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बेटे का विद्रोह: क्या शिव ने मां को अपनी शादी के बारे में बताया?

शादी से पहले काउंसलिंग है जरूरी

सुजाता और राजीव चौहान की शादी को सिर्फ 6 महीने ही हुए थे कि उन में रोज ?ागड़ा होने लगा. बात पिटाई तक पहुंच गई. आखिर तंग आ कर दोनों ने एकदूसरे से अलग होने का फैसला कर लिया. तलाक का फैसला देते हुए जज ने कहा कि शादी से पहले आप दोनों को काउंसलर की मदद लेनी चाहिए थी, ताकि वे आप को सम?ा सकते कि आगे दोनों में निभेगी या नहीं.

सोनिया मंडल और आकाश महतो शादी से पहले कई बार मिले, साथ घूमने गए, फिल्में देखीं वगैरहवगैरह. उन्हें लगा कि हम दोनों एकदूसरे के बारे में काफी कुछ जानतेसम?ाते हैं.

उन की शादी में एक पेंच था. दोनों हालांकि जाट बिरादरी के थे पर एक के घरवाले जमींदार किसान थे और दूसरे के फौज में साधारण सिपाही, पर पैसा इतना था कि बच्चों को शहर में पढ़ा सकें. सोनिया के पिता ने कहा भी कि आकाश के मातापिता का घर छोटा सा और वे इस तरह पैसा नहीं खर्च कर सकेंगे, पर दोनों ने कहा कि हमें तो शहर में रहना है, हमें आकाश के परिवार से क्या लेनादेना.

दोनों की नौकरियां अच्छी थीं, लगभग बराबर और रोजमर्रा के खाने के लिए काफी आय थी. उन्होंने प्लानिंग भी कर ली थी कि जल्दी ही अपना एक फ्लैट ले लेंगे. लेकिन शादी के 2 महीने बाद ही दोनों में तूतूमैंमैं, शुरू हो गई. आकाश के भाईबहन अकसर उन के प्लैट पर आ कर रहने लगे और सोनिया पर रोब जमाते. नतीजा यह हुआ कि सोनिया अपने मायके वापस आ गई. घरवालों ने लाख सम?ाया, लेकिन दोनों ही कुछ भी सम?ाने को तैयार न हुए.

सोनिया का कहना है, ‘‘आकाश बहुत शंकालु प्रवृत्ति का है. मु?ो किसी से बात नहीं करने देता है.’’ उधर आकाश का कहना है, ‘‘सोनिया में बहुत बचपना है. अपनी निजी बातें भी वह सब के सामने बोल देती है और उस की यही आदत ?ागड़े का कारण बन जाती है.’’

दोनों ने आर्थिकभेद कम बताया क्योंकि वह तो उन्हें पहले ही दोनों के मांबापों ने बोल दिया था. उस घुटन का गुस्सा कहीं और फूटा. कुछ इसी तरह की समस्याओं को ले कर हाल ही में एक सैमिनार का आयोजन किया गया. सैमिनार में इस बात पर जोर दिया गया कि लोगों में शादी से पहले होने वाली काउंसलिंग को ले कर जागरूकता की कमी है, इसी वजह से तलाक की संख्या में तेजी आई है.

इस के साथ ही यूथ में आपसी सम?ा की भी कमी है. इस बात को मैरिज काउंसलर्स भी मानते हैं कि आजकल की पीढ़ी में धैर्य की कमी है, फिर दोनों कमाते हैं तो उन में अहं का टकराव भी तलाक की वजह बनता है. शादी से पहले क्या काउंसलिंग की जरूरत होती है और उस का क्या नतीजा सकारात्मक रहता है, इस पर कुछ मैरिज काउंसलर्स से बात की गई.

फैसला कुछ घंटों में नहीं लिया जाता एक सैक्सोलौजिस्ट और मैरिज काउंसलर का कहना है, ‘‘ऐसा नहीं
है कि इस तरह की समस्याओं का सामना केवल मिडिल क्लास के लोग कर रहे हैं, बल्कि पढ़ेलिखे और उच्च आय ग्रुप के लोगों में भी इस तरह की परेशानियां हैं. अकसर यूथ फैमिली के दबाव और सोसाइटी के चलते शादी जैसे अहम फैसले कर तो लेते हैं, लेकिन रिलेशनशिप को ज्यादा समय मेंटेन नहीं रख पाते. लगातार तलाक के मामलों में बढ़ोतरी आने की वजह से मैरिज काउंसलर के कैरियर का ग्राफ दिनबदिन बढ़ता जा रहा है.

‘‘काउंसलर हर मुद्दे पर खुल कर बात करते हैं. कभी दोनों को साथ बैठा कर तो कभी अलगअलग बात करते हैं. इस में कैरियर संबंधी, आय से संबंधित, संयुक्त परिवार में रहने से संबंधित, बच्चों की संख्या आदि जैसे कई मुद्दे होते हैं. पारिवारिक पृष्ठभूमि की बात भी होती है. घरेलू बातों से ले कर हम दफ्तर तक की बातों को भी शामिल करते हैं. जिंदगीभर साथ रहने का निर्णय सिर्फ कुछ घंटों में नहीं लिया जा सकता है. उन के साथ लंबीलंबी सिटिंग्स करनी पड़ती हैं. दोनों पक्षों में मातापिता से भी बात करते हैं. आगे चल कर किस तरह की समस्याएं आ सकती हैं, उन पर पहले से विचार किया जाता है, बात की जाती है, उन का समाधान किस तरह से किया जा सकता है, इस के बारे में सोचा जाता है.’’

वे आगे कहते हैं, ‘‘विवाह के बाद अकसर समस्याएं घरेलू स्तर पर शुरू होती हैं जो धीरेधीरे कामकाज से ले कर रिश्तेदारों तक पहुंच जाती हैं. युवा यह जान ही नहीं पाते कि शादी के बाद आपसी बहस और ?ागड़े में वे किस स्तर तक उतर गए हैं. कई बार इस के भयंकर परिणाम सामने आते हैं. एकदूसरे पर हाथ उठाना, घर के सामान की तोड़फोड़, बच्चे हो गए हों तो उन पर बेवजह गुस्सा निकालना जैसी घटनाएं आएदिन परिवार में घटती हैं.

मैरिज काउंसलर्स मानते हैं कि आजकल पतिपत्नी दोनों कामकाजी हो गए हैं, जाहिर है अपेक्षाएं आशा से अधिक होने लगी हैं. साथ ही, घर में जिम्मेदारियों को ले कर भी दोनों में तनाव रहता है. मैरिज काउंसलर्स इन्हीं समस्याओं को दूर करने में मदद करते हैं.

विचारों में एकरूपता लाने की कोशिश

किसी भी लड़केलड़की को शादी से पहले किसी प्रोफैशनल ऐक्सपर्ट से बात करनी चाहिए. इस से उस के लिए सही फैसला लेना आसान हो जाएगा. वह शादी से पहले इस बात को जान सकेगा कि उस का होने वाला पार्टनर उस से क्या अपेक्षाएं रखता है और क्या वह उन सभी उम्मीदों पर खरा उतरता है.

मैरिज काउंसलर्स क्या सभी तरह की समस्याओं को दूर करने में मददगार हो सकते हैं? चावला सर का इस बारे में कहना है, ‘‘मैरिज काउंसलर्स एक हद तक आपसी विचारों में एकरूपता ला सकते हैं. यह सही है कि जीवन में ऐसी कई बातें होती हैं जिन के बारे में पहले से नहीं पता होता है, इसलिए स्थितियां काफी हद तक बिगड़ जाती हैं लेकिन कम से कम हम कोशिश तो करते हैं कि सबकुछ सामान्य हो जाए.’’ उन का मानना है कि घरेलू ?ागड़ों को सु?ालाने के लिए फैमिली कोर्ट हैं, परिवार परामर्श केंद्र हैं लेकिन
ये सब शादी के बाद अस्तित्व में आते हैं. शादी से पहले ही यदि मदद दी जाए, सलाह दी जाए तो हो सकता है आने वाले समय में तलाक और मनमुटाव की घटनाएं कम हो जाएं.

तलाकों की संख्या अब हर जाति में बढ़ने लगी है. कुर्मी की तलाकशुदा, जाट तलाकशुदा जैसे व्हाट्सऐप ग्रुपों से पता चलता है कि यह समस्या हर वर्ग की है और ऊंची जातियों के जज/वकील इन में से बहुतों के पारिवारिक बैकग्राउंड को भी नहीं सम?ा पाते. काउंसलरों का काम होता है कि वे हर तरह की समस्या का पूर्वानुमान करें. काउंसलर के सामने कभी दोनों साथ तो कभी एकएक कर के बैठते हैं. ऐसे में बहुत सी दबी बातें शादी से पहले साफ हो सकती हैं.

बड़े शहरों के साथसाथ अब छोटे शहरों में भी प्रीमैरिज काउंसलर्स संस्थाएं काम कर रही हैं. इन संस्थाओ में मनोवैज्ञानिक समाजशास्त्री और कानूनविद लोगों को सलाह देते हैं ताकि आने वाली जिंदगी में खुशहाली रहे. अब तो ऐसे लोगों की संख्या भी बढ़ती जा रही है जो अपने मन का संशय दूर करने में काउंसलर्स की मदद लेने लगे हैं. उन्हें पैसा देना हो उन को खलता नहीं, वे यह सम?ाते हैं कि पंडोंपुरोहितों को देने से इन्हें देना अच्छा है.

अच्छी सेहत के लिए बहुत जरूरी है Detoxification, जानें इसका मतलब

डिटॉक्सिफिकेशन का मतलब है शरीर को हानिकारक पदार्थों से छुटकारा दिलाना. हम रोज कई हानिकारक पदार्थों के संपर्क में आते हैं, जो हमारी सेहत के लिए खतरनाक हो सकते हैं. डिटौक्सीफिकेशन के द्वारा शरीर से इन पदार्थों को बाहर निकाल शरीर को तनावमुक्त बनाया जा सकता है.

ये पदार्थ शरीर में जमा हो जाते हैं:

– वायु प्रदूषण जैसे उद्योगों और गाडि़यों से निकलने वाला धुआं.

– फूड प्रिजर्वेटिव, एडिटिव और स्वीटनर.

– हेयर डाई, परफ्यूम, साफसफाई में काम आने वाले उत्पाद जिन में आमतौर पर प्रिजर्वेटिव या रसायन होते हैं, जो शरीर के लिए हानिकारक होते हैं.

– घर की सफाई में काम आने वाले क्लीनिंग एजेंट्स.

– भारी धातु यानी हैवी मैटल्स जो अकसर पीने के पानी में मौजूद होते हैं.

– शराब, सिगरेट का धुआं और नशीली दवाएं.

डिटॉक्सिफिकेशन का महत्त्व

हमारा शरीर हमेशा अपनेआप जहरीले पदार्थों को बाहर निकालने का काम करता रहता है. लेकिन खानेपीने की गलत आदतें, शराब, कैफीन, नशीली दवाओं का सेवन, तनाव, पौल्यूशन आदि आज के आधुनिक जीवन का हिस्सा बन चुके हैं.

हम चाहे कितना भी सेहतमंद भोजन करें और लाइफस्टाइल पर ध्यान दें, बाहरी कारकों का असर हमारे शरीर पर पड़ता ही है और जानेअनजाने जहरीले पदार्थ हमारे शरीर में इकट्ठे होते जाते हैं. इस से शरीर के अंगों की ताकत धीरेधीरे कम होने लगती है. जब शरीर के अंगों पर इस का दबाव बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, तो वह ठीक से काम नहीं कर पाता और बीमारियों की चपेट में आने लगता है.

कैसे करें डिटौक्स

शरीर को डिटौक्स करने के कई तरीके हैं. इन में न तो ज्यादा समय खर्च होता है और न ही ज्यादा पैसे.

आहार:

ऐसे आहार का सेवन न करें जिस से पाचनतंत्र पर दबाव बढ़ता हो. फलों में प्राकृतिक चीनी यानी फ्रुक्टोस होती है. फाइबर से युक्त आहार का सेवन करें. ब्राउन राइस, ताजे फल और सब्जियां खाएं. चुकंदर, मूली, आर्टीचोक, पत्तागोभी, ब्रौकली अच्छे खा-पदार्थ हैं, जो शरीर से जहरीले पदार्थ निकालने में मदद करते हैं. विटामिन सी का सेवन भरपूर मात्रा में करें. इस से शरीर में ग्लुटेथिऔन बनता है, जो शरीर से जहरीले पदार्थ बाहर निकालने में फायदेमंद होता है.

पानी मिनरल्स से युक्त पीएं:

पानी शरीर को जरूरी मिनरल्स देता है. अपने पानी की जांच करें. उस में कहीं भारी धातु यानी हेवी मैटल्स तो नहीं? नल से आने वाला पानी अकसर पुरानी पाइपों में से आता है, जिस में भारी धातु होती है.

इस के अलावा घर पर भी कुछ डिटौक्स ड्रिंक्स बना सकती हैं जैसे लैमन व मिंट, ग्रीन टी इत्यादि.

व्यायाम:

रोज कसरत करने से शरीर से जहरीले पदार्थ निकल जाते हैं. कसरत के दौरान पसीना आता है, लिपोलाइसिस यानी फैट टिशू बर्न होने की प्रक्रिया तेज हो जाती है और फैट टिशू में मौजूद विषैले पदार्थ बाहर निकलने लगते हैं. इस से रक्त का प्रवाह बढ़ता है, लिवर और किडनियों तक ज्यादा औक्सीजन पहुंचती है और जहरीले पदार्थ फिल्टर हो कर बाहर निकलने लगते हैं.

पसीना:

पसीना बहाने से शरीर में से भारी धातु और जेनोबायोटिक्स यानी प्लास्टिक और पेट्रोकैमिकल्स जैसे रसायन भी निकलने लगते हैं.

त्वचा:

हानिकर रसायनों का इस्तेमाल न करें. हेयर डाई, हेयर स्प्रे, मेकअप और त्वचा पर इस्तेमाल किए जाने वाले उत्पादों में बहुत से रसायन होते हैं. आप के स्किन प्रोडक्ट ऐसे हों, जिन में परफ्यूम और रसायन कम से कम मात्रा में हों. क्योंकि रसायन त्वचा पर मौजूद छिद्रों को बंद कर देते हैं.

अगर आप डिटौक्सीफिकेशन के बारे में सोच रहे हैं, तो पहले डाक्टर से जरूर बात कर जान लें कि आप के लिए क्या ठीक होगा, क्योंकि कई मामलों जैसे डायबिटीज आदि में यह हानिकारक हो सकता है. अगर आप को कोई बीमारी है या आप कोई दवा ले रहे हैं, तो इस बारे में भी डाक्टर को जरूर बता दें.

– डा. करुणा चतुर्वेदी, चीफ डाइटीशियन, जेपी हौस्टिपल, नोएडा

सहयोग: क्या सीमा और राकेश का तलाक हुआ?

वैवाहिक बंधन में बंधे सीमा और राकेश के जीवन में किसी तीसरे की एंट्री ने उथलपुथल मचा दी. सीमा के चरित्र पर उंगली उठाते राकेश ने कभी खुद के चरित्र को टटोला नहीं.सीमा के मुंह से तलाक शब्द सुनते ही राकेश के शरीर में बिजली कौंध गई, पर फिर…

Mother’s Day 2024: इन टिप्स को अपनाकर आप भी बन सकती हैं टैक्नोस्मार्ट मौम

उत्सव की रौनक हो या रिश्तेदारों के साथ खुशनुमा वक्त बिताने का मौका, बच्चों का होमवर्क कराना हो या प्यारी मौम का फर्ज निभाना, नई तकनीक का यह नया दौर हर पल को खास बनाता है.

एक तरफ जहां स्मार्ट फोन के जरीए आप खूबसूरत तसवीरें खींच कर कभी भी, कहीं भी सोशल साइट्स पर अपलोड कर सकती हैं, तो वहीं प्रिंटर्स की मदद से सजावट के लिए रंगबिरंगी कलरफुल डिजाइनों की कौपियां निकाल कर अपनी कला को अंजाम दे सकती हैं.

गृहिणियों के लिए कितनी कारगर

औफिस हो या घर, तकनीक हर क्षेत्र में महिलाओं के लिए सुविधाएं ले कर आई है. बस जरूरत है इसे समझने और प्रयोग में लाने की. टैक्नोलौजी के मामले में देखा जाए तो यह समय इस का सुनहरा समय ही कहा जाएगा.

ऐनर्जी सप्लायर ऐंड पावर द्वारा कुछ समय पहले यूके की 577 वयस्क महिलाओं पर किए गए एक अध्ययन के मुताबिक महिलाएं औसतन 1 सप्ताह में 18.2 घंटे घर के कामों में बिताती पाई गईं और इन कामों में क्लीनिंग, वैक्यूमिंग, शौपिंग और कुकिंग वगैरह शामिल है जबकि करीब 5 दशक पहले यही प्रतिशत 44 घंटे प्रति सप्ताह था.

घरेलू कामों में लगने वाले समय में लगातार कमी की मुख्य वजह नई तकनीकों का प्रयोग है.

एक समय था जब महिलाओं का सारा समय खाना बनाने, बच्चे पालने और घरेलू कामों को निबटाने में बीतता था. मगर आज वक्त बदल चुका है. नई तकनीक की मदद से घरेलू महिलाएं भी फटाफट काम खत्म कर अपने बचे समय का सदुपयोग कर रही हैं. आज खाना बनाने के लिए इलैक्ट्रौनिक और दूसरे कई तरह के गैजेट्स आ गए हैं, जिन से वक्त की बचत की जा सकती है.

कुकर, रोटी मेकर, डिशवाशर, टचस्क्रीन इंडक्शन, ओवन जैसे कितने ही उत्पाद हैं, जिन्होंने जहां किचन का काम आसान कर दिया है, वहीं फुली औटोमैटिक वाशिंग मशीन, वैक्यूम क्लीनर जैसे उत्पाद घर के काम फटाफट करने में मदद करते हैं. इन के जरीए अधिक सरलता से बेहतर काम हो जाता है. मगर इन सब को औपरेट करना और ढंग से सैट करना आना चाहिए.

तकनीकी ज्ञान जरूरी

दिल्ली की मनीषा अग्रवाल, जो हाउसवाइफ हैं, कहती हैं, ‘‘मैं हर तरह का तकनीकी ज्ञान रखती हूं. कोई भी नई तकनीक आती है तो उसे जाननेसमझने का प्रयास करती हूं. परिणामस्वरूप हाउसवाइफ होने के बावजूद मैं घरबाहर के सभी ऊपरी काम निबटा लेती हूं. मसलन, बैंक के सारे काम जैसे एफडी, डीडी आदि बनवाना, अपडेट कराना, क्रैडिट/डैबिट कार्ड्स का प्रयोग कर ट्रांजैक्शन वगैरह करना, औनलाइन टिकट बुक कराना, आधार से पैन कार्ड लिंक करना, एलआईसी प्रीमियम भरना वगैरह. हर जगह काम कंप्यूटरीकृत और औनलाइन होने लगे हैं. मैं उन्हें आसानी से कर लेती हूं.

‘‘दरअसल, हर महिला के लिए तकनीकी ज्ञान होना अपेक्षित है. उसे कंप्यूटर औपरेट करना आना चाहिए. गैजेट्स के तकनीकी पहलुओं की समझ होनी चाहिए. तभी वह स्मार्ट वूमन के साथ इंटैलिजैंट मौम बन सकती है.

‘‘बच्चों का होमवर्क मुझे ही करवाना होता है. उन्हें इस तरह के प्रोजैक्ट्स मिलते हैं, जिन्हें बिना कंप्यूटर और प्रिंटर के करना मुमकिन नहीं. कंप्यूटर से सामग्री निकालनी होती है. एमएस पावर पौइंट, एमएस पेंट, एमएस वर्ल्ड आदि पर काम करना पड़ता है. फिर प्रोजैक्ट तैयार कर प्रिंटर से कलर प्रिंटआउट निकालने होते हैं. इन सब के लिए कंप्यूटर और उस के सौफ्टवेयर से परिचित होना जरूरी है.

‘‘मैं ने तो यह जाना है कि यदि महिला तकनीकी रूप से समृद्घ है तो वह न सिर्फ पति और बच्चों की मदद कर सकती है वरन अपने परिचितों और रिश्तेदारों को भी सहयोग दे सकती है.’’

आत्मनिर्भर हो रही हैं महिलाएं

आज तकनीक ने हमें इतनी सुविधाएं दे दी हैं कि एक सिंगल टच से हम मीलों दूर शख्स के साथ भी वार्त्तालाप कर सकते हैं. स्मार्टफोन हाथ में हो तो जब चाहें कितनी भी दूर स्थित किसी भी परिचित या ऐक्सपर्ट के साथ अपनी परेशानियां शेयर कर समाधान पा सकती हैं.

स्क्रीनशौट और व्हाट्सऐप के जरीए तसवीरें भेज कर हर तरह की इनफौरमेशन शेयर की जा सकती है. इसी का नतीजा है कि महिलाएं घरपरिवार, बच्चों या औफिस से जुड़े किसी भी मसले को स्वयं हल करने में समर्थ बन सकी हैं.

कहीं भी जाना हुआ आसान

यदि महिला का अकेले या बच्चों के साथ कहीं जाना जरूरी हो जाए तो भी टैंशन की कोई बात नहीं. औनलाइन आसानी से टिकट बुक करा कर वह प्रोग्राम तय कर सकती है. आजकल ऐसे ऐप्स आ गए हैं, जिन के जरीए 5-10 मिनट में कैब घर पर बुलाई जा सकती है. गूगल मैप के जरीए सहजता से दुनिया के किसी भी कोने में पहुंचा जा सकता है. बिना किसी तरह की असुरक्षा के एहसास के महिलाएं घूम सकती हैं, क्योंकि तकनीक ने स्मार्टफोन में कई तरह के ऐसे ऐप्स डाल दिए हैं जो उन की सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित करते हैं.

नए विकल्पों की बढ़ती संभावना

महिलाएं स्मार्टफोन से फेसबुक वगैरह के जरीए अपने स्कूलकालेज के दोस्तों से जुड़ सकती हैं तब उन्हें कैरियर में आगे बढ़ने

के नएनए विकल्पों की जानकारी मिल सकती है. इस से उन का दिमाग खुलता है. आजकल महिलाएं घर से फ्रीलांसिंग भी करने लगी हैं. वैबसाइट्स बना रही हैं. बिजनैस कर रही हैं. इन सब बातों का सकारात्मक पक्ष यह है कि महिलाएं स्मार्ट और ऐक्टिव बनने के साथसाथ आत्मनिर्भर भी बन रही हैं.

जिम्मेदारियों का बेहतर निर्वहन

लेखिका और समाज सेविका कुसुम अंसल कहती हैं, ‘‘दुनिया भले ही 21वीं सदी में पदार्पण कर चुकी हो पर आज भी भारत में ज्यादातर महिलाएं परिवार से सबंधित घरेलू कार्यों और विभिन्न जिम्मेदारियों से जुड़ी हुई हैं. पुरुषों की तुलना में वे कम तर्कसंगत और कुशल पाई जाती हैं. लेकिन अब तकनीकी विकास के पसरते कदमों ने इन रूढिवादी बाधाओं को पार करना शुरू कर दिया है. आज की महिलाएं स्मार्टफोन, लैपटौप और कंप्यूटर वगैरह को आसानी से ऐक्सैस कर सकती हैं. वे यूट्यूब सरीखे सोशल मीडिया प्लेटफौर्मों पर उपलब्ध विभिन्न ट्यूटोरियल्स से सीख कर अपनी योग्यता बढ़ा सकती हैं ताकि अपने हितों व जिम्मेदारियों का बेहतर निर्वहन कर सकें.’’

ऐसा नहीं है कि महिलाओं के लिए तकनीकी ज्ञान में अपडेट रहना कठिन है या उन्हें इस की समझ नहीं. वे चाहें तो खुद को इस क्षेत्र में पुरुषों से कहीं बेहतर साबित कर सकती हैं. हाल ही में रिट्रेवो द्वारा किए गए गैजेटोलौजी टीएम स्टडी के मुताबिक महिलाएं कंज्यूमर इलैक्ट्रोनिक प्रोडक्ट्स के बारे में पुरुषों के मुकाबले कहीं ज्यादा जानती हैं जबकि पुरुषों को भ्रम रहता है कि उन्हें अधिक जानकारी है.

स्त्रियों को समझना होगा कि अपने परिवार व बच्चों को हर क्षेत्र में आगे बढ़ाने और सफल बनाने के लिए जरूरी है कि वे स्वयं भी स्मार्ट बनें. टैक्नोसेवी वूमन बन कर उन का मार्गदर्शन करें.

भारत में बढ़ते अरबपति और भूखीनंगी जनता

न्यूयौर्क ने 2024 में सब से अधिक अरबपतियों वाले शहर के रूप में बीजिंग को पीछे छोड़ दिया है. लंदन के बाद भारत का मुंबई शहर अरबपतियों की सब से अधिक संख्या वाला शहर बन गया है. बीते साल मुंबई में 26 नए अरबपति बने और मुंबई अरबपतियों के मामले में दुनिया की लिस्ट में तीसरे नंबर पर आ गया. जी हां, हुरुन रिसर्च की ‘2024 ग्लोबल रिच लिस्ट’ के मुताबिक, मुंबई में 92 अरबपति रहते हैं और यह एशिया में सब से ज्यादा अरबपतियों वाला शहर बन चुका है. मुंबई ने चीन की राजधानी बीजिंग को पीछे छोड़ कर यह मुकाम हासिल किया है, जहां 91 अरबपति हैं. हालांकि, अगर चीन की बात करें, तो भारत के 271 अरबपतियों के मुकाबले चीन में कुल 814 अरबपति हैं. न्यूयौर्क में 119 और लंदन में 97 अरबपति हैं. अरबपतियों के मामले में दिल्ली ने भी अपना मान बढ़ाया है और पहली बार अरबपतियों की लिस्ट में शामिल हुई है. दिल्‍ली का नाम भी पहली बार टौप 10 में शामिल हुआ है.

देश के अरबपतियों में सब से ऊपर रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी (115 अरब डौलर) हैं. इस के बाद नंबर आता है गौतम अडानी (86 अरब डौलर) का. इन की संपत्ति भी 34 फीसदी बढ़ गई है. देश में कुल मिला कर 94 अरबपतियों की संख्या बढ़ी है. इस तरह, कुल अरबपतियों की संख्या 271 पहुंच गई है. इन में से 26 नए अरबपतियों की संख्या सिर्फ मुंबई में ही जुड़ी है.

अरबपतियों की सूची में रोहिका साइरस मिस्‍त्री (साइरस मिस्‍त्री की पत्नी), इना अश्विन दानी (एशियन पेंट्स) जैसे नाम शामिल हैं. नए अरबपतियों में फार्मा, औटोमोबाइल, कैमिकल इंडस्ट्री जैसे सैक्‍टर्स के लोग ज्यादा शामिल हैं. मुंबई के सभी अरबपतियों की कुल संपत्ति 445 अरब डौलर है. यह पिछले साल की तुलना में 47 फीसदी अधिक है जबकि बीजिंग के अरबपतियों की कुल संपत्ति 265 अरब डौलर है. यह पिछले साल की तुलना में 28 फीसदी कम है. मुंबई पर एनर्जी और फार्मास्युटिकल्स जैसे सैक्टर से पैसों की बारिश हो रही है. इस में मुकेश अंबानी जैसे अरबपति खूब मुनाफ़ा बटोर रहे हैं. रियल एस्टेट के खिलाड़ी मंगल प्रभात लोढ़ा एंड फैमिली फीसदी (116 फीसदी) के लिहाज से मुंबई के सब से बड़े वैल्थगेनर थे. अगर दुनिया के अमीरों की लिस्ट की बात करें तो मुकेश अंबानी की संपत्ति में अच्छी ग्रोथ हुई है. इस का श्रेय मुख्य रूप से रिलायंस इंडस्ट्रीज़ को जाता है.

इसी तरह गौतम अडानी की संपत्ति में भी उल्लेखनीय वृद्धि ने उन्हें वैश्विक स्तर पर 8 पायदान ऊपर 15वें स्थान पर पहुंचा दिया है. एचसीएल के शिव नादर और उन के परिवार की संपत्ति और वैश्विक रैंकिंग दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है. वे 16 स्थान की छलांग लगाते हुए 34वें पर पहुंचने में कामयाब रहे. इस के विपरीत सीरम इंस्टिट्यूट के साइरस एस पूनावाला की कुल संपत्ति मामूली गिरावट के साथ 82 अरब डौलर पर रही. वे 9 पायदान गिर कर 55वें स्थान पर आ गए हैं. मुंबई को यह रुतबा हासिल कराने में सन फार्मास्युटिकल्स के दिलीप सांघवी (61वें स्थान) और कुमार मंगलम बिड़ला (100वें स्थान) का भी योगदान है. इन अरबपतियों की वजह से मुंबई ने आज अरबपतियों के शहर के मामले में चीन को पछाड़ा है.

कोविड महामारी के वक्त 9 करोड़ रुपयों का नुकसान उठाने वाले नोएडा बेस्ड एक ट्रेडिंग कंपनी के मालिक कहते हैं- ‘मोदी जी सिर्फ टौप के 10 उद्योगपतियों के मित्र हैं जो उन को पैसा देते हैं और दूसरी तरफ वे उन गरीबों के बारे में बात करते हैं जो उन को वोट देते हैं मगर उन को गरीबी से निकालने का उन का कोई इरादा नहीं है. वे उन को गरीब ही रखना चाहते हैं. मुफ्त राशन भी इसलिए दे रहे हैं ताकि यह वोटबैंक कहीं मर न जाए या बगावत न कर बैठे क्योंकि इन्हीं गरीबों की वजह से मोदी सत्ता में हैं.

ताज्जुब की बात है, एक ओर देश में अरबपतियों की संख्या बढ़ रही है दूसरी ओर देश में वे अस्सी करोड़ गरीब हैं जो अपने लिए दो वक्त का भोजन भी खुद नहीं जुटा पा रहे. मोदी सरकार अस्सी करोड़ लोगों को हर महीने मुफ्त राशन बांट कर गर्व महसूस कर रही है. उस का बढ़ चढ़कर बखान कर रही है. लेकिन यह गर्व की नहीं, शर्म की बात है कि एक तरफ देश की अस्सी करोड़ जनता भूखी और बदहाल है जबकि दूसरी ओर सारा पैसा कुछ सौ अरबपतियों की तिजोरियों में जमा हो गया है. यह शर्म की बात है कि आज़ादी के 75 साल बाद भी भारत के लोगों के घरों में उन की बहूबेटियों की इज्जत ढंकने के लिए अपना शौचालय नहीं है. सरकार उन को शौचालय बना कर दे रही है और बड़े गर्व से यह बात पूरी दुनिया को बता रही है. धिक्कार है. दुनिया की क्या राय बनी होगी भारत के बारे में.

जो मुंबई आज अरबपतियों की लिस्ट में तीसरे नंबर पर आ पहुंचा है उसी मुंबई में धारावी भी है जो एशिया का दूसरा सब से बड़ा स्लम एरिया है. इस की आबादी लगभग एक मिलियन है. धारावी को भारत की सब से बड़ी झुग्गी और दुनिया की तीसरी सब से बड़ी झुग्गी बस्ती एरिया कहा जाता है जहां इतने गरीब परिवार भी हैं जिन को एक वक्त खाना मिल गया तो दूसरे वक्त वे खाली पेट रहने को मजबूर हैं.

आज दुनिया के हर 3 गरीब में से 1 भारत में है. पढ़नेलिखने के बाद भी यहां ज्यादातर युवाओं को एक अदद नौकरी के लिए पापड़ बेलने पड़ते हैं. दरदर की ठोकरें खा कर भी पढ़ेलिखे ज्यादातर लोगों को नौकरी नहीं मिलती और वे छोटेमोटे कामधंधे कर के या ठेला-रेहड़ी-खोमचा लगा कर किसी तरह अपनी जिंदगी काटते हैं.

लगातार बढ़ती कीमतों के कारण बुनियादी जरूरत की चीजें भी गरीबों के हाथ से निकली जा रही हैं. गरीबीरेखा के नीचे रहने वाले व्यक्ति के लिए जीवित रहना एक चुनौती बन गया है. आय के संसाधनों का असमान वितरण गरीबी में वृद्धि का मुख्य कारण है. पूरे दिन मेहनत करने वाले मजदूर की आय 200 रुपए से ज़्यादा नहीं है. उन्हें रोज काम भी नहीं मिलता है. मालिकों को मजदूरों की कम आय और खराब जीवनशैली की कोई परवा नहीं है. उन की चिंता सिर्फ लागत में कटौती और अधिक से अधिक लाभ कमाना है. अकुशल कारीगरों के पास कम पैसों में काम करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.

हाल ही में देश के सब से बड़े अरबपति मुकेश अंबानी के बेटे की शादी की बड़ी चर्चा रही. मुकेश और नीता अंबानी ने अपने छोटे बेटे अनंत अंबानी और राधिका मर्चेंट की प्रीवैडिंग सेरेमनी में 1,260 करोड़ रुपए खर्च कर डाले. शादी अभी बाकी है जो जुलाई में होगी. अनंत अंबानी की प्रीवैडिंग में कई नैशनल और इंटरनैशनल सेलिब्रिटीज को बुलाया गया. इस सेरेमनी में हौलीवुड सिंगर रिहाना ने परफौर्म करने के लिए 74 करोड़ रुपए चार्ज किए. इस मौके पर मुकेश अंबानी ने अनंत और राधिका को 4.5 करोड़ रुपए की कार गिफ्ट की. इस प्रीवैडिंग में जिस खाने के मैन्यू की खूब चर्चा हुई उस पर भी 210 करोड़ रुपए खर्च किए गए. मजे की बात यह है कि इतना खर्च करने के बाद भी मुकेश अंबानी ने अपनी कुल संपत्ति का मात्र 0.1 फीसदी ही खर्च किया. लेकिन यह बात शायद आम लोगों तक नहीं पहुंची. उन्हें, बस, शानोशौकत दिखी जहां मार्क जुकरबर्ग से ले कर बौलीवुड के तीनों खानों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई.

अंबानी फैमिली ने इस से पहले अपने बड़े बेटा-बेटी की शादी में भी इसी तरह खूब पैसा लुटाया था. मुकेश अंबानी की इकलौती बेटी ईशा अंबानी की शादी अरबपति उद्योगपति अजय पीरामल के बेटे आनंद पीरामल से हुई थी. ईशा अंबानी के कपड़ों से ले कर कार्ड तक पर अंबानी फैमिली ने जम कर खर्च किया था. फाइनैंशियल एक्सप्रैस के मुताबिक, ईशा की शादी भारत की सब से महंगी शादी मानी जाती है. उन की शादी में कुल 700 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे. ईशा अंबानी की शादी का लहंगा ही 90 करोड़ रुपए का था.

इंटरनैशनल बिजनैस टाइम्स के अनुसार, मुकेश अंबानी ने अपने बड़े बेटे आकाश अंबानी की शादी के लिए स्विट्जरलैंड में एक हफ्ते के लिए आलीशान होटल बुक किया था, जिस के एक दिन का चार्ज 1 लाख रुपए था. यह होटल का सब से सस्ता रूम था, जो 500 मेहमानों के लिए बुक किया गया. शादी के एक कार्ड पर 1.5 लाख रुपए खर्च किए गए थे. नीता अंबानी ने अपनी बहू श्लोका अंबानी को शादी के तोहफे के तौर पर 451 करोड़ रुपए का मौवाड एल इंकम्पेरेबल हार दिया था. उस में 91 डायमंड जड़े हैं.

इस तरह की अमीर शादियों का प्रसारण तमाम टीवी चैनल और सोशल मीडिया प्लेटफौर्म पर होता है जो मध्यवर्ग को भी दिखावे और खर्चे के लिए प्रेरित करता है. मध्यवर्ग की शादियां निम्नवर्ग के सामने गलत उदाहरण प्रस्तुत करती हैं. यही वजह है कि रूढ़िवादी परंपराओं को निभाना, धर्म और दिखावे के कारण गरीब और मध्यवर्ग वाले कर्ज में डूबे रहते हैं. वे अमीरों की देखादेखी तड़कभड़क वाली शादी करते हैं. कर्ज ले कर बेवजह का खर्च करते हैं. शादी में दिए जाने वाला दहेज हो, मृत्युभोज हो या फिर आएदिन आने वाले तीजत्योहार हों, सब पर समाज में अपना मुंह दिखाने और अपनी हैसियत बताने के नाम पर वे भी अनापशनाप खर्च करते हैं. गरीबी का कुचक्र इसी प्रकार के खर्चों के कारण बना रहता है.

मध्य आयवर्ग में तो आजकल अपनी हैसियत से ज्यादा दिखावा करने और अपनी क्षमता से ज्यादा खर्च करने का ट्रैंड बन गया है. इस में बच्चों को महंगी शिक्षा, कार खरीदना, विदेशयात्रा, दानदहेज़ देना, धर्म के नाम पर मंदिरों में बड़ेबड़े चढ़ावे चढ़ाना, भंडारे करना, तीजत्योहारों में हैसियत से ज़्यादा खर्चा करना इत्यादि शामिल हैं. उधार चुकातेचुकाते अपनी मेहनत की कमाई लोग ऐसे ही कामों में लगा देते हैं और गरीबी में आ जाते हैं.

गरीब तबके में जनसंख्या भी बेहिसाब बढ़ रही है. स्लम एरिया, गांवदेहातों और झुग्गियों में रहने वाले लोग बेहिसाब बच्चे पैदा कर रहे हैं. उन के पास खाने को नहीं है, बच्चों को पढ़ाने के लिए पैसा नहीं है फिर भी एकएक परिवार में चारचार छहछह बच्चे पैदा हो रहे हैं. सरकार का कोई जनजागरूकता अभियान इन के कानों तक नहीं पहुंचता. सरकार सिर्फ जनसंख्या नियंत्रण और गरीबी उन्मूलन का राग ही अलापती है, करती कुछ नहीं है.

मोदी सरकार में नोटबंदी पहला ऐसा कदम था जिस की वजह से अमीरों की अमीरी बढ़ी और गरीब और अधिक गरीब हो गए. छोटे धंधे करने वालों की कमर टूट गई. दूसरा कदम जीएसटी को लागू करना था. असंगठित क्षेत्र के सारे व्यापारधंधे ठप हो कर रह गए. तीसरा कारण जब देशभर में कोरोना के 500 मामले हर रोज़ आ रहे थे तो संपूर्ण लौकडाउन लागू करना था. इस के कारण संगठित क्षेत्र से बड़ी संख्या में कर्मचारियों की छंटनी हुई, जो नौकरी में रह गए उन कर्मचारियों की तनख्वाह कम की गई और वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि की गई. सरकार के इन 3 कदमों ने अमीरों के और अमीर होने और गरीबों के और गरीब होने की गति कई गुणा बढ़ा दी. और अब सरकार का गरीबी उन्मूलन का कोई इरादा नहीं है. मुफ्त राशन बांट कर गरीबों को मुफ्तखोर और निठल्ला बनाने की योजना पर काम चल रहा है. गरीब को गुलाम बनाने और किसान को मजदूर बनाने के अभियान पर तेजी से काम हो रहा है.

मजाक नहीं, जिम्मेदारीभरा शब्द है ‘शहजादा’

प्रधानमंत्री भले ही शहजादा शब्द का प्रयोग मजाक या तंज में कर रहे हों लेकिन पौराणिक ग्रंथों में तमाम शहजादे ऐसे हैं जिन के पिताओं को दक्षिणापंथी सम्मान करते हैं. रामायण और महाभारत जैसे पौराणिक ग्रंथों में तमाम ऐेसे किरदार हैं जिन के शहजादों की आज भी पूजा होती है. ऐेसे में शहजादा शब्द का प्रयोग मजाक उड़ाने में कैसे किया जा सकता है.
दशरथ के शहजादे के नाम पर मंदिर की पूरी राजनीति टिकी है. देवकी और वासुदेव के शहजादे के विचारों को हमेशा आगे रखा जाता है. गीता का सारा ज्ञान वहीं से आता है. कंस जैसी दुरात्माओं के अंत के लिए इन की मदद लेनी पड़ी थी. शंकर के शहजादे की पूजा से ही दूसरी पूजा की शुरुआत होती है. ऐसे तमाम उदाहरण हैं जिन के शहजादों के बिना हमारा काम पूरा नहीं होता है. ऐसे में शहजादा शब्द मजाक का पर्याय कैसे हो सकता है? क्या भाषा बदल जाने से शब्द का अर्थ बदल जाता है.

अगर शहजादा मजाक का पर्याय है तो इन के पिताओं का भी मजाक उड़ रहा होगा. क्या यह पौराणिक कथाओं के मजाक उडाने वाला काम नहीं है. इस से हम उन का ही अपमान कर रहे हैं जिन के पदचिन्हों पर चलने की बात करते हैं. कुछ वोट के लिए हम अपने ही पूज्यों का अपमान नहीं कर रहे हैं? जब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कांग्रेस के नेता राहुल गांधी को शहजादा कह कर मजाक उड़ाते हैं उस का प्रभाव दूर तक पड़ रहा है. ऐसे में सवाल केवल शहजादा का ही नहीं, प्रिंस और राजकुमार का भी है. ये शब्द भी मजाक का पर्याय हो गए हैं. किसी को प्रिंस और राजकुमार कहा जाएगा तो उसे भी मजाक जैसा ही लगेगा.

चुनावीप्रचार का हिस्सा बना ‘शहजादे’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनावीप्रचार में ‘शहजादा’ का प्रयोग कांग्रेस नेता राहुल गांधी के लिए करते हैं. जब उन के साथ उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव और बिहार में तेजस्वी यादव को जोड़ना होता है तब ‘शहजादे‘ शब्द का प्रयोग करते हैं. राहुल और अखिलेश यादव को पहले 2 लड़कों की जोड़ी के नाम से संबोधित करते थे, अब उन को ‘2 शहजादे’ कहते हैं. पाकिस्तानी नेता फवाद चौधरी की सोशल मीडिया पोस्ट को ले कर पीएम मोदी ने गुजरात में चुनावी रैली में राहुल गांधी को निशाने पर लेते कहा, ‘संयोग देखिए, आज भारत में कांग्रेस कमजोर हो रही है. आप को पता चला होगा कि अब कांग्रेस के लिए पाकिस्तानी नेता दुआ कर रहे हैं. शहजादे को भारत का प्रधानमंत्री बनाने के लिए पाकिस्तान उतावला है.’
पीटीआई प्रमुख इमरान खान के करीबी और पाकिस्तान के पूर्व मंत्री फवाद चौधरी ने सोशल मीडिया प्लेटफौर्म एक्स हैंडल पर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी का समर्थन करते हुए एक वीडियो शेयर किया था, जिस में राहुल गांधी अयोध्या में हुए रामलला की प्राणप्रतिष्ठा समारोह का जिक्र कर प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा पर निशाना साध रहे हैं. फवाद चौधरी ने इस वीडियो को एक्स हैंडल पर रिपोस्ट करते हुए लिखा था- ‘राहुल औन फायर’.

बिहार में चुनावी प्रचार में पीएम मोदी ने लालू यादव पर गोधरा कांड के दोषियों को बचाने की कोशिश करने का आरोप लगाया. पीएम मोदी ने राहुल गांधी और तेजस्वी यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि जैसे एक शहजादा दिल्ली में है, वैसे ही एक शहजादा पटना में भी है. एक शहजादे ने बचपन से पूरे देश को और दूसरे शहजादे ने पूरे बिहार को अपनी जागीर समझा है. इन दोनों शहजादों के रिपोर्ट कार्ड एकजैसे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद पर यूपीए शासनकाल के दौरान गोधरा कांड के जिम्मेदार लोगों को बचाने की कोशिश करने का आरोप लगाया. दरभंगा संसदीय क्षेत्र में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए मोदी ने गोधरा कांड का जिक्र किया और आरोप लगाया कि विपक्षी दल हमेशा तुष्टीकरण की राजनीति करते हैं.
नरेंद्र मोदी ने कहा, ‘जब गोधरा में कारसेवकों को जिंदा जलाया गया था तब देश के रेल मंत्री, राजद के शाहजादे के पिता थे जो चारा घोटाला मामले में सजा काट कर जमानत पर घूम रहे हैं.’ मोदी ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा, ‘आप को पता होगा यह दिल्ली वाले शहजादे एक नई बात ले कर आए हैं. कांग्रेस ऐसा कानून बनना चाहती है कि जिस से आप के मांबाप ने जो कमाया है, वह आप को नहीं मिलेगा.’

शाहजादे के जवाब में पीरजादे और शहंशाह

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राहुल गांधी और तेजस्वी यादव को शहजादा कहा है, जिस पर बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने पलटवार किया है. तेजस्वी यादव ने कहा कि अगर हम शहजादे हैं तो पीएम मोदी पीरजादे हैं. वे बड़े हैं, बुजुर्ग हैं, उन्हें कुछ भी कहने का अधिकार है. जैसा वे कहेंगे वैसा ही जवाब मिलेगा. उन को शब्दों का चुनाव सोचसमझ कर करना चाहिए. वे झूठ अधिक बोलते हैं. काम की बात होनी चाहिए. मिथिला के लोग बहुत प्रबुद्ध हैं. वे काम की बात सुनना चाहते हैं. बिहार में भाजपा की हालत बहुत खराब है. लोग झूठे वादों से ऊब चुके हैं.

तेजस्वी यादव की बहन मीसा भारती ने कहा कि प्रधानमंत्री जिस के लिए शहजादा का प्रयोग कर रहे हैं उस ने बिहार में उपमुख्यमंत्री के रूप में 5 लाख युवाओं को नौकरी देने का काम किया है. इस तरह से ‘शहजादे विवाद’ में दोनों तरफ से नेता अपने बयानों से वार-पलटवार कर रहे हैं. कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘शहजादा’ तंज पर पलटवार करते हुए नरेंद्र मोदी को ‘शहंशाह’ बताया, जो महल में रहते हैं और जनता से कटे हुए हैं.

प्रियंका गांधी ने कहा, ‘वे मेरे भाई को शहजादा कहते हैं. मैं उन्हें बताना चाहती हूं कि यह शहजादे आम लोगों की समस्याएं सुनने के लिए कन्याकुमारी से कश्मीर तक 4,000 किलोमीटर तक चले, किसानों और मजदूरों से मिले तथा उन से पूछा कि वे उन की समस्याओं का कैसे समाधान कर सकते हैं. दूसरी ओर आप के ‘शहंशाह’ नरेंद्र मोदी हैं. वे महलों में रहते हैं. क्या आप ने कभी टीवी पर उन का चेहरा देखा है? एकदम साफसुथरा सफेद कुरता, धूल का एक दाग नहीं है. एक बाल इधर से उधर नहीं हो रहा है. वे आप की मेहनत, आप की खेती को कैसे समझेंगे? वे आप की समस्याओं को कैसे समझेंगे, आप महंगाई के बोझ से दबे हुए हैं.’

भक्ति के नाम पर लुटते भक्त

राजस्थान के पाली शहर में शिवरात्रि के मौके पर उमड़ी भीड़ का फायदा उठा कर जेबकतरों ने कितनों की ही जेबें काट डालीं. उधर सोमनाथ मंदिर में 2 युवकों ने तो हल्ला मचाया और पुलिस पहुंची भी लेकिन कुछ पता न चला. इस छोटे से शहर में शोभायात्रा, कलश यात्राओं और दर्शन के लिए उमड़ी औरतों के सोने के गहनों की उठाईगीरी में लगी औरतें भक्त बन कर घुसतीं और फिर महंगी गाडि़यों में उड़नछू हो जातीं. पकड़े गए एक गैंग ने 12 चोरियों में तो अपना हाथ होना मान लिया.

उज्जैन में महाकाल मंदिर में भी कम से कम 16 लोगों ने मोबाइल व पर्स चोरी होने की शिकायतें कीं. औरतें गहने पहन कर ही दर्शनों के लिए जाती हैं शायद इसलिए कि उन्हें आशा होती है कुछ ज्यादा ही मंदिर की कृपा से मिलेगा पर जो उन के पास होता है वह भी हाथ से निकल जाता है. पुलिस इक्केदुक्के को पकड़ तो लेती है पर किसी से भी कुछ बरामद नहीं होता क्योंकि जेबकतरे, चोर, छीनने वाले तुरंत चुराया सामान दूसरों को दे देते हैं.

उदयपुर के चित्तौड़ग़ढ़ इलाके में सांवलिया सेठ मंदिर के बैंक खाते से पैसे निकालने की साजिश का पता चला. मंदिर को हर महीने 6 से 8 करोड़ रुपयों का चढ़ावा मिलता है. अयोध्या के राम मंदिर के नाम पर लूटने के कई धंधे चल रहे हैं. राम मंदिर दर्शन टिकट, राम मंदिर फ्री प्रसाद, राम मंदिर रेलयात्रा टिकट, राम मंदिर बसयात्रा टिकट, राम मंदिर अयोध्या रुकने की जगह के इंतजाम के लिए बाकायदा क्यूआर कोड बना कर ऐसी वैबसाइटें मौजूद हैं जो बिलकुल आधिकारिक लगती हैं पर होती फेक हैं. इन में पैसा डालने के बाद एकदम चुप्पी छा जाती है और अंधभक्त, जो वैसे ही ठगे जाने के लिए तैयार होता है, मंदिर द्वारा नहीं, मंदिर के नाम पर बैठे लुटेरों के हाथों ठगा जाता है.

मध्य प्रदेश के सागर कैंट थाना में पंचशील पंप के पास जैन मंदिर से पूजा कर के लौट रही एक भक्त से 2 ठगों ने पहले पानी पिलाने को कहा, फिर ?ांसा दे कर गहने उतरवा लिए. ठगों की करतूतें आजकल ही नहीं, हमेशा से मंदिरों के अंधभक्तों पर हावी रही हैं. यह कमाल है अंधभक्ति और अंधविश्वास के प्रचार का जिस में मंत्री, संतरी और मीडिया सब लगे रहते हैं. लोगों को बारबार विश्वास दिलाया जाता है कि मंदिरों की शरण में जाओ, सब दर्ददुख दूर  हो जाएंगे. बदले में अमुक पार्टी को वोट दो और मंदिरों को चंदा दो. इस का फायदा जो चुनाव जीतते हैं वे उठाते हैं, जो मंदिर चलाते हैं वे उठाते हैं और जो ठगी करते हैं वे भी बहते चरणामृत को पी कर अमर हो रहे हैं.

यह इस अंधविश्वास के प्रचार का कमाल है जो चुनावी मंचों से हो रहा है कि लोग अपने घरों को तोड़ कर नींवों से सोना निकालने के चक्कर में भी आ जाते हैं, वास्तु के नाम पर घरों का खाका बदलने के लिए लाखों रुपए खर्च कर देते हैं. बेचारे बुजुर्ग अपने अंधविश्वास के कारण युवाओं को मंदिरों में ले जाने की जिद करते हैं और फिर वहां से चोट खा कर लौटते हैं. लगभग एक माह में हुई इन घटनाओं से अंधभक्त कोई सबक लेंगे, इस का भरोसा नहीं क्योंकि उन से तो बारबार यह कहा जा रहा है कि मंदिर ही देश का उत्थान करेगा, सो, वे भला क्यों तर्क वाली सच बात सुनने लगे.

इजराइल की हठधर्मिता

इजराइल की हठधर्मी अब सीमाएं पार कर रही है. लगता है इस ने पूरे विश्व को डांवांडोल करने की ठान ली है. दशकों से फिलिस्तीनियों पर हो रहे जुल्म के खिलाफ हमास द्वारा 7 अक्तूबर, 2023 को किए गए मिसाइल व जमीनी अटैक, जिस में काफी इजराइली अगवा कर लिए गए थे, का बदला लेने के लिए बजाय हमास को खत्म करने के इजराइल ने आसान तरीका अपनाया और फिलिस्तीनियों की गाजा पट्टी में बसी बस्तियों पर भारी बमबारी शुरू कर दी जिस में लड़ाकुओं के नहीं, आमजनों के घर तोड़े व उन में रहने वाले मारे जाने लगे.

जो काम हिटलर ने 1940 और 1945 में जरमनी, पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया, हंगरी में यहूदियों के साथ किया, उसी बर्बरता के साथ बेंजामिन नेतन्याहू की इजराइली सेनाओं ने किया. गाजा पट्टी को होलोकास्ट के बदनाम गैसचैंबरों में तबदील कर दिया गया. जो यूरोप और अमेरिका यूक्रेन पर रूसी आक्रमण के दौरान यूक्रेन की सहायता के लिए दौड़े वे इस हमले पर चुप रहे क्योंकि फिलिस्तीनियों ने पिछले 4-5 दशकों में आतंकवादी घटनाओं में साथ दिया था. मानवीय मूल्यों को भुला कर राजनीतिक मकसद के लिए हथियार उठाना सब को भारी पड़ रहा है और अब इस संघर्ष में ईरान के कूद जाने से यह संकट और ज्यादा गंभीर हो गया है.

ईरान के पास न्यूक्लियर बम भी हैं और मरने को तैयार कट्टर इसलामी लड़ाके भी. न इजराइल, न ईरान, न फिलिस्तीनी अब दुनिया के किसी देश की सुनते हैं, न बेगुनाहों की मौतों की चिंता करते हैं. पाकिस्तान से ले कर इजराइल तक के मुसलिम और यहूदी देश आज बेहद असुरक्षित हैं, कहीं भी, किसी भी कोने से यहां हमले हो सकते हैं और सरकारें एकदूसरे के खिलाफ मौत की साजिशें करती रहती हैं.

जिस तकनीक व साइंस का इस्तेमाल मानव को सुखी दिन देने के लिए किया जा रहा था उसे यहां मारने के लिए किया जा रहा है. ड्रोन, कंप्यूटर, इंटरनैट, सैटेलाइट टैक्नोलौजी आदि सब का विकास वैज्ञानिकों ने मानवहितों के लिए किया था. आज शासक सत्ता पाने या बनाए रखने के लिए इन का भरपूर दुरुपयोग कर रहे हैं.

इजराइल ने इतिहास का नाम ले कर सदियों पहले छोड़ी जमीन पर फिर से पश्चिमी देशों की सहायता से कब्जा कर लिया पर अपने पड़ोसियों को दोस्त बनाने की जगह दुश्मन बना डाला. धर्म ने पहले सदियों तक यहूदियों को ईसाइयों के भगवान जीसस क्राइस्ट की हत्या के लिए दोषी मान कर उन से पीढ़ीदरपीढ़ी बदला लिया और अब यहूदी अरबों को अपने पूर्वजों को इजराइल की जमीन से सैकड़ों साल पहले भगाने के जुर्म की सजा दे रहे हैं.

इतिहास का नाम ले कर दुनिया के कितने ही देशों में शासक अपनी सत्ता बनाए रखते हैं. भारत भी इस में से एक है. अयोध्या का मंदिर इसी की निशानी है कि धर्म के नाम पर पुरानी बातों की कहानियों को खोल कर कैसे आज सत्ता पाई जा सकती है और लोगों को मरनेमारने के लिए तैयार किया जा सकता है.

इजराइल पश्चिम एशिया में जो कर रहा है वह एक बहुत गलत उदाहरण है. 75 सालों में वह उस जमीन पर पहले बसे लोगों से सम?ाता नहीं कर पाया, यह उस की नीतिगत गलती है, भूल है और इजराइल ने जो अद्भुत उन्नति इन सालों में की है वह उसे राख में मिला सकती है.

ईरानी शासकों का दखल दुनिया को बहुत महंगा पड़ेगा क्योंकि ईरान बेलगाम देश है जो धर्म के नाम पर हर अति को सामान्य सम?ाता है. 14 अप्रैल को ईरान के सैकड़ों ड्रोनों का इजराइल पर हमले का तेहरान व दूसरे देशों में खुल कर जश्न मनाया गया जबकि यह मालूम है कि इस का मतलब है इजराइल का पटलवार जिस में ईरान में जानें तो जाएंगी ही, जो कुछ पिछले सालों में बना है वह नष्ट भी हो जाएगा.

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