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Ekaki Movie : फिल्मों से पैसा कमाने का यूट्यूब मौडल कितना हिट ? “एकाकी” कहीं अकेली न पड़ जाए!

Ekaki Movie : इन्फ्लुएंसर आशीष चंचलानी ने ओटीटी पर अपनी वैब सीरीज ‘एकाकी’ को रिलीज न कर सीधे यूट्यूब पर फ्री में जारी कर दिया है. ऐसा पहले टीवीएफ भी कर चुका है मगर अंत में उसे बड़े ओटीटी प्लेटफौर्म की तरफ जाना पड़ा. अब ‘एकाकी’ का क्या होगा?

इन्फ्लुएंसर आशीष चंचलानी को कौन नहीं जानता. यूट्यूब वीडियो से नाम कमा कर वह अब मूवी व वैब सीरीज में भी दिखने लगा है. कभी मोटा दिखने के चलते ट्रोल हुआ आशीष अपने फिजिकल ट्रांसफौर्मेशन के लिए भी काफी चर्चा में रहा.

म्यूजिक वीडियो बनाने के बाद अब उस की एक सीरीज आई है ‘एकाकी’ नाम से. इस का ख़ास कहीं जिक्र नहीं हुआ. दरअसल, सोशल मीडिया क्रिएटर की जर्नी का पीक पौइंट अगर किसी को जाननासमझना हो तो भुवन बाम, आशीष चंचलानी या मुनव्वर फारूकी जैसे नाम उदाहरण के तौर पर लिए जा सकते हैं.

आशीष से पहले भुवन बाम और मुनव्वर भी अपनी सीरीज ले कर आ चुके हैं. आशीष भी उसी जुगत में है कि कैसे भी कर के वह फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बना पाए. मगर यह रास्ता आसान नहीं. इस पर सिद्धार्थ अरोड़ा सहर ने अपनी टिप्पणी दी है.

सिद्धार्थ ने आशीष की नई सीरीज को ले कर फेसबुक पर कहा, “कोई लेखक, निर्देशक, गायक, गीतकार, संगीतकार या कोई कलाकार, अगर अपने हुनर से पैसा कमाना चाहे तो उसे किसी न किसी के नीचे रह कर, उस की मरजी और उस के मूड के अनुसार काम करना पड़ता है. लेखकों को लगता है कि ऐक्टर मजे में है, ऐक्टर सोचता है डायरैक्टर की मौज है और डायरैक्टर को लगता है कि प्रोड्यूसर की ऐश है.

“पर हक़ीकतन एकएक शख्स दूसरे पर निर्भर है. लेखक कुछ भी लिख दे, जाएगा तो वही जो डायरैक्टर को समझ आएगा, उसे समझ नहीं आया तो फिर कितनी ही सुंदर बात लिखी हो, व्यर्थ है. डायरैक्टर और प्रोड्यूसर्स भी स्टूडियो पर, ओटीटी प्लेटफौर्म पर डिपैंड हैं. वहीं मैं आशीष चंचलानी और इन के जैसे यूट्यूबर्स को देखता हूं तो इन में अपनी आज़ादी भी दिखती है.”

दरअसल सिद्धार्थ आशीष चंचलानी के किसी ओटीटी प्लेटफौर्म पर अपनी सीरीज को न रिलीज किए जाने की बात कर रहे हैं. आशीष ने अपनी सीरीज अपने यूट्यूब चैनल पर रिलीज की है, जिस का एक एपिसोड अभी, 28 नवंबर, तक रिलीज किया गया है और 7.9 मिलियन यानी तकरीबन 79 लाख लोगों ने इसे देख लिया है.

सिद्धार्थ आगे कहते हैं, “लंबे समय से निर्मित ‘एकाकी’ नाम से वैब सीरीज़ आखिरकार अब यूट्यूब पर स्ट्रीम हो गई है. पहले यह फ़िल्म थी, अब सीरीज़ में कन्वर्ट कर दिया गया है इसे. इस को देखने के लिए किसी सब्सक्रिप्शन का लफड़ा नहीं है. इस के प्रोड्यूसर, डायरैक्टर, राइटर और लीड ऐक्टर सबकुछ आशीष ही हैं. मुझे अंदाज़ा है कि 8 एपिसोड भी हों तो एक सीरीज़ बनाने में कितना खर्च आ सकता है. आशीष ने तो प्रोडक्शन वैल्यू में कोई कमी भी नहीं छोड़ी है. फिर भी उन्होंने किसी ओटीटी प्लेटफौर्म को अपनी सीरीज बेच कर चैन की नींद सोने के बजाय डायरैक्ट पब्लिक डोमैन पर फ्री में डालना बेहतर समझा.”

देखा जाए तो आशीष के समकक्ष बाकी इन्फ्लुएंसर ने किसी न किसी तरह से अपनी सीरीज को ओटीटी प्लेटफौर्म पर बेचा है, जैसे भुवन बाम की सीरीज ‘ताजा खबर’ के राइट्स हौटस्टार के पास हैं. वहीं मुन्नवर फारूकी की सीरीज ‘फर्स्ट कौपी’ एमएक्स प्लेयर पर है.

सिद्धार्थ आगे कहते हैं कि आशीष चंचलानी को प्रतिदिन अपनी सीरीज बनाने में मिनिमम खर्च भी ले कर चलें तो भी 10 लाख रुपए आता है. मतलब 50 दिन का मान कर चलें तो 5 करोड़ की लागत तो कम से कम है. व कहते हैं, “अब आप सोचिए, क्या यूट्यूब पर एक सीरीज़ से 5 करोड़ रुपए निकालना आसान है? अगर 3 डौलर आरपीएम भी मिल गया तो हरेक मिलियन व्यूज़ पर 3,000 डौलर्स के आसपास बनेंगे. अब तक 8 घंटे में 4 मिलियन से ज़्यादा व्यूज हो चुके हैं, यानी कम से कम 12,000 डौलर्स का रेवेन्यू बना होगा जो रुपए में 11 लाख के आसपास है.”

इस का मतलब आशीष को सिर्फ पैसे निकालने के लिए 5 लाख डौलर्स की ज़रूरत पड़ेगी, जिस के लिए इस पूरी सीरीज़ पर 180 मिलियन व्यूज़ जाने चाहिए.

सिद्धार्थ सोशल मीडिया और फिल्मों पर अपनी टिप्पणियां करते हैं. वे मोटामोटा हिसाब लगाते हैं कि आशीष का सीरीज को यूट्यूब पर रिलीज करना रिस्की मामला है मगर आशीष ने रिस्क लिया तो वे उस आजादी को भी भोग रहे हैं जो ओटीटी पर बेच कर बाकी क्रिएटर नहीं भोग पाते.

इस में कोई शक नहीं. मगर क्रिएटिव आजादी पैसों के नुकसान पहुंचाने के आधार पर जस्टिफाई नहीं हो पाती. बेशक आशीष ने यूट्यूब पर जाने का फैसला किया वो भी फ्री में दिखाने के, इस से व्यू ही मिल पाएंगे, जो उन के 3 करोड़ फौलोअर्स से खर्चा वसूली संभव नहीं, तब जब मुफ्त में कंटैंट यहांवहां पड़ा हो और फिल्म इंडस्ट्री के लोग लगभग मुफ्त में अपनी फ़िल्में दिखा रहे हों.

देखना यह है कि आशीष का यह मौडल कितना सफल होता है. Ekaki Movie :

Sanchar Saathi App Controversy : सरकारी सुरक्षा या सर्विलांस ?

Sanchar Saathi App Controversy : सरकार के ‘संचार साथी ऐप’ पर सोशल मीडिया पर अलगअलग प्रतिक्रियाएं आने लगी हैं. कई लोग इसे सही कदम बता रहे हैं तो कई इसे सरकारी सर्विलांस कह रहे हैं. आखिर मामला क्या है, जानते हैं.

फोन अब सिर्फ आम लोगों की जरूरत नहीं रह गया है बल्कि यह निजता की सब से बड़ी पहचान भी बन गया है. इंसान अपने निजी जीवन में क्या है, कैसा है, कौन है, इन सब का सटीक जवाब सिर्फ फोन के ही पास है. मगर क्या हो अगर फोन का सारा एक्सेस सरकार के पास हो? है न जौर्ज औरवेल के उपन्यास ‘1984’ जैसी कंपाने वाली बात, जहां बिग ब्रदर लोगों के हर हरकत पर नजर रखता था?

यह बात यहां क्यों कही जा रही है? दरअसल, भारत सरकार के डिपार्टमैंट औफ टैलीकम्युनिकेशन ने एक दिसंबर को भारत में सभी स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनियों के लिए यह निर्देश जारी कर दिया कि अब वे जो भी मोबाइल प्रोड्यूस करेंगी उन में ‘संचार साथी’ ऐप प्रीइंस्टौल कर के देंगी. यानी, अब जो भी मोबाइल आम लोग खरीदेंगे उन में सरकार का ‘संचार साथी’ ऐप इंस्टौल रहेगा.

ख़ास बात यह कि इस के नियमों में सीधेसीधे लिख दिया गया है कि यह ऐसी ऐप होगी जिसे न तो डिलीट किया जा सकता है न ही वह डिसेबल्ड हो सकती है. यानी, खरीदार अब चाह कर भी इसे अपने मोबाइल से हटा नहीं सकता. अब इस पर बहस चल पड़ी है कि कहीं ऐप के जरिए सरकार आम लोगों के निजी जीवन में तो नहीं घुसना चाहती? वे क्या सोचते हैं, क्या करते हैं, क्या खाते हैं, कहां रहते हैं, कहां जाते हैं, किस से बात करते हैं, उन के किस से संबंध हैं, किस से संबंध बनाना चाहते हैं, क्या पौलिटिकल व्यू है? कहीं वह इन सब का डाटा तो अपने पास नहीं रखना चाहती?

इस सवालों को ले कर उचित बवाल मचने के बाद कड़े नियमों से पांव पीछे खींचते हुए संबंधित मंत्रालय के मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने संसद के बाहर ऐप के संबंध में बयान देते हुए कहा कि इसे यूजर द्वारा डिलीट किया जा सकता है. फिर भी, संदेहों के बादल सरकार की मंशा पर घिरते जा रहे हैं.

दरअसल, इस ऐप को सरकारी सर्विलांस से जोड़ कर देखा जा रहा है. विपक्ष का कहना है कि इस के माध्यम से सरकार लोगों का निजी डाटा कलैक्ट करने की फिराक में है. संभव है ऐसा न भी हो मगर सरकार द्वारा लाई गई यह ऐप संशय तो पैदा करती ही है. यदि मान भी लें कि इसे डिलीट किया जा सकता है तो भी कंपनियों पर प्रीइंस्टौल कराए जाने का दबाव समझ से परे है जो आम आदमी के चुनाव के अधिकार का सीधासीधा हनन है. और अगर डिलीट किया जा सकता है तो यह बात चोर भी जानता होगा जो फोन चोरी कर के ऐप ही डिलीट कर दे.

सरकार के दावे

ऐप को ले कर सरकार के कई दावे हैं. सरकार का कहना है कि इसे डिजिटल सुरक्षा और फोन चोरी के मकसद से लाया गया है, जिस पर उस ने कुछ आंकड़े भी बाकायदा अपने पोर्टल पर डाले हैं. उन में मोबाइल ब्लौक के लगभग 42 लाख मामले, ट्रेस के 28 लाख, रिक्वैस्ट के 291 लाख और रिक्वैस्ट रिजौल्व के 255 लाख मामलों का जिक्र है. इस पोर्टल के बाईं तरफ टैलीकौम मिनिस्टर ज्योतिरादित्य सिंधिया की फोटो है और दाईं तरफ राज्य मंत्री पेम्मासनी चंद्रा शेखर की.

ऐप को ले कर पोर्टल के अबाउटरी में लिखा है, ‘संचार साथी, दूरसंचार विभाग की एक जनकेंद्रित पहल है, जिस का उद्देश्य मोबाइल उपभोक्ताओं को सशक्त बनाना, उन की सुरक्षा को मजबूत करना तथा सरकार की जनकेंद्रित पहलों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है. संचार साथी मोबाइल ऐप और वैब पोर्टल (www.sancharsaathi.gov.in) के रूप में उपलब्ध है. संचार साथी विभिन्न जनकेंद्रित सेवाएं प्रदान करता है.

मगर सरकार के सुरक्षा के इन दावों को ले कर लोगों की निजी जानकारियों की असुरक्षा के खतरे की संभावनाएं कम नहीं हो जातीं. सरकार भले इसे साइबर क्राइम की काट बता रही है मगर सवाल यह है कि क्या इस मोबाइल एप्लिकेशन के इंस्टौलेशन को आम जनता पर ही नहीं छोड़ देना चाहिए था? क्या इसे ले कर जन जागरूकता अभिनयान नहीं चलाया जाना चाहिए था? और क्या भरोसा है कि सरकार इस के माध्यम से आम लोगों का डाटा इस्तेमाल न करे?

मंत्रालय ने अपने निर्देश में क्या कहा है ?

  • सभी नए मोबाइल फोन में संचार साथी ऐप प्रीइंस्टौल होगी.
  • जो डिवाइस पहले से ही मार्केट में हैं, उन में ऐप ओएस सौफ्टवेयर अपडेट के ज़रिए इंस्टौल होगा.
  • ऐप का इस्तेमाल चोरी हुए फोन को ब्लौक करने, आईएमईआई असली है या नहीं इसे सुनिश्चित करने और स्पैम कौल को रिपोर्ट करने में किया जाएगा.
  • सरकार का कहना है कि इस ऐप के कारण हजारों गुम हुए मोबाइल फोनों को खोजा जा चुका है.
  • सरकार के इस क़दम का एपल विरोध कर सकता है क्योंकि टीआरआई ने अतीत में ऐसी ही पहल की थी और एपल ने विरोध किया था
  • इस से पहले डीओटी ने कहा था कि सिम बाइंडिंग साइबर अपराध को बंद करने के लिए ज़रूरी है. सिम बाइंडिंग के तहत मैसेजिंग ऐप्स को कहा गया है कि वे इस बात को सुनिश्चित करेंगी कि उन की सर्विस केवल रजिस्टर्ड सिम वाले डिवाइस में ही काम करे.
  • डीओटी के इन निर्देशों को 90 दिनों के भीतर लागू करना होगा और 120 दिनों में रिपोर्ट करना होगा.

क्या है संचार साथी ऐप ?

संचार साथी ऐप सरकारी साइबर सिक्योरिटी टूल बताया जा रहा है. यह ऐप 17 जनवरी, 2025 को मोबाइल ऐप के रूप में पेश किया गया. यह ऐप एंड्रौयड और आईओएस दोनों प्लेटफौर्म्स पर उपलब्ध है. सरकार ने बताया कि अगस्त 2025 तक इस ऐप को 50 लाख से अधिक बार डाउनलोड किया जा चुका है. जैसे मोबाइल में ओला, उबेर, स्विगी, जोमैटो जैसी ऐप हैं वैसे ही यह ऐप है, बस, इस का काम डिजिटल फ्रौड से बचाना है.

यह सीधे सरकार की टैलिकौम सिक्योरिटी प्रणाली से जुड़ी हुई है. दरअसल, सैंट्रल इक्विपमैंट आइडैंटिटी रजिस्टर यानी सीईआईआर केंद्रीय डेटाबेस है, जहां देश के हर मोबाइल फोन का आईएमईआई नंबर दर्ज रहता है.

यह फोन के आईएमईआई नंबर, मोबाइल नंबर और नैटवर्क से जुड़ी जानकारी की मदद से ग्राहक की सुरक्षा सुनिश्चित करता है.

जब ग्राहक इस ऐप को फोन में खोलते हैं, तो सब से पहले यह मोबाइल नंबर मांगता है. नंबर डालने के बाद फोन पर एक ओटीपी आता है, जिसे डाल कर फोन इस ऐप से जुड़ जाता है. इस के बाद ऐप फोन के नंबर को पहचान लेती है.

ऐप ईएमईआई को दूरसंचार विभाग की केंद्रीय सीआईईआर प्रणाली से मिलाती है और यह जांचती है कि फोन की शिकायत चोरी के मामले में दर्ज तो नहीं है या फिर ये ब्लैकलिस्टेड तो नहीं है. यह ऐप हिंदी और 21 अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध है. Sanchar Saathi App Controversy :

IndiGo Controversy : मोनोपोली और मुनाफे की दर्द भरी उड़ान

IndiGo Controversy : इंडिगो की मोनोपौली सरकार के सामने एक चुनौती बन कर खड़ी है. इसी मोनोपौली और मुनाफे के लालच ने लाखों यात्रियों को एयरपोर्ट्स पर बंधक सा बना कर रख दिया. लोग बुनियादी सहूलियतों सहित खानेपीने तक को तरस गए. बच्चों को दूध नसीब नहीं हुआ. और तो और, महिलाओं को सैनिटरी नैपकिन्स भी नहीं मिले. आखिर क्या था झमेला, जानिए आप भी.

वे दो दोस्त थे. दोनों ही विकट के महत्त्वाकांक्षी, उच्च शिक्षित और आम युवाओं की तरह कुछ कर गुजरने का जज्बा और बहुत सा पैसा कमा लेने का सपना देखने वाले थे. उन्होंने अपनी मेहनत और आइडियाज के दम पर अपने सपने को पूरा भी कर दिखाया. इन में से पहले हैं राहुल भाटिया जिन्होंने अपनी 65 साला जिंदगी के शुरुआती 50 साल आम उच्चमध्यवर्गीय की तरह काटे. अगले दशक की शुरुआत उनके लिए बेहद उम्दा रही क्योंकि उन्होंने उड़ने का और रातोंरात पैसा कमाने का अपना ख्वाब पूरा किया. उन्हें जिस दोस्त या पार्टनर की तलाश थी वह मिल गया था जिस का नाम राकेश गंगवाल था.

राहुल ने कनाडा की वाटरलू यूनिवर्सिटी से पहले इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डिग्री ली और फिर बिजनैस मैनेजमैंट की भी डिग्री हासिल करने के बाद 2 साल आईबीएम में नौकरी की. 80 के दशक की शुरुआत में पढ़ाई के बाद उन्हें दिल्ली आ कर अपना टूअर्स और ट्रैवल का पुश्तैनी कारोबार संभालना पड़ा. यह अनुभव बहुत अच्छा नहीं रहा क्योंकि उन के बिजनैस पार्टनर्स ने उन्हें धोखा दिया जिस के चलते उन्हें पुश्तैनी कारोबार से हाथ धोना पड़ा. पर राहुल ने हार नहीं मानी, हिम्मत नहीं हारी और बचेखुचे 15 लाख रुपए से अपनी खुद की कंपनी इंटर ग्लोब नाम से खोल ली जो आईटी, बीपीओ, ट्रैवल ट्रांसपोर्टेशन और हौस्पिटैलिटी सैक्टर्स में काम करती थी. अब यही कंपनी इंडिगो का संचालन करती है.

हालांकि राहुल की इच्छा टीचिंग में जाने की थी लेकिन पिता कपिल भाटिया की गिरती सेहत के चलते उन्हें दिल्ली के सदर बाजार स्थित अपनी ट्रैवल एजेंसी दिल्ली एक्सप्रैस के दफ्तर में बैठना पड़ा. इस से पहले वे भारत में एक टैलीकौम कंपनी शुरू करने की सोचा करते थे लेकिन 2006 में उन्होंने खोल ली एयरलाइंस कंपनी जिस का नाम रखा इंडिगो.

साल 2000 में राहुल की मुलाकात उन्हीं के हमउम्र राकेश गंगवाल से हुई जो मूलतया कोलकाता के एक संपन्न जैन परिवार से थे. राकेश आईआईटी कानपुर के पासआउट थे. इस के बाद उन्होंने पेन्सिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के व्हार्टन स्कूल से एमबीए किया. पढ़ाई के बाद वे अमेरिका की यूनाइटेड एयरलाइंस कंपनी में काम करने लगे थे. कई और कंपनियों में भी अहम पदों पर वे रहे और उस दौरान खासा पैसा व नाम कमाया. इंडिगो की स्थापना के बाद वे अमेरिका में ही बस गए थे. साल 2020 की 400 रईसों की फोर्ब्स लिस्ट में उन्हें 359वीं रैंकिंग मिली थी

एक और एक ग्यारह से बनी इंडिगो

दोनों मिले और कई दिन व रात सिर खपा कर इंडिगो की रूपरेखा तैयार की. दोनों के सिर पर जनून सवार था. दोनों के ही पास एविएशन का खासा अनुभव था जिस के चलते 2005-06 में इंडिगो वजूद में आई और देखते ही देखते आसमान पर छा गई. राकेश के पास ग्लोबल एयरलाइंस का तजरबा था. वे एक बेहतर प्रबंधक भी थे और राहुल के पास एविएशन सेवाओं के साथसाथ गजब की बिजनैस स्किल थी. अपनी ट्रैवल एजेंसी में फ्लाइट के टिकट बुक करतेकरते वे भारतीय ग्राहक की नब्ज समझने लगे थे.

यह वह दौर था जब एकएक कर भारतीय एयरलाइंस दम तोड़ रही थीं या खस्ता हाल में थीं जिन की हालत देख भारत को एयरलाइंस का कब्रिस्तान तक कहा जाने लगा था. इन में प्रमुख थीं किंगफिशर एयरलाइंस, एयर डेक्कन, जेट एयरवेज, स्पाइसजेट, एयर सहारा और गो एयर (गो फर्स्ट). लेकिन उसी दौर में घरेलू यात्रियों की तादाद बढ़ भी रही थी. सो, इन दोनों ने शुरू में मुनाफे के बजाय सर्विस पर ज्यादा फोकस किया.

इंडिगो की उड़ानें दूसरी कंपनियों के मुकाबले सस्ती थीं और वक्त की पाबंदी इस की पहचान बन गई थी. वक्त के साथ यह पहचान इतनी गहराई कि आकाश में इंडिगो के सिवा किसी और एयरलाइंस का दिखना दिखावाभर रह गया था. सब की हालत कच्ची लोई (बच्चों के पिट्ठू जैसे खेल में कमजोर खिलाड़ी) सरीखी हो गई थी.

यह राकेश के ही दिमाग की खूबी कही जाएगी कि उन्होंने शुरुआत में एक ही तरह के हवाई जहाज ए-320 ही खरीदे. इस से मेंटिनैंस, ट्रेनिंग और संचालन खर्च अपेक्षाकृत कम हुए. उड़ानों के वक्त का खास ध्यान रखा गया जिस से 2010 तक इंडिगो देश की शीर्ष एयरलाइंस में शुमार होने लगी. हालांकि 2006 में ही कंपनी ने 100 एयरबस खरीद ली थीं लेकिन 2011 से ले कर 2015 तक अपने सुनहरे काल में इंडिगो ने धड़ाधड़ एयरबसें खरीदीं. इस से हरकोई हैरान रह गया था. उसी साल कंपनी ने अमेरिका की एक कंपनी से एकसाथ 180 एयरबसें खरीद कर दुनियाभर को चौंका दिया था.

साल 2015 में इंडिगो ने शेयर मार्केट में कदम रखा और एक बार फिर देखते ही देखते की तर्ज पर 3,000 करोड़ रुपए जुटा लिए जो भारतीय एविएशन के सब से कामयाब आईपीओ में शामिल था. बेकार के प्रचार और शोरशराबे खासतौर से मीडिया से तयशुदा दूरी बना कर चलने वाली इस जोड़ी ने बिना किसी तरह की बौखलाहट या जोश दिखाए यात्रियों यानी अपने ग्राहकों से नजदीकी बनाए रखी जो किसी भी कारोबार की कामयाबी की कुंजी होती है.

2015 आते-आते इंडिगो भारत की नंबर वन एविएशन कंपनी बन चुकी थी जिस का मुनाफा और ग्राहक ‘दिन दोगुनी रात चौगुनी’ की दर से बढ़ते जा रहे थे. दिसंबर 2025 में उस के बेड़े में 434 हवाई जहाज थे और एक दिन में वे 2,300 उड़ानें भर रहे थे. तब उस के पास 5,456 पायलट और 10,212 क्रू मैंबर्स थे और कर्मचारियों की कुल संख्या 41 हजार से भी ज्यादा थी. इन सब के चलते उस की उड़ानों की तादाद और विश्वसनीयता बढ़ती जा रही थी.

रो दिए लोग

इंडिगो की इस विश्वसनीयता को दिसंबर के पहले दिन से ही जो झटका लगना शुरू हुआ उस ने न केवल एयरपोर्ट्स बल्कि आमजन की जिंदगी और घरों में भी हलचल व हाहाकार मचा दिया. हर कोई इंडिगो को कोस रहा था. सरकार सफाई दे रही थी, कार्रवाई करने के साथ-साथ धौंस भी दे रही थी और इन सब के ऊपर बैठी अदालत सब के कान उमेठ रही थी. इन सब में सब से डीजीसीए यानी डायरैक्टर जनरल औफ सिविल एविएशन नाम की एजेंसी अहम थी जो नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अधीन काम करती है जिस का एक बड़ा काम फ्लाइट्स की सुरक्षा और एविएशन कंपनियों के कामकाज की निगरानी का है. मीडिया इंडिगो की खबरों से सटा पड़ा था. साल के आखिरी महीने में सबसे ज्यादा बोला, लिखा और सुना जाने वाला शब्द था इंडिगो.

भारतीय ही नहीं, अब दुनियाभर की एयरलाइंस समझ चुकी हैं कि ग्राहकों की जरूरतों को वे पूरा कर रही हैं और वे हर देश की रेलवे कंपनी की तरह धौंस से काम करती हैं. भारतीय रेलवे का हाल तो सभी को मालूम है. एसी फर्स्ट क्लास से ले कर जनरल बोगी तक का हर मुसाफिर असल में बेचारा होता है. ट्रेनों के संकरे कौरिडोर, मैले व छोटे बाथरूम, उन की छोटी सीटों की नीति को एयरलाइनों ने अपना लिया है.

एयरलाइनों ने रेल या बसों के टिकटों को ब्लैक में बेचने का पाठ भी पढ़ लिया है और उन्होंने एक ही उड़ान की कुछ सीटों के टिकट कम दाम में बेच कर शेष सीटों के लिए ज्यादा, उस से ज्यादा और बेहद ज्यादा दामों पर टिकट बेच कर खासी कमाई करनी शुरू कर दी, इस में इंडिगो पीछे नहीं रही बल्कि एक कदम आगे रही.

एक्स्ट्रा लगेज के पैसे, विंडो सीट के पैसे, 2 जने साथ बैठ सकें तो एक्स्ट्रा चार्ज, केबिन में सीमित सामान ले जाने की शर्तें, खाने के मनमाने पैसे आदि के नाम पर भी वसूली कर एयरलाइनें हवाई मुसाफिरों की जेबें ढीली करने में लिप्त हैं.

फिर भी ग्राहक संतुष्ट क्योंकि वे अपने को रेल से सफर करने वालों से बेहतर समझते हैं. हवाई यात्रा के लिए एक पूरी वर्णव्यवस्था बना दी गई. तरहतरह के कार्ड दे कर एक ही वर्ण में ऊंचे और नीचे के भेद पैदा कर दिए गए. जैसे वर्णव्यवस्था ने देश का भट्टा बैठा रखा है वैसा ही 2 दिसंबर को हुआ जब एक सरकारी आदेश को न मानने के लिए बोर्ड ने फ्लाइट्स कैंसिल करनी शुरू कर दीं. वे चाहते तो पहले से टिकट बेचना बंद कर सकते थे लेकिन उन्हें सरकार के डीजीसीए और एविएशन मिनिस्टर को सबक सिखाना था.

वे यात्रियों को एयरपोर्टों पर ले आए और फिर फ्लाइट्स कैंसिल करनी शुरू कीं ताकि एक अजब तमाशा खड़ा हो जाए. बोर्ड सफल रहा. डीजीसीए ने आदेश वापस ले लिया. कुछ दिखावे की डांटफटकार लगाई गई पर इंडिगो ने अभी तो साबित कर दिया है कि उसे छुआ तो जनता के साथ वह आतंकवादी सुलूक कर सकती है. जिस सरकार ने हाल ही में इंडिया एयरलाइंस और एयर इंडिया टाटा कंपनी को बेची हो उस की हिम्मत यह कहां कि वह इंडिगो को नैशनलाइज कर दे.

जिस इंडिगो के हवाई जहाजों में देश के आधे से ज्यादा हवाई मुसाफिर सफर कर रहे थे उन की हालत देखने काबिल थी. दरअसल, हुआ क्या, यह किसी को समझ नहीं आ रहा था लेकिन एयरपोर्ट्स पर फंसे लोगों की हालत बंधकों जैसी हो गई थी. लग ऐसा रहा था मानो उन्हें अगवा कर लिया गया हो और ऐसी जगह छोड़ दिया गया हो जहां नाममात्र की भी सहूलियत न हो. लोग भूखेप्यासे घंटों फ्लाइट का इंतजार करते रहे. फ्लाइट नहीं मिली तो कुछ लटका सा मुंह लिए घर वापस लौट गए.

चूंकि फ्लाइट्स रीशैड्यूल की जा रही थीं इसलिए जिन्हें फ्लाइट मिलने की उम्मीद थी. वे कड़कड़ाती सर्दी में एयरपोर्ट पर ही बिना किसी कंबल या लिहाफ के देहातियों की तरह सो गए थे. कई एयरपोर्ट्स का नजारा तो रेलवे स्टेशन और बसअड्डों के मुसफिरखानों सरीखा था. खाना नहीं, पानी नहीं. भूख से कुलबुलाते बच्चों के लिए दूध नहीं. महिलाएं तो सैनिटरी नैपकिन्स तक के लिए तरस गईं.

कुछ युवतियों ने इस के वीडियो भी वायरल किए. बेंगलुरु एयरपोर्ट पर से तो एक पिता को हवाई अड्डे की फार्मेसी से नैपकिन न मिलने पर वीडियो के जरिए अपनी बेटी के लिए सैनिटरी नैपकिन की गुहार लगानी पड़ी थी. वे कहते नजर आ रहे थे, ‘मेरी बेटी को सैनिटरी नैपकिन चाहिए, नीचे से ब्लड गिर रहा है.’ यह बहुत ही शर्मसार कर देने वाला नजारा था.

दिल्ली एयरपोर्ट सहित सभी एयरपोर्ट्स पर सूटकेस और बैग वगैरह बिखरे पड़े थे मानो कोई बड़ी लड़ाई या हादसा हो कर गुजरा हो. हकीकत में स्थिति थी भी ऐसी ही. परेशानी भूख-प्यास की ही नहीं थी बल्कि कई जरूरी और अहम कामों के छूट जाने की भी थी. किसी को परीक्षा में शामिल होने को जाना था तो कोई अपने किसी बीमार सगे वाले से मिल लेना चाहता था या खुद इलाज कराने जाने वाला था. किसी के हाथों में पिता का अस्थि कलश था. एक महिला के पास तो पति का ताबूत था. कईयों की जरूरी मीटिंग्स छूट रही थीं.

हद तो उस वक्त हो गई जब एक वायरल वीडियो में एक दूल्हा यह कहता नजर आया कि मेरी तो शादी होनी थी, मैं अपनी ही शादी में नहीं पहुंच पाया. इसी तरह एक कपल ने अपनी ही शादी के रिसेप्शन में शामिल होने से नहीं पहुंच पाने का रोना रोया. एक वायरल वीडियो में एक युवक यह अपील करता नजर आया कि ‘मैं यहां एयरपोर्ट पर फंसा हूं, कोई मेरे बौस को बता दे वरना वे मुझे नौकरी से निकाल देंगे.’

ऐसी कई परेशानियां लोगों ने झेलीं लेकिन उन की भड़ास ‘इंडिगो हायहाय’ तक सिमट कर रह गई. लोग समझतावादी हो गए हैं या डरपोक हो गए हैं, यह तय कर पाना अब मुश्किल काम नहीं रहा. उन्हें तो हाहाकार मचा देना चाहिए था क्योंकि उन की तकलीफ दूर करने के लिए कोई इंडिगो, कोई सरकार या कोई डीजीसीए के प्रतिनिधि आगे नहीं आ रहे थे. ये सब के सब वातानुकूलित बिल्डिंगों में बैठे मीटिंग-मीटिंग खेल रहे थे और जल्द ही कुछ करने का झठा आश्वासन दे रहे थे.

जल्द ही कोढ़ में खाज वाली कहावत भी चरितार्थ होती दिखी जब यात्रियों ने वैकल्पिक फ्लाइट्स देखनी शुरू कीं. यह देख वे फिर सकते में आ गए कि हवाई उड़ानों के दाम आसमान को छू रहे थे जो टिकट आमतौर पर 4 से 7 हजार रुपए का मिलता है वह 40 से ले कर 80 हजार रुपए तक का हो गया है. अधिकतर यात्रियों ने जब किराया वापसी की कोशिश की तो पता चला कि इंडिगो ने रिफंड का विकल्प ही नहीं छोड़ा है.

तब कहीं जा कर लोगों को ज्ञान प्राप्त हुआ कि वे मुनाफे और मोनोपोली के चक्रव्यूह में फंस कर रह गए हैं जिस की पहली जिम्मेदार इंडिगो एयरलाइंस और दूसरी सरकार है. इस गुनाह के तीसरे गुनाहगार डीजीसीए के बारे में आम लोगों को कोहरा छंट जाने के बाद पता चला जिस की गलती इन दोनों के मुकाबले कमतर नहीं थी, जो बहुत बड़ी मिलीभगत की तरफ भी इशारा कर रही थी.

कौन कितना जिम्मेदार?

2 दिसंबर से मची इस अफरातफरी के पीछे की दास्तां किस्तों में उजागर होनी शुरू हुई. इंडिगो ने रोना रोया कि डीजीसीए द्वारा लागू किए नए नियमों के चलते उस के पास पायलट्स और क्रू मेंबर्स की कमी हो गई थी, इसलिए हड़ताल सरीखे हालात पैदा हुए लेकिन यह दलील निहायत ही बेदम और बचकानी थी. दरअसल, पायलटों को आराम देने की गरज से एफडीटीएल यानी फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन के संशोधित नियमों के तहत जो प्रावधान किए गए थे उन के मुताबिक पायलटों को दिए जाने वाले साप्ताहिक आराम का समय 36 से बढ़ा कर 48 घंटे कर दिया गया था. अभी तक पायलट 6 नाइट लैंडिंग करते थे जिन की संख्या घटा कर 2 कर दी गई थी. ऐसे दर्जनभर छोटे-बड़े बदलाव एफडीटीएल ने किए थे.

नतीजा यह हुआ कि नियमित ड्यूटी बजा रहे पायलट इन नए नियमों का पालन करते हुए घर चले गए और इंडिगो के आधे से ज्यादा हवाई जहाज एयरपोर्ट्स पर खड़े रह गए. एक के बाद एक उस की फ्लाइट्स रद्द होनी शुरू हुईं तो 10 दिसंबर तक जो हाय-तोबा मची, अराजकता फैली वह देश सहित पूरी दुनिया ने देखी लेकिन नए नियमों का पालन करने में दिक्कत सिर्फ इंडिगो को ही क्यों हुई, दूसरी एयरलाइंस कंपनियों को क्यों नहीं हुई? इस सवाल का इकलौता जवाब है मोनोपोली.

संशोधित नियम 2 चरणों में लागू किए जाने थे. पहले जुलाई और फिर इस के बाद नवंबर 2025 में लेकिन इंडिगो ने, साफ दिख रहा है, इसके लिए कोई तैयारी नहीं की थी और दिख यह भी रहा है कि ऐसा जानबूझ कर किया गया था.

तैयारी क्यों नहीं की थी जबकि उस के पास मुकम्मल वक्त था क्योंकि नए नियमों का आदेश जनवरी 2024 को ही जारी हो चुका था? जाहिर है, यह सरासर सरकार को चैलेंज था और इसी साल अप्रैल में आए दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश की भी अनदेखी थी जो पायलटों को आराम देने संबंधी एक लंबे मुकदमे के बाद आया था. हैरत की बात यह भी रही कि इस बाबत इंडिगो ने यात्रियों को कोई सूचना देनी भी जरूरी न समझ. यह उस की बादशाहत यानी एकाधिकार की बदमाशी भी थी और मिसाल भी कि हम तो आसमान के राजा हैं, हमारा कोई क्या बिगाड़ लेगा.

और सचमुच इंडिगो का कुछ खास नहीं बिगड़ा और न ही बिगड़ता दिख रहा. मामला अदालत तक गया जहां कार्रवाई तो हुई लेकिन वह उन लाखों यात्रियों के जख्म नहीं भर पाई जो उन्हें एयरपोर्ट्स पर मिले थे. इन घावों का जिक्र 10 दिसंबर को दिल्ली हाईकोर्ट में दायर हुई एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान हुआ जिसे उत्कर्ष शर्मा और अखिल राणा ने दायर किया था.

अदालत ने यात्रियों की परेशानियों को गंभीरता से लेते सख्त रवैया अपनाया. इस कार्रवाई में अदालत का गुस्सा सरकार पर ज्यादा फूटा. चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और तुषार राव गेडेला की बेंच ने सरकार को कटघरे में खड़ा करते वही सवाल पूछा जो लाखों यात्री और करोड़ों लोगों के दिलो-दिमाग में 2 दिसंबर से कौंध रहा था कि आखिर हालात इतने बिगड़ने कैसे दिए कि देशभर के एयरपोर्ट्स पर लाखों यात्री फंस गए. इस से केवल यात्रियों को ही परेशानी नहीं हुई बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी खासा नुकसान पहुंचा.

हाईकोर्ट ने यह सवाल भी उठाया कि जब इंडिगो की फ्लाइट्स कैंसिल हुईं तब दूसरी एयरलाइंस ने टिकट के दाम 5 हजार से बढ़ा कर 30 से 35 हजार रुपए कैसे कर दिए. सरकार ने इस पर क्या किया, अगर यह संकट था तो दूसरी एयरलाइंस को इस का फायदा उठाने की इजाजत कैसे दी गई?

साफ दिख रहा है कि दोषी सरकार भी बराबरी से है जो परेशानी के वक्त मूक दर्शक बनी एयरपोर्ट्स पर होता दुखदायी तमाशा देखती रही मानो कोई देवता अपने भक्तों के सब्र का इम्तिहान ले रहा हो. जाहिर यह भी हुआ कि उस का कोई नियंत्रण किसी एविएशन कंपनी पर नहीं है. लोग मरेंलुटें, तरह-तरह की परेशानियाँ और तनाव झेलें या त्राहि-त्राहि करें, महिलाएं सेनेटरी नैपकिन जैसी जरूरी चीज को, दुधमुंहे बच्चे दूध को तरस जाएं, सरकार को इन सब से कोई सरोकार नहीं.

सरकार सिर्फ बयानबाजी करती है, बाकी न्याय तो अदालतों में ही होता है जिस की अपनी सीमाएं हैं वरना होना तो यह चाहिए था कि राहुल भाटिया को एक मुजरिम की तरह अदालत में पेश होने को मजबूर किया जाता तब उसे एहसास होता कि परेशानी होती क्या है. सरकार की तरह वह भी माफी मांगते लकीर पीटता रहा. अकड़, ठसक और गरूर की यह हद कि माफी भी खुद उस ने अपने मुंह से नहीं मांगी, इस के लिए उस ने इंडिगो के सीईओ पीटर एल्बर्स को आगे कर दिया.

चोर की दाढ़ी में तिनका वाली कहावत की तर्ज पर न तो इंडिगो की पैरवी कर रहे वकील संदीप सेठी के पास कोई जवाब था और न ही सरकार का पक्ष रख रहे एएसजी चेतन शर्मा सिवा रिरियाने के कुछ कह पाए. इन दोनों के पास दलीलों के नाम पर वे सूचनाएं भर थीं जो मीडिया के जरिए जनता की अदालत तक पहुंच चुकी थीं. मसलन यह कि सरकार ने इंडिगो को कारण बताओ नोटिस दे दिया है और यह संकट कई नियमों के उल्लंघन के कारण पैदा हुआ वगैरह-वगैरह.

संदीप सेठी के पास तो देने के लिए सूचनाएं भी नहीं थीं. वे बेहद बचकाने तरीके से रहम की गुहार लगाते नजर आए, मसलन यह कि हम 19 साल से संचालन कर रहे हैं. पहली बार ऐसी स्थिति बनी. सो, इंडिगो के खिलाफ कोई फैसला नहीं आना चाहिए. यह संकट अनपेक्षित वजहों के चलते पैदा हुआ. 10 साल से हम दक्षिण एशिया में भी सर्वश्रेष्ठ एयरलाइन हैं.

यह कुछ-कुछ ऐसा ही तर्क था कि चूंकि हम ने जिंदगी का बड़ा हिस्सा शराफत से जिया है इसलिए हमें एकाध गुनाह करने की छूट दी जाए. उम्मीद के मुताबिक, अदालत ने इन बचकानी दलीलों से कोई इत्तफाक न रखते हुए इंडिगो को निर्देश दिए कि वह पीड़ित यात्रियों को तुरंत मुआवजा देना शुरू करे जो केवल उड़ान रद्द होने के कारण नहीं बल्कि यात्रियों की असुविधा के एवज में भी होना चाहिए.

11 दिसंबर को इंडिगो ने दानवीरता दिखाते ऐलान कर दिया कि वह पीड़ित यात्रियों को 10 हजार रुपए की कीमत के वाउचर यानी कूपन देगी जिन्हें एक साल तक इंडिगो की किसी भी फ्लाइट में इस्तेमाल किया जा सकता है. हालांकि, ये कूपन डीजीसीए के पैमानों के तहत अनिवार्य मुआवजे के अलावा होंगे, अनिवार्य मुआवजा यानी 24 घंटे के भीतर फ्लाइट रद्द होने पर इंडिगो यात्रियों को 3 से ले कर 10 हजार रुपए तक की राशि देगी.

बनिए-बक्कालों की तरह पेश आ रही इंडिगो ने यहां भी पैसा बचाया क्योंकि कूपनों का फायदा बमुश्किल 25 फीसदी यात्री ही उठा पाएंगे. ये कूपन भी जोमैटो और स्वीगी के डिस्काउंट कूपनों की तरह हैं जो 3, 4 और 5 दिसंबर तक के पीड़ित यात्रियों के लिए ही हैं. उस में भी टर्म्स एंड कंडीशंस लागू होने की तर्ज पर कई शर्तें छिपी हैं जिन में से प्रमुख हैं कूपन राशि ब्लॉक टाइम पर निर्भर रहेगी. यानी, अब भी इंडिगो की फ्लाइट्स में सफर करना मजबूरी हो जाएगी क्योंकि ये कूपन किसी और को ट्रांसफर नहीं किए जा सकते और ये टैक्स फ्री भी नहीं हैं.

बनियाई किस्म की धूर्तता भी इस में यह रही कि इंडिगो ने यह नहीं बताया कि इस के हकदार कौन लोग होंगे. साथ ही, उन यात्रियों को क्या दिया जाएगा जिन्होंने मजबूरी में दूसरी एयरलाइंस के भारी-भरकम कीमत के टिकट खरीद कर यात्रा की. फिर मानसिक, शारीरिक और दीगर परेशानियों की तो बात करना ही बेकार है.

खुले तौर पर इस खेल में डीजीसीए और सरकार भी शामिल नजर आते हैं जिन्होंने इस भ्रामक पेशकश पर चुप्पी साधे रखी. अब अदालत का रुख ही तय करेगा कि क्या आम लोगों के कष्ट की कीमत ऊंट के मुंह में जीरे की सी ही रहेगी.

जब सभी इन कूपनों का इस्तेमाल करने जाएंगे तो उस दिन इंडिगो की उड़ान का दाम क्या होगा, यह उस समय तक पता नहीं चल सकता जब टिकट की बुकिंग शुरू न की जाए. कोई भी एयरपोर्ट तक जाने का खर्च, होटल का खर्च वैसे ही तो नहीं उठाएगा.

यह भी संभव है कि उस समय इंडिगो की वेबसाइट कह दे कि इस फ्लाइट पर कूपन मान्य नहीं है, कोई और दिन, कोई और शहर चुन लें. सो, यह कूपन रोती आंखों में और ज्यादा आंसू भी ला सकता है.

अब क्या होगा?

जांच चल रही है, रिपोर्ट जब आएगी तब आएगी. इंडिगो का कुछ खास बिगड़ेगा, ऐसा लग नहीं रहा क्योंकि उस ने 13 वर्षों में यात्रियों से खरबों रुपए कमाए हैं. उस की मौजूदा नैटवर्थ 2 लाख 28 हजार करोड़ रुपए है. इस में से दो-चार फीसदी चला भी जाए तो उस की आर्थिक सेहत पर फर्क पड़ने वाला नहीं. यह तो कभी वह किराया बढ़ा कर वसूल लेगी और पूरे यकीन से कहा जा सकता है कि तब भी कोई कुछ नहीं बोलेगा क्योंकि लोग जल्द ही भूल जाने की बीमारी से ग्रस्त हो चुके हैं.

इस संकट के बाद एविएशन इंडस्ट्री से जुड़े लोगों को राकेश गंगवाल की याद बेवजह नहीं आई जो राहुल भाटिया से नीतिगत मतभेदों के चलते न केवल नाता तोड़ चुके हैं बल्कि मई 2025 तक अपने 37 फीसदी शेयर बेच कर कोई 30,000 करोड़ रुपए ले चुके थे. उन का इंडिगो से नाता टूट चुका था लेकिन इस से पहले 2019 में उन्होंने इंडिगो के कुप्रबंधन और मनमानी को ले कर सेबी को लिखी एक चिट्ठी में लिखा था, ‘इंडिगो अपने सिद्धांतों और मूल्यों से भटक चुकी है.

‘एक पान की दुकान इस से बेहतर तरीके से मामलों को सुलझ सकती है. राहुल भाटिया का इंडिगो पर असामान्य नियंत्रण हो चुका है और अगर तुरंत ऐक्शन नहीं लिए गए तो नतीजे दुर्भाग्यपूर्ण होंगे.’ और अब लाखों लोगों के साथ दुर्भाग्य से ऐसा हुआ भी.

अमेरिका में बैठे राकेश को मुमकिन है 20 साल पहले के वे दिन याद आ रहे हों जब उन्होंने इंडिगो की नींव रखते कंपनी में मिलिट्री सा अनुशासन प्राथमिकता में रखा था. इस अनुशासन और प्रबंधन के चिथड़े अगर उड़े तो उस में राहुल की मुनाफा कमाऊ मानसिकता थी जिसके चलते उन्होंने वक्त पर पायलटों की संख्या नहीं बढ़ाई और अरबों रुपए बचा लिए.

एक पायलट की सैलरी ट्रेनिंग के दौरान एक से दो लाख रुपए और सीनियरिटी के मुताबिक 15 लाख रुपए तक होती है. इंडिगो ने पायलट क्यों नहीं बढ़ाए, यह सवाल न कभी सरकार ने पूछा और न ही उस सहित कभी डीजीसीए ने नवंबर के पहले जानने की कोशिश की. उलटे, इंडिगो को 26 फरवरी तक की छूट नए नियमों में दे दी. इसे मिलीभगत नहीं तो और क्या कहा जाए. IndiGo Controversy :

Tere Ishq Mein Movie Review : “मसाले के साथ-साथ इमोशंस और ड्रामा भरपूर”

Tere Ishq Mein Movie Review : इश्क पर बौलीवुड में सैकड़ों फिल्में बन चुकी हैं. इश्क का जनून सभी फिल्मों में दिखाया गया है. कभी इश्क आंखों में छिपा दर्द बन कर दिखा तो कभी इश्क में प्यार और गुस्सा देखने को मिला. कभी इश्क में प्रेमीप्रेमिका दीवानों की तरह पागल हो जाते हैं तो कभी इश्क में वे मरनेमारने पर उतर आते हैं. उर्दू शायरी में ‘इश्क’ के महत्त्व को दर्शाया गया है. दो दिलों के धड़कने का नाम है इश्क, जज्बातों की आंधी है इश्क, एकदूसरे की चाहत में कुछ कर गुजरने का जज्बा है इश्क. बौलीवुड में इश्क पर बनी फिल्में बरसों तक याद रह जाती हैं.

अब तक इश्क पर आई सैकड़ों फिल्मों में एक और फिल्म जुड़ गई है ‘तेरे इश्क में’. यह हिंदी में बनी म्यूजिकल रोमांटिक ड्रामा फिल्म है. इस का निर्देशन आनंद एल रौय ने किया है. आनंद एल रौय रोमांटिक फिल्में बनाने के लिए प्रसिद्ध हैं. उन्हें 2011 में बनी रोमांटिक कौमेडी ड्रामा ‘तनु वेड्स मनु’ और इस के सीक्वल तथा 2013 में बनी ‘रांझणा’ के निर्देशन के लिए जाना जाता है. इस के अलावा कई पारिवारिक कौमेडी ड्रामा फिल्मों का भी उन्होंने निर्देशन किया है.

‘तेरे इश्क में’ एक लव स्टोरी है, जो जनूनी आशिकी और मरमिटने वाली मोहब्बत की दास्तान सुनाती है. इश्क की इसी तरह की दास्तान वे ऐक्टर धनुष के साथ फिल्म ‘रांझणा’ में दिखा चुके हैं. इस फिल्म के ‘मैं प्यार में पड़ गया तो दिल्ली फूंक दूंगा’ जैसे संवाद अग्रिम पंक्ति के दर्शकों को बहुत पसंद आ रहे हैं.

कहानी दिल्ली विश्वविद्यालय की है. विश्वविद्यालय के छात्रसंघ का अध्यक्ष शंकर (धनुष) अपने गुस्सैल और दबंगई के कारण कालेज में कोई न कोई कांड करता रहता है. उसी कालेज में पढऩे वाली मुक्ति देनी वाली एक रिसर्च स्कौलर है. समझदार मुक्ति अपनी रिसर्च द्वारा यह साबित करना चाहती है कि हिंसक इंसान के स्वभाव को भी बदला जा सकता है.

वह शंकर से दोस्ती बढ़ाती है. शंकर को उस से प्यार हो जाता है. अब शंकर का गुस्सा कम होने लगता है. मुक्ति का प्यार पाने के लिए वह खुद में बदलाव लाता है. मगर जब उसे पता चलता है कि मुक्ति उस से प्यार नहीं करती तो वह दुनिया को जला देने का आतुर हो जाता है. 7 साल बाद मुक्ति और शंकर जब मिलते हैं तब मुक्ति भी शंकर के इश्क में पूरी तरह डूब चुकी थी. उसे शंकर से इश्क हो गया था.

फिल्म की यह कहानी काफी दिलचस्प है. कहानी में मसाले के साथसाथ इमोशंस और ड्रामा भरपूर हैं. धनुष के जनून और कृति सेनन के प्यार ने ‘रांझणा’ वाले इश्क को दोहराया है. धनुष और कृति सेनन की कैमिस्ट्री ताजीताजी मोहब्बत जैसी लगती है. फिल्म के कई सीन पावरफुल हैं, जो दर्शकों को कुरसी से बांधे रखते हैं.

जैसेजैसे कहानी आगे बढ़ती है, प्रेम कहानी में जनून की आग दिखने लगती है. मध्यांतर से पहले 2 विपरीत पृष्ठभूमि से आए नायकनायिका के बीच का टकराव, प्यार का पागलपन, दिल टूटना, मोहब्बत की हदें पार करना दिखाया गया है जबकि मध्यांतर के बाद कहानी बिखरने लगती है.

फिल्म थोड़ी और छोटी होती तो ठीक था. तकनीकी दृष्टि से फिल्म अच्छी है. कैमरावर्क बढ़िया है. ए आर रहमान से उम्मीदें ज्यादा थीं मगर ‘तेरे इश्क में…’ और ‘जिगर ठंडा…’ जैसे गाने ही याद रह पाते हैं.

धनुष और कृति सेनन दोनों ने बढिय़ा अभिनय किया है. मोहम्मद जीशान अय्यूब ने दिल जीत लिया है. प्रकाशराज और पैन्यूली ने भी अपनेअपने किरदार बढ़िया ढंग से निभाए हैं. Tere Ishq Mein Movie Review :

Dhurandhar Movie Review : “हिंसा, राष्ट्रवाद और गाली-गलौज से भरी”

Dhurandhar Movie Review : ‘धुरंधर’ भारतीय सेना के दिवंगत मेजर मोहित शर्मा पर आधारित समझी जा रही है. वे 1978 से 2009 तक भारतीय सैन्य अधिकारी रहे, जिन्हें मरणोपरांत भारत के सैन्य सम्मान ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया गया था. 21 मार्च, 2009 को जम्मूकश्मीर के कुपवाड़ा सैक्टर के हकरुदा जंगल में हुई मुठभेड़ में उन्होंने 4 आतंकवादियों को मार गिराया था.

2019 में दिल्ली मैट्रो रेल कौर्पोरेशन ने गाजियाबाद में राजेंद्र नगर स्टेशन का नाम बदल कर मेजर मोहित शर्मा राजेंद्र नगर मैट्रो स्टेशन कर दिया. इस फिल्म को आदित्य धर ने निर्देशित किया है. जिस ने फिल्म ‘उरी : द सर्जिकल स्ट्राइक’ फिल्म के निर्देशन के साथसाथ कई फिल्मों की पटकथा भी लिखी है. वह अभिनेत्री यामी गौतम का पति है.

यह एक ऐक्शन थ्रिलर फिल्म है. यह फिल्म भारत की खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रा) के कराची, पाकिस्तान के ल्यारी इलाके में स्थानीय गिरोहों और अपराध सिंडिकेट के साथ गुप्त अभियानों से प्रेरित है. फिल्म को 2 भागों में बनाया गया है. दूसरा भाग 2026 में रिलीज किया जाएगा. पहला भाग लगभग 3 घंटे 34 मिनट का है. इसे देखने के लिए काफी धैर्य की जरूरत है. यह अब तक की सब से लंबी भारतीय फिल्मों में से एक है.

इस फिल्म में काफी अरसे बाद रणवीर सिंह परदे पर गरम तेवरों में नजर आया है. हमजा के रूप में उस का किरदार काफी एनर्जेटिक, जोश और भावनाओं से भरा है. उस ने दर्शकों को चौंकाया है. निर्देशक ने फिल्म इतनी लंबी बनाई है कि बीच में खिंचीखिंची लगती है.

‘यह नया हिंदुस्तान है, घर में घुसेगा भी, मारेगा भी’ इसी कहानी को सिलसिलेवार दिखाया गया है. इस डायलौग को फिल्म के अंत में रणवीर सिंह के मुंह से कहलवाया गया है. कहानी एजेंट की है जिस पर अंतअंत तक सस्पैंस बनाया गया है. कहानी की शुरुआत कंधार हाईजैक की घटना से होती है. भारत के आईबी चीफ अजय सान्याल (आर माधवन) आतंकवादियों को तगड़ा जवाब देना चाहते हैं. परंतु सरकार ने उन की योजना को नकार दिया है. कुछ सालों बाद आतंकवादी संसद पर हमला करते हैं तब सरकार सान्याल के ‘धुरंधर’ प्लान पर काम करने को राजी होती है. प्लान के मुताबिक हमजा (रणवीर सिंह) को अफगानिस्तान के रास्ते पाकिस्तान भेजा जाता है जहां जा कर उसे ल्यारी के माफिया रहमान डकैत (अक्षय खन्ना) के गैंग में शामिल होना है. किसी तरह वह रहमान डकैत के गैंग में शामिल हो जाता है. शामिल होने के लिए वह रहमान डकैत के बेटे को बचाने की नाकाम कोशिश करता है जिस पर खुश हो कर रहमान उसे अपने गैंग में शामिल कर लेता है. हालांकि, किसी गैंगस्टर के गैंग में शामिल होने का यह प्लौट कईयों बार फिल्मों में दिखाया जा चुका है.

हमजा आगे जा कर रहमान का ख़ास गुर्गा बन जाता है, कई बार तो रहमान हमजा से ही एडवाइस लेने लगता है. इस बीच वह अपने दुश्मन को मार कर शेर ए बलोच बन जाता है और अब अपनी राजनीतिक पारी खेलने की कोशिश में है. इस बीच हमजा हुकूमत के खास जमील यमाली (राकेश बेदी) की बेटी एलीना (सारा अर्जुन) को अपने प्यार में फंसा लेता है. हमजा और एलीना का निकाह हो जाता है, मगर उस का सामना आईएसआई चीफ मेजर इकबाल (अर्जुन रामपाल) से होता है जो 26/11 में हमला करवाता है.

चौधरी असलम (संजय दत्त) बालूचों का सब से बड़ा दुश्मन है. वह करप्ट पुलिस वाला है जो नेताओं के इशारों पर काम करता है. अपनी कुरसी बचाने के लिए जमील यमाली असलम को रहमान डकैत को खत्म करने का औफर देता है. अब हमजा दुश्मन के किले तक पहुंच जाता है और उस के नैटवर्क को ध्वस्त कर देता है, मगर क्लाइमैक्स में फिल्म एक ऐसे मोड़ पर जा पहुंचती है जहां से पार्ट 2 का खुलासा होता है.

फिल्म एकदम काल्पनिक है, जिस में हकीकत के बड़े इंसिडैंट उठाए गए हैं. लेकिन असलियत और नकलियत का ऐसा घोल मिलाया गया है कि लोग समझ नहीं पाते कि यह रियल इंसिडैंट पर बनी फिल्म देख रहे हैं या फिक्शनल है. भारत, पाक पर और कंधार हाईजैक पर कई फिल्में पहले भी बन चुकी हैं. मगर लगभग 6 वर्षों बाद निर्देशन में लौटे आदित्य धर इसे बड़े लैवल पर प्रोजैक्ट करते हैं. फिल्म बीचबीच में खिंचीखिंची दिखाई देती है.

फिल्म में ढेरों कलाकार हैं, सभी खूंखार दिखाए गए हैं. पकिस्तान में आम इंसान तो दिखाई ही नहीं देता. निर्देशक ने पाकिस्तान में नकली नोट छापने का मुद्दा फिल्म में उठाया है. मुंबई हमले की टीवी रिपोर्टिंग देखते हुए आतंकियों का अलर्ट होना और भारतीयों को कमजोर करने के दृश्य विचलित करते हैं. लेकिन फिल्म मुंबई हमले के मास्टरमाइंड लश्कर ए तैयबा पर बात नहीं करती. इस में पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी आतंकी डेविड हेडली का हलका सा जिक्र है, यह भी अखरता है. फिल्म में जम कर हिंसा है. गालीगलौज भी बहुत है. बहुत बार तो बेमतलब गालियां बकी गई हैं. फिल्म ए रेटेड है.

रणवीर सिंह आक्रामक दिखा है, मगर उस के संवाद कम हैं. लंबे बालों का लुक उस पर जंचता है. अक्षय खन्ना का काम बढ़िया है, पूरी मूवी में वह छाया हुआ है. अर्जुन रामपाल को मुंबई हमले के बाद जश्न मनाते देख दर्शकों का खून खौल उठता है. अब तक कौमेडी वाली भूमिकाएं करने वाले राकेश बेदी ने इस बार मौकापरस्त नेता की भूमिका में चौंकाया है. संजय दत्त एसपी की भूमिका में है. सारा अर्जुन न भी होती फिल्म में तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता.

सिनेमेटोग्राफी बढ़िया है. फिल्म की अवधि कम की जा सकती थी. बैकग्राउंड में चलते पुरानी फिल्मों के गाने सुनने में अच्छे लगते हैं. संगीत भी प्रभावशाली है. ऐक्शन, थ्रिलर और जासूसी फिल्में देखने वाले दर्शकों को यह फिल्म पसंद आएगी. Dhurandhar Movie Review :

Religious Intolerance : मजहब ही तो सिखाता आपस में बैर रखना

Religious Intolerance : जबजब धर्म का राजनीति के साथ घालमेल हुआ है, तबतब हिंसा, कत्ल, दंगे, आगजनी की घटनाएं घटी हैं. धर्म की बुनियाद ही, आस्था के नाम पर, एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से अलग करना है. यही कारण है कि आज देश ऐसी विकट स्थिति पर आ कर खड़ा है जहां लोग एकदूसरे को इंसान कम हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई अधिक सम   झने लगे हैं, जिस कारण देश में अलगअलग जगह हिंसा भड़क रही है.

मणिपुर का मामला ठीक से शांत भी नहीं हुआ था कि हरियाणा जलने की कगार पर है. नौबत यह है कि नूंह से भड़की इस हिंसा ने हरियाणा के मेवात, गुरुग्राम, फरीदाबाद व रेवाड़ी जिले में भी दंगे भड़कने के पूरे आसार बना दिए हैं.

इस की मुख्य वजह में जाएं तो सामने वे लोग दिख जाएंगे जो किसी खास राजनीतिक और धार्मिक संगठनों से जुड़े हुए हैं, जो धर्मों के अनुसार एकदूसरे को मारनेकाटने में यकीन रखते हैं. फिलहाल यह नहीं कहा जा सकता कि इस की लपटें कहां तक पहुंचेंगी पर यकीनन धर्म को कट्टरता से मानने वालों के उन्माद से आज देश के आम नागरिक हिंसा की चपेट में बुरी तरह फंस चुके हैं.

मार्क्स ने धर्म को अफीम का दर्जा देते वक्त सोचा नहीं होगा कि वे यूफेमिज्म (लाक्षविक्रता) का सहारा ले रहे हैं. मार्क्स की अफीम आज कोकीन, हशीश और हेरोइन से भी ज्यादा प्रसंस्कृत हो चुकी है. लिहाजा, अगर उन्होंने धर्म को नशे के बजाय सीधेसीधे नफरत फैलाने वाला कहा होता तो शायद गलत नहीं था. पूरी दुनिया में धर्मकेंद्रित आतंकवाद के उभरने से यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि धर्म दिलों को जोड़ नहीं, बल्कि तोड़ रहा है.

जमीनी सचाई भी यही है कि विभिन्न धर्मों की जड़ता और कट्टरता की वजह से विश्व 21वीं सदी में पहुंच कर भी पाषाणयुग के मुहाने पर खड़ा दिखाई देता है. महाकवि इकबाल के फलसफे ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’ से कोसों दूर धर्म आज वास्तविक धरातल पर मजहबी विद्वेष और अराजकता की आधारभूमि बना हुआ है.

पिछले 4 दशकों में अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रम पूरी तरह धार्मिक उन्माद और अलगाव की धुरी पर केंद्रित रहा है. विज्ञान और तकनीक के चमत्कारों को मजहबी विध्वंस की आंधी पूरी तरह लील गई. विश्व ने इसलामी आतंकवाद के खिलाफ मोरचा साधा तो भारत में हिंदूमुसलिम विद्वेष की खाई और गहरी हुई. जिन अर्थों में हम भारत को धर्मनिरपेक्ष और सद्भावपूर्ण राज्य का पर्याय मानते हैं, वे निरर्थक सिद्ध हो रहे हैं.

प्रश्न उठता है कि सदियों से जिस धार्मिक महानता के गीत गाए जाते रहे थे वे कितने अर्थपूर्ण थे. आखिर धर्म तो आज भी समन्वय के बजाय वैमनस्य का पर्याय बना हुआ है.

एंगल्स ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा था कि यह आदमी के दिमाग की ऐसी फुजूल उपज है जो प्राकृतिक क्रियाकलापों को दैवीय शक्ति का दरजा दे कर भ्रम पैदा करती है. नए परिप्रेक्ष्य में धर्म सिर्फ भ्रम ही नहीं, विनाश की स्थितियां भी पैदा कर रहा है.

भारत का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ. भारतीय संविधान में सांप्रदायिक सद्भाव को सुनिश्चित करने के लिए हरसंभव प्रयत्न किए गए. भारत एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बना. इस के बावजूद आजादी के बाद सांप्रदायिकता कम होने के बजाय बढ़ी है. अयोध्या, गुजरात, कश्मीर की घटनाएं इस का प्रमाण हैं. जाहिर तौर पर इसे राजकीय लिहाज से नीतिगत नाकामी का पर्याय ही कहा जाएगा.

दरअसल भारत में सभी सरकारों ने राज्य और धर्म को अलग रखने के बजाय इन के घालमेल का ही प्रयास किया. इसी वजह से कभी अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की आवाजें उठीं तो कभी बहुसंख्यक आक्रामकता को कोसा गया. प्रजातंत्र में धर्म का अन्यथा महत्त्व विध्वंसकारी सिद्ध हो सकता है. भारत जैसी गतिवादी संरचना में यह खतरा और भी विकट रूप से सामने आया. यह इस देश में ही संभव है कि कथित रूप से नास्तिक सम   झी जाने वाली वामपंथी पार्टियां भी जाति और धर्म के समीकरणों के आधार पर चुनावी गणित बैठाती हैं. भाजपा और कांग्रेस ने अपनेअपने स्तर पर धार्मिक उन्माद को हवा दी है.

इस से अधिक हास्यास्पद बात क्या होगी कि आज राष्ट्रीय मुद्दे के नाम पर उग्र हिंदुत्व और नरम हिंदुत्व की व्याख्या बहस का विषय बनी हुई है. इस में शक नहीं कि भाजपा जैसी धार्मिक मुद्दों वाली पार्टी ने आज समूचे मुल्क को विचारधारा के स्तर पर धर्मकेंद्रित बहस के इर्दगिर्द खड़ा कर राज्य हासिल करने में सफलता पाई है.

उस का पानी पी कर विरोध करने वाले दरअसल उस की जमीन ही सींच रहे हैं. विपक्षी दल सांप्रदायिकता के पोषण में उतने ही सहायक सिद्ध हुए जितनी कि भाजपा. यदि शाहबानो प्रकरण, बंगलादेशी घुसपैठ, बाबरी मसजिद विध्वंस, गोधरा जैसी घटनाएं न घटतीं तो भाजपा को अपनी विचारधारा फैलाने में कभी सफलता नहीं मिल सकती थी.

बहुसंख्यक सांप्रदायिकता का खात्मा अल्पसंख्यकवाद के जरिए संभव नहीं है. मूल तथ्य यह कि हम ने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर धर्मप्रधान राज्यप्रणाली को ही गले लगाया है. शायद इसीलिए राहुल गांधी को इसलामी सैंटर में भाषण दे कर मुसलिमप्रियता सिद्ध करनी पड़ती है तो जगहजगह मंदिरों में मत्था टेक कर हिंदुओं को लुभाना पड़ता है. क्यों नहीं राजनेता पूरी तरह धर्म आधारित राजनीति से किनारा कर लेते. दरअसल भारत की वर्णवादी व्यवस्था को प्रश्रय देने के साथ धार्मिक विभेद को भी राजनीतिज्ञों ने अपने फायदे के लिए भुनाया है. सांप्रदायिकता भारतीय राजनीति की आनुशंगिक बन गई है.

हम मानें या न मानें, दुनिया के सारे धार्मिक समाजों में ‘अस एंड दे’ अपने और पराए का भाव अंतर्निहित है. इसलाम तो पूरी दुनिया को दारुल हरब और दारुल अमन (काफिर एवं इसलामी विश्व) की अवधारणा में बांट कर देखता है. इसलामी मुल्कों की उग्रवादी कार्यशैली इसी फलसफे पर आधारित है. ईसाई धर्म में कट्टरता का भाव न होते हुए भी विजातीय धर्मों के एनलाइटेनमैंट (धार्मिक जागरण) की गलतफहमी पलती रही.

हिंदू धर्म ने दूसरे धर्मों के साथ तो सर्वधर्म सद्भाव की बात कही पर अपने ही सजातीय हिंदू भाइयों के साथ जातीय आधार पर विद्वेष का रुख अपना लिया. दुनिया के इन 3 विशालतम धर्मों की अपेक्षा पारसी, बौद्ध, जैन जैसे अपेक्षतया छोटे संप्रदायों में वैमनस्य की भावना कम रही है. फिर भी सवाल जहां का तहां है कि आखिर मनुष्य को धर्म की जरूरत ही क्या है, खासकर जब, धार्मिक (तथाकथित) समाज ही सर्वत्र खूनखराबे और विद्वेष की जमीन तैयार कर रहे हैं.

अगर 21वीं सदी में पहुंच कर भी हम धर्म जैसी अर्थहीन परिकल्पना के मोहजाल से निकल नहीं सकते तो तमाम वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति का औचित्य ही क्या है. दुनिया को धार्मिक उन्माद के दावानल से निकालने का एक ही उपाय है कि सारे देश मजहबी मान्यताओं पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाएं. सांप्रदायिक सद्भाव के खोखले नारों से कोई फायदा नहीं होगा क्योंकि संप्रदाय ही हैं जो सद्भाव बिगाड़ रहे हैं.

नए संसद भवन के उद्घाटन के समय दलित आदिवासी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को निमंत्रण न दे कर और संविधान में कोई हैसियत न रखने वाले बीसियों भगवाधारी भारीभरकम मठों के स्वामियों को विशेष जहाजों से बुला कर यही सिद्ध किया गया है कि यह प्रायोजन केवल धार्मिक है और मौजूदा भाजपाई सरकार धर्म को प्रोत्साहित या स्वतंत्रता ही नहीं देती, धार्मिक संदेशों की वह गुलाम भी है.

भारतीय संविधान का जो कचरा हुआ है उसे तो छोडि़ए पर हर भारतवासी के मन में यह बैठा दिया गया है कि जब देश अब इन भगवाधारियों के अनुसार चल रहा है तो वे भी अपना हर काम इसी तरह करें.

हर नागरिक, हर परिवार, हर व्यापार, हर उद्योग को स्पष्ट संदेश है कि उस का हर काम इसी तरह धर्म की अफीम पिलाने वालों के हाथों से शुरू हो, उन्हें दानदक्षिणा दीजिए, उन का आदेश सिरमाथे पर रखा जाए. जब राष्ट्रपति संसद के उद्घाटन के समय अपने अपमान पर त्यागपत्र देने का साहस नहीं कर सकतीं तो आम गृहिणी की क्या बिसात कि वह गली में घूमते एयरकंडीशंड बस में सवार किसी स्वामी की बात को ठुकरा सके.

इसलाम जो अफगानिस्तान, तुर्की व पाकिस्तान में कर रहा है, जो ट्रंप के समर्थक मलयेशिया में कर रहे हैं, वही भारत में हो रहा है. सब जगह वैरभाव सिखाया जा रहा है. लोगों को जबरन हांका जा रहा है. इन सब जगह वही पढ़ने व सुनने को मिल रहा है जो धर्म को स्वीकार है. उस के लिए दानपुण्य सर्वोपरि है. Religious Intolerance :

Hindi Kahani : माफी – तलाक के बाद भी प्रमोद ने शिफाली से क्यों मांगी माफी ?

Hindi Kahani : शिफाली और प्रमोद को आज कोर्ट से तलाक के कागज मिल गए थे. लंबी प्रक्रिया के बाद आज कुछ सुकून मिला. शिफाली और प्रमोद तथा उनके परिजन साथ ही कोर्ट से बाहर निकले, उनके चेहरे पर विजय और सुकून के निशान साफ झलक रहे थे. चार साल की लंबी जदोजहद के बाद आज फैसला हो गया था.

दस साल हो गए थे शादी को मग़र साथ 6 साल ही रह पाए थे.

चार साल तो तलाक की कार्यवाही में ही बीत गये गए.

शेफाली के हाथ मे दहेज के समान की लिस्ट थी जो अभी प्रमोद के घर से लेना था और प्रमोद के हाथ मे गहनों की लिस्ट थी जो उसने शेफाली से लेने थे.

साथ मे कोर्ट का यह आदेश भी था कि प्रमोद शेफाली को  दस लाख रुपये की राशि एकमुश्त देगा.शेफाली और प्रमोद दोनो एक ही  औटो में बैठकर प्रमोद के घर आये.  आज ठीक 4 साल बाद आखिरी बार ससुराल जा रही थी शेफाली, अब वह कभी इन रास्तों से इस घर तक नहीं आएगी. यह बात भी उसे कचोट रही थी कि जहां वह 4 साल तक रही आज उस घर से उसका नाता टूट गया है. वह  दहेज के सामान की लिस्ट लेकर आई थी, क्योंकि सामान की निशानदेही तो उसे ही करनी थी.

सभी रिश्तेदार अपनेअपने घर जा चुके थे. बस, तीन प्राणी बचे थे. प्रमोद,शेफाली और उस की मां. प्रमोद यहां अकेला ही रहता था, क्योंकि उसके पेरेंट्स गांव में ही रहते थे.

शेफाली और प्रमोद की इकलौती 5 साल की बेटी जो कोर्ट के फैसले के अनुसार बालिग होने तक शेफाली के पास ही रहेगी. प्रमोद महीने में एक बार उससे मिल सकता है.

घर में  घुसते ही पुरानी यादें ताज़ी हो गईं. कितनी मेहनत से सजाया था शेफाली ने इसे. एक एक चीज में उसकी जान बसती थी. सबकुछ उसकी आंखों के सामने बना था. एकएक ईंट से उसने धीरेधीरे बनते घरौदे को पूरा होते देखा था. यह उसका सपनो का घर था. कितनी शिद्दत से प्रमोद ने उसके सपने को पूरे किए थे.

प्रमोद थकाहारा सा सोफे पर पसर गया और शेफाली से बोला, “ले लो जो कुछ भी तुम्हें लेना है, मैं तुम्हें नही रोकूंगा.”

शेफाली बड़े गौर से प्रमोद को देखा और सोचने लगी 4 साल में कितना बदल गया है प्रमोद. उसके बालों में  अब हल्की हल्की सफेदी झांकने लगी थी. शरीर पहले से आधा रह गया है. चार साल में चेहरे की रौनक गायब हो गई थी.

शेफाली स्टोर रूम की तरफ बढ़ी, जहां उसके दहेज का समान पड़ा था. कितना था उसका सामान. प्रेम विवाह था दोनो का. घर वाले तो मजबूरी में साथ हुए थे.

प्रेम विवाह था तभी तो नजर लग गई किसी की. क्योंकि प्रेमी जोड़ी को हर कोई टूटता हुआ देखना चाहता है.

बस एक बार पीकर बहक गया था प्रमोद. हाथ उठा बैठा था उस पर. बस तभी वो गुस्से में मायके चली गई थी.

फिर चला था लगाने सिखाने का दौर. इधर प्रमोद के भाईभाभी और उधर शेफाली की माँ. नौबत कोर्ट तक जा पहुंची और आखिर तलाक हो गया. न शेफाली लौटी और न ही प्रमोद लेने गया.

शेफाली की मां जो उसके साथ ही गई थीं,बोली, ” कहां है तेरा सामान? इधर तो नही दिखता. बेच दिया होगा इस शराबी ने ?”

“चुप रहो मां,” शेफाली को न जाने क्यों प्रमोद को उसके मुँह पर शराबी कहना अच्छा नही लगा.

फिर स्टोर रूम में पड़े सामान को एक एक कर लिस्ट से मिलाया गया.

बाकी कमरों से भी लिस्ट का सामान उठा लिया गया.

शेफाली ने सिर्फ अपना सामान लिया प्रमोद के समान को छुआ तक नही.  फिर शेफाली ने प्रमोद को गहनों से भरा बैग पकड़ा दिया.

प्रमोद ने बैग वापस शेफाली को ही दे दिया, ” रखलो, मुझे नही चाहिए काम आएगें तेरे मुसीबत में .”

गहनों की किम्मत 15 लाख रुपये से कम नही थी.

“क्यों, कोर्ट में तो तुम्हरा वकील कितनी दफा गहने-गहने चिल्ला रहा था.”

“कोर्ट की बात कोर्ट में खत्म हो गई, शेफाली. वहाँ तो मुझे भी दुनिया का सबसे बुरा जानवर और शराबी साबित किया गया है.”

सुनकर शेफाली की मां ने नाकभों चढ़ा दीं.

“मुझे नही चाहिए.

वो दस लाख रुपये भी नही चाहिए.”

“क्यों?” कह कर प्रमोद सोफे से खड़ा हो गया.

“बस यूं ही” शेफाली ने मुंह फेर लिया.

“इतनी बड़ी जिंदगी पड़ी है कैसे काटोगी? ले जाओ,,, काम आएंगे.”

इतना कह कर प्रमोद ने भी मुंह फेर लिया और दूसरे कमरे में चला गया. शायद आंखों में कुछ उमड़ा होगा जिसे छुपाना भी जरूरी था.

शेफाली की मां गाड़ी वाले को फोन करने में व्यस्त थी.

शेफाली को मौका मिल गया. वो प्रमोद के पीछे उस कमरे में चली गई.

वो रो रहा था. अजीब सा मुंह बना कर.  जैसे भीतर के सैलाब को दबाने  की जद्दोजहद कर रहा हो. शेफाली ने उसे कभी रोते हुए नही देखा था. आज पहली बार देखा न जाने क्यों दिल को कुछ सुकून सा मिला.

मग़र वह ज्यादा भावुक नही हुई.

सधे अंदाज में बोली, “इतनी फिक्र थी तो क्यों दिया तलाक प्रमोद?”

“मैंने नही तलाक तुमने दिया.”

“दस्तखत तो तुमने भी किए.”

“माफी नही मांग सकते थे?”

“मौका कब दिया तुम्हारे घर वालों ने. जब भी फोन किया काट दिया.”

“घर भी तो आ सकते थे”?

“मेरी हिम्मत नही हुई थी आने की?”

शेफाली की मां आ गई. वो उसका हाथ पकड़ कर बाहर ले गई. “अब क्यों मुंह लग रही है इसके? अब तो रिश्ता भी खत्म हो गया.”

मां-बेटी बाहर बरामदे में सोफे पर बैठकर गाड़ी का इंतजार करने लगी.

शेफाली के भीतर भी कुछ टूट रहा था. उसका दिल बैठा जा रहा था. वो सुन्न सी पड़ती जा रही थी. जिस सोफे पर बैठी थी उसे गौर से देखने लगी. कैसे कैसे बचत कर के उसने और प्रमोद ने वो सोफा खरीदा था. पूरे शहर में घूमी तब यह पसन्द आया था.”

फिर उसकी नजर सामने तुलसी के सूखे पौधे पर गई. कितनी शिद्दत से देखभाल किया करती थी. उसके साथ तुलसी भी घर छोड़ गई.

घबराहट और बढ़ी तो वह फिर से उठ कर भीतर चली गई. माँ ने पीछे से पुकारा मग़र उसने अनसुना कर दिया. प्रमोद बेड पर उल्टे मुंह पड़ा था. एक बार तो उसे दया आई उस पर. मग़र  वह जानती थी कि अब तो सब कुछ खत्म हो चुका है इसलिए उसे भावुक नही होना है.

उसने सरसरी नजर से कमरे को देखा. अस्त व्यस्त हो गया था पूरा कमरा. कहीं कंही तो मकड़ी के जाले झूल रहे थे.

कभी कितनी नफरत थी उसे मकड़ी के जालों से?

फिर उसकी नजर चारों और लगी उन फोटो पर गई जिनमे वह प्रमोद से लिपट कर मुस्करा रही थी.

कितने सुनहरे दिन थे वो.

इतने में मां फिर आ गई. हाथ पकड़ कर फिर उसे बाहर ले गई.

बाहर गाड़ी आ गई थी. सामान गाड़ी में डाला जा रहा था. शेफाली सुन सी बैठी थी. प्रमोद गाड़ी की आवाज सुनकर बाहर आ गया.

अचानक प्रमोद कान पकड़ कर घुटनो के बल बैठ गया.

बोला,” मत जाओ…माफ कर दो.”

शायद यही वो शब्द थे जिन्हें सुनने के लिए चार साल से तड़प रही थी. सब्र के सारे बांध एक साथ टूट गए. शेफाली ने कोर्ट के फैसले का कागज निकाला और फाड़ दिया .

और मां कुछ कहती उससे पहले ही लिपट गई प्रमोद से. साथ मे दोनो बुरी तरह रोते जा रहे थे.

दूर खड़ी शेफाली की माँ समझ गई कि कोर्ट का आदेश दिलों के सामने कागज से ज्यादा कुछ नही.

काश, उनको पहले मिलने दिया होता?

अगर माफी मांगने से ही रिश्ते टूटने से बच  जाएं, तो माफ़ी मांग लेनी चाहिए. Hindi Kahani :

Hindi Family Story : मन का घोड़ा – क्यों श्वेता को अपने रंगरूप पर इतना गुमान था ?

Hindi Family Story : ‘‘अंकुर की शादी के बाद कौन सा कमरा उन्हें दिया जाए, सभी कमरे मेहमानों से भरे हैं. बस एक कमरा ऊपर वाला खाली है,’’ अपने बड़े बेटे अरुण से चाय पीते हुए सविता बोलीं.

‘‘अरे मां, इस में इतना क्या सोचना? हमारे वाला कमरा न्यूलीवैड के लिए अच्छा रहेगा. हम ऊपर वाले कमरे में शिफ्ट हो जाएंगे,’’ अरुण तुरंत बोला.

यह सुन पास बैठी माला मन ही मन बुदबुदा उठी कि आज तक जो कमरा हमारा था, वह अब श्वेता और अंकुर का हो जाएगा. हद हो गई, अरुण ने मेरी इच्छा जानने की भी जरूरत नहीं समझी और कह दिया कि न्यूलीवैड के लिए यह अच्छा रहेगा. तो क्या 15 दिन पूर्व की हमारी शादी अब पुरानी हो गई?

तभी ताईजी ने अपनी सलाह देते हुए कहा, ‘‘अरुण, तुम अपना कमरा क्यों छोड़ते हो? ऊपर वाला कमरा अच्छाभला है. उसे लड़कियां सजासंवार देंगी. और हां, अपनी दुलहन से भी तो पूछ लो. क्या वह अपना सुहागकक्ष छोड़ने को तैयार है?’’ और फिर हलके से मुसकरा दीं. पर अरुण ने तो त्याग की मूर्ति बन झट से कह डाला, ‘‘अरे, इस में पूछने वाली क्या बात है? ये नए दूल्हादुलहन होंगे और हम 15 दिन पुराने हो गए हैं.’’

ये शब्द माला को उदास कर गए पर गहमागहमी में किसी का उस की ओर ध्यान न गया. ससुराल की रीति अनुसार घर की बड़ी महिलाएं और नई बहू माला बरात में नहीं गए थे. अत: बरात की वापसी पर दुलहन को देखने की बेसब्री हो रही थी. गहनों से लदी छमछम करती श्वेता ने अंकुर के संग जैसे ही घर में प्रवेश किया वैसे ही कई स्वर उभर उठे, वाह, कितनी सुंदर जोड़ी है.

‘‘कैसी दूध सी उजली बहू है, अंकुर की यही तो इच्छा थी कि लड़की चांद सी उजली हो,’’ बूआ सास दूल्हादुलहन पर रुपए वारते हुए बोलीं.

माला चुपचाप एक तरफ खड़ी देखसुन रही थी. तभी सविताजी ने माला को नेग वाली थाली लाने को कहा और इसी बीच कंगन खुलाई की रस्म की तैयारी होने लगी. महिलाओं की हंसीठिठोली और ठहाके गूंज रहे थे पर माला अपनी कंगन खुलाई की यादों में खो गई…

फूल और पानी भरी परात से जब माला ने 3 बार अंगूठी ढूंढ़ निकाली तब सभी ने एलान कर डाला, ‘‘भई, अब तो माला ही राज करेगी और अरुण इस का दीवाना बना घूमेगा.’’

पर माला तो अरुण का चेहरा देखने को भी तरसती रही. भाई की शादी की व्यस्तता व मेहमानों, दोस्तों की गहमागहमी में माला का ध्यान ही नहीं आया. माला के कुंआरे सपने साकार होने को तड़पते और मन में उदासी भर देते, फिर भी माला सब के सामने मुसकराती बैठी रहती.

शाम 4 बजे रीता ने आवाज लगाई, ‘‘जिसे भी चाय पीनी हो वह जल्दी से यहां आ जाए. मैं दोबारा चाय नहीं बनाऊंगी.’’ ‘‘ला, मुझे 1 कप चाय पकड़ा दे. फिर बाहर काम से जाना है,’’ अरुण ने भीतर आते हुए कहा.

‘‘ठहरो भाई, पहले एक बात बताओ. वह आप के हस्तविज्ञान व दावे का क्या रहा जब आप ने कहा था कि मेरी दुलहन एकदम गोरीचिट्टी होगी. यह बात तो अंकुर भाई पर फिट हो गई,’’ कह रीता जोरजोर से हंसने लगी.

‘‘अच्छा, एक बात बता, मन का लड्डू खाने में कोई बंदिश है क्या?’’ अरुण ने हंसते हुए कहा.

तभी ताई सास ने अपनी बेटी रीता को डपट दिया, ‘‘यह क्या बेहूदगी है? नईनवेली बहुएं हैं, सोचसमझ कर बोलना चाहिए… और अरुण तेरी भी मति मारी गई है क्या, जो बेकार की बातों में समय बरबाद कर रहा है?’’

शादी के बाद अंकुर और श्वेता हनीमून पर ऊटी चले गए ताकि अधिकतम समय एकदूसरे के साथ व्यतीत कर सकें, क्योंकि 20 दिनों के बाद ही अंकुर को लंदन लौटना था. श्वेता तो पासपोर्ट और वीजा लगने के बाद ही जा पाएगी. हनीमून पर जाने का प्रबंध अरुण ने ही किया था. ये सब बातें माला को पिछले दिन रीता ने बताई थीं. घर के सभी लोग अरुण की प्रशंसा के पुल बांध रहे थे पर माला के मन में कांटा सा गड़ गया. मन में अरुण के प्रति क्रोध की ज्वाला उठने लगी.

‘हमारा हनीमून कहां गया? अपने लिए इन्होंने क्यों कुछ नहीं सोचा? क्यों? रोऊं, लडं क्या करूं?’ ये सवाल, जिन्हें संकोचवश अरुण से स्पष्ट नहीं कर पा रही थी, उस के मन को लहूलुहान कर रहे थे.

समय का पहिया अंकुर को लंदन ले गया. ऐसे में श्वेता अकेलापन अनुभव न करे, इसलिए घर का हर सदस्य उस का ध्यान रखने लगा था. भानजी गीता तो उसे हर समय घेरे रहती. माला तो जैसे कहीं पीछे ही छूटती जा रही थी. तभी तो माला शाम के धुंधलके में अकेली छत पर खड़ी स्वयं से बतिया रही थी कि मानती हूं कि श्वेता को अंकुर की याद सताती होगी. पर सारा परिवार उसी से चिपका रहे, यह तो कोई बात न हुई. मैं भी तो 2 माह से यहीं रह रही हूं और अरुण भी तो दिल्ली से सप्ताह के अंत में 1 दिन के लिए आते हैं. मुझ से हमदर्दी क्यों नहीं?

तभी किसी के आने की आहट से उस की विचारधारा भंग हो गई.

‘‘माला, तुम यहां अकेली क्यों खड़ी हो? चलो, नीचे मां तुम्हें बुला रही हैं. और हां कल सुबह की ट्रेन से दिल्ली निकल जाऊंगा. तुम श्वेता का ध्यान रखना कि वह उदास न हो. वैसे तो सभी ध्यान रखते हैं पर तुम्हारा ध्यान रखना और अच्छा रहेगा…’’

अरुण आगे कुछ और कहता उस से पहले ही माला गुस्से से चिल्ला पड़ी, ‘‘उफ, सब के लिए आप के मन में कोमल भावनाएं हैं पर मेरे लिए नहीं. क्या मैं इतनी बड़ी हो गई हूं कि मैं सब का ध्यान रखूं और खुद को भूल जाऊं? मेरी इच्छाएं, मेरी कल्पनाएं, मेरा हनीमून उस का क्या?’’

अरुण हैरान सा माला को देखता रह गया, ‘‘आज तुम्हें यह क्या हो गया है माला? तुम श्वेता से अपनी तुलना कर रही हो क्या? उस के नाम से तुम इतना अपसैट क्यों हो गईं?’’

‘‘नहीं, मैं किसी से तुलना क्यों करूंगी? मुझे अपना स्थान चाहिए आप के दिल में… परसों कौशल्या बाई बता रही थी कि अरुण भैया तो ब्याह के लिए तैयार ही नहीं थे. वह तो मांजी 3 सालों से पीछे लगी थीं तब उन्होंने हामी भरी थी. तो क्या आप के साथ शादी की जबरदस्ती हुई है? और उस दिन रीता ने जो हस्तविज्ञान वाली बात कही थी, इस से लगता है कि आप की चाहत शायद कोई और थी पर…’’ माला ने बात अधूरी छोड़ दी.

‘‘उफ, तुम औरतों का दिमागी घोड़ा बिना लगाम के दौड़ता है. तुम इन छोटीछोटी व्यर्थ की बातों का बतंगड़ बनाना छोड़ो और मन शांत करो. अब नीचे चलो. सब खाने पर इंतजार कर रहे हैं.’’

वह दिन भी आ गया जब माला अरुण के साथ दिल्ली आ गई. यहां अपना घर सजातेसंवारते उस के सपने भी संवर रहे थे. अरुण के औफिस से लौटने से पहले वह स्वयं को आकर्षक बनाने के साथ ही कुछ न कुछ नया पकवान, चाय आदि बनाती. फिर दोनों की गप्पों व कुछ टीवी सीरियल देखतेदेखते रात गहरा जाती तो दोनों एकदूसरे के आगोश में समा जाते.

हां, एक बार छुट्टी के दिन माला ने दिल्ली दर्शन की इच्छा भी व्यक्त की थी तो, ‘‘ये रोमानी घडि़यां साथ बिताने के लिए हैं, हमारा हनीमून पीरियड है यह. फिर दिल्ली तो घूमना होता ही रहेगा जानेमन,’’ अरुण का यह जवाब गुदगुदा गया था.

शनिवार की छुट्टी में अरुण अलसाया सा लेटा था कि तभी मोबाइल बज उठा. अरुण फोन उठा कर बोला, ‘‘हैलो… अच्छा ठीक है, मैं कल स्टेशन पहुंच जाऊंगा. ओ.के. बाय.’’

‘‘किस का फोन था?’’ चाय की ट्रे ले कर आती माला ने पूछा.

‘‘श्वेता का. वह कल आ रही है. उसे मैं रिसीव करने जाऊंगा,’’ कह अरुण ने चाय का कप उठा लिया.

श्वेता के आने की खबर से माला का उदास चेहरा अरुण से छिपा न रह सका, ‘‘क्या हुआ? अचानक तुम गुमसुम सी क्यों हो गईं?’’ अरुण ने उस की ओर देखते हुए पूछा.

‘‘अभी दिन ही कितने हुए हैं हमें साथ समय बिताते कि…’’

‘‘अरे यार, उस के आने से रौनक हो जाएगी, कितना हंसतीबोलती है. तुम्हारा भी पूरा दिन मन लगा रहेगा. सारा दिन अकेले बोर होती हो,’’ माला की बात बीच में ही काटते हुए अरुण ने कहा.

माला चुपचाप चाय की ट्रे उठा कर रसोई की ओर बढ़ गई.

‘फिर वही श्वेता. क्या वह अपने मायके या ससुराल में नहीं रह सकती थी कुछ महीने? फिर चली आ रही है दालभात में मूसलचंद. ‘खैर, मुसकराहट तो ओढ़नी ही होगी वरना अरुण न जाने क्या सोचने लगें.’ मन ही मन सोच माला नाश्ते की तैयारी करने लगी.

छुट्टी के दिन अरुण श्वेता और माला को एक मौल में ले गया. वहां की चहलपहल और भीड़ का कोई छोर ही न था. श्वेता की खुशी देखते ही बन रही थी, ‘‘भाभी, आप तो बस जब मन आए यहीं चली आया करो. यहां शौपिंग का मजा ही कुछ और है,’’ माला की ओर देख उस ने कहा.

‘‘मुझे तो अरुण, पहले कभी यहां लाए ही नहीं. यह सब तो तुम्हारे कारण हो रहा है,’’ माला उदासी भरे स्वर से बोली.

‘‘अच्छा,’’ श्वेता का स्वर उत्साहित हो उठा.

वहीं मौल में खाना खाते हुए श्वेता की आंखें चमक रही थीं. बोली, ‘‘वाह, खाना कितना स्वादिष्ठ है.’’

इस पर अरुण ने हंस कर कहा, ‘‘मुझे मालूम था कि श्वेता तुम ऐंजौय करोगी. तभी तो यहां लंच लेने की सोची.’’

‘‘और मैं?’’ माला ने अरुण से पूछ ही लिया.

‘‘अरे, तुम तो मेरी अर्द्धांगिनी हो, जो मुझे पसंद वही तुम्हें भी पसंद आता है, अब तक मैं यह तो जान ही गया हूं. इसलिए तुम्हें भी यहां आना तो अच्छा ही लगा होगा.’’

बुधवार की सुबह अखबार थामे श्वेता बोली, ‘‘बिग बाजार में 50% की बचत पर सेल लगी है. भैया, मुझे 5,000 दे देंगे? 2000 तो हैं मेरे पास. मैं और भाभी ड्रैसेज लाएंगी. ठीक है न भाभी? लंदन में यही ड्रैसेज काम आ जाएंगी.’’

‘‘हांहां, क्रैडिट कार्ड ले लेगी माला… दोनों शौपिंग कर लेना.’’

माला अरुण को मुंह बाए खड़ी देखती रह गई कि क्या ये वही अरुण हैं, जिन्होंने कहा था कि पहले शादी में मिली ड्रैसेज को यूज करो, फिर नई खरीदना. तो क्या श्वेता को ड्रैसेज का ढेर नहीं मिला है शादी में? ये छोटीबड़ी बातें माला का मन कड़वाहट से भरती जा रही थीं.

उस दिन तो माला का मन जोर से चिल्लाना चाहा था जब श्वेता बिस्तर में सुबह 9 बजे तक चैन की नींद ले रही थी और वह रसोई में लगी हुई थी. तभी अरुण ने श्वेता को चाय दे कर जगाने को कह दिया. वह जानती थी कि अरुण को देर तक बिस्तर में पड़े रहना पसंद नहीं. फिर श्वेता से कुछ भी क्यों नहीं कहा जाता? मन में उठता विचारों का ज्वार, सुहागरात की ओर बहा ले गया कि मुझे तो प्रथम मिलन की रात्रि में प्यार के पलों से पहले संस्कार, परिवार के नियमों आदि का पाठ पढ़ाया था अरुण ने… फिर तभी चाय उफनने की आवाज उसे वर्तमान में ले आई.

मैं आज और अभी अरुण से पूछ कर ही रहूंगी, सोच माला बाथरूम में शेव करते अरुण के पास जा खड़ी हुई.

‘‘क्या बात है? कोई काम है क्या?’’ शेविंग रोक अरुण ने पूछा.

‘‘क्या मैं जबरदस्ती आप के गले मढ़ी गई हूं? क्या मुझ में कोई अच्छाई नहीं है?’’

अरुण हाथ में शेविंगब्रश लिए हैरान सा खड़ा रहा. पर माला बोलती रही, ‘‘हर समय बस श्वेताश्वेता. मुझ से तो परंपरा निभाने की बात करते रहे और इस का बिंदासपन अच्छा लगता है. आखिर क्यों?’’ माला का चेहरा लाल होने के साथसाथ आंसुओं से भी भीग चला था.

‘‘तुम्हारा तो दिमाग खराब हो गया है. तुम्हारे मन में इतनी जलन, ईर्ष्या कहां से आ गई? श्वेता के नाम से चिढ़ क्यों हो रही है? देवरानी तो छोटी बहन जैसी होती है और तुम तो न जाने…’’

‘‘बस फिर शुरू हो गया मेरे लिए आप का प्रवचन. उस की हर बात गुणों से भरी होती है और मेरी बुराई से,’’ कह पांव पटकती माला अपने कमरे में चली गई.

अरुण बिना नाश्ता किए व लंच टिफिन लिए औफिस चला गया. उस दिन माला को माइग्रेन का अटैक पड़ गया. सिरदर्द धीरेधीरे बढ़ता उस की सहनशक्ति से बाहर हो गया. उलटियों के साथसाथ चक्कर भी आ रहा था. श्वेता ने मैडिकल किट छान मारी पर दर्द की कोई गोली नहीं मिली. उस ने अरुण को फोन किया तो सैक्रेटरी ने बताया कि वे मीटिंग में व्यस्त हैं.

इधर माला अपना सिर पकड़ रोए जा रही थी. तभी श्वेता 10 मिनट के अंदर औटो द्वारा मैडिकल स्टोर से दर्द की दवा ले आई और कुछ मानमनुहार तथा कुछ जबरदस्ती से माला को दवा खिलाई. माथे पर बाम मल कर धीरेधीरे सिरमाथे को तब तक दबाती रही जब तक माला को नींद नहीं आ गई.

करीब 2 घंटे बाद माला की आंखें खुलीं. तबीयत में काफी सुधार था. सिर हलका लग रहा था. उस ने उठ कर इधरउधर नजर दौड़ाई तो देखा श्वेता 2 कप चाय व स्नैक्स ले कर आ रही है.

‘‘अरे भाभी, आप उठो नहीं… यह लो चाय और कुछ खा लो. शाम के खाने की चिंता मत करना, मैं बना लूंगी. हां, आप जैसा तो नहीं बना पाऊंगी पर ठीकठाक बना लूंगी,’’ कह उस ने चाय का प्याला माला को थमा दिया.

माला श्वेता के इस व्यवहार को देख उसे ठगी सी देखती रह गई.

‘‘क्या हुआ भाभी?’’

‘‘मुझे माफ कर दो श्वेता, मैं ने तो न मालूम क्याक्या सोच लिया था… तुम्हें प्रतिद्वंद्वी के रूप में देख रही थी. और…’’

‘‘नहींनहीं भाभी, और कुछ मत कहिए आप, अब मैं आप से कुछ भी नहीं छिपाऊंगी. सच में ही मुझे अपने रंगरूप पर अभिमान रहा है. मुझ में उतना धैर्य नहीं जितना आप में है. इसीलिए मैं आप को चिढ़ाने के लिए अपने में व्यस्त रही… आप की कोई मदद नहीं करती थी. भाभी, आप मुझे माफ कर दीजिए. आज से हम रिश्ते में भले ही देवरानीजेठानी हैं पर रहेंगी छोटीबड़ी बहनों की तरह,’’ और फिर दोनों एकदूसरे के गले से लग गईं.

‘‘सच श्वेता. मैं आज से अपने मन को गलत दिशा की तरफ भटकने से रोकूंगी और तुम्हारे भैया से माफी भी मांगूंगी.’’

अब श्वेता व माला एकदूसरे को देख कर मुसकरा रही थीं. Hindi Family Story :

Hindi Social Story : अंदाज – क्या रूढ़िवादी ससुराल को बदल पाई रंजना ?

Hindi Social Story : ‘‘जब 6 बजे के करीब मोहित ड्राइंगरूम में पहुंचा तो उस ने अपने परिवार वालों का मूड एक बार फिर से खराब पाया…’’

अपने सहयोगियों के दबाव में आ कर रंजना ने अपने पति मोहित को फोन किया, ‘‘ये सब लोग कल पार्टी देने की मांग कर रहे हैं. मैं इन्हें क्या जवाब दूं?’’

‘‘मम्मीपापा की इजाजत के बगैर किसी को घर बुलाना ठीक नहीं रहेगा,’’ मोहित की आवाज में परेशानी के भाव साफ झलक रहे थे.

‘‘फिर इन की पार्टी कब होगी?’’

‘‘इस बारे में रात को बैठ कर फैसला करते हैं.’’

‘‘ओ.के.’’

रंजना ने फोन काट कर मोहित का फैसला बताया तो सब उस के पीछे पड़ गए, ‘‘अरे, हम मुफ्त में पार्टी नहीं खाएंगे. बाकायदा गिफ्ट ले कर आएंगे, यार.’’

‘‘अपनी सास से इतना डर कर तू कभी खुश नहीं रह पाएगी,’’ उन लोगों ने जब इस तरह का मजाक करते हुए रंजना की खिंचाई शुरू की तो उसे अजीब सा जोश आ गया. बोली, ‘‘मेरा सिर खाना बंद करो. मेरी बात ध्यान से सुनो. कल रविवार रात 8 बजे सागर रत्ना में तुम सब डिनर के लिए आमंत्रित हो. कोई भी गिफ्ट घर भूल कर न आए.’’

रंजना की इस घोषणा का सब ने तालियां बजा कर स्वागत किया था. कुछ देर बाद अकेले में संगीता मैडम ने उस से पूछा, ‘‘दावत देने का वादा कर के तुम ने अपनेआप को मुसीबत में तो नहीं फंसा लिया है?’’

‘‘अब जो होगा देखा जाएगा, दीदी,’’ रंजना ने मुसकराते हुए जवाब दिया.

‘‘अगर घर में टैंशन ज्यादा बढ़ती लगे तो मुझे फोन कर देना. मैं सब को पार्टी कैंसल हो जाने की खबर दे दूंगी. कल के दिन बस तुम रोनाधोना बिलकुल मत करना, प्लीज.’’

‘‘जितने आंसू बहाने थे, मैं ने पिछले साल पहली वर्षगांठ पर बहा लिए थे दीदी. आप को तो सब मालूम ही है.’’

‘‘उसी दिन की यादें तो मुझे परेशान कर रही हैं, माई डियर.’’

‘‘आप मेरी चिंता न करें, क्योंकि मैं साल भर में बहुत बदल गई हूं.’’

‘‘सचमुच तुम बहुत बदल गई हो, रंजना? सास की नाराजगी, ससुर की डांट या ननद की दिल को छलनी करने वाली बातों की कल्पना कर के तुम आज कतई परेशान नजर नहीं आ रही हो.’’

‘‘टैंशन, चिंता और डर जैसे रोग अब मैं नहीं पालती हूं, दीदी. कल रात दावत जरूर होगी. आप जीजाजी और बच्चों के साथ वक्त से पहुंच जाना,’’ कह रंजना उन का कंधा प्यार से दबा कर अपनी सीट पर चली गई.

रंजना ने बिना इजाजत अपने सहयोगियों को पार्टी देने का फैसला किया है, इस खबर को सुन कर उस की सास गुस्से से फट पड़ीं, ‘‘हम से पूछे बिना ऐसा फैसला करने का तुम्हें कोई हक नहीं है, बहू. अगर यहां के कायदेकानून से नहीं चलना है, तो अपना अलग रहने का बंदोबस्त कर लो.’’

‘‘मम्मी, वे सब बुरी तरह पीछे पड़े थे. आप को बहुत बुरा लग रहा है, तो मैं फोन कर के सब को पार्टी कैंसल करने की खबर कर दूंगी,’’ शांत भाव से जवाब दे कर रंजना उन के सामने से हट कर रसोई में काम करने चली गई.

उस की सास ने उसे भलाबुरा कहना जारी रखा तो उन की बेटी महक ने उन्हें डांट दिया, ‘‘मम्मी, जब भाभी अपनी मनमरजी करने पर तुली हुई हैं, तो तुम बेकार में शोर मचा कर अपना और हम सब का दिमाग क्यों खराब कर रही हो? तुम यहां उन्हें डांट रही हो और उधर वे रसोई में गाना गुनगुना रही हैं. अपनी बेइज्जती कराने में तुम्हें क्या मजा आ रहा है?’’

अपनी बेटी की ऐसी गुस्सा बढ़ाने वाली बात सुन कर रंजना की सास का पारा और ज्यादा चढ़ गया और वे देर तक उस के खिलाफ बड़बड़ाती रहीं.

रंजना ने एक भी शब्द मुंह से नहीं निकाला. अपना काम समाप्त कर उस ने खाना मेज पर लगा दिया.

‘‘खाना तैयार है,’’ उस की ऊंची आवाज सुन कर सब डाइनिंगटेबल पर आ तो गए, पर उन के चेहरों पर नाराजगी के भाव साफ नजर आ रहे थे.

रंजना ने उस दिन एक फुलका ज्यादा खाया. उस के ससुरजी ने टैंशन खत्म करने के इरादे से हलकाफुलका वार्त्तालाप शुरू करने की कोशिश की तो उन की पत्नी ने उन्हें घूर कर चुप करा दिया.

रंजना की खामोशी ने झगड़े को बढ़ने नहीं दिया. उस की सास को अगर जरा सा मौका मिल जाता तो वे यकीनन भारी क्लेश जरूर करतीं.

महक की कड़वी बातों का जवाब उस ने हर बार मुसकराते हुए मीठी आवाज में दिया. शयनकक्ष में मोहित ने भी अपनी नाराजगी जाहिर की, ‘‘किसी और की न सही पर तुम्हें कोई भी फैसला करने से पहले मेरी इजाजत तो लेनी ही चाहिए थी. मैं कल तुम्हारे साथ पार्टी में शामिल नहीं होऊंगा.’’

‘‘तुम्हारी जैसी मरजी,’’ रंजना ने शरारती मुसकान होंठों पर सजा कर जवाब दिया और फिर एक चुंबन उस के गाल पर अंकित कर बाथरूम में घुस गई.

रात ठीक 12 बजे रंजना के मोबाइल के अलार्म से दोनों की नींद टूट गई.

‘‘यह अलार्म क्यों बज रहा है?’’ मोहित ने नाराजगी भरे स्वर में पूछा.

‘‘हैपी मैरिज ऐनिवर्सरी, स्वीट हार्ट,’’ उस के कान के पर होंठों ले जा कर रंजना ने रोमांटिक स्वर में अपने जीवनसाथी को शुभकामनाएं दीं.

रंजना के बदन से उठ रही सुगंध और महकती सांसों की गरमाहट ने चंद मिनटों में जादू सा असर किया और फिर अपनी नाराजगी भुला कर मोहित ने उसे अपनी बांहों के मजबूत बंधन में कैद कर लिया.

रंजना ने उसे ऐसे मस्त अंदाज में जी भर कर प्यार किया कि पूरी तरह से तृप्त नजर आ रहे मोहित को कहना ही पड़ा, ‘‘आज के लिए एक बेहतरीन तोहफा देने के लिए शुक्रिया, जानेमन.’’

‘‘आज चलोगे न मेरे साथ?’’ रंजना ने प्यार भरे स्वर में पूछा.

‘‘पार्टी में? मोहित ने सारा लाड़प्यार भुला कर माथे में बल डाल लिए.’’

‘‘मैं पार्क में जाने की बात कर रही हूं, जी.’’

‘‘वहां तो मैं जरूर चलूंगा.’’

‘‘आप कितने अच्छे हो,’’ रंजना ने उस से चिपक कर बड़े संतोष भरे अंदाज में आंखें मूंद लीं. रंजना सुबह 6 बजे उठ कर बड़े मन से तैयार हुई. आंखें खुलते ही मोहित ने उसे सजधज कर तैयार देखा तो उस का चेहरा खुशी से खिल उठा.

‘‘यू आर वैरी ब्यूटीफुल,’’ अपने जीवनसाथी के मुंह से ऐसी तारीफ सुन कर रंजना का मन खुशी से नाच उठा.

खुद को मस्ती के मूड में आ रहे मोहित की पकड़ से बचाते हुए रंजना हंसती हुई कमरे से बाहर निकल गई.

उस ने पहले किचन में जा कर सब के लिए चाय बनाई, फिर अपने सासससुर के कमरे में गई और दोनों के पैर छू कर आशीर्वाद लिया.

चाय का कप हाथ में पकड़ते हुए उस की सास ने चिढ़े से लहजे में पूछा, ‘‘क्या सुबहसुबह मायके जा रही हो, बहू?’’

‘‘हम तो पार्क जा रहे हैं मम्मी,’’ रंजना ने बड़ी मीठी आवाज में जवाब दिया.

सास के बोलने से पहले ही उस के ससुरजी बोल पड़े, ‘‘बिलकुल जाओ, बहू. सुबहसुबह घूमना अच्छा रहता है.’’

‘‘हम जाएं, मम्मी?’’

‘‘किसी काम को करने से पहले तुम ने मेरी इजाजत कब से लेनी शुरू कर दी, बहू?’’ सास नाराजगी जाहिर करने का यह मौका भी नहीं चूकीं.

‘‘आप नाराज न हुआ करो मुझ से, मम्मी. हम जल्दी लौट आएंगे,’’ किसी किशोरी की तरह रंजना अपनी सास के गले लगी और फिर प्रसन्न अंदाज में मुसकराती हुई अपने कमरे की तरफ चली गई.

वह मोहित के साथ पार्क गई जहां दोनों के बहुत से साथी सुबह का मजा ले रहे थे. फिर उस की फरमाइश पर मोहित ने उसे गोकुल हलवाई के यहां आलूकचौड़ी का नाश्ता कराया. दोनों की वापसी करीब 2 घंटे बाद हुई. सब के लिए वे आलूकचौड़ी का नाश्ता पैक करा लाए थे. लेकिन यह बात उस की सास और ननद की नाराजगी खत्म कराने में असफल रही थी. दोनों रंजना से सीधे मुंह बात नहीं कर रही थीं. ससुरजी की आंखों में भी कोई चिंता के भाव साफ पढ़ सकता था. उन्हें अपनी पत्नी और बेटी का व्यवहार जरा भी पसंद नहीं आ रहा था, पर चुप रहना उन की मजबूरी थी. वे अगर रंजना के पक्ष में 1 शब्द भी बोलते, तो मांबेटी दोनों हाथ धो कर उन के पीछे पड़ जातीं.

सजीधजी रंजना अपनी मस्ती में दोपहर का भोजन तैयार करने के लिए रसोई में चली आई. महक ने उसे कपड़े बदल आने की सलाह दी तो उस ने इतराते हुए जवाब दिया, ‘‘दीदी, आज तुम्हारे भैया ने मेरी सुंदरता की इतनी ज्यादा तारीफ की है कि अब तो मैं ये कपड़े रात को ही बदलूंगी.’’

‘‘कीमती साड़ी पर दागधब्बे लग जाने की चिंता नहीं है क्या तुम्हें?’’

‘‘ऐसी छोटीमोटी बातों की फिक्र करना अब छोड़ दिया है मैं ने, दीदी.’’

‘‘मेरी समझ से कोई बुद्धिहीन इनसान ही अपना नुकसान होने की चिंता नहीं करता है,’’ महक ने चिढ़ कर व्यंग्य किया.

‘‘मैं बुद्धिहीन तो नहीं पर तुम्हारे भैया के प्रेम में पागल जरूर हूं,’’ हंसती हुई रंजना ने अचानक महक को गले से लगा लिया तो वह भी मुसकराने को मजबूर हो गई.

रंजना ने कड़ाही पनीर की सब्जी बाजार से मंगवाई और बाकी सारा खाना घर पर तैयार किया.

‘‘आजकल की लड़कियों को फुजूलखर्ची की बहुत आदत होती है. जो लोग खराब वक्त के लिए पैसा जोड़ कर नहीं रखते हैं, उन्हें एक दिन पछताना पड़ता है, बहू,’’ अपनी सास की ऐसी सलाहों का जवाब रंजना मुसकराते हुए उन की हां में हां मिला कर देती रही.

उस दिन उपहार में रंजना को साड़ी और मोहित को कमीज मिली. बदले में उन्होंने महक को उस का मनपसंद सैंट, सास को साड़ी और ससुरजी को स्वैटर भेंट किया. उपहारों की अदलाबदली से घर का माहौल काफी खुशनुमा हो गया था. यह सब को पता था कि सागर रत्ना में औफिस वालों की पार्टी का समय रात 8 बजे का है. जब 6 बजे के करीब मोहित ड्राइंगरूम में पहुंचा तो उस ने अपने परिवार वालों का मूड एक बार फिर से खराब पाया.

‘‘तुम्हें पार्टी में जाना है तो हमारी इजाजत के बगैर जाओ,’’ उस की मां ने उस पर नजर पड़ते ही कठोर लहजे में अपना फैसला सुना दिया.

‘‘आज के दिन क्या हम सब का इकट्ठे घूमने जाना अच्छा नहीं रहता, भैया?’’ महक ने चुभते लहजे में पूछा.

‘‘रंजना ने पार्टी में जाने से इनकार कर दिया है,’’ मोहित के इस जवाब को सुन वे तीनों ही चौंक पड़े.

‘‘क्यों नहीं जाना चाहती है बहू पार्टी में?’’ उस के पिता ने चिंतित स्वर में पूछा.

‘‘उस की जिद है कि अगर आप तीनों साथ नहीं चलोगे तो वह भी नहीं जाएगी.’’

‘‘आजकल ड्रामा करना बड़ी अच्छी तरह से आ गया है उसे,’’ मम्मी ने बुरा सा मुंह बना कर टिप्पणी की.

मोहित आंखें मूंद कर चुप बैठ गया. वे तीनों बहस में उलझ गए.

‘‘हमें बहू की बेइज्जती कराने का कोई अधिकार नहीं है. तुम दोनों साथ चलने के लिए फटाफट तैयार हो जाओ वरना मैं इस घर में खाना खाना छोड़ दूंगा,’’ ससुरजी की इस धमकी के बाद ही मांबेटी तैयार होने के लिए उठीं.

सभी लोग सही वक्त पर सागर रत्ना पहुंच गए. रंजना के सहयोगियों का स्वागत सभी ने मिलजुल कर किया. पूरे परिवार को यों साथसाथ हंसतेमुसकराते देख कर मेहमान मन ही मन हैरान हो उठे थे.

‘‘कैसे राजी कर लिया तुम ने इन सभी को पार्टी में शामिल होने के लिए?’’ संगीता मैडम ने एकांत में रंजना से अपनी उत्सुकता शांत करने को आखिर पूछ ही लिया. रंजना की आंखों में शरारती मुसकान की चमक उभरी और फिर उस ने धीमे स्वर में जवाब दिया, ‘‘दीदी, मैं आज आप को पिछले 1 साल में अपने अंदर आए बदलाव के बारे में बताती हूं. शादी की पहली सालगिरह के दिन मैं अपनी ससुराल वालों के रूखे व कठोर व्यवहार के कारण बहुत रोई थी, यह बात तो आप भी अच्छी तरह जानती हैं.’’

‘‘उस रात को पलंग पर लेटने के बाद एक बड़ी खास बात मेरी पकड़ में आई थी. मुझे आंसू बहाते देख कर उस दिन कोई मुसकरा तो नहीं रहा था, पर मुझे दुखी और परेशान देख कर मेरी सास और ननद की आंखों में अजीब सी संतुष्टि के भाव कोई भी पढ़ सकता था.

‘‘तब मेरी समझ में यह बात पहली बार आई कि किसी को रुला कर व घर में खास खुशी के मौकों पर क्लेश कर के भी कुछ लोग मन ही मन अच्छा महसूस करते हैं. इस समझ ने मुझे जबरदस्त झटका लगाया और मैं ने उसी रात फैसला कर लिया कि मैं ऐसे लोगों के हाथ की कठपुतली बन अपनी खुशियों व मन की शांति को भविष्य में कभी नष्ट नहीं होने दूंगी.

‘‘खुद से जुड़े लोगों को अब मैं ने 2 श्रेणियों में बांट रखा है. कुछ मुझे प्रसन्न और सुखी देख कर खुश होते हैं, तो कुछ नहीं. दूसरी श्रेणी के लोग मेरा कितना भी अहित करने की कोशिश करें, मैं अब उन से बिलकुल नहीं उलझती हूं.

‘‘औफिस में रितु मुझे जलाने की कितनी भी कोशिश करे, मैं बुरा नहीं मानती. ऐसे ही सुरेंद्र सर की डांट खत्म होते ही मुसकराने लगती हूं.’’

‘‘घर में मेरी सास और ननद अब मुझे गुस्सा दिलाने या रुलाने में सफल नहीं हो पातीं. मोहित से रूठ कर कईकई दिनों तक न बोलना अब अतीत की बात हो गई है.

‘‘जहां मैं पहले आंसू बहाती थी, वहीं अब मुसकराते रहने की कला में पारंगत हो गई हूं. अपनी खुशियों और मन की सुखशांति को अब मैं ने किसी के हाथों गिरवी नहीं रखा हुआ है.

‘‘जो मेरा अहित चाहते हैं, वे मुझे देख कर किलसते हैं और मेरे कुछ किए बिना ही हिसाब बराबर हो जाता है. जो मेरे शुभचिंतक हैं, मेरी खुशी उन की खुशियां बढ़ाने में सहायक होती हैं और यह सब के लिए अच्छा ही है.

‘‘अपने दोनों हाथों में लड्डू लिए मैं खुशी और मस्ती के साथ जी रही हूं, दीदी. मैं ने एक बात और भी नोट की है. मैं खुश रहती हूं तो मुझे नापसंद करने वालों के खुश होने की संभावना भी ज्यादा हो जाती है. मेरी सास और ननद की यहां उपस्थिति इसी कारण है और उन दोनों की मौजूदगी मेरी खुशी को निश्चित रूप से बढ़ा रही है.’’ संगीता मैडम ने प्यार से उस का माथा चूमा और फिर भावुक स्वर में बोलीं, ‘‘तुम सचमुच बहुत समझदार हो गई हो, रंजना. मेरी तो यही कामना है कि तुम जैसी बहू मुझे भी मिले.’’

‘‘आज के दिन इस से बढिया कौंप्लीमैंट मुझे शायद ही मिले, दीदी. थैंक्यू वैरी मच,’’ भावविभोर हो रंजना उन के गले लग गई. उस की आंखों से छलकने वाले आंसू खुशी के थे. Hindi Social Story :

Succession Law : पति-पत्नी की मौत, कौन होगा कानूनी वारिस ?

Succession Law : क्या हो जब पतिपत्नी दोनों की ही मृत्यु हो जाए, और दोनों ने कोई वसीयत न कराई हो, तो उन की संपत्ति का संपत्ति का वारिस कौन होगा. जानने के लिए पढ़ें लेख.

लखनऊ के महानगर में रहने वाले पति पत्नी कपिल और उन की पत्नी रोमा की मौत उन के ही घर में अचानक हो गई थी. वह दौर कोरोना का था. ऐसे में दूसरे दिन महल्ले वालों के जरीए पुलिस को पता चला. कपिल ने मरने से पहले अपनी कोई वसीयत नहीं की थी. हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत पत्नी प्रथम श्रेणी की वारिस होती है. लेकिन एक साथ मौत होने पर जब यह पता नहीं होता कि पहले कौन मरा तो स्थिति जटिल हो जाती है. इस को ‘कौमोरिएंट नियम’ के आधार पर हल किया जाता है.

कपिल और रोमा के मामले में रोमा ने अपनी वसीयत लिखवा कर रखी थी. वसीयत में रोमा ने अपनी भतीजी प्रभा को वारिस बना रखा था. कपिल और रोमा के अपनी कोई संतान नहीं थी. ऐसे में अगर रोमा की वसीयत सामने नहीं आती और कपिल की मौत बाद में होती तो यह संपत्ति कपिल के दूसरे श्रेणी के वारिसों यानि भतीजों को संपत्ति चली जाती.

कपिल और रोमा की मौत के बाद अचानक सवाल उठा कि जब दो लोगों की एक ही समय पर मृत्यु हो गई है तो संपत्ति का वारिस कौन होता है ? उत्तराधिकार के ऐसे मामलों में सबसे पहले यह देखा जाता है कि पहले किस की मृत्यु हुई थी. जो पहले मरता है उस की संपत्ति बाद में मरने वाले के नाम हस्तांतरित हो जाती है. उस के उत्तराधिकारी के नाम संपत्ति का दाखिला हो जाता है.

कपिल और रोमा के मामले में पहले कपिल की उत्तराधिकारी रोमा मानी जाएगी. इस के बाद रोमा ने जिस को अपनी संपत्ति की वसीयत की उस को इस पर अधिकार होगा. इस तरह के सवाल तब भी खड़े होते हैं जब एक ही परिवार के कई लोग सामूहिक आत्महत्या कर लेते हैं. कई बार सड़क और दूसरे हादसों में मौत हो जाती है. तब ऐसे सवाल खड़े हो जाते हैं. इस में एक सवाल और खड़ा हो जाता है कि जब यह पता ही न चले कि एक साथ मरने वालों में कौन पहले मरा और कौन बाद में तो उत्तराधिकार कैसे तय होगा ?

उत्तराधिकार का निर्धारण संपत्ति कानून अधिनियम 1925 की धारा 184 द्वारा ऐसे मामलों के लिए दिशानिर्देश दिया गया है. यह अधिनियम बताता है कि जब दो व्यक्तियों की एक साथ मृत्यु हो जाती है और यह निर्धारित करना संभव नहीं होता कि पहले किस की मृत्यु हुई, तो छोटे व्यक्ति को बड़े व्यक्ति से अधिक समय तक जीवित माना जाता है. इस को ‘कौमोरिएंट्स नियम’ के नाम से जाना जाता है.

सामान्य तौर पर यदि पतिपत्नी दोनों की मृत्यु हो जाती है, तो बच्चों को मातापिता की संपत्ति पर पूर्ण अधिकार मिलता है. वे प्रथम श्रेणी के वारिस होते हैं. एक साथ मौत होने पर, संपत्ति बच्चों या अन्य निकटतम कानूनी वारिसों में बंट जाती है. संयुक्त संपत्ति के मामले में भी ‘कौमोरिएंट नियम’ के कारण जीवित रहने का अधिकार लागू नहीं होता और संपत्ति बच्चों को मिलती है.

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के तहत यदि किसी हिंदू महिला की बिना वसीयत के मृत्यु हो जाती है तो उस की संपत्ति प्राथमिक रूप से उस के बच्चों और पति को विरासत में मिलती है. यदि पति या बच्चे मौजूद नहीं हैं तो संपत्ति पति के उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित हो जाती है. जिन मामलों में पति का कोई उत्तराधिकारी नहीं हैं संपत्ति महिला के माता पिता या उन के उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित होती है.

जब संपत्ति किसी स्रोत जैसे मातापिता, ससुराल वाले से विरासत में मिलती है और यदि महिला की मृत्यु बिना किसी प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी के हो जाती है, तो वह उस मूल परिवार को वापस मिल जाती है. हिंदू पुरुषों के मामलो में जब किसी हिंदू पुरुष की बिना वसीयत के मृत्यु हो जाती है तो उस की संपत्ति उस की पत्नी, बच्चों और मां के बीच बराबरबराबर बांट दी जाती है. अगर इन में से कोई भी उत्तराधिकारी मौजूद नहीं है तो संपत्ति पिता को मिल जाती है.

वरासत में कौन होते है उत्तराधिकारी :

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत प्रथम श्रेणी यानि क्लास 1 के उत्तराधिकारी सब से करीबी रिश्तेदार होते हैं जिन्हें बिना वसीयत मृत्यु होने पर संपत्ति में सब से पहले और समान हिस्सा मिलता है. इस में मुख्य रूप से विधवा, पुत्र, पुत्री, माता, और पूर्व मृत पुत्र या पुत्री के बच्चे पोतेपोतियां व विधवा शामिल हैं. यह सभी एक साथ संपत्ति के हकदार होते हैं. पुत्र, पुत्री में जैविक और गोद लिए हुए दोनों बच्चे शामिल होते हैं. प्रथम श्रेणी के सभी उत्तराधिकारी संपत्ति में बराबर हिस्सेदारी पाते हैं.

यदि किसी व्यक्ति के प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारी मौजूद नहीं है तो द्वितीय श्रेणी के उत्तराधिकारियों को संपत्ति में हिस्सा मिलता है. द्वितीय श्रेणी यानि क्लास 2 के उत्तराधिकारियो में वह रिश्तेदार होते हैं जो प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों के न होने पर संपत्ति के हकदार होते हैं. इन में मुख्य रूप से पिता, भाई बहन, दादा दादी, चाचा चाची, मामा मामी और इन के बच्चे भतीजे भतीजी, भांजेभांजी, भाई की विधवा, पिता के भाई बहन, माता के भाई बहन आदि शामिल होते हैं. एक श्रेणी के वारिसों के न होने पर ही अगली श्रेणी के वारिसों को संपत्ति मिलती है. यदि एक ही श्रेणी में एक से अधिक वारिस हों, तो वे संपत्ति को आपस में बराबर बांटते हैं.

अगर किसी मामले में पहली और दूसरी श्रेणी के कोई उत्तराधिकारी न हों, तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत संपत्ति मृतक के सगोत्रों को मिलती है. इन में पुरुष वंश के माध्यम से जुड़े रिश्तेदार जैसे चचेरे भाई हैं. इन में यदि सगोत्र भी न हों, तो सजातीयों को मिलती है, जो किसी भी वंश पुरुष या महिला से जुड़े होते हैं. इन में मौसी, मामा, ममेरे भाई बहन शामिल होते हैं. अगर यह भी न हों, तो संपत्ति राज्य के पास चली जाती है. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के तहत पुरुष मृतक के लिए वरासत का क्रम प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी, सगोत्र, सजातीय और राज्य सरकार का होता है. इसलिए यह जरूरी होता है कि लोग अपनी वसीयत कर के रखे जिस से उन के चाहने वालों को संपत्ति मिल सके. Succession Law :

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