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भेड़चाली बौलीवुड में बाक्सिंग पर एक और फिल्म ‘वी’

बाक्सिंग पर बनी फिल्म ‘‘साला खड़ूस’’ को भले ही बाक्स आफिस पर सफलता न मिली हो, मगर भेड़चाल के लिए मशहूर बौलीवुड में बाक्सिंग खेल पर ही आधारित फिल्म ‘‘वी’’ का निर्माण किया जा रहा है. संजय अमर निर्देशित फिल्म ‘वी’’ में भोजपुरी अभिनेता सुदीप पांडे के साथ मशहूर बाक्सिंग चैंपियन धर्मेंद्र यादव व विकास कृष्णन भी अभिनय कर रहे हैं.

फिल्म‘वी’को भारत के अलावा मलेशिया, सिंगापुर व इंडोनेशिया में फिल्माया जाएगा. भोजपुरी फिल्मों के मशहूर एक्शन अभिनेता सुदीप पांडे की यह पहली हिंदी फिल्म है. वह कहते हैं-‘‘मेरी पहचान एक एक्शन कलाकार की है. मैंने मार्शल आर्ट की भी ट्रेनिंग ले रखी है. बाक्सिंग के खेल में मेरी रूचि रही है. इसलिए मैंने फिल्म ‘‘वी’’ में बाक्सर का किरदार निभाने की चुनौती स्वीकार की है. इस फिल्म में निजी जिंदगी के दो बाक्सिंग चैम्पियन धर्मेंद्र यादव व विकास कृष्णन के साथ काम करते हुए इंज्वाय करुंगा. मैने खुद भी बाक्सिंग की ट्रेनिंग हासिल की है.’’

साक्षी नही कोई और है धोनी का पहला प्यार

कहा और माना जाता है कि टीम इंडिया के कप्तान (वनडे, टी20) महेंद्र सिंह धोनी का पहला और आख़िरी प्यार है साक्षी, जिससे उन्होंने ब्याह भी रचाया है और उनकी एक बेटी भी है, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि साक्षी उनका पहला प्यार कभी नहीं रही.

साक्षी से पहले धोनी किसी और से प्रेम करते थे और ये प्रेम इतना गहरा रहा है कि वह उसे आजतक अपने दिल में बसाए हुए हैं.

दरअसल धोनी को बचपन से ही गाड़ी और खेल से बेइंतहा प्यार रहा है. यही वजह है कि साक्षी से शादी करने के बाद भी वह अपने बाइक व कार प्रेम को नहीं भुला पाए हैं. धोनी रांची आने के बाद अपना ज़्यादातर वक़्त अपनी गाड़ियों में लगाते हैं. चाहे मामला उनकी साफ़-सफाई का हो या फिर उनके मेंटीनेंस का, इससे वह किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करते. इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है की जब भी इन गाड़ियों के लिए मैकेनिक बुलाये जाते हैं तो धोनी ख़ुद उसके साथ बैठ जाते हैं.

गाड़ी की करते हैं ख़ुद देख-रेख
धोनी रांची में रहने के दौरान एक-एक गाड़ी का कवर हटाकर उसकी देख-रेख करते हैं. मौका मिलने पर वो उन्हें सड़क पर भी दौडाते हैं. हालांकि उनका दुपहिया चलाने का शौक तो रांची में कुछ हद तक पूरा हो जाता है लेकिन रांची की तंग गलियों में उनकी बड़ी गाड़ियां खप नहीं पाती सो वे पार्किंग की शोभा बनकर रह जाती हैं. 

जानें धोनी के काफ़िले में हैं कौन-कौन सी कारें
रधोनी के पास लगभग दस से अधिक कारों का काफिला है जिसमें महिंद्रा स्कॉर्पियो, रेंज रोवर आदि गाड़ियां शामिल हैं. साथ ही उनके पास हमर एच-2, सिएरा, मित्सुबिशी, आउटलैंडर, टोयोटा कोरोला और ऑडी जैसी गाड़ियां भी हैं. टोयोटा कोरोला झारखण्ड सरकार ने 2007 में उन्हें गिफ्ट की थी. दुनिया में टी-20 सीरीज में भारत का झंडा लहराने पर झारखण्ड सरकार ने उन्हें यह तोहफा दिया था. वहीँ 17 फीट लम्बी 'हमर' धोनी ख़ुद दिल्ली से चलाकर रांची लेकर आये थे. इस यात्रा में बॉलर आरपी सिंह ने भी उनका साथ दिया था.

बाइक्स का भी ज़ख़ीरा है धोनी का
कार तो कार धौनी के पास एक दर्जन से भी अधिक बाइक भी हैं. इनमें कवास्की निंजा, हार्ले डेविडसन, डुकाटी 1098, यामाहा थंडरकैट, टीवीएस अपाचे, एनफील्ड बुलेट, यामाहा 650 समेत और भी कई मोटरसाइकिल शामिल हैं.

 

 

एवलीन शर्मा की इस पेंटिंग में आखिर क्या है खास

अभिनेत्री एवलीन शर्मा का हमेशा यह ख्वाब रहा है की उनका खूबसूरत चित्र बनाया जाए. उनका यह ख्वाब अब पूरा हो चुका है. दिलचस्प बात है की एवलीन के बहुत अच्छे दोस्त रोहन जोगळेकर पेशे से कलाकार हैं, वे एवलिन का चित्र बनाना चाहते थे, इसलिए वे एवलीन के पास उनका न्यूड स्केच बनाने की कल्पना के साथ आये.

इस पेंटिंग की कल्पना से एवलीन बहुत उत्साहित थी, वे जल्द दोनों एक साथ आये और इस कल्पना पर विचारविमर्श करने लगे की पेंटिंग किस प्रकार की होगी. रोहन यह खास पेंटिंग बनाने के लिए कुछ महीनों का समय लिया, हाल ही में रोहन ने यह खूबसूरत पेंटिंग एवलीन को गिफ्ट की है. 

एवलीन कहती है " मुझे लगता है की थोड़ा स्वार्थी होना अच्छा है, मुझे हमेशा लगता था की मेरा एक चित्र हो. यह पेंटिंग मेरी उम्मीदे पूरा करती है और मुझे इससे बहुत ,बहुत ही ज्यादा प्यार है.

औनलाइन शौपिंग के साइड इफैक्ट्स

शौपिंग लफ्ज का ईजाद और चलन कब और कैसे हुआ, मालूम नहीं, मगर आजकल इतना सामान्य व सहज हो गया है कि हम चाहे फुटपाथ पर सजे ठेलों पर चड्डीबनियान का मोलभाव करतेकरते पसीनापसीना हो जाएं या फिर फलसब्जी वाले से घंटों उलझ 2-4 रुपए कम कराने में लस्तपस्त, कहते हम उसे शौपिंग ही हैं, खरीदारी नहीं.

सड़कों पर भटक, दुकानदारों से उलझ, धूलमिट्टी से सन, भीड़भाड़ में धक्कामुक्की खा कर जब हमें अक्ल आ ही गई तो हम ने औनलाइन बायर बनने की सच्ची वाली कसम खा ही ली और आननफानन ताबड़तोड़ और्डर कर डाले.

अपनी देर आयद दुरुस्त आयद वाली सोच पर (काश, हम अपनी पीठ खुद थपथपा पाते.) हम फूले नहीं समाए (अब क्या कहें पहले से ही कितने फूले हुए हैं). फिर चैन से एक देशभक्ति के स्लोगन वाली चाय सिप करते हुए बेसब्री से और्डरों के आने का इंतजार करने लगे.

कुछ घडि़यां सुकून से घर की चारदीवारी में जो बिताईं तो पाया कि हम से पहले ही हमारे सभी पड़ोसी औनलाइन ग्राहक बन चुके हैं. कूरियर बौय का आना कुछ पोस्टमैनों की रोजाना वाली आमद की तरह था, जो अब गाहेबगाहे ही आया करते हैं और वे भी सरकारी चिट्ठियों के साथ. और तो और, कालोनी में औनलाइन ग्राहकों की गिनती का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता था कि कंपनियों की गाडि़यां भारी सामान से लदीं फर्राटे भरतीं घूमघूम कर घर बैठे सब के शौपिंग यानी खरीदारी वाले गमको अपने कंधों पर मुस्तैदी से उठा रही थीं.

हम मुंगेरीलालजी के नक्शेकदम चल कर के सुहानेहसीन सपनों में खो गए. सपना कि पैट्रोल के खर्च पर बचत. सपना कि अब ज्यादा रिलैक्स रह कर उम्दा काम करेंगे और औफिस में बौस को खुश कर देंगे… प्रोमोशन के चांसेज. सपना कि खरीदारी के दौरान सड़कों पर मुंह बाए खुले चैंबरों में असमय जान गंवाने से बचेंगे.

कहां घंटों ड्राइव कर के मौल्स, दुकानों तक पहुंचने की जद्दोजेहद. वह जाम में फंसना. कीचड़ का छपाका राहगीरों पर उड़ा कर (दाग अच्छे हैं. पर केवल क्यूट सी एड में.) खुद उन की गालियों की बौछार झेलना.

पर यहां तो सिर मुंडाते ही ओले पड़ने वाली बात हो गई. हमारा पहला और्डर उन की 3 खूबसूरत साडि़यों का था. लेकिन तोलमाप डौट.कौम की चकाचक मौडलों पर झकास सजी साडि़यां छेदों से भरी थीं. रंग यहांवहां से उड़ा था. बिटिया के 4 जोड़ी सैंडलों का साइज (हालांकि हम ने अच्छी तरह देख कर साइज और्डर किया था) उन्हीं नंबरों के साथ छोटा था.

हमारे लख्तेजिगर के सल्लू स्टाइल बूट्स के दोनों पैरों का लैदर अलगअलग रंग का था. डेढ़ घंटे का वक्त बरबाद कर जो और्डर हम ने क्लिक किया था उसे वापस लौटाने के लिए हमें बस 15 किलोमीटर दूर जाना था.

अभी टूटे सपनों का जनाजा उठ भी न पाया था कि जल्द ही दोबारा हमारी जिंदगी गच्चे खाने लगी. कनैक्टिविटी प्रौब्लम से दोचार होते ही हमें अपनी नानी याद आ गईं. मुई इंटरनैट कनैक्टिविटी के लपेटे में एक ही सामान के 2-2 और्डर जो क्लिक हो गए. हम ने सिर पीट लिया. अभी तो पहले ही सामान की वापसी के लिए मर्केंडाइज रिटर्निंग वालों के यहां चक्कर लगालगा कर वास्कोडिगामा हो रहे थे और… और अब जब तक दोबारा कनैक्टिविटी आए तब तक धाड़धाड़ करते कलेजे के साथ हम सारा कामधाम छोड़छाड़ डबल और्डर कैंसिल करने के लिए मौनीटर के सामने बिसूरते बैठे रहने को मजबूर थे. हमारी दुखभरी दास्तान इतने पर ही खत्म हो जाती, ऐसा भला हमारे नसीब में कहां था? एक मध्यवर्गीय भारतीय होने का श्राप हमारे सिर पर बेताल का ताल ठोंकता ही रहता.

अपने बौस को उन की शादी की सालगिरह पर तोहफे में देने के लिए खरीदा माइक्रोवेव एक छोटी सी शिपिंग मिस्टेक की वजह से किसी दूसरे के घर पहुंच गया था और बदले में उन साहब का पैकेजिंग मिस्टेक के कारण टूटा डिनर सैट सामने पड़ा हमारा मुंह चिढ़ा रहा था.

माइकल शूमाकर और सेबैस्टियन वेट्टल भैया के बाद हम एक नया रिकौर्ड बनाने जा रहे हैं, क्योंकि फौर्मूला वन की रेस में दौड़ना हमारे शहर की गलियों में कार दौड़ाने से इतर नहीं है. हमारे पिद्दी से कलेजे में सोतेजागते बस अपनी शौपिंग आइटम्स और और्डर्स को ले कर धुकधुकी बनी रहती. न जाने कब क्या हो जाए? हम ने पूरे परिवार के साथ बैठ कर तय किया कि चाहे जो हो जाए अब गिनीचुनी अच्छी कंपनियों को ही और्डर करेेंगे और साथ ही सब को घुड़काया भी कि घंटों बैस्ट औफर के चक्कर में इंटरनैट और बिजली के बिल से घर की बजटरूपी नैया को न डुबोएं.

इस सब के बावजूद हालांकि रबड़पैंसिल, जूतों के तस्मे, दियासलाई, ताजा पनीर, नीबू, मिर्ची वगैरह जैसी रोजमर्रा की डिमांड में चक्करघिन्नी हो गलीसड़कों पर फाकाकशी करनी ही पड़ती थी.

कभी किसी आइटम की डबल बिलिंग का लफड़ा तो कभी दोगुने शिपिंग चार्ज का थपेड़ा.

कुछ ही महीने बीते थे कि एक दिन अचानक हम ने पाया कि हम अस्पताल के बिछौने पर बड़े सुकून से आराम फरमा रहे हैं (और भला सुकून की नींद हमें कहां नसीब होती?). हम वापस आंखें खोल कर इस दुनिया से रूबरू नहीं होना चाहते थे. फिर… बस… हम श्रीमतीजी की जबानी अपने टूटे हुए दिल की कहानी सुनते रहे…

हमारी मिजाजपुर्सी को पहुंची किन्हीं मुहतरमा को वे बता रही थीं कि कैसे एक स्पाईवेयर ने हमारे क्रैडिट कार्ड पर खुफिया डाका डाल कर हमारे बचेखुचे बैंक बैलेंस को लूट लिया. हम ने हारे जुआरी की तरह एक लंबी सांस (हालांकि औक्सीजन मास्क लगा हुआ था हमें) खींच कर फिर कसम खाई कि अब कभी औनलाइन शौपिंग के लिए क्लिक नहीं करेंगे. आखिरकार हम भी एक जागे हुए ग्राहक थे और ग्राहक सेल में ठोंके गए मुकदमे में अपनी जीत का हमें पूरा भरोसा था. (भरोसा करना हमारी पुरानी मजबूरी थी). हम नेताओं, पुजारियों, मुल्लाओं, बीमा कंपनियों सब पर भरोसा करते चले आ रहे हैं. एक बार फिर गृहस्थी के जंजाल और संसार की मोहमाया में जकड़े हम हरभजन भैया के ठेले से 500 ग्राम टमाटरों पर 1 रुपया कम करा कर अपने पुराने दिनों में (सहीसलामत न सही) लाइफलाइन बचा लौट आए थे.

महिलाओं की ऊंची हील्स का पुरुषों पर असर

फ्रांस की एक यूनिवर्सिटी की टीम ने एक अध्ययन के दौरान कई पुरुषों से प्रश्न किया कि जब वे किसी महिला को हाई हील पहने देखते हैं तो उस महिला के प्रति उन की यौन अनुभूति में क्या परिवर्तन होता है और उन की शारीरिक क्रियाएं, मसलन दिल की धड़कनों का तेज हो जाना, पसीना आ जाना आदि कैसी होती हैं.

कई पुरुषों का जवाब था कि वे किसी ऐसी महिला को देखते हैं तो उस महिला के प्रति उन का आकर्षण बढ़ जाता है और शरीर में कुछ खास तरह की क्रियाएं महसूस होने लगती हैं, क्योंकि अधिकतर मौडल्स या सैलिब्रिटीज ही हाई हील्स का उपयोग करती हैं. उन की तरफ सभी पुरुषों का आकर्षण होना निश्चित ही है.

टीम ने बाजार या मौल में भी जा कर निरीक्षण किया तो पाया कि अगर किसी हाई हील पहनने वाली महिला का बैग गिरता है तो उस की सहायता करने वालों की संख्या एक सामान्य फुटवियर पहनने वाली महिला से काफी अधिक हो जाती है. इस से यह निष्कर्ष निकाला गया कि महिलाओं के जूते या सैंडल हील्स पुरुषों के व्यवहार पर एक शक्तिशाली प्रभाव डाल रहे हैं.

और की चाहत बन गई आफत

पत्नी के किसी से संबंध बन जाएं तो पतिपत्नी के रिश्ते पर तो आंच आती ही है, एकाध का खून हो जाना भी संभव रहता है. दिल्ली में बिजली के ठेकेदार को मथुरा ले जा कर पति ने इसलिए मार डाला कि पत्नी के उस से तब संबंध बन गए जब वह ठेकेदार पतिपत्नी के घर में ही रहता था और दोनों साथ काम करते थे. पत्नी पर हक बहुत पुराना मामला है. राम ने सीता को वापस पाने के लिए जहां पूरा युद्ध लड़ा, वहीं पत्नी के अपमान का बदला लेने के लिए महाभारत का युद्ध चचेरे भाइयों में हुआ. शक पर बनी फिल्मों में ‘संगम’ अच्छेअच्छों को आज भी याद होगी, जिस में तीसरा खुद आत्महत्या कर लेता है. नानावटी का मामला महीनों सुर्खियों में रहा.

पत्नी पर इस तरह का हक कि वह अपनी मरजी से किसी और से शारीरिक संबंध न बना सके, आज और ज्यादा विवाद का कारण बन रहा है.

इस बारे में कानून एकतरफा सा है. पत्नी से उस की मरजी से बने संबंध पर पति तीसरे पर फौजदारी का मुकदमा कर सकता है और यदि संबंध साबित हो जाए तो दूसरे आदमी को सजा भी हो सकती है. पर अगर पति का दूसरी किसी औरत से संबंध हो तो सजा न पति को दिलवाई जा सकती है, न सौतन को. कुछ वर्ष पहले सर्वोच्च न्यायालय ने पत्नियों के दूसरों से संबंध बनाने के हक पर उन के खिलाफ फैसला दिया था क्योंकि इस कानून से सजा पत्नी को नहीं, तीसरे पुरुष को ही मिलती है.

कानून चाहे आज भी पत्नी को पति की संपत्ति मानता हो पर सच यह है कि पति या पत्नी के किसी और से संबंध को तलाक की वजह तो माना जा सकता है पर न अपराध और न अपराध करने की छूट. यदि आज की औरत किसी से संबंध बनाती है तो वह सारी ऊंचनीच देख कर बनाती है. यह सामाजिक तौर पर भले गलत हो पर समाज के नाम पर पत्नी को एक औरत के सामान्य हकों से वंचित नहीं करा जा सकता.

शारीरिक संबंध वैवाहिक संबंधों से अलग है. विवाह साथ रहने, साझा घर शेयर करने, एकदूसरे का खयाल रखने का वादा है, पर जब विवाह में खटास आ जाए और पति या पत्नी को किसी और की चाहत हो जाए तो इसे इस विवाह की कमजोर कड़ी माना जा सकता है. इस पर तलाक लिया जाए या नहीं, यह दोनों की अपनी मरजी है पर इस में पति, पत्नी या तीसरे के खून को सामाजिक हक या संभावना का नाम नहीं दिया जा सकता. दिल्ली के इस मामले में पति उमेश ने पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाने पर तपन को मार कर सजा दे दी पर अब क्या होगा? उमेश वर्षों जेल में रहेगा और पत्नी वर्षों तक उस दर्द को झेलती रहेगी कि उस के साथ न तो प्रेमी है और न ही पति. विवाह का क्या यही हक है कि इस कारण 3-3 जीवन खराब हो जाएं? यह पुरुषों की ही सोच नहीं है, औरतों की भी है. पतिपत्नी दोनों एकदूसरे पर अधिकार जमातेजमाते हदें पार कर लेते हैं. उन्हें जरा भी भूलचूक स्वीकार्य नहीं होती और बहुत मामलों में आपा खो दिया जाता है. यह सिर्फ हमारे यहां हो रहा हो ऐसा नहीं, यह दुनिया भर में होता है.

आज जब औरतों का अपना वजूद बन रहा है, वे पति पर ही आश्रित नहीं हैं, नई तरह की सोच विकसित करनी होगी. एक को लगता है कि दूसरा उसे धोखा दे रहा है तो तलाक का रास्ता खुला तो है, मारपीट पर क्यों उतारू हो जाए जिस में कुछ हाथ नहीं लगता.

मौसम की मार, घट रही गेहूं की पैदावार

इस साल मौसम के बदले मिजाज ने सभी को चौंका कर रख दिया है. खेतीकिसानी के माहिरों के माथे पर चिंता की लकीरें हैं, तो किसान एक तरह से सकते में हैं कि आखिरकार यह हो क्या रहा है. जाड़ों में पहले सी ठंडक क्यों नहीं है. किसानों की चिंता खुद को ले कर कम और फसलों को ले कर ज्यादा है, जिन्हें बोआई से ले कर कटाई तक एक तय तापमान और नमी की जरूरत रहती है. मौसम की गड़बड़ी से गेहूं सहित रबी की सभी फसलों का रकबा काफी घट गया है.

तापमान में बदलाव का आलम यह है कि जानकार और माहिर हैरान हैं और एकदम से किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रहे. इस के लिए लगातार दुनिया भर के मौसम को बदलने वाली वजहों की निगरानी की जरूरत है और वजह मिल भी जाए तो उस के बाद एक बड़ी जरूरत उस के मुताबिक खेतीकिसानी का कैलेंडर बनाने और उस पर अमल करने की होगी, जो आसान काम नहीं होगा.

केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय ने बीती 3 जनवरी को जो आंकड़े गेहूं की घटती पैदावार को ले कर जारी किए, वे वाकई चिंताजनक हैं और देश की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डालने वाले हैं.

मंत्रालय के मुताबिक लगातार दूसरे साल सूखा पड़ने और जाड़े के मौसम में ठंडक न पड़ने से गेहूं की बोआई पिछड़ गई है. रबी के मौसम की सब से बड़ी फसल गेहूं की बोआई आमतौर पर अक्तूबर महीने में शुरू हो जाती है और नवंबर के आखिर तक चलती है.

लेकिन बीते साल के अक्तूबरनवंबर के महीनों में ठंडक पहले जैसी नहीं थी, इसलिए गेहूं की बोआई का रकबा बमुश्किल 271.46 लाख हेक्टेयर तक ही पहुंच पाया, जबकि बीते सीजन में इसी वक्त तक 293.16 लाख हेक्टेयर रकबे में गेहूं की बोआई हो चुकी थी यानी महज 1 साल में मौसम के बदलते मिजाज के चलते गेहूं की बोआई का रकबा 21.7 लाख हेक्टेयर कम हो गया.

इस आंकड़े का सीधा असर पैदावार और किसानों की माली हालत पर पड़ना तय है. अब देशभर में गेहूं की पैदावार 9 करोड़ टन का तयशुदा आंकड़ा छू पाएगी, इस में शक है. गौरतलब है कि साल 2014-15 में देश में गेहूं की पैदावार 889.5 लाख टन हुई थी. अगर मौसम के तेवर यही रहे तो इस साल गेहूं की पैदावार 850 लाख टन के आसपास सिमट जाने का अंदेशा है.

वक्त रहते अगर मौसम के बदलते मिजाज के मुताबिक खेतीकिसानी के तौरतरीके नहीं बदले गए, तो यह घाटा लगातार बढ़ना तय है.

जलवायु के लिहाज से देश के सभी सूबे गेहूं की खेती के लिए मुफीद हैं, पर सब से बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में गेहूं की खेती सब से ज्यादा होती है. इस के बाद पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और बिहार का नंबर आता है. इन सभी सूबों में मौसम आमतौर पर एक सा रहता है. गेहूं की बोआई के वक्त ठंडक रहती है और कटाई के वक्त तक धीरेधीरे गरमी बढ़ जाती है.

यह गेहूं की फसल की खूबी है कि वह तापमान का उतारचढ़ाव बरदाश्त कर जाती है और किसान को निराश नहीं करती. इस का बीज 4-5 डिगरी सेल्सियस पर भी अंकुरित हो जाता है और 35 डिगरी सेल्सियस पर भी, लेकिन ज्यादा और अच्छे अंकुरण के लिए सही तापमान 20-25 डिगरी सेल्सियस है.

कम और ज्यादा तापमान पर अंकुरण कम होता है, जिस से पैदावार भी कम होती है. देश में गेहूं की प्रति हेक्टेयर औसत पैदावार 30 क्विंटल है, लेकिन इस के लिए जरूरी है कि तापमान फसल की मांग और जरूरत के मुताबिक रहे. पिछले अक्तूबरनवंबर में तापमान औसत से ज्यादा रहा, इस से अंकुरण कम हुआ.

इसी तरह गेहूं की बेहतर बढ़वार के लिए सही तापमान 25 डिगरी  सेल्सियस माना जाता है. बोआई के समय तापमान कम हो और फसल की बढ़वार के साथ बढ़ता जाए तो नतीजा बेहतर होता है. मार्च के महीने में औसत तापमान 25 डिगरी  सेल्सियस होने से फसल समय पर और अच्छी पकती है. लेकिन जब दिसंबरजनवरी जैसे ठंडे महीनों में ही औसत तापमान 30 डिगरी सेल्सियस रहे जैसा कि इस साल हुआ, तो ज्यादा पैदावार की उम्मीद करना बेमानी है.

जनवरी के महीने में जब बाली में दाना पड़ रहा होता है तब गेहूं की फसल को ज्यादा ठंडक की जरूरत होती है, जो हर साल पड़ती भी थी. लेकिन इस साल हैरतअंगेज तरीके से दिसंबर का महीना गरम रहा, जिस का फर्क गेहूं की फसल पर देखने में आया. कहीं दाने बराबर नहीं पड़े, तो कहीं फसल पीली पड़ कर मुरझा गई. कहीं रोग और कीटों ने अपना असर दिखाया, तो कहीं फसल बढ़ी ही नहीं. अंदाजा है कि इस से प्रति हेक्टेयर 5 क्विंटल का नुकसान हुआ.

अगर यही हाल रहा तो फरवरी में पारा 25 डिगरी सेल्सियस से ऊपर ही रहेगा, जो गेहूं को जल्द पकाएगा. नतीजा यह होगा कि दाना छोटा व घटिया होगा और फसल इसी महीने में पक कर पीली पड़ जाएगी.

और भी हैं वजहें

बात अकेले तापमान में उतारचढ़ाव की नहीं है, बल्कि इस से जुड़ी और भी वजहें हैं जिन के चलते गेहूं की पैदावार पर बुरा असर पड़ रहा है. इस साल बारिश भी औसत से कम हुई और गरमी ज्यादा रही, जिस से जमीन में नमी की कमी रही. नतीजा यह हुआ कि असिंचित इलाकों में किसानों ने जैसेतैसे गेहूं बोने की तसल्ली कर ली.

रहीसही कसर बारिश ने पूरी कर दी, जो इस साल ढंग से हुई ही नहीं. बढ़वार के वक्त अगर एक बार भी हलकी बारिश हो जाए तो गेहूं की फसल अच्छी तरह बढ़ती है और उस में दाने भी खूब पड़ते हैं. इस साल गेहूं की फसल वही किसान ले पा रहे हैं, जिन के पास सिंचाई के साधन हैं और हर कोई जानता है कि ऐसे किसानों की तादाद 25 फीसदी भी नहीं है.

मौसम के बदलाव से गेहूं पर रोगों व कीटों का हमला भी ज्यादा होता है. गंजबासौदा के एग्रीकल्चर कालेज के प्रोफेसर आशीष श्रीवास्तव बताते हैं कि गेहूं को सब से ज्यादा नुकसान रस्ट यानी रतुआ बीमारी पहुंचाती है, जिस की रोकथाम के तमाम उपायों के बाद भी पैदावार में 10 फीसदी तक गिरावट आती है.

आशीष  बताते हैं कि जैसे कमजोर आदमी को बीमारियां जल्द अपनी गिरफ्त में ले लेती हैं, वैसे ही गेहूं की फसल पर तापमान का असर पड़ रहा है. हर फसल एक तय तापमान पर बढ़ती और पकती है. इस में 5-6 डिगरी सेल्सियस का अंतर ज्यादा असर नहीं डालता, लेकिन इस से कम या ज्यादा अंतर होने पर बीमारियां और कीड़े ज्यादा असर दिखाते हैं. कीटनाशक रसायनों का इस्तेमाल फसल की लागत बढ़ाता है. इस के बाद भी परेशानी खत्म होना पक्का नहीं होता.

यानी दिक्कत कम पैदावार की ही नहीं, बल्कि फसल की बढ़ती लागत की भी है. सिंचाई, खाद और कीटनाशक वगैरह सभी ज्यादा तादाद में किसानों को बढ़ते तापमान के चलते फसलों को देने पड़ रहे हैं.

क्या करें किसान

घटतेबढ़ते तापमान पर किसानों का कोई जोर नहीं चलता. ऐसे कारगर तरीके भी कोई नहीं बता सकता, जिन से वे इस मार और घाटे को कम कर सकें.

सीहोर के एक खेती के माहिर डीएम राठौर की मानें तो यह ठीक है कि खेतीकिसानी मौसम के हाथ में है, लेकिन गेहूं की फसल के लिए किसान कुछ एहतियात बरतें तो घाटा कुछ कम किया जा सकता है. ये उपाय हैं :

* गेहूं की फसल में सिंचाई ज्यादा और कम वक्त के अंतर से करें. 10-12 दिनों के अंतर पर सिंचाई करते रहने से गरमी का असर कम किया जा सकता है.

* निराई के बाद खरपतवारों को फेकें नहीं, बल्कि उन्हें खेत में ही बिछा दें जिस से नमी भाप बन कर कम से कम मात्रा में उड़े.

* ज्यादा तापमान के दिनों (25 डिगरी सेल्सियस से ज्यादा) में 2 फीसदी यूरिया का घोल खेत में डालें. इस से खेती की बढ़वार रुकेगी नहीं.

* खेतों में कृषिक्रियाएं जरूरत के मुताबिक ही करें और खाद भी उचित मात्रा में ही डालें.

* अगर अगले साल अच्छी फसल लेनी है, तो बारिश के बाद कम जुताई करें ताकि खेत में नमी बनी रहे. जुताई के तुरंत बाद बोआई करें, जिस से नमी का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल हो सके.

* देर से बोई जाने वाली किस्मों का इस्तेमाल करें. गेहूं की ऐसी खास किस्में हैं

जब उन की आदतें न हों पसंद

बंटी और रोशनी कुछ समय पहले ही दोस्त बने थे. हर मुलाकात के दौरान रोशनी को बंटी का व्यक्तित्व और साथ बहुत भला लगता. हर मुलाकात में बंटी वैलडै्रस्ड दिखता, जिस से रोशनी बहुत प्रभावित होती. धीरेधीरे दोनों का प्रेम परवान चढ़ा और फिर उन के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए. बंटी हमेशा रोशनी से स्त्रीपुरुष समानता की बातें करता. अंतत: रोशनी ने बंटी से शादी करने का फैसला कर लिया.

शादी हुए साल भर भी नहीं बीता था कि रोशनी के सामने बंटी की कई बुरी आदतें उजागर होने लगीं. उसे पता चला कि बंटी तो रोज नहाता भी नहीं है और जब नहाता है, तो नहाने के बाद गीले तौलिए को कभी दीवान पर तो कभी सोफे पर फेंक देता है. रात को सोते समय ब्रश भी नहीं करता है. रोशनी को बंटी से ज्यादा फोन करने की भी शिकायत रहने लगी. अब बंटी की स्त्रीपुरुष समानता की बातें भी हवा हो गईं. शादी के तीसरे ही साल दोनों अलग हो गए.

जब भी लव मैरिज की बात होती है तो उस के समर्थन में सब से बड़ा और ठोस तर्क यही दिया जाता है कि इस में दोनों पक्ष यानी लड़कालड़की एकदूसरे को अच्छी तरह जान लेते हैं. लेकिन क्या हकीकत में ऐसा हो पाता है? वास्तव में दूर रह कर यानी अलगअलग रह कर किया जाने वाला प्रेम बनावटी, अधूरा और भ्रमित करने वाला हो सकता है. ऐसा प्रेम करना किसी भी युवा के लिए काफी आसान होता है, क्योंकि इस में उसे अपने व्यक्तित्व का हर पक्ष नहीं दिखाना पड़ता. वह बड़ी आसानी से अपनी बुरी आदतें छिपा सकता है. इस प्रकार के प्रेम में ज्यादातर मुलाकातें पहले से तय होती हैं और घर से बाहर होती हैं, इसलिए दोनों ही पक्षों के पास तैयारी करने और दूसरे को प्रभावित करने का काफी समय होता है.

असली परीक्षा साथ रह कर

घर से बाहर प्रेमीप्रेमिका को एकदूसरे की अच्छी बातें ही नजर आती हैं. विभिन्न समस्याओं के अभाव में कुछ तो नजरिया भी सकारात्मक होता है, तो सामने वाला भी अपना सकारात्मक पक्ष ही पेश करता है. प्रेमी सैंट, पाउडर लगा कर इस तरह घर से निकलता है कि प्रेमिका को पता ही नहीं चल पाता कि वह आज 2 दिन बाद नहाया है. प्रेमिका को यह भी नहीं पता चलता कि उस का प्रेमी अपने अंडरगारमैंट्स रोज बदलता भी है या नहीं. और पिछली मुलाकात में उस के प्रेमी ने जो शानदार ड्रैस पहनी थी वह उसी की थी या किसी दोस्त से मांग कर पहनी थी.

कुल मिला कर लव मैरिज हो या अरेंज्ड मैरिज, किसी भी जोड़े की असली परीक्षा तो साथ रह कर ही होती है. इस लिहाज से विवाह के स्थायित्व की गारंटी को ले कर लव मैरिज या अरेंज्ड मैरिज में ज्यादा अंतर नहीं है, क्योंकि दोनों ही मामलों में साथी का असली रूप तो साथ रह कर ही पता चलता है. दोनों ही तरह की शादियों में यह दावा नहीं किया जा सकता कि जीवनसाथी कैसा निकलेगा?

सामंजस्य भी जरूरी

हम यहां इस बहस में नहीं पड़ रहे कि दोनों तरह की शादियों में कौन सी शादी सही है, लेकिन इतना जरूर कह रहे हैं कि शादी से पहले किया गया प्रेम शादी के बाद किए जाने वाले प्रेम से आसान होता है. शादी के बाद जोड़े को एकदूसरे के बारे में सब पता चल जाता है. एकदूसरे की असलियत खुल जाती है. अच्छीबुरी सब आदतें पता चल जाती हैं. जिंदगी की छोटीबड़ी समस्याएं भी साथ चलने लगती हैं. इस के बाद भी यदि उन में प्रेम बना रहता है तो हम उसे असली प्रेम कह सकते हैं. बेशक कुछ लोग इसे समझौता भी कहते हैं, मगर हर रिश्ते का यह अनिवार्य सच है कि कुछ समझौते किए बिना कोई भी, किसी के भी साथ, लंबे समय तक या जिंदगी भर नहीं रह सकता.

अंत में घर के अंदर और बाहर के इसी प्रेम के बारे में चुनौती सी देतीं ये लाइनें भी गौर करने लायक हैं:

घर से बाहर तो प्रेमी सब बन लेते हैं,
घर से बाहर तो प्यार सब कर लेते हैं,
करो घर में, घरवाली से तो जानें.
दाल खाते वक्त कंकड़ जो मुंह में आ जाए,
या रोटी में बाल लंबा तुम्हें दिख जाए,
तब आई लव यू बोलो तो जानें.

सुषमा ‘दीदी’ के हाथ में डोर

मध्य प्रदेश में भाजपा प्रदेशाध्यक्ष के पद पर दोबारा मौजूदा अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान का चुनाव हुआ, तो सभी ने राहत की सांस ली. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी इस कोशिश में कामयाब रहे कि चुनाव की नौबत ही न आए. अगर ऐसा होता, तो तय है कि भाजपा की फूट भी उजागर हो जाती.अध्यक्ष बनने के बाद नंदकुमार सिंह चौहान और शिवराज सिंह चौहान दोनों ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से आशीर्वाद लेते हुए यह दिखाने की कोशिश की कि ‘दीदी’ की रजामंदी भी इस चुनाव में थी. अब इन दोनों की नजर मैहर विधानसभा चुनाव सीट के उपचुनाव पर है. शिवराज सिंह चौहान के पीछे दिल्ली में कौन है, इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने के लिए अब लोगों को कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. दीदी हैं न.

किसानों से ठगी और सरकार को चूना, जानिए कैसे

जयपुर समेत राजस्थान के 12 जिलों में मौसम आधारित फसल बीमा योजना लागू है, जिस के तहत बीमा कंपनी सरकार व किसानों से प्रीमियम ले कर अपना खजाना भर रही है, लेकिन रिस्क कवर देने के नाम पर कंपनी सरकार व किसानों से ठगी कर रही है. दिलचस्प बात तो यह है कि बीमा कंपनी किसानों से ज्यादा सरकार से फायदा उठा रही है. वजह साफ है, सरकार पहले तो बीमा कंपनी को प्रीमियम की आधी राशि देती है और फिर फसल खराब होने पर अरबों रुपए किसानों को मुआवजे के रूप में देती है, जबकि फसल खराब होने पर बीमा कंपनी द्वारा किसानों को क्लेम देना चाहिए.

देखने में आया है कि बीमा कंपनी किसानों को कभीकभार फसल खराब होने का मुआवजा तो देती है, लेकिन यह मुआवजा ऊंट के मुंह में जीरा जितना ही होता है. गौरतलब है कि बीमा कंपनी किसानों को क्लेम दे तो सरकारी खजाने से किसानों को अरबों रुपए मुआवजा देने की नौबत ही न आए. बावजूद इस के मौसम आधारित फसल बीमा योजना की शर्तें भी इतनी जटिल हैं कि यह मामला हर किसी की समझ में नहीं आता और बीमा कंपनी कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से हर साल अरबों रुपए का प्रीमियम चट कर जाती है. यानी हर हालत में बीमा कंपनी रिस्क कवर देने में फिसड्डी है और सरकार को इस की भरपाई करनी पड़ती है. इस में यह भी मजे की बात है कि किसानों को फसल बीमा दिलाने में सरकार के नुमाइंदों की ओर से भी कुछ खास नहीं किया जा रहा है.

यह है हकीकत

रबी या खरीफ फसल में ज्यादा बारिश होने, ओले पड़ने या अकाल पड़ने पर सरकार किसानों को सरकारी खजाने से अरबों रुपए का मुआवजा देती है, जबकि प्राकृतिक आपदा या अकाल की स्थिति में फसल बीमा योजना के तहत किसानों को बीमा क्लेम दिया जाना चाहिए. बीमा क्लेम मिलने के बाद किसानों को किसी मदद या अनुदान की जरूरत ही नहीं रहेगी. ऐसे में महज उन किसानों को ही अनुदान देना होगा, जिन्होंने केसीसी के तहत कर्ज नहीं लिया हुआ है. हालांकि ऐसे किसानों की तादाद अब बहुत कम रह गई है.

इन का होता है बीमा

किसान क्रेडिट कार्ड यानी केसीसी के तहत बैंकों से कर्ज लेने वाले किसानों का खुद ही अनिवार्य फसल बीमा हो जाता है. बीमा प्रीमियम की आधी राशि किसान के खाते से काटी जाती है, जबकि आधी राशि सरकार देती है. यह फसल के अनुसार कमज्यादा हो सकती है. केसीसी के तहत कर्ज लेने वाले किसानों को आमतौर पर बैंक वाले इस बारे में नहीं बताते, जिस के कारण किसान कभी क्लेम की बात भी नहीं करते. वैसे किसान चाहें तो अपनी मर्जी से भी फसल बीमा करा सकते हैं.

दिखावा बने बीमामापन मौसमयंत्र

मौसम आधारित बीमा योजना में बीमा कंपनी कई जगहों पर  आटोमैटिक यानी अपनेआप चलने वाले मौसमयंत्र लगवाती है, जिन की रिपोर्ट के आधार पर क्लेम तय होता है. जयपुर में कुल 637 ग्राम पंचायतें हैं, लेकिन आटोमैटिक मौसमयंत्र महज 35 ही हैं. आज जहां 1 किलोमीटर दायरे में भी बारिश व अकाल का कहर हो सकता है, वहीं यह बीमा कंपनी 40 से 50 किलोमीटर की दूरी का मौसम एक ही यंत्र से रिकार्ड करती है, जो कभी भी सटीक नहीं हो सकता है.

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