Download App

हिंदुस्तान की सियासत मंदिरमसजिद के नाम पर नहीं चलेगी

लोकसभा चुनाव 2024 के जनादेश ने समाज को बांटने और ध्रुवीकरण करने वालों को साफ संदेश दे दिया है कि भारत जैसे महान लोकतंत्र में मंदिरमसजिद के नाम पर राजनीति ज्यादा देर तक नहीं चलेगी. कुछ समय के लिए जनता धर्म के नाम पर उकसाने पर भ्रमित जरूर हो सकती है, लेकिन जीवन के असली मुद्दे हावी होते ही धर्म और आस्था का भूत उतर जाता है. जीवन पहले है, धर्म बाद में है. जीवन जीने के लिए इंसान को सिर पर सुरक्षित छत चाहिए, अपनी औरतोंबच्चों की हिफाजत चाहिए, पड़ोसियों से मेलजोल और अच्छे संबंध चाहिए, बड़ीबड़ी डिग्रियां ले कर घूम रहे युवा हाथों को काम चाहिए, आसमान छूती महंगाई से नजात चाहिए, बच्चों को पौष्टिक भोजन और अच्छी शिक्षा चाहिए, अस्पताल में बीमार को दवाई चाहिए, किसान को अपनी फसल का वाजिब दाम चाहिए.

अगर इन चीजों की गारंटी नहीं दी जा रही है तो दूसरी मोदी गारंटियां किसी काम की नहीं हैं, चुनावी नतीजा भारतीय जनता पार्टी के लिए आगे भी वही आएगा जो अब की बार दिखाई दिया है. कहावत है कि काठ की हांडी एक बार ही चढ़ती है. जनता मूर्ख नहीं है जो हर बार आप के ललकारने पर थाली बजाने निकल पड़ेगी या नोटबंदी की लाइन में खड़ी हो जाएगी. बीते 10 सालों में समाज को बांटने, मुसलमानों को डराने, किसानों को रौंदने और गरीबों को और गरीब बनाने की जो साजिशें मोदी सरकार ने रचीं, उस का करारा जवाब जनता ने दिया है.

सब से ज्यादा हैरानी तो इस बात की है कि जिस अयोध्या ने भाजपा को सत्ता के सिंहासन पर बैठाया था, उसी अयोध्या ने राम को लाने वाले और रामलला के लिए भव्य मंदिर बनाने वालों को नकार दिया. अयोध्या से शुरू हुई हिंदू राष्ट्र बनाने की मुहिम पर अयोध्या ने ही पानी फेर दिया. भाजपा सरकार ने बीते 10 सालों में हिंदूमुसलिम के बीच जो गहरी खाई खोदी, उस में वह खुद औंधेमुंह जा गिरी. तमाम भाजपाई नेता जो मुसलमानों को आतंकवादी बता कर हिंदुओं के दिलों में उन के प्रति भय और नफरत भरने में जुटे थे, चुनावी नतीजे देख कर उन के चेहरे स्याह पड़ गए.

2024 के जनादेश ने साफ कर दिया कि इस देश में अब मंदिरमसजिद के नाम पर वोट नहीं मिलने वाले हैं. अब नेताओं को आम आदमी के जीवन के मुद्दों पर गौर करना होगा. जनता ने उस को जैसी पटखनी दी है इस के बाद हिंदूमुसलिम के बीच नफरत बढ़ाओ वाला मुद्दा अब भविष्य में भाजपा भुना नहीं सकेगी. निसंदेह यह नतीजा भविष्य में होने वाले तमाम चुनावों की भी दिशा बदलने वाला है. काशीमथुरा की लड़ाई में भी अब आम आदमी भाजपा के उकसावे में आने के बजाय कोर्ट के फैसले को तरजीह देगा.

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 5 अगस्त, 2020 को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के भूमिपूजन के साथ ही 2024 के आम चुनावों की नींव भाजपा ने डाल दी थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बारबार अयोध्या आ कर इस मुद्दे को ताजा कर रहे थे. पूरी अयोध्या के सौंदर्यीकरण के साथ 22 जनवरी को मंदिर के भव्य उदघाटन और प्राणप्रतिष्ठा में देश के कोनेकोने से नेताओं को अयोध्या ला कर इस मुद्दे को खूब तपाया गया ताकि लोकसभा चुनाव के नतीजे भाजपा के पक्ष में ऐसे आएं कि विपक्ष पूरी तरह समाप्त हो जाए. इस के लिए ‘अबकी बार 400 पार’ के नारे को भी खूब उछाला गया. लेकिन जनता ने भाजपा की मंशा पर पानी फेर दिया. भाजपा सिर्फ फैजाबाद (अयोध्या) लोकसभा सीट ही नहीं हारी, बल्कि मंडल की सभी सीटें और पूर्वांचल की कई प्रमुख सीटें भी उस के हाथ से निकल गईं.

उत्तर प्रदेश, जिस की बदौलत केंद्र की सत्ता तय होती है, उस उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से भाजपा और उस की सहयोगी पार्टियों के खाते में मात्र 36 सीटें आईं. यानी, उत्तर प्रदेश में योगी के बुलडोजर ने भाजपा को ही कुचल कर रख दिया. कहां तो योगी दावा कर रहे थे कि उत्तर प्रदेश में 72 सीटें भाजपा के खाते में जाएंगी, जबकि जनता साइकिल पर सवार हो कर चल दी. केंद्र में पूर्ण बहुमत से अगर भाजपा अपनी सरकार नहीं बना पाई और उसे गठबंधन के अन्य दलों की चिरौरी कर के सरकार बनानी पड़ी तो इस का बड़ा जिम्मेदार योगी का बुलडोजर मौडल है, जो जनता को रास नहीं आया.

अयोध्या में सौंदर्यीकरण के नाम पर गरीबों के आशियानों पर खूब बुलडोजर चलाया गया. सालों से बसे लोगों को उजाड़ दिया, उन की दुकानें तोड़ दीं, उन के रोजगार ख़त्म कर दिए. भाजपा नेताओं को घमंड हो गया कि धर्म के नाम पर वो कुछ भी करेंगे और जनता खामोश रहेगी. पूरी पार्टी राम मंदिर उद्घाटन और बन रहे कौरिडोर से उत्साहित थी. पार्टी ओवर कौन्फिडेंस थी. इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया कि हजारों को उजाड़ा, बसाया किस को? अंदरखाने जो चल रहा था उस पर ध्यान ही नहीं दिया. रामलला को लाने और अयोध्या में उन के लिए भव्य मंदिर बनाने का गुणगान पूरे देश में करते रहे. नहीं जान पाए कि अयोध्या में एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी था जो विकास के नाम पर उजाड़े जाने से खिन्न था. व्यापारी बारबार अधिग्रहण और मुआवजे का मुद्दा उठा रहे थे. पूरे शहर में जगहजगह पर बैरिकेटिंग, पुलिस बंदोबस्त, रूट डायवर्जन और वीआईपी कल्चर से जनता परेशान थी. उन की तकलीफों को योगी सरकार ने अनसुना और अनदेखा किया. पूरे शहर को भगवामय कर के विकासविकास की रट लगाए रहे और इसी खोखले विकास का खमियाजा भाजपा ने लोकसभा चुनाव में भुगता.

विस्तारीकरण के समय बड़ी तादाद में लोग संपत्ति पर मालिकाना हक के दस्तावेज नहीं दिखा सके और इसी वजह से अधिकतर को बाजार दर पर मुआवजा नहीं मिल सका. अयोध्या में बरसों से दुकानदारी करने वाले रघुनाथ प्रसाद कहते हैं, ”हमारी पूरी दुकान चली गई, मुआवजा मिला सिर्फ डेढ़ लाख. नई दुकान किराए पर ली तो पगड़ी ही 20 लाख से अधिक है. वो दुकान हमारे पास 3 पीढ़ियों से थी, अब हम सड़क पर आ गए हैं. आजीवन भाजपा को समर्थन किया, कभी सोचा नहीं था कि अयोध्या में राम आएंगे तो हम ही यहां से चले जाएंगे.”

भाजपा को बड़ा घाव दलितों और पिछड़ों ने भी दिया. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ लंबे समय से इस तबके को अपने साथ मिलाने की कवायद में जुटा था. कई सालों से कांवड़ यात्राओं को खूब प्रचारितप्रसारित किया जा रहा था. जगहजगह कांवड़ उठाने वाले यात्रियों के ठहरने के बढ़िया इंतजाम बीते कुछ सालों से होने लगे थे. कांवड़ियों पर बाकायदा हवाई जहाज से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पुष्पवर्षा करते थे.

यही नजारा मध्य प्रदेश में भी दिखाई देता था. सरकार कांवड़ियों पर इतनी मेहरबान इसलिए हो रही थी क्योंकि उन में अधिकांश पिछली जातियों और दलित समाज से होते हैं जो वोटबैंक की बहुत बड़ी संख्या है. इन दलितोंपिछड़ों को ब्राह्मण तबका किसी मंदिर का पुजारी तो नहीं बनने देता मगर कांवड़ उठवाने का काम इन्हीं से करवाता है. कांवड़ उठाने वाले ज़्यादातर लोग खेतीकिसानी से जुड़े होते हैं. एक तरफ भाजपा सरकार ने कांवड़ियों पर पुष्पवर्षा करवाई और दूसरी तरफ किसानों को तेज गरमी, बारिश और ठंड में अपनी मांगों के साथ महीनों सड़कों पर बैठने के लिए मजबूर किया. उन को गाड़ियों से रौंदा. उन की सरेआम हत्या की. किसान औरतों और लड़कियों से बदसलूकी हुई. किसानों की जमीनें छीन कर उन्हें मजदूर बनाने की साजिश सरकार ने रची और उस के लिए बाकायदा 3 काले कानून ले आई. इस के खिलाफ सालभर किसान खुलेआसमान के नीचे बैठे रहे, मोदी सरकार का दिल नहीं पसीजा. उन पर अपने काले कानून जबरन थोपने के लिए क्याक्या जुल्म नहीं ढाये? आज अगर भाजपा के टिकट पर मंडी सीट से जीत कर आई कंगना रानावत को चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर सीआईएसएफ की कौन्स्टेबल कुलविंदर कौर ने एक झन्नाटेदार थप्पड़ रसीद कर दिया तो उस पर हायहाय करने के बजाय यह देखना चाहिए कि यह घटना उस अत्याचार के प्रति गुस्से का परिणाम है जो मोदी सरकार ने किसानों पर ढाया है.

देश के मुसलमानों को डराने और उन्हें गैरनागरिक घोषित करने के लिए गृहमंत्री अमित शाह सीएए और एनआरसी लागू करने की बात कहते रहे. मुसलमानों के लिए आतंकवादी, घुसपैठिए, अधिक बच्चे पैदा करने वाले और न जाने किसकिस तरह के वाक्यों का इस्तेमाल करते रहे. बोले ‘इंडि गठबंधन सत्ता में आया तो वह दलितोंपिछड़ों का रिजर्वेशन खत्म कर के मुसलमानों को दे देगा.’

खुद प्रधानमंत्री मोदी मंच से कहते दिखाई दिए कि,“ये (मुसलमान) आप का मंगलसूत्र छीन लेंगे.” ऐसी घटिया भाषणबाजी करते वक्त सोचा होगा कि इस से बहुसंख्यक बेहद खुश होंगे और झूम कर वोट भाजपा के पक्ष में देंगे. लेकिन उस का नतीजा यह हुआ कि दलित, पिछड़ा और मुसलिम वोट एकजुट हो कर सपा व कांग्रेस की झोली में जा गिरा. दलित और पिछड़ा भाजपा से इसलिए भी छिटका क्योंकि भाजपा नेता संविधान को ख़त्म कर के मनुस्मृति के नियम लागू करने जैसी बकवास करने लगे थे. इस से दलित और पिछड़ा वर्ग के कान खड़े हो गए क्योंकि आरक्षण का कवच तो उस को संविधान की ताकत से मिला है.

मनुस्मृति के नियम तो उन्हें ब्राह्मण का दास बनने के लिए ही मजबूर करेंगे. ब्राह्मण के चंगुल और उस के अत्याचारों से छूटने में आजादी मिलने के बाद भी आधी शताब्दी का वक्त लग गया. अभी भी पूरी मुक्ति और पूरे अधिकार हासिल नहीं हुए, संविधान से खिलवाड़ हुआ तो दलितपिछड़ा वर्ग फिर से सदियों पुरानी वाली दरिद्र दशा में धकेल दिया जाएगा. इस आशंका ने दलितपिछड़ा वर्ग को एक झटके में भाजपा से अलग कर दिया.

मणिपुर में औरतों की नंगी परेड पर मोदीशाह की चुप्पी ने अल्पसंख्यक ईसाई समुदाय के मन में खटास घोल दी. इतनी बड़ी राष्ट्रीय शर्म की घटना, जिस की विश्वभर में निंदा हुई, सुप्रीम कोर्ट को फटकार लगानी पड़ी और कहना पड़ा कि अगर सरकार कुछ नहीं करती है तो सुप्रीम कोर्ट कदम उठाएगा. इस ने देश के सामने भाजपा का असली चेहरा उधाड़ कर रख दिया.

बेंगलुरु (कर्नाटक) में मुसलिम औरतों के हिजाब पर उठा विवाद हो या दिल्ली की सड़कों पर अमित शाह की पुलिस द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर की ऐथलीट्स को सड़कों पर घसीटघसीट कर गिरफ्तार करने की कोशिश, सत्ता के लिए लार टपकाने वाली भाजपा के लिए स्त्री अस्मिता और सुरक्षा की बातें और ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे नारे, सिर्फ वोट बटोरने का खेल है, यह बात देश की जनता बहुत अच्छी तरह समझ चुकी है.

सहयोगी दलों की चिरौरी और उन की तमाम जायजनाजायज मांगों के आगे घुटने टेक कर नरेंद्र मोदी भले तीसरी बार प्रधानमंत्री की कुरसी पर जा बैठे हों मगर उन के मंत्रिमंडल में किसी भी मुसलिम या किसी भी ईसाई व्यक्ति को मंत्री न बनाया जाना इस बात को साफ करता है कि देशभर में बुरी तरह नकारे जाने के बाद भी धर्म का कार्ड उस ने अपनी जेब में संभाल कर रख लिया है और जबजब चुनाव आएंगे, भाजपा ध्रुवीकरण का घिनौना खेल जरूर खेलेगी. हालांकि जनता जाग चुकी है. हिंदू राष्ट्र बनाने की चाह में देश को शताब्दियों पुरानी मनु की वर्णव्यवस्था में ले जाने की इच्छा पालने वालों को जनता ने फिलहाल तो पीछे धकेल दिया है. सहयोगियों की बैसाखियों पर खड़ी सरकार को खुद के पैरों पर आने में अब लंबा वक्त लगेगा.

पौलिटिक्स में फिल्म स्टार्स को मिलता रहा है लौलीपोप, वोट बटोरने के बावजूद कैबिनेट में एंट्री बैन

18वीं लोकसभा चुनाव में मनोज तिवारी, हेमामालिनी, शत्रुघ्न सिन्हा, कंगना रनोट, पवन कल्याण जैसे स्टार्स ने चुनाव जीतकर यह साबित कर दिया है कि इनके चेहरे किसी भी पौलिटिकल पार्टी की सीट में इजाफा करती है. मनोज तिवारी ने पूर्वी दिल्ली और हेमामािलनी ने मथुरा सीट से लगातार तीसरी बार जीत हासिल की वहीं तृणमूल कांग्रेस की ओर से पश्चिम बंगाल की आसनसोल लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रहे शत्रुघ्न सिन्हा ने बीजेपी के एसएस अहलूवालिया को 59 हजार वोटों से हराया. मंडी से कंगना ने भारी मतों से जीत हासिल की.

फिल्मी चेहरों को राजनीति से जोड़ने का क्लियर फंडा है वोट बैंक को आकर्षित कर जीती हुई सीटों की संख्या को बढ़ाना. लगभग सभी राजनीतिक दल ने फिल्मी सुंदर चिकने चेहरों का पूरी तरह से दोहन किया हैं. वे इन्हें चुनावी सभाओं में स्टार प्रचारक के तौर पर खूब दौड़ाती हैं, महंगे सनस्क्रीन लगानेवाले स्टार्स को चुनावी दिनों में धूपधूल सबको बरदाश्त करना पड़ता है. हेमामालिनी जैसी ड्रीमगर्ल तेज धूप में मथुरा के खेत में नजर आती हैं, तो कंगना रनौत जैसे पूरी सिक्योिरटी में चलने वाले स्टार्स मामूली लोगों के साथ सेल्फी लेने पर मजबूर है.

भीड़ को चुंबक की तरह खींचते हैं स्टार्स 

स्टार्स के चेहरे चुनावी सभाओं और रैलियों में भीड़ जुटाने और तालियां बटोरने का काम करती है. स्टार्स की पर्सनालिटी और डायलौगबाजी का अंदाजा 1991 में नई दिल्ली लोकसभा सीट के लिए हुए चुनाव से लगाया जा सकता है. उन दिनों रथयात्रा निकालने की वजह से लालकृष्ण आडवाणी का कद काफी बड़ा हो गया था. वहीं उनके विरुद्ध कांग्रेस की ओर से चुनाव लड़ रहे सुपर स्टार राजेश खन्ना का चार्म भी जनता के बीच कायम था. राजेश खन्ना की स्टार पर्सनालिटी का ही कमाल था कि अडवाणी मामूली वोटों के अंतर से ही अपनी सीट बचा पाए थे. दोनों की सीट का अंतर महज 1589 था.

फिल्मी चेहरों का फायदा नजर आता है वोट बैंक के अंतर में 

मिमी चक्रवर्ती और नुसरत जहां जैसे चेहरों को ममता बनर्जी ने टीएमसी में शामिल किया. बंगाली एक्ट्रेस नुसरत जहां ने 17वीं लोकसभा में अपने प्रतिद्वन्द्वी को 3.5 लाख वोटों से हराया था. 2019 की लोकसभा चुनाव में बंगाली एक्ट्रेस मिमी चक्रवर्ती ने भी अपने करीबी प्रतिद्वन्द्वी को करीब 3 लाख वोटों से शिकस्त दी. ये आंकड़े बताते हैं कि स्टार्स होने की वजह से इनकी जीत का मार्जिन भी बहुत ज्यादा होता है. ऐसे में किसी बड़े प्रतिद्वंद्वी को हराने के लिए भी फिल्मी सेलिब्रेटीज की मदद ली जाती है.

चुनावों में स्टारडम का दबदबा

स्टारडम का तड़का लगाने का एक और बड़ा उदाहरण है 1984 में इलाहाबाद लोकसभा सीट का चुनाव . इस सीट पर कांग्रेस ने सदी के महानायक अमिताभ बच्चन को प्रत्याशी बनाया था. उनदिनों सीनियर बच्चन, गांधी फैमिली के बेहद करीबी माने जाते थे. तब छोरा गंगा किनारे वाला के नाम से मशहूर बिग बी ने अपने मित्र राजीव गांधी के कहने परर इलाहाबाद की सीट से जबरदस्त जीत हासिल की. उन्हें कुल वोटों का करीब 70 प्रतिशत वोट मिला था. मीडिया रिपार्ट्स के अनुसार, हेमंती नंदन बहुगुणा को करीब 25 प्रतिशत वोट मिले, वहीं बाकी 24 प्रत्याशियों को केवल 1 प्रतिशत के वोटों से संतोष करना पड़ा. इसे कहते हैं स्टारडम का दबदबा.

शत्रुघ्न सिन्हा रहे थोड़े लकी 

वोटों को अपनी ओर खींचने के इस पावर के बावजूद पौलिटिक्स में मूवी स्टार्स को मंत्री बनाए जाने की बात न के बराबर हुई. मथुरा से जीतती रही हेमा मालिनी हो या ईस्ट दिल्ली में पूर्वांचलियों की वजह से 3 बार से जीतते रहे मनोज तिवारी, इन्हें कैबिनेट से बाहर ही रखा गया. शत्रुघ्न सिन्हा को एक बार जलमंत्री बनने का मौका जरूर मिला लेकिन वह पहला और आखिरी मौका था. बीजेपी से मोहभंग होने के बाद वे कांग्रेस में शामिल हुए, कांग्रेस से हताश होकर उन्होंने ममता बनर्जी की शरण ली और 18वीं लोकसभा में आसनसोल से जीत हासिल की. अब चूंकि अब सरकार एडीए की है, तो इस बार भी टीएमसी सांसद शत्रुघ्न सिन्हा के हाथ खाली रह जाएगा.

पवन कल्याण, कंगना नए फिल्मी चेहरे

इस बार बीजेपी की प्रत्याशी के रूप में एक्ट्रेस कंगना रनौत ने हिमाचल प्रदेश के मंडी लोकसभा सीट से जीत हासिल की. वहीं साउथ इंडियन एक्टर पॉलिटीशयन पवन कल्याण की पार्टी जनसेना ने भी 2 सीटों पर विजय पताका लहराया है. उधर एक्टर गोविंदा भी दोबारा पौलिटिक्स के गलियारों में नजर आ रहे हैं. साल 2004 में कांग्रेस ने गोविंदा को ईस्ट मुंबई लोकसभा सीट से उतारा और बीजेपी उम्मीदवार राम नाईक को हराकर वे जीत गए, हालांकि राम नाईक ने उन पर यह आरोप लगाया कि चुनाव में जीतने के लिए गोविंदा ने अंडरवर्ल्ड डौन दाउद इब्राहीम का सहारा लिया था, बाद में गोविंदा ने राजनीति छोड़ दी थी लेकिन हाल ही में उन्होंने शिवसेना का दामन थाम लिया है.

नाम के साथ साथ बदनाम भी होते हैं स्टार्स

अकसर पार्टियों को जीत दिलानेवाले ये स्टार्स को राजनीति में आने की भारी कीमत भी चुकानी पड़ती है. कुछ के स्कैंडल्स सामने आ जाते हैं तो कुछ को पब्लिक में थप्पड़ खाने पड़ते हैं. तृणमूल कांग्रेस की सांसद नुसरत जहां को 17वीं लोकसभा का सबसे खूबसूरत चेहरा कहा गया. लेकिन उन्हें भी एमपी बनने की कीमत चुकानी पड़ी. सांसद के रूप में अपने काम की बजाय उनका नाम केवल और केवल कौंट्रोवर्सी से जुड़ता रहा.आनेवाला समय ही बताएगा कि फिल्म स्टार्स को लेकर राजनीतिक दलों की सोच में कितना बदलाव आता है, वे अपनी कैबिनेट में इनको जगह देते हैं या केवल एमपी बनने का लौलीपोप थमाते रहते

मेरी बेटी सोशल एंग्जाइटी डिसऔर्डर से ग्रस्त लगती है, क्या करूं?

सवाल

 

बेटी की उम्र 28 साल की है. अच्छी पढ़ीलिखी है. देखने में भी सुंदर है लेकिन कालेज की पढ़ाई खत्म होने के बाद पता नहीं क्यों धीरेधीरे वह डल होती गई, जिससे मोटी हो गई. अपने कपड़े खरीदने भी बाजार जाने से कतराने लगी कि दुकानदार कहेगा कि आप का साइज नहीं है. फैमिली गैदरिंग में जाने का सोच कर ही उस की तबीयत खराब होने लगती है, पसीना आ जाता है. वैसे, हम ने डाक्टर को दिखाया है. उस ने दवाइयां दी हैं. आप भी कोई सुझाव दें जिस से वह इस स्थिति से बाहर निकल सके?

जवाब

इस स्थिति को सोशलफोबिया भी कहते हैं. व्यक्ति सामाजिक संबंधों को विकसित करने के दौरान अन्य लोगों की तुलना में बहुत अधिक आत्मजागरूक और भयभीत महसूस करता है. इस से आत्मसम्मान यानी सैल्फ स्टीम भी कम होने लगती है. वे आमतौर पर किसी भी सोशल गैदरिंग में जाने से इसलिए भी कतराते हैं कि उन्हें लगता है कि उन्हें जज किया जा रहा है.

डाक्टरी मदद तो आप ने शुरू कर दी है, साथ ही साथ, कुछ तरीके भी अपनाएं, जैसे ब्रीद ऐक्सरसाइज का रोजाना करना. आप की बेटी इस से काफी रिलैक्स महसूस करेगी.

प्रौग्रैसिव मसल रिलैक्सेशन भी इस में कारगर साबित हो सकता है. बेटी को फिजिकल एक्टिविटी, जैसे जौगिंग, रनिंग आदि के लिए प्रोत्साहित करें. शुरू में उस के साथ आप भी जाइए ताकि वह अपने को अकेला न महसूस करे. इस से एंग्जाइटी को कम करने में काफी मदद मिलती है.

किसी भी सोशल परिस्थिति का सामना करने के लिए उसे तैयार कीजिए. उस का माइंड सैट करने की कोशिश कीजिए. अचानक से बहुत भीड़भाड़ वाली जगहों, पार्टी, फंक्शन आदि में जाने के बजाय कम भीड़ वाली जगहों पर ले जाएं. रैस्टोरैंट में खाना खाने जाएं. शौपिंग करने के लिए उसे ऐसे स्टोर पर ले कर जाएं जहां एक्ट्रा लार्ज साइज के कपड़े मिलते हों. उस से पौजिटिव बातें करें और उसे भी पौजिटिव बातें करने के लिए कहे. मन में सकारात्मक खयाल रखें. इन सब बातों से भी उस में सोशल एंग्जाइटी धीरेधीरे कम होने लगेगी.

 

आपकी पड़ोसिन के रंगढंग भी क्या ऐसे ही हैं

इन्हें नकचढ़ी कहूं या मगरूर, लड़ाकू कहूं या मैंटल, समझ में नहीं आता. कुछ दिनों से इन्हीं के बारे में सोच रही हूं. ये साल भर पहले ही हमारे पड़ोस में शिफ्ट हुई हैं. इन की उम्र 40-45 के  बीच होगी. खातापीता परिवार है. पति अच्छी जौब करते हैं. दोनों लड़के 10वीं व 11वीं कक्षा में पढ़ रहे हैं.

इन का नाम है दामिनी. यथा नाम तथा गुण. सारा दिन पति व बच्चों पर रोब झाड़ती रहती हैं. जो सामने आ जाए उसी पर बरस पड़ती हैं. न कोई इन के घर आता है न ये किसी के घर जाती हैं. इन से साल भर में 3-4 बार ही मुलाकातें हुई हैं. अजीब करैक्टर हैं.

कहती हैं, ‘‘मेरे लिए तो सिर्फ 3 लोग हैं जिंदगी में जिन के लिए जीती हूं. पति व दोनों बच्चे.’’

ससुराल में कोई और नहीं है. ससुर कब के गुजर चुके हैं, सास को इन्होंने देखा ही नहीं. मायके में भरापूरा परिवार है. लोकल होने के बावजूद साल में एकाध बार ही जाती हैं.

कहती हैं, ‘‘रह ली बहुत आप लोगों के साथ. अब तो पति के साथ रहने दो.’’

पति भी सुदर्शन व गठीले शरीर के मालिक हैं. पति पर बड़ा नाज है. जब भी नजर आती हैं इठलातीबलखाती नजर आती हैं.

एक बार मैं डरतेडरते किसी काम से इन के घर गई. 10-15 मिनट में सब की धुलाई कर दी-भाइयों, भाभियों, पड़ोसियों की. भाइयोंभाभियों से इन की बनती नहीं है. कहती हैं, ‘‘मांबाप भी बेटों के ही होते हैं. पड़ोसियों की तरफ देखो तो नजर घुमा लेते हैं. घमंडी कहीं के.’’

न जाने कब तक इन का निंदा पुराण चलता अगर मैं वहां से चली न आती. यदाकदा इन की बच्चों पर चिल्लाने की आवाजें आती रहती हैं. एक दिन तो हद हो गई. उन की चीखनेचिल्लाने की इतनी भयंकर आवाज सुन कर हम भी सहम गए.

पति पर चीख रही थीं, ‘‘सब के सब मर जाएं कोईर् नहीं सुनता मेरी.’’

पूरा दिन घर में महाभारत मची रही. मायके वाले भी आए मामला शांत कराने. इन की महाभारत का सार यही था कि पति का कहीं अफेयर चल रहा है. इन का शक सही था या गलत पता नहीं. 2 दिन बाद फिर वही समर्पित पत्नी व मां की तरह परिवार में रम गईं. कामवाली यदि जरा भी लेट हो जाए या गलती से कोई उन के घर की घंटी बजा दे तो उस की खैर नहीं.

एक दिन कामवाली अगले दिन न आने की बोल कर गई, लेकिन आ गई. ‘‘तू मना कर के गई थी. अब क्यों आई? हम ने कर लिया काम. आज तेरी छुट्टी लगेगी,’’ कामवाली पर चिल्ला कर दरवाजा इतनी जोर से बंद किया कि कामवाली और दरवाजा दोनों एकदूसरे पर तरस खा रहे होंगे.

मैं अकसर सोचती हूं ये ऐसी क्यों हैं? विनम्रता किस चिडि़या का नाम है इन्हें नहीं पता. शायद जिंदगी के पिछले अनुभव अच्छे न हों. सब को शक की नजर से देखती हैं.

एक दिन मैं ने मुसकरा कर बातचीत की पहल की. 5-7 मिनट घरगृहस्थी की बातें करने लगीं.

बातोंबातों में कहने लगीं, ‘‘मैं ने तो अभी से अपने लड़कों से कह दिया है कि शादी होते ही अलग कर दूंगी.’’

मैं ने मन ही मन सोचा आप नहीं भी करेंगी तो वे खुद ही हो जाएंगे. आप के साथ रोबोट ही रह सकते हैं. पासपड़ोस में ऐसी 2-4 दामिनियां और आ जाएं तो पड़ोस का मतलब ही खत्म हो जाएगा.

अवश्य डिप्रैशन का शिकार हैं, पर उन्हें मनोवैज्ञानिक के पास जाने की सलाह देने वाले को कहीं खुद ही मनोवैज्ञानिक के पास न जाना पड़ जाए. इसलिए कोईर् बोलता नहीं है. उन के बारे में सोचतेसोचते मुझे खुद पर भी डिप्रैशन होने का शक होने लगा है.

कर्तव्य : क्या दीपक और अवनि इम्तिहान में खरे उतरे

स्कूली पढ़ाई अवनि ने गर्ल्स स्कूल से की थी और आज वह पहली बार कालेज में कदम रखने जा रही थी, वह भी कोएड कालेज में. स्कूल के माहौल से कालेज का माहौल बिलकुल अलग होता है. नई बिल्डिंग, हरियाली से भरे कैंपस में नएनए चेहरे, सभीकुछ नया ही तो था उस के लिए. वह डरतेघबराते, सकुचाते हुए मेनगेट से अंदर दाखिल हुई और अपनी क्लास में जाने लगी. पर उसे अपनी क्लास तो मालूम ही नहीं थी. किस से पूछे, कैसे पूछे? इसी उधेड़बुन में उस ने एक चपरासी से पूछ ही लिया, बीकौम फर्स्ट ईयर की क्लास कहां है?

चपरासी ने सही तरीके से उसे समझाया, ‘‘सीधे जा कर 2 मंजिल ऊपर चढ़ना और दाएं से 7वां कमरा. 2/6 यानी सैकंड फ्लोर पर रूम नं. 6, स्टाफरूम है और उस पर नंबर नहीं है.’’ अवनि ने उसे थैंक्यू कहा तो वह मुसकराते हुए आगे बढ़ गया और अवनि सीधे जाने लगी. वह चपरासी के बताए अनुसार ही चली और रूम नं. 6 के सामने जा कर देखा, गेट के ऊपर लगी तख्ती पर लिखा था. ‘‘क्च.ष्शद्व.ढ्ढ4द्गड्डह्म्. घबराते हुए वह क्लासरूम में दाखिल हुई तो लड़केलड़कियों से कमरा लगभग  भरा हुआ था. अधिकतर लड़कियां रंगबिरंगे, चटक रंग के कपड़े पहने हुए थीं, पर अवनि के कपड़े सादे थे. वह एक साधारण परिवार से थी.

प्रोफैसर आए, उन्होंने सब फ्रैशर्स का स्वागत करते हुए अपना परिचय दिया. इस के बाद उन्होंने अटैंडैंस ली और सभी को अपनाअपना परिचय देने को कहा. अवनि की बारी आई तो उस ने घबराते हुए अपना परिचय दिया. सब का परिचय होतेहोते पूरा पीरियड खत्म हो गया.

अगला पीरियड 45 मिनट बाद था. वह क्लास से बाहर निकली और नीचे जाने लगी. कैंपस की एक बैंच पर बैठी ही थी कि एक लड़की उस के पास आई और बोली, ‘‘मैं यहां बैठ सकती हूं?’’

अवनि बोली, ‘‘हांहां, क्यों नहीं.’’

थोड़ी देर बाद वह लड़की बोली, ‘‘मेरा नाम सुधा है, तुम्हारी ही क्लास में हूं, और तुम्हारा नाम अवनि है न.’’

उस ने ‘‘हां’’ कहा. दोनों ने थोड़ी देर बातें की, फिर दोनों अगले लैक्चर के लिए क्लास में चली गईं. इस बार दोनों साथसाथ ही बैठीं.

घर पहुंच कर उस ने अपनी मां को सारी बातें बताईं, कुछ देर आराम करने के बाद उस ने मां के काम में हाथ बंटाया. खाना खाने के वह बाद अपने से 3 साल छोटी अपनी बहन से बातें करने लगी और फिर उसे पढ़ाने के बाद सुला दिया. फिर वह पढ़ने लगी और पढ़तेपढ़ते ही सो गई.

अवनि और सुधा अच्छी दोस्त बन गई थीं. दोनों साथ ही क्लास में बैठतीं. बाद में लंच भी साथ ही करतीं और फ्री पीरियड में गपशप भी करतीं. सुधा अमीर हो कर भी साधारण ही रहती थी.

सुधा का जन्मदिन आने वाला था, इस के लिए उस ने शौपिंग का प्लान बनाया और रविवार की शाम को अवनि को ले कर मार्केट गई. उस ने अपने लिए नई ड्रैस और अन्य सामान लिया और कुछ सामान की बुकिंग कर दी जिसे अगले दिन उस के घर पहुंचना था. उस ने अवनि के लिए भी एक नई ड्रैस खरीदी. कुछ और खरीदारी के बाद दोनों मार्केट से बाहर आ कर गाड़ी के पास पहुंचीं. सुधा ने उसे घर छोड़ने को कहा तो उस ने मना कर दिया कि वह बस से चली जाएगी.

अवनि बस से उतर कर अपने घर जा रही थी. सड़क किनारे कुछ बच्चे खेल रहे थे, तभी उसे एक कार हौर्न बजाती, लहराती हुई आती दिखी. कार वाले ने बच्चों को बचाने के चक्कर में तेजी से ब्रेक लगाया तब भी कार घिसटतेघिसटते अवनि के पैरों से टकराती हुई थोड़ी आगे जा कर रुकी. कार वाला, जो एक नौजवान था, जल्दी से उतर कर पीछे की ओर भागा और बच्चों को सकुशल देख उस ने राहत की सांस ली और वापस कार की तरफ मुड़ते हुए अवनि को सड़क किनारे एक पत्थर पर पैर पकड़े कराहते देखा.

वह उस के पास गया और कुछ कहता, इस के पहले ही अवनि उस पर बरस पड़ी, ‘‘कार चलानी नहीं आती तो चलाते क्यों हो, सड़क के किनारे चलने वाले तो जैसे तुम्हें दिखते ही नहीं, कम से कम बच्चों को तो देखते. दिखते भी कैसे? बड़े बाप के बेटे जो ठहरे.’’

कार वाले ने बड़ी नम्रता से कहा, ‘‘आई एम सौरी, मैं तो सड़क पर ही था, बच्चे खेलतेखेलते अचानक सड़क के बीच में आ गए. उन्हें बचाने के चक्कर में तेजी से ब्रैक लगाने के बावजूद आप को टक्कर लग गई. चलिए, मैं आप को अस्पताल ले चलता हूं.’’

अवनि का गुस्सा अब थोड़ा शांत हो गया, वह बोली, ‘‘नो थैंक्स. मेरा घर पास में ही है, मैं चली जाऊंगी.’’ यह कह कर वह उठी तो लड़खड़ा कर वापस बैठ गई. पैर में चोट लगी थी. शायद बड़ी खरोंच थी. खून बह रहा था. कार वाले ने फिर कहा, ‘‘मैं पहले आप को अस्पताल ले चलता हूं. मरहमपट्टी के बाद आप को, आप के घर छोड़ दूंगा, मेरा भरोसा कीजिए.’’ अवनि ने उसे मना नहीं किया और उस के साथ अस्पताल चली गई.

मरहमपट्टी के बाद कार वाले ने उसे घर तक छोड़ा. अवनि को लड़खड़ाते हुए चलता देख उसे सहारा दे कर अंदर तक छोड़ा. तभी अवनि की मां भागती हुई आई. उसे संभाला और बिस्तर पर लिटाया. अवनि ने मां की घबराहट को देखते हुए सारा हाल बताया और कहा कि चोट गहरी नहीं है, थोड़ी खरोंच है, 2-3 दिनों में ठीक हो जाएगी. डाक्टर को दिखा दिया है.

अवनि ने कार वाले को थैंक्स कहते हुए बैठने का इशारा किया. वह बैठ गया. मां अंदर चली गई चायपानी लेने. कार वाले ने अपना परिचय दिया, ‘‘मैं कोई अमीर बाप का बेटा नहीं हूं, मेरा नाम दीपक है और यहीं पास में रहता हूं. यह कार मेरी नहीं है मेरे पड़ोसी की है. मैं पढ़ाई के साथसाथ शाम को एक मोटर गैराज में भी काम करता हूं. आज कालेज की छुट्टी होने के कारण सुबह से ही गैराज चला गया था. पड़ोसी की कार भी ठीक करनी थी, तो उन की कार ले गया था.’’ उस ने आगे बताया. ‘‘मैं अकेला ही हूं इस दुनिया में, दिनभर कालेज में पढ़ता हूं और शाम को 4 घंटे गैराज में काम करता हूं. गुजरबसर हो जाती है.

‘‘मैं एमकौम फर्स्ट ईयर में हूं और मेरे पास मोटरसाइकिल है, उसी से रोज कालेज जाता हूं.’’

मां चाय लाई तो उस ने मना करते हुए कहा, ‘‘थैंक्यू मुझे जाना है.’’ और अवनि को फिर से सौरी कहता हुआ वह बाहर आया और कार में बैठ कर चला गया.

2 दिन तक अवनि कालेज नहीं जा सकी, तीसरे दिन कालेज जाने के लिए तैयार हो रही थी कि एक बच्चे ने आ कर बताया, ‘‘कोई दीदी, आप को पूछ रही हैं.’’ बाहर आ कर देखा तो सुधा थी, 2 दिन कालेज में न देख कर वह मिलने घर ही आ गई. उस ने सुधा को मार्केट के बाद हुई घटना के बारे में बताया और दीपक के बारे में भी.

‘‘अरे, मैं तो उसे जानती हूं, बहुत सीधासादा, अच्छा लड़का है. कभीकभी थोड़ी बातचीत हो जाती है, नोट्स को ले कर,’’ सुधा ने एकदम से कहा. दोनों फिर कालेज के लिए रवाना हुईं.

शाम तक अवनि का पैरदर्द कम था, फिर भी वह थोड़ा लंगड़ाती हुई चल रही थी. रात को खाना खाया ही था कि डोरबैल बजी. अवनि ने दरवाजा खोला, देखा तो दरवाजे पर दीपक था. अवनि ने उस से अंदर आ कर बैठने को कहा. दीपक बैठते हुए बोला, ‘‘सौरी, 2 दिन से आप के हालचाल पूछने नहीं आ सका. कालेज और गैराज से समय नहीं मिला. काम ज्यादा था. आज काम कम था तो खत्म कर के सीधा यहीं आ गया.’’

‘‘इट्स ओके,’’ अवनि ने कहा, ‘‘नो प्रौब्लम, अब मैं ठीक हूं, थोड़ा दर्द है. 2-3 दिन में वह भी दूर हो जाएगा.’’

फिर बोली, ‘‘खाना खुद बनाते हो या होटल में खाते हो?’’

दीपक ने शरमाते हुए कहा, ‘‘मैं खुद बनाता हूं. अब जाऊंगा, बना कर खाऊंगा.’’

‘‘अब तुम्हें देर भी हो गई है तो आज यहीं से खाना खा कर जाओ. पर हां, सादी रोटी, दालचावल, सब्जी है. पकवान नहीं,’’ मुसकराहट के साथ अवनि ने कहा.

दीपक ने मना किया पर जब अवनि की मां ने कहा तो उस ने खाने के लिए हामी भर दी, साथ ही, एक शर्त रख दी. उस ने कहा, ‘‘मैं एक शर्त पर खाना खाऊंगा, तुम कल से मेरे साथ कालेज चलोगी.’’ अवनि ने भी हां कर दी. तभी दीपक ने कहा, ‘‘पर वापस तुम्हें बस से ही आना पड़ेगा, मुझे गैराज जो जाना होता है.’’ तीनों हंस दिए.

दीपक ने खाना खाया और फिर से थैंक्स कहा. अवनि ने दीपक की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया तो वह थोड़ी देर सोचता रहा. अवनि ने कहा, ‘‘कोई जल्दी नहीं है. आराम से सोच लो.’’ दीपक ने कहा, ‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं. मेरे दोस्तों में कोई लड़की नहीं है, इसलिए मैं जरा घबरा रहा था.’’

फिर दीपक ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘डन’’ और अवनि से हाथ मिलाते हुए विदा ली.

अगले दिन सुबह कालेज समय से डेढ़ घंटे पहले ही दीपक, अवनि के घर आ गया. अवनि ने जल्दी आने का कारण पूछा तो वह बोला, ‘‘तुम रोज बस से जाती हो, तो मुझे लगा कि कहीं निकल न जाओ, इसलिए.’’

‘‘नहीं मैं 1 घंटा पहले ही निकलती हूं. बस से कालेज पहुंचने में 45 मिनट लगते हैं.’’ अवनि ने मुसकराते हुए उत्तर दिया. दोनों ने चाय पी और मोटरसाइकल से कालेज के लिए रवाना हुए.

यह सिलसिला यों ही चलता रहा. दीपक उसे कालेज के लिए लेने आया. अब वह उसे कालेज में फ्री समय में मिलने भी लगा. देखते ही देखते 3 वर्ष हो गए. अवनि और सुधा का बीकौम पूरा हो गया और दीपक ने एमकौम फाइनल कर लिया और वह सीए करने के साथसाथ एक प्राइवेट कंपनी में जौब भी करने लगा. नौकरी अच्छी थी और सैलेरी भी, पर काम का बोझ ज्यादा था.

अवनि ने कई बार उस से कहा, ‘‘कोई दूसरी जौब देख लो, यहां काम ज्यादा है तो.’’

दीपक हर बार मुसकराते हुए कहता, ‘‘काम तो दूसरी जगह भी रहेगा, काम तो काम है. समय पर तो पूरा करना ही पड़ेगा. सैलरी भी ठीक है. गैराज के जैसे रोज काला तो नहीं होना पड़ता, धूलधुएं में तो नहीं रहना पड़ता.’’ उस का यह उत्तर सुन कर अवनि चुप हो जाती और फिर उस ने भी कहना छोड़ दिया.

अवनि और दीपक की दोस्ती गहराती जा रही थी. दोनों एकदूसरे से मन की बात कहते और लड़तेझगड़ते भी. घूमनेफिरने के साथसाथ पढ़ाई भी जारी थी और दीपक की जौब भी.

एक दिन अचानक सड़क दुर्घटना में अवनि के पिता की मृत्यु हो गई. अवनि पर तो जैसे दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. उस की और छोटी बहन की पूरी जिम्मेदारी उस के कंधों पर आ गई. वह तो जैसे इस बोझ से टूट ही गई थी. रिश्तेदार और आसपड़ोस के लोग तो आए और सांत्वना दे कर, हाथ जोड़ कर चले गए, पर दीपक ने उसे संभाला. उस ने अवनि को ढांढ़स बंधाया और उसे इस मुसीबत के समय हौसला रखने व अपनी, मां और छोटी बहन के प्रति जिम्मेदारी से घबरा कर भागने की नहीं, बल्कि इस मुसीबत से लड़ने की शक्ति दी.

दीपक ने कहा, ‘‘देखो, अगर इस दुखद घड़ी को दूर करना है तो इस से डरने की नहीं, लड़ने की जरूरत है. मां और छोटी बहन का अब तुम ही तो सहारा हो. अगर तुम इस तरह हिम्मत हार जाओगी तो इन को कौन संभालेगा और फिर मैं भी तो हूं तुम्हारे साथ. इस परिस्थिति में तुम को ही हिम्मत दिखानी है और अपने पिता की अपूर्ण जिम्मेदारियों को उठा कर घर को संभालना है. दृढ़शक्ति से उठो और आगे बढ़ती चलो और सब को बता दो कि तुम साधारण लड़की नहीं, तुम में अब भी वही हिम्मत, जोश और साहस है जो पिता की मृत्यु से पहले था.’’

अवनि पर दीपक की बातों का असर हुआ. उस ने मां और छोटी बहन की तरफ देखा और कहा, ‘‘दीपक, तुम ने ठीक ही कहा. मैं हिम्मत नहीं हारूंगी. इस विपरीत परिस्थिति के बोझ से अपने कंधे टूटने नहीं दूंगी, बल्कि पूरी ताकत से यह बोझ उठाऊंगी. मैं अब जौब कर के घर को चलाऊंगी और बहन को अच्छे से पढ़ा कर उस की शादी करवाऊंगी. दीपक ने मुसकराते हुए उस के  कंधे को थपथपाया और वहां से चला गया. अगले 2 दिनों तक वह अवनि के यहां नहीं आया.

2 दिन बाद दीपक आया. उस ने बताया कि वह 2 दिन अपने औफिस से समय निकाल कर दोपहरशाम को अवनि के लिए जौब ढूंढ़ रहा था. इस में उसे सफलता भी मिली. उस ने बताया, ‘‘एक कंपनी में क्लर्क की पोस्ट खाली है, कल तुम यहां अपना रिज्यूमे ले कर चली जाना, तुम्हारा इंटरव्यू होगा. हो सकता है यह जौब तुम्हें ही मिल जाए. वहां का मैनेजर हमारे औफिस में आता रहता है, उस ने बताया कि उन्होंने इस पोस्ट के लिए अभी तक विज्ञापन नहीं दिया है. तुम कल सुबह 10 बजे चली जाना.’’

अगले दिन अवनि ठीक समय पर इंटरव्यू के लिए पहुंच गई. उस ने सोचा, ‘अगर नौकरी नहीं मिली तो…’ थोड़ी देर बाद वह इंटरव्यू के लिए अंदर गई और आधे घंटे बाद बाहर निकली तो घबराई हुई थी. परिणाम के लिए उसे शाम को बुलाया गया तो उस ने घर वापस जाने के बजाय वहीं रुकना बेहतर समझा. शाम को उसे बताया गया कि वह सिलैक्ट हो गई और कल से ही औफिस जौइन कर सकती है. उस की आंखों से आंसू आ गए, ये खुशी के आंसू थे.

अवनि घर पहुंची. उस ने अपने पिता की फोटो को हाथ जोड़े और मां को गले लगाते हुए कहा, ‘‘मुझे नौकरी मिल गई. अब हमें कोई परेशानी नहीं होगी. मैं खूब मेहनत करूंगी और छोटी को पढ़ाऊंगी भी.’’

थोड़ी देर बाद दीपक आया. उस ने देखा अवनि बहुत खुश है तो वह समझ गया कि उसे नौकरी मिल गई. अवनि ने कहा, ‘‘थैंक्स दीपक, तुम्हारे कारण ही मुझे नौकरी मिल सकी.’’

‘‘नहीं यह तुम्हारी योग्यता और समझदारी के आधार पर मिली है, अब खूब मेहनत करो और आगे बढ़ो,’’ दीपक ने कहा.

अवनि की सालभर की नौकरी होने पर उसे बढ़े हुए इन्क्रीमैंट की जानकारी देते हुए उस के मैनेजर ने कहा, ‘‘मेरा ट्रांसफर हो गया है, कल से तुम नए मैनेजर के साथ ऐसी ही लगन व मेहनत से काम करना.’’

अगले दिन नए मैनेजर बाकी स्टाफ से पहले औफिस आ गए और फाइल देखने लगे. बाद में उन्होंने स्टेनो से एक लैटर टाइप करवाया और उस पर साइन करने के बाद आगे की कार्यवाही के लिए अवनि के पास भेज दिया. अवनि ने लैटर डिस्पैच करते हुए जब लैटर पढ़ा तो वह चौंक गई. लैटर में लिखी रकम के टोटल में फर्क आ रहा था जिस से कंपनी को 50 हजार रुपए का नुकसान हो सकता था.

वह फौरन उठी और मैनेजर के रूम में गई. नेमप्लेट पर लिखा था-नीरज राठौर. वह दरवाजा नौक कर बोली, ‘‘मैं अंदर आ सकती हूं?’’

अंदर से आवाज आई, ‘‘कृपया आइए.’’ गेट खोल कर वह अंदर गई तो देखा मैनेजर की कुरसी पर एक नौजवान बैठा हुआ है और कुछ फाइलें उस के सामने फैली हुई हैं.

उस ने वह लैटर उन की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘सर, मैं मिस अवनि चौधरी, यहां की क्लर्क. आप ने अभी जो लैटर टाइप करवाया है उस में रकम के टोटल में 50 हजार रुपए का फर्क है. आप कहें तो मैं इस की फाइल चैक कर लूं. मैनेजर ने देखा तो उसे अवनि की बात सही लगी. उस ने फाइल देते हुए कहा, ‘‘तुम सही कहती हो, फर्क है, तुम ने गलती पकड़ी है, इस से कंपनी को 50 हजार रुपए का नुकसान हो सकता था. मुझे खुशी है कि तुम जैसी मेहनती और ईमानदार लड़की इस कंपनी में काम करती है.’’ अवनि ने थैंक्यू कहा और फाइल ले कर बाहर निकल आई.

कई दिनों तक नीरज ने अवनि और उस के काम पर नजर रखी. उसे अवनि की सादगी, व्यवहार और काम करने का तरीका काफी पसंद आया (शायद अवनि भी). अब वह औफिस के हर मामले में उस की सलाह लेने लगा. एकदो बार तो उस ने पर्सनल मामले में भी उस से पूछ लिया. नीरज और अवनि को साथसाथ काम करते हुए कई महीने हो गए. नीरज अवनि को चाहने भी लगा था, शायद अवनि भी नीरज को. लेकिन दोनों एकदूसरे से मन की बात कह नहीं पा रहे थे. दीपक को अवनि की बातों से इस का अंदाजा हो गया था.

दीपक ने अवनि की मां को नीरज के बारे में बताया. मां ने कहा, ‘‘तुम अवनि को अच्छी तरह जानते हो. उस की पसंदनापसंद भी समझते हो. तुम ही बात करना उस से. लेकिन पहले नीरज के बारे में जानकारी हासिल कर लो कि कैसा लड़का है, उस का परिवार, व्यवहार आदि.’’ दीपक ने मां को आश्वासन दिया कि वे चिंता न करें, वह सब देख लेगा.

एक दिन रविवार की दोपहर नीरज अवनि के घर पहुंच गया और बोला, ‘‘यहां से गुजर रहा था तो सोचा तुम से और तुम्हारी मां से भी मिलता चलूं.’’ अवनि ने नीरज को अपनी मां व छोटी बहन से मिलवाया. फिर हंसती हुई बोली, ‘‘ये है मेरा बैस्ट फ्रैंड दीपक.’’

‘‘अच्छा तो ये हैं दीपक, आप के बारे में अवनि से कई बार सुन चुका हूं,’’ नीरज ने कहा.

सब ने आपस में कुछ देर बातें कीं. तभी दीपक ने मां से धीरे से कहा, ‘‘शादी की बात करने का अच्छा मौका है.’’ मां जैसे ही नीरज से कुछ कहने को हुईं, एकदम से नीरज ने अपनी और अपने परिवार की जानकारी देने के बाद कहा, ‘‘मुझे अवनि पसंद है और मैं उस से शादी करना चाहता हूं. शायद अवनि भी यही चाहती है. उस ने शर्म के मारे आप से बात नहीं की होगी. क्या आप हमारी शादी के लिए आशीर्वाद देंगी?’’ एक ही सांस में नीरज ने इतना सब कह दिया और फिर पानी पी कर चुप हो गया.

मां और दीपक की तो मनमांगी मुराद पूरी हो गई. उन्होंने अवनि की तरफ देखा तो वह शरमाती हुई अंदर चली गई. मां ने ‘हां’ कहा और जल्दी ही दोनों की शादी कराने की बात कही.

कुछ दिनों से अवनि खुश भी थी और थोड़ी चिंता में भी रहती. नीरज ने उस से पूछा तो उस ने अपने मन की बात कही, ‘‘मेरी शादी के बाद मां और छोटी का क्या होगा. कैसे होगा?’’

‘‘इस में चिंता की क्या बात है? हम सब साथ ही रहेंगे, एक ही घर में,’’ नीरज ने कहा. यह सुनते ही अवनि की खुशी का तो ठिकाना ही नहीं रहा, उसे दोहरी खुशी हुई.

शादी की तारीख तय हुई लेकिन इधर कुछ दिनों से दीपक का कुछ अतापता नहीं था. अवनि ने उस के औफिस जा कर पता किया तो मालूम हुआ कि उस की तबीयत खराब होने के कारण वह छुट्टी पर है. वह उस के घर गई तो वहां भी ताला लगा हुआ था. अवनि की चिंता बढ़ गई. दीपक का फोन तो पहले से ही स्विच औफ था. अवनि वापस अपने घर आई और दीपक की चिंता में बिना कुछ खाएपिए ही सो गई.

अगले दिन सुबह एक औटो घर के सामने रुका. उस ने देखा कि दीपक उस में से सामान निकाल रहा है. सामान रखा भी नहीं था कि अवनि ने उस पर सवालों की बौछार कर दी. दीपक चुपचाप सुनता रहा. अवनि जब चुप हुई तो उस ने कहा, ‘‘तुम्हारी बात खत्म हो गई हो तो मैं कुछ बोलूं?’’ अवनि चुप जरूर हो गई थी पर अभी भी गुस्से में थी. दीपक फिर बोला, ‘‘तुम्हारी शादी के लिए अपनी तरफ से तुम को देने के लिए और घर के लिए छोटामोटा सामान, कपड़े वगैरह लेने इंदौर गया था. तुम को बता कर जाता तो तुम मना करतीं, औफिस से छुट्टी नहीं मिलती तो वहां पर भी तबीयत खराब होने का बहाना बनाया.’’ यह सुन कर अवनि का गुस्सा थोड़ा शांत हुआ. उस ने सामान की तरफ देखा. उस पर इंदौर का पता लिखा हुआ था. फिर भी वह थोड़े गुस्से में बोली, ‘‘क्या जरूरत थी ये सब लाने की. चलो, ठीक है लाए, तो वहां से क्यों, यहां भी तो सब मिलता है.’’

थोड़ी बहसबाजी के बाद सब नौर्मल हो गया और सब सामान देखने लगे. दीपक लगभग 50-60 हजार रुपए का सामान लाया था. दीपक ने एक बैग नहीं खोला, अवनि के पूछने पर उस ने कहा, ‘‘औफिस की कुछ स्टेशनरी है.’’ अवनि ने उस से ‘थैक्यू माई बैस्ट फ्रैंड, कहा.

निश्चित दिन शादी हुई. सब खुश थे. दीपक, सुधा और छोटी सब ने मिल कर खूब डांस और धमाल किया. शादी का समारोह सादगीपूर्ण हुआ. अवनि की विदाई हुई. शादी के कुछ दिन बाद अवनि ने मां और छोटी को अपने पास बुला लिया. दीपक कुछ दिन तो अवनि से बराबर मिलता रहा लेकिन बाद में उस का मिलनाजुलना कम हो गया.

समय के साथसाथ छोटी भी बड़ी हो गई. उस की भी शादी हो गई और बाद में मां अपनी बीमारी व अपने पति की याद में रहरह कर चल बसीं. दीपक भी अब कम आता, 2-3 महीने में एक बार. उस को देख कर लगता कि काफी बीमार और कमजोर है. पूछने पर कहता, ‘‘काम ज्यादा है, खानेपीने का समय नहीं मिलता. टाइमटेबल बिगड़ गया है. अब ध्यान रखूंगा.’’ ऐसा आश्वासन देता और चला जाता.

एक बार 3 महीने से ज्यादा समय हो गया दीपक से मिले, तो अवनि एक दिन सुबहसुबह ही उस के घर पहुंच गई. पर वहां ताला लगा देख कर उस के औफिस भी गई. औफिस में जा कर पता चला कि वह तो कई महीने से औफिस आया ही नहीं. उस की तबीयत बहुत खराब थी. इंदौर जाने को कह गया है इलाज के लिए. यह सुनते ही अवनि के पैरों तले जमीन खिसक गई. फिर थोड़ा संभलती हुई बोली, ‘‘मुझे वहां उस अस्पताल का पता और फोन नंबर मिल सकता है.’’ औफिस वालों ने उसे अस्पताल का पता और फोन नंबर दे दिया.

अवनि जैसेतैसे घर पहुंची. नीरज औफिस जा चुके थे लेकिन अवनि ने उन्हें फोन लगा कर फौरन घर बुलाया और सारी बात बताई. नीरज को भी झटका लगा कि दीपक ने कभी बताया क्यों नहीं? दोनों ने फौरन इंदौर जाने का फैसला किया.

कुछ देर बार दोनों अपनी छोटी सी बच्ची के साथ अपनी गाड़ी से इंदौर के लिए रवाना हुए. अवनि रास्तेभर यही सोचती रही कि दीपक ने ऐसा क्यों किया, कभी कुछ बताया क्यों नहीं, क्या हुआ होगा उसे?

साढ़े 4 घंटे के सफर के बाद वह उस अस्पताल के सामने खड़ी थी जहां दीपक भरती था. अंदर जाते समय उस के पैर कांप रहे थे. रिसैप्शन पर पहुंच कर नीरज ने दीपक का नाम बता कर उस का वार्ड पूछा तो जवाब मिला ‘‘सैकंड फ्लोर, आईसीयू वार्ड, बैड नंबर 6.’’ ऊपर वार्ड के सामने जा कर नीरज बोले, ‘‘तुम थोड़ी देर यहीं बैठो, मैं देख कर आता हूं. फिर तुम जाना. छोटे बच्चों को अंदर ले जाना मना है.’’ अवनि ने कुछ नहीं कहा, सिर्फ हां में सिर हिला दिया.

नीरज अंदर गए. बैड नंबर 6 के पास जा कर रुके तो देखा, दीपक को औक्सीजन मास्क लगा था. साथ ही खून और एक अन्य  दवाई की बोतल भी लगी थी. वह बेहोश था. थोड़ी देर रुकने के बाद वह बाहर आए और बच्ची को लेते हुए अवनि से कहा, ‘‘अब तुम जाओ, और देखो, उस से कुछ बोलना नहीं, वह बेहोश है. बस, चुपचाप देख कर चली आना. फिर डाक्टर से मिलने चलेंगे.’’

अवनि ने इस बार कुछ नहीं बोला. फिर डरतीडरती अंदर गई. बैड नंबर 6 के पास रुकी. दीपक को देखा, उस की ऐसी हालत देख कर वह एकदम से चक्कर खाने लगी. पास खड़ी नर्स ने उसे पकड़ा और बाहर ले आई. बाहर आते ही वह रोने लगी. नीरज उसे चुप कराते हुए बोले, ‘‘चलो, डाक्टर से मिलते हैं.’’

डाक्टर के पास गए तो उन्होंने बताया, ‘‘कुछ सालों से दीपक के फेफड़ों में संक्रमण है जो उसे गैराज में काम करते हुए धूल व धुएं के कारण हो गया था. पहले भी उस का इलाज यहां होता रहा और उसे भरती होने के लिए कहा गया. पर उस ने कहा था, ‘मेरे ऊपर कुछ महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी है और मेरी दोस्त की शादी भी है.’ यह कह कर उस ने सभी जरूरी दवाइयां ली और चला गया. फिर बाद में आया ही नहीं. अभी जब वह यहां आया तो उस की स्थिति बेहद गंभीर थी. अभी भी कुछ कहा नहीं जा सकता.’’

अवनि ने नीरज को देखा फिर डाक्टर से कहा, ‘‘उस के इलाज में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए, डाक्टर साहब.’’

‘‘देखिए, हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे हैं. सबकुछ हमारे हाथ में नहीं है. और मैं आप को यह भी बता दूं कि उस का इलाज लंबा है पर 90 फीसदी चांसेज हैं कि वह ठीक हो जाए. पर कुछ हमारी भी मजबूरियां हैं.’’ डाक्टर ने कहा.

अवनि ने पूछा, ‘‘कैसी मजबूरी?’’ तो डाक्टर ने थोड़ा सकुचाते हुए कहा, ‘‘कुछ दवाइयां हैं जो यहां नहीं मिलतीं, उन्हें और्डर दे कर मुंबई या फिर चैन्नई से मंगवाना पड़ता है और कंपनी को कुछ ऐडवांस भी देना पड़ता है. दीपक ने जो रकम यहां जमा की थी वह सब खत्म हो गई. उस के औफिस से भी एक बार 50 हजार रुपए का चैक आया था. वह भी दवाई और अस्पताल के चार्ज में लग गया. उसे बाहर तो नहीं कर सकते, पर कुछ ही दिनों में हम उसे जनरल वार्ड में शिफ्ट करने वाले हैं.’’

दीपक की ऐसी स्थिति के बारे में सुन कर अवनि अपना रोना रोक नहीं सकी और बाहर आ गई. नीरज ने डाक्टर से कहा, ‘‘अब आप रुपयों की चिंता न करें और जो दवाइयां बाहर से मंगवानी हों, फौरन मंगवाए और दीपक का इलाज करें.’’ यह कहते हुए नीरज ने अपने बैग से चैकबुक निकाली और 1 लाख रुपए का चैक बना कर डाक्टर को दे दिया. डाक्टर ने चैक लेते हुए कहा, ‘‘आप निश्चिंत रहिए. मैं आज ही ईमेल कर दवाइयां का और्डर दे देता हूं और कल ड्राफ्ट से ऐडवांस भी भेज दूंगा. कल रात तक फ्लाइट से दवाइयां भी आ जाएंगी, फिर हम उस का बेहतर इलाज कर पाएंगे. उम्मीद रखिए. 1-2 महीने में वह बिलकुल ठीक हो जाएगा.’’

नीरज डाक्टर के रूम से बाहर आए तो देखा कि बच्ची सो गई थी. नीरज ने अवनि के कंधे पर हाथ रखा तो उन्हें देख कर उस की आंखों में आंसू आ गए और वह हाथ जोड़ कर उम्मीदभरी नजरों से नीरज को देखने लगी.

नीरज सब समझ गए. उस ने अवनि के हाथों को पकड़ा और उसे गले लगाते हुए कहा, ‘‘मैं सब समझता हूं, तुम दीपक की चिंता मत करो. हम उस का अच्छे से अच्छा इलाज करवाएंगे.’’ यह कहते हुए उस ने अभी अंदर डाक्टर से हुई बात सविस्तार बता दी. अवनि ने थैंक्यू कहा और रोने लगी. नीरज ने कहा, ‘‘दीपक तुम्हारा दोस्त है तो मेरा भी दोस्त हुआ. तुम यों हाथ जोड़ कर और थैंक्यू बोल कर मुझे शर्मिंदा मत करो.’’

थोड़ी देर बाद सुहानी सो कर उठी और रोने लगी तो नीरज उसे खिलाते हुए बाहर निकल गए. अवनि ने थोड़ी देर बाद कुछ सोचते हुए सिर हिलाया. वह अब समझ गई थी कि क्यों दीपक इतने दिनों तक गायब था, वह इतना कमजोर क्यों हो गया और शादी की खरीदारी के लिए अकेले ही इंदौर क्यों आया, खरीदारी  तो एक बहाना था अपनी बीमारी के बारे में उसे बताने से बचने का, और उस ने बैग क्यों नहीं दिखाया, उस में जरूर दवाइयां, डाक्टर के परचे और बिल रहे होंगे.

कुछ ही देर में नीरज और सुहानी आए और अवनि के पास बैठ गए. दोनों ने फिर अपना सामान गाड़ी में रखा और पास के होटल में रूम ले कर आराम करने लगे. अवनि और नीरज ने सुहानी को खाना खिलाया और खुद भी जैसेतैसे थोड़ा खाना खाया और फिर नीरज और सुहानी सो गए, पर अवनि को नींद नहीं आ रही थी. उसे रहरह कर दीपक की बातें याद आतीं. उस के साथ घूमना, पढ़ना, काम करना और हंसीमजाक के साथसाथ छोटीछोटी बातों पर लड़नाझगड़ना वगैरह. यही सोचतेसोचते वह भी सो गई.

अगले दिन सुबह दोनों फिर अस्पताल गए. डाक्टर ने बताया, ‘‘दीपक को होश नहीं आया, हमारी दी हुई दवाइयां असर नहीं कर रही हैं, शायद मुंबई से आई दवाइयां असर कर जाएं. दवाइयां रात तक ही आएंगी, तभी कुछ कर सकते हैं.’’ डाक्टर के ऐसा कहते ही अवनि दीपक के पास बैठ गई. एक घंटे बाद नीरज ने अवनि से कहा, ‘‘यहां बैठने से कोई फायदा नहीं. होटल चलते हैं. कुछ खा कर आराम करो. रात में फिर आएंगे.’’ फिर दोनों होटल चल गए.

रात को 8 बजे दोनों फिर अस्पताल पहुंचे और सीधे डाक्टर के पास गए और दवाइयों के बारे में पूछताछ की. डाक्टर ने बताया, ‘‘दवाइयां शहर में आ चुकी हैं. लगभग एक घंटे में एयरपोर्ट से अस्पताल पहुंच जाएंगी.’’

दोनों दवाइयों के इंतजार में बैठ गए. अवनि को यह एक घंटा बहुत ज्यादा लगने लगा. जैसे ही दवाइयां डाक्टर के पास पहुंचीं, उन्होंने उसी नर्स को बुलाया जिस पर दीपक की देखरेख का जिम्मा था. उन्होंने नर्स को दवाइयां से संबंधित कुछ समझाया और थोड़ी सावधानी बरतने की सलाह दे कर दवाइयों के साथ उसे दीपक के कमरे में भेजा. डाक्टर ने नीरज और अवनि से कहा, ‘‘आप बाहर बैठिए, हम उस का इलाज शुरू करते हैं, आप चिंता न करें, सब ठीक होगा.’’

करीब 2 घंटे बाद डाक्टर और नर्स दीपक के रूम से बाहर आए तो नीरज और अवनि बाहर ही खड़े थे. डाक्टर ने कहा, ‘‘दवाई दे दी हैं, अगले 8 घंटे में उस का असर दिखना शुरू हो जाएगा, नहीं तो…’’ यह कह कर डाक्टर चले गए. अवनि को तो यह सुनते ही चक्कर आने लगे, दोनों वहीं बैठ गए सुबह के इंतजार में. बीचबीच में डाक्टर आते और दीपक को चैक कर के चले जाते. नीरज बच्ची को ले कर होटल चले गए, पर अवनि वहीं बैठी रही.

सुबह करीब 7 बजे दीपक को देखने डाक्टर आए और करीब आधे घंटे बाद बाहर आ कर अवनि से बोले, ‘‘दवाइयों ने थोड़ा असर करना शुरू कर दिया है, अभी हालत ठीक हैं, पर पूरी तरह से नहीं कहा सकता कि कितने दिन और लगेंगे. आप लोग चाहें तो वापस जा सकते हैं. उस की हालत खतरे से बाहर है. और हां, आप उस के पास कुछ देर बैठ सकते हैं.’’ अवनि अंदर गई तो देखा वही नर्स दीपक को औक्सीजन मास्क, इंजैक्शन लगा रही थी. उस की आंखों से लगता था कि वह भी रातभर नहीं सोई. अवनि के पूछने पर उस ने भी ‘हां’ ही कहा.

फिर अवनि और नर्स आपस में धीरेधीरे बातें करने लगीं. अवनि ने नर्स से कहा, ‘‘तुम जा कर थोड़ा आराम कर लो, मैं यहीं बैठती हूं.’’ नर्स ने एकदम से कहा, ‘‘नहीं, मैं इन्हें ऐसी हालत में छोड़ कर नहीं जाऊंगी.’’ फिर थोड़ा रुक कर बोली, ‘‘मतलब, नहीं जा सकती, यह मेरी ड्यूटी है.’’

अवनि ने आश्चर्य से नर्स को देखा तो वह फिर अपने काम में लग गई. थोड़ी ही देर में नीरज, सुहानी को बाहर छोड़ कर अंदर आए तो अवनि ने डाक्टर द्वारा कही गई बात नीरज को बता दी तो वे मुसकराकर बोले, ‘‘अब दीपक जल्दी ही ठीक हो जाएगा.’’

दोपहर को डाक्टर आए. दीपक को चैक करने के बाद बोले, ‘‘रात तक होश आ जाएगा.’’ वे इतना कह कर चले गए. अवनि आज खुश थी. रात 8 बजे दोनों फिर अस्पताल गए. नर्स अभी भी वहीं थी. अवनि ने पूछा तो वह बोली, ‘‘मैं घर नहीं जाऊंगी, जब तक ये होश में नहीं आ जाते.’’ अवनि सोचने लगी, ऐसी नर्स तो पहली बार देखी जो मरीज की सेवा करने के कारण घर न जाए. उस ने नर्स को देखा तो नर्स ने सिर नीचे कर लिया.

अवनि कुछ पूछने ही वाली थी कि दीपक के कराहने की आवाज आई और उस के हाथों की उंगलियां हिलने लगीं. नर्स भागते हुए डाक्टर को बुलाने गई और अवनि ने दीपक का हाथ पकड़ लिया. डाक्टर आए, उन्होंने अवनि और नीरज को बाहर जाने को कहा और दीपक को चैक करने लगे. थोड़ी देर बाद नर्स बाहर आई और बोली, ‘‘आप लोग अंदर आ सकते हैं.’’ अंदर आ कर देखा तो दीपक की आंखें खुली थीं और वह सब को देख रहा था. उस ने अवनि को देख कर हाथ उठाने की कोशिश की पर वह फिर धीरे से हाथ नीचे करता हुआ फिर बेहोश हो गया.

डाक्टर सब को बाहर लाए और बोले, ‘‘अब दीपक जल्दी ठीक हो जाएगा, सुबह तक उसे पूरी तरह होश आ जाएगा.’’ अवनि और नीरज फिर होटल आ गए.

सुबह 8 बजे दोनों अस्पताल पहुंचे. अंदर जाने से पहले नीरज ने अवनि से कहा, ‘‘देखो, दीपक को होश आने के बाद उस से ज्यादा बात नहीं करना और न ही पूछताछ, गुस्सा तो बिलकुल नहीं. उस के पूरी तरह ठीक होने के बाद फिर तुम जानो और वो, मैं फिर बीच में नहीं बोलूंगा.’’

अवनि ने ‘‘हां’’ कहा और दोनों मुसकराते हुए रूम में गए तो देखा दीपक को होश आ चुका था. नर्स ने कहा, ‘‘ये अभी बोलने की स्थिति में नहीं हैं और डाक्टर भी चैक कर के जा चुके हैं.’’ अवनि वहीं बैठ गई. उस ने नर्स को देखा, वह खुश थी, उस के चेहरे पर थकान का नामोनिशान नहीं था.

अवनि ने नर्स से कहा, ‘‘अब तो आप घर जा सकती हो, अब तो इन्हें होश भी आ गया.’’ अवनि ने ‘इन्हें’ शब्द पर जोर दे कर कहा तो नर्स भी मुसकरा कर बोली, ‘‘हां, बस, आप एक घंटे बाद इन्हें ये 2 गोलियां और फिर एक घंटे बाद यह सीरप दे दीजिएगा और प्लीज, इन से ज्यादा बात नहीं करना. इन्हें तकलीफ होगी. गोली और सीरप लेने के बाद इन्हें नींद आ जाएगी. तब तक मैं भी जाऊंगी,’’ कहती हुई नर्स चली गई.

अवनि दीपक को देखने लगी. दीपक कुछ कहना चाह रहा था, उस के होंठ हिले तो अवनि ने उसे इशारे से चुप रहने को कहा. समय पर अवनि ने उसे दवा दी और फिर वह सो गया. शाम होने से पहले नर्स भी आ गई. उस ने आते ही दीपक को चैक किया, फिर रिपोर्ट लिखी. डाक्टर ने भी चैक किया. करीब 2 हफ्ते तक अवनि ने दीपक की खूब सेवा की और समय पर उसे दवाइयां व खाना देती रही. जल्दी ही दीपक थोड़ा ठीक हुआ और कुछकुछ बोलने की स्थिति में भी आ गया. अवनि और नीरज को उस ने अपनी इस स्थिति के बारे में अभी भी कुछ नहीं बताया और न ही अवनि ने कुछ पूछा. बस, साधारण बातें ही कीं.

रात को नीरज ने अवनि से कहा, ‘‘अब दीपक ठीक हो रहा है. कुछ दिनों में पूरी तरह ठीक हो जाएगा. अब हमें वापस घर चलना चाहिए. सुहानी के स्कूल से भी फोन आया था. उस के एग्जाम शुरू होने वाले हैं. एग्जाम के बाद हम फिर आ जाएंगे. बीचबीच में उस से फोन पर बात करते रहना.’’ अवनि का जाने का मन तो नहीं था पर बच्ची के एग्जाम के कारण उस ने हां कह दी. फिर अब दीपक भी अच्छा हो ही रहा था.

अगले दिन नीरज डाक्टर के पास गए. उन्हें अपने जाने के बारे में बता कर फिर कुछ रुपयों का चैक दिया और दीपक के रूम में गए. अवनि और नीरज ने दीपक से कहा, ‘‘अपना ध्यान रखना, बच्ची की परीक्षा नहीं होती तो हम नहीं जाते.’’ दीपक ने बच्ची को देखने की इच्छा जाहिर की तो बोले, ‘‘बाहर खेल रही है, उसे अंदर नहीं लाते और वैसे भी यहां छोटे बच्चों का आना मना है.’’ फिर दोनों ने दीपक से ‘अपना ध्यान रखना’ कहते हुए विदा ली और अवनि ने नर्स की ओर देख कर कहा, ‘‘इन का अच्छे से ध्यान रखोगी, यह हमें पूरा विश्वास है. इन्हें अकेला मत छोड़ना कभी.’’ नर्स ने शरमाते हुए हां में सिर हिला दिया.

करीब 20 दिन तक सुहानी के एग्जाम चले, फिर रिजल्ट के कुछ दिनों बाद उस की धमाचौकड़ी, फिर स्कूल रीओपन, उस की ड्रैस, किताबें आदि की खरीदारी, पढ़ाई, इस सब के कारण होने वाली थकान के बावजूद भी अवनि 2-3 दिन में दीपक से बात कर लेती थी. इस सब में वक्त कैसे गुजर गया, पता ही नहीं चला.

‘‘मम्मी, मम्मी उठो, कोई अंकलआंटी आए हैं, बाहर आप का इंतजार कर रहे हैं. उठो, उठो,’’ अवनि का हाथ जोरजोर से हिलाते हुए सुहानी ने उसे उठा दिया. ‘‘कौन आया है, क्यों चिल्ला रही हो… अच्छा जाओ, तुम खेलो. मैं देखती हूं,’’ कहती हुई वह बाहर आई तो उस के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा. सामने खड़े हुए व्यक्ति को देखते ही हंसते हुए जोर से चिल्लाई, ‘‘दीपक, तुम यहां? कैसे हो? कब आए? बताया भी नहीं? फोन तो करते?’’ अपने वही पुराने अंदाज में सवालों की बौछार करते हुए उस की आंखों से आंसू निकल आए. फिर थोड़ा संभल कर बोली, ‘‘ये कौन है? अच्छा, ये तो…’’

‘‘दीपक की ज्योति है,’’ यह आवाज सुन कर वह चौंकी और दरवाजे की तरफ देखा तो वहां नीरज खड़े थे. उन्होंने कहा, ‘‘जी हां, यह है दीपक की ज्योति, वही… हौस्पिटल वाली नर्स. इन का चक्कर कई महीनों से चल रहा था, पर हमें कुछ बताया नहीं. इस शहर में आ गए, फिर भी खबर नहीं दी. वह तो मुझे बसस्टैंड पर टैक्सी में बैठते हुए दिख गए.’’

‘‘फिर आप ने मुझे फोन क्यों नहीं किया,’’ अवनि ने पूछा.

‘‘इन्होंने मना कर दिया, पूछो इन से,’’ नीरज बोले, ‘‘अरे भाई, कुछ बोलते क्यों नहीं, चुप क्यों खड़े हो, बोलो.’’

‘‘क्या बोलूं, कैसे बोलूं, मुझे बोलने का मौका तो दो, तुम दोनों ही बोले जा रहे हो,’’ दीपक ने कहा तो दोनों ने हंसते हुए कहा, ‘‘सौरी, बैठो और बताओ.’’

‘‘मैं तुम दोनों को सरप्राइज देना चाहता था,’’ फिर अवनि की तरफ देख कर बोला, ‘‘मुझे अचानक सामने देख कर तुम्हारी खुशी और अपने प्रति प्यार को देखना चाहता था… और मैं ने देख भी लिया कि तुम मुझे कितना प्यार करती हो. मैं बहुत खुश हूं कि तुम मेरी दोस्त हो और नीरज भी,’’ दीपक ने कहा, ‘‘मुझे ज्योति और डाक्टर ने सब बता दिया. तुम लोगों ने मेरे लिए क्याक्या किया और कितनी परेशानी उठाई. मैं तुम लोगों का हमेशा एहसानमंद रहूंगा.’’

‘‘दोस्ती में एहसान शब्द नहीं होता. यह मेरा फर्ज था. तुम ने भी तो मेरे लिए क्याकुछ नहीं किया. यहां तक कि अपनी सेहत खराब होने के बाद भी मेरे साथ रहे. मेरी मदद की और खुद तकलीफ उठाई,’’ अवनि ने कहा.

इस तरह गिलेशिकवे, शिकायतगुस्सा, हंसीमजाक में रात हो गई. ‘‘क्या तुम दोनों ने शादी कर ली?’’ अवनि ने पूछा.

‘‘नहीं, तुम को बिना बताए और बिना बुलाए तो शादी होती ही नहीं,’’ दीपक ने कहा. अवनि ने ज्योति को छेड़ते हुए कहा, ‘‘क्यों ज्योति, ‘इन्हें’ बहुत प्यार करती हो न. इन से शादी करने का इरादा है?’’ ज्योति ने ‘हां’ में सिर हिलाया. अवनि ने फिर कहा,’’ इन्होंने तुम्हारे घर वालों की रजामंदी भी ली होगी.’’ इस बार ज्योति शरमाते हुए ‘हां’ बोल कर वहां से थोड़ा आगे चली गई.

‘‘ज्योति ने भी तुम्हारा खूब ध्यान रखा. बहुत सेवा की है उस ने तुम्हारी. कितने दिनों तक वहीं रही. घर भी नहीं जाती थी. बहुत अच्छी लड़की है. अब तो तुम दोनों की शादी बहुत धूमधाम से करेंगे,’’ अवनि ने कहा तो नीरज ने भी अवनि की बात से सहमति जताई.

2 महीने बाद दीपकज्योति की शादी धूमधाम से हुई. दीपक ने अपना औफिस फिर से जौइन कर लिया और ज्योति ने भी शादी के कुछ दिनों बाद एक अस्पताल में नर्स की नौकरी कर ली. सब का मिलनाजुलना बदस्तूर जारी था और सब जिंदगी आराम से जी रहे थे.

नए मंत्रिमंडल को ले कर जोशखरोश क्यों नहीं ?

देश के नए मंत्रिमंडल की शपथ बोझिल माहौल में हुई है. सरकार के प्रति जो उत्साह और उत्सुकता आम लोगों में आमतौर पर रहते हैं वो इस बार देखने में नहीं आए. 4 जून के नतीजों के बाद से ही देश में एक अजीब किस्म का माहौल है. नए मंत्रिमंडल का गठन इस सन्नाटे को चीरने में नाकाम साबित हो रहा है. ऐसा शायद इसलिए भी है कि इस बार पूरी तरह भाजपा सरकार नहीं है. लिहाजा मुख्यधारा के सवर्णों को लग रहा है कि अब मोदी सरकार मनचाहे और मनमाने फैसले नहीं ले पाएगी. बात सही भी है क्योंकि सरकार पर, उस की नीतियों पर और फैसलों पर सहयोगी सैक्युलर दलों का दबाब रहेगा.

इधर खासतौर पर उत्तर प्रदेश के पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक सहमे हुए हैं कि योगी – मोदी सरकारों का उन के प्रति क्या रवैया अब रहेगा. हालांकि शुरूआती माहौल से ही लोगों को थोड़ा सुकून इस बात को ले कर मिला है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संविधान को माथे से लगाया और शपथ ग्रहण समारोह में जयजय श्रीराम के नारे नहीं लगे और न ही मंदिरों में पूजापाठ हुआ. इस का यह मतलब नहीं कि नरेंद्र मोदी सरकार ने धर्मकर्म से किनारा कर लिया है बल्कि मतलब यह है कि होगा वही जो जनादेश के जरिए जनता ने चाहा है. यह चाहत भाजपा के हिंदूवादी एजेंडे पर लगाम कसने की थी.

नए मंत्रियों को नरेंद्र मोदी ने विनम्र रहने की सलाह दी है. अपेक्षा उन्होंने यह भी की है कि मंत्री ईमानदारी से काम करें और अपने कामकाज में ट्रांसपेरेंसी रखें. इस बार मंत्रिमंडल का साइज पिछली बार से थोड़ा छोटा है जिस में 71 सदस्य हैं. 30 केबिनेट मंत्रियों में से 21 पहले भी मंत्री रह चुके हैं. केबिनेट के 25 मंत्री भाजपा के और 5 सहयोगी दलों के हैं. 5 स्वतंत्र प्रभार और 36 राज्य मंत्रियों में से 6 सहयोगी दलों के हैं. यानी 9 सहयोगी दलों से कुल 11 को मंत्री बनाया गया है. यह हिस्सेदारी 16 फीसदी के लगभग होती है. मंत्रिमंडल में भाजपा की भागीदारी 84.6 फीसदी है जबकि टीडीपी और जद यू दोनों की 2.8 – 2.8 फीसदी है. बाकी सब चिल्लर पार्टियों के हैं. भाजपा के 7 सीनयर चेहरे लोगों की जानेमाने हैं. ये हैं राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, शिवराज सिंह चौहान, जेपी नड्डा, निर्मला सीतारामन और एस जयशंकर.

इन और ऐसे कई आंकड़ों के तात्कालिक हों न हों दीर्घकालिक माने जरुर हैं जो यह तो बताते हैं कि मोदी सरकार में दबदबा हाल फिलहाल भाजपा का ही है लेकिन इस के बाद भी उस पर नियंत्रण सहयोगी दलों का है. केबिनेट में शामिल बिहार से लिए गए जीतनराम मांझी और चिराग पासवान जैसों को तो लोग जानते हैं लेकिन एचडी कुमार स्वामी अहम नाम होते हुए भी उत्तर भारतीयों के लिए बहुत जानामाना नहीं है. टीडीपी के राम मोहन नायडू तो बिलकुल अजनबी से हैं. ऐसे कोई 50 मंत्रियों के नाम और काम से लोग ज्यादा वाकिफ नहीं हैं.

महिला मंत्रियों की संख्या 7 है जो पिछली बार से 3 कम हैं. मंत्रीमंडल में 21 सवर्ण, 27 ओबीसी, 10 दलित, 5 आदिवासी और 5 मंत्री अल्पसंख्यक समुदाय के हैं. लेकिन इन में से मुसलमान एक भी नहीं है. शपथ ग्रहण समारोह में आकर्षण का प्रमुख केंद्र थे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, जिन का चेहरा उतरा हुआ था और वे नरेंद्र मोदी और दूसरे भाजपा नेताओं की तरह चेहरे पर आए विषाद और अवसाद को छिपाते जबरन खुश दिखने की कोशिश भी नहीं कर रहे थे. क्योंकि इस में कामयाबी किसी को नहीं मिल रही थी. भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में से एक शिवराज सिंह चौहान ही जोशखरोश में दिखे नहीं तो सिरे से सभी भाजपाइयों के चेहरे बुझे हुए थे.

इस में कोई शक नहीं कि 4 जून के नतीजों से भगवा गैंग सकते में है और जनादेश को हजम करने में उसे खासी मशक्कत करनी पड़ रही है. यही मशक्कत शपथ के दौरान भी झलकी थी. एक दूसरी वजह उस पर सवर्णों और पूजापाठियों का भी बढ़ता दबाब है जो न केवल सोशल मीडिया पर बल्कि सोसायटी में भी अनर्गल प्रचार और हिंदूमुसलिम करने की लत नहीं छोड़ पा रहे हैं. इस तबके के नए शिगूफे ये हैं कि जिस ने साथ नहीं दिया उस का विकास सरकार को नहीं करना चाहिए, यानी दलित, आदिवासियों और मुसलमानों के भले के काम नहीं करना चाहिए.

अब यह और बात है कि शायद ही ये लोग बता पाएं कि सरकार ने इन वर्गों के लिए वाकई कुछ किया होता तो वे इतनी बेरहमी से खारिज ही क्यों करते. बात जहां तक सरकारी योजनाओं के जरिये मुफ्त का राशन, मकान और सिलेंडर वगैरह देने की है तो इन की जमीनी हकीकत वैसी है नहीं जैसी कि ये लोग गाते बताते रहते हैं. और यह सब अगर वोट के एवज में किया और दिया गया था तो इन तबकों ने अपनी गैरत को तबज्जो दी है. और यही स्वाभिमान लोकतंत्र का मूल भाव है.

मुमकिन है ये सनातनी लोग कुछ दिन और हल्ला मचा कर खामोश हो जाएं लेकिन सरकार के भाजपाई हिस्से से यह उम्मीद अब हर कोई कर रहा है कि वह बीती ताहि बिसार कर आगे की सुध ले. क्योंकि मोदी सरकार इस बार चुनौतियों के ढेर पर खड़ी है जी राजनीतिक भी हैं और सामाजिक भी हैं. इस के लिए जरुरी है कि नए मंत्री धर्म, जाति और वर्ग भूल कर सभी के लिए काम करें नहीं तो सैक्युलर वैशाखियां सरकार को बख्शेंगी नहीं.

9 जून को देश के लोगों ने टीवी पर ढाई घंटे तक चला शपथ ग्रहण समारोह कम भारत पाकिस्तान मैच ज्यादा देखा तो इस से उन की उदासीनता और नाउम्मीदी ही प्रदर्शित होती है.

धर्मराज में पिछड़ों, दलितों और मुसलमानों का कोई स्थान नहीं है

लोकसभा चुनाव 2024 के जनादेश ने संघ और भाजपा के हिंदू राष्ट्र के सपने को तोड़ दिया है. जनता ने साफ़ कर दिया है कि उस को विकास चाहिए, पहले अपना फिर देश का. भाजपा के रामराज, हिंदू-राज जैसे नारों का एक बहुत बड़े तबके पर कोई असर नहीं हुआ, बल्कि इस तरह के नारों ने उसे सजग जरूर कर दिया कि उसे हजार साल आगे की तरफ देखना है, न कि पांच हजार साल पीछे जाना है, जैसा कि संघ और भाजपा की नीयत है. संघ और भाजपा का हिंदू राष्ट्र बनाने का एक ही मकसद है- मनुस्मृति की वर्णव्यवस्था को लागू करना, जिस में महिलाओं, आदिवासियों और दलितों-पिछड़ों को फिर से ब्राह्मण जाति के हुक्म का गुलाम बनाया जाए. उन की सेवाएं ली जाएं और उन से वो सारे अधिकार छीन लिए जाएं जो बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर द्वारा रचित संविधान के जरिए भारत में रहने वालों को दिए गए हैं. जनता समझ गई कि अगर भाजपा के पास बहुमत आया तो अगले 5 वर्षों में संविधान को पूरी तरह समाप्त कर देश में तानाशाही कायम कर दी जाएगी. इस अंदेशे को कई राजनीतिक पार्टियों ने भी चुनावप्रचार के दौरान जाहिर किया.

अकेले-दम केंद्र की सत्ता पर काबिज होने के लिए भाजपा को 272 सीटों की जरूरत थी, मगर उस की मंशा से नाराज जनता ने उसे 240 पर ही रोक दिया. एनडीए गठबंधन को मिला कर भी 300 सीटों का आंकड़ा नहीं छू पाए. ऐसे में सपना तो टूटा ही, पैरों के नीचे से सत्ता खिसकने का ख़तरा भी पैदा हो गया. सत्ता में बने रहने के लिए भाजपा को आखिरकार गठबंधन के उन दलों की मानमनौवल करनी पड़ी जो दलितों, मुसलमानों और पिछड़ों की राजनीति करते आए हैं. जनता दल यूनाइटेड और तेलुगूदेशम पार्टी सरीखे दलों की बैसाखियों के सहारे आख़िरकार एनडीए गठबंधन सरकार बनाने का दावा पेश कर पाया और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने लायक हो सके.

दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों के दम पर देश के बड़े नेता बनने वाले जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, टीडीपी के चंद्रबाबू नायडू और लोक जनशक्ति पार्टी के चिराग पासवान जैसे लोगों, जो मोदी को सत्ता पर आसीन करने के लिए बड़े सहयोगी के तौर पर उभरे हैं, को याद रखना चाहिए कि भाजपा और संघ के धर्मराज में कभी भी दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों के लिए सम्मानजनक स्थान न रहा है और न कभी होगा, बल्कि संविधान ने जो अधिकार उन्हें दिए हैं उन्हें भी छीन लेने के प्रयास भाजपा और संघ तबतब करेंगे जबजब वे ताकतवर होंगे. यह नहीं भूलना चाहिए कि संघ और भाजपा ने दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों का सिर्फ इस्तेमाल किया, उन्हें अधिकार देने या अपने बराबर बिठाने की नीयत उन की न कभी रही और न कभी वे ऐसा करेंगे.

2014 की जीत के बाद आत्मविश्वास से लबरेज संघ प्रमुख मोहन भागवत ने साफ़ संकेत दे दिया था कि भारत अब मनुस्मृति के नियमों को स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ेगा. वर्णाश्रम धर्म की प्रशंसा करने वाले एक श्लोक का पाठ कर के भागवत ने बाकायदा यह भी स्थापित किया था कि इस दिशा में वे किस तरह बढ़ेंगे. 5 साल राम मंदिर, गोहत्या, मुसलमानों की लिंचिंग जैसे कृत्यों से हिंदूमुसलिम के दिलों में नफरत भरते और समाज का ध्रुवीकरण करते 2019 के लोकसभा चुनाव में फिर भाजपा ने प्रचंड जीत हासिल कर ली. इस के बाद, भाजपा और संघ परिवार संवैधानिक संस्थाओं पर हमला करने और उन्हें कमजोर करने के लिए किस गति और चालाकी से आगे बढ़े, यह भूलना नहीं चाहिए. विपक्ष को समाप्त करने के लिए उस ने कैसे राष्ट्रीय जांच एजेंसियों का बेजा इस्तेमाल कर के तमाम विपक्षी नेताओं को जेल में बंद किया, उन पर छापे मारे, उन को नजरबंद कर के रखा, उन बातों को हरगिज भूलना नहीं चाहिए. सीएए और एनआरसी का डर बना कर कैसे मुसलमानों को डराया गया, अपने खिलाफ उठने वाली आवाजों को बंद करने के लिए कैसे मीडिया संस्थानों पर कब्जा किया गया, यह भी भूलना नहीं चाहिए. बड़ेबड़े उद्योगपतियों के हाथों पूरे देश को कैसे गिरवी रख दिया गया, किसानों-मजदूरों की आवाज दबाने के लिए कैसे उन को गाड़ियों के नीचे रौंदा गया, यह भी नहीं भूलना चाहिए. शाहीन बाग़, किसान आंदोलन, योगी के बुलडोजर से ले कर चुनावी रिजल्ट आने के बाद चंडीगढ़ के एयरपोर्ट पर भाजपा के टिकट पर नईनई सांसद बनी कंगना रानावत के गाल पर पड़ा सीआईएसएफ की कौन्स्टेबल का झन्नाटेदार थप्पड़, भाजपा सरकार का किसानों-मजदूरों पर ढाए गए अत्याचार से उपजे गुस्से का प्रतीक था, जिसे भाजपा और संघ को याद रखना चाहिए.

आज अगर केंद्र की मोदी सरकार पिछड़ों, दलितों और मुसलमानों की राजनीति करने वाले दलों के सहारे एक बार फिर चल पड़ी है तो इन दलों को उस के कान उमेठ कर रखने की जरूरत है. वहीं अब देश के पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों और महिलाओं को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि खुद को सवर्ण जाति का कहने वाले ब्रह्मणों ने कभी अपनी लड़ाई स्वयं नहीं लड़ी. उन्होंने अपनी लड़ाइयों में पिछड़ों और दलितों को झोंका. वह कभी हारा नहीं, उस को कभी जानमाल का नुकसान नहीं उठाना पड़ा क्योंकि उस की लड़ाई तो हमेशा दलित और पिछड़े लड़ते रहे. ब्राह्मणों ने कभी मेहनतमशक्कत वाले काम नहीं किए. उस के बालक कभी कंधे पर बंदूक ले कर देश की रक्षा करने के लिए सीमा पर नहीं गए. अपनी सत्ता को सुरक्षित रखने की मंशा से 90 फ़ीसदी दलित और बैकवर्ड को इन्होंने सदियों तक अनपढ़ बना कर रखा. इसलिए इन की साजिश कामयाब होती रही. अज्ञानी लोग इन की कही बातों को धर्म मान कर उन के अनुसार चलते रहे. बैकवर्ड क्लास कभी यह समझ ही नहीं पाया कि ब्राह्मण का सब से बड़ा व्यवसाय तो मंदिर है. धर्म की आड़ में यह उस का पुरातन धंधा है. ऐसा धंधा जिस में बिना किसी मेहनत के, बिना कमाए उस का घर फल, फूल, मिष्ठान, अनाज, सोने, चांदी और रुपयों से भरा रहता है. ऐसी परंपरा को भला वे क्यों छोड़ेंगे? वे तो चाहेंगे कि यह परंपरा निर्बाध गति से चलती रहे. इसीलिए धर्म को धंधा बना कर पूरे देश को मंदिर में तबदील करने की साजिश में लगे है. धार्मिक पर्यटन को बढ़ा रहे हैं ताकि लोग श्रद्धा, पूजापाठ, भविष्य और स्वर्गनरक के डर से मंदिरों में धरी उन की तिजोरियां भरते रहें. इन्होंने दलितों और पिछड़ों से दरियां बिछवाईं, कावंड़ उठवाए, साफ़सफाई के काम करवाए मगर कभी किसी मंदिर का पुजारी नियुक्त नहीं किया. क्यों? क्योंकि पुजारी के हाथ में तो गल्ला होता है. गल्ला किसी बैकवर्ड को कैसे थमा दें?

भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में जहां हर जाति, धर्म, संप्रदाय, भाषाभाषी को जीने के समान अधिकार संविधान ने दिया है, किसी एक जाति (ब्राह्मण) की गुलामी करने की जरूरत किसी को नहीं है. हर व्यक्ति को शिक्षित होने, रोजगार पाने, स्वास्थ्य सेवाएं पाने का पूरा हक है. इस के लिए उस सरकार पर दबाव बनाए रखना है जिसे हम ने चुन कर अपनी सेवा के लिए संसद में भेजा है. वह किसी एक धर्म-जाति के एजेंडे को ले कर न चलने लगे, इस पर नजर रखनी है. दलित, पिछड़ा, मुसलमान और स्त्रियां अब काफी संख्या में शिक्षित हैं, इस पढ़ेलिखे तबके को अब यह भी समझ में आ चुका है कि उन्हें सवर्ण जातियों ने किसकिस तरह से ठगा और प्रताड़ित किया है. उन्होंने भाजपा और संघ द्वारा पैदा किए गए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का नतीजा देखा. उन्होंने देखा कि इस से सब से ज्यादा प्रतिकूल असर उन लोगों पर पड़ा जिन्हें सदियों तक सभी अधिकारों से वंचित रखा गया. जो सदियों तक समानता का कोई दावा नहीं कर सके. संघ और भाजपा ने सत्ता का लालच दे कर दलित, पिछड़ी जातियों, मुसलमानों और आदिवासी नेतृत्व को अपने जाल में इस तरह फंसा लिया कि दलित प्रतिनिधि दलितों के बारे में बोलना ही भूल गए. नौकरशाही और सत्ता में बैठे लोग दलितों और पिछड़ों की आवाज दबाने में लग गए. संघ का एजेंडा था कि या तो उन्हें साथ ले कर चलो, लेकिन अगर वे साथ न आएं तो उन पर झूठे मुकदमे लगाओ, उन्हें जेल भेज दो या ख़त्म कर दो.

बीते 2 दशकों में और एनडीए सरकार में मुसलमानों, दलितों और आदिवासियों के तीव्रता से होते दमन देखे गए. हिंसा और भय के तांडव के बीच लंबे समय से चले आ रहे दलित आंदोलन भी अपनी स्वाभाविक ऊर्जा खो कर भ्रमित हो गए. कई बार तो उन्हें यह भी नहीं पता चलता कि वे किस के साथ खड़े हैं. वे दोस्त और दुश्मन में फर्क नहीं कर पा रहे थे. दलित नेता कांशीराम और रामविलास पासवान को गए अरसा हो गया. मायावती, उदित राज, जीतनराम मांझी जैसे कई दलित नेताओं का कैरियर अब अंतिम पड़ाव पर है. यही हाल मुसलिम नेतृत्व का भी है. अधिकांश मुसलिम नेता या तो ख़त्म हो चुके हैं या जेल में हैं. पिछड़ों के दम पर अपनी राजनीति चमकाने वाले अनेक नेता देश में होने के बावजूद संघ और भाजपा द्वारा सत्ता में हिस्सेदारी देने के लालच में फंसे हुए बेजबान हो गए थे. जनता त्राहित्राहि कर रही थी, और मोदी की सत्ता बड़े उद्योगपतियों की तिजोरियां भरने में जुटी थी.

लेकिन अति का अंत अवश्य होता है. प्रकृति संतुलन बनाना जानती है. कृत्रिमता, साजिश और लालच कितनी भी शक्ति लगा ले, प्रकृति की एक करवट उसे संतुलित कर देती है. यही हुआ है 2024 के लोकसभा चुनाव में भी. लोकतंत्र शासन के प्राकृतिक सिद्धांत पर ही आधारित है. संतुलन और सब की भागीदारी ही देश को असली विकास और गति देगी.

अब जबकि एक बार फिर देश की राजनीति संतुलित सी नज़र आती है, देश के पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों, मुसलमानों और महिलाओं को संघ और भाजपा के एजेंडे से मुक्त होने के लिए स्वयं सशक्त होने के मजबूत प्रयास करने होंगे, जिस की पहली सीढ़ी है शिक्षा और रोजगार. शिक्षा दृष्टि देती है और नौकरी आर्थिक मजबूती. ये दोनों चीजें आज महिलाओं के लिए सब से ज्यादा आवश्यक हैं, फिर चाहे वे पिछड़ी जाति से हों, दलित हों, आदिवासी हों या मुसलमान हों क्योंकि भाजपा और संघ अपने धर्म के एजेंडे को महिलाओं के जरिए ही बढ़ाते हैं. धर्म की सारी नसीहतें सर्वप्रथम उन्हीं पर थोपी जाती हैं और उन पर दबाव बनाया जाता है कि वे उन के बनाए टाइमटेबल के हिसाब से अपनी और अपने परिवार व बच्चों की जिंदगी चलाएं. जिन महिलाओं के पास अपनी समझ नहीं हैं, जो अनपढ़ या कम पढ़ीलिखी हैं और जो आर्थिक रूप से पुरुषों पर निर्भर हैं वे बड़ी आसानी से संघ और भाजपा के खेल का आसान मोहरा बन जाती हैं. दानपुण्य के नाम पर अपने परिवार की गाढ़ी कमाई, जो उन के बच्चों की अच्छी शिक्षा और अच्छे भविष्य के लिए उपयोगी हो सकती है, को रोजाना मंदिरों के पंडों को चढ़ा आती हैं, घर पर आ कर कथा कहने वालों पर लुटाती हैं, दान के नाम पर खर्च कर देती हैं, त्योहारों और व्रतों के नाम पर वह पैसा निकल जाता है, तीर्थस्थानों के दर्शनों और पुण्य के लालच में उन की कमाई का बड़ा हिस्सा खर्च हो जाता है, मगर कभी सोचा है कि तिजोरी किस की भरती है? इसलिए महिलाओं को धर्म के ठेकेदारों के चंगुल से निकलना होगा.

दलितों को भी अब हीन भावना और डर का त्याग कर अपना मजबूत नेतृत्व इस देश में खड़ा करना होगा. 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति का एक नया चेहरा चंद्रशेखर आजाद के रूप में सामने आया है. नगीना से धमाकेदार जीत दर्ज करा के चंद्रशेखर खासी चर्चा में हैं. कांशीराम और मायावती की दलित सियासत, जो बिखराव की कगार पर पहुंच चुकी है, को संभालने के लिए चंद्रशेखर एक नया चमकदार और दमदार नेता के रूप में उभरे हैं.
गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव के बाद मायावती की बहुजन समाज पार्टी अपने अब तक के सब से ख़राब दौर में पहुंच गई है. उस के दलित वोट पूरी तरह अन्य दलों के बीच बंट गए हैं. दिशाहीन दलित को चंद्रशेखर के रूप में एक नेतृत्व मिला है. उन की आक्रामक शैली जहां भाजपा को डराती है वहीं दलित युवाओं में जोश और ताकत भरती है. सदियों से दबेकुचले रहने वाले दलित समाज को सिर उठा कर जीने के लिए ऐसे ही नेतृत्व की जरूरत है. पिछड़े समाज को आगे बढ़ाने के लिए आज अनेक नेता 2024 की लोकसभा में हैं. तेजस्वी यादव और अखिलेश यादव जैसे युवा चेहरे बैकवर्ड क्लास को नया जोश देते हैं. मुसलमान भी इस नेतृत्व को स्वीकार करता है. जिस तरह देश की जनता ने भाजपा और संघ की अति से आजिज आ कर उस की नकेल कसी है, अब इन नायकों का दायित्व है, कि अपनी जनता के हित और उन के अधिकारों के लिए संसद के भीतर मोदी सरकार पर मजबूत शिकंजा कस कर रखें.

ये 5 All Time हिन्दी क्लासिक फिल्में जो आप भूलकर भी न करें मिस

कुछ ऐसी क्लासिक फिल्में हैं, जिन्हें कितनी बार भी देख लें, आप बोर नहीं हो सकते हैं. बौलीवुड में कई बेहतरीन मूवीज बनती हैं, लेकिन क्लासिक फिल्मों की बात ही अलग है. कई लोग तो ऐसे होते हैं, जिन्हें मूवीज देखने का काफी शौक होता है, उन लोगों को सिनेमा का कीड़ा भी कहा जाता है. आज के आर्टिकल में हम आपके लिए कुछ क्लासिक मूवीज लेकर आए हैं, जिन्हें आप आज भी एंजौय कर सकते हैं. तो देर किस बात की आइए जानते हैं इन फेमस क्लासिक मूवीज के बारे में.

परिचय (1972)

‘परिचय’ फैंमिली बेस्ड फिल्म है. यह फिल्म साल 1972 में आई. इस फिल्म के मुख्य किरदार में जितेन्द्र, जया बच्चन हैं. एक्टर प्राण भी मुख्य भूमिका में नजर आए थे. गुलजार साहब की लिखी इस फिल्म की कहानी बहुत ही दिलचस्प है. दरअसल इस फिल्म में दिखाया गया है कि राय साहब (प्राण) के पोतेपोतियों को पढ़ाने बेरोजगार रवि यानी जितेन्द्र उनके घर जाता है. इनमें रमा यानी जया बच्चन सबसे बड़ी है. पढ़ाई के दौरान रवि और रमा एकदूसरे को अपना दिल दे बैठते हैं. दोनों की शादी में कई अड़चनें भी आती है, लेकिन इस फिल्म के अंत में दिखाया गया है कि इन दोनों की शादी हो जाती है. आप इस क्लासिक फिल्म को पूरे परिवार के साथ बैठकर देख सकते हैं. इस फिल्म से आप बोर नहीं होंगे.

मिली (1975)

यह फिल्म 1975 में रिलीज हुई थी. इस फिल्म ने खूब तारीफें बटोरी थी. ‘मिली’ एक रोमांटिक कहानी है. इस फिल्म का निर्देशन ऋषिकेश मुखर्जी ने किया है. ‘मिली’ फिल्म में अमिताभ बच्चन, जया बच्चन और अशोक कुमार मुख्य भूमिका में है. इस फिल्म में अमिताभ ने शेखर की भूमिका निभाई है. जिसे अपनी पड़ोस की लड़की मिली (जया बच्चन) से प्यार हो जाता है. मिली कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित है तो दूसरी तरफ शेखर की जिंदगी में घटना घटी होती है, जिससे वह अक्सर उदास रहता है, लेकिन मिली का एंजौयफुल नेचर शेखर का भी दिल जीत लेता है, वह मिली के इस अंदाज का दीवाना हो जाता है. अमिताभ और जया ने इस फिल्म में अमिट छाप छोड़ी है.
इस फिल्म को आप अपनी लिस्ट में  जरूर शामिल करें.

नौकर (1979)

साल 1979 में आई फिल्म ‘नौकर’ परिवार पर आधारित फिल्म है. इस फिल्म में जया बच्चन और संजीव कुमार दमदार किरदार के रूप में नजर आए हैं. यह फिल्म जबरदस्त हिट हुई थी. इस फिल्म में जया बच्चन ने नौकर का किरदार निभाया है. इस भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का तीसरा फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था. आप अपनी क्लासिक फिल्मों की लिस्ट में जया बच्चन की फिल्म ‘नौकर’ जरूर शामिल करें. इस फिल्म की कहानी काफी बेहतरीन है.

आनंद (1971)

यूं तो राजेश खन्ना ने कई सुपरहीट मूवीज दी है, लेकिन ‘आनंद’ ऐसी फिल्म है, जिससे आप कई बार देख सकते हैं. यह एक मोटिवेशनल मूवी है. यह फिल्म जिंदगी का हुनर सिखाती है. कई बार ऐसा होता है कि कुछ लोग जिंदगी में आई मुश्किलों से निराश होते हैं और जीने की इच्छा खत्म हो जाती है. ये मूवीज आपको जिंदगी जीने का बेहतरीन तरीका सिखाएगी. इस मूवी में राजेश खन्ना के किरदार ने जान डाल दी है.

अंदाज अपना अपना (1994)

‘अंदाज अपना अपना’ एक कौमेडी फिल्म है. यह राजकुमार संतोषी द्वारा निर्देशित फिल्म है. हालांकि यह फिल्म उस समय फ्लौप हुई थी, लेकिन इसकी कहानी दर्शकों के दिल छू गई थी. आज भी लोग इस फिल्म को देखना काफी पसंद करते हैं. इसमें सलमान खान, आमिर खान, रवीना टंडन करिश्मा कपूर आदि एक्टर्स मुख्य भूमिकाओं में है. यह क्लासिक फिल्म आपको गुदगुदाने में जरूर कामयााब होगी.

अधकचरी जानकारी और कुबुद्धि के शिकार इन्फ्लुएंसर धीरेंद्र राघव को सबक

आखिर क्या कारण है कि सोशल मीडिया नफरत फैलाने का अड्डा बनता जा रहा है? क्यों सरकार इन लोगों पर लगाम नहीं लगा पा रही? धीरेंद्र राघव जैसे सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को धार्मिक भावनाएं भड़काने की हिम्मत कहां से मिल रही है? और सब से ज्यादा जरूरी बात यह कि इन जैसे इन्फ्लुएंसर्स से युवा छुटकारा कैसे पाएं? ये वे सवाल हैं जिन्हें आज सोशल मीडिया यूज करने वाले हर यूजर को जानने की जरूरत है.

हाल के समय में सोशल मीडिया पर धार्मिक भावनाएं भड़काने वाली रील्स और पोस्ट खूब वायरल होने लगी हैं. मेटा का व्हाट्सऐप इस तरह के कंटैंट फैलाने वाला घोषित प्लेटफौर्म तो था ही, अब इंस्टाग्राम भी उसी राह चलने लगा है. जाहिर है, कुबुद्धि के शिकार जो लोग व्हाट्सऐप पर नफरत फैला रहे हैं उन्होंने रील्स को भी अपना हथियार बनाना शुरू कर दिया है.

इन नफरती इन्फ्लुएंसर्स के लिए सोशल मीडिया सब से सहूलियत भरी जगह बन कर उभरी है. यहां न तो कोई देखरेख है न संपादन करने वाला डेस्क, न ही रोकटोक. कहने को मेटा के अपने कानून तो हैं पर नाम के. इन्फ्लुएंसर्स के मन में जो भी अनापशनाप है, बेझिझक कह देता है चाहे फेक न्यूज के जरिए या गालियों के जरिए.

वायरल होना पड़ गया भारी

ऐसी ही झूठ की दुकान चलाने वाला सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर धीरेंद्र राघव है, जो फिलहाल पुलिस की कस्टडी में है. मामला यों है कि लोकसभा चुनाव 2024 में बीजेपी को बहुमत नहीं मिला और वह 240 पर ही सिमट गई. 400 पार नारा देने वालों के लिए एक तरह से यह नैतिक हार थी, क्योंकि राम मंदिर के नाम पर लड़ने वाले फैजाबाद लोकसभा सीट से चुनाव हार गए जहां अयोध्या पड़ता है.

बीजेपी के समर्थक इस बात से नाराज चल रहे थे और इस हार का ठीकरा वे अयोध्या में रहने वाले हिंदुओं पर फोड़ रहे थे. धीरेंद्र राघव उन इन्फ्लुएंसर्स में से एक था जो सोशल मीडिया पर इस बात को और भी हवा दे रहा था. उस की एक वीडियो इस बीच खूब वायरल होती है जिस में वह जानबूझ कर मुसलिम गेटअप ले कर हिंदुओं को कोसता नजर आता है ताकि लोग उसे मुसलिम ही समझें और ऐसे भ्रम फैलाता है जिस से धार्मिक माहौल बिगड़े और लोग मुसलामानों को गलियां दें.

धीरेंद्र राघव 5 जून को अपलोड किए अपने एक वीडियो में कहता है, “दोगले हिंदुओं बच गए तुम इस बार, हाथ में सरकार आतेआते रामभक्त हिंदुओं ने बचा लिया.” वह आगे कहता है, “इस बार तो बच गए, अगली बार हमारी सरकार आ गई तो समझ लेना क्या होगा.”

करीब 1 मिनट 10 सैकंड वाली इस वीडियो में वह हिंदुओं को काफिर कहते हुए बोलता है कि मोदी ने तुम्हारे लिए मंदिर बनवा दिया, फिर भी तुम ने उसे अयोध्या में हरा दिया. अगर वह मसजिद बनवाता तो हम उसे वोट देते. इस के अलावा, वह मुसलिम आरक्षण की भी बात करता है.

मामले और भी

यह कोई पहला मामला नहीं जब धीरेंद्र राघव ने इस तरह की वीडियो बनाई हो. ऐसी पगलैट हरकतें उस की काफी पहले से चलती आ रही हैं. इस से पहले भी वह मुसलिम वेशभूषा में ढेरों वीडियो बनाता रहा है. कुछ रील में वह पाकिस्तानी आतंकी तक बना हुआ है और उस में भारत विरोधी बातें कह रहा है, ताकि लोगों में भ्रम पैदा हो.

जाहिर है यह नैशनल सिक्योरिटी से जुड़ा मसला है जिस पर मजाक में भी ऐसी रील नहीं बनाई जानी चाहिए. मगर सैयां भए कोतवाल तो डर काहे का. धीरेंद्र का केस आम केस नहीं है, बल्कि यह कोरोना से भी घातक बीमारी का केस है जो सोशल मीडिया में फैल रहा है.

धीरेंद्र ने अपने इंस्टा अकाउंट में तकरीबन 1,000 रील्स डाली हैं. उस की 2-3 साल पुरानी शुरुआती रील्स देखें तो उस में नफरत वाली रील्स न के बराबर हैं. शुरुआती रील्स में तो वह फैमिली से जुड़े कंटैंट बनाता रहा है, जिस में फैमिली के साथ क्वालिटी टाइम वह बिताता दिखाई देता है, लेकिन नफरत ने कैसे उस की पर्सनल लाइफ को बदल दिया, यह धीरेंद्र राघव के मामले से समझा जा सकता है.

खोखला है धीरेंद्र

धीरेंद्र अपनेआप को आर्टिस्ट और सरकारी विभागों में ठेकेदार बता रहा है. यह तो जांच होनी ही चाहिए कि इस तरह के विकृत व्यक्ति को सरकारी ठेके किन कारणों से दिए जा रहे थे और ये ठेके दे कौन रहा था? क्या उसे सरकारी ठेके देने वाला भी खुद इसी तरह विकृत स्वभाव का है?

थाना न्यू आगरा मऊ रोड, खंदारी का रहने वाला धीरेंद्र राघव खुद को सोशल मीडिया एक्टिविस्ट बताता है. अब कोई पूछ सकता है कि किसानमजदूरों के लिए उस ने कौन सा आंदोलन खड़ा कर दिया कि उसे एक्टिविस्ट कहा जाए, छात्रों के एग्जाम में धांधली में उस ने क्या कह दिया जो वह खुद को एक्टिविस्ट कहे, दलितोंपिछड़ों के हकों के लिए उस ने क्या किया? क्या अब नफरत बांटना एक्टिविज्म हो चला है?

धीरेंद्र सिर्फ मुसलमानों के खिलाफ नफरत नहीं फैलाता, बल्कि वह खुद के राजपूत होने का घमंड करता है. अपनी जाति पर घमंड वही कर सकता है जो जातियों के भेद में विश्वास करता हो, जो खुद को ऊपर और दूसरे को नीचा मानता हो. समानता में भरोसा रखने वाला ऊंची जाति का व्यक्ति कभी खुद की जाति से अपनी पहचान बनाने की नहीं सोचेगा, मगर धीरेंद्र को अपनी जाति पर इतना घमंड है कि गाड़ी, बुलेट, मकान पर छोड़ो, उस ने अपने हाथ पर ही राजपूत का टैटू गुदवा रखा है.

धीरेंद्र राघव का इंस्टाग्राम पर वैरीफाइड अकाउंट बना हुआ है. फेमस होने का शौक है, इसलिए ब्लू टिक खरीद लिया है. उस के अकाउंट पर 47 हजार से अधिक फौलोअर्स हैं. ये फौलोअर्स धीरेंद्र की तरह सोच रखते हैं. आज धीरेंद्र राघव अपनी ही नफरती रील के चलते सलाखों के पीछे है, जिस पर वह सोचता रहा होगा कि वह तो एक्टिविज्म वाला काम कर रहा है लेकिन यही वो चीज है जो देश और समाज को खोखला कर रही है, यह बात अब हवालात में रह कर उसे जरूर समझ आ जाएगी.

यह भी सोच लेना चाहिए कि कल तक खुल कर नफरत की दुकान चलाने वाला धीरेंद्र राघव आज एकदो शिकायतों से ही जेल की सलाखों के पीछे पहुंच गया है. यानी, चीजें बदल पड़ी हैं, अब किसी धर्म से नफरत की दुकानदारी से व्यू तो बटोरे जा सकते हैं पर जेल जाने का रिस्क भी उठाना पड़ सकता है. धीरेंद्र से सबक ले कर बाकी इन्फ्लुएंसर्स को सोचना होगा कि यही वो चीज है जिसे अब नहीं करना चाहिए बाकि देश की बुनियाद को तो यही चीज खोखला कर ही रही है.

काश, आप ने ऐसा न किया होता : विजय के लिए क्या था मुश्किल

‘‘भैया, वह आप के साथ इतनी बदतमीजी से बात कर रहा था…क्या आप को बुरा नहीं लगा? आप इतना सब सह कैसे जाते हैं. औकात क्या है उस की? न पढ़ाईलिखाई न हाथ में कोई काम करने का हुनर. मांबाप की बिगड़ी औलाद…और क्या है वह?’’

‘‘तुम मानते हो न कि वह कुछ नहीं है.’’

भैया के प्रश्न पर चुप हो गया मैं. भैया उस की गाड़ी के नीचे आतेआते बड़ी मुश्किल से बचे थे. क्षमा मांगना तो दूर की बात बाहर निकल कर इतनी बकवास कर गया था. न उस ने भैया की उम्र का खयाल किया था और न ही यह सोचा था कि उस की वजह से भैया को कोई चोट आ जाती.

‘‘ऐसा इनसान जो किसी लायक ही नहीं है वह जो पहले से ही बेचारा है. अपने परिवार के अनुचित लाड़प्यार का मारा, ओछे और गंदे संस्कारों का मारा, जिस का भविष्य अंधे कुएं के सिवा कुछ नहीं, उस बदनसीब पर मैं क्यों अपना गुस्सा अपनी कीमती ऊर्जा जाया करूं? अपने व्यवहार से उस ने अपने चरित्र का ही प्रदर्शन किया है, जाने दो न उसे.’’

अपनी किताबें संभालतेसंभालते सहसा रुक गए भैया, ‘‘लगता है ऐनक टूट गई है. आज इसे भी ठीक कराना पड़ेगा.’’

‘‘चलो, अच्छा हुआ, सस्ते में छूट गया मैं,’’ सोम भैया बोले, ‘‘मेरी ही टांग टूट जाती तो 3 हफ्ते बिस्तर पर लेटना पड़ता. मुझ पर आई मुसीबत मेरी ऐनक ने अपने सिर पर ले ली.’’

‘‘मैं जा कर उस के पिता से बात करूंगा.’’

‘‘कोई जरूरत नहीं किसी से कुछ भी बात करने की. बौबी की जो चाल है वही उस की सब से बड़ी सजा बन जाने वाली है. जो लोग जीवन में बहुत तेज चलना चाहते हैं वे हर जगह जल्दी ही पहुंचते हैं…उस पार भी.’’

कैसे विचित्र हैं सोम भैया. जबजब इन से मिलता हूं, लगता है किसी नए ही इनसान से मिल रहा हूं. सोचने का कोई और तरीका भी हो सकता है यह सोच मैं हैरान हो जाता हूं.

‘‘अपना मानसम्मान क्या कोई माने नहीं रखता, भैया?’’

‘‘रखता है, क्यों नहीं रखता लेकिन सोचना यह है कि अपने मानसम्मान को हम इतना सस्ता भी क्यों मान लें कि वह हर आम आदमी के पैर की जूती के नीचे आने लगे. मैं उस की गाड़ी के नीचे आ जाता, आया तो नहीं न. जो नहीं हुआ उस का उपकार मान क्या हम प्रकृति का धन्यवाद न करें?’’

‘‘बौबी की बदतमीजी क्या इतनी बलवान है कि हमारा स्वाभिमान उस के सामने चूरचूर हो जाए. हमारा स्वाभिमान बहुत अमूल्य है जिसे हम बस कभीकभी ही आढ़े लाएं तो उस का मूल्य है. जराजरा सी बात को अपने स्वाभिमान की बलि मानना शुरू कर देंगे तो जी चुके हम. स्वाभिमान हमारी ताकत होना चाहिए न कि हमारी कमजोर नस, जिस पर हर कोई आताजाता अपना हाथ धरता फिरे.’’

अजीब लगता है मुझे कभीकभी भैया का व्यवहार, उन का चरित्र. भैया बंगलौर में रहते हैं. एक बड़ी कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत हैं. मैं एम.बी.ए. कर रहा हूं और मेरी परीक्षाएं चल रही हैं. सो मुझे पढ़ाने को चले आए हैं.

‘‘इनसान अगर दुखी होता है तो काफी सीमा तक उस की वजह उस की अपनी ही जीवनशैली होती है,’’ भैया मुझे देख कर बोले, ‘‘अगर मैं ही बच कर चलता तो शायद मेरा चश्मा भी न टूटता. हमें ही अपने को बचा कर रखना चाहिए.’’

‘‘तुम्हें अच्छे नंबरों से एम.बी.ए. पास करना है और देश की सब से अच्छी कुरसी पर बैठना है. उस कुरसी पर बैठ कर तुम्हें बौबी जैसे लोग बेकार और कीड़े नजर आएंगे जिन के लिए सोचना तुम्हें सिर्फ समय की बरबादी जैसा लगेगा. इसलिए तुम बस अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो.’’

मैं ने वैसा ही किया जैसा भैया ने समझाया. शांत रखा अपना मन और वास्तव में मन की उथलपुथल कहीं खो सी गई. मेरी परीक्षाएं हो गईं. भैया वापस बंगलौर चले गए. घर पर रह गए पापा, मां और मैं. पापा अकसर भैया को साधुसंत कह कर भी पुकारा करते हैं. कभीकभी मां को भी चिढ़ा देते हैं.

‘‘जब यह सोमू पैदा होने वाला था तुम क्या खाया करती थीं…किस पर गया है यह लड़का?’’

‘‘वही खाती थी जो आप को भी खिलाती थी. दाल, चावल और चपाती.’’

‘‘पता नहीं किस पर गया है मेरा यह साधु महात्मा बेटा, सोम.’’

इतना बोल कर पापा मेरी तरफ देखने लगते. मानो उन्हें अब मुझ से कोई उम्मीद है क्योंकि भैया तो शादी करने को मानते ही नहीं, 35 के आसपास भैया की उम्र है. शादी का नाम भी लेने नहीं देते.

‘‘यह लड़का शादी कर लेता तो मुझे भी लगता मेरी जिम्मेदारी समाप्त हो गई. हर पल इस के खानेपीने की चिंता रहती है. कोई आ जाती इसे भी संभालने वाली तो लगता अब कोई डर नहीं.’’

‘‘डर काहे का भई, मैं जानता हूं कि तुम अपने जाने का रास्ता साफ करना चाहती हो मगर यह मत भूलो, हम दोनों अभी भी तुम्हारी जिम्मेदारी हैं. विजय के बालबच्चों की चिंता है कि नहीं तुम्हें…और बुढ़ापे में मुझे कौन संभालेगा. आखिर उस पार जाने की इतनी जल्दी क्यों रहती है तुम्हें कि जब देखो बोरियाबिस्तर बांधे तैयार नजर आती हो.’’

मां और पापा का वार्त्तालाप मेरे कानों में पड़ा, आजकल पापा इस बात पर बहुत जल्दी चिढ़ने लगे हैं कि मां हर पल मृत्यु की बात क्यों करने लगी हैं.

‘‘मैं टीवी का केबल कनेक्शन कटवाने वाला हूं,’’ पापा बोले, ‘‘सुबह से शाम तक बाबाओं के प्रवचन सुनती रहती हो,’’ और अखबार फेंक कर पापा बाहर आ कर बैठ गए…बड़ाबड़ा रहे थे. बड़बड़ाते हुए मुझे भी देख रहे थे.

‘‘क्या जरूरत है इस की? क्या मेरे सोचने से ही मैं उस पार चली जाऊंगी. संसार क्या मेरे चलाने से चलता है? आप इस बात पर चिढ़ते क्यों हैं,’’ शायद मां भी पापा के साथसाथ बाहर चली आई थीं. बचपन से देख रहा हूं, पापा मां को ले कर बहुत असुरक्षित हैं. मां क्षण भर को नजर न आईं तो पापा इस सीमा तक घबरा जाते हैं कि अवश्य कुछ हो गया है उन्हें. इस के पीछे भी एक कारण है.

हमारी दादी का जब देहांत हुआ था तब पापा की उम्र बहुत छोटी थी. दादी घर से बाहर गईं और एक हादसे में उन की मौत हो गई. पापा के कच्चे मन पर अपनी मां की मौत का क्या प्रभाव पड़ा होगा वह मैं सहज महसूस कर सकता हूं. दादी के बिना पता नहीं किस तरह पापा पले थे. शायद अपनी शादी के बाद ही वह जरा से संभल पाए होंगे तभी तो उन के मन में मां उन की कमजोर नस बन चुकी हैं जिस पर कोई हाथ नहीं रख सकता.

‘‘मैने कहा न तुम मेरे सामने फालतू बकबक न किया करो.’’

‘‘मेरी बकबक फालतू नहीं है. आप अपना मन पक्का क्यों नहीं करते? मेरी उम्र 55 साल है और आप की 60. एक आदमी की औसत उम्र भी तो यही है. क्या अब हमें धीरेधीरे घरगृहस्थी से अपना हाथ नहीं खींच लेना चाहिए? बड़ा बेटा अच्छा कमा रहा है…हमारा मोहताज तो नहीं. विजय भी एम.बी.ए. के बाद अपनी रोटी कमाने लगेगा. हमारा गुजारा पेंशन में हो रहा है. अपना घर है न हमारे पास. अब क्या उस पार जाने का समय नहीं आ गया?’’

पापा गरदन झुकाए बैठे सुन रहे थे.

‘‘मैं जानता हूं अब हमें उस पार जाना है पर मुझे अपनी परवा नहीं है. मुझे तुम्हारी चिंता है. तुम्हें कुछ हो गया तो मेरा क्या होगा.’’

‘‘इसीलिए तो कह रही थी कि सोम की शादी हो जाती तो बहू आप सब को संभाल लेती. कोई डर न होता.’’

बात घूम कर वहीं आ गई थी. हंस पड़ी थीं मां. माहौल जरा सा बदला. पापा अनमने से ही रहे. फिर धीरे से बोले, ‘‘पता चल गया मुझे सोमू किस पर गया है. अपनी मां पर ही गया है वह.’’

‘‘इतने साल साथ गुजार कर आप को अब पता चला कि मैं कैसी हूं?’’

‘‘नौकरी की आपाधापी में तुम्हारे चरित्र का यह पहलू तो मैं देख ही नहीं पाया. अब रिटायर हो गया हूं न, ज्यादा समय तुम्हें देख पाता हूं.’’

सच कह रहे हैं पापा. भैया बड़े हैं. लगता है मां का सारा का सारा चरित्र उन्हें ही मिल गया. जो जरा सा बच गया उस में कुछ पापा का मिला कर मुझे मिल गया. मैं इतना क्षमावादी नहीं हूं जितने भैया और मां हैं. हो सकता है जरा सा बड़ा हो जाऊं तो मैं भी वैसा ही बन जाऊं.

भैया मुझ से 10 साल बड़े हैं. हम दोनों भाइयों में 10 साल का अंतर क्यों है? मैं अकसर मां से पूछता हूं.

कम से कम मेरा भाई मेरा भाई तो लगता. वह तो सदा मुझे अपना बच्चा समझ कर बात करते हैं.

‘‘यह प्रकृति का खेल है, बेटा, इस में हमारा क्या दोष है. जो हमें मिला वह हमारा हिस्सा था, जब मिलना था तभी मिला.’’

अकसर मां समझाती रहती हैं, कर्म करना, ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी निभाना हमारा कर्तव्य है. उस के बाद हमें कब कितना मिले उस पर हमारा कोई बस नहीं. जमीन से हमारा रिश्ता कभी टूटना नहीं चाहिए. पेड़ जितना मरजी ऊंचा हो जाए, आसमान तक उस की शाखाएं फैल जाएं लेकिन वह तभी तक हराभरा रह सकता है जब तक जड़ से उस का नाता है. यह जड़ हैं हमारे संस्कार, हमारी अपने आप को जवाबदेही.

समय आने पर मेरी नियुक्ति भी बंगलौर में हो गई. अब दोनों भाई एक ही शहर में हो गए और मांपापा दिल्ली में ही रहे. भैया और मैं मिल गए तो हमारा एक घर बन गया. मेरी वजह से भैया ने एक रसोइया रख लिया और सब समय पर खानेपीने लगे. बहुत गौर से मैं भैया के चरित्र को देखता, कितने सौम्य हैं न भैया. जैसे उन्हें कभी क्रोध आता ही नहीं.

‘‘भैया, आप को कभी क्रोध नहीं आता?’’

एक दिन मेरे इस सवाल पर वह कहने लगे, ‘‘आता है, आता क्यों नहीं, लेकिन मैं सामने वाले को क्षमा कर देता हूं. क्षमादान बहुत ऊंचा दान है. इस दान से आप का अपना मन शांत हो जाता है और एक शांत इनसान अपने आसपास काम करने वाले हर इनसान को प्रभावित करता है. मेरे नीचे हजारों लोग काम करते हैं. मैं ही शांत न रहा तो उन सब को शांति का दान कैसे दे पाऊंगा, जरा सोचो.’’

एक दोपहर लंच के समय एक महिला सहयोगी से बातचीत होने लगी. मैं कहां से हूं. घर में कौनकौन हैं आदि.

‘‘मेरे बड़े भाई हैं यहां और मैं उन के साथ रहता हूं.’’

भैया और उन की कंपनी का नाम- पता बताया तो वह महिला चौंक सी गई. उसी पल से उस का मेरे साथ बात करने का लहजा बदल गया. वह मुझे सिर से पैर तक ऐसे देखने लगी मानो मैं अजूबा हूं.

‘‘नाम क्या है आप का?’’

‘‘जी विजय सहगल, आप जानती हैं क्या भैया को?’’

‘‘हां, अकसर उन की कंपनी से भी हमारा लेनदेन रहता है. सोम सहगल अच्छे इनसान हैं.’’

मेरी दोस्ती उस महिला के साथ बढ़ने लगी. अकसर वह मुझ से परिवार की बातें करती. अपने पति के बारे में, अपने बच्चों के बारे में भी. कभी घर आने को कहती, मेरे खानेपीने पर भी नजर रखती. एक दिन नाश्ता करते हुए उस महिला का जिक्र मैं ने भैया के सामने भी कर दिया.

‘‘नाम क्या है उस का?’’

अवाक् रह गए भैया उस का नाम सुन कर. हाथ का कौर भैया के हाथ से छूट गया. बड़े गौर से मेरा चेहरा देखने लगे.

‘‘क्या बात है भैया? आप का नाम सुन कर वह भी इसी तरह चौंक गई थी.’’

‘‘तो वह जानती है कि तुम मेरे छोटे भाई हो…पता है उसे मेरा?’’

‘‘हां पता है. आप की बहुत तारीफ करती है. कहती है आप की कंपनी के साथ उस की कंपनी का भी अच्छा लेनदेन है. मेरा बहुत खयाल रखती है.’’

‘‘अच्छा, कैसे तुम्हारा खयाल रखती है?’’

‘‘जी,’’ अचकचा सा गया मैं. भैया के बदले तेवर पहली बार देख रहा था मैं.

‘‘तुम्हारे लिए खाना बना कर लाती है या रोटी का कौर तुम्हारे मुंह में डालती है? पहली बार घर से बाहर निकले हो तो किसी के भी साथ दोस्ती करने से पहले हजार बार सोचो. तुम्हारी दोस्ती और तुम्हारी भावनाएं तुम्हारी सब से अमूल्य पूंजी हैं जिन का खर्च तुम्हें बहुत सोच- समझ कर करना है. हर इनसान दोस्ती करने लायक नहीं होता. हाथ सब से मिला कर चलो क्योंकि हम समाज में रहते हैं, दिल किसीकिसी से मिलाओ…सिर्फ उस से जो वास्तव में तुम्हारे लायक हो. तुम समझदार हो, आशा है मेरा इशारा समझ गए होगे.’’

‘‘क्या वह औरत दोस्ती के लायक नहीं है?’’

‘‘नहीं, तुम उसी से पूछना, वह मुझे कब से और कैसे जानती है. ईमानदार होगी तो सब सचसच बता देगी. न बताया तो समझ लेना वह आज भी किसी की दोस्ती के लायक नहीं है.’’

भैया मेरा कंधा थपक कर चले गए और पीछे छोड़ गए ढेर सारा धुआं जिस में मेरा दम घुटने लगा. एक तरह से सच ही तो कह रहे हैं भैया. आखिर मुझ में ही इतनी दिलचस्पी लेने का क्या कारण हो सकता है.

दोपहर लंच में वह सदा की तरह चहचहाती हुई ही मुझे मिली. बड़े स्नेह, बड़े अपनत्व से.

‘आप भैया से पहली बार कब मिली थीं? सिर्फ सहयोगी ही थे आप या कंपनी का ही माध्यम था?’

मुस्कान लुप्त हो गई थी उस की.

‘‘नहीं, हम सहयोगी कभी नहीं रहे. बस, कंपनी के काम की ही वजह से मिलनाजुलना होता था. क्यों? तुम यह सब क्यों पूछ रहे हो?’’

‘‘नहीं, आप मेरा इतना खयाल जो रखती हैं और फिर भैया का नाम सुनते ही आप की दिलचस्पी मुझ में बढ़ गई. इसीलिए मैं ने सोचा शायद भैया से आप की गहरी जानपहचान हो. भैया के पास समय ही नहीं होता वरना उन से ही पूछ लेता.’’

‘‘अपनी भाभी को ले कर कभी आओ न हमारे घर. बहुत अच्छा लगेगा मुझे. तुम्हारी भाभी कैसी हैं? क्या वह भी काम करती हैं?’’

तनिक चौंका मैं. भैया से ज्यादा गहरा रिश्ता भी नहीं है और उन की पत्नी में भी दिलचस्पी. क्या वह यह नहीं जानतीं, भैया ने तो शादी ही नहीं की अब तक.

‘‘भाभी बहुत अच्छी हैं. मेरी मां जैसी हैं. बहुत प्यार करती हैं मुझ से.’’

‘‘खूबसूरत हैं, तुम्हारे भैया तो बहुत खूबसूरत हैं,’’ मुसकराने लगी वह.

‘‘आप के घर आने के लिए मैं भाभी से बात करूंगा. आप अपना पता दे दीजिए.’’

उस ने अपना कार्ड मुझे थमा दिया. रात वही कार्ड मैं ने भैया के सामने रख दिया. सारी बातें जो सच नहीं थीं और मैं ने उस महिला से कहीं वह भी बता दीं.

‘‘कहां है तुम्हारी भाभी जिस के साथ उस के घर जाने वाले हो?’’

भाभी के नाम पर पहली बार मैं भैया के होंठों पर वह पीड़ा देख पाया जो उस से पहले कभी नहीं देखी थी.

‘‘वह आप में इतनी दिलचस्पी क्यों लेती है भैया? उस ने तो नहीं बताया, आप ही बताइए.’’

‘‘तो चलो, कल मैं ही चलता हूं तुम्हारे साथ…सबकुछ उसी के मुंह से सुन लेना. पता चल जाएगा सब.’’

अगले दिन हम दोनों उस पते पर जा पहुंचे जहां का श्रीमती गोयल ने पता दिया था. भैया को सामने देख उस का सफेद पड़ता चेहरा मुझे साफसाफ समझा गया कि जरूर कहीं कुछ गहरा था बीते हुए कल में.

‘‘कैसी हो शोभा? गिरीश कैसा है? बालबच्चे कैसे हैं?’’

पहली बार उन का नाम जान पाया था. आफिस में तो सब श्रीमती गोयल ही पुकारते हैं. पानी सजा लाई वह टे्र में जिसे पीने से भैया ने मना कर दिया.

‘‘क्या तुम पर मुझे इतना विश्वास करना चाहिए कि तुम्हारे हाथ का लाया पानी पी सकूं?

‘‘अब क्या मेरे भाई पर भी नजर डाल कुछ और प्रमाणित करना चाहती हो. मेरा खून है यह. अगर मैं ने किसी का बुरा नहीं किया तो मेरा भी बुरा कभी नहीं हो सकता. बस मैं यही पूछने आया हूं कि इस बार मेरे भाई को सलाखों के पीछे पहुंचा कर किसे मदद करने वाली हो?’’

श्रीमती गोयल चुप थीं और मुझ में काटो तो खून न था. क्या भैया कभी सलाखों के पीछे भी रहे थे? हमें क्या पता था यहां बंगलौर में भैया के साथ इतना कुछ घट चुका है.

औरत भी बलात्कार कर सकती है, भैया भनक कर बोले, ‘‘इस का पता मुझे तब चला जब तुम ने भीड़ जमा कर के सब के सामने यह कह दिया था कि मैं ने तुम्हें रेप करने की कोशिश की है, वह भी आफिस के केबिन में. हम में अच्छी दोस्ती थी, मुझे कुछ करना ही होता तो क्या जगह की कमी थी मेरे पास? हर शाम हम साथ ही होते थे. रेप करने के लिए मुझे आफिस का केबिन ही मिलता. तुम ने गिरीश की प्रमोशन के लिए मुझे सब की नजरों में गिराना चाहा…साफसाफ कह देतीं मैं ही हट जाता. इतना बड़ा धोखा क्यों किया मेरे साथ? अब इस से क्या चाहती हो, बताओ मुझे. इसे अकेला लावारिस मत समझना.

‘‘मैं किसी से कुछ नहीं चाहती सिर्फ माफी चाहती हूं. तुम्हारे साथ मैं ने जो किया उस का फल मुझे मिला है. अब गिरीश मेरे साथ नहीं रहता. मेरा बेटा भी अपने साथ ले गया…सोम, जब से मैं ने तुम्हें बदनाम करना चाहा है एक पल भी चैन नहीं मिला मुझे. तुम अच्छे इनसान थे, सारी की सारी कंपनी तुम्हें बचाने को सामने चली आई. तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ा…मैं ही कहीं की नहीं रही.’’

‘‘मेरा क्या नहीं बिगड़ा…जरा बताओ मुझे. मेरे काम पर तो कोई आंच नहीं आई मगर आज किसी भी औरत पर विश्वास कर पाने की मेरी हिम्मत ही नहीं रही. अपनी मां के बाद तुम पहली औरत थीं जिसे मैं ने अपना माना था और उसी ने अपना ऐसा रूप दिखाया कि मैं कहीं का नहीं रहा और अब मेरे भाई को अपने जाल में फंसा कर…’’

‘‘मत कहो सोम ऐसा, विजय मेरे भाई जैसा है. अपने घर बुला कर मैं तुम्हारी पत्नी से और विजय से अपने किए की माफी मांगनी चाहती थी. मेरी सांस बहुत घुटती है सोम. तुम मुझे क्षमा कर दो. मैं चैन से जीना चाहती हूं.’’

‘‘चैन तो अपने कर्मों से मिलता है. मैं ने तो उसी दिन तुम्हारी और गिरीश की कंपनी छोड़ दी थी. तुम्हें सजा ही देना चाहता तो तुम पर मानहानि का मुकदमा कर के सालों अदालत में घसीटता. लेकिन उस से होता क्या. दोस्ती पर मेरा विश्वास तो कभी वापस नहीं लौटता. आज भी मैं किसी पर भरोसा नहीं कर पाता. तुम्हारी सजा पर मैं क्या कह सकता हूं. बस, इतना ही कह सकता हूं कि तुम्हें सहने की क्षमता मिले.’’

अवाक् था मैं. भैया का अकेलापन आज समझ पाया था. श्रीमती गोयल चीखचीख कर रो रही थीं.

‘‘एक बार कह दो मुझे माफ कर दिया सोम.’’

‘‘तुम्हें माफ तो मैं ने उसी पल कर दिया था. तब भी गिरीश और तुम पर तरस आया था और आज भी तुम्हारी हालत पर अफसोस हो रहा है. चलो, विजय.’’

श्रीमती गोयल रोती रहीं और हम दोनों भाई वापस गाड़ी में आ कर बैठ गए. मैं तो सकते में था ही भैया को भी काफी समय लग गया स्वयं को संभालने में. शायद भैया शोभा से प्यार करते होंगे और शोभा गिरीश को चाहती होगी, उस का प्रमोशन हो जाए इसलिए भैया से प्रेम का खेल खेला होगा, फिर बदनाम करना चाहा होगा. जरा सी तरक्की के लिए कैसा अनर्थ कर दिया शोभा ने. भैया की भावनाओं पर ऐसा प्रहार सिर्फ तरक्की के लिए. भैया की तरक्की तो नहीं रुकी. शोभा ने सदा के लिए भैया को अकेला जरूर कर दिया. कब वह दिन आएगा जब भैया किसी औरत पर फिर से विश्वास कर पाएंगे. यह क्या किया था श्रीमती गोयल आप ने मेरे भाई के साथ? काश, आप ने ऐसा न किया होता.

उस रात पहली बार मुझे ऐसा लगा, मैं बड़ा हूं और भैया मुझ से 10 साल छोटे. रो पड़े थे भैया. खाना भी खा नहीं पा रहे थे हम.

‘आप देख लेना भैया, एक प्यारी सी, सुंदर सी औरत जो मेरी भाभी होगी एक दिन जरूर आएगी…आप कहते हैं न कि हर कीमती राह तरसने के बाद ही मिलती है और किसी भी काम का एक निश्चित समय होता है. जो आप की थी ही नहीं वह आप की हो कैसे सकती थी. जो मेरे भाई के लायक होगी कुदरत उसे ही हमारी झोली में डालेगी. अच्छे इनसान को सदा अच्छी ही जीवनसंगिनी मिलनी चाहिए.’

डबडबाई आंखों में ढेर सारा प्यार और अनुराग लिए भैया ने मुझे गले लगा लिया. कुछ देर हम दोनों भाई एकदूसरे के गले लगे रहे. तनिक संभले भैया और बोले, ‘‘बहुत तेज चलने वालों का यही हाल होता है. जो इनसान किसी दूसरे के सिर पर पैर रख कर आगे जाना चाहता है प्रकृति उस के पैरों के नीचे की जमीन इसी तरह खींच लेती है. मैं तुम्हें बताना ही भूल गया. कल पापा से बात हुई थी. बौबी का बहुत बड़ा एक्सीडेंट हुआ है. उस ने 2 बच्चों को कुचल कर मार दिया. खुद टूटाफूटा अस्पताल में पड़ा है और मांबाप पुलिस से घर और घर से पुलिस तक के चक्कर लगा रहे हैं. जिन के बच्चे मरे हैं वे शहर के नामी लोग हैं. फांसी से कम सजा वे होने नहीं देंगे. अब तुम्हीं बताओ, तेज चलने का क्या नतीजा निकला?’’

वास्तव में निरुत्तर हो गया मैं. भैया ने सच ही कहा था बौबी के बारे में. उस का आचरण ही उस की सब से बड़ी सजा बन जाने वाला है. मनुष्य काफी हद तक अपनी पीड़ा के लिए स्वयं ही जिम्मेदार होता है.

दूसरे दिन कंपनी के काम से जब मुझे श्रीमती गोयल के पास जाना पड़ा तब उन का झुका चेहरा और तरल आंखें पुन: सारी कहानी दोहराने लगीं. उन की हंसी कहीं खो गई थी. शायद उन्हें मुझ से यह भी डर लग रहा होगा कि कहीं पुरानी घटना सब को सुना कर मैं उन के लिए और भी अपमान का कारण न बन जाऊं.

पहली बार लगा मैं भी भैया जैसा बन गया हूं. क्षमा कर दिया मैं ने भी श्रीमती गोयल को. बस मन में एक ही प्रश्न उभरा :

आप ने ऐसा क्यों किया श्रीमती गोयल जो आज आप को अपनी नजरें शर्म से झुकानी पड़ रही हैं. हम आज वह अनिष्ट ही क्यों करें जो कब दुख का तूफान बन कर हमारे मानसम्मान को ही निगल जाए. इनसान जब कोई अन्याय करता है तब वह यह क्यों भूल जाता है कि भविष्य में उसे इसी का हिसाब चुकाना पड़ सकता है.

काश, आप ने ऐसा न किया  होता.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें