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Hindi Corruption Story: अवैध वसूली- मंगला प्रसाद मुनाफे को कैसे छोड़ सकते थे!

Hindi Corruption Story: चोर चोरी से जाए, हेराफेरी से न जाए. सरकारी महकमे में काम करते हुए मंगला प्रसाद मुनाफे को कैसे छोड़ सकते थे, तभी तो एक हाथ दिया दूसरे हाथ लिया.

कालोनी संपन्नों की थी. ज्यादातर सुविधा संपन्न रिटायर्ड अधिकारियों के बेहतरीन मकान थे. कमलाकांत तो इतने संपन्न थे कि अपने 4 बिस्वे के बंगले में उन्होंने स्विमिंग पूल तक बनवा रखा था. मजाल है जो कोई उस पर हाथ लगाए, इतनी पहुंच थी उन की. कॉलोनी से सटा एक सरकारी तालाब था. उससे लगी जमीन पर कॉलोनी के लोगों ने मंदिर बनवाने की सोची. इस के लिए कॉलोनी के सभी लोगों की मीटिंग बुलाई गई.

‘‘हमें मंदिर में पूजा-अर्चना करने के लिए एक किलोमीटर दूर जाना पड़ता है. तकलीफ तब होती है जब शिवरात्रि या सावन के सोमवार के समय हमारी औरतों को परेशानी का सामना करना पड़ता है,’’ कमलाकांत बोले.

‘‘आप ठीक कहते हैं. वहां जिस तरह के लोगों का जमावड़ा होता है वह हमारे स्टेटस के अनुकूल नहीं होता. हमें शर्म और हिचक का सामना करना पड़ता है,’’ चतुर्वेदीजी ने हां में हां मिलाई.

‘‘बिलकुल सही,’’ एक अन्य सदस्य ने हामी भरी.

‘‘कहां सोचा है मंदिर बनवाने का,’’ चतुर्वेदीजी ने पूछा.

‘‘अपनी कालोनी से सटे तालाब के किनारे वाली जमीन पर,’’ कमलाकांत बोले.

‘‘वह तो सरकारी है?’’ वर्माजी से रहा न गया.

‘‘तो क्या हुआ. मंदिर सरकारी जमीन पर नहीं बनेगा तो क्या हमारे घर में बनेगा?’’ एक हंसा.

‘‘कल को सरकार उसे तुड़वा दे तब?’’ वर्माजी कहते रहे.

‘‘आप भी नादानों की तरह बात करते हैं वर्माजी. इतने साल सरकारी नौकरी कर के भी नहीं सम?ो?’’

वर्माजी कायदे-कानून वाले आदमी थे, इसलिए वे ऐसी जमीन पर मंदिर बनवाने के पक्ष में नहीं थे. बहुमत मंदिर के साथ था, लिहाजा, मुखरित होने में वे हिचक रहे थे. उन्हें सुमंतजी का समर्थन मिला.

‘‘हम लोग सरकारी आदमी रहे हैं. अगर हम ही ऐसा करेंगे तो दूसरों

को क्या संदेश जाएगा?’’ सुमंतजी बोले.

‘‘संदेश अच्छा ही जाएगा. हम शराब की दुकान थोडे़ ही खुलवा रहे हैं. मंदिर बनवाना तो पुण्य का काम है. सरकार बनवा सकती है तो हम क्यों नहीं,’’ कमलाकांत ने इस का पुरजोर समर्थन किया.

‘‘सवाल पापपुण्य का नहीं. अनैतिकता का है. क्या सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा कर के मंदिर बनवाना पुण्य का काम होगा? दूसरे, मंदिर से क्या हासिल होने वाला है?’’ सुमंतजी ने आगे कहा.

‘‘हम हासिल करने के लिए मंदिर नहीं बनवा रहे.’’

‘‘फिर किस उद्देश्य से बनवा रहे हैं?’’

‘‘यह हमारी आस्था से जुड़ा है.’’

‘‘आस्था बिनावजह तो होती नहीं.’’

‘‘आप कहना क्या चाहते हैं.’’

‘‘मेरा यही कहना है कि बेकार रुपया बरबाद करने से अच्छा है जरूरतमंदों की सहायता की जाए.’’

‘‘आप मंदिर का अपमान कर रहे हैं,’’ एक उखड़ा.

‘‘सैकड़ों मंदिर बने और टूटे, उस से क्या फर्क पड़ा? इतना ही शौक है तो मंदिर घर में भी बनवा लीजिए. इस के लिए सब से अच्छा विकल्प होगा कमलाजी का घर,’’ सुमंतजी बोले.

‘‘मेरा ही क्यों?’’ कमलाजी हत्थे से उखडे़, ‘‘घर तो आप का भी बड़ा है?

‘‘बड़ी मुश्किल से कालेज की अध्यापक की नौकरी कर के मकान बनवाया है. आप को पता होगा जब इस जमीन पर किसी की नजर नहीं पड़ी थी तब इसे हम ने औकात के हिसाब से रकम दे कर खरीदा था. आज तो यह करोड़ों में बिक रही है, तब तो यह पूरी खेत थी, सियार लोटते थे.’’

‘‘इस से क्या होता है. जमीन पर मंदिर बनवा ही सकते हैं,’’ कमलाजी बोले.

‘‘माफ करिए. मैं मंदिर से ज्यादा स्कूल खुलवाने में विश्वास करता हूं.’’

‘‘ठीक है आप स्कूल खोलें और हमें मंदिर बनवाने दें,’’ कमलाजी ने कहा तो सुमंतजी वहां से चले गए. बाकी सदस्यों को सुमंतजी की राय नागवार लगी. वे लोग आपस में सलाहमशवरा करने लगे.

‘‘कहते हैं घर में मंदिर बनवाइए. जब उन के घर की बात की तो स्कूल खुलवाने लगे,’’ नीतीशजी बोले.

‘‘इन की बीवी सब से ज्यादा धार्मिक है,’’ नीतीशजी आगे बोले.

‘‘आप को कैसे पता चला?’’ कमलाजी पूछ बैठे.

‘‘मेरी पत्नी से अच्छी पटती है. बताती है कि सुमंतजी को न समय से नाश्ता मिलता है न खाना. इन की बीवी दिनभर पूजापाठ में लगी रहती हैं. सुमंतजी की 2 बेटियां हैं, जो 32 की हो चली हैं. बेंगलुरु में नौकरी कर के अच्छा कमाती हैं. फिर भी शादी नहीं हो रही.

‘‘तो क्या मां इसीलिए दिनभर पूजापाठ में लगी रहती है?’’

‘‘हां, उन्हें विश्वास है कि ‘भगवान’ कुछ न कुछ रास्ता निकालेंगे. एक दिन

तो हद हो गई जब मेरे ही सामने सुमंतजी अपनी बीवी से कह रहे थे कि इतना पूजापाठ करने से तो पत्थर भी पिघल जाए मगर तुम्हारे भगवान नहीं पिघल रहे.’’

‘‘ऐसे निष्ठुर आदमी के बारे में क्या कहा जाए जिस के दिल में अपनी

धर्मभीरु पत्नी के लिए जरा भी जगह नहीं. आखिर वह भी तो मंदिर में

जल चढ़ाने के लिए एक किलोमीटर दूर जाती होगी?’’ चतुर्वेदीजी का मन कसैला हो गया.

‘‘इन से कुछ मिलने वाला नहीं. इन्हें अपने ग्रुप से हटाइए,’’ एक अन्य सदस्य की राय थी.

‘‘कैसे हटा दें, कल को उन की पत्नी मंदिर में जल चढ़ाने आएगी तो क्या हम उन्हें भगा देंगे? उन से भी चंदा लिया जाएगा न,’’ चतुर्वेदीजी बोले.

‘‘चतुर्वेदीजी ठीक कहते हैं. मंदिर तो सभी के लिए होगा. फिर उन्हें कैसे छोड़ा जाए?’’

एक हफ्ते के बाद दोबारा जब मीटिंग हुई तो मंदिर के खर्च पर चर्चा हुई.

‘‘कुल 4 लाख रुपए का खर्चा है. सभी लोग 20-20 हजार रुपए देंगे तो आसानी से मंदिर बन जाएगा.’’

‘‘यह रकम कुछ ज्यादा नहीं है?’’ चतुर्वेदीजी बोले.

‘‘मंदिर के लिए सब से पहले आप ही ने पहल की है. अब आप ही कदम पीछे खींच रहे हैं?’’

‘‘ऐसी बात नहीं है,’’ वे थोड़ा लजाए.

‘‘यहां किसी की भी पैंशन 50 हजार रुपए से कम नहीं है.’’

‘‘वह तो ठीक है मगर दवाओं और अन्य खर्चों में भी तो चला जाता है. बचता ही क्या है?’’ इस मामले में सभी की राय एक थी. एक बार तो लगा कि शायद यह काम न हो पाए.

‘‘चलिए, मैं एक लाख रुपए देता हूं,’’ मंगला प्रसाद पीडब्लूडी में इंजीनियर थे. उन के रिटायरमैंट होने में 2 साल बाकी थे. ज्यादातर सदस्यों की बांछें खिल गईं. मंदिर के लिए सब तैयार थे मगर जब रुपयों की बात आई तो बगलें देखने लगे.

‘‘किसी से जोरजबरदस्ती न की जाए. स्वेच्छा से जो देना चाहे, देगा,’’ समवेत स्वर में सभी सदस्यों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया.

‘‘रुपया घटेगा तब?’’

‘‘ऐसी नौबत नहीं आएगी.’’

पहला कमैंट कन्हैयाजी का था. वे पेशे से वकील थे. वे मीटिंग का हिस्सा नहीं थे.

‘‘मैं आप के इस मिशन का हिस्सा नहीं बनना चाहता हूं,’’ बिना लागलपेट के वकील साहब बोले.

वकील साहब की बात सुन कर सब के चेहरे पर निराशा के भाव आ गए.

‘‘ऐसे कैसे हो सकता है. आप इस कालोनी के गणमान्य सदस्य हैं. बिना आप के सहयोग से संभव नहीं.’’

‘‘मैं इसे फुजूलखर्ची सम?ाता हूं. आप लोगों के पास इफरात पैसा है, लगा सकते हैं,’’ वकील साहब बोले.

‘‘हम पैंशनधारी हैं.’’

‘‘मैं नहीं. सरकार पैंशन आप की निजी जरूरतों के लिए देती है न कि मंदिर बनवाने के लिए.’’

‘‘दानपुण्य भी तो कुछ होता है. कल को हम रहें या न रहें, इस मंदिर के कारण लोग हमेशा याद रखेंगे.’’

‘‘मु?ो रोज कुआं खोदना है और पानी पीना है. मेरी इस में कोई दिलचस्पी नहीं है.’’

‘‘आप चंदा नहीं देंगे?’’

‘‘कालोनी सालों बिना सीवर के रही. चाहते तो आप सब मिल कर सीवर का पाइप बिछवा सकते थे. याद होगा, एक बार मैं ने पहल भी की थी. मगर आप लोगों ने सहयोग करने से इनकार कर दिया, कहने लगे कि यह काम सरकार का है.’’

‘‘बिलकुल सही बात है. हम क्यों अपनी तनख्वाह लगाएं?’’

‘‘मंदिर में लगाएंगे?’’

‘‘बिलकुल लगाएंगे.’’

‘‘तो ठीक है, लगाइए.’’

‘‘मंदिर में कदम मत रखिएगा.’’

‘‘मु?ो क्या गरज है. मेरे लिए मेरा काम ही पूजा है. आप की तरह मुफ्त की पैंशन नहीं मिलती जो अनापशनाप योजना पर काम करूं,’’ वकील साहब भी ठनक गए.

लोग भुनभुनाते हुए वकील साहब के घर से बाहर निकल आए.

सारा मूड खराब कर दिया. पता नहीं प्रोफैसर ने भी बाहर का रास्ता दिखा दिया तो रहीसही कसर पूरी हो जाएगी, यह सोचते हुए सब भरे कदमों से चल कर प्रोफैसर सुमंत के घर पर आए.

‘‘प्रोफैसर साहब, आप स्वेच्छा से जो देना चाहें, दे सकते हैं,’’ एक अधिकारी बोला. सुमंतजी रिटायर थे. मगर ईमानदार. मेहनत से कमाए रुपयों से उन्होंने अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दी. फिर बैंक और अपने बचाए पैसे से एक सामान्य सा दिखने वाला मकान बनवा लिया. देना तो नहीं चाहते थे मगर कुछ सोच कर एक हजार रुपए थमा दिए.

‘‘इतने से क्या होगा,’’ दूसरे अधिकारी से रहा न गया.

‘‘आप ही ने तो स्वेच्छा से देने के लिए कहा, सो दे दिया,’’ सुमंतजी बोले.

अधिकारी को अपने बयान पर अफसोस हुआ. बेकार में स्वेच्छा शब्द इस्तेमाल किया पर उसे क्या मालूम था कि सुमंतजी उसे पकड़ लेंगे. उस ने तो औपचारिकतावश

कहा था.

‘‘कम से कम 10 हजार रुपए देते तो हमारा काम आसान हो जाता. मंगला प्रसाद ने एक लाख रुपए देने का वादा किया है.’’

‘‘वे मंदिर का पूरा खर्च दे सकते हैं.’’

‘‘आप को बुरा लगा तो माफी मांगते हैं.’’

‘‘माफी तो मु?ो मांगनी चाहिए जो मैं आप लोगों के काम न आ सका.’’

‘‘आप शर्मिंदा कर रहे हैं.’’

‘‘साफसाफ कहूं तो मैं आप लोगों के इस काम में शरीक नहीं होना चाहता,’’ सुमंतजी की स्पष्टवादिता किसी को अच्छी नहीं लगी.

औपचारिकताश सुमंतजी ने पत्नी से चाय बनवाने के लिए बोला. मगर सब ने मना कर दिया.

सुमंतजी की पत्नी राधिका उन्हें चार बातें सुनाने से बाज नहीं आई.

‘‘दे दिए होते 5 हजार रुपए. मंदिर के लिए ही तो मांग रहे थे.’’

‘‘5 हजार रुपए पेड़ पर उगते हैं?’’ सुमंतजी की बात सुन कर राधिका का मन तिक्त हो गया. 2 दिन उन से ठीक से बात तक नहीं की.

एक रोज गुस्से में आ कर सुमंतजी ने राधिका को अच्छे से सुना दिया.

‘‘आज भी तुम्हारी बेटी कुंआरी बैठी है. न तुम्हें कोई चिंता है न तुम्हारी बेटी को.’’

‘‘धैर्य रखो, सब अच्छा ही होगा. सब का समय होता है. जब उस का समय आएगा तो हो ही जाएगा.’’

‘‘बुढ़ापे में आएगा?’’ वे चिढे़, आगे कहा, ‘‘मैं मंदिर के नाम पर फूटी कौड़ी नहीं दूंगा.’’

राधिका का मन बेहद दुखी था. उसे पूजापाठ में बड़ा विश्वास था. उसे लगा, अगर इस महान काम में उन के पति ने हिस्सा नहीं लिया तो अनर्थ हो सकता है. इसलिए चोरी से 5 हजार रुपए सदस्यों को देने के लिए निकल पड़ी.

5 हजार रुपए पा कर सदस्यों के चेहरे खिल उठे. उन्हें लगा, सुमंतजी को अपनेआप पर अफसोस हुआ होगा, सो, पत्नी के हाथों रुपए भिजवा दिए.

मंगला प्रसाद ने अतिउत्साह के चलते हामी तो भर दी मगर बाद में जब दिमाग ठंडा हुआ तो अफसोस करने लगे. जबान और इज्जत की बात थी, सो, कुछ सोच कर एक लाख का चैक देने को निकल पड़े.

‘‘चतुर्वेदीजी, मैं आप से एक बात कहना चाहता हूं.’’

‘‘हांहां, कहिए.’’

‘‘जिनजिन लोगों ने चंदा दिया है उन के नाम एक शिलालेख पर अंकित कर के मंदिर के प्रांगण में लगाया जाए ताकि सब को पता चले कि मैं ने एक लाख रुपए चंदा दिया है.’’

‘‘ऐसा ही होगा,’’ चतुर्वेदी के आश्वासन पर उन्होंने बेहद प्रसन्न हो कर एक लाख रुपए का चैक थमा दिया. मंदिर का काम जोरशोर से शुरू हो गया. सालभर में मंदिर बन कर तैयार हो गया. चतुर्वेदीजी ने प्राणप्रतिष्ठा के लिए काशी से पंडित को बुलवाया. काशी में उन की ससुराल थी. उन्हीं पंडितजी ने ही उन्हें मंदिर बनवाने की राय दी थी.

लगभग सभी लेगों को न्योता दिया था. मगर वकील साहब नहीं आए. सुमंतजी की पत्नी आई थी, वे नहीं आए. मंगला प्रसाद का ध्यान शिलापट पर था जिसे देखते ही वे आगबबूला हो गए.

‘‘मैं ने तो एक लाख रुपए दिए थे मगर नाम चतुर्वेदी का है.’’

‘‘गलती से चढ़ गया है. आप परेशान न हों. आज पहला दिन है. जो हो रहा है, होने दीजिए. कारीगर से कहा गया है. वह आ कर ठीक कर देगा.’’

‘‘क्या खाक ठीक करेगा,’’ वे बमके. किसी तरह उन्हें शांत किया गया. मंगला प्रसाद का मूड उखड़ा हुआ था. उन्हें लगा सब ने उन को बेवकूफ बनाया. घर आए तो उन की पत्नी ने समझाया, ‘‘जाने दीजिए. आप ने दान-पुण्य की नीयत से दिया था. उस का फल आप को अवश्य मिलेगा,’’

तभी एक आदमी ने फाटक के पास खड़े हो कर उन के कमरे की घंटी बजाई. पता चला कि कोई ठेकेदार था. उन्होंने उसे अंदर आने के लिए कहा.

मंगला प्रसाद की तरफ ठेकेदार ने पैकेट बढ़ाया.

‘‘कितना है?’’

‘‘जितना बनता है,’’ ठेकेदार बोला.

मंगला प्रसाद पत्नी की तरफ पैकेट बढ़ाते हुए बोले, ‘‘इसे अलमारी में रख दो.’’ पत्नी के लिए यह नई बात नहीं थी. उलटे खुश हो कर बोली, ‘‘मैं ने कहा था कि फल अच्छा ही मिलेगा.’’

मंगला प्रसाद के दिल से शिकवा-शिकायत के भाव तिर गए. Hindi Corruption Story.

Best Social Story In Hindi: विमलाजी- दूसरों के लिए रहस्यमय सा क्यों था विमलाजी का व्यक्तित्व

Best Social Story In Hindi: विमलाजी का रोरो कर बुरा हाल था. उन का इकलौता बेटा मनीष 10 दिनों से लापता था. सब ने समझाया कि थाने में रिपोर्ट दर्ज करवा देनी चाहिए, लेकिन इस बात पर वे चुप्पी साध लेती थीं. उन के पति बारबार कालोनी के लोगों के सामने उन को ताने दे रहे थे कि उन के सिर चढ़ाने का ही यह परिणाम है, अवश्य किसी लड़की के साथ भाग गया होगा, जब पैसे खत्म होंगे तो अपनेआप घर लौट कर आएगा. अचानक एक दिन विमला भी घर से गईं और लौट कर नहीं आईं तो उन के पति और कालोनीवासियों का माथा ठनका कि जरूर दाल में कुछ काला है. पुलिस में रिपोर्ट लिखवाई गई. विमलाजी की खोज जोरशोर से की जाने लगी, सब ने अंदाजा लगाया कि मांबेटे दोनों के लापता होने के पीछे एक ही कारण होगा.

पुलिस ने घर के आसपास तथा उन सभी स्थानों पर उन को तलाशा, जहां उन के जाने की संभावना थी, लेकिन सब बेकार. कालोनी के पास ही एक कोठी थी, जिस में कोई नहीं रहता था. लोगों का मानना था कि उस में भूत रहते हैं, इसलिए वह ‘भुतहा कोठी’ कही जाती थी. किसी की उस के अंदर जाने की हिम्मत नहीं होती थी. पुलिस ने वहां भी छानबीन करनी चाही, अंदर का भयावह दृश्य देख कर पुलिस वाले और कालोनी वाले सन्न रह गए. विमलाजी की लाश वहां पड़ी थी, पूरा शरीर चाकुओं से गुदा हुआ था. हाथों में जो मोटेमोटे सोने के कंगन थे और गले में 5 तोले की चैन पहने रहती थीं, वे सब गायब थे. उन के आभूषण रहित नग्न शरीर को उन की ही साड़ी से ढक कर रखा गया था.

बहुत से लोग अटकलें लगाया करते थे कि उस कोठी को भुतहा कोठी कह कर जानबूझ कर बदनाम किया गया था जिस से उस में डर के मारे कोई प्रवेश न करे. वास्तविकता यह थी कि उस कोठी को आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देने के लिए इस्तेमाल किया जाता था. कालोनी में सनसनी फैल गई. पुलिस कार्यवाही कर के चली गई. लाश के क्रियाकर्म की तैयारी आरंभ हो गई, तभी उन का बेटा मनीष आता हुआ दिखाई पड़ा. सब लोग विस्फारित आंखों से अवाक् उस की ओर देख रहे थे. वह भी अपनी मां की लाश देख कर सकते में आ गया था और पेड़ की डाल की तरह टूट कर अपनी मां से लिपट कर खूब रोया. फिर उस ने जो वृतांत सुनाया, उसे सुन कर सभी सन्न रह गए. उस ने बताया, ‘‘मैं घर से भागा नहीं, मुझे दुकान से लौटते हुए कुछ लोगों ने किडनैप कर लिया था और अगले दिन से ही मां से 50 लाख रुपए की फिरौती की मांग करने लगे थे मेरे सामने उन के फिरौती न देने पर मुझे मार देने की धमकी देते थे. उन का फोन स्पीकर पर रहता था. मेरी मां ने इतना रुपया न देने की असमर्थता जताई, तो ऊंची आवाज में उन को धमकाते थे कि चाहे जैसे भी दो, हमें पैसा चाहिए. ‘‘वे पापा से भी कुछ नहीं बता सकती थीं, क्योंकि उन्होंने मां को सख्ती से मना कर रखा था कि वे उन को न बताएं वरना वे लोग पापा को बता देंगे कि वे अकसर एक बाबा से अपनी परेशानियों का समाधान पूछने के लिए मिलती थीं. उन के वार्त्तालाप से ही उसे ये सब जानकारी मिली थी और इस से साफ जाहिर था कि मां उन को अच्छी तरह जानती थीं.

‘‘फिर परसों अचानक उस भुतहा कोठी में अपनी मां को अपने सामने देख मैं हक्काबक्का रह गया. मां के हाथ में एक पोटली थी, जिस में गहने थे. मां तो वहीं खड़ी रहीं और मुझे आधी रात को एक कार में ले जा कर कहीं दूर छोड़ दिया था. मुझे मां से गले लग कर रोने भी नहीं दिया.’’ इतना कह कर वह फूटफूट कर रोने लगा. सारा अप्रत्याशित वृतांत सुन कर, सभी डर कर कांपने लगे. पुलिस ने मनीष से पूछा, ‘‘तुम उन लोगों का चेहरा पहचान सकते हो.’’

‘‘नहीं सर, वे हर समय अपना मुंह ढके रहते थे.’’ पुलिस को सारी स्थिति समझने में देर नहीं लगी. पुलिस ने कहा, ‘‘अपराधियों ने गहने मिलने के बाद लड़के को तो छोड़ दिया क्योंकि वह तो उन्हें पहचान ही नहीं पाया था और मां को जान से मार दिया कि कहीं वह घर जा कर उन का भेद न खोल दे.’’ थोड़ी देर सोच कर जांच अधिकारी ने कहा, ‘‘ठीक है, हम पूरी कोशिश करेंगे अपराधी को ढूंढ़ने की.’’

प्रतिदिन ही कुछ न कुछ इन बाबाओं के कुकृत्य मीडिया के द्वारा तथा इधरउधर से सुनने को मिलते हैं, फिर भी लोग न जाने क्यों इतने अंधविश्वासी होते हैं कि उन के जाल में फंस जाते हैं और एक बार फंसने के बाद ये ढोंगी अपने ग्राहक को ऐसा सम्मोहित कर लेते हैं कि फिर उन से पीछा छुड़ाना असंभव सा हो जाता है. लेकिन बाबाओं के चक्कर में पड़ने के पीछे पारिवारिक पृष्ठभूमि भी बहुत बड़ा कारण होती है, उस का ही ये लोग फायदा उठाते हैं और विमलाजी तथा उन के क्रियाकलाप ऐसे ही थे  विमलाजी कालोनी में फर्स्ट फ्लोर पर पिछले 5 वर्षों से रह रही थीं. अकसर वे आंगन में घूमती दिखाई पड़ जाती थीं. कपड़े धोना, सब्जी काटना, बरतन साफ करना, स्वेटर बुनना, कंघी करना आदि, जैसे उन के घर का सारा काम आंगन में ही सिमट कर आ गया हो. घर का अंदरूनी हिस्सा तो उन्हें काटने को दौड़ता था. आखिर, क्यों न ऐसा हो, सुबह ही दोनों बापबेटे दुकान के लिए निकल जाते थे और रात के 12 बजे तक आते थे. बेटी कोई थी नहीं.

पति को उन से अधिक अपना व्यवसाय प्यारा था. कभी मैं ने उन दोनों को आंगन में एकसाथ बैठे नहीं देखा. छुट्टी वाले दिन भी विमलाजी के पति अपने काम में व्यस्त रहते थे. पैसे की बहुतायत होने के कारण उन का इकलौता बेटा मनीष बुरी आदतों का शिकार हो गया था. इस कारण विमलाजी बहुत परेशान रहती थीं. अकसर उन की अपने बेटे पर चिल्लाने की जोरजोर से आवाजें सब के घर तक आती थीं. उन को इस बात की तनिक भी परवा नहीं थी कि सुनने वालों की क्या प्रतिक्रिया होगी. विमलाजी पढ़ीलिखी नहीं थीं. पति से तिरस्कृत होने के कारण, अपने रखरखाव के प्रति बहुत लापरवाह थीं. यों भी कह सकते हैं कि विमलाजी की इस लापरवाही के कारण ही उन के पति उन से दूरदूर रहते थे. कभी मैं उन के घर के सामने से निकलती तो अकेलेपन के कारण ही वे अकसर गेट पर ही खड़ी दिख जातीं. वे अकसर मुझे बड़े आग्रह से अपने घर के अंदर बुलातीं, लेकिन बैठातीं आंगन में ही थीं. वहीं बैठे हुए घर के अंदर का दृश्य देखने लायक होता था. ऐसा लगता था जैसे अभी चोर आ कर गए हों. उन की ओर दृष्टि जाती तो चेहरा ऐसा लगता जैसे सुबह से धोया तक नहीं है, कपड़े मैचेकुचैले होते, बाल बिखरे होते, लगता जैसे घर के काम में उन का बिलकुल रुझान नहीं है और अपनेआप से भी उन्हें दुश्मनी जैसी है.

समझ नहीं आता था कि कोई गतिविधि न होने के कारण वे सारा दिन काटती कैसे थीं. उन की इस प्रवृत्ति के कारण कोई उन के घर नहीं जाना चाहता था, लेकिन कभीकभी उन के अकेलेपन पर तरस आ जाता था और मैं उन के घर चली जाती थी. पूरी कालोनी में उन के रवैये के चर्चे होते थे कि इतना पैसा होने पर भी उन्होंने अपना यह हाल क्यों बना रखा है. अपनी व्यक्तिगत बातें वे किसी से साझा नहीं करती थीं, इसलिए सब को वे बड़ी रहस्यमय लगती थीं. किसी से तवज्जुह न मिलने के कारण दिशाहीन हो कर अपनेआप में उलझी रहती थीं. उन्हें यह समझ नहीं थी कि जवान होते हुए बेटे के साथ दोस्ताना व्यवहार रखना कितना आवश्यक था. उन के पति को तो बेटे से अपने व्यवसाय में पूरा सहयोग मिल रहा था, पर वह काम के सिलसिले में बाहर जा कर क्या करता था, उन्हें कोई मतलब नहीं था, लेकिन विमला से उस के देर रात घर आने पर उस के क्रियाकलाप देख कर कुछ भी छिपा नहीं था. उन्हें कुछ समझ नहीं आया तो बाबा की शरण ली. वे भविष्य तो बताते ही थे, साथ में उपाय भी बताते थे और विमलाजी उन उपायों को अपने बेटे के लिए अपनाती भी थीं.

धीरेधीरे बाबा के वर्चस्व का उन पर इतना प्रभाव पड़ा कि वे अकसर उन का प्रवचन सुनने उन के पास चली जाती थीं. इस क्रियाकलाप से उन के पति और बेटा अनभिज्ञ थे. यह बात बहुत समय बाद, जब उस का भयंकर दुष्परिणाम, उन की मृत्यु के रूप में सामने आया तब सब को पता लगा. पड़ोसियों को रातदिन अपने आंगन में दिखाई देने वाली विमलाजी का आंगन सूना देख कर मन बहुत व्यथित होता था. काश वे पढ़ीलिखी होतीं और अंधविश्वास में पड़ कर बाबाओं के पास चक्कर लगाने के स्थान पर अच्छी पुस्तकें पढ़तीं, अच्छे लोगों के संपर्क में रह कर अपनी समस्याओं का समाधान ढूंढ़तीं. कहते हैं, अपना दुख बांटने से वह आधा रह जाता है. उन की नासमझी के कारण, उन की स्वयं की तो दर्दनाक मृत्यु हुई ही, साथ में परिवार की जड़ें भी हिल गईं. इस सब के लिए उन के पति भी कम दोषी नहीं थे, जिन को यह समझ नहीं थी कि पत्नी को भौतिक सुख के साथ भावनात्मक संबल भी चाहिए होता है. विमलाजी की त्रासदी शायद कुछ लोगों की आंखें खोल सके. Best Social Story In Hindi.

Best Social Story In Hindi: खेल- मासूम दिखने वाली दिव्या तो मुझ से भी माहिर निकली

Best Social Story In Hindi: आज से 6-7 साल पहले जब पहली बार तुम्हारा फोन आया था तब भी मैं नहीं समझ पाया था कि तुम खेल खेलने में इतनी प्रवीण होगी या खेल खेलना तुम्हें बहुत अच्छा लगता होगा. मैं अपनी बात बताऊं तो वौलीबौल छोड़ कर और कोई खेल मुझे कभी नहीं आया. यहां तक कि बचपन में गुल्लीडंडा, आइसपाइस या चोरसिपाही में मैं बहुत फिसड्डी माना जाता था. फिर अन्य खेलों की तो बात ही छोड़ दीजिए कुश्ती, क्रिकेट, हौकी, कूद, अखाड़ा आदि. वौलीबौल भी सिर्फ 3 साल स्कूल के दिनों में छठीं, 7वीं और 8वीं में था, देवीपाटन जूनियर हाईस्कूल में. उन दिनों स्कूल में नईनई अंतर्क्षेत्रीय वौलीबौल प्रतियोगिता का शुभारंभ हुआ था और पता नहीं कैसे मुझे स्कूल की टीम के लिए चुन लिया गया और उस टीम में मैं 3 साल रहा. आगे चल कर पत्रकारिता में खेलों का अपना शौक मैं ने खूब निकाला. मेरा खयाल है कि खेलों पर मैं ने जितने लेख लिखे, उतने किसी और विषय पर नहीं. तकरीबन सारे ही खेलों पर मेरी कलम चली. ऐसी चली कि पाठकों के साथ अखबारों के लोग भी मुझे कोई औलराउंडर खेलविशेषज्ञ समझते थे.

पर तुम तो मुझ से भी बड़ी खेल विशेषज्ञा निकली. तुम्हें रिश्तों का खेल खेलने में महारत हासिल है. 6-7 साल पहले जब पहली बार तुम ने फोन किया था तो मैं किसी कन्या की आवाज सुन कर अतिरिक्त सावधान हो गया था. ‘हैलो सर, मेरा नाम दिव्या है, दिव्या शाह. अहमदाबाद से बोल रही हूं. आप का लिखा हुआ हमेशा पढ़ती रहती हूं.’

‘जी, दिव्याजी, नमस्कार, मुझे बहुत अच्छा लगा आप से बात कर. कहिए मैं आप की क्या सेवा कर सकता हूं.’ जी सर, सेवावेवा कुछ नहीं. मैं आप की फैन हूं. मैं ने फेसबुक से आप का नंबर निकाला. मेरा मन हुआ कि आप से बात की जाए.

‘थैंक्यूजी. आप क्या करती हैं, दिव्याजी?’ ‘सर, मैं कुछ नहीं करती. नौकरी खोज रही हूं. वैसे मैं ने एमए किया है समाजशास्त्र में. मेरी रुचि साहित्य में है.’

‘दिव्याजी, बहुत अच्छा लगा. हम लोग बात करते रहेंगे,’ यह कह कर मैं ने फोन काट दिया. मुझे फोन पर तुम्हारी आवाज की गर्मजोशी, तुम्हारी बात करने की शैली बहुत अच्छी लगी. पर मैं लड़कियों, महिलाओं के मामले में थोड़ा संकोची हूं. डरपोक भी कह सकते हैं. उस का कारण यह है कि मुझे थोड़ा डर भी लगा रहता है कि क्या मालूम कब, कौन मेरी लोकप्रियता से जल कर स्टिंग औपरेशन पर न उतर आए. इसलिए एक सीमा के बाद मैं लड़कियों व महिलाओं से थोड़ी दूरी बना कर चलता हूं.

पर तुम्हारी आवाज की आत्मीयता से मेरे सारे सिद्धांत ढह गए. दूरी बना कर चलने की सोच पर ताला पड़ गया. उस दिन के बाद तुम से अकसर फोन पर बातें होने लगीं. दुनियाजहान की बातें. साहित्य और समाज की बातें. उसी दौरान तुम ने अपने नाना के बारे में बताया था. तुम्हारे नानाजी द्वारका में कोई बहुत बड़े महंत थे. तुम्हारा उन से इमोशनल लगाव था. तुम्हारी बातें मेरे लिए मदहोश होतीं. उम्र में खासा अंतर होने के बावजूद मैं तुम्हारी ओर आकर्षित होने लगा था. यह आत्मिक आकर्षण था. दोस्ती का आकर्षण. तुम्हारी आवाज मेरे कानों में मिस्री सरीखी घुलती. तुम बोलती तो मानो दिल में घंटियां बज रही हैं. तुम्हारी हंसी संगमरमर पर बारिश की बूंदों के माध्यम से बजती जलतरंग सरीखी होती. उस के बाद जब मैं अगली बार अपने गृहनगर गांधीनगर गया तो अहमदाबाद स्टेशन पर मेरीतुम्हारी पहली मुलाकात हुई. स्टेशन के सामने का आटो स्टैंड हमारी पहली मुलाकात का मीटिंग पौइंट बना. उसी के पास स्थित चाय की एक टपरी पर हम ने चाय पी. बहुत रद्दी चाय, पर तुम्हारे साथ की वजह से खुशनुमा लग रही थी. वैसे मैं बहुत थका हुआ था. दिल्ली से अहमदाबाद तक के सफर की थकान थी, पर तुम से मिलने के बाद सारी थकान उतर गई. मैं तरोताजा हो गया. मैं ने जैसा सोचा समझा था तुम बिलकुल वैसी ही थी. एकदम सीधीसादी. प्यारी, गुडि़या सरीखी. जैसे मेरे अपने घर की. एकदम मन के करीब की लड़की. मासूम सा ड्रैस सैंस, उस से भी मासूम हावभाव. किशमिशी रंग का सूट. मैचिंग छोटा सा पर्स. खूबसूरत डिजाइन की चप्पलें. ऊपर से भीने सेंट की फुहार. सचमुच दिलकश. मैं एकटक तुम्हें देखता रह गया. आमनेसामने की मुलाकात में तुम बहुत संकोची और खुद्दार महसूस हुई.

कुछ महीने बाद हुई दूसरी मुलाकात में तुम ने बहुत संकोच से कहा कि सर, मेरे लिए यहीं अहमदाबाद में किसी नौकरी का इंतजाम करवाइए. मैं ने बोल तो जरूर दिया, पर मैं सोचता रहा कि इतनी कम उम्र में तुम्हें नौकरी करने की क्या जरूरत है? तुम्हारी घरेलू स्थिति क्या है? इस तरह कौन मां अपनी कम उम्र की बिटिया को नौकरी करने शहर भेज सकती है? कई सवाल मेरे मन में आते रहे, मैं तुम से उन का जवाब नहीं मांग पाया. सवाल सवाल होते हैं और जवाब जवाब. जब सवाल पसंद आने वाले न हों तो कौन उन का जवाब देना चाहेगा. वैसे मैं ने हाल में तुम से कई सवाल पूछे पर मुझे एक का भी उत्तर नहीं मिला. आज 20 अगस्त को जब मुझे तुम्हारा सारा खेल समझ में आया है तो फिर कटु सवाल कर के क्यों तुम्हें परेशान करूं.

मेरे मन में तुम्हारी छवि आज भी एक जहीन, संवेदनशील, बुद्धिमान लड़की की है. यह छवि तब बनी जब पहली बार तुम से बात हुई थी. फिर हमारे बीच लगातार बातों से इस छवि में इजाफा हुआ. जब हमारी पहली मुलाकात हुई तो यह छवि मजबूत हो गई. हालांकि मैं तुम्हारे लिए चाह कर भी कुछ कर नहीं पाया. कोशिश मैं ने बहुत की पर सफलता नहीं मिली. दूसरी पारी में मैं ने अपनी असफलता को जब सफलता में बदलने का फैसला किया तो मुझे तुम्हारी तरफ से सहयोग नहीं मिला. बस, मैं यही चाहता था कि तुम्हारे प्यार को न समझ पाने की जो गलती मुझ से हुई थी उस का प्रायश्चित्त यही है कि अब मैं तुम्हारी जिंदगी को ढर्रे पर लाऊं. इस में जो तुम्हारा साथ चाहिए वह मुझे प्राप्त नहीं हुआ.

बहरहाल, 25 जुलाई को तुम फिर मेरी जिंदगी में एक नए रूप में आ गई. अचानक, धड़धड़ाते हुए. तेजी से. सुपरसोनिक स्पीड से. यह दूसरी पारी बहुत हंगामाखेज रही. इस ने मेरी दुनिया बदल कर रख दी. मैं ठहरा भावुक इंसान. तुम ने मेरी भावनाओं की नजाकत पकड़ी और मेरे दिल में प्रवेश कर गई. मेरे जीवन में इंद्रधनुष के सभी रंग भरने लगे. मेरे ऊपर तुम्हारा नशा, तुम्हारा जादू छाने लगा. मेरी संवेदनाएं जो कहीं दबी पड़ी थीं उन्हें तुम ने हवा दी और मेरी जिंदगी फूलों सरीखी हो गई. दुनियाजहान के कसमेवादों की एक नई दुनिया खुल गई. हमारेतुम्हारे बीच की भौतिक दूरी का कोई मतलब नहीं रहा. बातों का आकाश मुहब्बत के बादलों से गुलजार होने लगा.

तुम्हारी आवाज बहुत मधुर है और तुम्हें सुर और ताल की समझ भी है. तुम जब कोई गीत, कोई गजल, कोई नगमा, कोई नज्म अपनी प्यारी आवाज में गाती तो मैं सबकुछ भूल जाता. रात और दिन का अंतर मिट गया. रानी, जानू, राजा, सोना, बाबू सरीखे शब्द फुसफुसाहटों की मदमाती जमीन पर कानों में उतर कर मिस्री घोलने लगे. उम्र का बंधन टूट गया. मैं उत्साह के सातवें आसमान पर सवार हो कर तुम्हारी हर बात मानने लगा. तुम जो कहती उसे पूरा करने लगा. मेरी दिनचर्या बदल गई. मैं सपनों के रंगीन संसार में गोते लगाने लगा. क्या कभी सपने भी सच्चे होते हैं? मेरा मानना है कि नहीं. ज्यादा तेजी किसी काम की नहीं होती. 25 जुलाई को शुरू हुई प्रेमकथा 20 अगस्त को अचानक रुक गई. मेरे सपने टूटने लगे. पर मैं ने सहनशीलता का दामन नहीं छोड़ा. मैं गंभीर हो गया था. मैं तो कोई खेल नहीं खेल रहा था. इसलिए मेरा व्यवहार पहले जैसा ही रहा. पर तुम्हारा प्रेम उपेक्षा में बदल गया. कोमल भावनाएं औपचारिक हो गईं. मेरे फोन की तुम उपेक्षा करने लगी. अपना फोन दिनदिन भर, रातभर बंद करने लगी. बातों में भी बोरियत झलकने लगी. तुम्हारा व्यवहार किसी खेल की ओर इशारा करने लगा.

इस उपेक्षा से मेरे अंदर जैसे कोई शीशा सा चटख गया, बिखर गया हो और आवाज भी नहीं हुई हो. मैं टूटे ताड़ सा झुक गया. लगा जैसे शरीर की सारी ताकत निचुड़ गई है. मैं विदेह सा हो गया हूं. डा. सुधाकर मिश्र की एक कविता याद आ गई,

इतना दर्द भरा है दिल में, सागर की सीमा घट जाए.

जल का हृदय जलज बन कर जब खुशियों में खिलखिल उठता है. मिलने की अभिलाषा ले कर,

भंवरे का दिल हिल उठता है. सागर को छूने शशधर की किरणें,

भागभाग आती हैं, झूमझूम कर, चूमचूम कर,

पता नहीं क्याक्या गाती हैं. तुम भी एक गीत यदि गा दो,

आधी व्यथा मेरी घट जाए. पर तुम्हारे व्यवहार से लगता है कि मेरी व्यथा कटने वाली नहीं है.

अभी जैसा तुम्हारा बरताव है, उस से लगता है कि नहीं कटेगी. यह मेरे लिए पीड़ादायक है कि मेरा सच्चा प्यार खेल का शिकार बन गया है. मैं तुम्हारी मासूमियत को प्यार करता हूं, दिव्या. पर इस प्यार को किसी खेल का शिकार नहीं बनने दे सकता. लिहाजा, मैं वापस अपनी पुरानी दुनिया में लौट रहा हूं. मुझे पता है कि मेरा मन तुम्हारे पास बारबार लौटना चाहेगा. पर मैं अपने दिल को समझा लूंगा. और हां, जिंदगी के किसी मोड़ पर अगर तुम्हें मेरी जरूरत होगी तो मुझे बेझिझक पुकारना, मैं चला आऊंगा. तुम्हारे संपर्क का तकरीबन एक महीना मुझे हमेशा याद रहेगा. अपना खयाल रखना. Best Social Story In Hindi.

Family Story In Hindi: लालच- रंजीता क्या बच पाई जिस्मफरोशी के जाल से?

Family Story In Hindi: रंजीता बहुत खूबसूरत तो नहीं थी, लेकिन बननेसंवरने में उसे बहुत दिलचस्पी थी. जब वह सजसंवर कर खुद को आईने में देखती, तो मुसकराने लगती. रंजीता अपनी असली उम्र से कम लगती थी. उसे घर के कामों में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी और वह बाजार में खरीदारी करने की शौकीन थी.

रंजीता को शेरोशायरी से लगाव था और वह अपनी शोखियों से महफिल लूट लेने का दम रखती थी. रंजीता का अपने पति रमेश से झगड़ा चल रहा था. इसी बीच उन के महल्ले का साबिर मुंबई से लौट आया था. वह चलता पुरजा था.

एक दिन मुशायरे में उन दोनों का आमनासामना हो गया. साबिर ने आदाब करते हुए कहा, ‘‘आप तो पहुंची हुई शायरा लगती हैं. आप मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में क्यों नहीं कोशिश करती हैं?’’ रंजीता पति रमेश की जलीकटी बातों से उकताई हुई थी. साबिर की बातों से जैसे जले पर रूई के फाहे सी ठंडक मिली. उस ने अपना भाव जाहिर करते हुए कहा, ‘‘साबिर, आप क्या मुझे बेवकूफ समझते हैं?’’

साबिर ने तुरंत अपना जाल बिछाया, ‘‘नहीं मैडम, मैं सच कह रहा हूं कि आप वाकई पहुंची हुई शायरा हैं.’’ रंजीता ने साबिर को अपने घर दिन के खाने पर बुला लिया. रात के खाने पर रमेश से झगड़ा हो सकता था.

खाने पर रंजीता व साबिर ने खूब खयालीपुलाव पकाए और योजना बनाई कि रंजीता अपनी जमापूंजी ले कर हफ्ते के आखिर में जा रही ट्रेन से मुंबई चलेगी. साबिर ने तो उस की जवान होती लड़की को भी साथ चलने के लिए कहा, पर रंजीता ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली थीं. बेटी को घर पर ही रख कर वह अपनी पक्की सहेली से बेटी से मिलते रहने की कह कर 50 हजार रुपए ले कर चल दी.

रंजीता जब गाड़ी में बैठी, तो उस का दिल धकधक कर रहा था. पर वह मन में नए मनसूबे बनाती जा रही थी. इन्हीं सब बातों को याद करती हुई वह मुंबई पहुंच गई. साबिर ने उसे वेटिंग रूम में ही तैयार होने को कहा और फोन पर किसी से मिलने की मुहलत मांगी.

रंजीता का चेहरा बुझ सा गया था. वह नए शहर में गुमसुम हो गई थी. साबिर ने उस से कहा, ‘‘चलो, कहीं होटल में कुछ खा लेते हैं.’’

कुछ देर में वे दोनों एक महंगे रैस्टोरैंट में थे. साबिर ने उस से पूछे बिना ही काफी महंगी डिश का और्डर किया. जब दोनों ने खाना खा लिया, तो साबिर ने यों जाहिर किया कि मानो उस का पर्स मिल नहीं रहा था. झक मार कर रंजीता ने ही वह भारी बिल अदा किया. रंजीता को घर की भी बेहद याद आ रही थी. घर से दूर आ कर वह महसूस कर रही थी कि पति के साए में वह कितनी बेफिक्र रहती थी.

अब साबिर व रंजीता एक टैक्सी से किसी सरजू के दफ्तर जा रहे थे. इस बार रंजीता ने खुद ही टैक्सी का भाड़ा दे दिया. उस ने साबिर को नौटंकी करने का चांस नहीं दिया. सरजू एक ऐक्टिंग इंस्टीट्यूट चलाता था. हालांकि वह खुद एक पिटा हुआ ऐक्टर था, पर मुंबई में ऐक्टिंग सिखाने का उस का धंधा सुपरहिट था.

सरजू के दफ्तर तक रंजीता को पहुंचा कर साबिर को जैसे कुछ याद आया. वह उठ खड़ा हुआ और ‘बस, अभी आता हूं’ कह कर बगैर रंजीता के जवाब का इंतजार किए चला गया. अब रंजीता और सरजू आमनेसामने बैठे थे. वह इधरउधर देखने की कोशिश करने लगी, जबकि सरजू उसे देख रहा था.

कुछ देर की खामोशी के बाद सरजू बोला, ‘‘लगता है कि आप थकी हुई हैं. आप ऐसा कीजिए कि रात तक नींद ले लीजिए.’’ सरजू की एक नौकरानी ने सोने का कमरा दिखा दिया. रंजीता सोई तो नहीं, पर वह उस कमरे में अपनी शायरी की किताब निकाल कर पढ़ने लगी. कब आंख लग गई, उसे पता ही नहीं चला.

सुबह जब संगीता को होश आया, तो उस ने खुद को पुलिस से घिरा पाया. एक खूबसूरत लड़की भी उस के पास खड़ी थी. पुलिस इंस्पैक्टर विनोद ने कहा, ‘‘लगता है कि आप होश में आ गई हैं.’’

रंजीता उठ बैठी. कपड़े टटोले. वह लड़की मुसकरा रही थी. इंस्पैक्टर विनोद ने उस लड़की को देख कर कहा, ‘‘थैंक्स समीरा मैडम, अब आप जा सकती हैं.’’

रंजीता भी उठ खड़ी हुई. इंस्पैक्टर विनोद ने कहा, ‘‘आप भी समीरा मैडम का शुक्रिया अदा कीजिए.’’ रंजीता कुछ नहीं समझी. तब इंस्पैक्टर विनोद ने बताया, ‘‘आप को साबिर ने सरजू को बेच दिया था. यह शख्स ऐटिंक्ग इंस्टीट्यूट की आड़ में जिस्मफरोशी का धंधा चलाता है.

समीरा मैडम को इन्होंने इसी तरह से धोखा दे कर बेचा था, पर वे बार डांसर बन कर आज आप जैसी धोखे की शिकार औरतों को बचाने की मुहिम चलाती हैं.’’ समीरा बोली, ‘‘और विनोदजी जैसे पुलिस इंस्पैक्टर मदद करें, तभी हम बच सकती हैं, वरना…’’

यह कहते हुए समीरा के आंसुओं ने सबकुछ कह दिया. तभी वह नौकरानी आ गई. समीरा ने उसे कुछ रुपए दिए और बताया कि इसी काम वाली ने उसे फोन कर के बताया था. शाम को रंजीता अपने शहर जा रही ट्रेन पर सवार हो गई. उस ने मन ही मन समीरा का शुक्रिया अदा किया और इस मायानगरी को अलविदा कह दिया. Family Story In Hindi.

Family Story In Hindi: वापसी- सविता-विकास को कब आई परिवार की याद?

Family Story In Hindi: सविता के छोटे बेटे विकास ने एक दिन आ कर अपनी मां से कहा, ‘‘मां, आप हम ढाई प्राणियों के लिए भी घरखर्च के लिए 2 हजार लेती हैं और भैयाभाभी के अलावा उन के 3 बच्चे हैं, उन से भी 2 हजार रुपए ही लेती हैं, यह कहां का न्याय है?”

‘‘क्यों रे, अब तू कमाने वाला हो गया है तो न्यायअन्याय समझाने आया है?जब तक तेरी नौकरी नहीं थी तब तक बड़े ही तो घर का पूरा खर्च चला रहा था. उस समय तेरा न्याय कहां चला गया था?’’ सविता ने उसी से प्रश्न किया. बड़े बेटे प्रवाश का वह नाम नहीं लेती थीं, ‘बड़े’ कह कर ही बुलाती थीं.

‘‘उस समय मैं कमाता नहीं था तो कहां से देता,’’ विकास ने सफाई दी.

‘‘संयुक्त परिवार का नियम ही यह कहता है कि जो कमाए और ज्यादा कमाए वही ज्यादा खर्च करे. और उस हिसाब से तेरी आमदनी बड़े से ज्यादा है इसलिए घर के खर्चें में तेरा योगदान ज्यादा होना चाहिए. पर मैं तो दोनों से बराबर ही लेती हूं. अगर तुम लोग अलग रहते तो क्या 2 हजार रुपए में खर्च चल जाता?’’ सविता ने तर्क किया.

‘‘क्यों नहीं चल जाता. हम लोगों का खर्च ही कितना है?’’ विकास बोला.

‘‘तो ठीक है, कुछ दिन तुम लोग अलग रह कर भी देख लो. जब तबीयत भर जाए तो साथ रहने आ जाना,’’ सविता ने दोटूक जवाब दे दिया.

विकास ने नौकरी लगते ही कंपनी के फ्लैट में जाने का सोचा था, पर उस समय तो सब के समझानेबुझाने के साथ ही रहने को राजी हो गया था मगर पिछले कुछ दिनों से उस की पत्नी दिव्या उसे कंपनी का फ्लैट लेने को उकसा रही थी. विकास ने उस के कहने पर क्वार्टर के लिए अरजी तो दे दी थी और एक फ्लैट उसे अलाट भी हो गया था, परंतु अलग जाने की बात को मां से कैसे कहे यह उस की समझ में नहीं आ रहा था.

आज जब मौका हाथ लगा तो उस ने पहल कर दी थी और समस्या इतनी आसानी से सुलझ जाएगी उस ने सोचा भी नहीं था. दिव्या तो बहुत खुश हुई और नए घर में जाने की तैयारी करने लगी.

एक दिन अच्छा मुहूर्त देख कर वे लोग नए मकान में चले गए. जरूरत की थोड़ीबहुत चीजें तो सविता ने पहुंचा दी थीं पर दिव्या तो अपने स्टैंडर्ड से रहना चाहती थी. कमरों की साजसज्जा आधुनिक डिजाइन से करवाने और नया सामान खरीदने में ही जमा की हुई पूंजी खर्च हो गई. फिर भी वे संयुक्त थे कि वहां सिर्फ पतिपत्नी व उन का अपना बेटा था.

दिव्या की तो मन की मुराद पूरी हो गई थी पर विकास को अंदर ही अंदर ऐसा एहसास होता कि उस ने कहीं कुछ भूल की है और इसीलिए मां का सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था. प्रवाश व उस की पत्नी सुधा कभीकभी उन से मिलने चले जाते थे और कहते थे कि मां और बाबूजी याद करते हैं पर विकास व्यस्तता का बहाना कर देता.

कुछ दिन तो जोश में घर की सजावट करने में निकल गए. अब मुख्य समस्या घर के काम की आई. नौकरनौकरानियों के दर्शन दुर्लभ थे. नई कालोनी तो बस गर्ई थी पर सर्वेंट क्वार्टर किसी भी फ्लैट में नहीं था. सुबह से शाम तक बरतन से ले कर झाड़ूपोंछा तक सबकुछ दिव्या को ही करना पड़ रहा था. बाजार का सामान विकास ले आता था. रसोई का पूरा काम था ही, बबलू अलग उसी से चिपका रहता था.

जब सब इकट्ठे रहते थे तब बबलू तो बच्चों के साथ ही खेलताखाता था. उस की ज्यादातर फरमाइशें दादी ही पूरा कर देती थीं. घर के काम के लिए भी पुराने नौकरनौकरानियां लगी हुई थीं जो दिव्या को कुछ भी काम नहीं करने देती थीं. रसोई का काम पूरा था पर सुबह तो सविता ही खाना बनाती थी और सुधा तथा दिव्या बच्चों का काम देखती थीं. शाम को सुधा ही अकसर खाना बनाती थी, दिव्या तो सिर्फ मदद कर देती थी.

अब सब काम दिव्या के जिम्मे ही आ गया तो शाम तक वह इतनी थक जाती कि जैसेतैसे शाम का खाना बना पाती. अकेले में पति व पुत्र को नएनए पकवान बना कर खिलाने का जो चाव था वह हवा हो गया.

उधर मां की मन नहीं मानता. सविता जब भी बबलू, विकास या दिव्या की पसंद की कोई चीज बनातीं तो उन के लिए जरूर भेजतीं.

कुछ दिन बाद बहुत कोशिश व मानमनुहार करने पर 2000 रुपए महीने पर सिर्फ चौकाबरतन व झाड़ूपोंछा करने के लिए एक काम वाली तैयार हो गई. दिव्या का 2000 रुपए महीने निकालना खला तो बहुत पर इस के अलावा कोई चार भी नहीं था. सविता के घर में तो पुराने नौकर ही बहुत सा फालतू काम कर देते थे पर यहां बंधेबधाएं काम के अलावा दूसरे काम में नौकरानी हाथ भी नहीं लगाती थी.

दिव्या को सब से ज्यादा परेशानी हुई कपड़ों की धुलाई की. घर में कपड़े धो भी ले तो इस्तिरी करवाने ही पड़ते थे. सविता के घर में तो एक धोबी को क्वार्टर दे दिया था जिस की बीवी कपड़े धो कर इस्तिरी करवा कर रख जाती थी. सविता हर महीने उसे बंधीबंधाई रकम दे देती थीं.

दूसरी परेशानी दिव्या को बबलू को ले कर हुई. पहले वह सब बच्चों के साथ खेलता रहता था. कहां है वह दिव्या का पता भी नहीं चलता था, मगर अब हर आधा घंटे बाद आ कर मां से कहता, ‘‘मन नहीं लग रहा. किस के साथ खेलूं.’’

कभीकभार तो दिव्या बबलू पर ही झुंझला पड़ती, फिर रोआंसी हो जाती. बबलू भी कहता कि वह दादी से कहेगा कि मां डांटती हैं. इतनी परेशानियों के बावजूद उन लोगों के घर को अच्छी तरह सेट कर लिया.
नया सोफासेट लिया, उस के लिए कुशन, डाइनिंग टेबल, चेअर, नया डबलबैड आदि खरीद लिए. शादी में मिली सारी चीजें सजा दीं. स्टील के प्रेम में अपना व विकास का तथा एक फ्रेम में बबलू का फोटो मढ़ दिया. दिव्या ने अपने मातापिता का फोटो भी टांग दिया. ड्राइंगरूम तो ऐसे सजा दिया मानो शोरूम हो.

अब दिव्या को चाव हुआ कि अम्मांजी व बाबूजी आ कर घर देखें. यह मौका भी आ गया. बबलू की वर्षगांठ पड़ी तो नए तरीके से मनाने का सोचा. केक का और्डर दिया. दिव्या के मायके वाले, ससुराल वाले और पड़ोस के 1-2 घर सब को निमंत्रण दिया. शाम को कमरे को खूब सजाया गया. केक पर मोमबत्तियां लगाई गईं. सब लोग आए तो दिव्या ने उन्हें घर दिखाया. सभी ने उस की रुचि की तारीफ की. जेठानी सुधा तो दिव्या से कहे बिना न रह सकी, ‘‘दिव्या बहन, तुम ने तो अपना घर खूब अच्छी तरह जमाया है. हम लोग तो कुछ कर ही नहीं पाते.’’

‘‘जैसे आप लोग रहते हैं दीदी, उस तरह मेरे वश की बात नहीं थी. थोड़े दिन काट लिए वही काफी था. अब अपनी तरह से रह सकते हैं इसलिए अलग हुए हैं.’’

‘‘विकास भैया की तरह यह मेरे कहे में थोड़े ही हैं,’’ सुधा ने सफाई दी, ‘‘अगर अम्मांजी व बाबूजी के पूछे बिना कुछ लेने को कहो तो झट कह देते हैं, काम चल तो रहा है.’’

‘‘ उस के लिए भी हुनर आना चाहिए कि पति को कैसे वश में किया जाए,’’ दिव्या हंस पड़ी.

सुधा भी खिसियानी हंसी हंस दी.
सभी दिव्या की सराहना कर रहे थे. दावत भी उन्होंने अच्छी ही दी थी. बबलू भी सब के उपहार पा कर बहुत खुश था. दादीबाबा को तो वह छोड़ ही नहीं रहा था. दिव्या भी अपनी तारीफ सुन कर खुश थी, पर सविता के एक चीज अवश्य खटकी थी. बबलू झटक गया था. विकास भी कुछ उदास था. उतना खुल कर बातें नहीं कर रहा था जैसे सब के साथ रहने पर करता था.

तभी सविता दिव्या से पूछ बैठी, ‘‘बबलू इतना कमजोर क्यों लग रहा है. क्या खाना ढंग से नहीं खाता?’’

‘‘पता नहीं, अम्मांजी, बबलू को क्या हो गया है. न ढंग से खाना खाता है न दूध पीता है. उस से कहती हूं बाहर जा कर खेल तो बाहर भी नहीं जाता,’’ दिव्या बोली.

‘‘बेटा, उसे घर में 4 भाईबहनों के साथ खानेखेलने की आदत पड़ी हुई थी, यहां वह अकेला पड़ गया है. तुम लोग तो इस वातावरण के आदी हो सो कोई फर्क नहीं पड़ा, परंतु बबलू को यह वातावरण माफिक नहीं आ रहा. अब दूसरा उस के साथ लिए चाहिए,’’ सविता ने कहा.

‘‘दूसरा कहां से ढूंढ़ूं,’’ दिव्या ने अपनी कठिनाई बताई.

‘‘तुम भी दिव्या बहुत भोली हो. बबलू अब 4 साल का हो गया है. साथ के लिए उसे भाईबहन की जरूरत है,’’ सविता ने स्पष्ट किया.

दिव्या झेंप गई, बोली, ‘‘अभी नहीं, अम्मांजी, अभी तो हम 3 का खर्च ही मुश्किल से चल पाता है. अभी तो हम परिवार बढ़ाने की सोच भी नहीं सकते.’’

‘‘तो ऐसा करो, बबलू को स्कूल भेजने लगो. वहां से बड़े के बच्चों के साथ घर आ जाया करेगा और शाम को विकास दफ्तर से लौटते समय ले आया करेगा. घर के पास ही तो विकास का दफ्तर है. वहां बच्चों के साथ मन लगा रहेगा,’’ सविता ने सुझाव दिया.

‘‘हां, यह ठीक रहेगा,’’ दिव्या बोली, उस ने सोचा उसे भी घर के काम के लिए फुरसत मिल जाएगी. दोपहर को थोड़ा आराम भी कर लेगी. बबलू से जब कहा गया तो वह भी खुश हो गया.

अब सबकुछ ढर्रे पर आ गया, पर जब बबलू की पढ़ाई का खर्च और बढ़ गया मगर वह भी जरूरी था. 200 रुपए नौकरानी के अलग से निकल जाते. महीने में गैस का खर्च, दूध आदि सभी कुछ अलग से खरीदना पड़ता, बिजली का बिल व कपड़ों की धुलाई का खर्च अलग. वहां तो बाबूजी के ही जिम्मे ये सब खर्चे थे, यहां तो ऊपर से 2 हजार रुपए महीने फ्लैट का किराया देना पड़ता है. काम में भी वहां ता सिर्फ शाम को ही मदद करनी पड़ती थी मगर यहां तो पूरे दिन खटना पड़ता है.

अब दिव्या को आटेदाल का भाव मालूम पडऩे लगा. उस के शौक की सभी चीजों में कटौती होती गई. सिनेमा देखना तो करीब छोड़ ही दिया था. इस घर में आने के बाद रेस्तरां की शक्ल तो देखी ही नहीं थी, जबकि वहां सब के बीच रहते थे तब तो पतिपत्नी महीने में एक बार सिनेमा जा बाहर ही खाना खा कर आते. जब भी घूमने जाते तो कोल्ड कौफी या आइसक्रीम का आनंद लेते. अब सब चीजें बंद हो गर्ई परंतु किसी से कुछ कह भी नहीं सकते थे. रास्ते तो स्वयं उन का चुना हुआ था.

एक दिन विकास के दफ्तर के लोगों ने सपरिवार पिकनिक का कार्यक्रम बनाया. शहर से बाहर सभी अपनाअपना खाना ले कर जाएंगे. दिनभर घूमेंगे. ताश खेलेंगे और शाम को वापस आ जाएंगे. दफ्तर की एक बड़ी गाड़ी का प्रबंध कर लिया था. विकास भी दिव्या व बबलू को ले कर गया. हंसीखुशी में दिन कट गया.

जब वे लोग घर लौटे तो देखा घर का ताला टूटा पड़ा है. अंदर जा कर देखा तो पता लगा सारा कीमती सामान गायब है. स्टील की अलमारी खुली पड़ी है आर उस में से कैश व ज्वैलरी चोरी हो गए. अड़ोसपड़ोस में पूछा तो कोई नहीं बता पाया, कब चोर आए और सारा कीमती सामान ले कर नौ दो ग्यारह हो गए.

दोनों माथा पकड़ कर बैठ गए.
विकास ने पुलिस को खबर की. पुलिस आर्ई भी पूछताछ करने, कुत्ता भी छोड़ा गया पर चोर कहां मिलते हैं, अगर पकड़ भी लिए जाएंगे तो सामान तो एक बार गया हुआ वापस मिलता नहीं.

खबर मिलते ही सविता व जेठानी सुधा भी आ पहुंची. वे दिव्या को धीरज बंधाती रहीं. सुधा ने दिव्या का गला सूना देख कर पूछा, ‘‘चेन जो तुम पहने रहती थीं, वह कहां गई.’’

‘‘भाभी, पिकनिक जाते समय इन्होंने उतरवा दी थी कि बाहर अकसर चेन ङ्क्षखच जाती हैं. सामान के साथ वह भी चली गई,’’ कहतेकहते दिव्या की आंखों में आंसू आ गए.

सविता ने दिव्या को दिलासा दिया, ‘‘बहू, हिम्मत मत हारो. खैर मनाओ तुम लोग ठीकठाक हो नहीं तो ऐसे मौकों पर ये लोग जान लेने में भी नहीं हिचकते.’’

तभी सुधा ने अपने गले की चेन उतार कर दिव्या को पहना दी, ‘‘सूना गला अच्छा नहीं लगता,’’ और दिव्या कहती रह गई, ‘‘भाभी, क्या कर रही हैं.’’ उस ने यह रूप तो सुधा का कभी जाना नहीं था.

‘‘दुखी न हो, बहू. शुक्र मनाओ कि संकट इसी में टल गया. सबकुछ फिर आ जाएगा.’’

‘‘अम्मांजी, तनख्वाह में तो महीने का खर्च ही मुश्किल से चलता है. फिर से बनाने का तो अब हम सोच ही नहीं सकते,’’ दिव्या रोंआसी हो कर बोली.
‘‘क्यों दिव्या, तुम्हारे तो एक ही बच्चा है और तनख्वाह भी विकास की अपने भैया से ज्यादा है, फिर तुम्हारी तो अच्छीखासी बचत हो जानी चाहिए,’’ सुधा ने व्यंग्य कर ही दिया. उस के बच्चों के लिए ही तो विकास ने कहा था कि खर्च ज्यादा होता है. वह इस बात को भूल नहीं पाई, मुंह से बात निकल ही गई, हालांकि यह कह कर उसे पछतावा भी हुआ.

दिव्या के पास इस का कोई जवाब नहीं था, बस, यही कहते बना, ‘‘हम लोग अपने स्टैंडर्ड से रहने आए थे, वही किसी को सहन नहीं हुआ.’’

‘‘यह स्टैंडर्ड ही तो आज परिवारों को तोडऩे का कारण बन रहा है. यह तो तुम उस घर में भी बना सकती थीं, ऊपर के कमरे तो खाली ही पड़ते हैं. आखिर बहुएं आ कर ही तो घर को नए सांचे में ढालती हैं,’’ सविता बोलीं.

‘‘पर अम्मांजी, इन्होंने तो कभी नहीं कहा कि वहां रह कर भी हम सब सुविधाएं प्राप्त कर सकते हैं. कुछ कहने पर यही कह देते थे कि ‘मां से पूछ लो,’’’ दिव्या ने सफाई दी.

‘‘अगर तुम पूछ कर मुझे थोड़ा मान दे देतीं और तुम्हारा काम न होता तब तुम्हें शिकायत होनी चाहिए थी, परंतु तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं था,’’ सविता ने भी उलाहना दिया.

‘‘हां, अम्मांजी, यह भूल मुझ से जरूर हुई. उस का नतीजा भुगत लिया,’’ दिव्या दुखी मन से बोली.

‘‘अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है. अगर चाहो तो तुम्हारे कमरे खाली पड़े हैं, वहीं आ कर जैसे यहां रह रहे हो उसी तरह से रहने लगो,’’ सविता ने समझाया.

‘‘पर मां, यहां इतना सामान जुटा लिया है, इसे कहां ले जाएंगे.’’ दिव्या ने अपनी असमर्थता जताई.
‘‘जैसे यहां सेट किया है, अपना घर समझ कर वहां भी इसी तरह सेट कर देना. घर को अच्छी तरह रखना किसे बुर लगता है. मैं ने तुम्हें सुझाव दे दिया है, मानना न मानना तुम्हारे ऊपर निर्भर करता है,’’ सविता ने दिव्या पर ही निर्णय लेना छोड़ दिया. फिर समझाते हुए कहा, ‘‘साथ रहने में जो आपस में स्नेह पनपता है, बड़ों में भी और छोटों में भी वह अलग रहने में नहीं.’’

सविता व सुधा विकास व दिव्या को काफी दिलासा दे गई. इस बीच सविता ने अपने कुछ जेवर और सुधा न कुछ नई साडिय़ां खरीद कर दिव्या के लिए भिजवा दीं.

दिव्या अपनी पिछली कही बातों से जो उस ने अलग होते समय कही थी, बहुत लज्जित थी. उन लोगों को काफी सबक मिल चुका था. सब से ज्यादा तो मकान का किराया देना खलता था जबकि सविता के घर में रहती थी तब तो हाउस एलाउंस जो कंपनी से मिलता था, एक तरह से अतिरिक्त आमदनी ही थी, जो बचता था. महीने का अंत होते-होते विकास व दिव्या मां के पास ही वापस आ गए कभी अलग न होने के लिए. Family Story In Hindi.

लेखक- शांति चतुर्वेदी ‘नीरजा’

Hindi Romantic Story: कसक- नीरव ने जूही की जिंदगी में कैसे मचा दी उथलपुथल?

Hindi Romantic Story: जूही का मन अचानक 10 वर्षों बाद नीरव को देख कर अशांत हो उठा था. 10 वर्षों पहले का वाकेआ उस की आंखों के सामने तैरने लगा. ठंड की भरी दोपहरी में हाथपैर सुन्न पड़ते जा रहे थे. वह तो अपनी सहेली के घर एक छोटे से फंक्शन में आई थी पर यों अचानक नीरव यहां टकरा जाएगा, उस ने कभी सोचा भी न था.

जूही न चाहते हुए भी नीरव के विषय में सोचने को मजबूर हो गईर् थी. ‘क्यों मुझे बिना कुछ कहे छोड़ गया था वह? क्यों मुझे एहसास कराया उस ने अपने प्यार का? क्यों कहा था कि मैं हमेशा साथ दूंगा? आखिर क्या कमी थी मुझ में? ‘कितने झूठे हो न तुम… डरपोक कहीं के.’ आज भी इस बात को सोच जूही के चेहरे पर दर्द की गहरी रेखा उभर गई थी, पर दूसरे ही क्षण गुस्से के भाव से पूरा चेहरा लाल हो गया था. फिर वही सवाल जेहन में आने लगे कि वह मुझे क्यों छोड़ गया था? आज क्यों फिर मुझ से मिलने आ गया? यों सामने आए सौरव को देखते ही मन में बेचैनी और सवालों की झड़ी लग गई थी.

जूही ने दोबारा उस कागज के टुकड़े को खोला और पढ़ा. नीरव ने केवल 2 लाइनें लिखी थीं, ‘प्लीज, एक बार बात करना चाहता हूं. यह मेरा मोबाइल नंबर है… हो सके तो अपना नंबर एसएमएस कर दो.’

यही पढ़ कर जूही बेचैन थी और सोच रही थी कि अपना मोबाइल नंबर दे या नहीं. क्या इतने वर्षों बाद कौल करना ठीक रहेगा? इन 10 वर्षों में क्यों कभी उस ने मुझ से मिलने या बात करने की कोशिश नहीं की? कभी मेरा हालचाल भी नहीं पूछा. मैं मर गई हूं या जिंदा हूं, किस हाल में हूं.  कभी कुछ भी तो जानने की कोशिश नहीं की उस ने. फिर क्यों वापस आया है? सवाल कई थे पर जवाब एक का भी नहीं था.

जाने क्या सोच मैं ने अपना नंबर लिख भेजा. 10 वर्षों पहले सहेली के घर गई थी, वहीं मुलाकात हुई थी. सहेली का रोका था. सब लोगों के बीच जो छिपछिप कर वह मुझे देख रहा था, शायद पहली नजर में ही वह मुझे भा गया था पर… न ही उस ने कुछ कहा न मैं ने. पूरे फंक्शन में वह मेरे आगेपीछे घूमता रहा. लेकिन जब चलने का समय हुआ तो अचानक चला गया था. न तो उस ने मुझे बाय बोला न ही कुछ… मन ही मन मैं ने उस को खूब गालियां दीं.

उस मुलाकात के बाद तो मिलने की उम्मीद भी नहीं थी. न उस ने जूही का नंबर लिया न ही जूही ने उस का. ऐसी तो पहली मुलाकात थी जूही और नीरव की. कितनी अजीब सी… जूही सोचसोच कर मुसकरा रही थी.  नीरव से हुई मुलाकात ने जूही के पुराने मीठे और दर्द भरे पलों को हरा कर दिया था.

एक दिन सहेलियों के साथ पैसिफिक मौल में मस्ती करते हुए नीरव से मुलाकात हो गई. वह मुझे बेबाकी से मिला. बात ही बात में उस ने मेरा नंबर और पता ले लिया.

अगले दिन शाम को घर पर बेतकल्लुफी के साथ वह हाजिर भी हो गया था. सारे घर वालों को उस ने सैल्फ इंट्रोडक्शन दिया और ऐसे घुलमिल गया जैसे सालों से हम सब से जानपहचान हो. जूही यह सब देख हैरान भी थी और कहीं न कहीं उसे एक अजीब सी फीलिंग भी हो रही थी. बहुत मिलनसार स्वभाव था उस का. मां, पापा और जूही की छोटी बहन तो उस की तारीफ करते नहीं थक रहे थे. वास्तव में उस का स्वभाव, हावभाव सबकुछ कितना अलग और प्रभावपूर्ण था. जूही उस के साथ बहती चली जा रही थी.

वह फैशन डिजाइनर बनना चाहता था. निट के फाइनल ईयर में था. उस से मेरी अच्छी दोस्ती हो गईर् थी. रोज आनाजाना होने लगा था. जूही के परिवार के सभी लोग उसे पसंद करते थे. धीरेधीरे उस ने जूही के दिल में भी खास जगह बना ली थी. जूही जब उस के साथ होती तो उसे लगता ये पल यहीं थम जाएं. उस के साथ बिताए पलों की याद में वह खोई सी रहती थी. जूही को यह एहसास हो गया था कि नीरव के दिल में भी जूही के लिए खास फीलिंग्स हैं. अब तक उस ने जूही से अपनी फीलिंग्स बताई नहीं थीं.

नीरव और जूही का कालेज एक ही रास्ते पर पड़ता था. इसलिए नीरव अकसर जूही को घर छोड़ने आया करता था. और तो और, जूही को भी उस के साथ आना अच्छा लगता था. रास्तेभर वे बातें करते व उस की बातों पर जूही का हंसना कभी खत्म ही नहीं होता था. वह अकसर कहा करता था, ‘जूही की मुसकराहट उसे दीवाना बना देती है.’ इस बात पर जूही और खिलखिला कर हंस पड़ती थी.

आज भी जूही को याद है, नीरव ने उसे 2 महीने बाद उस के 22वें बर्थडे पर प्रपोज किया था. औसतन लोग अपनी चाहत को, गुलदस्ते या उपहार के साथ दर्शाते हैं, पर उस ने जूही के हाथों में एक छोटा सा कार्ड रखते हुए कहा था, ‘क्या तुम अपनी जिंदगी का सफर मेरे साथ करना चाहोगी?’ कितनी दीवानगी थी उस की बातों में.

जूही उसे समझने में असमर्थ थी. यह कहतेकहते नीरव उस के बिलकुल नजदीक आ गया और जूही का चेहरा अपने हाथों में थामते हुए उस के होंठों को अपने होंठों से छूते दोनों की सांसें एक हो चली थीं. जूही का दिल जोरों से धड़क रहा था. खुद को संभालते हुए वह नीरव से अलग हुई. दोनों के बीच एक अजीब मीठी सी मुसकराहट ने अपनी जगह बना ली थी. कुछ देर तो जूही वहीं बुत की तरह खड़ी रही थी. जब उस ने जूही का उत्तर जानने की उत्सुकता जताई तो जूही ने फौरन हां कह दी थी. उस रात जूही एक पल भी नहीं सोई थी. वह कई विषयों पर सोच रही थी जैसे कैरियर, आगे की पढ़ाई और न जाने कितने खयाल उस के दिमाग में आते. नींद आती भी कैसे, मन में बवंडर जो मचा था. तब जूही मात्र 22 वर्ष की ही तो थी फाइनल ईयर में थी. नीरव भी केवल 25 वर्ष का था. उस ने अभी नौकरी के लिए अप्लाई किया था.

इतनी जल्दी शायद नीरव भी शादी नहीं करना चाहता था. वह मास्टर्स करना चाहता था. पर जूही उसे यह बताना चाहती थी कि वह उस से बेइंतहा मुहब्बत करती है और हां, जिंदगी का पूरा सफर उस के साथ ही बिताना चाहती है, इसलिए उस ने नीरव को कौल किया. तय हुआ कि अगले दिन जीआईपी मौल में मिलेंगे. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. यह बात जूही के मन में ही रह गई थी, कभी उस से बोल नहीं पाई.

जैसा कि दोनों ने तय किया था अगले दिन जूही तय समय पर वहां पहुंच गई. वहां पहुंच कर नीरव का फोन मिलाया तो फोन स्विचऔफ आ रहा था. वह वहीं उस का इंतजार करने बैठ गई थी. आधे घंटे बाद फिर फोन मिलाया. तब भी फोन औफ ही आ रहा था.

जूही काफी परेशान और विचलित थी पर उस ने सोचा, शायद कोईर् जरूरी काम में फंसा होगा. वह उस का इंतजार करती रही. इंतजार करतेकरते काफी देर हो गई पर वह नहीं आया. उस के बाद उस का फोन भी कभी औन नहीं मिला. 2 वर्षों तक जूही उस का इंतजार करती रही पर कभी उस ने उसे एक भी कौल नहीं किया.

इन 2 सालों में उस ने मम्मीपापा से अपने दिल की बात बताई तो उन्होंने भी नीरव को मैसेज किया. पर कब तक वे इंतजार करते. आखिर, थक कर उन्होंने जय से जूही की शादी करवा दी. जूही भी कुछ नहीं कह पाई. जय एक औडिटिंग कंपनी चलाता था. उस के मातापिता उस के साथ ही रहते थे. जूही विवाह के बाद सबकुछ भूलना चाहती थी और नए माहौल, नए परिवार में ढलना चाहती थी. पर शायद सोचा हुआ काम कभी पूरा नहीं होता.

शादी के बाद कितने साल लगे थे जूही को उसे भूलने में पर ठीक से भूल भी तो नहीं पाई थी. कहीं न कहीं किसी मोड़ पर तो हमेशा उसे नीरव की याद आ ही जाया करती थी. आज अचानक क्यों आया है? और क्या चाहता है?

जूही की सोच की कड़ी को तोड़ते हुए तभी अचानक फोन की घंटी बजी, एक अनजाना नंबर था. दिल की धड़कनें तेज हो चली थीं. जूही को लग रहा था, ‘हो न हो, यह नीरव की कौल हो.’ वह एक आवेग सा महसूस कर रही थी. कौल रिसीव करते हुए उस ने ‘‘हैलो,’’ कहा तो दूसरी ओर नीरव ही था.

नीरव ने अपनी भारी आवाज में कहा, ‘‘हैलो, आप…’’ इतने सालों बाद भी नीरव की आवाज जूही के कानों से होते हुए पूरे शरीर को झंकृत  कर रही थी.

खुद को संभालते हुए जूही ने कहा, ‘‘जी, मैं जूही. आप कौन?’’ उस ने पहचानने का नाटक करते हुए कहा. नीरव ने अपने अंदाज में कहा, ‘‘तुम तो मुझे भूल ही गईं, मैं नीरव.’’

‘‘ओह, नहीं, ऐसा नहीं है. ऐसे कैसे हो सकता है?’’ फिर जूही ने घबराहट भरी आवाज में कहा, ‘‘तुम भूले या मैं?’’

जूही के दिमाग में काफी हलचल थी, इस का अंदाजा लगाना भी मुश्किल था. यह नीरव के लिए उस का प्यार था या नफरत. मिलने का उत्साह था या असमंजसता थी. एक मिलाजुला मिश्रण था भावों का, जिस की तीव्रता सिर्फ जूही ही महसूस कर सकती थी.

कभीकभी यह समझना कितना मुश्किल हो जाता है न कि आखिर किसी के होने का हमारे जीवन में इतना असर क्यों हो जाता है. जूही भी एक असमंजसता से गुजर रही थी. खुद को रोकना चाहती थी पर धड़कन थी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी. नीरव ने आगे कहना शुरू किया, ‘‘इतने सालों बाद तुम्हें देखा, बहुत अच्छा लगा, कल तुम बहुत खूबसूरत लग रही थीं.’’

जूही अब भी एक गहरी सोच में डूबी हुई थी और एक हलकी मुसकान के साथ उस ने कहा, ‘‘थैंक्स, मैं भी तुम से मिल कर खुश हुई. इनफैक्ट, सरप्राइज्ड भी हुई.’’

नीरव भांप गया था, जूही के कहने का क्या तात्पर्य था. उस ने कहा, ‘‘क्या तुम ने अब तक मुझे माफ नहीं किया. मैं जानता हूं कि तुम से वादा कर मैं आ न सका.’’

जूही ने कहा, ‘‘10 साल कोई कम तो नहीं होते. माफ कर दूं? मैं आज तक अपने को ही माफ नहीं कर पाई.’’

उस की बात से व्यंग्य साफ झलक रहा था. ‘‘कैसे करूं तुम्हें माफ, क्या तुम लौटा सकते हो बीता वक्त? मैं ने ही नहीं, मेरे मातापिता दोनों ने भी तुम्हारे जवाब का, तुम्हारा बहुत इंतजार किया. क्या दोष था, उन का? यही न कि उन्होंने तुम्हारे साथ मेरे सुखी जीवन की चाह की, मेरे सपनों को सच करना चाहा. और तुम ने क्या किया? मैं जानना चाहती हूं, क्या हुआ था तुम्हारे साथ? क्यों नहीं आए तुम.’’

जूही की आवाज से नाराजगी साफ झलक रही थी. अपने को संभालते हुए नीरव ने कहा, ‘‘मैं तुम से प्यार करता था, करता हूं और करता रहूंगा. तुम से तो इजहार कर दिया था पर दुनिया के सामने अपना प्यार कुबूल करने की हिम्मत नहीं कर पाया.

‘‘अगले दिन तुम से मिलने आने से पहले सोचा, क्यों न दिल की बात अपने घर वालों को भी बता दूं. मां तो सुनते ही नाराज हो गईं और बाकी सब ने चुप्पी साध ली. मां कुछ सुनने को तैयार ही नहीं थीं. अपनी कसम दे कर उन्होंने मुझे आने से रोक दिया. अगले दिन ही मुझे पढ़ने के लिए बाहर भेज दिया गया. मुझ में इतनी हिम्मत नहीं थी कि परिवार से अलग हो जाऊं और न ही तुम्हारे सवालों का सामना करने की हिम्मत मुझ में थी. बाद में पता चला कि मेरी मां बहुत पहले ही मेरा रिश्ता तय कर चुकी थीं.

उन्होंने मेरे सुनहरे भविष्य के लिए बहुत से सपने बुन रखे थे और ये सारी चीजें आपस में इतनी उलझी हुई थीं कि उन्हें सुलझाने का वक्त ही नहीं मिला. और तो और, मां इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं होंगी, मैं जानता था. उन्होंने अपनी कसम दे कर मेरे पैर रोक दिए थे. उन्हें उस वक्त मैं कह ही नहीं पाया कि मैं अपनी जिंदगी वहीं छोड़ आया हूं. उस वक्त मैं ने चुप रहना ही ठीक समझा था या यह कह लो, मैं डर गया था.

‘‘जब तक हिम्मत आई, पता चला तुम्हारा रिश्ता हो चुका है. तुम्हारा मोबाइल औफ होने की वजह से तुम तक खबर पहुंचाना भी मुश्किल था. तुम नए बंधन अपना चुकी थीं. मैं जानता हूं तुम अपनी जिंदगी से खुश नहीं हो. इस बंधन में खुश नहीं हो, शायद इस का कारण मैं हूं.’’

‘‘हां, इन सब बातों के कोई माने नहीं अब, नीरव. किस जिंदगी की बात कर रहे हो, वह जिसे तुम जानते थे. वह तो तभी खत्म हो गई थी जब तुम बीच में ही छोड़ कर चले गए थे. और अब यह जिंदगी कर्जदार है उन 2 मासूमों की, जिन्हें मैं ने जन्म दिया है,’’ रोते हुए जूही ने कहा.

‘‘क्या हम फिर से आगे नहीं सोच सकते, जूही’’? नीरव ने पूछा.

‘‘फिर… यह कैसा सवाल है? अब 2 प्यारीप्यारी जिंदगियां भी जुड़ी हुई हैं मुझ से. मैं एक बार अपनेआप को धोखा दे चुकी हूं, लेकिन अब सब को धोखा देना होगा और सारी बातें छोड़ो, क्या अब है तुम में हिम्मत, सब का सामना करने की? अरे, जो तब नहीं कर पाया वह आज कहां से हिम्मत करेगा? मुझे नहीं मालूम था कि तुम इतने डरपोक हो. मैं लड़की हो कर भी हिम्मत कर पाई उस समय, और तुम… बहुत इंतजार किया तुम्हारा और तुम्हारे जवाब का.’’

नीरव की आवाज भारी हो गई थी और अपने को संभालते हुए वह बोला, ‘‘क्या तुम अपनी इस जिंदगी से खुश हो?’’

‘‘यही सवाल मैं करूं तो,’’ जूही ने कहा.

‘‘शायद नहीं, बस, जी रहा हूं. एक बीवी है, बेटी है. अच्छी है. बस, वह मेरा प्यार नहीं है. दिल में एक खालीपन है. पर उस खालीपन को भरा नहीं जा सकता, यही हकीकत है,’’ नीरव बोला.

‘‘नीरव, कितनी अजीब सी बात है न, जो हम चाहते हैं वह मिलता नहीं और जो मिलता है उसे हम चाहते नहीं,’’ कहते हुए जूही सुबकने लगी थी. कोशिश तो बहुत की थी कि रोक ले इन आंसुओं के सैलाब को, पर… इतने सालों से वही तो कर रही है. दुनिया में 2 तरह के लोग होते हैं, एक वे जो प्यार के लिए सबकुछ छोड़ दें, और दूसरे वे जो सब के लिए प्यार को छोड़ दें. तुम दूसरी तरह के लोगों में आते हो. तुम ने भी तो सुनहरे सपने और कैरियर को ही चुना था, क्यों?’’ जूही ने आगे कहा.

‘‘तुम सही कह रही हो. पर एक सच यह भी है कि आप की जेब में रुपए न हों और आप का बच्चा या परिवार का सदस्य दर्द से तड़प रहा हो, तब प्यार तो नहीं परोस सकते, लेकिन तुम्हें कभी भुला नहीं पाया.’’

फिर जिंदगी की आपाधापी में उलझता ही चला गया. पर तुम हमेशा याद आती रहीं. हमेशा सोचता था कि तुम क्या सोचती होगी मेरे बारे में, इसलिए तुम से मिल कर तुम्हें सब बताना चाहता था. काश, मैं इतनी हिम्मत पहले दिखा पाता. उस दिन जब हम मिलने वाले थे तब तुम मुझ से कुछ कहना चाहती थी न, आज बोल दो, क्या बताना था.

जूही को भी तो यह सब जानना था. वह तय नहीं कर पा रही थी कि नीरव को धोखेबाज कहे या इसे उस की मजबूरी माने. जूही ने कहा, ‘‘वह जो मैं तुम से कहना चाहती थी उन बातों का अब कोई वजूद नहीं.’’

जूही ने अपने जज्बातों को अपने अंदर ही दफनाने का फैसला किया था. एक फीकी सी मुसकराहट के साथ जूही ने कहा, ‘‘तुम से बात कर के अच्छा लगा.’’ अब शायद आंसुओं का सैलाब और हिचकियों का तूफान उसे बात नहीं करने दे रहा था. अंत में सिर्फ अच्छा कह कर उस ने बातों के सिलसिले पर पूर्णविराम लगाना चाहा. शायद सवाल तो बहुत से थे जेहन में पर उन सवालों का अब कोई औचित्य नहीं था.

नीरव ने हड़बड़ाते हुए कहा, ‘‘सुनो, एक वादा करो कि तुम हमेशा खुश रहोगी. करो वादा.’’

‘‘वादा तो नहीं पर कोशिश करूंगी,’’ जूही रोए जा रही थी और उसी पल कौल डिस्कनैक्ट हो गई. Hindi Romantic Story.

Family Story in Hindi: व्यवस्था- हम सब किस तरह से थे अव्यवस्था के भागीदार?

Family Story in Hindi: एक रात को मैं अपनी सहकर्मी साक्षी के घर भोजन पर आमंत्रित थी. पति-पत्नी दोनों ने बहुत आग्रह किया था. तभी हम ने हां कर दी थी. साक्षी के घर पहुंची. उन का बड़ा सा ड्राइंगरूम रोशनी में नहाया हुआ था. साक्षी ने सोफे पर बैठे अपने पति के मित्र आनंद जी से हमारा परिचय कराया.  साक्षी के पति सुमित भी आ गए. हम लोग सोफे पर बैठ गए थे. कुछ देर सिर्फ गपें मारीं. साक्षी के पति ने इतने बढि़या और मजेदार जोक सुनाए कि हम लोग टैलीविजन पर आने वाले घिसे-पिटे जोक्स भूल गए थे. तय हुआ कि महीने में एक बार किसी न किसी के घर पर बैठक किया करेंगे.

हंसी का दौर थमा. भूख बहुत जोर से लग रही थी. रूम के एक हिस्से में ही डाइनिंग टेबल थी. टेबल खाना खाने से पहले ही तैयार थी और हौटकेस में खाना, टेबल पर लगा हुआ था. प्लेट्स सजी थीं. जैसे ही हम खाने के लिए उठने लगे, लाइट चली गई. एक चुटकुले के सहारे 5-10 मिनटों तक इंतजार किया. पर लाइट नहीं आई. आनंद ने पूछा, ‘‘अरे यार, तुम्हारे पास तो इनवर्टर था?’’

उन की जगह साक्षी ने जवाब दिया, ‘‘हां भाईसाहब है, पर खराब है. कब से कह रही हूं कि मरम्मत करने वाले के यहां दे दें. पर ये तो आजकलआजकल करते रहते हैं.’’

सुमित ने कहा, ‘‘बस भी करो. जाओ, माचिस तलाश करो. फिर मोमबत्ती ढूंढ़ो. कैंडललाइट डिनर ही सही.’’

साक्षी उठ कर किचन की तरफ गई. इधरउधर माचिस तलाशती रही, पर माचिस नहीं मिली. वहीं से चिल्लाई, ‘‘अरे भई, न तो माचिस मिल रही है, न ही गैसलाइटर जो गैस जला कर थोड़ी रोशनी कर लूं. अब क्या करूं?’’

‘‘करोगी क्या? यहां आ जाओ, मिल कर निकम्मी सरकार को ही कोस लें. इस का कौन काम सही है?’’ सुमित ने कहा. अपनी बात आगे बढ़ाते हुए वे बोले, ‘‘बिजली का कोई भरोसा नहीं है कि कब आएगी, कब जाएगी. 4 घंटे का घोषित कट है, पर रहता है 8 घंटे. और बीचबीच में आंखमिचौली.

कभी अगर ट्रांसफौर्मर खराब हो जाए, तो समझ लो 2-3 दिनों तक बिजली गायब.’’

तभी आनंद ने कहा, ‘‘अरे भाईसाहब, रुकिए. मेरे पास माचिस है. यह मुझे ध्यान ही नहीं रहा. यह लीजिए.’’

उन्होंने एक तीली जला कर रोशनी की. सुमित तीली और माचिस लिए हुए चिल्लाए, ‘‘जल्दी मोमबत्ती ढूंढ़ कर लाओ.’’

‘‘मोमबत्ती…यहीं तो साइड में रखी हुई थी,’’ साक्षी ने कहा. दोनों पतिपत्नी मेज के पास पहुंच कर दियासलाई जलाजला कर मोमबत्तियां ढूंढ़ते रहे. पर वह नहीं मिली. कई जगहों पर देखी, लेकिन बेकार. इतने में ही उन्हें एक मोमबत्ती ड्रैसिंग टेबल की दराज में मिल गई. वहीं से वह चिल्लाई, ‘‘मिल गई.’’

जब काफी देर तक मोमबत्ती नहीं जली तो आनंद ने पूछा, ‘‘क्या हुआ, मोमबत्ती क्यों नहीं जलाते? क्या अंधेरे में रोमांस चल रहा है?’’

तब तक सुमित ड्राइंगरूम में आ चुके थे, बोले, ‘‘लानत है यार ऐसी जिंदगी पर. जब मोमबत्ती मिली, तो माचिस की तीलियां ही खत्म हो गईं.’’

आनंद कुछ कहते, उस से पहले ही बिजली आ गई.

सुमित ने मोमबत्ती एक कोने में फेंक दी और बोले, ‘‘खैर, बत्ती आने से सब काम ठीक हो गया.’’

मौके की नजाकत पर आनंद ने एक जोक और मारा तो सब खिलखिला उठे. प्रसन्नचित्त सब ने भोजन किया. थोड़ी देर में साक्षी फ्रिज में से 4 बाउल्स निकाल कर लाई. सभी लोग खीर खाने लगे.

तो मैं ने कहा, ‘‘अरे भाईसाहब, मीठी खीर के साथ एक बात कहूं, आप बुरा तो नहीं मानेंगे?’’

सुमित ने खीर मुंह में भरे हुए ही कहा, ‘‘नहीं. आप तो बस कहिए, क्या चाहती हैं?’’

मैं ने कहा, ‘‘अभी आप सरकार को उस की बदइंतजामी के लिए कोस रहे थे. मैं सरकार की पक्षधर नहीं हूं, फिर भी क्षमाप्रार्थना के साथ कहती हूं कि जब आप के इस छोटे से परिवार में इतनी अव्यवस्था है, आप को पता नहीं कि माचिस कहां रखी है? मोमबत्ती कहां पर है? तो इतने बड़े प्रदेश का भार उठाने वाली सरकार को क्यों कोसते हैं?

‘‘जिले के ट्रांसफौर्मर के शीघ्र न ठीक होने की शिकायत तो आप करते हैं पर घर पर रखे इनवर्टर की आप समय से मरम्मत नहीं करवाते. कभी सोचा है कि ट्रांसफौर्मर के फुंक जाने के कई कारणों में से एक प्रमुख कारण उस पर अधिक लोड होना है. आप के इस रूम में जरूरत से ज्यादा बल्ब लगे हैं. अच्छा हो पहले हम अपने घर की व्यवस्था ठीक कर लें, फिर किसी और को उस की अव्यवस्था के लिए कोसें. मेरी बात बुरी लगे, तो माफ कर दीजिएगा.’’

आनंद ने ताली बजाते हुए कहा, ‘‘दोस्तो, हास्य के बीच, आज का यह सब से गहरा व्यंग्य. चलो, अब मीटिंग बरखास्त होती है.’’ Family Story in Hindi.

ICC Women’s World Cup 2025: क्रिकेट- भारतीय महिला खिलाड़ियों ने जीता वर्ल्ड कप

ICC Women’s World Cup 2025: इस जीत ने न सिर्फ इतिहास रचा है, बल्कि उन सभी लड़कियों को नई दिशा दी है जो तमाम मुश्किलों के बावजूद खेल के मैदान में अपना कैरियर बनाने का सपना देखती हैं. मेहनत, समर्पण और पसीने से उन्होंने साबित कर दिया कि अगर हौसले बुलंद हों तो कोई मंजिल दूर नहीं. यह जीत हर उस भारतीय बेटी के नाम है जो अपने सपनों को उड़ान देना चाहती है.

शुरुआत एक ऐसे शख्स से करते हैं, जिस का नाम है अमोल मजूमदार. क्रिकेट को समर्पित ऐसा इनसान, जो एक समय मुंबई रणजी की जान हुआ करता था. उन्होंने फर्स्ट क्लास क्रिकेट में 11,000 से ज्यादा रन बनाए हैं, जिन में 30 सैंचुरी भी शामिल हैं.

अक्तूबर, 2023 में जब अमोल मजूमदार को भारतीय महिला टीम का हैड कोच बनाया गया था, तब टीम बदलाव के दौर से गुजर रही थी. नए हैड कोच को नई मजबूत टीम बनानी थी. ठीक वैसे ही जैसे हिंदी फिल्म ‘चक दे इंडिया’ में कबीर खान (शाहरुख खान) ने अपनी हौकी टीम को बनाया और चमकाया था.

अमोल मजूमदार की मेहनत से आई इसी चमक का नतीजा आज यह है कि 2 नवंबर, 2025 को नवी मुंबई के डीवाई पाटिल स्टेडियम में भारत ने फाइनल मुकाबले में दक्षिण अफ्रीका को हरा कर खिताब अपने नाम किया.

बारिश के खलल से मैच थोड़ा देरी से शुरू हुआ था, पर जब भारतीय महिला टीम बल्लेबाजी करने मैदान पर उतरी, तो उस के बाद वह नया इतिहास बना कर ही खुशी के मारे नाचतीकूदती ड्रैसिंग रूम में लौटी.

टीम इंडिया ने महिला वनडे वर्ल्ड कप 2025 के फाइनल मुकाबले में दक्षिण अफ्रीका को 52 रन से हरा दिया. पहले बल्लेबाजी करते हुए भारत ने 50 ओवर में 7 विकेट पर 298 रन बनाए थे, जिस के जवाब में दक्षिण अफ्रीका की टीम 246 रन पर सिमट गई.

यह भारत का पहला महिला वनडे वर्ल्ड कप का खिताब है. याद रहे कि पहला महिला वनडे वर्ल्ड कप साल 1973 में खेला गया था.

फाइनल मुकाबले में भारत की ओर से दीप्ति शर्मा के अलावा शेफाली वर्मा ने भी कमाल का खेल दिखाया. शेफाली ने बल्लेबाजी में 87 रन बनाने के अलावा 2 विकेट भी झटके. वे ‘प्लेयर औफ द मैच’ रहीं. दीप्ति शर्मा ने 5 विकेट अपने नाम किए. वे ‘प्लेयर औफ द सीरीज’ बनीं और फाइनल मुकाबले में उन्होंने 58 रन भी बनाए.

यह वर्ल्ड कप जीतने के बाद भारतीय महिला क्रिकेट टीम पर पैसों की बरसात हुई है. लोगों से मिली शाबाशी के बाद वे हर लिहाज से मजबूत दिख रही हैं और कप्तान हरमनप्रीत कौर की अगुआई में एकजुट भी लग रही हैं. पर सब से बड़ी बात यह है कि भारत में महिला क्रिकेट खिलाड़ियों को अब दर्शक मिल रहे हैं. फाइनल मुकाबले में स्टेडियम भरा हुआ था और टैलीविजन पर भी करोड़ों लोगों ने इसे देखने का लुत्फ उठाया.

अगर कहें कि इस मैच के शुरू होने से पहले भारत की पुरुष क्रिकेट टीम ने आस्ट्रेलिया में हुए तीसरे टी20 मैच को जीतने के रंग को फीका कर दिया, तो कोई बड़ी बात नहीं होगी. वहां हो रही हिंदी कमैंट्री में महिला क्रिकेट वर्ल्ड कप के फाइनल मुकाबले की चर्चा ज्यादा हो रही थी.

होती भी क्यों न, यह जीत ही इतनी शानदार रही कि इस ने भारतीय महिला क्रिकेट टीम के सपने को पूरा कर दिया है. साथ ही, इस जीत ने हर उस लड़की को नई दिशा दी है, जो तमाम तरह की मुसीबतें झेलते हुए खेल के मैदान पर अपना कैरियर तलाशती है. अपनी कड़ी मेहनत और मैदान पर बहाए गए पसीने से देश का नाम दुनिया में रोशन करने का सपना देखती है. यह जीत हर भारतीय बेटी के नाम है. ICC Women’s World Cup 2025.

Romantic Story in Hindi: बदबू- कमली ने किसना को किस हालत में देखा?

Romantic Story in Hindi: ‘‘इतनी रात गए कहां से आ रहा है  हम सब परेशान हो रहे थे कि शाम से तू किधर है…’’ बापू की यह पूछताछ किसना को अखर गई.

‘‘तुम से चुपचाप सोया भी नहीं जाता है  अरे, जरा मुझे भी सुकून से अपने हिसाब से जीने दो,’’ किसना की तल्खी देख बापू समझ गए कि उन का बेटा जरूर कोई तीर मार कर आया है.

‘चलो, इस निखट्टू ने आज कुछ तो किया,’ यह सोचते हुए बापू नींद के आगोश में गुम हो गए.

कमरे में कमली अधनींदी सी लेटी हुई थी. आहट सुन कर वह उठ बैठी. देखा कि किसना ने कुछ नोट निकाले और उन्हें अलमारी में रखने लगा.

कमली की आंखें खुशी से चमक उठीं. उसे लगा कि 2 महीने ईंटभट्ठे पर काम करने की तनख्वाह आखिरकार किसना को मिल ही गई. कमली को पलभर में जरूरतों की झिलमिल करती लंबी फेहरिस्त पूरी होती दिखने लगी.

‘‘लगता है कि रज्जाक मियां ने आखिरकार तुम्हारी पूरी तनख्वाह दे ही दी. मैं तो सोच रही थी कि हर बार की तरह इस बार भी आजकल कर के 6 महीने में आधी ही तनख्वाह देगा,’’ कमली ने चहकते हुए पूछा.

‘‘अरे, वह क्यों देने लगा  इतना ही सीधा होता, तो हमारा खून क्यों पीता ’’ किसना ने खाट पर पसरते हुए कहा.

कमली ने देखा कि किसना पसीने से भीगा हांफ रहा था.

‘बेचारा दिनभर मजदूरी और काम की तलाश में भटकतादौड़ता रहता है,’ कमली ने सोचा.

कोई और दिन होता, तो कमली भी किसना को काट खाने ही दौड़ती कि कुछ कमा कर लाओ नहीं तो घर कैसे चलेगा, पर आज तो अलमारी में रखे नोट उस के दिल में हलचल मचा रहे थे.

कमली गुनगुनाती हुई एक लोटा पानी ले आई.

‘‘लो, पानी पी लो. लग रहा है कि तुम बहुत थक गए हो…

‘‘क्या हुआ… तुम्हारी छाती धौंकनी सी क्यों चल रही है

‘‘अरे, रज्जाक भाई ने पैसा नहीं दिया, तो फिर किस ने दिया पैसा ’’ कमली ने लाड़ जताते हुए पूछा.

‘‘जब से आया हूं, पहले बापू ने, फिर तुम ने मेरा दिमाग चाट कर रख दिया है. क्या कुछ देर शांति नहीं मिल सकती मुझे ’’ लोटा फेंकते हुए किसना ने कहा और करवट ले कर सोने की कोशिश करने लगा.

कमली ने चुपचाप किसना को एक चादर ओढ़ा दी और बगल में लेट गई.

किसना बेचैन सा रातभर करवटें बदलते रहा. वह कभी उठ बैठता, तो कभी लेट जाता.

सुबह के 5 बजे कमली उठी और तैयार हो कर उस ने ग्रेटर नोएडा की बस पकड़ी, जहां वह कुछ घरों में झाड़ूपोंछा और बरतन धोने का काम करती थी.

बिजली की फुरती से काम निबटाती कमली 5वें घर में जा पहुंची. वहां वह चाय नाश्ता बनाती थी. साहब और बीबीजी को दे कर वह खुद भी खाती थी.

कमली के वे साहब और बीबीजी नौकरी से रिटायर हो चुके थे. सो, वहां सुबह की हड़बड़ी नहीं रहती थी. वे दोनों देर तक सोने के आदी थे. आज भी सवा 10 बज गए थे. डोरबैल की आवाज से ही बीबीजी जागी थीं.

‘‘आओ कमली… पहले चाय बना ले… मैं तुम्हारे साहब को जगाती हूं…’’ कह कर बीबीजी बाथरूम में हाथमुंह धोने चली गईं.

जब तक चाय उबली, फुरतीली कमली ने सब्जीभाजी काट ली और कुकर में छौंक दी.

इस के बाद कमली ने साहबजी और बीबीजी को चाय थमा दी और खुद भी वहीं फर्श पर बैठ कर चाय पीने लगी. लगातार 4-5 घंटे काम करने के बाद वह हर दिन यहीं पलभर के लिए आराम करती थी.

साहबजी ने टैलीविजन चला दिया था. बारबार ‘दादरीदादरी’ सुन कर कमली के कान खड़े हुए, चाय हाथ से छलकतेछलकते बची.

जब दादरी के बिसाहड़ा गांव का नाम भी सुना, तो बीबीजी ने पूछा, ‘‘कमली, तुम भी तो काम करने दादरी से ही आती हो न  क्या तुम इन को जानती हो  रात एक भीड़ ने इन की हत्या कर दी…’’ मारे गए आदमी के फोटो को दिखाते हुए बीबीजी ने पूछा.

‘‘हाय… हम तो इन के पीछे वाली बस्ती में ही रहते हैं. इन्हें किस ने मारा ’’ कमली एकदम से चिल्लाई.

अब कमली के हलक से चाय नहीं उतर रही थी. वह गुमसुम सी वहीं खड़ी हो गई.

‘‘बीबीजी, आज मुझे जल्दी जाने दो. मैं ने सब्जी बना दी है… रोटी आप बना लेना…’’ कहते हुए कमली घर लौटने को बेचैन हो उठी.

जैसेतैसे कमली अपनी बस्ती के पास पहुंची, तो देखा कि वहां जमघट लगा हुआ था. टैलीविजन पर रिपोर्ट दिखाने वाले, पुलिस और भी न जाने कौनकौन से लोग दिख रहे थे. आज तक इस जगह कोई नेता नहीं पहुंचा था, वहीं आज पूरी भीड़ लगी हुई थी. Romantic Story in Hindi.

(क्रमश:)

मारा गया शख्स कौन था  पैसे होने के बावजूद किसना का मूड क्यों उखड़ा हुआ था  पढि़ए अगली किस्त में…

 

Hindi Family Story: ताऊजी डीजे लगवा दो- क्या बदली ताऊ की सोच?

Hindi Family Story: ‘ताऊजी डीजे लगवा दो… ताऊ…’ के नारे लगाते हुए युवकों के शोर से ताऊजी की तंद्रा भंग हुई और वे उचक कर बाहर देखने लगे. बाहर का दृश्य अचंभित करने वाला था. ढोलक की ताल पर संग में हाथों में लट्ठ लिए गांव के कई युवक उन के दरवाजे पर खड़े नारे लगा रहे थे और अगुआई कर रहा था उन का अपना भतीजा कपिल, जो होने वाला दूल्हा था. हां भई, अगले महीने उस का विवाह जो था.

पंचों के पंचायती फरमानों ने युवाओं के हितों पर सदा से कुठाराघात किया है. आज समाज भले ही विकसित हो गया हो पर इन के तुगलकी फरमानों में बरसों पुरानी दकियानूसी सोच दिखती है. कभी युवतियों के कपड़ों पर आपत्ति जताएंगे तो कभी जातिधर्म के नाम पर प्रेम करने वालों को हमेशाहमेशा के लिए जुदा करते दिखेंगे.

युवाओं को कभी न भाने वाले इन के तुगलकी फरमानों की फेहरिस्त काफी लंबी है, लेकिन हाल में हरियाणा के 100 गांवों में डीजे पर लगाई गई पाबंदी युवाओं को नागवार गुजरी. इसी के विरोध में युवा नारे लगा रहे थे.

आज शादीविवाह में डीजे का उतना ही महत्त्व है जितना बैंडबाजे, बरात का या फूलमालाओं से सजी नवविवाहित जोड़े की गाड़ी का, जयमाला या फिर लजीज खाने का, भले ही विवाह में खाने में सौ व्यंजन परोस दें, तरहतरह के स्नैक्स से ले कर चाइनीजमुगलई खाने और अंत में जातेजाते तरहतरह के हाजमिक पान का स्वाद चखने के बावजूद  युवकयुवतियों का विवाह का सारा मजा तब तक अधूरा रहता है जब तक कि उन्हें डीजे पर थिरकने का मौका न मिले.

किसी पार्टी, फंक्शन, बर्थडे, शादीविवाह की शान डीजे भले ही समारोह में एक कोने की शोभा बढ़ाता हो, लेकिन पार्टी में शिरकत करते युवकयुवतियों के लिए समारोह का मुख्य आकर्षण यही कोना रहता है. डीजे की आवाज जितनी अधिक कानफोड़ू होगी मस्ती उतनी ही अधिक होती है और उतने ही अधिक मदहोश हो कर युवकयुवतियां थिरकते हैं.

डीजे पर एक भी गाना पूरा नहीं बजाया जाता बल्कि रीमिक्स कर कई गानों की खासकर पहली लाइन ही बजाई जाती है, जिस से हर किसी का पसंदीदा गाना एकाध मिनट के अंतराल में बज ही उठता है जिस से मनोरंजन का मजा दोगुना हो जाता है. यह गाने अधिकतर लेटैस्ट और प्रचलित होते हैं.

डीजे सिर्फ युवकयुवतियों को ही आनंदित नहीं करता बल्कि अधेड़ और बुजुर्गों में भी नया जोश भर देता है. इस की कानफोड़ू आवाज मदमस्त नाचते बूढ़ों में जवानी का संचार कर देती है वहीं जलतीबुझती लाइटों से डीजे पर थिरकने का मजा दोगुना हो जाता है और युवकयुवतियों संग उम्रदराज भी मदहोश हो कर अपने पसंदीदा गानों पर थिरक उठते हैं.

किसी यारदोस्त की शादी हो और नाचगाने का समां न बंधे, डीजे पर थिरकने को न मिले, तो मन में यही मलाल रहता है कि फलां की शादी में रूखासूखा भात खा कर आ गए. डीजे नहीं होने से न नाचगाना हुआ, न रौनक रही. दूसरी ओर डीजे पर थिरकते क्षणों की अपने कैमरे या मोबाइल द्वारा बनाई वीडियो क्लिपिंग्स सालोंसाल उस मस्ती को तरोताजा बनाए रखती हैं.

लेकिन हर पार्टीफंक्शन की शान बन चुके डीजे पर पाबंदी की बात बरदाश्त से बाहर थी. युवकयुवतियां सब बरदाश्त कर सकते हैं पर अपनी मौजमस्ती में खलल नहीं, सो वे ‘ताऊजी डीजे लगवा दो…‘ की नारेबाजी के साथ पंचों के फैसले के विरुद्ध खड़े थे.

असमंजस में पड़े ताऊजी ने कारण पूछा तो पता चला कि वे जिस डीजे वाले को कपिल की शादी में डीजे बजाने को मना कर आए हैं वे उसी से खफा हैं.

ताऊजी ने अपनी असमर्थता जताई और बताया कि यह पाबंदी गांव के हित में है, लेकिन युवा नहीं माने. ‘अगर शादीविवाह में डीजे नहीं बजेगा तो क्या मातम पर बजेगा,’ युवाओं ने दलील दी और ‘ताऊजी डीजे…’ का पुरजोर नारा लगाया.

बात न बनती देख ताऊजी ने गांव के पंचों के पास चलने को कहा तो सभी नारे लगाते हुए सरपंच के पास जा धमके. ऐसा पहली बार हुआ था कि गांव के युवा अपने बुजुर्गों के सामने तन कर खड़े थे और डीजे पर पाबंदी हटवाने का हरसंभव प्रयत्न कर रहे थे.

सरपंच सभी को शांत करता हुआ बोला, ‘‘भई, इतने उग्र होने से अच्छा है अपनी बात बताओ?’’

बल्लू ने अपना पक्ष रखा, ‘‘सरपंचजी, अगले महीने कपिल की शादी है और हमें नाचनेगाने की भी आजादी नहीं. आप ही बताइए, शादी में डीजे न बजे और रौनक न हो तो क्या मजा आएगा भला.’’

‘‘ओह, तो यह बात है, भाई, तुम लोग तो जानते ही हो कि हरियाणा के 100 गांवों में डीजे पर पाबंदी है, हम तुम्हें यह आजादी कैसे दे दें?’’ सरपंचजी बोले, तो उन की बात पुख्ता करते हुए एक पंच बोला, ‘‘डीजे बजने से बहुत नुकसान होता है. तुम जानते हो डीजे की कानफोड़ू आवाज से विचलित हो कर भैंसें दूध नहीं देतीं और डीजे की धमक से गर्भधारण किए भैंसों के गर्भ भी गिर रहे हैं.’’

अब झबरू ने युवाओं का पक्ष रखा, ‘‘सरपंचजी, सारा दूध हमारे ही गांव का तो नहीं पहुंचता देश में, अगर एकदिन भैंस दूध नहीं देगी तो कौन सी मुसीबत आ जाएगी. शादीब्याह तो जीवन में एक ही बार होता है वह भी इस पाबंदी के कारण दिल में मलाल रह जाए तो क्या फायदा, हमेशा यारदोस्त यही बात कहेंगे कि फलां की शादी में न डीजे बजा और न नाचगाना हुआ, बस, रूखासूखा भात खा आए. पेट तो घर में भी भरते हैं फिर शादी की पार्टी का क्या फायदा?’’

बल्लू ने साथ दिया, ‘‘और जो यह भैंसों के गर्भ गिरने की बात है यह बेकार की बात है. आज तक किसी औरत का इस से गर्भ गिरा क्या? वे भी तो डीजे पर नाचतीगाती हैं और फिर एकाध दिन गर्भधारण की भैंस को विवाह वाले घर से दूर भी तो रखा जा सकता है. हमारी खुशी पर पाबंदी क्यों?’’

अब तीसरा बोला, ‘‘भाई, बात इतनी ही नहीं है. इस से बड़ेबुजुर्गों के सिर में दर्द भी हो जाता है जिस से उन का शादी का सारा मजा किरकिरा हो जाता है. तुम लोग नाचतेगाते हो और वे खाट पर सिर बांध कर पड़े रहते हैं.’’

‘‘वाह, पंचों ने क्या नुक्ता निकाला है. भई, पहले भी तो शादियां होती थीं. महीना पहले से ही जश्न शुरू हो जाता था. आप को तब नहीं खयाल आया अपने बुजुर्गों का. हमारा समय आया तो सिरदर्द होने लगा,’’ बल्लू ने अपना पक्ष रखा.

ताऊजी बोले, ‘‘देख लो पंचो, इन्हें ऐसी बातें करते शर्म भी नहीं आती.’’

‘‘भई, ताऊजी की शर्म वाली बात से एक और बात याद आई. जब युवक-युवतियां डीजे पर नाचते हैं तो बेशर्म हो कर नाचते हैं, भौंड़ी और फूहड़ हरकतें करते हैं जो देखने में भी अच्छी नहीं लगती हैं.’’ चौथे पंच ने कहा, तो 5वां पंच उन की हां में हां मिलाता हुआ बोला, ‘‘हां भई, डीजे पर थिरकते तुम लोग सिर्फ फूहड़ हरकतें ही नहीं करते बल्कि युवतियों से छेड़छाड़ भी करते हो और अश्लील गाने चलवाते हो जो बिलकुल अच्छा नहीं लगता.’’

कपिल आक्रोश में बोला, ‘‘आप हमें नाचते देखते हो या युवतियों के कपड़े और उन के थिरकते अंगों को.’’

झबरू आगे आया और सब को शांत करता हुआ बोला, ‘‘अगर युवक-युवतियां इस उम्र में फैशनेबलकपड़े नहीं पहनेंगे तो क्या बुढ़ापे में पहनेंगे. रही बात अश्लील गानों की तो ताऊजी आप अपना समय याद करो जब आप ने मदनू काका की शादी में गाना चलवाया था, ‘चोली के पीछे क्या है… चुनरी के नीचे क्या है…’ क्या वह फूहड़ अश्लील गाना नहीं था और जो आप ने अपने साथ नाचती युवती के साथ गलत हरकत की थी, सब जानते हैं. वह अलग बात है कि आप की शादी बाद में उसी से हो गई.’’

अब सब पंचों का मुंह देखने वाला था तभी कपिल बोला, ‘‘आप सब जानते हैं कि शादी का माहौल खुशी का होता है ऐसे में युवतियां स्वयं सजधज कर डीजे की धुनों पर नाचती हैं. कोई युवक अगर उन से टकरा जाए या वह टशन मारता हुआ उन के साथ नाचने लगे तो वे आंखें तरेरती हैं. भला, आप ही बताइए युवकों का इस में क्या कुसूर है, वे तो अपने ही नशे में चूर होते हैं.’’

अब सभी पंचों के मुंह पर ताला लग गया था. थोड़ी देर वातावरण में सन्नाटा रहा. सभी पंच और बुजुर्ग आपस में विचारविमर्श करने लगे. उन के भी मन के किसी कोने में विवाह जैसे अवसर पर ठुमकने की चाह थी. फिर सन्नाटा तोड़ते हुए सरपंच बोले, ‘‘भई, हम ने आप की सब दलीलें सुन लीं. हमें आप लोगों से हमदर्दी है और हम भी चाहते हैं कि आप नाचोगाओ, जश्न मनाओ, इसलिए कुछ शर्तों पर यह पाबंदी हटाते हैं.

‘‘युवकों को ध्यान रखना होगा कि शादीविवाह वाले घर के आसपास के घरों से सहमति ले कर ही डीजे लगवाएं. देर रात तक डीजे न बजे और कोई फूहड़ता या छेड़छाड़ की घटना न हो.’’

सरपंच की बात खत्म भी नहीं हुई थी कि युवक एकसाथ बोल पड़े, ‘‘हुर्रे… हमें आप की शर्तें मंजूर हैं पर डीजे तो बजेगा ही…’’

‘‘चलो, ताऊजी अपने घर और जातेजाते डीजे वाले को भी और्डर दे दो डीजे लगाने का,’’ कपिल ने कहा तो सभी युवक ताऊजी को साथ ले वापस चल दिए. पार्श्व में उन की ‘‘हुर्रे… पार्टी यों ही चालेगी… डीजे यों ही बाजेगा…’’ की आवाजें गूंज रही थीं और पंच भी खुश थे कि उन्होंने बीच का रास्ता निकाल कर युवकों के साथसाथ अपने मनबहलाव का रास्ता भी खोज लिया था. Hindi Family Story.

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