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ख्वाब पूरे हुए : भाग 1 – नकुल की शादी से क्यों घर वाले नाराज थे?

“मन्नो, मन्नो.”

“हां, बोलो.”

“फुरसत मिल गई अपने काम से…? या अभी भी पिज्जा डिलीवरी के लिए और जाना है?”

“मन्नो, सुनो तो. यों मुझ पर गुस्सा तो मत करो प्लीज.”

“गुस्सा न करूं तो क्या करूं? रोजाना आधी रात के बाद घर लौटते हो. कभी सोचा है, आधी रात तक का मेरा वक्त कैसे बीतता है अकेले बिस्तर पर करवटें बदलतेबदलते?”

“सब समझता हूं मन्नो, लेकिन मैं करूं तो क्या करूं? घर बैठ जाऊं? पिछले महीने घर बैठा तो था. याद है या भूल गई? दो वक्त की रोटियों तक के लाले पड़ गए थे. इतनी मुश्किल से तो यह नौकरी मिली है. अब इसे भी छोड़ दूं?”

“दूसरी नौकरी तलाशोगे तब तो मिलेगी. तुम्हारी यह आधीआधी रात तक की नौकरी मुझे तो फूटी आंख नहीं सुहाती. दिनदिन की नौकरी करो ना, भलेमानसों की तरह. मैं भी तो नौकरी करती हूं. शाम को 7 बजतेबजते लौट आती हूं कि नहीं? अरे ढूंढ़ोगे तब तो मिलेगी न नौकरी. यों हाथ पर हाथ धर कर तो मिलने से रही नई नौकरी.”

“तो तुम्हारा मतलब है कि मैं हाथ पर हाथ रख कर बैठा रहता हूं? बस, बस, अपनी नौकरी को ले कर ज्यादा उड़ो मत. तुम चाहती हो कि तुम्हारी इस 10,000 रुपए की नौकरी के दम पर मैं अपनी लगीलगाई नौकरी छोड़ दूं और फिर से सड़कों की खाक छानूं?”

“मेरी 10,000 रुपए की नौकरी तुम्हारी इस फूड डिलीवरी की नौकरी से लाख गुना बेहतर है. कम से कम समय पर घर तो आ जाती हूं मैं.”

“अब कितनी बार आधी रात घर लौटने को ले कर ताने सुनाओगी. बस भी करो यार. अपना स्यापा बंद भी करो. न चैन से खुद रहती हो और न ही मुझे रहने देती हो. जिंदगी नरक बन कर रह गई है.”

“नरक बनी है तुम्हारी करनी से. मेरा उस से क्या लेनादेना? शादी की थी यह सोच कर कि अकेले से दुकेले होंगे तो जिंदगी में सुकून आएगा.

लेकिन यहां तो तुम उलटी ही गंगा बहा रहे हो. बताना जरा, शादी के बाद क्या सुख दिया तुम ने सिवा कंगाली और अकेलेपन के?”

“मैं ने सुख नहीं दिया तो ढूंढ़ लेती कोई रईस आसामी, जो घर बैठाबैठा तुम्हारे सौसौ नखरे उठाता,” भीषण गुस्से से उबलते हुए अपने हाथ में थमा गजरा जमीन पर फेंकते हुए नकुल पत्नी मन्नो पर गरजा और करवट बदल कर सोने की कोशिश करने लगा.

उधर मन्नो भी पति नकुल के आज पहली शादी की वर्षगांठ पर भी आधी रात के बाद घर लौटने को ले कर बेहद गुस्सा थी. अंतस का क्रोध आंखों की राह बह रहा था. मन में खयालों की उठापटक जारी थी.

आंखें मूंद कर सोने का असफल प्रयास करतेकरते मनपंछी कब अतीत के सायों में अटकनेभटकने लगा, उसे तनिक भी एहसास नहीं हुआ.

उस ने एक छोटे से शहर में सफाई कर्मचारी मातापिता के घर में जन्म लिया था. बचपन से ही मातापिता दोनों शहर के एक अपार्टमैंट के प्रांगण को बुहारने का काम करते. वह बचपन से ही एक परिष्कृत रुचि संपन्न लड़की थी. जैसेजैसे उम्र के पायदान पर चढ़ रही थी, मातापिता के सफाई के काम को ओछी नजर से देखती. बेहद संवेदनशील स्वभाव की थी वह. बचपन में जब भी सहेलियां आपस में अपने मातापिता, उन के कामकाज की बातें करतीं, मातापिता का सफाई कर्मचारी के तौर पर परिचय देने पर उन की नजरों में आए बदलाव को भांप जाती और इसे ले कर मन ही मन घुलती. 5वीं-6ठी कक्षा में आतेआते उस की कोई हमउम्र सहेली नहीं बची थी, जिस के साथ वह मन की बातें साझा कर पाती. यहां तक कि उसे अपने घर से लाया टिफिन भी अकेले ही खाना पड़ता. कोई भी सखी ऐसी न थी, जो उस के साथ खाना पसंद करती.
वक्त का कारवां कब रुका है? देखतेदेखते वह 11वीं कक्षा में आ पहुंची. तभी उस की नजरें अपनी ही कक्षा के एक सहपाठी नकुल से भिड़ीं. नकुल को पतलीदुबली, दोनों गालों पर डिंपल वाली, बड़ीबड़ी सीपीनुमा आंखों वाली, उदास सी अपनेआप में खोईखोई क्लास में पीछे अकेली बैठी मन्नो बहुत अच्छी लगती. ख्वाबोंखयालों की उम्र में वक्त के साथ दोनों ही एकदूसरे को दिल दे बैठे और अकसर दोनों स्कूल में एकसाथ देखे जाते.

बरसों से कक्षा की सहेलियों की उपेक्षा से व्यथित मन्नो को जैसे जीवनदान मिला. समय के साथ नकुल से उस की नजदीकियां बढ़ीं और दोनों एकसाथ जीनेमरने की कसमें खाने लगे.दोनों ही बेहद भावुक स्वभाव के थे. सो, अब एकदूसरे से अलगअलग रहना दोनों को ही रास नहीं आ रहा था.

दोनों ने अपनेअपने घरों में एकदूसरे से विवाह की बात छेड़ी, लेकिन दोनों को ही इस शादी को ले कर जातिभेद की वजह से अपनेअपने मातापिता का सख्त प्रतिरोध सहना पड़ा.

दोनों के मातापिता ने उन के विवाह संबंध से साफसाफ इनकार कर दिया.

करेला और नीम चढ़ा, कच्ची उम्र और प्यार का जुनून, दोनों ने घर से भाग कर शादी करने का फैसला किया, लेकिन भूल गए कि जिंदा रहने के लिए रोटी, कपड़ा और मकान की जरूरत होती है.

दोनों मन्नो और नकुल ने 12वीं की बोर्ड परीक्षा के बाद अपने घनिष्ठ दोस्तों के उकसाने पर आर्य समाज मंदिर में उन की मौजूदगी में एकदूसरे से ब्याह रचा लिया. नकुल ने अपनी मां को पहले से ही बता रखा था कि वह एक लड़की से प्यार करता है. उसे अपनी मां पर, उन के प्यार पर अटूट भरोसा था कि वह हर हाल में मन्नो को अपनी बहू के तौर पर अपना लेंगे. नकुल सोच ही न पाया कि उस के मातापिता उस से कमतर जाति की सफाई कर्मचारी मातापिता की संतान को अपनी बहू के रूप में हरगिज नहीं स्वीकारेंगे.

विवाह के बाद जब नकुल अपनी नवोढ़ा दुलहन को रोजमर्रा के कपड़ों में सिंदूर से भरी मांग के साथ पिता के घर की दहलीज पर पहुंचा, उस की मां और पिता ने उन दोनों के मुंह पर यह कहते हुए धड़ाम से दरवाजा बंद कर दिया कि, “हमारे घर में लोगों का मैला साफ करने वालों की लड़की के लिए कोई जगह नहीं.”

नकुल ने उन्हें बहुत समझाने की कोशिश की कि वे मात्र एक आवासीय कालोनी के प्रांगण को बुहारने का काम करते हैं, मैला साफ करने का नहीं, लेकिन बेटे की इस नाफरमानी से बुरी तरह से रुष्ट पिता ने उन से अपने सारे रिश्ते तोड़ने की कसमें खाते हुए उन दोनों को अपने घर में घुसने तक की इजाजत नहीं दी.

दोनों पतिपत्नी उन के घर की ड्योढ़ी पर घंटों बैठेबैठे उन से दरवाजा खोलने की गुहार करते रहे, लेकिन पिता का मन नहीं पसीजा और थकहार कर नकुल मन्नो को अपने निस्संतान मामामामी के यहां ले गया, जिन का उस पर विशेष स्नेह था. मन्नो के मातापिता ने भी बेटी के इस निरंकुश आचरण से क्षुब्ध हो उस से सारे रिश्ते तोड़ लिए थे.

मामामामी के यहां वे दोनों करीब महीनेभर रहे. महीना बीततेबीतते मामामामी के व्यवहार में भी तुर्शी आने लगी और दोनों को ही एहसास हुआ कि अब अपनी लड़ाई लड़ने का वक्त आ गया है. सो, दोनों अपने लिए काम की तलाश करने लगे.

जानें क्यों लगती है बार बार भूख ?

भूख लगी है खाना लाओ, भूख लगी है खाना लाओ, क्या आपका पेट भी बार बार यही बात कहता है. अगर हां तो हो जाओ सावधान क्योंकि ये संकेत है आपके अंदर पल रही बीमारी का जैसे हाइपोग्लैकैमिया, डीहाइड्रेशन, ब्लड शुगर में  बदलाव, माइग्रेन जैसी बीमारी के शिकार भी हो सकते है.

कभी कभी हम अधिक तनाव में होते हैं तो भी हमें अधिक भूख लगती है क्योंकि जब आप ज्यादा तनाव में होते हैं तो कोर्टिसोल नाम का हार्मोन शरीर में बनना शुरू हो जाता है. जिस कारण अधिक भूख लगती है. इसके आलावा ज्यादा भूख लगने के कई और कारण भी हैं. इसके कारणों को पहचाने की बजाय कुछ लोग ओवर ईटिंग करने लगते हैं जिससे पाचन तंत्र कमजोर होने लगता है. अगर आपको भी खाना खाने के बाद पेट खाली लगता है तो इस समस्या को नजरअंदाज न करें.

अधिक भूख लगने के कारण

  • पोषक तत्वों की कमी

जब हमारे शरीर को भरपूर मात्रा में पोषण नहीं मिलता तब हमें ऐसा खाने की इच्छा होती है, जिसे खाने से हमें तुरंत एनर्जी मिल जाये. और जब तक वह कमी पूरी नहीं होती तब तक हमें बार बार भूख लगती रहती है.

प्रोटीन और फाइबर की कमी भोजन में प्रोटीन और फाइबर की मात्रा सही होनी चाहिए. खाने में इनकी कमी से व्यक्ति का पेट नहीं भरता और हर समय भूखे होने का अहसास होता रहता है. प्रोटीन और फाइबर युक्त भोजन खाने से पेट भरा- भरा लगाता है.

  • पानी की कमी के कारण

कुछ लोगों को कम पानी पीने की आदत होती है. जिस कारण उनके बाल और त्वचा पर गलत प्रभाव पड़ता है और बौडी डिहाईड्रेट हो जाती है और बार बार भूख लगती है. यह समस्या सर्दियों में अधिक होती है. इसके कारण हमारी त्वचा व बाल खुश्क होने लगते है.

  • हाइपोग्लैकैमिया

इसमें शरीर में ब्लड शुगर का लेवल कम हो जाता है जिसकी वजह से भूख ज्यादा लगती है ताकि शरीर उस खाने को ऊर्जा में परिवर्तित कर सके.

  •  कैलोरी की कमी

शरीर को कार्य करने के लिए संपूर्ण आहार की आवश्यकता होती है. कम कैलरी वाले भोजन का सेवन करने से ज्यादा भूख लगती है. हर पल ऐसा  लगता है जैसे खाना नहीं खाया. इस समस्या से राहत पाने के लिए कैलरी से भरपूर भोजन खाएं.

  • हाइपोथाइरौयडिज्म

थाइरौयड की वजह से शरीर में हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है जिस कारण लगातार भूख लगने लगती है और यह समस्या  हाइपोथाइरौयडिज्म भी हो सकता है.

कैसे करें बचाव

नट्स : जब भूख लगे तो नट्स खा  सकते है लेकिन बिना नमक के जैसे काजू, बदाम, अखरोट या मूंगफली इन्हें खाने से जल्दी भूख भी नहीं लगती और शरीर को भरपूर पोषण मिलता है.

सेब खाएं : सेब में भरपूर फाइबर और  जल की मात्रा होती है . सेब के छिलकों में पेक्टिन पाया जाता है, जो भूख को कम करने में मदद करता है.इसके सेवन से लबे समय तक भूख नहीं लगती.

अगर आपकी भूख पर कंट्रोल नहीं हो पा रहा है तो जरूरी है की गैस्ट्रो डौक्टर से इलाज कराएं क्योंकि यह समस्या आपको मोटापे का शिकार भी बना सकती है और साथ ही आप कई ऐसी बीमारियों घिर सकते हैं जिनका इलाज जल्दी से नहीं हो पाता.

सर्दियों में हाथ-पैरों को मुलायम रखने के लिए क्या करें ?

सवाल

सर्दी के मौसम की शुरुआत हो चुकी है. ऐसे में मेरे हाथ और पैर दोनों ही काफी रुखे-रुखे रहते हैं. मौइश्चराइजर लगाने के बाद भी ये सामान्य नहीं दिखते. इसलिए मुझे कोई उपाय बताइए, जिससे ये नर्ममुलायम बने रहें.

जवाब

हाथों और पैरों की स्किन में कोई औयल ग्लैंड्स नहीं होने के कारण इन्हें औयल देना पड़ता है. अत: इन्हें मुलायम और चिकना बनाए रखने के लिए इन्हें धोने के बाद हमेशा कोई थिक क्रीम लगाएं. यह आप की त्वचा में नमी बनाए रखने में मदद करेगी.

आप हाथपैर धोने के लिए कौन सा साबुन इस्तेमाल करती हैं इस पर भी ध्यान दें. ज्यादातर साबुन त्वचा को रूखा बना देते हैं, इसलिए लिक्विड सोप ही बेहतर है.

रात को सोने से पहले ब्रैंडेड मौइश्चराइजिंग क्रीम लगा कर सोना बेहतर रहेगा. आहार पर ध्यान दें और खूब पानी पीएं.

आरोही : विज्ञान पर भरोसा करती एक डॉक्टर की कहानी – भाग 1

शाम को 5 बजे थे, आज अविरल औफिस से जल्दी आ गए थे तो पतिपत्नी दोनों बैठ कर कौफी पी रहे थे. तभी अविरल ने कहा,‘’आरोही, अगले महीने 5 दिनों की छुट्टी है, चलो कश्मीर चलते हैं. एक दिन डल लेक में सैर करेंगे. बचपन से ही मुझे स्नो फौल देखने की बहुत बड़ी तमन्ना है. मैं ने वेदर फोरकास्ट में देखा था, श्रीनगर में स्नोफौल बता रहा है,” वह उम्मीदभरी नजरों से पत्नी के चेहरे की ओर देख रहा था.

आरोही आदतन अपने मोबाइल पर नजरें लगाए कुछ देख रही थी. अविरल आईटी की मल्टीनैशनल कंपनी में सीनियर मैनेजर हैं. उन की औफिस की व्यस्तता लगातार बनी रहती थी.

पत्नी डा. आरोही सर्जन है. वह एक बङे हौस्पिटल में डाक्टर है. उस ने अपने घर पर भी क्लीनिक खोल रखा है. इसलिए यहां भी मरीज आते रहते हैं. दोनों पतिपत्नी अपनीअपनी दिनचर्या में बहुत बिजी रहते हैं.

वह धीरे से बुदबुदाई,”क्या तुम कुछ कह रहे थे?”

“आरोही, तुम्हें भी सर्जरी से ब्रेक की जरूरत है और मैं भी 2-4 दिनों का ब्रेक चाहता हूं. इसलिए मैं ने पहले ही टिकट और होटल में बुकिंग करवा ली है.”

वह पति की बात को समझने की कोशिश कर रही थी क्योंकि उस समय उस का ध्यान अपने फोन पर था.

“आजकल लगता है कि लोग छुट्टियों से पहले से ही प्लानिंग कर के रखते हैं. बड़ी मुश्किल सेरैडिसन में रूम मिल पाया. एअरलाइंस तो छुट्टी के समय टिकट का 4 गुना दाम बढ़ा देते हैं…” अविरल बोल रहे थे.

“कहां की बुकिंग की बात कर रहे हो?

“तुम से तो बात करने के लिए लगता है कि कुछ दिनों के बाद मुझे भी पहले अपौइटमैंट लेना पड़ेगा,” वे रोषभरे स्वर में बोले.

फिर तल्खी भरी आवाज में बोले, “श्रीनगर…”

“श्रीनगर, वह भी दिसंबर में… न बाबा न… मेरी तो कुल्फी दिल्ली में ही जमी रहती थी और तुम कश्मीर की बात कर रहे हो…”

“’तुम्हारे साथ तो कभी कोई छुट्टी का प्लान करना ही मुश्किल रहता है… कहीं लंबा जाने का सोच ही नहीं सकते.”

अविरल के मुंह से श्रीनगर का नाम सुनते ही आरोही का मूड औफ हो गया था,”जब तुम जानते हो कि पहाड़ों पर जाने से मेरी तबियत खराब हो जाती है फिर भी तुम हिल्स पर ही जाने का प्रोग्राम बनाते हो. तुम्हें मेरी इच्छा से कोई मतलब ही नहीं रहता. मैं ने कितनी बार तुम से कहा है कि मुझे महाबलीपुरम जाना है. समुद्र के किनारे लहरों का शोर, उन का अनवरत संघर्ष देख कर मुझे जीवन जीने की ऊर्जा सी मिलती है. लहरों का गरजन मुझे बहुत आकर्षित करता है.”

“हद करती हो… रहती मुंबई में हो और सी बीच के लिए महाबलीपुरम जाना है?”

“तुम्हें कुछ पता भी है? यह शहर तमिलनाडु के सब से सुंदर और लोकप्रिय शहरों में गिना जाता है. यहां 7वीं और 8वीं शताब्दी में पल्लववंश के राजाओं ने द्रविड़शैली के नक्काशीदार अद्भुत भवन बनवाए थे, वह तुम्हें दिखाना चाहती हूं.”

“मुझ से बिना पूछे तुम ने क्यों बुकिंग करवाई जबकि तुम्हें मालूम है कि मुझे पहाड़ों पर जाना पसंद ही नहीं.”

“क्या तुम ने कसम खा रखी है कि तुम वहीं का प्रोग्राम बनाओगे जहां मुझे जाने में परेशानी होने वाली है?”

उन दोनों की शादी के 3 साल हो चुके थे. दोनों की पसंद बिलकुल अलगअलग है. इसी वजह से आपस में अकसर नोकझोंक हो जाया करती थी और फिर दोनों के बीच आपस में कुछ दिनों तक के लिए बोलचाल बंद हो जाती थी.

आरोही ने गाड़ी की चाबी उठाई और बोली,”अब बंद करो इस टौपिक को… कहीं नहीं जाएंगे… आओ, बाहर मौसम कितना सुहावना हो रहा है…चलते हैं, कहीं आइसक्रीम खा कर आते हैं. थोड़ा ठंडी हवा में बैठेंगे, आज के औपरेशन ने मुझे बिलकुल थका कर रख दिया है.”

अविरल ने साफ मना कर दिया, “मुझे तुम्हारी तरह भटकना पसंद नहीं.”

लगभग 15 दिनों तक दोनों के बीच बोलचाल बंद रही थी. एक दिन यों ही समझौता करने के लिए वह पति से कहने लगी,” अविरल, हमारे यहां लोग सर्जरी से बचने के लिए बाबाओं और हकीमों के पास चक्कर काटते रहते हैं और जब बीमारी बढ़ कर लाइलाज हो जाती है, तो डाक्टर से बारबार पूछते हैं कि डाक्टर यह ठीक तो हो जाएंगे न? पत्नी, बेटे के चेहरे की मायूसी देख कर मेरा दिल दुख जाता है. अवि प्लीज, थिऐटर में अमोल पालेकर का ड्रामा है. मैं ने औनलाइन टिकट बुक कर लिए हैं. रात में 8 से 10 तक का समय है.”

“मेरी तो जरूरी मीटिंग है.”

“उफ, अविरल तुम कितने बदल गए हो, पहले मेरे साथ आइसक्रीम पार्लर भी उछलतेकूदते चल देते थे. अब तो जहां कहीं भी चलने को कहती हूं, तो तुरंत मना कर देते हो.”

सुगंध : धन दौलत के घमंड में डूबे लड़के की कहानी – भाग 1

अपने दोस्त राजीव चोपड़ा को दिल का दौरा पड़ने की खबर सुन कर मेरे मन में पहला विचार उभरा कि अपनी जिंदगी में हमेशा अव्वल आने की दौड़ में बेतहाशा भाग रहा मेरा यार आखिर जबरदस्त ठोकर खा ही गया.

रात को क्लिनिक कुछ जल्दी बंद कर के मैं उस से मिलने नर्सिंग होम पहुंच गया. ड्यूटी पर उपस्थित डाक्टर से यह जान कर कि वह खतरे से बाहर है, मेरे दिल ने बड़ी राहत महसूस की थी.

मुझे देख कर चोपड़ा मुसकराया और छेड़ता हुआ बोला, ‘‘अच्छा किया जो मुझ से मिलने आ गया पर तुझे तो इस मुलाकात की कोई फीस नहीं दूंगा, डाक्टर.’’

‘‘लगता है खूब चूना लगा रहे हैं मेरे करोड़पति यार को ये नर्सिंग होम वाले,’’ मैं ने उस का हाथ प्यार से थामा और पास पड़े स्टूल पर बैठ गया.

‘‘इस नर्सिंग होम के मालिक डाक्टर जैन को यह जमीन मैं ने ही दिलाई थी. इस ने तब जो कमीशन दिया था, वह लगता है अब सूद समेत वसूल कर के रहेगा.’’

‘‘यार, कुएं से 1 बालटी पानी कम हो जाने की क्यों चिंता कर रहा है?’’

‘‘जरा सा दर्द उठा था छाती में और ये लोग 20-30 हजार का बिल कम से कम बना कर रहेंगे. पर मैं भी कम नहीं हूं. मेरी देखभाल में जरा सी कमी हुई नहीं कि मैं इन पर चढ़ जाता हूं. मुझ से सारा स्टाफ डरता है…’’

दिल का दौरा पड़ जाने के बावजूद चोपड़ा के व्यवहार में खास बदलाव नहीं आया था. वह अब भी गुस्सैल और अहंकारी इनसान ही था. अपने दिल के दौरे की चर्चा भी वह इस अंदाज में कर रहा था मानो उसे कोई मैडल मिला हो.

कुछ देर के बाद मैं ने पूछा, ‘‘नवीन और शिखा कब आए थे?’’

अपने बेटेबहू का नाम सुन कर चोपड़ा चिढ़े से अंदाज में बोला, ‘‘नवीन सुबहशाम चक्कर लगा जाता है. शिखा को मैं ने ही यहां आने से मना किया है.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘अरे, उसे देख कर मेरा ब्लड प्रेशर जो गड़बड़ा जाता है.’’

‘‘अब तो सब भुला कर उसे अपना ले, यार. गुस्सा, चिढ़, नाराजगी, नफरत और शिकायतें…ये सब दिल को नुकसान पहुंचाने वाली भावनाएं हैं.’’

‘‘ये सब छोड़…और कोई दूसरी बात कर,’’ उस की आवाज रूखी और कठोर हो गई.

कुछ पलों तक खामोश रहने के बाद मैं ने उसे याद दिलाया, ‘‘तेरे भतीजे विवेक की शादी में बस 2 सप्ताह रह गए हैं. जल्दी से ठीक हो जा मेरा हाथ बंटाने के लिए.’’

‘‘जिंदा बचा रहा तो जरूर शामिल हूंगा तेरे बेटे की शादी में,’’ यह डायलाग बोलते हुए यों तो वह मुसकरा रहा था, पर उस क्षण मैं ने उस की आंखों में डर, चिंता और दयनीयता के भाव पढ़े थे.

नर्सिंग होम से लौटते हुए रास्ते भर मैं उसी के बारे में सोचता रहा था.

हम दोनों का बचपन एक ही महल्ले में साथ गुजरा था. स्कूल में 12वीं तक की शिक्षा भी  साथ ली थी. फिर मैं मेडिकल कालिज में प्रवेश पा गया और वह बी.एससी. करने लगा.

पढ़ाई से ज्यादा उस का मन कालिज की राजनीति में लगता. विश्वविद्यालय के चुनावों में हर बार वह किसी न किसी महत्त्वपूर्ण पद पर रहा. अपनी छात्र राजनीति में दिलचस्पी के चलते उस ने एलएल.बी. भी की.

‘लोग कहते हैं कि कोई अस्पताल या कोर्ट के चक्कर में कभी न फंसे. देख, तू डाक्टर बन गया है और मैं वकील. भविष्य में मैं तुझ से ज्यादा अमीर बन कर दिखाऊंगा, डाक्टर. क्योंकि दौलत पढ़ाई के बल पर नहीं बल्कि चतुराई से कमाई जाती है,’ उस की इस तरह की डींगें मैं हमेशा सुनता आया था.

उस की वकालत ठीक नहीं चली तो वह प्रापर्टी डीलर बन गया. इस लाइन में उस ने सचमुच तगड़ी कमाई की. मैं साधारण सा जनरल प्रेक्टिशनर था. मुझ से बहुत पहले उस के पास कार और बंगला हो गए.

हमारी दोस्ती की नींव मजबूत थी इसलिए दिलों का प्यार तो बना रहा पर मिलनाजुलना काफी कम हो गया. उस का जिन लोगों के साथ उठनाबैठना था, वे सब खानेपीने वाले लोग थे. उस तरह की सोहबत को मैं ठीक नहीं मानता था और इसीलिए हम कम मिलते.

हम दोनों की शादी साथसाथ हुई और इत्तफाक से पहले बेटी और फिर बेटा भी हम दोनों के घर कुछ ही आगेपीछे जन्मे.

चोपड़ा ने 3 साल पहले अपनी बेटी की शादी एक बड़े उद्योगपति खानदान में अपनी दौलत के बल पर की. मेरी बेटी ने अपने सहयोगी डाक्टर के साथ प्रेम विवाह किया. उस की शादी में मैं ने चोपड़ा की बेटी की शादी में आए खर्चे का शायद 10वां हिस्सा ही लगाया होगा.

रुपए को अपना भगवान मानने वाले चोपड़ा का बेटा नवीन कालिज में आने तक एक बिगड़ा हुआ नौजवान बन गया था. उस की मेरे बेटे विवेक से अच्छी दोस्ती थी क्योंकि उस की मां सविता मेरी पत्नी मीनाक्षी की सब से अच्छी सहेली थी. इन दोनों नौजवानों की दोस्ती की मजबूत नींव भी बचपन में ही पड़ गई थी.

‘नवीन गलत राह पर चल रहा है,’ मेरी ऐसी सलाह पर चोपड़ा ने कभी ध्यान नहीं दिया था.

‘बाप की दौलत पर बेटा क्यों न ऐश करे? तू भी विवेक के साथ दिनरात की टोकाटाकी वाला व्यवहार मत किया कर, डाक्टर. अगर वह पढ़ाई में पिछड़ भी गया तो कोई फिक्र नहीं. उसे कोई अच्छा बिजनेस मैं शुरू करा दूंगा,’’ अपनी ऐसी दलीलों से वह मुझे खीज कर चुप हो जाने को मजबूर कर देता.

आज इस करोड़पति इनसान का इकलौता बेटा 2 कमरों के एक साधारण से किराए वाले फ्लैट में अपनी पत्नी शिखा के साथ रह रहा था. नर्सिंग होम से सीधे घर न जा कर मैं उसी के फ्लैट पर पहुंचा.

नवीन और शिखा दोनों मेरी बहुत इज्जत करते थे. इन दोनों ने प्रेम विवाह किया था. साधारण से घर की बेटी को चोपड़ा ने अपनी बहू बनाने से साफ मना कर दिया, तो इन्होंने कोर्ट मैरिज कर ली थी.

चोपड़ा की नाराजगी को नजरअंदाज करते हुए मैं ने इन दोनों का साथ दिया था. इसी कारण ये दोनों मुझे भरपूर सम्मान देते थे.

चोपड़ा को दिल का दौरा पड़ने की चर्चा शुरू हुई, तो नवीन उत्तेजित लहजे में बोला, ‘‘चाचाजी, यह तो होना ही था.’’ रोजरोज की शराब और दौलत कमाने के जनून के चलते उन्हें दिल का दौरा कैसे न पड़ता?

‘‘और इस बीमार हालत में भी उन का घमंडी व्यवहार जरा भी नहीं बदला है. शिखा उन से मिलने पहुंची तो उसे डांट कर कमरे से बाहर निकाल दिया. उन के जैसा खुंदकी और अकड़ू इनसान शायद ही दूसरा हो.’’

‘‘बेटे, बड़ों की बातों का बुरा नहीं मानते और ऐसे कठिन समय में तो उन्हें अकेलापन मत महसूस होने दो. वह दिल का बुरा नहीं है,’’ मैं उन्हें देर तक ऐसी बातें समझाने के बाद जब वहां से उठा तो मन बड़ा भारी सा हो रहा था.

चोपड़ा ने यों तो नवीन को पूरी स्वतंत्रता से ऐश करने की छूट हमेशा दी, पर जब दोनों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हुई तो बाप ने बेटे को दबा कर अपनी चलानी चाही थी.

नादानियां : भाग 1

प्रथमा की शादी को 3 साल हो गए हैं. कितने अरमानों से उस ने रितेश की जीवनसंगिनी बन कर इस घर में पहला कदम रखा था. रितेश से जब उस की शादी की बात चल रही थी तो वह उस की फोटो पर ही रीझ गई थी. मांपिताजी भी संतुष्ट थे क्योंकि रितेश

2 बहनों का इकलौता भाई था और दोनों बहनें शादी के बाद अपनेअपने घरपरिवार में रचीबसी थीं. सासससुर भी पढ़ेलिखे व सुलझे विचारों के थे.

शादी से पहले जब रितेश उसे फोन करता था तो उन की बातों में उस की मां यानी प्रथमा की होने वाली सास एक अहम हिस्सा होती थी. प्रथमा प्रेमभरी बातें और होने वाले पति के मुंह से खुद की तारीफ सुनने के लिए तरसती रह जाती थी और रितेश था कि बस, मां के ही गुणगान करता रहता. उसी बातचीत के आधार पर प्रथमा ने अनुमान लगा लिया था कि रितेश के जीवन में उस की मां का पहला स्थान है और उसे पति के दिल में जगह बनाने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ेगी.

शादी के बाद हनीमून की योजना बनाते समय रितेश बारबार हरिद्वार, ऋ षिकेश, मसूरी जाने का प्लान ही बनाता रहा. आखिरी समय तक वह अपनी मम्मीपापा से साथ चलने की जिद करता रहा. प्रथमा इस नई और अनोखी जिद पर हैरान थी क्योंकि उस ने तो यही पढ़ा व सुना था कि हनीमून पर पतिपत्नी इसलिए जाते हैं ताकि वे ज्यादा से ज्यादा वक्त एकदूसरे के साथ बिता सकें और उन की आपसी समझ मजबूत हो. मगर यहां तो उलटी गंगा बह रही है. मां के साथ तीर्थ पर ही जाना था तो इसे हनीमून का नाम देने की क्या जरूरत है. खैर, ससुरजी ने समझदारी दिखाई और उन्हें हनीमून पर अकेले ही भेजा.

स्मार्ट और हैंडसम रितेश का फ्रैंडसर्किल बहुत बड़ा है. शाम को औफिस से घर आते ही जहां प्रथमा की इच्छा होती कि वह पति के साथ बैठ कर आने वाले कल के सपने बुने, उस के साथ घूमनेफिरने जाए, वहीं रितेश अपनी मां के साथ बैठ कर गप मारता और फिर वहां से दोस्तों के पास चला जाता. प्रथमा से जैसे उसे कोई मतलब ही नहीं था. रात लगभग 9 बजे लौटने के बाद खाना खा कर वह सो जाता. हां, हर रात वह सोने से पहले प्रथमा को प्यार जरूर करता था. प्रथमा का कोमल हृदय इस बात से आहत हो उठता, उसे लगता जैसे पति ने उसे सिर्फ अपने बिस्तर में ही जगह दी है, दिल में नहीं. वह केवल उस की आवश्यकतापूर्ति का साधन मात्र है.

ऐसा नहीं है कि उस की सास पुरानी फिल्मों वाली ललिता पंवार की भूमिका में है या फिर वह रितेश को उस के पास आने से रोकती है, बल्कि वह तो स्वयं कई बार रितेश से उसे फिल्म, मेले या फिर होटल जाने के लिए कहती. रितेश उसे ले कर भी जाता है मगर उन के साथ  उस की मां यानी प्रथमा की सास जरूर होती है. प्रथमा मन मसोस कर रह जाती, मगर सास को मना भी कैसे करे. जब पति खुद चाहता है कि मां उन के साथ रहे तो फिर वह कौन होती है उन्हें टोकने वाली.

कई बार तो उसे लगता कि पति के दिल में उस का एकछत्र राज कभी नहीं हो सकता. वह उस के दिल की रानी सास के रहते तो नहीं बन सकती. उस की टीस तब और भी बढ़ जाती है जब उस की बहन अपने पति के प्यार व दीवानगी के किस्से बढ़ाचढ़ा कर उसे बताती कि कैसे उस के पति अपनी मां को चकमा दे कर और बहाने बना कर उसे फिल्म दिखाने ले जाते हैं, कैसे वे दोनों चांदनी रातों में सड़कों पर आवारगी करते घूमते हैं और चाटपकौड़ी, आइसक्रीम का मजा लेते हैं. प्रथमा सिर्फ आह भर कर रह जाती.

हां, उस के ससुर उस के दर्द को समझने लगे थे और कभी बेकार में चाय बनवा कर, पास बैठा कर इधरउधर की बातें करते तो कभी टीवी पर आ रही फिल्म को देखने के लिए उस से अनुरोध करते.

दिन गुजरते रहे, वह सब्र करती रही. लेकिन जब बात सिर से गुजरने लगी तो उस ने एक नया फैसला कर लिया अपनी जीवनशैली को बदलने का.

प्रथमा को मालूम था कि राकेश मेहरा यानी उस के ससुरजी को चाय के साथ प्याज के पकौड़े बहुत पसंद हैं, हर रोज वह शाम की चाय के साथ रितेश की पसंद के दूसरे स्नैक्स बनाती रही है और कभीकभी रितेश के कहने पर सासूमां की पसंद के भी. मगर आज उस ने प्याज के पकौड़े बनाए. पकौड़े देखते ही राकेश के चेहरे पर लुभावनी सी मुसकान तैर गई.

प्रथमा ने आज पहली बार गौर से अपने ससुरजी को देखा. राकेश की उम्र लगभग 55 वर्ष थी, मगर दिखने में बहुत ही आकर्षक व्यक्तित्व है उन का. रितेश अपने पापा पर ही गया है, यह सोच कर प्रथमा के दिल में गुदगुदी सी हो गई.

राकेश ने जीभर कर पकौड़ों की तारीफ की और प्रथमा से बड़े ही नाटकीय अंदाज में कहा, ‘‘मोगाम्बो खुश हुआ. अपनी एक इच्छा बताओ, बच्ची. कहो, क्या चाहती हो?’’

वो जलता है मुझ से : विजय को तकलीफ क्यों होने लगी थी ? – भाग 1

‘‘सुपीरियरिटी कांप्लेक्स जैसी कोई भी भावना नहीं होती. वास्तव में जो इनसान इनफीरियरिटी कांप्लेक्स से पीडि़त है उसी को सुपीरियरिटी कांप्लेक्स भी होता है. अंदर से वह हीनभावना को ही दबा रहा होता है और यही दिखाने के लिए कि उसे हीनभावना तंग नहीं कर रही, वह सब के सामने बड़ा होने का नाटक करता है. ‘‘उच्च और हीन ये दोनों मनोगं्रथियां अलगअलग हैं. उच्च मनोग्रंथि वाला इनसान इसी खुशफहमी में जीता है कि सारी दुनिया उसी की जूती के नीचे है. वही सब से श्रेष्ठ है, वही देता है तो सामने वाले का पेट भरता है. वह सोचता है कि यह आकाश उसी के सिर का सहारा ले कर टिका है और वह सहारा छीन ले तो शायद धरती ही रसातल में चली जाए. किसी को अपने बराबर खड़ा देख उसे आग लग जाती है. इसे कहते हैं उच्च मनोगं्रथि यानी सुपीरियरिटी कांप्लेक्स.

‘‘इस में भला हीन मनोगं्रथि कहां है. जैसे 2 शब्द हैं न, खुशफहमी और गलतफहमी. दोनों का मतलब एक हो कर भी एक नहीं है. खुशफहमी का अर्थ होता है बेकार ही किसी भावना में खुश रहना, मिथ्या भ्रम पालना और उसी को सच मान कर उसी में मगन रहना जबकि गलतफहमी में इनसान खुश भी रह सकता है और दुखी भी.’’ ‘‘तुम्हारी बातें बड़ी विचित्र होती हैं जो मेरे सिर के ऊपर से निकल जाती हैं. सच पूछो तो आज तक मैं समझ ही नहीं पाया कि तुम कहना क्या चाहते हो.’’

‘‘कुछ भी खास नहीं. तुम अपने मित्र के बारे में बता रहे थे न. 20 साल पहले तुम पड़ोसी थे. साथसाथ कालिज जाते थे सो अच्छा प्यार था तुम दोनों में. पढ़ाई के बाद तुम पिता के साथ उन के व्यवसाय से जुड़ गए और अच्छेखासे अमीर आदमी बन गए. पिता की जमा पूंजी से जमीन खरीदी और बैंक से खूब सारा लोन ले कर यह आलीशान कोठी बना ली. ‘‘उधर 20 साल में तुम्हारे मित्र ने अपनी नौकरी में ही अच्छी इज्जत पा ली, उच्च पद तक पहुंच गया और संयोग से इसी शहर में स्थानांतरित हो कर आ गया. अपने आफिस के ही दिए गए छोटे से घर में रहता है. तुम से बहुत प्यार भी करता है और इन 20 सालों में वह जब भी इस शहर में आता रहा तुम से मिलता रहा. तुम्हारे हर सुखदुख में उस ने तुम से संपर्क रखा. हां, यह अलग बात है कि तुम कभी ऐसा नहीं कर पाए क्योंकि आज की ही तरह तुम सदा व्यस्त रहे. अब जब वह इस शहर में पुन: आ गया है, तुम से मिलनेजुलने लगा है तो सहसा तुम्हें लगने लगा है कि उस का स्तर तुम्हारे स्तर से नीचा है, वह तुम्हारे बराबर नहीं है.’’

‘‘नहीं, ऐसा नहीं है.’’ ‘‘ऐसा ही है. अगर ऐसा न होता तो उस के बारबार बुलाने पर भी क्या तुम उस के घर नहीं जाते? ऐसा तो नहीं कि तुम कहीं आतेजाते ही नहीं हो. 4-5 तो किटी पार्टीज हैं जिन में तुम जाते हो. लेकिन वह जब भी बुलाता है तुम काम का बहाना बना देते हो.

‘‘साल भर हो गया है उसे इस शहर में आए. क्या एक दिन भी तुम उस के घर पर पहले जितनी तड़प और ललक लिए गए हो जितनी तड़प और ललक लिए वह तुम्हारे घर आता रहता था और अभी तक आता रहा? तुम्हारा मन किया दोस्तों से मिलने का तो तुम ने एक पार्टी का आयोजन कर लिया. सब को बुला लिया, उसे भी बुला लिया. वह भी हर बार आता रहा. जबजब तुम ने चाहा और जिस दिन उस ने कहा आओ, थोड़ी देर बैठ कर पुरानी यादें ताजा करें तो तुम ने बड़ी ठसक से मना कर दिया. धीरेधीरे उस ने तुम से पल्ला झाड़ लिया. तुम्हारी समस्या जब यह है कि तुम ने अपने बेटे के जन्मदिन पर उसे बुलाया और पहली बार उस ने कह दिया कि बच्चों के जन्मदिन पर भला उस का क्या काम?’’ ‘‘मुझे बहुत तकलीफ हो रही है राघव…वह मेरा बड़ा प्यारा मित्र था और उसी ने साफसाफ इनकार कर दिया. वह तो ऐसा नहीं था.’’

‘‘तो क्या अब तुम वही रह गए हो? तुम भी तो यही सोच रहे हो न कि वह तुम्हारी सुखसुविधा से जलता है तभी तुम्हारे घर पर आने से कतरा गया. सच तो यह है कि तुम उसे अपने घर अपनी अमीरी दिखाने को बुलाते रहे हो, अचेतन में तुम्हारा अहम संतुष्ट होता है उसे अपने घर पर बुला कर. तुम उस के सामने यह प्रमाणित करना चाहते हो कि देखो, आज तुम कहां हो और मैं कहां हूं जबकि हम दोनों साथसाथ चले थे.’’ ‘‘नहीं तो…ऐसा तो नहीं सोचता मैं.’’

‘‘कम से कम मेरे सामने तो सच बोलो. मैं तुम्हारे इस दोस्त से तुम्हारे ही घर पर मिल चुका हूं. जब वह पहली बार तुम से मिलने आया था. तुम ने घूमघूम कर अपना महल उसे दिखाया था और उस के चेहरे पर भी तुम्हारा घर देखते हुए बड़ा संतोष झलक रहा था और तुम कहते हो वह जलता है तुम्हारा वैभव देख कर. तुम्हारे चेहरे पर भी तब कोई ऐसा ही दंभ था…मैं बराबर देख रहा था. उस ने कहा था, ‘भई वाह, मेरा घर तो बहुत सुंदर और आलीशान है. दिल चाह रहा है यहीं क्यों न आ जाऊं…क्या जरूरत है आफिस के घर में रहने की.’ ‘‘तब उस ने यह सब जलन में नहीं कहा था, अपना घर कहा था तुम्हारे घर को. तुम्हारे बच्चों के जन्मदिन पर भागा चला आता था और आज उसी ने मना कर दिया. उस ने भी पल्ला खींचना शुरू कर दिया, आखिर क्यों. हीन ग्रंथि क्या उस में है? अरे, तुम व्यस्त रहते हो इसलिए उस के घर तक नहीं जाते और वह क्या बेकार है जो अपने आफिस में से समय निकाल कर भी चला आता है. प्यार करता था तभी तो आता था. क्या एक कप चाय और समोसा खाने चला आता था?

निर्णय : भाग 1

रेलवे स्टेशन से बाहर निकल कर जब वह टैक्सी लेने लगी तो पलभर के लिए उस का मन हुआ कि घर न जा कर वह कहीं भाग जाए सोनू को ले कर. फिर उतनी ही त्वरित गति से उस की आंखों के सामने उस की अपनी तीनों मासूम बेटियों का चेहरा घूम गया. अपना घर, पति, बच्चे एक स्त्री का संपूर्ण संसार तो बस इन्हीं तानोंबानों में जकड़ा होता है. भाग सकने की गुंजाइश ही कहां छोड़ता है स्त्री का अपना मन. नहीं, हार मानने से नहीं चलेगा. स्त्री जब एक बार मातृत्व के गुरुगंभीर पद पर आसीन हो जाती है तो उस पद की रक्षा करने का दुर्दम्य साहस भी स्वयमेव ही चला आता है. अपनी सुषुप्त शक्ति को पहचानने भर की देर होती है, बस. नहीं, वह हार नहीं मानेगी.

भीतर ही भीतर स्वयं को दृढ़ता का पाठ पढ़ाती, तौलती, परखती वह टैक्सी में जा बैठी, रामबाग, अपने घर का पता बता कर उस ने सोनू को सीट पर बिठा दिया. बैग आगे की खाली सीट पर रख दिया. पर्स  से उस ने सोनू के दूध की बोतल निकाली और उसे पकड़ा दी. सोनू उस से टिक कर अधलेटा हो गया. खुद को उस ने सीट पर ढीला छोड़ दिया तथा आंखें बंद कर लीं. अपने 3 दिन के ससुराल प्रवास की एकएक बात उस के सिर पर हथौडे़ सी बज रही थी. विदा लेते समय छोटी ननद सरिता ने भावावेग में उस का हाथ कस कर पकड़ लिया था. उस ने कहा था, ‘अपनाया है तो रिश्तों को ईमानदारी से निभाओ. सचाइयों से घबरा कर संबंधों के प्रति बेईमान नहीं हुआ जा सकता, फिर मांबच्चे का संबंध किसी भी सहमति का मुहताज नहीं होता.’

‘ईमानदारी से भी अधिक जरूरी साहस है इस रिश्ते में.’ अपनी भर्राई हुई टूटती आवाज में कह कर वह कार में बैठ गई थी. सरिता वहीं, घर के गेट पर खड़ी उसे जाता हुआ देखती रही थी. वापसी के पूरे सफर में सरिता की कही बातें उस के दिमाग में घूमती रही थीं. वह रोना चाहती थी, चिल्लाचिल्ला कर अपने भीतर का सारा आक्रोश निकाल देना चाहती थी. क्यों उस के आसपास के सारे लोग इतने स्वार्थी हो कर सोच रहे हैं. क्यों सरिता के सिवा किसी अन्य को उस का दर्द दिखाई नहीं देता. इतना निर्मम तथा कठोर कैसे हो सकता है कोई. यों तो वह जब भी ससुराल से लौटी है, कभी खाली नहीं लौटी. मां तथा बड़ी ननद, सुषमा जिज्जी की तीखीकड़वी बातों से भरा दुखी, हताश दिलदिमाग ले कर ही लौटी है. पर डेढ़ साल पहले जब पहली बार नन्हे से सोनू को गोद में लिए ससुराल आई थी तो इन्हीं मां तथा जिज्जी ने हम दोनों को जैसे पलकों पर उठा लिया था. पोते को गोद में उठाए दादी पूरे महल्ले में घूम आई थीं. रोज शाम के वक्त उस की नजर उतारती थीं…और अब? एक सच ने मानो ममता, प्रेम, वात्सल्य सब पर डाका ही डाल दिया था. आने से पहले उसे तनिक भी अंदेशा नहीं था कि वहां ये सब हो जाएगा. अनमनी अवश्य थी, पहली बार अकेले जा रही थी, जबकि लड़कियों की परीक्षाएं सिर पर थीं. बूआ के पोते के नामकरण पर जाना कोई इतना जरूरी तो नहीं था, पर नीलाभ नहीं माने. दरअसल, उस का ससुराल और नीलाभ की बूआ का घर एक ही महल्ले में है. इसीलिए उन का तर्क था कि बूआ के घर की खुशी में सम्मिलित होने के बहाने वह अपने ससुराल वालों से भी मिल आएगी. साथ ही, सारी बिरादरी से भी मेलमुलाकात हो जाएगी. एक तरह से नीलाभ ने उसे जबरन ठेलठाल कर भेजा था.

उसे चिढ़ हो रही थी नीलाभ की बचकानी जिद पर. वह उस के पीछे छिपी उन की मंशा को भांप नहीं पाई थी. ट्रेन  4 घंटे लेट थी. ससुराल का ड्राइवर स्टेशन पर उस का इंतजार कर रहा था. घर पहुंची तो वहां की हवा में उसे कुछ भारीपन सा लगा था. मां व जिज्जी दोनों ही कुछ उखड़ीउखड़ी लग रही थीं. सोनू को भी दोनों में से किसी ने हुलस कर पहले की भांति गोद में उठा कर लाड़प्यार की बौछार नहीं की थी. उस का जी तो उसी समय हुड़क गया था. जेठानी प्रभा औपचारिक नमस्ते के बाद रसोई में जा घुसी थीं. कुछ देर बाद चायनाश्ता व सोनू का दूध रख कर फिर गायब  हो गई थीं. नौकर से कह कर मां ने उस का सामान ऊपर वाले छोटे कमरे में रखवा दिया था. शाम 5 बजे बूआ के घर के लिए निकलने व अभी ऊपर जा कर आराम करने की हिदायत दे कर दोनों उसे बैठक में अकेला छोड़ कर निकल गई थीं. उस का व सोनू का खाना भी जिज्जी ने ऊपर ही भिजवा दिया था, जिस का एक निवाला तक उस के गले नहीं उतरा था.

4 साढ़े 4 बजे वह नीचे आई तो देखा, मां ने पूरी तैयारी कर रखी है. अपनी ननद के घर जोजो नेग ले कर जाने हैं वे सब पलंग पर फैला रखे थे. उसे सब दिखाती हुई मां बोलीं, ‘छोरियां चाहे बूढ़ी ही क्यों न हों, रहेंगी छोरियां ही न घर की. माई, बापू और भाई का साया सिर पर से उठ गया तो क्या हुआ, भौजी तो जिंदा है न अभी. मेरे होते कभी मायके की कमी न अखरेगी तुम्हारी बूआ को. इतने दिनों के बाद आई है उस के घर में खुशी, सारी बिरादरी देखेगी, इसीलिए करना पड़े है ये सब.’ लहूलुहान कलेजे के बावजूद हंसी ने एक हिलोर ले ली थी, जिसे उस ने भीतर ही दबा लिया. दोहरी बातें करने में पारंगत हैं मां. तोहफे तो उस के पास भी थे. नीलाभ ने अपनी मां, जिज्जी, भाई, भाभी तथा बच्चों के लिए अलगअलग उपहार भेजे थे. सब ज्यों के त्यों रखे थे बैग में. जब बैग खोला तो सारे उपहार मुंह चिढ़ाते से लगे थे उसे. ये जो सब मिल कर उस की भावनाओं की, ममता की हत्या करने पर तुले हुए हैं, उन्हें किस कलेजे से जा कर थमाए उपहार.

फिर पता नहीं क्या सोच कर वह उठी और अपनी तरफ से बूआ को देने लाए हुए उपहार निकाल लाई. बूआ तथा उन की बहू की साड़ी व नवजात पोते के लिए चांदी के तार में काले मोतियों वाले कड़े लाई थी वह. मां को दिखा कर ये सामान भी  उस ने अन्य वस्तुओं के साथ पलंग पर रख दिया. कुछ भी हो, बिरादरी के सामने तो घर की बातों को ढक कर ही रखना पड़ता है. बहू हो कर वह अलग से कैसे करेगी लेनदेन.

विरासत : क्या लिखा था उन खतों में ? – भाग 1

अपराजिता की 18वीं वर्षगांठ के अभी 2 महीने शेष थे कि वक्त ने करवट बदल ली. व्यावहारिक तौर पर तो उसे वयस्क होने में 2 महीने शेष थे, मगर बिन बुलाई त्रासदियों ने उसे वक्त से पहले ही व्यस्क बना दिया था. मम्मी की मौत के बाद नानी ने उस की परवरिश का जिम्मा निभाया था और कोशिश की थी कि उसे मम्मी की कमी न खले.

यह भी हकीकत है कि हर रिश्ते की अपनी अलग अहमियत होती है. लाचार लोग एक पैर से चल कर जीवन को पार लगा देते हैं. किंतु जीवन की जो रफ्तार दोनों पैरों के होने से होती है उस की बात ही अलग होती है. ठीक इसी तरह एक रिश्ता दूसरे रिश्ते के न होने की कमी को पूरा नहीं कर सकता.

वक्त के तकाजों ने अपराजिता को एक पार्सल में तब्दील कर दिया था. मम्मी की मौत के बाद उसे नानी के पास पहुंचा दिया गया और नानी के गुजरने के बाद इकलौती मौसी के यहां. मौसी के दोनों बच्चे उच्च शिक्षा के लिए दूसरे शहरों में रहते थे. अतएव वह अपराजिता के आने से खुश जान पड़ती थीं.

अपराजिता के बहुत सारे मित्रों के 18वें जन्मदिन धूमधाम से मनाए जा चुके थे. बाकी बच्चों के आने वाले महीनों में मनाए जाने वाले थे. वे सब मौका मिलते ही अपनाअपना बर्थडे सैलिब्रेशन प्लान करते थे. तब अपराजिता बस गुमसुम बैठी उन्हें सुनती रहती थी. उस ने भी बहुत बार कल्पनालोक में भांतिभांति विचरण किया था अपने जन्मदिन की पार्टी के सैलिब्रेशन को ले कर मगर अब बदले हालात में वह कुछ खास करने की न तो सोच सकती थी और न ही किसी से कोई उम्मीद लगा सकती थी.

2 महीने गुजरे और उस की खास सालगिरह का सूर्योदय भी हुआ. मगर नानी की हाल ही में हुई मौत के बादलों से घिरे माहौल में सालगिरह उमंग की ऊष्मा न बिखेर सकी. अपराजिता सुबह उठ कर रोज की तरह कालेज के लिए निकल गई.

शाम को घर वापस आई तो देखा कि किचन टेबल पर एक भूरे रंग का लिफाफा रखा था. वह लिफाफा उठा कर दौड़ीदौड़ी मौसी के पास आई. लिफाफे पर भेजने वाले का नामपता नहीं था और न ही कोई पोस्टल मुहर लगी थी.

‘‘मौसी यह कहां से आया?’’ उस ने आंगन में कपड़े सुखाने डाल रहीं मौसी से पूछा.

‘‘उस पर तो तुम्हारा ही नाम लिखा है अप्पू… खोल कर क्यों नहीं देख लेतीं?’’

अपराजिता ने लिफाफा खोला तो उस के अंदर भी थोड़े छोटे आकार के कई सफेद रंग के लिफाफे थे. उन पर कोई नाम नहीं था. बस बड़ेबड़े अंकों में गहरीनीली स्याही से अलगअलग तारीखें लिखी थीं. तारीखों को गौर से देखने पर उसे पता चला कि ये तारीखें भविष्य में अलगअलग बरसों में पड़ने वाले उस के कुछ जन्मदिवस की हैं. खुशी की बात कि  एक लिफाफे पर आज की तारीख भी थी. अपराजिता ने प्रश्नवाचक निगाहों से मौसी को निहारा तो वे मुसकरा भर दीं जैसे उन्हें कुछ पता ही नहीं.

‘प्लीज मौसी बताइए न ये सब क्या है. ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि आप को इस के बारे में कुछ खबर न हो… यह लिफाफा पोस्ट से तो आया नहीं है… कोई तो इसे दे कर गया है… आप सारा दिन घर में थीं और जब आप ने इसे ले कर रखा है तो आप को तो पता ही होना चाहिए कि आखिर यह किस का है?’’

‘‘मुझे कैसे पता चलता जब कोई बंद दरवाजे के बाहर इसे रख कर चला गया. तुम तो जानती हो कि दोपहर में कभीकभी मेरी आंख लग जाती है. शायद उसी वक्त कोई आया होगा. मैं ने तो सोचा था कि तुम्हारे किसी मित्र ने कुछ भेजा है. हस्तलिपि पहचानने की कोशिश करो शायद भेजने वाले का कोई सूत्र मिल जाए,’’ मौसी के चेहरे पर एक रहस्यपूर्ण मुस्कराहट फैली हुई थी.

अपराजिता ने कई बार ध्यान से देखा, हस्तलिपि बिलकुल जानीपहचानी सी लग रही थी. बहुत देर तक दिमागी कसरत करने पर उसे समझ में आ गया कि यह हस्तलिपि तो उस की नानी की हस्तलिपि जैसी है. परंतु यह कैसे संभव है? उन्हें तो दुनिया को अलविदा किए 2 महीने गुजर गए हैं और आज अचानक ये लिफाफे… उसे कहीं कोई ओरछोर नहीं मिल रहा था.

‘‘मौसी यह हस्तलिपि तो नानी की लग रही है लेकिन…’’

‘‘लेकिनवेकिन क्या? जब लग रही है तो उन्हीं की होगी.’’

‘‘यह असंभव है मौसी?’’ अपराजिता का स्वर द्रवित हो गया.

‘‘अभी तो संभव ही है अप्पू, मगर 2 महीने पहले तक तो नहीं था. जिस दिन से तुम्हारी नानी को पता चला कि उन का हृदयरोग बिगड़ता जा रहा है और उन के पास जीने के लिए अधिक समय नहीं है तो उन्होंने तुम्हारे लिए ये लैगसी लैटर्स लिखने शुरू कर दिए थे, साथ ही मुझे निर्देश किया था कि मैं यह लिफाफा तुम्हें तुम्हारे 18वें जन्मदिन वाले दिन उपहारस्वरूप दे दूं. अब इन खतों के माध्यम से तुम्हें क्या विरासत भेंट की गई है, यह तो मुझे भी नहीं मालूम. कम से कम जिस लिफाफे पर आज की तारीख अंकित है उसे तो खोल ही लो अब.’’

वैलेंटाइन डे : पति पत्नी की प्यार भरी कहानी – भाग 1

वैसे तो आजकल ‘बर्थ डे’, ‘मदर्स डे’,  ‘फादर्स डे’, ‘रिब्बन डे’, ‘रोज डे’, ‘वैलेंटाइन डे’ आदि की भरमार है पर इन में सब से ज्यादा अहमियत दी जाती है ‘वैलेंटाइन डे’ को. क्यों? पता नहीं, पर एक बुखार सा चढ़ जाता है. सारा माहौल गुलाबी हो जाता है, प्यारमोहब्बत की अनदेखी रोमांचक तरंगें तनमन को छू कर उत्तेजित कर देती हैं. महीना भर पहले जो हर किसी की जबान पर यह एक बार चढ़ जाता है तो फिर कई दिनों तक उतरने का नाम ही नहीं लेता.

मुझे सुबह की पहली चाय पीते हुए अखबार पढ़ने की आदत है. आज मेरे सामने अखबार तो है पर चाय नहीं. देर तक इंतजार करता रहा पर चाय नहीं आई. दिमाग में एक भी शब्द नहीं जा रहा था. गरमगरम चाय के बिना अखबार की गरमगरम खबरें भी बिलकुल भावशून्य लगने लगीं. जब दिमाग ने बिलकुल ही साथ देने से मना कर दिया तो मैं ने अखबार वहीं पटक दिया और किचन की ओर चला.

देखा, चूल्हा ठंडा पड़ा है. माथा ठनका, कहीं पत्नी बीमार तो नहीं. मैं शयनकक्ष की ओर भागा. मैं इसलिए चिंतित नहीं था कि पत्नी बीमार होगी बल्कि इसलिए परेशान था कि सच में अगर श्रीमतीजी की तबीयत नासाज हो तो उन का हालचाल न पूछने के कारण उन के दिमाग के साथ यह नाचीज भी आउट हो जाएगा. कहीं होतेहोते बात तलाक तक न पहुंच जाए. अजी, नहीं, आप फिर गलतफहमी में  हैं. तलाक से डरता कौन है? तलाक मिल जाए तो अपनी तो चांदी ही चांदी हो जाएगी. मगर तलाक के साथ मुझे एक ऐसी गवर्नेस भी मिल जाए जो हर तरह से मेरे घर को संभाल सके. यानी सुबह मुझे चाय देने से ले कर, दफ्तर जाते वक्त खाना, कपड़ा, मोजे देना, बच्चों की देखभाल करना, उन की सेहत, पढ़ाई- लिखाई आदि पर ध्यान रखना, फिर घर की साफसफाई आदि…चौबीस घंटे काम करने वाली (बिना खर्चे के), एक मशीन या रोबोट मिल जाए. फिर मैं तो क्या दुनिया में कोई भी किसी का मोहताज न होगा.

मैं ने शयनकक्ष में जा कर क्या देखा कि मेरी पत्नी तो सच में ही बिस्तर में पड़ी है. मैं ने घबरा कर पूछा, ‘‘अरे, यह तुम्हें क्या हो गया? तबीयत ठीक नहीं है क्या?’’

पत्नी ने नाकभौं सिकोड़ते हुए कहा, ‘‘मुझे क्या हुआ है? मैं तो अच्छीभली हूं.’’

‘‘फिर मुझे चाय…’’ उस का तमतमाया चेहरा देख कर मैं चुप हो गया.

‘‘क्यों? क्या मैं कोई नौकरानी हूं कि सुबह उठ कर सब की जरूरतें पूरी करती रहूं. आज मेरा चाय बनाने का मूड नहीं है.’’

मैं भौचक्का रह गया. यह क्या कह रही है? मैं कुछ सम?ा नहीं पाया. इतने में बबलू आ गया.

‘‘मम्मी, मेरा टिफिन बाक्स तैयार है? तुम ने वादा किया था, याद है कि आज मेरे टिफिन में केक रखोगी?’’

‘‘मैं ने कुछ नहीं रखा.’’

‘‘क्यों, मम्मी? आज सभी बच्चे अपनेअपने घर से अच्छीअच्छी चीजें लाएंगे. मैं ने भी उन को प्रौमिस किया था कि मैं केक लाऊंगा.’’

मैं बीच में ही बोल पड़ा, ‘‘अरे, बबलू, आज क्या खास बात है? आप की बर्थ डे है क्या?’’

बबलू ने अपना माथा ठोक लिया.

‘‘पापा आप भी न…अभी पिछले महीने ही तो मनाया था मेरा बर्थ डे.’’

‘‘यू आर राइट,’’ मैं खिसियाते हुए बोला. कैसे भूल गया मैं बबलू का बर्थ डे जबकि मेरी जेब में उस दिन इतना बड़ा होल हो गया था कि टूटे मटके के पानी की तरह सारा पैसा बह गया था.

‘‘फिर आज क्या बात है जो आप सारे बच्चे इतने खुश हो?’’

बबलू ने फिर माथा ठोक लिया. यह आदत उसे अपनी मम्मी से विरासत में मिली थी. दोनों मांबेटे बारबार मेरी नालायकी पर इसी तरह माथा ठोकते हैं.

‘‘पापा, आप को इतना भी नहीं मालूम कि आज सारी दुनिया ‘वैलेंटाइन डे’  मनाती है. जानते हैं दुनिया में इस दिन की कितनी इंपोर्टेंस है? आज के दिन लोग अपने बिलव्ड को अच्छा सा गिफ्ट देते हैं.’’

चौथी कक्षा में पढ़ रहे बेटे के  सामान्य  ज्ञान को देखसुन कर मेरा मुंह खुला का खुला और आंखें फटी की फटी रह गईं. वाह, क्या बात है. फिर उस की आवाज आई, ‘‘पापा, आप ने मम्मी को क्या गिफ्ट दिया?’’

मेरे दिमाग में बिजली सी कौंध गई. तो यह राज है श्रीमती के मुंह लपेट कर पडे़ रहने का. मैं यह सोच कर अंदर से परेशान हो रहा था कि अब मुझे इस कहर से कौन बचाएगा? मैं ने अपने बेटे के बहाने अपनी पत्नी को सम?ाते हुए कहा, ‘‘बेटे, वैलेंटाइन का अर्थ भी जानते हो? वैलेंटाइन किसी संत का नाम है जिस ने हमारे प्रसिद्ध संत कबीर की तरह दुनिया को पे्रम का संदेश दिया था. यह पे्रम या प्यार किसी के लिए भी हो सकता है. मातापिता, भाईबहन, गुरु, दोस्त आदि. मीरा कृष्ण की दीवानी थी, राधा कृष्ण की पे्ररणा. यह सब प्यार नहीं तो और क्या है? आज का विकृत रूप प्यार…खैर, जाने दो, तुम नहीं समझेगे.’’

‘‘क्या अंकल, बबलू क्या नहीं समझेगा? आप ने जो कहा वह मैं सम?ा गया. बबलू ने ठीक ही तो कहा था, आप ने आंटी को क्या तोहफा दिया?’’

‘‘हूं,’’ सांप की फुफकार सुनाई दी. मैं ने पलट कर देखा. मेरी पत्नी मुझे घूर रही थी. मैं ने उधर ध्यान न देते हुए टिंकू से पूछा, ‘‘तुम कब आए, टिंकू?’’

‘‘अभीअभी, अंकल. आप बात को टाल रहे हैं. खैर, आंटी से ही पूछ लेता हूं. आंटी, अंकल ने आप को क्या तोहफा दिया? कुछ नहीं न?’’ टिंकू को जैसे अपनी आंटी को उकसाने में मजा आ रहा था.

‘‘हुंह, ये क्या देंगे मुझे तोहफा, कंजूस मक्खीचूस. जेब से पैसे निकालने में नानी मरती है,’’ उस ने मुंह बिचकाया.

‘‘जानेमन, मैं तुम्हें क्या तोहफा दूंगा. हम तो जनमों के साथी हैं जिन्हें ऐसी औपचारिकताओं की जरूरत नहीं पड़ती.’’

‘‘रहने दो, ज्यादा मत बनो. अगले जनम में भी इसी कंजूस पति को झेलना पडे़गा. इस से तो मैं कुंआरी भली,’’ मेरी पत्नी बोल पड़ी. बच्चों के सामने कबाड़ा हो गया न.

‘‘सुनो भी यार, मेरा सबकुछ तुम्हारा ही तो है. अपनी सारी तनख्वाह महीने की पहली तारीख को तुम्हें ला कर दे देता हूं और घर तो तुम्हीं चलाती हो. मेरे पास दोस्तों को चाय पिलाने के भी पैसे नहीं बचते. मैं तुम्हें कोई ऐसावैसा तोहफा नहीं दे सकता न? जिस दिन मैं इतना अमीर हो जाऊं कि दुनिया का सब से खूबसूरत और अनमोल तोहफा तुम्हें दे सकूं, उसी दिन मैं तुम्हें तोहफा दूंगा.’’

मैं ने अपने बचाव में पासा फेंका तो वह सही निशाने पर जा कर लगा. श्रीमतीजी के चेहरे पर गुस्से का स्थान शरम ने ले लिया. छूटते ही मैं ने एक और तीर छोड़ा, ‘‘दूसरी बात यह है डार्लिंग, विदेशों में लड़की और लड़के के बीच की केमिस्ट्री कब अपना इक्वेलिब्रियम खो दे कुछ ठिकाना नहीं रहता. इस साल पत्नी की सीट पर कोई है पर अगले साल कौन होगा कुछ पता नहीं. इसलिए उन्होंने एक भी साल का पड़ाव पार कर लिया तो अपने को बहुत भाग्यशाली मानते हैं. और इतना भी झेलने के लिए एक दूसरे को गिफ्ट देते हैं,’’ मेरे इतने लंबे भाषण का उस पर कुछ तो असर होना चाहिए.

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