश ने अपना फोन कटा ही रहने दिया. इस पर मुझे और भी गुस्सा आता कि बच्चों को कुछ कहता क्यों नहीं. फोन पर तो बात हो नहीं पा रही थी. 2 दिन सैर पर भी नहीं आया तो मैं उस के घर ही चला गया. पता चला साहब बीमार हैं. इस हालत में अकेला घर पर पड़ा था क्योंकि दोनों बहुएं अपनेअपने मायके गई थीं.

‘‘हर शनिवार उन का रात का खाना अपनेअपने मायके में होता है.’’

‘‘तो तुम कहां खाते हो? बीमारी में भी तुम्हें उन की ही वकालत सूझ रही है. फोन ठीक होता तो कम से कम मुझे ही बता देते, मैं ही मीना से खिचड़ी बनवा लाता…’’

महेश चुप रहा और उस का पालतू कुत्ता सूं सूं करता उस के पैरों के पास बैठा रहा.

‘‘यार, इसे फ्रिज में से निकाल कर डबलरोटी ही डाल देना,’’ महेश बोला, ‘‘बेचारा मेरी तरह भूखा है. मुझ से खाया नहीं जा रहा और इसे किसी ने कुछ दिया नहीं.’’

‘‘क्यों? अब यह भी फालतू हो गया है क्या?’’ मैं व्यंग्य में बोल पड़ा, ‘‘10 साल पहले जब लाए थे तब तो आप लोगों को मेरा इसे कुत्ता कहना भी बुरा लगता था, तब यह आप का सिल्की था और आज इस का भी रेशम उतर गया लगता है.’’

‘‘हो गए होंगे इस के भी दिन पूरे,’’ महेश उदास मन से बोला, ‘‘कुत्ते की उम्र 10 साल से ज्यादा तो नहीं होती न भाई.’’

‘‘तुम अपनी उम्र का बताओ महेश, तुम्हें तो अभी 20-25 साल और जीना है. जीना कब शुरू करोगे, इस बारे में कुछ सोचा है? इस तरह तो अपने प्रति जो तुम्हारा रवैया है उस से तुम जल्दी ही मर जाओगे.’’

कभीकभी मुझे यह सोच कर हैरानी होती है कि महेश किस मिट्टी का बना है. उसे कभी कोई तकलीफ भी होती है या नहीं. जब पत्नी चल बसी तब नाते- रिश्तेदारों ने बहुत समझाया था कि दूसरी शादी कर लो.

तब महेश का सीधा सपाट उत्तर होता था, ‘मैं अपने बच्चों को रुलाना नहीं चाहता. 2 बच्चे हैं, शादी कर ली तो आने वाली पत्नी अपनी संतान भी चाहेगी और मैं 2 से ज्यादा बच्चे नहीं चाहता. इसलिए आप सब मुझे माफ कर दीजिए.’

महेश का यह सीधा सपाट उत्तर था. हमारे भी 2 बच्चे थे. मीना ने साथ दिया. इस सत्य से मैं इनकार नहीं कर सकता क्योंकि यदि वह न चाहती तो शायद मैं भी चाह कर कुछ नहीं कर पाता.

एक तरह से महेश, मैं और मीना, तीनों ने मिल कर 4 बच्चों को पाला. महेश के बच्चे कबकब मीना के भी बच्चे रहे समझ पाना मुश्किल था. मैं यह भी नहीं कहता महेश के बच्चे उस से प्यार नहीं करते, प्यार कहीं सो सा गया है, कहीं दब सा गया है कुछ ऐसा लगता है. सदा पिता से लेतेलेते  वे यह भूल ही गए हैं कि उन्हें पिता को कुछ देना भी है. छोटे बेटे ने पिता के नाम पर गाड़ी खरीदी जिस की किश्त पिता चुकाता है और बड़े ने पिता के नाम पर घर खरीदा है जिस की किश्त भी पिता की तनख्वाह से ही जाती है.

‘‘कुल मिला कर 2 हजार रुपए तुम्हारे हाथ आते हैं. उस में तुम्हारा दोपहर का खाना, कपड़ा, दवा, टेलीफोन का बिल कैसे पूरा होगा, क्या बच्चे यह सब- कुछ सोचते हैं? अगर नहीं सोचते तो उन्हें सोचना पड़ेगा, महेश.

‘‘यह कुत्ता भी आज तुम्हारे परिवार में फालतू है क्योंकि घर में तुम्हारे पोतेपोतियां हैं जो एक जानवर के साथ असुरक्षित हैं. कल कुत्ता तुम्हारी जरूरत था क्योंकि बच्चे अकेले थे. दोनों बच्चे तुम्हारे साथ किस बदतमीजी से पेश आते हैं तुम्हें पता ही नहीं चलता, कोई भी बाहर का व्यक्ति झट समझ जाता है कि तुम्हारे बच्चे तुम्हारी इज्जत नहीं कर रहे और तुम कबूतर की तरह आंखें बंद किए बैठे हो. महेश, अपनी सुधि लेना सीखो. याद रखो, मां भी बच्चे को बिना रोए दूध नहीं पिलाती. तकलीफ हो तो रोना भी पड़ता है और रोना भी चाहिए. इन्हें वह भाषा समझाओ जो समझ में आए.’’

‘‘मैं क्या करूं? कभी अपने लिए कुछ मांगा ही नहीं.’’

‘‘तुम क्यों मांगो, अभी तो 20 हजार हर महीने तुम इन पर खर्च कर रहे हो. अभी तो देने वालों की फेहरिस्त में तुम्हारा नाम आता है. तुम्हें अपने लिए चाहिए ही क्या, समय पर दो वक्त का खाना और धुले हुए साफ कपड़े. जरा सी इज्जत और जरा सा प्यार. बदले में अपना सब दे चुके हो बच्चों को और दे रहे हो.’’

‘‘अब कुछ नहीं हो सकता मेरा.’’

‘‘चाहो तो सब हो सकता है. तुम जरा सी हिम्मत तो जुटाओ.’’

वास्तव में उस दिन महेश बेचैन था और उस की पीड़ा हम भी पूरी ईमानदारी से सह रहे थे. बिना कुछ भी कहे पलपल हम महेश के साथ ही तो थे. एक अधिकार था मीना के पास भी, मां की तरह ममत्व लुटाया था मीना ने भी बच्चों पर.

‘‘जी चाहता है कान मरोड़ दूं दोनों के,’’ मीना ने गुस्सा होते हुए कहा, ‘‘आज किसी लायक हो गए तो पिता की जरूरतों का अर्थ ही नहीं रहा उन के मन में.’’

‘‘पहल महेश को करने दो मीना, यह उस की अपनी जंग है.’’

‘‘इस में जंग वाली क्या बात हुई?’’

‘‘जंग का अर्थ सिर्फ 2 देशों के बीच लड़ाई ही तो नहीं होता, विचारों के बीच जब तालमेल न हो तब भी तो मन के भीतर एक घमासान चलता रहता है न. उस के घर का मसला है, उसी को निबटने दो.’’

किसी तरह मीना को समझा- बुझा कर मैं ने शांत तो कर दिया लेकिन खुद असहज ही रहा. अकसर सोचता, महेश बेचारे ने गलती भी तो कोई  नहीं की. एक अच्छा पिता और एक समर्पित पति बनना तो कोई अपराध नहीं है. महेश ने जब दूसरी शादी न करने का फैसला लिया था तब उस का वह फैसला उचित था. आज यदि वह अकेला है तो हम सोचते हैं कि उस का निर्णय गलत था, तब शादी कर लेता तो कम से कम आज अकेला तो न होता.

अकसर जीवन में ऐसा ही होता है. कल का सत्य, आज का सत्य रहता ही नहीं. उस पल की जरूरत वह थी, आज की जरूरत यह है. हम कभी कल के फीते से आज को तो नहीं नाप सकते न.

संयोग ऐसा बना कि कुछ दिन बाद, सुबहसुबह मैं उठा तो पाया कि बरामदे का वह कोना साफसुथरा है जहां घुग्गी ने घोंसला बना रखा था. बाई पोंछा लगा रही थी.

‘‘बच्चे उड़ गए साहब,’’ बाई ने बताया, ‘‘वह देखिए, उधर…’’

2 छोटेछोटे चिडि़या के आकार के नन्हेनन्हे जीव इधरउधर फुदक रहे थे और नरमादा उन की खुली चोंच में दाना डाल रहे थे.

‘‘अरे मीना, आओ तो, देखो न कितने प्यारे बच्चे हैं. जरा भाग कर आना.’’

मीना आई और सहसा कुछ ऐसा कह गई जो मेरे अंतरमन को चुभ सा गया.

‘‘हम इनसानों से तो यह परिंदे अच्छे, देखना 4 दिन बाद जब बच्चों को खुद दाना चुगना आ जाएगा तो यह नरमादा इन्हें आजाद छोड़ देंगे. हमारी तरह यह नहीं चाहेंगे कि ये सदा हम से ही चिपके रहें. हम सब की यही तो त्रासदी है कि हम चाहते हैं कि बच्चे सदा हमारी उंगली ही पकड़ कर चलें. हम सोचना ही नहीं चाहते कि बच्चों से अपना हाथ छुड़ा लें.’’

‘‘क्योंकि इनसान को बुढ़ापे में संतान की जरूरत पड़ती है जो इन पक्षियों को शायद नहीं पड़ती. मीना, इनसान सामाजिक प्राणी है और वह परिवार से, समाज से जुड़ कर जीना चाहता है.’’

मीना बड़बड़ा कर वहीं धम से बैठ गई. मैं मीना को पिछले 30 सालों से जानता हूं. अन्याय साथ वाले घर में होता हो तो अपने घर बैठे इस का खून उबलता रहता है. महेश के बारे में ही सोच रही होगी. एक बेनाम सा रिश्ता है मीना का भी महेश के साथ. वह मेरा मित्र है और यह मेरी पत्नी, दोनों का रिश्ता भला क्या बनता है? कुछ भी तो नहीं, लेकिन यह भी एक सत्य है कि मीना महेश के लिए बहुत कुछ है, भाभी, बहन, मित्र और कभीकभी मां भी.

‘‘महेश को अपने घर ला रही हूं मैं, ऊपर का कमरा खाली करा कर सब साफसफाई करा दी है. बहुत हो चुका खेलतमाशा…बेशर्मी की भी हद होती है. अस्पताल से सीधे यहीं ला रही हूं, सुना आप ने…’’

मुझ में काटो तो खून नहीं रहा. अस्पताल से सीधा? तो क्या महेश अस्पताल में है? याद आया…मैं तो 2 दिन से यहां था ही नहीं, कार्यालय के काम से दिल्ली गया था. देर रात लौटा था और अब सुबहसुबह यह सब. पता चला महेश के शरीर में शुगर की बहुत कमी हो गई थी जिस वजह से उसे कार्यालय में ही चक्कर आ गया था और दफ्तर के लोगों उसे अस्पताल पहुंचा दिया था.

‘‘नहीं मीना, यह हमारी सीमा में नहीं आता. घर तो उस का वही है, कोई बात नहीं, आज देखते हैं अस्पताल से तो वह अपने ही घर जाएगा.’’

उस दिन मैं दफ्तर से आधे दिन का अवकाश ले कर उसे अस्पताल से उस के घर ले गया. दोनों बेटे जल्दी में थे और बहुएं बच्चों में व्यस्त थीं. सहसा तभी उन का कुत्ता छोटे बच्चे पर झपट पड़ा, शायद वह भूखा था. उस के हाथ का बिस्कुट छिटक कर परे जा गिरा. महेश के पीछे उस ने 2 दिन कुछ खाया नहीं होगा क्योंकि महेश के बिना वह कुछ भी खाता नहीं. महेश को देखते ही उस की भूख जाग उठी और बिस्कुट लपक लिया.

‘‘पापा, आप ने इसे ढंग से पाला नहीं. न कोई टे्रनिंग दी है न तमीज सिखाई है. 2 दिन से लगातार भौंकभौंक कर हम सब का दिमाग खा गया है. न खाता है न पीता है और हमारे पास इस के लिए समय नहीं है.’’

‘‘समय तो आप के पास अपने बाप के लिए भी नहीं है, कुत्ता तो बहुत दूर की चीज है बेटे. रही बात तमीज की तो वह महेश भैया ने तुम दोनों को भी बहुत सिखाई थी. यह तो जानवर है. बेचारा मालिक के वियोग में भूखा रह सकता है या भौंक सकता है फिर भी दुम हिला कर स्वागत तो कर सकता है. तुम से तो वह भी नहीं हुआ…जिन के पास जबान भी है और हाथपैर भी. घंटे भर से हम देख रहे हैं मुझे तो तुम दोनों में से कोई अपने पिता के लिए एक कप चाय लाता भी दिखाई नहीं दिया.’’

मीना बोली तो बड़ा बेटा अजय स्तब्ध रह गया. कुछ कहता तभी टोक दिया मीना ने, ‘‘तुम्हारे पास समय नहीं कोई बात नहीं. महेश नौकर रख कर अपना गुजारा कर लेंगे. कम से कम उन की तनख्वाह तो तुम उन के पास छोड़ दो…बाप की तनख्वाह तो तुम दोनों भाइयों ने आधीआधी बांट ली, कभी यह भी सोचा है कि वह बचे हुए 2 हजार रुपयों में कैसे खाना खाते हैं? दवा भी ले पाते हैं कि नहीं? फोन तक कटवा दिया उन का, क्यों? क्या उन का कोई अपना जानने वाला नहीं जिस के साथ वह सुखदुख बांट सकें. क्या जीते जी मर जाए तुम्हारा बाप?’’

मीना की ऊंची आवाज सुन छोटा बेटा विजय और उस की पत्नी भी अपने कमरे से बाहर चले आए.

‘‘तुम दोनों की मां आज जिंदा होतीं तो अपने पति की यह दुर्गति नहीं होने देतीं. हम क्या करें? हमारी सीमा तो सीमित है न बेटे. तुम मेरे बच्चे होते तो कान मरोड़ कर पूछती, लेकिन क्या करूं मैं तुम्हारी मां नहीं हूं न.’’

रोने लगी थी मीना. महेश और उस के परिवार के लिए अकसर रो दिया करती है. कभी उन की खुशी में कभी उन की पीड़ा में.

‘‘कभी कपड़े देखे हैं विजय तुम ने अपने पापा के. हजारों रुपए अपनी कमीजों पर तुम खर्च कर देते हो. कभी देखा है इतनी गरमी में उन के पास कोई ढंग की सूती कमीज भी है…

‘‘आफिस के सामने वाले ढाबे पर दोपहर का खाना खाते हैं. क्या तुम दोनों की बीवियां वक्त पर ससुर को टिफिन नहीं दे सकतीं. अरे, सुबह नहीं तो कम से कम दोपहर तक पहुंचाने का इंतजाम ही करवा दो.

‘‘बहुएं तो दूसरे घरों से आई हैं. हो सकता है इन के घर में मांबाप का ऐसा ही आदर होता हो. कम से कम तुम तो अपने पिता की कद्र करना अपनी पत्नियों को सिखाओ. क्या मैं ने यही संस्कार दिए थे तुम लोगों को? ऐसा ही सिखाया था न?’’

दोनों भाई चुप थे और उन की बीवियां तटस्थ थीं. अजयविजय आगे कुछ कहते कि मीना ने पुन: कहा, ‘‘बेटा, अपने बाप को लावारिस मत समझना. अभी तुम जैसे 2-4 वह और भी पाल सकते हैं. नहीं संभाले जाते तो यह घर छोड़ कर चले जाओ, अजय तुम अपने फ्लैट में और विजय तुम किराए के घर में. अपनीअपनी किस्तें खुद दो वरना आज ही महेश फ्लैट और गाड़ी बेचने को तैयार हैं…इन्हीं के नाम हैं न दोनों चीजें.’’

महेश चुपचाप आंखें मूंदे पड़े थे. जाहिर था उसी के शब्द मीना के होंठों से फूट रहे थे.

‘‘मीना, अब बस भी करो. आओ, चलें.’’

आतेआते दोनों बच्चों का कंधा थपक दिया. मुझ से आंखें मिलीं तो ऐसा लगा मानो वही पुराने अजयविजय सामने खड़े हों जो स्कूल में की गई किसी शरारत पर टीचर की सजा से बचने के लिए मेरे या मीना के पास चले आते थे. आंखें मूंद कर मैं ने आश्वासन दिया.

‘‘कोई बात नहीं बेटा, जब जागे तभी सवेरा. संभालो अपने पापा को…’’

डबडबा गई थीं दोनों की आंखें. मानो अपनी भूल का एहसास पहली बार उन्हें हुआ हो. मैं कहता था न कि हमारे बच्चे संस्कारहीन नहीं हैं. हां, जवानी के जोश में बस जरा सा यह सत्य भूल गए हैं कि उन्हें जवान बनाने में इसी बुढ़ापे का खून और पसीना लगा है और यही बुढ़ापा बांहें पसारे उन का भी इंतजार कर रहा है.

कहा था न मैं ने कि उन का प्यार कहीं सो सा गया है. उसी प्यार को जरा सा झिंझोड़ कर जगा दिया था मीना ने. सच ही कहा था मैं ने, रो पड़े थे दोनों और साथसाथ मीना भी. जरा सा चैन आ गया मन को, अंतत: सब अच्छा ही होगा, यह सोच मैं ने और मीना ने उन के घर से विदा ली. क्या करते हम, कभीकभी मर्ज को ठीक करने के लिए मरीज को कड़वी गोली भी देनी पड़ती है. Hindi Family Story :

Hindi Kahani : बीच की दीवार – मीठे, प्यारे, दिल से जुड़े रिश्तों में आई कड़वाहट की मर्मस्पर्शी कहानी

Hindi Kahani : ‘‘मम्मी,आप नानी के यहां जाने के लिए पैकिंग करते हुए भी इतनी उदास क्यों लग रही हैं? आप को तो खुश होना चाहिए. नानी, मामा से मिलने जा रही हैं, पिंकी दीदी, सोनू भैया भी मिलेंगे.’’

‘‘नहींनहीं खुश तो हूं, बस जाने से पहले क्याक्या काम निबटाने हैं, यही सोच रही हूं.’’

‘‘खूब ऐंजौय करना मम्मी, हमारी पढ़ाई के कारण तो आप का जल्दी निकलना भी नहीं होता,’’ कह कर मेरे गाल पर किस कर के मेरी बेटी सुकन्या चली गई.

सही तो कह रही है, कोई मायके जाते हुए भी इतना उदास होता है? मायके जाते समय तो एक धीरगंभीर स्त्री भी चंचल तरुणी बन जाती है पर सुकन्या को क्या बताऊं, कैसे दिखाऊं उसे अपने मन पर लगे घाव. 20 साल की ही तो है. दुनिया के दांवपेचों से दूर. अभी तो उस की अपनी अलग दुनिया है, मांबाप के साए में हंसतीमुसकराती, खिलखिलाती दुनिया.

मेरे जाने के बाद अमित, सुकन्या और उस से 3 साल छोटे सौरभ को कोई परेशानी न हो, इस बात का ध्यान रखते हुए घर की साफसफाई करने वाली रमाबाई और खाना बनाने वाली कमला को अच्छी तरह निर्देश दे दिए थे. अपना बैग बंद कर मैं अमित का औफिस से आने का इंतजार कर रही थी.

सौरभ ने भी खेल कर आने पर पहला सवाल यही किया, ‘‘मम्मी, पैकिंग हो गई? आप बहुत सीरियस लग रही हैं, क्या हुआ?’’

‘‘नहीं, ठीक हूं,’’ कहते हुए मैं ने मुसकराने की कोशिश की.

इतने में अमित भी आ गए. हम चारों ने साथ डिनर किया. खाना खत्म होते ही अमित बोले, ‘‘सुजाता, आज टाइम पर सो जाना. अब किसी काम की चिंता मत करना, सुबह 5 बजे  एअरपोर्ट के लिए निकलना है.’’

सब काम निबटाने में 11 बज ही गए. सोने लेटी तो अजीब सा दुख और बेचैनी थी. किसी से कह नहीं पा रही थी कि मुझे नहीं जाना मां के घर, मुझे नहीं अच्छे लगते लड़ाईझगड़े. अकसर सोचती हूं क्या शांति और प्यार से रहना बहुत मुश्किल काम है? बस अमित मेरी मनोदशा समझते हैं, लेकिन वे भी क्या कहें, खून के रिश्तों का एक अजीब, अलग ही सच यह भी है कि अगर कोई गैर आप का दिल दुखाए तो आप उस से एक झटके में किनारा कर सकते हैं, लेकिन ये खून के अपने सगे रिश्ते मन को चाहे बारबार लहूलुहान करें आप इन से भाग नहीं सकते. कल मैं मुंबई एअरपोर्ट से फ्लाइट पकड़ूंगी, 2 घंटों में दिल्ली पहुंच कर फिर टैक्सी से मेरठ मायके पहुंच जाऊंगी. जहां फिर कोई झगड़ा देखने को मिलेगा. झगड़ा वह भी मांबेटे के बीच का, सोच कर ही शर्म आ जाती है, रिटायर्ड टीचर मां और पढ़ेलिखे मुझ से 5 साल बड़े नरेन भैया, गीता भाभी और मेरी भतीजी पिंकी व भतीजे सोनू के बीच का झगड़ा, कौन गलत है कौन सही, मैं कुछ सोचना नहीं चाहती, लेकिन दोनों मुझे फोन पर एकदूसरे की गलती बताते रहते हैं, तो मन का स्वाद कसैला हो जाता है मेरा. मायके का यह तनाव आज का नहीं है.

5 साल पहले मां जब रिटायर हुई थीं तब से यही चल रहा है. आपस के स्नेहसूत्र कहां खो गए, पता ही नहीं चला. पिछली बार मैं 2 साल पहले गई थी. इन 2 सालों में हर फोन पर तनाव बढ़ता ही दिखा. अब तो हालत यह हो गई है कि मुझ से तो कोई यह पूछता ही नहीं है कि मैं कैसी हूं, अमित और बच्चे कैसे हैं, बस मेरे ‘नमस्ते’ कहते ही शिकायतों का पिटारा खोल देते हैं सब. ऐसे माहौल में मायके जाते समय किस बेटी का दिल खुश होगा? मैं तो अब भी न जाती पर मां ने फौरन आने के लिए कहा है तो मैं बहुत बेमन से कल जा रही हूं. काश, पापा होते. बस, इतना सोचते ही आंखें भर आती हैं मेरी.

मैं 13 वर्ष की ही थी जब उन का हार्टफेल हो गया था. उन का न रहना जीवन में एक ऐसा खालीपन दे गया जिस की कमी मुझे हमेशा महसूस हुई है. उन्हें ही याद करतेकरते मेरी आंख कब लगी, पता ही नहीं चला.

सुबह बच्चों को अच्छी तरह रहने के निर्देश देते हुए हम एअरपोर्ट के लिए निकल गए. अमित से बिदा ले कर अंदर चली गई और नियत समय पर उदास सा सफर खत्म हुआ.

जैसे ही घर पहुंची, मां गेट पर ही खड़ी थीं, टैक्सी से उतरते ही घर पर एक नजर डाली तो बाहर से ही मुझे जो बदलाव दिखा उसे देख मेरा दिल बुझ गया. अब घर के एक गेट की जगह 2 गेट दिख रहे थे और एक ही घर के बीच में दिख रही थी एक दीवार. दिल को बड़ा धक्का लगा.

मैं ने गेट के बाहर से ही पूछा, ‘‘मां, यह क्या?’’

‘‘कुछ नहीं, मेरे बस का नहीं था रोजरोज का क्लेश. अब दीवार खींचने से शांति रहती है. वे लोग उधर खुश, मैं इधर खुश.’’

खुश… एक ही आंगन के 2 हिस्से. इस में खुश कैसे रह सकता है कोई?

मां और मेरी आवाज सुन कर भैया और उन का परिवार भी अपने गेट पर आ गया.

भैया ने मेरे सिर पर हाथ रख कर कहा, ‘‘कैसी है सुजाता?’’

गीता भाभी भी मुझ से गले मिलीं. पिंकी, सोनू तो चिपट ही गए, ‘‘बूआ, हमारे घर चलो.’’

इतने में मां ने कहा, ‘‘सुजाता, चल अंदर यहां कब तक खड़ी रहेगी?’’

मैं तो कुछ समझ नहीं पा रही थी कि यह क्या हो गया, क्या करूं.

भैया ने ही कहा, ‘‘जा सुजाता, बाद में मिलते हैं.’’

मैं अपना बैग उठाए मां के पीछे चल दी. दीवार खड़ी होते ही घर का पूरा नक्शा बदल गया था. छत पर जाने वाली सीढि़यां भैया के हिस्से में चली गई थीं. अब छत पर जाने के लिए भैया के गेट से अंदर जाना था. आंगन का एक बड़ा हिस्सा भैया की तरफ था और एक छोटी गैलरी मां के हिस्से में जहां से बाहर का रास्ता था.

आंगन और गैलरी के बीच खड़ी एक दीवार जिसे देखदेख कर मेरे दिल

में हौल उठ रहे थे. मां एकदम शांत और सामान्य थीं. नहाधो कर मैं थोड़ी देर लेट गई. मां चाय ले आईं और फिर खुल गया शिकायतों का पिटारा. मैं अनमनी सी हो गई. इतनी दूर मैं क्या इसलिए आई हूं कि यह जान सकूं कि भाभी ने टाइम पर खाना क्यों नहीं बनाया, भैया भाभी के साथ उन के मायके क्यों जाते हैं बारबार, भाभी उन्हें बिना बताए पिक्चर क्यों गईं बगैराबगैरा…

मां ने पूछा, ‘‘क्या हुआ? बहुत थक गई क्या? बहुत चुप है?’’

मैं ने भर्राए गले से कहा, ‘‘मां, यह दीवार…’’

बात पूरी नहीं होने दी मां ने, ‘‘बहुत अच्छा हुआ, अब रोज की किटकिट बंद हो गई. अब शांति है. अब बोल, क्या खाएगी और इन लोगों को सिर पर मत चढ़ाना.’’

मैं अवाक मां का मुंह देखती रह गई. इतने में दीवार के उस पार से भैया की आवाज आई, ‘‘सुजाता, लंच यहीं कर लेना. तेरी पसंद का खाना बना है.’’

पिंकी की आवाज भी आई, ‘‘बूआ, जल्दी आओ न.’’

मां ने पलभर सोचा, फिर कहा, ‘‘चल, अच्छा, एक चक्कर काट आ उधर, नहीं तो कहेंगे मां ने भाईबहन को मिलने नहीं दिया.’’

मैं भैया की तरफ गई. पिंकी, सोनू की बातें शुरू हो गईं. दोनों सुकन्या और सौरभ की बातें पूछते रहे और फिर धीरेधीरे भैया और भाभी ने भी मां की शिकायतों का सिलसिला शुरू कर दिया, ‘‘मां हर बात में अपनी आर्थिक स्वतंत्रता की बात करती हैं, उन्हें पैंशन मिलती है, वे किसी पर निर्भर नहीं हैं. बातबात में गुस्सा करती हैं. समय के साथ कोई समझौता नहीं करती हैं.’’

मैं यहां क्यों आ गई, मुझे समझ नहीं आ रहा था. कैसे रहूंगी यहां. यहां सब मुझ से बड़े हैं. मैं किसी को क्या समझाऊं और आज तो पहला ही दिन था.

इतने में मां की आवाज आई, ‘‘सुजाता, खाना लग गया है, आ जा.’’

मैं फिर मां के हिस्से में आ गई. मैं ने बहुत उदास मन से मां के साथ खाना खाया. मां ने मेरी उदासी को मेरी थकान समझा और फिर मैं थोड़ी देर लेट गई. बैड की जिस तरफ मैं लेटी थी वहां से बीच की दीवार साफ दिखाई दे रही थी जिसे देख कर मेरी आंखें बारबार भीग रही थीं.

अपनेअपने अहं के टकराव में मेरी मां और मेरे भैया यह भूल चुके थे कि इस घर की बेटी को आंगन का यह बंटवारा देख कर कैसा लगेगा. मुझे तो यही लग रहा था कि मेरा तो इस घर में गुजरा बचपन, जवानी सब बंट गए हैं. आंगन का वह कोना जहां पता नहीं कितनी दोपहरें सहेलियों के साथ गुड्डेगुडि़या के खेल खेले थे, अमरूद का वह पेड़ जिस के नीचे गरमियों में चारपाई बिछा कर लेट कर पता नहीं कितने उपन्यास पढ़े थे. छत पर जाने वाली वे बीच की चौड़ी सीढि़यां जहां बैठ कर लूडोकैरम खेला था, अब वे सब दीवार के उस पार हैं जहां जाने पर मां की आंखों में नाराजगी के भाव दिखेंगे. मां के हिस्से में वह जगह थी जहां हर तीजत्योहार पर सब साथ बैठते थे, आज वह खालीखाली लग रही थी. घर का बड़ा हिस्सा भैया के पास था. मां ने अपनी जरूरत और घर की बनावट के हिसाब से दीवार खड़ी करवा दी थी.

यही चल रहा था. मैं भैया की तरफ होती तो मां बुला लेतीं और बारबार पूछतीं कि नरेन क्या कह रहा था, भैयाभाभी पूछते मां मुझे क्या बताती हैं उन के बारे में. मैं ‘कुछ खास नहीं’ का नपातुला जवाब सब को देती. मुझे महसूस होता घर भी मेरे दिल की तरह उदास है. मैं मन ही मन अपने जाने के दिन गिनती रहती. अमित और बच्चों से फोन पर बात होती रहती थी. दिनभर मेरा पूरा समय इसी कोशिश में बीतता कि सब के संबंध अच्छे हो जाएं, लेकिन शाम तक परिणाम शून्य होता.

एक दिन मैं ने मां से पूछ ही लिया, ‘‘मां, मुझे आप ने फोन पर इस दीवार के बारे में नहीं बताया और फौरन आने के लिए क्यों कहा था?’’

मां ने कहा, ‘‘ऐसे ही, गीता को दिखाना था मैं अकेली नहीं हूं… बेटी है मेरे साथ.’’

मैं ने भैया से पूछा, ‘‘आप ने फोन पर बताया नहीं कुछ?’’

जवाब भाभी ने दिया, ‘‘बस, फोन पर क्या बताते, दीवार खींच कर मां खुश हो रही हैं तो हमें भी क्या परेशानी है. हम भी आराम से हैं.’’

मेरे मन में आया ये सब खुश हैं तो मुझे ही क्यों तकलीफ हो रही है घर के आंगन में खड़ी दीवार से.

एक दिन तो हद हो गई. मां मुझे साड़ी दिलवाने मार्केट ले जा रही थीं.

मैं ने कहा, ‘‘मां, पिंकी व सोनू को भी बुला लेती हूं. उन्हें उन की पसंद का कुछ खरीद दूंगी.’’

मां ने फौरन कहा, ‘‘नहीं, हम दोनों ही जाएंगे.’’

मैं ने कहा, ‘‘मां, बच्चे हैं, उन से कैसा गुस्सा?’’

‘‘मुझे उन सब पर गुस्सा आता है.’’

मैं उस समय उन्हें नहीं ले जा पाई. उन्हें मैं अलग से ले कर गई. उन्हें उन की पसंद के कपड़े दिलवाए. फिर हम तीनों ने आइसक्रीम खाई. जब से आई थी यह पहला मौका था कि मन को कुछ अच्छा लगा था. पिंकी व सोनू के साथ समय बिता कर मन बहुत हलका हुआ.

5 दिन बीत रहे थे. मुझे अजीब सी मानसिक थकान महसूस हो रही थी. पूरा दिन दोनों तरफ की आवाजों पर कभी इधर, तो कभी उधर घूमती दौड़ती रहती. मन रोता मेरा. किसी को एक बेटी के दिल की कसक नहीं दिख रही थी. किस बेटी का मन नहीं चाहता कि कभी वह 2-3 साल में अपने मायके आए तो प्यार और अपनेपन से भरे रिश्तों की मिठास यादों में साथ ले कर जाए. मगर मैं जल्दी से जल्दी अपने घर मुंबई जाना चाहती थी, क्योंकि मेरा मायका मायका नहीं रह गया था.

वह तो ऐसा मकान था जहां दीवार की दोनों तरफ मांबेटा बुरे पड़ोसियों की तरह रह रहे थे. इस माहौल में किसी बेटी के दिल को चैन नहीं आ सकता था.

मैं ने अमित को बता दिया कि मैं 1 हफ्ते में ही आ रही हूं. अमित सब समझ गए थे. 7वें दिन मैं ने अपना बैग पैक किया. सब से कसैले मन से बिदा ली. भैया ने अपने जानपहचान की टैक्सी बुलवा दी थी. टैक्सी में बैठ कर सीट पर सिर टिका कर मैं ने अपनी आंखें बंद कर लीं. लगा बिदाईर् तो आज हुई है मायके से. शादी के बाद जो बिदाई हुई थी उस में फिर मायके आने की, सब से मिलने की एक आस, चाह और कसक थी, लेकिन अब लग रहा था कभी नहीं आ पाऊंगी. इतने प्यारे, मीठे रिश्ते में आई कड़वाहट सहन करना बहुत मुश्किल था. मायके में खड़ी बीच की दीवार रहरह कर मेरी आंखों के आगे आती रही और मेरे गाल भिगोती रही. Hindi Kahani :

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