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क्रिकेटर घूमें मंदिरमंदिर, क्यों है यह कोरा अंधविश्वास

21 से 24 दिसंबर, 2023 को मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में भारत और आस्ट्रेलिया की महिला क्रिकेट टीम के बीच टैस्ट मैच हुआ था, जिसे भारत ने बहुत बड़े अंतर से जीत कर कमाल कर दिया था. महिला टैस्ट क्रिकेट के इतिहास में पहली बार भारत ने आस्ट्रेलिया को हराया था. इस से पहले दोनों देशों के बीच 10 टैस्ट मैच खेले गए थे, जिन में से आस्ट्रेलिया को 4 मुकाबलों में जीत मिली थी, जबकि 6 मैच बेनतीजा रहे थे.

पर असली खबर तो यह है कि इस जीत को भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान और हैड कोच ने धार्मिक जामा पहना दिया. कप्तान हरमनप्रीत कौर ने 26 दिसंबर, 2023 को मुंबई के सिद्धि विनायक मंदिर में जा कर पूजाअर्चना की थी. उन के साथ टीम के हैड कोच अमोल मजूमदार भी मौजूद थे.

इतना ही नहीं, कभी भारतीय क्रिकेट टीम में सलामी बल्लेबाज रहे और अब भारतीय जनता पार्टी के सांसद गौतम गंभीर भी इसी साल के फरवरी महीने में उज्जैन के महाकाल मंदिर में दर्शन करने गए थे. उन्होंने वहां सुबह की भस्म आरती में भी हिस्सा लिया था.

हालिया भारतीय क्रिकेट टीम की रीढ़ की हड्डी कहे जाने वाले विराट कोहली कुछ समय पहले बिलकुल भी बल्लेबाजी नहीं कर पा रहे थे. उन की कप्तानी भी चली गई थी और सोशल मीडिया पर उन की खराब बल्लेबाजी की खूब खिंचाई भी हो रही थी. इस के बाद वे खबरों में इस बात को ले कर चर्चित हुए कि ‘इस मंदिर में जाते ही खुले भाग्य’.

बता दें कि इसी साल की शुरुआत में विराट कोहली अपनी पत्नी अनुष्का शर्मा के साथ उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में दर्शन करने पहुंचे थे. इस दौरान उन दोनों ने तकरीबन डेढ़ घंटे तक मंदिर के नंदी हाल में बैठ कर भस्म आरती की थी और उस के बाद दोनों ने मंदिर के गर्भगृह में जा कर पंचामृत पूजन अभिषेक किया था.

यही नहीं, पिछले साल वे दोनों उत्तराखंड के नील करोली बाबा के आश्रम में भी पहुंचे थे और जनवरी महीने में उन्हें वृंदावन में नीम करोली बाबा के समाधि स्थल पर भी देखा गया था. उन्हें वृंदावन के स्वामी प्रेमानंदजी महाराज के आश्रम में भी देखा गया था.

इस के बाद लोगों ने विराट कोहली की अच्छी बल्लेबाजी को बाबा और मंदिर जाने का कारनामा बता दिया. एक फैन ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘कोहली किस बाबा से मिला था, एड्रैस बताओ. एकदो ख्वाहिश पूरी करवानी हैं.’

इसी तरह सचिन तेंदुलकर के पूरे परिवार को सत्य साईंबाबा का परम भक्त कहा जाता है. जब बाबा का निधन हुआ था, तब सचिन हैदराबाद में थे. यह खबर मिलते ही उन्होंने खुद को होटल के कमरे में बंद कर लिया था. कहते हैं कि क्रिकेटर सुनील गावस्कर ने सचिन की मुलाकात सत्य साईंबाबा से कराई थी.

सोशल मीडिया पर मंदिरों का प्रचार

जब कोई नामचीन क्रिकेटर या कोई दूसरा सैलिब्रिटी किसी मंदिर में जा कर माथा टेकता है और उस की खबर मीडिया में आती है, तो सोशल मीडिया उसे हाथोंहाथ लेता है. विराट कोहली जैसे नामचीन लोगों के किसी मंदिर, बाबा आदि के बारे में सोशल मीडिया पर किए गए कमैंट, फोटो और वीडियो आम लोगों के दिमाग पर गहरा असर करते हैं. वे मन में बिठा लेते हैं कि अगर बड़े लोगों के बिगड़े काम ऐसे बन रहे हैं, तो हमें भी वहीं जाना चाहिए.

अभी हाल ही में उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर, नीम करौली बाबा, वृंदावन के स्वामी प्रेमानंद के आश्रम और मुंबई के सिद्धि विनायक मंदिर सोशल मीडिया पर बहुत ज्यादा ट्रैंड कर रहे हैं और इस अंधविश्वास को बढ़ावा दे रहे हैं कि जब कोई राह न सूझे तो किसी के दरबार में जा कर माथा टेक दो.

जो लोग क्रिकेटरों को अपने ‘भगवान’ का दर्जा देते हैं, वे तो आंख मूंद कर उन की हर चीज को फौलो करते हैं. तभी तो आज हर छोटेबड़े मंदिर, आश्रम में लोगों की भीड़ देखी जा सकती है. नतीजतन, लोग किसी से कर्ज ले कर भी ऐसी जगह जाते हैं, ताकि उन की मुसीबतें दूर हो जाएं, पर कर्ज लेने के बाद तो उन की मुश्किलें और ज्यादा बढ़ जाती हैं, यह उन्हें समझ में नहीं आता है.

घोर अंधविश्वासी क्रिकेटर

वैसे तो किसी न किसी तरह का अंधविश्वास हर देश के क्रिकेटर में देखा जा सकता है, पर कुछ क्रिकेटर अपनी पोंगापंथी हरकतों से चर्चा में बने रहते हैं. ‘क्रिकेट के भगवान’ के नाम से मशहूर महान भारतीय बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर बल्लेबाजी करने के लिए मैदान में उतरने से पहले हमेशा बायां पैड पहनते थे, जबकि राहुल द्रविड़ जब बल्लेबाजी करने के लिए तैयार होते थे, तो हमेशा पहले दायां पैड पहनते थे.

एक जमाने के दिग्गज क्रिकेटर मोहिंदर अमरनाथ फील्डिंग करते समय अपनी पैंट की जेब में लाल रूमाल रखते थे. भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान रहे मोहम्मद अजहरुद्दीन के गले में काला तावीज बंधा रहता था. फील्डिंग के दौरान कई बार उन्हें उस तावीज को चूमते हुए भी देखा जा सकता था.

एक बार ‘द कपिल शर्मा शो’ में आए वीरेंद्र सहवाग और मोहम्मद कैफ ने खुलासा किया था कि उन के कप्तान सौरव गांगुली बहुत ज्यादा अंधविश्वासी थे. मोहम्मद कैफ ने बताया कि एक बार तो सौरव गांगुली मैच में अपने गले में पहनी माला को पकड़े बैठे रहे थे और प्रार्थना करते रहे थे.

इसी तरह वीरेंद्र सहवाग ने कहा था कि दादा (सौरव गांगुली) के गले में जो चेन है, उस में दुनिया के जितने भगवान हैं उन की फोटो मिलेंगी आप को. दुनिया के जितने पत्थर होते हैं नीलम, मोंगा सब उन के पास हैं.

कहने का मतलब है कि जितने क्रिकेटर, उन के उतने ही अंधविश्वास. हैरत तो तब होती है जब ये लोग अपने हुनर के आगे अपने अंधविश्वास को तरजीह देते हैं और आम लोगों के मन में भर देते हैं कि अगर आप का भाग्य खराब है तो खेल खराब होना तय है, जबकि खेल में हारजीत होना कोई नई बात नहीं है. कोई जीतता है, तो कोई हारता है.

अगर किस्मत और गंडेतावीज, बाबाआश्रम, मठमंदिर और पूजाअर्चना आदि इतने ही ताकतवर होते तो पिछले वनडे वर्ल्ड कप में लगातार 10 मैच जीतने वाली भारतीय क्रिकेट टीम देशभर में हो रहे हवनपूजन के बावजूद फाइनल मुकाबले में न हारती. लिहाजा, अपने हुनर और मेहनत पर यकीन करें और इन फुजूल के चक्करों में न पड़ें.

न्याय यात्रा पर निकलेंगे राहुल गांधी, भारतीय जनता पार्टी में हड़कंप क्यों ?

राहुल गांधी ने 7 सितंबर, 2022 को कन्याकुमारी से भारत जोड़ो यात्रा शुरू की थी, जो 30 जनवरी, 2023 को श्रीनगर में खत्म हुई. 2024 में जब भारतीय जनता पार्टी लोकसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में वोट मांगने के लिए रैलियां निकाल रही होगी तब राहुल गांधी अपनी न्याय यात्रा पर होंगे. 14 जनवरी, 2024 को मणिपुर से चल कर यह यात्रा 20 मार्च के करीब मुंबई में खत्म होगी.

‘भारत न्याय यात्रा असम, पश्चिम बंगाल, बिहार, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और गुजरात समेत 14 राज्यों से हो कर 6,200 किलोमीटर की दूरी तय करेगी. 67 दिनों की इस यात्रा की ज्यादातर दूरी बस से तय की जाएगी. वहीं कुछ जगहों पर पदयात्रा भी की जाएगी. ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के बाद राहुल गांधी की ‘भारत न्याय यात्रा’ से भाजपा बेचैन हो रही है.

यात्रा के मुद्दों से घबराई भाजपा

मणिपुर से यात्रा को शुरू करने का मकसद वहां हिंसा के शिकार लोगों की आवाज को उठाना, उन को न्याय दिलाना है. यह एक राष्ट्रीय बहस का मुद्दा है. लोकसभा चुनाव में इस को उठाने से भाजपा की दिक्कत बढ़ सकती है. मणिपुर को ले कर जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणियां कीं, वे सभी को पता हैं. इस के बाद भी पीएमओ ने मणिपुर को संज्ञान में नहीं लिया. राहुल गांधी इस यात्रा के जरिए यह बताना चाहते हैं कि मोदी सरकार भले ही विपक्षी सांसदों को लोकसभा और राज्यसभा में अपनी आवाज न उठाने दे, सडक वे वह अपनी बात कह ही सकते हैं.

राहुल इस न्याय यात्रा में लोकसभा से सदस्यों के निलंबन, संवैधानिक संस्थाओं के अधिकारों पर कटौती, बेरोजगारी और महंगाई जैसे उन मुददों पर बात करेंगे जिन के जवाब भाजपा के पास नहीं होंगे. ये मुद्दे भाजपा के गले की फांस बन सकते हैं. भारत जोडो यात्रा का प्रभाव दक्षिण के राज्यों पर पड़ा था. उस के बाद कर्नाटक और तेलगांना में कांग्रेस को जीत हासिल हुई. भाजपा इस यात्रा को ले कर कोई बड़ा विरोध नहीं कर पा रही है. उस की सोशल मीडिया टीम और पीएमओ को कोई मुद्दा नहीं मिल रहा है.

यह नए किस्म की राजनीति है

भारतीय राजनीति में अब यात्राओं का दौर खत्म हो चला है. ऐसे में राहुल गांधी इस को फिर से शुरू कर रहे हैं. इन लंबी यात्राओं से विभिन्न क्षेत्रों, वहां के लोगों और रीतिरिवाजों को जानने का मौका मिलता है. राजनीति में इन यात्राओं का बहुत महत्त्व होता है. इस के जरिए लोगों से जुड़ी समस्याओं का अच्छी तरह से समझने का मौका मिलता है. राहुल गांधी ने अपनी यात्राओं से यह बता दिया है कि जब पार्टी सरकार में न हो तब भी विपक्ष में रह कर लोगों की समस्याओं को समझा जा सकता है और उन को संसद या विधानसभाओं में उठा सकते हैं.

राहुल गांधी की न्याय यात्रा 2024 के लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए देश के उत्तरपूर्वी और पश्चिमी हिस्सों को जोड़ने के लिए शुरू की गई है. इस को पिछले साल उत्तर दक्षिण भारत जोड़ो यात्रा पार्ट-2 के रूप में देखा जा रहा है. राहुल गांधी ने अपनी भारत जोड़ो यात्रा के दौरान अलगअलग क्षेत्रों और लोगों को समझा. उन की परेशानियां सुनीं. छोटेछोटे तबके के लोगों से मिले.

राहुल जिस तरह से मोदी सरकार से लड़ रहे हैं वह विपक्ष के लिए एक उदाहरण जैसा है. वे हार न मानने वाले नेताओं में से है. जब राहुल गांधी ने अपनी भारत जोड़ो यात्रा निकाली तो कांग्रेस गुजरात चुनाव हार गई लेकिन हिमांचल और कर्नाटक जीत गई. इस हार का राहुल गांधी के मनोबल पर प्रभाव नहीं पड़. इस से पहले भी हार का प्रभाव राहुल गांधी पर नहीं पड़ा था.

2023 में कांग्रेस राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में चुनाव हारी लेकिन तेलंगाना में कांग्रेस की सरकार बन गई. राजनीतिक जानकार यह मान कर चल रहे थे कि अब कांग्रेस खत्म हो गई. लोकसभा चुनाव में वह भाजपा को चुनौती नही दे पाएगी. कांग्रेस ने खुद को वापस मुख्यधारा में लाने के लिए मणिपुर से मुंबई तक की न्याय यात्रा निकालने की घोषणा कर दी. सब से बड़ी बात यह कि इस यात्रा के बारे में पहले से किसी को पता नहीं था. इस के बाद भी राहुल गांधी की टीम ने पूरी रिसर्च के बाद इस को प्लान कर लिया.

खामोशी से बना यात्रा का प्लान

2024 के लोकसभा चुनाव होने वाले हैं. मार्च से मई के बीच इन चुनावों की संभावना है. राहुल गांधी ने चुनाव का मोह नहीं किया. यह अपनेआप में अलग तरह की राजनीति है. जहां इंडिया गठबंधन के घटक दल एकएक सीट पर अपने हिस्से को ले कर माथपच्ची कर रहे हैं वहां राहुल गांधी सीटों के मायामोह को त्याग कर न्याय यात्रा निकाल रहे हैं. महात्मा गांधी और जय प्रकाश नारायण के बाद राहुल गांधी ऐसे नेता हैं जो प्रधानमंत्री की कुरसी और सत्ता की लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं.

राहुल गांधी की ‘भारत न्याय यात्रा’ का प्लान कुछ इस तरह से तैयार किया गया है कि कम समय में ज्यादा लोगों तक पहुंचा जा सके. यात्रा के जरिए 14 राज्यों और 85 जिलों को कवर किया गया है. यह यात्रा मणिपुर, नगालैंड, असम, मेघालय, पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र शामिल हैं. बस के साथ ही पैदल यात्रा भी की जाएगी. इस यात्रा का मकसद पार्टी के विचार ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना है.

बढ़ेगा कार्यकर्ताओं का मनोबल

चुनावी जीतहार के मोह से बाहर निकल राहुल गांधी का यह संघर्ष अब रंग दिखाने लगा है. इस ने जनता में राहुल गांधी के प्रति अलग भाव को जगा दिया है. यह जनता के न्याय की बात कर रहा है. न्याय यात्रा में राहुल गांधी वोट नहीं मांगने जा रहे. राहुल गांधी की इस यात्रा से पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह आएगा.

राहुल गांधी अपनी पार्टी मीटिंग में कार्यकर्ताओं को साफ संदेश दे रहे हैं कि उन की लड़ाई प्रधानमंत्री की कुरसी की नहीं है. वे आरएसएस की विचारधारा के खिलाफ लड़ रहे हैं. यह लड़ाई लंबी है. हमारे पास समय है. हम इस लड़ाई को जीतेंगे. ऐसे में जितना भी संघर्ष हो, हम तैयार हैं.

भाजपा के लिए सब से चिंता का विषय यही है कि राहुल गांधी का मनोबल टूट नहीं रहा. हर हार के बाद किसी योद्धा की तरह वे वापस युद्ध के लिए तैयार हो जा रहे हैं. भारत न्याय यात्रा का समय और रूट जिस तरह से तैयार हुआ है वह भाजपा के लिए चिंता का विषय है.

पाकिस्तान में पहली बार एक हिंदू महिला लड़ेगी आम चुनाव, क्या जीतेगी भी ?

खबर आश्चर्यचकित करने वाली है. पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में पहली बार किसी हिंदू महिला ने आम चुनाव के लिए अपना नौमिनेशन फाइल किया है. डाक्टर सवीरा प्रकाश पाकिस्तान के खैबर पख्तूनवा के बुनेर जिले से चुनाव लड़ने जा रही हैं. उन्हें पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी यानी पीपीपी की तरफ से टिकट औफर हुआ है.

सवीरा ने पीके-25 सीट से अपना नामांकन दाखिल कर दिया है. यह अल्पसंख्यक समुदाय के लिए आरक्षित सीट है. सवीरा के पिता ओमप्रकाश पेशे से डाक्टर थे, जो हाल ही में सेवानिवृत्त हुए हैं. वे पिछले 3 दशकों से पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के सक्रिय सदस्य हैं और डाक्टर सवीरा स्व यं बुनेर की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की महिला शाखा की महासचिव रह चुकी हैं.

गौरतलब है कि पाकिस्तान में आम चुनाव अगले साल 8 फरवरी को होने हैं. पाकिस्तान की प्रमुख पार्टियों ने अभी से अपनेअपने प्रत्याशियों को टिकट दे दिए हैं. प्रमुख पार्टियों की बात की जाए तो फिलहाल 3 ही पार्टियां ऐसी हैं जो सत्ता के करीब आती हुई नजर आती हैं. जिनमें पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ (पीटीआई), पाकिस्तान मुसलिम लीग (नवाज़) यानी पीएमएल-एन और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी यानी (पीपीपी).

पाकिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यकों में आते हैं. ईसाई और सिख कम्युनिटी भी अल्पसंख्यक समुदाय में हैं. पाकिस्तान के संविधान में अल्पसंख्यकों के लिए अलग से नियमकानून बनाए गए हैं. राजनीति के कानून में अल्पसंख्यकों के लिए अलग से प्रावधान रखा गया है. संविधान के अनुच्छेद 51 (2ए) द्वारा पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में गैरमुसलिम लोगों के लिए 10 सीटें रिजर्व हैं, तो वहीं अनुच्छेद 106 के अनुसार 4 प्रांतीय विधानसभा में नौन मुसलिम लोगों के लिए 23 सीटें रिजर्व हैं. पाकिस्तान की सीनेट में भी गैरमुसलिम लोगों के लिए 4 सीटें रिजर्व हैं.

उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान के इतिहास में अब तक किसी भी चुनी हुई सरकार ने अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया है. साल 2024 में होने वाले आम चुनावों के लिए पाकिस्तान में तैयारी शुरू हो चुकी है. यहां पहली बार कोई हिंदू महिला चुनाव लड़ने जा रही है.

आरक्षण और अधिकार मिले होने के बावजूद अल्पसंख्यक उन जगहों पर नजर नहीं आते जहां बैठ कर वे अपनी कम्युनिटी के लिए कुछ अच्छे काम कर सकते हैं. दरअसल, अल्पसंख्यक समुदाय की बात करें तो पाकिस्तान में उन की स्थिति कमोबेश वैसी ही है जैसी भारत में है. वहां उसी तरह धर्म के आधार पर भेदभाव बरतते हुए हिंदुओं को प्रताड़ित किया जाता है जैसे भारत में मुसलमानों को किया जाता है.

उन के धार्मिक स्थलों पर हमले होते हैं. उन की आस्था पर चोट पहुंचाई जाती है. उन को शिक्षा से दूर रखा जाता है. उन को अच्छी नौकरियां नहीं मिलतीं. उन को सेना या सत्ता में उच्च पदों पर नियुक्ति नहीं मिलती. वहां भी अल्पसंख्यक अपनी आवाज नहीं उठा पाता है, अपने अधिकारों की बात नहीं कर पाता है. हालांकि, अल्पसंख्यकों को आबादी के आधार पर सुविधाएं और आरक्षण मौजूद हैं. संसद में भी उन के लिए आरक्षित सीटें हैं और सरकारी नौकरियों में भी आरक्षण मिला हुआ है.

दूसरी वजह यह कि पाकिस्तान में अनुसूचित जाति के हिंदुओं की आबादी सवर्ण हिंदुओं के मुकाबले अधिक है. सवर्ण जाति के हिंदू सवर्ण जाति के मुसलमानों से ज़्यादा गलबहियां करते हैं बजाय अपने निम्न जाति के हिंदुओं के. निम्न जाति के हिंदू न तो अधिक शिक्षित हैं और न ही आर्थिक रूप से समृद्ध जबकि सवर्ण हिंदू सरकार में भी शामिल हैं और नौकरियों में आरक्षण का लाभ भी ले रहे हैं.

दूसरी ओर अनुसूचित जाति के लोगों के पास न तो नौकरी है, न शिक्षा और न ही दूसरे संसाधनों तक पहुंच है. वे उसी तरह के छोटेछोटे कामधंधों में अपनी दो जून की रोटी की जुगाड़ में दिनरात लगे हैं जैसे भारत में मुसलिम कम्युनिटी के लोग. गौरतलब है कि पाकिस्तान में ग़ैरमुसलिम अल्पसंख्यकों को सरकारी नौकरियों में 5 प्रतिशत आरक्षण हासिल है, जबकि पाकिस्तान की संसद में 10 सीटें आरक्षित हैं.

संसद के ऊपरी सदन में 4 सीटें आरक्षित हैं और पाकिस्तान के प्रांतों की विधानसभाओं में कुल मिला कर 23 सीटें आरक्षित हैं. बावजूद इस के, अल्पसंख्यकों की आवाज वहां नक्कारखाने में तूती की आवाज सरीखी ही है.

1947-48 में बंटवारे के वक्त अनुसूचित जाति के हिंदू अधिक संख्या में पाकिस्तान गए क्योंकि भारत के सवर्ण हिंदुओं ने उन्हें हमेशा दुत्कारा और अपमानित किया. उन के साथ अमानवीय व्यवहार किया. बहुसंख्यक होने के बाद भी अतीत में उन पर ब्राह्मण और ठाकुरों का शासन रहा और उन को अछूत माना गया. वे यह सोच कर पाकिस्तान गए कि मुसलिम उन की पीड़ा समझेंगे और उन का सहारा बनेंगे क्योंकि वे भी उन की तरह उपेक्षित और प्रताड़ित रहे हैं. मगर उन की सोच गलत साबित हुई क्योंकि मुसलमानों में भी खुद को सवर्ण समझने वालों ने न तो भारत से आए अनुसूचित जाति के हिंदुओं को अपने बगल में बैठने की इजाजत दी और न उन गरीब व नीची जाति के मुसलमानों को जो पाकिस्तान को अपना वतन समझ कर वहां गए थे. उन्हें तो आज भी पाकिस्तान में मुहाजिर कह कर अपमानित किया जाता है.

सवर्ण चाहे हिंदू हो या मुसलमान, नीची जातियों पर हमेशा हावी रहा, उन को प्रताड़ित करता रहा और उन के हकों को मारता रहा, फिर देश चाहे भारत हो या पकिस्तान. 2017 में पाकिस्तान में हुई जनगणना में हिंदू आबादी 45 लाख के करीब पाई गई. कुछ लोगों का मानना है कि पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी कोई 80 लाख है पर अधिकांश का आज तक पंजीकरण नहीं हुआ है.

ऐसे में अगर सरकारी आंकड़े को ही मानें तो इस में करीब 85 फ़ीसदी पिछड़े और अनुसूचित जाति के हिंदू हैं. अब जब पाकिस्तान की राजनितिक पार्टियां हिंदुओं को टिकट देने का बड़ा दिल दिखा रही हैं तो अब सवर्णों और अनुसूचित जाति के हिंदुओं को एकसाथ लाने के प्रयास शुरू हो गए हैं.

पाकिस्तान हिंदू काउंसिल के चेयरमैन रमेश वांकवानी अल्पसंख्यक समुदाय की एकजुटता की वकालत करते हुए कहते हैं- अनुसूचित जाति के हिंदुओं की आबादी दूसरे समुदायों की तुलना में ज़्यादा है. ऐसे में सवर्ण हिंदुओं का मानना है कि सामूहिक आवाज कहीं ज्यादा दमदार और मजबूत होगी. इन दोनों को अलग अलग वर्गों में रखना पाकिस्तान के हिंदुओं के लिए फायदेमंद नहीं है.

राजनीतिक फायदे के लिए सवर्णों द्वारा नीची जातियों को जोड़ने की ऐसी कवायद भारत में भी जारी है. यहां भी अगले साल आम चुनाव होने हैं. नीची जातियां संख्याबल में अधिक होते हुए भी सदियों से सवर्णों के हाथों की कठपुतली बनी रहीं. वे जब तक गुलामी की मानसिकता से उबर कर अपनी ताकत नहीं पहचानेंगी तब तक उन का उद्धार नहीं होगा.

पाकिस्तान हिंदू को सत्ता में शामिल कर ले या भारत मुसलमान को सत्ता में बिठा दे, अल्पसंख्यक समुदाय का भला तब तक नहीं होगा जब तक वह गुलामी की मानसिकता से निकल कर निडर नहीं होता. पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी द्वारा सवीरा प्रकाश को टिकट देने के पीछे अल्पसंख्यकों के लिए सत्ता का रास्ता खोलने से ज्यादा सवीरा प्रकाश के जरिए अल्पसंख्यकों को अपने पाले में खींच कर सत्ता हासिल करने की जो चाह है उसे अल्पसंख्यकों को समझना चाहिए.

पश्चिम बंगाल में राम और वाम का घमासान, किस का हैै यह काम

हमारी नीति धार्मिक मान्यताओं और प्रत्येक व्यक्ति के अपनी आस्था को आगे बढ़ाने के अधिकार का सम्मान करना है. धर्म एक व्यक्तिगत पसंद का मामला है जिसे राजनीतिक लाभ के साधन में परिवर्तित नहीं किया जाना चाहिए. निमंत्रन मिलने के बाबजूद कामरेड सीताराम येचुरी समारोह में शामिल नहीं होंगे.

यह जबाब मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का है जो उन्होंने अपने नेता सीताराम येचुरी को राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह का न्यौता मिलने के बाद सोशल मीडिया पर एक खास मकसद से दिया. आगे इस जवाब में कहा गया कि यह सब से दुर्भाग्यपूर्ण है कि भाजपा और आरएसएस ने एक धार्मिक समारोह को राज्य प्रायोजित कार्यक्रम में बदल दिया है, जिस में सीधे प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और अन्य अधिकारी शामिल हो रहे हैं.

भारत में शासन का एक बुनियादी सिद्धांत है संविधान के तहत भारत में शासन का कोई धार्मिक जुड़ाव नहीं होना चाहिए. सत्तारूढ़ पार्टी इस का उल्लंघन कर रही है.

सीताराम येचुरी ने मीडिया से बात करते हुए कहा नृपेन्द्र मिश्रा विश्व हिंदू परिषद के एक नेता के साथ मरे पास आमंत्रण ले कर आए थे जिसे मैं ने ले लिया. मैं ने उन्हें चाय काफी औफर की लेकिन उन्होंने मना कर दिया.

नहीं चाटी अफीम

इन दिनों राम मंदिर ट्रस्ट के छोटेबड़े तमाम पदाधिकारी 22 जनबरी के भव्य और खर्चीले आयोजन को ले कर शहरशहर घूम कर आमंत्रण बांटते फिर रहे हैं और अपने विरोधियों को जानबूझ कर बुला रहे हैं जिस से उन के आने और न आने को भी चुनावी मुद्दा बनाया जा सके.
वामपंथियों के घर जाने का मकसद भी यही था. सभी को मालूम है कि माकपा धर्म से दूरी बना कर चलती है. उस के पितृ पुरुष कार्ल मार्क्स ने बहुत पहले ही धर्म को अफीम का नशा करार दे कर दुनियाभर में हाहाकार मचाते धर्म की पोल खोल दी थी.

वामपंथी किसी भी कीमत पर नहीं आएंगे यह बात नृपेन्द्र मिश्रा सहित सभी दक्षिणपंथियों को बेहतर मालूम है. इस के बाद भी वे अफीम ले कर नशा मुक्ति आंदोलन के पैरोकारों के पास ही गए तो मकसद सिर्फ उन्हें चिढ़ाना भर नहीं था बल्कि एक चुनावी मुद्दे का पौधा रोपना भी था जिस के मई आतेआते बहुत बड़ा वृक्ष बन जाने की उम्मीद भगवा गैंग को है क्योंकि उन के पास वोटर को लुभाने कुछ और खास है नहीं जिस के दम पर वोट बटोरे जा सकें.

माकपा और येचुरी ने निहायत ही सज्जनता से आमंत्रण ठुकरा कर जता दिया है कि वे इस झमेले और झांसे में नहीं आने वाले. उन्होंने ऐसी कोई बात नहीं कही जिस से धर्म का अपमान होता लगे या फिर किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचे. इस के बाद भी भगवा खेमा तिलमिलाया हुआ है.

भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने तल्ख़ लहजे में कहा जिन्हें राम बुलाएंगे वही आएंगे. विहिप के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल भी पीछे नहीं रहे उन्होने कहा जिस का नाम सीताराम है वही नहीं आएंगे.

चित भी मेरी पट भी मेरी

हिंदूवादियों का मकसद वामपंथियों को घेरने का साफसाफ दिख रहा है. वे अगर अयोध्या जाते तो कहा जाता देखो आखिर आ ही गए धर्म की शरण में या फिर उन के आने को राजनीति और ड्रामा करार दिया जाता. आने से मना कर दिया तो अभी से ताने कसना शुरू कर ही दिया है कि देखो इन वामपंथियों और कम्युनिस्ट नास्तिकों को, इन का तो भगवान ही मालिक है.

अकेले सीताराम येचुरी ही नहीं बल्कि भगवा गैंग की मंशा सभी उन विरोधियों को धर्म संकट में डालने की है जो धर्म की राजनीति से अपनी पार्टी के सिद्धांतों के मुताबिक दुरी या नजदीकी बना कर चलते हैं.

सोनिया गांधी और मल्लिकार्जुन खडगे को तो आमंत्रण पहले ही दिया जा चुका है अब बारी नितीश कुमार, लालू यादव, अखिलेश यादव, मायावती, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, हेमंत सोरेन और अरविंद केजरीवाल जैसों की है जिन का रुख देखना दिलचस्प होगा. इतना जरुर है कि ये और इन जैसे सीताराम येचुरी जैसी साफगोई नहीं दिखा पाएंगे. शिवसेना की तरफ से संजय राउत तो पहले ही कह चुके हैं कि हम तो राम मंदिर में पहले से ही हैं.

जिस हिसाब और जोरशोर से राममंदिर के उद्घाटन की तैयारियां चल रही हैं वे किसी अश्वमेघ यज्ञ से कमतर नहीं हैं. विपक्ष से जो आएगा उसे भी बख्शा नहीं जाएगा और जो नहीं आएगा उसे राम और धर्म विरोधी कहते उस की इमेज खराब करने में कोई कसर भगवा गैंग नहीं छोड़ेगा.

सवाल आखिर सत्ता का जो है. किसी ने माकपा के शब्दों के संतुलन पर गौर नहीं किया कि धर्म और राजनीति 2 अलगअलग चीजें हैं और धर्म का इस्तेमाल सत्ता हासिल करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए. अब यह और बात है जो वामपंथियों को भी मालूम है कि भाजपा का तो जन्म ही धर्म की राजनीति से हुआ है इस के बगैर उस का कोई वजूद ही नहीं.

निगाहें बंगाल पर

जिस वक्त नृपेन्द्र मिश्रा सीताराम येचुरी की न सुन रहे थे, उसी वक्त में गृहमंत्री अमित शाह कोलकाता में बंगाल फतह करने का प्लान बना रहे थे. इस बार लोकसभा की 42 में से 35 सीटें जीतने का लक्ष्य ले कर चल रहे अमित शाह का खास जोर सीएए पर रहा जो वहां का संवेदनशील मुद्दा है.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर देश की सुरक्षा को खतरे में डालने का आरोप लगाने वाले शाह इस बार पश्चिम बंगाल मे खुल कर हिंदुत्व का कार्ड खेलने के इरादे में लग रहे हैं. अपने कार्यकर्ताओं को टिप्स देते उन्होंने घुसपैठ, गौ तस्करी और तुष्टिकरण को हवा देने का इशारा किया.
असल में भाजपा बंगाल में अपने गिरते ग्राफ को ले कर खासतौर से चिंतित है क्योंकि अब मुकाबला अकेली टीएमसी से नहीं बल्कि इंडिया गठबंधन से है. पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को 42 में से 18 सीटें 40 फीसदी वोटों के साथ मिली थीं. लेकिन इसी साल हुए पंचायत चुनावों में उस का वोट शेयर घट कर 22.9 फीसदी रह गया था. जबकि टीएमसी को 51 फीसदी वोट मिले थे और हर 10 में से 9 सीट पर उस का कब्जा था. माकपा और कांग्रेस को भी 20 फीसदी वोट मिले थे.

2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 294 में 77 सीट 38.14 फीसदी वोटों के साथ मिली थीं जबकि टीएमसी 213 सीट 47.93 वोटों के साथ ले गई थी, यानी चुनाव दर चुनाव भाजपा का ग्राफ पश्चिम बंगाल में गिर रहा है. पंचायत चुनाव के बाद उस के कई नेता टीएमसी में जा चुके हैं जिस से उस का संगठन छिन्नभिन्न हो चुका है.

मंदिर हल नहीं

हर बार भाजपा धर्म भगवान और मंदिर की बात पश्चिम बंगाल में करती रही है और हर बार मुंह की खा रही है तो लगता नहीं कि 2024 के लोकसभा चुनाव में उसे खास कुछ मिलेगा. कम से कम धर्म की राजनीति से तो वह वहां ममता का तिलिस्म नहीं तोड़ सकती. सीताराम येचुरी ने राम मंदिर के उद्घाटन का आमंत्रण ठुकरा कर संदेश यही दिया है कि इस से लोगों की समस्याएं हल नहीं होने बालीं और राम उत्तर भारत की तरह पूर्वोत्तर में नहीं चलने बाले कमोवेश यही हाल दक्षिण भारत का भी है. अब देखना दिलचस्प होगा कि सभी दलों की आगामी नीतियां क्या होंगी.

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जान लें सोने में खोट, वरना पड़ेगी भारी चोट

सोने के गहने खरीदने और इस्तेमाल करने वाले सभी जानते हैं कि वे शुद्ध सोने के नहीं हैं क्योंकि बिना किसी दूसरी धातु को मिलाए बगैर सोने को गहनों में नहीं ढाला जा सकता, उस में खोट मिलाना जरूरी होता है. खोट का शाब्दिक अर्थ दोष या निकृष्टता होता है लेकिन सोने की खोट के माने होते हैं इस में अन्य धातुओं की मिलावट जिस की मात्रा सोने की शुद्धता और कीमत पर असर डालती है.

सोने की शुद्धता को कैरेट में नापा जाता है. शुद्ध सोना 24 कैरेट का होता है जिस के गहने नहीं बनाए जा सकते क्योंकि सोना बहुत ही मुलायम धातु होता है इस के बिस्कुट, छड़ें, सिक्के और ईंट मिलती हैं. सोने को सख्त बनाने के लिए दूसरी धातुओं की मिलावट करने पर ही इसे मनचाहे आकार में ढाला जा सकता है. आइए समझें इस खोट और सोने की शुद्धता को जिस से खरीदते और इस्तेमाल करते वक्त मन में कोई शक न रहे.

1 कैरेट गोल्ड का मतलब होता है 1 / 24 फीसदी सोना

आमतौर पर सोने के गहने 22 कैरेट से बने होते हैं. अब अगर आप 22 कैरेट सोने के गहने खरीदते हैं तो उस में सोने की मात्रा इस तरह निकाली जाती है.

22/24*100-91.66 फीसदी सोना. और सरल शब्दों में सम?ों तो 22 कैरेट सोने में दरअसल 91.66 फीसदी सोना होता है. दूसरे शब्दों में कहें तो 8.34 फीसदी खोट होती है. इसी तरह 20,18 और 16 कैरेट में सोने और खोट की मात्रा निकाली जा सकती है.

1 कैरेट सोने की कीमत निकालें

इन दिनों 24 कैरेट सोने का दाम 60 हजार रुपए प्रति 10 ग्राम के लगभग है. बाजार से आप 22 कैरेट सोने के गहने खरीदते हैं तो उस का दाम होगा- 60000/24*22 = 55000. इसी तर्ज या फार्मूले से आप 20 और 18  कैरेट सोने की कीमत खुद निकाल सकते हैं. मसलन 20 कैरेट की निकालें तो 60,000/24

*20=50,000 होगी. इसी फार्मूले से 1 कैरेट सोने की कीमत 2500 रुपए होगी.

और सहूलियत के लिए ऐसे समझें

24 कैरेट सोना यानी शुद्धता 99.9 फीसदी. 23 कैरेट यानी शुद्धता 95.8, 22 कैरेट यानी शुद्धता 91.6, 21 कैरेट यानी शुद्धता 87.5, 18 कैरेट यानी शुद्धता 75.0 और 17 कैरेट यानी शुद्धता होगी 70.8 फीसदी.

यहां दिलचस्प बात यह है कि शहरी इलाकों में लोग 22 कैरेट सोने के गहने प्राथमिकता में रखते हैं तो गांवदेहातों के लोग 18 कैरेट के सोने के गहने प्राथमिकता में रखते हैं.

अब समझें खोट को

सोने को कठोर बनाने के लिए उस में तांबा, चांदी या कैडमियम धातुएं मिलाई जाती हैं. इन धातुओं के मिश्रण से सोना कठोर यानी गहने बनाने लायक हो जाता है.

खुद भाव निकालें : अब अगर आप ने 22 कैरेट का नैकलेस खरीदा है तो उस का भाव क्या होना चाहिए, इसे आप खुद निकाल सकते हैं. चूंकि एक कैरेट सोना 2,500 रुपए का है इसलिए 22 कैरेट का उस में गुणा कर दें जो रकम आएगी वह 55,000 रुपए होगी. अब इस पर मेकिंग चार्ज जो भी लगा हो तो वह कीमत में जुड़ जाएगा. अगर वह प्रति 10 ग्राम पर 500 रुपए है तो आइटम की कीमत 55,500 रुपए होगी.

खरीदने पर जीएसटी चार्ज जो भी लगेगा वह भी इसी कीमत में शामिल किया जाएगा. अगर जीएसटी 3 फीसदी है तो आइटम की कीमत में 1,066 रुपए 50 पैसे भी जुड़ेंगे. इस तरह 55,500+ 500+1066.50 रुपए = 57,116.50 रुपए उस आइटम का विक्रय मूल्य होगा.

कई निर्माता और विक्रेता

मेकिंग चार्ज में छूट देते हैं जिस से आइटम की कीमत थोड़ी कम हो जाती है.

इसी तरह 18 कैरेट के या उस से कम कैरेट के किसी भी गहने की कीमत निकाली जा सकती है.

हालमार्र्क से करें पहचान

सोने के जेवर खरीदते वक्त हर किसी के मन में उस की शुद्धता को ले कर स्वाभाविक संदेह होता है जिसे दूर करने का सब से बेहतर तरीका हालमार्क का निशान है जिसे भारतीय मानक ब्यूरो यानी बीआईएस जारी करता है. सभी गहनों पर हालमार्क अब अनिवार्य है. सोना किसी भी रूप में खरीदें, सब से पहले उस पर बीआईएस का लोगो जरूर देखना चाहिए.

इस के बाद उस की शुद्धता और फाइनैंस की जांच करनी चाहिए. इस के बाद 6 अंकों का एचयूआईडी यानी अल्फान्यूमेरिक कोड देखना चाहिए. उदाहरण के लिए अगर किसी गहने पर 916 लिखा है तो इस का मतलब है कि वह 22 कैरेट से बना है.

23 कैरेट सोने को बीआईएस 958 लिखा जाता है. बीआईएस का मतलब होता है कि गहने बार मानकों के मुताबिक तैयार किए गए हैं और किसी मान्यता प्राप्त लैब से सत्यापित हैं. बिना हालमार्क वाली ज्वैलरी कभी नहीं लेनी चाहिए. इस का बेचा जाना अब पूरे देश में कानूनी अपराध है.

खोट की चोट

भारतीय घरों में सोने के पुराने गहनों की भरमार है जिन की शुद्धता और कैरेट की कोई गारंटी नहीं. जब भी कोई पुराने गहने बेचने सुनार के पास या ज्वैलरी शोरूम में जाता है तो उस का भाव आज के भाव से कम मिलता है. वजह पूछने पर जवाब यही मिलता है कि हम खोट काट रहे हैं. कभीकभी तो यह 30 फीसदी तक होता है क्योंकि सोना पुराना और बिना हालमार्क का होता है.

अब बेचने वाले के पास कोई रास्ता नहीं रह जाता, सिवा इस के कि पैसों की जरूरत है या सोना एक्सचेंज करना है तो जो भाव मिल रहा है उसी में सौदा कर लिया जाए. इस स्थिति से बचने का एक अहम तरीका कैरेट मीटर से कैरेट की जांच कराने का है जो बड़े शोरूम में ही मिलता है. उन्हें निर्धारित शुल्क दे कर जांच करा लेनी चाहिए, जिस से ठगे जाने का अंदेशा न रहे.

कई बार ऐसा भी होता है कि लोग जिस दुकान या शोरूम से गहने खरीदते हैं, बेचने जाने पर वही खोट काटने की बात करने लगता है. ऐसा तब ज्यादा होता जब गहनों पर हालमार्क  न हो या फिर उस का बिल न लिया गया हो. इसलिए सोने की खरीदी का बिल जरूर लेना चाहिए और उसे संभाल कर भी रखना चाहिए. यह जरूरत पड़ने पर कई कानूनी झंझटों से भी आप को बचाता है.

24 कैरेट लें

अगर सोना निवेश के लिए खरीदा जा रहा है तो हमेशा 24 कैरेट का ही लेना चाहिए. बाजार में सोने के सिक्के, बिस्कुट व ईंट आसानी से मिल जाते हैं. इन्हें लगभग सभी बड़े बैंक और नामी कंपनियां बेचती हैं. इन पर भी चूंकि हालमार्क होता ही है इसलिए इन्हें जरूरत पड़ने पर कभी भी आज की कीमत में बेचा जा सकता है जिस में कोई खोट नहीं कटता.

बैंक से खरीदने पर विश्वसनीयता ज्यादा रहती है लेकिन दिक्कत यह है कि बैंक इन्हें ज्वैलर्स की तरह आप से वापस नहीं खरीदते. आमतौर पर ज्वैलर्स भी ऐसा ही करते हैं लेकिन कुछ कम दाम दे कर वे इन्हें खरीद भी सकते हैं, यही उन का मुनाफा होता है.

कंप्यूटर विजन सिंड्रोम होने के ये हैं 5 मुख्य कारण, जानें बचाव के उपाय

आज के हाईटैक जमाने में कंप्यूटर निजी, प्रोफैशनल व सोशल लाइफ का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है. कार्यक्षमता बढ़ाने वाला अनेक सुविधाओं से युक्त कंप्यूटर का आप की सेहत पर बुरा असर न पड़े, इस के लिए किन बातों का रखें ध्यान, बता रहे हैं डा. महिपाल सचदेव.

कंप्यूटर पर काम करते समय सिरदर्द, फोकस की कमी, आंखों में जलन, सूखापन या थकान, कमजोर या धुंधली दृष्टि, गले व कंधे में दर्द होना आम बात है. इस के अलावा और भी कई तरह की समस्याएं पैदा होती हैं. चिकित्सा विज्ञान में इसे कंप्यूटर विजन सिंड्रोम यानी सीवीएस कहा जाता है. बच्चे भी इस समस्या से अछूते नहीं हैं. कंप्यूटर स्क्रीन के सामने घंटों बैठे रहने की वजह से बच्चे की आंखों में तनाव पैदा होता है क्योंकि कंप्यूटर बच्चे की दृष्टि प्रक्रिया को फोकस करने के लिए मजबूर करता है जिस से किसी और काम के मुकाबले आंखों में अधिक तनाव होता है.

कारण

  1. नजर:

जिन लोगों को दूर या पास की चीजों को साफसाफ देखने में परेशानी होती है या फिर जो एस्टीगमैटिज्म से पीडि़त हैं उन्हें सीवीएस का खतरा बहुत अधिक रहता है. मल्टीफोकल लैंस इसे और कठिन बना देता है क्योंकि स्क्रीन ऊंची होती है और दूर या नजदीक के लिए बने हुए क्षेत्रों से और दूर होती है.

  1. रोशनी :

आसपास जलते लैंप तथा बिजली की वजह से भी आंखों में खिंचाव या तनाव हो सकता है.

  1. कंप्यूटर टेबल का डिजाइन :

अधिकांश स्थितियों में कंप्यूटर का मौनिटर बहुत ऊंचाई पर रखा रहता है. जबकि स्क्रीन का ऊपरी सिरा आंखों के समानांतर होना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि देखने का आदर्श कोण आंखों के नीचे 10 से ले कर 20 डिगरी तक होता है. अगर स्क्रीन बहुत ऊंचाई पर है तो आप को आंखें झपकाने का अपेक्षाकृत कम अवसर मिलता है जिस से उन में सूखापन या जलन पैदा हो जाती है. इस वजह से सिर में दर्द, गरदन में दर्द तथा पीठ के ऊपरी भाग में दर्द होता है क्योंकि देखने के लिए सिर को पीछे की तरफ झुकाना पड़ता है.

  1. शुष्क वातावरण एवं डिहाइड्रेशन :

बहुत सारे कार्यालयों में वायु का स्तर बहुत बुरा होता है. बहुत अधिक तल्लीनता के साथ कंप्यूटर पर काम करने की वजह से कई बार आप कुछ पीना भूल जाते हैं जोकि स्थिति को और बिगाड़ सकता है. या कभीकभी आप उठने की जरूरत महसूस नहीं करते. कार्यस्थल या घर के साथ जुड़ी इन 2 समस्याओं की वजह से आंखों की जलन एवं उन की शुष्कता और अधिक बढ़ जाती है.

  1. अनजानी सामग्रियों को पढ़ना :

अगर आप अनजानी सूचनाओं को समझने की कोशिश करते हैं और वह भी बहुत छोटी समयसीमा के अंदर तो ऐसी स्थिति में आप का मस्तिष्क तनावग्रस्त व उत्तेजित हो जाता है. और जब मानसिक तनाव या उत्तेजना पैदा हो तो उस का असर बांहों, कंधों, गरदन, सिर सहित शरीर के समूचे ऊपरी हिस्से पर होता है. यही वजह है कि कार्यस्थल पर पढ़ना बहुत थकाने वाला होता है.

इलाज

  1. पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था :

अकसर बाहर से आने वाली तेज रोशनी तथा भीतर की जरूरत से ज्यादा तेज रोशनी आंखों में तनाव पैदा करती है. जब आप कंप्यूटर का इस्तेमाल कर रहे हों तो वहां अधिकतर कार्यालयों में रहने वाली रोशनी की आधी रोशनी ही रहनी चाहिए. बाहर से आने वाली रोशनी को बंद कर देना चाहिए. आंतरिक रोशनी को भी कम कर देनी चाहिए या फिर कम पावर के बल्बों व ट्यूबों का इस्तेमाल करना चाहिए. अपने मौनिटर को इस तरह से रखिए कि खिड़कियां, उस के सामने या पीछे रहने के बजाय अगलबगल में रहें.

  1. कम से कम चकाचौंध :

दीवारों या सतह की चकाचौंध के साथसाथ कंप्यूटर स्क्रीन पर होने वाला परावर्तन भी आंखों में तनाव पैदा करता है. आप अपने मौनिटर पर चमकविहीन स्क्रीन (एंटीग्लेयर) लगा सकते हैं. फिर जब बाहरी रोशनी कम नहीं की जा सकती हो तो कंप्यूटर हुड का इस्तेमाल कीजिए. खिड़कियों के शीशों पर परावर्तन रोकने वाली कोटिंग लगवाएं. ऐसा करने से आप के लैंस के पिछले हिस्से से चमक और प्रतिबिंब आप की आंखों तक नहीं पहुंच पाएंगे.

  1. स्क्रीन की चमक को एडजस्ट करें :

मौनिटर के बटनों के इस्तेमाल द्वारा कंप्यूटर स्क्रीन की चमक को आसपास के वातावरण की चमक के अनुरूप बनाएं. इस के अलावा मौनिटर को एडजस्ट करते हुए ऐसी व्यवस्था करें कि स्क्रीन की पृष्ठभूमि तथा स्क्रीन पर दिखाई दे रहे शब्दों या तसवीरों के बीच कंट्रास्ट हाई रहे. साथसाथ अपने डैस्क लैंप को इस तरह से रखें कि वह न तो कंप्यूटर स्क्रीन पर चमके न ही आप की आंखों पर.

  1. पलकें अधिक झपकाएं :

कंप्यूटर पर काम करते हुए पलकें झपकाना बहुत जरूरी है क्योंकि इस से आंखों में शुष्कता तथा जलन पैदा नहीं होती और पानी आता रहता है. अध्ययनों के अनुसार, सामान्य स्थितियों के मुकाबले कंप्यूटर पर काम करते हुए लोग पलकों को पांचगुना कम झपकाते हैं. पलकें नहीं झपकाने की वजह से आंसू नहीं आते जिस से आंखें तेजी से शुष्क हो जाती हैं. कार्यालयों में जो शुष्क वातावरण होता है उस की वजह से भी आंखों में कम आंसू आते हैं. इस व्यायाम को आजमाएं और हर आधे घंटे में 10 बार आंखों को इस तरह से धीरेधीरे झपकाएं जैसे सो रहे हों.

  1. आंखों को फैलाएं :

हर आधे घंटे बाद कंप्यूटर स्क्रीन से नजरें हटाएं और दूरी पर रखी हुई किसी चीज पर 5-10 सैकंड के लिए नजरें डालें. अपने फोकस को फिर से एडजस्ट करने के लिए पहले दूर रखी चीज पर 10-15 सैकंड तक नजरें टिकाए रखें और उस के बाद फिर पास की चीज पर 10-15 सैकंड तक फोकस करें.

10 बार ऐसा ही करें. इन दोनों व्यायामों से आप की दृष्टि तनावग्रस्त नहीं होगी और आप की आंखों की फोकस करने वाली मांसपेशियों में भी फैलाव होगा. इस के अलावा हर 20 मिनट बाद 20 सैकंड का ब्रेक लें.

  1. कार्यस्थल को बेहतर बनाएं :

अगर आप को कंप्यूटर स्क्रीन और पेज को बारीबारी स??े देखना पड़ता है तो उस से आंखों में तनाव पैदा होता है. इस समस्या से बचने के लिए मौनिटर से सटे हुए कौपी स्टैंड पर लिखे हुए पेपर को रखें. अपने कार्य स्टेशन तथा कुरसी को सही ऊंचाई पर स्थापित करें. ऐसा फर्नीचर खरीदें जिस से कंप्यूटर स्क्रीन सही जगह पर रखी जा सके.

बहरहाल, जो लोग बैठ कर काम करते हों, विशेष रूप से जो कंप्यूटर का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें समयसमय पर खड़े होना चाहिए, टहलना चाहिए या बांहों, पैरों, पीठ, गले तथा कंधे का व्यायाम करना चाहिए.

हालांकि ये सारे उपाय बहुत से मामलों में समस्याएं खत्म कर सकते हैं लेकिन इस बात का भी ध्यान रखें कि जब कभी भी कंप्यूटर विजन सिंड्रोम के लक्षण नजर आएं, आंखों के डाक्टर के पास जा कर सलाह अवश्य लें.

Solutions For Hair Problems: बालों को झड़ने से कैसे रोकूं?

Solutions For Hair Problems

सवाल

मैं 25 वर्षीय युवती हूं और अभी से मेरे बाल बहुत झड़ने लगे हैं. कोई ऐसा घरेलू उपाय बताएं जिससे बालों का झड़ना रुक जाए?

जवाब:

बालों के झड़ने के पीछे खराब जीवनशैली, संतुलित व पौष्टिक आहार का अभाव, प्रदूषित वातावरण व हारमोनल बदलाव जैसे अनेक कारण होते हैं. कईर् बार बाल आनुवंशिक कारणों से भी झड़ते हैं, साथ ही किसी प्रकार की शारीरिक बीमारी या दवा का सेवन भी बालों के झड़ने का कारण हो सकता है. पहले आप अपने बालों के झड़ने का कारण जानें. फिर उस के अनुसार उपाय करें.

घरेलू उपाय के तौर पर आप बालों को झड़ने से रोकने के लिए उन की सप्ताह में एक बार हेयर औयल से मसाज करें और उन में दही लगाएं. झड़ते बालों को रोकने के लिए दही बहुत ही कारगर घरेलू नुसखा है. दही से बालों को पोषण मिलता है. बालों को धोने से कम से कम 30 मिनट पहले उन में दही लगाएं. जब दही सूख जाए, तो बालों को धो लें.

एक अन्य उपाय के तौर पर आप कुनकुने औलिव औयल में 1 चम्मच शहद और 1 चम्मच दालचीनी पाउडर मिला कर पेस्ट बनाएं और नहाने से पहले इस पेस्ट को बालों पर लगाएं. 1 घंटे बाद शैंपू कर लें. इस से बालों का गिरना कम होगा.

झड़ते बालों को रोकने के लिए मेथीदाने का पैक भी एक बेहतरीन उपाय है. इस के अलावा अपने दैनिक आहार में प्रोटीन और आयरनयुक्त पदार्थ अधिक मात्रा में शामिल करें. प्रोटीन और आयरन सिर की त्वचा के ऊतकों के पुनर्निर्माण और कोशिकाओं को मजबूती प्रदान करने में मदद करते हैं, जिस से बालों की जड़ें मजबूत होती हैं और उन का झड़ना रुक जाता है. खासतौर से हमने आपको इस बारे में इसलिए बताया कि बदलते पर्यावरण के साथ आपको अपने स्वास्थ का बेहद ख्याल रखना है. Solutions For Hair Problems

मल्लिकार्जुन खड़गे हो सकते हैं इंडिया गठबंधन में मायावती का विकल्प

वोट के लिहाज से देखें तो ओबीसी के बाद सब से अधिक संख्या दलित वोटर की है. यही वजह है कि इंडिया गठबंधन लगातार इस कोशिश में था कि बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती को गठबंधन का हिस्सा बनाया जा सके. कांग्रेस पार्टी में 2 विचार थे. राहुल गांधी चाहते थे कि अखिलेश यादव इंडिया गठबंधन का हिस्सा रहें. प्रियंका गांधी और उत्तर प्रदेश के कांग्रेस नेता चाहते थे कि मायावती को इंडिया गठबंधन से जोड़ा जाए.

इंडिया गठबंधन की दिल्ली मीटिंग के बाद कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के अपने नेताओं की मीटिंग दिल्ली में बुलाई थी. इस मीटिंग में कांग्रेस प्रदेश में अपनी जमीनी हालत देखना चाहती थी. प्रदेश कांग्रेस के नेताओं ने 2 बातें प्रमुख रूप से कहीं. पहली यह कि गांधी परिवार के तीनों सदस्य उत्तर प्रदेश से लोकसभा का चुनाव लड़ेंड़े. दूसरी बात यह कि अखिलेश के मुकाबले मायावती से गठबंधन लाभकारी रहेगा.

अड़ंगा बना मायावती का डांवाडोल रुख

इस मीटिंग से कांग्रेस को लगा कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस बेहद कमजोर है. वह बिना गांधी परिवार और गठबंधन के आगे नहीं बढ़ना चाहती. मीटिंग में प्रदेश कांग्रेस के एक भी नेता ने यह नहीं कहा कि वह मुख्यमंत्री बनने के लिए मेहनत कर सकता है. कांग्रेस ने जब उत्तर प्रदेश की तुलना तेलंगाना से कर के देखी तो लगा कि कांग्रेस वहां भी सत्ता से बाहर थी. इस के बाद भी वहां कांग्रेस के पास 6 नेता ऐसे थे जो मुख्यमंत्री बनने के लिए मेहनत कर रहे थे.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को अपनी कमजोरी का पता चल गया. मायावती को ले कर दुविधा यह है कि वे खुल कर बात नहीं करतीं. जल्दी मिलने का समय नहीं देतीं. प्रियंका गांधी उन से मिल कर इंडिया गठबंधन में लाना चाहती थीं लेकिन मायावती की तरफ से कोई सिग्नल नहीं मिला. चुनाव करीब आने और 3 राज्यों में हार के बाद कांग्रेस दबाव में थी. ऐसे में उस ने यह फैसला कर लिया कि अब मायावती वाला चैप्टर बंद कर दिया जाए.

मायावती का डर क्या है ?

अब चुनाव के पहले मायावती इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं बनेंगी. मायावती ने अपने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर के यह जरूर कहा कि ‘राजनीति में संबंध ऐसे रखने चाहिए कि जरूरत पड़ने पर सहयोग लिया जा सके.’ इस का मतलब यह लगाया जा रहा है कि मायावती चुनाव के बाद सीटों के नंबर के अनुसार अपना साथी चुन सकती हैं. चुनाव बाद गठबंधन का रास्ता खुला रखा है. सवाल यह उठ रहा है कि मायावती ने इंडिया गठबंधन को मना भी नहीं किया और शामिल भी नहीं हुईं.

मायावती के इस ऊहापोह की वजह समाजवादी पार्टी है. 2 जून, 1995 को उत्तर प्रदेश के स्टेट गेस्ट हाउस कांड की खौफनाक यादें अभी भी उन के मन पर छाई हैं. सामाजिक स्तर पर भी ओबीसी और एससी वोटर के बीच उसी तरह की हालत है. 2019 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश और मायावती के बीच समझौता हुआ था. उस का अंत भी बुरा ही रहा.

मायावती खुद को समाजवादी पार्टी से कमतर नहीं आंकतीं. 2019 में जब सपा-बसपा गठबंधन हुआ था तो मायावती ने बसपा के लिए सपा से एक सीट अधिक ली थी. इंडिया गठबंधन में मायावती के हिस्से सीटे कम आतीं. वे अखिलेश से कमजोर दिखना नहीं चाहतीं.

इस कारण वे इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं बनीं. चुनाव बाद के लिए मायावती ने हर समझौते के रास्ते खुले रखे हैं. कहीं न कहीं प्रधानमंत्री पद की इच्छा मायावती के भी मन में है. पर यह चुनाव के बाद सांसदों की संख्या और हालात पर निर्भर है. लिहाजा, मायावती चुनाव के पहले अपने पत्ते नहीं खोलना चाहतीं.

दलित चेहरा बने मल्लिकार्जुन खड़गे

मायावती के विकल्प के रूप में इंडिया गठबंधन ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम पीएम फेस के रूप में आगे किया है. यह फैसला जिस रणनीति के तहत हुआ उस पर मेहनत करना इंडिया गठबंधन की जिम्मेदारी है. केवल दलित होने के कारण नाम घोषित होने से दलित वोट नहीं मिलने वाले. पंजाब विधानसभा का चुनाव इस का उदाहरण है. पंजाब में विधानसभा चुनाव के पहले चरनजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बना कर कांग्रेस ने सोचा था कि दलित वोट उस को मिल जाएंगे. कांग्रेस ने इस के लिए मेहनत नहीं की. लिहाजा, पंजाब में कांग्रेस चुनाव हार गई.

मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम आगे करने से दलित वोट नहीं मिलेंगे. इस के लिए इंडिया गठबंधन को पूरी ईमानदारी के साथ काम करना होगा. केवल कांग्रेस के चाहने से भी यह नहीं होगा. यह बात सच है कि कांग्रेस मल्लिकार्जुन खड़गे का बहुत सम्मान करती है. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और सांसद राहुल गांधी हमेशा खुद खड़गे की कार में उन के पीछे बैठते हैं. जिस से पार्टी और लोगों को यह संदेश जाए कि खड़गे ‘डमी कंडीडेट’ नहीं हैं. पार्टी चलाने में खड़गे आजाद हैं.

दिक्कत यह है कि देश के तमाम राज्यों में कांग्रेस मजबूत नहीं है. ऐसे में वह अपने सहयोगी दलों पर निर्भर है. 2024 में अगर इंडिया गठबंधन सरकार बनाने की हालत में आता भी है तो राहुल गांधी पीएम नहीं बनेंगे. राहुल गांधी यह सोच कर चल रहे हैं कि अभी उन की उम्र जिस दौर में है वहां उन के पास पीएम बनने के लिए 10 साल का समय है.

ऐसे में मल्लिकार्जुन खड़गे ही पीएम बनेंगे, यह तय है. इंडिया गठबंधन तभी सरकार बना पाएगा जब कांग्रेस के पास अपने 120 से 150 के बीच सांसद आएं ऐेसे में मल्लिकार्जुन खड़गे को पीएम फेस बनाने से काम नहीं चलने वाला. उस के लिए इंडिया गठबंधन और उस में शामिल हर दल को पूरी ईमानदारी से यह सोच कर मेहनत करनी होगी कि मल्लिकार्जुन खड़गे को प्रधानमंत्री बनाना है.

रौबिन मिंज : भारत का पहला आदिवासी क्रिकेट खिलाड़ी जो छा जाने को तैयार है

रौबिन मिंज ऐसा नाम है जो आज संपूर्ण देश में चर्चा में है. रौबिन अनुसूचित जनजाति का प्रतिनिधित्व करते हुए आईपीएल क्रिकेट के खेलों में अपने बूते मुकाम बना चुके हुए हैं. अपनी अद्भुत प्रतिभा से उन्होंने जता दिया है कि वे किसी से कम नहीं.

दिसंबर 2023 के अंतिम पखवाड़े में 19 दिसंबर को आईपीएल-17 के लिए दुबई में हुई नीलामी में दुनिया के कई क्रिकेटर खूब मालामाल हुए. यह सम्मान झारखंड के 21 साल के विकेटकीपर रौबिन मिंज, जो बाएं हाथ के बल्लेबाज हैं, ने हासिल किया. युवा रौबिन मिंज को गुजरात टाइटंस ने 3.60 करोड़ रुपए में खरीदा है. वे आईपीएल में पहुंचने वाले पहले आदिवासी खिलाड़ी बन गए हैं.

रौबिन मिंज कहते हैं, “मैं बचपन से ही क्रिकेट टीम में शामिल होने के सपने देखता रहा. अब यह सच हो गया. हां, इस नीलामी को ले कर मैं यह समझ रहा था कि 20 लाख रुपए में भी कोई टीम खरीद ले तो कोई बात नहीं, लेकिन राशि बढ़ती चली गई.”

उन्होंने आगे कहा, “टीम में चुने जाने के बाद जब मैं ने अपनी मां से मोबाइल पर बात की तो वे रोने लहीं. पापा भी रोने लगे.” दरअसल, रौबिन मिंज झारखंड के ही भारतीय टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धौनी को अपना आदर्श मानते हैं.

धोनी से मिली प्रेरणा

रौबिन मिंज कुछ वर्षों से झारखंड टीम के साथ जुड़े हुए हैं. मजेदार बात यह है कि इस दौरान उन्हें कई बार महेंद्र सिंह धौनी से मुलाकात करने और उन से गुर सीखने के मौके मिले.

वे कहते हैं, “धोनी सर ने हमेशा यही कहा कि दिमाग को शांत रख कर खेलो और हमेशा आगे की सोचो.”

रौबिन मिंज मूलतया गुमला जिले के रायडीह प्रखंड के सिलम पांदनटोली गांव के निवासी हैं. यहीं उन की प्राथमिक शिक्षा हुई और क्रिकेट के प्रति प्रेम जागृत हुआ. क्रिकेट के आकर्षण में बंध कर उन्होंने सबकुछ समर्पित कर दिया और एक तरह से आज छा गए हैं.

उन के पिता फ्रांसिस जेवियर मिंज एक सेवानिवृत्त सैन्यकर्मी हैं. वे बिहार रेजीमैंट में तैनात रहे. उस समय वे रांची एयरपोर्ट पर बतौर सिक्योरिटी गार्ड इनर सर्किल में बोर्डिंग पास चैक करते थे.

रौबिन के पिता के अनुसार, “आईपीएल में रौबिन का चयन सौ फीसदी होगा, इस को ले कर तो मैं तैयार ही था.”

उन्होंने आगे कहा, “मैं उतने में ही खुश था. मगर रौबिन को जो ऊंचाई मिली है वह आनंदित करने वाली हैं.”

दूसरी तरफ रौबिन की मां एलिस मिंज ने कहा, “इस साल क्रिसमस का इस से बड़ा तोहफा मेरे लिए कुछ नहीं हो सकता. जब से यह खबर मिली है, मुझे तो बस रोना आ रहा है. मेरा तो बस यही सपना है कि जिस तरह धौनी ने झारखंड का नाम रोशन किया है, मेरा बेटा भी करे.”

पहला आदिवासी क्रिकेटर

पिता जेवियर मिंज ने कहा, “जब रौबिन 2 साल का था, तब से ही उस ने डंडे ले कर बौल पर मारना शुरू कर दिया था. मैं खुद भी फुटबाल और हौकी का खिलाड़ी रहा हूं. मैं ने इस को जब टैनिस बौल ला कर दी तो यह दाएं हाथ के बजाय बाएं हाथ से खेलने लगा. यही बात मेरे मन में घर कर गई क्योंकि मेरे परिवार में कोई भी बाएं हाथ से काम करने वाला नहीं है. यह भी क्रिकेट के अलावा सब काम दाएं हाथ से ही करता है. 5 साल की उम्र में मैं ने इसे क्रिकेट कोचिंग में डाल दिया.”

पहले आदिवासी क्रिकेटर के सवाल पर उन का कहना है, “हम तो यही कहते हैं कि इतिहास लिखने वालों को चाहिए कि वे इस बात को पहले पन्ने पर लिखें.”

रौबिन मिंज की बड़ी बहन है करिश्मा मिंज जो देहरादून में कृषि से स्नातक की पढ़ाई कर रही है. वे कहती हैं, “रौबिन जो इतिहास बना रहा है उस से मैं बहुत खुश हूं.”

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