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कुवैत अग्निकांड : सपने ले कर गए थे, ताबूत में घर लौटे

उन की आंखों में छोटेछोटे सपने थे. किसी को अपना घर बनाना था, किसी को बहन की शादी करनी थी, कोई अपने छोटे भाईबहनों का भविष्य संवारना चाहता था तो कोई पिता का हाथ बंटाने की चाहत में कुवैत गया था, मगर उन के नन्हेनन्हे सपने अधूरे ही रह गए. सपने देखने वाले बंद ताबूतों में अपने घर वापस लौटे हैं. कुवैत के मंगाफ शहर में हुए अग्निकांड में 49 लोगों की मौत हुई है, जिस में 45 भारतीय हैं. इस के अलावा 50 से ज्यादा लोग बुरी तरह झुलसी हालत में अस्पतालों में जीवन की जंग लड़ रहे हैं. मृतकों में सब से अधिक 24 केरल के, 5 तमिलनाडु के, 3 उत्तर प्रदेश के, 2 बिहार के और एक निवासी झारखंड का था. उत्तर प्रदेश के जिन 3 लोगों की मौत हुई है उस में गोरखपुर के दो युवक शामिल हैं. एक गुलरिया के जयराम गुप्ता और दूसरे गोरखनाथ थाना क्षेत्र के जैतपुर उत्तरी निवासी अंगद गुप्ता. जबकि तीसरा मृतक गाजीपुर का रहने वाला है.

मंगाफ की जो बहुमंजिली इमारत 12 जून 2024 की सुबह 4.30 बजे पालक झपकते लाक्षागृह में तब्दील हो गई, उस में अधिकांश लोग भारत, ख़ासकर केरल और तमिलनाडु के रहने वाले थे. हालांकि अन्य देशों नेपाल और फिलीपींस के लोग भी वहां रहते थे. कुवैत की एक निर्माण कंपनी एनबीटीसी ग्रुप ने 195 से ज्यादा श्रमिकों के रहने के लिए यह बिल्डिंग किराए पर ले रखी थी. इस बिल्डिंग में कम किराए पर बड़ी संख्या में प्रवासी लोगों को रखा जाता है. कुवैत के मीडिया के मुताबिक आग रसोई में लगी थी. चूंकि गर्मियों का मौसम है इसलिए वहां ज्यादातर मजदूर नाइट शिफ्ट में काम कर रहे हैं. कुछ मजदूर जो नाइट शिफ्ट कर के तड़के लौटे थे, वे किचन में अपने लिए खाना बना रहे थे. गर्मी के कारण वहां आग तेजी से फैलने लगी. जो लोग इमारत में मौजूद थे, वे आग पर काबू पाने की स्थिति में नहीं थे. वहां पर्याप्त पानी भी नहीं था और आग से बचाव के कोई उपकरण भी इमारत में नहीं थे. आग फैलते ही पूरी बिल्डिंग गहरे धुएं से भर गई. निकलने का रास्ता आग ने रोक लिया था और छत का रास्ता बंद था. लिहाजा अधिकांश मौतें धुएं के कारण दम घुटने से हुईं. सुबह साढ़े चार बजे का वक्त था. इमारत में अधिकतर लोग उस वक्त दिन भर की कड़ी मेहनत से थके गहरी नींद में सोए हुए थे.

दरभंगा के नैनाघाट वार्ड 6 निवासी काले खां अभी महज 23 साल का था. काले खां के घर में उस की की शादी की तैयारी चल रही थी. अगले महीने उस की बारात नेपाल जाने वाली थी. काले खां अगले महीने 5 जुलाई को भारत लौटने वाला था. मगर उस की लाश ताबूत में लौटी है. काले खां कुवैत के एक मौल में श्रमिक के रूप में काम कर रहा था.

48 साल के लुकोसे कुवैत की कंपनी एनबीटीसी में फोरमैन थे. उन की मौत की खबर सुन कर केरल में उन का परिवार सदमे में है. लुकोसे के मातापिता बुज़ुर्ग हैं. मां 86 साल की हैं और पिता 93 साल के हैं. लुकोसे की पत्नी और बच्चों पर तो मानों दुख का पहाड़ टूट पड़ा है. घर में लुकोसे ही एकमात्र कमाने वाले व्यक्ति थे. उन की कमाई से ही पूरा घर चल रहा था.

बिनौय जोसेफ त्रिशूर जिले के चावक्कड़ के पास पलायूर के रहने वाले थे. पलायूर में अपना एक घर बनाने की लालसा में पैसा कमाने के लिए वे कुवैत गए थे. बिनौय जोसेफ की दो नन्ही बेटियां हैं. छोटी वाली अभी कक्षा एक में गई है. कुवैत जाने से पहले बिनौय जोसेफ चावक्कड़ में एक दुकान में सेल्समैन थे. उन के पास अपना घर नहीं था. पिछले साल, बिनौय ने घर बनाने के लिए जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा खरीदा था. कुछ पैसा जमा कर के उन्होंने उस जमीन पर एक छोटा सा शेड बना लिया था. वह 44 साल की उम्र में कुवैत सिर्फ इसलिए गए थे, ताकि वह जमीन खरीदने में हुई देनदारी चुका सकें और घर बनाने के लिए पर्याप्त पैसे जुटा सकें.

झारखंड के युवक मोहम्मद अली हुसैन 18 दिन पहले ही कुवैत गए थे. कुवैत जाते समय उस के परिजनों ने सोचा भी नहीं था कि वे उन्हें आखिरी बार देख रहे हैं. 24 वर्षीय हुसैन अपने 3 भाईबहनों में सब से छोटा था और अपने परिवार की मदद के लिए रांची से कुवैत गया था. उसे वहां सेल्‍समैन की नौकरी मिल गई थी. लेकिन हुसैन को उस की मौत कुवैत ले गई थी. महज 18 दिन ही बीते थे, और उस की मौत की खबर ने पूरे घर को सदमे में डाल दिया. रांची में वाहनों के टायरों का छोटा सा कारोबार चलाने वाले उस के पिता मुबारक कहते हैं, “हम ने कभी नहीं सोचा था कि 18 दिनों के भीतर इतनी बड़ी घटना हो जाएगी. मेरे बेटे के एक सहकर्मी ने बृहस्पतिवार को सुबह उस की मौत की सूचना मुझे दी. शाम तक मैं इतनी भी हिम्मत नहीं जुटा पाया कि अपनी पत्नी को इस दुखद खबर के बारे में बता सकूं. मेरा बेटा स्नातक की डिग्री पूरी करने के बाद ‘सर्टिफाइड मैनेजमैंट अकाउंटेंट (सीएमए) का कोर्स कर रहा था. एक दिन अचानक उस ने कहा कि वह कुवैत जाएगा. वह घर के खर्चों में मेरा हाथ बंटाना चाहता था. मगर इतना बड़ा दुख दे गया.”

27 वर्षीय श्रीहरि प्रदीप ने पिछले हफ्ते ही कुवैत में अपनी पहली नौकरी शुरू की थी. इस अग्निकांड में प्रदीप की भी मौत हो गई है. केरल के रहने वाले प्रदीप मैकेनिकल इंजीनियर थे. जिस इमारत में आग लगी, वहां प्रदीप की कंपनी एनबीटीसी के कई लोग रहते थे. वह भी कुछ दिन पहले ही यहां शिफ्ट हुए थे. वहीं, प्रदीप के पिता इस इमारत से कुछ दूर दूसरी बिल्डिंग में रहते थे. वह पिछले 10 साल से एनबीटीसी कंपनी में कार्यरत हैं. उन्होंने ही प्रदीप को वहां बुलाया था. अग्निकांड के बाद वे बदहवास से अपने बेटे को धुंए के गुबार में तलाशते रहे. फिर अस्पताल के मुर्दाघर में उन्होंने अपने बेटे की पहचान की.

केरल के कोल्लम के रहने वाले उमरुद्दीन शमीर का परिवार तो इतने सदमे में हैं कि उन के पास आने वाले फोन के जवाब भी उन के पड़ोसी दे रहे हैं. उमरुद्दीन की 9 महीने पहले ही शादी हुई थी. उमरुद्दीन एक भारतीय मालिक की तेल कंपनी में ड्राइवर का काम कर रहे थे.

आखिर क्या वजह है कि कुवैत और सऊदी अरब जैसे देशों में भारत से इतने लोग नौकरी के लिए जाते हैं. कुवैत में दोतिहाई आबादी प्रवासी मजदूरों की है. ये देश पूरी तरह बाहरी मजदूरों पर निर्भर है, खासकर निर्माण और घरेलू क्षेत्र में. मजदूरी के अलावा पढ़ेलिखे नौजवानों के लिए भी कुवैत में अनेक ऐसे काम हैं जिस में उन की अच्छी कमाई हो जाती है. इस में सेल्समैन, मौल मैनेजर, सुपरवाइजर के अलावा फैक्ट्रियों में काम का संचालन करने वालों की काफी डिमांड है. मगर वहां उन के रहनेखाने की व्यवस्था बहुत बदतर है. मानवाधिकार समूह कई बार कुवैत में प्रवासियों के जीवनस्तर को ले कर सवाल उठा चुके हैं. अपनी दयनीय हालत के लिए कुछ हद तक जिम्मेदार ये प्रवासी मजदूर वर्ग भी है जो ज्यादा से ज्यादा पैसा बचा कर भारत अपने घरपरिवार को भेजने की चाह में खुद न्यूनतम खर्च और असुविधाजनक परिस्थितियों में गुजर बसर के लिए तैयार हो जाता है. एकएक कमरे में 12 से 20 लोग सो लेते हैं. किचन और शौचालयों की हालत बदतर होती है. फिर भी ज्यादा से ज्यादा पैसा कमा कर देश वापस लौटने की चाह में ये हर चीज में एडजस्ट कर लेते हैं.

मजदूर वर्ग की बात छोड़ दें तो कुवैत में सब से ज्‍यादा डिमांड बिजनैस एडमिनिस्‍ट्रेटर की रहती है. बीते कुछ सालों में कुवैत में कारोबार का विस्‍तार तेजी से हुआ है और तमाम विदेशी कंपनियां भी वहां अपना बिजनेस स्‍थापित कर रही हैं. लिहाजा अच्‍छी स्किल वालों को यहां हर महीने औसतन 400 कुवैती दिनार तक पगार मिल जाती है. यह भारतीय करेंसी में 1,09,055 रुपए के करीब होता है. जो पढ़ेलिखे भारतीय नौजवानों के लिए एक बहुत बड़ा लालच है क्योंकि भारत में तो उन्हें नौकरी ही नहीं मिलती. यदि किस्मत से मिल जाए तो इतने पैसे नहीं मिलते.

कुवैत में नौकरी खोजने वालों के लिए दूसरी सब से हौट जौब है मौल मैनेजर की. कुवैत और सऊदी अरब में मौल कल्‍चर तेजी से फैल रहा है और वहां दुनिया के बेहतरीन शौपिंग सेंटर भी बनाए जा रहे. ऐसे में मौल मैनेजर की जौब आएदिन निकलती रहती है. उन का काम शौपिंग सेंटर को चलाना होता है. इस काम के लिए हर महीने 500 कुवैती दिनार मिल जाते हैं, जो भारत के 1,36,319 रुपए के बराबर होंगे.

आप को जानकर हैरानी होगी कि कुवैत में भले ही अरबी और फारसी बोली जाती है, लेकिन वहां इंग्लिश टीचर की काफी डिमांड है. इस का कारण यह है कि ग्‍लोबल मार्केट खुलने की वजह से वहां अंगरेजी की मांग बढ़ रही है. जिस के लिए टीचर की जरूरत होती है. इंग्लिश पढ़ाने वाले को हर महीने औसतन 300 से 350 कुवैती दिनार (करीब 95,423 रुपये) मिल जाते हैं.

कुवैत में सब से ज्‍यादा पैमेंट इंजीनियरिंग सैक्‍टर में मिलती है. अभी खाड़ी देश में इन्‍फ्रा पर काफी काम हो रहा है, लिहाजा सिविल और इलैक्ट्रिकल इंजीनियर की मांग भी यहां काफी ज्‍यादा बढ़ गई है. इन का काम इन्‍फ्रा प्रोजैक्‍ट की डिजानिंग, प्‍लानिंग और डेवलपमैंट पर निगाह रखना है. इस काम के लिए हर महीने औसतन 600 से 750 कुवैती दिनार (1.63 लाख से 2.04 लाख रुपए) मिल जाते हैं.

कुवैत में ग्राफिक डिजाइनर की मांग भी काफी रहती है. इस में एडवरटाइजिंग, वेबसाइट की डिजाइनिंग और तमाम डिजिटल प्‍लेटफौर्म पर ग्राफिक्‍स डिजाइन करने की प्रोफाइल दी जाती है. इस के लिए हर महीने 250 से 350 कुवैती दिनार मिल जाते हैं, जो भारत के 95,423 रुपए के बराबर होते हैं. भारत में कोई ग्राफिक डिजाइनर इतनी अच्छी तनख्वाह की कल्पना भी नहीं कर सकता है.

कुवैत और अन्‍य खाड़ी देशों में विदेशी कंपनियों का जमावड़ा लग रहा है तो इन कंपनियों को मानव संसाधन विभाग के लिए भी बड़ी संख्या में प्रोफैशनल्‍स की जरूरत है. स्किल वाले व्‍यक्ति को हर महीने करीब 250 से 400 कुवैती दिनार मिल जाते हैं, जो भारतीय करेंसी में 1,09,055 रुपए तक हो सकते हैं.

कुवैत में तेल की तमाम फैक्ट्रियां हैं. इस के अलावा मैन्‍युफैक्‍चरिंग व अन्‍य इंडस्ट्रियल डेवलपमैंट के लिए भी फैक्‍ट्री सुपरवाइजर की जौब काफी निकलती है. इस फील्‍ड में काम करने वाले को हर महीने औसतन 600 कुवैती दिनार (करीब 1,63,582 रुपये) तक मिल जाते हैं.

कुवैत में कंपनियों और शौपिंग मौल्‍स की बढ़ती संख्‍या को देखते हुए सेल्‍स रीप्रेजेंटेटिव्‍स की डिमांड भी काफी बढ़ रही है. इन का काम सेवाओं और प्रोडक्‍ट का प्रोमोशन करना है. इस काम के लिए हर महीने औसतन 200 से 400 कुवैती दिनार (करीब 1.09 लाख रुपये) तक मिल जाते हैं.

इन नौकरियों का लालच बड़ी संख्या में भारतीय नौजवानों को खाड़ी देशों में ले जा रहा है. आज 90 लाख से अधिक भारतीय खाड़ी देशों में काम कर रहे हैं. संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई में जहां 35 लाख से अधिक भारतीय कार्यरत हैं तो वहीं कुवैत में भारतीयों की तादात 9 लाख के करीब है. भारतीय विदेश मंत्रालय की 2022 की सूची देखें तो सऊदी अरब में साढ़े 24 लाख से अधिक, कतर में करीब 9 लाख, ओमान में साढ़े 6 लाख और बेहरीन में 3 लाख से ज्यादा भारतीय काम के लिए गए हैं. मगर इन के रहनेखाने और स्वास्थ्य समस्याओं के लिए इन देशों में कुछ ख़ास इंतजाम नहीं हैं. शोषण, प्रताड़ना और अवयवस्था का शिकार हो कर हर साल अनेकों भारतीय अपनी जान से हाथ धो रहे हैं.

कुवैत और अन्य खाड़ी देशों में भारतीय मजदूरों की बढ़ती संख्या यह साबित करती है कि भारत में नौकरियां नहीं हैं और मोदी सरकार युवा हाथों को रोजगार देने में बिलकुल फेल साबित हुई है. दूसरी ओर इन्हीं प्रवासी लोगों से सरकार को सीधे 120 अरब डौलर की विदेशी मुद्रा मिल रही है जिस से प्रधानमंत्री 8000 करोड़ रुपये के दोदो एयरोप्लेन खरीद रहे हैं. यह बहुत शर्मनाक है.

चीन आबादी की दृष्टि से भले अब दूसरे नंबर पर आ गया, पहले वहां की आबादी भारत से ज्यादा थी. लेकिन बावजूद इतनी बड़ी जनसंख्या के चीनी मजदूर मजदूरी करने बाहर कम ही जा रहे हैं क्योंकि वहां की सरकार उन का ज्यादा ख्याल रखती है और वहां मजदूरों को ज्यादा इज्जत मिलती है.

एक आंकड़े के मुताबिक़ पिछले दो सालों में अकेले कुवैत में 1400 भारतीयों की मौत हो चुकी है. ज्यादातर मजदूर वर्ग के लोगों ने इस देश में अपनी जान गंवाई है. कुवैत में स्थित भारतीय दूतावास को 2021 से 2023 के बीच 16000 शिकायतें मिलीं. यह सारी शिकायतें उन भारतीय मजदूरों की थीं जिन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें ना समय पर सैलरी मिलती है और ना ठीक से रहने के लिए कोई जगह दी जाती है. इस के अलावा कई अन्य प्रकार के शोषण का वे शिकार होते हैं.

फरवरी 2024 में भारतीय संसद में विदेश मंत्रालय की तरफ से यह जानकारी दी गई कि कुवैत में 2021 से 2023 के बीच 731 प्रवासी मजदूरों की मौत हुई जिस में से 708 भारतीय मजदूर थे. थोड़ा और पीछे जाएं तो कोरोना काल के दौरान वहां हजारों मजदूरों की मौत हुई क्योंकि उन तक स्वास्थ्य सेवाएं नहीं पहुंचीं. 2014 से 2018 के बीच कुवैत में 2932 प्रवासी मजदूरों की मौत दर्ज की गई थी.

यह आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि कुवैत में मजदूरों के लिए हालात अच्छे नहीं हैं. वहां ख़राब स्थिति और कम संसाधनों के बीच उन को रहने के लिए मजबूर किया जाता है. कुवैत की अर्थव्यवस्था जो इस समय बड़ी तेजी से आगे बढ़ रही है उस में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका भारतीय मजदूरों की है. वहां की कुल आबादी का 21 फीसदी भारतीय-जन है, बावजूद इस के भारतीय मजदूरों के साथ कुवैत में काफी खराब व्यवहार होता है. स्थानीय लोग भी उन के साथ बदसलूकी से बाज नहीं आते हैं. जो कंपनियां इन मजदूरों को हायर करती हैं वो उन के पासपोर्ट तक जब्त कर लेती हैं कि कहीं शोषण से तंग आ कर ये टिकट कटा कर वापस भारत न भाग जाएं.

खाड़ी देशों में भारतीय मजदूरों के काम के घंटे भी तय नहीं हैं. उन से घंटों काम लिया जाता है और उन के साथ जानवरों जैसा व्यवहार होता है. एकएक कमरे में 15 से 20 मजदूरों को रहने के लिए बाध्य किया जाता है. इस समय कुवैत में बंदरगाह के पास कई ऐसी इमारतें हैं जहां सुविधा और सुरक्षा के कोई बंदोबस्त नहीं हैं. खतरा लगातार मंडराता रहता है. लेकिन ऐसे कठिन हालात में भी भारतीय मजदूर कुवैत और खाड़ी देशों में जाने के लिए तैयार हैं क्योंकि भारत में भूखे मरने से बेहतर है जान जोखिम में डाल कर अपने परिवार के लिए रहनेखाने और जीने का इंतजाम कर लें. यही मजबूरी 45 प्रवासियों की दर्दनाक मौत के रूप में सामने आई है

फिल्म ‘मुंज्या’ का अविश्वसनीय बौक्स औफिस कलैक्शन

दिनेश वीजन निर्मित और आदित्य सरपोतदार निर्देfशत फिल्म ‘मुंज्या’ जून माह के प्रथम सप्ताह, 7 जून को सिनेमाघरों में पहुंची. भूत पिशाच व हौरर वाली इस फिल्म की कहानी थोड़ी सी अलग है पर बीच में जबरन कुछ हास्य दृष्य भी थोपे गए हैं. मगर यह फिल्म न तो हौरर बन पाई और न ही हास्य फिल्म बन पाई. फिल्म की कहानी महाराष्ट्रीयन लुक के गांव की है. फिल्म में नामचीन चेहरों की कमी है.

फिल्म के नायक अभय वर्मा कुछ सीरीज के अलावा संदीप सिंह की फिल्म ‘सफेद’ में नजर आ चुके हैं. इस फिल्म ने बौक्स औफिस पर पानी तक नहीं मांगा. ऊपर से अभय वर्मा अभी से अहम शिकार हैं. फिल्म की नायिका मनोहर जोश की नातिन शरवरी वाघ हैं. जो कि ‘द फारगोटन आर्मी’, ‘बंटी और बबली 2’ जैसी असफल फिल्में कर चुकी हैं. कई सफल मराठी फिल्मों के निर्देशक आदित्य सरपोतदार असफल हिंदी फिल्म ‘थोड़ीथोड़ी मनमानियां’ का भी निर्देशन कर चुके हैं. उस के बाद यह उन की दूसरी फिल्म है. वह अभी भी क्षेत्रीयता के रंग में ही रंगे हुए हैं. फिल्म का संगीत, एडिटिंग भी खराब है.

फिल्म के क्लाइमैक्स में जबरन वरूण धवन को भी ठूंसा गया है. फिल्म का प्रचार बहुत घटिया है. दर्शकों को पता ही नहीं है कि इस नाम की कोई फिल्म रिलीज हुई है. इतना ही नहीं इस फिल्म को सीमित सिनेमाघरों में ही प्रदर्शित किया गया है.

फिल्म के निर्माता अपनी फिल्म का बजट बताने को तैयार नहीं हैं. मगर उन के पीआरओ का दावा है कि फिल्म ‘मुंज्या’ ने 7 दिन में 35 करोड़ कमा लिए हैं. जिस पर किसी को भी यकीन नहीं हो रहा है क्योंकि मुंबई में जहां भी यह फिल्म प्रदर्शित हुई है, वहां पर फिल्म का डिब्बा गोल है.

कहानी के अनुसार बिट्टू जब अपने पैतृक गांव पहुंचता है तो उसे पता चलता है कि उस के परिवार से दुश्मनी रखने वाली एक अदृष्य ताकत उस से विवाह कर उस की व उस की मंगेतर की जिंदगी बर्बाद करना चाहती है. अब उस के सामने अपनी व अपनी मंगेतर की जिंदगी बचाने की चुनौती है.

प्रफुल फसाड निर्मित व विशाल कुम्भार निर्देशित फिल्म ‘मल्हार’ भी 7 जून को ही प्रदर्शित हुई थी. इस में अंजली पाटिल, शारिब हाश्मी के अभिनय से सजी इस फिल्म में 3 कहानियां चलती हैं जो कि एकदूसरे से जुड़ी हुई हैं. कहानी, सोच व विषयवस्तु के स्तर यह एक बेहतरीन फिल्म है.

फिल्म बनी भी अच्छी है. सभी कलाकारों का अभिनय अच्छा है. इस की गति जरुर धीमी है लेकिन फिल्म का प्रचार ठीक से नहीं किया गया. दर्शकों को पता ही नहीं चला कि फिल्म कब कहां रिलीज हुई जिस के चलते यह फिल्म 7 दिनों में महज एक करोड़ रूपए भी नहीं कमा सकी.

जून माह के पहले सप्ताह से ही ‘जियो स्टूडियो’ की ज्योति देशपांडे निर्मित व देवांग शसिन निर्देfशत फिल्म ‘ब्लैक आउट’ भी ‘जियो सिनेमा’ पर स्ट्रीम हो रही है. इसे मुफ्त में देखा जा सकता है पर इसे दर्शक देखना ही नहीं चाहते. विक्रांत मैसे, रुहानी शर्मा व मौनी राय के अभिनय से सजी यह फिल्म एक रात की कहानी है. पर पूरी फिल्म बेसिर पैर है. इस फिल्म में विक्रांत मैसे का भी अभिनय घटिया है. अब तो लोग खुल कर सवाल उठाने लगे हैं कि क्या ज्योति देषपांडे ‘जियो सिनेमा’ को पूरी तरह से डुबा कर ही मानेंगी?

भाजपा के अहंकार पर हाहाकार पर अब सब बेकार

आरएसएस के एक प्रमुख प्रचारक इंद्रेश कुमार जयपुर के पास कनोता में रामरथ अयोध्या यात्रा दर्शन पूजन समारोह में बोल रहे थे. उन्होंने कहा, राम सब के साथ न्याय करते हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव को ही देख लीजिए. जिन्होंने राम की भक्ति की उन में धीरेधीरे अहंकार आ गया. उस पार्टी को सब से बड़ी पार्टी घोषित कर दिया गया. उन को जो पूर्ण हक मिलना चाहिए जो शक्ति मिलनी चाहिए वो भगवान ने अहंकार के कारण रोक दी.

जिन्होंने राम का विरोध किया उन्हें बिलकुल भी शक्ति नहीं दी. उन में से किसी को भी शक्ति नहीं दी, सब मिला कर भी नम्बर 1 नहीं बने, नम्बर 2 पर खड़े रह गए. इसलिए प्रभु का न्याय विचित्र है. सत्य है आनंददायक है.

इंद्रेश कुमार प्रवचन कर रहे थे या लोकसभा चुनाव का विश्लेष्ण कर रहे थे यह कहना और समझना मुश्किल नहीं है लेकिन एक बात जो उन्होंने तुक की कही और जिस के लिए उन्होंने रामकथा सी भूमिका बांधी वह बात महज इतनी सी थी कि भाजपा की दुर्गति आनंददायक है. रही बात चुनावी विश्लेष्ण की तो वे भी भूल गए यह लोकतंत्र है जिस में न्याय या चयन कोई भगवान राम नहीं बल्कि जनता करती है. और राम अगर न्यायप्रिय होते तो सीता, शूर्पनखा, बालि और शम्बूक के प्रति जो उन्होंने किया वह किस एंगल से न्याय होता है यह तो उन का राम जाने.

यह सोचना भी बेमानी है कि आरएसएस और भाजपा में कोई सैद्धांतिक या वैचारिक मतभेद हैं. दोनों का मकसद एक ही है मनुवाद थोपना और भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना. भाजपा तो संघ का सियासी टूल है जिस में सभी जातियों वर्गों के लोग हैं. लेकिन खुद संघ पर एक जाति विशेष के लोगों का कब्जा शुरू से ही रहा है. यह जाति चितपावन ब्राह्मण है.

विकिपीडिया में इस समुदाय के बारे में लिखा गया है कि, चितपावन ब्राह्मण या कोकणस्थ ब्राह्मण महाराष्ट्र राज्य के तटीय क्षेत्र में रहने वाला एक हिंदू महाराष्ट्रीय ब्राह्मण समुदाय है. 17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में संदेशवाहक और जासूस के रूप में काम करने वाले इस समुदाय ने 18वीं शताब्दी में तब प्रसिद्धि पाई जब बालाजी विश्वनाथ के भट परिवार से पेशवा के उत्तराधिकारी मराठा साम्राज्य के वास्तविक शासक बन गए. 18वीं शताब्दी तक कर्नाटक, महाराष्ट्र क्षेत्र के पुराने स्थापित ब्राह्मण समुदाय देशस्थ द्वारा चितपावनों को कम सम्मान दिया जाता था.

अव्वल तो हिंदुओं में सभी जातियों की उत्पप्ति या उद्भव की एक दिलचस्प कहानी है. इस समुदाय की भी कम दिलचस्प नहीं. स्कन्द पुराण के एक प्रसंग के मुताबिक भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम जो अपने अनुष्ठान के लिए कोंकण में कोई ब्राह्मण नहीं ढूंढ पाए तो उन्होंने 60 मछुआरों को पाया जो समुद्र तट के पास एक अंतिम संस्कार की चिता के पास एकत्र हुए थे. इन 60 मछुआरा परिवारों को शुद्ध किया गया और ब्राह्मणत्व के लिए संस्कृत किया गया. चूंकि अंतिम संस्कार की चिता को चिता और शुद्ध पावना कहा जाता है इसलिए इस समुदाय को तब से चितपावन या अंतिम संस्कार की चिता के स्थान पर शुद्ध नाम से जाना जाता था.

इतिहासकारों में हालांकि चितपावन ब्राह्मणों को ले कर जो कुछ मतभेद हैं वे भी कम दिलचस्प नहीं लेकिन आरएसएस का जनक यही समुदाय है जो हिंदू राष्ट्र का कट्टर हिमायती रहा है और ब्राह्मणवाद फैलाना भी इस का मकसद रहा है. इसी समुदाय के कुछ चर्चित नामों को सुन कर ही यह धारणा तथ्य में बदल जाती है ये कुछ नाम हैं – विनायक दामोदर सावरकर, नाना फडवनीस, बाल गंगाधर तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले, विनोबा भावे, नाथूराम गोडसे, नारायण आप्टे, गोपाल गोडसे और संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार से ले कर वर्तमान मुखिया मोहन भागवत तक सभी चितपावन ब्राह्मण हैं जिन में हिंदू राष्ट्र की जिद जूनून की हद तक मौजूद है.

इस जूनून के पीछे की वजह यह भी है कि चितपावन ब्राह्मण हिंदुत्व के सूत्र अपने हाथ में रखना चाहते हैं. इसलिए अपवादों को छोड़ कर ही आरएसएस का मुखिया चितपावन ब्राह्मण ही रहा. दरअसल में चितपवानों को दूसरे ब्राह्मण सम्मान नहीं देते हैं और उन से रोटीबेटी के रिश्ते करने से भी कतराते रहे हैं. यह अनदेखी और अपमान आक्रामक तरीके से चितपावन ब्राह्मणों में आया तो वे देखते ही देखते हिंदुत्व के ठेकेदार और पैरोकार बन बैठे. लेकिन आज भी उन्हें स्थानीय ब्राह्मण ब्राह्मणों सरीखा दर्जा नहीं देते लेकिन काम उन्हीं की छत्रछाया में करते हैं.

हिंदू राष्ट्र के अपने मकसद को परवान चढ़ाने आरएसएस ने तबियत से पूजापाठ मठमंदिरों के कारोबार को हवा दी जिस का फायदा दूसरे ब्राह्मणों ने उठाया. मनुवादी होने के नाते वे भी चाहते हैं कि युग पौराणिक हो या लोकतंत्र का हो उन का धंधा फलताफूलता रहे समाज के नुकसान से इन्हें भी कोई सरोकार या वास्ता नहीं.

भीमराव आंबेडकर संघ को बीमार लोगों का संगठन बताते थे. अपनी किताब जातियों के विनाश में उन्होंने इस विषय पर विस्तार से व्याख्या की है जो कहीं से भी अतार्तिक नहीं लगती. मौजूदा दौर के नेता भी संघ को कटघरे में खड़ा करने का कोई मौका नहीं चूकते खासतौर से कांग्रेस और राहुल गांधी तो हर कभी हमलावर रहते हैं.

इंद्रेश कुमार के बयान से जो बबंडर सियासी गलियारों में मचा है उस पर कांग्रेस नेता और प्रवक्ता पवन खेड़ा कहते हैं कि आरएसएस को कोई गंभीरता से नहीं लेता तो हम क्यों लें. आरएसएस वक्त पर क्यों नहीं बोला कि भाजपा और मोदी अहंकारी हो चले हैं और अहंकार के ये बीज बोए भी तो उसी ने थे. आरएसएस ने भी सत्ता का सुख लिया. इंद्रेश कुमार के विपक्ष को रामद्रोही कहने पर भी उन्होंने एतराज दर्ज कराया.

अब तो इस वाक युद्ध में जेडीयू भी कूद पड़ी है जिस का असर गठबंधन सरकार पर पड़ सकता है. जेडीयू के एक एमएलसी खालिद अनवर के मुताबिक इंद्रेश कुमार आरएसएस के बड़े नेता हैं इन के ऊपर आतंकवाद और ट्रेन ब्लास्ट के आरोप थे. जब भाजपा की सरकार आई तो इन को मुक्ति मिली. भाजपा का अगर बुरा हाल हुआ है तो इस पर वही मंथन करेगी इस में आरएसएस को नहीं पड़ना चाहिए.

लेकिन इस पचड़े में पड़ना आरएसएस की एक चालाक मजबूरी हो गई है. जिस का मकसद या याद दिलाना है कि भाजपा को सत्ता के शिखर तक पहुंचाया तो हम ने ही है. तय है पवन खेड़ा हों या खालिद अनवर वे यह भी बेहतर जानते हैं कि संघ और भाजपा का रिश्ता पिता पुत्र सरीखा है. यह और बात है कि बेटे के पांव में पिता का जूता आ जाने के बाद भी पिताजी जूते पर से अपनी दावेदारी नहीं छोड़ रहे.

असल में भाजपा की दुर्गति और फिर उस का गठबंधन सरकार बना लेना वह भी जद यू और टीडीपी जैसे सैक्युलर दलों के साथ, संघ को हजम नहीं हो रहा. इस से उस की की हिंदू राष्ट्र और मनुवाद थोपने की मुहिम खटाई में पड़ने लगी है. शपथ के पहले ही नरेंद्र मोदी का संविधान को माथे से लगाना इस का आगाज ही है.

रही बात अहंकार की तो वाकई में मोदी अहंकारी हो गए थे. चुनाव प्रचार अभियान उन्ही के इर्दगिर्द रहा था. वोट भाजपा के नहीं बल्कि मोदी के नाम पर मांगे गए थे. गारंटी भी मोदी की दी गई थी भाजपा की नहीं. बातबात में मोदी मैंमैं करते रहे थे और आखिर में तो खुद को नौन बायोलौजिकल बता कर अहंकार की सीमाएं पार कर दी थीं.
4 जून को वोटर ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया. इस सदमे से मोदी और भाजपा मुद्दत तक उबर पाएंगे ऐसा लग नहीं रहा. इंद्रेश कुमार जैसे संघियों को भी समझना चाहिए कि वोट धर्म हिंदुत्व या राम के नाम पर नहीं पड़ा है और मोदी अगर संघ को भाव नहीं दे रहे तो यह राजनीति का पौराणिक सिद्धांत भी है कि इस में बाप पर भी भरोसा न करने की नसीहत हर कोई देता है.

बेहतर तो यही है कि संघ, भाजपा और मोदी को अब हिंदू राष्ट्र के लिए नहीं बल्कि धर्म निरपेक्ष भारत के लिए काम करना चाहिए. राम नाम का जप छोड़ देना चाहिए जिस का राष्ट्रीय स्वाभिमान से कोई लेनादेना नहीं. इस के बाद भी वे वाज नहीं आते हैं तो जनता है, उस का विवेक और शक्ति है जो उन्हें और नीचे ला पटकेगी. राम ने नहीं बल्कि जनता ने यह फैसला दिया है कि मोदी और भाजपा सैक्युलर पार्टियों से दब कर और डर कर जनहित के काम करें, नहीं मानेंगे तो विकल्प भी जनता के सामने हैं जिस को शक्ति भी उसी ने दी है.

मेरा बेटा पढ़ाई में सीरियस हो जाए, इसके लिए मैं क्या करूं?

सवाल

मेरा बेटा चौथी क्लास में पढ़ता है. वैसे तो वह पढ़ाई में अच्छा है लेकिन पढ़ाई के नाम से भागता है. लेकिन जब पढ़ता है तो फटाफट सब याद कर लेता है. मुझे लगता है कि यदि वह पढ़ाई से जी न चुराए तो बहुत ही अच्छे नबंर ला सकता है.

जवाब

आप का बच्चा शार्प मांइड का है. वैसे न पढ़ने के बहाने मारता है तो आप कुछ पेरैंटिंग टिप्स अपना कर देखें जिस से बच्चे की न पढ़ने की आदत छूट जाए और वह खुद बैठ कर पढ़ना शुरू कर दे.

सब से पहले तो यदि आप अपने बच्चे की तुलना किसी और बच्चे के साथ करते हैं तो यह करना छोड़ दें. बल्कि उसे मोटिवेट करें कि वह और बच्चों से बेहतर कर सकता है.

दूसरे, पढ़ाई का प्रैशर बच्चे पर पढ़ाई का डर पैदा कर देता है, जिस से वह पढ़ाई से दूर भागने लगता है. उस से केवल पढ़ाई के समय ही पढ़ाई की बातें करें. तीसरे, पढ़ाई करने के लिए एक बेहतर रूटीन बनाना बेहद जरूरी है. इस से बच्चे में अनुशासन आएगा और वह हर काम समय पर करेगा. शुरू में उसे लंबे समय तक पढ़ने के लिए न बैठाएं. बड़ी बात, उस के सामने से वे चीजें हटा दें जो उस का ध्यान भटकाती हों, जैसे मोबाइल फोन, खिलौने प्लेइंग गैजेट्स आदि.

उस की कमियां निकालना बंद कर दें. इस से बच्चा उदास हो जाता है. कमियां निकालने से बच्चे को लगता है वह कुछ अच्छा कर ही नहीं सकता. इसलिए बच्चे को सराहें, प्यार करते उस की हौसलाअफजाई करें ताकि वह अच्छा करने के लिए उत्साहित रहे.

मशीन : सुबह के बजते अलार्म को देखकर उसके मन में क्या ख्याल आ रहे थे

इलैक्ट्रौनिक अलार्म की अपेक्षाकृत मधुर आवाज उसे बहुत कर्कश लगी और उस की आंखें खुल गईं. उस ने पास सोए पति व बच्चों पर नजर डाली. सभी बेखबर खर्राटे ले रहे थे. उस के जी में आया वह भी उन्हीं की तरह सोई रहे. वह करवट बदल कर सोने की कोशिश करने लगी. लेकिन शीघ्र ही उसे एहसास हुआ कि उस के दैनिक जीवन में सुकून नाम की चीज नहीं रह गई है. थोड़ा सा अलसा कर उठने से अस्पताल पहुंचने में लेट हो जाएगी. जब उस के वरिष्ठ डा. मयंक उसे अपने चश्मे में से घूरेंगे तो उसे बिलकुल अच्छा नहीं लगेगा. लेट होने पर उस के मरीजों को भी असुविधा होती है. यही सब सोच कर वह अलसाती हुई उठ गई और पति व बच्चों को आवाज लगाई.

उठते ही वह तेज गति से दैनिक कर्मों से निवृत्त हो कर रसोई में पहुंची. जल्दीजल्दी पति व बच्चों का नाश्ता बनाने की तैयारी करने लगी. अपनी तमाम व्यस्तताओं में भी वह सुबह का नाश्ता अपने हाथों से ही बनाती थी. यों खाना बनाने वाली बाई थी लेकिन सभी की फरमाइश और स्वयं की इच्छा से वह इतना तो करती ही थी. फिर खाना बनाने वाली बाइयां भी कहां ढंग का खाना बनाती हैं. हर नई बाई के आने के बाद कुछ दिन तक तो सब ठीक रहता है लेकिन फिर सभी उस खाने से मुंह बनाने लगते हैं. पिछले हफ्ते जो बाई काम छोड़ कर गई उस का कहना था कि इतनी सुबह उस का पति उसे छोड़ता नहीं, इसलिए वह सुबह जल्दी काम पर नहीं आ सकती. उस ने सोचा, मुझ से तो वह बाई अच्छी है जो जल्दी न पहुंच पाने की वजह से काम छोड़ कर चली गई. लेकिन क्या वह ऐसा कर सकती है? फिर उसे खुद ही अजीब लगा कि वह अपनी तुलना किस से कर रही है. यही सब सोचते हुए उस की तंद्रा तब टूटी जब गैस पर रखी चाय उफन कर बाहर गिरने लगी.

किसी तरह रसोई से निबट कर उस ने गराज से गाड़ी निकाली ही थी कि बालकनी से पति की आवाज आई, ‘‘दोपहर को जल्दी लौट आना. मुझे दोपहर की ट्रेन से दिल्ली जाना है, तैयारी करनी है.’’ ‘तैयारी में क्या करना है? 2 जोड़ी कपड़े ही तो रखने हैं, वे भी इस्तिरी किए हुए अलमारी में रखे हैं. रख लेना ब्रीफकेस में खुद ही,’ उस ने सोचा कि वह कह दे लेकिन यंत्रवत उस की गरदन जल्दी आने की स्वीकृति में हिल गई. वह जानती थी, तैयारी का तो बहाना है. पति जब भी बाहर जाते, तैयारी के बहाने बुलाते थे और…

सड़क पर चलते लोगों को देखती और सभी की तुलना स्वयं से मन ही मन करती वह अस्पताल की तरफ बढ़ रही थी. ‘क्या ये सभी लोग मेरी ही तरह, मशीन की तरह सड़कों पर चलते रहते हैं?’ उस ने सोचा. वह कब रेलवे क्रौसिंग पर पहुंच गई, पता ही न चला. गेट रोज की तरह बंद था. उस ने बेबसी से रुकी भीड़ में स्वयं को खड़ा कर लिया और रेल गुजरने की प्रतीक्षा करने लगी. शीघ्र ही धड़धड़ाती ट्रेन गुजरी. उस ने स्वयं की तुलना उस इंजन से की जो ट्रेन को खींचे जा रहा था और डब्बे उस के पीछेपीछे बरबस भागते जा रहे थे. वह सोचने लगी, ‘क्या इस ट्रेन में और मुझ में कोई फर्क है? शायद नहीं, दोनों ही समय से बंधे चले जा रहे हैं.’

अस्पताल में गाड़ी पार्क कर ही रही थी कि डा. सुरेंद्र से सामना हो गया. वे बोले, ‘‘नमस्कार, मैडम.’’

‘‘नमस्कार, सर.’’

डा. सुरेंद्र ने उसे लगभग घूरते हुए कहा, ‘‘रात की थकावट शायद अभी तक गई नहीं.’’

उन के इस द्विअर्थी संवाद पर वह मन ही मन झल्ला गई, लेकिन प्रकट में मुसकराते हुए बोली, ‘‘हां, रात को ओटी से निकलतेनिकलते साढ़े 11 बज गए थे और सवा 12 बजे घर पहुंची.’’ केबिन में पहुंचते ही इंटरकौम बज उठा. उस ने यंत्रवत रिसीवर उठाया और बोली, ‘‘हैलो…हां…अभी आई…’’

फिर उस ने रिसीवर रख दिया और थोड़ा सामान्य होने के लिए कुरसी से पीठ लगाई ही थी कि दवाएं बनाने वाली कंपनी का एक प्रतिनिधि आ गया, ‘‘नमस्कार, मैडम. मुझे थोड़ा बाहर जाना है. आप यदि अभी वक्त दे देतीं तो…’’ ‘‘अभी नहीं, 11 बजे से आधा घंटा आप लोगों के लिए ही मैं ने तय कर रखा है. उसी समय आइएगा,’’ उस ने स्वाभाविक मुसकान लाने की कोशिश करते हुए कहा. चाय के बाद वह डा. मयंक के केबिन की ओर चल दी. उन के केबिन में 2-3 लोग और बैठे थे. डा. मयंक ने उसे देखते ही कहा, ‘‘आइएआइए, हम लोग आप का ही इंतजार कर रहे थे.’’

उस के बैठने के बाद डा. मयंक ने कहा, ‘‘ये लोग बैड नं. 10 वाले मरीज के रिश्तेदार हैं.’’

उस ने उन लोगों की तरफ सहज नजर डाली. उन में से एक नेतानुमा आदमी था.

‘‘इन का कहना है कि आप इन के मरीजों का खास खयाल रखें,’’ डा. मयंक ने कहा.

‘‘लेकिन मैं तो सभी मरीजों का खयाल खास ढंग से ही रखती हूं. यथासंभव सर्वश्रेष्ठ इलाज करती हूं,’’ उस ने नेतानुमा आदमी को देखा, फिर डाक्टर से कहा.

‘‘मैं अपनी पार्टी का जिला अध्यक्ष हूं और ये हमारे समर्पित कार्यकर्ता हैं. इन्हीं का मरीज है,’’ नेतानुमा सज्जन ने कहा.

‘यहां भी…मरीज के इलाज में भी नेतागीरी. अरे भई, क्या दूसरी कोई जन समस्याएं नहीं हैं जो यहां भी अपनी ही चला रहे हो. हमारे लिए सभी मरीज एकमान होते हैं. अपनी यह नेतागीरी कहीं और दिखाइए. हमें मत सिखाइए कि किस मरीज का क्या इलाज करना है,’ उस ने सोचा कि वह उस नेता से कह दे. लेकिन वह ऐसा नहीं कह सकी क्योंकि डा. मयंक बाद में उसे उपदेशात्मक तरीके से इस प्रकार की दुनियादारी सिखाते थे. हालांकि कई बार उन की आंखों में भी उस ने बेबसी के भाव देखे थे.

‘‘ठीक है,’’ कह कर वह बाहर आ गई.

लंबे जनरल वार्ड में वह मरीज दर मरीज देखती जा रही थी. सभी मरीजों के रिश्तेदार उसे आशाभरी नजरों से देखते. कइयों की नजरों में तो उसे स्वयं के प्रति श्रद्धाभाव नजर आता. हर एक की बस एक ही चाह, एक ही निवेदन कि उस के मरीज को वह ज्यादा ध्यान से देखे. अपने जूनियर डाक्टरों और नर्सों को निर्देश देतेदेते तो लगभग वह निढाल हो जाती. जैसेतैसे केबिन में पहुंचती. थक कर चूर हो जाने के बाद भी आराम से बैठना संभव नहीं होता था. उस ने चाय का पहला ही घूंट भरा था कि एक मरीज का रिश्तेदार और उस के पीछे नर्स दौड़ती आई.

‘‘मरीज की हालत बहुत गंभीर है, जल्दी चलिए,’’ उन्होंने चिल्लाते हुए कहा.

उस ने सोचा कह दे, ‘चलिए, चाय पी कर आती हूं. 2 मिनट में कोई पहाड़ नहीं टूट जाएगा.’ लेकिन वह कह न सकी. बैड तक पहुंचतेपहुंचते मरीज की नाड़ी रसातल को जा चुकी थी.

‘यदि मैं चाय पी कर आती तो उस का जिम्मेदार मुझे ही ठहराया जाता,’ यह सोच कर ही उस के सारे शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गई. मरीज के सीने और पैरों पर मालिश कर के उसे लौटा लाने की कोशिश की लेकिन उस की कोशिश नाकाम रही. मरीज के रिश्तेदार दहाड़ मार कर रोने लगे. एक तो उस के गले में हाथ डाल कर रोने की कोशिश करने लगा. किसी तरह उस से बच कर वह अपने केबिन में पहुंची. एसी को थोड़ा और तेज किया. चपरासी को 10 मिनट तक किसी को भी अंदर न आने का निर्देश दे कर वह कुरसी में धंस गई. आंखें बंद कर के थोड़ा आराम किया कि टैलीफोन बज उठा.

शहर के दूसरे छोर पर स्थित एक नर्सिंग होम से फोन था. कल ही वहां उस ने एक मरीज को भेजा था. उसी की स्थिति के बारे में फोन आया था. उधर से डा. अशोक कह रहे थे, ‘‘आप को अभी आना पड़ेगा. मरीज की हालत गंभीर है.’’ डा. अशोक के नर्सिंग होम तक जाना है, यह सोच कर ही उसे पसीना आ गया. इतनी गरमी और दूरी, फिर इतना ट्रैफिक. लेकिन और कोई चारा भी तो न था. ‘घर पर फोन कर के बता दूं कि मेरा आना जल्दी नहीं हो सकेगा,’ उस ने सोचा और घर का नंबर औपरेटर से मांगा.

‘‘मैं आप के जाने तक आ नहीं सकूंगी. डा. अशोक के नर्सिंग होम जाना पड़ेगा. एक मरीज की हालत गंभीर है.’’

‘‘लेकिन मेरी तैयारी का क्या होगा?’’ पति ने पूछा.

‘‘खुद ही कर लेना.’’

‘‘लेकिन…’’ इस के साथ ही उधर से फोन धड़ाक से रखने की आवाज आई तो उसे लगा जैसे डा. अशोक के नर्सिंग होम दूर होने और मरीज के गंभीर होने की जिम्मेदार वह खुद है.

डा. अशोक के नर्सिंग होम से लौटते वक्त तक पति की ट्रेन का समय हो चला था. इसलिए उस ने गाड़ी सीधे रेलवे स्टेशन की ओर मोड़ दी. प्लेटफौर्म पर पहुंचते ही पति मिल गए. वे बहुत खफा थे, ‘‘सारा मूड चौपट कर दिया,’’ उन्होंने गुस्से से कहा. उसे लगा कि जैसे वह किसी अक्षम्य अपराध की अपराधिनी हो. ट्रेन प्लेटफौर्म छोड़ चुकी थी, लेकिन वह उस से बेखबर कहीं खड़ी थी.

‘‘नमस्ते, मैडम,’’ इस आवाज ने उस की तंद्रा तोड़ी. उस ने देखा एक अनजान आदमी उस के सामने हाथ जोड़े खड़ा है.

‘‘नहीं पहचाना?’’ वह मुसकराते हुए बोला, ‘‘महीना पहले मेरी पत्नी का इलाज आप ने किया था. अब वह पूरी तरह ठीक है. बहुत मेहरबानी आप की. आप सदा खुश रहें,’’ उस के हाथ श्रद्धा से और बंध गए.

‘‘अच्छाअच्छा,’’ कहते हुए उस के चेहरे पर एक मुसकराहट तैर गई.

जब वह घर पहुंची तब तक 4 बज चुके थे. गेट पर ही गाड़ी देख कर दोनों बच्चे दौड़े आए और कार का दरवाजा खोल कर अंदर आ गए. फिर दोनों उस से लिपट गए. एक पल को उस की सारी थकावट दूर हो गई. फिर कमरे में पहुंचते ही बिस्तर पर निढाल हो कर लेट गई.

‘‘मां, भूख लगी है, कुछ खाने को दो,’’ दोनों बच्चे चिल्ला रहे थे. अकसर ही यह होता था कि वह थकीहारी लौटती तब तक बच्चे स्कूल से आ कर नाश्ता कर के सो रहे होते या वह थोड़ी भी लेट हो जाती तो उन का खाना खाने का समय हो चुका होता.

उस ने रामू को आवाज लगाई.

‘‘जी, बीबीजी.’’

‘‘बच्चों का खाना लगा दो.’’

‘‘और बीबीजी, आप?’’

‘‘हां मां, आप भी,’’ बच्चे बोले.

‘‘नहीं, मैं थोड़ा आराम करना चाहती हूं. तुम दोनों खाओ.’’

‘‘नहीं, आज हम आप के साथ खाएंगे. आप के साथ खाए हुए कितने दिन हो गए,’’ बच्चे एकसाथ जिद करने लगे.

उस ने दोनों को डांट दिया, ‘‘जिद नहीं करते, जाओ और खाना खा लो.’’ बच्चे रोंआसे हो कर उस की तरफ सहमी नजरों से देखते हुए खाना खाने चले गए. लेकिन थोड़ी देर में ही उस का ममत्व जागा, ‘क्या बच्चों की जिद गलत है. वे भी आखिर अपने मातापिता से यह अपेक्षा कर ही सकते हैं. क्या भौतिक सुविधाएं जुटा देना ही काफी है. बच्चों को भावनात्मक सान्निध्य भी तो चाहिए.’ एक पल में ही उस के विचारों की शृंखला कहां से कहां तक पहुंच गई. फिर उस ने भी तो सुबह से खाना नहीं खाया था. वह उठ कर हाथमुंह धो कर बच्चों के पास जा पहुंची. तब दोनों बच्चों की आंखों में अनोखी चमक आ गई, वे उत्साह से खाना खाने लगे. खाना खाने के बाद वह आराम करने लगी और बच्चे वीडियो गेम्स खेलने लगे. अजीबअजीब कर्णभेदी आवाजें उस के आराम में बाधा डाल रही थीं. अभी आंख लग ही रही थी कि रामू ने सहमते हुए आवाज लगाई, ‘‘बीबीजी…’’

उस ने आंखें खोलीं और प्रश्नवाचक नजरों से रामू को देखा तो वह हिम्मत जुटा कर बोला, ‘‘डा. जैनेंद्र का फोन है, आप को फौरन बुलाया है.’’

‘‘उन से कह दो कि मैं अभी आराम कर रही हूं.’’

थोड़ी देर बाद फिर रामू आया और कहने लगा, ‘‘वे कह रहे हैं कि प्रसूति केस है और मरीज की हालत गंभीर है. आप को फौरन आने को कहा है.’’

‘आज मैं नहीं आ सकती डाक्टर साहब, आज मैं आराम करना चाहती हूं,’ उस ने सोचा कि वह डा. जैनेंद्र से स्पष्ट शब्दों में कह दे. लेकिन उन से व्यावसायिक और मित्रवत रिश्तों को मद्देनजर रखते हुए वह ऐसा न कह पाई. उस ने वहां पहुंचने की स्वीकृति दे दी. लेकिन साथ में यह शर्त जोड़ दी कि गाड़ी उन्हें भेजनी होगी.

‘‘मां, आज पार्क में घूमने चलते हैं. कितना मजा आया था जब पिछली बार वहां गए थे,’’ दोनों बच्चों ने उसे लगभग झकझोरते हुए कहा. वह उस समय तैयार हो रही थी.

उस ने अपना अक्स आईने में देखा और मानो खुद से ही कहा, ‘बहुत चाह थी तुम्हें कुछ कर दिखाने की और जो तुम आज हो, उस की कीमत क्या ये बच्चे नहीं चुका रहे हैं? माना कि तुम एक आम मां नहीं हो, लेकिन बच्चे तो आम और खास नहीं होते. वे चाहते हैं मां का सान्निध्य, मां का असीम प्यार. लेकिन क्या तुम अपनी व्यस्तताओं, अपनी कमाई के नशे में इतनी दूर नहीं निकल गई हो जहां तक इन बच्चों की आवाज नहीं पहुंच पाती?’ और वह स्वयं के ही इस प्रश्न से खुद ही अनुत्तरित हो गई. उस ने बच्चों के सिर पर प्यार से हाथ फेरा मानो बगैर कहे ही सब कुछ कह देना चाहती हो. कुछ पल वह इसी तरह बच्चों को लिपटाए खड़ी रही और फिर ‘‘कल चलेंगे,’’ कह कर उन को रामू के सिपुर्द कर के तैयार होने लगी. डा. जैनेंद्र के नर्सिंग होम से लौटते हुए 9 बज चुके थे. बच्चे टीवी देखने में मशगूल थे और रामू एक कोने में बैठा उनींदा सा उसी की राह देख रहा था. उस ने सुबह जल्दी आने की हिदायत के साथ उसे छुट्टी दी और कपड़े बदल कर शयनकक्ष में बच्चों के साथ टीवी देखने लगी. उसे अचानक स्वयं का नर्सिंग होम खोलने की बात पर पति से हुई तकरार याद हो आई. उस के चेहरे पर ऐसे भाव आए जैसे कोई कड़वी चीज मुंह में आ गई हो.

वह दिन उसे अच्छी तरह याद है जब पतिदेव बहुत खुशखुश घर पहुंचे और चहकते हुए बोले, ‘मैडम, बहुत जल्द आप का एक नर्सिंग होम होगा. बहुत जल्द आप एक अदद नर्सिंग होम की मालकिन बनने जा रही हैं.’ एक क्षण को तो उस की आंखों में चमक आई लेकिन अगले ही क्षण वह गायब हो गई.

‘क्या बात है, तुम सुन कर खुश नहीं हुईं?’ पति ने हैरानी से पूछा था.

‘रहने दो यह सब, मुझ से यह सब नहीं होगा.’

‘लेकिन स्वयं का नर्सिंग होम खोलने जैसी प्रतिष्ठित बात पर भी तुम खुश नहीं हो. जानती हो, नर्सिंग होम खोलना आज सब से फायदे वाली बात है. और फिर क्या उस से प्रतिष्ठा नहीं बढ़ती?’

‘हां बढ़ती है. लेकिन आज भी हमारी काफी प्रतिष्ठा है और कमाई भी काफी है.’

‘तुम्हें मालूम नहीं, मेरे सभी साथियों ने खुद के नर्सिंग होम खोल लिए हैं. और मैं उन से पिछड़ना नहीं चाहता. नर्सिंग होम अब मेरे लिए कमाई के साथसाथ प्रतिष्ठा का प्रतीक भी बन गया है.’

‘आप का यह प्रतिष्ठा का प्रतीक हमारा कितना सुखचैन छीनेगा, क्या यह आप से छिपा है? जिन दोस्तों से आप पिछड़ना नहीं चाहते, क्या उन का हाल आप नहीं जानते. वे खाने तक का पर्याप्त समय नहीं निकाल पाते. फिर अभी ही हम बच्चों के लिए समय नहीं निकाल पाते. सुखसुविधाएं जो हम ने जुटाई हैं, क्या उन का समुचित उपभोग करने का समय है हमारे पास?’

‘न सही, कुछ पाने के लिए कुछ तो खोना ही पड़ता है. बच्चों के लिए ही हम यह सब कर रहे हैं. फिर उन के लिए घर में किस चीज की कमी है. देखभाल के लिए नौकरचाकर हैं…’

‘आप नहीं समझ पाएंगे क्योंकि आप पिता हैं. आप के इस ‘कुछ’ खोने में बच्चे कितना कुछ खोते जा रहे हैं, आप शायद नहीं समझ पाएंगे.’

‘तुम कहना चाहती हो कि चिंता मुझे बिलकुल नहीं है? मैं उन की देखभाल नहीं करता? यह सारी भागदौड़ किस के लिए करता हूं? क्या तुम ज्यादा समझदार हो?’ कहतेकहते वे बहुत उत्तेजित हो गए थे. इसी तरह तर्कवितर्क बहुत देर तक चलता रहा. अब पति इसी सिलसिले में दिल्ली गए थे. जिन बच्चों को ले कर बहस हो रही थी वे वहीं सहमे डरे खड़े थे, लेकिन कुछ भी समझ पाने में असमर्थ थे. उस ने इसी सोचने की रौ में बहतेबहते बच्चों की तरफ देखा. दोनों सोए हुए थे. उस ने उन के सिरों पर स्नेह से हाथ फेरा. फिर यही सब सोचतेसोचते उसे कब नींद आ गई, पता ही न चला.

समझौता ज़िन्दगी और मौत का : दूल्हा बना रामबिलास मंडप में क्यों हिचकिचा रहा था

बात सन 1920 की है. कार्तिक का महीना था. गुलाबी सर्दी पड़ने लगी थी. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बसे छोटे से गांव गिराहू में, सभी किसान  दोपहर बाद खेतों से थके-हारे लौटे थे. बुवाई का समय निकला जा रहा था, सभी व्यस्त थे. पर सब लोग पंचों की पुकार पर पंचायत के दफ्तर में इकट्ठे हो गए थे. बस पंचों के आने का बेसब्री से इंतज़ार हो रहा था.

एक ओर  गाँव की औरतें होने वाली दुल्हन निम्मो को जबरन  पंचायत के दफ्तर में ले आयी थी और दूसरी तरफ कुछ आदमी होने वाले दूल्हे रामबिलास का हाथ  पकड़कर बाहर पेड़ के नीचे खड़े थे.  वह भी इस शादी के नाम पर हिचकिचा रहा था.

सारे गाँव वाले इस शादी के पक्ष में थे पर वर और वधू, दोनों ही इस शादी के लिए तैयार न थे. आखिरकार मामला पंचायत में पहुंचा दिया गया था. पंचायत का फैसला तो  सबको मानना ही पड़ेगा. बस पंचों के आने का इंतज़ार था पर पंच अभी तकआये नहीं थे.

अंदर के कमरे में बैठी निम्मो शादी के लिए तैयार ही नहीं हो रही थी.

“मुझे ये शादी नहीं करनी है,” कहते हुए निम्मो ने एक बार फिर हाथ छुड़ाने का असफल प्रयास किया तो पड़ोस की बुज़ुर्ग काकी बोली, “चुपकर, मरी. शादी नहीं करेगी तो भरी जवानी में कहाँ जायेगी?”

सभी उपस्थित औरतों ने काकी की बात से सहमति में सिर हिलाया.

“हाँ तो और क्या? मरद के सहारे के बगैर भी भला औरत को कोई पूछे है क्या?” दूसरी पड़ोसन बोली.

“काहे का सहारा देगा मुझे? अपनी सुध तो है नहीं उसे. अरे बच्चा है वो तो?” निम्मो ने खीजकर  पलटवार किया.

काकी ने एकबार फिर  ज्ञान बघारा, “कैसा बच्चा? अरे मरद तो है ना घर में ? मिटटी का ही हो, मरद तो मरद ही होता है. और क्या चाहिए औरत को?”

बाहर कुछ सरगर्मी हुई.  शायद पंच आ गए थे.  पंचायत बैठी तो फैसला सुनाने में दो मिनट भी न लगे. रामबिलास, अपने भाई हरबिलास की विधवा निम्मो को चूड़ी पहनायेगा और आज से वो मियां-बीवी कहलायेंगे. निम्मो ने आवाज़ उठाने की कोशिश की तो सबने उसे चुप करा दिया.

उधर सरपंच ने ऊंची आवाज़ में कहा, “अरे ओ रामबिलास! कहाँ  मर गया रे. चल, जल्दी कर. ये लाल चूड़ियाँ डाल दे अपनी भाभी  के हाथ में. चल आज से ये तेरी जोरू हुई. ख़याल रखना इसका और इसके लड़के का. वो भी आज से तेरा लड़का ही हुआ. ”

“चलो अच्छा ही  है. बिना शादी किये ही लड़का मिल गया,” किसी ने पीछे से चुटकी ली.

पंचायत के दो टूक फैसले से सहमा सा रामबिलास जब चूड़ियाँ लेकर निम्मो के पास पहुंचा तो निम्मो ने अपने हाथ पीछे खींच लिए. पर गाँव की औरतें कहाँ मानने वाली थी? साथ बैठी औरतों ने उसके हाथ ज़बरन पकडे और रामबिलास से उनमें लाल कांच की चूड़ियाँ डलवा दीं. कहीं से कोई एक चुटकी सिन्दूर भी ले आई और रामबिलास से निम्मो की मांग में डलवा दिया. निम्मो की नम आँखों को किसी ने नहीं देखा या शायद देखा तो अनदेखा कर दिया.  पास बैठी औरतों में से एक ढोलक उठा लाई और सबने शादी के गीत गाने शुरू कर दिये.

और इस तरह रामबिलास की शादी अपने बड़े भाई हरबिलास की विधवा निम्मो से हो गयी.

इसी तरह बन्ने-बन्नी गाते-गाते रात हो गयी और गांव की औरतें निम्मो को उसकी कोठरी में धकेल कर बाहर निकल गयीं. पड़ोस की काकी ने बाहर से आवाज़ दी, “अरी निम्मो, तेरा बेटा हरिया आज हमारे घर में रहेगा. फ़िक्र न करना.”

निम्मो का दिमाग तो बिलकुल सुन्न हो गया था. उसे समझ में ही नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. कुछ देर सोचती रही, फिर थककर बिस्तर पर बैठी ही थी कि कोई रामबिलास को भी कमरे में धकेल गया और बाहर से कुंडी लगा दी. सहमासकुचाया सा रामबिलास कोठरी में आकर दो मिनट तो खड़ा रहा.  फिर जैसे ही लालटेन की बत्ती बुझाने बढ़ा, निम्मो ने खिन्न मन से कहा, “देवर जीये बत्ती-वत्ती बाद में बुझाना. यह दरी ले लोऔर उधर ज़मीन पर सो जाओ.”

रामबिलास ने चुपके से दरी उठाई और कोठरी के एक कोने में बिछाली. वह सुबह से परेशान था और थका हुआ था.  थोड़ी ही देर में उसके खुर्राटों की आवाज़ कोठरी में गूंजने लगी. पर निम्मो की आँखों में नींद कहाँ थी? यह वही कोठरी थी जहाँ उसके पति की मृत्यु  हुई थी.  वही चारपाई थी और वही लालटेन थी.

उसके पति को मरे अभी एक साल भी नहीं गुज़रा था और देवर से चूड़ी पहनवाकर जबरन उसकी शादी करवा दी गयी थी. ये पंच भी  कैसे पत्थर दिल हैं . इनके दिल में कोई भावनाएं नहीं हैं क्या? क्या कोई अपनों को इतनी जल्दी भुला देता है? क्या पति-पत्नी का रिश्ता सिर्फ जिस्मानी रिश्ता है? निम्मो  का  दिमाग पूर्णतः अशांत था. उसके दिमाग में पिछले सालभर की घटनाये फिल्म की तरह घूम रही थी.

****

करीब एक साल पहले की ही तो बात थी.  पूस का महीना था. कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी.  हवा के थपेड़े तो इतने तेज़ कि मानो झोंपड़ी पर पड़े छप्पर को ही उड़ाकर ले जायेंगे. टूटी हुई खिड़की पर ठंडी हवा को रोकने के लिए लगाया हुआ गत्ता  हिल-हिल कर मानो हवा को अंदर आने का बुलावा दे रहा था. कोठरी के अंदर दीवार के कोने पर लटकी हुई लालटेन की लौ लगातार भभक रही थी.  संभवतःउसमे तेल शीघ्र ही समाप्त होने वाला था.

कोने में एक टूटी सी चारपाई पर हरबिलास लेटा हुआ था. उसका बदन तीव्र ज्वर से तप रहा था. पुरानी मैली सी रज़ाई में उंकडूं होकर किसी तरह वहअपनी ठण्ड मिटाने का असफल प्रयास कर रहा था. पर उसका शरीर की कंपकंपाहट थी कि ख़त्म होने को नहीं आ रही थी. पास ही एक पीढ़े पर वह बैठी थी. तीन  वर्ष का हरिया उस की गोद में सो रहा था. चिंता के मारे उसका सुन्दर चेहरा स्याह पड़ गया था. पति के माथे पर ठन्डे पानी की पट्टी रख-रखकर उसके हाथ भी ठण्ड से सफ़ेद हो गए थे.  पर बुखार था कि उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था.पति के होठ कुछ बुदबुदाये तो उसने आगे झुककर सुनने की कोशिश की.

“राम बिलास कहाँ है?” वो पूछ रहा था.

“उसे भी तेज़ बुखार है. वो दूसरी कोठरी में लेटा है.” उसने धीरे से जवाब दिया था.

“निम्मो, कितने लोग और चल बसे?” हरबिलास की आवाज़ कमज़ोरी और डर के मारे और भी मंद  हो गयी  थी.

“आप फिकर नहीं करोजी, कोई  नहीं गया है. सब ठीक हो रहे हैं,” उसने अपने स्वर को संभालकर झूठ बोला था.
“मुझे नहीं लगता मैं ठीक हो पाऊँगा.  यह महामारी तो कितने प्राण ले चुकी है.  लगता है इसका कोई इलाज भी नहीं हैं,”  उसने फिर कहा था.

“नहीं नहीं.  रामू काका कह रहे थे कल सरकारी अस्पताल का डाक्टर गॉंव में आएगा,” उसने पति को उम्मीद दिलाने की कोशिश की थी.

“अरे डाक्टर ही क्या कर लेगा.  इस प्लेग का तो कहते हैं कोई इलाज ही नहीं हैं. मैंने सुना था बड़े-बड़े अँगरेज़ भी मर गए हैं इससे. फिर हम गरीबों का क्या?”

पास रखी अंगीठी की आंच तेजी से कम होती जा रही थी और लाल अंगारों पर राख की मोटी परतें जमने लगी थी. क्या यह मात्र संयोग था या फिर आने वाले काल का संकेत? तभी पास के मकान से ह्रदय-विदारक विलाप की चीखें सुनाई पड़ी.

“लगता है बाबूलाल भी गया. मुझे लगता है अब मेरी बारी है,” हरबिलास की आवाज़ कांप रही थी.

“शुभ- शुभ बोलो. तुम कहीं नहीं जाओगे मुझे और हरिया को छोड़के,” उसने प्यार भरी झिड़की दी थी.

“ना निम्मो. लगता है मेरा टाइम आ गया है. हरिया और रमिया का ख्याल …” कहते-कहते उसकी सांसें उखडने लगी थी.

घर्र …घर्र …घर्र ………… और फिर उसका सिर एक और लुढ़क गया था.

उसको कुछ समझ नहीं आया था.  वह पथराई आँखों से  कुछ क्षण उसे देखती रही.  फिर जोर से आवाज़ दी, “रमिया, जल्दी आ.  देख तो तेरे भाई को क्या हो गया,” कहते हुए उसने हरिया को गोद से धक्का दिया और अपने पति की छाती को झकझोरने लगी थी.

“क्या हुआ भैया को?” कहते हुए जब रामबिलास कोठरी में घुसा तो उसका चेहरा भी तेज़ बुखार से तप रहा था और आँखें गुडहल के फूल की तरह लाल थी. एक मिनट तो उसने भाई की नब्ज़ देखने की कोशिश की पर वो यह सदमा न सह पाया और बेहोश  होकर ज़मीन पर गिर पड़ा था .

यह घटना सन  1919 की थी. सारे देश में प्लेग की महामारी फैली हुई थी. गिराहू गाँव भी इससे अछूता न था. मौत का तांडव हर रोज़ आठ दस लोगों की बलि ले रहा था. बस एक यही घर बचा हुआ था जिसमे भी आज यमराज के पाँव पड़ गए थे. घर का इकलौता कमाऊ आदमी आज मौत के घाट उतर गया  था.

राम बिलास को होश आ गया था और अब  वह ज़मीन पर बैठा हुआ, रीती आँखों से फर्श की ओर घूर रहा था. आठ साल की उम्र में माँ-बाप दोनों भगवान को प्यारे हो गए थे. तब से आज तक बड़े भैया ने ही उसे बच्चे की तरह संभाला था.  पिछले तेरह साल कैसे निकल गये, उसे पता ही नहीं चला था.  बड़े  भैया ने उसे हर तकलीफ से दूर रखा था. उनके बगैर पता नहीं वह ज़िन्दगी कैसे जियेगा?

वह थोड़ी देर तो गुमसुम बैठी देखती रही, फिर दहाड़ें मारकर रोने लगी थी. उसे पता भी न चला की रामबिलास  कोठरी से कब बाहर निकल गया. कुछ देर बाद जब भोले-भाले हरिया ने उसका हाथ खींचना शुरू किया तो उसे होश आया. आसपास देखा तो रामबिलास कहीं न दिखा.  उसने मन पक्का किया और देवर को देखने बाहर निकली. उसका कहीं नामो-निशान  भी नहीं था. कहाँ चला गया? अभी-अभी तो यहीं था.

घनी काली रात थी और बर्फीली हवाएं अभी भी चल रही थी.  कहाँ जाए, किसको बुलाए? पास के घर में तो अभी कुछ मिनट पहले  ही बाबूलाल की मौत हो चुकी थी. वहां से रोने की आवाज़ें अभी भी आ रही थीं.  हरिया को कमर पर उठाये वह दरवाज़े पर खड़ी ही थी की अचानक चन्दन  काका दिख गये जो शायद बाबूलाल के घर जा रहे थे.

“काका,” उसने सिर पर पल्लू लिया और सिसकना शुरू कर दिया.

“क्या हुआ हरबिलास की बहू?” चन्दन काका की आवाज़ में चिंता थी.

“हरिया के बापू … …भी चले गये.” किसी तरह उसके मुंह से निकला था. उसकी सिसकियाँ  किसी तरह  भी रुक नहीं  रही थी.

“हे राम.हे राम.  रमिया कहाँ है?”

“पतानहींकाका.  अभीतोयहींथा.”

राम बिलास कहीं न दिखा तो चन्दन काका पड़ोस से कुछ और लोगों को ले आये थे और उसके पति के शव को चारपाई से उतारकर ज़मीन पर रख दिया था. गाँव के कुछ बड़े आकर वहां बैठ गए थे. वह लोग मरने वालों की गिनती कर रहे थे. इस रफ़्तार से तो पूरा गाँव ही ख़तम हो जायेगा. निम्मो उनकी बातें नहीं सुन रही थी. वह तो बस सूनी आँखों से ज़मीन को देख रही थी. यह व्यक्ति जो अभी तक उसका पति था, एक क्षण में लाश कहलाने लगा था. सुबह होते न होते उसे जला भी दिया जायेगा. यह कैसी रीत है? यह कैसी दुनिया है? निम्मो और उसका तीन साल का बच्चा हरिया, उनका क्या होगा? पर रमिया?  रमिया कहाँ है? वह तो अपने बड़े  भैया  के बिना रह भी नहीं सकता. उसे इतना बुखार भी है, पर वह है कहाँ? सोच सोचकर उसका दिमाग सुन्न  होने लगा था.

सुबह हुई और उसके पति का अंतिम संस्कार हो गया. साथ ही उसी रात प्लेग की चपेट में आये चार और लोगों का भी. औरतें श्मशान घाट नहीं जातीं है यह कहकर चन्दन काका बस अपने साथ तीन वर्ष के हरिया को लेगए थे.  उसने आपत्ति की तो चन्दन काका ने कहा था, “बाप के मुंह में अग्नि कौन देगा? यही तो देगा न!”

“लगता है किसी मरने वाले की  क्रिया या तेरहवीं भी नहीं हो पाएगी.  पंडित जी खुद भी प्लेग की चपेट में आ गए हैं.  शायद भगवान को यही मंज़ूर है.” श्मशान घाट से लौटने पर उन्होंने कहा था.

रामबिलास का कुछ पता ही नहीं चल रहा था. हफ्ते भर तक गाँव वाले उसे ढून्ढ-ढून्ढकर हार गये थे.  कहाँ चला गया? कोई शेर चीता उसे खा गया या कोई भूत-प्रेत उसे  उठाकर ले गया था ?

पंद्रह दिन कैसे कटे, यह तो अकेली निम्मो ही जानतीथी. कितनी अकेली हो गयी थी वह. दो हफ्ते बाद का वह दिन क्या वह भूल पायेगी? शाम का झुटपुटा हो चला था और घर में अँधेरा होता जा रहा था. कितने दिनों से घर में चूल्हा नहीं जला था. वह हरिया को गोद में सुलाने की कोशिश कर रही थी. अचानक पड़ोस का लड़का गूल्हा रामबिलास को हाथ से पकडे घर में घुसा, “लो भाभी, रमिया भैया आ गए.”

रामबिलास खड़ा-खड़ा सर झुकाए फर्श को घूर रहा था.

उसे देख वह अपने गुस्से पर काबू नहीं कर पाई थी और इतने दिन की सारी भड़ास उसपर निकाल दी थी, “अरे कहाँ मर गया था रे  तू ? मैं अकेली यहाँ परेशान हो रही हूँ. तुझे किसी की कोई फ़िकर-विकर है कि नहीं? सारी ज़िन्दगी निकम्मा ही रहेगा?”

कहते-कहते उस के आंसू बह निकले थे.शायद इतने दिनों का रुका  बांध टूट गया था.

गूल्हा पहले तो अकबकाकर कुछ क्षण उसे देखता रहा था, फिर बोला था, “अरे भाभी, इस बिचारे को ना डांट. ये तो पागल हो गया है. और तो और, इसकी तो ज़बान भी गयी. पहले ही  गऊ था, पर अब तो ….”

सुनकर वह सकते में आ गयी थी. अपना रोना-धोना छोड़कर बोली, “हाय राम! और इसका बुखार?  उतरा कि नहीं?”

भाग के उसने उसके मत्थे पर हाथ रखा और बोली, “चल बुखार तो ठीक हो गया. खाना-वाना खाया कि नहीं?  तेरा स्वेटर कहाँ गया रे? जा बिस्तर में लेट जा. मैं तेरे लिए चाय लाती हूँ.”

पिछले चार साल से उसने छोटे देवर को अपने बच्चे की तरह संभाला था. वही ममता आज फिर उमड़ आयी थी.

चाय बना के लौटी तो देखा हरिया चाचा की गोद में बैठा हुआ था.  रामबिलास  के आंसू बह रहे थे और हरिया उन्हें  पोंछ रहा था.

अगले छह महीनों में प्लेग की महामारी कुछ थम गयी थी औरज़िंदगी फिर से पुराने ढर्रे पर लौटने सी लगी थी. पर रामबिलास को न अपनी सुध थी और न ही वो बोल पा रहा था. बस जब हरिया उसके पास होता उसके चेहरे पर हल्की सी खुशी दिखती थी. जैसे जैसे परिस्थितियां सामान्य होने लगीं, निम्मो उसे लेकर इलाज कराने चली.  बेचारी कहाँ-कहाँ नहीं गयी थी और किस-किस वैद्य, हकीम और ओझाओं के चक्कर नहीं काटे थे. तब कहीं जाकर रामबिलास की जुबान वापिस आयी थी. पर एक उदासी सी उसके चेहरे पर हमेशा के लिए बस गयी थी जो जाने का नाम ही नहीं लेती थी. भाई की कमी उसे हर वक़्त खलती थी. हर वक़्त हँसने-हँसाने वाला रमिया अब गंभीर रामबिलास बन गया था. उसको पति के रूप में स्वीकारना तो किसी भी हालत में संभव नहीं होगा.  पर पंचायत के इकतरफा फैसले के बाद और चारा भी क्या है?

*****

यूं ही सोचते-सोचते कब निम्मो की आँख लग गयी और कब सुबह हो गयी निम्मो को पता ही नहीं चला. आँख खुली तो दिन चढ़ आया था. खिड़की से सूरज की किरणे अंदर झाँक रहीं थी. दरवाज़ा खुला हुआ था और रामबिलास कमरे में नहीं था.

निम्मो धीरे से उठकर बाहर आयी तो देखा पड़ोसन हरिया को वापस छोड़ गयी थी. आँगन में रामबिलास दातुन कर रहा था.  साथ ही एक छोटी सी दातुन उसने हरिया को भी बनाकर दे दी थी.  दोनों मिलकर हंस रहे थे. दातुन हो गयी थी. अब रामबिलास हरिया को कुल्ला करना सिखा  रहा था. निम्मो खड़ी-खड़ी दोनों को देखती रही.  दोनों एकदूसरे के साथ कितने खुश लग रहे थे. दातुन कर के राम बिलास खड़ा हुआ तो हरिया मचल उठा, “काका गोदी .. काका गोदी …”

उसकी आवाज़  सुनकर निम्मो का ध्यान टूटा तो देखा हरिया अपने चाचा की पीठ पर  चढ़ने की कोशिश कर रहा था. रामबिलास ने दातुन ख़तम की और हरिया को गोद में उठा लिया.

” उठ गयी भाभी? अच्छा रोटी दे दे. खेत पर जा रहा हूँ. बुवाई का समय निकलता जा रहा  है, अभी खेती भी शुरू करनी है ना और हाँ, हरिया की रोटी भी बना देना. इसे भी साथ ले जा रहा हूँ.”

“हाँ, बस पांच मिनट में देती हूँ,” और  निम्मो जल्दी से आटा गून्दने लगी.

नाश्ता कर के रामबिलास हरिया को अपने कंधे पर बिठाकर खेत की ओर चल  पड़ा और निम्मो दरवाज़े पर खड़ी काफी देर तक दोनों को जाते हुए देखती रही. लगता था रामबिलास को अपनी ज़िम्मेदारियों का एहसास होने लगा था. कितनी आसानी से उसने घर का ज़िम्मा संभाल लिया था. अपने मृतक भाई की सारी ज़िम्मेदारियाँ, उसकीखेती, उसका बच्चा, उसकी बीबी,  सभीकुछ  मानो आज उसकी ज़िम्मेदारी बन गया था.

शायद ज़िंदगी को यही मंज़ूर था.

समय किसी के लिए नहीं रुकता और जीवन से समझौता करने में ही शायद सबकी भलाई है. उसे महसूस हुआ कि ज़िंदगी और मौत के बीच ज़िंदगी ही ज़्यादा बलवान है. दोनों के बीच आज शायद एक समझौता हो गया था .

 

भटकन : मिताली किस वजह से उदास थी

मिताली से मुलाकात का दिन था. साउथ एक्स के एक रैस्टोरैंट में कौशलजी प्रतीक्षा कर रहे थे तभी मिताली को आते देख उन के चेहरे पर मुसकराहट फैल गई. पर मिताली आज चुपचुप व उदास थी.

‘‘क्या बात है? उदास लग रही हो?’’

‘‘क्या बताऊं, आज का दिन मेरे लिए ठीक नहीं है अभी आते वक्त मैट्रो में किसी ने मेरे बैग से मनीपर्स निकाल लिया. उस में रखे रुपए मां को भिजवाने थे,’’ उस की आंखें छलछला उठीं, ‘‘सौरी, मैं तो आप को खुशी देने आई थी पर अपना ही रोना ले कर बैठ गई,’’ इतना कह कर उस ने टिश्यूपेपर आंखों पर रख लिया.

‘‘तुम भी अजीब लड़की हो. इस में सौरी जैसी क्या बात है. यह बताओ कि कितने रुपए चाहिए मां को भेजने के लिए? कल तुम्हें मिल जाएंगे.’’

‘‘पर आप क्यों…’’ और आवाज रुंध गई थी मिताली की.

‘‘मुझ से यह रोनी सूरत नहीं देखी जाती, समझीं. अब ज्यादा मत सोचो और बताओ.’’

‘‘तो सर, अभी 10 हजार रुपए चाहिए. मां का इलाज भी चल रहा है और…पर मैं ये रुपए अगले महीने ही आप को दे पाऊंगी.’’

‘‘हांहां, यह बाद में सोच लेना. अभी तो अपना मूड ठीक करो और गरमगरम कौफी पियो.’’

‘‘थैंक्स फौर दिस हैल्प, सर,’’ उस ने कौशलजी का हाथ पकड़ धीरे से चूम लिया. कुछ पल वे प्रस्तर मूर्ति बने रह गए, पर मन में कुछ अच्छा लगा था.

2 वर्ष पहले पत्नी रमा की मृत्यु के बाद से कौशलजी उदास व अकेले पड़ गए थे. घर की ओर बढ़ते कदम बोझिल हो जाते. अकेला घर काटता सा प्रतीत होता. यों तो पुस्तकें, टीवी उन के साथी बनने के लिए हाजिर थे पर बातचीत, कुछ हंसी, मस्ती की खुराक के बिना उन का मन उदासी से घिरा रहता.

अब की होली भी अकेली व फीकी ही गई थी. बेटा टूर पर था, बेटी दूसरे शहर में थी. तभी लखनऊ की होली की याद कर के उन के होंठ स्वत: ही मुसकरा उठे. फिर कुछ पल बाद, बुदबुदा उठे, ‘रमा, तुम्हारे साथ ही सारे रंग भी चले गए हैं. लोग कहते हैं कि बढ़ती उम्र के साथ विरक्ति आनी चाहिए लेकिन खुशी के साथ जीने की इच्छा तो हर उम्र में होती है.’

स्वभाव से बातूनी व हंसमुख कौशलजी की उदासी, बेटे के पास दिल्ली की फ्लैट संस्कृति में जस की तस रही. वे यहां अपना अकेलापन दूर करने की इच्छा से आए थे पर बेटा राहुल अपनी जौब में इतना व्यस्त था कि साथ में ब्रेकफास्ट या डिनर भी न हो पाता. आसपास भी हमउम्र नहीं. यंग जैनरेशन अपने जौब आदि में व्यस्त. ऐसे में अखबार, टीवी के बाद, नजदीकी बाजार या पार्क का चक्कर लगा आते.

एक दिन कौशलजी, अपना पीएफ तथा रुकी पैंशन के लाखों में रुपए मिलने की खबर से इतने उत्साहित थे कि तत्काल अपने बच्चों को यह बात बताना चाहते थे. उन्होंने राहुल को फोन लगाया. उस के फोन न उठाने पर दोबारा फोन करते रहे. तब राहुल ने खीज कर कहा कि वह अभी बात नहीं कर सकता. बारबार फोन मत करना. फ्री होने पर वह कौल कर लेगा.

उन्होंने सोचा, ‘हां, राहुल ठीक ही तो कह रहा है. वह उन की तरह फ्री थोड़े ही है. चलो स्वाति बिटिया को बता देता हूं यह बात.’

‘हैलो पापा, मैं एक पार्टी के साथ हूं. बाद में बात करती हूं. बायबाय.’

सभी व्यस्त हैं. एक मैं ही भटक रहा हूं. 2 हफ्ते बीत गए पर बच्चों से बात नहीं हो पाई. उन्होंने भी निश्चय कर लिया था कि बच्चों को डिस्टर्ब नहीं करेंगे.

एक दिन फिर मन भटका तो अपनी अटैची से फोटो एलबम निकाल कर देखने लगे. पत्नी, परिवार, सालीसलहज की फोटो देखतेदेखते अतीत की सुखद यादों में खो गए.

शादी के बाद रमा के साथ जब पहली बार ससुराल गए थे तब शाम को संगीत की महफिल जमी थी. रीना का गाना समाप्त होते ही उन्होंने एक गुलाब का फूल उस की ओर उछाल दिया था. वह फूल उस की कुरती के गले में जा गिरा. तब रीना ने शिकायती नजरों से उन्हें देख अपनी नजरें शरमा कर झु़का ली थीं. इस पर उन्होंने ठहाका लगाते हुए कहा था, ‘भई इकलौती साली साहिबा पर फूल फेंकने का हक तो बनता है.’

इसी बीच, यादों से बाहर आए तो पत्नी रमा की फोटो पर हाथ रखते हुए बुदबुदाए, ‘तुम थीं तो सारी दुनिया जैसे साथ थी. अब एकदम अकेला हो गया हूं. तुम कहा करती थीं कि बच्चों की जिम्मेदारी पूरी होने के साथसाथ तुम्हारा रिटायरमैंट भी हो जाएगा.

तब हम निश्ंिचत हो कर खूब घूमेंगेफिरेंगे, अपने लिए जीएंगे पर तुम तो बीच में ही चली गईं, रमा,’ और उन के गालों पर आंसू लुढ़क आए.

मन को शांत करने के लिए उन्होंने चाय बनाई और उसे पीते हुए, पास रखे अखबार के एक विज्ञापन पर उन की दृष्टि पड़ गई, ‘फ्रैंडशिप क्लब अकेलेपन को दूर करने, निराशा से उबरने का सहज साधन. फ्रैंडशिप क्लब जौइन करें, मोबाइल नंबर 9910033333 एक बार फोन मिलाइए.’

कुछ देर की ऊहापोह के बाद कौशलजी ने वह नंबर मिला लिया. ‘हैलो, नमस्कार. कहिए, मैं आप की क्या हैल्प कर सकती हूं?’ एक मधुर आवाज सुनाई दी.

‘वो…मैं ने अभी फ्रैंडशिप क्लब का विज्ञापन देखा तो…’

‘हां, हां कहिए, आप की क्या समस्या है?’

‘मैं अकेलेपन से परेशान हूं. बताइए क्या तरीका है?’ कौशलजी ने जल्दी से अपनी बात खत्म की.

‘हां, हां, सर, हमारा क्लब खुशी बांटता है. आप का नाम जान सकती हूं?’

‘मैं एक रिटायर्ड व्यक्ति हूं और मेरा नाम कौशल है. थोड़ी बातचीत व नेक दोस्ती द्वारा कुछ महत्त्वपूर्ण समय व्यतीत करना चाहता हूं, बस.’

‘मैं, मिताली हूं. आप की दोस्त बनने को तैयार हूं. पूरी कोशिश होगी कि आप को खुशी दे सकूं और विश्वास दिलाती हूं कि मेरा साथ अच्छा लगेगा. इस के लिए क्लब की कुछ शर्तें होती हैं. मैं अपनी बौस से बात कराती हूं.’

कुछ ही सैकंड्स में दूसरी आवाज आई जो कि क्लब की प्रैसिडैंट नीलिमा की थी, ‘डील के अनुसार, मिताली से आप की मुलाकात किसी रैस्टोरैंट या ओपनप्लेस में ही संभव होगी, हर बार समय डेढ़ से 2 घंटे तक होगा. हर मीटिंग के 2 हजार रुपए कैश देने होंगे. मैंबरशिप की फीस 10 हजार रुपए होगी जो कि 3 माह तक वैलिड होगी और…’

‘फीस तो बहुत ज्यादा है मैडम,’ बीच में ही कौशलजी बोल पड़े.

‘अरे, सर, आप कल अपने घर के पास वाले रैस्टोरैंट में मिलिए. वहां हम तय कर लेंगे. आप रिटायर्ड व्यक्ति हैं, ठीक है, छूट मिल जाएगी. पर क्लब को एक बार अपनी सेवा का अवसर तो दीजिए. कल 12 बजे मुलाकात होगी. मैं और मिताली साथ होंगे. आप का दिन अच्छा हो सर. बायबाय.’ फोन बंद हो गया.

मिताली से हुई दोस्ती से कौशलजी संतुष्ट हो उठे थे. मिताली की बातों का तरीका, उस का हंसना, बतियाना, कौशलजी की बातों में दिलचस्पी लेना कौशलजी को खुशी के साथसाथ सुकून दे रहा था. 2 हफ्ते में 1 बार की मुलाकात अब हर हफ्ते की मुलाकात बन गई थी.

2 माह बीत गए थे पर कौशलजी को अपने बेटेबेटी से बातें शेयर करने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई, बेटाबेटी भी अपनी नौकरी व जिंदगी में इतने व्यस्त थे कि इस परिवर्तन की ओर उन का ध्यान ही नहीं गया.

एक दिन रैस्टोरैंट में बातें करते हुए कौशलजी किसी बात पर ठहाका लगा कर हंस पड़े पर तुरंत ही झेंप कर वे चुप हो गए. तभी बाएं ओर की तीसरी टेबल से एक व्यक्ति सामने आ खड़ा हुआ.

‘‘हैलो, कौशल, पहचाना मुझे?’’

कुछ पल देख, ‘‘ओह दिनेश, तुम यहां कैसे? तुम तो इलाहाबाद में थे न. और इतने वर्षों बाद भी तुम ने मुझे पहचान लिया पर शायद मैं दूर से देखता तो तुम्हें पहचान न पाता,’’ कौशलजी दोस्त से मिल कर खुश होते हुए बोले.

‘‘हां, हां, भई मेरी खेती जो साफ हो गई है और खोपड़ी सफाचट मैदान. तुम तो यार वैसे ही लगते हो आज भी. और यह तुम्हारी बिटिया है?’’

‘‘न, न, यह मेरी यंग दोस्त है, एक अच्छी दोस्त.’’

मिताली के जाने के बाद कौशल अपने जीवन की बातें पत्नी की मृत्यु, रिटायरमैंट के बाद का अकेलापन, संवादहीनता की व्यथा जैसी कई बातें बताते रहे. दिनेश के द्वारा युवती दोस्त के बारे में पूछे जाने पर अखबार के विज्ञापन से ले कर रजिस्टे्रशन व

मीटिंग की सारी बातें बताईं.

‘‘यह ठीक नहीं है, यार. ऐसी दोस्ती सिर्फ पैसे पर टिकी होती है. तुम्हारे साथ हंसनाबोलना तो ड्यूटी मात्र है, तुम्हारे प्रति कोई सद्भावना या संवेदना नहीं…’’

‘‘पर यह बहुत अच्छी लड़की है,’’ बात पूरी होने से पूर्व ही कौशल बोल पड़े.

‘‘चलो माना कि अच्छी है वह, पर कौन मानेगा कि उस के साथ तुम्हारा दोस्ती भर का रिश्ता है. और जब तुम्हारे बच्चों को पता लगेगा तब क्या होगा, यह सोचा है तुम ने?’’ दिनेश ने कौशलजी के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा.

‘‘तुम ये सब इसीलिए कह रहे हो कि तुम अकेले नहीं हो. एकाकीपन की पीड़ा क्या होती है, तुम सोच नहीं सकते,’’ अपनी उंगलियों को मरोड़ते हुए कौशल जैसे मन की व्यथा निकाल रहे थे.

‘‘ठीक है तुम्हारी बात, पर अकेलेपन को दूर करने के और भी रास्ते हैं. इस तरह की दोस्ती सिर्फ एक मकड़जाल है जिस में फंस कर व्यक्ति छटपटाता है. पिछले दिनों अखबार में एक ऐसा ही समाचार छपा था. 65 वर्ष का व्यक्ति इस जाल में ऐसा फंसा कि चिडि़यां चुग गईं खेत वाली बात हो गई. छीछालेदर हुई, सो अलग.

‘‘कहो तो तुम्हारे लिए, अपने जैसा ही हलका जौब देखूं. यह रुपएपैसे के लिए नहीं बल्कि अपना समय अच्छी तरह व्यतीत करने का तरीका है. या तो फिर कोई समाजिक संस्था जौइन कर लो.’’

‘‘नहीं, अब मुझे कोई भी बंधनयुक्त कार्य नहीं करना,’’ कौशलजी ने चिढ़ कर जवाब दिया.

‘‘शायद तुम भूल रहे हो कि बद अच्छा, बदनाम बुरा होता है. और यह बात तुम्हीं कहा करते थे,’’ दिनेश ने फिर कौशल को समझाने की कोशिश की.

‘‘छोड़ो यह बात, मैं कोई बच्चा नहीं हूं. कोई और बात करो,’’ अपना हाथ छुड़ाते हुए कौशल ने कहा.

इस वक्त इस बात का छोर यहीं छूट गया.

‘‘पापा, वह कौन थी जिस के साथ नटराज में आप बातें कर रहे थे. मैं अपने साथी के साथ वहां गया था, इसीलिए आप से बात नहीं कर पाया.’’

राहुल के इस प्रश्न पर कौशल सकपका गए. तभी राहुल का मोबाइल बज उठा और वह बाहर चला गया.

‘क्या मैं राहुल से कह पाऊंगा कि वह लड़की मेरी दोस्त है. तो क्या दिनेश का कहना सही है?’ पर सिर उठाते इस विचार को उन्होंने झटक डाला.

एक दिन को कौशलजी व मिताली, मौल के कौफी शौप में आधा घंटा बिता कर, मौल घूमने लगे. पर्स शौप में ब्रैंडेड लाल रंग का पर्स देख कर मिताली रुक नहीं पाई. अपने कंधे पर उसे लटका कर आईने में देख चहक उठी.

तभी कौशलजी के पूछने पर कि वह पर्स उसे पसंद है तो खरीद ले.

‘‘काफी महंगा है,’’ कह कर टाल दिया पर साथ ही चेहरा उदास भी हो गया, ‘‘इतना महंगा पर्स तो देख ही सकती हूं, खरीद नहीं सकती मैं.’’

‘‘चलो मेरी तरफ से गिफ्ट है तुम्हारे लिए. मैं पेमैंट कर दूंगा. तुम ले लो.’’

मिताली के चेहरे पर खिल आई खुशी को देख कौशल सोचने लगे, ‘इस को खुशी देने में मुझे भी कितनी खुशी मिल रही है.’

जब तक मिताली से एक बार फोन पर बात नहीं हो जाती, कौशल बेचैनी अनुभव करने लगे हैं. इसीलिए वे बात करने की सोच ही रहे थे कि टूर से लौटे राहुल ने फाइनैंशियल एडवाइजर के आने की बात कह, पापा से अपनी ‘मनी’ अपनी इच्छा से इन्वैस्ट करने की बात कही.

‘‘पिछले 2 माह से एक ऐडवांस प्रोजैक्ट के कारण वक्त नहीं मिल पाया. आज मनी एडवाइजर के सामने मैं भी आप के साथ रहूंगा, पापा, आप जैसा चाहेंगे वैसा हो जाएगा.’’

‘‘अभी रहने दो, फिर देखा जाएगा,’’ कौशलजी ने बात को टाला.

‘‘क्यों, आप कुछ और सोच रहे हैं क्या?’’

‘‘हां, फिलहाल तुम उसे मना कर दो.’’

नाश्ते के बाद कौशलजी टीवी में आ रही एक पुरानी फिल्म देखने में मग्न थे. डोरबैल की आवाज पर मन मसोस कर उठे, ‘‘कोई सैल्स बौय ही होगा,’’ पर दरवाजे पर दिनेश को देख, खुशी से चहक उठे, ‘‘अरे वाह, आज इस वक्त यहां कैसे? तुम तो अपनी जौब पर जाते हो फिर…पर अच्छा हुआ तुम आए. बैठो मैं गरमागरम चाय लाता हूं, फिर दोनों गपें लगाएंगे.’’

‘‘नहीं, आज हम कनाटप्लेस चल रहे हैं. वहीं खाएंगेपीएंगे, घूमेंगे. कुछ अलग सा दिन बिताएंगे.’’

दोढाई घंटे की विंडो शौपिंग के बाद एक रैस्टोरैंट में बैठे दोनों मित्र प्रसन्न थे. लंच का और्डर दे कर दिनेश लघुशंका के लिए वाशरूम की ओर बढ़ गए. वापसी पर उन की निगाह जानीपहचानी शक्ल पर पड़ी. वह मिताली थी जो कि एक युवा से सट कर या कहें कि लिपट कर ही बैठी थी. खूब खिलखिला रही थी.

उन के मन की उथलपुथल चेहरे पर उतर आई.

‘‘क्या हुआ, अभी तो तुम बड़े खुश थे. अब उदास क्यों हो गए?’’

‘‘कुछ नहीं. ऐसी कोई बात नहीं है,’’ इधरउधर की एकदो बातों के बाद, ‘‘अरे हां, तुम्हारी उस यंग दोस्त के क्या हाल हैं?’’ डोसे के टुकड़े को सांभर में डुबोते हुए दिनेश ने पूछा.

‘‘तुम गलत सोचते हो उस के लिए. वह तो परिस्थिति की मारी लड़की है. अकेली अपनी मां की जिम्मेदारी उठा रही है. यहां वह पीजी में रहती है. आजकल वह अपनी बीमार मां को देखने गांव गई है. अब वह अपनी मां को साथ रखने के लिए यहीं एक छोटा सा घर चाहती है. मन की बात बताऊं, मैं तो उस की इस में सहायता करना चाहता हूं. जरूरतमंद लड़की है, उस की हैल्प से मुझे संतुष्टि मिलती है,’’ वे बोले जा रहे थे.

‘‘कौशल, तुम कह रहे थे कि मिताली, मां को देखने गांव गई है. फोन कर के उस की मां का हाल तो पूछो.’’

‘‘हां, पूछ लूंगा.’’

‘‘अभी बात करो और धीमी आवाज में स्पीकार औन कर लेना. देखता हूं, मैं भी कुछ सहयोग कर दूंगा. ऐसी लड़की की सहायता करनी ही चाहिए,’’ दिनेश ने आवाज सुनने के लिए फोन पर ध्यान केंद्रित करते हुए कहा.

‘‘चलो ठीक है. हैलो मिताली, अब तुम्हारी मां कैसी हैं?’’

‘‘थोड़ी बेहतर हैं सर. मैं मां के पास ही बैठी हूं. पड़ोसी भी बैठे हैं यहां. मैं बाद में आप से बात करती हूं. ओके बाय,’’ और फोन बंद कर दिया.

तभी दिनेश ने कौशल का हाथ पकड़ा और बिना कुछ कहे उस तरफ ले गए जहां से मिताली का आधा चेहरा, पीठ, हंसना आदि स्पष्ट दिख रहे थे.

कौशलजी बुत बने खड़े रह गए.

‘‘ओह, यह तो मिताली है और वह युवक हमारे ब्लौक के आखिरी छोर पर रहने वाला रितेश है. उस की सुंदर पत्नी व 2 बच्चे हैं. औफिस के वक्त यह यहां पर? इतने मुखौटे…इतनी चालें…मिताली का भोला चेहरा…आंसुओं से डबडबाती आंखें…मां की बीमारी की बात, अपनी नौकरी की कहानी जो कि रिसैशन के कारण छूट गई और उसे यह फ्रैंड्स क्लब मजबूरी में जौइन करना पड़ा. और भी न जाने क्याक्या…ओह, मैं तो मूर्ख ही बनता रहा और न जाने कब तक बनता रहता. अगले माह उस के फ्लैट के लिए 1 लाख रुपए देने वाला था.’’

कौशलजी का चेहरा दुख, छलावे और पछतावे से रोंआसा हो उठा. आवाज भर्रा उठी, ‘‘खैर…बस, अब यह एकाकीपन और नहीं भटकाएगा, और न यह मेरे व्यक्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा पाएगा.’’

स्वयं को दृढ़तापूर्वक संयत करते हुए कौशलजी ने दूसरी ओर कदम बढ़ा दिए.

‘‘यह हुई न दिलदार वाली बात. मैं आज बहुत खुश हूं. मेरा दोस्त वापस आ गया है,’’ कह कर दिनेश ने अपना हाथ कौशल के कंधे पर रख दिया.

पछतावा: रजनीश रात में क्या चीखता था?

दीनानाथ नगरनिगम में चपरासी था. वह स्वभाव से गुस्सैल था. दफ्तर में वह सब से झगड़ा करता रहता था. उस की इस आदत से सभी दफ्तर वाले परेशान थे, मगर यह सोच कर सहन कर जाते थे कि गरीब है, नौकरी से हटा दिया गया, तो उस का परिवार मुश्किल में आ जाएगा. दीनानाथ काम पर भी कई बार शराब पी कर आ जाता था. उस के इस रवैए से भी लोग परेशान रहते थे. उस के परिवार में पत्नी शांति और 7 साल का बेटा रजनीश थे. शांति अपने नाम के मुताबिक शांत रहती थी. कई बार उसे दीनानाथ गालियां देता था, उस के साथ मारपीट करता था, मगर वह सबकुछ सहन कर लेती थी.

दीनानाथ का बेटा रजनीश तीसरी जमात में पढ़ता था. वह पढ़ने में होशियार था, मगर अपने एकलौते बेटे के साथ भी पिता का रवैया ठीक नहीं था. उस का गुस्सा जबतब बेटे पर उतरता रहता था.

‘‘रजनीश, क्या कर रहा है  इधर आ,’’ दीनानाथ चिल्लाया.

‘‘मैं पढ़ रहा हूं बापू,’’ रजनीश ने जवाब दिया.

‘‘तेरा बाप भी कभी पढ़ा है, जो तू पढ़ेगा. जल्दी से इधर आ.’’

‘‘जी, बापू, आया. हां, बापू बोलो, क्या काम है ’’

‘‘ये ले 20 रुपए, रामू की दुकान से सोडा ले कर आ.’’

‘‘आप का दफ्तर जाने का समय हो रहा है, जाओगे नहीं बापू ’’

‘‘तुझ से पूछ कर जाऊंगा क्या ’’ इतना कह कर दीनानाथ ने रजनीश के चांटा जड़ दिया. रजनीश रोता हुआ 20 रुपए ले कर सोडा लेने चला गया. दीनानाथ सोडा ले कर शराब पीने बैठ गया.

‘‘अरे रजनीश, इधर आ.’’

‘‘अब क्या बापू ’’

‘‘अबे आएगा, तब बताऊंगा न ’’

‘‘हां बापू.’’

‘‘जल्दी से मां को बोल कि एक प्याज काट कर देगी.’’

‘‘मां मंदिर गई हैं… बापू.’’

‘‘तो तू ही काट ला.’’

रजनीश प्याज काट कर लाया. प्याज काटते समय उस की आंखों में आंसू आ गए, पर पिता के डर से वह मना भी नहीं कर पाया. दीनानाथ प्याज चबाता हुआ साथ में शराब के घूंट लगाने लगा. शाम के 4 बज रहे थे. दीनानाथ की शाम की शिफ्ट में ड्यूटी थी. वह लड़खड़ाता हुआ दफ्तर चला गया. यह रोज की बात थी. दीनानाथ अपने बेटे के साथ बुरा बरताव करता था. वह बातबात पर रजनीश को बाजार भेजता था. डांटना तो आम बात थी. शांति अगर कुछ कहती थी, तो वह उस के साथ भी गालीगलौज करता था. बेटे रजनीश के मन में पिता का खौफ भीतर तक था. कई बार वह रात में नींद में भी चीखता था, ‘बापू मुझे मत मारो.’

‘‘मां, बापू से कह कर अंगरेजी की कौपी मंगवा दो न,’’ एक दिन रजनीश अपनी मां से बोला.

‘‘तू खुद क्यों नहीं कहता बेटा ’’ मां बोलीं.

‘‘मां, मुझे बापू से डर लगता है. कौपी मांगने पर वे पिटाई करेंगे,’’ रजनीश सहमते हुए बोला.

‘‘अच्छा बेटा, मैं बात करती हूं,’’ मां ने कहा.

‘‘सुनो, रजनीश के लिए कल अंगरेजी की कौपी ले आना.’’

‘‘तेरे बाप ने पैसे दिए हैं, जो कौपी लाऊं  अपने लाड़ले को इधर भेज.’’ रजनीश डरताडरता पिता के पास गया. दीनानाथ ने रजनीश का कान पकड़ा और थप्पड़ लगाते हुए चिल्लाया, ‘‘क्यों, तेरी मां कमाती है, जो कौपी लाऊं  पैसे पेड़ पर नहीं उगते. जब तू खुद कमाएगा न, तब पता चलेगा कि कौपी कैसे आती है  चल, ये ले 20 रुपए, रामू की दुकान से सोडा ले कर आ…’’

‘‘बापू, आज आप शराब बिना सोडे के पी लो, इन रुपयों से मेरी कौपी आ जाएगी…’’ ‘‘बाप को नसीहत देता है. तेरी कौपी नहीं आई तो चल जाएगा, लेकिन मेरी खुराक नहीं आई, तो कमाएगा कौन अगर मैं कमाऊंगा नहीं, तो फिर तेरी कौपी नहीं आएगी…’’ दीनानाथ गंदी हंसी हंसा और बेटे को धक्का देते हुए बोला, ‘‘अबे, मेरा मुंह क्या देखता है. जा, सोडा ले कर आ.’’

दीनानाथ की यह रोज की आदत थी. कभी वह बेटे को कौपीकिताब के लिए सताता, तो कभी वह उस से बाजार के काम करवाता. बेटा पढ़ने बैठता, तो उसे तंग करता. घर का माहौल ऐसा ही था. इस बीच रात में शांति अपने बेटे रजनीश को आंचल में छिपा लेती और खुद भी रोती. दीनानाथ ने बेटे को कभी वह प्यार नहीं दिया, जिस का वह हकदार था. बेटा हमेशा डराडरा सा रहता था. ऐसे माहौल में भी वह पढ़ता और अपनी जमात में हमेशा अव्वल आता. मां रजनीश से कहती, ‘‘बेटा, तेरे बापू तो ऐसे ही हैं. तुझे अपने दम पर ही कुछ बन कर दिखाना होगा.’’ मां कभीकभार पैसे बचा कर रखती और बेटे की जरूरत पूरी करती. बाप दीनानाथ के खौफ से बेटे रजनीश के बाल मन पर ऐसा डर बैठा कि वह सहमासहमा ही रहता.

समय बीतता गया. अब रजनीश 21 साल का हो गया था. उस ने बैंक का इम्तिहान दिया. नतीजा आया, तो वह फिर अव्वल रहा. इंटरव्यू के बाद उसे जयपुर में पोस्टिंग मिल गई. उधर दीनानाथ की झगड़ा करने की आदत से नगर निगम दफ्तर से उसे निकाल दिया गया था. घर में खुशी का माहौल था. बेटे ने मां के पैर छुए और उन से आशीर्वाद लिया. पिता घर के किसी कोने में बैठा रो रहा था. उस के मन में एक तरफ नौकरी छूटने का दुख था, तो दूसरी ओर यह चिंता सताने लगी थी कि बेटा अब उस से बदला लेगा, क्योंकि उस ने उसे कोई सुख नहीं दिया था. मां रजनीश से बोलीं, ‘‘बेटा, अब हम दोनों जयपुर रहेंगे. तेरे बापू के साथ नहीं रहेंगे. तेरे बापू ने तुझे और मुझे जानवर से ज्यादा कुछ नहीं समझा…

‘‘अब तू अपने पैरों पर खड़ा हो गया है. तेरी जिंदगी में तेरे बापू का अब मैं साया भी नहीं पड़ने दूंगी.’’ रजनीश कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, ‘‘नहीं मां, मैं बापू से बदला नहीं लूंगा. उन्होंने जो मेरे साथ बरताव किया, वैसा बरताव मैं नहीं करूंगा. मैं अपने बेटे को ऐसी तालीम नहीं देना चाहता, जो मेरे पिता ने मुझे दी.’’ रजनीश उठा और बापू के पैर छू कर बोला, ‘‘बापू, मैं अफसर बन गया हूं, मुझे आशीर्वाद दें. आप की नौकरी छूट गई तो कोई बात नहीं, मैं अब अपने पैरों पर खड़ा हो गया हूं. चलो, आप अब जयपुर में मेरे साथ रहो, हम मिल कर रहेंगे.‘‘ यह सुन कर दीनानाथ की आंखों में आंसू आ गए. वह बोला, ‘‘बेटा, मैं ने तुझे बहुत सताया है, लेकिन तू ने मेरा साथ नहीं छोड़ा. मुझे तुझ पर गर्व है.’’ दीनानाथ को अपने किए पर खूब पछतावा हो रहा था. रजनीश ने बापू की आंखों से  आंसू पोंछे, तो दीनानाथ ने खुश हो कर उसे गले लगा लिया.

पर्यावरण के लिए भी अच्छी है ज्वाइंट फैमिली, जानें कैसे?

संयुक्त परिवार कोई दकियानूसी सामाजिक परंपरा नहीं. इस में परिवार के सदस्यों की भावनात्मक सुरक्षा, सहयोग, सहभागिता और घर की सुरक्षा बनी रहती है. खेद की बात है कि संयुक्त परिवार की परंपरा अब टूटन और बिखराव के कगार पर है. आज के युग में इसे आउटडेटेड माना जाता है. लोगों को अधिक स्वतंत्रता, अधिक उत्साह और अधिक उत्तेजना चाहिए जो उन्हें संयुक्त परिवार की अपेक्षा छोटे परिवार में दिखाई देती है.

बिजनैस एग्जीक्यूटिव विजय सिन्हा और सिविल इंजीनियर अजय सिन्हा राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के गुलमोहर पार्क क्षेत्र में अलगअलग बंगलों में रहते हैं. केवल 2 से 3 सदस्यों के ये छोटे परिवार अलग रहने में अधिक स्वतंत्र और उत्साहित नजर आते हैं. इन्हीं की तरह दिल्ली जैसे महानगरों में ही नहीं, अनेक राज्यों में कई परिवारों के सदस्य ऐसे हैं जिन्होंने एक छत के नीचे बड़े परिवारों में न रहते हुए अपने लिए अलग घर बनाए हैं. हालांकि केवल उत्साह और स्वतंत्रता की चाह ने न केवल लोगों को एकदूसरे से दूर किया है और आत्मकेंद्रित बनाया है बल्कि पर्यावरण को भारी मात्रा में क्षति भी पहुंचाई है.

एक संयुक्त परिवार बिखर कर 3-4 घरों में रहने लगा है. छोटे परिवारों की बढ़ती संख्या के चलते ऊंचीऊंची इमारतें बनाई जा रही हैं. जंगलों को काट कर शहर बसाने के लिए कंकरीट के जंगल खड़े किए जा रहे हैं जिस से प्रकृति में असंतुलन हो रहा है और पर्यावरण प्रभावित हो रहा है. कैसे, आइए नजर डालें.

पानी की खपत

संयुक्त परिवार के घर की सफाई में जो पानी खर्च होता था वह उस परिवार के विभाजित हुए 3 अलगअलग घरों में अब तीनगुना खर्च हो रहा है, जिस से पानी की कमी की समस्या उत्पन्न होती है. दिल्ली सरकार के सौजन्य से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली में प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति पानी की खपत गैलन में 1996 में 43.76 थी, 1997 में 80.24 हुई. 1998 में 94.11, 1999 में 94.09, 2000 में 91.15, 2002 में 93.04, 2010 में 49 और 2013 में 90 गैलेन की वृद्धि हुई. भविष्य में इस के क्या भयंकर परिणाम होंगे, अंदाजा लगाया जा सकता है.

अधिक बिजली की खपत

छोटे परिवारों की अधिकता के कारण बिजली के उपकरण भी बड़ी संख्या में प्रयोग किए जाते हैं. जहां 2 कूलर, 1 फ्रिज, 1 मिक्सी, टीवी, वाशिंगमशीन और 3-4 पंखे जैसे बिजली के उपकरणों की दोगुनी खरीदारी के साथसाथ बिजली की खपत भी जोर पकड़ने लगी है. बिजली पानी से पैदा की जाती है. जलस्रोतों के सूखने के कारण बिजली की पैदावार में कमी आई है क्योंकि बिजली की पूर्ति कम और मांग अधिक है.

कूड़े की समस्या

आगामी वर्षों में स्वस्थ वातावरण की इच्छा भी केवल कल्पनामात्र रह जाएगी क्योंकि एकल परिवार के लिए बनते अधिकाधिक इमारतों से निकलते कूड़े की समस्या अपना विकराल रूप धारण करने लगी है. कूड़े को एकत्र करने के लिए लैंड फीलिंग साइट की कमी की समस्या सरकार के सामने अभी से है तो भविष्य में क्या स्थिति होगी, अंदाजा लगाया जा सकता है.

अतिरिक्त ईंधन

संयुक्त परिवार में 8-10 व्यक्तियों का खाना जितने समय और ईंधन के प्रयोग से पकता है उतने ही समय और ईंधन से 3-4 सदस्यों वाले छोटे परिवार के लिए बनता है. जितने अधिक घर उतने अधिक चूल्हे. फलस्वरूप ईंधन की खपत बढ़ती है.

वायु और ध्वनि प्रदूषण

अलगअलग घरों में वाहनों की अधिकता के कारण ध्वनि और वायु प्रदूषण को बढ़ावा मिलता है. संयुक्त परिवार में जहां एक स्कूटर व कार से काम चल सकता है वहां छोटे परिवारों में भी 1 कार या स्कूटर की जरूरत होती है. यानी एक वाहन की जगह 3 वाहनों का प्रयोग होता है. इस के अतिरिक्त दीवाली और दशहरा जैसे पर्वों में एक बड़े घर में हर्षोल्लास के साथ त्योहार मनाया जाता है. पटाखे, दीए आदि जलाए जाते हैं लेकिन अब न तो एकल परिवार की व्यवस्था में एकजुट हो कर खुशियां मनाने की बात रहती है और न ही एक बड़े घर को सजाने की बात रहती है. फलत: एकल परिवार के चलते घर को सजाने के लिए न केवल दीए, कैंडल की खपत बढ़ती है बल्कि पटाखों को जलाने की संख्या भी अधिक होती है. परिणामस्वरूप ध्वनि और वायु प्रदूषण पर्यावरण में जहर घोलते हैं.

भारत के पर्यावरण विशेषज्ञों का ही नहीं बल्कि विदेशों के पर्यावरण वैज्ञानिकों का भी मानना है कि एकल परिवार भविष्य में प्रकृति को और भी भारी नुकसान पहुंचाने वाले हैं. भारत में खासतौर से इस की विकृत स्थिति होगी. पर्यावरणविद जियनज्यू लियू के एक विस्तृत अध्ययन के अनुसार, भारत में जैव विविधता की भयंकर स्थिति है. वह इसलिए कि जैव विविधता के कारण भारत में अनेक प्रजातियां मानवीय प्रक्रियाओं के कारण संकट में पड़ी हैं. ऐसे में हमें ही इस समस्या से निबटने के लिए तैयार होना होगा. अब तक एकल परिवार का लुत्फ उठा रहे व्यक्ति इस बात को समझ लें कि एकता की शक्ति न केवल संयुक्त परिवार के तौर पर मानवीय संबंधों को मजबूत आधार देती है बल्कि पर्यावरण के लिए भी जीवनदायी है. लिहाजा, टूटते संयुक्त परिवारों का संरक्षण कर हम न सिर्फ पर्यावरण को असंतुलित होने से बचा सकते हैं बल्कि मधुर संबंधों व रिश्तों को एक छत के नीचे फिर से जी सकते हैं.

विपक्ष मजबूत होगा तभी लोकतंत्र जीवित रहेगा

एक इंग्लिश कहावत है– ‘विनिंग इज नौट औलवेज अ विक्ट्री एंड लूजिंग इज नौट औलवेज अ डिफीट’ अर्थात जीत हमेशा विजय नहीं होती और हारना हमेशा पराजय नहीं. 2024 लोकसभा चुनाव परिणाम इस कहावत का यथार्थ रूप है, जहां भाजपा गठबंधन की सरकार के सामने जनता ने एक मजबूत विपक्ष खड़ा कर दिया है. लोकतंत्र में जनता सिर्फ सरकार नहीं चुनती, वह विपक्ष भी चुनती है. इस बार उस ने जैसा मजबूत विपक्ष चुना है उतना मजबूत विपक्ष आजाद भारत के इतिहास में पहले कभी नहीं रहा है. इस मजबूत विपक्ष के चलते तानाशाही का सपना देखने वाले अब दशकों तक संविधान से छेड़छाड़ की जुर्रत और अपनी मनमानी नहीं कर पाएंगे.

सत्ता के सिंहासन पर आसीन व्यक्ति अपने मन की बात कितनी ही कर ले लेकिन जब मतदाता अपने मन की बात सुनाता है तो ‘राजा’ की सारी बातें धरी की धरी रह जाती हैं. इस बार के आम चुनाव में मतदाताओं ने न तो एनडीए की ‘400 पार’ की हुंकार सुनी और न ही इंडिया गठबंधन के बहुमत की पुकार पर कान धरा. उस ने तो भाजपा को बहुमत के आंकड़े से दूर रख कर सहयोगी दलों पर उस को ऐसा निर्भर किया कि सरकार तो बन गई मगर पहले की तरह उस में मनमानी करने का अवगुण नहीं रहा क्योंकि सामने इंडिया गठबंधन जैसा ताकतवर विपक्ष भी खड़ा कर दिया. लोकतंत्र के लिए विपक्ष की मजबूती जरूरी भी है क्योंकि जब एक पक्ष पहलवान हो जाए और दूसरा पक्ष कुपोषित रह जाए तो सामंजस्य नहीं बैठता और मजबूत पक्ष लगातार विपक्ष की आवाज दबाने व अपनी मनमानी पर उतारू रहता है.

देश में इस से पहले कई बार कमजोर सरकारें रही हैं, लेकिन इतना मजबूत विपक्ष कभी नहीं रहा. पहले कई बार विपक्ष में ज्यादा सांसद होते थे लेकिन वे चूंकि एकदूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ कर आते थे, लिहाजा वह साझा विपक्ष नहीं बन पाता था. पहली बार ऐसा हुआ है कि संसद में सत्तारूढ़ गठबंधन 293 सांसदों के साथ एकतरफ है तो दूसरी ओर 204 सांसदों का मजबूत विपक्ष एक मत से खड़ा है. अगर इस में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को भी जोड़ लें तो संख्या 233 हो जाती है. इस से पहले आखिरी बार 1989 में कांग्रेस ने 197 सीटें जीती थीं और लोकसभा में एक मजबूत विपक्ष की मौजूदगी दिखाई दी थी, लेकिन इस बार उस से भी मजबूत विपक्ष जनता ने सत्ताधारी पार्टी के सामने खड़ा कर दिया है. कुछ इस अंदाज में कि अब चलाओ अपनी मरजी, हम देखेंगे कैसे चलाते हो.

गौरतलब है कि पिछले 10 वर्षों में विपक्ष को पूरी तरह से दरकिनार कर के भारतीय जनता पार्टी ने संसद की कार्यवाही चलाई, क्योंकि वह बहुमत में थी. विपक्ष की गैरहाजिरी में अनेक विधेयक पास कराए गए. विपक्ष के सांसदों के निलंबन का इतिहास देश ने पिछले 10 वर्षों में बनते हुए देखा. आश्चर्जनकरूप से विपक्ष के डेढ़ सौ सांसद एक बार में निलंबित कर दिए गए. वे संसद परिसर में महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने रातदिन धरने पर बैठे रहे और सरकार ने उन की तरफ फूटी आंख भी न देखा. संसद के अंदर मनमानी की जो परंपरा स्थापित की जा रही थी उसे रोकने में जनता इस बार सफल हुई है. यह जनता की जीत है जो लोकतंत्र की सब से सुखद जीत के रूप में दर्ज होगी.

लोकतंत्र को केवल विपक्ष की उपस्थिति में ही मापा जा सकता है. म्यांमार में लोकतंत्र की महान योद्धा आंग सान सू की कहती हैं कि विपक्ष को बुरा कहना लोकतंत्र की बुनियादी अवधारणा को न समझ पाना है और विपक्ष को दबाना तो लोकतंत्र की जड़ों को खोदने जैसा है.

लोकतंत्र को मजबूत रखना है तो विपक्ष का कद्दावर होना जरूरी है. इस में कोई संदेह नहीं कि प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के 10 वर्षों का कार्यकाल कई उपलब्धियों और धारा 370 हटाने जैसे साहसिक फैसलों से भरा पड़ा है. उन के कार्यकाल में दुनिया के दूरदराज हिस्से तक भारत की हुंकार सुनाई दी है लेकिन उन का कार्यकाल नोटबंदी जैसे कई बेवकूफी भरे फैसलों से भी भरा रहा है. यह कार्यकाल जनता का पैसा अपने उद्योगपति दोस्तों के तिजोरियों में भरने और किसानों, मजदूरों व विरोधियों के दमन की दास्तां भी बयान करता है. मतदाताओं को कहीं न कहीं यह महसूस हो रहा था कि देश में विपक्ष निरंतर कमजोर होता जा रहा है और सत्ता इस का फायदा उठा रही है. सत्ताधारी दल से जुड़े नेताओं ने आरक्षण ख़त्म करने, संविधान बदलने और ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के सपने को साकार करने की कोशिश की तो मतदाताओं के कान खड़े हो गए. लोकतंत्र में किसी पार्टी के समूल नाश के बारे में कोई सोच भी कैसे सकता है? फिर कांग्रेस जैसी पार्टी को समाप्त करने की बात करना जो आजादी के समय से एक वट वृक्ष की तरह खड़ी है, जिस के पत्ते कुछ समय के लिए मुरझा भले जाएं मगर जिस की जड़ें बहुत गहरी हैं. अपना एकछत्र राज कायम करने के लिए भाजपा ने सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, अन्य दलों, जैसे आम आदमी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और तृणमूल कांग्रेस को नेस्तनाबूद करने के लिए राष्ट्रीय जांच एजेंसियों को जिस तरह हथियार बना रखा था, उस पर जनता की बहुत गहरी नज़र थी.

इस लोकसभा में चूंकि भाजपा बहुमत से दूर होने के कारण गठबंधन के अन्य दलों के सहयोग से सत्ता पर आसीन हुई है इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने चुनौतियां अपने गठबंधन की तरफ से भी कम नहीं हैं. सब से बड़ा सवाल तो यह पैदा हो गया है कि ‘मोदी की गारंटी’ का हुंकार भरने वाले व्यक्ति के लिए क्या अब दूसरे दलों की राय के आगे झुक कर चलना आसान होगा?

हालांकि चंद्रबाबू नायडू, नीतीश कुमार, एकनाथ शिंदे और चिराग पासवान ने पूरे 5 साल भाजपा के साथ बने रहने का वादा किया है लेकिन नायडू और नीतीश राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हैं. वे मुफ्त में समर्थन नहीं देंगे. अब उन का वक्त आया है तो वसूली भी जरूर करेंगे. इन तेजतर्रार और मौकापरस्त नेताओं की मांगों को मोदी दरकिनार भी नहीं कर पाएंगे क्योंकि पल में पाला बदलने वाले कब सरकार गिरा दें, कह नहीं सकते. और भारतीय मतदाता तोड़फोड़ की इस प्रवृत्ति को पसंद नहीं करता. भविष्य के चुनावों में वह भाजपा को पूरी तरह खारिज भी कर सकता है. भूलना नहीं चाहिए कि महाराष्ट्र में भाजपा की पराजय का बड़ा कारण यह तोड़फोड़ ही रही है. गौरतलब है कि महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में इस साल विधानसभा के चुनाव होने हैं. अगर साझा विपक्ष इन राज्यों में भी लोकसभा चुनाव के नतीजे को दोहराता है तो देशभर के लोगों के बीच विपक्ष की स्थायी एकजुटता का मैसेज जाएगा, जिस से आगे की राजनीति की दिशा तय होगी.

इस बार संसद में ऐसे अनेक विपक्षी नेता हैं जो वाक कौशल में प्रवीण हैं. पहले विपक्ष के नाम पर सिर्फ राहुल गांधी ही नजर आते थे, जो पूरी ताकत से सदन में जनता की बात रखने की कोशिश करते थे, मगर सत्ता के अहंकार में डूबे नेताओं की चीखचिल्लाहटों और छींटाकशी के बीच उन की बात पर स्पीकर भी ज्यादा ध्यान नहीं देता था या देना नहीं चाहता था. नतीजा, विपक्ष को बारबार वौकआउट करना पड़ता था. मगर अब सदन के अंदर विपक्षी नेताओं की बात न सिर्फ ध्यान से सुनने के लिए सत्तादल और स्पीकर बाध्य होंगे, बल्कि यह भी हो सकता है कि वौकआउट करने की बारी अब सत्ता दल के नेताओं की हो.

उत्तर प्रदेश के विधानसभा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से टक्कर लेने का माद्दा सिर्फ समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव में था. उन्होंने वहां कई बार योगी की बातों पर कटाक्ष किया, विरोध किया और उन को सुना गया. अब अखिलेश यादव देश की संसद में पहुंच गए हैं, वह भी अकेले नहीं बल्कि अपने 37 नेताओं की मजबूत सेना के साथ, जिस में उन की पत्नी और भाई भी शामिल हैं. अब सदन में पत्नी डिम्पल का साथ होगा तो जनता की बात और जोरशोर से उठाएंगे वे.

तृणमूल कांग्रेस के भी 29 नेता इस बार संसद में मौजूद होंगे, जिस में अनेक मजबूत नेता हैं. उन में महुआ मोइत्रा, अभिषेक बनर्जी, आजाद कीर्ति झा, शर्मिला सरकार, अरूप चक्रवर्ती, शत्रुघ्न सिन्हा के सवालों का सामना एनडीए को करना होगा. इन में से कई ऐसे नेता हैं जिन को परेशान करने में भाजपा ने कोई कोरकसर नहीं छोड़ी.

कांग्रेस से राहुल गांधी अब अपने 99 नेताओं के साथ पूरे दमखम से सदन में ताल ठोकेंगे. उज्जवल रमण सिंह और इमरान मसूद जैसे कांग्रेसी नेताओं का साथ उन्हें ताकत देगा. आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद इस बार विपक्ष की एक दमदार आवाज होंगे वहीं औल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुसलिमीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी के तर्कों की काट ढूंढना एनडीए के लिए आसान नहीं होगा.

विपक्षी पार्टियों और विपक्षी राजनीति दोनों के लिए लोकतंत्र को मजबूत करने का यह बड़ा मौका है. यह बताने की जरूरत नहीं है कि किस बात के लिए मतदाताओं ने विपक्ष को इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है. विपक्ष का पूरा प्रचार इस बात पर केंद्रित था कि संविधान की रक्षा करनी है, लोकतंत्र की रक्षा करनी है और आरक्षण बचाना है. आरक्षण को तो खैर अभी कोई खतरा नहीं दिख रहा है लेकिन संविधान और लोकतंत्र के सामने जो प्रत्यक्ष चुनौती है और जिसे पिछले 10 वर्षों में संसद की कार्यवाही के दौरान सब ने देखा है उस से निबटने की जिम्मेदारी मतदाताओं ने विपक्ष को दी है.

पिछले 10 वर्षों में देश ने देखा कि कैसे तमाम संसदीय परंपराओं को ताक पर रख दिया गया और भाजपा ने सिर्फ अपनी मनमरजी चलाई. 17वीं लोकसभा का तो पूरा कार्यकाल बीत गया मगर उपाध्यक्ष की ही नियुक्ति नहीं हुई. संसद की स्थाई समितियों की बैठकें भी न्यूनतम हो गईं. भारत के नियंत्रक व महालेखा परीक्षक यानी सीएजी की ओर से सरकार के कामकाज को ले कर लोक लेखा समिति को जो रिपोर्ट भेजी जाती थी उसे भी न्यूनतम कर दिया गया था, जो रिपोर्ट आती भी थी उस पर या तो चर्चा नहीं होती थी और चर्चा होती थी तो उस में बहुमत के दम पर विपक्ष की आवाज को दबा दिया जाता था.

पहले आमतौर पर सरकार की ओर से लाए गए विधेयक संसदीय समिति में चर्चा के लिए भेजे जाते थे लेकिन बीते 10 वर्षों में गिनेचुने विधेयक ही संसदीय समितियों में भेजे गए. जहां सत्ता पक्ष ने अपने विशाल बहुमत के दम पर विपक्ष की असहमतियों को वहीं दबा दिया और अगर किसी तरह से विपक्ष की असहमति सदन में पहुंच गई तो वहां बहुमत के दम पर उसे खारिज कर दिया गया. अब विपक्ष का दायित्व होगा कि वह सत्ता पर दबाव बना कर पुरानी संसदीय परंपरा को बहाल करे. इस काम में उसे उन पार्टियों की भी मदद मिल सकती है जो सरकार के साथ हैं. तेलुगूदेशम पार्टी और जनता दल यू जैसी पार्टियों को मुद्दों के आधार पर सरकार की मनमानी का विरोध करने में दिक्कत भी नहीं होगी, बशर्ते विपक्ष उन के साथ अच्छा तालमेल बना ले.

पिछले 10 साल इस बात के गवाह रहे हैं कि भाजपा अपने बहुमत के दम पर विपक्ष को खत्म करने या कमजोर करने का काम करती रही है. अब तो लोग इस बात की गिनती भी भूल गए हैं कि भाजपा ने पिछले 10 वर्षों में कितने राज्यों में चुनी हुई सरकारों को गिरा दिया. मतदाता अपनी पसंद की सरकार चुनता और भाजपा ‘औपरेशन लोटस’ चला कर चुनी हुई सरकार को गिरा देती. मगर अब विपक्ष को सुनिश्चित करना होगा कि लोकतंत्र पर इस तरह का हमला न हो.

इसी तरह मोदी सरकार ने केंद्रीय एजेंसियों की मदद से जिस तरह से विपक्षी नेताओं को निशाना बनाया, उस की भी मिसाल नहीं मिलती. पहले भी सरकारें अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग करती थीं लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि चुनौती दे कर विपक्ष को पूरी तरह से खत्म कर देने के लिए इन एजेंसियों का इस्तेमाल किया गया हो.

पिछले 10 वर्षों में जब लोकतंत्र पर इस तरह के हमले हो रहे थे तब विपक्ष इतना कमजोर था कि न तो संसद के अंदर उस की आवाज सुनी जाती थी और न सड़क पर वह आंदोलन कर पाता था. इस बार उस के पास संसद के अंदर और बाहर दोनों जगह भरपूर ताकत है.

भाजपा के 10 वर्षों के शासनकाल में कानून बनाने, कई बिलों को पास करने में कोई लंबीचौड़ी चर्चा नहीं हुई. विपक्ष को सदन से बाहर कर कई कानून बने और कई विधेयक पास हुए. कई बार एकतरफा फैसले लिए गए. लेकिन अब उस से हट कर संसद में एक स्वस्थ वादविवाद और चर्चा होगी. बीते 10 वर्षों में तमाम जांच एजेंसियां अपनी स्वतंत्रता और निष्पक्षता खो चुकी हैं. यहां तक कि वे सत्ता पक्ष के सदस्य के रूप में कम करने लगी हैं.

मोदी सरकार ने अपनी पसंद के अधिकारियों को सालोंसाल तक सेवा विस्तार दे कर एक ही पद पर बैठाए रखा, जिस की वजह से उन की प्रतिबद्धता संविधान और संस्था से ज्यादा सरकार के साथ हो गई है. इस गड़बड़ी को दुरुस्त करना भी विपक्ष की जिम्मेदारी होगी. उसे बहुत बारीकी से सरकार के कामकाज पर नजर रखनी होगी, संसद में रोकना होगा और कमियों को जनता के सामने लाना होगा. किसी भी लोकतंत्र के बेहतर तरीके से काम करने के लिए जरूरी है कि उस में असहमति और नाराजगी की गुंजाइश हो और सत्तारूढ़ पार्टी पर निगाह हो. 2024 का लोकसभा चुनाव दुनिया का सब से बड़ा चुनाव रहा, जिस में करीब 64 करोड़ लोगों ने वोट डाला और एक अच्छा जनादेश दिया, जो सभी पार्टियों के लिए एक सबक है.

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