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SC on Gambling Game : भारत अजीब देश है- सुप्रीम कोर्ट

SC on Gambling Game : एक कहावत है कि जुआ किसी का न हुआ. जुआ सिर्फ उसी का हुआ जिस ने जुआरियों को जुआ खेलने की जगह दी. भारत में जुए की परंपरा रही है. पहले चार लोग किसी कोने में बैठ कर जुआ खेलते थे. जुए में कुछ लोग जीतते थे कुछ बर्बाद होते थे. आज औनलाइन का जमाना है. जुआ खेलने का तरीका बदला है लेकिन जुए के प्रति जूनून नहीं बदला.

आज पूरी दुनिया में औनलाइन गेमिंग के चक्कर में बहुत से लोग बर्बाद हो रहे हैं. इस के उलट बहुत से लोग और कंपनियां जो जुआरियों को औनलाइन जुआ खेलने का प्लेटफार्म मुहैया करवा रही हैं वो मालामाल हो रही हैं. जुए के इस मार्किट को खत्म करने के लिए भारत सरकार ने अगस्त 2025 में औनलाइन गेमिंग को रोकने के लिए क़ानून बनाया जिस से औनलाइन गेमिंग से जुड़े बहुत से लोग और कम्पनियां रातों रात बर्बाद हो गईं.

“प्रमोशन एंड रेगुलेशन औफ औनलाइन गेमिंग एक्ट, 2025” यह कानून “औनलाइन मनी गेम्स” रियल मनी वाले गेम्स जैसे फैंटेसी स्पोर्ट्स, ई-स्पोर्ट्स और ऐसे गेम्स को प्रमोट करने वाले विज्ञापनों पर रोक लगाने के लिए बना है.

इस क़ानून के खिलाफ एक व्यक्ति ने कोर्ट में याचिका दी. इस आदमी का कहना है कि यह क़ानून स्किल बेस्ड गेम्स पर भी रोक लगाता है जो कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) का उल्लंघन है. याचिका दाखिल करने वाला आदमी औनलाइन टूर्नामेंट्स से रुपए कमाता था और अपना ऐप लौन्च करने वाला था. इस क़ानून के बनने से उस की जिंदगी तबाह हो गई.

4 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका पर सुनवाई के दौरान जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा, “India is a strange country. You are a player, you want to play, and it’s your only source of income…” भारत एक अजीब देश है. आप खिलाड़ी हैं, खेलना चाहते हैं यहां तक तो ठीक हैं लेकिन क्या यही आप की एकमात्र आजीविका है यह बहुत अजीब है.

औनलाइन गेमिंग को रोकने का कानून अगस्त 2025 में पारित हुआ. तब से भारत के अलग अलग राज्यों के हाई कोर्ट में इस क़ानून के खिलाफ ढेरों याचिकायें दाखिल कि गईं. इसी को लेकर दिल्ली, कर्नाटक व मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसफर किया ताकि विरोधाभासी फैसले न हों. याचिकाकर्ताओं में कुछ कंपनियां भी शामिल हैं जो कहती हैं कि इस क़ानून से उन का कारोबार ठप हो गया है और लाखों लोग बेरोजगार हो गए हैं. SC on Gambling Game 

Pandit Nain Singh Rawat : भारत के मारको पोलो, पंडित नयन सिंह रावत

Pandit Nain Singh Rawat : 13वीं सदी के इब्ने बतुता ने अरब से चीन तक की लम्बी यात्राएं की थीं. 13वीं सदी के ही यूरोपियन यात्री मारको पोलो भी सिल्क रूट के सहारे चीन तक पहुंचे थे. इन दोनों यात्रियों को दुनिया जानती है लेकिन भारत के पंडित नैन सिंह रावत के बारे में ज्यादा कुछ लिखापढ़ा नहीं जाता. पंडित नैन सिंह रावत वो शख्शियत हैँ जिन्होंने 19वीं शताब्दी में बिना किसी आधुनिक उपकरण की मदद के पूरे तिब्बत का नक्शा तैयार कर लिया था.

नयन सिंह रावत के इस काम के लिए अंग्रेजी हुकुमत से उन्हें सर्वेक्षण के क्षेत्र में दिया जाने वाले सब से ऊंचा सम्मान ‘पेट्रोन गोल्ड मैडल’ मिला था. यह पुरस्कार पाने वाले नैन सिंह इकलौते भारतीय हैं.

अंगरेजों के लिए पहाड़ों के बीच बसे तिब्बत का नक्शा बनाना कठिन था. उन्हें एक ऐसे पहाड़ी आदमी की तलाश थी जो पहाड़ों पर मीलों लम्बी दूरी तय कर तिब्बत की सीमा को माप सके. उत्तराखंड के एक गांव के रहने वाले नयन सिंह रावत को पहाड़ों पर लम्बी दूरी तय करने का अच्छा खासा अनुभव था. अंग्रेजों ने नयन सिंह को इस महत्वपूर्ण काम के लिए चुना. आज से डेढ़ सौ साल पहले वह भारत की सुदूर सीमा से लगे एक गांव से, तिब्बत की ओर निकले. नयन सिंह का काम था तिब्बत का नक्शा बनाना, लेकिन कोई उपकरण तो था नहीं इसलिए उन्होंने एक कमाल का रास्ता निकाला.

पंडित नैन सिंह के हाथों में एक माला रहती थी. यूं तो माला में 108 मनके होते हैं, लेकिन इस माला में 100 मनके थे और 100वां मनका बाकी मनकों से कुछ बड़ा था. हर 100 कदम चलने पर एक मनका वह खिसका देते थे और इस तरह 100 मनकों पर 10 हजार क़दमों की दूरी तय हो जाती थी. 10 हजार कदम यानी ठीक 5 मील. अब हर कदम बराबर हो ये जरूरी तो नहीं, इसलिए पंडित नैन सिंह अपने पैरों के बीच एक रस्सी बांधते थे और कुछ इस तरह चलते थे कि एक कदम ठीक 31.5 इंच का हो और ऐसा करते हुए उन्हें सिर्फ सपाट रास्तों पर ही नहीं बल्कि तिब्बत के पठारों और उबड़ खाबड़ दर्रों पर भी चलना था. ऐसा करते हुए पंडित नैन सिंह 31 लाख 60 हजार कदम चले और एकएक कदम का हिसाब रखा.

21 अक्टूबर 1830 को उत्तराखंड के भटकुरा नाम के गांव में जन्मे पंडित नैन सिंह रावत ने अपने जीवन काल में 6 यात्राएं कीं, जिन की कुल लम्बाई 42 हजार किलोमीटर थी. इन यात्राओं में उन्होंने लद्दाख से ल्हासा का नक्शा बनाया. ल्हासा की ऊंचाई नापने वाले वो पहले व्यक्ति थे. इस के अलावा तारों की स्थिति देख कर उन्होंने ल्हासा के लैटीट्यूड और लोंगिट्यूड की भी गणना की, जो आज की आधुनिक मशीनों से की गई गणना के बहुत करीब है. सांगपो नदी के किनारे 800 किलोमीटर चलते हुए उन्होंने पता लगाया कि सांगपो और ब्रहमपुत्र एक ही हैं. नैन सिंह ने सतलज और सिन्धु के उद्गम भी खोजे. 16 साल तक घर नहीं लौटने पर लोगों ने उन्हें मृत तक मान लिया था, लेकिन पत्नी को विश्वास था कि वह लौटेंगे. वह हर साल उनके लिए ऊन कातकर एक कोट व पैजामा बनाती थीं. जब 16 साल बाद वह वापस लौटे, तो पत्नी ने उन्हें एक साथ 16 कोट व पैजामे भेंट किए. Pandit Nain Singh Rawat :

Relationship Issues : रिलेशनशिप में अजीब वो

Relationship Issues : रिलेशनशिप के बारे में जहां औरतें औरत से और मर्द मर्द से प्यार करते हों हमारे समाज में कोई जगह नहीं. समाज ऐसे रिश्तों को बर्दास्त ही नहीं करता. समलैंगिक रिश्तों का मज़ाक उड़ाने वाली ढेरों फिल्में बनी लेकिन ऐसे रिश्तों की जटिललताओं को समझने और इन मुद्दों पर खुल कर बात करने वाली फिल्में बौलीवुड में बहुत ही कम बनी हैं.

दो दिलों के बीच तीसरे की घुसपैठ कोई नई बात नहीं है. साहित्य और सिनेमा के लिए यह मुद्दा सब से रोमांचक रहा है. दिल टूटने वाले गाने, बेवफाई के तराने, तीसरे के लिए ठुकराए जाने का गम, किसी तीसरे के आने से आंसुओं से भरे नग्मे और वापस लौट के आने की फरियादें. तीसरे के आने के वियोग पर पूरी म्यूजिक इंडस्ट्री ख़डी हुई है. गायक लेखक और अदाकार पैदा हुए. इसी वियोग को भुनाने के लिए कभी बौलीवुड का पूरा बिजनेस चला करता था लेकिन अब समय थोड़ा बदल गया है. लड़कियां पहले से ताकतवर हुई हैं. अब अगर उस के रिलेशनशिप के बीच कोई तीसरा आ भी जाता है तो वह वियोग में तड़पती नहीं बल्कि ऐसे रिश्ते को खुद से ठुकरा कर आगे बढ़ जाती है और खुद किसी नये रिश्ते में चली जाती है. ऐसे में लड़के भी अब जुदाई के गीत नहीं गाते, दिल चीर कर प्रेमिका का नाम नहीं लिखते, खून से खत नहीं लिखते और रात रात भर जग कर माशूका की याद में शराब नहीं पीते बल्कि गुलाब का फूल ले कर अगले इश्क का इंतजार करते हैं.

शादीशुदा लोगों के बीच अगर तीसरा आ जाए तो भी अब पहले जैसा गम नहीं होता इसलिए तलाक के मामलों में बढ़ोतरी हुई है. यह पहले से बेहतर स्थिति है. तलाक के बढ़ते ट्रेंड का सब से ज्यादा फायदा औरतों को ही है. औरतें सक्षम हुई हैं तो वह पति की ज़्यादती सहने को तैयार नहीं हैं. तलाक के बढ़ते मामलों में एक सब से बड़ी वजह दोनों के बीच तीसरे की घुसपैठ ही है. शादीशुदा औरत का एकस्ट्रा मेरिटल अफेयर मर्द बर्दाश्त नहीं कर पाते तो औरतें भी अब पहले की तरह अबला नारी नहीं रह गई हैं जब पति घर में दूसरी ले आता था और औरत कुछ नहीं बोल पाती थी. अब पति के एकस्ट्रा मेरिटल को भी औरतें बर्दाश्त नहीं कर पाती और मामला तलाक तक पहुंच जाता है. पत्नी के पुरुष दोस्तों को पति बर्दाश्त नहीं करता तो पति की महिला मित्र, पत्नी के लिए हमेशा संभावित सौतन ही ही होती हैं. कई बार मामला थोड़ा पेचीदा भी हो जाता है जब यह तीसरा या तीसरी क्या है, यही समझ नहीं आए.

श्वेता गुप्ता अपने पति के साथ लखनऊ के आलमबाग में रहती थी. श्वेता के पति राकेश गुप्ता की मार्किट में हार्डवेयर की शौप थी. शादी को अभी दो साल ही हुए थे दोनों के कोई बच्चा नहीं हुआ था. श्वेता अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती थी. एक दिन श्वेता के घर उस की सहेली पूनम आ गई. पूनम को लखनऊ के एक पैरा मेडिकल इंस्टिट्यूट से 6 महीना का कोर्स करना था इसलिए वो लखनऊ आ गई. उस ने श्वेता से सम्पर्क किया ताकि वह पीजी ढूंढने में उस की मदद कर सके. श्वेता ने अपने पति राकेश से बात की और पूनम को अपने घर में ही रहने की जगह दे दी.

दोनों स्कूल के वक़्त की सहेलियां थी इसलिए राकेश को भी इस बात में कोई बुराई नहीं नजर आई. कुछ महीने बीते. राकेश को अपने और श्वेता के बीच दूरियां बढ़ती हुई नजर आईं. श्वेता और पूनम सिर्फ दोस्त नहीं थी दोनों के बीच दोस्ती से ज्यादा भी कुछ था. राकेश को यह सब अच्छा नहीं लगा तो वह पूनम को पीजी में भेजनें की बात करता तो उस की पत्नी श्वेता इस बात पर नाराज हो जाती. एक रात राकेश को श्वेता और पूनम के रिश्ते की असलियत पता चल गई. दोनों सिर्फ सहेलियां नहीं थी बल्कि एक दूसरे की जान थी. राकेश के लिए यह बेहद चौंकाने वाली बात थी. दो औरतें कैसे एक दूसरे के साथ इंटिमेट हो सकती हैं? राकेश को तो यह बात सोच कर ही घिन आती थी.

राकेश ने श्वेता से सख़्ती से कह दिया की अब पूनम इस घर में नहीं रह सकती. राकेश के गुस्से को देखते हुए श्वेता ने पूनम को घर से विदा कर दिया और कुछ दिनों बाद खुद भी लखनऊ से गायब हो गई. राकेश ने थाने में अपनी बीबी की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाई और एफ आई आर में पूनम का भी नाम दर्ज करवाया. पुलिस ने पूनम के इंस्टिट्यूट में पता किया तो वह भी गायब थी. कुछ दिनों बाद राकेश के वाट्सअप पर वीडियो आया की श्वेता और पूनम ने चार दोस्तों के साथ हिंदू विवाह का मंडप किसी के घर बना कर, एक कुंड में आग जला कर और एक दोस्त को पंडित की वेशभूषा पहना कर शादी कर ली और दोनों अब ख़ुश हैं.

राकेश के लिए यह सदमे से कम नहीं था. उस के लिए सब से बड़ी हैरानी की बात यह थी कि वह इतने दिन एक लेस्बियन औरत के साथ रह रहा था.

किसी भी जेंडर के दो लोग अपनी मर्जी से साथ रह सकते हैं. ऐसे मामलों में पुलिस और क़ानून भी कुछ नहीं कर सकते.

तबस्सुम के घर उस के पति का दोस्त फैजान अकसर आता जाता. फैजान पड़ोस में ही रहता था और तबस्सुम के हजबैंड के साथ एयरपोर्ट पर नाइट शिफ्ट में काम करता था. तबस्सुम ब्यूटी पार्लर चलाती थी. उस के पति शादाब दिन में जब भी घर में रहते तो फैजान भी घर आ जाता. दोनों दोस्त शाम तक घर में रहते. सिलसिला कई महीनो तक यूँही चलता रहा. तबस्सुम को फैजान का घर पर रहना बिलकुल पसंद नहीं था लेकिन अपने पति का सब से करीबी दोस्त होने की वजह से वह फैजान को बर्दाश्त करती थी. फैजान की ड्यूटी दिन की हो गई तो अब वह रात को घर पर रहने लगा. तबस्सुम थोड़ी हैरान थी कि उस का पति उसे कैसे अपने दोस्त के साथ अकेले छोड़ कर चला जाता है. ज्यादा हैरानी यह थी फैजान हमेशा अदब से पेश आता और एक दो बार तबुस्सम ने फ्लर्टिंग करने की कोशिश की तो वह कन्नी काट गया. वह इस बात से बेहद खुश थी लेकिन उस की यह ख़ुशी ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाई. एक रात फैजान घर आया तो तबस्सुम को मालूम चला की फैजान ने भी अपनी ड्यूटी दिन की करवा ली है. फैजान ने शादाब को घर का ऊपर वाला कमरा रहने को दे दिया. अब रात को खाना खाने के बाद फैजान अपने दोस्त के पास चला जाता और देर रात तक वहीं पड़ा रहता. तबस्सुम को शक हुआ तो एक रात उस ने चुपके से फैजान और शाहिद के बीच के रिश्ते की गहराई को अपनी आंखों से देख लिया. नीचे आ कर उस ने उल्टियां की और अगली सुबह ही अपने मायके के लिए निकल गई. तबस्सुम किसी से बता भी नहीं पा रही थी की उस के पति का किसी मर्द से जिस्मानी संबंध है. आखिरकार उस ने अपने पति से तलाक ले लिया.

इस तरह के रिलेशनशिप के बारे में जहां औरतें औरत से और मर्द मर्द से प्यार करते हों हमारे समाज में कोई जगह नहीं. समाज ऐसे रिश्तों को बर्दास्त ही नहीं करता. समलैंगिक रिश्तों का मज़ाक उडाने वाली ढेरों फिल्में बनी लेकिन ऐसे रिश्तों की जटिललताओं को समझने और इन मुद्दों पर खुल कर बात करने वाली फ़िल्में बौलीवुड में बहुत ही कम बनी हैं.

ऐसे ही रिश्तों पर मनोज बाजपेयी की सब से चर्चित फिल्म अलीगढ़ है. जिस में वे एक गे प्रोफैसर का किरदार निभाते हैं. यह फिल्म अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर श्रीनिवास रामचंद्र सिरास की सच्ची कहानी पर आधारित है. श्रीनिवास को उन की सैक्शुअल ओरिएंटेशन की वजह से नौकरी से निकाल दिया गया था.

प्रोफैसर सिरास (मनोज बाजपेयी) एक शांत और विद्वान व्यक्ति हैं, जो अपनी निजी जिंदगी में समलैंगिक रिश्ते में होते हैं. एक स्टिंग औपरेशन के बाद उन की प्राइवेसी उजागर हो जाती है, जिस से उन्हें सामाजिक और संस्थागत उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है. राजकुमार राव एक पत्रकार की भूमिका में हैं जो प्रोफैसर सिराज की कहानी को उजागर करने की कोशिश करते हैं.

मनोज बाजपेयी को इस रोल के लिए खूब सराहना मिली. उन्होंने प्रोफैसर की नरमी, अकेलापन और मजबूती को इतनी बारीकी से निभाया कि फिल्म को नेशनल अवार्ड मिला. ये फिल्म समलैंगिकता पर एक संवेदनशील नजरिया पेश करती है.

समलैंगिक औरतों को लेस्बियन और ऐसे पुरुषों को गे कहा जाता है. सदियों से समलैंगिकता को बुराई माना जाता रहा. कई देशों में समलैंगिकता का पता चलने पर लोगों को मार दिया जाता था लेकिन आधुनिक मनोविज्ञान, विज्ञान और मानवाधिकारों के दृष्टिकोण से इसे स्वाभाविक और सामान्य माना जाता है. यह एक व्यक्ति की यौनाचार स्थिति (सैक्सुअल ओरियंटेशन) का हिस्सा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन और दुनियाभर के मनोवैज्ञानिक संगठन इस कंडीशन को सामान्य स्थिति मानते हैं. यही वजह है की दुनिया के ज्यादातर देशों में समलैंगिकता गैरकानूनी नहीं है पर इसे सामाजिक तौर पर स्वीकृति नहीं मिली है.

भारत में सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में धारा 377 को निरस्त कर समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से हटा दिया. यह कानूनी स्वीकृति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ लेकिन समाज में आज भी ऐसे रिश्तों के लिए कोई जगह नहीं है हालांकि नई जेनरेशन के बीच समलैंगिकता को ले कर स्वीकृति धीरेधीरे बढ़ रही है. यूरोप अमेरिका में कैथोलिक चर्चों के पादरियों में यह बुरी तरह से फैला हुआ है क्योंकि वे शादी प्रेम या चर्च के नियमों के कारण सैक्स नहीं कर सकते.

समलैंगिकता एक सामान्य स्थिति है लेकिन यह स्थिति जनसंख्या अनुपात में बेहद कम लोगों में होती है. विभिन्न वैश्विक सर्वेक्षणों के आधार पर, विश्व स्तर पर समलैंगिक (गे/लेस्बियन) लोगों का प्रतिशत लगभग 2-4% है. यदि LGBTQ+ (लेस्बियन, गे, बाइसेक्शुअल, ट्रांसजेंडर आदि) को शामिल करें तो यह 5-9% तक हो सकता है.

सामाजिक धारणाएं, धर्म और परम्पराएं हमेशा बहुसंख्यक का समर्थन करती हैं और अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव करती हैं लेकिन कंस्टीटूशन सभी नागरिकों को बराबरी का दर्जा देता है इसलिए नागरिकों की उन्नति के लिए कंस्टीटूशन का मजबूत होना बेहद जरुरी है. किसी के सेक्सुअल बिहेवियर या सैक्सुअल इंट्रेस्ट के आधार पर उससे भेदभाव या नफरत करना जायज नहीं है. कोई किसी भी जेंडर, नस्ल, जाती या धर्म से हो हर व्यक्ति को सम्मान और स्वतंत्रता का अधिकार मिलना चाहिए. समलैंगिक अपने सामान्य व्यवहार में दूसरों की तरह के ही दिखते हैं और समाज को उनसे कोई परेशानी नहीं होती पर पंडित पादरी चिढ़ते हैं क्योंकि इन संबंधों से उन की रोजी रोटी मारी जाती है. खुद करते हों तो ठीक है पर भक्त करें तो उन का बस चले तो फांसी पर चढ़ा दें. Relationship Issues :

Parental Neglect : मातापिता की अनदेखी और नशे में डूबते बच्चे

Parental Neglect : नशे का व्यापार सिर्फ एक आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक नरसंहार है. वह नरसंहार जो धीरेधीरे, चुपचाप, बिना गोली या बम के आज हमारे बच्चों की नसों में उतारा जा रहा है. यह चुपचाप, धीरेधीरे हमारे घरों, गलियों और स्कूलों में फैलता हुआ बच्चों की नसों में उतर रहा है. इस की भयावहता इसलिए भी अधिक है क्योंकि इस में मरने वाला शरीर नहीं, पूरा समाज होता है.

मयंक का बस्ता साफ करते समय उस की एक किताब से जब गुटके की खाली पन्नी निकल कर जमीन पर गिरी तो सोनाली का दिल धक्क से रह गया. अभी मयंक सिर्फ 11 साल का है और पांचवी कक्षा में पढ़ रहा है, उस के बस्ते में गुटका कैसे आया? सोचसोच कर सोनाली का सिर दुखने लगा.

मयंक उस वक्त अपने दोस्तों के साथ पार्क में क्रिकेट खेल रहा था. सोनाली का मन हुआ कि अभी बुला कर पूछे. फिर रुक गई. सोचा, इस के पापा को बताएगी. मगर शाम के बाद रात भी बीत गई, वो उन को बता नहीं पाई. क्योंकि जानती थी कि पति भी सारी की सारी तोहमत उस पर ही मढ़ देंगे. बच्चे के प्रति अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं समझेंगे. ”तुम बच्चे की परवरिश ठीक से नहीं कर पा रही हो. तुम सारा दिन घर में करती क्या रहती हो? बच्चे की हरकतों पर नजर क्यों नहीं रख पाती? तुम ने इस को सिर पर चढ़ा रखा है. तुम देखती ही नहीं कि यह किन बच्चों के साथ खेलता है?” आदिआदि जहरबुझी बातों से वे परेशानी के समाधान की जगह नई परेशानी खड़ी कर देंगे.

दूसरे दिन जब मयंक घर लौटा और बस्ता रख कर खेलने के लिए निकला तो सोनाली ने सारी किताबें उस के बस्ते से निकाल कर खंगाल डालीं. बस्ते के अंदर वाली पौकेट से गुटके की एक पुड़िया फिर निकली, जो आधी भरी हुई थी. कल सोनाली ने यह सोच कर मन को शांत किया था कि हो सकता है उस ने चमकदार पन्नी खाली पड़ी देख कर किताब के बीच रख ली हो, मगर आज तो नया पैकेट है और वह भी आधा भरा हुआ. अब तो शक की कोई गुंजाइश ही नहीं है.

मयंक खेल कर घर लौटा तो गुस्से से भरी बैठी सोनाली ने पुड़िया दिखा कर उस से पूछना शुरू किया. मयंक का चेहरा सफेद पड़ गया. पहले तो उस ने साफ इंकार कर दिया कि उसे नहीं पता ये क्या है. फिर जब चेहरे पर मां का एक झन्नाटेदार थप्पड़ पड़ा तो आंखों से झरझर बहते आंसुओं के बीच उस ने सारी बातें उगल दीं. स्कूल में उस की दोस्ती 8वीं में पढ़ने वाले दो लड़कों से है जो उस को अपने साथ क्रिकेट खिलाते हैं. स्कूल के पीछे वाले मैदान की बाउंड्रीवाल एक जगह से टूटी हुई है. उस टूटे स्थान से वे दोनों लड़के मयंक को बाहर भेज कर सामने की गुमटी से गुटका मंगवाते हैं. खुद भी खाते हैं और मयंक को भी चखाते हैं. कभीकभी मयंक अपनी पौकेटमनी से खुद भी खरीदता है.

बेटे की बातें सुन कर सोनाली सकते में आ गई. जाने कब से खा रहा है? गुटका खा कर इस की तबियत नहीं बिगड़ी? चक्कर नहीं आया? यह तो तंबाकू है. उस ने पूछा तो मयंक ने बताया कि जब पहली बार उस ने जरा सा खाया था तो उस को बड़ी जोर से चक्कर आने लगा था. वह गिर गया था. तब उन दोनों लड़कों ने ही उस को संभाला था और छुट्टी में घर तक छोड़ कर गए थे. मगर अब इस को खाने से वह काफी शक्तिशाली महसूस करता है. उस को खेलने में मजा आता है. थकान नहीं लगती. मस्ती लगती है.

मयंक ने बताया कि वह छह महीने से खा रहा है. बेटे की सारी बातें सुन कर सोनाली हतप्रभ सी हो गई. पता नहीं स्कूल के कितने बच्चों को तंबाकू की लत है? उस के मयंक जैसे न जाने कितने बच्चे होंगे जो अनजाने में ही इस के लती हो गए होंगे. स्कूल को बच्चों की चिंता ही नहीं है. ऐसी गुमटियां स्कूल के आसपास होती ही क्यों हैं? सोनाली ने तय किया कि वह कल ही स्कूल की प्रिंसिपल से मिल कर यह बात उठाएगी.

ये कोई काल्पनिक किस्सा नहीं है. भारत के 10 बड़े शहरों में किए गए एक सर्वे में यह बात सामने आई है कि बच्चे बहुत कम उम्र में ही ड्रग्स डीलर्स के चंगुल में फंस कर ड्रग्स का सेवन शुरू कर रहे हैं. इस सर्वे के मुताबिक, बच्चे औसतन 12.9 साल की उम्र में पहली बार किसी नशीले पदार्थ को हाथ लगाते हैं, और कुछ तो 11 साल के भी पाए गए हैं. ‘नैशनल मैडिकल जर्नल औफ इंडिया’ में छपी सर्वे रिपोर्ट कहती है कि हर सात में से एक स्कूल जाने वाले बच्चे ने कभी न कभी कोई साइकोएक्टिव पदार्थ इस्तेमाल किया है.

इस सर्वे में करीब 14.7 साल के 5,920 छात्रों से जानकारी हासिल की गई है. यह सर्वे दिल्ली, बेंगलुरु, मुंबई, लखनऊ, चंडीगढ़, हैदराबाद, इम्फाल, जम्मू, डिब्रूगढ़ और रांची शहरों में हुआ है. सर्वे में पाया गया कि 15.1 फीसदी छात्रों ने कभी न कभी कोई नशीला पदार्थ इस्तेमाल किया है. वहीं, पिछले एक साल में 10.3 फीसदी और पिछले महीने में 7.2 फीसदी छात्रों ने नशीले पदार्थों का इस्तेमाल किया है.

चार फीसदी तंबाकू और 3.8 फीसदी शराब के बाद सब से ज्यादा इस्तेमाल होने वाले पदार्थों में ओपिओइड्स (2.8%), भांग (2%) और इनहेलेंट्स (1.9%) शामिल हैं. खास बात यह है कि ओपिओइड्स का ज्यादातर इस्तेमाल बिना डाक्टर की पर्ची के मिलने वाली दवाइयों के रूप में हुआ है. गौरतलब है कि यह सर्वे इन शहरों के बड़े और नामी स्कूलों में किए गए हैं, ऐसे में छोटे शहरों, जिलों या कस्बों में छोटेबड़े सरकारी या प्राइवेट स्कूलों के बच्चों पर मंडरा रहे ड्रग्स के खतरे को समझा जा सकता है जहां स्कूलों की दीवारों से सटी गुमटियां और चाय के ठेले खड़े होते हैं.

हालिया सर्वे का नेतृत्व डा. अंजू धवन ने किया था जो एम्स दिल्ली के नेशनल ड्रग डिपेंडेंस ट्रीटमेंट सेंटर की प्रमुख हैं. उन के साथ चंडीगढ़, डिब्रूगढ़, लखनऊ, बेंगलुरु, श्रीनगर, इम्फाल, मुंबई, हैदराबाद और रांची के मेडिकल कालेजों के डाक्टर भी शामिल थे. इन की संयुक्त रिपोर्ट में कहा गया है कि जैसेजैसे बच्चों की उम्र बढ़ती है, वैसेवैसे नशे का इस्तेमाल भी बढ़ता जाता है. डाक्टर्स ने पाया है कि 11वीं-12वीं क्लास के बच्चे 8वीं क्लास के बच्चों की तुलना में दोगुने नशीले पदार्थ इस्तेमाल करते हैं. लड़कों में तंबाकू और भांग का इस्तेमाल ज्यादा पाया गया, जबकि लड़कियों में इनहेलेंट्स और बिना पर्ची वाली ओपिओइड दवाइयों का इस्तेमाल ज्यादा देखा जा रहा है. आधे से ज्यादा बच्चों ने कहा कि अगर उन से पूछा जाए तो वे नशे के इस्तेमाल को छिपाएंगे. इस से यह पता चलता है कि असल में नशे का इस्तेमाल करने वाले बच्चों की संख्या इस से कहीं ज्यादा हो सकती है.

सर्वे में नशे के इस्तेमाल और मानसिक परेशानी के बीच एक सीधा संबंध पाया गया है. जो बच्चे पिछले साल नशीले पदार्थ इस्तेमाल कर रहे थे, उन में से 31 फीसदी बच्चों में मानसिक परेशानी के लक्षण ज्यादा पाए गए हैं. खासकर व्यवहार संबंधी समस्याएं, अतिसक्रियता और भावनात्मक लक्षण इन बच्चों में ज्यादा देखे गए हैं.

बच्चों का इतनी कम उम्र में नशे की ओर बढ़ना एक गंभीर चेतावनी है. सड़क किनारे गुमटियों में आसानी से नशीले पदार्थ मिल जाना और बच्चों की भावनात्मक परेशानियों पर ध्यान न देना, उन्हें इन चीजों की ओर धकेल रहा है. खासकर किशोरावस्था में जब दिमाग बहुत नाजुक होता है, इनहेलेंट्स, ओपिओइड्स और भांग जैसी चीजें बच्चों के दिमाग को बहुत नुकसान पहुंचा रही हैं.

ड्रग्स और तंबाकू बेचने वाले लोगों को अपना धंधा बढ़ाने के लिए स्कूलकालेज के बच्चों को बहकाना और उन्हें नशे का लती बनाना आसान है. स्कूल के बड़े लड़के अपने से छोटी क्लास के बच्चों को ये लत लगाते हैं. वे अपने से छोटी क्लास के बच्चों को ‘कूल दिखने’, ‘बड़े बनने’ या ‘दोस्ती निभाने’ के बहाने नशा ट्राय करने को उकसाते हैं. उन से पुड़िया मंगवाई जाती है ताकि किसी को शक न हो फिर धीरेधीरे ‘मजे’ के नाम पर शुरू की गई यह आदत लत का रूप ले लेती है, और फिर वही बच्चे इस काले कारोबार की अनौपचारिक सप्लाई चेन बन जाते हैं.

भले सड़क किनारे की गुमटियों पर बड़ेबड़े अक्षरों में यह लिखा दिखाई दे कि 18 वर्ष से कम उम्र के लोगों को गुटका बेचना अपराध है, कागज़ों और कानूनों में भले ही लिखा है कि 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को तंबाकू बेचना अपराध है, पर जमीनी हकीकत यह है कि हर गलीमहल्ले की पान गुमटी और चाय की दुकान इन नियमों का निर्भीक उल्लंघन कर रही हैं. गलीनुक्कड़ की दुकानें तो बाकायदा नशे की छोटीछोटी खिड़कियां बन चुकी हैं. पुलिस कार्रवाई छिटपुट होती है और स्थानीय स्तर पर मिलीभगत इतनी गहरी है कि कोई स्थाई बदलाव दिखाई नहीं देता है.

पान की गुमटियों और चाय की दुकानों पर रजनीगंधा, दिलबर, तांबा कुथार, मंगलम, किंग, शुद्ध प्लस, मिस्टर राइट, सम्राट, चमन बहार, तिरंगा पान मसाला, शान पान मसाला, गोवा, पर्ल, प्रताप, वी-वन, राजू गुटखा, तुलसी गुटखा, दाना पान मसाला व गुटखा, पायल गुटखा, हंसा गुटखा, दिलबहार गुटखा, कमला पसंद, सरदार गुटखा, शिकारी गुटखा, पायल गोल्ड, जोधपुर गुटखा, नेवी कट, तम्बाकू राजा, रेड गोल्ड, सुपर 5000, किंग सुप्रीम, दिल्ली स्पेशल, रौयल गुटखा और मेघापान मसाला के नाम से बिकने वाली रंगबिरंगी पन्नियों में भरा नशे का सामान खरीदने वाले नन्हे हाथों की संख्या बहुत ज्यादा है.

मजदूर वर्ग के नन्हेनन्हे बच्चे जो अभी साफ बोलना भी नहीं सीख पाए हैं, अपनी नन्ही उंगलियों में पांच या दस का सिक्का दबाए अपने मांबाप या बड़े भाई चाचामामा के लिए इन गुमटियों से तंबाकू खरीदते दिखाई देते हैं. जरा उम्र बढ़ी तो यही गुटका उन के अपने मुंह में होता है. यानी पहले यह किसी बड़े के लिए खरीदी जाती है, फिर उत्सुकता में एक चुटकी खुद चख ली जाती है, और धीरेधीरे लती बनने की यात्रा शुरू हो जाती है. गरीबी, अभाव और अनदेखी इन बच्चों को और अधिक असुरक्षित बनाती है. जब पेट खाली हो, स्कूल दूर हो और घर में कोई देखभाल करने वाला न हो, तब नशे की दुनिया उन्हें अपने चंगुल में लेने में देर नहीं लगाती.

नशे का व्यापार सिर्फ एक आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक नरसंहार है. वह नरसंहार जो धीरेधीरे, चुपचाप, बिना गोली या बम के हमारे बच्चों की नसों में उतारा जा रहा है. यह चुपचाप, धीरेधीरे हमारे घरों, गलियों और स्कूलों में फैलता हुआ बच्चों की नसों में उतर रहा है. इस की भयावहता इसलिए भी अधिक है क्योंकि इस में मरने वाला शरीर नहीं, पूरा समाज होता है. और यह कड़वी सच्चाई भी हमें स्वीकार करनी होगी कि इस विनाशक चक्र में सब से बड़ी जिम्मेदारी आज के मातापिता पर ही आती है, जो या तो अनजाने में या लापरवाही में अपने बच्चों को इस दलदल की ओर धकेल रहे हैं.

आज के बच्चे एक ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहां नशे का कारोबारियों ने स्कूलों और कालेजों को अपने लिए सब से उपजाऊ बाजार बना लिया है. बड़ी कक्षाओं के छात्र छोटे बच्चों को बहलाकर इस लत में धकेलते हैं, और खुद भी उसी जाल में फंसते जाते हैं. यह अपराध सिर्फ गलीकूचों की दुकानों तक सीमित नहीं; यह एक सुनियोजित रणनीति है जहां किशोरवय को सब से आसान शिकार माना गया है. एक से दूसरे को और फिर चौथेपांचवे तक कड़ी से कड़ी जुड़ती जाती है. दुःख की बात यह है कि इस पूरे खेल का पता मातापिता को सब से अंत में चलता है जब उन का बच्चा मानसिक या शारीरिक रूप से बीमार दिखने लगता है. आखिर अपने बच्चे के स्वास्थ्य और व्यवहार में बदलाव को मातापिता समय रहते क्यों नहीं पकड़ पाते हैं?

दरअसल आज के मांबाप आर्थिक दौड़ में इतने उलझे हुए हैं कि उन के पास बच्चे के साथ बैठकर दो घड़ी बात करने तक का समय नहीं है. घरों में बातचीत की जगह स्क्रीन ने ले ली है, और संस्कार की जगह ‘कंटेंट’ ने. बच्चे बाहर क्या सीख रहे हैं, किस के साथ उठबैठ रहे हैं, कौन उन के दोस्त हैं? वह किस किस दोस्त के घर जा रहा है? किस के साथ खातापीता है? कौन उन के मन पर असर डाल रहा है, इन सवालों के कोई जवाब उन के पास नहीं हैं क्योंकि इस ओर उन की दृष्टि ही नहीं जा रही है.

मां-बाप की व्यस्तता

नौकरीपेशा मातापिता के पास बच्चों के लिए समय नहीं होता है. अधिकांश तो अपने बच्चों के स्कूलों में होने वाली पैरेंटटीचर मीटिंग, एनुअल फंक्शन या स्पोर्ट्स-डे में भी नहीं जाते हैं. शाम को थकेहारे औफिस से लौटने वाले ज्यादातर कपल पूरी शाम अपने औफिस की टेंशन ही डिस्कस करते रहते हैं या घर के काम को ले कर आपस में झिकझिक करते दिखाई देते हैं. बच्चा अपने कमरे में बैठा क्या कर रहा है, किताबों में मुंह छिपाए क्या सोच रहा है, उस के पास अपने मातापिता से कहने के लिए कुछ है या नहीं, उस के स्कूल में आज क्या हुआ, उस के साथ किसी ने कोई गलत हरकत तो नहीं की, वह किसी तरह के तनाव में तो नहीं है, इन बातों को पूछनेजानने की फुर्सत मांबाप के पास नहीं है. ऐसे घरों के बच्चे जल्दी ही अराजक तत्वों के चंगुल में फंस जाते हैं.

बच्चों के दोस्तों की जानकारी नहीं

घर के आसपास, स्कूल में, जिम या स्टेडियम आदि में जहां भी बच्चे जा रहे हैं, वहां उन के दोस्त कौनकौन हैं, किस उम्र के हैं, किस तबके से हैं, इस की कोई जानकारी आजकल के मांबाप को नहीं होती है. चूंकि मांबाप को ये बातें जानने में इंटरेस्ट नहीं होता है तो बच्चा भी अपने दोस्तों के बारे में उन्हें कुछ नहीं बताता है.

देखा गया है कि जिन बच्चों की दोस्ती उन की उम्र से अधिक बड़े बच्चों के साथ होती है उन में से अधिकांश बच्चे नशे का शिकार हो जाते हैं. दोतीन दशक पहले तक परिवारों में बच्चे अपने दोस्तों को अपने जन्मदिन पर या त्योहारों आदि के अवसर पर बुलाया करते थे. मां को भी बच्चे के दोस्तों को अपने हाथ की बनी पूरीसब्जी, खीरहलवा खिला कर ख़ुशी मिलती थी. इस तरह मां की नजर उन सभी बच्चों पर रहती थी जो उस के बच्चे के दोस्त हैं. उन में किस का व्यवहार अच्छा है और किस का बुरा, यह मां एक नजर में जान लेती थी और बुरे लड़के से दूर रहने के लिए अपने बच्चे को हिदायत देती थी.

मगर आज के समय में लोग अपने बच्चों के जन्मदिन होटलोंरेस्त्रां में मनाने लगे हैं. जहां परिवार के कुछ सदस्य और मांबाप के कुछ नजदीकी दोस्तों को बुला कर केक कटिंग हो जाती है और बढ़िया डिनर दे कर मान लिया जाता है कि बच्चे ने भी एन्जौय किया होगा. बच्चे के चेहरे पर अपने लिए महंगे गिफ्ट देख कर भले कुछ समय के लिए मुस्कान आई हो पर सच पूछें तो भीतर से वह बिलकुल अकेला था क्योंकि उस पार्टी में उस का अपना ग्रुप तो था नहीं. मां को इतनी फुर्सत कहां कि घर पर उस के साथियों को बुला कर अच्छा खाना बना कर खिलाए. उस को तो बड़े होटल में बेटेबेटी की बर्थडे पार्टी मनाने की फोटो अपने फेसबुक पेज पर लगानी है. दिखावे की दुनिया में बच्चों की असली खुशी खो चुकी है.

बढ़ता स्क्रीन टाइम

तकनीक के विस्तार ने संबंधों को बर्बाद किया है. आज बड़ेछोटे सभी के हाथों में मोबाइल फोन है. मां अगर गृहणी है तो घर के काम निपटाने के बाद वह फोन पर रील देखने में व्यस्त है. बाप औफिस से लौट कर आने फोन में खोया हुआ है. बच्चों का बहुत सारा वक़्त स्क्रीन पर गुजर रहा है. सब के बीच एक गहरी चुप्पी पसरी हुई है. बच्चे अपनी एजुकेशन से जुड़ी सामग्री के अलावा फोन पर तमाम तरह के घटिया कंटेंट भी देख रहे हैं. समय से पहले व्यस्क हो रहे हैं और मांबाप को भनक तक नहीं लगती है.

अनेक बच्चे आज अपनी समस्याओं का समाधान चैटजीपीटी जैसी साइट्स पर ढूंढ रहे हैं. गूगल से पूछ रहे हैं. अवसाद में डूबे जा रहे हैं. फेसबुक के मकड़जाल में फंस कर नशे के सौदागरों तक पहुंच जाते हैं. एक कश…. दो कश…. के बाद जब उन की जिंदगी सचमुच धुंआ होने लगती है तब कहीं जा कर मातापिता को पता चलता है कि बच्चा नशे की गिरफ्त में है.

जरूरत से ज्यादा पौकेटमनी

दिखावा संस्कृति में डूबे मातापिता अपने बच्चों को पैसे का मूल्य नहीं समझा पाते हैं. जिन के पास पैसा है वे खुले हाथ से अपने बच्चों को पौकेटमनी देते हैं, साथ ही उन की आयदिन की ख्वाहिशें भी पूरी करते रहते हैं. जिन बच्चों की जेब में भरपूर पैसा होता है, वे नशे के कारोबारियों के जाल में जल्दी फंसते हैं. क्योंकि ऐसे ही बच्चे उन के धंधे को चार चांद लगाते हैं. इन बच्चों को वे अपनी सप्लाई चेन की कड़ी की तरह इस्तेमाल करते हैं. ये इन के ड्रग पेडलर भी बनते हैं. जिन बच्चों को कभीकभार पौकेटमनी मिलती है या जरूरत भर का पैसा उन की जरूरत पूछ कर दिया जाता है, वे अपने पैसे का इस्तेमाल भी सोचसमझ कर करते हैं.

बच्चों को जिम्मेदार बनाना, अनुशासन देना, किसी गलत हरकत की समय से रोकथाम करना, ये सब मातापिता की प्राथमिक जिम्मेदारी है. लेकिन वर्तमान परिवार संरचना में यह जिम्मेदारी कहीं खोती जा रही है. समाज में संयुक्त परिवार अब ज्यादा बचे नहीं हैं, जहां दादादादी, बुआ या चाचा बच्चों पर नजर रखते थे. साथ खेलने के लिए चचेरे भाई बहनों की फौज होती थी.

सब एक दूसरे पर नजर रखते थे और साथ समय बिताते थे. अब एकल परिवार हो गए हैं. घर में एक या दो बच्चे अपने मांबाप के साथ हैं. और अगर मांबाप दोनों नौकरीपेशा हैं तो फिर अकेलेपन, उपेक्षा, तनाव, अपेक्षाओं का बोझ उठाए बच्चा जब दोस्ती और सहारे की तलाश में निकलता है तो अक्सर गलत हाथों में पड़ जाता है. Parental Neglect :

Religious Extremism : मजहब ही सिखाता है आपस में बैर रखना

Religious Extremism : धर्म के नाम पर सड़कों पर भीड़ का तमाशा सिर्फ भारत में ही नहीं होता. धर्म के नाम पर पूरी दुनिया में ऐसे तमाशे होते हैं. 14 दिसंबर 2025 को औस्ट्रेलिया के सिडनी में यहूदी हनुक्का मना रहे थे. इस धार्मिक हुड़दंग के दौरान यहूदियों की भीड़ पर हमला हुआ. इस हमले में कम से कम 15-16 लोग मारे गए और 40 से ज्यादा घायल हुए. हमला करने वाले बापबेटे की जोड़ी थी. 50 साल का साजिद अकरम और उस का 24 साल का बेटा नवीद अकरम. दोनों गाजा का बदला लेने औस्ट्रेलिया पहुंचे थे. दोनों बापबेटों को जन्नत में सीट रिजर्वड करवानी थी सो उन्होंने यहूदियों को भून दिया. आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने इस घटना को “एक्सट्रीमिस्ट आइडियोलौजी” बताया.

एक्सट्रीमिस्ट आइडियोलौजी का मतलब होता है यहूदी विरोधी भावना. 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले और उस के बाद इजरायल की कार्रवाई से आस्ट्रेलिया में एंटीसेमिटिक घटनाएं बढ़ीं. हमले से पहले बौन्डी इलाके में यहूदी बिल्डिंग्स पर हमले हुए. कोषर रेस्तरां में आगजनी और सिनेगाग पर फायरबौम्बिंग हुई.

हमलावरों के पास इसलामिक स्टेट के झंडे मिले. दोनों बापबेटे मिल कर दुनिया को इसलामिक स्टेट बनाने के रास्ते पर निकले थे. नवीद अकरम पहले से आस्ट्रेलियन सिक्योरिटी इंटेलिजेंस और्गेनाइजेशन की नजर में था लेकिन इंटेलिजेन्स से चूक हो गई और नतीजा यह हुआ की औस्ट्रेलिया में 1996 के बाद भय का ऐसा तांडव दूसरी बार देखा गया.

भारत के लिए भय का ऐसा तांडव कोई नई बात नहीं है. यहां धर्म के साथ जातियों का तांडव भी सनातन काल से जारी है. धर्म के नाम पर मौबलिंचिंग, जाती के नाम पर गांवों को फूंक देना आम बात है. बुलडोजर की दहशत अलग से पैदा हो गई है. यह सब आतंक के अलगअलग फ्लेवर हैं. भारत के दलित, ईसाई, आदिवासी और मुसलमान आतंक के इस फ्लेवर को रोज चखते हैं. वहीं पाकिस्तान के अहमदियों और ईसाईयों को इस आतंक की आदत सी हो गई है. आतंकवाद मजहबों की कोख से ही जन्मा है और पूरी दुनिया में आतंकवाद के अलगअलग बच्चे अपनेअपने तरीके से मौत का खेल खेल रहे हैं.

दुनिया में मजहबों के नाम पर बहुत तमाशा हुआ है और आज भी हो रहा है. कहने को मजहब सिखाता है हरामखोरी मत करो लेकिन दुनिया भर में सब से ज्यादा हरामखोरी और आरामखोरी मजहबों के नाम पर ही होती है. कहने को मजहब सिखाता है आपस में प्रेम रखना लेकिन यह भी कोरी बकवास बात है.
इंसानों के बीच सब से ज्यादा नफरत मजहब ही पैदा करता है. कहने को धर्म से शांति आती है लेकिन दुनिया के इतिहास में सब से ज्यादा अशांति धर्म ने ही फैलाई है. दुनिया भर में युद्ध, हिंसा, दंगे और अराजकता के पीछे मजहबों का बड़ा योगदान रहा है और आज भी तमाम मजहब अपने इस मिशन में सक्रिय भूमिका अदा कर रहे हैं.

यूरोप के इतिहास में यहूदियों के साथ ईसाईयों ने जुल्म ढाए. ईसाई और यहूदियों के बीच इस नफरत को बढ़ाने में चर्च ने बड़ी भूमिका अदा की. यहूदी ताकतवर हुए तो उन्होंने अपना मुल्क बना लिया और मुसलमानों पर जुल्म ढा कर अपनी कुंठा शांत कर ली. इतिहास में जब मुसलमानों का जोर था तो तलवार के दम पर पूरी दुनिया को फतह करने निकल पड़े थे लेकिन जब विज्ञान का दौर आया तब सारी हुकूमत चली गई. अब मुसलमानों के कुछ गिरोह तलवार की जगह आतंकवाद के रास्ते दुनिया फतह करने पर अमादा हैं.

धर्म और पूंजीवाद का चोली दामन का साथ हमेशा से रहा है इसलिए दोनों को ही इंसानियत की त्रासदी से कोई फर्क नहीं पड़ता. धर्म को बनाने और बेचने वाले जानते हैं की भक्तों की भीड़ से कैसे उल्लू सीधा किया जाता है? धर्म के नाम पर कोई भी मरे धर्म के धंधेबाजों को कोई फर्क नहीं पड़ता. धर्म के नाम पर लूटखसोट और हिंसा से धर्म को ऊर्जा मिलती है. इसी तरह हथियार बनाने और बेचने वाले जानते हैं कि उन के हथियार से इंसान ही शिकार बनेगा. उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि उन के हथियार कोई सरकार खरीदे या गिरोह. सरकार भी तो एक तरह का गिरोह ही है जो डैमोक्रेसी की आड़ में लूटखसोट और हिंसा करती है.

राहुल सांस्कृतयायन ने लिखा था ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’ यह सफेद झूठ है और इस सफेद झूठ का क्या ठिकाना? अगर मजहब बैर नहीं सिखलाता तो चोटीदाढ़ी की लड़ाई में हजार बरस से आज तक हमारा मुल्क पामाल क्यों हैं? पुराने इतिहास को छोड़ दीजिए, आज भी हिंदुस्तान के शहरों और गांवों में एक मजहब वालों को दूसरे मजहब वालों के खून का प्यासा कौन बना रहा हैं ? और कौन गाय खाने वालों को गोबर खाने वालों से लड़ा रहा है? असल बात यह है कि ‘मजहब तो है सिखाता आपस में बैर रखना, भाई को सिखाता है भाई का खून पीना’. Religious Extremism :

Hindi Family Story : सुख की छैयां – उदास रहने वाली लड़की की कहानी

Hindi Family Story : बेटे की कामयाबी ने आज मां मीरा की सुख को  तरसती आंखों में नमी ला दी. बहुत बड़ी कंपनी में अच्छा पैकेज. कितना असीम सुख होता है अपने बच्चे को कामयाबी की सीढ़ी चढ़ते देखना. मातापिता कितनी मिन्नतें करते  हैं. व्रतउपवास करते  हैं. रातों को पढ़ते  बेटे के साथ अपने ही कमरे में उनींदी से जागते हैं. शायद बेटे को चाय या कौफ़ी की ज़रूरत पड़ जाए या भूख ही लग जाए. पिता भी गर्वित होते हैं. एक संतुष्टि उन के ह्रदय को तृप्त कर देती है पिता का दायित्व  पूरा करने की, जीवन सफल होने की. मातापिता के जीवन की सफलता बेटे के जीवन के सुखदुख की आहट से बंध जाती है.

अभिन्न ने मां के भावपूर्ण चेहरे को देख कर कहा, “अरे मां, अब क्यों आंख में आंसूं? अब तो हमारी सारी परेशानियां ही ख़त्म हो गई  हैं.”

“नहीं बेटा, ये दुख के नहीं, ख़ुशी के आंसूं हैं. तुम ने भी बहुत दुख देखे हैं. हम तेरी छोटी ख्वाहिशें भी हम पूरा नहीं कर पाते थे. तेरे पापा की सीमित आय और पापा पर अपने भाईबहनों की ज़िम्मेदारी…”

“हां मां, ये पापा और आप दोनों के अच्छे कर्मों का फल है जो कुदरत ने मुझे आज इतनी ऊंचाई पर पहुंचाया है. “अब मेरी प्यारी मां, एक बात सुन लो, आप को  और पापा को अब कोई काम करने नहीं दूंगा. बहुत हुआ काम. अब आराम से बैठ कर हुक्म चलाना.“

मांपिता संग आज अभिन्न भी भावी जीवन की ख़ुशियों का तानाबाना बुन रहा था. सुख की दस्तक ने जीवन में रंग भरने शुरू कर दिए थे.

छोटे से शहर श्यामली से आज मुंबई के 5 बैडरूम वाले फ्लैट में बैठे थे. बहू अनिका नये फ़र्नीचर और सजावट की चीजें क़रीने से सजाती मुसकरा रही थी.

“मां, शाम होने को आई, आप लोगों को चाय लगवा दूं?” अनिका ने प्यार से गले में बांहें डालते हुए कहा.

सुख की निर्झरिणी  अनिका  हमेशा मुसकराती रहती. अभिन्न की तरह ही उस का भी प्रयास रहता कि सासससुर को किसी भी चीज की परेशानी न हो.

“हां बेटा, बनवा दे, तू भी सुबह से काम में लगी है, अपनी चाय भी हमारे साथ आ कर पी ले.“

“ओके मम्मा.“

अपनी जौब में आ कर अभिन्न अधिक ही व्यस्त हो गया. पर जब भी औफ़िस से घर आता, थोड़ी देर  मांपापा के साथ अवश्य बैठता.

अब घर भी व्यवस्थित हो चला था. मातापिता दोनों सुबह टहलने जाते, आ कर नहा कर पूजा करते. फिर साथ में बैठ कर मनपसंद ताश खेलते या टीवी देखते.

“मां आज दशहरा है. खाने में क्या बनेगा?“

“ निका बेटा, आज रायता-पूड़ी और सब्ज़ी बनेंगी. रायता ज़रूर बनता है.“

“ठीक है मां, मैं करती हूं.“

“अरे मां, आप रसोई मैं क्यों आ गईं? अभिन्न देखेंगे, तो ग़ुस्सा होंगे कि  मेरी मां से काम क्यों करवाया?“ मां को रसोई में देख अनिका ने कहा.

“तो उसे बताने कौन जा रहा है? आज ख़ाना मैं बनाती हूं.“

एक अनोखी लालसा मां के चेहरे पर तैर गई. आज वे अपने हाथ से ख़ाना बना कर सब को खिलाना चाहती थीं. वैसे भी, बहुत दिनों से उन्होंने रसोई में कदम ही नहीं रखा था. जब से यहां आई हैं, बहू अनिका आगे बढ़ कर सारा काम संभाल रही थी. उन्हें कुछ करने का मौक़ा ही न मिलता. मीरा ख़ुश भी थीं. दुर्दिन छंट गए हैं. प्यारसम्मान करने वाली बहू मिली थी और क्या चाहिए. वे जब भी रसोई में आतीं, अनिका उन्हें प्यार से पापा के पास ला कर बिठा देती, फिर कहती, “आप तो, बस, यहीं बैठ कर आराम करो और हमें आशीर्वाद दो,“

ऐसा अकसर होता कि जब भी मां कुछ काम करने की कोशिश करतीं, अनिका उन्हें वापस कर देती. उन का मन अब उदास होने लगा था. बिना काम किए लगता था जीवन का महत्त्व ही नहीं है.

मीरा  का मायका और ससुराल भरापूरा था. सुबह से शाम काम में ही बीतता  था. ख़ाना बनाना या कुछ करते रहना उन को आंतरिक ख़ुशी देता था. पर अब वे चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहीं थीं.

आज धूप में बैठे हुए मीरा ने सोचा, एक स्वेटर ही शुरू कर लेती हूं. वे फंदे डाल ही रहीं थीं कि  अनिका आ गई, “अरे मां, आप स्वेटर क्यों बना रही हैं, आप के कंधों में दर्द हो जाता है. रहने दीजिए. वैसे, आप किस के लिए बना रही हैं?“

“तेरे पापा के लिए बना रही थी.“

शाम को मीरा बाज़ार से एक गिफ्ट ससुर के लिए ले कर कर आई, “पापा देखिए, आप के लिए गिफ्ट है.“

“अरे, यह तो बहुत सुंदर है,“ ससुरजी ने पैकेट खोला तो एक सुंदर स्वेटर अपनी रंगत बिखेर रहा था.

पश्मीने की वूल का स्वेटर हाथ में लिए ससुरजी उसे सहला रहे थे. एक जमाने में उन की ऐसे स्वेटर की बहुत ख्वाहिश थी. लेकिन सीमित आय और बड़े परिवार की ज़िम्मेदारियों ने यह चाहत पूरी न होने दी. उन का ख़ुशी से चेहरा चमक रहा था.

मीरा सोच रही थी, कितनी ह्रदय से जुड़ी प्यारी लड़की है, ज़रा सी कोई इच्छा हो, उसे तुरंत पूरा करती है. लेकिन अब उन का मन भी चाहता था कुछ करें. यों ही बैठे रहना उन्हें निरर्थक लगता. कभी ऐसा लगता, अब वे बेकार हो गई हैं, उन से कुछ काम ही नहीं होगा. जैसे उन का ख़ुद पर से विश्वास ही ख़त्म होता जा रहा था. जिस भी काम को करने चलतीं, बहू हाथ से काम ले लेती या सहायक को कह कर करवा देती. वे बेमन से बैठी रह जातीं. उन का आत्मविश्वास डगमगाने लगा था. उन को  ह्रदय में सबकुछ होते हुए कुछ ख़ालीपन सा लगता. कुछ दिन इसी ऊहापोह में बीते. बहू से  उस के लाड़प्यार के आगे कुछ कह भी न पातीं. अब मीरा का मन अपने पुराने घर जाने को करने लगा. उन्हें अपनी रसोई, अपना घर याद आने लगा.

“ सुनो जी, कुछ दिनों के लिए घर वापस चलें?“ रात में सोने के पूर्व मीरा ने पति से कहा.

“क्यों, क्या हुआ? तुम्हें किसी ने कुछ कहा, कुछ परेशानी है क्या? यह भी तो अपना घर है. कुछ दिनों से मैं देख रहा हूं तुम कुछ परेशान हो?“

“अरे, आप तो परेशान हो गए. मुझे कोई परेशानी नहीं. न ही किसी ने कुछ कहा. बहू तो ह्रदय से सम्मान देती है. बस, कुछ करने को नहीं है. सो, मन उदास हो जाता है. लगता है, मेरे जीवन का कोई मक़सद ही नहीं, अपने ही घर में मेहमान हो गई हूं.“

“होहोहो, बस, इतनी सी बात. ठीक है, अब तुम काम कर सकोगी लेकिन एक वादा करो, ख़ुद को थकाओगी नहीं, तुम्हारा बीपी बढ़ जाता है.“

सुबह नाश्ते के बाद महेश जी ने बोला, “अनिका, आज मुझे ख़ाना मेरी पत्नी के हाथ का चाहिए और कोई नहीं बनाएगा.“

अनिका  ने अचानक से पापाजी की आवाज़ सुन कर परेशान होते हुए कहा, “क्या हुआ पापा जी? खाने में कुछ गड़बड़ हो गई, मुझे बताइए.“

“हां, बहुत बड़ी गड़बड़ हो गई है. तुम ने अपनी सास को मेहमान बना दिया है,“ कह कर ज़ोर से खिलखिला कर हंस पड़े.

“पर पापा जी…”

महेश जी ने प्यार से हाथ सिर पर फेरते हुए कहा, “बेटा, आराम भी हिसाब से ही अच्छा लगता है. तेरी सास ने हमेशा किचन पर राज किया है. शायद, इसी में उस को तृप्ति मिलती है. कुछ काम कर संतुष्टि हर उम्र की ज़रूरत है.”

“तो, लेकिन मां को तो बीपी है, कहीं काम करने से…”

अनिका के वाक्य पूरा करने के पहले ही महेश बोले, “तुम्हारी चिंता स्वाभाविक है पर बेटा, हलकाफुलका काम नहीं थकाता, बल्कि स्फूर्ति देता है.”

तभी अनिका ने सासुमां का हाथ प्यार से पकड़ा और रसोई में ले चली, “आज आप खीर बनाएंगी, मुझे अभिन्न ने बताया था, आप खीर बहुत अच्छी बनाती हैं, हमेशा ही खीर खाते के समय वे कहते हैं.“

मां बच्चों को खीर देते मुसकरा रही थीं. उन के चेहरे पर असीम तृप्ति थी, जिसे देख अनिका भी ख़ुश थी. वह ख़ुद यही तो चाहती थी कि मां ख़ुश रहें.

“ये लो तुम्हारी खीर बनाई की साड़ी,“ कहते हुए पति महेश  ने  साड़ी दी, अनिका ने ऊन  सलाई और अभिन्न ने उन को मौर्निग वौक के शूज़.

“अरे, आप लोग ये सामान कब लाए और इन सब की क्या ज़रूरत थी?” बहुत दिनों बाद उन के मन का कोना उमंग में चंचल हो उठा. वे नईनवेली सी मुसकरा उठीं.

“ज़रूरत थी, इस घर में आज आप की पहली रसोई थी,” अभिन्न, अनिका और महेश ने एकसाथ कहा.

“मैं यह साड़ी एक हफ़्ते बाद करवाचौथ आ रहा है, उस के लिए लाया था,“ महेश जी ने कहा.

बच्चों और पति के प्यार से अविभूत  मीरा सुख की छैयां में गुनगुना उठीं. Hindi Family Story :

Hindi Romantic Story : मन के बंधन – दो दिलों की अधूरी प्रेम कहानी

Hindi Romantic Story : मैंने बहुत कोशिश की उस के नाम को याद कर सकूं. असफल रहा. इंग्लिश वर्णमाला के सभी अक्षरों को बिखेर कर उस के नाम को मानो बनाया गया था. यह उस का कुसूर न था. चेकोस्लोवाकिया में हर नाम ऐसा ही होता है. वह भी चैक नागरिक था. वेरिवी के शानदार शौपिंग कौंप्लैक्स की एक बैंच पर बैठा था. 70-80 वर्ष के मध्य का रहा होगा.

यह बात ज्यादा पुरानी नहीं. आस्ट्रेलिया आए मुझे एक माह ही तो हुआ था. म्यूजियम और घूमनेफिरने की कई जगहों की घुमक्कड़ी हो गई, तो परदेश के अनजान चेहरों को निहारने में ही मजा आने लगा. आभा बिखेरते शहर मेलबर्न के उपनगर वेरिवी के इस वातानुकूलित भव्य मौल में जब मैं चहलकदमी करतेकरते थक गया, तो बरामदे में पड़ी एक बैंच पर जा बैठा. पास में एक छहफुटा गोरा पहले से बैठा था. गोरे की आंखों की चमक गायब थी, खोईखाई आंखें मानो किसी को तलाश रही थीं.

आस्ट्रेलिया की धरती ने डेढ़ सौ साल पहले सोना उगलना शुरू किया था. धरती की गरमी को आज भी विराम नहीं लगा है. इस धरती में समाए सोने की चमक ने परदेशियों को लुभाने का सिलसिला सदियों से बनाए रखा है. शानदार और संपन्न महाद्वीप में लोग सात समंदर पार कर चारों दिशाओं से आ रहे हैं. नतीजा यह है कि सौ से ज्यादा देशों के लोग अपनीअपनी संस्कृतियों को कलेजे से लगाए यहां जीवन जी रहे हैं.

बैंच पर बैठा मैं इधर से उधर तेज कदमों से गुजरती गोरी मेमों को कनखियों से निहारतेनिहारते सोचने लगता था कि वे किस देश की होंगी. भारत, पाकिस्तान, लंका और चीन के लोगों की पहचान करने में ज्यादा दिक्कत नहीं हो रही थी. पर सैकड़ों देशों के लोगों की पहचान करना सरल काम न था. एकजैसी लगने वाली गोरी मेमों को देख कर जब आंखों में बेरुखी पैदा हुई तो बैंच पर बैठे पड़ोसी के देश की पहचान करने की पहेली में मन उलझ गया. स्पेन का हो नहीं सकता, इटली का है नहीं, तो फिर कहां का. तभी एक गोरे ने मेरे पड़ोसी बूढ़े के पास आ कर ऐसी विचित्र भाषा में बतियाना शुरू किया कि मेरे पल्ले एक शब्द न पड़ा. गोरा चला गया, तो मैं अपनेआप को न रोक पाया.

मैं ने बूढ़े की आंखों में आंखें डालते बड़ी विनम्रता से हिंदुस्तानी इंग्लिश में पूछा, ‘‘आप किस देश से हैं?’’

मेलबर्न में बसे मेरे मित्र ने मुझे समझा दिया था कि परदेश में अपरिचितों से बिना जरूरत बात करने से बचना चाहिए. लेकिन पड़ोसी गोरे ने जिस सहजता और आत्मीयता से मेरे सवाल का जवाब दिया था उस से मेरे सवालों में गति आ गई. उस ने अपने देश चेकोस्लोवाकिया का नाम उच्चारित किया तो मैं ने उस का नाम पूछा. नाम काफी लंबा था. मेरे लिए उसे बोलना संभव नहीं. सच पूछो तो मुझे याद भी नहीं. सो, मैं उसे चैक के नाम से उस का परिचय आप से कराऊंगा.

उस की इंग्लिश आस्ट्रेलियन थी. पर वह संभलसंभल कर बोल रहा था ताकि मैं समझ सकूं.मेरे 2 सवालों के बाद चैक ने मुझ में दिलचस्पी लेनी शुरू की, ‘‘आप तो इंडियन हैं.’’ उस की आवाज में भरपूर आत्मविश्वास था.

मेरे देश की पहचान उस ने बड़ी सरलता से और त्वरित की, इसे जान कर मुझे गर्व हुआ और खुशी भी. मेरी दिलचस्पी बूढ़े चैक में बढ़ती गई, ‘‘आप कहां रहते हैं?’’

‘‘एल्टोना,’’ उस ने जवाब दिया. दरअसल, मेलबर्न में 10 से

15 किलोमीटर की दूरी पर छोटेछोटे अनेक उपनगर हैं. एल्टोना उन में एक है. उपनगर वेरिवी, जहां हम चैक से बतिया रहे थे, एल्टोना से 10 किलोमीटर दूर है.

चैक खानेपीने के सामान को खरीदने के लिए अपनी बस्ती के बाजार के बजाय

10 किलोमीटर की दूरी अपनी कार में तय करता है. पैट्रोल पर फुजूलखर्ची करता है. वक्त की कोई कीमत चैक के लिए नहीं क्योंकि वह रिटायर्ड जिंदगी जी रहा है. लेकिन सरकार से मिलने वाली पैंशन

15 सौ डौलर में गुजरबसर करने वाला फुजूलफर्ची करे, यह मेरी समझ से बाहर था. इस पराई धरती पर रहते हुए मुझे मालूम पड़ गया था कि यहां एकएक डौलर की कीमत है.

चैक की दरियादिली कहें या उस का शौक, मैं ने सोचा कि अपनी जिज्ञासा को चैक से शांत करूं.

तभी सामने की दुकान से मेरी पत्नी को मेरी ओर आते देख चैक बोला, ‘‘आप की पत्नी?’’

मैं ने मुसकराते कहा, ‘‘आप ने एक बार फिर सही पहचाना.’’

चैक अपने अनुमान पर मेरी मुहर लगते देख थोड़ी देर इस प्रकार प्रसन्न दिखाई दिया मानो किसी बालक द्वारा सही जवाब देने पर किसी ने उस की पीठ थपथपाई हो.

‘‘आप कितने समय से साथ रह रहे हैं?’’ उस ने पूछा.‘‘40 वर्ष से,’’ मैं ने कहा. वह बोला, ‘‘आप समय के बलवान हैं.’’

मुझे यह कुछ अटपटा लगा. पत्नी के साथ रहने को वह मेरे समय से क्यों जोड़ रहा था, जबकि यह एक सामान्य स्थिति है. इस के साथ ही मेरी जबान से सवाल निकल पड़ा, ‘‘और आप की पत्नी?’’

मेरा इतना पूछना था कि चैक के माथे पर तनाव उभर आया. चैक की आंखों ने क्षणभर में न जाने कितने रंग बदले, मुझे नहीं मालूम. पलकें बारबार भारी हुईं, पुतलियां कई बार ऊपरनीचे हुईं. मैं कुछ अनुमान लगाऊं, इस से पहले चैक के भरेगले से स्वर फूटे, ‘‘थी, लेकिन अब वह वेरिवी में किसी दूसरे पुरुष के साथ रहती है.’’

मैं चैक के और करीब खिसक आया. उस के कंधे पर मेरा हाथ कब चला गया, मुझे नहीं मालूम. चैक ने इस देश में हमदर्दी की इस गरमी को पहले कभी महसूस नहीं किया था. उस ने मन को हलका करने की मंशा से कहा, ‘‘हम 30 साल साथसाथ रहे थे.’’

मैं ने देखा, यह बात कहते चैक के होंठ कई बार किसी बहेलिया के तीर लगे कबूतर के पंखों की तरह फड़फड़ाए थे.

‘‘यह सब कैसे हुआ, क्यों हुआ?’’ मुझ से रुका न गया. शब्द उस के मुंह में थे, पर नहीं निकले. गला रुंध आया था. उस ने हाथों से जो इशारे किए उस से मैं समझ गया. मानो कह रहा हो, सब समयसमय का खेल है. मगर, मेरी जिज्ञासा मुझ पर हावी थी.

मैं ने अगला सवाल आगे बढ़ा दिया, ‘‘आप का कोई झगड़ा हुआ था?’’ ‘‘ऐसा तो कुछ नहीं हुआ था,’’ वह बोला, ‘‘वह एक दिन मेरे पास आई और बोली, ‘चैक, आई एम सौरी, मैं अब तुम्हारे साथ नहीं रहूंगी. मैं ने और स्टीफन ने एकसाथ रहने का फैसला किया है.’ फिर वह चली गई.’’

‘‘आप ने उसे रोका नहीं?’’ ‘‘मैं कैसे रोकता, यह उस का फैसला था. यदि वह किसी दूसरे व्यक्ति के साथ रह कर ज्यादा खुश है तो मुझे बाधा नहीं बनना चाहिए.’’

मैं हैरानी से उसे देख रहा था. ‘‘लेकिन हां, आप से झूठ नहीं कहूंगा. मैं ने उस के लौटने का इंतजार किया था.’’ वह आगे बोला.

उस की आंखें नम हो रही थीं. वह फिर बोला, ‘‘आखिर, हम लोग 30 साल साथ रहे थे. मुझे हर रोज उसे देखने की आदत पड़ गई थी,’’ हाथ के इशारे से बैंच के सामने वाली दुकान की ओर संकेत करते हुए उस ने कहा, ‘‘इस दुकान में हम लोग अकसर आते थे. यह उस की पसंदीदा दुकान थी.’’

मैं समझ गया कि वेरिवी के शौपिंग कौंपलैक्स में वह उस दुकान के सामने की बैंच पर क्यों बैठता है.

मैं ने उस से पूछा, ‘‘यहां उस से मुलाकात होती है?’’

‘‘मुलाकात नहीं कह सकते. वह स्टीफन के साथ यहां आती थी. बहुत खुश नजर आती थी. मैं उसे यहीं से देख लिया करता था. उसे देख कर लगता था कि उन दोनों को किसी तीसरे व्यक्ति की जरूरत नहीं है. वह खुश थी. लेकिन…’’ वह कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, ‘‘पिछली बार मैं ने उसे देखा था तो वह अकेली थी.’’

मैं ने देखा कि रोजलिन के चेहरे पर गहरी उदासी उतर आई थी. कुछ परेशान लग रही थी. उस ने मुझे देख लिया था. हमारी नजरें मिलीं, मगर वह बच कर निकल जाना चाहती थी. मैं ने आगे बढ़ कर अनायास ही उस का हाथ थाम लिया था, पूछा था, ‘कैसी हो?’ उस ने मेरी आंखों में देखा था, मगर कुछ बोल नहीं पाई थी. उस के हाथ फड़फड़ा कर रह गए थे. वह हाथ छुड़ा कर चली गई थी. मैं सिर्फ इतना जानना चाहता था कि वह ठीक तो है. अब जब वह मिलेगी, तो पूछूंगा कि वह खुश तो है.’’

‘‘आप की यह मुलाकात कब हुई थी?’’ ‘‘करीब 2 साल पहले.’’

उस की आंखें डबडबा रही थीं और मैं हैरत से उसे देख रहा था. वह पिछले 2 साल से इस बैंच पर बैठ कर इंतजार कर रहा था ताकि वह उस से पूछ सके कि ‘वह खुश तो है.’

उस दिन मैं ने उस के कंधे पर सहानुभूति से हाथ रख कामना की थी कि उस का इंतजार खत्म हो.

मैं अपने देश लौट आया था. मगर चैक मेरे दिमाग पर दस्तक देता रहा. बहुत से सवाल मेरे मन में कौंधते रहे. क्या उस की मुलाकात हुई होगी? क्या रोजलिन उस को मिल गई होगी या वह उसी बैंच पर आज भी उस का इंतजार कर रहा होगा? Hindi Romantic Story :

Genetic Muscle Disorder : क्या है नेमालाइन मायोपैथी? बचने के लिए जानें

Genetic Muscle Disorder : नेमालाइन मायोपैथी एक दुर्लभ और आनुवंशिक मांसपेशीय विकार है। इसमें व्यक्ति की मांसपेशियों में धीरे-धीरे कमजोरी आने लगती है। इसका सबसे ज्यादा असर गर्दन, धड़ और रीढ़ के निचले हिस्से पर पड़ता है। गंभीर स्थिति में व्यक्ति व्हीलचेयर पर निर्भर हो जाता है। बीमारी बढ़ने पर खाना निगलने, चबाने और दैनिक गतिविधियाँ करने में कठिनाई होने लगती है।

इस बीमारी के लक्षण आमतौर पर जन्म के समय या बचपन में ही दिखने लगते हैं। प्रमुख लक्षणों में शामिल हैं:
मांसपेशियों का पतला होना
गर्दन और चेहरे की मांसपेशियों की कमजोरी
हाथ-पैरों में कमजोरी या सुन्नपन
छाती का अंदर की ओर धँसना
अगर ये लक्षण दिखाई दें, तो डॉक्टर नेमालाइन मायोपैथी की जांच करने की सलाह देते हैं।

जांच कैसे होती है?

इस बीमारी की पुष्टि के लिए निम्नलिखित परीक्षण किए जाते हैं:
मांसपेशियों की बायोप्सी
EMG (Electromyography)
जेनेटिक टेस्टिंग
MRI या CT स्कैन
इन सभी जांचों से बीमारी की गंभीरता और कारणों का पता लगाया जाता है।

इलाज क्या है?

वर्तमान में नेमालाइन मायोपैथी का कोई निश्चित इलाज उपलब्ध नहीं है। लेकिन यदि समय रहते इसका पता चल जाए, तो इसके लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है।
इलाज में निम्नलिखित उपाय शामिल होते हैं:

नियमित फिजियोथेरेपी
रेस्पिरेटरी (श्वसन) सपोर्ट
आवश्यकतानुसार सर्जरी
सामान्य देखभाल और निगरानी
भावनात्मक सहारा और परिवार का सहयोग

यदि स्थिति अधिक गंभीर हो जाए तो रोगी को व्हीलचेयर की आवश्यकता पड़ सकती है। रोगी का मानसिक और भावनात्मक रूप से मजबूत रहना भी उपचार का अहम हिस्सा होता है। Genetic Muscle Disorder

Road Safety Rules: सड़क पर दुर्घटना की स्थिति में क्या करें और क्या न करें ?

Road Safety Rules: बीते महीने रोहित अपनी कार से शिमला जा रहा था अचानक सामने से आती तेज़ स्पीड कार के साथ उसकी कार की टककर हो गई. पहले तो रोहित घबरा गया लेकिन अपनी सूझ बुझ से ना सिर्फ उसने अपनी बल्कि तेज़ स्पीड में आती कार में सवार लोगो की भी जान बचाई. उसने दोषी से बहस बाजी में ना फ़स कर पहले कार में रखे फर्स्ट ऐड बॉक्स को निकला और खुद की चोट पर डिटोल लगाने लगा व दुर्घटना स्थिल की जानकारी 108 पर कॉल कर एम्बुलेंस को बुला लिया जिससे उसने अपने साथ साथ दूसरी कार में सवार लोगो की जान भी बचा ली.

आजकल सड़क पर बढ़ता ट्रैफिक लोगों के लिए परेशानी का सबब बनता जा रहा है. आए दिन सड़क दुर्घटनाओं की घटनाएँ सामने आती हैं. लेकिन ऐसी परिस्थिति में घबराने के बजाय हमें सूझबूझ और संयम से काम लेना चाहिए. यदि आप कम चोटिल हुए हैं तो सही कदम तुरंत उठाकर न केवल अपनी, बल्कि दूसरों की जान भी बचा सकते हैं. साथ ही कुछ ऐसी महत्वपूर्ण चीजे है जो आपको हमेशा अपने वाहन में रखनी चाहिए. क्योंकि पहले खुद को सुरक्षित रखना बहुत जरूरी है तभी हम किसी कि मदद कर सकेंगे.ऐसे में कुछ बातों का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है.

क्या करें

1.अपने वाहन में फर्स्ट एड बॉक्स आवश्य रखें जिसमे प्राथमिक उपचार में काम आने वाली चीजे रखना ना भूले जैसे स्टरलाइज़्ड गॉज़ पैड और रोल,एंटीसेप्टिक सॉल्यूशन (जैसे Dettol, Savlon),बैंड-एड और मेडिकल टेप,दर्द कम करने की दवा (पैरासिटामॉल) ,बर्न ऑइंटमेंट (जैसे Burnol),रुई,साफ़ दस्ताने रखें.

2.अपना एक इमरजेंसी नंबर आवश्य रखें.यदि कोई घटना घट जाए तो घट वालो को सूचित किया जा सके.

3.अपने वाहन की समय-समय पर सर्विस अवश्य कराएं, ताकि ब्रेक, लाइट आदि सही स्थिति में रहें. दोपहिया वाहन चलाते समय हमेशा हेलमेट पहनें और चारपहिया वाहन में सीटबेल्ट लगाएँ.

4.यदि किसी कारणवश आपके द्वारा एक्सीडेंट हो जाता है या आप शिकार बन जाते हैं तो घबराएँ नहीं, तुरंत गाड़ी रोकें और इंजन बंद करें.

5. यदि आप गंभीर रूप से चोटिल नहीं हैं तो खुद को और यात्रियों को सुरक्षित स्थान पर ले जाएँ और सामने वाले की भी मदद करें.

6. घायलों को प्राथमिक उपचार दें और तुरंत एम्बुलेंस (108/102) बुलाएँ. साथ ही पास के थाने या 112 नंबर पर सूचना दें.

7.अपने वाहन की इमरजेंसी लाइट/हैज़र्ड लाइट जलाएँ ताकि पीछे से आने वाले वाहन सतर्क हो सकें.

8. दुर्घटना स्थल की फोटो/वीडियो लें ताकि घटना का रिकॉर्ड सुरक्षित रहे.

9. अपनी इंश्योरेंस कंपनी को सूचित करें क्योंकि दावा (Claim) करने के लिए यह आवश्यक है.

10. हमेशा अपने पास आवश्यक दस्तावेज रखें – ड्राइविंग लाइसेंस, आरसी, इंश्योरेंस और पॉल्यूशन सर्टिफिकेट. साथ ही इनकी फोटोकॉपी घर पर भी सुरक्षित रखें.

क्या न करें

1. शांत रहकर स्थिति को संभालें. झगड़े या बहस से बचें.

2. पहले अपने उपचार पर ध्यान दे. आसपास के लोगो खडे लोगो की मदद ले.

3. घायल को गलत तरीके से न उठाएँ, विशेषकर रीढ़ की हड्डी की चोट के मामले में. पेशेवर मदद का इंतज़ार करें.

4. यदि आपने शराब या नशे में गाड़ी चलाई है तो इसे छिपाएँ नहीं. यह गंभीर अपराध है और पुलिस जाँच में साबित हो सकता है.

5. दुर्घटना की जानकारी तुरंत सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के बजाय कानूनी और मेडिकल मदद को प्राथमिकता दें.

6. यदि गलती आपकी नहीं है तो डर में अपनी गलती न मान लें. कानून निर्दोष को सजा नहीं देता.

7. पुलिस और इंश्योरेंस कंपनी को हमेशा सही और पूरी जानकारी दें.

संबंधित मुख्य अधिनियम और धाराएं

भारतीय दंड संहिता (IPC)

धारा 279 – लापरवाही से वाहन चलाना

धारा 304A – लापरवाह वाहन चलाने से मृत्यु होना

धारा 337/338 – लापरवाही से चोट पहुँचाना (साधारण या गंभीर)

मोटर वाहन अधिनियम, 1988 (Motor Vehicles Act)

धारा 134 – चालक का कर्तव्य (घायल को अस्पताल पहुँचाना व पुलिस को सूचना देना)

धारा 187 – दुर्घटना के बाद मदद न करना या भाग जाना अपराध

धारा 146 – थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस का होना अनिवार्य होता है. Road Safety Rules

Law Awareness: पतिपत्नी की मौत – कौन होगा कानूनी वारिस ?

Law Awareness: लखनऊ के महानगर में रहने वाले पति पत्नी कपिल और उन की पत्नी रोमा की मौत उन के ही घर में अचानक हो गई थी. वह दौर कोरोना का था. ऐसे में दूसरे दिन महल्ले वालों के जरीए पुलिस को पता चला. कपिल ने मरने से पहले अपनी कोई वसीयत नहीं की थी. हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत पत्नी प्रथम श्रेणी की वारिस होती है. लेकिन एक साथ मौत होने पर जब यह पता नहीं होता कि पहले कौन मरा तो स्थिति जटिल हो जाती है. इस को ‘कौमोरिएंट नियम’ के आधार पर हल किया जाता है.

कपिल और रोमा के मामले में रोमा ने अपनी वसीयत लिखवा कर रखी थी. वसीयत में रोमा ने अपनी भतीजी प्रभा को वारिस बना रखा था. कपिल और रोमा के अपनी कोई संतान नहीं थी. ऐसे में अगर रोमा की वसीयत सामने नहीं आती और कपिल की मौत बाद में होती तो यह संपत्ति कपिल के दूसरे श्रेणी के वारिसों यानि भतीजों को संपत्ति चली जाती.

कपिल और रोमा की मौत के बाद अचानक सवाल उठा कि जब दो लोगों की एक ही समय पर मृत्यु हो गई है तो संपत्ति का वारिस कौन होता है ? उत्तराधिकार के ऐसे मामलों में सबसे पहले यह देखा जाता है कि पहले किस की मृत्यु हुई थी. जो पहले मरता है उस की संपत्ति बाद में मरने वाले के नाम हस्तांतरित हो जाती है. उस के उत्तराधिकारी के नाम संपत्ति का दाखिला हो जाता है.

कपिल और रोमा के मामले में पहले कपिल की उत्तराधिकारी रोमा मानी जाएगी. इस के बाद रोमा ने जिस को अपनी संपत्ति की वसीयत की उस को इस पर अधिकार होगा. इस तरह के सवाल तब भी खड़े होते हैं जब एक ही परिवार के कई लोग सामूहिक आत्महत्या कर लेते हैं. कई बार सड़क और दूसरे हादसों में मौत हो जाती है. तब ऐसे सवाल खड़े हो जाते हैं. इस में एक सवाल और खड़ा हो जाता है कि जब यह पता ही न चले कि एक साथ मरने वालों में कौन पहले मरा और कौन बाद में तो उत्तराधिकार कैसे तय होगा ?

उत्तराधिकार का निर्धारण संपत्ति कानून अधिनियम 1925 की धारा 184 द्वारा ऐसे मामलों के लिए दिशानिर्देश दिया गया है. यह अधिनियम बताता है कि जब दो व्यक्तियों की एक साथ मृत्यु हो जाती है और यह निर्धारित करना संभव नहीं होता कि पहले किस की मृत्यु हुई, तो छोटे व्यक्ति को बड़े व्यक्ति से अधिक समय तक जीवित माना जाता है. इस को ‘कौमोरिएंट्स नियम’ के नाम से जाना जाता है.

सामान्य तौर पर यदि पतिपत्नी दोनों की मृत्यु हो जाती है, तो बच्चों को मातापिता की संपत्ति पर पूर्ण अधिकार मिलता है. वे प्रथम श्रेणी के वारिस होते हैं. एक साथ मौत होने पर, संपत्ति बच्चों या अन्य निकटतम कानूनी वारिसों में बंट जाती है. संयुक्त संपत्ति के मामले में भी ‘कौमोरिएंट नियम’ के कारण जीवित रहने का अधिकार लागू नहीं होता और संपत्ति बच्चों को मिलती है.

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के तहत यदि किसी हिंदू महिला की बिना वसीयत के मृत्यु हो जाती है तो उस की संपत्ति प्राथमिक रूप से उस के बच्चों और पति को विरासत में मिलती है. यदि पति या बच्चे मौजूद नहीं हैं तो संपत्ति पति के उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित हो जाती है. जिन मामलों में पति का कोई उत्तराधिकारी नहीं हैं संपत्ति महिला के माता पिता या उन के उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित होती है.

जब संपत्ति किसी स्रोत जैसे मातापिता, ससुराल वाले से विरासत में मिलती है और यदि महिला की मृत्यु बिना किसी प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी के हो जाती है, तो वह उस मूल परिवार को वापस मिल जाती है. हिंदू पुरुषों के मामलो में जब किसी हिंदू पुरुष की बिना वसीयत के मृत्यु हो जाती है तो उस की संपत्ति उस की पत्नी, बच्चों और मां के बीच बराबरबराबर बांट दी जाती है. अगर इन में से कोई भी उत्तराधिकारी मौजूद नहीं है तो संपत्ति पिता को मिल जाती है.

वरासत में कौन होते है उत्तराधिकारी:

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत प्रथम श्रेणी यानि क्लास 1 के उत्तराधिकारी सब से करीबी रिश्तेदार होते हैं जिन्हें बिना वसीयत मृत्यु होने पर संपत्ति में सब से पहले और समान हिस्सा मिलता है. इस में मुख्य रूप से विधवा, पुत्र, पुत्री, माता, और पूर्व मृत पुत्र या पुत्री के बच्चे पोतेपोतियां व विधवा शामिल हैं. यह सभी एक साथ संपत्ति के हकदार होते हैं. पुत्र, पुत्री में जैविक और गोद लिए हुए दोनों बच्चे शामिल होते हैं. प्रथम श्रेणी के सभी उत्तराधिकारी संपत्ति में बराबर हिस्सेदारी पाते हैं.

यदि किसी व्यक्ति के प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारी मौजूद नहीं है तो द्वितीय श्रेणी के उत्तराधिकारियों को संपत्ति में हिस्सा मिलता है. द्वितीय श्रेणी यानि क्लास 2 के उत्तराधिकारियो में वह रिश्तेदार होते हैं जो प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों के न होने पर संपत्ति के हकदार होते हैं. इन में मुख्य रूप से पिता, भाई बहन, दादा दादी, चाचा चाची, मामा मामी और इन के बच्चे भतीजे भतीजी, भांजेभांजी, भाई की विधवा, पिता के भाई बहन, माता के भाई बहन आदि शामिल होते हैं. एक श्रेणी के वारिसों के न होने पर ही अगली श्रेणी के वारिसों को संपत्ति मिलती है. यदि एक ही श्रेणी में एक से अधिक वारिस हों, तो वे संपत्ति को आपस में बराबर बांटते हैं.

अगर किसी मामले में पहली और दूसरी श्रेणी के कोई उत्तराधिकारी न हों, तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत संपत्ति मृतक के सगोत्रों को मिलती है. इन में पुरुष वंश के माध्यम से जुड़े रिश्तेदार जैसे चचेरे भाई हैं. इन में यदि सगोत्र भी न हों, तो सजातीयों को मिलती है, जो किसी भी वंश पुरुष या महिला से जुड़े होते हैं. इन में मौसी, मामा, ममेरे भाई बहन शामिल होते हैं. अगर यह भी न हों, तो संपत्ति राज्य के पास चली जाती है. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के तहत पुरुष मृतक के लिए वरासत का क्रम प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी, सगोत्र, सजातीय और राज्य सरकार का होता है. इसलिए यह जरूरी होता है कि लोग अपनी वसीयत कर के रखे जिस से उन के चाहने वालों को संपत्ति मिल सके. Law Awareness

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