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Hindi Best Kahani : रोटी – शर्माजी अम्मां को समझाने का प्रयास क्यों कर रहे थे ?

Hindi Best Kahani : ढाई बजे तक की अफरातफरी ने पंडितजी का दिमाग खराब कर के रख दिया था. ये लाओ, वो लाओ, ये दिखाइए, वो दिखाइए, ऐसा क्यों है, कहां है, किस तरह है? इस का सुबूत… उस का साक्ष्य?

पारिवारिक सूची क्या बनी, पूरे खानदान की ही फेहरिस्त तैयार हो गई. पूरे 150 नाम दर्ज हो गए, सभी के पते, फोन नंबर, मोबाइल नंबर, उन का व्यवसाय और उन सब के व्यवसायों से जुड़े दूसरेदूसरे लोग.

पंडित खेलावन ने बेटी की सगाई पिछले माह ही की थी. उन्हें डर था कि कहीं ऐसा कुछ न हो कि उन के संबंधों पर आंच आए, सो कह उठे, ‘‘देखिए शर्मा साहब, आप को मेरे परिवार और मेरे धंधे के बाबत जो कुछ पूछना और जानना है, पूछिए किंतु मेरे समधी को इस में न घसीटिए, प्लीज. बेटी के विवाह का मामला है. कहीं ऐसा न हो कि…’’

पंडित खेलावन को बीच में टोकते हुए शर्माजी बोले, ‘‘देखिए पंडितजी, जिस तरह से आप को अपने संबंधों की परवा है उसी तरह मुझे भी अपनी नौकरी की चिंता है. यह सब तो आप को बताना ही होगा. आखिर आप का, आप के व्यापार का किसकिस से और कैसाकैसा संबंध है, यह मुझे देखना है और यही मेरे काम का पार्र्ट है.’’

तमाम जानकारियां दर्ज कर शर्माजी लंच के लिए बाहर निकल गए थे किंतु पीछे अपनी पूरी फौज छोड़ गए थे. घर के हर सदस्य पर पैनी नजर रखने के लिए आयकर विभाग का एकएक कर्मचारी मुस्तैद था.

पलंग पर निढाल हो पंडित खेलावन ने सारी स्थितियों पर गौर करना शुरू किया. आयकर वालों की ऐसी रेड पड़ी थी कि छिपनेछिपाने की तनिक भी मोहलत नहीं मिली. यह शनि की महादशा ही थी कि सुबहसुबह हुई दस्तक ने उन्हें जैसे सड़क पर नंगा ला कर खड़ा कर दिया हो.

पंडित खेलावन का दिमाग हर समय हर बात को धंधे की तराजू पर तोलता रहता था. पलड़ा अपनी तरफ झुके तभी फायदा है, इसी सिद्धांत को उन्होंने अपनाना सीखा था. और पलड़ा अपनी ओर झुकाने के लिए साम, दाम, दंड, भेद की नीति ही कारगर सिद्ध  होती थी, होती आई है. इसीलिए पूरे जीवन को उन्होंने धंधे की तराजू पर तोला था.

‘‘मुझे, नहीं खाना कुछ भी,’’ कह कर पंडित खेलावन ने थाली परे सरका दी.

‘‘हमारी तो तकदीर ही फूटी थी जो यह दिन देखना पड़ रहा है,’’ पत्नी ने पीड़ा पर मरहम लगाते हुए कहा, ‘‘मैं कहती थी न कि अपने दुश्मनों से होशियार रहो. कहने को भाई हैं तुम्हारे मांजाए. पर हैं नासपीटे…यह सबकुछ उन्हीं का कियाधरा है, नहीं तो…’’ कहतेकहते पंडिताइन सिसकसिसक कर रोने लगीं.

‘‘देख लूंगा…एकएक को देख लूंगा…किसी को नहीं छोड़ं ूगा. मुझे बरबाद करने पर तुले हैं…उन को भी आबाद नहीं रहने दूंगा. क्या मैं उन की रगरग को नहीं जानता हूं कि उन की औलादें क्याक्या गुल खिलाती फिरती हैं? मेरे मुंह खोलने की देर भर है, सब लपेटे में आ जाएंगे.’’

पंडितजी जोरजोर से चिल्ला रहे थे. वह जानते थे कि दीवार के उस पार जरूर भाइयों के कान लगे होंगे, भाभियों को चटखारे लेने का आज अच्छा मौका जो मिला था.

आयकर जांच अधिकारी ने लंच से लौटते ही एकएक चीज का मूल्यांकन करना शुरू किया. पत्नी के काननाक को भी उन्होंने नहीं छोड़ा.

‘‘हर चीज सामने होनी चाहिए…सोना, चांदी, हीरा, मोती, नकदी, बैंकबैलेंस, जमीनजायदाद, फैक्टरी, दुकान, घर, मकान, कोठी, बंगला, खेत खलिहान… सबकुछ नामे या बेनामे.’’

ज्योंज्यों लिस्ट बढ़ती जा रही थी त्योंत्यों पंडित खेलावन का दिल बैठता जा रहा था.

कोई जगह, कोई  कोना, कोई तहखाना नहीं छोड़ा था रेड पार्टी ने. हर कमरे की तलाशी, गद्दोंतकियों को छू- दबा कर देखा तो देखा, दीवारों के प्लास्टर को भी ठोकबजा कर देखने से नहीं चूके.

पंडितजी कुछ कहने को होते तो शर्मा साहब उन्हें बीच में ही रोक देते, ‘‘हम, अच्छी तरह जानते हैं, कहां क्या हो सकता है. टैक्स बचाने के चक्कर में आप लोगों का बस चले तो क्या कुछ नहीं कर सकते?’’

आखिरी कमरा बचा था अम्मां वाला. शर्माजी ने कहा, ‘‘इसे भी देखना होगा.’’

‘‘इस में क्या रखा है…बूढ़ी मां का कमरा है. जाओजाओ, अब उसे भी देख लो…कोई कसर बाकी नहीं रहनी चाहिए पंडितजी की इज्जत का फलूदा बनाने में…’’ झल्लाहट में पंडित खेलावन बड़बड़ा रहे थे.

समाज में इज्जत बनाने के लिए और बाजार में अपनी साख कायम रखने के लिए पंडित खेलावन ने क्याक्या नहीं किया था. थोड़ीबहुत राजनीति में भी दखल रखने का इरादा था. इसीलिए उन्होंने हाथ जोड़ कर नमस्कार करते हुए अपने एक चित्र को परचे पर छपवाया और इस खूबसूरत परचे को शहर के कोनेकोने में चस्पां करवा डाला था. गली, महल्ला, टैक्सी, जीप, बस और रेल के डब्बों में भी उन की पहचान कायम थी.

सबकुछ धो डाला है आज के मनहूस दिन ने. हो न हो, कहीं यह सामने वाली पार्टी की करतूत तो नहीं? हो भी सकता है क्योंकि अभी वह पार्टी पावर में है. उन का मानना था कि अगले चुनाव में केंद्र वाली पार्टी ही राज्य में भी आएगी, इसलिए उस से ही जुड़ना ठीक होगा. पर इस बार के अनुमान में वह गच्चा खा गए.

अम्मां 80 को पार कर रही थीं. इस आयु में तो हर कोई सठिया जाता है. बातबात पर बच्चों जैसी जिद…अब वह क्या जानें कि ये आयकर क्या होता है वह तो जिद पर अड़ी हैं कि अपने कमरे में किसी को नहीं आने देंगी.

आंख से भले ही पूरा दिखाई न देता हो पर किसी बच्चे के पैरों की आहट भी सुनाई दे जाती है तो कोहराम मचा देती हैं…रोने लगती हैं. उन्हें अकेले पड़े रहना ही सुहाता है. अब अम्मां को कौन समझाए कि ये रेड पार्टी वाले जो ठान लेते हैं कर के ही दम लेते हैं, उन्हें तो यह कमरा भी चेक कराना ही होगा.

शर्माजी समय की नजाकत को जानते थे और जांचपड़ताल के दौरान किस के साथ कैसा व्यवहार कर के जड़ तक पहुंचना है, खूब जानते थे. उन्होंने सभी को रोक कर अकेले अम्मां के कमरे में प्रवेश किया.

‘‘अम्मां, पांव लागूं. कैसी हो अम्मां जी. बहुत दिनों से सुनता था कि बड़ेबूढ़ों का आशीर्वाद जीवन में पगपग पर कामयाबी देता है, क्या ऐसा वरदान आप मुझे नहीं देंगी?’’

‘‘बेटा, सब करनी का फल है… आशीषों से क्या होता है? पर तुम हो कौन? सुबह से इस घर में कोहराम मचा हुआ है. क्यों परेशान कर रखा है मेरे बच्चों को?’’ अम्मां के शब्दों में तल्खी भी थी और आर्तनाद भी, जैसे वह सबकुछ जानतीसमझती हों.

शर्माजी ने अम्मां को जैसे समझाने का प्रयास किया, ‘‘हम लोग सरकारी आदमी हैं, अम्मां. हमारा काम है गलत तरीकों से कमाए गए रुपएपैसों की पड़ताल करना…खरी कमाई पर खरा टैक्स लेना सरकार का कायदा है. अब देखिए न अम्मांजी, मैं ठहरा सरकारी मुलाजिम. मुझे आदेश मिला है कि पंडित खेलावन पर टैक्स चोरी का मुआमला है, उस की छानबीन करो…सो आदेश तो बजाना ही होगा न…अब बताइए अम्मां, इस में मेरा क्या दोष है? जो खरा है तो खरा ही रहेगा…पंडितजी ने कोई गुनाह किया नहीं है तो उन्हें सजा कैसे मिल सकती है पर खानापूर्ति तो करनी ही होगी न…’’

‘‘सो तो है, बेटा…तुम आदमी भले लगते हो. मुझ से क्या चाहते हो? सारे घर का हिसाब तो तुम ले ही चुके हो…लो, मेरा कमरा भी देख लो. यही चाहते हो न…पूरी कर लो अपनी ड्यूटी,’’ शर्माजी की बातों से अम्मां प्रभावित हुई थीं.

पुराने कमरे में क्या लुकाधरा है लेकिन शर्माजी की पैनी नजर ने संदेह तो खड़ा कर ही दिया था.

‘‘इस संदूक में क्या है? अम्मां, जरा खोल कर दिखाओ तो,’’ शर्माजी ने कहा तो अम्मां जैसे फिर बिफर पड़ीं, ‘‘नहीं… नहीं, इसे नहीं खोलने दूंगी. तुम इसे नहीं देख सकते…’’

‘‘लेकिन ऐसा भी क्या है, अम्मां, संदूक को जरा देख तो लेने दो,’’ शर्माजी बोले, ‘‘आप ने ही तो कहा है कि मुझे मेरी ड्यूटी पूरी करने देंगी. सो समझिए कि मेरी ड्यूटी में हर बंद चीज को खोल कर देखना शामिल है.’’

अम्मां ने अब और जिद नहीं की. खटिया से उठीं, दरवाजा भीतर से बंद किया.

संदूक का नाम सुनते ही पंडिताइन के मन में खटका हुआ था कि हो न हो, बुढि़या ने सब से छिपा कर जरूर कुछ बचा रखा है. इसीलिए वह अपने संदूक के पास किसी को फटकने तक नहीं देती थीं. जरूर कुछ ऐसा है जिसे शर्माजी ताड़ गए हैं, नहीं तो…

इधर पंडितजी भी शंकालु हो उठे तो पंडिताइन से कहने लगे, ‘‘अम्मां रहती हैं मेरे यहां और मन लगा रखा है दूसरे बेटों के साथ. भले ही वे उन्हें न पूछते हों. कहीं ऐसा तो नहीं है कि बड़के भैया के लिए कुछ रख छोड़ा हो. चलो, जो भी होगा, आज सामने आ ही जाएगा.’’

बंद कमरे में पसरे अंधकार में पिछली खिड़की से जो थोड़ी रोशनी की लकीर  आ रही थी उसी रोशनी में संदूक रखा था. ताला खोल कर ज्यों अम्मां ने संदूक का ढक्कन उठाया तो शर्माजी अवाक् रह गए.

‘‘रोटियां, ये क्या अम्मां… रोटियां और संदूक में?’’

‘‘हां, बेटे, यही जीवन का सत्य है… रोटियां. इन्हीं के लिए इनसान दुनिया में जीता है, जीवन भर भागता फिरता है, रातदिन एक करता है, बुरे से बुरा काम करता है. किस के लिए ? रोटी के लिए ही तो. खानी उसे सिर्फ दो रोटी ही हैं. फिर भी न जाने क्यों…’’ कहतेकहते अम्मां का गला भर उठा था.

‘‘लेकिन मांजी, ये तो सूखी रोटियां हैं. आप ने इन्हें संदूक में सहेज कर क्यों रख छोड़ा है?’’ शर्माजी इस गुत्थी को सुलझा नहीं पा रहे थे, भले ही उन्होंने बड़ी से बड़ी गुत्थियों को सुलझा दिया हो.

‘‘सप्ताह में एक दिन ऐसा भी आता है बेटे, जब कोई भी घर में नहीं रहता. इतवार को सभी बाहर खाना खाते हैं. उस दिन घर में रोटी नहीं बनती. उसी दिन के लिए मैं इन्हें बचाए रखती हूं. दो रोटियों को पानी में भिगो देती हूं और फिर किसी न किसी तरह से उन्हें चबा कर पेट भर ही लेती हूं…लो बेटे, तुम ने तो देख ही लिया है… अब इस कटुसत्य को पूरे घर के सामने भी जाहिर हो जाने दो…न जाने मेरे बच्चे क्या सोचेंगे.’’ आंसू पोंछते हुए अम्मां ने बंद दरवाजा खोल दिया. Hindi Best Kahani :

Hindi Family Story : उपलब्धि – नौकरानी और मालकिन की अद्भुत कहानी

Hindi Family Story : इतवार को सोचा था पर मेहमान आ गए तो उन्हीं में व्यस्त होना पड़ा. आज भी छुट्टी है और नाश्ता भी पकौडि़यों का भरपेट हो चुका है. खाना आराम से बनेगा. रसोई का हर कोना उस ने रगड़रगड़ कर अच्छी तरह चमकाया. फिर रैकों पर साफ अखबार, प्लास्टिक बिछाए.

अंदर जब कुछ सर्दी लगने लगी थी तो सोचा थोड़ी देर धूप में बैठ कर अखबार पढ़ लूं फिर खाने का काम शुरू होगा. तब तक रसोईघर भी सूख जाएगा.

अखबार ले कर शीला छत पर अभी आई ही थी कि पति विनोद की आवाज सुनाई दी, ‘‘अरे भई, कहां हो? आज खाना नहीं बनेगा क्या?’’ यह कहते हुए वह भी छत पर आ गए.

‘‘अभी तो भरपेट नाश्ता हुआ है सब का. आप ने भी तो किया है.’’

‘‘शीला, जानती हो मैं नाश्ता नहीं करता हूं. बच्चों का मन रखने के लिए 2-4 पकौडि़यां ले ली थीं. मुझे तो हर रोज 10 बजे खाने की आदत है. फिर भी बहस किए जा रही हो.’’

‘‘क्यों? आप इतवार को सब के साथ देर से खाना नहीं खाते हैं?’’

‘‘पर आज इतवार नहीं है. अब नहीं बना है तो और बात है. मुझे तो पहले ही पता है कि आजकल तुम्हारी हर काम को टालने की आदत हो गई है. अब यह समय अखबार पढ़ने का है या घर के काम का. दूसरी औरतों को देखा है, नौकरी भी करती हैं और घर भी कितनी कुशलता से संभालती हैं. यहां तो बच्चे भी बड़े हो गए हैं, काम करने को नौकरानी है फिर भी हर काम देरी से होता है.’’

विनोद के ऊंचे होते स्वर के साथ शीला का मूड बिगड़ता चला गया.

शीला अखबार वहीं पटक कर नीचे रसोईघर में गई. उबले आलू रखे थे वे छौंक दिए और फटाफट आटा गूंध कर परांठे बना दिए. पर खाना देख कर विनोद का पारा और चढ़ गया.

‘‘यह क्या? सिर्फ सब्जी, परांठे. तुम जानती ही हो कि लंच के समय मैं पूरी खुराक लेता हूं. जब नाश्ता बंद कर दिया है तो खाना तो कम से कम ढंग का होना चाहिए. पता नहीं तुम्हें क्या हो गया है. सारे ऊलजलूल कामों के लिए तुम्हारे पास समय है, बस, मेरे लिए नहीं.’’

गुस्से में विनोद ने थाली सरका दी थी. शीला का मन हुआ कि वह भी फट पडे़. एक तो दिन भर काम में जुटे रहो उस पर फटकार भी सुनो.  आखिर कुसूर क्या था, रसोई की सफाई ही तो की थी. चाय, नाश्ता, खाना, घर की संभाल, बच्चों की देखरेख में उस ने जिंदगी गुजार दी पर किसी को संतोष नहीं. बच्चों को लगता है मां आधुनिक, स्मार्ट नहीं हैं जैसी औरों की मम्मी हैं. विनोद को तो अब नौकरीपेशा औरतें अच्छी लगने लगी हैं. चार पैसे जो कमा कर लाती हैं. घरगृहस्थी संभा-लने वाली तो इन की नजरों में गंवार ही हैं.

विनोद तो बाहर निकल गए थे पर शीला ने बेमन से पूरा खाना बनाया. शुभा भी तब तक सहेली के घर से आ गई थी, और शुभम कोच्ंिग से. दोनों को खाना खिला कर वह अपने कमरे में आ गई.

और दिन तो शीला काम पूरा करने के बाद टीवी देखती, अधबुना स्वेटर पूरा करती या कोई पत्रिका पढ़ती पर आज कुछ भी करने का मन नहीं था. विनोद का यह बेरुखी भरा व्यवहार वह पिछले कई दिनों से देख रही थी. आखिर कहां गलत हो गई वह. क्या इन घरेलू कामों की कोई अहमियत नहीं है? अगर बाहर नौकरी करती होती तो क्या तभी तक शख्सियत थी उस की?

शादी हुए 18 साल हो गए. जब शादी हुई थी उसी साल एम.ए. फर्स्ट डिवीजन में पास किया था. चाहती तो तभी नौकरी कर सकती थी. इच्छा भी थी पर उस समय तो ससुराल वालों को नौकरी करती हुई बहू पसंद नहीं थी.

विनोद भी तब यही कहते थे कि बच्चों को अच्छे संस्कार दो, उन की पढ़ाई में मदद करो, घर संभाल लो, यही बहुत है मेरे लिए.

उस ने सबकुछ तो उन्हीं की इच्छानुसार किया था. देवर की शादी हो गई, देवरानी आ गई तब भी सासससुर उसी के पास रहे.

‘‘बड़ी बहू हम लोगों का जितना ध्यान रखती है छोटी नहीं रख पाती,’’ मांजी तो अकसर कह देती थीं.

बच्चों को संभालना, बूढ़े सासससुर की सेवा करना, घरगृहस्थी देखना, सबकुछ तो कुशलता से निभाया था उस ने. फिर ससुरजी की मौत के बाद यह सोच कर मांजी का खयाल वह और भी रखने लगी थी कि कहीं इन्हें अकेलापन महसूस न हो.

पर अब क्या हो गया? ठीक है, बच्चे अब बड़े हो गए हैं. उन्हें अब उस की उतनी जरूरत नहीं रही है. मांजी ने भी अपनेआप को सत्संग, भजन, पूजन में व्यस्त कर लिया है. विनोद का प्रमोशन हुआ है तब से उन की भी जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं. मकान का लोन लिया है तो खर्चे भी बढ़ गए हैं. बच्चों की भारी पढ़ाई है फिर शुभा की शादी भी 4-5 साल में करनी है. शायद इसी बात को ले कर विनोद को अब नौकरीपेशा औरतें अच्छी लगने लगी हैं. पर क्या देखते नहीं कि उस की भी तो व्यस्तता बढ़ गई है. सुबह 6 बजे से काम की जो दिनचर्या शुरू होती है तो रात को ही सिमटती है. फिर उन्हें ऐसा क्यों लगता है कि वह फालतू है?

घर के सारे काम क्या अपनेआप हो जाते होंगे, और तो और शुभा जब से बाहर होस्टल में गई है और शुभम की कोचिंग शुरू हुई है, बाजार के भी सारे काम उसे ही करने पड़ रहे हैं. पर नहीं, सब को यही लगता है कि वह फालतू है. सब को उस से शिकायतें ही शिकायतें हैं. और तो और मांजी पहली बार 10-15 दिन को देवर के पास गईं तो वह भी जाते समय कहने में नहीं चूकीं, ‘‘बहू, तुम मेरी देखभाल करतेकरते थक जाती हो तो सोचा कि छोटी के पास कुछ दिन रह लूं.’’

अनमनी सी शीला फिर बाहर बरामदे में पड़े मूढ़े पर आ कर बैठ गई थी. शुभा पास ही बैठी सिर झुकाए डायरी में कुछ लिख रही थी.

‘‘क्या कर रही है?’’

‘‘मां, अब दिसंबर खत्म हो रहा है न, तो अपनी उपलब्धियां लिख रही हूं इस जाते हुए साल की और तय

कर रही हूं कि अगले साल मुझे

क्याक्या करना है. नए संकल्प भी तो करूंगी न…’’

‘‘अच्छा, क्या उपलब्धियां रहीं?’’

‘‘मां, विशेष उपलब्धि तो इस वर्ष की यह रही कि मेरा मेडिकल में चयन हो गया. अब मैं संकल्प करूंगी कि मेरा कैरियर इतना ही अच्छा रहे. अच्छे नंबर आते रहें हर परीक्षा में.’’

शुभा कुछ सोचते हुए बोली, ‘‘ममा, मैं अपनी ही नहीं शुभम और पापा की भी उपलब्धियां लिखूंगी. देखो न, शुभम को इस साल स्कूल में बेस्ट स्टूडेंट का अवार्ड मिला है और पापा का तो प्रमोशन हुआ है न…’’

शीला ने भी उत्सुक हो कर शुभा की डायरी में झांका था तो वह बोली, ‘‘ममा, आप भी अपनी उपलब्धियां बताओ, मैं लिखूंगी. और आप अगले साल क्या करना चाहोगी. यह भी…’’

शीला का उत्साह फिर से ठंडा हो गया. क्या बताए, कुछ भी तो उपलब्धि नहीं है उस की. अब घर भर के लिए फालतू जो हो चली है वह…और एक ठंडी सांस न चाहते हुए भी उस के मुंह से निकल ही गई.

‘‘ओह मां, आप बहुत थक गई हो, आप को थोड़ा चेंज करना चाहिए…’’

शुभा कह ही रही थी कि फोन की घंटी बजने लगी. शुभा ने ही दौड़ कर फोन उठाया था.

‘‘मां, मामा का फोन है. पूछ रहे हैं कि शेफाली की शादी में हम लोग कब पहुंच रहे हैं. लो, बात कर लो.’’

‘‘हां, भैया, अभी तो कुछ तय नहीं हुआ है. बात यह है कि इन्हें तो फुरसत है नहीं क्योंकि बैंक की क्लोजिंग चल रही है. शुभम के अगले ही हफ्ते बोर्ड के इम्तहान हैं.’’

‘‘पर तू तो आ सकती है.’’

शीला क्या जवाब दे यह सोच ही रही थी कि शुभा ने आ कर दोबारा फोन ले लिया और बोली, ‘‘मामा, हम लोग भले ही न आ पाएं पर मम्मी जरूर आएंगी,’’ और शुभा ने फोन रख दिया था.

‘‘मां, आप हो आइए न,’’ शुभा आग्रह करते हुए बोली, ‘‘भोपाल है ही कितनी दूर. एक रात का ही तो सफर है. आप का चेंज भी हो जाएगा और नातेरिश्तेदारों से मुलाकात भी हो जाएगी. और फिर दोनों मौसियां भी तो आ रही हैं.

‘‘मां, आप यहां की चिंता न करें. मैं घर संभाल लूंगी. बस, पापा और शुभम का ही तो खाना बनाना है. फिर लीला बाई है ही मदद के लिए. बस, आप तो अपनी तैयारी करो.’’

जाने का खयाल तो अच्छा लगा था शीला को भी पर विनोद क्या तैयार हो पाएंगे? शीला अभी भी असमंजस में ही थी पर शुभा ने विनोद को राजी कर लिया था. फटाफट दूसरे दिन का आरक्षण भी हो गया और शुभा ने मां की सारी तैयारी करवा दी.

शादी की गहमागहमी में शीला को भी अच्छा लगा था. रातरात भर जाग कर बहनों में गपशप होती रहती. सब रिश्तेदारों के समाचार मिले. भैया ने बेटी की शादी खूब धूमधाम से की थी.

शेफाली के विदा होते ही घर सूना हो गया था. रिश्तेदार तो चल ही दिए थे, बहनों ने भी जाने की तैयारी कर ली थी.

‘‘भैया, मुझे भी अब लौटना है,’’ शीला ने याद दिलाया था.

‘‘अरे, तुझे क्या जल्दी है. शोभा और शशि तो नौकरीपेशा हैं. उन की छुट्टियां नहीं हैं इसलिए उन्हें लौटने की जल्दी है पर तू तो रुक सकती है.’’

भैया ने सहज स्वर में ही कहा था पर शीला को लगा जैसे किसी ने फिर कोमल मर्म पर चोट कर दी है. सब व्यस्त हैं वही एक फालतू है, वहां भी सब यही कहते हैं और यहां भी.

भैया के बहुत जोर देने पर वह 2 दिन रुक गई पर लौटना तो था ही. बेटी वापस जाएगी. शुभम पता नहीं ढंग से पढ़ाई कर भी रहा होगा या नहीं. सबकुछ भूल कर उसे भी अब घर की याद आने लगी थी.

स्टेशन पर सभी उसे लेने आए थे.

‘‘मां, बस, दादी नहीं आ पाईं आप को लेने क्योंकि वह अभी यहां नहीं हैं पर उन के 2 फोन आ गए हैं और वे जल्दी ही वापस आ रही हैं, कह रही थीं कि मन तो बड़ी बहू के पास ही लगता है.’’

शुभा ने पहली सूचना यही दी थी. उधर शुभम कहे जा रहा था, ‘‘आप ने इतने दिन क्यों लगा दिए लौटने में, 2 दिन ज्यादा क्यों रुकीं?’’

‘‘अच्छा, पहले घर तो पहुंचने दे.’’

शीला हंस कर रह गई थी. विनोद चुपचाप गाड़ी चला रहे थे. घर पहुंचते ही शुभा गरम चाय ले आई थी. शीला ने कमरे को देखा तो काफी कुछ अस्तव्यस्त सा लगा.

‘‘मां, अब यह मत कहना कि मैं ने घर की संभाल ठीक से नहीं की और रसोई को देख कर तो बिलकुल भी नहीं. आप तो बस, चाय पीओ…और फिर अपना घर संभालना…’’

शुभा ने मां के आगे एक डायरी बढ़ाई तो वह बोली, ‘‘यह क्या है?’’

‘‘मां, आप तो अपनी इस साल की उपलब्धियां बता नहीं पाई थीं पर पापा ने खुद ही आप की तरफ से यह डायरी पूरी कर दी, और पता है सब से ज्यादा उपलब्धियां आप की ही हैं…लो, मैं पढ़ूं…’’

शुभा उत्साह से पढ़ती जा रही थी.

‘‘हम सब को बनाने में आप का ही योगदान रहा. मेरा मेडिकल में चयन हुआ आप की ही बदौलत. मैं एक बार मेडिकल में असफल हो गई थी तब आप ही थीं जिन्होंने मुझे दोबारा परीक्षा के लिए प्रेरित किया और शुभम को स्कूल के बेस्ट स्टूडेंट का अवार्ड मिलना आप की ही क्रेडिट है. सुबह जल्दी उठ कर बेटे को तैयार करना, नाश्ते, खाने से ले कर हर चीज का ध्यान रखना, उस का होेमवर्क देखना, और तो और यह आप की ही मेहनत और लगन थी कि पापा का प्रमोशन हुआ. पापा कह रहे थे कि जब कभी आफिस में किसी कारण से उन्हें लौटने में देर हो जाती तो आप ने कभी शिकायत नहीं की बल्कि उन की गैरमौजूदगी में दादी को डाक्टर के पास तक आप ही ले कर जाती रहीं…’’

‘‘बसबस…अब बस कर,’’ शीला ने शुभा को टोका था. उधर विनोद मंदमंद मुसकरा रहे थे.

‘‘अब नया संकल्प हम सब लोगों का यह है कि तुम इसी तरह हम सब का ध्यान रखती रहो…’’ विनोद के कहते ही सब हंस पड़े थे. उधर शीला को लग रहा था कि एक घना कोहरा, जो कुछ दिनों से मन पर छा गया था, अचानक हटने लगा है. Hindi Family Story :

Interesting Fact : तितली के पैर, बिल्ली के कान, बारिश की मिट्टी की खुशबू, भारत में समोसे

Interesting Fact :

  1. तितली अपने पैरों से टैस्ट करती है

तितलियां सिर्फ खूबसूरत नहीं, बल्कि बेहद अनोखी भी होती हैं. उन के पैरों में ‘टैस्ट सैंसर्स’ होते हैं. वे किसी फूल पर बैठती हैं, तो अपने पैरों से उस फूल के रस यानी नैक्टर का स्वाद महसूस करती हैं.

  1. बिल्ली के कान – छोटे राडार

बिल्ली के हर कान में 32 छोटीछोटी मसल्स होती हैं. इसी वजह से वह दूर की बहुत हलकी आवाज़ भी सुन लेती है. जब बिल्ली किसी आवाज़ की दिशा जानना चाहती है तो वह अपने कानों को उस दिशा में मोड़ देती है, बिलकुल एक मिनी राडार की तरह.

  1. बारिश की मिट्टी की खुशबू – ‘पेट्रिकोर’

जब पहली बारिश होती है और मिट्टी से जो भीनी खुशबू आती है उसे पेट्रिकोर कहा जाता है. यह असल में पौधों से निकलने वाले तेल और मिट्टी के बैक्टीरिया की खुशबू होती है, जो बारिश की पहली बूंद से उठती है. यह खुशबू हमें सुकून देती है.

  1. सांता क्लौज: नीलेहरे से लाल कपड़ों तक का सफ़र

सांता क्लौज की शुरुआत आज जैसी नहीं थी. शुरुआती चित्रों और कलात्मक रूपों में सांता अलगअलग रंगों के कपड़े पहनते नजर आते थे, कभी नीले, कभी हरे, कभी भूरे और कई बार सफ़ेद. 1931 में कोकाकोला ने सर्दी की अपनी विज्ञापन मुहिम के लिए कलाकार हैडन सन्डब्लोम को सांता की तसवीरें बनाने के लिए चुना. उन्होंने सांता को मोटातगड़ा व हंसमुख सफेद दाढ़ी वाला और चमकीली लाल पोशाक पहने हुए दिखाया (जो कोकाकोला के ब्रैंड रंग से भी मेल खाती थी). इन विज्ञापनों ने इतनी लोकप्रियता हासिल की कि लाल कपड़ों वाला सांता क्लौज पूरी दुनिया में ‘स्टैंडर्ड’ छवि बन गया.

  1. भारत में समोसों की शुरुआत कैसे हुई?

समोसे मूल रूप से भारत में नहीं बने थे. इन की उत्पत्ति मध्य एशिया और मध्यपूर्व में हुई थी, जहां इन्हें ‘संबोसा’, ‘संबूसा’ या ‘संबुसक’ कहा जाता था. लगभग 10वीं से 13वीं शताब्दी के बीच मध्य एशिया के व्यापारी और मुसाफ़िर भारत आए. वे अपने साथ यह भरा व तला हुआ नाश्ता लाए, जिसे भारत में धीरेधीरे समोसा कहा जाने लगा. भारत आने के बाद इस में काफी बदलाव हुए. पहले इस में मांस और मेवे भरे जाते थे. भारत में आ कर लोगों ने इस में आलू, मटर और मसाले भरने शुरू किए. समय के साथ यह देशभर का लोकप्रिय स्ट्रीट फूड बन गया.

  1. क्यों इंदौर को माना जाता है देश का सब से स्वच्छ शहर

इंदौर में लगातार कचरा प्रबंधन, सफाई व्यवस्था, सार्वजनिक स्वच्छता और नागरिक भागीदारी जैसे पहलुओं पर मजबूती से काम किया जाता है. सालों तक (लगातार 8वीं बार) भारत की वार्षिक स्वच्छता सर्वे में ‘सब से स्वच्छ शहर’ का खिताब जीता है. इस का मतलब है कि इंदौर न केवल सड़कों, गलियों व सार्वजनिक स्थानों में साफसफाई के लिए जाना जाता है बल्कि वहां रहने वाले लोगों की सक्रिय भागीदारी भी इसे सफल बनाती है. Interesting Fact :

Love Problems : “वह मेरे साथ सहज नहीं”, “शादी के नाम से झगड़ा”, “मैं उस की प्राथमिकता नहीं”, “हमारे रिश्ते पर इसका असर”

Love Problems : मेरा बौयफ्रैंड चैट पर बहुत रोमांटिक और बातूनी है लेकिन जब हम आमने-सामने मिलते हैं तो वह शांत रहता है. कभी-कभी मुझे लगता है कि शायद वह मेरे साथ सहज नहीं है. क्या यह सामान्य है?

बहुत से लोग टेक्स्ट में खुल कर बोल लेते हैं क्योंकि वहां सोच कर जवाब देने की सुविधा होती है. आमने-सामने घबराहट या संकोच हो सकता है.

उन्हें थोड़ा समय दीजिए. कोशिश करें कि मिलने पर हलकी, आसान और मज़ेदार बातों से शुरुआत हो. धीरे-धीरे वे सहज हो जाएंगे.

यह ज़रूरी नहीं कि समस्या रिश्ते में हो, शायद अपने व्यक्तित्व के कारण वे ऐसे हों.

हम शादी के नाम पर बार-बार झगड़ते हैं. हम 5 साल से रिलेशनशिप में हैं. मैं शादी के लिए तैयार हूं लेकिन मेरा बौयफ्रैंड कहता है कि अभी कैरियर सेट नहीं हुआ. मुझे लगता है कि वह बात टाल रहा है. इस वजह से हमारा रिश्ता तनाव में है.

शादी जीवन का बड़ा फैसला है और हर व्यक्ति अपने समय से तैयार होता है. आप यह समझने की कोशिश करें कि क्या सचमुच करियर कारण है या वह भावनात्मक रूप से निर्णय को लेकर दुविधा में है.

एक हलकी, साफ बातचीत करें जिस में आप यह पूछें कि वह शादी को कितने समय बाद व्यावहारिक मानता है. अगर समय-सीमा स्पष्ट हो जाए, तो तनाव कम होगा. अगर वह किसी ठोस कारण के बिना लगातार टाल रहा है तो अपने भविष्य का सोच कर समझदारी से निर्णय लेना पड़ेगा.

मेरी गर्लफ्रैंड सोशल मीडिया पर तो बहुत एक्टिव है लेकिन मेरे लिए टाइम नहीं. वह इंस्टाग्राम पर लगातार पोस्ट करती रहती है, रील्स बनाती है, दोस्तों से चैट करती है लेकिन मेरे मैसेज का जवाब देर से देती है. मुझे लगता है कि शायद मैं उस की प्राथमिकता नहीं रहा.

आज के समय में सोशल मीडिया कई लोगों के लिए एक तरह का एक्सप्रेशन बन गया है. पर आप की शिकायत भी वाजिब है क्योंकि रिश्तों में ध्यान और समय बहुत मायने रखते हैं.

शांत तरीके से उसे बताइए कि यह व्यवहार आप को अनदेखा महसूस कराता है. कोशिश करें कि आप दोनों दिन का एक समय ‘नो फोन ज़ोन’ रखें, जब सिर्फ आपस में बात हो. अगर वह आप को अपनी प्राथमिकता मानती है, तो वह इस बदलाव को समझेगी और अपनाएगी.

मेरे बॉयफ्रेंड को दोस्तों के साथ समय बिताना ज्यादा पसंद है. मैं और मेरा बौयफ्रैंड पिछले डेढ़ साल से साथ हैं, लेकिन पिछले कुछ महीनों से वह हर वीकेंड दोस्तों के साथ ही प्लान बनाता है. मैं समझती हूं कि दोस्त भी ज़रूरी हैं लेकिन मुझे लगता है कि हमारे रिश्ते पर इस का असर पड़ रहा है. क्या मैं ज्यादा सोच रही हूं?

यह पूरी तरह सामान्य है कि किसी व्यक्ति को अपने दोस्तों के साथ समय बिताने की ज़रूरत होती है. पर रिश्ते में संतुलन भी उतना ही ज़रूरी है. आप उस से हलके माहौल में बिना शिकायत किए अपनी भावना बताइए कि आप उस के समय को मिस करती हैं और चाहती हैं कि हफ्ते में एक-दो दिन सिर्फ आप दोनों के लिए तय हो.

अगर वह आप को समझता है, तो वह खुद ही आप का ध्यान रखेगा. रिश्तों में ‘मांगने’ से ज्यादा ‘समझाने’ का असर होता है. Love Problems :

Love Problems : “नियंत्रणकारी व्यवहार परेशानी का सबब”, “फिर से वही दर्द न झेलना पड़े”

Love Problems : मैं 22 वर्ष की कॉलेज छात्रा हूं. मेरा एक बॉयफ्रेंड है जिस से मेरा रिश्ता 2 वर्षों से चल रहा है. शुरू में वह बहुत केयरिंग और समझदार था लेकिन कुछ महीनों से उस का बरताव बदल गया है. वह अब बहुत ज्यादा पजेसिव हो जाता है. मैं किसी दोस्त से बात कर लूं तो उसे बुरा लग जाता है, मेरे कपड़ों पर टिप्पणी करता है और हर वक्त जानना चाहता है कि मैं कहां हूं. जब मैं उसे समझाने की कोशिश करती हूं तो कहता है, ‘मैं, बस, तुम्हारी फिक्र करता हूं.’

मुझे उस से प्यार तो है लेकिन लगातार कंट्रोल करने वाला उस का व्यवहार मुझे परेशान करने लगा है. मैं नहीं चाहती कि यह रिश्ता टूटे लेकिन मैं अपनी आजादी भी नहीं खोना चाहती. कृपया बताइए कि मुझे क्या करना चाहिए?

आप की समस्या आज की कई युवतियों के दिल की बात है. प्यार में अपनापन ज़रूरी है लेकिन कंट्रोल कभी भी सच्चे प्यार की निशानी नहीं होता. यह व्यवहार आप के बॉयफ्रेंड की असुरक्षा और असंतुलित आत्मविश्वास को दर्शाता है.

सबसे पहले आप उन से शांत मन से बात करें. उन्हें समझाएं कि प्यार भरोसे पर टिका होता है, निगरानी पर नहीं. यह भी स्पष्ट करें कि आप को अपनी पहचान और स्वतंत्रता की आवश्यकता है जो किसी भी स्वस्थ रिश्ते की बुनियाद होती है.

अगर वे आप की भावनाओं को समझने और सुधारने की कोशिश करते हैं, तो रिश्ता संभालने लायक है. लेकिन अगर बातचीत के बाद भी उन का व्यवहार नहीं बदलता, तो यह सोचें कि क्या आप ऐसे रिश्ते में रह कर वास्तव में खुश रह पाएंगी.

कभी-कभी ‘छोड़ देना’ भी अपने आत्मसम्मान और मानसिक शांति को बचाने का सबसे सही तरीका होता है.

मैं 24 वर्ष की हूं, पिछले 3 वर्षों से एक रिश्ते में थी. हमारा ब्रेकअप 6 महीने पहले हुआ था क्योंकि वह मुझे समय नहीं दे पा रहा था और अक्सर झगड़ा हो जाता था. ब्रेकअप के बाद मैं ने खुद को संभाल लिया, नौकरी में ध्यान दिया और धीरे-धीरे सब ठीक होने लगा.

अब अचानक कुछ हफ़्तों से मेरा एक्स बौयफ्रैंड दोबारा संपर्क करने की कोशिश कर रहा है. वह कहता है कि उस ने अपनी गलती समझ ली है और दोबारा रिश्ता शुरू करना चाहता है. मेरे दिल में अभी भी कहीं न कहीं उस के लिए भावनाएं हैं, लेकिन मैं डरती हूं कि फिर से वही दर्द न झेलना पड़े.

क्या मुझे उसे एक और मौका देना चाहिए या अपने रास्ते पर आगे बढ़ जाना चाहिए?

आप की स्थिति बहुत स्वाभाविक है— जब कोई पुराना रिश्ता लौटता है, तो दिल और दिमाग दोनों अलग दिशा में खींचते हैं. सब से पहले, दिल के बजाय विवेक से सोचें. यह जांचें कि उस ने केवल भावनाओं के बहाव में बात की है या सच में वह अपने व्यवहार में बदलाव लाया है. क्या वह अब वही गलतियां नहीं दोहराएगा जिन से रिश्ता टूटा था?

अगर संभव हो तो पहले दोबारा डेटिंग के बजाय बातचीत से शुरुआत करें पुराने दोस्त की तरह. उस के इरादे, व्यवहार और संवेदनशीलता को परखें. अगर आप को लगे कि वह अब परिपक्व है और रिश्ता निभाने को तैयार है, तभी दूसरा मौका देने पर विचार करें. लेकिन अगर उस की वापसी सिर्फ आप की भावनात्मक कमजोरी को भुनाने की कोशिश लगती है, तो पीछे हट जाएं. याद रखें, ‘पुराने रिश्ते को ज़िंदा करना’ तभी सार्थक है जब दोनों लोग सच में बदले हों, सिर्फ हालात नहीं. कभी-कभी ‘नए सिरे से खुद को अपनाना’ पुराने प्यार को अपनाने से कहीं ज्यादा सुकून देता है. Love Problems :

Bihar Assembly Election 2025 : सरित प्रवाह – बिहार विधानसभा चुनाव

Bihar Assembly Election 2025 : बिहार विधानसभा चुनावों में भारी जीत पा कर नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने साबित कर दिया है कि चुनावी जीत के लिए जमीन पर काम करना होता है, सिर्फ नारों और आरोपों से काम नहीं चलता. जहां भारतीय जनता पार्टी के सेवक घर-घर जा कर वोट बटोरते रहे, वहीं राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के नेता तेजस्वी यादव और राहुल गांधी सभाओं में उमड़ी भीड़ को देख कर खुश होते रहे.

चुनावी सभाओं में भीड़ तो जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर शर्मा को सुनने भी आती थी जो बिहार में परिवर्तन की आंधी लाने का दम भर रहे थे. चुनावी नतीजे में उन का हाल तो बहुत ही बुरा रहा, वे जीरो पर रहे.

भारतीय जनता पार्टी ने सावधानी से वर्षों से लगातार मेहनत कर के वोट बटोरे हैं. उस के कार्यकर्ता हिंदू धर्म को पुनर्स्थापित करने के लिए वर्ण और जाति के भेद पर पतली भगवा चादर लपेट कर गांव-गांव, गली-गली काम करते रहे और दूसरी पार्टियों के बड़े नेता जमींदारों की तरह तो छोटे नेता खार खाए कारिंदों की तरह मन मान कर काम करते रहे.

लोकतंत्र सिर्फ नारों से नहीं चलता. लोकतंत्र के लिए मेहनत करनी पड़ती है. भाजपा व उस का स्वयंसेवक संघ इस मेहनत को उन हजारों, लाखों मंदिरों, मंदिरों से जुड़े स्कूलों-कॉलेजों, धर्म व्यवस्था के दूसरे अंगों जैसे ज्योतिषियों, वास्तुविदों, प्रवचनों, भाषणों, सोशल मीडिया से करवाता है. लोकतंत्र में भी नेता और वोटर का सीधा संबंध जरूरी है जिसे लालू यादव का परिवार व गांधी परिवार अब भूल चुके हैं.

एक जमाने में कांग्रेस का एक छोटा-बड़ा कार्यालय हर मोहल्ले में होता था. आज उस पर भाजपा का बोर्ड लटक रहा है. यह कार्यालय चाहे कुछ न करे, आने वाले को अपनेपन का एहसास दिलाता है. लेकिन अब कांग्रेस सेवादल का नामोनिशान नहीं है. लालू यादव ने ऐसी कोई मशीनरी बनाई होगी भी तो विरोधियों ने उस पर जंगल राज की कालिख पोत दी है और लगने लगा कि यह कहीं रंगदारी का अड्डा तो नहीं?

भाजपा की केंद्र सरकार ने सभी तरीकों का पूरा उपयोग किया. मीडिया को खरीद कर रखा. न्यायपालिका के पास सरकार की हां में हां मिलाने के अलावा कोई चारा न रखा. वर्ण व्यवस्था ने पेड़ की मजबूत जड़ों का लाभ उठा कर उस के सहारे छोटों को भी नीचे पनाह दे दी. वोट बटोरने के लिए हर जाति को समेट लिया.

भारतीय जनता पार्टी ने हरियाणा और बिहार के चुनाव जीत कर साबित कर दिया है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में जो धक्का उसे लगा था, वह एक छोटी लड़ाई में हार थी, बड़ा युद्ध तो अभी उसी के हाथों में है. विपक्ष आज पहले से ज्यादा बिखरा व ज्यादा निरुद्देश्य नजर आ रहा है. उस के पास न मुद्दे हैं और न जनता को लुभाने के नारे. वह चुनाव लड़ता है सिर्फ सत्ता पाने के लिए, बिना लंबी मेहनत के.

प्रदूषण और सत्ताधारी

प्रदूषण पर आजकल जगह-जगह धरने-प्रदर्शन होने लगे हैं और दिल्ली में तो पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा है. केंद्र सरकार इसे अपनी आलोचना मान रही है. वह चाहती है कि लोग प्रदूषण का दोष भी विपक्ष पर ही डालें, सत्ता पर काबिज भगवा सरकार पर नहीं.

प्रदूषण बड़ी समस्या है पर इस का हल धरनों-प्रदर्शनों से नहीं हो सकता. यह हमारे सिविक सेंस से जुड़ा है. हमारे यहां हवा के प्रदूषण के साथ जमीन पर फैला कूड़ा, बदबू, मल-मूत्र, बचा खाना, कागज, प्लास्टिक पूरे माहौल को गंदा बनाते हैं. इन सब से हवा का प्रदूषण दमघोंटू हो रहा है.

हमारे सिविक सैंस में हरेक को बचपन से यही शिक्षा दी जाती है कि अपनी सोचो, पड़ोसी की नहीं. कहीं खाना, कहीं कूड़ा फेंक दिया जाता है. कहीं भी फैक्ट्री खोल ली और उस का कूड़ा कहीं भी फेंक दिया. गरीब और किसान इस प्रवृत्ति का शिकार हैं तो अमीर भी. अमीर कुछ पैसे दे कर अपने घर, दफ्तर, कारखाने को साफ करा लेते हैं पर यह चिंता नहीं करते कि उन का कूड़ा किसी और के दरवाजे या आसपास फेंका जा रहा है.

सरकारों से मांग करना कि वे प्रदूषण कम कराएं, ठीक है. लेकिन यह भी सही है कि इस प्रदूषण को फैलाने के लिए सरकारों से ज्यादा नागरिक जिम्मेदार हैं. भारत के नागरिक तो ज्यादा ही जिम्मेदार हैं बजाय चीन, अमेरिका और यूरोप के. दूसरे देश कम से कम देश की सड़कों, भवनों को तो साफ रखते हैं. हमारे यहां कहीं चले जाओ, कूड़े के ढेर उन लोगों के लगाए होते हैं जो चूं-चूं कर रहे हैं, प्रदूषण पर भाषण दे रहे हैं, आंकड़े पेश कर रहे हैं.

सिविक सैंस उस समाज में आता है जहां आपसी सहयोग समाज का अटूट हिस्सा हो. हमारे यहां सहयोग और दूसरे की तकलीफ का ख्याल न रखना लगभग धर्म की देन है. समाज के निर्माण के साथ हम ने साथ-साथ रहना नहीं बल्कि झगड़ना ज्यादा सीखा है.

हमारे यहां समाज का विभाजन धर्म ने कर दिया जिस ने सक्षम तीन जातियों को बैठेबिठाए गंद में रहने के आदी लोगों को गंद निबटाने का काम दे दिया. जो लोग खुद नालियों के पास रहने को मजबूर हों वे शहरों को कैसे साफ रखेंगे. जिन लोगों को सफाई करना आफत ही नहीं बल्कि उन्हें यह सामाजिक दुर्गति लगती हो, वे भला कैसे हवा या जमीन के प्रदूषण को कम कर सकते हैं?

हवा को प्रदूषित करने वाला हर किसान, फैक्ट्री मालिक या कार ड्राइवर पैदाइशी स्वार्थी है जिसे सिर्फ अपनी चिंता है. उसे लगता है कि उस का अपना घर ठीक है तो वह कूड़ा बराबर के घर के सामने डाल सकता है. समाज को एक साथ चलना है तो जिम्मेदारी सभी के कंधों पर आती है. दुनिया के बहुत से अमीर देश इस जिम्मेदारी को लेने से इनकार उसी तरह कर रहे हैं जैसे हमारे देश के नेता, अमीर और उद्योगपति कर रहे हैं. और सरकार की बागडोर उन्हीं के हाथों में है.

अमेरिका में सिख ड्राइवर

अगर दिल्ली, मुंबई और कोलकाता में टैक्सी ड्राइवर अब यदाकदा ही दिखते हैं तो इस का बड़ा कारण यह है कि उन्हें अमेरिका, कनाडा और दूसरे देशों में नौकरियां मिल रही हैं. अक्टूबर में अमेरिका में घटित 2 मामलों में सिख ड्राइवरों ने नशे में गाड़ी चलाते हुए लोगों को मार डाला और अब वहां हिंदू आरएसएस की तरह का ईसाई मागा गुट सिख ड्राइवरों को ट्रकों से हटाने की मांग कर रहा है.

अमेरिका के ट्रक बिजनेस का 20 फीसदी हिस्सा आज सिखों के हाथ में है और लगभग डेढ़ लाख सिख ड्राइवर 20-30 टन के ट्रक फर्राटे से अमेरिकी सड़कों पर दौड़ा रहे हैं. उन्हें ट्रक ड्राइवरी पसंद इसलिए भी है कि उन्हें पगड़ी पहनने और मनचाही पोशाक पहनने का हक है. मागा मुखिया डोनाल्ड ट्रंप ने हाल में फतवा जारी किया था कि हर ड्राइवर को इंग्लिश आनी चाहिए पर खब्ती राष्ट्रपति के आदेशों को अब मानना, न मानना मनमाना सा होने लगा है.

अमेरिका, कनाडा और दूसरे देशों में जो भी भारतीय जा रहे हैं वे अपने साथ गंद का कल्चर और नियमों को न मानने की आदत छिपे टोकरों में ले कर जाते हैं, सिख ड्राइवर इस के अपवाद नहीं हैं.

भारत सरकार के लिए सिखों का भारत से जाना और ट्रकों जैसे बिजनेस में उतरना एक खतरे की घंटी है क्योंकि इन स्वतंत्र कामों में पैसा भरपूर है और ड्रग्स, मजदूर, औरतों, स्मगलिंग के साथ खालिस्तान की मांग करना भी आसान है. ये सिख ड्राइवर अगर खालिस्तान समर्थक गुटों के समर्थक बनते हैं तो न अमेरिकी पुलिस और न ही भारतीय खुफिया एजेंट इन पर नजर रख पाएंगे. खालिस्तान समर्थकों को इस तरह के ट्रक बिजनेसों से बहुत पैसा मिलने लगा है और अमेरिका व कनाडा में जम कर भारत विरोधी गुट बनने लगे हैं. इस का असर भारत के पंजाब पर भी पड़ रहा है.

सिख ड्राइवरों की कंपनियों का जाल अब अमेरिका में बुरी तरह फैल रहा है और जो दमखम वे भारत में पिछले 50-60 साल के दौरान दिखाते रहे हैं  वही अब अमेरिका में दिखने लगा है. हिंदू-हिंदू करने का नुकसान यह है कि ये लोग घोर हिंदू विरोधी बनते जा रहे हैं और भारत हो, अमेरिका हो, कनाडा हो, आस्ट्रेलिया हो, कट्टर हिंदुओं को कट्टर सिखों का कट्टर मुसलमानों से ज्यादा मुकाबला करना पड़ रहा है.

किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए ट्रांसपोर्ट एक बहुत जरूरी हिस्सा होता है और इस पर एक जमात का कब्जा होने का फल 1970 के दशक में भारत भुगत चुका है जब संत भिंडरावाले के नेतृत्व में खालिस्तान की मांग ने आग पकड़ ली थी और भारत का पंजाब एक दूसरे देश सा बन गया था. अमेरिकी सिख ट्रक ड्राइवर तरह-तरह के गुल खिला सकते हैं, यह पक्का है.

संकुचित सोच

भारतीय जनता पार्टी के मध्य प्रदेश के एक नेता का यह कहना है कि अगर कुछ मजदूर रोटी की जगह पोहा खा रहे हैं तो जरूर बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं.

हिंदू धर्म की यह खासियत है कि यह कब, किस को क्या खाना है, पहनना है, बोलना है, सोना है, नहाना है आदि सब धर्म-जनित नियमों से बंधा हुआ है. हिंदू धर्म ने सिर्फ भक्त को नहीं, हर आम हिंदू को भी नियमों के दायरे में बुरी तरह बांध रखा है.

धर्म के तहत, किस त्योहार पर क्या खाना है, यह तय है. नवरात्रों में अब पांच सितारे होटलों से ले कर सड़क की गुमटियों तक बोर्ड लटका दिए जाते हैं कि नवरात्रों का खाना उपलब्ध है. छठ पूजा पर यह खाया जाएगा, बसोड़ा पर वह खाया जाएगा, दिवाली में इस तरह का खाना बनेगा, होली पर यह बनाया जाएगा, सब कुछ तय सा है.

यह तो बुरा हुआ कि अंग्रेजों ने कोटपैंट की आदत डाल दी, पर अब जब से देश में भाजपा राज आया है, फिर कुर्ता-पजामा और जैकेट आ गई है. किसी दिन धोती पहनने का आदेश आ जाए, जिसे गांधी ने देश के गले उतारने की कोशिश की थी, तो बड़ी बात नहीं.

औरतों पर तो नियम कठोरता से चलते ही हैं. उल्टे पल्ले, सीधे पल्ले पर लंबी बहस चली है. घूंघट से निकलने में हिंदू औरतों को 3 पीढ़ियों तक जद्दोजहद करनी पड़ी थी. आज लड़कियां सलवार-कमीज व चुन्नी के बजाय जींस-टॉप पहनती हैं, तो उन्हें विद्रोही मान लिया जाता है.

पहनना व खाना सुविधाजनक होना चाहिए. यह अलग बात है कि आमतौर पर लोग एक सी ही पोशाकें पहनते हैं, एक सा ही खाना खाते हैं. पंजाब में छोले-भटूरे ही मिलेंगे, चेन्नई में बड़ा और डोसा. पर यह धर्म-जनित नहीं है, बल्कि सुविधा की दृष्टि से है. लेकिन, यदि इसे जबरन थोपा जाने लगे, तो गलत होगा.

स्वाद के लिए दक्षिण में अब छोले-भटूरे धड़ाधड़ बिक रहे हैं और उत्तर में इडली-डोसा ही नहीं, चीनी मोमोज भी खूब मिल रहे हैं, धर्मों के बावजूद.

धर्मों की विशेषता होती है कि वे किसी को सोचने का अवसर नहीं देना चाहते. जो कुछ भी तय होना है, वह धर्म ही करेगा. छूट देनी है, तो धर्म ही देगा. कुछ नेता इसी संकुचित सोच के शिकार हैं. यही सोच पूरे समाज को एक ठहरे पानी के जोहड़ में बांधे सी रखती है, जिस में चाहे बदबू पैदा हो जाए पर लोग सुबह-सुबह उस का आचमन करना पुनीत कार्य समझें. Bihar Assembly Election 2025 :

Mythological Films : पौराणिक फिल्मों के पीछे अंधविश्वास या कुछ और ?

Mythological Films : पौराणिक फिल्में हमेशा से भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में बनती रहीं मगर उन का स्केल बहुत बड़ा नहीं होता था, अब उन का स्केल बड़े स्तर पर होने लगा है, आखिर क्या है इस की वजह, जानिए…

फिल्मों का निर्माण जब से शुरू हुआ है तभी से पौराणिक फिल्में बनती आई हैं, फिर चाहे वे ‘रामायण’, ‘महाभारत’ हों या ‘जय संतोषी मां’ या फिर ‘जय बजरंगबली’ ही क्यों न हों. पौराणिक फिल्मों का निर्माण सिर्फ बड़े परदे तक ही सीमित नहीं, छोटे परदे पर भी रामायण और महाभारत पर आधारित सीरियल्स प्रसारित होते आए हैं. ऐसे में इन दिनों ऐसा क्या चमत्कार हो गया कि हर मेकर बिग बजट और बिग स्टार्स के साथ पौराणिक फिल्में बनाने पर आमादा है.

यही नहीं, बॉलीवुड के नामी-गिरामी कलाकार, जैसे रणबीर कपूर, सैफ अली खान, साउथ ऐक्टर यश आदि मोटी रकम ले कर पौराणिक फिल्मों में काम कर रहे हैं. फिल्म मनोरंजन को शक्तिशाली माध्यम मानने वाले फिल्ममेकर्स आजकल भव्य तरीके से पौराणिक फिल्मों का निर्माण कर रहे हैं.

आज के समय में 500 से 1,000 करोड़ रुपए तक के बजट में पौराणिक फिल्मों का निर्माण हो रहा है और दर्शक भी ऐसी फिल्में देखने को ले कर बेहद उत्सुक रहते हैं. ऐसे में सवाल यह उठता है कि आज की निर्माण की गई पौराणिक फिल्मों में ऐसी क्या खास बात है कि मेकर्स इस तरह की फिल्में बनाने को लेकर बेहद उत्साहित हैं. वहीं, दर्शक भी ऐसी पौराणिक फिल्में देखना पसंद कर रहे हैं. यहां डालते हैं इसी सिलसिले पर एक नजर.

पौराणिक फिल्मों की ओर दर्शकों का बढ़ता आकर्षण

जबसे सिनेमा शुरू हुआ है तभी से पौराणिक फिल्मों का युग भी जारी रहा है. पहले आध्यात्मिक भावनाओं से जुड़े लोगों की तादाद ज्यादा होने की वजह से पौराणिक फिल्में ज्यादा सफल होती थीं लेकिन आज जब लोग चांद की सैर कर रहे हैं और सेटेलाइट के जरिए काफी-कुछ देख-सुन चुके हैं, फिर भी पौराणिक फिल्मों का क्रेज उतना ही है जितना पुराने समय में हुआ करता था.

वर्ष 2025 में कई बड़ी पौराणिक फिल्में बन रही हैं जिन का बजट 800 से 900 करोड़ रुपए तक भी है. ज्यादातर पौराणिक फिल्में बिग बजट की होती हैं क्योंकि ऐसी फिल्मों में ग्राफिक्स और महंगे सेट के अलावा महंगे कलाकारों का भी समावेश होता है. इस वर्ष कई ऐसी पौराणिक फिल्में आ रही हैं जिन में कई बड़े स्टार हैं और जो बिग बजट की हैं.

बॉलीवुड परफेक्शनिस्ट कहलाने वाले आमिर खान भी बतौर डायरेक्टर बड़े स्टारों को ले कर ‘महाभारत’ बनाना चाहते हैं जिस का बजट 1,000 करोड़ रुपए के करीब होगा. आमिर खान के अनुसार, जब वे इस फिल्म का डायरेक्शन करेंगे तब वे अभिनय पूरी तरह त्याग देंगे. आमिर खान के हिसाब से पौराणिक फिल्म ‘महाभारत’ का निर्माण करना आसान नहीं होगा, बतौर निर्देशक, सौ प्रतिशत समय देना होगा.

आमिर खान की तरह ही कई बड़े नामी-गिरामी मेकर्स पौराणिक फिल्मों का निर्माण करने में दिलचस्पी रखते हैं. कई सारे मेकर्स बिग बजट और बिग स्टार्स के साथ ‘रामायण’, ‘अश्वत्थामा’, ‘कर्ण’, ‘हनुमान’, ‘कांतारा’ जैसी भव्य पौराणिक फिल्मों का निर्माण कर भी रहे हैं. हालांकि पौराणिक फिल्मों की सफलता हमेशा अधर में अटकी होती है, क्योंकि अगर एनिमेटेड फिल्म ‘महाअवतार नरसिम्हा’ 250 करोड़ रुपए का बिजनेस कर एक नया रिकॉर्ड बना सकती है तो ‘आदिपुरुष’ जैसी बिग बजट व बिग स्टार फिल्म बौक्स औफिस पर धराशायी भी हुई है.

‘आदिपुरुष’ के अलावा भी कई पौराणिक फिल्में बौक्स औफिस पर असफल साबित हुई हैं. ज्यादातर पौराणिक फिल्मों का भविष्य कभी नरम कभी गरम रहता है. बावजूद इस के बॉलीवुड के नामी-गिरामी मेकर्स न सिर्फ पौराणिक फिल्में बनाने में दिलचस्पी रखते हैं बल्कि आज की युवा पीढ़ी और दर्शक ऐसी फिल्में देखना भी चाहते हैं.

ऐसे में सवाल यह उठता है कि आज के समय में दर्शकों का पौराणिक फिल्मों की तरफ रुझान के पीछे क्या खास वजह है? इस तरह की फिल्मों में दर्शकों को क्या चीजें आकर्षित करती हैं?

बड़े बजट की पौराणिक फिल्मों की विशेषताएं :

बड़े बजट की पौराणिक फिल्मों में ऐसी बहुत सी बातें होती हैं जो दर्शकों को फिल्म देखने के लिए आकर्षित करती हैं, जैसे बेहतरीन ग्राफिक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए अलौकिक दृश्य का प्रदर्शन वगैरह. पौराणिक कथाओं के भारतीय संस्कृति से जुड़ी होने की वजह से हर पीढ़ी के लोगों को इस तरह की फिल्में पसंद आती हैं.

इन फिल्मों में अलौकिक क्षमताओं से भरे अद्भुत पात्र, वेशभूषा दर्शकों को आध्यात्मिक तौर पर एक काल्पनिक दुनिया में ले जाते हैं. ज्यादातर ऐसी फिल्मों को देखने वाले दर्शक उच्च गुणवत्ता और विशेष प्रभाव वाले वीएफएक्स, बेहतरीन एक्शन दृश्य, पौराणिक पात्रों को कलाकारों द्वारा दमदार अभिनय के साथ जीवित करना, संस्कृति से भरपूर भाषा का प्रदर्शन आदि पौराणिक फिल्मों को अलग बनाता है.

इस तरह की फिल्में दर्शकों को इसलिए भी पसंद आती हैं क्योंकि ये दर्शकों को रोजमर्रा के जीवन से दूर एक अलग काल्पनिक दुनिया में ले जाती हैं. ये दर्शकों को अपनी संस्कृति और विरासत से जोड़ कर एक भावनात्मक अनुभव प्रदान करती हैं. पौराणिक फिल्मों का प्रचार भी बड़े पैमाने पर होता है जो दर्शकों के बीच उत्साह और उम्मीद भी बढ़ाता है.

भारतीय जनता पार्टी ने देश का पहला उद्देश्य धर्म बना दिया है और धर्म का प्रचार इतना होना शुरू हो गया है कि आम बुद्धि का जना इस ढोल पिटते प्रचार के फंदे में आ ही जाता है. वह सोचता है कि सरकार धर्म को इतना महत्व दे रही है तो उस का कल्याण धर्म-कर्म, पूजा-पाठ और सब से मुख्य दान-दक्षिणा देने में होगा. पौराणिक फिल्म देखना एक मंदिर दर्शन की तरह होता है जिस में टिकट के दामों को दान कहा जा सकता है.

बिग स्टार पौराणिक फिल्में

‘रामायणम पार्ट 1’ : डायरेक्टर नितेश तिवारी की ‘रामायण’ अब तक की सबसे महंगी फिल्म है. ‘रामायण’ फिल्म 2 भागों में बन रही है जिस का कुल बजट 4,000 करोड़ रुपए है. निर्माता नामित मल्होत्रा के अनुसार यह फिल्म लगभग 50 करोड़ डॉलर की लागत से बन रही है जो इसे सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय निर्माण की श्रेणी में ला खड़ा करती है. इस फिल्म को वीएफएक्स के भारी प्रोजेक्ट के रूप में विकसित किया जा रहा है. इसे एक भव्य आईमैक्स रिलीज के लिए डिजाइन किया जा रहा है जोकि भारतीय सिनेमा में पहली बार हो रहा है. इस फिल्म के मुख्य कलाकार रणबीर कपूर, साईं पल्लवी, बॉबी देओल और साउथ के एक्टर यश हैं.

‘हनुमान भाग 2’ : हनुमान फिल्म की अपार सफलता के बाद ‘हनुमान 2’ में हनुमान की आगे की कहानी को अगले भाग में प्रस्तुत किया जाएगा. इस में भक्ति और शक्ति को अलग रूप में दिखाया जाएगा.

‘कांतारा 2’ : वर्ष 2022 में आई सुपरहिट फिल्म ‘कांतारा’ का पहला पार्ट  रिलीज हो चुका है, जिस में भगवान और प्रकृति के बीच के रिश्ते को दर्शाया गया है.

‘अखंडा 2’ : नंदपुरी बालकृष्ण अभिनीत और बोयापति श्रीनू द्वारा निर्देशित ‘अखंडा 2’ शिव की शक्ति को दर्शाएगी.

‘महाकाल और एपिक सागा’ : ‘महाकाल और एपिक सागा’ आने वाली फिल्म है जो परशुराम के जीवन पर आधारित है. परशुराम को विष्णु का छठा अवतार माना जाता है. इस के मुख्य कलाकार विक्की कौशल हैं.

‘द्रौपदी’ : दीपिका पादुकोण अभिनीत द्रौपदी की महाकाव्य पौराणिक कहानी को भव्य रूप में परदे पर दिखाने की योजना है. संभवतया इस फिल्म में दीपिका पादुकोण द्रौपदी के किरदार में नजर आएंगी.

‘द इंकारनेशन सीता’ : फिल्म ‘द इंकारनेशन सीता’ में कंगना रनौत सीता की भूमिका में नजर आएंगी. इस पौराणिक फिल्म का डायरेक्शन अलौकिक देसाई कर रहे हैं.

‘द इम्मॉर्टल अश्वत्थामा’ : फिल्म ‘द इम्मॉर्टल अश्वत्थामा’ में शाहिद कपूर मुख्य भूमिका में नजर आएंगे. अश्वत्थामा उन पौराणिक योद्धाओं में से एक है जो महाकाव्य भारत का हिस्सा थे.

‘कर्ण’ : पेन इंडिया निर्मित फिल्म ‘कर्ण’ भव्य पौराणिक फिल्म है जिस में कर्ण की मुख्य भूमिका में एक्टर सूर्या नजर आएंगे.

निष्कर्ष यह निकलता है कि सामाजिक फिल्में हों या ऐक्शन या पौराणिक फिल्में ही क्यों न हों, दर्शकों को ऐसी ही फिल्में आकर्षित करती हैं जिन में कुछ आकर्षक हो, अलग हो, फैंटेसी हो, कल्पना से भी अलग हो. दर्शक वह सभी कुछ देखना पसंद करते हैं. यही वजह है कि दर्शक आज के सैटेलाइट युग में भी अंधविश्वास से जुड़ी कहानियों पर आधारित पौराणिक फिल्में उत्साह के साथ देखना पसंद करते हैं.

यह उत्साह बेवजह नहीं है और न ही इस के पीछे किसी तरह की अंधी आस्था है, बल्कि यह देश के धर्ममय होते माहौल का नतीजा है जिस ने पिछले एक दशक से लोगों के दिलो-दिमाग में धार्मिक दिखावा, मंदिर, पाखंड और अंधविश्वास ठूंस दिए हैं. इन की सहमति और पुष्टि के लिए ऐसी फिल्में तेजी से एक जरूरत बन कर उभरी हैं. सोशल मीडिया पर आने वाली लगभग आधी पोस्टें धार्मिक होती हैं जिन का बुरा और बड़ा फर्क लोगों के व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन पर पड़ रहा है. लोग एक अंतराल के बाद फिर से चमत्कारी और अंधविश्वासी मानसिकता के होते जा रहे हैं.

चूंकि ऐसी फिल्मों और उन के निर्माता, निर्देशक व कलाकारों को राजनीतिक और सरकारी संरक्षण व प्रोत्साहन भी खूब मिल रहा है इसलिए भी मेकर्स पौराणिक फिल्मों में अपना आर्थिक भविष्य और हित साध रहे हैं. यह नव राष्ट्रवाद है जिसे ब्राह्मणवाद भी कह सकते हैं और जिस का बड़ा नुकसान देश उठा रहा है. लोग तर्क करना भूल रहे हैं. वे अपनी समस्याओं की बाबत सोचना भूल रहे हैं. दरअसल, ये पौराणिक फिल्में उन्हें बरगला रही हैं कि तुम्हारी समस्याओं की जड़ राजा नहीं, बल्कि तुम्हारा बुरा समय है जो तुम्हारे कर्मों (पूर्व व वर्तमान दोनों जन्मों) की देन है. सो, भक्ति करो, दान दक्षिणा देते रहो और यथास्थितिवादी हो जाओ.

70 के दशक में ही रिलीज हुई ‘जय संतोषी मां’ ने रोटी कपड़ा और मकान से कम पैसा नहीं बटोरा था लेकिन इन दोनों फिल्मों में बड़ा फर्क था कि मनोज कुमार ने भगवानवादी होते हुए भी विजय शर्मा की तरह चमत्कारों से समस्याएं हल नहीं की थीं. इस फिल्म के बाद संतोषी माता घर-घर में पसर गई थी. लोग, खासतौर से महिलाएं, शुक्रवार का व्रत रखने लगी थीं. ‘संतोषी माता व्रतकथा’ की करोड़ों प्रतियां बिकी थीं. वही अंधविश्वास अब दूसरे तरीकों से पौराणिक फिल्मों के जरिए फैलाया जा रहा है. यह ठीक है कि उन दिनों और आज भी फिल्मों का सुखांत होना कहानी की मजबूरी होती थी लेकिन वे ‘संतोषी माता’ जैसी अव्यावहारिक नहीं होती थीं.

एक दौर था जब लोग उन चलताऊ मसाला व्यावसायिक फिल्मों को हाथों-हाथ लेते थे जिन में उन की समस्याओं को प्रभावी तरीके से उठाया जाता था, मसलन मनोज कुमार की फिल्म ‘रोटी कपड़ा और मकान’ जिस में बताया गया था कि युवकों को रोजगार नहीं मिलता तो वे देशद्रोहियों के संग हो कर अपराधी बन जाते हैं.

सिनेमा हमेशा से ही समाज का दर्पण रहा है, आज भी है. इस में अक्स दिखता है राम और कृष्ण की अच्छाई और बुराई की लड़ाई के नाम पर देवताओं की जीत का जो सवर्ण होते हैं और रावण और कंस जैसे कैरेक्टरों को कर्म और पूर्व-जन्म के पाप-पुण्यों की बात किए बिना भी शूद्र मान लिया गया है.

हिंदी सिनेमा की पहली फिल्म 1913 में प्रदर्शित दादा साहब फालके की ‘हरिश्चंद्र’ थी जिस ने खासा बिजनेस किया था. फिर आजादी के बाद 60 के दशक तक एक नियमित अंतराल से धार्मिक फिल्में बनती और चलती रहीं क्योंकि तब अधिकतर जनता अनपढ़ और अंधविश्वासी थी.

अब लोग शिक्षित लेकिन अंधविश्वासी हैं तो पौराणिक फिल्मों का बनना तो तय है. उन्हें भव्य और महंगा तो बिजनेस के लिए बनाया जा रहा है ठीक यही सोच कर कि जितना बड़ा और भव्य मंदिर उतनी ही ज्यादा दक्षिणा. मौज है तो बस, पंडे-पुजारियों की फिर चाहे वे मंदिर के हों या फिल्मों के, दोनों में फर्क ही क्या? Mythological Films :

Hindi Social Story : वह सांवली लड़की – कैसे बनाई चांदनी ने अपनी पहचान ?

Hindi Social Story : रंग पक्का सांवला और नाम हो चांदनी, तो क्या सोचेंगे आप? यही न कि नाम और रूपरंग में कोई तालमेल नहीं. जिस दिन चांदनी ने उस कालेज में बीए प्रथम वर्ष में प्रवेश लिया, उसी दिन से छात्रों के जेहन में यह बात कौंधने लगी. किसी की आंखों में व्यंग्य होता, किसी की मुसकराहट में, कोई ऐसे हायहैलो करता कि उस में भी व्यंग्य जरूर झलकता था.

चांदनी सब समझती थी. मगर वह इन सब से बेखबर केवल एक हलकी सी मुसकान बिखेरती हुई सीधे अपनी क्लास में चली जाती. केवल नाम और रंग ही होता तो कोई बात नहीं थी, वह तो ठेठ एक कसबाई लड़की नजर आती थी. किसी छोटेमोटे कसबे से इंटर पास कर आई हुई. बड़े शहर के उस कालेज के आधुनिक रूपरंग में ढले हुए छात्रछात्राओं को भला उस की शालीनता क्या नजर आती.

हां, 5-7 दिन में ही पूरी क्लास ने यह जरूर जान लिया था कि वह मेधावी भी है. बोर्ड परीक्षा की मैरिट लिस्ट में अपना स्थान बनाने वाली लड़की. इस बात की गवाही हर टीचर का चेहरा देने लगता, जो उस का प्रोजैक्ट देखते. वे कभी प्रोजैक्ट की फाइल देखते, तो कभी चांदनी का चेहरा. रंगनाथ क्लास का मुंहफट छात्र था. एक दिन वह चांदनी से पूछ बैठा, ‘‘मैडम, क्या हमें बताएंगी कि आप कौन सी चक्की का आटा खाती हैं?’’

चांदनी कुछ नहीं बोली. बस, चुपचाप उसे देख भर लिया. तभी नीलम के मुंह से भी निकला, ’’हां, हां, जरूर बताना ताकि हम भी उसे खा कर अपने दिमाग को तरोताजा रख सकें.’’ रंगनाथ और नीलम की ये फबतियां सुन पूरी क्लास ठहाका मार कर हंसने लगी. लेकिन चांदनी के चेहरे का सौम्यभाव इस से जरा भी प्रभावित नहीं हुआ. वह मुसकरा कर केवल इतना बोली, ‘‘हां, हां, क्यों नहीं बताऊंगी, जरूर बताऊंगी,’’ फिर उस का ध्यान अपनी कौपी पर चला गया.

चांदनी गर्ल्स होस्टल में रहती थी. वह छुट्टी का दिन था. लड़कियां होस्टल के मैदान में वौलीबौल खेल रही थीं. कुछ हरी घास पर बैठी गपशप कर रही थीं, तो कुछ मिलने आए अपने परिजनों से बातचीत में व्यस्त थीं. साथ आए बच्चे हरीहरी घास पर लोटपोट हो रहे थे. वहीं कौरीडोर में एक किनारे कुरसी पर बैठी होस्टल वार्डन रीना मैडम सारे दृश्य देख रही थीं. उन के चेहरे पर उदासी छाई हुई थी. इन सारे दृश्यों को देखते हुए भी उन की आंखें जैसे कहीं और खोई हुई थीं. उन का हमेशा प्रसन्न रहने वाला चेहरा, इस वक्त चिंता में डूबा हुआ था. कौरीडोर में लड़कियां इधर से उधर भागदौड़ मचाए हुए थीं. मगर शायद किसी का भी ध्यान रीना मैडम पर नहीं गया. अगर गया भी हो तो किसी ने उन के चेहरे की उदासी के बारे में पूछने की जरूरत नहीं समझी. अचानक रीना मैडम के कंधे पर किसी का हाथ पड़ा. उन्होंने सिर उठा कर देखा, वह चांदनी थी, ‘‘कहां खोई हुई हैं, मैडम? आप की तबीयत तो ठीक है न,’’ चांदनी ने पूछा.

‘‘नहीं, ऐसा कुछ नहीं है. मैं ठीक हूं चांदनी,’’ रीना मैडम बोलीं. ‘‘नहीं मैडम. कुछ तो है. छिपाइए मत, आप का चेहरा बता रहा है कि आप किसी परेशानी में हैं.’’

रीना मैडम की आंखें नम हो आईं. चांदनी के शब्दों में न जाने कैसा अपनापन था कि उन से बताए बिना नहीं रहा गया. वे अपनी आंखों में छलक आए आंसुओं को आंचल से पोंछती हुई भरे गले से बोलीं, ‘‘चांदनी, कुछ देर पहले ही मेरे घर से फोन आया है कि मेरे बेटे की तबीयत ठीक नहीं है. वह मुझे बहुत याद कर रहा है. मैं कुछ समय के लिए उसे यहां लाना चाहती हूं. लेकिन यहां मैं हर समय तो उस के पास रह नहीं सकती. घर से कोई और आ नहीं सकता. ऐसे में कौन रहेगा, उस के पास?’’ ‘‘बस, इतनी सी बात के लिए आप परेशान हैं. मैडम, बस समझ लीजिए कि आप की प्रौब्लम दूर हो गई. उदासी और चिंता को दूर भगाइए. घर जा कर बच्चे को ले आइए.’’

‘‘मगर कैसे?’’ ‘‘मैं हूं न यहां,’’ चांदनी बोली.

रीना मैडम ने उस का हाथ पकड़ लिया. वे चकित हो कर उसे देखती भर रहीं. उन्हें अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ. क्या होस्टल की एक सामान्य छात्रा इतना आत्मीय भाव प्रकट कर सकती है. आज ऐसा पहली बार हुआ था, पर चांदनी की आंखों से झांकती निश्छलता कह रही थी, ‘हां, मैडम, यह सच है. मुझे हर किसी के दर्द और चिंता की पहचान हो जाती है.’ रीना मैडम की आंखों में एक बार फिर आंसू छलक आए. ‘‘न…न…न… मैडम, आप की ये आंखें आंसू बहाने के लिए नहीं हैं. जो मैं ने कहा है उसे कीजिए,’’ चांदनी इस बार स्वयं अपने रूमाल से उन के आंसू पोंछती हुई बोली.

धीरेधीरे साल बीत गया. चांदनी बीए द्वितीय वर्ष में पहुंच गई. वह टैलेंटेड तो थी ही, उस के व्यवहार ने भी अब तक कालेज में उस की अपनी एक अलग पहचान बना दी थी. मगर रंगनाथ जैसे साहबजादों को अभी भी यह सब चांदनी का एक ढोंग मात्र लगता था. अब भी वे मौका मिलने पर उस पर व्यंग्य करने से नहीं चूकते थे.

नया सत्र शुरू होते ही हमेशा की तरह इस बार भी अपनीअपनी कक्षाओं में प्रथम आए छात्रों का सम्मान समारोह आयोजित करने की घोषणा हुई. इस में उन छात्रछात्राओं को अपने अभिभावकों को भी साथ लाने के लिए कहा जाता था. चांदनी अपनी कक्षा में प्रथम आई थी. रंगनाथ के लिए चांदनी पर फबती कसने का यह अच्छा मौका था. उस ने अपने दोस्तों से कहा, ‘‘चलो, अच्छा है. इस बार हमें भी मैडम के मम्मीपापा के दर्शन हो जाएंगे.’’

मम्मीपापा, ‘‘अरे, बेवकूफ, मैडम तो गांव से आई हैं. वहां मम्मीपापा कहां होते हैं,’’ एक दोस्त बोला. ‘‘फिर?’’ रंगनाथ ने पूछा.

‘‘अपनी अम्मां और बापू को ले कर आएंगी मैडम,’’ दोस्त के इस जुमले पर पूरी मित्रमंडली खिलखिला पड़ी. ‘‘चलो, तब तो यह भी देख लेंगे कि मखमल की चादर पर टाट का पैबंद कैसा नजर आता है,’’ रंगनाथ इस पर भी चुटकी लेने से नहीं चूका.

समारोह के दिन प्राचार्य और स्टाफ के साथ शहर के कुछ गण्यमान्य लोग भी स्टेज पर बैठे हुए थे. प्राचार्य ने सब लोगों के स्वागत की औपचारिकता पूरी करने के बाद एकएक कर सभी कक्षाओं के सर्वश्रेष्ठ छात्रों को स्टेज पर बुलाना शुरू किया. चांदनी का नाम लेते ही पूरे कालेज की नजरें उधर उठ गईं. चांदनी एक अधेड़ उम्र की औरत का हाथ पकड़ कर उसे सहारा देती हुई धीरेधीरे स्टेज की ओर बढ़ रही थी. वह एक सामान्य हिंदुस्तानी महिला जैसी थी. वहां उपस्थित दर्जनों सजीसंवरी शहरी महिलाओं से बिलकुल अलग. मगर सलीके से पहनी सफेद साड़ी, खिचड़ी हुए बालों के बीच सिंदूरविहीन मांग, थकी हुई दृष्टि के बावजूद सजग आंखें, चेहरे पर झलकता उस का आत्मविश्वास. लेकिन साधारण होते हुए भी उन के व्यक्तित्व में गजब का आकर्षण था. वह चांदनी की मां थी. वहां उपस्थित अभिभावकों में पहली ऐसी मां थीं, जिन्हें कोई छात्र अपने साथ स्टेज पर ले गया.

उन के स्टेज पर पहुंचते ही प्राचार्य ने खड़े हो कर उन का स्वागत किया. फिर एक कुरसी मंगा कर उन्हें बैठाया. अब आगे चांदनी को बोलना था. उस ने थोड़े से नपेतुले शब्दों में बताया, ‘‘ये मेरी मां हैं. गांव में रहती हैं. पिताजी के देहांत के बाद मुझे कभी उन की कमी महसूस नहीं होने दी. इन्होंने मां और पिता दोनों की जगह ले ली. मुझे पढ़ाने के इन के इरादों में जरा भी कमी नहीं आई. आज मैं जो आप लोगों के बीच हूं वह इन्हीं की बदौलत है. ‘‘काफी समय पहले मेरे कुछ मित्रों ने पूछा था कि मैं कौन सी चक्की का आटा खाती हूं. मैं ने उन से वादा किया था कि समय आने पर आप को जरूर बताऊंगी. आज वह वादा पूरा करने का समय आ गया है. मैं अपने उन प्रिय मित्रों को बताना चाहूंगी कि वह चक्की है, मेरी मां. तमाम मुश्किलों और तकलीफों में पिस कर भी इन्होंने मुझे कभी हताश नहीं होने दिया. इन का प्रोत्साहन पा कर ही मैं आगे बढ़ी हूं. मेरा आज का मुकाम, आप के सामने है. इस से भी बड़े मुकाम को मैं हासिल करना चाहती हूं. उस के लिए मुझे आप की शुभकामनाएं चाहिए.’’

चांदनी के चुप होते ही पूरा हौल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. प्राचार्य ने स्वयं उठ कर उस की मां को स्टेज की सीढि़यों से नीचे उतरने के लिए सहारा दिया. रंगनाथ और उस के दोस्तों को आज पहली बार एहसास हुआ कि उस सांवली लड़की का नाम ही चांदनी नहीं है बल्कि उस के भीतर चांदनी सा उजला एक दिल भी है. बाहर निकलते ही चांदनी को बधाई देने वाला पहला व्यक्ति रंगनाथ ही था, दोनों हाथ जोड़े और आंखों में क्षमायाचना लिए हुए, चांदनी ने गद्गद हो कर उस के जुड़े हुए हाथों को थाम लिया. Hindi Social Story :

Real Vs Fake Eggs : असली-नकली का फंडा, पोल्ट्री फार्म का अंडा

Real Vs Fake Eggs : लेखक – डॉ. आलोक खरे – भारत में अंडे के आहार को ले कर जब-तब बहस चलती रहती है. अंडा आखिर है क्या? खाने और न खाने वालों के अपने मत हैं. बावजूद इसके, अंडा आज भी अपनी जगह पर न सिर्फ कायम है बल्कि बड़ी मात्रा में खाया भी जाता है.

अंडा खाने वाले खाते ही हैं, चटकारे ले कर. अंडा करी हो, भुरजी हो, अंडा सलाद हो. सभी को स्वादिष्ठ लगता है. इसे अकेले ही उबाला, तला, भूना जा सकता है. यह किसी बड़े व्यंजन का हिस्सा हो सकता है- आमलेट, सलाद, बेकन, पनीर, हरी मिर्च, काली मिर्च और नमक के साथ.  लेकिन कुछ लोग खाते-खाते भी इल्जाम लगाएंगे कि असली अंडा तो देसी मुर्गी का होता है. पोल्ट्री फार्म का अंडा तो नकली होता है. दवाएं, एंटीबौयोक, हार्मोंस वगैरह मुर्गियों को दे कर उत्पादन किया जाता है. गाड़ी ले कर शहर में देशी अंडा ढूंढ़ते रहेंगे लेकिन पड़ोस की दुकान में सस्ता अंडा मिल रहा है, उसे मशीन से निकाला हुआ समझ कर नहीं लेंगे. यह समझ-समझ का फर्क है. मुझे समझते हुए एक समय निकल गया कि दोनों में कोई फर्क नहीं होता. दोनों बराबर हैं. अंतर है तो सिर्फ उत्पादन क्षमता का. यह आनुवंशिकता का कमाल है जो वैज्ञानिकों ने मुर्गियों की उत्पादन क्षमता बढ़ाई है ताकि मुर्गी पालन करने वाले किसानों को आर्थिक लाभ मिल सके. इसलिए आप तो अंडे के व्यंजन खाते रहो. आप को बराबर मात्रा में पोषक तत्व मिलते रहेंगे.

इस से सस्ता प्रोटीन आहार कहां मिलेगा. 60 ग्राम के अंडे में 6 ग्राम प्रोटीन. इस प्रोटीन का जैव मूल्य लगभग 94 प्रतिशत है. इस से अधिक 100 प्रतिशत जैव मूल्य सिर्फ मां के दूध में ही होता है.  प्रतिदिन आप के शरीर के प्रति किलोग्राम वजन के हिसाब से एक ग्राम प्रोटीन की आवश्यकता होती है और पोल्ट्री फार्म का अंडा लगभग एक रुपए प्रति एक ग्राम प्रोटीन के बराबर कीमत में बाजार में मिलता है. इतनी सरल गणित में आप अपने परिवार के सदस्यों को सस्ता प्रोटीन आहार दे सकते हैं. इस से महिलाओं और बच्चों में कुपोषण दूर हो सकता है. समाज में गलतफहमी की वजह से अंडा रंगभेद का भी शिकार होता है. पोल्ट्री फार्म का अंडा सफेद रंग का और देसी मुर्गी का अंडा भूरे रंग का होता है. लोग सिर्फ रंग के आधार पर अंडे में ताकतवर और नकली का निर्णय दे देते हैं. जबकि असलियत यह कि यह रंगभेद सिर्फ अंडे के छिलके का है. अंदर से दोनों में पाए जाने वाले तत्त्व तो बराबर होते हैं.

पीला भाग है ज्यादा फायदेमंद

जिम जाने वाले, बॉडी बिल्डिंग वाले अंडे का सिर्फ सफेद हिस्सा खाते हैं और पीला भाग फेंक देते हैं जबकि अंडे के सफेद और पीले, दोनों में ही लगभग  3-3 ग्राम प्रोटीन होता है. अंडे का सफेद भाग मुख्य रूप से प्रोटीन का स्रोत होता है जबकि पीले भाग में प्रोटीन के साथ-साथ, विटामिन सी को छोड़ कर सभी विटामिन (जैसे ए, डी, ई, के), खनिज (आयरन, जिंक), वसा, ओमेगा-3 फैटी एसिड, कोलीन और ज़ेक्सैंथिन जैसे पोषक तत्व भरपूर मात्रा में होते हैं. असलियत में अंडे का पावर हाउस तो पीला भाग ही होता है. हमेशा पूरा अंडा खाना चाहिए क्योंकि इस से आप को सभी आवश्यक पोषक तत्त्व एक साथ मिल जाते हैं.

हृदय रोगी अंडा खाने से परहेज करते हैं क्योंकि इस में पाए जाने वाले कोलेस्ट्रॉल पर बहुत विवाद है. असलियत यह है कि अंडे में कुल 186 मिलीग्राम कोलेस्ट्रॉल होता है जो अपने शरीर के लिए अच्छा होता है और हृदय की बीमारी का खतरा कम करता है. उल्लेखनीय है कि हमारा शरीर 2,000 मिलीग्राम कोलेस्ट्रॉल बनाता है और अच्छे व बुरे कोलेस्ट्रॉल का अनुपात हृदय को प्रभावित करता है.

लोग गर्मी के मौसम में अंडा खाने से परहेज करते हैं. उन का मानना है कि अंडा गरम होता है जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से अंडे में ठंडा या गर्म जैसा कोई तत्त्व नहीं होता. यह सिर्फ गलतफहमी है. अंडे के बारे में यही वाद-विवाद होता है कि यह शाकाहारी भोजन है या मांसाहारी. हालांकि ऐसा कभी नहीं हुआ कि आमलेट बनाने के लिए फ्राई पैन में अंडा फोड़ा हो और अंदर से चूजा निकल आया हो. देशी मुरगी का अंडा जरूर मांसाहारी हो सकता है क्योंकि देसी मुर्गी में निषेचन होता रहता है और भ्रूण का विकास हो कर अंडे से चूजा निकलता है लेकिन पोल्ट्री फार्म में पाली जा रही मुर्गियों में ऐसी कोई संभावना नहीं होती क्योंकि उन में निषेचन नहीं करवाया जाता और न ही अंडे में कोई भ्रूण (या कोई भी जीव) होता है. इस में किसी भी प्रकार की कोई जीव-हत्या नहीं होती. सो, यह कैसे मांसाहारी भोजन हो सकता है? पोल्ट्री फार्म की मुर्गियों में आनुवंशिक रूप से अधिक से अधिक अंडा उत्पादन की क्षमता विकसित की गई है. लगभग प्रतिदिन ओव्यूलेशन होता है और अगले 24 घंटे बाद अंडा बन कर बाहर आ जाता है. यह आनुवंशिकी का कमाल है.

फिजूल है विवाद

लोग अंडा उत्पादन की आनुवंशिकी पर ध्यान तो नहीं दे सके लेकिन अफवाह पर जरूर ध्यान देने लग जाते हैं. वर्ष 2008 में महाराष्ट्र में देश का पहला बर्ड फ्लू का प्रकोप हुआ तो लोगों ने तुरंत प्रभाव से अंडा खाना छोड़ दिया. फिर वर्ष 2019 में कोविड की महामारी आई तो शरारती तत्त्वों ने सोशल मीडिया पर अंडे को कोविड प्रकोप का जिम्मेदार घोषित कर दिया. धीरे-धीरे यह दुष्प्रचार मांसाहार बनाम शाकाहार में बदल गया. वर्ष 2021 में कौओं में फ्लू के प्रकोप की खबर आई तो फिर अंडे पर कहर टूटा. फिर से अंडा खाना बंद कर दिया. आदिवासी लोककथाओं में वर्णन है कि किसी गांव में अकाल, महामारी परिस्थितियों में ओझ द्वारा किसी विधवा या बूढ़ी महिला को जिम्मेदार ठहराते हुए डायन घोषित कर दिया जाता था. यहां तक कि उस की हत्या तक कर दी जाती थी. जब भी कोई रोग प्रकोप होता है तो कमोबेश यही स्थिति पोल्ट्री फार्म के अंडों की हो जाती है. अंडों के खिलाफ दुष्प्रचार शुरू हो जाता है. वास्तविकता यह है कि कोविड जैसे वायरल प्रकोप में अपने शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने के लिए पोल्ट्री फार्म का अंडा एक औषधि के रूप में सामने आया है. ऐसे समय में प्रोटीन युक्त भोजन लेने की आवश्यकता होती है. वायरस को पहचानने और उसे निष्क्रिय करने के लिए अपना शरीर इम्यूग्लोबिलिन्स यानी कि एंटीबॉडीज बनाता है जो प्रोटीन से बनते हैं.

पोल्ट्री फार्म के अंडे में उच्च गुणवत्ता का प्रोटीन होता है और शरीर के लिए अति आवश्यक सभी 9 अमीनो एसिड होते हैं. रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने के लिए आवश्यक जिंक, सेलेनियम, कोबाल्ट, आयरन, कोलीन क्लोराइड जैसे खनिज तत्व और विटामिन ए, डी, ई, बी-6, बी-12 आदि भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं.

पोल्ट्री फार्म के अंडे के बारे में कितनी भी गलतफहमियां हों, इस के खिलाफ दुष्प्रचार किया गया हो, भ्रामक जानकारी दी जा रही हो लेकिन यह कभी नहीं टूटा और अंडा उत्पादन करने वाले किसान भी जिजीविषा से भरे हुए डटे रहते हैं. किसी का समर्थन मिले या न मिले. अपने देश में अंडा उत्पादन साल-दर-साल 7-8 प्रतिशत की विकास दर से आगे बढ़ रहा है. पोल्ट्री फार्म के अंडे के बारे में बात करते-करते मशहूर शायर मोहसिन नकवी का एक शेर याद आ गया-  ‘‘मोहसिन तुम बदनाम बहुत हो जैसे हो फिर भी अच्छे हो.’’ Real Vs Fake Eggs :

Family Bonding Game : कैरम – अपनों से जुड़ने का अनोखा खेल

Family Bonding Game : कैरम सही मायनों में फैमिली गेम है जहां न सिर्फ खेलने वाला एंटरटेन होता है बल्कि जो खिलाड़ियों को खेलते देख रहा होता है वह भी एंटरटेन हो रहा होता है.

कोरोना काल ने पूरे भारत को घरों में कैद कर दिया था. इस का एक फायदा यह हुआ था कि जिन घरों में सालों से कैरम अंधेरे वाले उमस-भरे स्टोर में धूल फांक रहे थे, वे अब बाहर ताजा हवा में सांसें लेने लगे थे. उन्हें झाड़-पोंछ कर स्टूल पर रख दिया गया था. उस स्टूल के इर्द-गिर्द 4 कुर्सियां सजा दी गई थीं.

कहने का मतलब यह है कि आम भारतीय घरों में अपनी पहचान खो रहा कैरम खेल फिर से जिंदा हो गया था. यह एक ऐसा इंडोर गेम है जो बहुत कम जगह घेरता है और मनोरंजन का सस्ता साधन होने के अलावा खिलाड़ी को कैसे फोकस्ड रहना है, यह भी सिखाता है.

दिलचस्प है खेल

जब हम मनोरंजन की बात करते हैं तो हमें कैरम के इर्द-गिर्द वे 4 मासूम बच्चे बैठे नजर आते हैं जिन के लिए एक काली गोटी निकालने (पॉकेट करने) का मतलब होता है 10 नंबर अपने खाते में जोड़ना और एक सफेद गोटी लेने का मतलब है 20 नंबर अपनी झोली में डालना. लाल गोटी (रानी या क्वीन) के सीधे 50 नंबर.

बच्चों के इस खेल में कैरम कितना बड़ा या छोटा है, इस की कोई परवाह नहीं करता और नियम भी ज्यादा मायने नहीं रखते क्योंकि बच्चों को तो कैरम खेलने के बहाने जोड़ने व घटाने की प्रैक्टिस कराई जाती है. इस बहाने बच्चों में एक गुण और विकसित होता है- अपनी बारी का इंतजार करना और पार्टनर को यह बताना कि कौन सी गोटी लेना आसान होगा. थोड़ी-बहुत चीटिंग भी इस में जायज मानी जाती है.

ऐसा माना जाता है कि जब हम इस खेल में खो जाते हैं तो यह हमारे ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखता है. इस से हमारा ध्यान काबू में रहता है और यह सामाजिक कौशल को बढ़ाने का बेहतरीन साधन बन जाता है.

यही वजह है कि कैरम परिवार व दोस्तों के साथ अच्छा समय बिताने का एक तरीका ही नहीं है, बल्कि यह हमें रणनीति बनाने में भी मददगार साबित होता है, क्योंकि आप को अपने खेलने की कला का तो अंदाजा होता ही है, साथ ही, आप को यह भी पता करना होता है कि प्रतिद्वंद्वी अपनी चालों की योजना किस तरह बना रहा है.

चैंपियन खिलाड़ी वही होता है जो एक स्ट्राइक में अपनी एक गोटी पॉकेट करे, दूसरी को आसान करे और मुमकिन हो तो प्रतिद्वंद्वी की गोटी को मुश्किल बना दे. जो ऐसा करने में कामयाब होता है वह तालियों का हकदार बनता है.

यह खेल उंगलियों और अंगूठे का सटीक तालमेल ही नहीं है, बल्कि हमें यह भी सिखाता है कि किस ताकत से हमें स्ट्राइक करना है और हमारा निशाना और एंगल कितना परफेक्ट होना चाहिए.

इस खेल का सब से खास मनोवैज्ञानिक पहलू यह है कि हम अपने पार्टनर की बात या सलाह पर गौर करते हैं. उस की बताई गई चाल पर यकीन करते हैं. यही आपसी तालमेल हमें प्रैक्टिकल दुनिया की समस्याओं को सुलझाने में कारगर साबित होता है और जब सामने आप का दोस्त या परिवार वाला बैठा होता है तो आप दोनों की बॉन्डिंग अलग लेवल की हो जाती है.

तभी तो कहते हैं कि किसी भी तरह के बोर्ड गेम (कैरम बोर्ड इसी श्रेणी में आता है) को खेलने से शरीर में फील गुड हार्मोन ‘एंडोर्फिन’ बनता है, जो हमें कुदरती रूप से खुशी देता है. चूंकि यह खेल मनोरंजन का साधन भी होता है तो हार-जीत में लगने वाले ठहाके और शिकायतें हमारे दिमाग को बैलेंस करते हैं.

लिहाजा, यह जरूरी नहीं है कि कैरम खेलने के लिए कोरोना जैसी किसी आपदा का इंतजार किया जाए. यह बेहद ही सस्ता खेल है और जगह भी ज्यादा नहीं घेरता है. तो फिर देर किस बात की, आप भी अपनों के साथ प्लाईवुड लकड़ी से बने इस चौकोर बोर्ड के इर्द-गिर्द बैठ जाएं. Family Bonding Game :

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