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महज गपोड़िए और पालतू बन कर रह गए इंडियन पोडकास्टर्स

यूट्यूब पर पोडकास्ट चलाने वाले इन्फ्लुएंसर्स की संख्या खूब बढ़ रही है. हालत यह है कि इंस्टाग्राम ओपन करते ही इन्हीं की काटी हुई शौर्ट रील्स जबरदस्ती हर दूसरी फीड में आ जाती है. इन रील्स में काम का होताजाता कुछ नहीं, बस कैमरे के सामने एक हैडफोन पहने पोडकास्टर कुरसी पर बैठे दिखता है. थोड़ाबहुत पैसा जोड़ लिया हो तो रौड कंपनी का ब्लैक माइक्रोफोन सामने लगा रहता है और ट्रैंडिंग बैकग्राउंड म्यूजिक से बातों को ऐसे सैंसेशनलाइज किया जाता है जैसे इस से जरूरी कुछ और नहीं.

इंडिया में अधिकतर पोडकास्टर्स यूट्यूब पर अपनी गपों की दुकान चला रहे हैं. ध्यान से यदि इन के पोडकास्ट सुनें तो समझ आ जाएगा कि ये डिजिटल एरा में ठीक उसी तरह के गपोड़िए हैं जैसे हर रिश्तेदारी में मिर्चमसाला लगा कर यहां से वहां करने वाली कोई न कोई चाचीताई होती है, या ये ठीक उसी तरह के गपोड़िए हैं जैसे चौपालों या ड्राइंगरूम में ज्ञान दे रहे शर्मा और वर्मा अंकलों की अधकचरी राजनीतिक व सामाजिक समझ.

माजरा यह है कि पोडकास्ट इन्फ्लुएंसर बनने में लगताजाता कुछ नहीं है. एक छोटे से कमरे में स्टूडियो सैटअप लगाना होता है. दीवारों पर वौयस कैंसिलेशन वाले गद्दे, अगर यह नहीं भी है तो बिस्तर के गद्दे ही जमीन पर बिछा कर काम चल जाता है. पीछे काला परदा, एक एचडी कैमरा (ईएमआई पर खरीदा फोन ही सही), कोई भी ऐसा लैपटौप जिस में एडिटिंग सौफ्टवेयर चल सके, काफी है. अगर हलका बजट ज्यादा है तो ट्राईपोड, कौलर माइक और लाइटिंग किट भी जोड़ लिया जाता है. कुल मिला कर 15-20 हजार रुपए लगा कर किसी भी ऐरेगैरे को ज्ञानगपोड़ी बनने का लाइसैंस यूट्यूब दे ही देता है.

यही कारण है कि यूट्यूब पर कचरा परोसने वाले ऐसे ढेरों पोडकास्टर्स उग आए हैं जो न सिर्फ लोगों का घंटों समय बरबाद कर रहे हैं बल्कि ऐसी अधकचरी जानकारियां सोशल मीडिया पर ठेल रहे हैं जिन से झूठ और आलतूफालतू बातें ही यहांवहां फैल रही हैं. उदाहरण के लिए ‘रियल टौक क्लिप्स’ नाम के एक यूट्यूब चैनल को लेते हैं.

इस चैनल को 3 लड़के चलाते हैं. इन के पोडकास्ट का पैटर्न इंटरव्यू बेस्ड है. ये ऐसे लोगों को एक्सपर्ट बता कर इंटरव्यू लेते हैं जो अजीबोगरीब मिथकीय बातें करते हैं. इंटरव्यू सिर्फ नाम का होता है. चुनाव के समय जिस तरह न्यूज़ चैनल्स पीएम मोदी की जीहुजूरी वाले इंटरव्यू ले रहे थे, इस में भी बस इसी तरह के इंटरव्यूज होते हैं. किसी भी नत्थूखैरा, जिसे जाननेसमझने से जानकारी कम, बेड़ा गर्क ज्यादा होगा, को गेस्ट के तौर पर बैठा लिया जाता है और उस से कोई काउंटर सवाल नहीं किया जाता.

इन तीनों लड़कों का यह चैनल जानकारी देने के नाम पर अंधविश्वास फैलाने का अड्डा बना हुआ है. एक उदहारण से समझिए, 11 जून को ये ऐसा ही एक 45 मिनट के करीब का वीडियो अपलोड करते हैं, जिस में हर्ष गोयल नाम के एक रुद्राक्ष एक्सपर्ट को बुलाते हैं. अब कोई बताए कि रुद्राक्ष पहनने में कब से एक्सपर्टीज आने लगी है? होस्ट अपनी बात स्टार्ट करता है कि यह पोडकास्ट रुद्राक्ष पहनने के नियमों पर है.

इस वीडियो में ‘एक्सपर्ट’ हर्ष गोयल बताता है कि जो व्यक्ति रुद्राक्ष धारण करता है उसे खुद भगवान शिव नमन करते हैं. यह वह शिवपुराण के 25वें अध्याय के आधार पर बताता है. इस के अलावा वह कहता है कि ‘सही समय पर रुद्राक्ष धारण कर लिया जाए तो कैंसर जैसी बीमारियों से बचा जा सकता है.’ अब ऐसी बातें सुन कर कोई भी समझदार व्यक्ति अपना माथा धुन ले.

अब अगर इन गपोड़ी इन्फ्लुएंसर की जगह कोई जिज्ञासु पोडकास्टर होता तो काउंटर में सवाल जरूर पूछता कि रुद्राक्ष में यदि इतनी ही ताकत है तो सरकार से देशभर के सारे सरकारी और प्राइवेट अस्पताल बंद करवा कर घरघर रुद्राक्ष बंटवाने की मुहिम क्यों नहीं शुरू कर देते? जब 200 रुपए के रुद्राक्ष की माला से ही सब कष्ट दूर हो रहे हैं, तो हजारों रुपए पर खर्चने की जरूरत ही क्या है? मगर नहीं, ऐसे भ्रम फैलाना तो इन पोडकास्टर्स का धंधा है.

इस चैनल में यह ऐसी अकेली कचरा वीडियो नहीं है. 2 हफ्ते पहले यह यूट्यूब चैनल ‘लड़की की वजह से अपने ही दोस्त पे किया काला जादू’ नाम से एक वीडियो अपलोड करता है. इस में गेस्ट के रूप में अक्षय वशिष्ट नाम के व्यक्ति को बुलाया जाता है. एक तो समझ नहीं आता ये पोडकास्ट वाले कहां से एक से बढ़ कर एक नमूने ढूंढ लाते हैं.

अक्षय इस वीडियो में बिना प्रूफ के बस सुनीसुनाई बातों से भूतप्रेत वाला किस्सा सुनाता है, जिस में एक किस्सा, रोहित नाम के यूपी के लड़के का होता है जिसे उसी का दोस्त उस की गर्लफ्रैंड का वशीकरण कर लेता है. अक्षय इस वीडियो में लम्बीलम्बी गपें हांक रहा होता है और होस्ट ‘ओये…क्या बात है…सच में…ओयेहोए…अच्छा जी’ कहते रहते हैं. इस चैनल पर ऐसी ढेरों वीडियोज हैं जिन पर कायदे से रिपोर्ट की जाए तो चैनल पर अंधविश्वास फैलाने के चक्कर में छापा पड़ जाए.

‘रियल टौक क्लिप्स’ के अलावा ‘दोस्तकास्ट’ नाम का एक यूट्यूब चैनल है. इसे चलाने वाले का नाम विनम्र कसाना है. इस के पोडकास्ट देखें तो इस में मिक्स कंटैंट देखने को मिलता है. इस में यूनियन मिनिस्टर हरदीप पुरी से ले कर पत्रकारिता का फुका कारतूस प्रदीप भंडारी भी दिखने को मिलता है, जिस ने पत्रकार जमात का नाम ही खराब किया है. इस चैनल के अधिकतर एपिसोड मौजूदा सरकार को एकतरफा सपोर्ट करने वाले होते हैं. आजकल बगुलेभक्तों के बीच फेमस हो रहा अक्षत गुप्ता का इंटरव्यू भी इस में दिखता है जिस की रोजीरोटी ही धर्मप्रचार से चलती है.

अगर पौलिटिकल वीडियो से हट कर भी देखा जाए तो रजत दलाल जैसे इंटरनैट माफिया को यह अपने शो में गेस्ट के तौर पर बुलाता है, जिस की वीडियो में क्या है, क्यों है कुछ पता नहीं चलता. सवाल पूछे जाते हैं कि मैक्सटर्न और एल्विश की लड़ाई में उस की एंट्री कैसे होती है. जिस पर रजत कहता है, “एक मैं ने स्टोरी डाली थी जो पिटने के काम करेगा वो पिटेगा. उस पर 74 हजार शेयर थे. यह स्टोरी इतनी घूमी कि लगा रजत दलाल इन के झगड़े में एंट्री कर रहा है. पर मैं ने दोनों से बात की और बात ख़त्म की.”

अब कोई भी समझदार बताए कि इन तीनों के झगड़े से आम दर्शकों का क्या लेनादेना और वैसे भी, ये कौन सा नैशनल, एजुकेशनल या लोकल इशू है जिसे दर्शकों का जानना बहुत जरूरी है. एल्विश जो युवाओं को नशे करना सिखा रहा है, मैक्सटर्न जो सस्ती पौपुलैरिटी से पैदा हुआ है और रजत दलाल जो लफंगई करता है आदि जैसों को युवा जानें ही क्यों? क्यों इन्हें ही युवाओं के बीच थोपा जा रहा है?

हैरानी यह कि लफंगई करने वालों को यह चैनल खुला स्पेस दे रहा है, साथ में, उन्हें यूथ आइकन की तरह प्रेजेंट कर रहा है. इस शो में आए गेस्ट गालीगलौज करते हैं. हिंदी बोलने वाले गाली देते समय जितने भौंडे सुनाई देते हैं, इंग्लिश बोलने वाले उस से ज्यादा अश्लील दिखाई देते हैं.

अब एक नजर ‘श्याम शर्मा शो’ चैनल पर डालें तो यह भी सिर्फ अपने पोडकास्ट पर गपें हांकता है. कोई ठोस प्रमाण और वजहें इस के पोडकास्ट में दिखाई नहीं देतीं. इस के ढाई लाख से अधिक सब्सक्राइबर्स हैं. इस के चैनल पर भी घूमफिर कर एक ही तरह के गेस्ट यहां से वहां दिखाई देते हैं. गेस्ट भी सिर्फ कचरा परोस रहे हैं और इन्फ्लुएंसर, बस, सिर ही हिला रहे हैं.

इस चैनल की भी अधिकतर जानकारियों का सोर्स और एजेंडा भाजपा के दफ्तर से बन कर आए लगते हैं. चैनल का काम एक तरह का नैरेटिव सैट करने का दिखाई देता है, जैसे ‘हाउ टू रीक्लैम काशी’, ‘डार्क रिऐलिटी औफ मुग़ल’, ‘हाउ जयशंकर ट्रांसफौर्म्ड इंडियन फौरेन पौलिसी’, ‘फौरेन यूनिवर्सिटी स्प्रेडिंग एंटी हिंदू एजेंडा’ वगैरहवगैरह.

ये तो महज कुछ उदाहरण हैं. राज शमामी, बीर बाइसैप्स, सुशांत सिन्हा जैसे बड़ेबड़े पोडकास्टर्स हैं जो अपने शो में ऐसेऐसे लोगों को बुलाते हैं जिन्हें एक्सपर्ट कह कर इंट्रोड्यूस किया जाता है. इन इन्फ्लुएंसर्स के पास सैलिब्रिटीज तक जाते हैं. वहां जा कर उन की क्या क्वालिफिकेशन, एक्सपर्टीज और एक्सपीरियंस हैं, इन पर गोलमोल बातें होती हैं. दर्शक को एक्सपर्ट के नाम पर धेला कुछ नहीं मिलता. हां, कोई यहांवहां से टुकड़े जोड़ कर, किसी समुदाय, ग्रुप को टारगेट कर दे, कुछ भी एक घंटे तक बकबक कर दे वही एक्सपर्ट बन जाता है. एक्सपर्ट ऐसे दिखाई देते हैं जैसे पनवाड़ी की दुकान पर कोई रहस्यमयी बात बता रहे हों. समस्या यह कि ये पोडकस्टर्स अपने दिए कंटैंट तक को सीरियसली नहीं लेते. इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन के दर्शक को ये कितना बुरा इफैक्ट पहुंचा रहे हैं.

भारत में इस समय कई पोडकास्ट चैनल्स हैं. ये चैनल्स बनाए ही इसलिए गए हैं ताकि कंट्रोवर्शियल चीजों पर कुछनकुछ उलटीसीधी बात बाहर आ जाए. लोगों के बीच हल्ला गरम रहे, आउटपुट के नाम पर इन वीडियोज में से कुछ भी नहीं निकलता. व्यूअर्स अपना समय और पैसा बरबाद ही करते हैं. अगर इस का कोई प्रूफ चाहिए तो सोचिए आम समस्याओं पर ये क्या दिखा रहे हैं? क्या भूतप्रेत जैसी अंधविश्वास की कहानियां सीख देंगी? क्या सरकार के पक्ष में पोडकास्ट बनाना लोगों की समस्याओं को सुलझाएगा? गालीगलौज और किसी भी ऐरेगैरे को अपने चैनल पर बैठा कर बेकाम की बातें किस तरह की इन्फौर्मेशन दे रही हैं?

‘‘हमारे बारह’ मूवी प्रोपेगेंडा!   कितनी हकीकत, कितना फरेब

भारत में जनसंख्या विस्फोट है तो क्या इसका एकमात्र कारण मुसलमानों द्वारा अधिक बच्चे पैदा करना है. या फिर मुसलमान जानबूझकर अपनी संख्या बढ़ते जा रहे हैं. यह बातें सही हैं या गलत, यह अलग बहस का विषय है. लेकिन, फिल्म ‘हमारे बारह’ कुछ इसी तरह के प्रोपेगेंडा को लेकर बनाई गई है.  समाज में एक बड़ा वर्ग इसी तरह की चर्चा कर रहा है.

प्रोपेगेंडा मूवी के दौर में हिंदू-मुसलमान करने वाली कहानी खास करके सामने लाई जा रही हैं. रातोंरात चर्चा में आने का यह सबसे आसान रास्ता भी बन गया है. लेकिन, समाज के बीच इस तरह से विभाजन की लकीर खींचने वाला, दूसरे के प्रति दुर्भावना पैदा करने वाला प्रोपेगेंडा अच्छा तो कतई नहीं। फिल्म ‘हमारे बारह’ के संदर्भ में इसे देखा जाए तो एक तरह से मुसलमानों पर बड़ी तोहमत लगाई गई है. हकीकत क्या है और इसमें फरेब कितना है, इस पर नजर जरूरी है.

‘हमारे बारह’ मूवी ने भारत में मुसलमानों की बढ़ती आबादी पर सवाल उठाए हैं. इस फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह से एक मुसलमान परिवार दर्जनभर बच्चे पैदा कर रहा है. इनके घरों की औरतें धड़ाधड़ एक के बाद एक बच्चा पैदा करने में लगी है. इसकी सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय का कहना था कि हमें इसके ट्रेलर में अभी भी आपत्तिजनक डायलॉग्स जारी है, सीबीएफसी जैसी वैधानिक संस्था अपना काम करने में विफल रही है. उच्चतम न्यायालय ने ऐसा उन आरोपों का संज्ञान लेते हुए किया जिसमें यह कहा गया है कि इसमें मुस्लिम महिलाओं का अपमान किया गया है.

हम दो… से हमारे बारह तक का बदलाव
टीजर रिलीज के समय यह मूवी अपने नाम की वजह से काफी चर्चा में आ गई. मूवी के पहले टाइटल ‘हम दो हमारे बारह’ ने ही इसकी आधी पब्लिसिटी कर दी. इस नाम से उपजे विवाद की वजह से इस मूवी का टीज़र सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. बाद में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के हस्तक्षेप के बाद इसका नाम ‘हमारे बारह’ कर दिया गया. एक विशेष वर्ग की ओर से इस मूवी को इस्लामोफोबिक करार दिया गया. इतना ही नहीं इस मूवी को कश्मीर फाइल्स, द केरला स्टोरी जैसी प्रोपेगेंडा फिल्मों से जोड़कर देखा गया. लोकसभा चुनाव के दिनों के आसपास टीज़र रिलीज होने की वजह से समाज के एक धड़े ने इस मूवी के कंसेप्ट को सही ठहराया, वहीं समुदाय विशेष के लोगों ने इस पर ऐतराज जताया.

एक-एक फोटो पर प्रोपेगेंडा का मुहर!  मूवी के पोस्टर पर लिखी लाइन ही फिल्म की सारी स्टोरी को बयां कर देती है.  इस पोस्टर पर एक कैची लाइन लिखी हुई है ‘चीन को पीछे छोड़ दिया’. पोस्टर में लीड एक्टर अन्नू कपूर की फोटो है, मंजूर अली खान संजारी के रूप में अन्नू कपूर पूरी अकड़ के साथ तन के खड़े हैं. उनके बैकग्राउंड में ढेर सारी उदास मुस्लिम प्रेगनेंट महिलाएं हैं, जिनके होंठ सिले हुए हैं. दरअसल पोस्टर के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि मुस्लिम पुरुषों के लिए उनके घर की महिलाएं जनसंख्या बढ़ाने की फैक्ट्री हैं। एक अन्य पोस्टर में दिखाया गया कि अन्नू कपूर के साथ अलग-अलग उम्र के 11 बच्चे और एक प्रैगनेंट महिला मौजूद हैं. इसका संदेश साफ है कि संजारी साहब 12वें बच्चे के अब्बू बनने वाले हैं. लेकिन, क्या असलियत में वाकई देश की बढ़ती जनसंख्या के लिए पूरी तरह से मुसलमान जिम्मेदार हैं.

मुस्लिम और हिंदू घरों में बच्चों के चिल्लपों का अंतर चकित कर देगा
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे -5 की रिपोर्ट के अनुसार, 2019 से 2021 के बीच मुस्लिम महिलाओं का प्रजनन दर 2. 36 रहा, वहीं इसी समयांतराल में हिंदू महिलाओं का प्रजनन दर 1. 94 पाया गया. रिपोर्ट के अनुसार अगर 100 मुसलमान महिलाएं अपने पूरे जीवनकाल में 236 बच्चे पैदा करती हैं, तो इनकी तुलना में उतनी ही संख्या में हिंदू महिलाएं 194 बच्चों को जन्म देती हैं, जो कम है इसलिए किसी के मन में यह सवाल कौंध रहा है कि मुसलमानों का एकमात्र उद्देश्य भारत में अपनी जनसंख्या बढ़ाकर देश की डेमोग्राफी को अपने पक्ष में करना है, तो उनके लिए यह आंकड़ा आंख खोलने वाला है.  साल 1998 से 99 के बीच मुस्लिम महिलाओं की फर्टिलिटी रेट 3. 6 थी.  यानी साल 1999 से 2021 पहुंचते-पहुंचते इन्होंने बर्थ रेट पर काफी कंट्रोल किया है और इसी कारण इसमें करीब 1. 24 की कमी आई.

प्रोपैगेंडा मूवीज का जहर कितना गहरा 
आमतौर पर, द कश्मीर फाइल्स (2022), द केरला स्टोरी (2023), द वैक्सीन वार (2023), 72 हूरें  (2023),  रजाकार (2024) जैसी मूवी को प्रोपैगेंडा मूवी के रूप में माना गया. ये सभी फिल्में एक के बाद एक करके पिछले दो सालों से रिलीज होती रही हैं. क्या इन मूवीज का उद्देश्य सत्तारूढ़ पार्टी के हिंदुत्ववादी एजेंडे को आगे बढ़ाना था. रजाकार और  द कश्मीर फाइल्स मूवीज कहीं न कहीं यह इशारा कर रही थी कि हिंदुओं के नरसंहार में मुस्लिम समुदाय के हाथ को नकारा नहीं जा सकता है. वहीं द केरला स्टोरी में भी यह दिखाने की कोशिश की गई कि किस तरह हिंदू लड़कियों को बहलाफुसलाकर लव जिहाद के एजेंडे को सफल बनाया जा रहा है, 72 हूरें में यह दिखाया गया कि काफिरों को मारने के बाद जन्नत जाने से 72 हूरें मिलती है.  हाल ही में रिलीज हुई रजाकार मूवी ने तो मुसलमानों को गलत ठहराने के एजेंडे को काफी बल दिया. हिंदू महिलाओं के साथ बलात्कार के दृश्य इतने भयावह थे कि समुदाय विशेष के प्रति आसानी से घृणा का बीज बोया जा सकता है. सामाजिक समरसता और सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के लिए इस तरह प्रयासों पर अंकुश जरूरी है।

 

अंगदान न करने के पीछे धार्मिक मिथ्या

भारत में अंगदान जितनी संख्या में हो रहे हैं उस से ज्यादा देश में इस की मांग है. यानी, भारत में प्रति 10 लाख आबादी में अंगदान डोनर एक से भी कम है. यह आंकड़ा दुनियाभर के कई विकसित देशों के मुकाबले बेहद शर्मनाक है. खासतौर पर अमेरिका और स्पेन जैसे देशों की तुलना में जहां डोनरों की दर दुनिया में सब से ऊंची है और जहां प्रति 10 लाख लोगों में 40 अंगदान डोनर हैं.

भारत में इस तरह की स्थिति के चलते जीवित रहने के लिए दान के अंगों की जरूरत वाले कई मरीजों की मौत हो जाती है. भारत अंगदान करने वाले देशों के सब से निचले पायदानों में कहीं पर ठहरता है.

हम बात कर रहे हैं उस भारत की जहां गर्व “दानदक्षिणा” करने पर तो किया जाता है पर यह गर्व अंगों या जरूरतमंदों को दान किए खून का नहीं बल्कि मंदिरों में बैठे पंडों को, वहां विराजमान मूर्तियों पर दूध, तेल, फूल, प्रसाद, पैसों के अभिषेक पर किया जाता है. आमतौर पर लोग इसे शिक्षा की कमी से जोड़ देते हैं, लेकिन खातेपीते लोग सब से ज्यादा इस भ्रम को पाले रहते हैं.

हमारा धर्मशास्त्र हमें यही तो सिखाता है कि अपने मरने पर शरीर में किसी प्रकार की काटपीट न होने दें क्योंकि पुनर्जन्म की व्याख्या शास्त्रों में ही बांची जाती है. हमारे शास्त्रों का पूरा आधार ही पुनर्जन्म पर टिका है, इसी का डर दिखा कर भक्तों से मंदिरों में पैसे काटे जाते हैं.

बात इस जन्म के यहीं खत्म होने की होती, तो लोग मरने के बाद की कहानी को न सोचते, लेकिन यहां धर्म ही सिखाता है कि इस जन्म के बाद एक और जन्म है, और फिर एक और जन्म है. तब भला कोई कैसे अपने अंगों को शरीर से हटवा सकता है? क्या उसे यह डर नहीं सताएगा कि अगर इस जन्म में अंग दान कर दिए तो अगले जन्म में बेअंग पैदा न हो जाएं.

डाक्टर और प्रत्यारोपण के विशेषज्ञों ने अंगों के डोनरों की कमी के लिए कुछ वजहों की शिनाख्त की हैं. उन में अंगदान के बारे में जागरूकता की कमी, प्रैक्टिस से जुड़ी गलत मान्यताएं और बुनियादी ढांचे से जुड़े मुद्दे भी शामिल हैं.

मान्यताएं ऐसी हैं कि अच्छाभला आदमी अपना सिर धुनना शुरू कर दे. क्योंकि यही मान्यताएं हमें मंगलवार को हनुमान पूजा के बाद गरीब लोगों को लड्डू दान करना पसंद कराती हैं. हम निर्जीव मूर्तियों में लाखों का पैसा फेंक आते हैं लेकिन जीवित प्राणियों में एक इंसान नहीं देखते.

यही कारण है कि हर साल, सड़क परिवहन के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में करीब 1,50,000 लोग सड़कों पर मारे जाते हैं. यानी, लगभग 410 से ज्यादा लोग प्रतिदिन दम तोड़ देते हैं. समस्या यह कि इन मृतकों के परिजनों से बात करे कौन? डाक्टर खुद सकुचाते हैं, कहीं उन के परिजन लाठीडंडों से पीटने न लग जाएं.

मार्च में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मासिक रेडियो प्रसारण में जनता से अंगदान का विकल्प चुनने की अपील की थी. उन्होंने कहा कि उन की सरकार एक नीति पर काम कर रही है जो अंगदान की प्रक्रिया को प्रोत्साहित करेगी और उसे सरल बनाएगी.

लेकिन समस्या यह कि देश में अगर अंगदान करने के इच्छुक लोग बढ़ भी जाएं तो सभी अस्पतालों में अंग प्रत्यारोपण से जुड़ी तमाम प्रक्रियाओं के लिए जरूरी साजोसामान या उपकरण मौजूद नहीं हैं. भारत में सिर्फ 250 अस्पताल ही नैशनल और्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट और्गनाइजेशन (नोटो) से पंजीकृत हैं. यह संगठन देश के अंग प्रत्यारोपण कार्यक्रम का समन्वय करता है.

यानी, देश में प्रत्येक 43 लाख नागरिकों के लिए तमाम सुविधाओं और उपकरणों वाला सिर्फ एक अस्पताल है. भारत के देहाती इलाकों में तो ट्रांसप्लांट सैंटर कमोबेश हैं भी नहीं.

समस्या यह कि ताजा राष्ट्रीय स्वास्थ्य रूपरेखा के मुताबिक, भारत उन देशों में शामिल है जहां सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सब से कम पैसा खर्च किया जाता है. प्रधानमंत्री चाहे जितनी चाहे बातें कर लें, अगर स्वास्थय क्षेत्र में पैसा नहीं लगाएंगे तो ये बातें मात्र बातें ही साबित होंगी.

समझने वाली बात यह है कि भारत में अंग प्रत्यारोपण जीवित डोनरों के जरिए ही संभव हो पाता है यानी अपने जीवित रहते ही अपना अंग दान करने पर राजी होना, जैसे कि किडनी. आज विज्ञान ने तरक्की कर ली है, वेदों-शास्त्रों में बेबुनियाद विज्ञान खोजने वाले भी जरूरत पड़ने पर अस्पताल दौड़े चले जाते हैं. इन्हें भी समझने की जरूरत है कि यह तभी संभव होगा जब यह दोमुंहापन छोड़ा जाए और सरकार को स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करने पर मजबूर किया जाए.

हड्डियों को स्वस्थ रखने के लिए खाएं ये चीजें

मजबूत हड्डियों के लिए जरूरी तत्त्व किस तरह के खानपान से मिल सकते हैं, जानिए जरूर:

कैल्सियम: कैल्सियम शरीर में सब से अधिक मात्रा में पाया जाने वाला तत्त्व है. शरीर के 99% कैल्सियम का संचय हड्डियों में होता है जबकि शरीर की विभिन्न क्रियाओं में केवल 1% ही इस का उपयोग किया जाता है. एक औसत व्यक्ति को प्रतिदिन 1,000 से 1,200 मिलिग्राम कैल्सियम की आवश्यकता होती है. हरी पत्तेदार सब्जियां कैल्सियम का अच्छा स्रोत होती हैं. इन के अलावा मछलियां, साबूत अनाज, केले, ब्रैड, पास्ता सोया मिल्क, टोफू और बादाम भी कैल्सियम के अच्छे स्रोत हैं. कम वसायुक्त डेयरी प्रोडक्ट्स में वसायुक्त डेयरी प्रोडक्ट्स की तुलना में अधिक कैल्सियम होता है.

विटामिन डी: विटामिन डी की कमी से हड्डियां कमजोर और मुलायम हो जाती हैं. सूर्य का प्रकाश विटामिन डी का सब से अच्छा स्रोत है. सूर्य की रोशनी के अलावा दूध, अंडा, चिकन, मछली आदि भी विटामिन डी के अच्छे स्रोत हैं.

पोटैशियम: जो लोग पर्याप्त मात्रा में पोटैशियम का सेवन करते हैं उन की हड्डियों की सेहत बेहतर रहती है. शकरकंद, आलू छिलके सहित, दही और केले पोटैशियम के अच्छे स्रोत हैं.

मैग्नीशियम: पालक, चुकंदर, टमाटर, आलू, शकरकंद, किशमिश आदि खाइए, क्योंकि इन में भरपूर मात्रा में मैग्नीशियम पाया जाता है, जो हड्डियों को मजबूत बनाता है.

प्रोटीन: प्रोटीन शरीर का निर्माण करने वाले तत्त्वों में सब से महत्त्वपूर्ण है. यह हड्डियों को मजबूत रखता है. प्रोटीन हड्डियों के लिए ही नहीं उतकों और लिंगामैंट्स के लिए भी बेहद जरूरी है. मेनोपौज के बाद जिन महिलाओं के भोजन में प्रोटीन की मात्रा कम होती है उन में औस्टियोपोरोसिस का खतरा 30% तक बढ़ जाता है.

विटामिन सी और के: हड्डियों को स्वस्थ रखने के लिए विटामिन सी और के भी बहुत आवश्यक हैं. लालमिर्च, हरीमिर्च, संतरा, अंगूर, ब्रोकली, स्ट्राबैरी, अंकुरित अनाज, पपीता और पाइनऐप्पल विटामिन सी के अच्छे स्रोत हैं. शलगम, पालक, सरसों और मैथी में भी विटामिन के भरपूर मात्रा में पाया जाता है.

दोबारा कैसे हासिल करूं पति का भरोसा?

सवाल

मैं 2 वर्षीया बेटी की मां हूं. मेरे कुछ लोगों से नाजायज संबंध हो गए थे. अब पति को मालूम होने पर बड़ी विकट समस्या उत्पन्न हो गई है. मुझे किसी से कोई लगाव नहीं था. सो, संबंध तोड़ने में कठिनाई नहीं हुई.पहले तो मेरे पति ने सब बातें बड़े प्रेम से पूछ लीं और कहा कि तुम पश्चात्ताप कर लो लेकिन अब वे बहुत दुखी रहते हैं. उन्हें मुझ पर विश्वास ही नहीं होता. मुझ से उन का दुख नहीं देखा जाता. दिल करता है कि आत्महत्या कर लूं. लेकिन अपनी बच्ची का मोह इस संसार से बांधे हुए है. मुझे समझ में नहीं आता कि मैं क्या करूं.

जवाब

आप कोई गलत कदम उठाने से पहले क्यों नहीं सोचतीं कि इस का अंजाम कितना बुरा होगा. आप ने जानबूझ कर सरासर गलत काम किए हैं व अपने पति के साथ विश्वासघात किया है. दूसरे, आप ने पति को सबकुछ बता कर भी गलती की है. इस से अविश्वास बढ़ेगा ही, घटेगा नहीं.

आत्महत्या करना कायरता है. आज भी आप स्वयं को सुधार कर अपने परिवार की खुशियां लौटा सकती हैं. अब आप को संयम से काम लेना चाहिए और अपने पति का फिर से विश्वास प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए. खोया विश्वास जगाना आसान नहीं है, लेकिन जीजान से किया गया प्रयत्न कभी बेकार नहीं जाता. आप को पति का विश्वासपात्र बनने के लिए पति द्वारा बताए रास्ते पर चलना चाहिए. आप निष्ठापूर्वक सेवा व प्यार से ही उन का विश्वास पा सकती हैं. कोई भी ऐसा मौका न दें जिस से आप की बीती बातों की झलक मिले.

प्यार या सिर्फ शारीरिक आकर्षण: ऐसे करें लव और लस्ट की पहचान

रिलेशनशिप में हम अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए शब्दों का उपयोग अधिक करते हैं. लेकिन शब्दों पर क्या पूरी तरह से भरोसा किया जा सकता है. हालांकि हमारा शरीर झूठ नहीं बोलता. जब हम किसी के सामने होते हैं तो हम कुछ बौडी लैंगवेज का इस्तेमाल करते हैं. बौडी लैंगवेज किसी भी इंसान के वास्तविक इरादों को दर्शाती है. बहुत बार शब्दों से आकर्षित होकर आप समझ बैठते हैं कि जिस रिश्ते में आप है उसकी नींव प्यार है लेकिन कुछ समय बाद आपको पता चलता है कि उसमें प्यार नहीं केवल शारीरिक आकर्षण है. हालांकि आप अपने रिश्ते को परख कर फर्क जान सकती हैं कि ये प्यार हैं या केवल शारीरिक आकर्षण.

  1. क्या आपका पार्टनर केवल शारीरिक सम्बंधो को महत्व देता है:

एक स्वस्थ रिश्ते में शारीरिक सम्बंधो का होना जरुरी है. अगर आप में से कोई एक केवल और केवल सेक्स के बारे में ही सोचता है और शारीरिक सम्बंधो को ही महत्व देता हो तो आपको वास्तव में सोचने की ज़रूरत है कि क्या ये प्यार है. प्यार का अर्थ होता है विश्वास, प्रतिबद्धता और संचार लेकिन यदि आपका साथी हर वक्त ये सोचता हैं कि ‘हम अभी क्यों सेक्स नहीं कर रहे हैं?’ तो आपको एक कदम पीछे ले लेना चाहिए और उस रिश्ते को आगे बढ़ाने से पहले एक बार फिर सोचें. किसी भी रिश्ते में कमिटमेंट तभी करें जब यह केवल प्रेम के आधार पर बना हो.

2. अगर आपके रिश्ते में प्यार फीका पड़ने लगे:

हमेशा इस बात का ध्यान रखें कि जब आप किसी प्रेम सम्बंध में हैं तो उससे प्यार कभी फीका नहीं होता और अगर ये सिर्फ शारीरिक आकर्षण है तो आप एक-दूसरे से बहुत जल्दी ऊब जाते हैं. अगर आपके रिश्ते में फिजिकल इंटिमेसी की बजाय इमोशनल इंटिमेसी ज्यादा है तो आपके रिश्ते का आधार वास्तव में प्यार है. लेकिन अगर कुछ समय बाद आपके रिश्ते में प्यार फीका हो जाएं तो समझ लें कि ये रिश्ता केवल शारीरिक आकर्षण के लिए बनाया गया था.

3. बाहरी सुंदरता:

कभी-कभी आप किसी इंसान को उसकी बाहरी सुंदरता के लिए पसंद करते हैं. अगर आपके लिए किसी इंसान की केवल बाहरी सुंदरता मायने रखती हैं तो ध्यान रखें कि आप उस इंसान से प्यार नहीं करते हैं. कुछ समय बाद आपको एहसास होगा कि आपने कभी उस इंसान स प्यार किया ही नहीं था. बल्कि आपका प्यार उसकी बाहरी और शारीरिक सुंदरता के लिए था.

4. आप रिश्ते के वास्तविक पहलुओं पर ध्यान देते हैं:

किसी भी व्यक्ति के लिए रिश्ता निभाना आसान नहीं होता. हर एक रिश्ते में बुरा वक्त आता ही है. लेकिन आप इससे कैसे सुलझाते हैं वह आपके रिश्ते को और मजबूत बनाता है. जब आप सच्चे रिश्ते में होते हैं और एक-दूसरे से प्यार करते हैं तो आप रिश्ते के वास्तविक पहलुओं के बारे में सोचते हैं. साथ ही यह सोचते हैं कि आपके रिश्ते को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है. लेकिन जब आप केवल शारीरिक आकर्षण के लिए इस रिश्ते में होते हैं तो रिश्ते के बारे में नहीं बल्कि अपने स्वार्थ के बारे में सोचते हैं. अगर आपको लगता है कि आपका साथी ऐसा सोचता है तो उस रिश्ते में अपने समय और प्रयास ना निवेश करें.

मासूम कातिल : मां और बेटी दोनों का इमरान ने कैसे किया शोषण

यह एक अजीबोगरीब केस है, दर्दभरी दास्तान. आप सुनेंगेपढ़ेंगे तो दुख आप को भी होगा. पढि़ए और सोचिए, मैं गलत था या सही. फैसला आप को करना है.

मकतूल एक दौलतमंद और रसूख वाला आदमी था जबकि कातिल 2 औरतें थीं. मां सुहाना और बेटी अदीना. सुहाना की उम्र करीब 38 साल थी और अदीना की 19 साल. वह बेहद हसीन व शोख लड़की थी. उस के चेहरे पर गजब की मासूमियत थी.

सुहाना भी खूबसूरत औरत थी, लेकिन उस के चेहरे पर उदासी और आंखों में समंदर की गहराई थी. दोनों मांबेटी कोर्ट में मुसकराती हुई आती थीं और बड़े फख्र से कहती थीं कि उन्होंने इमरान हसन को कत्ल किया है. अदीना कहती थी, ‘‘मैं ने एक ठोस डंडे से उस की पिंडलियों पर वार किए थे. वह नीचे गिर पड़ा.’’

सुहाना कहती थी, ‘‘जब वह नीचे गिरा तो मैं ने उसी ठोस डंडे से उस के सीने पर मारना शुरू किया, इस से उस की पसलियां टूटने की आवाज आने लगी. फिर मैं ने अपनी अंगुलियों के नाखून उस की दोनों आंखों में उतार दिए.’’

मांबेटी दोनों बड़े फख्र से ये कारनामा सुनाती थीं और मैं भी उन के गुरूर को सही समझता था. लाश बुरी हालत में मिली थी. डंडे से उस का सिर फोड़ दिया गया था. मैं जानता था, मासूम चेहरे वाली इन मांबेटी को कड़ी सजा मिलेगी. पर उन के चेहरे पर डर या वहशत नहीं थी. वे दोनों बड़े सुकून और इत्मीनान से बैठी रहती थीं. इस के पीछे एक दर्दनाक कहानी छिपी थी. मैं आप को वही कहानी सुनाऊंगा, जो मुझे सुहाना ने कोर्ट के अंदर सुनाई थी.

आप यह सोच कर सुहाना की कहानी सुनें कि आप ही उस का इंसाफ करने वाले जज हैं. सुहाना ने मुझे बताया, ‘‘मेरी मां का नाम नसीम था. हमारा घर पुराना पर अच्छा था. घर में हम 3 लोग थे. मैं मेरी मां और मेरे अब्बू. जिंदगी आराम से गुजर रही थी. हमारे रिश्तेदार और अब्बू के दोस्त आते रहते थे. अब्बू काफी मिलनसार थे.

बदनसीबी कहिए या कुछ और, अब्बू बीमार पड़ गए. 3 दिन अस्पताल में भरती रहे और चौथे दिन चल बसे. हम लोगों की दुनिया अंधेरी हो गई. कुछ दिनों तक दोस्तों व रिश्तेदारों ने साथ निभाया, लेकिन फिर सब अपनीअपनी राह लग गए. अब मैं बची थी और मेरी मजबूर मां. न कोई मददगार न सिर पर हाथ रखने वाला.

उस वक्त मैं बीए के पहले साल में थी, पर अब पढ़ाई जारी रखने जैसे हालात नहीं बचे थे. पड़ोसी भी शुरू में मोहब्बत से पेश आए लेकिन धीरेधीरे सब ने निगाहें फेर लीं. गनीमत यही थी कि हमारा घर अपना था. सिर छिपाने को आसरा था हमारे पास, पर खाने के लाले पड़ने लगे थे.

अम्मा ने घरों में काम करने की बात की, पर मुझ से यह बरदाश्त नहीं हुआ. मैं ने अम्मा को बहुत समझाया और खुद नौकरी करने की बात की. मैं इंग्लिश मीडियम से पढ़ी थी, मेरी अंगरेजी और मैथ्स बहुत अच्छा था. बहुत कोशिश करने पर मुझे एक औफिस में जौब मिल गई. वेतन ज्यादा तो नहीं था, पर गुजारा किया जा सकता था.

शुरू में लोगों ने बातें बनाईं कि खूबसूरती के चलते यह नौकरी मिली है. अम्मा बहुत डरती, घबराती, लोगों की बातों से दहशत खाती. मैं ने उन्हें समझाया, ‘‘अम्मा, लोग सिर्फ बातें बनाते हैं. वे हमें खिलाने नहीं आएंगे. हमें अपना बोझ खुद उठाना है. लोगों को भौंकने दें.’’

अम्मा को बात समझ में आ गई. फिर भी उन्होंने नसीहत दी, ‘‘बेटी, दुनिया बहुत बुरी है. तुम बहुत मासूम और नासमझ हो. फूंकफूंक कर कदम रखना, हर मोड़ पर इज्जत के लुटेरे बैठे हैं.’’

मैं ने उन्हें दिलासा दी, ‘‘अम्मी, आप फिक्र न करें, मैं अपना भलाबुरा खूब समझती हूं. जिस फर्म में मैं काम करती हूं, वहां भेड़िए नहीं, बहुत नेक और भले लोग हैं.’’

एकाउंटेंट अली रजा बूढ़े आदमी थे. बहुत ही सीधे व मोहब्बत करने वाले. मुझे नौकरी दिलाने में भी उन्होंने मेरी मदद की थी और पहले दिन से ही मुझे गाइड करना और सिखाना भी शुरू कर दिया था. वैसे मैं काफी जहीन थी. जल्द ही सारा काम बहुत अच्छे से करने लगी.

औफिस में सभी लोग अली रजा साहब की बहुत इज्जत करते थे. हां, फर्म के बौस इमरान हसन से मेरी अब तक मुलाकात नहीं हुई थी. सुना था, बहुत रिजर्व रहते हैं. काम से काम रखने वाले व्यक्ति हैं.

फर्म के लोग मालिक इमरान हसन से खुश थे. सब उन की तारीफ करते थे. मुझे वहां काम करते एक महीना हो गया था. पहली तनख्वाह मिली तो अम्मा बड़ी खुश हुईं. तनख्वाह इतनी थी कि हम मांबेटी का गुजारा आसानी से हो जाता और थोड़ा बचा भी सकते थे. फर्म में 4-5 लड़कियां और भी थीं. उन से मेरी अच्छी दोस्ती हो गई. बौस पिछले दरवाजे से आतेजाते थे, इसलिए उन से मेरा कभी आमनासामना नहीं हुआ.

एक दिन एक कलीग रशना की सालगिरह थी. उस ने बड़े प्यार से मुझे अपने घर आने की दावत दी. इस प्रोग्राम में बौस समेत औफिस के सभी लोग जाने वाले थे. मुझे भी वादा करना पड़ा. अम्मा से इजाजत  लेने में मुश्किल हुई, क्योंकि वह मेरे अकेले जाने से परेशान थीं. रशना के यहां पहुंचने पर मेरा शानदार वेलकम हुआ. वहां बहुत धूमधाम थी. केक काटा गया. पार्टी भी बढि़या थी.

मैं अपनी प्लेट ले कर एक कोने में खड़ी थी. उसी वक्त एक गंभीर नशीली आवाज मेरे कानों में पड़ी, ‘‘आप कैसी हैं मिस सुहाना?’’

मैं ने सिर उठा कर सामने देखा. एक बेहद हैंडसम यूनानी हुस्न का शाहकार सामने खड़ा था. शानदार पर्सनैलिटी, तीखे नैननक्श, ऊंची नाक, नशीली आंखें. मैं बस देखती रह गई. मेरी आवाज नहीं निकल सकी. रशना ने कहा, ‘‘सुहाना, बौस तुम से कुछ पूछ रहे हैं.’’

मैं जैसे होश में आ गई. मैं ने जल्दी से कहा, ‘‘मैं ठीक हूं सर.’’

‘‘हमारी फर्म में कोई परेशानी तो नहीं है?’’

‘‘नहीं सर, कोई प्रौब्लम नहीं है. सब ठीक है.’’

मैं बौस को देख कर हैरान रह गई. कितने खूबसूरत, कितने शानदार पर उतने ही मिलनसार और विनम्र. अभी खाना चल ही रहा था कि बादल घिरने लगे. जब मैं घर जाने के लिए खड़ी हुई तो अच्छीखासी बारिश होने लगी. रशना भी सोच में पड़ गई. जब हम बाहर निकले तो बौस इमरान साहब कहने लगे, ‘‘सुहाना, अभी टैक्सी मिलना मुश्किल है. तुम मेरे साथ आओ मैं तुम्हें तुम्हारे घर ड्रौप कर दूंगा.’’

रशना ने फोर्स कर के मुझे उन की कार में बिठा दिया.

मैं सकुचाते हुए बैठ गई. मैं जिंदगी में इतने खूबसूरत मर्द के साथ पहली बार बैठी थी. मेरा दिल अजीब से अंदाज से धड़क रहा था. मैं ने कहा, ‘‘सर, आप ने मेरे लिए बेवजह तकलीफ उठाई. आप बहुत अच्छे इंसान हैं.’’

इमरान साहब हंस पड़े, फिर कहा, ‘‘नहीं भई, हम इतने अच्छे इंसान नहीं हैं. अगर तुम भीग जाती तो बीमार पड़ जातीं. 2-3 दिन हमारे औफिस को इतनी अच्छी वर्कर से महरूम रहना पड़ता और फिर ये मेरा फर्ज भी तो है.’’

मैं ने कहा, ‘‘आप बेहद शरीफ इंसान हैं, बहुत नेक और बहुत खयाल रखने वाले.’’

उन्होंने मुसकरा कर कहा, ‘‘आप को मुझ पर यकीन है तो मेरी एक बात मानेंगी?’’

‘‘जी कहिए, आप क्या चाहते हैं?’’

‘‘सामने एक अच्छा रेस्टोरेंट है, वहां एक कप कौफी पी जाए.’’

मैं सोच में पड़ गई, ‘‘मैं कभी ऐसे होटल में नहीं गई. मुझे वहां के तौरतरीके नहीं आते. मैं एक गरीब घर की लड़की हूं.’’ मैं ने कहा.

इमरान साहब बोले, ‘‘कोई बात नहीं, हालात सब सिखा देते हैं. आप की इस बात ने मेरी नजरों में आप की इज्जत और भी बढ़ा दी. क्योंकि आप ने मुझ से अपनी हालत छिपाई नहीं, यह अच्छी बात है.’’

उन्होंने कार रेस्टोरेंट के सामने रोक दी. हम अंदर गए, बहुत शानदार हौल था. वहां का माहौल खुशनुमा था. मैं इस से पहले कभी किसी होटल में नहीं गई थी. इमरान साहब ने कौफी का और्डर दिया, फिर मेरे काम की, मेरे मिजाज की तारीफ करते रहे. फिर कहने लगे, ‘‘अच्छा ये बताइए, आप मेरे बारे में क्या सोचती हैं?’’

मैं ने कहा, ‘‘आप ने पार्टी में मुझे मेरा नाम ले कर पुकारा था, आप तो मुझ से मिले भी नहीं थे?’’

‘‘आप के सवाल में बड़ी मासूमियत है. आप मेरे औफिस में काम करती हैं और एक अच्छा बौस होने के नाते मुझे अपने साथियों के बारे में पूरी जानकारी रखना चाहिए. मैं तो यह भी जानता हूं कि आप औफिस की दूसरी लड़कियों से अलग हैं. अपने काम से काम रखने वाली.’’

मैं हैरान रह गई. हम कौफी पी कर बाहर आ गए. वह कहने लगे, ‘‘बहुत शुक्रिया, आप ने अपना समझ कर मुझ पर यकीन किया. आज तो आप से ज्यादा बातें न हो सकीं. खैर, अगली मुलाकात में बातें होंगी.’’

मैं देर होने से अम्मा के लिए परेशान थी. मैं ने सोच लिया था कि उन्हें इमरान साहब के बारे में कुछ नहीं बताऊंगी वरना उन की नींद उड़ जाएगी. मेरा घर आ गया. मैं ने गली के बाहर ही गाड़ी रुकवाते हुए कहा, ‘‘सर, मुझे यहीं उतार दें.’’

‘‘मैं आप की मजबूरी समझता हूं. मैं तो चाहता था कि आप को आप के दरवाजे पर ही उतारूं.’’

मुझे उतार कर कार आगे बढ़ गई. मेरे लिए अम्मा परेशान बैठी थीं. मैं ने उन्हें दिलासा दिया और बताया रशना के ड्राइवर चाचा मुझे छोड़ने आए थे. ताकि वह किसी शक में न पड़ें. जब मैं बिस्तर पर लेटी तो दिल बुरी तरह धड़क रहा था. आंखों में वही खूबसूरत चेहरा बसा था. उन्हीं के खयालों में खोए पता नहीं कब सो गई.

दूसरे दिन फिर वही औफिस था, वही काम, वही लोग. मेरी निगाहें बारबार बौस के औफिस की तरफ उठ रही थीं, दिल में प्यार का तूफान उमड़ रहा था. आंखों में दीदार की आस थी. लेकिन बौस के रूटीन में कोई फर्क नहीं आया, वह पिछले दरवाजे से ही आतेजाते रहे. मेरा दिल दीदार को तड़पता रहा.

कई बार जी चाहा, उन के औफिस में चली जाऊं, पर हिम्मत नहीं हुई. मैं ने दिल को समझा कर खुद को काम में मसरूफ कर लिया. बारबार सोचती, उस दिन रात को मेरी तारीफ करना, प्यार से बातें करना, वह सब क्या था?

उस दिन मैनेजर अहमद साहब मेरे पास आए और कहने लगे, ‘‘सुहाना, आप टाइपिंग सीख लीजिए. आगे आप के बहुत काम आएगी.’’

मुझे अहमद साहब ने दूसरी टेबल पर बिठा दिया. थोड़ा खुद ने सिखाया फिर साथी की ड्यूटी लगा दी कि मुझे बाकायदा टाइपिंग सिखाए. मैं ने दिल लगा कर सीखना शुरू कर दिया.

करीब 20 दिन के बाद अहमद साहब ने एक टेस्ट लिया. अच्छीखासी स्पीड हो गई थी. उन्होंने कहा, ‘‘वैरी गुड, अब आप आइए मेरे साथ.’’

मैं उन के अंदाज पर हैरान थी. वह मुझे ले कर इमरान साहब के औफिस में गए. मैं पहली बार वहां आई थी. औफिस की सजावट और खूबसूरती देख कर मैं चकाचौंध हो गई. कमरे में हलका अंधेरा था. एसी की ठंडक, टेबल पर हलकी नीली रोशनी थी. उन की गूंजती सी आवाज सुनाई दी, ‘‘आइए अहमद साहब, आप कैसी हैं मिस सुहाना.’’

मेरी आवाज मुश्किल से निकली, ‘‘मैं अच्छी हूं सर.’’

इतने दिनों के बाद बौस को देखने से मेरी तड़प और चाहत और बढ़ गई थी. मैं प्यासी निगाहों से उन्हें देखती रही. अहमद साहब बोले, ‘‘सर, मैं ने आप के लिए टाइपिस्ट का बंदोबस्त कर लिया है, ये हैं.’’

‘‘वैरी गुड, मिस सुहाना क्या आप टाइपिंग जानती हैं?’’

‘‘जी सर, इन्होंने अच्छे से सीख लिया है.’’

‘‘अहमद साहब, आप ने ये बड़ा अच्छा काम किया. एक बड़ा मसला हल हो गया.’’

उन के कमरे में एक तरफ एक छोटी टेबल रखी थी, जिस पर टाइपराइटर रखा था. मुझे वहां बिठा दिया गया. इमरान साहब ने मुझे कुछ कागजात टाइप करने को दिए.

शाम को जब मैं टेबल से उठी तो इमरान साहब ने कहा, ‘‘मिस सुहाना, टाइपिस्ट की हैसियत से आप की तनख्वाह में 300 रुपए का इजाफा कर दिया गया है.’’

मुझे बड़ी खुशी हुई. मैं ने अम्मा को बताया तो वह खुश नहीं हुईं. कहने लगीं, ‘‘मैं कैसी मजबूर मां हूं कि तुम्हारी कमाई खा रही हूं. मुझे तो तुम्हारी शादी का सोचना चाहिए. तुम्हारी कमाई जमा कर के मुझे शादी की तैयारी करनी होगी.’’

मेरा दिल भी उदास हो गया. मैं ने कहा, ‘‘अम्मा, मैं शादी नहीं करूंगी. आप को छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगी.’’

‘‘नहीं बेटी, ये तो दुनिया का दस्तूर है. हर लड़की को विदा हो कर अपने असली घर जाना पड़ता है.’’ अम्मा ने दुखी मन से कहा.

वक्त गुजरता रहा. मैं इमरान हसन के औफिस में मेहनत और लगन से काम करती रही. वह भी बड़ी मोहब्बत और इज्जत से पेश आते. मेरी नजरों में उन की इज्जत और सम्मान दिनबदिन बढ़ता जा रहा था.

जिंदगी बड़ी अच्छी गुजर रही थी. उस दिन मैं घर पर ही अम्मा के साथ किचन में थी. मैं ने देखा अम्मा टटोलटटोल कर काम कर रही थीं. वह दूध का पतीला ठीक से देख नहीं पाईं. दूध नीचे गिर गया. कुछ गरम दूध पांव पर भी गिरा. उन्हें चक्कर आ गया. मैं उन्हें कमरे में लाई और ग्लूकोज पिलाया. पैर पर दवा लगाई, फिर पूछा, ‘‘अम्मा, ये सब क्या है? आप को क्या कम दिखाई देने लगा है?’’

‘‘कुछ नहीं बेटा, ऐसे ही जरा चक्कर आ गया था.’’

‘‘नहीं अम्मा, आप सच बताएं, आप को मेरी जान की कसम, आप को मुझे सच बताना होगा.’’

वह फूटफूट कर रोने लगीं फिर बताया, ‘‘बेटी, कुछ दिनों से मुझे चक्कर आ रहे हैं. धीरेधीरे मेरी आंखों की रोशनी कम होने लगी. अब तो बहुत ही कम दिखाई देता है. चक्कर भी आते हैं.’’

‘‘अम्मा, आप ने मुझे बताया क्यों नहीं, हम किसी डाक्टर को दिखाते, यह नौबत यहां तक आती ही नहीं. चलिए, उठिए डाक्टर के पास चलते हैं.’’

‘‘नहीं सुहाना, तुम मेरी बेटी हो. बेटी की कमाई कर्ज की तरह होती है. तुम्हारी कमाई सिर्फ तुम्हारी शादी पर खर्च होगी, इलाज पर नहीं.’’

‘‘नहीं अम्मा, मैं आप को किसी अच्छे डाक्टर के पास ले चलूंगी.’’

मैं ने बहुत कुछ कहा लेकिन अम्मा किसी कीमत पर इलाज के लिए तैयार नहीं हुईं.

दूसरे दिन औफिस में मैं उदास सी थी. इमरान हसन ने मुझे देखते ही कहा, ‘‘क्या बात है सुहाना, आप उदास लग रही हैं?’’

‘‘नहीं सर, ऐसी कोई बात नहीं है.’’

‘‘मिस सुहाना, आप मुझे गैर समझती हैं. आप नहीं जानतीं, मैं आप के बारे में क्या सोचता हूं. मेरा दिल चाहता है सारी दुनिया की खुशियां ला कर आप के कदमों में डाल दूं.’’

फिर वह अचकचा कर चुप हो गए.

‘‘शायद मैं कुछ ज्यादा बोल गया, मुझे माफ करना सुहाना.’’

‘‘नहीं सर, आप मेरे हमदर्द हैं. दरअसल मेरी अम्मा की आंखों की रोशनी जा रही है. उन्हें बहुत कम दिखाई देने लगा है. मैं क्या करूं?’’

‘‘आप परेशान न हों सुहाना. मैं आज आप के साथ आप के घर चलूंगा. हम उन्हें अच्छे डाक्टर को दिखाएंगे. क्या आप की अम्मा मेरी मां जैसी नहीं हैं?’’

‘‘यह बात नहीं है सर, असल में वह इलाज कराने को राजी ही नहीं होतीं.’’

‘‘मैं उन्हें समझा लूंगा, आप फिक्र न करें.’’

शाम को वह मेरे साथ मेरे घर आए. उन्होंने अम्मा से उन की बीमारी के बारे में पूछा, ‘‘इस की शुरुआत करीब 3 महीने पहले हुई थी, पर अम्मा ने मुझ से छिपाया.’’

इमरान साहब ने बड़े प्यार से कहा, ‘‘आप घबराएं नहीं, मैं आप का इलाज कराऊंगा. आप ठीक हो जाएंगी.’’

‘‘नहीं बेटे, हम कुदरत से जंग नहीं लड़ सकते. मैं डाक्टरों का सहारा नहीं लेना चाहती. मैं आप का अहसान भी नहीं ले सकूंगी. मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो.’’

इमरान साहब भी नाकाम हो कर वापस चले गए. अम्मा ने कहा, ‘‘बड़ा नेक आदमी है. क्या तुम्हारे औफिस में काम करता है. अल्लाह उसे अच्छा रखे. वैसे कितनी उम्र है उस की?’’

मैं ने यहां झूठ बोलना ठीक समझते हुए कहा, ‘‘हां, अम्मा मेरे औफिस में काम करता है. अधेड़ आदमी है. 3 बच्चों का बाप है. भला आदमी है.’’

अम्मा को इत्मीनान हो गया.

दूसरे दिन इमरान साहब ने बड़े जज्बाती ढंग से कहा, ‘‘सुहाना, आज मैं दिल की बात तुम से कहना चाहता हूं. मैं तुम्हें दुलहन बना कर अपने घर ले जाना चाहता हूं. मैं तुम से बेहद मोहब्बत करता हूं. मुझे जवाब दो सुहाना.’’

मेरा दिल जोर से धड़क रहा था. मैं ने शरमा कर कहा, ‘‘सर, पर हमारे हालात में जमीनआसमान का फर्क है. मैं एक गरीब लड़की हूं और आप…’’

‘‘सुहाना, दिल के रिश्तों में ऊंचनीच, गरीब अमीर कुछ नहीं देखते. तुम मेरे लिए क्या हो, यह बस मैं जानता हूं.’’

‘‘क्या जिंदगी के किसी मोड़ पर आप को यह अहसास नहीं होगा कि आप ने बराबरी में शादी नहीं की?’’

‘‘नहीं, मैं ने बचपन में अपनी अम्मी को खो दिया था. फिर अब्बू चल बसे. मैं प्यार को तरसा हुआ इंसान हूं. तुम मेरे लिए मोहब्बत का समंदर हो. मेरी मंजिल हो. बस तुम राजी हो जाओ.’’

मैं सोच में थी. मैं ने कहा, ‘‘इमरान साहब, मैं नहीं जानती, यह कैसे मुमकिन होगा?’’

‘‘तुम परेशान न हो, मैं सब देख लूंगा.’’

‘‘रजा साहब बाकायदा मेरा रिश्ता ले कर तुम्हारी अम्मा के पास जाएंगे. तुम्हारी अम्मा को राजी कर लेंगे, पर पहले तुम्हारी मंजूरी जरूरी है.’’

मैं उन के कदमों में झुक गई. उन्होंने मुझे उठा कर सीने से लगा लिया. मेरे तड़पते दिल व प्यासी रूह को जैसे सुकून मिल गया. हम दोनों रोज मिलने लगे पर दुनिया से छिप कर. मैं तो अपने महबूब को पा कर जैसे पागल हो गई थी. सब से बड़ी खुशी की बात यह थी कि उन्होंने अपनी मोहब्बत का इजहार शादी के पैगाम के बाद किया था. वह कहते थे, ‘‘सुहाना, मैं तुम्हें दुनिया की हर खुशी देना चाहता हूं.’’

और मैं कहती, ‘‘बस थोड़ा सा इंतजार मेरे महबूब.’’

‘‘जैसी तुम्हारी मरजी.’’ कह कर वह चुप हो जाते.

अब हालात बदल गए थे. मैं औफिस में उन के करीब रहती, हमारे बीच में बहुत से फैसले हो गए थे. मां की आंखों की रोशनी चली गई थी. हमारी मोहब्बत तूफान की तरह बढ़ रही थी. मैं अपनी मां की नसीहत, अपनी मर्यादा भूल कर सारी हदें पार कर गई. औफिस के बाद हम काफी वक्त साथ गुजारते. इमरान साहब ने मुझे कीमती जेवर, महंगे तोहफे और कार देनी चाही, पर मैं ने यह कह कर इनकार कर दिया कि ये सब मैं शादी के बाद कबूल करूंगी.

मैं ने उन पर अपना सब कुछ निछावर कर दिया. एक गरीब लड़की को ऐसा खूबसूरत और चाहने वाला मर्द मिले तो वह कहां खुद पर काबू रख सकती है. मैं शमा की तरह पिघलती रही, लोकलाज सब भुला बैठी.

अली रजा साहब उन दिनों छुट्टी पर गए हुए थे. मैं ने इमरान हसन से कहा, ‘‘अब आप अम्मा से मेरे रिश्ते के लिए बात कर लीजिए. आप अम्मा के पास कब जाएंगे?’’

‘‘जब तुम कहोगी, तब चले जाएंगे.’’

‘‘अच्छा, परसों चले जाइएगा.’’

‘‘जानेमन, अभी अली रजा साहब छुट्टी पर हैं. वह आ जाएं, कोई बुजुर्ग भी तो साथ होना चाहिए.’’

मैं खामोश हो गई. अब वही मेरी जिंदगी थे. दिन गुजरते रहे वह अम्मा के पास न गए. अली रजा साहब भी पता नहीं कितनी लंबी छुट्टी पर गए थे. धीरेधीरे इमरान साहब का रवैया मेरे साथ बदलता जा रहा था. अली रजा साहब छुट्टी से वापस आ गए. मैं ने इमरान साहब से कहा, ‘‘आप कुछ उलझेउलझे से नजर आते हैं. क्या बात है?’’

‘‘कुछ बिजनैस की परेशानियां हैं. लाखों का घपला हो गया है. मुझे देखने के लिए बाहर जाना पड़ेगा.’’

‘‘आप अम्मा से मिल लेते तो बेहतर था.’’

‘‘हां, उन से भी मिल लेंगे, पहले ये मसला तो देख लें. लाखों का नुकसान हो गया है.’’

उन का लहजा रूखा और सर्द था. उन्होंने मुझ से कभी इस तरह बात नहीं की थी. मैं परेशान हो गई. रात भर बेचैन रही. मैं ने फैसला कर लिया कि सवेरे अली रजा साहब से कहूंगी कि वह इमरान साहब को ले कर अम्मा के पास मेरे रिश्ते के लिए जाएं. वह मुझे बहुत मानते हैं, वह जरूर ले जाएंगे.

दूसरे दिन मैं इमरान के औफिस में बैठी उन का इंतजार कर रही थी. 12 बजे तक वह नहीं आए, मैं अली रजा साहब के पास गई और उन से पूछा, ‘‘सर, अभी तक बौस नहीं आए?’’

अली रजा साहब बोले, ‘‘वह तो कल रात को फ्लाइट से स्वीडन चले गए.’’

मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. वह मुझे बिना बताए बाहर चले गए. मुझ से मिले भी नहीं.

‘‘मेरे लिए कुछ कह गए हैं?’’

‘‘हां, इमरान साहब की वापसी का कोई यकीन नहीं है. 7-8 महीने या साल-2 साल भी लग सकते हैं. कारोबार वहीं से चलता है. उन्हें वहां का बिगड़ा हुआ इंतजाम संभालना है. आप अपनी सीट पर वापस आ जाइए.’’ अली रजा साहब ने सपाट लहजे में कहा.

मुझे चक्कर सा आ गया. मैं ने एक हफ्ते की छुट्टी ली और घर आ गई.

कुदरत के भी अजीब खेल हैं. मां की रोशनी इसलिए छिन गई थी ताकि वह मेरी यह हालत न देख सकें. मैं अपने कमरे में पड़ी रहती, रोती रहती. मुझे एक पल का चैन नहीं था. पलपल मर रही थी मैं.

एक हफ्ते बाद एक उम्मीद ले कर औफिस पहुंची. शायद कोई अच्छी खबर आई हो. मैं ने अली रजा साहब से पूछा, ‘‘इमरान साहब की कोई खबर आई?’’

‘‘हां आई, ठीक हैं. औफिस के बारे में डिसकस करते रहे. क्या तुम्हें उन का इंतजार है?’’

‘‘जी, मैं उन की राह देख रही हूं.’’

‘‘बेकार है, जब वे आएंगे तो तुम्हें भूल चुके होंगे.’’

मेरी आंखों से आंसू बह निकले. उन्होंने दुख से कहा, ‘‘मेरी समझ में नहीं आता तुम्हें क्या कहूं? तुम जैसी मासूम व बेवकूफ लड़कियां आंखें बंद कर के भेडि़ए के सामने पहुंच जाती हैं. तुम्हारे घर वाले लड़कियों को अक्ल व दुनियादारी की बात क्यों नहीं सिखाते? तुम्हें यह क्यों नहीं समझाया गया, जहां तुम जा रही हो, वे लोग कैसे हैं. उन का स्टाइल क्या है. वहां तुम जैसी लड़कियों की क्या कीमत है. सब जानते हैं, ये अमीरजादे साथ नहीं निभाते, बस कुछ दिन ऐश करते हैं. पर तुम लोग उन्हें जीवनसाथी समझ कर खुद को लुटा देती हो.’’

मैं सिसकने लगी, ‘‘रजा साहब, मैं ने ये सब जानबूझ कर नहीं किया, दिल के हाथों मजबूर थी. उन की झूठी मोहब्बत को सच्चाई समझ बैठी.’’ मैं ने धीरे से कहा.

‘‘सुहाना, अगर तुम अपनी इज्जत गंवा चुकी हो तो चुप हो जाओ, चिल्लाने से कुछ हासिल नहीं होगा. वह लौट कर नहीं आएगा, ऐसा वह कई लड़कियों के साथ पहले भी कर चुका है. अब तुम अपने फ्यूचर की फिक्र करो. बाकी सब भूल जाओ.’’

सुहाना अपनी कहानी सुनाते हुए बोली, ‘‘मैं ने सब समझ लिया. वक्त से पहले अपनी बरबादी को स्वीकार कर लिया. मेरे पास सिवा पछताने के और कुछ नहीं बचा था. मैं ने औफिस जाना छोड़ दिया. मां से बहाना कर दिया. उन्होंने ज्यादा पूछताछ की तो झिड़क दिया.’’

वक्त गुजरता रहा. मां चुप सी हो गईं. गुजरबसर जैसेतैसे हो रही थी. चंद माह गुजर गए और फिर पड़ोसियों ने मां से कह दिया. अम्मा ने मुझे टटोल कर देखा और एक दर्दभरी चीख के साथ बेहोश हो कर नीचे गिर गई. सदमा इतना बड़ा था कि वह बरदाश्त न कर सकी और फिर कभी नहीं उठ सकीं.

पेट में पलती औलाद ने मुझे खुदकशी करने न दी. फिर मेरी बदनसीब बेटी अदीना पैदा हो गई. मेरे जिस्म का एक टुकड़ा मेरी गोद में था. मैं ने अपना घर बेच दिया, एक गुमनाम मोहल्ले में एक कमरा खरीद कर रहने लगी. मैं ने अपनी पुरानी सब बातें भुला दीं. मकान से अच्छी रकम मिली थी. फिर मैं थोड़ाबहुत सिलाईकढ़ाई का काम करने लगी.

हम मांबेटी की अच्छी गुजर होने लगी. मैं ने अपनी बेटी की बहुत अच्छी परवरिश की. उसे दुनिया की हर ऊंचनीच समझाई. उस से वादा लिया कि वह मुझ से कोई बात नहीं छिपाएगी. अदीना बेइंतहा हसीन निकली. मैं ने उसे अच्छी तालीम दिलाई. वह बीएससी कर रही थी. एक दिन वह मुझ से कहने लगी, ‘‘मम्मी, मेरी एक बात मानोगी?’’

‘‘कहो.’’

‘‘मैं नौकरी करना चाहती हूं. मेरे एग्जाम भी पूरे हो गए हैं. रिजल्ट भी जल्द आएगा.’’

‘‘नहीं बेटी, नौकरी ढूंढना और करना बड़ा कठिन है.’’

‘‘मम्मी, मुझे एक अच्छी नौकरी मिल गई है.’’

‘‘कहां मिल गई नौकरी तुम्हें?’’

‘‘एक प्राइवेट फर्म है. फर्म के मालिक ने मुझे खुद नौकरी का औफर दिया है. मेरी इमरान साहब से कालेज के फंक्शन में मुलाकात हुई थी. वह चीफ गेस्ट थे. इतने नेक और सादा मिजाज आदमी हैं कि देख कर आप दंग रह जाएंगी.’’

‘‘कौन?’’ मुझे जैसे बिच्छू ने डंक मारा.

‘‘इमरान हसन साहब. बड़े हमदर्द इंसान हैं.’’ अदीना उन के बारे में पता नहीं क्याक्या बोलती रही. मुझे लगा, मेरे चारों तरफ जहन्नुम की आग दहक रही हो. फिर मैं ने खुद पर काबू पाया और कुछ सोच कर अदीना को नौकरी की इजाजत दे दी.

वह मेरी हां सुन कर खुशी से खिल उठी. साथ ही मैं ने एक काम किया. चुपचाप उस का पीछा करना शुरू कर दिया. मैं ने इमरान हसन को देखा, वह उतना ही खूबसूरत और डैशिंग था.

उम्र की अमीरी ने उसे और ग्रेसफुल बना दिया था. मैं उस के एकएक रूप एकएक चाल से वाकिफ थी. फिर मैं ने अदीना को अपनी गमभरी दास्तान सुनाई. वह कांप उठी, उस ने चीख कर पूछा, ‘‘ममा, कौन था वह कमीना बेदर्द इंसान?’’

‘‘मैं खुद उस बेगैरत की तलाश में हूं.’’

‘‘काश! वह मिल जाए.’’ अदीना ने गुर्राते हुए कहा तो मैं ने पूछा, ‘‘क्या करेगी तू उस का?’’

‘‘खुदा की कसम है मम्मी, मैं उसे जान से मार डालूंगी. ऐसा हाल करूंगी कि दुनिया देखेगी.’’

मुझे सुकून मिल गया, मैं ने अदीना की परवरिश इसी तरह की थी. ऐसा ही बनाया था उसे. मेरी निगरानी जारी थी. मैं चुपचाप उस का पीछा करती रही. उस दिन भी मैं अदीना से ज्यादा दूर नहीं थी, जब वह अदीना को अपनी शानदार कार में कहीं ले जा रहा था. वह अदीना को अपने घर ले गया. मैं भी छिप कर अंदर आ गई और दरवाजे के पीछे खड़ी हो गई.

मैं सारे रास्तों से वाकिफ थी. घर सुनसान पड़ा था. हलका अंधेरा था. मेरे कानों में इमरान हसन की नशीली आवाज पड़ी, ‘‘अदीना, तुम मेरी जिंदगी में बहार बन कर आई हो. मैं ने सारी जिंदगी तुम जैसी हसीना की तलाश में तनहा गुजार दी.’’

‘‘सर, ये आप क्या कह रहे हैं. मैं तो आप पर बहुत ऐतमाद करती थी. आप पर बहुत भरोसा है मुझे.’’

‘‘हां ठीक है, पर मोहब्बत तो उफनती नदी है. उस पर रोक नहीं लगाई जा सकती. तुम्हारी चाहत मेरी रगरग में समा गई है. मेरी जान, मैं अब तुम्हारे बिना नहीं रह सकता.’’

‘‘सर, ये आप गलत कर रहे हैं. आप मुझे यहां यह कह कर लाए थे कि कुछ लेटर्स भेजने हैं.’’

‘‘ये मेरा घर है और तुम अपनी मरजी से मेरे घर आई हो. अब यहां जो कुछ होगा, उस में तुम्हारी रजा भी समझी जाएगी. इस में मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा, पर तुम बदनाम हो जाओगी. लोग कहेंगे तुम मेरे सूने घर में क्यों आई थीं?’’

‘‘सर, आप मुझे काम के बहाने लाए थे.’’

‘‘कौन सुनेगा, तुम्हारी बकवास.’’ वह हंस कर आगे बढ़ा. उसी वक्त मैं अंदर दाखिल हो गई. मैं ने कहा, ‘‘अदीना, यही है वह आदमी जिस की कहानी मैं ने तुम्हें सुनाई थी. यही है वह वहशी दरिंदा, जिस ने मेरी इज्जत लूटी थी.’’

इमरान मुझे देख कर हैरान रह गया. मैं ने उस से कहा, ‘‘इमरान, ये तेरी बेटी है. तेरा गुनाह है.’’

फिर हम दोनों मसरूफ हो गए. अदीना ने अपना वादा निभाया. उसे कोने में रखा डंडा मिल गया. हम ने अपना इंतकाम लिया. इज्जत के लुटेरे उस शैतान को हम ने खत्म कर दिया. हम ने बहुत बड़ा नेक काम किया है और कई लड़कियों की इज्जत बचाई है. भले ही आप हमें सजा दीजिए, हमें मंजूर है. सुहाना चुप हो गई.

यह मेरी जिंदगी का सब से संगीन केस था. मैं बड़ी उलझन में था. अदालत में मैं सरकारी वकील की हैसियत से खड़ा था. मुझे इन मांबेटी पर संगीन जुर्म साबित करना था. उन के खिलाफ बोलना था, पर मेरा जमीर इस बात पर राजी नहीं था. मेरा दिल कहता था कि मैं यह मुकदमा हार जाऊं.

मुझे नहीं मालूम मैं ये मुकदमा ठीक से लड़ पाऊंगा या नहीं. मेरी जबान जैसे गूंगी हो गई थी. मैं अपनी बात कह नहीं पा रहा था. जुबान लड़खड़ा रही थी. और सचमुच मैं यह मुकदमा हार गया. मांबेटी सजा से बच गईं. मैं सही था या नहीं, कह नहीं सकता. आप खुद फैसला कीजिए.

(प्रस्तुति : शकीला एस. हुसैन)

अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो

और मैं अवतरित हो गया इस धरती पर. मांबाप का अकेला बेटा, 2 बहनों का इकलौता भाई, घर का नूर, खानदान का चिराग, नाममात्र की जायदाद का वारिस व वंश वृद्धि का बायस. ‘‘तुझे पैदा करने के लिए मैं ने क्याक्या जतन किए, तुझे क्या मालूम है? मैं चाहती थी कि मेरी गोद में भी मेरा बेटा खेले, खानदान का नाम रोशन करने वाला, मेरा सिर ऊंचा करने वाला. बेटी पैदा होने पर  वह गुरूर नहीं महसूस होता है जो बेटा पैदा होने पर होता है. क्याक्या नहीं किया हम ने तेरे पैदा होने पर, सोहर गवाए, लड्डू बंटवाए, पूरे गांव को खाना खिलाया. आखिर अब मैं भी एक बेटे वाली मां जो थी,’’ मां कहतीं. मैं कुलबुला कर रह जाता, ‘‘स्वार्थी कहीं की. मुझे मालूम है, मां मुझे क्यों पैदा करना चाहती थीं ताकि मैं बड़ा हो कर उन का सहारा जो बनूंगा. कितने बेवकूफ हैं मेरे मांबाप. बेटा पैदा करने के साथ उस के लिए एक अच्छी नौकरी भी तो पैदा करनी चाहिए थी. अब भुगतो. जब तक नौकरी नहीं मिलती तब तक इस सहारे को सहारा दो.’’

मुझे बचपन से ही मांबाप तैयार कर रहे थे अपने बुढ़ापे के लिए, ‘हाय मेरा बचपन,’ मैं और मेरी बहनें टीवी देखते रहते. मां आवाज लगातीं, ‘बबलू, चलो पढ़ने बैठो.’ मैं ठुनकता, ‘नहीं मां, मुझे अभी टीवी देखना है.’ लेकिन वे मुझे जबरदस्ती उठा देतीं, ‘नहीं, पहले पढ़ाई. टीवी तो बाद में भी देखा जा सकता है.’ मैं बहनों की तरफ देख कर कहता, ‘पर मां, ये भी तो देख रही हैं, इन्हें क्यों नहीं पढ़ने बैठातीं?’

मां बेरुखी से कहतीं, ‘इन्हें कौन सा पढ़लिख कर कलैक्टर बनना है. कलैक्टर तो तू बनेगा, मेरा राजा बेटा.’ मैं बहनों को ईर्ष्या से देखता हुआ, मन मार कर पढ़ने बैठता. मैं सोचता ‘काश मैं भी लड़की होता.’ मेरे मांबाप के सपनों की तलवार हर समय मेरे सिर पर लटकी रहती, ‘तुम्हें बड़ा हो कर यह बनना है, वह बनना है.’ मेरा पढ़ने में बिलकुल मन नहीं लगता था. मैं बड़ी हसरत से अपनी बहनों को इधरउधर डोलते, आसपास की लड़कियों के साथ गपशप करते, फोन पर फ्रैंड्स के साथ गपें मारते, टीवी देखते, हंसीमजाक करते देखता रहता था. मन हुआ तो पढ़ा नहीं तो कोई बात नहीं. उन को कहने वाला कोई नहीं था. पर मैं, मैं तो बेटा था न, मुझे तो पढ़ना था, पढ़लिख कर नौकरी के लिए घिसटना था. अच्छी नौकरी पानी थी. तो मैं झूलता रहता घर, कालेज, ट्यूशन और होमवर्क के बीच. जैसेतैसे मेरी पढ़ाई पूरी हुई. अब नौकरी की तलाश. जितना मैं नौकरी पाने की कोशिश करता उतना वह मुझ से दूर छिटकती, किसी मगरूर प्रेमिका की तरह. मेरे पिता मेरे नौकरी पाने के प्रयासों को समझते नहीं, उलटा मेरे घर में घुसते ही शुरू हो जाते. ‘आ गए साहबजादे मटरगश्ती कर के, कभी सोचा भी है कि किस तरह दिनरात खूनपसीना एक कर के अपना पेट काटकाट कर तुम्हें पढ़ायालिखाया है. अब तुम्हारा फर्ज बनता है कि इस बुढ़ापे में हमें सहारा दो.’

मैं मन ही मन उबल पड़ता, ‘मैं ने कहा था कि मुझे पढ़ाओलिखाओ. मुझ पर खर्च करो. पढ़लिख कर, पढ़पढ़ कर मेरा दिमाग खराब हो गया, वह दिखाई नहीं देता. मुझे पढ़ाने के बजाय ‘थ्री-पी’ यानी कि पहुंच, पहचान और पैसे का जुगाड़ किया होता, तो आज कहीं का कहीं पहुंच जाता.’ मरी बहनें भी मेरे कमा न पाने पर मेरी योग्यता पर प्रश्नचिह्न टांगें खड़ी रहतीं. उन्हें देखदेख कर मेरा और जी जलता रहता, ‘क्या आराम की जिंदगी है. न पढ़नेलिखने की चिंता न नौकरी की. जितना है उस में शादी तो हो ही जाएगी. कोई न कोई तो मिल ही जाएगा. एक मैं हूं, न नौकरी मिलती है न छोकरी. कहीं सारी जिंदगी कुंआरा ही न रहना पड़े. इस के लिए भी मेरे मांबाप मुझे ही दोषी ठहराते रहते.’

‘कहीं छोटीमोटी जौब कर ली होती तो यह नौबत नहीं आती.’ ‘आप ने भी क्लर्की के बजाय कलैक्टरी कर ली होती तो यह नौबत न आती.’ मेरे पिता यह सुन कर बिसुरने लगते. नालायक व बदतमीज औलाद पाने पर खुद को कोसने लगते. गिनाने लगते कि यह वही औलाद है जिस को पाने के लिए उन्होंने इतने पापड़ बेले. मैं कहता, ‘तो मुझे पा लिया न, अब और क्या चाहिए, आखिर देने वाले की भी तो कुछ सीमाएं होती हैं. आप को बेटा चाहिए था, मिल गया. आप ने यह थोड़ी ही कहा था कि कमाऊ बेटा चाहिए.’  मेरी बहनें सब से निर्लिप्त टीवी देखती रहतीं या आंगन में खड़ी पड़ोसिन की बेटी के साथ गपशप करती रहतीं. किसी बात की चिंता नहीं, शादी की भी नहीं, वह भी उन के मांबाप की है. उन का तो काम है कि मस्त रहो मस्ती में, आग लगे बस्ती में. तौबा, क्या मेरी जिंदगी है, बेटा बन कर क्या मिला मुझे? पढ़ाई का बोझ, नौकरी का टैंशन, छोकरी का गम. काश, इस से तो अच्छा कि मैं लड़की होता. कम से कम अपनी मरजी से तो कुछ कर पाता. पेंटिंग, ड्रैस डिजाइनिंग, कुकिंग, डांस, सिंगिंग, जो मुझे पढ़ना होता पढ़ता. नहीं तो छोड़ देता. जबरदस्ती डाक्टरी, इंजीनियरिंग, एमबीए में नहीं घिसटना पड़ता. लड़की होता तो मैं भी अपनी लाइफ ऐंजौय कर पाता. शादी से पहले भी शादी के बाद भी. न कमाने का झंझट. न नालायक, नकारा, कामचोर जैसे शब्दों से नवाजा जाता. जिस ने भी मुझे बनाया वह इस बार मेरी अर्जी पर ध्यान दे, इस जनम में भले मेरे बाप की सुन ली पर अब मेरी ही सुनियो और अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो…

मैंने शादी से पहले गर्भपात करवाया था, उस के बाद से ही मेरा पीरियड अनियमित हो गया है, अब क्या करूं?

सवाल
मेरी उम्र 30 साल है. शादी को 2 साल हो गए हैं. शादी के बाद से ही गर्भधारण करने की कोशिश कर रही हूं. मैं ने शादी से पहले गर्भपात करवाया था. उस के बाद से ही मेरा पीरियड अनियमित हो गया है और पीरियड के दौरान स्राव भी बहुत कम होता है. बताएं मैं क्या करूं?

जवाब
पीरियड के दौरान कम रक्तस्राव होने के कई कारण हो सकते हैं. इस का पता लगाने के लिए प्रारंभिक परीक्षण के तौर पर आप के पैल्विक का अल्ट्रासाउंड करना होगा, जिस में आप के गर्भाशय की भीतरी परत की मोटाई  की माप ली जाएगी. हारमोन का भी ठीक से पता लगाया जाएगा. उस के बाद अश्रमैंस सिंड्रोम पता लगाने के लिए हिस्टेरोस्कोपी जांच महत्त्वपूर्ण होगी. इस के अलावा जननांग की तपेदिक का पता लगाने के लिए बायोप्सी कर जांच के लिए भेजी जाएगी, क्योंकि पीरियड के दौरान कम रक्तस्राव होने का यह एक सामान्य कारण है.

डिलिवरी के बाद रहना चाहती हैं फिट तो फौलो करें ये टिप्स

शिल्पा शेट्टी या मलाइका अरोड़ा की पतली कमर देख कर भला किस का दिल नहीं मचलेगा. इन अभिनेत्रियों की परफैक्ट फिगर व चमकती त्वचा को देख कर भला कौन कह सकता है कि ये न केवल शादीशुदा हैं बल्कि मां भी बन चुकी हैं अधिकतर महिलाएं शादी मां बनने के बाद खुद को रिटायर समझने लगती हैं और सोचने लगती हैं कि अब उन की फिगर पहले जैसा आकार नहीं ले सकती. इसलिए वे अपनी फिटनैस को ले कर लापरवाह हो जाती हैं, उस के लिए कोई कोशिश ही नहीं करतीं.

नतीजतन उन का शरीर थुलथुला हो जाता है व त्वचा मुरझा जाती है. जबकि हकीकत यह है कि बच्चा पैदा होने के बाद यदि थोड़ा सा भी ध्यान खुद पर दिया जाए तो कोई भी महिला इन अभिनेत्रियों की तरह सुंदर दिख सकती है.

आइए जानते हैं कि कैसे डिलिवरी के बाद भी अपने को फिट और खूबसूरत रख सकती हैं.

कब शुरू करें व्यायाम

दिल्ली के सार्थक मैडिकल सैंटर की डायरैक्टर (गाइने) डाक्टर निम्मी रस्तोगी का कहना है, ‘‘अगर डिलिवरी सामान्य हुई हो तो डिलिवरी के 6 हफ्तों के बाद कोई भी महिला ऐक्सरसाइज शुरू कर सकती है और अगर डिलिवरी सिजेरियन हुई हो तो 3 महीनों के बाद महिला ऐक्सरसाइज शुरू कर सकती है.’’

डिलिवरी के समय वेट गेन होना यानी वजन का बढ़ना स्वाभाविक है. हर महिला 9 किलोग्राम से 11 किलोग्राम तक वेट गेन करती है. चूंकि इस समय फिजिकल ऐक्टिविटीज नहीं होती और घी, ड्राई फू्रट्स आदि हाईकैलोरी वाली चीजों का सेवन ज्यादा किया जाता है, तो वजन बढ़ ही जाता है. अगर नियमित रूप से व्यायाम और खानपान का ध्यान रखा जाए तो बढ़े वजन को घटाया जा सकता है.

कैसे करें ऐक्सरसाइज

सब से अच्छी ऐक्सरसाइज वाकिंग है. जितना अधिक चल सकें चलें, पानी बौडी को मूव करती रहें. शुरुआत सरल व्यायाम से करें. शुरू में 15 मिनट ही व्यायाम करें. धीरेधीरे व्यायाम का समय बढ़ा कर 45 मिनट करें. टोनिंग, ब्रीदिंग आदि ऐक्सरसाइज करें. ध्यान रहे हैवी  पीरियड्स के दौरान ऐक्सरसाइज न करें. ऐक्सरसाइज उतनी ही करें जिस से थकान न हो. ऐसी ऐक्सरसाइज भी न करें जिस से शरीर में खिंचाव या दर्द महसूस हो. डिलिवरी के बाद हारमोनों के प्रभाव से जोड़ों में ढीलापन आ जाता है. पेट की मांसपेशियां ढीली पड़ जाती हैं. ऐसे में व्यायाम द्वारा उन्हें मजबूत बनाया जा सकता है.

केगेल ऐक्सरसाइज

डिलिवरी के बाद योनि पर नियंत्रण कम होने से हंसते या खांसते समय यूरिन पास होने लगता है. इस समस्या के लिए केगेल ऐक्सरसाइज बहुत जरूरी है. यह ढीली हो चुकी योनि को मजबूत बनाती है. इस ऐक्सरसाइज द्वारा योनि को संकुचित किया जाता है. इस ऐक्सरसाइज में सांस को रोक कर योनि को 10-15 सैकंड तक सिकोड़ कर रखें. फिर ढीला छोड़ दें.

इस ऐक्सरसाइज को दिन में 5 बार करें. इस से योनि की मांसपेशियां मजबूत होती हैं, उन का ढीलापन कम होता है.

पेट की ऐक्सरसाइज

पेट की मांसपेशियों के लिए पीठ के बल लेट जाएं और घुटनों को मोड़ लें. पेट पर दोनों हाथ क्रौस की मुद्रा में रखें. फिर सिर को उठाएं. सिर उठाने पर पेट की मांसपेशियां सख्त हो जाएंगी. फिर एक गहरी सांस लें. फिर सांस छोड़ते हुए सिर और कंधों को 45 डिग्री के कोण तक उठाएं और पेट की मांसपेशियों को सख्त कर लें. धीरेधीरे वापस पहले वाली स्थिति में आ जाएं. इस व्यायाम को धीरेधीरे बढ़ाते हुए रोज 50 बार करें.

मौर्निंग वाक के फायदे

यदि आप हमेशा फिट रहना चाहती हैं और अपने चेहरे की चमक भी बरकरार रखनी है तो प्रतिदिन वाकिंग को अपनी आदत में शामिल करें. इस से ब्लड में कोलैस्ट्रौल कम होने के साथसाथ हृदयरोग का खतरा भी कम होता है. जोड़ भी मजबूत होते हैं और शरीर में मैटाबोलिज्म की गति तीव्र होती है. वाक आप की रोगप्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाता है. इस से इमोशनल सपोर्ट भी मिलता है.

खानपान कैसा हो

आप प्रोटीनयुक्त भोजन करें तो ज्यादा फायदा होगा. हम जो भोजन करते हैं उस में 60% कार्बोहाइड्रेट और 25 से 40% वसा होती है जबकि प्रोटीन कम होता है. कार्बोहाइड्रेट व वसा की मात्रा कम कर के यदि प्रोटीन की मात्रा बढ़ा दें तो मोटापा आसानी से कम किया जा सकता है.

पनीर: यह दांतों के लिए बेहद लाभकारी होता है. इस में पाए जाने वाले खनिज, लवण, कैल्सियम और फास्फोरस दांतों के इनैमल की रक्षा करते हैं. पनीर हड्डियों को भी मजबूत बनाता है.

अंकुरित अनाज: अंकुरित अनाज में बहुत सारे प्रोटीन होते हैं, जो शरीर को मजबूत रखते हैं और बीमारियों से बचाते हैं. यह पोषक तत्त्वों से भरपूर होता है. इस में ऐंटीऔक्सीडैंट और विटामिन ए,बी,सी भरपूर होते हैं.

फाइबरयुक्त रेशेदार अंकुरित अनाज खाने से आप का पाचनतंत्र मजबूत बनता है. अंकुरित अनाज में कैलोरी बहुत कम होती है.

पपीता: पपीते में विटामिन ए, बी, सी और डी, प्रोटीन तथा बीटा कैरोटिन जैसे तत्त्व पाए जाते हैं. पपीता वजन कम करने में बेहद सहायक है.

हरी पत्तेदार सब्जियां लौहयुक्त होती हैं. इन्हें खाने से डिलिवरी के बाद लौह की कमी से होने वाले एनीमिया से बचाव होता है. महिलाओं को प्रतिदिन

100 ग्राम हरी सब्जियां जरूरी खानी चाहिए. ये हमारे इम्यून सिस्टम को भी मजबूत बनाती हैं और आंखों के लिए भी लाभदायक होती हैं. ये ब्रैस्ट कैंसर व लंग्स कैंसर की रोकथाम में भी कारगर हैं. सब्जियों में फाइबर प्रचुर मात्रा में होता है.

दिल्ली के तारकोर इन इंडिया जिम सैंटर के फिटनैस ऐक्सपर्ट पीयूष कुमार के अनुसार, ‘‘डिलिवरी के बाद ऐसी ऐक्सरसाइज करें जिस से स्टमक पर ज्यादा जोर न पड़े. इस के लिए हलकी स्ट्रैचिंग, नौर्मल क्रंच आदि करें. बैठेबैठे पैरों को क्रौस कर हिलाएं. पीठ के बल लेट कर घुटनों को मोड़ सकती हैं. पैरों को 10 बार ऊपरनीचे करें. खड़े हो कर दोनों हाथों को ऊपर की तरफ खींचें. सीधी खड़ी हो कर लैफ्टराइट मूव करें.’’

दिल्ली के ब्यूटी ऐक्सपर्ट साक्षी थडानी का कहना है कि डिलिवरी के बाद महिलाओं में हारमोनल बदलाव की वजह से थकावट सी रहती है. वे पार्लर में जाने से आलस करती हैं. ऐसे में वे घर बैठे ही खूबसूरती को कायम रख सकती हैं. क्लींजर या टोनर से चेहरे की मसाज कर के चेहरा साफ कर लें. फिर चेहरे पर लाइट बेस पाउडर लगाएं. लिप कलर लाइट कलर का ही लगाएं.

घर पर ही किसी ब्यूटीशियन को बुला कर थ्रैडिंग, वैक्सिंग कराएं. थ्रैडिंग करवाने से चेहरा साफ दिखेगा. औलिव औयल से पूरी बौडी की मालिश करवाएं और फेशियल जरूर करवाएं.

डिलिवरी के बाद ब्यूटी टिप्स

अधिकतर महिलाएं डिलिवरी के बाद अपने लुक के प्रति सतर्क नहीं रहतीं, क्योंकि उन्हें लगता है कि घर से बाहर तो जाना नहीं है, फिर भला क्यों बनावशृंगार किया जाए. परिणामस्वरूप उन की त्वचा डल सी दिखने लगती है. अगर आप थोड़ा सा समय निकाल कर दिल्ली की ब्यूटी ऐक्सपर्ट रेनू महेश्वरी के बताए निम्न ब्यूटी टिप्स पर अमल करें तो डिलिवरी के बाद भी आप की त्वचा चमकदार और खूबसूरत दिखेगी.

  1. डिलिवरी के बाद स्किन बहुत ड्राई हो जाती है. अत: केले को मसल कर चेहरे की हलके हाथों से मसाज करें.
  2. लिवरी के बाद बौडी में स्वैलिंग आ जाती है. ऐसे में चेहरे पर कोई फ्रूट पैक लगा कर थोड़ी देर रैस्ट करें.
  3. पपीते को मैश कर के फेस पर लगाने से स्किन ग्लोइंग और मुलायम हो जाती है और रिंकल्स भी खत्म हो जाती हैं.
  4. चेहरे की क्लीनिंग और टोनिंग जरूर करें. इस के बाद चेहरा कौटन से पोंछ कर मौइश्चराइजर लगाएं.
  5. हफ्ते में 2 बार स्क्रब जरूर करें. चाहे स्क्रब घरेलू हो या फिर रेडीमेड.
  6. अगर चेहरे पर दाने से निकलते हैं, तो लगातर स्किन टोनर का प्रयोग करें.
  7. ऐक्यूप्रैशर से खुद अपने हाथों से मसाज करें. पैरों को गोलगोल घुमाएं.
  8. गरम पानी में नीबू के छिलके या सी साल्ट डाल कर पैरों को डिप करें. इस से थकावट दूर होगी और पैर खूबसूरत हो जाएंगे.
  9. डिलिवरी के बाद पूरे शरीर की अरोमा औयल से मसाज करें. इस से रक्तसंचार बढ़ता है और त्वचा में चमक आती है. हां, अगर सिजेरियन डिलिवरी हुई हो तो पेट की मसाज न करें.
  10. 1 चम्मच मौइश्चराइजर में 3-4 बूदें नैरोली औयल की मिला कर मसाज करें.
  11. डिलिवरी के बाद बेचैनी और रात को नींद नहीं आती हो तो अपने तकिए पर कुछ बूंदें नैरोली औयल की डाल लें. इस से नींद अच्छी आती है. भरपूर नींद लेना अच्छे स्वास्थ्य की निशानी है और यह खूबसूरती भी बढ़ाती है.
  12. केशों के लिए विटामिन ई औयल से रोज हलके हाथों से मसाज करें. कंघी भी हलके हाथों से करें. इस से केशों के झड़ने की समस्या दूर होती है.
  13. केले को मैश कर के केशों में लगाने से केश नर्म, मुलायम और चमकदार हो जाते हैं.
  14. खूब पानी पीना और अपनी डाइट को संतुलित रखना बहुत जरूरी है. इस से चेहरे पर थकान का नामोनिशान नहीं रहेगा और त्वचा भी खिलीखिली लगेगी.
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