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हिंदी फिल्मों में चरित्र के अनुसार वजन बढ़ाना और घटाने का राज क्या होता है, आइए जानें

कैरेक्टर की डिमांड और ऐक्टिंग को जीवंत रूप देने के लिए सालों से हौलीवुड और बौलीवुड के कलाकर अपने वज़न, चालढ़ाल और रूप आदि में तेजी से परिवर्तन करते रहे हैं. चरित्र की मांग के हिसाब से अपने वजन में तेजी से बदलाव लाना उन के लिए एक जुनून होता है. उन्हें देख कर आम दर्शक भी इसे करने की कोशिश करते हैं, हालांकि इस में कोई संदेह नहीं कि वजन को बढ़ाना और घटाना एक नियमित दायरे में होने से किसी प्रकार का कोई फर्क शरीर पर नहीं पड़ता, लेकिन बिना प्रोपर गाइडेंस के कुछ भी करना शरीर के लिए सही नहीं होता.

आज भी ऐसा देखा जाता है कि जब फसल की कटाई होती है, तो किसान और उस के परिवार तंदुरुस्त हो जाते हैं और ये उन के शरीर के लिए नुकसानदायक नहीं होता, अर्थात सही समय पर सही भोजन और काम हर किसी के लिए फायदेमंद होता है.

वजन बढ़ाना था जरूरी

पिछले दिनों रिलीज हुई फिल्म ‘अमर सिंह चमकीला’ में परिणीति ने चमकीला की पत्नी अमरजोत कौर की भूमिका निभाई. उन की इस अदाकारी को सराहा भी जा रहा है. उन्होंने इस फिल्म के लिए 15 किलो वजन बढ़ाया है. उन्होंने एक जगह कहा है कि इस फिल्म के लिए उन्हें केवल वजन बढ़ाना ही नहीं, बल्कि निर्देशक इम्तियाज अली ने उन्हें कहा कि चेहरे पर कोई मेकअप भी नहीं होगा.
वह कहती हैं, “मुझे चमकीला में सब से खराब दिखना था, पर मैं ने उस भूमिका को स्वीकार किया. कुछ लोगों ने ऐसा करने से मना भी किया था, लेकिन मैं अभिनेत्री विद्या बालन से इंस्पायर हुईं हूं, उन्होंने ‘द डर्टी पिक्चर’ के लिए वजन बढ़ाया था और फिल्म हिट भी हुई थी.”

अच्छे ट्रैनर की जरूरत

वजन घटाने और बढ़ाने की इस लिस्ट में आमिर खान सब से ऊपर हैं. उन्होंने अधिकतर ब्लौकबस्टर फिल्में दी हैं और किसी प्रकार के प्रयोग से वे घबराते नहीं हैं. उन की सफल फिल्मों में तारे जमीं पर, गजनी, पीके, 3 इडियट्स, दंगल आदि है. उन्होंने वर्ष 2016 में रिलीज हुई फिल्म ‘दंगल’ के लिए 5 या 10 किलो नहीं, बल्कि 28 किलो वजन बढ़ाया. इतना ही नहीं महावीर सिंह फोगाट की भूमिका के लिए पहले वजन बढ़ाया और फिर दूसरी फिल्म में नौर्मल दिखने के लिए वजन घटा भी दिया.
दर्शकों को आमिर का ये अंदाज इतना पसंद आया कि फिल्म दंगल ने केवल 1000 करोड़ नहीं, बल्कि 2000 करोड़ से ज्यादा की कमाई बौक्स औफिस पर की. आमिर का इस तरह के प्रयोग के बारे में पूछने पर वे कहते हैं कि उन्होंने ऐसा करने के लिए हमेशा एक अच्छे ट्रैनर की सहायता ली है. उन्हें वजन बढ़ाने के लिए वो सब जंक फूड खाने पड़े, जो कभी खाने के बारें में सोचा भी नहीं था. वे कहते हैं, “मैं ने आइसक्रीम, केक, ब्लाउनीस, वड़ा पाव और समोसे सब खाए. दूसरी फिल्म के सीन्स के लिए जब वजन घटाना था, तब मुझे अमेरिकी डाक्टर निखिल धुरंधर ने पूरा कैलोरीज डाइट प्लान बनाकर दिया था, जिसे मुझे फौलो करना पड़ता था.”

हौलीवुड से प्रेरित बौलीवुड

ये चलन बौलीवुड के सितारों ने हौलीवुड के कलाकारों से अपनाया है. हौलीवुड बात करें तो वहां की मशहूर अभिनेत्री जूलिया राबर्ट्स ने फिल्म ‘ईट प्रे लव’ के लिए 10 पाउंड वज़न बढ़ाया. इस के लिए जूलिया हर दिन 8 से 10 पीस पिज्जा खाती थी, जिस से उन का वजन बढ़ पाया, लेकिन इस बीच एक बड़ा सवाल ये है कि, फिल्मी सितारों का वजन बढ़ाना और घटाना करते कैसे हैं, चलिए जानते हैं.

धैर्य और लगन जरूरी

इस बारे में मुंबई की फिटनैस ट्रैनर संदीप रामचन्द्र वालावलकर कहते हैं कि वजन अगर सही तरीके से घटाया जाए तो कोई समस्या शरीर में नहीं होती. फिल्मों में वजन घटाने और बढ़ाने की प्रक्रिया प्रोजैक्ट के हिसाब से होती है, मसलन प्रोजैक्ट को लौन्च होने में 6 महीने या 3 महीने का समय है, उस के हिसाब से नियमित रूटीन को फौलो करते हुए आगे बढ़ना पड़ता है. इस काम में किसी प्रोजैक्ट के शुरू होने से तकरीबन 12 महीने पहले से प्लानिंग करनी पड़ती है, कम समय में ये होना संभव नहीं होता. इस में शामिल होने वाली टीम बहुत अधिक प्रोफैशनल होती है, मसलन प्रोफैशनल ट्रैनर, डाइटीशियन, डाक्टर आदि, जिसे आम इंसान अफोर्ड नहीं कर सकता. ये टीम समयसमय पर गाइड करती रहती है. किसी भी प्रोजैक्ट में उस के पीछे की टीम, डेडीकेशन और समय काफी महत्वपूर्ण होता है और इस का सही कैलकुलेशन होना जरूरी होता है, नहीं तो शरीर में इस के दुष्परिणाम दिखाई पड़ने लगते हैं.

संतुलन व्यायाम, डाइट, रेस्ट

ट्रैनर आगे कहते हैं कि इसे करने के सही प्रोसेस में 40 प्रतिशत व्यायाम, 40 प्रतिशत डाइट और 20 प्रतिशत आराम करना होता है, इन सब का तालमेल सही होना आवश्यक होता है, फिर चाहे वजन बढ़ाना हो या घटाना. इस पर पूरी प्रक्रिया निर्भर करती है. शरीर किस प्रकार की व्यायाम करती है, किस प्रकार का डाइट व्यक्ति लेता है, इस के ऊपर वजन बढ़ाना और घटाना निर्भर करता है. अगर वजन बढ़ाना है तो कार्बोहाइड्रैट की मात्रा बढ़ानी पड़ती है, प्रोटीन के साथ थोड़ा फैट भी लेना पड़ता है, ताकि वजन बढ़े. अगर वजन घटाना है तो कार्बोहाइड्रैट की मात्रा मीडियम से भी कम करनी पड़ती है, प्रोटीन बैलन्स लेना पड़ता है और जंक फूड या कुछ भी अलग से फैट की मात्रा नहीं लिया जा सकता. तब वजन कम होता है.

व्यायाम की अगर बात करें, तो वजन कम के लिए दो चीजों पर अधिक ध्यान देना पड़ता है, मसलन कार्डियो और वैट ट्रैनिंग अधिक करनी पड़ती है. वजन बढ़ाने के लिए कार्डियो का पार्ट कम वैट ट्रैनिंग मीडीयम और रेस्ट अधिक होता है, जैसे कि दो दिन का व्यायाम 1 दिन का रेस्ट, 3 दिन का व्यायाम एक दिन रेस्ट आदि. वेट लौस के लिए 5 से 6 दिन 45 मिनट से कम या अधिक व्यायाम करना पड़ता है. इन सभी में ट्रैनिंग, खाना, ब्रेक आदि महत्वपूर्ण होते हैं.

एक महीने में अधिक से अधिक 3 किलो औसतन वजन कम होता है, जबकि बढ़ना केवल 2 किलो औसतन ही होता है. अच्छा वजन बढ़ाने या घटाने का पैरामीटर यही होता है. कई विज्ञापनों में जो दिखाया जाता है कि महीने में 10 किलो कम हुआ या बढ़ गया ये सभी भ्रामक होते हैं, जो सही नहीं होता. इस के अलावा सैलिब्रिटी जब प्रोजैक्ट के अनुसार वजन घटाते और बढ़ाते हैं, तब वे पूरी तरह से उसी पर फोकस्ड रहते हैं, जिस का परिणाम उन्हें जल्दी मिलता है, लेकिन हमेशा सही ट्रैनर के साथ वजन घटाने या बढ़ाना ही उचित होता है. परिणिती और आमिर खान के अलावा कई दूसरे कलाकारों ने भी चरित्र के लिए वजन बढ़ाए और सफल हुए.

कृति सेनन

ऐक्ट्रैस कृति सेनन की फिल्म ‘मिमी’ ओटीटी पर रिलीज हुई थी, जिसे दर्शकों ने खूब पसंद किया था. इस फिल्म में कृति ने सेरोगेट मदर का किरदार निभाया है. एक्ट्रैस को इस फिल्म के लिए उन्हें 15 किलो वजन बढ़ाना पड़ा. इस फिल्म के लिए कृति को बेस्ट एक्ट्रैस का अवार्ड भी मिल चुका है.

भूमि पेडनेकर

अपनी पहली फिल्म ‘दम लगा के हईशा’ में भूमि पेडनेकर ने काफी मेहनत की थी. उन्होंने अपने लुक के साथ एक्सपेरिमैंट करते हुए मोटी लड़की का किरदार निभाया था. इस फिल्म के लिए भूमि को अपना 20 किलो वजन बढ़ाना पड़ा था. इस फिल्म से उसे इंडस्ट्री में पहचान मिली.

कंगना रनौत

एक्ट्रैस कंगना रनौत ने अपनी फिल्म ‘थलाइवी’ के लिए 20 किलो वजन बढ़ाया था. एक्ट्रैस ने फिल्म के लिए काफी मेहनत की. इस के बाद उन्हें वापस अपना वजन कम करने में भी काफी समय लगा था.

विद्या बालन

एक्ट्रैस विद्या बालन ने फिल्म ‘द डर्टी पिक्चर’ में निभाए गए सिल्क स्मिता के किरदार के लिए अपना वजन बढ़ाया था. जिस के बाद फिल्म में उन के काम को काफी ज्यादा सराहना मिली थी.

निम्रत कौर

फिल्म ‘दसवीं’ में बिमला देवी की भूमिका निभाने वाली निम्रत कौर ने इस किरदार के लिए कम से कम 15 किलो वजन बढ़ाया था. इस के लिए एक्ट्रैस को कई बार ट्रोल भी किया गया. जिस के बाद ट्रोलर्स को करारा जवाब देते हुए उन्होंने सोशल मीडिया पर एक नोट लिखा और कहा कि, ये सिर्फ फिल्म के लिए था.

सलमान खान

अभिनेता सलमान खान ने ‘सुल्तान’ मूवी के लिए 18 से 20 किलो वजन बढ़ाया था, जिसे उन के किरदार को सभी ने पसंद किया.

राजकुमार राव

राजकुमार राव ने बोस: डेड/अलाइव फिल्म के लिए सुभाष चंद्र बोस की भूमिका निभाई थी, जिस के लिए 10 से 12 किलो वजन बढ़ाया था. इस के लिए उन्होंने हाई फैट हाई कार्ब युक्त भोजन लिया था. इस फिल्म में राजकुमार राव की भूमिका को दर्शकों ने काफी पसंद किया.

रीता सा शजरे बहारां: भाग 3

उस ने जल्दी से हाथ छुड़ा कर सामने आते हुए कहा,आप यह सब कैसे…”

“अरे मस्तक पर सजदे का इतना बड़ा निशान ले कर घूम रहे हो, अंधा भी जान जाएगा कि…अबे  तुम सच में इतने ही भोले हो? और वह फिर खिलखिला दी. चलते हुए बाज़ार में सभी की निगाहें उस पर आ कर रुक गईं. 

“अब तुम वही फौरमैलिटी वाले सवाल मत पूछना कि तुम कौन हो और इतना सब कैसे जानती हो?उस ने फिर से उस का हाथ पकड़ते हुए कहा, आओ चलें,” चलते हुए अपनी गाड़ी का दरवाज़ा खोलते हुए बोली, कार तो चला लेते होगे?

“जी, मगर मेरा लाइसैंस रिन्यू नहीं हुआ है.”

“क्यों, यही सोच कर कि अब गाड़ी नहीं रही तो ड्राइविंग लाइसैंस का क्या,  यही न? चलो, मेरे साथ बैठो, ड्राइविंग मैं करती हूं. तुम भी याद रखोगे कि एक शानदार पायलट के साथ लौंग ड्राइव पर गए थे.”

“लौंग ड्राइव?

“क्यों डर गए क्या?वह फिर खिलखिला कर हंस दी.

“घर पर कोई इंतज़ार तो नहीं करेगा?

कोई नहीं.”

“फिर ठीक है. आओ बैठो, चलते हैं,” और उस ने कार आगे बढ़ा दी.

“मकान किराए का है या…?” 

“जी, बस वही बचा रहा. मकान नहीं, फ्लैट है. पुश्तैनी है तो बच गया.”

“हूं.” और वह बिना कुछ बोले गाड़ी चलाती रही.

“दोबारा ज़ीरो से शुरू करना बहुत मुश्किल होता है, है न? और वह कनखियों से देखती इंतज़ार करती रही कि शायद वह कुछ बोले, लेकिन वह चुप बाहर खिड़की से झांकता रहा.

“तुम्हें डर तो नहीं लग रहा?

“डर, कैसा डर?

“कुछ नहीं. बस यों ही पूछ लिया.”

कुछ ही देर में गाड़ी महरौली की पहाड़ियों में किसी मकबरे के दरवाज़े पर थी. उस ने    सवालिया निगाहों से उसे देखा तो वह उतरते हुए बोली, आओ चलें.” फिर उस ने गाड़ी में से स्कार्फ निकाल कर सिर पर बांध लिया और वहीं नज़दीक एक दुकान से फूलों की टोकरी ले कर उस का हाथ थामे दरवाज़े की ओर बढ़ गई. अंदर जा कर उस ने बड़ी तन्मयता से फूल बिछाए और हाथ जोड़ कर होंठों ही होंठों में बुदबुदाने लगी. 

वह उसे ऐसा करते देख विस्मित था. कुछ देर बाद वह माथा टेक कर आते ही उस का हाथ पकड़ एकतरफ़ ले जा कर आंखें तरेरते हुए बोली, तुम ने न दुआ मांगी और न ही सिर ढका? क्यों?

उस के इस तरह से झिड़कने पर वह सिर्फ़ मुसकरा दिया. 

“जवाब दो, क्या तुम वहाबी हो? 

“आप यह सब जानती हैं?

“मेरे जानने या न जानने से कुछ फ़र्क पड़ने वाला नहीं है.”

“फिर यह सब जानने में इतना इंटरैस्ट क्यों?”

“मतलब, कम्युनिस्ट हो?

नहीं, हो तो तुम मज़हबी ही,’ वह ख़ुद से ख़ुद ही बोली. 

उस ने उस की कलाई पकड़ी और दूर ले जा कर बैठ गया.

“क्या तुम राइटर हो या पेंटर?

“क्यों?

“तुम्हारे हाथ बहुत सौफ्ट हैं.”

“आप का इंट्यूशन क्या कहता है? 

“यही कि मुझे तुम से प्यार होता जा रहा है.”

“आप की इस बात पर हंसा जा सकता है.”

“तो हंसो, रोका किस ने है? मैं भी देखना चाहती हूं कि हंसते हुए तुम कैसे दिखते हो.”

“आप ने तो कहा था कि आप प्रैक्टिकली स्ट्रौंग हैं?”

“क्या यथार्थवादी प्रेम नहीं कर सकते?

“कर सकते हैं मगर मुझ जैसे फटीचर से नहीं.”

“ख़ुद को फटीचर मत कहो,” उस की फिर वही नायकों वाली खनक गूंज गई. 

कुछ देर वह उस के चहेरे को यों ही देखता रहा, फिर बोला, “मैं बालों को खिजाब से रंगता हूं.”

“उम्र बालों से नहीं, चहरे से दिखती है.”

“मेरा तात्पर्य उम्र से नहीं, बल्कि सचाई से है, मैं सच्चा नहीं हूं जबकि आप सच्ची हैं.”

“हर वक्त गहरा सोचना ज़रूरी तो नहीं.”

“जी, आदत हो जाती है. आप भी अकेली हैं? 

“मुझ में इंट्रैस्ट ले रहे हो?

“शायद. लेकिन समझने की कोशिश ज़रूर कर रहा हूं.”

“पहले ख़ुद को तो समझ लो.”

“यहां क्यों ले कर आईं हैं आप मुझे?

“यहां सुकून है, मैं अकसर आती हूं यहां.”

“जी, कब्रिस्तान में सुकून के सिवा और कुछ होता भी नहीं.”

“कब्रिस्तान, तुम इस जगह को कब्रिस्तान कहते हो?

“और फिर क्या कहें? ज़मीन के नीचे सोए हुए लोगों के ऊपर इमारत तामीर कर दी गई और क्या, बस.” 

“मालूम नहीं, इन सोए हुए लोगों को आदमी जगाने की कोशिश क्यों करता है जबकि वहां कोई सुनने वाला नहीं होता.” 

“जब इंसान अकेला था तो भीड़ तलाशता रहा और अब जब भीड़ है तो एकांत तलाश रहा है.”

“ऐसा नहीं है जैसा तुम सोचते हो. इंसान दुनिया के छल, प्रपंच और आपाधापी से मुक्त होने के लिए ऐसी जगह पर आता है. बेशक, कुछ वक्त के लिए ही सही, साथसाथ अपने जज़्बात भी कह जाता है.” 

“आप सुलझी हुई बात कह रही हैं लेकिन सभी आप के जैसा नहीं सोचते.”

“और सभी तुम्हारे जैसा भी नहीं सोचते, रियलिस्टिक बंदे,” उस के होंठों पे मुसकान सी खिली हुई थी. दूर कहीं बादलों के गरजने की आवाज़ हुई और ठंडी हवा बहने लगी. 

“तो फिर सुकून मिला?

“तुम जैसा साथी साथ में हो तो सुकून मिल सकता है क्या?इस बार वह, बस, हंस दी. “तुम इतने रूखे तो लगते नहीं हो, लेकिन तुम्हारी सैंसिटिविटी ने तुम्हारी लचक को हाईजैक कर लिया है.”

“नहीं. नाकामी ने.”

“नाकामी का अर्थ पैसे से लगाया जाए या परिवार से?

“आप स्वतंत्र हैं समझने के लिए.”

“तुम इतने ईज़ी क्यों हो, यार?

“ईज़ी मतलब? मैं समझा नहीं?”

“यही कि दूसरों की बातों को आसानी से मान जाना, उन्हें तवज्जुह देना और साथ ही स्पेस देना.

और देखो न, मेरी भी सभी बातें तुमने आसानी से मान लीं जबकि हम एकदूसरे के लिए अजनबी हैं.”

“अजनबी?

“हां, अजनबी.”

“मैं ने तो ऐसा सोचा ही नहीं.”

“मैं, कनुप्रिया  श्वेताम्बर, प्रोफैसर कनुप्रिया. और तुम?

“छोड़िए, क्या करेंगी जान कर? चलिए चलते हैं, उस ने कलाई छोड़ कर उठते हुए कहा.

“मुझ से भाग रहे हो या ख़ुद से?

“शायद, दोनों से.”

“नाम नहीं बताओगे?

“वैसे, आप लगभग सभीकुछ तो जानती हैं.”

“कह सकते हो लेकिन जानती नहीं, सिर्फ़ अनुमान लगाती हूं जो अकसर सही होते हैं. तुम अकेले रहते हो,उस ने उठते हुए कहा, “खाना तो ख़ुद बनाते होगे?

“हां.” 

“कैसा बनाते हो?

“बस, खाया जा सके, वैसा.”

“तो फिर चलो, आज से मुझे खाना बना कर खिलाओ,” और उस ने अपनी बाईं कलाई उस के दाएं हाथ में पकड़ा कर खंडहर से बाहर क़दम बढ़ाया. हलकीहलकी बारिश की फुहारें उन के स्वागत को तत्पर थीं.

 

जब वह उस के घर पहुंचा तो उसे लगा कि यह घर कुछ जानापहचाना सा है. कनुप्रिया ने कहा, जनाब, अब याद आया कि नहीं, हम जब चौथी कक्षा में थे तो तुम मेरी क्लास में ही थे और एकदो बार घर भी आए थे. मैं जब पार्किंग में गाड़ी में बैठी सोच रही थी कि कैसे दिन गुजारा जाए, तुम्हारे बालों के ठीक करने के स्टाइल से तुम्हें पहचान लिया. इतनी बातें पक्का करने के लिए कीं कि तुम वही हो न?

 

वह भौचक्का रह गया पर लगा कि जिंदगी को अब एक राह मिलेगी.

भगोड़े नेताओं से शुद्धीकरण क्या रंग लाएगा?

ताजा आंकड़ों के मुताबिक अब तक लगभग 90 हजार कांग्रेसी भाजपा जौइन कर चुके हैं और यह सिलसिला लगता है तब तक चलता रहेगा जब तक कांग्रेस, खासतौर से, ब्राह्मणविहीन नहीं हो जाती. क्यों रोजरोज कांग्रेसी, खासतौर से सवर्ण और उन में भी ब्राह्मण, भाजपा में जा रहे हैं?

बौक्सर विजेंद्र सिंह, गौरव भाटिया, जितिन प्रसाद, अमरिंदर सिंह, परनीत कौर, नवीन जिंदल, सावित्री जिंदल, सुरेस पचौरी, हेमंत बिस्वा शर्मा, आलोक चंसोरिया, शैलेंद्र रावत, मनीष खंडूड़ी, महेश शर्मा, अशोक चव्हाण, वसव राज पाटिल, नारायण राठवा, कृष्णमूर्ति हुड्डा, हार्दिक पटेल, सुनील जाखड़, अल्पेश ठाकोर, ज्योतिरादित्य सिंधिया, ललितेश त्रिपाठी, मिलिंद देवड़ा, रीता बहुगुणा जोशी, शेखर तिवारी, अरुणोदय चौबे, संजय शुक्ला, शशांक भार्गव और हिमांशु व्यास वगैरहवगैरह.

अब नजर मध्य प्रदेश पर डालें तो पहेली एक हद तक सुलझती हुई नजर आती है कि कांग्रेसी सवर्ण और ब्राह्मण इसलिए कांग्रेस छोड़ कर भाजपा जौइन नहीं कर रहे हैं कि कांग्रेसी कड़ाहे में सत्ता की मलाई खत्म हो चली है या कथित तौर पर कांग्रेस में ब्राह्मणों का पहले सा आदरसम्मान नहीं रहा व उन की अनदेखी की जा रही है बल्कि सच सनातन और शाश्वत यह है कि डाक्टर राजेंद्र प्रसाद, गोखले, तिलक और बनर्जी, चटर्जी, आगरकर व मुखर्जी की इन ब्राह्मण-सवर्ण संतानों को मंदिर चाहिए, वर्णव्यवस्था चाहिए, धर्म का राज चाहिए, मूर्तियां चाहिए और दक्षिणा चाहिए, जिन की गारंटी आज की तारीख में सिर्फ भाजपा दे रही है. इसे ही समझने वाले मोदी की गारंटी समझते हैं. बाकी सब तो मिथ्या है और सार्वजनिक मंच से दिए जाने वाले राजनीतिक भाषण हैं जो दलित, पिछड़ों और आदिवासियों के कानों को प्रिय लगने वाले होते हैं.

ऊपर जो जानेअनजाने मुट्ठीभर नाम बताए गए हैं उन में से सभी ने कांग्रेस के सुनहरे दिनों में सत्तासुख भोगा है और इस के लिए सोनिया-राहुल गांधी के तलवे चाटने से भी गुरेजपरहेज नहीं किया है. इन में से ही कईयों के बापदादा भी कांग्रेसी थे जो पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी का थूका अपनी हथेली पर लेने से भी परहेजगुरेज नहीं करते थे, बल्कि गर्व महसूस करते थे क्योंकि इसी परिवार की कृपा से उन्हें विधायकी, सांसदी और मिनिस्ट्री मिलती रही थी.

अब इन्हें लग रहा है कि यहां कुछ नहीं मिलने वाला तो ये भाजपा की तरफ भाग रहे हैं लेकिन यह वजह बहुत वजनदार नहीं है और सभी पर लागू नहीं होती. आम लोग बड़ी दिलचस्पी से रोजरोज का यह ड्रामा देखते हैं तो राय यही बनाते हैं कि भाजपा दिनोंदिन मजबूत हो रही है और कांग्रेस कमजोर होती जा रही है क्योंकि उस के छोटेबड़े नेता भाजपा जौइन कर रहे हैं लेकिन जो नेता जा रहे हैं उन में से 99 फीसदी जमीनी नहीं हैं. मसलन, मध्य प्रदेश के सुरेश पचौरी जो लड़े तो 2 बार लेकिन कभी चुनाव जीते ही नहीं. उलट इस के, कांग्रेस के जो नेता कोई भी चुनाव जीते तो वह नेहरू-गांधी परिवार के दम पर जीते, मसलन जितिन प्रसाद. यह हकीकत इन्हें भी मालूम है और भाजपा को भी, जो रोज नए आने वालों की गिनती कर कुल टोटल बढ़ा देती है.

हिंदुत्व का एजेंडा

भाजपा ने सभी राज्यों में जौइनिंग कमेटियां बना रखी हैं जिन का काम ही इन भगोड़ों को समारोहपूर्वक पार्टी में शामिल करना है. खुलेतौर पर वह कहती भी है कि उस का मकसद खुद को मजबूत और कांग्रेस को कमजोर करना है, जिस से कि मोदी के ‘अब की बार 370 पार’ वाले कथन को पूरा किया जा सके. लेकिन क्या सिर्फ सवर्ण नेताओं की भरती से यह मुमकिन है.

इस सवाल का जवाब न में ही मिलता है क्योंकि सवर्ण कांग्रेसी तो हमेशा से प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष उस का साथ देते रहे हैं लेकिन जा इसलिए नहीं रहे थे कि उन्हें बैठेबिठाए, बिना कुछ किए कुरसी मिल रही थी. दूसरे, भाजपा का हिंदुत्व का एजेंडा भी परवान चढ़ रहा था. दलित, आदिवासी न के बराबर भाजपा में जा रहे हैं क्योंकि वे भाजपा के हिंदुत्व के एजेंडे और मंदिर नीति से सहमत नहीं हैं. मुसलमान का उस से परहेज किसी सुबूत का मुहताज कभी नहीं रहा जो हिंदुत्व और अयोध्या के बाद मथुरा-काशी के होहल्ले से दहशत में है.

यानी, भाजपा कांग्रेसी नेताओं को नहीं बल्कि कुछ हजार वोटों की भरती घोषित तौर पर कर रही है जो उसे पहले से ही मिलते रहे थे. अब तो यह जताने की कोशिश की जा रही है कि उस का कुनबा यानी मोदी का परिवार कांग्रेसियों के आने से बढ़ रहा है. इन भगोड़ों को भगवा शौल पहनाई जाती है तो लगता ऐसा है कि कट्टर हिंदूवादी नेता या संत घरवापसी मुहिम को अंजाम दे रहा है. फर्क इतना भर होता है कि घर वापस आने वाले ईसाई या मुसलमान नहीं होते बल्कि सवर्ण ही होते हैं जिन्हें कांग्रेस में कुछ खास वजहों से घुटन होने लगी थी.

जैसे ही राहुल गांधी ने पिछड़ों की हिमायत करते जातिगत जनगणना की बात कही और कांग्रेस आलाकमान ने दलित समुदाय के कद्दावर वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया तो सवर्ण कांग्रेसी बिदक उठे क्योंकि कांग्रेस उन के हाथ से फिसल रही थी. जिस से बचने के लिए खुद इन्होंने ही फिसलने का फैसला ले लिया. ये नेताओं की उस जमात के वंशज हैं जो दलित, आदिवासी, पिछड़ों और मुसलमानों के वोटों पर विधायक-सांसद से ले कर सरपंच तक बनते रहे थे.

सवर्ण वोट तो आजादी के बाद से ही रामराज्य परिषद, हिंदू महासभा, जनसंघ और फिर भाजपा को जा रहा था जिस में इत्तफाक से 2014 में अन्ना हजारे के आंदोलन की बदौलत छोटी जाति वालों के वोट भी शामिल हो गए तो भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ दिल्ली की कुरसी पर काबिज हो गई. प्रधानमंत्री बनते ही नरेंद्र मोदी ने भगवा जाल बिछाना शुरू किया तो इस में कोई शक नहीं कि कई दलित, पिछड़े और आदिवासी भी फड़फड़ा रहे हैं. मोदी ने सवर्णों की राम मंदिर बनाने की जिद और मंशा पूरी की लेकिन साथ ही छोटी जाति वालों को उन के देवीदेवताओं के मंदिर पकड़ाना शुरू कर दिए जिस से वे भी पूजापाठ में उलझ कर ऊंची जाति वालों के मंदिर में न जाएं और भाजपा को वोट भी देते रहें. हिंदीभाषी राज्यों में ऐसा हो भी रहा है और उसी के दम पर भाजपा 400 पार का नारा लगा रही है लेकिन दक्षिण भारत में उस का यह टोटका नहीं चल रहा.

कांग्रेस लेगी खुली सांस

हिंदी पट्टी के सवर्ण कांग्रेसियों को यह ज्ञान प्राप्त हो गया है कि हिंदू राष्ट्र जितना बन सकता था, बन चुका है, इसलिए अब यहां से फूट लो. इन कांग्रेसियों, खासतौर से ब्राह्मणों का एक बड़ा दर्द यह भी है कि आलाकमान ने 22 जनवरी को अयोध्या के जलसे में शामिल होने से साफ मना कर दिया क्योंकि यह भगवा गैंग का सियासी इवैंट था.

सुरेश पचौरी जैसे नेताओं ने तो स्पष्ट कहा कि वे कांग्रेस इसलिए छोड़ रहे हैं कि उस ने राम मंदिर की प्राणप्रतिष्ठा का न्योता ठुकरा दिया था. यह किसी कांग्रेसी नेता का नहीं बल्कि एक पूजापाठी ब्राह्मण का दर्द है जो अपनों यानी ऊंची जाति वालों की पार्टी में जाने का बहाना ढूंढ़ रहा था. बिना कोई चुनाव जीते जिस नेता को कांग्रेस ने 24 साल संसद पहुंचाया, केंद्र में मंत्री बनाया, उस ने रत्तीभर भी लिहाज इस बात का नहीं किया और न ही यह सोच पाया कि देश और समाज धर्म से ऊपर हैं.

यही दर्द उन तमाम नेताओं का है जो भाजपा की तरफ भाग रहे हैं. यह तो खुद मध्य प्रदेश के एक मंत्री भूपेंद्र सिंह पब्लिक मीटिंग में कह चुके हैं कि जब सालों से भाजपा के लिए काम कर रहे नेताओं को ही कुछ नहीं मिला तो इन भगोड़ों को क्या मिलेगा. यानी ये लोग फर्श और दरियां बिछाने का काम करेंगे, मोदी, शाह, योगी और मोहन यादव की जयजयकार करेंगे. दोचार को विधायकी और सांसदी मिल भी जाएगी लेकिन इस के लिए जरूरी है कि वह ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसा हो जो 20-22 विधायकों को साथ लाने की हैसियत रखता हो और अपनी रीढ़ की हड्डी भाजपाई और संघ की चौखट के बाहर रख कर आए.

कांग्रेस का शुद्धीकरण हो रहा है. जिस से आने वाले वक्त में वह मजबूत हो कर उभरेगी. कांग्रेस का समर्पित सवर्ण तो इस कचरे के छंटने से खुश है ही, साथ ही दलित, पिछड़े, आदिवासी भी राहत की सांस ले रहे हैं कि चलो, अच्छा हुआ जो सामंती मानसिकता वाले ये पूजापाठी अपनों के पास चले गए. अब कांग्रेस पर लोगों का भरोसा और बढ़ेगा जो इन सनातनियों के चलते डगमगा रहा था कि जब पूजापाठ और धार्मिक ढोंगपाखंड वालों को ही वोट देना है तो फिर भाजपा क्या बुरी है. इस में कोई शक नहीं कि कांग्रेस को अपने मूल स्वरूप में आने में अभी वक्त लगेगा क्योंकि हिंदीभाषी राज्यों के माहौल में पिछले 10 सालों में यज्ञहवनों का इतना धुआं फैल चुका है कि सियासी तसवीर साफ नहीं दिख रही.

 

मैं ओवरवेट हूं, क्या कीटो डाइट वाकई फायदेमंद है?

सवाल 

मैं ओवरवेट हूं. क्या कीटो डाइट वाकई फायदेमंद है?

जवाब

मैं हाउसवाइफ हूं. ओवरवेट हो गई हूं. मेरी सहेली ने कीटो डाइट अपनाई है और अब वह काफी पतली हो गई है. क्या वाकई यह डाइट फायदेमंद है?

कीटो डाइट का चलन इन दिनों काफी बढ़ गया है. कीटो डाइट में कम कार्ब, उच्च वसा वाला आहार होता है. इस डाइट को फौलो करने से शरीर एनर्जी के लिए कार्ब्स के बजाय ज्यादा फैट जलाता है, जिस कारण वजन कम होता है. इस स्थिति को कीटोसिस कहा जाता है. अगर आप भी कीटोसिस डाइट शुरू करना चाहते हैं तो ऐसे खाद्य पदार्थ, जिन में कार्ब्स की मात्रा बहुत अधिक है, के सेवन से बचना चाहिए.

ऐसा करने से ब्लडप्रैशर नियंत्रण में रहने के साथ शरीर भी स्वस्थ रहता है. कीटो डाइट हर व्यक्ति के लिए नहीं होती है. ऐसे में इसे फौलो करने से पहले एक बार डाक्टर से जरूर बात करें.

 

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प्रौपर्टी टैक्स लेकिन क्यों

देशभर की कौर्पोरेशनों की बड़ी आय का स्रोत प्रौपर्टी टैक्स होता है जो हर कौर्पोरेशन अपने अनुसार लगाती है. मकान बनाते समय जो पैसे चाहो, बनाने वाला दे देता है. पर हर साल, साल दर साल, उन सपंत्तियों पर टैक्स देना जो कोई पैसा कमा कर नहीं दे रही, एक मुसीबत ही लगती है. हर कौर्पोरेशन के खाते में वर्षों के बकाएवसूली की मोटी रकम पड़ी रहती है. यह रकम उगाहने के लिए समयसमय पर नोटिस, कुर्की, सीलिंग जैसे ऐक्शन लिए जाते हैं. इन से वसूली तो कुछ हो जाती है पर कभी भी यह 100 प्रतिशत नहीं होती और जो होती है वह फूलप्रूफ भी नहीं होती.

सब से बड़ी समस्या यह होती है कि प्रौपर्टी टैक्स किस आधार पर दिया जाए. यह समस्या सदियों से है. इंगलैंड में एक बार घरों में खिड़कियों की गिनती और उन के साइज पर टैक्स लगने लगा था. बड़े मकानों ने बाहर की खिड़कियां बंद कर दीं या छोटी कर दी थीं. आज भी तरहतरह की दरें हैं और तरहतरह की छूटें हैं जो पूरे ढांचे को चरमरा देती हैं. कौर्पोरेशन के चुनावों में जो पार्टी सत्ता में नहीं होती वह किसी तरह की छूट देने का वादा करती है पर जीतने के बाद मुकर जाती है और उस से मुश्किल और बढ़ जाती है.

मकान मालिक अकसर सुविधाओं की कमी का रोना रोते हैं कि पानी का पाइप नहीं डाला, गलियां-सड़कें ठीक नहीं हैं, बिजली के खंबों पर बल्ब नहीं हैं तो प्रौपर्टी टैक्स किस बात का दें. मकान मालिक गिनती में बहुत होते हैं, इसलिए कोई बड़ा कदम उठाना भी आसान नहीं होता. सीलिंग इन में से सब से खतरनाक कदम होता है. जिस प्रौपर्टी में रह रहे हैं, उस में काम कर के रोजीरोटी कमा रहे हैं उसे अगर सील कर दिया जाए तो करदाता आखिर पैसा कहां से जुटाएगा, यह सीधी सी बात आम अफसरों को सम?ा नहीं आती. मकान की कुर्की में चूंकि हजार ?ां?ाट होते हैं, इसलिए कौर्पोरेशनों के अफसर सीलिंग की क्रिया को अपनाते हैं पर यह तो अंडा देने वाली मुरगी को दाना न देने की बात है या कि शायद भूखे रह कर वह ज्यादा अंडे दे देगी.

प्रौपर्टी पर टैक्स तभी दिया जा सकता है जब उस से लाभ दिख रहा हो. जीएसटी वसूला जाता है क्योंकि बेचने वाले को लगता है कि कौन सा अपनी जेब से जा रहा है और खरीदने वाला उसे चीज के दाम में जोड़ लेता है. सो, कोई ?ां?ाट नहीं. पर सीलिंग करने का मतलब है कि व्यापार, घर या किराया बंद तो टैक्स चुकाने के पैसे भला कहां से आएंगे? यह मराठे सरदारों का तरीका हुआ जो अपने युद्धों में किसानों से बीज के लिए रखा अनाज भी लूट ले जाते थे क्योंकि उन की अपनी सेना की सप्लाई चेन को लुटेरे बीच में लूट लेते थे.

प्रौपर्टी टैक्स शायद ही किसी शहरकसबे में सही ढंग से लागू किया जाता हो. हर जगह यह विभाग रातदिन ऊपरी वसूली में लगा रहता है. आमदनी कौर्पोरेशनों से ज्यादा अफसर और बाबुओं की बढ़ती है और मकान मालिकों को लगता है कि वे फैसला कर लेंगे. प्रौपर्टी टैक्स तभी सही ढंग से वसूल किया जा सकता है जब शहरी नागरिकों को लगे कि उन के दिए पैसे से उन्हें सही व पर्याप्त सुविधाए मिल रही हैं और पैसे का सदुपयोग हो रहा है. जब प्रौपर्टी टैक्स, चाहे दर कोई हो, देने के बाद भी सड़कें टूटी व गंद के ढेर, बदबू से भरी नालियां, नलों में पानी बंद, अंधेरी गलियां होंगी तो जनता पैसे देने में हिचकिचाएगी. कानूनी अधिकारी सीलिंग करें या नीलामी, उस पर खर्च करने से पैसा वसूल नहीं होगा.

 

सही सलामत घर वापसी: आखिर रिंकू नादान थी या चालक

दीपा बड़ी देर से अपनी भांजी रिंकू का इंतजार कर रही थी. पति सुशांत कंपनी के काम से चेन्नई गए हुए थे. रिंकू के मोबाइल पर उस ने बहुत बार ट्राई किया. रिंग पर रिंग जा रही थी पर रिंकू ने न फोन उठाया और न ही कौलबैक किया. उस के औफिस में भी कोई फोन नहीं उठ रहा था.

दीपा का मन आशंकाओं से घिरा जा रहा था. घर में 2 छोटे बच्चों को छोड़ कर इतने बड़े शहर में वह अपनी भांजी को ढूंढऩे आखिर कहां जाए. जवान भांजी के साथ कहीं कोई अनहोनी हो गई तो… इस शहर को रिंकू जानती ही कितना है. देवास जैसी छोटी जगह से चंद महीने पहले ही तो वह यहां पर रहने आई है. न तो दीपा सुशांत को फोन लगाना चाहती थी और न ही रिंकू के घर वालों को. दोनों ही दूसरे शहरों में बैठे हैं, बेवजह परेशान होंगे और इतनी दूर से कुछ कर भी नहीं पाएंगे.

दरअसल, आज रिंकू का बर्थडे भी था, इसलिए वह शाम को लकी बेकरी से उस का मनपसंद केक और एक सुंदर पर्स गिफ्ट के तौर पर ले कर आई थी. लेकिन अब साढ़े नौ बजने को थे. बच्चे भी अपना होमवर्क खत्म कर के केक कटने का इंतजार करतेकरते थक कर सो चुके थे. आखिरकार, हताश हो उस ने सुशांत को फोन लगाया. ‘‘अब बता रही हो मुझे?’’ छूटते ही सुशांत ने कहा.

‘‘क्या करती सुशांत, मुझे लगा वह आती ही होगी. मैं बेवजह तम्हें परेशान नहीं करना चाहती थी,’’ दीपा रोंआसी हो उठी.

‘‘चलो, परेशान मत हो, मैं उसे फोन लगाकर देखता हूं और दीदी से भी बात करता हूं,’’ कह कर सुशांत ने फोन रख दिया. बीतते हर पल के साथ दीपा की चिंता बढ़ती जा रही थी. लगता है रिंकू को अपने घर रख कर उस ने कोई गलत निर्णय ले लिया है.

उसे याद आया कि रिंकू की जौब दिल्ली में लगने पर कितनी खुशी हुर्ई थी उसे. जीजाजी ने जब रिंकू के लिए एक अच्छा होस्टल देखने को कहा तो उस ने नाराज होते हुए कहा था कि जब रिंकू के मामीमामा दिल्ली में रहते हैं तो वह होस्टल में क्यों रहेगी. उस के लिए जैसे उस के बच्चे, वैसी ही रिंकू. बड़ी ही प्रसन्नता से उस ने आगे बढ़ कर रिंकू की देखभाल व उस की पूरी जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली थी. पर उसे नहीं मालूम था कि कुछ ही महीनों में रिंकू पर शहर की चमकधमक का वह रंग चढ़ेगा कि उस की आंखें चौंधिया जाएंगी. उस के लिए औफिस के कलीग्स के आगे मामीमामा का प्यार और समझाइश गौण हो जाएगी.

कुछ दिनों तक तो रिंकू औफिस से सही वक्त पर घर आ जाती थी. फिर ‘काम का प्रैशर ज्यादा है मामी, मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ेगी,’ कह कर वह थोड़ा लेट आने लगी. फिर भी साढ़े सातआठ बजे तक तो हर हालत में आ ही जाती थी. लेकिन आज तो लापरवाही की हद हो गई थी. आज वह जरूर उसे थोड़ी डांट लगाएगी, आखिर उसे भी तो समझ आए कि उस के कारण मुझे कितना परेशान होना पड़ा है. सोचती हुई दीपा उसे फिर से फोन लगाने को उद्यत हुई कि मोबाइल की घंटी घनघना उठी, ‘‘हैलो दीदी, चरणस्पर्श.’’ उस की ननद का फोन था.

‘‘खुश रहो दीपा, अभी रिंकू से बात हुई है मेरी, वह बस आधे घंटे में पहुंच रही है. तुम चिंता मत करना. दरअसल, उस के बर्थडे पर औफिस वालों ने एक पार्टी रखी थी तो वह उसी में बिजी थी.’’

‘‘ठीक है दीदी.’’ दीपा को बड़ा आश्चर्य हुआ. यह क्या तरीका है बर्थडे पार्टी मनाई जा रही है वह भी इतनी देर तक. और तो और, इस लडक़ी ने उसे बताना भी जरूरी नहीं समझा, जबकि उसे अच्छी तरह से मालूम है कि मामा बाहर गए हुए है. अकेली मामी कितनी परेशान होंगी, उस ने यह भी न सोचा, ऊपर से उस का फोन भी नहीं उठा रही है. और दीदी को देखो इतनी देररात लडक़ी घर से बाहर है, यह जान कर उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा. अरे, अच्छी बात है कि आप लडक़ी को आजादी देने के पक्ष में हो. लेकिन यह क्या बात हुई कि जहां आप रह रहे हो उन्हें सूचित करना भी जरूरी नहीं समझते. दीपा की सोच से परे था यह सब.

उसे पड़ोसिन सेन भाभी की वह समझाइश याद आ रही थी जिस में उन्होंने साफ तौर पर उसे चेतावनी देते हुए कहा था कि दीपा, यह अच्छी बात है कि तुम अपनी भांजी को यहां रख कर अपने दीदीजीजाजी की मदद करना चाहती हो. परंतु यह काम इतना आसान नहीं. दूसरों के बच्चों को अपने पास रखना व उन की देखभाल करना एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है, जिस में यदि सबकुछ अच्छा रहा तो कोर्ई बात नहीं लेकिन अगर कोई चूक हुई तो लोग आप को बुरा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे.

उस वक्त उन की बातों को हलके में लेते हुए उस ने कहा था कि आप चिंता न करें भाभी, मैं सब संभाल लूंगी. मैं अपनी भांजी को इतने प्यार से रखूंगी की मामीभांजी का यह रिश्ता सब के लिए मिसाल बन जाएगा. आज उसे लग रहा था कि अपने अतिआत्मविश्वास के चलते भाभी की बात को अनसुनी कर के हंसी में उड़ा देना शायद एक भूल थी. क्योंकि बड़ों की तीक्ष्ण अनुभवी नजरें अधिक यथार्थवादी होती हैं.

वह जितना इस रिश्ते को सहेजने की कोशिश कर रही थी, यह उतना ही उलझता जा रहा था और आज हालात ये थे कि घर पर वह और बच्चे रिंकू का बर्थडे मनाने की तैयारी कर के बैठे थे और वह अपना बर्थडे औफिस वालों के साथ सैलिब्रेट करने में बिजी थी.

दीपा के मन में एक टीस उठी और गालों पर दो बूंद आंसुओं की टपक पड़ीं. रिंकू ने उस के घर को क्या होटल समझ रखा है जहां अपना लगेज रख कर इंसान सिर्फ खाने और आराम फरमाने ही आता है. समझदार सुशांत शायद इस स्थिति को पहले ही भांप चुके थे, तभी तो पहलेपहल वे उसे वहां रखने के पक्ष में नहीं थे. वे तो बाद में उस के काफी समझाने व जोर देने पर आखिरकार उन्हें इस निर्णय पर अपनी मूक सहमति दे दी थी.

वैसे तो 24 वर्षीय रिंकू बहुत भोली व प्यारी बच्ची थी. वह तो पहले भी उसे बहुत प्यार करती थी और बस, यह चाहती थी कि वह इतनी आसानी से किसी पर भी भरोसा न करे. अपने औफिस में भी थोड़ी सी होशियारी और समझदारी से चले ताकि कभी किसी परेशानी में न पड़े. क्योंकि आजकल किस के मन में क्या चल रहा है, यह समझ पाना थोड़ा मुश्किल होता जा रहा है. अच्छाई व अपनेपन का दिखावा कर के लोग बड़ी आसानी से मासूमों को अपना शिकार बना लेते हैं. लेकिन शायद रिंकू पर पैसों की चकाचौंध और स्टेटस सिंबल का जनून धीरेधीरे सवार होता जा रहा था. इसलिए मामीमामा की हर समझाइश अब उसे अपनी पर्सनल लाइफ में दखलंदाजी लगने लगी थी.

रिंकू को अपने घर पर अपनी जिम्मेदारी पर रखना दीपा के लिए कड़ी चुनौती बनता जा रहा था. लगभग हर हफ्ते छुट्टी वाले दिन उस के औफिस कलीग कहीं पिकनिक या फिल्म देखने का प्रोग्राम बना लेते थे और दसग्यारह बजे निकली रिंकू देररात घर आती थी. कभीकभार जब सुशांत कहीं जाने का प्रोग्राम बनाते थे तो रिंकू साफ तौर पर आनाकानी करती नजर आती, इस से सुशांत स्वाभाविक रूप से चिढ़ जाते. फिर भी वह लगातार इसी कोशिश में लगी रहती कि सुशांत और उन की प्यारी भांजी के बीच कोई मनमुटाव न हो.

पर अब रिंकू को समझ पाना और उसे समझाना दीपा के लिए टेढ़ी खीर होता जा रहा था. बड़े होने के नाते वे जिन खतरों को आसानी से सूंघ पा रहे थे, रिंकू के लिए वह उन की बेवजह की चिंता थी. एक बार तो ‘मयंक ब्लू वाटर पार्क’ गई रिंकू दोस्तों के कहने पर जींस पहने ही पानी में उतर गई और दिनभर गीली जींस में घूमती रही. शाम को जब दीपा ने यह देखा, तो उसे डांटा, ‘‘यह क्या तरीका है रिंकू, पूरे दिन गीली जींस से क्या तुम बीमार नहीं होगी.’’

‘‘अरे कुछ नहीं होगा मामी, आप बेकार ही परेशान होती हो,’’ रिंकू ने लापरवाही से जवाब दिया. दीपा मन ही मन कुढ़ कर रह गई. यह क्या बात हुई, अभी बीमार हो जाएगी तो डाक्टर के पास तो मुझे ही ले कर भागना पड़ेगा. रिंकू की मनमरजी के आगे दीपा बेबस हो चुकी थी. अगर ये सभी बातें दीदी को बताती है तो उन्हें लगेगा की वे उन की बेटी को रखना नहीं चाहते, इसलिए उस की चुगली कर रहे हैं और बाद में कुछ ऊंचनीच हुई तो उसे यही सुनना पड़ेगा कि हमें पहले क्यों नहीं बताया, हम ने तो उसे तुम्हारे भरोसे छोड़ रखा था. अत्यधिक खुशी और जल्दबाजी में लिया निर्णय अब उस के गले की फांस बनता जा रहा था.

अचानक दीपा के विचारों की श्रंखला टूटी, बाहर से कोई हौर्न पर हौर्न दिए जा रहा था. उस ने दीवालघड़ी पर नजर डाली, 11 बजने को थे. उफ्फ… उठ कर गेट का लौक खोला तो बाहर खड़ी कार से उतरी रिंकू ने अपने बौस से उस का परिचय करवाया. गाड़ी में पिछली सीट पर 2 लडक़े और बैठे हुए थे. इतनी देर से आने पर भी रिंकू के चेहरे पर अफसोस का कोई भाव न था और न ही होंठों पर सौरी. वह गुनगुनाती हुई आते ही वाशरूम में घुस गई. दीपा का मन कसैला हो गया. माना कि वह रिंकू की मामी है, दीदी जीजाजी उस के मान्य हैं और इस नाते अपने मान्यों का मान रखना उस का कर्तव्य है. पर इस रिश्ते को निभाने का सारा दारोमदार क्या उसी पर है. क्या दूसरी ओर से कोई सार्थक पहल नहीं की जानी चाहिए. ये कैसे रिश्ते हैं जिन में, बस, चुप हो कर अपनी ड्यूटी करते रहो, दूसरा सही हो या गलत आप के मुंह से उफ नहीं निकलनी चाहिए. इस तरह एकतरफा रिश्ता वह आखिर कब तक निभा पाएगी.

चलो, माना कि रिंकू नादान है, पर दीदी को तो उसे सही सलाह देनी चाहिए, न कि उस की गलतियों को बढ़ावा. ऐसे में कल को रिकू की बेवकूफियों का खमियाजा उसे या सुशांत को ही भुगतना होगा क्योंकि दीदी तो यह कह कर छूट जाएंगी कि तुम ने हमें बताया क्यों नहीं. और कुछ बताने चलो, तो अभी उन के पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा है.

2-3 महीने तक उसे उस ऊहापोह में रहना पड़ा पर फिर पता चला कि रिंकू को बेंगलुरु में एक और अच्छी नौकरी मिल गई. जब यह सूचना रिंकू ने दी तो दीपा जितनी खुश हुई वह महीनों तक सुशांत व रिंकू के मातापिता दोनों को समझ नहीं आया.

मणिपुर: न्याय नहीं तो वोट भी नहीं

एक साल से ज्यादा समय हो गया मणिपुर में आग लगी हुई है. विपक्ष कहता रहा है प्रधानमंत्री जी, कुछ बोलिए. मगर नरेंद्र मोदी मणिपुर के संदर्भ में मौन धारण किए हुए हैं. अब जबकि लोकसभा 2024 का आगाज हो गया है, पहले चरण का मतदान हो चुके हैं. लेकिन मणिपुर में ‘न्याय नहीं तो वोट नहीं’ की आवाज भी गूंजने लगी है. भारतीय जनता पार्टी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश को एक ऐसे चौराहे पर खड़ा कर चुकी है जो अनेक त्रासदी और दंश लिए हुए है. नरेंद्र मोदी के 10 साल का कार्यकाल सिर्फ हिंदूमुसलिम, रामरहीम और मैंमैं का बन कर इतिहास बन जाएगा. मणिपुर की जनता ने जो घाव सहे हैं जिस तरह मणिपुर जलता रहा है वह देशभर में ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में चर्चा का सबब बन गया जिसे देख कर के भाजपा और उस के नेतृत्व की मोदी सरकार यही कहती रही कि यह हमारा आंतरिक मामला है.

भारतीय जनता पार्टी के साथ विसंगति यह है कि कब मामला भारत का आंतरिक और संप्रभुता का हो जाता है, कोई नहीं जानता. अपने हिसाब से हर समय की परिभाषा करने में भाजपाई महारत हासिल कर चुके हैं. मगर वे यह भूल जाते हैं. दूसरे देशों में जब कोई घटना घटित होती है तब प्रधानमंत्री और विदेश मंत्रालय सक्रिय हो जाता है और दुनिया में नेतागीरी झाड़ने लगता है. तब यह भूल जाते हैं कि उस देश वाले भी कह सकते हैं कि यह उन का आंतरिक मामला है. लाख टके की बात है कि जब आप अपने मणिपुर को नहीं संभाल सकते, वहां जा कर अपने लोगों के आंसू नहीं पोंछ सकते, वहां शांति कायम नहीं कर सकते तो दुनिया को सीख देने का आप को क्या अधिकार है.

वोट का बहिष्कार, एक संदेश है

मणिपुर में कुकी-जो समुदाय के कुछ संगठनों ने घोषणा की है कि वे संघर्ष प्रभावित राज्य में हिंसा की ताजा घटनाओं के बाद ‘न्याय नहीं तो वोट नहीं’ का आह्वान करते हुए आगामी लोकसभा चुनावों का बहिष्कार करेंगे. गौरतलब है कि विगत दिनों इंफाल पूर्वी जिले में 2 सशस्त्र समूहों के बीच हुई गोलीबारी में 2 लोगों की मौत हो गई, वहीं 12 अप्रैल, 2024 को तेंगनौपाल जिले में सशस्त्र ग्रामीण स्वयंसेवकों और अज्ञात लोगों के बीच हुई गोलीबारी में 3 लोग घायल हो गए.

कुकी समुदाय के लोगों ने घोषणा की है कि वे बहिष्कार के रूप में ‘संसदीय चुनाव’ में कोई उम्मीदवार नहीं उतार रहे. वैश्विक कुकी जोमी-हमार महिला समुदाय ने पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त राजीव कुमार को पत्र लिख कर चुनाव का बहिष्कार करने के फैसले की जानकारी दी थी. यह महिलाओं का एक समूह है जिस में सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी, अखबारों के लेखक, बाहरी मणिपुर के पूर्व सांसद किम गांगटे और दिल्ली में कुकी जीमी-हमार महिला मंचों के नेता शामिल हैं.

अब कुकी नैशनल असैंबली और कुकी इन्पी नामक संगठन ने भी संसदीय चुनाव के बहिष्कार करने की घोषणा कर दी है. कुकी नैशनल असैंबली के मांगबोई हाओकिप ने कहा, “हम अपने नेताओं के प्रति अपना असंतोष व्यक्त करते हैं. यह निराशाजनक है कि भारतीय सेनाएं, जो चीन और पाकिस्तान के खतरों को रोकने व उन का मुकाबला करने में सक्षम हैं, वे निर्दोष नागरिकों को आतंकवादियों से बचाने में विफल रही हैं. इस से भारतीय संविधान और देश के इस दावे पर से विश्वास उठ गया है कि यह दुनिया का सब से बड़ा लोकतंत्र है.”

उन्होंने आगे कहा, “हम भारतीय नेतृत्व के प्रति अपना क्षोभ प्रकट करने के लिए लोकसभा चुनाव में मतदान से दूरी बनाने को बाध्य हैं. अगर भारत में परेशानियों को ही हमारा अधिकार समझा जाता है तो हम चुनाव में भाग लेना नहीं चाहते. यह बहिष्कार भारत और दुनिया में हमारे दुख और पीड़ा को जताने का तरीका है.”

दूसरी तरफ, कांग्रेस ने देश के गृहमंत्री अमित शाह के मणिपुर दौरे से पहले 15 अप्रैल, 2024 को आरोप लगाया कि पूर्वोत्तर के इस राज्य में कानूनव्यवस्था की स्थिति ध्वस्त होने के बावजूद मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह को बरखास्त क्यों नहीं किया गया? पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने मणिपुर के संदर्भ में मोरचा संभालते हुए कहा, “प्रधानमंत्री मोदी मणिपुर के मुख्यमंत्री को क्यों बचा रहे हैं? गृहमंत्री अमित शाह ने आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवारों के समर्थन में मणिपुर में प्रचार किया.” यह सारा देश जानता है कि चुनावों के हर चरण में प्रधानमंत्री मोदी हर स्टेट में पहुंच जाते हैं मगर वे मणिपुर क्यों नहीं जा रहे हैं, यह सवाल आज हवाओं में गूंज रहा है.

 

आईएएस की तैयारी करें जरूर मगरऔप्शन रख कर

17 अप्रैल की रात को 29 साल की एक यूट्यूबर स्वाति ने आत्महत्या कर ली. स्वाति ने अपने पीजी के सैकंडफ्लोर से कूद कर जान दी. वह पिछले 10 सालों से दिल्ली के मुखर्जी नगर में रह रही थी और यूपीएससी की तैयारी कर रही थी लेकिन एग्जाम में क्वालीफाई नहीं कर पाई थी. स्वाति ने कई सालों तक एसएससी की भी तैयारी की लेकिन उस में भी सफलता नहीं मिली. वह बारबार फेल हो रही थी. वैसे, खुदकुशी की स्पष्ट वजह का अभी पता नहीं चल पाया है. हां, यह बात सामने आ रही है कि एग्जाम क्लियर न कर पाने की वजह से वह काफी समय से परेशान चल रही थी.

इसी तरह झांसी में रहने वाला मयूर बीटैक पास था और यूपीएससी की तैयारी कर रहा था. वह पढ़ने में काफी होशियार था. उस ने 2019 में सोनीपत के एक इंस्टिट्यूट से फूड टैक्नोलौजी में बीटैक पास की थी. उस के बाद दिल्ली जा कर यूपीएससी की तैयारी करने लगा. मयूर लगातार 3 बार से यूपीएससी की परीक्षा में असफल हो रहा था. बारबार वह एकदो नंबरों से रह जाता था जिस कारण काफी मायूस रहता था. 14 जनवरी की रात को उस ने पहले स्कूटी में पैट्रोल भरवाया, फिर खुद को आग लगाई और चौथी मंजिल से नीचे कूद गया. तुरंत ही उस की मौत हो गई.

इस तरह की घटनाएं आएदिन सुनने को मिलती रहती हैं. युवा पूरी मेहनत से कईकई साल आईएएस की तैयारी में लगाते हैं, अफसर बनने का सपना देखते हैं मगर बारबार असफल होने पर हिम्मत खो बैठते हैं.

दरअसल, संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) परीक्षा को भारत की सब से कठिन परीक्षाओं में से माना जाता है. इस एग्जाम को पास करने के बाद आईएएस, आईपीएस, आईआरएस या आईएफएस अधिकारी बनने का मौका मिलता है. इन सरकारी अफसरों का अलग ही रुतबा होता है. इस रुतबे को हासिल करने के लिए ही हर साल लाखों युवा यूपीएससी परीक्षा देते हैं. हालांकि, उन में से कुछ ही परीक्षा पास कर पाते हैं.

इस बार के घोषित यूपीएससी परिणामों पर नज़र डालें तो;

यूपीएससी 23-24 के लिए करीब 13 लाख छात्रों ने आवेदन किया था. कुल मिला कर 14,624 यूपीएससी मेन्स के लिए योग्य हुए और 2,916 को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया. लेकिन केवल 1,016 छात्रों को शौर्टलिस्ट किया गया और प्लेसमैंट के लिए अनुशंसित किया गया.

यूपीएससी के नियमानुसार, सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों को परीक्षा में 6 प्रयास या 32 वर्ष का होने तक बैठने की अनुमति है. ओबीसी के लिए यह 9 प्रयास या उम्र 35 वर्ष है. एससी/एसटी के लिए यह 37 वर्ष है और प्रयासों की कोई सीमा नहीं है. इतने सारे प्रयासों की अनुमति देने का मतलब है कि कई छात्र अपनी जिंदगी के प्रमुख वर्ष परीक्षा की तैयारी और उसे क्रैक करने की कोशिश में लगा देते हैं. उन में से कई लोग इन परीक्षाओं की तैयारी के अलावा कुछ नहीं करते. हर राज्य में ऐसे उम्मीदवारों के लिए कोचिंग हब भी हैं.

साल 2020 से 2023 (4 वर्ष) में परीक्षार्थियों की संख्या

2020 से 2023 (4 वर्ष) तक कुल 46.03 लाख छात्रों ने यूपीएससी सिविल के लिए आवेदन किया था. उन में से कुल 48,214 छात्र मुख्य परीक्षा के लिए उत्तीर्ण हुए. इस के बाद अगले पड़ाव में करीब 10,000 छात्र चयनित हुए और उन्हें साक्षात्कार के लिए बुलाया गया. इन 4 सालों में कुल रिक्तियां 3,823 थीं. यानी, 2020-23 के बीच 1,204 छात्र एक रिक्त पद के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे थे.

पिछले करीब 15 वर्षों में सिविल सेवक बनने के लिए प्रतिस्पर्धा 1:365 से बढ़ कर 1:1,204 हो गई. यानी, प्रतिस्पर्धा 3.3 गुना बढ़ चुकी है.

क्या यह प्रतिभा की भारी बरबादी नहीं है? जिन का सिलैक्शन नहीं होता है उन में योग्यता की कोई खास कमी नहीं होती वरना वे मेंस तक कैसे पहुंचते. रिक्तियां कम हैं, इसलिए बहुत से छात्रों को न चाहते हुए भी रेस से हटाना पड़ता है.

परीक्षा प्रक्रिया में सुधार जरूरी

हमें इस बात पर पुनर्विचार करना चाहिए कि क्या हम अपने युवाओं को 6 साल (ओबीसी के लिए 9) तक यूपीएससी पद के लिए तैयारी और प्रयास करते रहने दें. क्या कुछ ऐसा नियम नहीं होना चाहिए कि एक न्यूनतम अंक से कम लाने वाले परीक्षार्थियों को दोबारा बैठने न दिया जाए यानी उन उम्मीदवारों को बाहर करना शुरू किया जाए ताकि वे अपने प्रमुख वर्षों को उस परीक्षा की तैयारी में बरबाद न करें जिस में उन के सिलैक्शन की कोई संभावना नहीं है. इस के साथ ही किसी भी कैटेगरी का छात्र हो, 4 या 5 से अधिक अटैम्प्ट की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए. वैसे ही, इस की तैयारी छात्र कालेज के दिनों में ही शुरू कर देते हैं.

इस एग्जाम के सिस्टम में भी कुछ सुधार की जरूरत है. कहीं न कहीं इस के पेपर कठिन तो होते ही हैं, साथ ही, पूरी प्रक्रिया भी टाइम टेकिंग है. आप पूरे एक साल तक और कुछ नहीं कर पाते. बस, इसी में लगे रहते हैं क्योंकि आप को पहले प्रीलिम्स देना होता है, फिर मेंस देना होता है और फिर इंटरव्यू की तैयारी करनी होती है. इस सिस्टम को चेंज करना चाहिए. कहीं न कहीं इस के पूरे प्रोसीजर को थोड़ा छोटा बनाना चाहिए.

छात्रों को औप्शन रखना चाहिए

आप इस की तैयारी कर रहे हैं, तो ठीक है दोतीन साल पूरी मेहनत से एग्जाम दीजिए. लेकिन सफलता हासिल न हो तो अपने पास एक औप्शन रखें. आप जिस भी फील्ड के हैं उस फील्ड में काम शुरू कीजिए, ताकि आप उस में थोड़ा व्यवस्थित हो सकें और फिर साथसाथ इस की तैयारी करें. ऐसा न करें कि 8 -10 साल तक आप ने और कुछ नहीं किया और अंत तक आप को सफलता नहीं मिली. और तब, आप के पास करने के लिए कुछ खास न हो क्योंकि आप की उम्र निकल गई हो या आप के अंदर की ऊर्जा व उत्साह खत्म हो चुका हो.

इसलिए बेहतर यह होगा कि आप पहले किसी भी फील्ड में अपना एक मुकाम बना लें. आप इंजीनियरिंग की फील्ड में जाना चाहते हैं या डाक्टरी की फील्ड में, लौयर बनना चाहते हैं या सीए- जो भी बनना चाहते हैं, किसी एक फील्ड को चुन कर उस में आगे बढ़ें और कुछ नहीं तो बिजनैस शुरू कीजिए. आईएएस में सफल न होने पर आप एसएससी या दूसरे गवर्नमैंट या प्राइवेट एग्जाम दे सकते हैं या फिर आप मीडिया या एजुकेशन की फील्ड में आ सकते हैं. औप्शन रहेगा, तो आप बेफिक्र हो कर कई साल तक भी एग्जाम की तैयारी कर सकेंगे. यानी, जब तक एग्जाम देने हैं, देते रहिए मगर पूरी तरह खुद को इस के लिए झोंक देना उचित नहीं है.

एक स्टूडैंट को समझना होगा कि 8-10 साल उस की जिंदगी के सब से खूबसूरत होते हैं, शरीर में सब से ज्यादा एनर्जी है और कुछ कर गुजरने की सोच है. यही वह समय है जब इंसान अपना कैरियर बनाता है, जब एक जीवनसाथी की कल्पना उस के मन में उमड़ती है, जब वह शादी करता है और उस का मन उत्साह से भरा होता है. लेकिन यही 10 साल सिर्फ एग्जाम कंपीट करने की कोशिश और फ्रस्ट्रेशन में निकल जाएं तो इंसान चाह कर भी अपनी जिंदगी को इतनी खूबसूरती से नहीं जी सकता जितना वह जी सकता था अगर वह इस तैयारी में अपना समय बरबाद न करता. आप ऊंचे सपने जरूर देखें. कुछ बड़ा बनने के सपने भी जरूर देखें. मगर इस तरह देखें कि आप की लाइफ में केवल वही न रह जाए. आप पैरेलल में कुछ और काम या बिजनैस करते रहिए ताकि आप किसी एक फील्ड में तो व्यवस्थित हो सकें और आगे अगर सिलैक्शन न हो, तो भी अच्छे से जी सकें.

इतनी एनर्जी कहीं और लगाई जाए तो हालात जुदा होंगे

अधिकतर युवा इस परीक्षा को पास करने के लिए विभिन्न शहरों में कोचिंग लेते हैं और मोटी धनराशि भी ख़र्च करते हैं. यही नहीं, इतने साल जो वे बिना रोजगार के रहते हैं तो वह संभावित सैलरी की राशि, जो उन की हो सकती थी, वह भी खर्च में ही शामिल की जाएगी. वे सालों रातदिन एक कर के करीब 17-18 घंटे रोज की पढ़ाई करते हैं. लेकिन इतनी मेहनत और खर्च के बावजूद पास होने वाली युवाओं की संख्या बेहद सीमित है. लगभग एक फीसदी ही सफलता प्राप्त करते हैं. सीट हजार में होती हैं उम्मीदवार लाखों में होते हैं. बाकी के युवा फ़्रस्ट्रेशन और स्ट्रैस का शिकार बनते हैं. इसी समस्या को ले कर अभी हाल ही में ‘12वीं फेल’ फिल्म आई थी जिस में इस परीक्षा को ले कर युवाओं की कोशिशों, उन के तनाव और आर्थिक हालात का चित्रण करने की कोशिश की गई.

इन परीक्षाओं को पास करने के लिए युवा जितनी एनर्जी खर्च कर रहे है अगर उसे किसी और क्षेत्र में लगाया जाए तो परिणाम अलग ही मिलेगा. लाखों लोग एक परीक्षा पास करने की कोशिश में अपनी जिंदगी के बेहतरीन साल निकाल देते हैं. जबकि, वास्तव में वहां कुछ हजार लोगों की छोटी संख्या की ही जरूरत है. अगर युवा अपनी ऊर्जा को कुछ और करने में लगाते हैं तो हम ज्यादा ओलिंपिक गोल्ड मैडल जीतेंगे. बेहतर फिल्में बनते देखेंगे. बेहतर डाक्टर देखेंगे. ज्यादा उद्यमी और वैज्ञानिक सामने आएंगे.

पहला चरण में फंसती दिखी भाजपा, राहुल अखिलेश का एकता संदेश क्या काम आया?

एक पुराने नगर में एक सेठ रहता था. उस के 5 बेटे थे. पांचों की अलग सोच थी. ऐसे में सेठ के विरोधी हावी होते जा रहे थे. पांचों बेटे आपस में ही लड़ रहे थे. सेठ और उन के बेटे चर्चा कर रहे थे कि किस तरह से अपने विरोधियों का मुकाबला करें. सेठ ने 5 लकड़ी के टुकडे लिए और पांचों बेटों को दिया. सब से लकड़ी तोड़ने के लिए कहा. सभी बेटों ने अपने अपने टुकड़े तोड़ दिए. अब सेठ ने पांचों लकड़ी को ले कर एक रस्सी से बांध दिया. अब वह पांचों लकड़ी एकएक बेटे से तोड़ने के लिए दी. कोई भी बेटा उस को तोड़ नहीं पाया. पिता ने कहा अगर अपने विरोधियों को हराना है तो एकजुट हो कर लड़ना पड़ेगा. एकता का यही संदेश काम करता है. यह संदेश पुराना है लेकिन कारगर है.

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राजनीति में भी एकता का संदेश चुनावी लड़ाई में हार को जीत में बदल देता है. लोकसभा 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 400 पार का नारा दिया. अब चर्चा इस बात की होने लगी कि भाजपा और उस के सहयोगी 400 पार या भाजपा अपने बल पर 370 सीटें जीत लेगी. प्रधानमंत्री को लग रहा था कि उन के नारे के आगे विपक्ष एकजुट नहीं हो पाएगा. जो एकजुट होने का प्रयास करेगा उस को तोड़ दिया जाएगा. जैसे ‘इंडिया ब्लौक’ के संस्थापक बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ हुआ. भाजपा ने उन को अपने साथ मिला लिया. ‘इंडिया ब्लौक’ के एक और सहयोगी आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को जेल जाना पड़ गया.

इस के बाद भी इंडिया ब्लौक चुनावी लड़ाई से पीछे नहीं हटा. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हर विरोध और बाधा को पार कर आपसी सहयोग बना कर भाजपा का विरोध करते रहे. उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी ने बहुत सारे अंर्तविरोध के बाद भी समाजवादी पार्टी का न केवल साथ बल्कि सपा के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ साझा प्रैस काफ्रेंस की. आगे चुनाव में साथसाथ रैलियां भी कर रहे हैं.

प्रियंका गांधी भी अपनी अलग रैली कर के यह दिखा रही है कि कितना भी प्रयास मोदी सरकार कर ले इंडिया ब्लौक पीछे हटने वाला नहीं है.

भीड़ बढ़ा रही हौसला

सहारानपुर में प्रियंका गांधी के पहुंचते ही लोगों के उत्साह का कोई ठिकाना न रहा और लोगों ने प्रियंका गांधी और इमरान मसूद के समर्थन में जोरदार नारे लगाए. हर कोई प्रियंका गांधी की गाड़ी के पास खड़े हो कर सेल्फी लेने के लिए उतावला दिख रहा था. रोड शो के मार्ग में दोनों और जहां बड़ी संख्या में नागरिक ने खड़े हो कर प्रियंका गांधी का स्वागत किया, तो वहीं महिलाओं और बच्चों ने छतों से ही गुलाब व अन्य पुष्प पंखुड़ियों की वर्षा कर जोरदार स्वागत किया पूरे रोड शो के दौरान प्रियंका गांधी ने हाथ हिला कर, हाथ जोड़ कर सभी का अभिवादन और स्वागत स्वीकार किया.

प्रियंका गांधी ने रामायण की चौपाई ’रावण रथी विरथ रघुबीरा..’ का उच्चारण करते हुए कहा कि युद्ध में रथ, सत्ता, महल, सोने की लंका रावण के पास थी, लेकिन उस की लड़ाई असत्य पर आधारित थी, इसलिए रावण को हार का सामना करना पड़ा, जबकि राम एक वनवासी की तरह बिना रथ और सत्ता के युद्ध लड़े और इसलिए विजयी हुए क्योंकि भगवान राम ने युद्ध सत्य के लिए लड़ा.
भाजपा सरकार औद्योगिक घरानों का 16 लाख करोड़ का कर्ज और ब्याज तो माफ कर सकती है, लेकिन किसानों को एमएसपी, ऋण माफी की गारंटी तो दूर उन के गन्ने का भुगतान भी सही समय पर नहीं करती. भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई लड़ने का दावा करने वाली मोदी सरकार पर उन्होंने भ्रष्टाचार में डूबे होने का आरोप लगाते हुए पूछा कि इलैक्टोरल बांड जिसे माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अवैधानिक घोषित किया, क्या मनी लौन्ड्रिंग का एक जरिया नहीं है ? उन्होंने युवाओं के लिए 30 लाख रोजगार और महिलाओं की सुरक्षा व सरकारी नौकरियों में 50 प्रतिशत आरक्षण, किसानों को एमएसपी आदि सहित कांग्रेस के 5 न्याय और 25 गारंटीयों का भी जिक्र किया.

150 सीटें मिलेंगी भाजपा को

एक तरफ जहां भाजपा 370 और 400 सीटों की बात कर रही राहुल गांधी और अखिलेश यादव की प्रैस काफ्रेंस में राहुल गांधी ने भाजपा के लिए 150 सीटें पाने की बात कही. पहले राहुल गांधी और ममता बनर्जी भाजपा को 200 सीटें दे रहे थे. गाजियाबाद में हुई प्रेस काफ्रेंस में अखिलेश यादव ने कहा कि जनता बदलाव चाहती है. इंडिया ब्लौक केंद्र में सरकार बनाने जा रहा है. राहुल और अखिलेश की जोड़ी उत्तर प्रदेश में आगे बढ़ कर बदलाव करने की तैयारी कर रही है.

इस में कोई चमत्कार जैसी बात नहीं है. 2004 के लोकसभा चुनाव में केंद्र की अटल सरकार मजबूत सरकार मानी जा रही थी. कांग्रेस बिखरी हुई थी. इस से पहले कांग्रेस ने कभी गठबंधन की सरकार नहीं बनाई थी. कांग्रेस में गठबंधन का कोई अनुभव नहीं था. सोनियां गांधी ने कुछ इस तरह से चुनावी बिसात बिछाई की इंडिया शाइनिंग का नारा देेने वाली अटल सरकार धराशाई हो गई. कांग्रेस ने यूपीए गठबंधन की सरकार पूरे 10 साल चलाई.

1977 में यही हाल कांग्रेस का था. इंदिरा गांधी जैसी मजबूत प्रधानमंत्री के खिलाफ विपक्ष एकजुट हो गया. इमरजैंसी लगाने के बाद भी इंदिरा गांधी चुनाव हार गई. उन को हराने वाले तब छोटेछोेटे दलों ने मिल कर जनता पार्टी बनाई थी. उन के पास कोई चेहरा नहीं था. न कोई नेता था. भले ही वह सरकार ज्यादा दिन नहीं चली पर कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया था. असल में उस समय भी जनता पार्टी को केवल टूल थी असल लड़ाई देश की जनता ही लड़ रही थी.

इंडिया ब्लौक भले ही मोदी के खिलाफ बड़ा न दिख रहा हो लेकिन जैसेजैसे चुनाव आगे बढ़ रहे हैं यह ताकत दिख रही है. जनता देख रही है कि एक तरफ सुविधाओं से युक्त भाजपा है तो दूसरी तरफ संघर्ष कर रहा इंडिया ब्लौक.

आज भी जनता अपने मंहगाई, बेरोजगारी के मुद्दे को ले कर लड़ाई कर रही है. मोदी सरकार के पास धर्म के मुद्दे के अलावा कोई मुददा नहीं रह गया है. काठ की हांडी 2014 और 2019 में चढ़ गई अब जनता की रूचि इस में नहीं रह गई है.

2024 के लोकसभा चुनाव में पहले चरण का मतदान 19 अप्रैल को है. इस चरण में 21 राज्यों की कुल 102 सीटों पर वोटिंग है. पहले चरण में कुल 1625 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं. 2019 में पहले चरण में कुल 91 सीटों के लिए मतदान कराए गए थे. इन में से 31 सीटें भाजपा के खाते में गई थीं. वहीं, कांग्रेस के महज 9 उम्मीदवार जीतने में सफल रहे थे. इस के अलावा 51 सीटों पर अन्य दलों ने कब्जा जमाया था. 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा पहले चरण के चुनाव में ही फंसी नजर आ रही है. इस चरण में सब से अधिक सीटें दक्षिण भारत की है. जहां भाजपा के लिए गढ़ भेदना कठिन काम है. उत्तर भारत में भाजपा की ठाकुर बिरादरी उस का खेल बिगाड़ रही है.

उत्तर प्रदेश के पश्चिम में 8 लोकसभा सीटों पर कांटे की टक्कर हुई है. उत्तर प्रदेश जैसे मजबूत किले में इंडिया गठबंधन की ताकत बढ़ने से भाजपा कमजोर पड़ गई है. मोदी सरकार नेताओं के नहीं पीएमओ के बल पर चलती रही है. ऐसे में अब भाजपा के नेता भी बहुत रूचि नहीं दिखा रहे हैं. पहले चरण के चुनाव में भाजपा के रथ का पहिया युद्व के मैदान में फंस गया दिखता है. ऐसे में विरोधी हमलावर हैं और वह बचाव भी नहीं कर पा रहे हैं. ऐसे में वह बारबार राम की शरण में पहुंच जा रहे हैं.

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