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भोर- राजवी को कैसे हुआ अपनी गलती का एहसास- भाग 1

उस दिन सवेरे ही राजवी की मम्मी की किट्टी फ्रैंड नीतू उन के घर आईं. उन की कालोनी में उन की छवि मैरिज ब्यूरो की मालकिन की थी. किसी की बेटी तो किसी के बेटे की शादी करवाना उन का मनपसंद टाइमपास था. वे कुछ फोटोग्राफ्स दिखाने के बाद एक तसवीर पर उंगली रख कर बोलीं, ‘‘देखो मीरा बहन, इस एनआरआई लड़के को सुंदर लड़की की तलाश है. इस की अमेरिका की सिटिजनशिप है और यह अकेला है, इसलिए इस पर किसी जिम्मेदारी का बोझ नहीं है. इस की सैलरी भी अच्छी है. खुद का घर है, इसलिए दूसरी चिंता भी नहीं है. बस गोरी और सुंदर लड़की की तलाश है इसे.’’

फिर तिरछी नजरों से राजवी की ओर देखते हुए बोलीं, ‘‘उस की इच्छा तो यहां हमारी राजवी को देख कर ही पूरी हो जाएगी. हमारी राजवी जैसी सुंदर लड़की तो उसे कहीं भी ढूंढ़ने से नहीं मिलेगी.’’

यह सब सुन रही राजवी का चेहरा अभिमान से चमक उठा. उसे अपने सौंदर्य का एहसास और गुमान तो शुरू से ही था. वह जानती थी कि वह दूसरी लड़कियों से कुछ हट कर है.

चमकीले साफ चेहरे पर हिरनी जैसी आंखें और गुलाबी होंठ उस के चेहरे का खास आकर्षण थे. और जब वह हंसती थी तब उस के गालों में डिंपल्स पड़ जाते थे. और उस की फिगर व उस की आकर्षक देहरचना तो किसी भी हीरोइन को चैलेंज कर सकती थी.

इस से अपने सौंदर्य को ले कर उस के मन में खुशी तो थी ही, साथ में जानेअनजाने में एक गुमान भी था.

मीरा ने जब उस एनआरआई लड़के की तसवीर हाथ में ली तो उसे देखते ही उन की भौंहें तन गईं. तभी नीतू बोल पड़ीं, ‘‘बस यह लड़का यानी अक्षय थोड़ा सांवला है और चश्मा लगाता है.’’

‘लग गई न सोने की थाली में लोहे की कील,’ मीरा मन में ही भुनभुनाईं. उन्हें लगा कि मेरी राजवी शायद इसे पसंद नहीं करेगी. पर प्लस पौइंट इस लड़के में यह था कि यह नीतू के दूर के किसी रिश्तेदार का लड़का था, इसलिए एनआरआई लड़के के साथ जुड़ी हुई मुसीबतें व जोखिम इस केस में नहीं था. जानापहचाना लड़का था और नीतू एक जिम्मेदार के तौर पर बीच में थीं ही.

फिर कुछ सोच कर मीरा बोलीं, ‘‘ओह, बस इतनी सी बात है. आजकल ये सब देखता कौन है और चश्मा तो किसी को भी लग सकता है. और इंडियन है तो रंग तो सांवला होगा ही. बाकी जैसा तुम कहती हो लड़का स्मार्ट भी है, समझदार भी. फिर क्या चाहिए हमें… क्यों राजवी?’’

अपने ही खयालों में खोई, नेल पेंट कर रही राजवी ने कहा, ‘‘हूं… यह बात तो सही है.’’

तब नीतू ने कहा, ‘‘तुम भी एक बार फोटो देख लो तो कुछ बात बने.’’

‘‘बाद में देख लूंगी आंटी. अभी तो मुझे देर हो रही है,’’ पर तसवीर देखने की चाहत तो उसे भी हो गई थी.

मीरा ने नीतू को इशारे में ही समझा दिया कि आप बात आगे बढ़ाओ, बाकी बात मैं संभाल लूंगी.

मीरा और राजवी के पापा दोनों की इच्छा यह थी कि राजवी जैसी आजाद खयाल और बिंदास लड़की को ऐसा पति मिले, जो उसे संभाल सके और समझ सके. साथ में उसे अपनी मनपसंद लाइफ भी जीने को मिले. उस की ये सभी इच्छाएं अक्षय के साथ पूरी हो सकती थीं.

नीतू ने जातेजाते कहा, ‘‘राजवी, तुम जल्दी बताना, क्योंकि मेरे पास ऐसी बहुत सी लड़कियों की लिस्ट है, जो परदेशी दूल्हे को झपट लेने की ख्वाहिश रखती हैं.’’

नीतू के जाने के बाद मीरा ने राजवी के हाथ में तसवीर थमा दी, ‘‘देख ले बेटा, लड़का ऐसा है कि तेरी तो जिंदगी ही बदल जाएगी. हमारी तो हां ही समझ ले, तू भी जरा अच्छे से सोच लेना.’’पर राजवी तसवीर देखते ही सोच में डूब गई. तभी उस की सहेली कविता का फोन आया. राजवी ने अपने मन की उलझन उस से शेयर की, तो पूरे उत्साह से कविता कहने लगी, ‘‘अरे, इस में क्या है. शादी के बाद भी तो तू अपना एक ग्रुप बना सक ती है और सब के साथ अपने पति को भी शामिल कर के तू और भी मजे से लाइफ ऐंजौय कर सकती है. फिर वह तो फौरेन कल्चर में पलाबढ़ा लड़का है. उस की थिंकिंग तो मौडर्न होगी ही. अब तू दूसरा कुछ सोचने के बजाय उस से शादी कर लेने के बारे में ही सोचना शुरू कर दे…’’

कविता की बात राजवी समझ गई तो उस ने हां कह दिया. इस के बाद सब कुछ जल्दीजल्दी होता गया. 2 महीने बाद नीतू का दूर का वह भतीजा लड़कियों की एक लिस्ट ले कर इंडिया पहुंच गया. उसे सुंदर लड़की तो चाहिए ही थी, पर साथ में वह भारतीय संस्कारों से रंगी भी होनी चाहिए थी. ऐसी जो उसे भारतीय भोजन बना कर प्यार से खिलाए. साथ ही वह मौडर्न सोच और लाइफस्टाइल वाली हो ताकि उस के साथ ऐडजस्ट हो सके. पर उस की लिस्ट की सभी मुलाकात के बाद एकएक कर के रिजैक्ट होती गईं.

तब एक दिन सुबह राजवी के पास नीतू का फोन आया, ‘‘शाम को 7 बजे तक रेडी हो जाना. अक्षय के साथ मुलाकात करनी है. और हां, मीरा से कहना कि वे तुझे अच्छी सी साड़ी पहनाएं.’’

‘‘साड़ी, पर क्यों? मुझ पर जींस ज्यादा सूट करती है,’’ कहते हुए राजवी बेचैन हो गई.

‘‘वह तुम्हारी समझ में नहीं आएगा. तुम साड़ी यही समझ कर पहनना कि उसी में तुम ज्यादा सुंदर और अटै्रक्टिव लगती हो.’’

नीतू आंटी की बात पर गर्व से हंस पड़ी राजवी, ‘‘हां, वह तो है.’’

और उस दिन शाम को वह जब आकर्षक लाल रंग की डिजाइनर साड़ी पहन कर होटल शालिग्राम की सीढि़यां चढ़ रही थी, उस की अदा देखने लायक थी. होटल के मीटिंग हौल में राजवी को दाखिल होता देख सोफे पर बैठा अक्षय उसे देखता ही रह गया.

नीतू ने जानबूझ कर उसे राजवी का फोटो नहीं भेजा था, ताकि मिलने के बाद ही अक्षय उसे ठीक से जान ले, परख ले. नीतू को वहीं छोड़ कर दोनों होटल के कौफी शौप में चले गए.

‘‘प्लीज…’’ कह कर अक्षय ने उसे चेयर दी. राजवी उस की सोच से भी अधिक सुंदर थी. हलके से मेकअप में भी उस के चेहरे में गजब का निखार था. जैसा नाम वैसा ही रूप सोचता हुआ अक्षय मन ही मन में खुश था. फिर भी थोड़ी झिझक थी उस के मन में कि क्या उसे वह पसंद करेगी?

ऐसा भी न था कि अक्षय में कोई दमखम न ?था और अब तो कंपनी उसे प्रमोशन दे कर उस की आमदनी भी दोगुनी करने वाली थी. फिर भी वह सोच रहा था कि अगर राजवी उसे पसंद कर लेती है तो वह उस के साथ मैच होने के लिए अपना मेकओवर भी करवा लेगा. मन ही मन यह सब सोचते हुए अक्षय ने राजवी के सामने वाली चेयर ली.

अक्षय के बोलने का स्मार्ट तरीका, उस के चेहरे पर स्वाभिमान की चमक और उस का धीरगंभीर स्वभाव राजवी को प्रभावित कर गया. उस की बातों में आत्मविश्वास भी झलकता था. कुल मिला कर राजवी को अक्षय का ऐटिट्यूड अपील कर गया.

उस मुलाकात के बाद दोनों ने एकदूसरे को दूसरे दिन जवाब देना तय किया. पर उसी दिन रात में राजवी ने अक्षय को फोन लगाया, ‘‘एक बात का डिस्कशन तो रह गया. क्या शादी के बाद मैं आगे पढ़ाई कर सकती हूं? और क्या मैं आगे जा कर जौब कर सकती हूं? अगर आप को कोई एतराज नहीं तो मेरी ओर से इस रिश्ते को हां है.’’

‘‘ओह. इस में पूछने वाली क्या बात है? मैं मौडर्न खयालात का हूं क्योंकि मौडर्न समाज में पलाबढ़ा हूं. नारी स्वतंत्रता मैं समझता हूं, इसलिए जैसी तुम्हारी मरजी होगी, वैसा तुम कर सकोगी.’’

अक्षय को भी राजवी पसंद आ गई थी, उसे इतनी सुंदर पत्नी मिलेगी, उस की कल्पना ही उस को रोमांचित कर देने के लिए काफी थी.

फिर तो जल्दी ही दोनों की शादी हो गई. रिश्तेदारों की उपस्थिति में रजिस्टर्ड मैरिज कर के 4 ही दिनों के बाद अक्षय ने अमेरिका की फ्लाइट पकड़ ली और उस के 2 महीने बाद आंखों में अमेरिका के सपने संजोए और दिल में मनपसंद जिंदगी की कल्पना लिए राजवी ने ससुराल का दरवाजा खटखटाया.

मंजिल तक भाग 1

कुमार रंगा अपनी प्रेमिका सोनिया की खुशियों के लिए धर्मा ने अपनी जमीन तक बेच दी और उसे अमेरिका पढ़ने भेज दिया. मगर वहां जा कर सोनिया धर्मा को भूल अपराध की दुनिया में जा फंसी और फिर वही हुआ जिस की कल्पना खुद उस ने भी नहीं की थी. धर्मा ने ट्रैक्टर को एक किनारे लगाया और कूद कर पास बहते नल के नीचे बैठ गया. दिनभर की कड़ी मेहनत का पसीना और पानी की बूंदें आपस में यों मिल गईं जैसे सदियों से बिछड़े प्रेमी युगल मिलते हैं.

कुछ समय के लिए धर्मा मानो गरमी से कहीं दूर जा चुका था. आंखें बंद कर के भारत से कहीं दूर पश्चिम के किसी देश में पहुंच गया था और वहां की ठंडी हवाएं उसे जमा रही थीं और सर्दी ने उस के बदन को जकड़ लिया था कि अचानक भाभी की आवाज उस के कानों में पड़ी, ‘‘थक गया धर्मा, आज गरमी ने भी न जाने कब का बदला चुकाया है. इतनी चिलचिलाती धूप, बादल का कहीं नाम ही नहीं और उस पर तुम्हें दिनभर खेत में रहना पड़ता है,’’ भाभी के हाथ से तौलिया लेते हुए धर्मा मुसकराते हुए बोला, ‘किसान धूप में नहीं जाएगा तो क्या साहूकार जाएंगे. असली किसान का तो मंदिर, पूजापाठ, गुरुद्वारा सब खेत की मिट्टी में ही है.’’ भाभी ने धर्मा की इन बातों को सुन कर अनसुना कर दिया, ‘‘तू यहां खुश नहीं है धर्मा, तु?ो सोतेजागते, उठतेबैठते परदेस याद आता है.’’ ‘‘यह तो नहीं पता भाभी, लेकिन एक सपना जरूर है कि अमेरिका जाऊं, वहां रहूं, मजे करूं लेकिन क्या करूं पढ़ालिखा नहीं हूं न, इंग्लिश के 4 लफ्ज नहीं आते.’’ ‘‘हां, सो तो है. अगर तेरे भैया जिंदा होते तो शायद, तेरे जाने का कुछ…’’ ‘‘उदास मत हो भाभी, आप तो जानती हैं कि मैं आप को और भतीजे को हमेशा खुश देखना चाहता हूं. मेरी तरफ से हमेशा कोशिश रहती है कि आप दोनों को कोई तकलीफ न हो.’’ ‘‘अच्छा, मु?ो तुम से एक काम है. मेरी सहेली सोनिया आई हुई है. उसे कुछ पैसे चाहिए. रकम बड़ी है,

इसलिए हो सकता है अपनी जमीन का एक टुकड़ा गिरवी रखना पड़े या बेचना पड़ जाए. मैं ने उस से वादा कर दिया कि उस का काम हो जाएगा. वह चंद महीनों में ही पैसे वापस कर देगी, यह मेरा तु?ा से वादा है.’’ ‘‘भाभी, आप क्या नहीं जानतीं कि वह पैसे लेने के बाद तुम से भी कन्नी काट लेगी. वह तुम्हें बेवकूफ बना रही है. मु?ो बताना पड़ेगा क्या कि वह कितनी मतलबी और खुदगर्ज है.’’ ‘‘होगी, मगर शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा.’’ ‘‘शादी? किस की शादी भाभी, आप तो आज पहेलियां बु?ा रही हैं. मु?ो आप की बात पल्ले नहीं पड़ रही.’’ ‘‘देख धर्मा, मैं जानती हूं कि तुम्हें सोनिया पसंद है. सिर्फ उस की फितरत थोड़ी कम पसंद है. तू उस से शादी कर ले. मैं वादा करती हूं कि उस की आदतें बदल जाएंगी, फिर परदेस जाएगी तो जमाने की ठोकरें और तेरा साथ उसे बदल देगा.’’

‘‘परदेस, अब यह क्या पहेली है भाभी?’’ ‘‘साफसाफ सुन धर्मा, सोनिया अमेरिका जाएगी और तु?ो वहीं बुला लेगी और इस तरह तेरा सपना भी पूरा हो जाएगा और घर में एक सुंदर, पढ़ीलिखी बहू भी आ जाएगी. इस में ही सब का भला है, तेरामेरा, सोनिया का और अपने परिवार का. जानता है, पूरे गांव में सिर्फ हमारे परिवार से कोई अमेरिका या कनाडा नहीं गया, कितना बुरा लगता है .’’ ‘‘देख लो भाभी, मैं तो अनपढ़ हूं, आप तो पढ़ीलिखी हो, सुंदर हो, 10वीं पास भी हो, स्मार्ट हो, मु से ज्यादा चीजों की बारीकियों को सम?ाती हो, आप कह रही हैं तो ठीक ही कह रही होंगी.’’ धर्मा ने देखा, भाभी फूल कर कुप्पा हो रही थीं.

लेखक-राकेश कुमार 

दस्विदानिया : उसने रूसियों को क्या गिफ्ट दिया – भाग 1

दीपक उत्तरी बिहार के छोटे से शहर वैशाली का रहने वाला था. वैशाली पटना से लगभग 30 किलोमीटर दूर है. 1982 में गंगा नदी पर गांधी सेतु बन जाने के बाद वैशाली से पटना आनाजाना आसान हो गया था. वैशाली की अपनी एक अलग ऐतिहासिक पहचान भी है.

दीपक इसी वैशाली के एनएनएस कालेज से बीएससी कर रहा था. उस की मां का देहांत बचपन में ही हो चुका था. उस के पिता रामलाल की कपड़े की दुकान थी. दुकान न छोटी थी न बड़ी. आमदनी बस इतनी थी कि बापबेटे का गुजारा हो जाता था. बचत तो न के बराबर थी. वैशाली में ही एक छोटा सा पुश्तैनी मकान था. और कोई संपत्ति नहीं थी. दीपक तो पटना जा कर पढ़ना चाहता था, पर पिता की कम आमदनी के चलते ऐसा नहीं हो सका.

दीपक अभी फाइनल ईयर में ही था कि अचानक दिल के दौरे से उस के पिता भी चल बसे. उस ने किसी तरह पढ़ाई पूरी की. वह दुकान पर नहीं बैठना चाहता था. अब उसे नौकरी की तलाश थी. उस ने तो इंडियन सिविल सर्विस के सपने देखे थे या फिर बिहार लोक सेवा आयोग के द्वारा राज्य सरकार के अधिकारी के. पर अब तो उसे नौकरी तुरंत चाहिए थी.

दीपक ने भारतीय वायुसेना में एअरमैन की नियुक्ति का विज्ञापन पढ़ा, तो आवेदन कर दिया. उसे लिखित, इंटरव्यू और मैडिकल टैस्ट सभी में सफलता मिली. उस ने वायुसेना के टैक्नीकल ट्रेड में एअरमैन का पद जौइन कर लिया. ट्रेनिंग के बाद उस की पोस्टिंग पठानकोट एअरबेस में हुई. ट्रेनिंग के दौरान ही वह सीनियर अधिकारियों की प्रशंसा का पात्र बन गया. पोस्टिंग के बाद एअरबेस पर उस की कार्यकुशलता से सीनियर अधिकारी बहुत खुश थे.

वायुसेना के रसियन प्लेन को बीचबीच में मैंटेनैंस के लिए रूस जाना पड़ता था. दीपक के अफसर ने उसे बताया कि उसे भी जल्दी रूस जाना होगा. वह यह सुन कर बहुत खुश हुआ. उस ने जल्दीजल्दी कुछ आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले रसियन शब्द और वाक्य सीख लिए. अपने एक दोस्त, जो 2 बार रूस जा चुका था से हैवी रसियन ओवरकोट भी उधार ले लिया. रूस की जबरदस्त ठंड के लिए यह जरूरी था.

1 महीने के अंदर ही दीपक को एक रसियन प्लेन के साथ बेलारूस की राजधानी मिंस्क जाना पड़ा. उस जहाज का कारखाना वहीं था. तब तक सोवियत संघ का बंटवारा हो चुका था और बेलारूस एक अलग राष्ट्र बन गया था.

अपने दोस्तों की सलाह पर उस ने भारत से कुछ चीजें जो रूसियों को बेहद पसंद थीं रख लीं. ये स्थानीय लोगों को मित्र बनाने में काम आती थीं. चूंकि जहाज अपना ही था, इसलिए वजन की सीमा नहीं थी. उस ने टूथपेस्ट, परफ्यूम, सुगंधित दार्जिलिंग चायपत्ती, ब्रैंडेड कौस्मैटिक आदि साथ रख लिए.

‘‘लेडीज कौस्मैटिक वहां की लड़कियों को इंप्रैस करने में बहुत काम आएंगे,’’ ऐसा चलते समय दोस्तों ने कहा था.

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मिंस्क में लैंड करने के बाद दीपक का सामना जोरदार ठंड से हुआ. मार्च के मध्य में भी न्यूनतम तापमान शून्य से थोड़ा नीचे था. मिंस्क में उस के कम से कम 2 सप्ताह रुकने की संभावना थी. खैर, उस के मित्र का ओवरकोट प्लेन से निकलते ही काम आया.

दीपक के साथ पायलट, कोपायलट, इंजीनियर और क्रू  मैंबर्स भी थे. दीपक को एक होटल में एक सहकर्मी के साथ रूम शेयर करना था. वह दोस्त पहले भी मिंस्क आ चुका था. उस ने दीपक को रसियन से दोस्ती के टिप्स भी दिए.

अगले दिन से दीपक को कारखाना जाना था. उस की टीम को एक इंस्ट्रक्टर जहाज के कलपुरजों, रखरखाव के बारे में रूसी भाषा में समझाता था. साथ में एक लड़की इंटरप्रेटर उसे अंगरेजी में अनुवाद कर समझाती थी.

नताशा नाम था उस लड़की का. बला की खूबसूरत थी वह. उम्र 20 साल के आसपास होगी. गोरा रंग तो वहां सभी का होता है, पर नताशा में कुछ विशेष आकर्षण था जो जबरन किसी को उस की तारीफ करने को मजबूर कर देता. सुंदर चेहरा, बड़ीबड़ी नीली आंखें, सुनहरे बाल और छरहरे बदन को दीपक ने पहली बार इतने करीब से देखा था.

दीपक की नजरें बारबार नताशा पर जा टिकती थीं. जब कभी नताशा उस की ओर देखती दीपक अपनी निगाहें फेर लेता. वह धीमे से मुसकरा देती. जब वह सुबहसुबह मिलती तो दीपक हाथ मिला कर रूसी भाषा में गुड मौर्निंग यानी दोबरोय उत्रो बोलता और कुछ देर तक उस का हाथ पकड़े रहता.

नताशा मुसकरा कर गुड मौर्निंग कह आगे बोलती कि प्रस्तिते पजालास्ता ऐक्सक्यूज मी, प्लीज, हाथ तो छोड़ो. तब दीपक झेंप कर जल्दी से उस का हाथ छोड़ देता.

उस की हरकत पर उस के साथी और इंस्ट्रक्टर भी हंस पड़ते थे. लंच के समय कारखाने की कैंटीन में दीपक, नताशा और इंस्ट्रक्टर एक ही टेबल पर बैठते थे. 1 सप्ताह में वे कुछ फ्रैंक हो गए थे. इस में इंडिया से साथ लाए गिफ्ट आइटम्स की अहम भूमिका थी.

नताशा के साथ अब कुछ पर्सनल बातें भी होने लगी थीं. उस ने दीपक को बताया कि रूसी लोग इंडियंस को बहुत पसंद करते हैं. उस के मातापिता का डिवोर्स बहुत पहले हो चुका था और कुछ अरसा पहले मां का भी देहांत हो गया था. उस के पिता चेर्नोबिल न्यूक्लियर प्लांट में काम करते थे और वह उन से मिलती रहती थी.

लगभग 10 दिन बाद दीपक को पता चला कि प्लेन को क्लीयरैंस मिलने में अभी 10 दिन और लगेंगे. एक दिन दीपक ने इंस्ट्रक्टर से कहा कि उस की मास्को देखने की इच्छा है.

इंस्ट्रक्टर ने कहा, ‘‘ओचिन खराशो (बहुत अच्छा) शनिवार को नताशा भी किसी काम से मास्को जा रही है. तुम भी उसी की फ्लाइट से चले जाओ. मात्र 1 घंटे की फ्लाइट है.’’

‘‘स्पासिबा (थैंक्स) गुड आइडिया,’’ दीपक बोला और फिर उसी समय नताशा से फोन पर अपनी इच्छा बताई तो वह बोली नेत प्रौब्लेमा (नो प्रौब्लम).

दीपक बहुत खुश हुआ. उस ने अपने दोस्त से मास्को यात्रा की चर्चा करते हुए पूछा, ‘‘अगर मुझे किसी रूसी लड़की के कपड़ों की तारीफ करनी हो तो क्या कहना चाहिए?’’

जवाब में दोस्त ने उसे एक रूसी शब्द बताया. शनिवार को दीपक और नताशा मास्को पहुंचे. दोनों होटल में आसपास के कमरों में रुके. नताशा ने उसे क्रेमलिन, बोलशोई थिएटर, बैले डांस, रसियन सर्कस आदि दिखाए.

1 अप्रैल की सुबह दोनों मिले. उसी दिन शाम को उन्हें मिंस्क लौटना था. नताशा नीले रंग के लौंग फ्रौक में थी, कमर पर सुनहरे रंग की बैल्टनुमा डोरी बंधी थी, जिस के दोनों छोरों पर पीले गुलाब के फूलों की तरह झालर लटक रही थी. फ्रौक का कपड़ा पारदर्शी तो नहीं था, पर पतला था जिस के चलते उस के अंत:वस्त्र कुछ झलक रहे थे. वह दीपक के कमरे में सोफे पर बैठी थी.

दीपक बोला, ‘‘दोबरोय उत्रो. तिह क्रासावित्सा (यू आर लुकिंग ब्यूटीफुल).’’

‘‘स्पासिबा (धन्यवाद).’’

वह नताशा की ओर देख कर बोला ‘‘ओचिन खराशो तृसिकी.’’

‘‘व्हाट? तुम ने कैसे देखा?’’

‘‘अपनी दोनों आंखों से.’’

‘‘तुम्हारी आंखें मुझ में बस यही देख रही थीं?’’

फिर अचानक नताशा सोफे से उठ

खड़ी हुई और बोली, ‘‘मैं इंडियंस की इज्जत करती हूं.’’

‘‘दा (यस).’’

‘‘व्हाट दा. मैं तुम्हें अच्छा आदमी समझती थी. मुझे तुम से ऐसी उम्मीद नहीं थी,’’ और फिर बिना दीपक की ओर देखे कमरे से तेजी से निकल गई.

दीपक को मानो लकवा मार गया. वह नताशा के कमरे के दरवाजे की जितनी बार बैल बजाता एक ही बात सुनने को मिलती कि चले जाओ. मैं तुम से बात नहीं करना चाहती हूं.

उसी दिन शाम की फ्लाइट से दोनों मिंस्क लौट आए. पर नताशा ने अपनी सीट अलग ले ली थी. दोनों में कोई बात नहीं हुई.

अगले दिन लंच के समय कारखाने की कैंटीन में दीपक, उस का मित्र,

नताशा और इंस्ट्रक्टर एक टेबल पर बैठे थे. दीपक बारबार नताशा की ओर देख रहा था पर नताशा उसे नजरअंदाज कर देती. दीपक ने इंस्ट्रक्टर के कान में धीरे से कुछ कहा तो इंस्ट्रक्टर ने नताशा से धीरे से कुछ कहा.

नताशा से कुछ बात कर इंस्ट्रक्टर ने दीपक से पूछा, ‘‘तुम ने नताशा से कोई गंदी बात की थी? वह बहुत नाराज है तुम से.’’

‘‘मैं ने तो ऐसी कोई बात नहीं की थी,’’ बोल कर दीपक ने जो आखिरी बात नताशा को कही थी उसे दोहरा दिया.

इंस्ट्रक्टर ने भी सिर पीटते हुए कहा, ‘‘बेवकूफ यह तुम ने क्या कह दिया? इस का मतलब समझते हो?’’

‘‘हां, तुम्हारी ड्रैस बहुत अच्छी है?’’

‘‘नेत (नो), इस का अर्थ तुम्हारी पैंटी बहुत अच्छी है, होता है बेवकूफ.’’

तब दीपक अपने मित्र की ओर सवालिया आंखों से देखने लगा. फिर कहा, ‘‘तुम ने ही सिखाया था यह शब्द मुझे.’’

नताशा भी आश्चर्य से उस की तरफ देखने लगी थी. दोस्त भी अपनी सफाई में बोला, ‘‘अरे यार मैं ने तो यों ही बता दिया था. मुझे लेडीज ड्रैस का यही एक शब्द आता था. मुझे क्या पता था कि तू नताशा को बोलने जा रहा है. आई एम सौरी.’’

फिर नताशा की ओर देख कर बोला, ‘‘आई एम सौरी नताशा. मेरी वजह से यह गड़बड़ हुई है. दरअसल, दीपक ने तुम्हारी ड्रैस की तारीफ करनी चाही होगी… यह बेचारा बेकुसूर है.’’

यह सुन कर सभी एकसाथ हंस पड़े.

दीपक ने नताशा से कहा, ‘‘ईजवीनीते (सौरी) नताशा. मैं ने जानबूझ कर उस समय ऐसा नहीं कहा था.’’

‘‘ईजवीनीते. प्रस्तिते (सौरी, ऐक्सक्यूज मी). हम दोनों गलतफहमी के शिकार हुए.’’

इंस्ट्रक्टर बोला, ‘‘चलो इसे भी एक अप्रैल फूल जोक समझ कर भूल जाओ.’’

इस के बाद नताशा और दीपक में मित्रता और गहरी हो चली. दोनों शालीनतापूर्वक अपनी दोस्ती निभा रहे थे. दीपक तो इस रिश्ते को धीरेधीरे दोस्ती से आगे ले जाना चाहता था, पर कुछ संकोच से, कुछ दोस्ती टूटने के भय से और कुछ समय के अभाव से मन की बात जबान पर नहीं ला रहा था.

इसी बीच दीपक के इंडिया लौटने का दिन भी आ गया था. एअरपोर्ट पर नताशा दीपक को बिदा करने आई थी. उस ने आंखों में छलक आए आंसू छिपाने के लिए रंगीन चश्मा पहन लिया. दीपक को पहली बार महसूस हुआ जैसे वह भी मन की कुछ बात चाह कर भी नहीं कर पा रही है. दीपक के चेहरे की उदासी किसी से छिपी नहीं थी.

‘‘दस्विदानिया, (गुड बाई), होप टु सी यू अगेन,’’ बोल कर दोनों गले मिले.

दीपक भारत लौट आया. नताशा से उस का संपर्क फोन से लगातार बना हुआ था. इसी बीच डिपार्टमैंटल परीक्षा और इंटरव्यू द्वारा दीपक को वायुसेना में कमीशन मिल गया. वह अफसर बन गया. हालांकि उस के ऊपर कोई बंदिश नहीं थी, उस के मातापिता गुजर चुके थे, फिर भी अभी तक उस ने शादी नहीं की थी.

इस बीच नताशा ने उसे बताया कि उस के पापा भी चल बसे. उन्हें कैंसर था. संदेह था कि चेर्नोबिल न्यूक्लियर प्लांट में हुई भयानक दुर्घटना के बाद कुछ लोगों में रैडिएशन की मात्रा काफी बढ़ गई थी. शायद उन के कैंसर की यही वजह रही होगी.

पिता की बीमारी में नताशा महीनों उन के साथ रही थी. इसलिए उस ने नौकरी भी छोड़ दी थी. फिलहाल कोई नौकरी नहीं थी और पिता के घर का कर्ज भी चुकाना था. वह एक नाइट क्लब में डांस कर और मसाज पार्लर जौइन कर काम चला रही थी. उस ने दीपक से इस बारे में कुछ नहीं कहा था, पर बराबर संपर्क बना हुआ था.

लगभग 2 साल बाद दीपक दिल्ली एअरपोर्ट पर था. अचानक उस

की नजर नताशा पर पड़ी. वह दौड़ कर उस के पास गया और बोला, ‘‘नताशा, अचानक तुम यहां? मुझे खबर क्यों नहीं की?’’

नताशा भी अकस्मात उसे देख कर घबरा उठी. फिर अपनेआप को कुछ सहज कर कहा, ‘‘मुझे भी अचानक यहां आना पड़ा. समय नहीं मिल सका बात करने के लिए…तुम यहां कैसे?’’

‘‘मैं अभी एक घरेलू उड़ान से यहां आया हूं. खैर, चलो कहीं बैठ कर कौफी पीते हैं. बाकी बातें वहीं होंगी.’’

दोनों एअरपोर्ट के रेस्तरां में बैठे कौफी पी रहे थे. दीपक ने फिर पूछा, ‘‘अब बताओ यहां किस लिए आई हो?’’

नताशा खामोश थी. फिर कौफी की चुसकी लेते हुए बोली, ‘‘एक जरूरी काम से किसी से मिलना है. 2 दिन बाद लौट जाऊंगी.’’

‘‘ठीक है पर क्या काम है, किस से मिलना है, मुझे नहीं बताओगी? क्या मैं भी तुम्हारे साथ चल सकता हूं?’’

‘‘नहीं, मुझे वहां अकेले ही जाना होगा.’’

‘‘चलो, मैं तुम्हें ड्रौप कर दूंगा.’’

‘‘नेत, स्पासिबा (नो, थैंक्स). मेरी कार बाहर खड़ी होगी.’’

‘‘कार को वापस भेज देंगे. कम से कम कुछ देर तक तो तुम्हारे साथ ऐंजौय कर लूंगा.’’

‘‘क्यों मेरे पीछे पड़े हो?’’ बोल कर नताशा उठ कर जाने लगी.

दीपक ने उस का हाथ पकड़ कर रोका और कहा, ‘‘ठीक है, तुम जाओ, मगर मुझ से नाराजगी का कारण बताती जाओ.’’

नताशा तो रुक गई, पर अपने आंसुओं को गालों पर गिरने से न रोक सकी.

दीपक के द्वारा बारबार पूछे जाने पर वह रो पड़ी और फिर उस ने अपनी पूरी कहानी बताई, ‘‘मैं तुम से क्या कहती? अभी तक तो मैं सिर्फ डांस या मसाज करती आई थी पर मैं पिता का घर किसी भी कीमत पर बचाना चाहती हूं. मैं ने एक ऐस्कौर्ट एजेंसी जौइन कर ली है. शायद आने वाले 2 दिन मुझे किसी बड़े बिजनैसमैन के साथ ही गुजारने पड़ेंगे. तुम समझ रहे हो न मैं क्या कहना

चाहती हूं? ’’

‘‘हां, मैं समझ सकता हूं. तुम्हें किस ने हायर किया है, मुझे बता सकती हो?’’

‘‘नो, सौरी. हो सकता है जो नाम मैं जानती हूं वह गलत हो. मैं ने भी उसे अपना सही नाम नहीं बताया है. वैसे भी इस प्रोफैशन की बात किसी तीसरे आदमी को हम नहीं बताते हैं. मैं बस इतना जानती हूं कि मुझे 3 दिनों के लिए 4000 डौलर मिले हैं.’’

‘‘तुम उसे फोन करो, उसे पैसे वापस कर देंगे.’’

‘‘नहीं, यह आसान नहीं है. वह मेरी एजेंसी का पुराना भरोसे वाला ग्राहक है.’’

New Year Special : नया कैलेंडर

नए साल की पहली सुबह थी. बच्चों ने बिस्तर छोड़ने के साथ ही मुझे और आकाश को नए साल की मुबारकबाद दी. रसोई में जा कर मैं ने नववर्ष का विशेष व्यंजन बनाने के लिए सामग्री का चुनाव किया. फिर चाय ले कर मैं बाबूजी के कमरे में गई. आकाश वहीं पिता से सट कर बैठे थे. मैं ने स्टूल पर चाय रखी और आकाश से मुखातिब हो कर कहा, ‘‘चाय पी कर बाजार निकल जाइए, सब्जी वगैरह ले आइए.’’

‘‘नए साल की शुरुआत गुलामी से?’’ आकाश ने आंखें तरेर कर कहा.

मैं कुछ कहती इस से पूर्व ही बाबूजी ने कहा, ‘‘घर का काम करना खुशी की बात होती है, गुलामी की नहीं.’’चाय पी कर ज्यों ही मैं उठने को हुई, चंदनजी का स्कूटर सरसराता हुआ आ कर रुक गया.

‘‘नए साल की बहुतबहुत बधाई हो,’’ कह कर उन्होंने आकाश, बाबूजी एवं मुझे नमस्कार किया.

बाबूजी ने कहा, ‘‘नए साल का पहला मेहमान आया है. मुंह मीठा कराओ, दुलहन.’’

‘‘जी, बाबूजी, अभी लाई,’’ कह कर ज्यों ही मैं उठने लगी, चंदनजी ने 2 प्लास्टिक के थैले मुझे पकड़ाते हुए कहा, ‘‘एक में मिठाई है बच्चों के लिए, दूसरे में चिकन है, आकाश साहब के लिए.’’

‘‘और मेरे लिए?’’ बाबूजी ने शरारती बच्चों की तरह पूछा.

‘‘नए साल का कलैंडर और डायरी लाया हूं चाचाजी,’’ कह कर चंदनजी ने भारतीय जीवन बीमा निगम का एक खूबसूरत कलैंडर अपने थैले से निकाल कर दीवार पर टांग दिया. राजस्थानी वेशभूषा से सुसज्जित 8-10 युवतियां, परंपरागत आभूषणों से लदी नृत्य कर रही थीं. पृष्ठभूमि में चमकीली रेत और रेत पर पड़ती सूर्य की सुनहरी किरणें बहुत आकर्षक लग रही थीं. डायरी भी बेहद खूबसूरत थी.

‘‘इतना सब करने की क्या जरूरत थी?’’ बाबूजी ने स्नेहपूर्वक कहा.

‘‘आप के प्यार और सहयोग से इस वर्ष मैं ने रिकौर्ड व्यवसाय दिया है. बोनस भी भरपूर मिला है. आप लोगों को पहले जानता नहीं था, कुछ खिलायापिलाया नहीं. इसे एक बेटे की कमाई समझ कर स्वीकार कीजिए.’’

‘‘अच्छी बात है बेटे. मगर आज दिन का खाना तुम मेरे साथ खाओ तब मुझे आनंद आएगा,’’ बाबूजी ने कहा.

‘‘ऐसा है चाचाजी, मुझे आज 7-8 और घनिष्ठ मित्रों के घर मिठाई पहुंचानी है. सुप्रियाजी के ससुर के लिए मछली लेनी है. इसलिए आज आप मुझे क्षमा कर दें. मेरा लाया कलैंडर हर पल आप के साथ है न,’’ कह कर चंदनजी ने आज्ञा ली और हाथ जोड़ कर मुझे नमस्कार किया.उन के जाने के बाद बाबूजी ने कहा, ‘‘दुलहन का यह सहकर्मी भला इंसान है. देखो तो, सब की रुचि के अनुसार नववर्ष की भेंट दे कर चला गया. आजकल के युग में ऐसे भलेमानुष दुर्लभ हैं. आकाश बेटे, तुम्हारा क्या विचार है?’’

‘‘मैं आप से विपरीत विचार रखता हूं. मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि अति विनम्रता, अकारण विनम्रता व्यक्ति की धूर्तता पर पड़ा आवरण है. मुझे यह व्यक्ति मतलबी, धोखेबाज और…’’

आकाश की बात बीच में ही काटते हुए मैं ने कहा, ‘‘आप को तो हर बात में मनोविज्ञान नजर आने लगता है. अकारण किसी पर संदेह करना कौन सा बड़प्पन है? कालेज में वे सब के सुखदुख में शामिल रहने वाले आदमी हैं.’’

‘‘ओहो, आप दोनों बहस करने बैठ गए. देखिए, चंदन चाचा का दिया, कलैंडर कितना खूबसूरत है,’’ बेटे ने पिता के गले में बांहें डाल कर लाड़ जताते हुए कहा.

‘‘वाह, साल का नया कलैंडर. बेटे, यह तो मछली को फंसाने के लिए फेंका गया चारा है…चारा. चंदन बीमा एजेंट है और नएनए लोगों को येनकेन प्रकारेण आकर्षित करना उस का खास शगल है,’’ आकाश ने मुंह बनाते हुए कहा और उठ कर स्नानघर में चले गए.

कालेज में सुप्रिया से भेंट हुई. वह मेरी अंतरंग सहेली थी. उस से मैं ने चंदन वाली बात बताई तो उस ने भी मेरे विचारों से सहमत होते हुए कहा, ‘‘ये पति लोग भी बड़े अजीब होते हैं, हमारे मुंह से किसी की तारीफ सुन ही नहीं सकते. कोई न कोई मीनमेख जरूर निकाल लेंगे. न हुआ तो उसे आवारा, बदचलन ही साबित कर देंगे.’’

‘‘ठीक कहती हो तुम. आकाश को भी हर चीज में गड़बड़ नजर आती है. पर मेरे बाबूजी बहुत भले आदमी हैं. वे ही मेरे सब से बड़े हिमायती हैं.’’

‘‘क्या बातें हो रही हैं?’’ दूर से आते हुए चंदनजी ने कहा.

‘‘जी, कुछ नहीं, नई समयसारणी की चर्चा हो रही थी. 2-2 पीरियड खाली रहने के बाद शाम तक क्लास…’’ सुप्रिया ने बात बदलते हुए कहा.

‘‘लाइए, समयसारणी मुझे दे दीजिए और कक्षाएं कैसेकैसे ऐडजस्ट करनी हैं, इस पर पीछे लिख दीजिए. मैं इंचार्ज से कह कर ठीक करवा दूंगा,’’ चंदन ने विनम्रता से कहा.

सुप्रिया ने समयसारणी निकाली और इच्छानुसार हम दोनों की कक्षाएं निर्धारित कर कागज के पीछे लिख दीं. फिर कागज चंदन को देते हुए कहा, ‘‘इंचार्ज तो बड़े टेढ़े आदमी हैं, संभव है, इसे स्वीकार नहीं करेंगे.’’

‘‘उन्हें समझाना और मनाना मेरा काम है, आप निश्ंचत रहें.’’

‘‘लो, चंदन बहुत ही नेक इंसान है. मैं ने उसे एक झूठी बात कही तो उस ने उस मुश्किल को भी आसान कर दिया,’’ सुप्रिया ने कहा.

‘‘चल, कैंटीन में बैठ कर चाय पीते हैं,’’ कह कर मैं ने सुप्रिया का हाथ थामा और कैंटीन की ओर बढ़ गई.

20 जनवरी को चंदनजी हमारी पदोन्नति का आदेश ले कर रसायनशास्त्र विभाग में पधारे. हमारी खुशी का तो ठिकाना ही नहीं था. घर बैठे, बिना कुलपति, कुलसचिव की जीहुजूरी किए पदोन्नति हमारी कल्पना से परे थी, अविश्वसनीय थी. सब ने हमें बधाई दी और एक स्वर में कहा, ‘‘चंदन ने आप दोनों के लिए बहुत परिश्रम किया, उसे तो इनाम मिलना चाहिए.’’

इनाम शब्द कह कर कुछ लोग बड़े अजीब ढंग से मुसकराए, जो हमें अजीब लगा.

बाबूजी को जब मैं ने अपनी पदोन्नति का कागज दिया तो वे बेहद खुश हुए और चंदनजी को मन ही मन शुभकामनाएं दीं. दिन बीतते रहे. फरवरी माह में आयकर की विवरणी के संबंध में कार्यालय से एक नोटिस मिला. उस में चेतावनी थी कि अगर हम ने 40 हजार रुपयों का राष्ट्रीय बचतपत्र अथवा अन्य उपाय नहीं किए तो लगभग 8 हजार रुपए आयकर के रूप में जमा करने होंगे. हर वर्ष इस प्रकार की स्थिति आती थी और सामान्यतया आकाश की इच्छानुसार मैं आयकर ही देती आई थी. इस बार भी मेरे जिक्र करने पर आकाश ने कहा, ‘‘8 हजार रुपए बचाने के लिए 40 हजार रुपए निवेश करना हमारे लिए मुश्किल है. हाउसिंग बोर्ड को पैसे देने हैं, बच्चों का दाखिला है…आयकर दे देना.’’

अकसर मैं वही करती थी जो आकाश चाहते थे. इस से 2 लाभ होते, एक तो परिणाम से मैं निश्ंिचत रहती. जो भी होता, अच्छा या बुरा, आकाश के ऊपर उस की जवाबदेही होती. दूसरे, इस से परिवार में असीम सुख एवं शांति रहती थी. दूसरे दिन दोपहर में मैं अपने ससुर के साथ बैठी पुरानी तसवीरों का अलबम पलट रही थी कि चंदनजी आ गए. बाबूजी को प्रणाम किया और मगही पान का बीड़ा उन को दे कर बोले, ‘‘इस बेटे की ओर से.’’

इधरउधर की बातें होने के बाद चाय की चुसकियों के साथ आयकर की चर्चा छिड़ गई. चंदन ने जीवन बीमा के सैकड़ों फायदों का बखान किया.

मैं ने कहा, ‘‘मेरे पति आयकर देने के ही मूड में हैं.’’

‘‘वह तो ठीक है, परंतु आप सोचिए, सरकारी खजाने में 8 हजार रुपए जाने से सरकार को जो भी लाभ हो, हमें और आप को क्या लाभ है?’’ चंदन ने पूछा.

‘‘देखो बेटा, सरकार को जो पैसा आयकर के रूप में देते हैं, उसी से तो कल्याण कार्य होते हैं,’’ बाबूजी ने कहा.

‘‘पर चाचाजी, जो 8 हजार रुपए सपनाजी टैक्स के रूप में जमा करेंगी, केवल उतने का ही अगर बीमा करवा लें तो मालूम है, अगले 20 वर्षों में उन्हें लगभग 6 लाख रुपए बीमा कंपनी देगी.’’

‘‘हां, यह बात तो ठीक है, पर बाकी राशि तो टैक्स के रूप में भरनी ही होगी,’’ मैं ने 6 लाख रुपए का सपना देखते हुए कहा.

‘‘उस की चिंता आप मुझ पर छोड़ दें, मैं आप को कुछ ऋण दिला दूंगा. आप के आरडी अथवा बीमा के एवज में उन पैसों की अदायगी प्रतिमाह किस्त के रूप में हो जाएगी. पदोन्नति के बाद जो बढ़ोतरी हुई है, उन्हीं पैसों से वह सब हो जाएगा,’’ चंदनजी ने मुसकराते हुए आगे कहा, ‘‘तो लीजिए, यह फौर्म भर दीजिए, मुझे चार पैसे मिल जाएंगे कमीशन के रूप में और आप का भविष्य पूरी तरह सुरक्षित हो जाएगा.’’

मैं ने ससुरजी से कहा, ‘‘जरा भीतर चलिए, बाबूजी.’’

‘‘क्या बात है, बेटी?’’ भीतर जा कर बाबूजी ने पूछा.

‘‘बाबूजी, मैं क्या करूं? आप के पुत्र टैक्स देने को कहते हैं, चंदनजी बीमा कराने को. चंदनजी के अलावा अन्य कोई ऐसा नहीं जो कालेज में हमारी समस्याओं को सुलझा सके.’’

‘‘तुम फौर्म पर दस्तखत कर दो, मैं आकाश को समझा दूंगा,’’ बाबूजी ने मेरे सिर पर हाथ रखते हुए कहा.

मैं ने हस्ताक्षर कर फौर्म चंदनजी को लौटा दिया और बाकी कौलमों को उन्हें स्वयं भर देने का आग्रह किया. चंदनजी ने उन्हें भर दिया और प्रसन्न मन से चले गए. सबकुछ चंदनजी ने ही किया था. ऋण दिलाना, ऋण के पैसों से फिर बचतपत्र खरीद कर ला देना, बीमा की राशि जमा करवा देना वगैरहवगैरह. आकाश से हम ने न तो चर्चा की, न उन्होंने स्वयं कभी इस संबंध में पूछताछ की. एक दिन मैं कालेज से लौटी तो पितापुत्र दोनों मुंह फुलाए बैठे थे.

‘‘क्या बात है, आप लोग चुपचाप हैं?’’ मैं ने हिम्मत कर के पूछ लिया.

‘‘तो क्या जश्न मनाऊं? बीमा कराने का बड़ा शौक है न तुम्हें, पहले का कराया हुआ बीमा ही हम से नहीं संभल रहा है, ऊपर से यह सब…’’ कहते हुए उन्होंने बीमे का बौंड, जो रजिस्टर्ड डाक से आया था, मेरी ओर फेंक दिया.

पहले तो चोरी पकड़ी जाने के एहसास से मैं घबराई, फिर संभलते हुए कहा, ‘‘आप को तो मेरा लिया गया एक भी निर्णय सही नहीं लगता.’’

‘‘बकवास बंद करो, हमेशा उलटा सोचने की आदत है तुम्हारी. अरी पागल, बाबूजी तो सीधेसादे गृहस्थ ठहरे, ये क्या जानें आयकर और बीमावीमा को. इन्होंने इसलिए हां कर दी, क्योंकि तुम्हारे कथनानुसार चंदन तुम्हारी बहुत सहायता करता है. पर जान लो, तुम ने बीमा करा के उस का काम पूरा कर दिया. वह अब तुम से कोई भी मतलब नहीं रखेगा. बीमा न करातीं तो कम से कम वह मृगतृष्णा में ही तुम्हारी मदद करता रहता,’’ इतना कह कर आकाश मुसकरा दिए.

उन का मुसकराना देख बाबूजी हंस पड़े और बोले, ‘‘अब तुम भी हंसो दुलहन. आकाश का गुस्सा जाड़े की धूप की तरह है, बैठो तो सरकता जाए.’’

बहरहाल, वह साल गुजर गया, नया साल फिर आ गया. पूरे दिन मैं मन ही मन चंदनजी का इंतजार करती रही. पुराना कलैंडर उतर चुका था. उस की जगह खाली पड़ी थी. बाबूजी ने शाम को कहा, ‘‘चंदन कहता था कि वह हर साल इतना ही खूबसूरत नया कलैंडर दीवार पर टांगता रहेगा…आया नहीं?’’

‘‘वह अब कभी नहीं आएगा बाबूजी, नया कलैंडर ले कर वह किसी नए शिकार की टोह में निकला होगा,’’ आकाश ने कहा.

‘इंसान भूल भी तो सकता है, व्यस्त भी तो हो सकता है, बीमार भी तो पड़ सकता है. आप को तो बस…’ मैं ने बुदबुदाते हुए कहा. तभी फोन की घंटी बजी. चंदन ने मुबारकबाद दे कर कहा कि इस वर्ष नया कलैंडर मिला ही नहीं.

2 जनवरी को कालेज के बाद सुप्रिया ने कहा, ‘‘मेरी एक सहपाठिन यहां डाक्टर बन कर आई है. उस ने फोन किया था. चलो, आज उस के घर चल कर उसे नए साल की बधाई दे आएं.’’

रास्ते में सुप्रिया मुझे अपनी सहेली के स्वभाव के बारे में बताती रही. उस ने कहा कि वह किसी सहपाठी से प्यार करती है, इसलिए अब तक कुंआरी है.

मैं ने कहा, ‘‘तो शादी क्यों नहीं कर लेती?’’

‘‘कैसे करेगी, प्रेमी तो शादीशुदा है. इसे जब तक मालूम हुआ, पानी सिर से ऊपर पहुंच चुका था. अब यह बिहार में और वह गुजरात में, अपनेअपने दिलों में प्यार छिपाए बैठे हैं.’’

‘‘यह तो पागलपन है, छिछोरापन है,’’ मैं ने कहा.

‘‘क्या राधा पागल थी? कृष्ण छिछोरे थे?’’ उस ने पूछा.

‘‘अब मैं क्या कहूं. वह हमारी तरह साधारण…’’ बात बीच में ही रुक गई. डा. शोभना का निवास आ चुका था.

गैलरी में हम दोनों ठिठक गईं. चंदनजी, शोभना के पिताजी के लिए ताजी मछलियां, डायरी और कलैंडर ले कर हाजिर थे. सुप्रिया ने मुझे चुप रहने का संकेत किया.

चंदनजी कह रहे थे, ‘‘शोभनाजी, 2 माह पूर्व आप आईं, मगर समाजसेवा से मुझे फुरसत कहां जो इतनी महान त्याग की मूर्ति के दर्शन कर सकूं. आज सोचा आप के पिताजी मेरे पिताजी जैसे हैं. कोई ला कर दे, न दे, मैं हर साल पिताजी को पुत्र की तरह नया कलैंडर, नई डायरी और ताजी मछलियां दे कर बधाई दूंगा.’’

‘‘बड़ा सुंदर कलैंडर है,’’ पिताजी ने कहा.

‘‘सीमित मिलता है, कल से ही खासखास मित्रों को बांट रहा हूं. यह अंतिम आप के घर की दीवार पर मेरी याद…’’

मैं ने कहा, ‘‘चंदनजी, हमारा कलैंडर कहां गया?’’

‘‘अरे, तुम दोनों कब आईं?’’ शोभना ने उठ कर स्वागत करते हुए कहा.

‘‘जब ये महोदय तुम्हें खास मित्र, त्याग की मूर्ति और न जाने क्याक्या कह रहे थे,’’ सुप्रिया ने कहा.

चंदनजी को काटो तो खून नहीं. दीवार पर कलैंडर टांगते हुए उन के हाथ रुक से गए. अचानक उन्होंने, ‘नमस्ते पिताजी, नमस्ते शोभनाजी,’ कहा और चले गए.

‘‘बड़ा अजीब आदमी है. अभी साथ में खाना खाने का प्रोग्राम बना रहा था, तुम्हें देखते ही…’’

शोभना की बात बीच में ही काटते हुए मैं ने कहा, ‘‘दुम दबा कर भाग गया.’’ और फिर वहां समवेत ठहाका गूंज उठा

New Year Special : हैप्पी न्यू ईयर

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2023 के वे फिल्मी गाने जो बरसों बजेंगे, विक्की कौशल का यह गाना तो मस्त रहा

पुराना साल 2023 बौलीवुड की कुछ फिल्मों के लिए काफी हिट साबित हुआ है. शाहरुख़ खान, विक्की कौशल, सारा अली खान, रणबीर कपूर की फिल्मों ने 2023 ने काफी अच्छी कमाई की. इन की फिल्मों के गाने भी लोगों को खूब पसंद आए और लम्बे समय तक लोगों की जुबां पर चढ़े रहे. साल 2023 की शुरुआत शाहरुख़ खान की ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘पठान’ से हुई थी. फिल्म ‘पठान’ का गाना ‘झूमे जो पठान’, सुपरडुपर हिट हुआ. इस गाने को अरिजीत और सुकृति कक्कड़ ने अपनी आवाज दी थी और इस का संगीत विशालशेखर की हिट जोड़ी ने तैयार किया था.

रणबीर कपूर और बौबी देयोल अभिनीत फिल्म ‘एनिमल’ के गाने भी काफी पसंद किये गए। इसका एक सौंग ‘जमाल कुडू’ जो बौबी देयोल की एंट्री के साथ शुरू होता है, ने अभी भी धमाल मचाया हुआ है. यह गाना ईरानी शादी के गाने से प्रेरित है. इस के बोल भले लोगों की समझ में न आए होने मगर इस का म्यूजिक इतना शानदार है कि नृत्य न जानने वालों के भी पैर थिरकने लगें. फर्क ये है कि पहले बौबी देयोल के बाल लम्बे थे लेकिन इस फिल्म में उन की दाढ़ी लंबी है. बाकी गाने का मतलब कोई समझ पाए या न समझ पाए लेकिन सिर पर बोतल रख कर लोग अभी भी नाचते नजर आते हैं. इस गाने ने रिलीज के चंद घंटों के अंदर ही मिलियन व्यूज हासिल कर लिए थे. वहीं सोशल मीडिया पर इस गाने पर जम कर रील बन रही है.

फिल्म एनीमल का ही एक और गीत ‘सारी दुनिया जला देंगें’ भी लोगों के बीच खूब हिट हुआ. इस गाने को पंजाबी गीतकार जानी ने लिखा है और उन की टीम के सिंगर बी प्राक ने इसे बड़े ही शानदार ढंग से गाया है. वहीं एनीमल का तीसरा हिट सौंग ‘अर्जन वैली’ भी चार्टबस्टर में टौप पर है. इस गाने को पंजाबी सिंगर भूपिंदर बब्बल ने गाया है.

2023 में रणबीर कपूर की पहली रिलीज फिल्म ‘तू झूठी मैं मक्कार’ का गीत ‘प्यार होता – होता कई बार है’, भी नौजवानों की जुबान पर खूब लम्बे समय तक चढ़ा रहा. इस गीत के लिए रणबीर और अरिजीत की काफी सराहना हुई. इसी फिल्म का दूसरा गान ‘तेरे प्यार में’ को भी लोगों ने खूब पसंद किया. इस गाने में रणबीर कपूर और श्रद्धा कपूर के बीच की मस्ती और रोमांस ही काबिलेतारीफ नहीं हैं बल्कि इस का जीवंत संगीत शरीर में सिहरन सी पैदा करता है. पूरे गाने में दिखाई गई स्पेन की अलग अलग खूबसूरत लोकेशन्स, स्टाइलिश आउटफिट और रणबीर और श्रद्धा के बीच आकर्षक केमिस्ट्री गाने की सुंदरता को बढ़ाते हैं.

बौलीवुड के शानदार एक्टर विक्की कौशल और सारा अली खान की फिल्म ‘जरा हट के जरा बच के’ बौक्स औफिस पर हिट साबित हुई है. इसका गाना ‘फिर और क्या चाहिए’ लोगों को बड़ा कर्णप्रिय लगा. इस गाने को अरिजीत सिंह ने गाया है. फिल्म का दूसरा गाना ‘तेरे वास्ते फलक से मैं चांद लाऊंगा’ जबरदस्त हिट साबित हुआ. इस गाने को भी अरिजीत सिंह ने अपनी आवाज से सजाया है.

2023 में फिल्म ‘पठान’ से कमबैक करने वाले शाहरुख खान ने फिल्म ‘जवान’ में भी बड़ा धमाका किया. फिल्म का गीत ‘चलैया’ बड़ा हिट हुआ और इस पर देश विदेश में खूब रील्स बनीं. वहीं ‘जवान’ का एक और गाना ‘जिंदा बंदा’ भी शाहरुख खान के फैंस के सिर चढ़ कर बोला. ‘ज़िंदा बन्दा’ में शाहरुख खान की जवां पर्सनालिटी और एनर्जेटिक डांस उनके फैंस को खूब भाया.

इन फिल्मी गीतों के अलावा 2023 में कुछ म्यूजिक एलबम्स ने भी काफी धमाल मचाया. जानी और बी प्राक की जोड़ी ने ‘क्या लोगे तुम’, गाने से सुनने वालों का दिल जीत लिया. इस गाने में अक्षय कुमार और अमायरा दस्तूर लीड रोल में हैं.

साल 2023 में एक और वीडियो एल्बम ‘हीरिए’ भी छाया रहा. इस लव रोमांटिक सॉन्ग को जसलीन रौयल और अरिजीत सिंह ने मिल कर गाया है. इस गाने में खुद जसलीन ने एक्ट किया है और इस में उन का साथ साउथ के एक्टर दुलकर सलमान ने दिया है.

साल 2002 में शमिता शेट्टी का गाना आया था ‘शरारा-शरारा’. शादियों-पार्टियों में लोग इस पर झूमते देखे जाते थे, लेकिन, 2023 आतेआते इस में अपडेट हुआ. शरारा को रंग मिल गया. अब ये हो गया ‘गुलाबी शरारा’. फिर क्या था, लोगों को गाने की बाकी लिरिक्स भले ही कम समझ आयी हों, पर धुन और मुखड़े पर लोग खूब थिरके. दरअसल यह एक कुमाऊनी गाना है. इसका जो वर्जन वायरल हुआ उसे इंदर आर्या ने गाया है. इस को लिखा है गिरीश जीना ने और कोरियोग्राफ किया है अंकित कुमार ने. इस गाने के हुक स्टेप की रीलें सोशल मीडिया पर फैली नजर आती हैं.

2023 की सफल फिल्में : फिल्मों ने की बंपर कमाई, मगर सिनेमाघर के अंदर कुर्सियां रहीं खाली

बौलीवुड में हमेशा माना जाता रहा है कि सिनेमा में सिर्फ सैक्स और हिंसा बिकता है.कम से कम 2023 के बौक्स औफिस आंकड़े भी इसी बात की ओर इशारा करते हैं. 2023 में ‘एनिमल‘, ‘जवान‘, ‘पठान‘ और ‘गदर 2‘ बड़ी हिट फिल्में मानी गई हैं. अफसोस की बात यह रही कि यह चारों फिल्में कहानी के स्तर पर शून्य रहीं, मगर इन फिल्मों में हिंसा व सैक्स जरुर हावी रहा. पर जब हम फिल्मों के निर्माण की लागत और बौक्स ओफिस कलैक्शन के आधार पर तुलना करते हैं, तो ‘द केरल स्टोरी‘ और ‘गदर 2‘ साल की सब से ज्यादा मुनाफा कमाने वाली फिल्में नजर आती हैं. हम सभी को यह पता होना चाहिए कि किसी भी फिल्म को ‘सफलता’ का तमगा पाने के लिए अपनी निर्माण लागत के मुकाबले कम से कम दोगुनी से अधिक कमाई भारतीय बौक्स औफिस पर करना अनिवार्य है.

इस कसोटी पर बड़े बजट व बड़े सितारों वाली फिल्में ही बौक्स पर हिट रहें, यह आवश्यक नहीं है. अगर फिल्म की कहानी अच्छी हो तो कम बजट व बिना बड़े स्टार की फिल्में भी बौक्स औफिस पर कमाई का झंडा लहरा सकती हैं. इस कसौटी पर विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ‘‘12वीं फेल’, अमित राय की ‘ओह माई गाॅड 2’, विक्टर बनर्जी की फिल्म ‘लकड़बग्घा’, राज शांडिल्य की ‘ड्रीमगर्ल 2’ को सफल माना जाना चाहिए. जबकि कहानी के स्तर पर ओटीटी पर प्रदर्शित मनोज बाजपेयी अभिनीत फिल्म ‘सिर्फ एक बंदा’ तथा यशवर्धन निर्देशित फिल्म ‘कटहल’ को भी सफल माना जाना चाहिए. पर अफसोस यह सभी अच्छी कहानी व छोटे स्टार के अभिनय से सजी पांच सौ करोड़ी क्लब का हिस्सा नहीं बन पाई.

सोशल मीडिया पर जबरन हिट

सिनेमा एक नकली दुनिया है. यहां सपने बेचे जाते हैं. पिछले कुछ साल से एक नया चलन शुरू हो गया है. पहले हर फिल्मकार अपनी फिल्म का प्रीमियर करता था, जहां वह फिल्म इंडस्ट्री के लोगों को अपनी फिल्म दिखा कर उन की राय मांगता था. अब भी फिल्म के प्रीमियर होते हैं, मगर फिल्म के प्रीमियर पर पहुंचे कलाकार व फिल्मकार के लिए अनिवार्य होता है कि वह तुरंत अपनी प्रतिक्रिया सोशल मीडिया पर पोस्ट करे.

परिणामतः फिल्म के रिलीज से पहले ही सोशल मीडिया पर कई कलाकार व फिल्मकार फिल्म की प्रशंसा करने के साथ ही फिल्म की बंपर कमाई करने की बातों की बौछार हो जाती है. उस के अलावा फिल्म की पीआरटीम भी कई फर्जी एकाउंट से बाक्स आफिस के बनावटी आंकड़ों सोशल मीडिया पर दिनरात बौछार करते रहते हैं. इन सभी का मकसद यही होता है कि लोग उन की फिल्म की अच्छाई या बुराई पर जाने की बनिस्पत फिल्म की कमाई देख कर लोग फिल्म को हिट समझें और इसे देखने ज्यादा से ज्यादा संख्या में आएं.

लोग अपने पसंदीदा सितारों की यह पोस्ट देख कर फिल्म देखने पहुंच भी जाते हैं. फिल्म की टिकटें बिक जाती हैं, बाद में दर्शक सिनेमाघर से गाली देते हुए बाहर निकलता है. पर यह धंधा बदस्तूर जारी है. फिल्म ‘जीरो’ की असफलता के बाद 4 साल बाद ‘पठान’ से परदे पर वापसी करते हुए शाहरुख खान 2 कदम आगे निकल गए. उन्होने अपनी फिल्म ‘पठान’ की कारपोरेट बुकिंग, बल्क बुकिंग और फैंस क्लब की बुकिंग के माध्यम से पैसे जमा कर लिए, पर सिनेमा घर के अंदर विरानी छाई रही.

बहरहाल, ऐन केन प्रकारणे निर्माताओं ने बाक्स आफिस के जो आंकड़े दिए, उस के अनुसार 2023 में पठान, जवान, गदर 2 और एनीमल ने बाक्स आफिस पर बंपर कमाई की.

पठान

2023 के शुरू होने से पहले तक कहा जा रहा था कि बौलीवुड खत्म हो गया. और अब बौलीवुड पर दक्षिण का कब्जा हो गया. लेकिन 4 साल से असफलता का दंश झेल रहे शाहरुख खान की फिल्म ‘‘पठान’’ 25 जनवरी 2023 को सिनेमाघरों में पहुंची और दूसरे ही दिन से सोशल मीडिया पर शोर मच गया कि बौलीवुड के सुनहरे दिन आ गए.

सिद्धार्थ आनंद के निर्देशन में बनी यह एक्शन थ्रिलर फिल्म वाईआरएफ के स्पाई यूनिवर्स की चौथी किस्त है, जिस में शाहरुख खान के अलावा दीपिका पादुकोण और जौन अब्राहम की मुख्य भूमिकाएं हैं, इस फिल्म में सलमान खान कैमियो में नजर आए.

एक्शन प्रधान, देशभक्ति व जासूसी फिल्म ‘‘पठान’’ की कहानी के केंद्र में रा एजेंट फिरोज पठान (शाहरुख खान) और पूर्व ‘रा’ अफसर जिम्मी (जौन अब्राहम) और पाकिस्तानी खुफिया एजंसी की जासूस डा. रूबैया मोहसीन (दीपिका पादुकोण) और पाकिस्तानी आईएसआई जनरल हैं.

फिल्म में शाहरुख खान का अभिनय नहीं जमा. दीपिका पादुकोण तो जिस्म की नुमाइश ही रकती रही. मगर इस के कुछ एक्शन सीन्स जरुर अच्छे हैं. 225 करोड़ करोड़ रुपये की लागत में बनी इस फिल्म ने बाक्स आफिस पर 543.05 करोड़ रुपए एकत्र किए. इस में कारपोरेट बुकिंग,बल्क बुकिंग और फैंस क्लब बुकिंग का ही सब से बड़ा योगदान रहा.अन्यथा थिएटर अंदर खाली पड़े हुए थे.

अफसोस ‘पठान’ के बाद प्रदर्शित फिल्में बाक्स आफिस पर धराशाही होती रहीं. इस के बाद 11 अगस्त 2023 को अनिल शर्मा निर्देशित फिल्म ‘गदर 2’ प्रदर्शित हुई. यह 2001 की फिल्म ‘गदर एक प्रेम कथा’ का सीक्वल है. पहली फिल्म तारा सिंह व सकीना की प्रेम कहानी थी. जबकि ‘गदर 2’ तो 1971 की पृष्ठभूमि में तारा सिंह व जीते यानी कि बाप बेटे की कहानी है.

पूरी फिल्म देख कर इस बात का भी अहसास होता है कि अनिल शर्मा ने इस फिल्म का निर्माण अपने बेटे उत्कर्ष शर्मा के कैरियर को संवारने के लिए बनाई, जिस में वह बुरी तरह से विफल रहे हैं. इस में कुछ राष्ट्रवादी व देशभक्ति के संवाद के अलावा कुछ एक्शन दृश्य हैं. सनी देओल पूरी फिल्म में छाए हुए हैं. सनी देओल,उत्कर्ष शर्मा और अमीषा पटेल के अभिनय से सजी यह फिल्म सर्फ 60 करोड़ रुपये में बनी और इसने भारतीय बाक्स आफिस पर 523.45 करोड़ रुपये एकत्र कर लिए.

इस फिल्म के सफलता की मूल वजह यह रही कि इस फिल्म में एक्शन के साथ ही राष्ट्रवाद व देशभक्ति का वह तड़का है, जिस से वर्तमान सरकार इत्तफाक रखती है. कहा जाता है कि इस फिल्म में कारपोरेट बुकिंग तो नहीं हुई, मगर एक खास विचारधारा के लोगों ने जरुर इस की टिकटें खरीद कर लोगों के बीच मुफ्त में बांटी.

जवान

फिल्म ‘‘पठान’’ से जिस तरह शाहरुख खान ने सफलता का स्वाद चखा था, उसी तरह उन्होने अपनी 7 सितंबर 2023 को प्रदर्शित फिल्म ‘‘जवान’’ के साथ किया. फिल्म ‘जवान‘ में शाहरुख खान ने बाप व बेटे की दोहरी भूमिका निभाई. एटली कुमार के निर्देशन में बनी यह फिल्म भारतीय सेना से ले कर किसानों तक की बात करती है. भ्रष्ट सिस्टम से प्रतिशोध की कहानियों पर कई फिल्में बन चुकी हैं. यह फिल्म भ्रष्ट सिस्टम की बात करते हुए जिस संघर्ष को जन्म देती हैं, उस में कुछ भी नवीनता नहीं है. यदि हम कला सिनेमा को नजरंदाज कर दें, तो भी राकेश ओम प्रकाश मेहरा (फिल्म ‘रंग दे बसंती’) या रेंसिल डिसिल्वा (फिल्म ‘उंगली’) से ले कर अब तक कई फिल्मकार इस तरह की कहानियां सशक्त तरीके से पेश करते आए हैं.

एटली उसी ढर्रे पर चलते हुए भ्रष्ट सिस्टम के खिलाफ संघर्ष के साथ ही चुनाव में वोट देने से पहले नेताओं से सवाल करने की बात करने वाली दो घंटे पचास मिनट लंबी अवधि की फिल्म ‘‘जवान’’ बना दी.

इस फिल्म ने कामयाबी में शाहरुख खान की ही फिल्म ‘पठान‘ को मात दे दी. 300 करोड़ रुपये के बजट में बनी इस फिल्म ने बाक्स आफिस पर 643.87 करोड़ रुपये एकत्र किए.

एनिमल

2023 की सर्वाधिक सफल फिल्मों में एक दिसंबर 2023 को प्रदर्शित संदीप रेड्डा वांगा निर्देशित अति सैक्स व हिंसा से भरपूर फिल्म ‘‘एनिमल’ रही. इस फिल्म में पहली बार अभिनेता रणबीर कपूर एकदम अलग अवतार में नजर आए. वह ‘अल्फा मैन’ के रूप में परदे पर जो कुछ किया, उस को ले कर विरोध के स्वर भी उठे. पर फिल्म ‘एनिमल‘ अभिनेता रणबीर कपूर के कैरियर की जबर्दस्त एक्शन फिल्म है. इस फिल्म में रणबीर कपूर के अलावा अनिल कपूर, बौबी देओल, रश्मिका मंदाना और तृप्ति डिमरी की मुख्य भूमिकाएं हैं. इस फिल्म से सब से ज्यादा फायदा तृप्ति डीमरी को ही हुआ. महज 100 करोड़ रुपये के बजट में बनी यह फिल्म का बाक्स आफिस पर 880.83 करोड़ रुपये कमा चुकी है.

यूं तो फिल्म ‘एनिमल’ की कहानी के केंद्र में पिता पुत्र का रिश्ता ही है मगर कहानी जरुरत से ज्यादा कन्फ्यूजन पैदा करती है. कहानी दिल्ली, केदारनाथ, अमरीका, स्काटलैंड से ले कर इंस्ताबुल तक फैली हुई है. पर दर्शक समझ नहीं पाता कि कब कहानी कहां से कहां पहुंच जाती है. लेखक व निर्देशक ने जानबूझकर सीधे कहानी पेश करने की बजाय कन्फ्यूजन पैदा करने का प्रयास किया है.

फिल्मकार ने ‘अल्फा मैन’ की परिभाषा बताते हुए नायक को सैक्स के प्रति दीवाना दिखाने के अलावा पतिपत्नी के आंतरिक संबंधो व सैक्स संबंधों पर जिस तरह के संवाद हैं, उन संवादों ने युवा पीढ़ी को आकर्षित किया,पर महिलाओं ने इस का विरोध भी किया.

फिल्म में अतिरंजित हिंसा व खूनखराबा के दृष्य भी हैं लेकिन फिल्म में रणबीर कपूर,अनिल कपूर और बौबी देओल का जबरदस्त अभिनय का रस भी है.

‘डंकी’ को नहीं मिला प्रतिसाद

सर्वाधिक आश्चर्य की बात यह रही कि ‘पठान’, ‘जवान’ और ‘एनिमल’ ने महज दो दिन के अंदर सौ करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया था जबकि ‘गदर 2’ ने 3 दिन में सौ करोड़ का आंकड़ा पार किया था. शाहरुख खान ने जो तरकीब फिल्म ‘पठान’ व ‘जवान’ को सफल बनाने के लिए अपनाई, वही तरकीब उन्होने अपनी 22 दिसंबर को प्रदर्शित फिल्म ‘‘डंकी’’ के साथ भी लगाई और फिल्म के प्रदर्शन से 15 दिन पहले से ही सोशल मीडिया पर चिल्लाना शुरू कर दिया था कि यह फिल्म 3 दिन में ही हजार करोड़ कमा लेगी.

मगर सूत्रों के अनुसार शाहरुख खान ने जिस तरह से फिल्म ‘सालार’ को डुबाने का खेल रचा, उस से कारपोरेट नाराज हुआ और ‘डंकी’ की पहले दिन की एडवांस बुकिंग के बाद कारेपोेरट ने अपने हाथ पीछे खींच लिए. जिस के चलते ‘डकी’ को सफलता नसीब न हो सकी.

और्गन सेल पर रिस्ट्रिक्शन से माफिया के मजे

देश में हर साल हजारों मरीज हार्ट, किडनी या लिवर की बीमारी से मर रहे हैं. कितने लोगों का पूरा जीवन अंधकारमय ही रहता है क्योंकि नेत्रदान के लिए लोग सामने नहीं आते हैं. दूसरी तरफ अपराध की काली दुनिया में किडनी से ले कर कोख तक नाजायज तरीके से बिक रही है. गरीबों की मजबूरी का फायदा उठाने वाले अपराधी गिरोह बड़ेबड़े अस्पतालों में डाक्टर्स और नर्सों की मिलीभगत से लाखों रुपयों के वारेन्यारे कर रहे हैं. गरीब आदमी से चंद हजार रुपयों में किडनी या लिवर खरीद कर जरूरतमंद मरीज को लाखों रुपयों में बेचे जा रहे हैं. यह धंधा छोटेबड़े तमाम अस्पतालों में चल रहा है.

इसी तरह बच्चे की चाह रखने वाले युगल जोड़ों को अस्पतालों से नवजात बच्चे या किराए की कोख भी बड़ी कीमत चुका कर आसानी से मिल जाती है. दिल्ली के अनेक अस्पतालों में यह धंधा खुलेआम चल रहा है. कई गरीब औरतें बच्चे पैदा ही इसलिए कर रही हैं ताकि उन्हें ऊंचे दामों में उन विवाहित जोड़ों को बेच सकें जिन के पास औलाद नहीं है. इन अपराधों के फलनेफूलने की जिम्मेदार सरकार है जिस ने सेरोगेसी पर प्रतिबंध लगा कर और अनाथाश्रमों से बच्चे गोद लेने की प्रक्रिया को कानून के तहत इतना मुश्किल कर दिया है कि बच्चे की चाह रखने वाले लोग गलत रास्ता अपना कर अपने जीवन में बच्चे की कमी को पूरा कर रहे हैं.

अगर इन चीजों को लीगल कर दिया जाए और एक रेट तय कर दिया जाए तो शायद गरीब आदमी अपराधी तत्वों और डाक्टरों के हाथों शोषण से बच जाए. लोगों के दिमाग में यह बात भी होती है कि अपना कोई करीबी बीमार पड़े और उस को किसी अंग की जरूरत हो तो हम दे दें, मगर किसी अनजान को दान क्यों दें? लेकिन इसी व्यक्ति से अगर कहा जाए कि उस की एक किडनी या लिवर के एक छोटे से अंश के लिए सरकार ने रेट तय किया है तो वह खुशीखुशी अपना अंग बेचने को तैयार हो जाएगा. इस से बीच के दलालों को भी खत्म किया जा सकता है.

धर्म की वजह से अंगदान नहीं

लोग अंगदान के लिए इसलिए भी आगे नहीं आते हैं क्योंकि धर्म ने उन्हें अनेक भ्रांतियों में जकड़ रखा है. पूर्वजन्म और अगले जन्म की भ्रांति में फंसा आदमी सोचता है कि इस जन्म में यदि उस ने अपना कोई अंग दान किया तो अगले जन्म में उस को उस अंग के अभाव का सामना करना पड़ेगा. मैं यदि अपनी मृत्यु के पश्चात अपने अंगदान का फौर्म भर दूं तो शायद अगले जन्म में मेरे शरीर के वे अंग रोगग्रस्त रहें. ऐसी अनेक भ्रांतियां समाज में फैली हुई हैं जिन को किसी धर्मगुरु ने दूर करने की कोशिश नहीं की बल्कि स्वर्ग, नरक, दूसरा जन्म, दूसरी योनि जैसी आधारहीन बातों में उलझा कर उसे अंगदान जैसे महान कार्य से रोक कर रखा है.

अंगदान कर के किसी लाचार व्यक्ति की जिंदगी में जीवन की नई उम्मीद जगाने से ज्यादा संतोषप्रद कार्य कोई दूसरा नहीं है. अंगदान करने की उदारता और संवेदना व्यक्ति की महानता को प्रदर्शित करती है. इंसान की संपत्ति का कोई मतलब नहीं अगर उसे बांटा और उपयोग में न लाया जाए, फिर चाहे वह शरीर के अंग ही क्यों न हों.

मानवीय दृष्टि से हर इंसान परिपूर्ण शरीर और स्वस्थ अंगों के साथ जीवन जीने का अधिकारी है. किसी कारणवश या बीमारी की वजह से यदि कोई अंग बेकार हो जाए तो कई बार व्यक्ति अवसादग्रस्त हो जाता है अथवा मर जाता है. ऐसे में अंगदान से उस व्यक्ति का जीवन बचाया जा सकता है. इस पुनीत कार्य से खुद का जीवन भी सार्थक नजर आता है.

डोनर के इंतजार में मरीजों की मौतें

सिर्फ भारत में ही नहीं दुनिया भर में लाखों लोग शरीर के अंग खराब होने के चलते अकाल मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं. दुनिया भर के अंगदाताओं की संख्या की तुलना में अंगों की मांग काफी ज्यादा है. इसलिए हर साल कई मरीज डोनर के इंतजार में मर जाते हैं.

आंकड़े बताते हैं कि भारत में 2 लाख किडनियों की औसत वार्षिक मांग के मुकाबले केवल 6 हजार किडनियां प्राप्त होती हैं. इसी तरह, दिलों की औसत वार्षिक मांग 50 हजार है जबकि अस्पतालों को इस का केवल 15 फीसदी ही मिल पाता है.

ब्रेन स्टेम डेथ की स्थिति में एक व्यक्ति 8 अंगों को दान कर सकता है. अंगदान में किडनी, लिवर, छोटी आंत,कोर्निया, बोन, त्वचा और हृदय वाल्व शामिल हैं. इस स्थिति में एक ब्रेन डेड व्यक्ति के शरीर से 8-9 लोगों को जीवनदान मिल सकता है.

आज लिवर की बीमारी से बहुत बड़ी संख्या में लोग पीड़ित हैं. एक स्वस्थ व्यक्ति के लिवर का छोटा सा अंश दो व्यक्तियों को प्रत्यारोपित किया जा सकता है. लिवर की भांति पैंक्रियाज का भी आंशिक दान किया जाता है. दान देने वाले व्यक्ति का लिवर या पेन्क्रियाज कुछ ही दिन में फिर परिपूर्ण हो जाता है और दान पाने वाले व्यक्ति में भी ये दोनों अंग स्वयं को विकसित कर लेते हैं. लेकिन अफसोस की बात है कि इस दान के लिए लोग आगे नहीं आते. वहीं अगर उस को कुछ आर्थिक फायदा दिखे तो वह अवश्य अपने लिवर का छोटा सा अंश बेच देगा.

अंगों की खरीदफरोख्त एक अपराध

प्रत्यारोपित होने वाले अंगों में दोनों गुर्दे (किडनी), यकृत (लिवर), हृदय, फेफड़े, आंत और पेन्क्रियाज शामिल हैं. जबकि ऊतकों के रूप में कोर्निया, त्वचा, हृदय वाल्व कार्टिलेज, हड्डियों और वेसेल्स का प्रत्यारोपण होता है. आंख, पाचक ग्रंथि, आंत, अस्थि ऊतक, हृदय छिद्र, नसें आदि अंगों का भी दान किया जा सकता है. पूरे देश में अभी तक ज्यादातर अंगदान अपने परिजनों के बीच में ही हो रहा है यानी कोई व्यक्ति सिर्फ अपने रिश्तेदारों को ही अंगदान करता है क्योंकि अंगों की खरीदफरोख्त को अपराध माना जाता है. हालांकि यह अपराध निर्बाध गति से हो रहा है.

अब मान लें कि कोई व्यक्ति अकेला है, उस के पास ऐसा कोई नहीं है जो उस की शारीरिक कमी को दूर करने में उस की मदद कर सके और उस के पास लाखों रुपया भी नहीं है कि वह अंगों की खरीदफरोख्त करने वाले लोगों से जरूरी अंग खरीद पाए, ऐसे में अगर इस कार्य को लीगल कर दिया जाए तो जरूरतमंद व्यक्ति एक निश्चित धनराशि में किसी अंग बैंक से जरूरी अंग खरीद सकता है और अपनी पूरी जिंदगी जी सकता है.

अगर अंगों की कमी को दान से ही पूरा करवाने की मंशा सरकार की है तो इस दिशा में अब जबरदस्त जागरूकता फैलाने और लोगों को अंधविश्वास से बाहर निकालने की आवश्यकता है क्योंकि स्थितियां बहुत गंभीर हैं. अभी तक तो अनेक डाक्टर्स ही इस के लिए चिंता व्यक्त
करते थे मगर पिछले दिनों देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी अंगदान की आवश्यकता पर मार्मिक अपील की है. और्गन्स की अनुपलब्धता पर चिंता जताते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि अंगदान के लिए बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान शुरू करने की जरूरत है. लिवर हमारे शरीर का सुरक्षा गार्ड है. हमारे देश में लिवर से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याएं बहुत गंभीर हैं और इन से होने वाली बीमारियों की बहुत बड़ी संख्या चिंता का कारण हैं.

अंगों की कमी के कारण लिवर, किडनी के अनेक मरीज प्रत्यारोपण से वंचित रह जाते हैं और असमय ही उन का देहांत हो जाता है. इस समस्या का समाधान करना एक जागरूक समाज की जिम्मेदारी है. अंगदान जीवन के लिए अमूल्य उपहार है. अंगदान उन व्यक्तियों को किया जाता है जिन की बीमारी अंतिम अवस्था में होती हैं और सिर्फ अंगदान ही जीवन बचाने का एकमात्र रास्ता बचता है.

गौरतलब है कि देश के विभिन्न अस्पतालों में सालाना सिर्फ अपने मरीज के लिए उन के रिश्तेदारों द्वारा लगभग 4000 किडनियां और 500 लिवर डोनेट किए जाते हैं जबकि भारत में प्रतिवर्ष 5 लाख लोग किडनी और लिवर का इंतजार करते हुए पलपल मौत की तरफ बढ़ रहे हैं.

मौजूदा समय में सिर्फ उत्तर प्रदेश में करीब 40 हजार मरीजों को किडनी ट्रांसप्लांट की और 15 हजार मरीजों को लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत है. मगर पूरे प्रदेश में हर साल महज 400 किडनी ट्रांसप्लांट हो पा रहे हैं जबकि लिवर ट्रांसप्लांट सिर्फ 35 से 40 मरीजों में हो रहा है.

जागरूकता जरूरी

समस्या को दूर करने के लिए अब ब्रेन डेड मरीजों के अंगदान को बढ़ावा देने की कोशिश शुरू हुई है मगर चींटी की चाल से. लोग अपने मृत परिजनों के अंगों को भी आधारहीन धार्मिक कारणों से दान करने को तैयार नहीं हैं जबकि हर साल उत्तर प्रदेश में सड़क दुर्घटना में करीब 22000 लोगों की मौत होती है. इस में ज्यादातर ब्रेन डेड होते हैं. ब्रेन डेड के बाद मरीज तो जीवित नहीं बचता मगर उस के शरीर के कुछ अंग कुछ घंटों के लिए जीवित रहते हैं. इन में से यदि सिर्फ एक फीसदी मरीजों के घरवालो को ही अंगदान के लिए राजी कर लिया जाए तो हर साल 440 मरीजों को किडनी और 220 मरीजों का लिवर ट्रांसप्लांट हो सकता है.

पीजीआई के स्टेट और्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट और्गेनाइजेशन के इंचार्ज डा. हर्षवर्धन कहते हैं कि 2015 से ले कर अब तक मात्र 32 ब्रेन डेड लोगों के घरवालों ने अंगदान किया है. इस तरह हर साल औसतन महज 4 डोनेशन हुए हैं जबकि ब्रेन डेड मरीज हर साल हजारों की संख्या में होते हैं. भ्रांतियों के कारण लोग अंगदान नहीं करते. वे सोचते हैं कि इस जन्म में शरीर का कोई अंग दे दिया तो अगले जन्म में शरीर में वह अंग नहीं होगा. कोई नहीं जानता कि कोई अगला जन्म होना भी है या नहीं. जबकि अंगदान की कमी से रोजाना देश में करीब 283 मौतें हो रही हैं.

अंगदान और प्रत्यारोपण मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम (टीएचओए) 1994 के अंतर्गत आता है जो फरवरी 1995 से लागू हुआ था. इस अधिनियम के अनुसार अंगदान सिर्फ उसी अस्पताल में किया जा सकता है जहां उसे ट्रांसप्लांट करने की भी सुविधा हो. यह अपने आप में काफी मुश्किल नियम था. इस नियम से दूरदराज के इलाकों के लोगों का अंगदान तो हो ही नहीं पाता था.

इस समस्या को देखते हुए सरकार ने 2011 में इस अधिनियम को संशोधित किया. अब नए नियम के मुताबिक अंगदान किसी भी आईसीयू में किया जा सकता है अर्थात उस अस्पताल में ट्रांसप्लांट न भी होता हो लेकिन आईसीयू है तो वहां भी अंगदान किया जा सकता है. मगर समस्या का समाधान तब तक नहीं हो सकता जब तक लोगों में इस को ले कर जागरूकता पैदा न हो. अंगदान करने वालों की संख्या बढ़ाने के लिए अंगदान की आवश्यकता को जनता के बीच संवेदनशील बनाने की जरूरत है. हालांकि टीवी इंटरनैट के माध्यम से कुछ चेतना फैलाई जा रही है मगर यह अपर्याप्त है. इस के लिए लंबा रास्ता तय करना होगा और इस दौरान लाखों मरीज अंगों के इंतजार में दम तोड़ देंगे. इस से बेहतर है अंगों की खरीदफरोख्त को सरकार लीगल कर दे.

सैक्स पर बनी फिल्में : ‘ओ माय गौड’ व ‘थैंक यू फौर कमिंग’ भी पूर्वाग्रह का शिकार

‘ओ माय गौड – 2’ की एक आम मध्यमवर्गीय परिवार के किशोर विवेक ( आरुष शर्मा ) की है जो हस्तमैथुन को ले कर कुछ गलतफहमियों और तनाव का शिकार हो कर नीमहकीमों के चक्कर में पड़ जाता है . स्कूल के टौयलेट में जब वह हस्तमैथुन कर रहा होता है तो कुछ दोस्त उस का वीडियो बना कर वायरल कर देते हैं . स्कूल में उस की खिल्ली उड़ती है और घबराया विवेक आत्महत्या करने की कोशिश करता है.

विवेक के पिता कांति शरण मुदगल ( पंकज त्रिपाठी ) ऐसे में समझ से काम लेते हैं .यह समझ भी मानवीय न हो कर दैवीय होती है. हालांकि इस से फिल्म का इतना ही लेनादेना है कि यह शायद निर्देशक अमित राय की मजबूरी हो गई थी कि उन्हें शंकर के दूत के रूप में अक्षय कुमार को दिखाना पड़ा.

बेटे और परिवार को शर्मिंदगी से बचाने के लिए कांति शरण अदालत की शरण लेता है . फिल्म मनोरंजक ढंग से चलती रहती है और यह साबित हो जाता है कि मास्टरवेशन कोई पाप या गलती नहीं है बल्कि टीनएज की जरूरत है जिस के बारे में स्कूलों में पढ़ाया जाना चाहिए. सैक्स की अहमियत को दिखाने के लिए कामसूत्र और पंचतंत्र जैसे ग्रन्थों का भी हवाला फिल्म में दिया गया है .

मास्टरवेशन जरूरी है

‘ओ माय गौड ‘ की दूसरी खूबी यह है कि यह आज के लड़कों की कहानी है . हस्तमैथुन हालांकि हर दौर के किशोर करते रहे हैं लेकिन इसे ले कर डर यह बैठाल दिया गया है कि यह पाप है या फिर इस से कमजोरी आती है जिस के चलते युवा पत्नी को संतुष्ट नहीं कर पाते , खुद भी सैक्स का लुत्फ नहीं उठा पाते और इस से पेनिस का साइज छोटा हो जाता है वगैरहवगैरह . उलट इस के चिकित्सक और मनोवैज्ञानिक हस्तमैथुन को एक जरूरी सैक्स क्रिया मानने लगे हैं जिस से कोई नुकसान नहीं होता. यह सत्य भी है कि हस्तमैथुन अच्छे स्वास्थ की ही निशानी है.

इंटरनैट पर टीनएजर्स की सारी समस्याओं का हल नहीं मिलता. खासतौर से हस्तमैथुन को ले कर आज का युवा भी डर और गलतफहमियों का शिकार है. ‘ओ माय गौड’ फिल्म पेरेंट्स की भूमिका भी तय करती हुई है कि उन्हें बच्चों की यौन समस्याओं और जिज्ञासाओं को ले कर क्या रवैया अपनाना चाहिए. इस फिल्म में सेंसर ने 27 कट लगाए थे और पंडेपुजारियों ने भी एतराज जताया था कि इस से देवताओं की इमेज खराब होती है.

पर तमाम झंझटों से परे सुकून देने वाली इकलौती बात यह थी कि एक महत्त्वपूर्ण विषय पर पहली बार फिल्म बनी , नहीं तो सैक्स पर फिल्में बनाने से बौलीवुड कतराता ही है क्योंकि इस में जोखिम ज्यादा है और मुनाफा कम. पहला डर तो विरोध का ही रहता है कि क्या पता कब कौन सा धार्मिक या नैतिकता का पैरोकारी संगठन सड़कों पर आ कर हायहाय करने लगे कि देखो हमारी संस्कृति पर हमला हो रहा है. ‘ओ माय गौड’ में तो उसी धर्म और संस्कृति के हवाले से बात कही गई है कि सैक्स कोई वर्जित या अछूत विषय नहीं है.

मोक्ष जैसा और्गेज्म

इस साल सैक्स पर प्रदर्शित दूसरी फिल्म ‘थैंक यू फौर कमिंग’ थी. इस की निर्माता एकता कपूर और निर्देशक करण बुलानी ने भी अहम मुद्दा महिलाओं में और्गेज्म का उठाया था. फिल्म की नायिका 30 वर्षीय कनिका कपूर (भूमि पेडनेकर) और्गेज्म महसूस करने के लिए कई पुरुषों से सहवास करती है. आमतौर पर कनिका शराब के नशे में धुत रहती है और किसी मर्दखोर औरत जैसे और्गेज्म महसूस करने के लिए हर किसी से सहवास करने के लिए तैयार रहती है.

एकता कपूर अपनी बोल्डनैस के लिए बदनाम हैं लेकिन वह इस की चिंता नहीं करतीं. ‘थैंक यू फौर कमिंग’ के विषय पर भी वे आलोचना का शिकार हुई . इस बार तो साफसाफ लगा कि वे मीडियाई बहिष्कार का भी शिकार हो चली हैं .फिल्म समीक्षकों ने विषय की तो नहीं की लेकिन उस के प्रस्तुतीकरण की जम कर छिलाई की कि वह भारतीय समाज से मेल नहीं खाता और कोई हिन्दुस्तानी औरत ऐसा नहीं कर सकती जैसा कि फिल्म में नायिका कनिका को दिखाया गया है.

असल में फिल्म में कुछ ऐसा था नहीं जिस पर एतराज जताया जाए या जो वास्तविकता में न होता हो. लाख टके का सवाल महिलाओं का और्गेज्म को महसूस करना न करना है जिस पर विकट का विरोधाभास है. अभिजात्य वर्ग में इस को ले कर असमंजस है लेकिन कोई निष्कर्ष नहीं है . गोया कि और्गेज्म कुछकुछ मोक्ष जैसा हो चला है जो है भी और नहीं भी है.

एकता कपूर ने भी सटीक विषय हस्तमैथुन की तरह उठाया लेकिन फिल्म अपनी लागत भी नहीं वसूल पाई जबकि ‘ओ माय गौड’ ने ठीकठाक बिजनैस कर लिया था. ‘थैंक फौर कमिंग’ का हश्र बताता है अभी भी हम सैक्स पर बनी फिल्मों को सहज नहीं स्वीकार पा रहे हैं क्योंकि हम अपनी परम्पराओं और रूढ़ियों के गुलाम हैं. हमारी रोजमर्राई जिन्दगी भी धर्म से नियंत्रित और संचालित होती है जिस में स्त्री की छवि ऐसी नहीं है कि वह सम्पत्ति की तरह यौनाधिकार भी मांग सके . उसे तो अपनी यौन इच्छाएं जाहिर करने का हक नहीं और जिन्हें है वे समाज का बहुत छोटा सा हिस्सा हैं.

सैक्स फिल्मों का अतीत भी अच्छा नहीं

इन दोनों फिल्मों की तरह पहले भी सैक्स पर फिल्में बनी हैं लेकिन ज्यादा चल नहीं पाई क्योंकि सैक्स के प्रति धार्मिक सामाजिक और पारिवारिक पूर्वाग्रह ज्यों के त्यों हैं. हौलीवुड में सैक्स पर बनी फिल्मों की मिसाल दी जाती है जबकि बौलीवुड की सैक्स फिल्मों को समीक्षक फिल्म ही नहीं मानते. हर कोई चाहता है कि आप सैक्स की जानकारियां मस्तराम छाप किताबों से ले कर पोर्न साइट्स पर ढूंढते रहें जहां कचरा ज्यादा मिलता है. सैक्स एजुकेशन गाहेबगाहे चर्चा का विषय रह गया है जो किसी बड़े सैक्स क्राइम के बाद ज्यादा याद आता है. लेकिन सहमति जताने से तब भी समाज के ठेकेदार डरते हैं.

70 के दशक में गुप्त ज्ञान को प्रगट करती कुछ फिल्में बनी थीं जो निचले दर्शक की उत्तेजना का विषय हो कर रह गईं थीं बौक्स औफिस पर सफलता इन्हें भी नहीं मिल पाई थी. मध्यमवर्गीय तब ऐसी फिल्मों के पोस्टर देखने से भी घबराता था. चोरीछिपे सीमित साधनों से जो मिल जाए उसे ही ज्ञान समझ ग्रहण कर लिया जाता था.

सैक्स पर बनी एक अहम फिल्म गुप्त ज्ञान साल 1974 में प्रदर्शित हुई थी जिसे साकिब पेंड्रर ने निर्देशित किया था. फिल्म में कहानी के नाम पर कुछ खास नहीं था और हिम्मत जुटा कर जो दर्शक थिएटर तक पहुंचे भी थे उन्हें उम्मीद के मुताबिक गरमागरम दृश्य और ज्ञान नहीं मिला था, फिल्म में दो ही जाने माने चेहरे थे कादर खान और भरत कपूर. यह फिल्म पैसा इकट्ठा नहीं कर पाई तो निर्माताओं को सैक्स आधारित फिल्में बनाना रिस्की लगने लगा.

इस के दस साल बाद सलीके की फिल्म ‘उत्सव’ रिलीज हुई जो एक क्षत्रिय राजा शूद्रक के नाटक मृच्छकटिकम पर आधारित थी. इस में अमजद खान ने सूत्रधार का रोल निभाया था. शशि कपूर रेखा, नीना गुप्ता, अनुपम खेर, कुलभूष्ण खरबंदा, अन्नू कपूर और शेखर सुमन जैसे मझे और सधे कलाकारों से सजीधजी इस कलात्मक और एतिहासिक फिल्म का निर्देशन गिरीश कर्नाड ने किया था. उत्सव वर्ग विशेष यानी अभिजात्य दर्शकों में सिमट कर रह गई थी लेकिन सैक्स को ले कर कुछ मैसेज तो इस में थे.

साल 1996 में आई फिल्म ‘कामसूत्र’ से भी दर्शक निराश ही हुए थे इस फिल्म की कहानी मीरा नायर ने लिखी थी. रेखा के अलावा कोई पहचाना चेहरा इस फिल्म में भी नहीं था. इस के एक साल बाद ही रेखा की ही एक और फिल्म ‘आस्था’ रिलीज हुई थी जिस में ओम पुरी उन के अपोजिट थे . फिल्म एक पत्नी की यौन जिज्ञासाओं और फोर प्ले पर आधारित थी जिस के कलात्मक अनुभव नायिका मानसी को एक धनाड्य पुरुष से मिलते हैं यह भूमिका नवीन निश्छल ने निभाई थी.

इस के बाद अनियमित अन्तराल से सैक्स पर फिल्में प्रदर्शित होती रहीं लेकिन उन के विषय थोड़े अलग थे और कई फिल्मों को सेंसर बोर्ड ने पास नहीं किया. मसलन ‘कामसूत्र 3 डी’ शर्लिन चोपड़ा द्वारा अभिनीत यह फिल्म यू ट्यूब पर उपलब्ध है. इसी तरह शबाना आजमी अभिनीत ‘फायर’ को भी सेंसर बोर्ड ने पास नहीं किया था जो अब ओटीटी प्लेटफौर्म पर देखी जा सकती है. जौन अब्राहम की ‘वाटर’ का भी यही हश्र हुआ था.

ऐसे में ‘ओ माय गौड’ और ‘थैंक यू फौर कमिंग’ फिल्में उम्मीद तो जगाती हैं कि सैक्स एजुकेशन का मुद्दा अभी सुनहरे परदे से गायब नहीं हुआ है और ऐसी फिल्मों को समीक्षकों से ज्यादा दर्शकों के प्रोत्साहन की जरूरत है.

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