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इसमें बुरा क्या है : महेश और आभा ने मां के साथ क्या किया

महेश और आभा औफिस जाने के लिए तैयार हो ही रहे थे कि आभा का मोबाइल बज उठा. आभा ने नंबर देखा, ‘रुक्मिणी है,’ कहते हुए फोन उठाया. कुछ ही पलों बाद ‘ओह, अच्छा, ठीक है,’ कहते हुए फोन रख दिया. चेहरे पर चिंता झलक रही थी. महेश ने पूछा, ‘‘कहीं छुट्टी तो नहीं कर रही है?’’

‘‘3 दिन नहीं आएगी. उस के घर पर मेहमान आए हैं.’’ दोनों के तेजी से चलते हाथ ढीले पड़ गए थे. महेश ने कहा, ‘‘अब?’’

‘‘क्या करें, मैं ने पिछले हफ्ते 2 छुट्टियां ले ली थीं जब यह नहीं आई थी और आज तो जरूरी मीटिंग भी है.’’

‘‘ठीक है, आज और कल मैं घर पर रह लेता हूं. परसों तुम छुट्टी ले लेना,’’ कह कर महेश फिर घर के कपड़े पहनने लगे. उन की 10वीं कक्षा में पढ़ रही बेटी मनाली और चौथी कक्षा में पढ़ रहा बेटा आर्य स्कूल के लिए तैयार हो चुके थे. नीचे से बस ने हौर्न दिया तो दोनों उतर कर चले गए. आभा भी चली गई. महेश ने अंदर जा कर अपनी मां नारायणी को देखा. वे आंख बंद कर के लेटी हुई थीं. महेश की आहट से भी उन की आंख नहीं खुली. महेश ने मां के माथे पर हाथ रख कर देखा, बुखार तो नहीं है?

मां ने आंखें खोलीं. महेश को देखा. अस्फुट स्वर में क्या कहा, महेश को समझ नहीं आया. महेश ने मां को चादर ओढ़ाई, किचन में जा कर उन के लिए चाय बनाई, साथ में एक टोस्ट ले कर मां के पास गए. उन्हें सहारा दे कर बिठाया. अपने हाथ से टोस्ट खिलाया. चाय भी चम्मच से धीरेधीरे पिलाई. 90 वर्ष की नारायणी सालभर से सुधबुध खो बैठी थीं. वे अब कभीकभी किसी को पहचानती थीं. अकसर उन्हें कुछ पता नहीं चलता था. रुक्मिणी को उन्हीं की देखरेख के लिए रखा गया था. रुक्मिणी के छुट्टी पर जाने से बहुत बड़ी समस्या खड़ी हो जाती थी. इतने में साफसफाई और खाने का काम करने वाली मंजू बाई आई तो महेश ने कहा, ‘‘मंजू, देख लेना मां के कपड़े बदलने हों तो बदल देना.’’

मां का बिस्तर गीला था. मंजू ने ही उन्हें सहारा दे कर खड़ा किया. बिस्तर महेश ने बदल दिया. ‘‘मां के कपड़े बदल दो, मंजू,’’ कह कर महेश कमरे से बाहर गए तो मंजू ने नारायणी को साफ धुले कपड़े पहनाए और मां को फिर लिटा दिया.

नारायणी के 5 बेटे थे. सब से बड़ा बेटा नासिक के पास एक गांव में रहता था. बाकी चारों बेटे मुंबई में ही रहते थे. महेश घर में सब से छोटे थे. नारायणी ने हमेशा महेश के ही साथ रहना पसंद किया था. महेश का टू बैडरूम फ्लैट एक अच्छी सोसाइटी में दूसरे फ्लोर पर था. एक वन बैडरूम फ्लैट इसी सोसाइटी में किराए पर दिया हुआ था. पहले महेश उसी में रहते थे पर बच्चों की पढ़ाई और मां की दिन पर दिन बढ़ती अस्वस्थता के चलते बाकी भाइयों के आनेजाने से वह फ्लैट काफी छोटा पड़ने लगा था. तो वे इस फ्लैट में शिफ्ट हो गए थे. मां की सेवा और देखरेख में महेश और आभा ने कभी कोई कमी नहीं छोड़ी थी. कुछ महीनों पहले जब नारायणी चलतीफिरती थीं, रुक्मिणी का ध्यान इधरउधर होने पर सीढि़यों से उतर कर नीचे पहुंच जाती थीं. फिर वाचमैन ही उन्हें ऊपर तक छोड़ कर जाया करता था. महेश के सामने वाले फ्लैट में रहने वाले रिटायर्ड कुलकर्णी दंपती ने हमेशा महेश के परिवार को नारायणी की सेवा करते ही देखा था. उन के दोनों बेटे विदेश में कार्यरत थे. आमनेसामने दोनों परिवारों में मधुर संबंध थे. पर जब से नारायणी बिस्तर तक सीमित हो गई थीं, सब की जिम्मेदारी और बढ़ गई थी.

बच्चे स्कूल से वापस आए तो महेश ने हमेशा की तरह पहले मां को बिठा कर अपने हाथ से खिलाया. उस के औफिस में रहने पर रुक्मिणी ही उन का हर काम करती थी. फिर बच्चों के साथ बैठ कर खुद लंच किया. मां की हालत देख कर महेश की आंखें अकसर भर आती थीं. उसे एहसास था कि उस के पैदा होने के एक साल बाद ही उस के पिता की मृत्यु हो गई थी. पिता गांव के साधारण किसान थे. 5 बेटों को नारायणी ने कई छोटेछोटे काम कर के पढ़ायालिखाया था. अपने बच्चों को सफल जीवन देने में जो मेहनत नारायणी ने की थी उस के कई प्रत्यक्षदर्शी रिश्तेदार थे जिन के मुंह से नारायणी के त्याग की बातें सुन कर महेश का दिल भर आता था. यह भी सच था कि जितनी जिम्मेदारी और देखरेख मां की महेश करते थे उतनी कोई और बेटा नहीं कर पाया था. शायद, इसलिए नारायणी हमेशा महेश के साथ ही रहना पसंद करती थीं.

नारायणी को एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोड़ा जाता था, यहां तक कि घूमनेफिरने का प्रोग्राम भी इस तरह बनाया जाता था कि कोई न कोई घर पर उन के पास रहे. मनाली की इस साल 10वीं बोर्ड की परीक्षा थी. तो वह अपनी पढ़ाई में व्यस्त थी. शाम को महेश के बड़े भाई का फोन आया कि वे होली पर मां को देखने सपरिवार आ रहे हैं. मनाली के मुंह से तो सुनते ही निकला, ‘‘पापा, उस दौरान बोर्ड की परीक्षाएंशुरू होंगी. मैं सब लोगों के बीच कैसे पढ़ूंगी?’’ ‘‘ओह, देखते हैं,’’ महेश इतना ही कह पाए. सबकुछ ठीकठाक चल रहा था पर आजकल मां को देखने के नाम पर जो भीड़ अकसर जुटती रहती थी उस से महेश और आभा को काफी असुविधा हो रही थी. हर भाई के 2 या 3 बच्चे तो थे ही, सब आते तो उन की आवभगत में महेश या आभा को औफिस से छुट्टी करनी ही पड़ती थी, ऊपर से बच्चों की पढ़ाई में व्यवधान पड़ता. मां को देखने आने का नाम ही होता, उन के पास बैठ कर उन की सेवा करने की इच्छा किसी की भी नहीं होती. सब घूमतेफिरते, अच्छेअच्छे खाने की फरमाइश करते. भाभियां तो मां के गीले कपड़े बदलने के नाम से ही कोई बहाना कर वहां से हट जातीं. आभा ही रुक्मिणी के साथ मिल कर मां की सेवा में लगी रहती. अब महेश थोड़ा चिंतित हुए, दिनभर सोचते रहे कि क्या करें, मां की तरफ से भी लापरवाही न हो, बच्चों की पढ़ाई में भी व्यवधान न हो.

महेश और आभा दोनों ही मल्टीनैशनल कंपनी में अच्छे पदों पर थे. आर्थिक स्थिति अच्छी ही थी, शायद इसलिए भी दिनभर कई तरह की बातें सोचतेसोचते आखिर एक रास्ता महेश को सूझ ही गया. रात को आभा लौटी तो महेश, भाई के सपरिवार आने का और मनाली की परीक्षाओं का एक ही समय होने के बारे में बताते हुए कहने लगे, ‘‘आभा, दिनभर सोचने के बाद एक बात सूझी है. मैं दूसरा फ्लैट खाली करवा लेता हूं. मां को वहां शिफ्ट कर देते हैं. मां के लिए किसी अतिविश्वसनीय व्यक्ति का उन के साथ रहने का प्रबंध कर देते हैं.’’

‘‘यह क्या कह रहे हो महेश? मां अकेली रहेंगी?’’

‘‘अकेली कहां? हम वहां आतेजाते ही रहेंगे. पूरी नजर रहेगी वहां हमारी. जो भी रिश्तेदार उन्हें देखने के नाम से आते हैं, वहीं रह लेंगे और यहां भी आने की किसी को मनाही थोड़े ही होगी. मैं ने बहुत सोचा है इस बारे में, मुझे इस में कुछ गलत नहीं लग रहा है. थोड़े खर्चे बढ़ जाएंगे, 2 घरों का प्रबंध देखना पड़ेगा, किराया भी नहीं आएगा. लेकिन हम मां की देखरेख में कोई कमी नहीं करेंगे. बच्चों की पढ़ाई भी डिस्टर्ब नहीं होने देंगे.’’

‘‘महेश, यह ठीक नहीं रहेगा? मां को कभी दूर नहीं किया हम ने,’’ आभा की आंखें भर आईं.

‘‘तुम देखना, यह कदम ठीक रहेगा. किसी को परेशानी नहीं होगी. और अगर किसी को भी तकलीफ हुई तो मां को यहीं ले आएंगे फिर.’’

‘‘ठीक है, जैसा तुम्हें ठीक लगे.’’

अगला एक महीना महेश और आभा काफी व्यस्त रहे. दूसरा फ्लैट बस 2 बिल्ंडग ही दूर था. किराएदार भी महेश की परेशानी समझ जल्दी से जल्दी फ्लैट खाली करने के लिए तैयार हो गए. महेश ने स्वयं उन के लिए दूसरा फ्लैट ढूंढ़ने में सहयोग किया. महेश की रिश्तेदारी में एक लता काकी थीं, जो विधवा थीं, जिन की कोई संतान भी नहीं थी. वे कभी किसी रिश्तेदार के यहां रहतीं, कभी किसी आश्रम में चली जातीं. महेश ने उन की खोजबीन की तो पता चला वे पुणे में किसी रिश्तेदार के घर में हैं. महेश खुद कार ले कर उन्हें लेने गए. नारायणी जब स्वस्थ थीं, वे तब कई बार उन के पास मिलने आती थीं. महेश को देख कर लता काफी खुश हुईं और जब महेश ने कहा, ‘‘बस, मैं आप पर ही मां की देखभाल का भरोसा कर सकता हूं काकी, आप उन के साथ रहना, घर के कामों के लिए मैं एक फुलटाइम मेड का प्रबंध कर दूंगा,’’ लता खुशीखुशी महेश के साथ आ गईं.

दूसरा फ्लैट खाली हो गया. एक फुलटाइम मेड राधा का प्रबंध भी हो गया था. एक रविवार को मां को दूसरे फ्लैट में ले जाया जा रहा था. महेश और आभा ने उन के हाथ पकड़े हुए थे. वे बिलकुल अंजान सी साथ चल रही थीं. सामने वाले फ्लैट के मिस्टर कुलकर्णी पूरी स्थिति जानते ही थे. वे कह रहे थे, ‘‘महेशजी, आप ने सोचा तो सही है पर आप की भागदौड़ और खर्चे बढ़ने वाले हैं.’’

‘‘हां, देखते हैं, आगे समझ आ ही जाएगा, यह सही है या नहीं?’’ आभा ने वहां किचन पूरी तरह से सैट कर ही दिया था. लता काकी को सब निर्देश दे दिए गए थे. महेश ने उन्हें यह भी संकेत दे दिया था कि वे उन्हें हर महीने कुछ धनराशि भी जरूर देंगे. वे खुश थीं. उन्हें अब एक ठिकाना मिल गया था. सोसाइटी में पहले तो जिस ने सुना, हैरान रह गया. कई तरह की बातें हुईं. किसी ने कहा, ‘यह तो ठीक नहीं है, बूढ़ी मां को अकेले घर में डाल दिया.’ पर समर्थन में भी लोग थे. उन का कहना था, ‘ठीक तो है, मां जी को देखने इतना आनाजाना होता है, लोगों की भीड़ रहती थी, यह अच्छा विचार है.’ महेश और बाकी तीनों भी मां के आसपास ही रहते, जिस को समय मिलता, वहीं पहुंच जाता. मां अब किसी को पहचानती तो थीं नहीं, पर फिर भी सब ज्यादा से ज्यादा समय वहीं बिताते. वहां की हर जरूरत पर उन का ध्यान रहता. मिस्टर कुलकर्णी ने अकसर देखा था महेश सुबह औफिस जाने से पहले और आने के बाद सीधे वहीं जाते हैं और छुट्टी वाले दिन तो अकसर सामने ताला रहता, मतलब सब नारायणी के पास ही होते. 3 महीने बीत गए. होली पर भाई सपरिवार आए. पहले तो उन्हें यह प्रबंध अखरा पर कुछ कह नहीं पाए. आखिर महेश ही थे जो सालों से मां की सेवा कर रहे थे. मनाली की परीक्षाएं भी बिना किसी असुविधा के संपन्न हो गई थीं. मां की हालत खराब थी. उन्होंने खानापीना छोड़ दिया था. डाक्टर को बुला कर दिखाया गया तो उन्होंने भी संकेत दे दिया कि अंतिम समय ही है. कभी भी कुछ हो सकता है. बड़ी मुश्किल से उन के मुंह में पानी की कुछ बूंदें या जूस डाला जाता. लता काकी को इन महीनों में एक परिवार मिल गया था.

मां को कुछ होने की आशंका से लता काकी हर पल उदास रहतीं और एक रात नारायणी की सांसें उखड़ने लगीं तो लता काकी ने फौरन महेश को इंटरकौम किया. महेश सपरिवार भागे. मां ने हमेशा के लिए आंखें मूंद लीं. सब बिलख उठे. महेश बच्चे की तरह रो रहे थे. आभा ने सब भाइयों को फोन कर दिया. सुबह तक मुंबई में ही रहने वाले भाई पहुंच गए, बाकी रिश्तेदारों का आना बाकी था. सोसाइटी में सुबह खबर फैलते ही लोग इकट्ठा होते गए. भीड़ में लोग हर तरह की बातें कर रहे थे. कोई महेश की सेवा के प्रबंध की तारीफ कर रहा था, वहीं सोसाइटी के ही दिनेशजी और उन की पत्नी सुधा बातें बना रहे थे, ‘‘अंतिम दिनों में अलग कर दिया, अच्छा नहीं किया, मातापिता बच्चों के लिए कितना करते हैं और बच्चे…’’

वहीं खड़े मिस्टर कुलकर्णी से रहा नहीं गया. उन्होंने कहा, ‘‘भाईसाहब, महेशजी ने अपनी मां की बहुत ही सेवा की है, मैं ने अपनी आंखों से देखा है.’’

‘‘हां, पर अंतिम समय में दूर…’’

‘‘दूर कहां, हर समय तो ये सब उन के आसपास ही रहते थे. उन की हर जरूरत के समय, वे कभी अकेली नहीं रहीं, आर्थिक हानिलाभ की चिंता किए बिना महेशजी ने सब की सुविधा का ध्यान रखते हुए जो कदम उठाया था, उस में कुछ भी बुरा नहीं है. आप के बेटेबहू भी तो अपने बेटे को ‘डे केयर’ में छोड़ कर औफिस जाते हैं न, तो इस का मतलब यह तो नहीं है न, कि वे अपने बेटे से प्यार नहीं करते. आजकल की व्यस्तता, बच्चों की पढ़ाई, सब ध्यान में रखते हुए कुछ नए रास्ते सोचने पड़ते हैं. इस में बुरा क्या है. बातें बनाना आसान है. जिस पर बीतती है वही जानता है.  महेशजी और उन का परिवार सिर्फ प्रशंसा का पात्र है, एक उदाहरण है.’’ वहां उपस्थित बाकी लोग मिस्टर कुलकर्णी की बात से सहमत थे. दिनेशजी और उन की पत्नी ने भी अपने कहे पर शर्मिंदा होते हुए उन की बात के समर्थन में सिर हिला दिया था.

इस में गलत क्या है : आखिर मेरी क्या गलती थी

मेरी छोटी बहन रमा मुझे समझा रही है और मुझे वह अपनी सब से बड़ी दुश्मन लग रही है. यह समझती क्यों नहीं कि मैं अपने बच्चे से कितना प्यार करती हूं.

‘‘मोह उतना ही करना चाहिए जितना सब्जी में नमक. जिस तरह सादी रोटी बेस्वाद लगती है, खाई नहीं जाती उसी तरह मोह के बिना संसार अच्छा नहीं लगता. अगर मोह न होता तो शायद कोई मां अपनी संतान को पाल नहीं पाती. गंदगी, गीले में पड़ा बच्चा मां को क्या किसी तरह का घिनौना एहसास देता है? धोपोंछ कर मां उसे छाती से लगा लेती है कि नहीं. तब जब बच्चा कुछ कर नहीं सकता, न बोल पाता है और न ही कुछ समझा सकता है.

‘‘तुम्हारे मोह की तरह थोड़े न, जब बच्चा अपने परिवार को पालने लायक हो गया है और तुम उस की थाली में एकएक रोटी का हिसाब रख रही हो, तो मुझे कई बार ऐसा भी लगता है जैसे बच्चे का बड़ा होना तुम्हें सुहाया ही नहीं. तुम को अच्छा नहीं लगता जब सुहास अपनेआप पानी ले कर पी लेता है या फ्रिज खोल कर कुछ निकालने लगता है. तुम भागीभागी आती हो, ‘क्या चाहिए बच्चे, मुझे बता तो?’

‘‘क्यों बताए वह तुम्हें? क्या उसे पानी ले कर पीना नहीं आता या बिना तुम्हारी मदद के फल खाना नहीं आएगा? तुम्हें तो उसे यह कहना चाहिए कि वह एक गिलास पानी तुम्हें भी पिला दे और सेब निकाल कर काटे. मौसी आई हैं, उन्हें भी खिलाए और खुद भी खाए. क्या हो जाएगा अगर वह स्वयं कुछ कर लेगा, क्या उसे अपना काम करना आना नहीं चाहिए? तुम क्यों चाहती हो कि तुम्हारा बच्चा अपाहिज बन कर जिए? जराजरा सी बात के लिए तुम्हारा मुंह देखे? क्यों तुम्हारा मन दुखी होता है जब बच्चा खुद से कुछ करता है? उस की पत्नी करती है तो भी तुम नहीं चाहतीं कि वह करे.’’

‘‘तो क्या हमारे बच्चे बिना प्यार के पल गए? रातरात भर जाग कर हम ने क्या बच्चों की सेवा नहीं की? वह सेवा उस पल की जरूरत थी इस पल की नहीं. प्यार को प्यार ही रहने दो, अपने गले की फांसी मत बना लो, जिस का दूसरा सिरा बच्चे के गले में पड़ा है. इधर तुम्हारा फंदा कसता है उधर तुम्हारे बच्चे का भी दम घुटता है.’’

‘‘सुहास ने तुम से कुछ कहा है क्या? क्या उसे मेरा प्यार सुहाता नहीं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘अरे नहीं, दीदी, वह ऐसा क्यों कहेगा. तुम बात को समझना तो चाहती नहीं हो, इधरउधर के पचड़े में पड़ने लगती हो. उस ने कुछ नहीं कहा. मैं जो देख रही हूं उसी आधार पर कह रही हूं. कल तुम भावना से किस बात पर उलझ रही थीं, याद है तुम्हें?’’

‘‘मैं कब उलझी? उस ने तेरे आने पर इतनी मेहनत से कितना सारा खाना बनाया. कम से कम एक बार मुझ से पूछ तो लेती कि क्या बनाना है.’’

‘‘क्यों पूछ लेती? क्या जराजरा सी बात तुम से पूछना जरूरी है? अरे, वही

4-5 दालें हैं और वही 4-6 मौसम की सब्जियां. यह सब्जी न बनी, वह बन गई, दाल में टमाटर का तड़का न लगाया, प्याज और जीरे का लगा लिया. भिंडी लंबी न काटी गोल काट ली. मेज पर नई शक्ल की सब्जी आई तो तुम ने झट से नाकभौं सिकोड़ लीं कि भिंडी की जगह परवल क्यों नहीं बनाए. गुलाबी डिनर सैट क्यों निकाला, सफेद क्यों नहीं. और तो और, मेजपोश और टेबल मैट्स पर भी तुम ने उसे टोका, मेरे ही सामने. कम से कम मेरा तो लिहाज करतीं. वह बच्ची नहीं है जिसे तुम ने इतना सब बिना वजह सुनाया.

‘‘सच तो यह है, इतनी सुंदर सजी मेज देख कर तुम से बरदाश्त ही नहीं हुआ. तुम से सहा ही नहीं गया कि तुम्हारे सामने किसी ने इतना अच्छा खाना सजा दिया. तुम्हें तो प्रकृति का शुक्रगुजार होना चाहिए कि बैठेबिठाए इतना अच्छा खाना मिल जाता है. क्या सारी उम्र काम करकर के तुम थक नहीं गईं? अभी भी हड्डियों में इतना दम है क्या, जो सब कर पाओ? एक तरफ तो कहती हो तुम से काम नहीं होता, दूसरी तरफ किसी का किया तुम से सहा नहीं जाता. आखिर चाहती क्या हो तुम?

‘‘तुम तो अपनी ही दुश्मन आप बन रही हो. क्या कमी है तुम्हारे घर में? आज्ञाकारी बेटा है, समझदार बहू है. कितनी कुशलता से सारा घर संभाल रही है. तुम्हारे नातेरिश्तेदारों का भी पूरा खयाल रखती है न. कल सारा दिन वह मेरे ही आगेपीछे डोलती रही. ‘मौसी यह, मौसी वह,’ मैं ने उसे एक पल के लिए भी आराम करते नहीं देखा और तुम ने रात मेज पर उस की सारे दिन की खुशी पर पानी फेर दिया, सिर्फ यह कह कर कि…’’

चुप हो गई रमा लेकिन भन्नाती रही देर तक. कुछ बड़बड़ भी करती रही. थोड़ी देर बाद रमा फिर बोलने लगी, ‘‘तुम क्यों बच्चों की जरूरत बन कर जीना चाहती हो? ठाट से क्यों नहीं रहती हो. यह घर तुम्हारा है और तुम मालकिन हो. बच्चों से थोड़ी सी दूरी रखना सीखो. बेटा बाहर से आया है तो जाने दो न उस की पत्नी को पानी ले कर. चायनाश्ता कराने दो. यह उस की गृहस्थी है. उसी को उस में रमने दो. बहू को तरहतरह के व्यंजन बनाने का शौक है तो करने दो उसे तजरबे, तुम बैठी बस खाओ. पसंद न भी आए तो भी तारीफ करो,’’ कह कर रमा ने मेरा हाथ पकड़ा.

‘‘सब गुड़गोबर कर दे तो भी तारीफ करूं,’’ हाथ खींच लिया था मैं ने.

‘‘जब वह खुद खाएगी तब क्या उसे पता नहीं चलेगा कि गुड़ का गोबर हुआ है या नहीं. अच्छा नहीं बनेगा तो अपनेआप सुधारेगी न. यह उस के पति का घर है और इस घर में एक कोना उसे ऐसा जरूर मिलना चाहिए जहां वह खुल कर जी सके, मनचाहा कर सके.’’

‘‘क्या मनचाहा करने दूं, लगाम खींच कर नहीं रखूंगी तो मेरी क्या औकात रह जाएगी घर में. अपनी मरजी ही करती रहेगी तो मेरे हाथ में क्या रहेगा?’’

‘‘अपने हाथ में क्या चाहिए तुम्हें, जरा समझाओ? बच्चों का खानापीना या ओढ़नाबिछाना? भावना पढ़ीलिखी, समझदार लड़की है. घर संभालती है, तुम्हारी देखभाल करती है. तुम जिस तरह बातबात पर तुनकती हो उस पर भी वह कुछ कहती नहीं. क्या सब तुम्हारे अधिकार में नहीं है? कैसा अधिकार चाहिए तुम्हें, समझाओ न?

‘‘तुम्हारी उम्र 55 साल हो गई. तुम ने इतने साल यह घर अपनी मरजी से संभाला. किसी ने रोका तो नहीं न. अब बहू आई है तो उसे भी अपनी मरजी करने दो न. और ऐसी क्या मरजी करती है वह? अगर घर को नए तरीके से सजा लेगी तो तुम्हारा अधिकार छिन जाएगा? सोफा इधर नहीं, उधर कर लेगी, नीले परदे न लगाए लाल लगा लेगी, कुशन सूती नहीं रेशमी ले आएगी, तो क्या? तुम से तो कुछ मांगेगी नहीं न?

‘‘इसी से तुम्हें लगता है तुम्हारा अधिकार हाथ से निकल गया. कस कर अपने बेटे को ही पकड़ रही हो…उस का खानापीना, उस का कुछ भी करना… अपनी ममता को इतना तंग और संकुचित मत होने दो, दीदी, कि बेटे का दम ही घुट जाए. तुम तो दोनों की मां हो न. इतनी तंगदिल मत बनो कि बच्चे तुम्हारी ममता का पिंजरा तोड़ कर उड़ जाएं. बहू तुम्हारी प्रतिद्वंद्वी नहीं है. तुम्हारी बच्ची है. बड़ी हो तुम. बड़ों की तरह व्यवहार करो. तुम तो बहू के साथ किसी स्पर्धा में लग रही हो. जैसे दौड़दौड़ कर मुकाबला कर रही हो कि देखो, भला कौन जीतता है, तुम या मैं.

‘‘बातबात में उसे कोसो मत वरना अपना हाथ खींच लेगी वह. अपना चाहा भी नहीं करेगी. तुम से होगा नहीं. अच्छाभला घर बिगड़ जाएगा. फिर मत कहना, बहू घर नहीं देखती. वह नौकरानी तो है नहीं जो मात्र तुम्हारा हुक्म बजाती रहेगी. यह उस का भी घर है. तुम्हीं बताओ, अगर उसे अपना घर इस घर में न मिला तो क्या कहीं और अपना घर ढूंढ़ने का प्रयास नहीं करेगी वह? संभल जाओ, दीदी…’’

रमा शुरू से दोटूक ही बात करती आई है. मैं जानती हूं वह गलत नहीं कह रही मगर मैं अपने मन का क्या करूं. घर के चप्पेचप्पे पर, हर चीज पर मेरी ही छाप रही है आज तक. मेरी ही पसंद रही है घर के हर कोने पर. कौन सी चादर, कौन सा कालीन, कौन सा मेजपोश, कौन सा डिनर सैट, कौन सी दालसब्जी, कौन सा मीठा…मेरा घर, मैं ने कभी किसी के साथ इसे बांटा नहीं. यहां तक कि कोने में पड़ी मेज पर पड़ा महंगा ‘बाऊल’ भी जरा सा अपनी जगह से हिलता है तो मुझे पता चल जाता है. ऐसी परिस्थिति में एक जीताजागता इंसान मेरी हर चीज पर अपना ही रंग चढ़ा दे, तो मैं कैसे सहूं?

‘‘भावना का घर कहां है, दीदी, जरा मुझे समझाओ? तुम्हें जब मां ने ब्याह कर विदा किया था तब यही समझाया था न कि तुम्हारी ससुराल ही तुम्हारा घर है. मायका पराया घर और ससुराल अपना. इस घर को तुम ने भी मन से अपनाया और अपने ही रंग में रंग भी लिया. तुम्हारी सास तुम्हारी तारीफ करते नहीं थकती थीं. तुम गुणी थीं और तुम्हारे गुणों का पूरापूरा मानसम्मान भी किया गया. सच पूछो तो गुणों का मान किया जाए तभी तो गुण गुण हुए न. तुम्हारी सास ने तुम्हारी हर कला का आदर किया तभी तो तुम कलावंती, गुणवंती हुईं.

वे ही तुम्हारी कीमत न जानतीं तो तुम्हारा हर गुण क्या कचरे के ढेर में नहीं समा जाता? तुम्हें घर दिया गया तभी तो तुम घरवाली हुई थीं. अब तुम भी अपनी बहू को उस का घर दो ताकि वह भी अपने गुणों से घर को सजा सके.’’

रमा मुझे उस रात समझाती रही और उस के बाद जाने कितने साल समझाती रही. मैं समझ नहीं पाई. मैं समझना भी नहीं चाहती. शायद, मुझे प्रकृति ने ऐसा ही बनाया है कि अपने सिवा मुझे कोई भी पसंद नहीं. अपने सिवा मुझे न किसी की खुशी से कुछ लेनादेना है और न ही किसी के मानसम्मान से. पता नहीं क्यों हूं मैं ऐसी. पराया खून अपना ही नहीं पाती और यह शाश्वत सत्य है कि बहू का खून होता ही पराया है.

आज रमा फिर से आई है. लगभग 9 साल बाद. उस की खोजी नजरों से कुछ भी छिपा नहीं. भावना ने चायनाश्ता परोसा, खाना भी परोसा मगर पहले जैसा कुछ नहीं लगा रमा को. भावना अनमनी सी रही.

‘‘रात खाने में क्या बनाना है?’’ भावना बोली, ‘‘अभी बता दीजिए. शाम को मुझे किट्टी पार्टी में जाना है देर हो जाएगी. इसलिए अभी तैयारी कर लेती हूं.’’

‘‘आज किट्टी रहने दो. रमा क्या सोचेगी,’’ मैं ने कहा.

‘‘आप तो हैं ही, मेरी क्या जरूरत है. समय पर खाना मिल जाएगा.’’

बदतमीज भी लगी मुझे भावना इस बार. पिछली बार रमा से जिस तरह घुलमिल गई थी, इस बार वैसा कुछ नहीं लगा. अच्छा ही है. मैं चाहती भी नहीं कि मेरे रिश्तेदारों से भावना कोई मेलजोल रखे.

मेरा सारा घर गंदगी से भरा है. ड्राइंगरूम गंदा, रसोई गंदी, आंगन गंदा. यहां तक कि मेरा कमरा भी गंदा. तकियों में से सीलन की बदबू आ रही है. मैं ने भावना से कहा था, उस ने बदले नहीं. शर्म आ रही है मुझे रमा से. कहां बिठाऊं इसे. हर तरफ तो जाले लटक रहे हैं. मेज पर मिट्टी है. कल की बरसात का पानी भी बरामदे में भरा है और भावना को घर से भागने की पड़ी है.

‘‘घर वही है मगर घर में जैसे खुशियां नहीं बसतीं. पेट भरना ही प्रश्न नहीं होता. पेट से हो कर दिल तक जाने वाला रास्ता कहीं नजर नहीं आता, दीदी. मैं ने समझाया था न, अपनेआप को बदलो,’’ आखिरकार कह ही दिया रमा ने.

‘‘तो क्या जाले, मिट्टी साफ करना मेरा काम है?’’

‘‘ये जाले तुम ने खुद लगाए हैं, दीदी. उस का मन ही मर चुका है, उस की इच्छा ही नहीं होती होगी अब. यह घर उस का थोड़े ही है जिस में वह अपनी जानमारी करे. सच पूछो तो उस का घर कहीं नहीं है. बेटा तुम से बंधा कहीं जा नहीं सकता और अपना घर तुम ने बहू को कभी दिया नहीं.

‘‘मैं ने समझाया था न, एक दिन तुम्हारा घर बिगड़ जाएगा. आज तुम से होता नहीं और वह अपना चाहा भी नहीं करती. मनमन की बात है न. तुम अपने मन का करती रहीं, वह अपने मन का करती रही. यही तो होना था, दीदी. मुझे यही डर था और यही हो रहा है. मैं ने समझाया था न.’’

रमा के चेहरे पर पीड़ा है और मैं यही सोच कर परेशान हूं कि मैं ने गलती कहां की है. अपना घर ही तो कस कर पकड़ा है. आखिर इस में गलत क्या है?

मल्हार : वास्तविक मार्मिक दृश्यों के साथ इंसानों को बांटने वाली धर्म की लकीर पर चोट

(तीन स्टार)

देश के प्रधानमंत्री इस लोकसभा चुनाव के दौरान हिंदू व मुसलिमों को बांटने की बात करते रहे,
वहीं फिल्मकार विशाल कुम्भार हिंदी और मराठी दो भाषाओं में उन्हीं के गुजरात के कच्छ की
पृष्ठभूमि में धर्म को देखने के नजरिए पर बात करने वाली विचारोत्तेजक फिल्म ‘मल्हार’ ले कर
आए हैं, जोकि 6 जून को सिनेमाघरों में पहुंची है.

यह फिल्म मोरपंख को ‘भगवान कृष्ण का मुकुट’ बताने के साथ ही मुसलिम धर्म में ‘इबादत व
दुआ के लिए पाक’ कह कर एक अद्भुत संदेश देती है. फिल्म धर्म के भेदभाव पर कटाक्ष करने,
सभी धर्म के इ्र्रश्वर एक हैं की बात करने के साथ ही झूठी सामाजिक मानमर्यादा से ले कर पुरूष
की नपुंसकता पर भी बिना किसी भाषणबाजी के चोट करती है.

यह एक एंथेलौजी वाली फिल्म है. यानी कि फिल्म में 3 कहानियां हैं जो कि समानांतर चलते हुए
भी एकदूसरे से जुड़ी हुई हैं. कहानियां गुजरात के कच्छ के एक दूरदराज गांव की है, जिस में एक
कहानी दो बालकों की है, जो कि अच्छे दोस्त हैं. एक जावेद (विनायक पोतदार) है, जिस के पिता
परवेज मुसलिम कब्रिस्तान में शव दफन का काम कर के घर चलाते हैं. उस की बड़ी बहन
जस्मिन (अक्षता आचार्य) व छोटी बहन जमीला है. जबकि दूसरा हिंदू लड़का भैरव (श्रीनिवास
पोकले) है, जिस के दादाजी संगीतज्ञ हैं और अपने पोते भैरव को भी संगीत सिखाने का प्रयास
करते रहते हैं.

भैरव को सुनाई नहीं देता. वह कान में सुनने का यंत्र यानी कि श्रवण यंत्र लगा कर रखता है. गांव
के तालाब में भैरव का श्रवण यंत्र खराब हो जाता है, दोनों बालक अपने स्तर पर श्रवण यंत्र की
मरम्मत के लिए संघर्ष करते हैं तो पता चलता है कि इस की मरम्मत नहीं हो सकती. नया

खरीदने के लिए 1500 रूपए एकत्र करने के लिए दोनों बालकों के संघर्ष के साथ कहानी चलती
है.

दूसरी तरफ गांव के सरपंच (रवि झांकल) के परिवार की कहानी है. सरपंच के बेटे लक्ष्मण (ऋषि
सक्सेना) की शादी केसर (अंजली पाटिल) से हुई है, पर वह मां नहीं बन पाई है. लक्ष्मण की
कमजोरी के चलते केसर पर बांझ होने का आरोप लगता है. लक्ष्मण के मातापिता व दादी चाहते
हैं कि वह लक्ष्मण की दूसरी शादी करा दे. ऐसे में केसर अपनी शादी व अपने प्यार को बचाने के
साथ ही पति व परिवार की इज्जत को बचाने के लिए एक अनूठा कदम उठाती है. जिस में वह
एक सेल्समैन के रूप में कार्यरत मोहन (शारिब हाशमी) की मदद लेती है.

तीसरी कहानी गांव में दूध की डेयरी चलाने वाले शमशेर के बेटे जतिन (मोहम्मद सामद) और
जावेद की बहन जस्मिन की प्रेम कहानी है. यह तीनों कहानियां समानांतर चलते हुए भी एक
दूसरे से जुड़ी हुई हैं.

निर्देशक विशाल कुम्भार ने अपने कुशल निर्देशन के माध्यम से देश की ग्रामीण संरचना,
अंर्तविरोध, बच्चों की दिल को छू लेने वाली दोस्ती, मार्मिक संघर्ष, इंसानी जीवन की त्रासदी, सच्चे
प्यार की परिभाषा के साथ ही इस बात को भी रेखांकित किया है कि बच्चों के लिए सभी धर्म,
भगवान या अल्लाह एक ही हैं. मगर कुछ समाज व धर्म के ठेकेदार अपना वर्चस्व कायम रखने
के लिए धर्म के आधार पर ऐसी लकीर खींचते हैं, जो कि इंसान की जान ले लेती है.

बतौर निर्देशक विशाल कुम्भार ने फिल्म में भाषणबाजी नहीं की है, मगर कुछ खूबसूरत दृश्यों को
पिरो कर दर्शकों के दिलों तक अपनी बात पहुंचाने में सफल रहे हैं. मसलन- भैरव के लिए नया
श्रवण यंत्र खरीदने में मदद की गुहार लगाने के लिए जावेद और भैरव का एक साथ हनुमान के
मंदिर जाना, हनुमान की मूर्ति से जावेद का अपने पिता की आर्थिक हालत सुधारने की मांग
करना हो या फिर हिंदू लड़के जतिन का अपनी प्रेमिका जस्मिन के साथ मजार पर जा कर
विनती करना हो. या अपनी मुसलिम प्रेमिका की खातिर जतिन द्वारा उर्दू जुब़ान सीखने व
साहिर को पढ़ने का दृश्य हो.

फिल्म की कमजोर कड़ी इस की पटकथा है. फिल्म की गति भी धीमी है. लेखकों ने कहानी तो
फैला दी, पर उसे समेटने में इतनी जल्दबाजी कर दी कि दर्शक को झटका सा लगता है. लेखकों

ने इस बात पर रोशनी नहीं डाली कि भैरव के पिता को कैसे पता चला कि भैरव का श्रवण यंत्र
खराब हो गया है. इसी तरह जस्मिन ने आत्महत्या की या… इस पर भी फिल्म खुल कर कुछ
नहीं कहती. पर पटकथा लेखकों ने केसर के बांझ होने की वजह पर अंत तक जिस तरह से
दर्शकों के मन में एक उत्सुकता जगा कर रखी है, वह काबिले तारीफ है, जिसे क्लाइमैक्स से पहले
उजागर किया जाता है कि लक्ष्मण में पुरूष या स्त्री किसी के प्रति कोई आकर्षण नहीं है. उस ने
तो अपने सरपंच पिता की इज्जत को तारतार होने से बचाने के लिए केसर से विवाह किया था.
फिल्मकार ने पति व परिवार की झूठी सामाजिक मानमर्यादा को बचाने के लिए केसर द्वारा
उठाए गए कदम की नैतिकता पर सवाल न उठाते हुए सामाजिक ढकोसले पर कटाक्ष किया है.
इतना ही नहीं लेखकों की इस बात के लिए सरहाना की जानी चाहिए कि वह दोस्ती, प्रेम, विवाह
और अल्पसंख्यक समुदाय के संघर्षों को बिना मेलोड्रामा के सूक्ष्म स्पर्श के साथ पेश करने में
सफल रहे हैं.

फिल्म के संवाद लेखकों सिद्धार्थ साल्वी और स्वप्निल सीताराम के चुतीले संवाद सीधे दिल पर
चोट करते हुए बहुत कुछ कह जाते हैं. फिल्म में जस्मिन का संवाद है, ‘‘प्यार दो तरफा होता है,
जान भी लेता है और जनाजे पर मातम भी मनाता है.’’ यह संवाद बहुत कुछ कह जाता है. तो
वहीं एक जगह चांद के संदर्भ में जतिन कहता है, ‘‘करवा चौथ का चांद हो या ईद का चांद हो,
चांद तो चांद ही होता है.’’ केसर का प्यार को ले कर कहा गया संवाद, ‘‘बिस्तर पर साथ होना ही
प्यार नहीं होता, एकदूसरे को स्वीकार करना भी प्यार होता है.’’ पतिपत्नी के बीच के रिश्ते पर
रोशनी डालता है.

दो अलगअलग धर्म के होने के चलते प्रेमियों के एक न होने पर प्रेमिका मरने से पहले अपने
प्रेमी को लिखे पत्र में अपने पिता को दोष देने या उन्हें गलत बताने की बजाय लिखती है-
“गलत तो वक्त था और वक्त से कोई नहीं जीत सकता.’’

क्लायमैक्स में जतिन के लिए जस्मीन द्वारा लिखा गया दिल दहला देने वाला पत्र दर्शकों के
दिलोंदिमाग पर एक अमिट छाप छोड़ता है. फिल्म का क्लाइमैक्स सोचने पर विवश कर एक नए
समाज की संरचना का संकेत देता है. जस्मिन पत्र में लिखती है, ‘‘इस मोरपंख को न मंदिर में
रखना न मस्जिद में, इसे दफना देना…’’ अर्थात फिल्म अंत में इंसानों के बीच लकीर खींचने वाले
धर्म को दफनाने का संदेश देती है.

फिल्म में 3 कहानियां जरुर हैं, मगर फिल्म की कहानी के केंद्र में दो बालकों की दोस्ती व दोस्त
की मदद का संघर्ष ही है. भैरव के किरदार में श्रीनिवास रोकाले और जावेद के किरदार में
विनायक पोतदार अपने स्वाभाविक अभिनय से दर्शकों को अंत तक बांध कर रखते हैं. इन के बीच
की बचकानी मासूमियत, बचकानी शरारत और अटूट वफादारी का चित्रण दिल छू लेता है.
केसर के किरदार में अंजली पाटिल ने एक बार फिर अपनी अभिनय प्रतिभा का लोहा मनवाने में
सफल रही है. इस से पहले दर्शक उन्हें ‘चक्रव्यूह’ और ‘न्यूटन’ जैसी फिल्मों में पसंद कर चुके हैं.
मोहन के छोटे किरदार में शारिब हाशमी अपनी छाप छोड़ जाते हैं. वैसे शारिब हाशमी के किरदार
को ठीक से गढ़ा नहीं गया. जतिन के किरदार में मोहम्मद समद व जस्मिन के किरदार में
अक्षता आचार्य ने साबित किया कि उन के अंदर अपार अभिनय क्षमता है. सरपंच के अति छोटे
किरदार में रवि झांकल और लक्ष्मण के किरदार में ऋषि सक्सेना ठीक ठाक रहे.

अति आवश्यक और ज्वलंत सामाजिक मुद्दे को उकेरने वाली यह फिल्म कितने दर्शकों तक
पहुंच सकेगी, यह कहना मुश्किल है. इन दिनों बौलीवुड के हालात काफी गड़बड़ हैं. इस फिल्म को
मुंबई में बामुश्किल चारपांच शो ही मिले हैं.

राजनीति में सवर्ण एससी एसटी प्रेम विवाह : प्रेम के लिए या सत्ता के लिए?

राजनीतिक गलियारों में प्रेम कहानियां कोई नहीं बात नहीं है. भारतीय राजनीति में ऐसे कई नेता रहे हैं, जो अपनी पर्सनल लाइफ को लेकर अक्सर सुर्खियों में छाए रहे. इन राजनेताओं को पिछड़ी जाति में प्यार हुआ और ये महज सिर्फ प्रेम कहानी तक ही सीमित नहीं रही, ये कहानी शादी में भी तब्दील हुई. हालांकि गांव या छोटे शहरों में सवर्ण घरों में आज भी एससी एसटी को हीन भावना से देखा जाता है, शादी तो बहुत दूर की बात है, लोग इनके साथ खाना खाने से भी कतराते हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि राजनीतिक घरानों में सवर्ण और एससी एसटी की शादियां चुनाव के दौरान वोट बैंक भरने के लिए है या सिर्फ प्रेम के लिए?

 

देश की कोई भी ऐसी राजनीतिक पार्टियां नहीं है, जिसमें सभी जातियों के लिए काम किया जाता हो. हर पार्टी में किसी जाति विशेष के प्रति झुकाव देखा गया है
तो क्या ये सवर्ण और एससी एसटी शादियां भी सिर्फ दिखावे के लिए है? इस सवाल का जवाब आपको इस आर्टिकल में मिलेगा.

रामविलास पासवान (लोकजनशक्ति पार्टी, बिहार )

स्वर्गिय रामविलास पासवान जीवन के अंतिम दौर में मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री थे. ये दलित वर्ग के नेता थे, इनके पर्सनल लाइफ की बात करें, तो इन्होंने दोदो शादियां की थी. ये अपनी पहली पत्‍नी को तलाक देकर एयर होस्‍टेस रीना शर्मा से लव मैरिज की. रीना शर्मा पंजाबी हिंदू हैं. रामविलास पासवान दलित नेता थे, जिस वजह से यह शादी उन दिनों काफी चर्चे में रही. जनता के बीच उनकी इमेज भी खराब हुई, पहली पत्नी को छोड़कर उन्होंने दूसरी शादी की.  हालांकि इस शादी से रामविलास पासवान को सत्ता में कोई फायदा भी नहीं होने वाला था. उन्होंने दूसरी शादी सिर्फ प्रेम के लिए की थी.

राजीव गांधी (कांग्रेस)

स्वर्गिय राजीव गांधी और सोनिया गांधी की लव स्टोरी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है. विदेश में सोनिया और राजीव की मुलाकात हुई, दोनों में प्यार हुआ और थोड़े उतार-चढ़ाव के बाद इनकी शादी भी हुई. जब राजीव गांधी की शादी सोनिया से हुई तो उनकी मां इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं. यह शादी भी महज प्रेम के लिए ही किया गया, सत्ता से इसका कोई लेनादेना नहीं था.

अखिलेश यादव (सपा, यूपी)

अखिलेश यादव और डिंपल की लव स्टोरी बेहद दिलचस्प है. पहले दोनों के बीच दोस्ती हुई, फिर प्यार और साल 1999 में इन दोनों ने सात जन्मों के लिए एकदूसरे का हाथ थाम लिया. डिंपल राजपूत परिवार से हैं. अखिलेश पिछड़ी जाति के हैं, जबकि डिंपल सवर्ण हैं. कहा जाता है कि अखिलेश के पिता और यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव और डिंपल के पिता कर्नल आर.एस. रावत इस शादी के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन खबरों के अनुसार उस समय के प्रभावशाली नेताओं ने मुलायम सिंह को समझाया, तो बाद में वो इस शादी के लिए मान गए.

हालांकि मुलायम सिंह यादव को इस बात का डर था कि यादव समाज पर इस शादी के बाद वोट बैंक का असर पड़ सकता है. इसिलिए अखिलेश और डिंपल की शादी के लिए तैयार नहीं थे तो दूसरी तरफ बेटे अखिलेश को यह अंदेशा था कि डिंपल से शादी करने के बाद समाज में उनकी राजनीतिक छवि पर असर पड़ सकता है, लेकिन
इन बातों को दरकिनार कर जिंदगीभर डिंपल का हाथ थामने के लिए तैयार थे. ये शादी भी सिर्फ प्रेम के लिए की गई.

तेजस्वी यादव (राजद पार्टी, बिहार)

बिहार-यूपी की राजनीति जाति की राजनीति होती है. बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के बेटे तेजस्वी यादव अक्सर अपने बयान को लेकर सुर्खियों में छाए रहते हैं. दिसंबर 2021 में तेजस्वी यादव ने रेचल गोडिन्हो से शादी की थी. ये लंबे समय से तेजस्वी की दोस्त रही हैं. जब तेजस्वी की शादी हुई थी तो वो बिहार के सक्रिय राजनीति में शामिल नहीं थे. रेचल जो अब राजश्री के नाम से जानी जाती है, ये ईसाई परिवार से हैं, इसके बावजूद भी तेजस्वी और इनकी शादी हुई. यह तो तय था कि इस शादी से यादव समाज में असंतोष फैलेगा जो लालू का बहुत बड़ा वोट बैंक था. यहां तक कि इस शादी के कारण तेजस्वी के मामा साधु यादव भी नाराज थे. उन्होंने लालू के परिवार पर तीखी टिप्पणी भी की थी. ये विवाद इतना बढ़ गया था कि तेजस्वी के छोटे भाई तेजप्रताप ने तो साधु यादव को कंस मामा भी कह दिया था.

हालांकि बीजेपी के एक नेता ने तेजस्वी पर तीखा प्रहार भी किया और कहा कि तेजस्वी के दिमाग में बचपन से ही जातिवाद का जहर घोला गया है. उन्होंने राजश्री के नाम पर भी सवाल उठाया,  कहा  खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने वाले तेजस्वी ने अपनी पत्नी का नाम बदला कि उनकी सोच ही जातिवादी है.

मुझे कौन रोकेगा: धर्मकर्म के चक्कर में कैसे अपना ही नुकसान कर बैठी सुधा?

सुबह सुबह चार बजे किसी मन्त्र की आवाज से मेघा की आंख खुली, लेटे लेटे माथे पर हाथ मारा , ओह्ह, फिर मां जी ने कोई ड्रामा शुरू किया है, मेघा का मन बेड छोड़ने का नहीं किया,  आजकल कोरोना वायरस के कारण कहने को तो वर्क फ्रॉम होम था, पर सारा दिन पल भर चैन न मिलता, ऊपर से मां जी के व्हाट्सएप्प पर मिले उनके फालतू के ज्ञान भरे उपदेश सुनने को मिलते, उन्हें समझाने में ही कितना टाइम चला जाता.

उसने बराबर में सोये सुमित पर नजर डाली, फिर मन ही मन हंसी भी आ गयी, सुमित की नींद भला इन मन्त्रों से क्यों खुलेगी, बचपन से यही सब सुनकर ही तो बड़ा हुआ है, पक्का हो गया होगा. मेघा ने दोबारा सोने की कोशिश की पर जब नींद नहीं आयी तो उठकर पानी पीने के लिए  अपने बैडरूम से बाहर आ गयी.

पानी पीने किचन में गयी तो किचन के ही एक तरफ बने छोटे से पूजा घर में उसके सास ससुर सुधा और रमेश हाथ जोड़े बहुत जोश में मन्त्रों का उच्चारण कर रहे थे, सुधा ने बीच में पूछा, तुम क्यों उठ गयी?”

”इन आवाजों से.”

”चाहो तो तुम भी नहा धोकर आ जाओ, महा मृत्युञ्जय जाप सब करते रहेंगें, फिर ये कोरोना वोरोना तो घर में फटकेगा भी नहीं.”

मेघा का मन हुआ सर पीट ले अपना, बोली, ”मां जी, मैं तो पानी पीकर लेटने जा रही हूं.” इस बीच रमेश की पूजा जारी थी, सुधा अपने मन से पूजा में कभी भी ब्रेक ले लेती थीं, भगवान की मूर्ति के आगे हाथ जोड़े, फिर मेघा के पास आकर कहा,”जब तुम लोग रात को सो गए थे, इंदौर से रमा जीजी का फ़ोन आया था,  नवरात्र आने वाले हैं न, वे हमेशा की तरह अपने घर माता की चौकी रख रही हैं, आज रात की बस से हम दोनों भी जा रहे हैं, इन्होने रात में ही बुकिंग कर ली थी.”

मेघा ने कुछ हड़बड़ाकर कहा,”क्या कह रहीं है, मां जी? लोगों को बाहर न निकलने की सलाह दी जा रही है, नहीं, नहीं, न तो रमा मौसी को यह सब भीड़ अभी जुटानी चाहिए और न आप जायेंगी.”

”सुबह सुबह उठ कर महा मृत्युञ्जय जाप कर तो लिया, अब क्या डर, अब कौन रोकेगा मुझे ?”

”नहीं, मां जी, मुंबई से इंदौर इस समय इस पूजा के काम के लिए जाना बिलकुल समझदारी नहीं है, नहीं, मां जी, आप जाने की सोचना भी मत. सुमित आपको बिलकुल नहीं जाने देंगें.”

”अरे, मैं देखती हूं, कौन रोकेगा मुझे, मेरे धर्म कर्म में तुम लोग टांग न अड़ाया करो, यह जो आज दुनिया में हो रहा है न, वह इसलिए कि सब लोग अपना धर्म, संस्कार भूलते जा रहे हैं, ईश्वर नाराज हैं.

आज हम कुछ पूजा कर रात की बस से निकल जायेंगें, सुबह रमा जीजी के घर, जाओ, तुम थोड़ी देर और लेट लो.” मेघा खीझती हुई बैडरूम में आ गयी. टाइम देखा, अब साढ़े चार हो रहे थे, उसे लेटे लेटे गुस्सा आने लगा, यह कौन सा पागलपन है, घर में सब कुछ अच्छा है, उसकी सास ससुर से अच्छी बॉन्डिंग है, वह खुद अच्छे पद पर है, दस साल की प्यारी सी बेटी चिंकी है.

सुमित अच्छा पति है, पर धर्मांध सास ससुर के आगे उनकी एक नहीं चलती है, उसकी क्या, सुमित भी हार जाता है उनकी जिदों के आगे, अब यह मूर्खता ही है न, कोरोना का प्रकोप बढ़ता जा रहा है, सब घर में काम कर रहे हैं, स्कूल बंद हैं, पर ये पूजा में मुंबई से इंदौर जाने की तैयारी कर रहे हैं, कितनी बड़ी मूर्खता! और रमा मौसी !सोने पे सुहागा, बहन को ऐसे में आने के लिए जोर डाल रही हैं, उनके घर भी यही हाल, उनके बेटे बहू भी उन्हें समझाकर जरूर थक गए होंगें पर वे भीड़ जुटाकर रहेंगीं. वह जानती है , उनकी भी एक नहीं चली होगी.

सुमित सोकर उठा तो उसने उसे सास के प्रोग्राम की जानकारी दी, सुमित को गुस्सा आ गया, पैर पटकते हुए मां के पास पहुंचा,”मां, आप इस समय घर से नहीं निकल सकती.”

” देख , सुमित, हमारे तो टिकट भी बुक हो गए, हम तो जा रहे हैं.”

”नहीं, मां, सवाल ही नहीं उठता, आप लोग कहीं नहीं निकलेंगें,”

सुमित का स्वर तेज हुआ तो सुधा का उससे तेज होना ही था,”कौन रोकेगा मुझे?”

”मैं रोकूंगा, मैं आप लोगों की लाइफ को रिस्क में नहीं डाल सकता.”

”अरे, कुछ तो ईश्वर पर भरोसा करो, सुबह उठते ही इतने पाठ किये हैं, हमारा अब कुछ भी अमंगल हो ही नहीं सकता, धर्म कर्म पर भरोसा करना सीखो कुछ.”

” नहीं , मां , आप लोग नहीं जायेंगें.”

”देख, बेटा, हम तो जा रहे हैं. हमें तो अब कोई नहीं रोक सकता.”

चिंकी सोकर उठ गयी थी, वह भी दादा दादी के साथ जाने की ज़िद करने लगी, उसके स्कूल बंद थे. सुमित ने थोड़ा प्यार, थोड़ी सख्ती से स्थिति की गंभीरता समझायी तो वह समझ गयी पर अपने माता पिता को सुमित समझा नहीं पा रहा था, सुमित ने फिर नाराज होने का पैंतरा भी आजमाया, वह भी फेल हो गया.

”कौन रोकेगा मुझे, ईश्वर के नाम पर सबको ऐसे धर्म कर्म में साथ देना चाहिए,

बताओ, जीजी के घर इतनी बड़ी पूजा और मैं मना कर दूं.

राम राम, कितना पाप लगेगा मुझे, सब नास्तिक हुए जा रहे हैं तभी तो इतना प्रकोप भुगत रहे हैं .”

सुधा पूरा दिन अपना ही राग अलापती रहीं और रात की बस से रमेश के साथ इंदौर निकल भी गयीं. पूरा दिन रमेश अपनी पत्नी की बातों से हमेशा की तरह सहमत दिखे. सुमित का मूड बहुत खराब हुआ. इससे पहले भी सुमित जब भी किसी भी धार्मिक कर्मकांड को आंख बंद करके मानने पर कोई भी लॉजिक देता, सुधा तुनक जाती,

”मैं अपने भक्ति भाव में किसी की दखलंदाजी नहीं सह सकती.” पर इस बार बात गंभीर थी. यह कहीं से भी समझदारी नहीं थी कि ऐसे समय में जब महामारी जैसी स्थिति हो गयी हो, व्यर्थ की ज़िद पर मुसीबत को दावत देने जैसी बात थी, पर वह क्या कर सकता था, अपने पिता से भी उसे नाराजगी थी कि वे भी क्यों मां का ऐसी बातों में साथ देते हैं. सुमित और मेघा बस उन्ही की चिंता में डूबे अपना काम करते रहे.

इंदौर पहुंच कर रमा और सुधा ने गले मिलते हुए जय माता दी का उद्घोष किया, रमा ने बड़े उत्साह से कहा,” वाह , बहन हो तो ऐसी, बिल्कुल मेरी तरह माता की भक्त, ऐसे माहौल में भी हर साल की तरह आ ही गयी. रमा के बेटे बहू सुधीर और नीना ने भी दोनों का स्वागत किया, रमा ने कहा ,”तुम लोग फ्रेश होकर आराम करो, रात भर सफर करके आये हो, शाम को तो माता का दरबार लगेगा, बहुत आनंद आएगास और हां, तुम्हे पता है, सुधा इस बार मैंने एक बड़े हाई प्रोफाइल पंडित शिवनाथ को बुलाया है, यहां के बड़े बड़े लोगों के यहां जाते हैं, इनका अपॉइंटमेंट बड़ी मुश्किल से मिलता है, तीन दिन पहले ही यहां के एक धन्ना सेठ अनिल काबरा के यहां इन्होंने कोरोना से बचाव के लिए ऐसी भव्य पूजा की थी कि लोग पेपर में फोटोज देखकर हैरान होते रह गए थे, जब वे यहां आने के लिए मान गए, हम तो धन्य हो गए.”

वहीं खड़े सुधीर ने छेड़ा, ”वो इसलिए मान गए, मां, इस समय उन्हें कोई नहीं पूछ रहा होगा,

कौन समझदार इस समय अपने घर में भीड़ जुटाएगा.”

रमा ने झिड़का ,”बकवास मत करो, खबरदार, उन्हें कुछ न कहो.”

सुधीर यहीं पर नहीं रुका, फिर सुधा से कहा ,”देखा, मौसी, एक फर्जी पंडित के लिए मां अपने बेटे को भी डांट सकती है.

” सुधा ने भी प्यार से झिड़का, देखो, सुधीर, कम से कम तुम तो सुमित की तरह बात मत करो, एक तो पता नहीं, हमारे बच्चों को क्या हो गया है,व हमने उन्हें इतने अच्छे संस्कार दिए फिर भी धर्म कर्म से तो ऐसे भागते हैं कि पूछो मत, सुमित भी आने के लिए मना कर रहा था पर मुझे कौन रोक सकता है, आपके यहां सालाना माता का दरबार लगे और मैं न आऊं,

जीजी , यह तो हो ही नहीं सकता .”

शाम को जैसे घर में शादी का माहौल था, एक बड़ी सी चौकी पर देवी की महंगे फ्रेम में बड़ी सी तस्वीर, फूलों की सजावट, जिसमे रमा के पति अनिल पूरी रूचि ले रहे थे. प्रोग्राम यह था कि शिवनाथ जी आकर एक पूजा करेंगें, फिर वे चले जायेंगें, उसके बाद महिला मंडली कीर्तन करेंगीं, कोरोना से बचने के लिए भजन तैयार थे, फिर जलपान होगा, जो एक तरह से डिनर ही था, रमा के बड़े से घर के पीछे के हिस्से में हलवाई बैठे थे. खूब तैयार, सजी धजी पड़ोसने जब इकठ्ठा होने लगीं, सुधीर और नीना अपने रूम में परेशान से बातें कर रहे थे,

” यार , मुझे इतना डर लग रहा है, भीड़ से बचने के लिए कहा जा रहा है, पर हमारे पेरेंट्स को कौन रोक सकता है, मुझे बड़ा दुःख है कि मैं इस बेकार की भीड़ को रोक नहीं पाया.”

पंडित शिवनाथ करीब पचास के काफी स्टाइलिश पंडित थे, उन्होंने क्या मन्त्र बुदबुदाए, यह तो उन्हीं को पता होगा, रमा ने उनकी खातिरदारी बहुत की, महिलायें जिन्होंने इतनी ख़ुशी से कभी अपने सास ससुर के पैर नहीं छुए होंगें, उनके चरण छूने के लिए बावली हुई जा रहीं थीं, वे सबके सर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते रहे, जो कुछ कम उम्र की थीं, उन्हें सर से कमर तक हाथ फहराकर आशीर्वाद दिया, उनकी छोटी सी पूजा हो गयी. उन्होंने कहा, आप सबको डरने की जरुरत नहीं है, आप सबका मंगल ही होगा, ईश्वर की इतनी भक्ति करने वालों का कोई अहित नहीं होता .” सब गदगद हो गए.

रमा ने उन्हें काफी भारी भरकम गिफ्ट्स वाला पैकेट और एक लिफाफे में कितना कैश दिया, यह तो कोई देख नहीं पाया. शिवनाथ ख़ुशी ख़ुशी चले गए. फिर जमकर कीर्तन किया गया, खा पीकर सब महिलायें भी चली गयीं.

सुधा और रमेश को रमा ने कुछ दिन और रोक लिया, दो ही दिन और हुए तो सुबह पेपर पढ़ते हुए रमा और अनिल के मुंह से घबराई सी आवाज निकली, ”ओह्ह. यह तो बड़ी चिंता की बात है .”

सुधीर और नीना घर से ही काम कर रहे थे, लैपटॉप से नजर उठाकर पूछा,”क्या हुआ, माँ?”

”अनिल काबरा का कोरोना का टेस्ट पॉजिटिव आया है. वह अभी मिलान से लौटा था. कुछ दिन पहले उसके घर जो पूजा हुई थी, उसमे शामिल सब लोगों का टेस्ट हो रहा है.”

”सुधीर चौंक पड़ा,”क्या?” फिर उसने पेपर पढ़ा, सर पकड़ लिया, बोला,”ओह्ह,नो, शिवनाथ हमारे घर भी होकर गया है.”

अनिल ने कहा,” मैंने तुम लोगों को कुछ कहा तो नहीं, पर मुझे भी तबियत कुछ ढीली लग रही है.”

सबके चेहरों पर पसीना आ गया, सुधीर अलर्ट हुआ, उसने और नीना ने तुरंत लैपटॉप बंद किया. पिता को देखा, चेहरा बुखार की लालिमा वाला लगा, उसने फौरन फैमिली डॉक्टर से बात की, वे अनिल काबरा और उसके मेहमानों से बहुत नाराज थे. बोले- ये लोग हमारी और अपनी मुश्किलें बढ़ा देते हैं. शिवनाथ का भी टेस्ट पॉजिटिव आया है. तुम लोग फौरन अपना टेस्ट करवाओ, मैं इंतज़ाम कर रहा हूं.”

पूरा घर कोरोना वायरस की चपेट में था, जिसे सब मामूली सी ढीली तबियत, खांसी, जुकाम समझ रहे थे, वह शिवनाथ का आशीर्वाद था. यहां तक कि रमेश और सुधा जो अपने जॉइंट्स पेन को उम्र का तकाजा समझ रहे थे, वे भी इससे नहीं बच पाए थे. सबको तुरंत हॉस्पिटल में एडमिट कर लिया गया, पूरी कीर्तन मंडली में हड़कंप मच गया, सबके टेस्ट होने शुरू हुए तो संख्या बढ़ती चली गयी, लोग उन्हें बुरा भला कहते रहे, देखते ही देखते शहर में हालत बदतर होती जा रही थी.

सुधा ने जब रोते रोते सुमित को पूरी जानकारी दी, सुमित को घबराहट के मारे  रोना और गुस्सा भी आ गया, ” मां , देख लिया, आप दोनों बहनों ने अपनी ज़िद का नतीजा. कहां हैं आपके धर्म कर्म अब? किसी ने क्यों नहीं बचाया आप लोगों को?”

सुधा ने कहा,” बेटा, हम तो आकर फंस गए. अब पता नहीं कब घर आ पायेंगें. डॉक्टर पता नहीं कब तक रोकेंगे!”

”नहीं, माँ, आपकी जब मर्जी हो, चली आना, अपनी मर्जी से ही तो गयी थी, आपको कौन रोक सकता है.”

सुमित मां को गुस्सा तो दिखा रहा था, पर मां के लिए बहुत चिंतित और बेचैन हो उठा था, कुछ भी अब उसके बस में कहां था. अब तो बस सबके ठीक होने का इंतज़ार ही किया जा सकता था.

शरीर में क्यों होती है कैल्शियम की कमी

हड्डियां मानव शरीर का मजबूत आधार हैं, जिन पर शरीर का ढांचा बना होता है. हड्डियां लगातार बनती रहती हैं. शारीरिक प्रक्रिया में हड्डियां घुलती और साथ ही नई बनती रहती हैं. इन दोनों के संतुलन से हड्डियों की मजबूती तय होती है. जब जीवन कोख में होता है तब से ले कर जीवन के हर पड़ाव तक टूटनेबनने का यह सिलसिला चलता रहता है. दोनों में से क्या ज्यादा होगा, यह जीवन के पड़ावों पर निर्भर करता है. किशोरावस्था में हड्डियों का सब से तेजी से विकास होता है. जैसेजैसे उम्र बढ़ती है, हड्डियों के नष्ट होने की प्रक्रिया बढ़ जाती है. महिलाओं में यह पुरुषों के मुकाबले जल्दी होता है.

इस प्रक्रिया को कौन तय करता है? शरीर में काम कर रहे हार्मोंस, कैल्शियम और फौसफेट जैसे मिनरल बिल्डिंग ब्लौक्स, विटामिन डी, उम्र, सैक्स और भोजन में प्रोटीन की मात्रा मिल कर हड्डियों को मजबूत और सेहतमंद बनाते हैं. किशोर उम्र में हड्डियां अधिकतम मजबूत होती हैं, उस उम्र में उन का आधार बनता है. उसी उम्र में लिया गया कैल्शियम, किया गया व्यायाम हड्डियों की नींव बनाता है. इसलिए याद रखें कि मजबूत हड्डियों की शुरुआत बचपन से होती है. महिलाओं में 30 साल की उम्र से हड्डियों के घिसने की शुरुआत हो जाती है जबकि पुरुषों में 40 साल बाद. मीनोपौज के बाद महिलाओं में एस्ट्रोजन हार्मोन की कमी होने के कारण हड्डियों का घिसना तेज हो जाता है. इस उम्र में हड्डियां मजबूत रखने के लिए अधिक खयाल रखने की आवश्यकता होती है. हड्डियों की सेहत किसी भी उम्र में सुधारी जा सकती है. इंसान के जीवन में 8 साल की उम्र तक 200-800 एमजी,

9 से 19 साल तक 1,300 एमजी, 20 से 50 साल तक 1,000 एमजी और 51 के बाद हमेशा 1,200 एमजी कैल्शियम की रोजाना जरूरत होती है. दूध, दूध उत्पाद, मेथी व चौलाई जैसी हरी पत्तेदार सब्जियां, मछली, सोया, पनीर आदि कैल्शियम के भरपूर स्रोत हैं. दूध के एक गिलास में 300 एमजी कैल्शियम होता है.

कैल्शियम की कमी के कारण

  1. कैल्शियम युक्त चीजों का कम सेवन.
  2. कैल्शियम सोखने में समस्या.
  3. बुढ़ापा.
  4. एंटी कैंसर दवाओं का सेवन.
  5. ओवरडोज.
  6. व्यायाम न करना, बैठे रहना.
  7. धूप न सेंकना.
  8. टीबी या थायरायड जैसी बीमारी.

कमी के लक्षण

अगर किसी की हड्डियों में दर्द, आम बदन दर्द और हड्डियां दबाने पर दर्द हो तो कैल्शियम की कमी होती है. डेक्सा बोन स्कैन, रीढ़ और हिप्स के एक्सरे से कमजोर हड्डियों की जांच होती है. कैल्शियम की कमी से बचने और इलाज के लिए कैल्शियम युक्त आहार लेना सब से जरूरी है. कैल्शियम के साथ विटामिन डी और हड्डियों को मजबूत बनाने वाले कुछ अन्य तत्त्व लेना जरूरी हैं. हड्डियों की सेहत के लिए व्यायाम बेहद जरूरी है.

… तो समझिए कैल्शियम की कमी है

शरीर के विभिन्न अंगों में ऐंठन या कंपन हो, जरा से टकराने पर हड्डियों का टूटना जोड़ों में दर्द हो, चोट लगने पर खून का बहना बंद हो जाए या फिर मस्तिष्क सही ढंग से काम न कर रहा हो तो समझिए कि कैल्शियम की कमी है.

कमजोर दांत :

कैल्शियम की कमी का असर सब से अधिक दांतों पर दिखाई देता है. दांतों की सड़न पहला लक्षण माना जाता है. यदि बचपन में ही कैल्शियम की कमी हो जाए तो बच्चे के दांत काफी देर से निकलेंगे.

कमजोर नाखून :

मजबूत नाखूनों के लिए कैल्शियम की जरूरत होती है. यदि कैल्शियम की कमी हो जाए तो नाखून कमजोर हो जाते हैं और वे बीचबीच में टूटना शुरू हो जाएंगे.

मासिकधर्म में गड़बड़ी :

मासिकधर्म में गड़बड़ी होना कैल्शियम की कमी हो सकती है. कई महिलाओं या किशोरियों को मासिकधर्म शुरू होने से पहले काफी पीड़ा भी हो सकती है.

कमजोर हड्डियां :

कैल्शियम की कमी का सब से अधिक असर हड्डियों पर पड़ता है. आप की हड्डियां जल्दी टूट सकती हैं या उन में फ्रैक्चर हो सकता है. मांसपेशियों में अकड़न और दर्द हमेशा बना रह सकता है.

अम्मी कहां हैं: कौन मिला रेलवे प्लेटफौर्म पर?

‘‘अम्मीजान, आप यहीं खड़ी रहना, मैं टिकट ले कर अभी आता हूं,’’ कह कर मोहिन खान अपनी मां को रेलवे प्लेटफार्म की तरफ जाने वाली सीढ़ी के पास छोड़ कर टिकट लेने चला गया.

टिकट खिड़की पर लाइन लंबी थी, जो बस स्टौप तक पहुंच गई. उसे इतनी भीड़ होने का अंदाजा न था. उस ने सोचा, ‘टिकट ही तो लेनी है. उस में कौन सी बड़ी बात है.’

पर जब वह टिकट लेने पहुंचा, तो सब ने उसे ‘लाइन से आओ’ कह कर पीछे भेज दिया. वह सब से पीछे जा कर खड़ा हो गया और लाइन आगे बढ़ने का इंतजार करता रहा. पर कहां? लाइन वहीं की वहीं, धीरेधीरे चींटी की तरह आगे बढ़ रही थी.

मोहिन खान को अपनी मां को ले कर भिंडी बाजार जाना था. कल उस के भतीजे का पहला जन्मदिन था.

चूंकि उस की मां की उम्र हो चुकी थी. उस ने सोचा कि आज मां को वहां छोड़ कर कल शाम अपनी बीवी और बच्चे को साथ ले जाएगा, इसलिए मां को भाई के घर छोड़ कर उसे किसी भी हाल में वापस लौटना था, क्योंकि नौकरों के भरोसे वह दुकान छोड़ नहीं सकता था, इसलिए उसे जल्दी थी.

वहां उस की अम्मी इंतजार कर के थक गईं. मन ही मन कुढ़ते हुए वे सोचने लगीं कि पता नहीं कहां चला गया. कह कर गया था कि टिकट लाने जा रहा हूं, पर इतनी देर हो गई और अब तक नहीं लौटा.

उन्होंने गुस्से में आव देखा न ताव धीरेधीरे सीढ़ी चढ़ कर 2 नंबर के प्लेटफार्म पर आ गईं. यह सोच कर कि उन का बेटा पीछेपीछे आ जाएगा.

जो ट्रेन आई, वे उस में चढ़ गईं.

उन्हें अपनी सहेली की बेटी सुलताना मिली. उसे भी भिंडी बाजार जाना था. वे कई सालों बाद उस से मिलीं, तो बतियाने लगीं.

इधर मोहिन खान टिकट ले कर सीढि़यों के पास पहुंचा. वहां अपनी अम्मी को न देख कर वह घबरा गया. उस ने टिकटघर के आसपास का सारा इलाका छान मारा, पर उसे उस की अम्मी कहीं नहीं नजर आईं.

शाम ढल चुकी थी. अंधेरा भी हो गया. सड़कें, दुकान, मकान, होटल यहां तक कि टिकटघर के साथ प्लेटफार्म भी बिजली की रोशनी से जगमगाने लगे थे.

उस ने सभी प्लेटफार्म देख लिए, पर अम्मी का कहीं पता नहीं चला. पूछताछ करे भी तो किस से? उसे कुछ भी सूझ नहीं रहा था कि वह क्या करे.

मोहिन खान ने बारीबारी से सब को फोन कर के पूछ लिया, पर कहीं से भी उस की अम्मी के पहुंचने की खबर नहीं मिली. अब तो वह और भी डर गया. उस के परिवार वाले भी परेशान थे. भिंडी बाजार में फोन करने पर उस के भाईजान और भाभीजान दोनों परेशान हो गए. कुर्ला से भायखाला का आधे घंटे का सफर है, फिर वे कहां रह गईं.

भिवंडी में मझले भाई असलम को पता चला, तो वह भी परेशान हो गया. गोवंडी में मोहिन खान की आपा को जब यह बात पता चली, तो वे बहुत गुस्से में बिफर कर फोन पर ही चिल्लाईं, ‘कितने लापरवाह हो तुम लोग? अभी कल ही तो छोड़ आई थी मैं उन्हें, कहीं कोई झगड़ा तो नहीं कर लिया किसी ने?’ कह कर गुस्से से फोन रख दिया.

मझला भाई भी अपने परिवार के साथ अम्मी को ढूंढ़ता हुआ पहुंच गया. फिर सब ने मिल कर अंदाजा लगाया कि कहीं वे वापस मोहिन खान के घर तो नहीं चली गईं?

यह सोच कर मझले भाई ने उसे फोन लगा कर कहा, ‘‘देखो मोहिन, तुम घबराना मत. तुम एक काम करो, एक बार घर जा कर देख लो. कहीं वे वापस न चली गई हों. अगर वे घर पर न हों, तो भी फिक्र मत करो. तुम दुकान बंद कर के बीवीबच्चों के साथ यहां चले आओ. हम सब मिल कर ढूंढ़ते हैं.’’

‘‘अच्छा भाईजान,’’ कह कर मोहिन खान सीधा घर गया. वहां अम्मी को न पा कर दोनों मियांबीवी कुछ देर बाद भिंडी बाजार पहुंच जाते हैं.

सब कितने खुश थे कि कल असलम के बच्चे का पहला जन्मदिन मनाया जाने वाला था. सब सोच रहे थे कि बड़े धूमधाम से जन्मदिन मनाएंगे कि अचानक यह खबर मिली. जहां कल के जश्न की तैयारियां होनी थीं, आज वहां एक अजीब सी खामोशी छाई थी.

जैसेजैसे रात होती गई, सब की फिक्र भी बढ़ती जा रही थी. सब के चेहरे मायूस थे. फिर सब ने तय किया कि अगर कल शाम तक कोई खबर नहीं मिली या अम्मी नहीं लौटीं, तो पुलिस में शिकायत दर्ज करेंगे. रात के साढ़े 11 बजे थे. सब थक चुके थे, पर किसी को भी न भूख थी, न आंखों में नींद.

अचानक दरवाजे की घंटी बजी. दरवाजा खुलते ही सामने अम्मी को एक अजनबी के साथ देख कर सब को हैरानी हुई. सब के चेहरे खुशी से चमक उठे.

अम्मी ने उस अजनबी को भीतर बुलाया और सोफे पर बैठाया. बहू से कहा, ‘‘शबनम, जरा पानी तो लाना.’’

‘‘जी अम्मीजान,’’ कह कर वह रसोईघर में गई और एक ट्रे में एक जग पानी भर कर और कुछ खाली गिलास भी ले आई.

तब तक अम्मी भी बैठ चुकी थीं. उन को पानी पिला कर वह जाने लगी, तो अम्मी ने कहा, ‘‘बहू, ये हमारे मेहमान हैं, आज रात यहीं रुकेंगे. इन के खानेपीने का इंतजाम करो.’’

‘‘जी अम्मीजान,’’ कह कर वह वापस रसोईघर में चली गई.

अब अम्मी बेटों और दामाद की ओर मुड़ कर बोलीं, ‘‘यह मेरी सहेली का बेटा है, जो मुझे छोड़ने आया है. हुआ यों कि मैं मोहिन खान के इंतजार में खड़ीखड़ी थक कर यह सोच कर धीरेधीरे चल पड़ी कि मेरे पीछे चला आएगा, पर वह नजर ही नहीं आया…

‘‘मैं यह सोच कर गाड़ी में भी चढ़ गई कि वह पीछे ही होगा, पर इस का तो पता ही नहीं था.

‘‘फिर मुझे मेरी सहेली की बेटी सुलताना मिली. उस से पता चला कि उस की मां की तबीयत आजकल खराब चल रही है, इसलिए मैं उसे देखने चली गई थी. वह भिंडी बाजार में ही रहती है.’’

यह सुन कर सब खामोश हो गए. कुछ ही देर में शबनम ने आ कर अम्मी के कान में कहा, ‘‘अम्मीजान, खाना लग चुका है.’’

‘‘चलो, खाना लग चुका है,’’ अम्मी ने कहा.

बाद में अम्मी अपनी सहेली के बेटे अजीज को मेहमानों के कमरे में पहुंचा कर खुद भी आराम करने अपने कमरे में चली गईं. बाकी सब भी सोने के लिए जाने की तैयारी में थे कि ऐसे में असलम के मोबाइल फोन की घंटी बजी. सामने से पूछा गया… ‘अम्मी कहां…’

इस से पहले कि उस की बात पूरी होती, असलम ने कहा, ‘‘अम्मी यहां…’’ और इस से आगे वह खुशी के मारे कुछ भी नहीं कह पाया.

मेरा कलीग मुझे ब्लैकमेल कर रहा है, मैं क्या करूं?

सवाल

मेरी शादी को 7 साल हो गए हैं. हम पति-पत्नी जौब करने के कारण एक-दूसरे से अलग रह रहे हैं. मेरी पोस्टिंग लखनऊ में है, जहां मेरी अपने कलीग से अच्छी दोस्ती है. मैं उस से हर बात शेयर करती हूं. लेकिन जब मैंने उसे बताया कि अब मैं अपने पति के पास दिल्ली जाना चाहती हूं चाहे मुझे जौब ही क्यों न छोड़नी पड़े, तो यह सुन उस ने मुझे ब्लैकमैल करना शुरू कर दिया कि मैं तुम्हारे पति को हम दोनों के रिश्ते के बारे में सब बता दूंगा. यह सुन मेरे होश उड़ गए, क्योंकि हम सिर्फ अच्छे दोस्त हैं उस के सिवा कुछ नहीं. मुझे नहीं पता था कि वह इस तरह का इंसान है. समझ नहीं आ रहा, कैसे खुद को इस दुविधा से बाहर निकालूं?

जवाब

कई बार जब हम दूसरे पुरुष से अपना सुखदुख शेयर करना शुरू कर देते हैं तो वह यह समझने लगता है कि आप उसे पसंद करते हैं. आप के मामले में भी यही हुआ है. अब आप से दूरी उसे बरदाश्त नहीं हो रही. तभी वह आप को ब्लैकमैल कर रहा है. आप घबराएं नहीं, बल्कि यह जांचें कि उस ने कोई आप का अश्लील वीडियो तो नहीं बनाया है.

फिर आप इस बात से पति को परिचित कराएं ताकि वे आ कर सारा मामला सुलझा सकें. ध्यान रखें एक बार चीजें नौर्मल होने के बाद भविष्य के लिए आप भी सचेत हो जाएं, क्योंकि आप को नहीं पता कि आप की करीबी का कोई क्या मतलब निकाल रहा है.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem 

संस्कार: आखिर मां संस्कारी बहू से क्या चाहती थी

नई मारुति दरवाजे के सामने आ कर खड़ी हो गई थी. शायद भैया के ससुराल वाले आए थे. बाबूजी चुपचाप दरवाजे की ओट में हाथ जोड़ कर खड़े हो गए और मां, जो पीछे आंगन में झाड़ दे रही थीं, भाभी के आवाज लगाते ही हड़बड़ी में अस्तव्यस्त साड़ी में ही बाहर दौड़ी आईं.

आते ही भैया की छोटी साली ने रिंकू को गोद में भर लिया और अपने साथ लाए हुए कई कीमती खिलौने दे कर उसे बहलाने लगी. ड्राइंगरूम में भैया के सासससुर तथा भाभीभैया की गपशप आरंभ हो गई. भाभी ने मां को झटपट नाश्ता और चाय बनाने को कह दिया. मां ने मुझ से पूछ कर अपनी मैली साड़ी बदल डाली और रसोई में व्यस्त हो गईं.

मां और बाबूजी के साथ ही ऐसा समय मुझे भी बड़ा कष्टकर प्रतीत होता था. इधर भैयाभाभी के हंसीठट्टे और उधर मां के ऊपर बढ़ता बोझ. यह वही मां थीं जो भैया की शादी से पूर्व कहा करती थीं, ‘‘इस घर में जल्दी से बहू आ जाए फिर तो मैं पलंग पर ही पानी मंगा कर पिऊंगी,’’ और बहू आने के बाद…कई बार पानी का गिलास भी बहू के हाथ में थमाना पड़ता था.

जिस दिन भैया के ससुराल वाले आते थे, मां कपप्लेट धोने और बरतन मांजने का काम और भी फुरती से करने लगती थीं. घर के छोटेबड़े काम से ले कर बाजार से खरीदारी करने तक का सारा भार बाबूजी पर एकमुश्त टूट पड़ता था. कई बार यह सब देख कर मन भर आता था, क्योंकि उन लोगों के आते ही मांबाबूजी बहुत छोटे पड़ जाते थे.

दरवाजे के बाहर बच्चों का शोरगुल सुन कर मैं ने बाहर झांक कर देखा. कई मैलेकुचैले बच्चे चमचमाती कार के पास एकत्र हो गए थे. भैया थोड़ीथोड़ी देर बाद कमरे से बाहर निकल कर देख लेते थे और बच्चों को इस तरह डांटते खदेड़ते थे, मानो वे कोई आवारा पशु हों.

भैया के सासससुर के मध्य रिंकू की पढ़ाई तथा संस्कारों के बारे में वाक्युद्ध छिड़ा हुआ था. रिंकू बाबूजी द्वारा स्थापित महल्ले के ही ‘शिशु विहार’ में पढ़ता था. किंतु भाभी और उन के पिताजी का इरादा रिंकू को किसी पब्लिक स्कूल में दाखिला दिलवाने का था. भाभी के पिताजी बोले, ‘‘इंगलिश स्कूल में पढ़ेगा तो संस्कार भी बदलेंगे, वरना यहां रह कर तो बच्चा खराब हो जाएगा.’’

इस से पहले भी रिंकू को पब्लिक स्कूल में भेजने की बात को ले कर कई बार भैयाभाभी आपस में उलझ पड़े थे. भैया खर्च के बोझ की बात करते थे तो भाभी घर के खर्चों में कटौती करने की बात कह देती थीं. वह हर बार तमक कर एक ही बात कहती थीं, ‘‘लोग पागल नहीं हैं जो अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ाते हैं. इन स्कूलों के बच्चे ही अच्छे पदों पर पहुंचते हैं.’’

भैया निरुत्तर रह जाते थे.

बड़े उत्साह से भाभी ने स्कूल से फार्म मंगवाया था. रिंकू को किस प्रकार तैयारी करानी थी इस विषय में मुझे भी कई हिदायतें दी थीं. वह स्वयं सुबह जल्दी उठ रिंकू को पढ़ाने बैठ जाती थीं. उन्होंने कई बातें रिंकू को तोते की तरह रटा दी थीं. वह उठतेबैठते, सोतेजागते उस छोटे से बच्चे के मस्तिष्क में कई तरह की सामान्य ज्ञान की बातें भरती रहती थीं.

अब मां और बाबूजी के साथ रिंकू  का खेलना, घूमना, बातें करना, चहकना काफी कम हो गया था. एक दिन वह मांबाबूजी के सामने ही महल्ले के बच्चों के साथ खेलने लगा. भाभी उबलती हुई आईं और तमक कर बाबूजी को भलाबुरा कहने लगीं, ‘‘आप रिंकू की जिंदगी को बरबाद कर के छोड़ेंगे. असभ्य, गंदे और निरक्षर बच्चों के साथ खेलेगा तो क्या सीखेगा.’’

और बाबूजी ने उसी समय दुलारते हुए रिंकू को अपनी गोद में भर लिया था.

भाभी की बात सुन कर मेरे दिल में हलचल सी मच गई थी. ये अमीर लोग क्यों इतने भावनाशून्य होते हैं? भला बच्चों के बीच असमानता की खाई कैसी? बच्चा तो बच्चों के साथ ही खेलता है. एक मुरझाए हुए फूल से हम खुशबू की आशा कैसे कर सकते हैं. क्यों नहीं सोचतीं भाभी यह सबकुछ?

एक बार उबलता दूध रिंकू के हाथ पर गिर गया था. वह दर्द से तड़प रहा था. सारा महल्ला परेशान हो कर एकत्र हो गया था, तरहतरह की दवाइयां, तरहतरह के सुझाव. बच्चे तो रिंकू को छोड़ कर जाने को ही तैयार नहीं थे. आश्चर्य तो तब हुआ जब भाभी के मुंह से उन बच्चों के प्रति वात्सल्य के दो बोल भी नहीं फूटे. वह उन की भावनाओं के साथ, उमड़ते हुए प्यार के साथ तालमेल ही नहीं बैठा पाई थीं.

भाभी भी क्या करतीं? उन के स्वयं के संस्कार ही ऐसे बने थे. वह एक अमीर खानदान से ताल्लुक रखती थीं. पिता और भाइयों का लंबाचौड़ा व्यवसाय है. कालिज के जमाने से ही वह भैया पर लट्टू थीं. उन का प्यार दिनोंदिन बढ़ता गया. मध्यवर्गीय भैया ने कई बार अपनी परिस्थिति की यथार्थता का बोध कराया, लेकिन वह तो उन के प्यार में दीवानी हुई जा रही थीं. समविषम, ऊंचनीच का विचार न कर के उन्होंने भैया को अपना जीवनसाथी स्वीकार ही लिया.

जब इस घर में आने के बाद एक के बाद एक अभावों का खाता खुलने लगा तो वह एकाएक जैसे ढहने सी लगी थीं. उन्होंने ही ड्राइंगरूम की सजावट और संगीत की धुनों को पहचाना था. इनसानों के साथ जज्बाती रिश्तों को वह क्या जानें? वह अभावों की परिभाषा से बेखबर रिंकू को अपने भाइयों के बच्चों की तरह ढालना चाहती थीं. भैया की औकात, भैया की मजबूरी, भैया की हैसियत का अंदाजा क्योंकर उन्हें होता?

कभीकभी ग्लानि तो भैया पर भी होती थी. वह कैसे भाभी के ही सांचे में ढल गए थे. क्या वह भाभी को अपने अनुरूप नहीं ढाल सकते थे?

रिंकू टेस्ट में पास हो गया था. भाभी की खुशी का ठिकाना न रहा था. मानो उन की कोई मनमांगी मुराद पूरी हो गई थी. अब वह बड़ी खुशखुश नजर आने लगी थीं.

जुलाई से रिंकू को स्कूल में भेजे जाने की तैयारी होने लगी थी. नए कपड़े बनवाए गए थे. जूते, टाई तथा अन्य कई जरूरत की वस्तुएं खरीदी गई थीं. अब तो भाभी रिंकू के साथ टूटीफूटी अंगरेजी में बातें भी करने लगी थीं. उसे शिष्टाचार सिखाने लगी थीं.

भाभी रिंकू को जल्दी उठा देती थीं, ‘‘बेटा, देखा नहीं, तुम्हारे मामा के ऋतु, पिंकी कैसे अपने हाथ से काम करते हैं. तुम्हें भी काम स्वयं करना चाहिए. थोड़ा चुस्त बनो.’’

भाभी उस नन्ही जान को चुस्त बनना सिखा रही थीं, जिसे खुद चुस्त का अर्थ मालूम नहीं था. मां और बाबूजी रिंकू से अलग होने की बात सोच कर अंदर ही अंदर विचलित हो रहे थे.

आखिर रिंकू के जाने का निश्चित दिन आ गया था. स्कूल ड्रेस में रिंकू सचमुच बदल गया था. वह जाते समय मुझ से लिपट गया.

मैं ने उसे बड़े प्यार से पुचकार कर समझाया, ‘‘तुम वहां रहने नहीं, पढ़ने जा रहे हो, वहां तुम्हारे जैसे बहुत से बच्चे होंगे. उन में से कई तुम्हारे दोस्त बन जाएंगे. उन के साथ पढ़ना, उन के साथ खेलना. तुम हर छुट्टी में घर आ जाओगे. फिर मांबाबूजी भी तुम से मिलने आते रहेंगे.’’

भाभी भी उसे समझाती रहीं, तरहतरह के प्रलोभन दे कर. मां और बाबूजी के कंठ से आवाज ही नहीं निकल रही थी. बस, वे बारबार रिंकू को चूम रहे थे.

रिंकू की विदाई का क्षण मुझे भी रुला गया. बोगनबेलिया के फूलों से ढके दरवाजे के पास से विदाई के समय हाथ हिलाता हुआ रिंकू…मां और बाबूजी के उठे हाथ तथा आंसुओं से भीगा चेहरा… उस खामोश वातावरण में एक आवाज उभरती रही थी. बोगनबेलिया के फूलों की पुरानी पंखडि़यां हवा के तेज झोंके से खरखर नीचे गिरने लगी थीं. उस के बाद उस में संस्कार के नए फूल खिलेंगे और अपनी महक बिखेरेंगे.

सास भी कभी बहू थी: बहुओं की ताजातरीन खबरें

जी हां, विवाहों के पिछले सीजन में मैं भी सास बन गई हूं. वैसे देखने में तो अपने 24 वर्षीय पुत्र की बड़ी बहन ही लगती हूं, पर हां, मेरा पद अवश्य बढ़ गया है. अब बारी आ गई है मेरी वे सभी कर्जे चुकाने की जो बहू बनने के बाद से आज तक मेरे माथे थे. रिश्तेदारों, मित्रों सभी की नजरों में मैं बहुत शांत स्वभाव की महिला हूं. लोग तो यहां तक कहते हैं कि मेरी बहू ने कितने अच्छे कर्म किए होंगे जो ऐसी सास उसे मिली. और कहें भी क्यों न, आज तक बहू को मैं ने कभी ऊंची आवाज में डांटा तक नहीं. यह अलग बात है कि घर आते ही बेटे को दैनिक घटनाओं से मैं तुरंत अवगत करा देती हूं. बहू को चढ़ाई सारी अच्छी साडि़यां, मैं ने रख ली हैं. अरे भई फैशन पलटते देर ही नहीं लगती. इतनी सारी एक ही फैशन की साडि़यों का वह क्या करेगी, उसी के लेनेदेने में ही तो ये साडि़यां कल काम आएंगी. और तो और, उस के गहने, हमारा चढ़ाया हीरे का सैट सब मेरे पास ही हैं. आजकल तो चोरउचक्कों का कोई अतापता नहीं, इसलिए मेरे लौकर में उस के सारे भारी गहने मैं ने रख छोड़े हैं. हां, कभीकभी उन्हें मैं पहन लेती हूं. अब भई, पता भी तो रहना चाहिए कि कहीं कुछ गायब तो नहीं हो गया.

घर में मित्रोंरिश्तेदारों के आते ही बहू जो काम रोज करती है, वह मैं उसे करने नहीं देती. अब देखिए, बेटीबहू सभी एकसमान हैं. हां, यह अलग बात है कि बहू को कुछ बनाना नहीं आता या खराब बनाया होता है तो मैं उसे चुपचाप से अपने संबंधियों को चखा देती हूं. खामख्वाह बहू के प्रति उन की उम्मीद बढ़ाने से क्या फायदा? बहू यों तो मायके कम ही जाती है पर उस के पीछे उस का कमरा, उस की अलमारियां सब मैं साफ करती रहती हूं, जमाती रहती हूं. आखिर मेरा भी तो कुछ फर्ज बनता है बहू के प्रति. यह बात अलग है कि उस दौरान मु झे बहू के पस और क्याक्या है, पता चल जाता है. एक तरह से अच्छा ही है. आकस्मिक पार्टियों में भेंट देने को ऐसे ही गिफ्ट तो काम आते हैं.

सुबहसवेरे सत्संग जाए बगैर मु झे चैन ही नहीं मिलता. अजी सत्संग के अनेक फायदे हैं, एक तो भगवान का ध्यान 1-2 घंटे का हो जाता है, दूसरे, सभी सहेलियों से उन की बहुओं की ताजातरीन खबरें और नुस्खे मिल जाते हैं और तीसरे, घर आते ही गरमगरम खाना टेबल पर तैयार मिलता है. बहू को फैशनेबल कपड़े मैं ने कभी पहनने नहीं दिए. अजी हमारी भी तो कोई संस्कृति है. यह सलवार, सूट, जींस वगैरह तो अपनी परंपरा नहीं है. साड़ी ही भारतीय परिधान है, फिर भले ही उस में भागदौड़ करते वक्त पैर फिसले और कोई गिर क्यों न पड़े. सिर ढकना तो हमारी सभ्यता की निशानी है. अब बहू भले ही विजातीय हो, बेटे की पसंद और लवमैरिज से आई हो, पर रह तो हमारे ही घर में रही है न. सास बन कर मैं बेहद प्रसन्न हूं. सारे पड़ोसी मेरा लोहा मानते हैं. बहू मेरी सारी बातें मानती, जो कभी नहीं भी मानती है तो मेरी तबीयत ही खराब हो जाती है. फिर ईसीजी के बिल, डाक्टर की दवाओं का बिल देख कर वह अपनेआप मान जाती है.

पोतेपोती भी मु झ से बहुत ही प्रसन्न रहते हैं. आतेजाते उन को टौफीचौकलेट जो मैं खिलाती रहती हूं. अब बहू मना करे तो भी क्या? इस उम्र में चौकलेट नहीं खाएंगे तो कब खाएंगे. अब दांतों में कीड़ा तो रोज रात को ब्रश नहीं करने से लगता है और यह तो बहू की ही जिम्मेदारी है न. दहेज की मैं ने कभी मांग ही नहीं की. इस उम्र में धनमाया का मैं क्या करूंगी. हां, पड़ोस की बहुएं जो तीजत्योहारों पर ससुराल वालों के लिए सौगातें लाती रहती हैं, वह जरूर बहू को बता देती हूं. अब अपने पासपड़ोस की भी तो आदमी को खबर रखनी चाहिए. अपनी बहू की कद्र करना तो कोई मु झ से सीखे. पीएचडी की उस की पढ़ाई को मैं ने रोका नहीं और उसे नौकरी भी करने दी. मेरा लाड़ बहू के कामकाजी होने की वजह से भी कभी कम नहीं हुआ. शाम को बहू ही आ कर अदरक वाली चाय और खाना बनाती है. भई, उस के हाथ की चाय के बिना उठा ही कहां जाता है बिस्तर से. भले ही शादियों, फंक्शनों में बहू दस्तूर दे आए, पर वहां से आए गिफ्ट तो मैं ही रखती हूं. अब भई, मिलना बरतना तो मु झे ही है. उस बेचारी को क्या पता कि कहां क्या देनालेना है. नारी सशक्तीकरण के चलते मैं ने कभी बहू को इमोशनली कमजोर नहीं होने दिया. जब भी वह रोती है, मैं उस के आंसुओं को मगरमच्छ के आंसू करार दे देती हूं, बस. बहू का रोना बंद हो जाता है. आखिर उसे स्ट्रौंग बनाना भी तो मेरा ही कर्तव्य है.

घर, औफिस, बच्चों से बहू जब भी थोड़ी फ्री होती है, मैं अपने ब्लाउज, साड़ीफौल उसे थमा देती हूं. आखिर सिलाईकढ़ाई के हुनर को जीवित रखना भी तो बेहद जरूरी है. सिलाईकढ़ाई करेगी नहीं तो दक्ष कैसे होगी और इन सब कामों से उसे टाइम न मिलने के कारण वह मेकअप भी कहां कर पाती है, तभी तो सिंपल रहती है. कहते भी हैं न, सादगी में भी सुंदरता है. घर का खर्च दोनों कमाऊ बेटाबहू से मैं बराबर लेती है. समानता का जमाना है भई. बड़े विवेकपूर्ण ढंग से उसे खर्च करती हूं. विवाहित बेटे और अविवाहित बेटे को बराबर खर्चा देती हूं. इसी अनुशासन दूरदृष्टि व सहयोगात्मक रवैए के कारण ही तो मैं इतनी प्रसिद्ध हूं. बहू की भावनाओं को जितना मैं सम झती हूं उतना और कोई नहीं. और सम झूं क्यों नहीं, आखिर सास भी तो कभी बहू थी.

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