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भाजपा आखिर क्यों अंबेडकर शरणम गच्छामि

अंबेडकर जयंती के अवसर पर 14 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की जनता को संबोधित करते हुए कहा- कांग्रेस ने हमेशा डा.. बाबासाहेब अंबेडकर का अपमान किया, हम ने उन का सम्मान किया है. डा. बाबासाहेब अंबेडकर द्वारा दिए गए संविधान के कारण ही आज एक आदिवासी महिला भारत की राष्ट्रपति बन सकी. जहां तक संविधान का सवाल है, आज बाबासाहेब अंबेडकर खुद भी आ जाएं तो वे भी संविधान खत्म नहीं कर सकते हैं. संविधान हमारी सरकार के लिए गीता, रामायण, बाइबिल और कुरान है.

लोकसभा चुनाव के दौरान पूरा विपक्ष संविधान को ले कर भाजपा पर हमलावर है. हिंदू राष्ट्र का राग अलापने वाली भाजपा के पास धर्म और राम मंदिर के अलावा कोई मुद्दा नहीं है. हिंदू धर्म संकट में है. राम मंदिर बनने और प्राणप्रतिष्ठा के बाद अब उस के नेता रामराज लाने का विलाप करते नज़र आ रहे हैं. महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार को ले कर मोदी-शाह सहित उन के किसी नेता की जबान से एक शब्द नहीं फूट रहा है. मुद्दे की बातें सिर्फ विपक्ष, ख़ासकर इंडिया गठबंधन, कर रहा है.

इलैक्टोरल बौंड को ले कर भाजपा की काफी फजीहत हो चुकी है. इस मामले में वह बैकफुट पर है. सफाई देतेदेते हालत पस्त है. भाजपा नेता चाहे टीवी चैनलों की डिबेट में बैठे हों या मंच से पब्लिक को संबोधित कर रहे हों, इलैक्टोरल बौंड के बारे में सिर्फ एक बात कहते दिख रहे हैं कि चंदा तो दूसरी पार्टियों ने भी लिया है. दरअसल, भाजपा नेता जनता को मूर्ख समझते हैं. क्या जनता नहीं समझ रही कि वास्तविक चंदा तो सचमुच अन्य पार्टियों को ही मिला है जो सत्ता में नहीं हैं और जो चंदे की एवज में देने वाले को कोई फायदा नहीं पहुंचा सकतीं, भाजपा ने तो बड़ीबड़ी कंपनियों से खुली धनउगाही की है, ईडी, सीबीआई और आयकर के छापे का डर पैदा कर के. कंपनियों ने उन को चंदा नहीं, रिश्वत दी है वह भी 6 हज़ार करोड़ रुपए से ऊपर.

ईवीएम से वोटिंग के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हालत पतली कर दी है. इलैक्ट्रौनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम के वोटों और वोटर वैरिफिएबल पेपर औडिट ट्रेल (VVPAT) परचियों की 100 फीसदी क्रौसचैकिंग की मांग को ले कर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई है और फैसला सुरक्षित रखा गया है. निष्पक्ष चुनाव हो, इस के लिए कोर्ट का वीवीपैट पर पूरा जोर है. इस को ले कर भी अब भाजपा खेमे की धुकधुकी बढ़ गई है.

अब तक होने वाले चुनावों में भाजपा सांप्रदायिकता पर खुल कर खेलती रही. ध्रुवीकरण के जरिए हिंदूमुसलिम कर के वह हिंदू वोटबैंक को अपने काबू में किए रही. मगर इस बार ध्रुवीकरण की नीति फेल हो गई. कोशिश तो बहुत हुई कि धार्मिक उन्माद पैदा किया जा सके मगर मुसलमानों की खामोशी ने देश में दंगे नहीं भड़कने दिए. मुसलमानों को भाजपा से जोड़ने की कोशिश भी नाकाम ही रही. उधर देशभर का किसान कमर कस कर बैठा है सबक सिखाने को. कई जगहों पर तो भाजपा नेताओं को गांवोंकसबों में लोग प्रचार के लिए घुसने ही नहीं दे रहे.

ऐसे में अंबेडकर जयंती के बहाने संविधान को गीता, कुरआन, बाइबिल से ऊपर बता कर प्रधानमंत्री ने न सिर्फ दलित को लुभाने की कोशिश की है बल्कि यह कह कर कि अंबेडकर के संविधान की बदौलत ही एक आदिवासी महिला को देश के सर्वोच्च पद पर बैठने का गौरव हासिल हुआ, उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भी अपने चुनावी हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है. संघ और भाजपा की विचारधारा, जो मनु की वर्णव्यवस्था पर आधारित है, संविधान की सोच के बिलकुल विपरीत है. ऐसे में मोदी द्वारा संविधान का महिमामंडन क्या मनु की वर्णव्यवस्था को ख़त्म करने की दिशा में उठाया जाने वाला कदम नहीं है. और यदि सचमुच ऐसा है तो यह देशहित में उठाया गया बड़ा कदम है. क्या मोदी संघ के खिलाफ हुए जा रहे हैं? या ये बड़ीबड़ी बातें सिर्फ दलितों को लुभाने मात्र के लिए हैं?

तो कुल जमा यह कि भाजपा इस वक्त आक्रामक नहीं बल्कि रक्षात्मक मोड में है. ‘अब की बार चार सौ पार’ का नारा कमजोर पड़ता नज़र आ रहा है. लिहाजा, अब दलितों का सहारा तलाशा जा रहा है.

विपक्षी पार्टियों का मानना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में अगर भाजपा को जीत हासिल होती है तो सब से पहले संविधान को ख़त्म किया जाएगा और देश तानाशाही के अधीन होगा. विपक्ष के इसी हमले का ही जवाब था 14 अप्रैल को मोदी का वह भाषण. अंबेडकर जयंती पर प्रधानमंत्री का दीक्षा भूमि, नागपुर जाने का कार्यक्रम भी था, जो अंतिम समय में स्थगित हो गया.

भारतीय जनता पार्टी का संकल्प पत्र और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संबोधन, वह भी अंबेडकर जयंती पर, इसे राजनीतिक नज़रिए से देखना तब महत्त्वपूर्ण हो जाता है जब विपक्ष का सब से बड़ा आरोप यही है कि अगर प्रधानमंत्री को 400 सांसदों का समर्थन हासिल हो गया तो वे अंबेडकर के बनाए संविधान को बदल देंगे.

हालांकि, इन आरोपों का खंडन भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी की सरकार की ओर से कई बार किया जा चुका है. मोदी कह चुके हैं, “संविधान हमारे लिए गीता, बाइबिल, कुरान और सबकुछ है. संविधान को कोई नहीं बदल सकता. बाबासाहेब आ भी जाएं तो अब संविधान नहीं बदला जा सकता.”

संविधान में अपनी अटूट आस्था दिखाने के लिए ही प्रधानमंत्री मोदी ने डा. अंबेडकर के नाम का जिक्र किया.

गौरतलब है कि कभी भाजपा सरकार में मंत्री रहे अरुण शौरी ने ‘वर्शिपिंग फौल्स गौड्स’ नाम की किताब लिख कर बाबासाहेब की काफी आलोचना की थी. उस समय पार्टी ने उन के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की थी. संघ और भाजपा के तमाम बड़े नाम अंबेडकर और संविधान को गालियां देते रहे हैं. आज उसी पार्टी के नेता बाबासाहेब का नाम लेते नज़र आ रहे हैं. यह अंतर मुख्य रूप से पिछले कुछ सालों की राजनीति में देखने को मिल रहा है.

नरेंद्र मोदी भारतीय जनता पार्टी से पहले लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे जिसे भारतीय जनता पार्टी अपना मूल संगठन मानती है. राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों के विद्वानों के मुताबिक मोदी की विचारधारा और डा.
अंबेडकर की विचारधारा को एकसाथ नहीं रखा जा सकता. दोनों एकदूसरे के बिलकुल विपरीत हैं. मगर 2024 की चुनावी वैतरणी पार करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अंबेडकर के विचारों को ‘समायोजित’ करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है. मौजूदा सरसंघचालक मोहन भागवत अकसर अंबेडकर की प्रशंसा करते दिख रहे हैं, कहते सुने जा रहे हैं कि संघ के विचार अंबेडकर के विचारों के समान ही हैं. क्या सचमुच?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और डा. अंबेडकर के विचारों को ले कर जब भी बहस होती है कि ये एकजैसे हैं या नहीं हैं, तो सब से पहले जो शब्द दिमाग़ में आते हैं, वो हैं- ‘समता’ और ‘समरसता’.

इन दोनों अवधारणाओं के अर्थ में बारीक़ अंतर है. इंग्लिश में समता का अर्थ है इक्विलिटी यानी समानता जबकि समरसता का इंग्लिश में अर्थ है हारमनी. यही सूक्ष्म अंतर अंबेडकर और संघ के विचारों में भी दिखता है. बाबासाहेब हमेशा समानता पर ज़ोर देते हैं, जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आजकल सद्भाव पर ज़ोर दे रहा है. संघ वर्चस्व के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए हमेशा ही सद्भाव की अवधारणा का उपयोग करता रहा है, जबकि बाबासाहेब समानता की अवधारणा का उपयोग आज़ादी के लिए करते रहे हैं.

डा. भीमराव अंबेडकर के राजनीतिक जीवन का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव था महाड़ सत्याग्रह. 20 मार्च,1927 को अंबेडकर और उन के अनुयायियों ने महाराष्ट्र के कोलाबा ज़िले के महाड़ में स्थित चावदार तालाब तक एक जुलूस निकाला था. वो लोग छुआछूत के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे थे.

हज़ारों की संख्या में अछूत कहे जाने वाले लोगों ने अंबेडकर की अगुआई में चावदार के एक सार्वजनिक तालाब से पानी पिया. सब से पहले डाक्टर अंबेडकर ने चुल्लू से पानी पिया और फिर उन का अनुकरण करते हुए उन के हज़ारों अनुयायियों ने पानी पिया.

उस समय अंबेडकर ने वहां मौजूद लोगों को संबोधित करते हुए कहा था, ‘क्या हम इसलिए यहां आए हैं कि हमें पीने के लिए पानी नहीं मिलता है? क्या हम यहां इसलिए आए हैं कि यहां के ज़ायक़ेदार कहलाने वाले पानी के हम प्यासे हैं? बिलकुल नहीं. हम यहां इसलिए आए हैं कि हम इंसान होने का अपना हक़ जता सकें.’

यह एक प्रतीकात्मक विरोध था जिस के ज़रिए हज़ारों साल पुरानी सवर्ण और सामंती सत्ता को चुनौती दी गई थी जो सामाजिक पायदान के सब से निचले स्तर के लोगों को वो हक़ भी देने के लिए तैयार नहीं थी जो जानवरों तक को हासिल था.

हाल में प्रकाशित अंबेडकर की जीवनी ‘अ पार्ट अपार्ट द लाइफ़ एंड थौट्स औफ़ बी आर अंबेडकर’ में अशोक गोपाल लिखते हैं, “महाड़ सत्याग्रह के समय सवर्ण हिंदुओं ने दलित बच्चों, बूढ़ों और महिलाओं को बुरी तरह से पीटा. यही नहीं, अंबेडकर के इस विरोध के एक दिन बाद 21 मार्च, 1927 को सनातनी हिंदुओं ने चावदार तालाब के पानी का ‘शुद्धीकरण’ किया था.”

मनु की वर्णव्यवस्था को निरंतर पुख्ता करने वाला संघ यही चाहता है कि दलितों और सवर्णो में जो अंतर है, वह बना रहे मगर सद्भावना के जरिए उन्हें अपने साथ मिलाए रखो. उन से दरियां तो बिछवाओ मगर कभी कुरसी मत दो.

इतिहास के शोधकर्ता और विचारक डा. उमेश बागड़े भी मानते हैं कि समानता और सद्भाव की 2 अवधारणाओं के बीच अंतर है, इसलिए डा. बाबासाहेब अंबेडकर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिकाएं अलगअलग हैं.

वे कहते हैं, “बाबासाहेब ने 3 क्षेत्रों में असमानता देखी, जन्म से असमानता (जाति, धर्म आदि), विरासत से असमानता (धन, ज्ञान आदि) और उपलब्धि से असमानता. उन का स्पष्ट मत था कि उपलब्धि के कारण होने वाली असमानता के बजाय पहली 2 असमानताएं, यानी कि जन्म और विरासत की असमानताएं समाप्त होनी चाहिए. ऐसा लगता है कि उन की सारी कोशिशें इसी बात के लिए हैं. वहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख रहे माधव सदाशिव गोलवलकर पहली 2 असमानताओं को ‘प्राकृतिक’ बताते थे.”

जब बाबासाहेब ने ‘समता’ के मूल्य या अवधारणा को इस स्तर पर देखा, तो वे इस असमानता को सुलझाने के लिए कैसे तैयार हो सकते थे? इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि बाबासाहेब और संघ का समानता और सद्भाव का लक्ष्य एक ही था. दोनों विपरीत ध्रुव हैं. मोदी खेमे की चुनावी मजबूरी अगर दोनों को साथ लाने की कोशिश कर रही है, तो दलितों को इस धोखे में आने से बचना होगा.

Loksabha Election 2024: हेमा मालिनी से ले कर अनुप्रिया पटेल तक, पढ़ें 10 महिला उम्मीदवारों की राजनीतिक छवि का लेखाजोखा

Loksabha Election 2024: हमेशा की तरह इस बार के चुनाव में भी महिला महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया गया है. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के संस्थापक दिग्गज नेता शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले बारामती लोकसभा क्षेत्र से एक बार फिर चुनाव लड़ने जा रही हैं. वह इस सीट का साल 2009 से प्रतिनिधित्व कर रही हैं. बारामती पवार परिवार का गढ़ है. शरद पवार इस सीट से 1996 से 2009 तक सांसद रहे थे. सुप्रिया सुले भी यहां से लगातार 3 बार से सांसद हैं. इसी तरह भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाले एनडीए गठबंधन की तरफ से उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर लोकसभा सीट से अनुप्रिया पटेल चुनाव लड़ रही हैं. वह अपना दल सोनेलाल गुट की अध्यक्ष है. 2012 के विधानसभा चुनाव में वह विधायक चुनी गई थीं.  आइए आज आपको इस आर्टिकल में कुछ महिला उम्मीदवारों  की राजनीतिक छवि का लेखाजोखा बताते हैं.

 

1. तृणमूल कांग्रेस की तेजतर्रार नेत्री महुआ मोइत्रा

mahua moina
महुआ मोइत्रा

5 फुट 6 इंच लंबी महुआ मोइत्रा की पहचान एक स्मार्ट और तेजतर्रार नेता के तौर पर होती है जो हमेशा ही लोकसभा में सरकार को घेरती रहती हैं. सदन में दिए जाने वाले उन के भाषण हमेशा ही वायरल होते रहते हैं. महुआ को एक कुशल वक्ता और बेहतरीन नेता के तौर पर जाना जाता है.

महुआ काफी पढ़ीलिखी हैं. उन का जन्म असम के कछार जिले में साल 1974 में हुआ. उन्होंने अपनी पढ़ाई राजधानी कोलकाता से की है. शुरुआती शिक्षा हासिल करने के बाद महुआ को उन के परिवार ने आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका भेज दिया. उन्होंने मैसाचुसेट्स के माउंट होलिओक कालेज से गणित और अर्थशास्त्र में उच्च शिक्षा प्राप्त की है. बहुत ही कम लोगों को मालूम है कि महुआ राजनीति में आने से पहले एक सफल बैंकर हुआ करती थीं और अमेरिकी बहुराष्ट्रीय निवेश बैंक जे पी मौर्गन में काम करती थीं. वहां वे करोड़ों रुपए की सैलरी पर काम कर रही थीं.

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2.कौन है बसपा प्रत्याशी डा. इंदु चौधरी, जिन्हें बचपन से ही जातिवादी भेदभाव का सामना करना पड़ा

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डा. इंदु चौधरी

उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के पहले चरण में 80 उम्मीदवारों में 7 महिलाएं हैं. बहुजन समाज पार्टी ने इस बार डा. इंदु चौधरी पर दांव लगाया है. उत्तर प्रदेश के आंबेडकरनगर में एक दलित परिवार में जन्मी इंदु को बचपन से ही अपनी जाति की वजह से भेदभाव का सामना करना पड़ा. कई बार उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलीं, लेकिन न वे कभी डरीं, न रुकीं. न्याय के लिए संघर्ष करती रहीं और यह संघर्ष आज भी जारी है.

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3. हेमामालिनी एक बार फिर मथुरा से चुनाव लड़ेंगी, अब तीसरी बार जीत की गारंटी संदेह में

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जानेअनजाने या जोशखरोश में कांग्रेस अकसर कैसे अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मारती रही है, इस का एक और उदाहरण कुरुक्षेत्र से बीती एक अप्रैल को देखने में आया जब रणजीत सिंह सुरजेवाला के हेमा मालिनी को ले कर दिए एक बयान ने खासा तहलका मचा दिया. इस बार अपनी जीत को ले कर जो दिग्गज भाजपाई डरे हुए हैं, 75 वर्षीया बुजुर्ग फिल्म ऐक्ट्रैस हेमा मालिनी उन में से एक हैं.

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4. बिहार की पतवार संभालने की कोशिश में लालू प्रसाद यादव की बेटी मीसा भारती

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मीसा भारती

इस लोकसभा चुनाव के मद्देनजर लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी ने बिहार में 6 महिला उम्मीदवार उतारे हैं जबकि भाजपा ने बिहार में एक भी महिला को अवसर नहीं दिया. राजद की लिस्ट में बिहार की कुल 22 सीटों पर जिन 6 महिला उम्मीदवारों के नामों का ऐलान किया गया है उन में लालू यादव की दोनों बेटियों के नाम भी शामिल हैं. इस में रोहिणी आचार्य को सारण से तो मीसा भारती को पाटलिपुत्र से उम्मीदवार बनाया गया है. बीजेपी ने मीसा के खिलाफ पाटलिपुत्र से राम कृपाल यादव को उम्मीदवार बनाया है जो पिछली दफा मीसा को शिकस्त दे चुके हैं.

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5. जानिए सुषमा स्वराज की बेटी बांसुरी के बारे में, जिन्हें भाजपा ने नई दिल्ली सीट से प्रत्याशी बनाया है

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बांसुरी
कभी राजनीति में परिवारवाद का विरोध करने वाली भारतीय जनता पार्टी ने अब परिवारवाद का विरोध छोड़ कर वंशवाद का विरोध करना शुरू कर दिया है. भाजपा का गठन 80 के दशक में हुआ था. 1980 का लोकसभा चुनाव जनवरी माह में हुआ था. भाजपा का गठन अप्रैल में हुआ था. भाजपा ने गठन के बाद पहला चुनाव 1984 का लड़ा था. उस समय पार्टी में कोई प्रमुख नेता नहीं था. अटल बिहारी वाजपेयी का ही नाम चर्चा में रहता था. जब भाजपा में पहचान वाले नेता ही नहीं थे तो उन के परिवार के लोग होने का सवाल ही नहीं था. ऐसे में भाजपा के लिए परिवारवाद का विरोध करने में दिक्कत नहीं थी.
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6. सुप्रिया सुले और सुनेत्रा पवार: ननद भौजाई के बीच चुनावी लड़ाई

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सुप्रिया सुले और सुनेत्रा पवार

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के संस्थापक दिग्गज नेता शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले बारामती लोकसभा क्षेत्र से एक बार फिर चुनाव लड़ने जा रही हैं. वह इस सीट का साल 2009 से प्रतिनिधित्व कर रही हैं. बारामती पवार परिवार का गढ़ है. शरद पवार इस सीट से 1996 से 2009 तक सांसद रहे थे. सुप्रिया सुले भी यहां से लगातार 3 बार से सांसद हैं.

हालांकि यह चुनाव पिछले चुनावों से अलग है. अब शरद पवार की एनसीपी विभाजित हो गई है. इस के एक गुट की बागडोर 80 साल के शरद पवार के हाथ में है और दूसरे गुट का नेतृत्व उन के भतीजे अजित पवार कर रहे हैं. अजित पवार बीजेपी और शिवसेना के साथ गठबंधन कर के महाराष्ट्र सरकार का हिस्सा बन चुके हैं. सुप्रिया सुले अब एनसीपी (शरद पवार) की उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ेंगी.

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7. श्रेया वर्मा: समाजवादी पार्टी में तीसरी पीढ़ी का दखल

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श्रेया वर्मा

श्रेया वर्मा समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक बेनी प्रसाद वर्मा की पोती हैं. इस से एक बात और साफ होती है कि चुनाव लड़ना अब सामान्य परिवार और खासकर महिलाओं के लिए सरल नहीं है.

समाजवादी पार्टी यानी सपा ने 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की गोंडा सीट से श्रेया वर्मा को अपना उम्मीदवार बनाया है. 31 साल की श्रेया वर्मा बेनी प्रसाद वर्मा की पोती और राकेश वर्मा की बेटी हैं. बेनी प्रसाद वर्मा सपा के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे हैं. मुलायम सिंह यादव के बेहद करीबी रहे बेनी प्रसाद को मुलायम सिंह यादव के बाद सपा में नंबर 2 का नेता माना जाता था.

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8. बीजेपी की ऐक्टिव और स्ट्रौंग महिला नेता हैं कमलजीत सहरावत

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कमलजीत सहरावत

लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने बहुत से मौजूदा सांसदों की जगह नए चेहरों को मैदान में उतारा है. पूर्व मेयर कमलजीत सहरावत एक ऐसा ही चेहरा हैं. दिल्ली में बीजेपी ने पश्चिमी दिल्ली के मौजूदा सांसद प्रवेश वर्मा का टिकट काट कर कमलजीत सहरावत को मौका दिया है.

कमलजीत दिल्ली बीजेपी की महासचिव हैं. वे एसडीएमसी की मेयर रह चुकी हैं. वर्तमान में वे वार्ड संख्या-120 (द्वारका बी) से पार्षद हैं. वे एमसीडी की स्टैंडिंग कमेटी की सदस्य भी हैं. कमलजीत सोशल मीडिया पर ऐक्टिव रहती हैं. एक्स पर उन के 48 हजार से ज्यादा फौलोअर्स हैं. वहीं फेसबुक पर उन्हें 2 लाख से ज्यादा लोग फौलो करते हैं. पार्टी गतिविधियों में वे बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती हैं.

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9. सीता सोरेन :पहचान बनाने के चक्कर में पहचान खो रहीं

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सीता सोरेन
विचारधारा का संकट आदिवासी बाहुल्य राज्य झारखंड में भी दस्तक दे चुका है. सियासी तौर पर देखा जाए तो 49 वर्षीया सीता सोरेन के झारखंड मुक्ति मोरचा छोड कर भाजपा जौइन कर लेने से कोई हाहाकार नहीं मच गया है लेकिन सामाजिक तौर पर इस घटना के अपने अलग माने हैं जो आदिवासी समुदाय की अपनी पहचान को ले कर उलझन को बयां करते हुए हैं. आजादी के बाद इस राज्य का इतना ही विकास हुआ है कि लोग राम और रामायण को जानने लगे हैं. इस का यह मतलब भी नहीं कि घरघर में रामायण या रामचरितमानस पढ़ी जाने लगी हो बल्कि यह है कि आदिवासियों, जो खुद को मूल निवासी कहते हैं, ने हिम्मत हारते एक समझौता सा कर लिया है कि अब राम ही उन की नैया पार लगाएगा. धर्म के इस प्रपंच से हमेशा ही आदिवासी समुदाय जिल्लत की जिंदगी जीता रहा है.

यह राम है कौन और कहां रहता है, यह इन्हें भाजपाई बता रहे हैं कि जल, जंगल और जमीन की लड़ाई मिथ्या है, तुम लोग नाहक ही भटक रहे हो और इस भटकाव से मुक्ति चाहते हो तो राम की शरण में आ जाओ जिस ने शबरी के झूठे बेर खा कर ही उस का उद्धार कर दिया था. सीता सोरेन के भगवा गैंग में चले जाने की दास्तां भी कुछकुछ ऐसी ही है कि वे सियासी मोक्ष की चाहत में रामदरबार की सब से पिछली कतार में कतारबद्ध हो कर जा बैठी हैं. अपने ससुर, देवर और परिवार से बगावत करने के एवज में उन्हें भाजपा से दुमका सीट से टिकट मिला है.

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10. अनुप्रिया पटेल: विरासत की राजनीति में न पार्टी बची न परिवार

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अनुप्रिया पटेल

भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाले एनडीए गठबंधन की तरफ से उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर लोकसभा सीट से अनुप्रिया पटेल चुनाव लड़ रही हैं. वह अपना दल सोनेलाल गुट की अध्यक्ष है. 2012 के विधानसभा चुनाव में वह विधायक चुनी गई थीं. इस के बाद वह 2014 के लोकसभा चुनाव जीत कर सांसद और मोदी मंत्रिमंडल में केन्द्रीय मंत्री बनीं. अनुप्रिया पटेल डाक्टर सोने लाल पटेल की बेटी हैं.

उत्तर प्रदेश की राजनीति में डाक्टर सोने लाल पटेल को कमजोर वर्ग का प्रभावी नेता माना जाता है. उन का राजनीतिक कैरियर बहुजन समाज पार्टी से शुरू हुआ. वह कांशीराम के बेहद करीबी और बसपा के संस्थापक सदस्यों में से थे. डाक्टर सोनेलाल पटेल ने हमेशा जातिवाद का डट कर विरोध किया और सामाजिक असमानता के खिलाफ लड़ाई लड़ी. शुरूआती दौर में वह भाजपा और उस के मनुवाद के प्रबल विरोधी थे. सोने लाल पटेल का जन्म कन्नौज जिले के बगुलिहाई गांव में एक कुर्मी हिंदू परिवार में हुआ था.

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आरोही : अविरल की बेरुखी की क्या वजह थी?

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हीनता और वितृष्णा का प्रतीक पादुका पूजन

भारत में  गुरु तो गुरु, उन की पादुकाएं तक पैसा कमाती हैं. इसे चमत्कार कहें या बेवकूफी, यह अपने देश में ही होना संभव है. धर्मगुरुओं ने प्रवचनों के जरिए लोगों में आज कूटकूट कर इतनी हीनता भर दी है कि वे मानसिक तौर पर अपाहिज हो कर रह गए हैं. धर्म के कारोबारी नहीं चाहते कि उन के अनुयायी कभी तर्क करें, इसलिए प्रवचनों और धार्मिक किस्सेकहानियों के जरिए उन्हें आस्था की घुट्टी पिलाई जाती है. हमारे धर्मप्रधान भारत देश में धर्मगुरुओं की भरमार है. हरेक नागरिक ने अपनी पसंद और रुचि के अनुसार गुरु बना रखा है.

इन धर्मगुरुओं की बादशाहत और ठाटबाट न तो पहले किसी सुबूत के मुहताज थे, न अब हैं. आम आदमी के मुकाबले औसतन हजारोंगुना ज्यादा संपन्न और सुविधाभोगी धर्मगुरु, हैरत की बात है, कोई उद्यम नहीं करते, न ही सांसारिक लोगों की तरह उन्हें परेशानियां ?ोलनी पड़ती हैं. त्याग, वैराग्य और तपस्या का चोला ओढ़े यह वर्ग सदियों से कंबल ओढ़ कर घी पी रहा है.

धर्म के व्यवसाय का हिसाबकिताब बेहद सरल है. श्रद्धालु जो पैसा चढ़ाते हैं, धर्मगुरु उसे बटोरते हैं. गुरुपूर्णिमा सरीखे पर्व पर तो यह धंधा अरबों का आंकड़ा पार कर जाता है. करोड़ों लोग पागलों की तरह गुरुपूजन में जुट जाते हैं. चूंकि यह एक धार्मिक परंपरा है इसलिए इसे बगैर किसी तर्क के निभाया जाता है. अपने प्रवचनों में तमाम छोटेबड़े धर्मगुरु यह जताने से नहीं चूकते कि बगैर गुरु के जीवन व्यर्थ है. वजह, गुरु रहित व्यक्ति को न तो ज्ञान मिलता, न ईश्वर, न मोक्ष, न मुक्ति और न ही संसाररूपी नरक से वह तर पाता है?.

लोगों का विश्वास, जो मूलतया भ्रम है, बना रहे, इस के लिए हर बार ये गुरु दोहराते हैं कि गुरु होने के नाते हम ईश्वर से भी बड़े हैं, तीनों लोकों के स्वामी हैं. थोड़ी सी दक्षिणा के बदले तुम्हारे कष्ट और विपत्तियां अपने ऊपर ले लेते हैं और यह उपकार महज इसलिए करते हैं कि तुम हमारे शिष्य हो.

ये बड़े खतरनाक और नुकसानदेह शब्द हैं, जो दहशत पैदा करते हैं. औसत आदमी इतने खौफ में आ जाता है कि जेब ढीली करने में ही भलाई सम?ाता है. इस के पीछे मानसिकता यह रहती है कि तकलीफें और परेशानियां और न बढ़ें. अगर गुरुजी आभूषण, वस्त्र और नकदी के एवज में काल्पनिक विपत्तियां अपने ऊपर ले रहे हैं तो सौदा घाटे का नहीं. पैसे का क्या है, वह तो आताजाता रहता है. आता है तो गुरुकृपा से ही है, जाता है तो गुरु की नाराजगी से. लोग हीनता से भरे रहें, इसलिए गुरु पादुका पूजन का विधान भी हर कहीं देखा जा सकता है. पादुका यानी बोलचाल की भाषा में जूता, जिसे एक खास जाति के लोग परंपरागत रूप से बना कर पेट पालते रहे हैं. इन बहिष्कृत और अछूतों का बनाया जूता धर्मगुरु के पांव में जाते ही करोड़ों का हो जाता है, लोग इसे पूजते हैं, कई तो चूमते भी हैं, माथा नवाना तो अनिवार्यता है.

धर्मशास्त्रों में जो लिखा है वह तो मूर्खतापूर्ण, काल्पनिक और ठगी से भरपूर सामग्री है ही मगर जो नहीं लिखा वह धर्म के कारोबारियों के खुराफाती दिमाग की वहशी और पैसाकमाऊ उपज है. पादुका पूजन का उल्लेख या विधान किसी धर्मग्रंथ में नहीं है लेकिन क्षेत्रवार शिष्यों के बढ़ जाने से धर्मगुरुओं ने यह रिवाज फैलाया. वजह, हर जगह तो वे खुद जा नहीं सकते थे, इसलिए जूता नाम की गुल्लक भेजना शुरू कर दी.

दोतरफा ठगी का धंधा

गुरु तो गुरु, उस के जूते भी पैसा कमा सकते हैं. यह चमत्कार या बेवकूफी जो भी कह लें अपने देश में ही होना संभव है. इसे संभव बनाने वाले लोगों में धर्मगुरुओं ने हीनता इतनी कूटकूट कर प्रवचनों के जरिए भर दी है कि वे मानसिक तौर पर अपाहिज हो कर रह गए हैं. किसी आदमी के जूते थाल में सजा कर रखना, उन पर फूल चढ़ाना, दीपक जलाना, अगरबत्ती जलाना लोगों की घटिया मानसिकता ही बताते हैं.

देशभर में यह ‘जूतापूजन’ परंपरा बड़ी भव्यता से संपन्न होती है. करने वाले आस्थावान होते हैं. इसलिए उन की बुद्धि या विवेक तर्क को नहीं स्वीकारती कि यह न केवल ठगी का एक जरिया है बल्कि हास्यास्पद और वितृष्णा पैदा करने वाला कार्य भी है. गुरु को ईश्वर से भी बड़ा मानना या बताना दोतरफा ठगी का धंधा है. ईश्वर चूंकि अस्तित्वहीन है, किसी ने उसे देखा नहीं, इसलिए साक्षात गुरु में उसे देखने की मनोवृत्ति व्यक्तिपूजा फैला कर लोगों से उन का स्वाभिमान छीन रही है.

लोग गुरुओं का जूता पूज रहे हैं, उसे माथे से लगा रहे हैं. चूम रहे हैं. इस से ज्यादा शर्मनाक और तरस खाने काबिल बात शायद ही दूसरी हो. 40-50 रुपए के कीमत की पादुका गुरु के ब्रैंडनेम के मुताबिक हजारोंलाखों रुपए कमा कर दे देती है. देने वाले धन्य हो जाते हैं कि हम ने अपना धार्मिक उत्तरदायित्व निभाया. गुरुपूजन नहीं कर पाए तो क्या, गुरु का पादुका पूजन कर पापों से मुक्त हो गए. मानव योनि में पैदा होने से बड़ा पाप कोई नहीं, ऐसा गुरुजी कहते हैं मगर खुद किन पापों के चलते इस योनि में आए, यह नहीं बता पाते वे.

एक बड़े गुरु की कोई दर्जनभर पादुकाएं अलगअलग हिस्सों में पुजवा कर खासा पैसा इकट्ठा कर लेती हैं. इन पैसों के बारे में कोई सवाल करने की जुर्रत नहीं कर सकता कि यह कहां जाता है. जहां पैसों से पाप धोने अर्थात और पाप करने की छूट हो वहां यह सवाल कोई पूछेगा भी नहीं. इसलिए गुरुद्रोह और गुरुनिंदा नर्क भुगतने वाले अपराध बारबार बताए जाते हैं.

इसी माया से वातानुकूलित आश्रम बनते हैं. शानदार मठमंदिर बनते हैं. महंगी विदेशी कारें आती हैं और अहम बात, गुरु की ब्रैंडिंग होती है जिसे देख दूसरे लोग भी उसे गुरु बनाने को टूट पड़ते हैं. धर्मगुरुओं का पैसों के मामले में दोहरा चरित्र और मानदंड शायद ही लोग कभी सम?ा पाएं. वजह, अपने इर्दगिर्द इन लोगों ने वाकई एक भव्य मायाजाल फैला रखा है जिसे देख मामूली आदमी की आंखें चौंधिया जाती हैं और इसी ऐश्वर्य के स्वामी को वह ईश्वर मान बैठता है.

अब तो उन के पास बड़ेबड़े राजनेता भी आते हैं क्योंकि पूरी राजनीति ही धर्म पर टिकी है. भारतीय जनता पार्टी की खासीयत तो यही है कि वह इन पादुका पुजवाने वाले गुरुओं को असली मार्गदर्शक मानती है. दरअसल, इस ठगी की तह में चमत्कारों के ?ाठे और गढ़े हुए किस्सेकहानी होते हैं जिन का बड़े पैमाने पर लिखित और मौखिक प्रचार गुरु गिरोह के सदस्य करते हैं. किसी को गुरु सपने में आते हैं तो किसी को साक्षात दर्शन दे जाते हैं. किसी की विपत्ति हजारों किलोमीटर दूर अपने आश्रम में बैठे गुरु ने हर ली थी तो किसी को विपत्ति से आगाह किया था. धंधे में फायदा गुरुमंत्र से हुआ था तो नौकरी गुरुकृपा से बची थी. गुरुकृपा से संतान तो आदिकाल से होती चली आ रही है.

इस तरह का प्रायोजित प्रचार कइयों को विक्षिप्त बना कर मनोचिकित्सकों की शरण लेने पर मजबूर कर चुका है. अब इस दिमागी हालत को भी लोग आस्था की अति और गुरुकृपा बताएं तो हालात सुधरने की उम्मीद करना बेवकूफी होगी. हकीकत में पादुका पूजन जातिवाद बनाए रखने के लिए ऊंची जाति के धर्मगुरुओं की नई सांचे में ढली सोच है कि हमें शूद्र स्पर्श न कर पाएं. सामंतवाद की बू भी इस में से आती है. राजेरजवाड़ों के जमाने में छोटी जाति वाले दबंगों के जूते छू कर ही बगैर पिटे आगे बढ़ पाते थे. अब इस प्रथा का स्वरूप बदल गया है- जूते पूजो भी और उस का शुल्क भी दो.

इतना ही नहीं, बड़े पैमाने पर देखें तो पादुका पूजन चलतेफिरते व्यवसाय का रूप भी धारण कर चुके हैं. नामीगिरामी संतों, जिन में शिर्डी के साईंबाबा भी शामिल हैं, की पादुकाएं देशभर में घुमाई जाती हैं, जिस से खासी आमदनी होती है. अभी कुछ माह पहले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने 2 पीठों के शंकराचार्य के रामपुर में पहुंचने पर सपरिवार पादुका पूजन कर आशीर्वाद लिया और राज्य की समृद्धि का आश्वासन भी लिया. एक तरह से सरकार की डोर पादुकाओं में अर्पित करना ही है.

इसी तरह कुछ माह पहले मध्य प्रदेश के गृह मंत्री ताऊध्वज साहू ने शिवगंगा आश्रम में पहुंच कर भंडारे का प्रसाद लिया और शंकराचार्य का पादुका पूजन भी किया. गुरुपूर्णिमा के दिन पादुका पूजन की हर छात्र को पट्टी पढ़ाई जाती है और फिर दक्षिणा देने को भी कहा जाता है. बड़े भी यह करते हैं. उन्हें फिर मिठाई, नैवेद्य, वस्त्र, दक्षिणा भी दी जाती है. बावजूद इन बेहूदगियों के, देश अगर तरक्की कर रहा है तो उस के अपराधी उद्योगपति, वैज्ञानिक, सैनिक और निर्भीक आलोचक हैं जो यह सम?ाते हैं कि जूतापूजन जैसे रिवाज लोगों को मानसिक गुलामी से ज्यादा कुछ नहीं दे सकते.

कोर्ट पर भाजपाई कुदृष्टि

यह तो होना ही था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब न्यायपालिका पर प्रहार करना शुरू कर दिया है क्योंकि मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ के कुछ फैसले भारतीय जनता पार्टी के मनसूबों के खिलाफ हैं जिन में से सब से बड़ा इलैक्टोरल बौंड्स का है. प्रधानमंत्री को अब चिंता हो रही है कि सुप्रीम कोर्ट कहीं प्राइम मिनिस्टर केयर फंड को भी पब्लिक घोषित न कर दे और उस का हिसाबकिताब न मांग ले. मोदी सरकार की चिंता यह भी है कि वह जिस तरह जेल की धमकियों से विपक्षी पार्टियों के नेताओं को फोड़ रही है, वह सिलसिला कहीं बंद न हो जाए.

हरीश साल्वे एक जमाने में प्रतिष्ठित वकील माने जाते थे और अपनी तीव्र बुद्धि व तार्किक सोच के कारण नागरिक अधिकारों के रक्षक माने जाते थे, आजकल भाजपा के पहरेदार बने हुए हैं और गुजराती धर्म निभाते हुए सरकार के हर गलत फैसले पर कानूनी मोहर लगाने की कोशिश कर रहे हैं. उन की अगुआई में न्यायपालिका को गलत मोड़ देने की मुहिम चालू की गई है जिसे नरेंद्र मोदी का पूरा समर्थन है.

इलैक्टोरल बौंड्स ने राम मंदिर निर्माण की पूरी उपलब्धि को उसी तरह धूल में मिला दिया है जैसे 1992 में कारसेवकों ने अयोध्या में बाबरी मसजिद को धूल में मिला दिया था. चुनावी माहौल में सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला विपक्ष के हाथों में गांडीव और सुदर्शन चक्र की तरह का सा है और विपक्ष महाभारत के पांडवों की तरह कौरवों के सामने खड़ा हो सका है. यह गांडीव, सुदर्शन चक्र, इंद्र के दिए कर्ण के अस्त्र सब ‘इंडिया’ गठबंधन को सुप्रीम कोर्ट की कृपा से मिले हैं और उस से सत्ता का नाराज होना स्वाभाविक ही है. इस महाभारत में पितामह भीष्म और धृतराष्ट्र के पुत्र जीतेंगे, यह स्पष्ट सा है.

इंडिया ब्लौक के अर्जुन अभी संशय में हैं कि युद्ध लड़ा जाए या नहीं क्योंकि दूसरी तरफ की सेना से इंडिया ब्लौक छोड़ कर गए नेता ही खड़े हैं. पांडवों के गुरु, भाई, सखे दूसरी तरफ हैं. कौरवों के आड़े तो सुप्रीम कोर्ट आ रही है. उसे निष्क्रिय करने के लिए अब जपतप शुरू हो गए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने न केवल इलैक्टोरल बौंड्स के मामले में रिश्वतखोरी का परदाफाश किया, बल्कि  कई फैसलों में सरकार के पक्ष की नहीं सुनी है. ऐसे में सत्ताधारी पार्टी और पूरी सरकार यह महसूस कर रही है कि उन्हें अपने हित के लिए अब माहौल बनाना जरूरी हो गया है कि सुप्रीम कोर्ट को उसी तरह काबू में लाया जाए जैसे मीडिया, संचार साधनों, धनसंपत्ति पर नियंत्रण कर लेने के साथ परिवारों की अपनी जिंदगी में सरकारी दखल को भी अंजाम दिया जा चुका है, कुछ रेडों (छापों) की मारफत, कुछ पुजारियों की मारफत तो कुछ टैक्सों की मारफत. सरकार चाहती है कि सुप्रीम कोर्ट रूसी, पाकिस्तानी, ईरानी कोर्टों की तरह हो जाए और वह आकाओं की सुने.

वैसे भी, कोर्टों में बहुत से जज भाजपा जैसी पौराणिक सोच वाले हैं. कोलकाता हाईकोर्ट के एक जज का त्यागपत्र दे कर भाजपा टिकट पर चुनाव लड़ना यह बात साफ करता भी है. इस से पहले पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, जिन्होंने राम मंदिर का फैसला दिया था, का राज्यसभा में पहुंचना भी तो यही दर्शाता है. सरकार की हां में हां मिलाने वाली न्यायपालिका चाहिए. वह यह हां में हां अपनी पौराणिक भक्ति के कारण दिखाए या सरकार के डर से, इस से फर्क नहीं पड़ता.

मन और दिमाग अव्यवस्था का शिकार होने लगा है, क्या करूं?

सवाल 

मन और दिमाग अव्यवस्था का शिकार होने लगा है, क्या करूं?

जवाब

मैं 38 वर्षीया गृहिणी हूं. घर की पूरी जिम्मेदारी मेरी है. पति जौब पर सुबह चले जाते हैं तो रात 9 बजे तक वापस घर लौटते हैं. बच्चे कालेज में पढ़ते हैं. सब का अपनाअपना रूटीन है. मैं सब के हिसाब से चलती हूं. घर का हिसाबकिताब, लेनादेना, रिश्तेदारी, अड़ोसपड़ोस, सब का खयाल रखना मेरी जिम्मेदारी है. कभीकभी तो ऐसा लगता है जैसे मैं कोई मशीन हूं जिस में सब बातें फीड हो रही हैं. दिमाग लगता है जैसे सब बातों से भर गया है. आजकल तो कुछ ज्यादा ही महसूस कर रही हूं. कैसे मैं अपना दिमाग शांत करूं, कुछ सम?ा नहीं आ रहा?

दिमाग को व्यवस्थित करने के लिए उसे डीक्लटर करना जरूरी है. आप घरगृहस्थी के कामों में बुरी तरह से फंसी हुई हैं. कई तरह की समस्याओं का सामना अकेली कर रही हैं. अकसर गृहिणी को यह सुनने को मिलता है कि घर में तो रहती हो, सारा दिन काम ही क्या है तुम्हारे पास. लेकिन कहने वाले नहीं जानते कि गृहिणी होममेकर होती है. इस के बलबूते पर घर के बाकी सदस्य बेफिक्र हो कर बाहर काम करते हैं.

खैर, बात करते हैं आप के मन को डीक्लटर करने की तो सब से पहले साउंडस्लीप को प्राथमिकता दें. मैंटल हैल्थ को मजबूती प्रदान करने के लिए नींद जरूरी है. पर्याप्त नींद नहीं मिलती तो इस से सोचनेसम?ाने की शक्ति प्रभावित होती है. आप का दिमाग कई सारी बातों से भरा हुआ है तो आप निश्चित रूप से तनाव में रहती होंगी. तनावमुक्त होने के लिए ऐक्सरसाइज शुरू करें. आप शांत और सहज होती जाएंगी. आप के पास एक लंबी टू-डू लिस्ट होगी लेकिन यह आप को सोचना है कि पहले कौन सा काम करना है. आप देखेंगी कि जैसे ही आप प्रायोरिटी के अनुरूप काम करना शुरू करती हैं, आप का दिमाग डीक्लटर होना शुरू हो जाता है.

कई बार हम खुद को बैस्ट साबित करने के लिए अपने ऊपर कई तरह के काम लाद लेते हैं. यह मल्टीटास्ंिकग हमारे दिमाग को प्रभावित करने लगती है, इसलिए कई काम करने के बजाय एक काम पर ध्यान केंद्रित करें. इन सब बातों को अपनाएं. आप अपने में काफी बदलाव महसूस करेंगी.

बिग डील : बलात्कारी दोस्त को माफ करती आत्मविश्वास से भरी युवती की कहानी

सोशल नैटवर्किंग साइट पर मोहना अपनी सगाई के कुछ फोटो अपलोड कर के हटी ही थी कि उस के स्मार्टफोन में नए मैसेज की टोन गूंज उठी. सभी मित्र तथा सहकर्मी उसे बधाई दे रहे थे. मुसकराती हुई वह सभी मैसेज पढ़ रही थी कि एक नाम पढ़ते ही उस के फैले अधर सिकुड़ गए, मुसकराते चेहरे पर त्योरियां चढ़ गईं और खुशमिजाज मूड बिगड़ गया. फिर भी उस ने बधाई का उत्तर दिया, ‘धन्यवाद गोपाल, मुझे तुम से यही उम्मीद थी.’

एक बार को दिल किया कि गोपाल को अपनी फ्रैंडलिस्ट से निकाल दे लेकिन रुक गई. पिछले 3 वर्षों में गोपाल ने कोई ऐसी हरकत नहीं की थी. आज भी अन्य मित्रों की भांति बधाई दी है. फिर मोहना आज के जमाने की बोल्ड युवती है, खुले विचारों वाली, दकियानूसी विचारधारा से परे. 3 साल पहले हुई एक दुर्घटना उस का मनोबल कैसे तोड़ सकती है. लैपटौप बंद कर वह रसोई में अपने लिए एक कप कौफी बनाने चल दी. दूध के उबाल के साथसाथ उस के विचारों में भी ऊफान आने लगा और एक झटके में पुराने दिनों में पहुंच गई.

स्नातकोत्तर के लिए कालेज में प्रवेश के साथ ही मोहना की मित्रता गोपाल से हुई थी. दोनों का विषय एक था. कुछ ही अरसे की दोस्ती ने गोपाल को एक सुंदर, सुनहरे भविष्य के सपने दिखाने शुरू कर दिए. वह अकसर बात करता, ‘मोहना, जब हम अपना घर लेंगे तो उस में…’

मोहना बीच में ही बात काट देती, ‘अपना घर? हम एक घर क्यों लेंगे?’ गोपाल शरमा कर हंस देता और मोहना सिर झटक कर हंस देती. ‘जब मैं ने मोहना के आगे शादी का प्रस्ताव ही नहीं रखा तो वह क्यों मेरे इशारों को समझेगी. जब मैं प्रपोज करूंगा तभी तो मोहना भी मेरे प्रति अपना प्यार स्वीकारेगी,’ सोचता हुआ गोपाल एक सही समय की प्रतीक्षा कर रहा था.

कालेज के अंतिम वर्ष में प्लेसमैंट सैल द्वारा लगभग सभी की जौब लग गई. मोहना व गोपाल को भी अपनी पसंदीदा कंपनियों में अच्छे पैकेज वाली नौकरियां मिल गईं. किंतु एक को दिल्ली में तो दूसरे को हैदराबाद में नौकरी मिली. गोपाल इस से काफी उदास हो उठा.

‘अरे, हम टच में रहेंगे न, इतना क्यों उदास होते हो?’

‘मैं ने कल शाम. तुम्हारे लिए एक पार्टी रखी है, मोहना, आओगी न?’ गोपाल ने उदासी का चोला उतार पहले जैसी मुसकान ओढ़ ली.

‘बिलकुल आऊंगी. मेरे लिए पार्टी हो और मैं न आऊं?’ मोहना पार्टी का नाम सुन कर खुश थी. अगली शाम जब मोहना तैयार हो निर्धारित जगह पर पहुंची तो अपने ज्यादातर मित्रों को उस पार्टी में पा कर बोली, ‘‘अरे वाह, यहां तो सभी हैं.’’ ‘क्योंकि ये आम पार्टी नहीं, आज यहां कुछ खास होने वाला है. कुछ ऐसा जिसे तुम सारी उम्र नहीं भूलोगी,’ कहते हुए गोपाल के इशारे पर सारा वातावरण मधुर संगीत से गूंज उठा. आसपास खड़े मित्र, मोहना और गोपाल पर गुलाब की पंखुडि़यां बरसाने लगे.

मोहना आश्चर्यचकित थी पर साथ ही इतने मनमोहक माहौल में उस की मुसकान थमने का नाम नहीं ले रही थी. तभी गोपाल ने जेब से एक सुंदर सी डब्बी निकाली और खोल कर मोहना के समक्ष बढ़ा दी. उस डब्बी में एक खूबसूरत अंगूठी थी, ‘क्या तुम मेरी जीवनसंगीनी बनोगी, मोहना?’ मोहना की हंसी अचानक काफूर हो गई. उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह क्या हो रहा है, जिसे वह अपनी नौकरी मिलने की खुशी की पार्टी समझ रही थी वह तो दरअसल गोपाल ने उसे प्रपोज करने हेतु रखी थी. वह भी सब के सामने. इस अप्रत्याशित प्रस्ताव के लिए वह कतई तैयार नहीं थी. पहली बात उस ने अभी शादी करने के बारे में सोचा भी न था. गोपाल को उस ने कभी इस नजर से देखा भी नहीं था. वह तो उसे सिर्फ एक दोस्त मानती थी.

‘ओह गोपाल. एक बार मुझ से पूछ तो लेते. यों अचानक सब के सामने… देखो, मैं तुम्हारा दिल नहीं दुखाना चाहती पर मैं अभी शादी नहीं करना चाहती. मैं तुम से प्यार भी नहीं करती. प्लीज, बात समझने की कोशिश करो,’ मोहना अचकचा गई थी, वह गोपाल को किसी भी गलतफहमी में नहीं रखना चाहती थी. उस के इतना कहते ही पार्टी में हलचल मच गई. चारों ओर खुसफुसाहट सुनाई देने लगी. गोपाल को अपनी बेइज्जती महसूस हुई. सब मित्र अपनेअपने घर रवाना हो गए. मोहना भी चुपचाप चली गई. कुछ दिन बाद मोहना हैदराबाद चली गई और वहां नई नौकरी जौइन कर ली. उस शाम से आज तक उस ने गोपाल से कोई बातचीत नहीं की थी. नए शहर और नई नौकरी में मोहना खुश थी. मोहना को इस औफिस में अभी एक हफ्ता ही हुआ था कि एक सुबह अचानक औफिस में प्रवेश करते समय उस ने गोपाल को रिसैप्शन पर खड़ा पाया.

‘अरे, गोपाल तुम?’

‘हां, किसी काम से हैदाराबाद आया था. सोचा, तुम से भी मिलता चलूं. तुम्हारी कंपनी का नामपता तो मालूम ही था.’

‘अच्छा किया. कैसे हो? कहां ठहरे हो और कब तक?’

‘होटल मयूर में रुका हूं. यदि शाम को तुम फ्री हो तो आ जाओ, एक कप कौफी पीएंगे साथ में और गपशप करेंगे दोनों.’ गोपाल के इस प्रस्ताव पर मोहना झिझकी.

‘हां, मैं आऊंगी,’ मोहना ने झिझकते हुए कहा. शाम को मोहना होटल मयूर पहुंची. वहीं के रेस्तरां में दोनों ने कौफी पी. कुछ हलका सा खाया ही था कि गोपाल ने पेटदर्द की शिकायत की, ‘मेरी तबीयत ठीक नहीं लग रही है, मोहना. मैं अब कमरे में जाना चाहता हूं.’ मोहना गोपाल को छोड़ने उस के कमरे तक गई, ‘कोई दवा है तुम्हारे पास या मैं जा कर ले आऊं?’ ‘मेरी दवा तुम हो, मोहना,’ कहते हुए गोपाल ने अचानक कमरे का दरवाजा बंद कर दिया और मोहना को घसीट कर बिस्तर पर गिरा दिया. ‘यह क्या कर रहे हो, गोपाल? क्या पागल हो गए हो? मैं तुम्हें साफतौर से बता चुकी हूं कि मैं तुम्हें नहीं चाहती. फिर भी तुम…’

गोपाल अपनी सुधबुध खो चुका था. मोहना की बातों का, उस की चीखों का उस पर कोई असर नहीं हुआ. उस पर तो जैसे फुतूर सवार हो गया था. वह मोहना पर टूट पड़ा और उस की अस्मिता भंग करने के पश्चात ही सांस ली. मोहना का रोरो कर बुरा हाल था. एक पुराने दोस्त के हाथों इतना बड़ा धोखा. उस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि गोपाल उसे इतना आहत कर सकता है. शारीरिक वेदना से अधिक वह रोष अनुभव कर रही थी. मना करने के बावजूद उस के अपने मित्र ने उस के साथ छल किया. मोहना का दिल कसमसा उठा. रात काफी हो चुकी थी. मोहना अपने संताप को स्वीकार चुकी थी. गोपाल चुपचाप एक तरफ बैठा था. अचानक गोपाल उठ खड़ा हुआ और कमरे की एकमात्र अलमारी से फिर वही अंगूठी वाली डब्बी निकाल लाया और बोला, ‘अब तो मान जाओ, मोहना,’ और वही अंगूठी मोहना की ओर बढ़ा दी.

‘ओह, तो तुम ने ये सब इसलिए किया ताकि मैं कहीं और, किसी और के पास जाने लायक न रहूं? मुझे तरस आता है, गोपाल, तुम्हारी संकुचित सोच पर. ऐसी हरकत कर के तुम किसी लड़की को जबरदस्ती पा तो सकते हो, लेकिन उस का दिल कभी नहीं जीत सकते, उस के अंतर्मन में अपने लिए इज्जत कभी नहीं बना सकते. मैं आज के जमाने की लड़की हूं. मेरे लिए मेरे सभी अंग महत्त्वपूर्ण हैं. किसी एक अंग को भंग कर के तुम मेरा आत्मविश्वास नहीं खत्म कर सकते. ‘यदि तुम्हारी एक उंगली कट जाए तो क्या तुम जीना छोड़ दोगे? नहीं ना? वैसे ही इस घटना को मैं अपने मनमस्तिष्क पर हावी नहीं होने दूंगी. तुम ने मेरे साथ जबरदस्ती की, इस का पछतावा तुम्हें होना चाहिए, मुझे नहीं. मेरा मन साफ है. ‘मेरे मन में तुम्हारे लिए कभी भी प्यार नहीं था और अब तो बिलकुल नहीं पनप सकता. मैं यहीं बैठी हूं. चाहो तो ऐसी हरकत फिर कर लो. मगर बारबार आहत कर के भी तुम मुझे नहीं पा सकते,’ कहते हुए मोहना उठी और अपने कपड़े, पर्स संभालते हुए कमरे से बाहर निकल गई. गोपाल भोर तक वहीं उसी मुद्रा में बैठा रहा. यह क्या कर दिया था उस ने? जिस को इतना चाहता था उसे ही इतनी पीड़ा पहुंचाई उस ने. मोहना द्वारा कही बातें उस के कानों में गूंज रही थीं.

‘अब तो कभी उस की शक्ल तक देखना पसंद नहीं करेगी मोहना?’ उस ने सोचा. अगले दिन पूरी हिम्मत जुटा कर गोपाल फिर मोहना के औफिस पहुंच गया. किंतु आज मोहना औफिस नहीं आई थी. वहां से उस के घर का पता ले, वह उस के घर जा पहुंचा. दरवाजे पर गोपाल को खड़ा देख मोहना ने उसे एक चांटा जड़ दिया. गोपाल फिर भी सिर झुकाए चुपचाप खड़ा रहा, हाथ जुड़े थे, मुख ग्लानि की स्याही से मलिन था. ‘मुझे माफ कर दो, मोहना. मैं पागल हो गया था. तुम्हें पा लेने के जनून में मैं ने अपना विवेक खो दिया था. प्लीज, मुझे माफ कर दो, मोहना,’ गोपाल गिड़गिड़ा रहा था.

मोहना एक आत्मविश्वासी, समझदार युवती थी. वह जानती थी कि किस चीज को कितनी अहमियत देनी है. गोपाल से उस की दोस्ती 3 साल पुरानी थी और इस समयाकाल में गोपाल ने उस का सिर्फ हित सोचा था. आज उस से एक भूल अवश्य हो गई थी लेकिन उस के पीछे भी उस की मनशा गलत नहीं थी. यह उस की मूर्खता थी. मोहना ने एक शर्त पर गोपाल को माफ कर दिया कि अब जब तक वह नहीं चाहेगी, दोनों एकदूसरे से मिलेंगे भी नहीं. गोपाल ने भी शर्त मान ली थी. ‘गोपाल, तुम्हारे मन में मेरे लिए जो भी भावना रही, उसे मैं विनिमय नहीं कर सकती और यह बात तुम्हें सहर्ष स्वीकारनी चाहिए. इसी में तुम्हारा बड़प्पन है,’ मोहना ने गोपाल को विदा किया. कौफी बन चुकी थी. हाथ में कौफी का मग लिए मोहना टीवी देखने बैठ गई. अपनी शादी पर पूरे 3 वर्ष पश्चात वह गोपाल से मिलेगी. गोपाल ने कहा था कि उस की शादी में अपनी गर्लफ्रैंड को भी लाएगा.

World Liver Day 2024 : क्या आपको पता है लिवर से जुड़ी ये जरूरी बातें

शरीर के सब से महत्त्वपूर्ण अंगों में शुमार होता है लिवर. यह शरीर का सब से बड़ा भीतरी अंग है जो स्वस्थ शरीर के अस्तित्व के लिए जरूरी कई रासायनिक क्रियाओं के लिए जिम्मेदार है. लिवर एक ग्रंथि भी है क्योंकि यह ऐसे रसायनों का स्राव भी करता है जिस का इस्तेमाल शरीर के अन्य अंग करते हैं. अपने अलगअलग तरह के कार्यों के कारण यह एक अंग और ग्रंथि दोनों में शुमार होता है. यह शरीर के सामान्य ढंग से काम करने के लिए जरूरी रसायनों का निर्माण करता है. यह शरीर में बनने वाले तत्त्वों को छोटेछोटे हिस्सों में तोड़ता है और जहरीले तत्त्वों को खत्म करता है. साथ ही, यह स्टोरेज यूनिट की तरह भी काम करता है.

हेप्टोसाइट्स (हेपट-लिवर+ साइट-सेल) शरीर में कई प्रकार के  प्रोटीन के  निर्माण के लिए जिम्मेदार होते हैं जिन की अलगअलग कार्यों के लिए जरूरत होती है. इन में ब्लड क्लौटिंग और एल्बुमिन शामिल हैं जिन की सर्कुलेशन सिस्टम  के भीतर फ्लुइड बनाए रखने के लिए जरूरत होती है. लिवर कोलैस्ट्रौल और ट्रिग्लीसेराइड्स बनाने के लिए जिम्मेदार होते हैं. कार्बोहाइड्रेट्स का निर्माण भी लिवर में होता है और यह अंग ग्लूकोज को ग्लूकोजेन में बदलने के लिए जिम्मेदार है जिन्हें लिवर में और मांसपेशियों की कोशिकाओं में स्टोर किया जा सकता है.

लिवर बाइल भी बनाता है जो खाना पचाने में मदद करते हैं. लिवर शरीर में उपापचयी प्रक्रिया के सहउत्पाद अमोनिया को यूरिया में बदल कर शरीर को जहरीले तत्त्वों से मुक्त करने में अहम भूमिका निभाता है जिसे किडनी द्वारा पेशाब मार्ग से शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है. यह अल्कोहल समेत दवाओं को भी तोड़ता है और यह शरीर में इंसुलिन व दूसरे हार्मोंस को तोड़ने के लिए भी जिम्मेदार होता है.

लिवर की सामान्य बीमारियां

जीवनशैली और खानपान की आदतों में होने वाले बदलावों के कारण आज जिस अंग पर सब से अधिक प्रभाव पड़ा है वह है लिवर. लिवर को नुकसान पहुंचाने वाले कारकों में विषाणु, नुकसानदायक भोजन और अल्कोहल का इस्तेमाल भी हो सकता है. हेपेटाइटिस ए, बी और सी जैसे विषाणु लिवर को नुकसान पहुंचा सकते हैं.

आज अल्कोहालिक पेय का अत्यधिक कोलैस्ट्रौल वाले जंक फूड के साथ उपभोग किया जाना एक नित्य जीवनशैली सी बन गया है, यह भी लिवर की बीमारियों का एक प्रमुख कारण है. इस से बीएमआई यानी बौडी मास इंडैक्स का स्तर बढ़ जाता है जो टाइप 2 डायबिटीज के बढ़ते जोखिम से संबंधित है और जो लिवर की गंभीर बीमारी से भी संबंधित है. अत्यधिक बीएमआई के बढ़ते जोखिम की वजह से जीवन के  बाद के हिस्से में गंभीर लिवर बीमारी होने का खतरा कम उम्र से ही बना रहता है. लगातार अधिक वजन बने रहने और मोटापे ने भी दुनियाभर में लिवर की बीमारियों को बढ़ाने में भूमिका निभाई है.

लिवर को नुकसान पहुंचाने वाला एक अन्य कारक मोटापा है. मोटापा आज के समय में दुनियाभर की समस्या है और विकासशील देशों में भी वयस्कों एवं बच्चों दोनों में मोटापे की समस्या की वजह से यह एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बन गया है. उपलब्ध अध्ययनों से मोटापे से विभिन्न प्रकार के कैंसर पैदा होने की जानकारी मिली है. खासतौर पर मोटापे और लिवर कैंसर के बीच मजबूत संबंध है. इस के अलावा नौन अल्कोहालिक फैटी लिवर डिजीज (एनएएफएलडी) और अधिक गंभीर नौन अल्कोहालिक स्टियोहैपेटाइटिस (एनएएसएच) जैसी अन्य बीमारियों का भी खतरा है. एनएएसएच को लिवर के चरबीदार होने और जलन होने से पहचाना जाता है और माना जाता है कि इस से फाइब्रोसिस और सिरौसिस भी हो सकता है. सिरौसिस को लिवर कैंसर के जोखिम के कारण के तौर पर जाना जा सकता है. दरअसल, अधिक लोगों के मोटापे से पीडि़त होने की वजह से यह हेपेटाइटिस विषाणु की वजह से होने वाले संक्रमण के मुकाबले हैप्टोसैल्यूलर कार्सिनोमा की अहम वजह हो सकता है.

अत्यधिक मात्रा में अल्कोहल का इस्तेमाल करने की वजह से लिवर को गंभीर नुकसान हो सकता है. जब कोई व्यक्ति अत्यधिक मात्रा में अल्कोहल का इस्तेमाल करता है तो लिवर के सामान्य कामकाज में बाधा पैदा होती है. जिस से शरीर में रासायनिक असंतुलन हो सकता है. लिवर की कोशिकाएं बरबाद हो सकती हैं.

लिवर कैंसर के लक्षण

लिवर कैंसर के लक्षण प्रत्येक व्यक्ति में अलगअलग होते हैं और इन में से कोई लक्षण दूसरे लक्षण की वजह से हो सकता है.

–       वजन में कमी.

–       बुखार आना.

–       पेट में सूजन.

–       उबकाई और उलटी होना.

–       भूख में कमी या थोड़ा खाना खाने के बाद ही पेट भरा महसूस होना.

–       सामान्य कमजोरी लगातार थकान बनी रहना.

–       दायीं तरफ पेट के ऊपरी हिस्से में या दाएं कंधे में होना वाला दर्द.

–       लिवर का बड़ा आकार (हैप्टोमीगली) पसलियों के नीचे दायीं तरफ एक बनावट की तरह महसूस होता है.

–       स्प्लीन का बड़ा आकार पसलियों के नीचे बायीं तरफ एक बनावट की तरह महसूस होता है.

–       पीलिया जो त्वचा व आंखों में पीलेपन के तौर पर दिखाई देता है. पीलिया तब होता है जब लिवर अच्छी तरह काम नहीं करता है.

चिकित्सकीय प्रौद्योगिकी के आधुनिकीकरण के साथ गंभीररूप से खराब हो चुके लिवर वाले मरीज लिवर प्रत्यारोपण का विकल्प चुन सकते हैं. उन के लिए इस की आधारभूत प्रक्रिया को समझना जरूरी है. देखभाल करने के लिहाज से लिवर सरल अंग है लेकिन उसे वह महत्त्व नहीं मिलता जिस का वह हकदार है. अपने विभिन्न प्रकार के कार्यों की वजह से इस पर विषाणुओं, जहरीले पदार्थों, खाने और पानी में मौजूद मिलावट व बीमारियों का असर पड़ता है. लेकिन यह परेशानी में होने के बाद भी शिकायत करने के लिहाज से सुस्त होता है क्योंकि यह शरीर का एक मजबूत और सख्त हिस्सा है. अकसर लिवर की समस्याओं से पीडि़त लोगों को किसी गड़बड़ी का पता नहीं चलता क्योंकि उन्हें कुछ या न के बराबर ही लक्षण देखने को मिलते हैं.

हालांकि लिवर की बीमारियों के उपचार का महत्त्वपूर्ण आधुनिकीकरण तरीका उपलब्ध है लेकिन संपूर्ण सामाधन नहीं है. इसलिए लिवर को नुकसान से बचाने के लिसेहतमंद जीवनशैली अपनानी बेहद महत्त्वपूर्ण है और लिवर की बीमारियां पैदा करने वाले विषाणुओं के खिलाफ जरूरी टीके लेने जरूरी हैं.

(लेखक गुरुग्राम स्थित फोर्टिस मैमोरियल रिसर्च इंस्टिट्यूट के निदेशक हैं.)

बड़े काम के हैं मैरिज मैनेजमैंट के ये 5 नियम

किसी कंपनी को चलाना किसी मैरिज को मैनेज करने जैसा ही हो सकता है. सुनने में यह अजीब बात लग सकती है. पर गौर करें तो दोनों में ही कहीं एक समानता नजर आएगी. तो फिर वैवाहिक जिंदगी को अपने बिजनैस या प्रोफैशनल लाइफ की तरह मैनेज करने में बुराई ही क्या है?

जैसे आप किसी बिजनैस को चलाने के लिए बजट बनाते हैं, लोगों को काम सौंपते हैं, उन्हें समयसमय पर प्रोत्साहित करते हैं, रिवार्ड देते हैं. ठीक वैसे ही वैवाहिक जीवन में भी बजट बनाना पड़ता है, एकदूसरे को काम सौंपे जाते हैं, जिम्मेदारियां बांटी जाती हैं, साथी को प्रोत्साहित किया जाता है, उसे समयसमय पर गिफ्ट दे कर अपने प्यार का इजहार कर यह जताया जाता है कि वह उस के जीवन में कितना महत्त्वपूर्ण है.

ग्रोइंग बिजनैस की तरह समझें

कोई भी अपने वैवाहिक जीवन की तुलना बिजनैस के साथ करना पसंद नहीं करता है. ऐसा करने से रिश्ते से रोमांस खत्म होता लगता है. पर विवाह में भी अपेक्षाएं और सीमाएं वैसी ही होती हैं जैसी कि किसी कंपनी में. आर्थिक जिम्मेदारियां, स्वास्थ्य संबंधी फायदे और प्रौफिट मार्जिन विवाहित संबंध में भी देखे जा सकते हैं. अगर हम अपने रिश्ते को एक ग्रोइंग बिजनैस की तरह देखते हैं, जिस में भविष्य की योजनाएं होती हैं, तब हमारा विवाह भी ग्रो कर सकता है.

हमें भावनात्मक संसाधनों को निर्मित

करने, वित्तीय स्थिरता को बढ़ाने और अनापेक्षित स्थितियों का सामना करने के लिए वैकल्पिक योजनाएं बनाने के लिए समय की आवश्यकता होती है. यही बात बिजनैस पर भी लागू होती है, जिस में सही तरह से बनाई गई योजनाएं ही लक्ष्य तक पहुंचाने में मदद करती हैं.

पार्टनरशिप डील है

अगर सीधे शब्दों में कहें तो मैरिज को एक प्रकार की पार्टनरशिप ही मानें जिसे आप सफल बनाना चाहती हैं. मैरिज काउंसलर दिव्या राणा का कहना है कि लक्ष्य बनाएं और एक टीम की तरह उसे पूरा करने के लिए सहमत हों. याद रखें कि सब से सफल पार्टनरशिप प्रत्येक पार्टनर की बेहतरीन व अनोखी विशेषताओं का उपयोग करती है. आप में से कोई फाइनैंस संभालने में ऐक्सपर्ट हो सकता है तो दूसरा प्लानिंग में. आप को एकदूसरे की इन विशेषताओं का वैसे ही सम्मान करना चाहिए जैसे कि बिजनैस पार्टनर आपस में करते हैं.

मनोवैज्ञानिक अनुराधा सिंह मानती हैं कि अपनी शादी को एक प्राइवेट कंपनी की तरह अच्छे कम्यूनिकेशन के साथ चलाना और उसे सफल बनाने की इच्छा रखना बहुत माने रखता है. एक अच्छा बिजनैसमैन अपने कर्मचारी को सम्मान देता है और उस का खयाल रखता है, इसी वजह से कर्मचारी उस का सम्मान करते हैं और उम्मीद से ज्यादा काम करते हैं.

इस वजह से बिजनैस सुगमता और व्यवस्थित ढंग से चलने के साथसाथ लाभ भी देता है. इसी तरह जब हम अपने साथी का सम्मान करते है, उस की हर छोटीबड़ी बात की परवाह करते हैं, हमें उन से बदले में कहीं अधिक मिलता है, कई बार उम्मीद से ज्यादा.

बिजनैस के साथ प्लैजर को भी मिक्स करें. बिजनैस को भी ऐंजौय करें और मैरिज को भी. इस से संतुलन बने रहने के साथसाथ जोश और उत्साह भी बना रहेगा जो निरंतर आगे बढ़ते रहने को प्रोत्साहित करेगा. विवाह अगर नीरस बन जाए तो जीवन की गाड़ी खींचना बोझ लगने लगता है, तो फिर दायित्वों के साथ थोड़ा प्लैजर भी क्यों न मिक्स कर लिया जाए?

वर्क ऐथिक्स हैं जरूरी

चाहे बिजनैस हो या मैरिज दोनों ही वर्क ऐथिक्स पर चलते हैं. दोनों में ही निवेश करना पड़ता है. जिस तरह से आप अपने पोर्टफोलियो को मैनेज करते हैं, उसी तरह मैरिज में भी आप को अपने संबंधों के पोर्टफोलियो को मैनेज और अपडेट करते रहना पड़ता है.

अगर आप अपने मनपसंद प्रोफैशन में सफल होने के लिए कड़ी मेहनत कर सकते हैं तो क्या वही वर्क ऐथिक्स आप की मैरिज पर लागू नहीं होते? बात आश्चर्यजनक लग सकती है पर अपने कैरयर में आप ने जो सफलता व निपुणता हासिल की है, उसे ही मैरिज में ट्रांसफर कर दीजिए. फिर उसी तरह से एक मजबूत परिवार निर्मित कर पाएंगे जैसे कि आप ने अपनी कंपनी खड़ी की है.

ईगो को रखें दूर

मैरिज हो या बिजनैस, दोनों में ही अगर ईगो फैक्टर सिर उठाने लगे तो बिजनैस चौपट हो जाता है और मैरिज में टकराव या अलगाव झेलना पड़ जाता है. इसीलिए माना जाता है कि एक सही तरह से चलने वाला बिजनैस एक सही ढंग से चल रही शादी के समान है. दोनों ही अपनेअपने खिलाडि़यों के ईगो को बढ़ने नहीं देते.

ईगो वह संवेग है, जो युगल को अपने स्वार्थ से बाहर आने और एकदूसरे के प्रति पूर्ण समर्पित होने से रोकता है, चाहे युगल एकदूसरे को बहुत ज्यादा प्यार व सम्मान देने की चाह ही क्यों न रखते हों. इसी तरह बिजनैस के फेल होने का मुख्य कारण ईगो ही होता है, क्योंकि मालिक को वह अपने मातहतों के साथ सही ढंग से पेश आने या उन की परेशानियों को समझने से रोकता है.

कमिटमैंट है जरूरी

विवाह हो या बिजनैस दोनों ही जगह सहयोग अपेक्षित है. दोनों ही जगह अगर समझौते की स्थिति न हो तो असफलता हाथ लगते देर नहीं लगती है. समझौते के साथसाथ कम्यूनिकेशन एक ऐसा आधार है, जो दोनों को ही सफल बनाता है.

एकदूसरे को बदलने की कोशिश करने के बजाय दोनों को अपने को सुधारने पर काम करने को तैयार रहना चाहिए. कम्युनिकेशन के साथसाथ कमिटमैंट भी एक आवश्यक तत्त्व है शादी को निभाने के लिए वैसे ही जैसे वह बिजनैस को चलाने के लिए आवश्यक होता है. जहां कमिटमैंट नहीं वहां युगल में न विश्वास होगा न समर्पण की भावना और न ही जिम्मेदारी का भाव.

इसी तरह अगर बिजनैस में कमिटमैंट न हो तो बौस उस के प्रति न तो चिंतित रहेगा न ही उसे सुधारने के लिए मेहनत करेगा. ऐसी स्थिति में बिजनैस लंबे समय तक कायम नहीं रह पाएगा. वैसे ही शादी भी इस के अभाव में एक जगह पर आ कर ठहर जाएगी और पतिपत्नी दोनों के लिए एकदूसरे का साथ किसी सजा से कम नहीं होगा.

VIDEO : हाउ टू फिल इन आई ब्रोज यूसिंग पेंसिल, पाउडर एंड क्रीम
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