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‘द साबरमती रिपोर्ट’ : पुरानी कहानी बयां करती प्रोपगंडा फिल्म में हिंदी बनाम अंगरेजी का नया तड़का

(एक स्टार)

27 फरवरी, 2002 को गोधरा स्टेशन के आउटर सिग्नल पर  अयोध्या से साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन के दो कोच में आग लगी थी,जिस मेें 59 निर्दाेष लोगों की दुखद मौत हो गई थी. यह ट्रेन अयोध्या से अहमदाबाद जा रही थी, जिस में अयोध्या में ‘विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के तत्वावधान में आयोजित ‘संपूर्णाहुति यज्ञ’ का हिस्सा बनने के बाद ‘कार सेवक’ लौट रहे थे. इसी सत्य घटना पर आधारित क्राइम थ्रिलर  फिल्म ‘द साबरमती रिपोर्ट’ ले कर एकता कपूर, अमूल मोहन व अंषुल मोहन आए हैं, जिस का लेखन विपिन अग्निहोत्री और अविनाश ने किया है. पहले इस का निर्देशन रंजन चंदेल ने किया था लेकिन ‘विक्कीपीडिया’ की माने तो सेंसर बोर्ड ने जब 8 अप्रैल 2024 में फिल्म में बदलाव के लिए कहा, तब निर्माताओं ने 9 जुलाई 2024 को, रंजन चंदेल को फिल्म से बाहर कर दिया और अगस्त 2024 में रंजन चंदेल की जगह टैलीविजन लेखक और अभिनेता धीरज सरना ने निर्देशन की जिम्मेदारी लेेते हुए कथानक में कुछ बदलाव कर कुछ दृश्य पुनः फिल्माए. उस के बाद 15 नवंबर, 2024 को यह फिल्म सिनेमाघरों में पहुंची.

फिल्म देखते वक्त हमें इस बात का अहसास हो रहा था कि सेंसर बोर्ड ने क्या बदलाव कराए होंगे. फिल्म के क्लाइमैक्स में पत्रकार समर कुमार ‘भारत न्यूज’ चैनल में बडे़ पद पर पहुंच कर देश की जनता के सामने 2002 में ट्रेन में आग लगने से मृत 59 लोगों की नामावली के साथ ही बताते हैं कि उस के बाद गुजरात व देया का किस तरह विकास हुआ और कैसे अयेाध्या का राम मंदिर 22 जनवरी 2024 को लोगों के दर्शन के लिए खुला. समझ में नहीं आता कि फिल्मकार फिल्म में गोधरा कांड के सच को बताते हुए अयोध्या के राम मंदिर कैसे पहुंच गए.

सच यह है कि ‘गोधरा कांड’ पर आज तक कोई अंतिम निर्णय नहीं आया है. मगर फिल्मकार लगातार ‘नानावटी कमीशन’ के आधार पर गोधरा कांड पर अधपकी प्रोपगंडा फिल्में बनाते जा रहे हैं.

‘साबरमती ट्रेन’ के दो कोचों में आग लगने की भयावह घटना के बाद गुजरात में 3 दिनों तक दंगे हुए. इन 3 दिन के दंगो में मृतकों की संख्या 2000 से अधिक थी. सैकड़ों लड़कियों की इज्जत लूटी गई थी. इन 3 दिवसीय दंगो में एक धर्म विशेष के लोग ही हताहत व पीड़ित हुए थे, जबकि दूसरे धर्म के कुछ छुटभैया नेता आज की तारीख में बड़े राष्ट्रीय नेता बने हुए हैं. मगर इन तीन दिनों के दंगों को ले कर यह फिल्म खामोश रहती है. राज्य सरकार द्वारा नियुक्त नानावती-मेहता आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रेन में लगी आग पूर्व नियोजित थी, जिसे एक बड़ी मुसलिम भीड़ द्वारा योजनाबद्ध आगजनी कर अंजाम दिया गया था.

2004 में केंद्र सरकार द्वारा गठित एक सदस्यीय बनर्जी आयोग ने इसे एक दुर्घटना की संज्ञा दी थी. इन दो निष्कर्षों के बीच एक बड़ी खाई है. अब यह तो हर आम इंसान पर निर्भर करता है कि कौन किसे कितना सच मानता है. कोई कुछ भी माने लेकिन कटु सत्य यह है कि ‘गोधरा कांड’ के बाद हुआ यह तीन दिवसीय दंगा, देश में हुए सब से बुरे दंगों में से एक ऐसा दंगा रहा, जिस ने भारत के सामाजिक और राजनीतिक तानेबाने में विनाशकारी बदलाव लाने में अहम भूमिका निभाई.

कहानी में 27 फरवरी, 2002 को गुजरात के गोधरा स्टेशन के नजदीक साबरमती एक्सप्रेस के दो कोच में आग लग गई थी, जिस में 59 निर्दाेष लोगों की दुखद मौत हो गई थी. उस के बाद जांच शुरू होती है कि  क्या यह एक दुखद दुर्घटना थी अथवा कोई एक भयावह साजिश. रेलवे की रिर्पोट और सरकार की रिर्पोट में अंतर रहा. फिल्म ‘द साबरमती रिपोर्ट’ शुरू होती है अदालत से,जहां ईबीटी चैनल ने पत्रकार समर कुमार (विक्रांत मैसी)  के खिलाफ मुकदमा दायर किया है कि उस ने उन के चैनल की मानहानि की है. समर कुमार से सार्वजकिन माफी के साथ ही दो करोड़ रुपए की मांग की गई है. अदालत में समर कुमार सच उगलना शुरू करते हैं फिर फिल्म उन की यात्रा के साथ आगे बढ़ती है. तो यह फिल्म उन की बतौर पत्रकार एक यात्रा है. समर कुमार कैमरामैन कम पत्रकार के रूप में फिल्म बीट संभालते हैं, अचानक गोधरा कांड हो जाता है तो ईबीटी की मशहूर पत्रकार मणिका राजपुरोहित (रिद्धि डोगरा ) के साथ समर कुमार को कैमरामैन के रूप में गोधरा जाने का अवसर मिलता है.

रिपोर्टिंग के दौरान एक राजनेता द्वारा राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा करने की बात की जाती है और मणिका के पास एक फोन आता है. मणिका, समर को फटेज ले कर औफिस में पहुंचाने का आदेश दे कर चली जाती है. कुछ देर बाद समर कुछ और फुटेज व सच ले कर दफ्तर पहुंच कर टेप संपादक को दे देता है. समर के अनुसार आग लगवाई गई है. संपादक के आश्वासन के बावजूद चैनल पर मणिका की स्टोरी चलाई जाती है कि साबरमती ट्रेन में लगी आग एक दुर्घटना है. समर इस का विरोध करता है तो उसे नौकरी से निकाल कर उस पर चोरी का इल्जाम लगाया जाता है.

समर की प्रेमिका (  बरखा सिंह ) उस की जमानत कराने के बाद उस का साथ छोड़ देती है. अब समर शराबी हो गया है. 5 साल बाद चैनल में नई पत्रकार अमृता गिल (राशी खन्ना) आती है,उसे गोधराकांड की पांचवीं बरसी पर काम करने के लिए कहा जाता है तो उस के हाथ समर की फुटेज लग जाती है. फिर वह समर के साथ मिल कर सच जानने का प्रयास करते हुए 59 मृत लोगों के नाम भी उजागर होते हैं. समर को एक नए चैनल ‘भारत न्यूज’ में नौकरी मिलती है,जहां समर इस सच को सभी के सामने लाते है.

‘गोधरा कांड’ पर अब तक काफी कुछ कहा जा चुका है. कई फिल्में आ चुकी हैं. सभी नानावटी कमीशन की रिपोर्ट ही घुमाफिरा कर पेश कर रहे हैं. इस फिल्म में भी कोई नया तथ्य नहीं है. केवल कहानी के प्रस्तुतिकरण में अंतर है. इस बार निर्माताओ ने पत्रकारों, खासकर अंगरेजी भाषी पत्रकारों को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास करते हुए यह कहने का प्रयास किया है कि अंगरेजी पत्रकारों के सामने हिंदी के पत्रकारों को इज्जत नहीं दी जाती. लेकिन यह बात केवल जुमलेबाजी बन कर रह जाती है.

अदालत के अंदर समर कुमार के कुछ संवाद मात्र से हिंदी के महत्व को सिद्ध करने का प्रयास सफल नहीं रहा. माना कि समर की यात्रा के माध्यम से फिल्मकार ने मीडिया का एक अलग चेहरा दिखाया है, पर इस से हर आम इंसान परिचित है. मीडिया व सत्ता के बीच के सांठगांठ की तरफ इशारा जरुर किया गया. बताया गया है कि एक कमरे में जिस चैनल का औफिस था, जैसे ही वह  सत्तापक्ष का साथ देने लगता है, वैसे ही वह चैनल बहुमंजली इमारत का स्वामित्व पा जाता है. पर मीडिया व राजनीति की सांठगांठ की परतों को उजागर नहीं किया गया. हां फिल्म यह जरूर कहती है कि सरकार के इशारे पर झूठी खबरें बेच कर सत्ताधारी सरकार को खुश रखते हुए महल खड़े किए जा सकते हैं.

फिल्म में गाना, मनोरंजक पलों का भी घोर अभाव है, यही वजह है कि यह फिल्म कलाकारों के सशक्त अभिनय के बावजूद फिल्म दर्शकों को बांध कर नहीं रख पाती. समर कुमार व श्वेता की प्रेम कहानी तो ‘मलमल में जूट का पैबंद’ सी लगती है. घटनाओं की तीव्रता को पकड़ने वाला निर्देशन सराहनीय है. इंटरवल के बाद फिल्म भटकी हुई है. इंटरवल के बाद गति धीमी हो जाती है, इंटरवल के बाद फिल्म फीचर फिल्म की बजाय डाक्यूमेंट्री का रूप ले लेती है. फिल्म का क्लाइमैक्स काफी कमजोर है.

विक्रांत मैसी के चरित्र में भी कमियां हैं. विक्रात मैसी के किरदार समर कुमार के चरित्र की कई परतों पर रोशनी नहीं डाली गई. नौकरी चले जाने के बाद एक हिंदी भाषी पत्रकार का शराब में डूब जाना भी अजीब सा लगता है, वह भी उस राज्य में जहां शराब बंदी है.

फिल्म का प्रचार काफी कमजोर रहा, इसलिए भी यह फिल्म दर्षकों तक नही पहुंच पाई. वैसे निर्माताओं का दावा है कि यह फिल्म ‘माउथ टू माउथ पब्लिसिटी’ से सफलता के रिकौर्ड बनाएगी.

फिल्मकार ने इस बात को रेखांकित ही नहीं किया कि ‘साबरमती ट्रेन’ के कोचों में आग लगने के जब अंग्रेजीदां मणिका राजपुरोहित, हिंदी भाषी कैमरामैन कम पत्रकार समर कुमार के साथ गोधरा ‘ग्राउंड जीरो’ पर जाती है, तो दोनों बिना किसी पारदर्शी जांच के दोनों यह निष्कर्ष कैसे निकालते हैं कि यह कोई दुर्घटना नहीं थी, आग लगी नहीं, लगवाई गई थी.जबकि निर्देशक ने इस निर्णय से मणिका के पलट जाने की वजह की तरफ इशारा जरुर किया है.

नानावटी आयोग की रिपोर्ट, गुजरात हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उद्धरण देती यह फिल्म दर्शकों को यही याद दिलाने की कोशिश है कि अयोध्या से लौट रहे 59 रामभक्तों को गोधरा में जिंदा जला दिया गया था.

‘भारत न्यूज’ पर उन के नाम भी फिल्म बताने की समर कुमार कोशिश करते हैं, लेकिन 10-12 नाम परदे पर आने के बाद यह सिलसिला भी टूट जाता है. गोधरा कांड की बात करतेकरते अंत में राम मंदिर के बनने व उद्घाटन के दृष्यों को दिखाने के मायने भी समझ से परे हैं.

कथानक में संतुलन बनाने या ‘नए राष्ट्रवाद’ के नाम पर अहमदाबाद के एक मुसलिम इलाके में भारतपाक क्रिकेट मैच में भारत की जीत पर मुसलिम बच्चों को खुशी मनाते हुए यह कहा गया यह है नए भारत का भविष्य.

गत वर्ष प्रदर्शित छोटे बजट की फिल्म ‘12वीं फेल’ में अपने शानदार अभिनय से लोगों को अपना दीवाना बना चुके विक्रांत मैसी ने ईमानदार हिंदी भाषी खोजी पत्रकार समर कुमार की भूमिका में जानदार अभिनय किया है.नमगर इस तरह का ‘ओटीटी’ प्लेटफौर्म में शोहरत पाने वाला अभिनय व इस तरह की फिल्में करते हुए विक्रांत मैसी ज्यादा दिन तक सफलता की डगर पर अपने पैर जमाए नहीं रख पाएंगे. मीडिया के अंदरूनी सूत्रों के लिए भरोसेमंद अनुभवी पत्रकार मणिका राजपुरोहित के किरदार में रिद्धि डोगरा एक बार फिर सशक्त अदाकारा के रूप में उभरती है. वही प्रशिक्षु पत्रकार अमृता गिल के किरदार में राशि खन्ना का अभिनय ठीकठाक है. अन्य कलाकार अपनीअपनी जगह ठीक हैं.

बड़ा मकान : क्यों अपना मकान छोड़ दिया गुप्ता जी?

गरमी की छुट्टियों में मैं मम्मी के साथ अपनी मौसी के घर जब भी दिल्ली जाती तो रास्ते में बड़ेबड़े मकान दिखाई देते. शीशे की खिड़कियों पर डले परदे और बालकनी में लगे झूले, कुरसियां, पौधे, हैंगिंग लाइट और बड़ेबड़े सुंदर से मेन गेट और बाहर खड़े गार्ड्स व चमकती गाडि़यां दिखती थीं. मैं हमेशा सोचती कि इन मकानों में लोग अंदर कैसे रहते होंगे. इन मकानों को बस फिल्मों में ही देखा था और वैसी ही कल्पना की थी. पता नहीं, एक उत्सुकता सी थी हमेशा इन बड़े मकानों को अंदर से देखने की.

हमारे घर के सामने रहने वाले गुप्ता अंकल ने अपना घर बेच दिया और रातोंरात ही घर को ढहा दिया गया. अब मलबा ही मलबा था चारों ओर. दोचार दिनों बाद ही मलबा उठाने के लिए मजदूर भी आ गए. 10 दिनों में ही 5 सौ गज का प्लौट दिखाई देने लगा. मैं रोजाना अपने स्कूल से आ कर कमरे की खिड़की से मजदूरों को काम करते देखती. जब मम्मी खाने के लिए आवाज लगातीं, तभी मैं खिड़की से हटती. एक दिन स्कूल से आ कर मैं ने देखा कि प्लौट पर बहुत गहमागहमी है. कई लोग सिर पर कैप लगाए दिखाई दिए जो इंचीटेप से जमीन माप रहे थे. मम्मी ने बताया कि ये कैप लगाए लोग इंजीनियर हैं जो घर का डिजाइन बनाएंगे. किन्हीं अरोड़ा साहब ने यह घर खरीदा है और अब यहां बड़ा सा महलनुमा घर बनेगा. मैं सुन कर बड़ी खुश हो गई और सोचने लगी कि अब तो शायद मैं यह बड़ा सा मकान अंदर से देख पाऊं.

कभी तो कोई मौका मिलेगा अंदर जाने का. अब तो बड़े ही जोरशोर से काम चलने लगा. बहुत शोर रहने लगा. अब हमारे घर के अंदर तक आवाजें आती थीं. ईंटें, सीमेंट, लोहे के सरिये, मशीनें चलती रहतीं, मजदूर जोरजोर से बातें करते यानी खूब चहलपहल रहती थी रात तक. करीब 2 साल तक काम चला और मम्मी ने जैसा कहा था वैसा ही महलनुमा सुंदर सा मकान तैयार हुआ. आज मेरी स्कूल की छुट्टी थी और मैं ने देखा कि इस मकान के बाहर बड़ा सा शामियाना लगा था और पूरा घर शामियाने से चारों ओर से ढका हुआ था. मैं दौड़ कर मम्मी के पास गई तो पापा को मम्मी से बात करते सुना कि आज अरोड़ा साहब के मकान का मुहूर्त है. तभी यह शामियाना लगा है.

तब मैं ने उछलते हुआ पापा को टोका और पूछा, ‘‘फिर तो हम भी जाएंगे न, आखिर पड़ोसी हैं हम इन के?’’ पापा मुसकराए, बोले, ‘‘अरे नहीं बेटा, हमें नहीं बुलाया है उन्होंने. हमें तो जानते भी नहीं हैं ये लोग.’’ सुन कर मैं उदास हो गई और मन ही मन कल्पना करने लगी कि कैसे इस घर के लोग पार्टी करेंगे, घर अंदर से कैसा होगा? सब मजे कर रहे होंगे? बच्चे भागमभाग कर रहे होंगे? इतना बड़ा मकान है यह. काश, ये अरोड़ा अंकल हमें भी बुला लेते. मैं खिड़की के पास आ कर खड़ी हो गई और हसरतभरी निगाहों से मकान की तरफ देखने लगी. रात हो चली थी.

बस, लाइटें ही लाइटें थीं मकान की मंजिलों और शामियाने में और खूब तेज म्यूजिक बज रहा था. कुछ ज्यादा दिख नहीं पा रहा था कि अंदर क्या चल रहा है. दूर तक गाडि़यां दिख रही थीं. मेहमान खूबसूरत कपड़ों में अंदर जाते दिख रहे थे. मम्मी ने मु झे खाना खाने को बुलाया पर मेरा मन तो अरोड़ा अंकल के मकान के अंदर जाने को मचल रहा था. आज अपनी पसंद का खाना भी अच्छा नहीं लगा मु झे. रातभर सामने पार्टी चलती रही. मम्मी, पापा और मैं सो गए. सुबह मैं तैयार हो कर स्कूल चली गई. वापस आ कर खिड़की से मकान देखने लगी. मकान बाहर से सुंदर था पर घर में कोई दिखाई नहीं देता था. बस, गाडि़यां आतीजाती दिखती थीं कभीकभी. ज्यादातर बड़ा सा गेट बंद ही रहता था. इस मकान को देखतेदेखते अब मेरा मन भी उकता गया था. मैं अब अपना समय अपनी पढ़ाई में देने लगी.

इस मकान में अरोड़ा अंकल को आए पांचछह साल हो गए थे. मैं आज जब कालेज से वापस आ रही थी तो अरोड़ा अंकलजी के घर पर लाइटें लगी देखीं. रात को पापा ने बताया कि अगले महीने अरोड़ा अंकल के बेटे की शादी है. सुना है, बड़े ही अमीर घर से बहू आ रही है. ‘‘तो अभी से इतनी लाइटें क्यों लगा दीं?’’ मैं ने पूछा. ‘‘पूरे महीने फंक्शंस होंगे इन के यहां,’’ मम्मी बोलीं. ‘‘पर हमें क्या? हमें कौन सा बुलाएंगे?’’ मैं ने चिढ़ते हुए कहा. एक महीना यों ही निकल गया. बैंड बजने लगे. शहर के सभी अमीर लोग घर के बाहर इकट्ठे थे. घुड़चढ़ी हो रही थी. घर की सजावट से ले कर मेहमानों और अरोड़ा अंकलआंटीजी के कपड़े सब देखने लायक थे. बरात चली गई और चमकते हुए घर में शांति पसर गई. सुबह 4 बजे बैंडबाजा सुनाई दिया. मम्मी और मैं आंखें मलते हुए खिड़की पर पहुंचे. डोली आ गई थी. लंबी सी चमकती हुई गाड़ी रुकी और परी जैसी बहू उतरी. अरोड़ा आंटी अपने सभी रिश्तेदारों और मेहमानों के साथ अपने बहूबेटे को बड़े से गेट के अंदर ले गईं और गेट बंद हो गया. चारों ओर चुप्पी फैल गई और मम्मी वापस जा कर सो गईं. मैं अपने बैड पर लेटे हुए सोचने लगी कि अंदर कैसे सब बहू पर वारिवारि जा रहे होंगे. ढेरों गिफ्ट मिले होंगे बहू को. महल की रानी बन कर रहेगी यह तो. क्या समय है इस लड़की का.

नौकरचाकर आगेपीछे घूमेंगे इस के. गाड़ीबंगला, पैसा, शानोशौकत और क्या चाहिए एक लड़की को. इतना सुंदर और बड़ा घर यानी जो भी फिल्मों में देखा था उसी की कल्पना करते और ये सब सोचतेसोचते मैं सो गई. कई दिनों तक सामने गाडि़यां आतीजाती रहीं. कई दिनों बाद बाजार में अचानक से हमें सामने वाली गुप्ता आंटी मिलीं. हालचाल पूछने के बाद बोलीं, ‘‘हमारे जाने के बाद अब तो अरोड़ाजी बन गए हैं आप के पड़ोसी? पिछले साल शादी थी उन के बेटे की, आप लोग भी गए होंगे?’’ ‘‘नहींनहीं, आंटी. हम कहां गए थे. हमें थोड़ी बुलाया था और हम से तो वे लोग आज तक बोले भी नहीं. बस, गाड़ी आतीजाती दिखती हैं, फिर गेट बंद,’’ मैं ने तपाक से जवाब दिया. ‘‘ओह, वैसे मैं भी शादी में तो जा नहीं पाई थी, बस, थोड़ी देर के लिए ही इन के घर गई थी बहू की मुंहदिखाई के लिए. बड़े ही अमीर घर से बहू लाए हैं अरोड़ा साहब और ऊपर से इतनी सुंदर, सुशील और खूब पढ़ीलिखी. इन के पूरे परिवार में कोई भी इतना पढ़ालिखा नहीं है. बस, क्या ही बताऊं, समय ही बलवान है इन लोगों का तो. वैसे,

हम ने भी अपनी बेटी शिखा का रिश्ता तय कर दिया है. अगले महीने ही शादी है. आप सब को भी आना है. शादी का कार्ड देने आऊंगी मैं,’’ गुप्ता आंटी खुश होती हुई बोलीं. ‘‘हांहां जरूर आइएगा. यह तो बड़ी खुशी की बात है. अब चलते हैं, काफी देर हो गई है. आप भाईसाहब के साथ आइएगा हमारे घर. उन से मिले भी काफी समय हो गया है,’’ मम्मी ने गुप्ता आंटी से कह कर विदा ली और हम बाजार में आगे निकल गए. थोड़े दिनों बाद ही गुप्ता आंटी हमारे घर अपनी बेटी शिखा की शादी का कार्ड देने आईं. मम्मी को मु झे और पापा को साथ लाने का कह जल्दी ही चली गईं. मैं पापामम्मी के साथ शिखा की शादी में पहुंची. दूर से ही हौल में गुप्ता आंटी ने स्टेज से हमें देखा और अपनी ओर आने का इशारा किया. हम तीनों गुप्ता आंटी के पास पहुंचे. तभी आंटी ने कीमती से लहंगे में पास ही खड़ी खूबसूरत सी लड़की को नजदीक बुलाया और मेरी तरफ देखते हुए बोलीं, ‘‘निया बेटे, इस से मिलो यह शीनू है. तुम्हें एक बार देखना चाहती थी और तुम्हारे घर के सामने वाले घर में ही रहती है और शीनू, यह निया है, अरोड़ा अंकल की बहू.’’ ‘‘अच्छा, सच में,’’ निया ने कहा. मेरे कुछ कहने से पहले ही निया ने मु झे गले लगा लिया. ‘‘आप तो बहुत ही प्यारी हो, शीनू. आओ न कभी हमारे घर. खूब बातें करेंगे,’’ निया ने कहा. ‘‘हांहां, भाभी. जरूर. जल्दी ही आती हूं आप के यहां. आप अपना मोबाइल नंबर दे दें,’’ मैं ने कहा. घर वापस आ कर मैं तो उछल रही थी. मेरी तो खुशी का कोई ठिकाना न था.

मेरा तो मानो कोई सपना सच हो गया. अब तो मैं बड़े आराम से उस मकान में अंदर जा सकती हूं और अगर निया भाभी मेरी दोस्त बन गईं तो फिर तो मजा ही आ जाएगा. मैं रोज इस बड़े से मकान में जा पाऊंगी. ‘‘अरे, शादी से आ कर बड़ी ही खुश नजर आ रही हो तुम. क्या बात है? कपड़े बदल लो और सो जाओ. सुबह कालेज भी जाना है. एग्जाम्स भी हैं तुम्हारे,’’ मां ने कमरे में मु झे कौफी पकड़ाते हुए कहा. झटपट दिन बीत गए और एग्जाम्स भी नजदीक आ गए. मेरा सारा टाइम कालेज और पढ़ाई में ही बीतने लगा. खिड़की से अरोड़ा अंकल का मकान देखे तो बहुत समय हो गया था. आज मेरा आखिरी पेपर था. कालेज से वापस आते समय मैं सोच रही थी कि कल फ्री हो कर कुछ अच्छा सा गिफ्ट ले कर निया भाभी से मिलने जाऊंगी. आते ही मैं ने मम्मी से पूछा, ‘‘मम्मा, कल मैं निया भाभी से मिलने सामने चली जाऊं?’’ ‘‘चली जाना. एक बार पापा से भी फोन कर के पूछ लो. सुबह ही भोपाल के लिए निकल गए हैं और अब एक हफ्ते बाद आएंगे. तुम्हारे पेपर का भी पूछ रहे थे. वैसे, पेपर कैसा हुआ तुम्हारा? जाने से पहले एक बार फोन भी कर लेना निया को. अच्छी लड़की है निया. कोई एटीट्यूड नहीं था लड़की में,’’ मम्मा ने कहा. ‘‘पेपर तो बहुत अच्छा हुआ है, मम्मा. फिकर नौट. अभी पापा को बताती हूं और हां, फोन कर के ही जाऊंगी निया भाभी के घर,’’ मैं ने हंसते हुए कहा.

कल मैं इस बड़े से मकान को अंदर से देख पाऊंगी. यह सोचसोच कर मैं बहुत ही खुश थी. सुबहसवेरे गाड़ी के हौर्न से मेरी नींद खुली. मम्मी घर में दिखाई नहीं दीं. मैं भाग कर अंदर खिड़की पर गई. देखा तो अरोड़ा अंकलजी के मकान के बाहर चारपांच पुलिस की गाडि़यां खड़ी थीं. भीड़ ही भीड़ थी सामने. मीडिया की गाडि़यां और शोर ही शोर था. तभी मम्मी ने मु झे आवाज लगाई. ‘‘आप कहां थीं, मम्मा? क्या हुआ है नीचे? यह पुलिस क्यों आई है? क्या हुआ है अरोड़ा अंकलजी के घर में?’’ मैं ने पूछा. ‘‘बेटे, निया भाभी नहीं रहीं. पता नहीं कैसेकैसे लोग हैं दुनिया में? नीचे सब बता रहे हैं कि बहुत तंग करते थे ससुराल वाले उस लड़की को. इतना दहेज लाई थी, पढ़ीलिखी थी, सुंदर थी. फिर भी उसे दहेज के लिए मारतेपीटते थे. अरोड़ा अंकल के बेटे को निया पसंद नहीं थी और पता चला है कि वह पहले से ही शादीशुदा था.

संतान न होने का ताना देते थे. मतलब हर तरह से परेशान थी वह और आज उस ने अपनी जान ही ले ली,’’ मम्मी ने सुबकते हुए बताया. मेरी आंखों से आंसू बह रहे थे. मु झे निया भाभी याद आ रही थीं. मैं ने अपने मोबाइल पर उन की डीपी देखी. विश्वास ही नहीं हो रहा था कि प्यारी सी, खूबसूरत सी लड़की अब दुनिया में नहीं थी. बड़े से मकान को अंदर से देखने का मेरा चाव एक झटके में ही खत्म हो गया. मकान बड़ा नहीं, हमारी सोच बड़ी होनी चाहिए. हमारा दिल बड़ा होना चाहिए. इतनी चमकदमक के पीछे कितना अंधकार है. निया भाभी के लिए लाए गिफ्ट को टेबल पर रख मैं ने खिड़की को बंद कर दिया.

जिंदा मुर्दों संग चैटिंग कथा

जम्बूद्वीपे उत्तराखंडे आनंदनगर नामक एक सुंदर शहर हुआ करता. उस शहर में रोज 3 बढ़िया मर्डर, 4 सुंदर रेप, 5 प्रभावी भ्रष्टाचार व 6 चैन स्नैचिंग जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ करते. सभी में सोशल मीडिया की भूमिका पाई जाती. वहां सभी लोग सोशल मीडिया का पूजापाठ किया करते थे.

उसी शहर में एक अनिद्य सुंदरी निवास करती थी. की-पैड फोन के उपयोग के कारण उस में ईमानदारी, नैतिकता और सत्यवादिता के दुर्गुण पैदा हो गए. स्मार्टफोन नहीं होने के कारण घर में हमेशा तनाव रहता. उस का बीपी व शुगर बढ़ गया. आयरन की भारी कमी हो गई. वह एक सूखी लकड़ी की भांति लाश में तबदील हो गई. उस की ऐसी हालत देख कर उस की पड़ोसिन ने उसे एक स्मार्टफोन थमा दिया. उसे बताया कि सोशल मीडिया के त्रिदेव व्हाट्सऐप, फेसबुक और इंस्टाग्राम की साधना करने से संसार के सारे दुखों का नाश होता है.

उस ने शीघ्र ही व्हाट्सऐप पर अपने दोस्तों के साथ मैसेजों की बरसात कर दी. फेसबुक पर दूरदराज के देशों के दोस्त बनाने शुरू कर दिए. इंस्टाग्राम पर वीडियो कौलिंग कर के मौज करने लगी. वह रातदिन इसी तरह के धार्मिक कार्यों में अपना समय बिताने लगी. कुछ ही समय में उस की बीपी नौर्मल हो गया. उस की शुगर सामान्य हो गई. देखते ही देखते वह और ज्यादा खूबसूरत हो गई.

वह घर में पति और बच्चों पर ज्यादा ध्यान नहीं देती थी और फेसबुक, व्हाट्सऐप के समुंदर में ही गोते लगाया करती. उस के जीवन में आनंद आने लग गया. उस की एक सहेली ने उस की सुंदरता एवं खुशमिजाजी का राज पूछा. तब उस ने सोशल मीडिया के त्रिदेव की सारी उत्तम कहानियां सभी सहेलियों को सुना दीं.

सहेली ने प्रश्न किया- ‘मुझे बताओ, यह उत्तम उद्यापन कैसे किया जाता है? इस के करने से क्या फल मिलता है? मैं भी सोशल मीडिया वाला ये उद्यापन मन लगा कर संपन्न करूंगी.’

तब उस सुंदरी ने कहा- ‘सुबह उठते ही सोशल मीडिया के दर्शन करना चाहिए. कई तरह के पास और दूर के दोस्त बनाने चाहिए. उन सब को गुडमौर्निंग कहना चाहिए. गुलाब का फूल, उगता हुआ सूरज, प्रेम के प्रति आकर्षण का कोई चित्र आदि नियमित रूप से भेजने पर सात जन्मों का पुण्य मिलता है. शाम को गुड इवनिंग व निशा काले गुड नाइट कह कर सब को स्वीट ड्रीम करने पर उत्तम फल मिलता है. इस मंत्र का रातदिन जाप करना चाहिए. दूसरों द्वारा भेजे गए मैसेजों को पूरी भक्तिभावना के साथ पढ़ना चाहिए. उन की प्रशंसा करनी चाहिए. उन को बातबात पर बधाई देनी चाहिए. सभी मैसेजों को ढोलबाजे बजाते हुए दूसरे ग्रुप में भेजना चाहिए.’

इमोजी बना कर प्रेमभरे संदेश भेजना निश्चित रूप से उत्तम फलदाई सिद्ध हुआ है. तब बेताल ने विक्रम से कहा- बता विक्रम, यह कहां की कथा है और यह किस तरह का नया रोग लगा है? तब विक्रमादित्य ने बेताल के हाथों से नया स्मार्टफोन छीन लिया. राजा विक्रमादित्य ने बेताल को उछाल कर श्मशान घाट के पेड़ पर टांग दिया. खुद विक्रम श्मशान के मुर्दों के बीच स्मार्टफोन ले कर सोशल मीडिया के जिंदा मुर्दों से चैटिंग करने लग गया.

Supreme Court की फटकार योगी का बुलडोजर अब नहीं

उतर प्रदेश की योगी सरकार के बुलडोजर एक्शन पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी सख्ती दिखाई है कि पूरे भाजपा खेमे में हलचल मची हुई है. सुप्रीम कोर्ट ने बुलडोजर एक्शन पर रोक लगाने की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा है कि कार्यपालिका न्यायाधीश नहीं बन सकती है. बिना प्रक्रिया आरोपी का घर तोड़ना असंवैधानिक है. यहां तक कि किसी व्यक्ति के दोषी पाए जाने पर भी सजा के तौर पर उनकी संपत्ति नष्ट नहीं की जा सकती है.

 

बुलडोजर एक्शन के खिलाफ दायर की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने जो फैसला सुनाया है और बुलडोजर एक्शन के लिए जो नियम तय किये हैं, उससे ना सिर्फ भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के पैरों तले जमीन काँप रही है बल्कि अधिकारी वर्ग में खलबली मची हुई है जो सत्ता के इशारे पर तबाही का नंगा नाच नाचते रहे सिर्फ इसलिए कि मुख्यमंत्री के चहेते अफसर की लिस्ट में शामिल हो जाएँ या मनचाहा प्रमोशन पा लें.

सुप्रीम कोर्ट के आर्डर के बाद 2017 में शुरू हुई बुलडोजर-नीति जिसके सूत्रधार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं, अब अपने आखिरी पड़ाव में जाती दिख रही है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि अब निजी संपत्तियों पर बुलडोजर नहीं चलाया जा सकता है. यदि बुलडोजर ही आखिरी विकल्प हो तो उसके लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किये गए नियमों का पालन आवश्यक होगा. अन्यथा ध्वस्त संपत्ति का मुआवजा अधिकारी अपनी जेब से भरेगा.

गौरतलब है कि भाजपा की दूसरी पीढ़ी के नेताओं में योगी आदित्यनाथ का नाम तेजी से उभर रहा था. कहा जा रहा था कि मोदी के बाद वे ही प्रधानमंत्री की कुर्सी पर विराजेंगे. फिर क्या था बुलडोजर से ब्रांड योगी की छवि गाढ़ी जाने लगी. 2017 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपनी सख्त प्रशासक की छवि गढ़ने और विपक्षियों को नेस्तनाबूत करने के लिए खुद को ही अदालत-जज-संविधान समझते हुए प्रदेश भर में लोगों की सम्पत्तियों पर बुलडोजर चलवाने शुरू कर दिए थे. बुलडोजर के फौलादी पहियों ने सपा नेताओं-समर्थकों और मुसलमानों के घरों, दुकानों को सबसे ज्यादा रौंदा. मोहल्ले के मोहल्ले जमीदोज कर दिए गए. बड़ी बड़ी इमारतें ढहा दी गयीं.

योगी ने अपने बुलडोजर एक्शन के जरिए खुद की ऐसी सख्त इमेज दिखाने की कोशिश की जो अपराध और अपराधियों को उत्तर प्रदेश की जमीन पर टिकने नहीं देगा. हालाँकि अपराध का आंकड़ा लगातार बढ़ता रहा और कोई दिन ऐसा नहीं गया जब महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों से अखबार रंगे ना हों.

बुलडोजर एक्शन की वजह से योगी को यूपी में उनके समर्थक बुलडोजर बाबा कहने लगे. योगी ने भी इसे अपना ट्रेड मार्क बनाया. छाती चौड़ी करके मंचों से दहाड़े -बुलडोजर चलवाने के लिए दिल और जिगरा की जरूरत होती है. इस पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने चुटकी भी ली. कहा – बुलडोजर चलाने के लिए स्टेयरिंग और ड्राइवर की जरूरत होती है और ड्राइवर दिल्ली में बैठा है, कब स्टेयरिंग घुमा दे पता भी नहीं चलेगा.

खैर, योगी अपनी हर रैली में बुलडोजर एक्शन का बढ़चढ़ कर बखान करते रहे. उनके बखान पर दर्शक भी खूब तालियां पीटते रहे, लेकिन अब जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने इस पर फटकार लगाते हुए रोक लगाई है, उससे योगी को आगे अपने ब्रांड को मजबूत करने के लिए कोई दूसरा रास्ता तलाशना पड़ेगा. मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है, याचिका पर याचिका दाखिल हो रही हैं. ऐसे में कोर्ट के सामने जांच में यह बात सामने आने पर कि ध्वस्तीकरण की कार्रवाई मानक के अनुरूप नहीं हुई है, जब एक एक व्यक्ति को मुआवजा देने के आर्डर होंगे तो योगी के सख्त प्रशासक वाली छवि ऐसे दरकेगी कि संभालना मुश्किल होगा. इस आशंका से भाजपा भयभीत है. उल्लेखनीय है कि अभी कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने बुलडोजर ध्वस्तीकरण के एक अन्य मामले में पीड़ित व्यक्ति को 25 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश सुनाया है. यह फैसला उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले में 2019 के एक घर ध्वस्तीकरण मामले से संबंधित है।है. राज्य सरकार की कार्रवाई को “अत्याचारी” पाते हुए, पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार को याचिकाकर्ता को 25 लाख रुपये का अंतरिम मुआवजा देने का आदेश दिया है, जिसका घर सड़क निर्माण के लिए ध्वस्त कर दिया गया था.

बताते चलें कि उत्तर प्रदेश में लॉ एंड आर्डर की विफलता को ढंकने के लिए, राजनीतिक विरोध को रोकने के लिए, समाज का ध्रुवीकरण करने और विरोधियों को डराने के लिए यूपी के बुलडोजर बाबा का यह एक्शन प्लान कुछ अन्य राज्यों जैसे मध्य प्रदेश, उत्तराँचल, गुजरात, असम के भाजपा मुख्यमंत्रियों को भी खूब भाया था और उन्होंने भी विरोधियों की कमर तोड़ने के लिए बहाने ढूंढ ढूंढ कर उनकी सम्पतियों पर बुलडोजर चलवाया था. यानी भाजपा शासित राज्यों में बुलडोजर के जरिए सियासी नफा-नुकसान तय किया जा रहा था.

असम हो या उत्तर प्रदेश, राजस्थान हो या मध्य प्रदेश…बुलडोजर का सबसे ज्यादा उपयोग मुसलमान आरोपियों के घर, दुकान या मकान गिराने के लिए ही किया गया. फ्रंटलाइन की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक पूरे देश में पिछले 2 साल में करीब 1.5 लाख घर बुलडोजर से गिराए गए. इनमें से अधिकांश घर मुस्लिम और हाशिए पर पड़े लोगों के थे. इससे भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति खूब चमकी.

फरवरी 2024 में बुलडोजर एक्शन के खिलाफ मानवाधिकार समूह एमनेस्टी इंटरनेशनल ने एक बयान जारी कर कहा था कि भारत में जानबूझकर मुसलमानों के घर बुलडोजर से गिराए जा रहे हैं. संस्था के मुताबिक पिछले वर्षों में जिन घरों को सरकार ने बुलडोजर से गिराया, उन्हें गिराने में किसी कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया. एमनेस्टी के मुताबिक उन राज्यों में बुलडोजर की कार्रवाई जोर-शोर से हुई, जहां पर मुस्लिम एक्स फैक्टर है.

ध्रुवीकरण के लिए तो बुलडोजर का इस्तेमाल हुआ ही, लॉ एंड आर्डर को ठीक तरीके से लागू ना कर पाने के कारण जब जब सरकार की आलोचना हुई, सरकार ने बुलडोजर का सहारा लिया. जुलाई 2023 में मध्य प्रदेश के रीवा में एक व्यक्ति द्वारा एक आदिवासी के ऊपर पेशाब करने की घटना सामने आई थी. इसका वीडियो वायरल होते ही वहां की भाजपा सरकार बैकफुट पर आ गई. विपक्षी कांग्रेस समेत कई आदिवासी संगठनों ने इसे मुद्दा बनाना शुरू कर दिया. लोगों के गुस्से को देखते हुए भाजपा सरकार ने तुरंत आरोपियों के घर बुलडोजर चलवा दिए. इसी तरह के कई मामले यूपी, उत्तराखंड, राजस्थान और असम में देखे गए. दिल्ली के जहांगीरपुरी में भी दंगे न रोक पाने से झल्लाई पुलिस इलाके में अवैध अतिक्रमण को आधार बनाकर बुलडोजर चलाने जा रही थी, लेकिन उस वक्त सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्टे लगा दिया था. यानी कुल मिलाकर भाजपा शासित राज्य की सरकारें लॉ एंड ऑर्डर से उपजे गुस्से को शांत करने के लिए भी बुलडोजर का उपयोग करती रहीं.

24 अगस्त को मध्यप्रदेश के छतरपुर में पुलिस पर पथराव मामले में आरोपी हाजी शहजाद अली के बंगले को बुलडोजर से तोड़ दिया गया. पथराव के 24 घंटे के भीतर सरकार ने 20 हजार स्क्वायर फीट में बनी 20 करोड़ रुपए की तीन मंजिला हवेली को जमींदोज कर दिया.

अगस्त माह में राजस्थान के उदयपुर के एक सरकारी स्कूल में 10वीं में पढ़ने वाले एक बच्चे ने दूसरे बच्चे को चाकू मारकर घायल कर दिया. जवान होती इस उम्र में बच्चों के बीच ऐसी घटनाएं कई बार होती हैं. पर चूंकि हमला करने वाला बच्चा मुस्लिम समुदाय से था लिहाजा पूरे शहर में आगजनी और हिंसक प्रदर्शन हुए. 17 अगस्त को आरोपी छात्र के घर पर सरकार का बुलडोजर एक्शन हुआ. हाँ, इससे पहले सरकार के निर्देश पर वन विभाग ने आरोपी के पिता सलीम शेख को अवैध बस्ती में बने मकान को खाली करने का नोटिस दिया मगर उन्हें दूसरी जगह स्थापित होने का मौक़ा दिए बगैर पूरे परिवार को बेघर कर दिया गया.

इसी तरह उत्तर प्रदेश में तो अनेकों मकान बुलडोजर से ढहा दिए गए और अनेकों परिवार अपनी औरतों और बच्चों को लेकर खुले आसमान के नीचे कई कई दिन पड़े रहे. अंततः इस तानाशाही की शिकायत अदालत के कानों तक पहुंचीं और सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई शुरू हुई. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में लगातार बुलडोजर एक्शन के बाद जमीयत-उलेमा-ए-हिंद ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई और आरोप लगाया कि भाजपा शासित राज्यों में मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है और असंवैधानिक रूप से बुलडोजर एक्शन लिया जा रहा है.

सुप्रीम कोर्ट ने बुलडोजर संस्कृति की जड़ें खोदते हुए अपने 12 सितम्बर के आदेश में जो कहा वह उद्धृत करने लायक है. मामला जस्टिस ऋषिकेश रॉय, जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस एसवीएन भट्टी की बेंच में था. गुजरात में नगरपालिका की तरफ से एक परिवार को बुलडोजर एक्शन की धमकी दी गई थी. याचिका लगाने वाला खेड़ा जिले के कठलाल में एक जमीन का सह-मालिक था. कोर्ट ने इस कार्रवाई को रोकने का आदेश देते हुए कहा – बुलडोजर एक्शन देश के कानूनों पर बुलडोजर चलाने जैसा है. सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा कि इस मामले में मनमाना रवैया बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. अधिकारी मनमाने तरीके से काम नहीं कर सकते.

अब एक बार फिर 13 नवंबर 2024 को बुलडोजर मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और पूरे प्रशासन को लताड़ लगाईं है. सुप्रीम कोर्ट के चार फाइनल कमेंट्स ऐसे हैं जो अधिकारियों को अब अपने आका के गलत इशारे पर नाचने से रोकेंगे. कोर्ट ने कहा है –

1. एक आदमी हमेशा सपना देखता है कि उसका आशियाना कभी ना छीना जाए. हर एक का सपना होता है कि उसके सिर पर छत हो. क्या अधिकारी ऐसे आदमी की छत ले सकते हैं, जो किसी अपराध में आरोपी हो? आरोपी हो या फिर दोषी हो, क्या उसका घर बिना तय प्रक्रिया का पालन किए गिराया जा सकता है?

2. अगर कोई व्यक्ति सिर्फ आरोपी है, तो उसकी प्रॉपर्टी को गिरा देना पूरी तरह असंवैधानिक है. अधिकारी यह तय नहीं कर सकते हैं कि कौन दोषी है, वे खुद जज नहीं बन सकते हैं कि कोई दोषी है या नहीं. यह सीमाओं को पार करना हुआ.

3. अगर कोई अधिकारी किसी व्यक्ति का घर गलत तरीके से इसलिए गिराता है कि वो आरोपी है, यह गलत है. अधिकारी कानून अपने हाथ में लेता है तो एक्शन लिया जाएगा. आप मनमाना और एकतरफा एक्शन नहीं ले सकते. कोई अफसर ऐसा करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई के लिए एक सिस्टम हो. ऐसे अधिकारी को बख्शा नहीं जा सकता है.

4. एक घर समाजिक-आर्थिक तानेबाने का मसला है. ये सिर्फ एक घर नहीं होता है, यह बरसों का संघर्ष है, यह सम्माना की भावना देता है. अगर घर गिराया जाता है तो अधिकारी को साबित करना होगा कि यही आखिरी रास्ता था. जब तक कोई दोषी करार नहीं दिया जाता है, तब तक वो निर्दोष है. ऐसे में उसका घर गिराना उसके पूरे परिवार को दंडित करना हुआ. इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कोई 28 बिंदुओं में पूरी रूलिंग दी है कि क्या ठीक है और क्या नहीं. कोर्ट ने अपने निर्देशों में कहा है –

– सिर्फ इसलिए किसी का घर नहीं गिराया जा सकता क्योंकि वह किसी मामले में व्यक्ति आरोपी है. राज्य आरोपी या दोषी के खिलाफ मनमानी कार्रवाई नहीं कर सकता.

– बुलडोजर एक्शन सामूहिक दंड देने के जैसा है, जिसकी संविधान में अनुमति नहीं है.

– निष्पक्ष सुनवाई के बिना किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

– सरकार को कानून के शासन, कानूनी व्यवस्था में निष्पक्षता पर विचार करना होगा.

– कानून का शासन मनमाने विवेक की अनुमति नहीं देता है. चुनिंदा डिमोलेशन से सत्ता के दुरुपयोग का सवाल उठता है.

– आरोपी और यहां तक कि दोषियों को भी आपराधिक कानून में सुरक्षा दी गई है. कानून के शासन को खत्म नहीं होने दिया जा सकता है.

– संवैधानिक लोकतंत्र में नागरिक अधिकारों और आजादी की सुरक्षा जरूरी है.

– अगर कार्यपालिका मनमाने तरीके से किसी नागरिक के घर को इस आधार पर ध्वस्त करती है कि उस पर किसी अपराध का आरोप है तो यह संविधान और कानून का उल्लंघन है. अधिकारियों को इस तरह के मनमाने तरीके से काम करने के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए.

– अधिकारियों को सत्ता का दुरुपयोग करने पर बख्शा नहीं जा सकता.

– स्थानीय कानूनों का उल्लंघन करने वाले के घर को गिराने पर विचार करते वक्त यह देखना चाहिए कि नगरपालिका कानून में क्या अनुमति है. अनधिकृत निर्माण समझौता योग्य हो सकता है या घर का केवल कुछ हिस्सा ही गिराया जा सकता है.

– अधिकारियों को यह दिखाना होगा कि संरचना अवैध है और अपराध को कम करने या केवल एक हिस्से को ध्वस्त करने की कोई संभावना नहीं है

– अगर घर गिराने का फैसला ले लिया गया है तो 15 दिन का समय दिया जाए. नोटिस जारी की जाए और उक्त संपत्ति पर वह नोटिस चस्पा की जाए. घर के मालिक को रजिस्टर्ड डाक द्वारा नोटिस भेजा जाएगा. नोटिस में बुलडोजर चलाने का कारण, सुनवाई की तारीख बताना जरूरी होगी. नोटिस से 15 दिनों का वक्त नोटिस तामील होने के बाद है.

– नोटिस तामील होने के बाद कलेक्टर और जिला मजिस्ट्रेट द्वारा सूचना भेजी जाएगी.

– कलेक्टर और डीएम नगरपालिका भवनों के ध्वस्तीकरण आदि के प्रभारी नोडल अधिकारी नियुक्त करेंगे.

– प्राधिकरण व्यक्तिगत सुनवाई सुनेगा, रिकॉर्ड किया जाएगा और उसके बाद अंतिम आदेश पारित किया जाएगा.

– आदेश के 15 दिनों के अंदर मालिक को अनधिकृत संरचना को ध्वस्त करने या हटाने का मौका दिया जाएगा.

– व्यक्तिगत सुनवाई की तारीख जरूर दी जानी चाहिए.

– सरकार एक डिजिटल पोर्टल 3 महीने में बनाये, जिसमें नोटिस की जानकारी और संरचना के पास सार्वजनिक स्थान पर नोटिस प्रदर्शित करने की तारीख दिखाई जाए.

– आदेश में यह जरूर नोट किया जाना चाहिए कि बुलडोजर एक्शन की जरूरत क्यों है.

– केवल तभी इमारत गिराई जा सकती है, जब अनधिकृत संरचना सार्वजनिक सड़क/रेलवे ट्रैक/जल निकाय पर हो. इसके साथ ही प्रक्रिया का पालन करने के बाद ही इमारत गिराई जा सकती है

– केवल वे संरचनाएं ध्वस्त की जाएंगी, जो अनाधिकृत पाई जाएंगी और जिनका निपटान नहीं किया जा सकता.

– अगर अवैध तरीके से इमारत गिराई गई है, तो अधिकारियों पर अवमानना की कार्रवाई की जाएगी और उन्हें संपत्ति का हर्जाना भरना होगा.

– अनाधिकृत संरचनाओं को गिराते वक्त विस्तृत स्पॉट रिपोर्ट तैयार की जाएगी. पुलिस और अधिकारियों की मौजूदगी में तोड़फोड़ की वीडियो रिकॉर्डिंग की जाएगी. यह रिपोर्ट पोर्टल पर पब्लिश की जाएगी.

– अगर घर गिराने का आदेश पारित किया जाता है, तो इस आदेश के खिलाफ अपील करने के लिए वक्त दिया जाना चाहिए. बिना अपील के रात भर ध्वस्तीकरण के बाद महिलाओं और बच्चों को सड़कों पर देखना सुखद दृश्य नहीं है

– सभी निर्देशों का पालन किया जाना चाहिए और इन निर्देशों का पालन न करने पर अवमानना और अभियोजन की कार्रवाई की जाएगी और अधिकारियों को मुआवजे के साथ ध्वस्त संपत्ति को अपनी लागत पर वापस करने के लिए उत्तरदायी ठहराया जाएगा.

– इस सम्बन्ध में मुख्य सचिवों को भी निर्देश दिए जाने चाहिए.

Story अनमोल उपहार : जिंदगी का सहारा

शादी के एक साल बाद पति की मौत से सरस्वती समाज की नजरों में मनहूस बन गई. बेटे को भी मां का प्यार न दे सकी. पुत्रवधू को भी तो असामयिक मौत ही मिली पर उस ने ऐसा क्या किया जो सरस्वती को लोग सम्मानित नजरों से देखने लगे.

 

दीवार का सहारा ले कर खड़ी दादीमां थरथर कांप रही थीं. उन का चेहरा आंसुओं से भीगता जा रहा था. तभी वह बिलखबिलख कर रोने लगीं, ‘‘बस, यही दिन देखना बाकी रह गया था उफ, अब मैं क्या करूं? कैसे विश्वनाथ की नजरों का सामना करूं?’’

 

सहसा नेहा उठ कर उन के पास चली आई और बोली, ‘‘दादीमां, जो होना था हो गया. आप हिम्मत हार दोगी तो मेरा और विपुल का क्या होगा?’’

 

दादीमां ने अपने बेटे विश्वनाथ की ओर देखा. वह कुरसी पर चुपचाप बैठा एकटक सामने जमीन पर पड़ी अपनी पत्नी गायत्री के मृत शरीर को देख रहा था.

 

आज सुबह ही तो इस घर में जैसे भूचाल आ गया था. रात को अच्छीभली सोई गायत्री सुबह बिस्तर पर मृत पाई गई थी. डाक्टर ने बताया कि दिल का दौरा पड़ा था जिस में उस की मौत हो गई. यह सुनने के बाद तो पूरे परिवार पर जैसे बिजली सी गिर पड़ी.

 

दादीमां तो जैसे संज्ञाशून्य सी हो गईं. इस उम्र में भी वह स्वस्थ हैं और उन की बहू महज 40 साल की उम्र में इस दुनिया से नाता तोड़ गई? पीड़ा से उन का दिल टुकड़ेटुकड़े हो रहा था.

 

 

नेहा और विपुल को सीने से सटाए दादीमां सोच रही थीं कि काश, विश्वनाथ भी उन की गोद में सिर रख कर अपनी पीड़ा का भार कुछ कम कर लेता. आखिर, वह उस की मां हैं.

 

सुबह के 11 बज रहे थे. पूरा घर लोगों से खचाखच भरा था. वह साफ देख रही थीं कि गायत्री को देख कर हर आने वाले की नजर उन्हीं के चेहरे पर अटक कर रह जाती है. और उन्हें लगता है जैसे सैकड़ों तीर एकसाथ उन की छाती में उतर गए हों.

 

‘‘बेचारी अम्मां, जीवन भर तो दुख ही भोगती आई हैं. अब बेटी जैसी बहू भी सामने से उठ गई,’’ पड़ोस की विमला चाची ने कहा.

 

विपुल की मामी दबे स्वर में बोलीं, ‘‘न जाने अम्मां कितनी उम्र ले कर आई हैं? इस उम्र में ऐसा स्वास्थ्य? एक हमारी दीदी थीं, ऐसे अचानक चली जाएंगी कभी सपने में भी हम ने नहीं सोचा था.’’

 

‘‘इतने दुख झेल कर भी अब तक अम्मां जीवित कैसे हैं, यही आश्चर्य है,’’ नेहा की छोटी मौसी निर्मला ने कहा. वह पास के ही महल्ले में रहती थीं. बहन की मौत की खबर सुन कर भागी चली आई थीं.

 

दादीमां आंखें बंद किए सब खामोशी से सुनती रहीं पर पास बैठी नेहा यह सबकुछ सुन कर खिन्न हो उठी और अपनी मौसी को टोकते हुए बोली, ‘‘आप लोग यह क्या कह रही हैं? क्या हक है आप लोगों को दादीमां को बेचारी और अभागी कहने का? उन्हें इस समय जितनी पीड़ा है, आप में से किसी को नहीं होगी.’’

 

‘‘नेहा, अभी ऐसी बातें करने का समय नहीं है. चुप रहो…’’ तभी विश्वनाथ का भारी स्वर कमरे में गूंज उठा.

 

गायत्री के क्रियाकर्म के बाद रिश्तेदार चले गए तो सारा घर खाली हो गया. गायत्री थी तो पता ही नहीं चलता था कि कैसे घर के सारे काम सही समय पर हो जाते हैं. उस के असमय चले जाने के बाद एक खालीपन का एहसास हर कोई मन में महसूस कर रहा था.

 

एक दिन सुबह नेहा चाय ले कर दादीमां के कमरे में आई तो देखा वे सो रही हैं.

 

‘‘दादीमां, उठिए, आज आप इतनी देर तक सोती रहीं?’’ नेहा ने उन के सिर पर हाथ रखते हुए पूछा.

 

‘‘बस, उठ ही रही थी बिटिया,’’ और वह उठने का उपक्रम करने लगीं.

 

‘‘पर आप को तो तेज बुखार है. आप लेटे रहिए. मैं विपुल से दवा मंगवाती हूं,’’ कहती हुई नेहा कमरे से बाहर चली गई.

 

दादीमां यानी सरस्वती देवी की आंखें रहरह कर भर उठती थीं. बहू की मौत का सदमा उन्हें भीतर तक तोड़ गया था. गायत्री की वजह से ही तो उन्हें अपना बेटा, अपना परिवार वापस मिला था. जीवन भर अपनों से उपेक्षा की पीड़ा झेलने वाली सरस्वती देवी को आदर और प्रेम का स्नेहिल स्पर्श देने वाली उन की बहू गायत्री ही तो थी.

 

बिस्तर पर लेटी दादीमां अतीत की धुंध भरी गलियों में अनायास भागती चली गईं.

 

‘अम्मां, मनहूस किसे कहते हैं?’ 4 साल के विश्वनाथ ने पूछा तो सरस्वती चौंक पड़ी थी.

 

‘बूआ कहती हैं, तुम मनहूस हो, मैं तुम्हारे पास रहूंगा तो मैं भी मर जाऊंगा,’ बेटे के मुंह से यह सब सुन कर सरस्वती जैसे संज्ञाशून्य सी हो गई और बेटे को सीने से लगा कर बोली, ‘बूआ झूठ बोलती हैं, विशू. तुम ही तो मेरा सबकुछ हो.’

 

तभी सरस्वती की ननद कमला तेजी से कमरे में आई और उस की गोद से विश्वनाथ को छीन कर बोली, ‘मैं ने कोई झूठ नहीं बोला. तुम वास्तव में मनहूस हो. शादी के साल भर बाद ही मेरा जवान भाई चल बसा. अब यह इस खानदान का अकेला वारिस है. मैं इस पर तुम्हारी मनहूस छाया नहीं पड़ने दूंगी.’

 

‘पर दीदी, मैं जो नीरस और बेरंग जीवन जी रही हूं, उस की पीड़ा खुद मैं ही समझ सकती हूं,’ सरस्वती फूटफूट कर रो पड़ी थी.

 

‘क्यों उस मनहूस से बहस कर रही है, बेटी?’ आंगन से विशू की दादी बोलीं, ‘विशू को ले कर बाहर आ जा. उस का दूध ठंडा हो रहा है.’

 

बूआ गोद में विशू को उठाए कमरे से बाहर चली गईं.

 

सरस्वती का मन पीड़ा से फटा जा रहा था कि जिस वेदना से मैं दोचार हुई हूं उसे ये लोग क्या समझेंगे? पिता की मौत के 5 महीने बाद विश्वनाथ पैदा हुआ था. बेटे को सीने से लगाते ही वह अपने पिछले सारे दुख क्षण भर के लिए भूल गई थी.

 

सरस्वती की सास उस वक्त भी ताना देने से नहीं चूकी थीं कि चलो अच्छा हुआ, जो बेटा हुआ, मैं तो डर रही थी कि कहीं यह मनहूस बेटी को जन्म दे कर खानदान का नामोनिशान न मिटा डाले.

 

सरस्वती के लिए वह क्षण जानलेवा था जब उस की छाती से दूध नहीं उतरा. बच्चा गाय के दूध पर पलने लगा. उसे यह सोच कर अपना वजूद बेकार लगता कि मैं अपने बच्चे को अपना दूध नहीं पिला सकती.

 

कभीकभी सरस्वती सोच के अथाह सागर में डूब जाती. हां, मैं सच में मनहूस हूं. तभी तो जन्म देते ही मां मर गई. थोड़ी बड़ी हुई तो बड़ा भाई एक दुर्घटना में मारा गया. शादी हुई तो साल भर बाद पति की मृत्यु हो गई. बेटा हुआ तो वह भी अपना नहीं रहा. ऐसे में वह विह्वल हो कर रो पड़ती.

 

समय गुजरता रहा. बूआ और दादी लाड़लड़ाती हुई विश्वनाथ को खिलातीं- पिलातीं, जी भर कर बातें करतीं और वह मां हो कर दरवाजे की ओट से चुपचाप, अपलक बेटे का मुखड़ा निहारती रहती. छोटेछोटे सपनों के टूटने की चुभन मन को पीड़ा से तारतार कर देती. एक विवशता का एहसास सरस्वती के वजूद को हिला कर रख देता.

 

विश्वनाथ की बूआ कमला अपने परिवार के साथ शादी के बाद से ही मायके में रहती थीं. उन के पति ठेकेदारी करते थे. बूआ की 3 बेटियां थीं. इसलिए भी अब विश्वनाथ ही सब की आशाओं का केंद्र था. तेज दिमाग विश्वनाथ ने जिस दिन पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षा पास की सारे घर में जैसे दीवाली का माहौल हो गया.

 

‘मैं जानती थी, मेरा विशू एक दिन सारे गांव का नाम रोशन करेगा. मां, तेरे पोते ने तो खानदान की इज्जत रख ली.’  विश्वनाथ की बूआ खुशी से बावली सी हो गई थीं. प्रसन्नता की उत्ताल तरंगों ने सरस्वती के मन को भी भावविभोर कर दिया था.

 

विश्वनाथ पहली पोस्टिंग पर जाने से पहले मां के पांव छूने आया था.

 

‘सुखी रहो, खुश रहो बेटा,’ सरस्वती ने कांपते स्वर में कहा था. बेटे के सिर पर हाथ फेरने की नाकाम कोशिश करते हुए उस ने मुट्ठी भींच ली थी. तभी बूआ की पुकार ‘जल्दी करो विशू, बस निकल जाएगी,’ सुन कर विश्वनाथ कमरे से बाहर निकल गया था.

 

समय अपनी गति से बीतता रहा. विशू की नौकरी लगे 2 वर्ष बीत चुके थे. उस की दादी का देहांत हो चुका था. अपनी तीनों फुफेरी बहनों की शादी उस ने खूब धूमधाम से अच्छे घरों में करवा दी थी. अब उस के लिए अच्छेअच्छे रिश्ते आ रहे थे.

 

एक शाम सरस्वती की ननद कमला एक लड़की की फोटो लिए उस के पास आई. उस ने हुलस कर बताया कि लड़की बहुत बड़े अफसर की इकलौती बेटी है. सुंदर, सुशील और बी.ए. पास है.

 

‘क्या यह विशू को पसंद है?’ सरस्वती ने पूछा.

 

‘विशू कहता है, बूआ तुम जिस लड़की को पसंद करोगी मैं उसी से शादी करूंगा,’ कमला ने गर्व के साथ सुनाया, तो सरस्वती के भीतर जैसे कुछ दरक सा गया.

 

धूमधाम से शादी की तैयारियां शुरू हो गईं. सरस्वती का भी जी चाहता था कि वह बहू के लिए गहनेकपड़े का चुनाव करने ननद के साथ बाजार जाए. पड़ोस की औरतों के साथ बैठ कर विवाह के मंगल गीत गाए. पर मन की साध अधूरी ही रह गई.

 

धूमधाम से शादी हुई और गायत्री ने दुलहन के रूप में इस घर में प्रवेश किया.

 

गायत्री एक सुलझे विचारों वाली लड़की थी. 2-3 दिन में ही उसे महसूस हो गया कि उस की विधवा सास अपने ही घर में उपेक्षित जीवन जी रही हैं. घर में बूआ का राज चलता है. और उस की सास एक मूकदर्शक की तरह सबकुछ देखती रहती हैं.

 

उसे लगा कि उस का पति भी अपनी मां के साथ सहज व्यवहार नहीं करता. मांबेटे के बीच एक दूरी है, जो नहीं होनी चाहिए. एक शाम वह चाय ले कर सास के कमरे में गई तो देखा, वह बिस्तर पर बैठी न जाने किन खयालों में गुम थीं.

 

‘अम्मांजी, चाय पी लीजिए,’ गायत्री ने कहा तो सरस्वती चौंक पड़ी.

 

‘आओ, बहू, यहां बैठो मेरे पास,’ बहू को स्नेह से अपने पास बिठा कर सरस्वती ने पलंग के नीचे रखा संदूक खोला. लाल मखमल के डब्बे से एक जड़ाऊ हार निकाल कर बहू के हाथ में देते हुए बोली, ‘यह हार मेरे पिता ने मुझे दिया था. मुंह दिखाई के दिन नहीं दे पाई. आज रख लो बेटी.’

 

गायत्री ने सास के हाथ से हार ले कर गले में पहनना चाहा. तभी बूआ कमरे में चली आईं. बहू के हाथ से हार ले कर उसे वापस डब्बे में रखते हुए बोलीं, ‘तुम्हारी मत मारी गई है क्या भाभी? जिस हार को साल भर भी तुम पहन नहीं पाईं, उसे बहू को दे रही हो? इसे क्या गहनों की कमी है?’

 

सरस्वती जड़वत बैठी रह गई, पर गायत्री से रहा नहीं गया. उस ने टोकते हुए कहा, ‘बूआजी, अम्मां ने कितने प्यार से मुझे यह हार दिया है. मैं इसे जरूर पहनूंगी.’

 

सामने रखे डब्बे से हार निकाल कर गायत्री ने पहन लिया और सास के पांव छूते हुए बोली, ‘मैं कैसी लगती हूं, अम्मां?’

 

‘बहुत सुंदर बहू, जुगजुग जीयो, सदा खुश रहो,’ सरस्वती का कंठ भावातिरेक से भर आया था. पहली बार वह ननद के सामने सिर उठा पाई थी.

 

गायत्री ने मन ही मन ठान लिया था कि वह अपनी सास को पूरा आदर और प्रेम देगी. इसीलिए वह साए की तरह उन के साथ लगी रहती थी. धीरेधीरे 1 महीना गुजर गया, विश्वनाथ की छुट्टियां खत्म हो रही थीं. जिस दिन दोनों को रामनगर लौटना था उस सुबह गायत्री ने पति से कहा, ‘अम्मां भी हमारे साथ चलेंगी.’

 

‘क्या तुम ने अम्मां से पूछा है?’ विश्वनाथ ने पूछा तो गायत्री दृढ़ता भरे स्वर में बोली, ‘पूछना क्या है. क्या हमारा फर्ज नहीं कि हम अम्मां की सेवा करें?’

 

‘अभी तुम्हारे खेलनेखाने के दिन हैं, बहू. हमारी चिंता छोड़ो. हम यहीं ठीक हैं. बाद में कभी अम्मां को ले जाना,’ बूआ ने टोका था.

 

‘बूआजी, मैं ने अपनी मां को नहीं देखा है,’ गायत्री बोली, ‘अम्मां की सेवा करूंगी, तो मन को अच्छा लगेगा.’

 

आखिर गायत्री के आगे बूआ की एक न चली और सरस्वती बेटेबहू के साथ रामनगर आ गई थी.

 

कुछ दिन बेहद ऊहापोह में बीते. जिस बेटे को बचपन से अपनी आंखों से दूर पाया था, उसे हर पल नजरों के सामने पा कर सरस्वती की ममता उद्वेलित हो उठती, पर मांबेटे के बीच बात नाममात्र को होती.

 

गायत्री मांबेटे के बीच फैली लंबी दूरी को कम करने का भरपूर प्रयास कर रही थी. एक सुबह नाश्ते की मेज पर अपनी मनपसंद भरवां कचौडि़यां देख कर विश्वनाथ खुश हो गया. एक टुकड़ा खा कर बोला, ‘सच, तुम्हारे हाथों में तो जादू है, गायत्री.’

 

‘यह जादू मां के हाथों का है. उन्होंने बड़े प्यार से आप के लिए बनाई है. जानते हैं, मैं तो मां के गुणों की कायल हो गई हूं. जितना शांत स्वभाव, उतने ही अच्छे विचार. मुझे तो ऐसा लगता है जैसे मेरी सगी मां लौट आई हों.’

 

धीरेधीरे विश्वनाथ का मौन टूटने लगा  अब वह यदाकदा मां और पत्नी के साथ बातचीत में भी शामिल होने लगा था. सरस्वती को लगने लगा कि जैसे उस की दुनिया वापस उस की मुट्ठी में लौटने लगी है.

 

 

समय पंख लगा कर उड़ने लगा. वैसे भी जब खुशियों के मधुर एहसास से मन भरा हुआ होता है तो समय हथेली पर रखी कपूर की टिकिया की तरह तेजी से उड़ जाता है. जिस दिन गायत्री ने लजाते हुए एक नए मेहमान के आने की सूचना दी, उस दिन सरस्वती की खुशी की इंतहा नहीं थी.

 

‘बेटी, तू ने तो मेरे मन की मुराद पूरी कर दी.’

 

‘अभी कहां, अम्मां, जिस दिन आप का बेटा आप को वापस लौटा दूंगी, उस दिन वास्तव में आप की मुराद पूरी होगी.’

 

गायत्री ने स्नेह से सास का हाथ दबाते हुए कहा तो सरस्वती की आंखें छलक आईं.

 

गायत्री ने कहा, ‘मन के बुरे नहीं हैं. न ही आप के प्रति गलत धारणा रखते हैं. पर बचपन से जो बातें कूटकूट कर उन के दिमाग में भर दी गई हैं उन का असर धीरेधीरे ही खत्म होगा न? बूआ का प्रभाव उन के मन पर बचपन से हावी रहा है. आज उन्हें इस बात का एहसास है कि उन्होंने आप का दिल दुखाया है.’

 

गायत्री के मुंह से यह सुन कर सरस्वती का चेहरा एक अनोखी आभा से चमक उठा था.

 

गायत्री की गोदभराई के दिन घर सारे नातेरिश्तेदारों से भरा हुआ था. गहनों और बनारसी साड़ी में सजी गायत्री बहुत सुंदर लग रही थी.

 

‘चलो, बहू, अपना आंचल फैलाओ. मैं तुम्हारी गोद भर दूं,’ बूआ ने मिठाई और फलों से भरा थाल संभालते हुए कहा.

 

‘रुकिए, बूआजी, बुरा मत मानिएगा. पर मेरी गोद सब से पहले अम्मां ही भरेंगी.’

 

‘यह तुम क्या कह रही हो, बहू? ये काम सुहागन औरतों को ही शोभा देता है और तुम्हारी सास तो…’ पड़ोस की विमला चाची ने टोका, तो कमला बूआ जोर से बोलीं, ‘रहने दो बहन, 4 अक्षर पढ़ कर आज की बहुएं ज्यादा बुद्धिमान हो गई हैं. अब शास्त्र व पुराण की बातें कौन मानता है?’

 

‘जो शास्त्र व पुराण यह सिखाते हों कि एक स्त्री की अस्मिता कुछ भी नहीं और एक विधवा स्त्री मिट्टी के ढेले से ज्यादा अहमियत नहीं रखती, मैं ऐसे शास्त्रों और पुराणों को नहीं मानती. आइए, अम्मांजी, मेरी गोद भरिए.’

 

गायत्री का आत्मविश्वास से भरा स्वर कमरे में गूंज उठा. सरस्वती जैसे नींद से जागी. मन में एक अनजाना भय फिर दस्तक देने लगा.

 

‘नहीं बहू, बूआ ठीक कहती हैं,’ उस का कमजोर स्वर उभरा.

 

‘आइए, अम्मां, मेरी गोद पहले आप भरेंगी फिर कोई और.’

 

बहू की गोद भरते हुए सरस्वती की आंखें मानो पहाड़ से फूटते झरने का पर्याय बन गई थीं. रोमरोम से बहू के लिए आसीस का एहसास फूट रहा था.

 

निर्धारित समय पर विपुल का जन्म हुआ तो सरस्वती उसे गोद में समेट अतीत के सारे दुखों को भूल गई. विपुल में नन्हे विश्वनाथ की छवि देख कर वह प्रसन्नता से फूली नहीं समाती थी.

 

अपने बेटे के लिए जोजो अरमान संजोए थे, वह सारे अरमान पोते के लालनपालन में फलनेफूलने लगे. फिर 2 साल के बाद नेहा गायत्री की गोद में आ गई. सरस्वती की झोली खुशियों की असीम सौगात से भर उठी थी. गायत्री जैसी बहू पा कर वह निहाल हो उठी थी. विश्वनाथ और उस के बीच में तनी अदृश्य दीवार गायत्री के प्रयास से टूटने लगी थी. बेटे और मां के बीच का संकोच मिटने लगा था.

 

अब विश्वनाथ खुल कर मां के बनाए खाने की प्रशंसा करता. कभीकभी मनुहारपूर्वक कोई पकवान बनाने की जिद भी कर बैठता, तो सरस्वती की आंखें गायत्री को स्नेह से निहार, बरस पड़तीं. कौन से पुण्य किए थे जो ऐसी सुघड़ बहू मिली. अगर इस ने मेरा साथ नहीं दिया होता तो गांव के उसी अकेले कमरे में बेहद कष्टमय बुढ़ापा गुजारने पर मैं विवश हो जाती.

 

समय अपनी गति से बीतता रहा. 3 वर्ष पहले कमला बूआ की मृत्यु हो गई. विपुल ने इसी साल मैट्रिक की परीक्षा दी थी. और नेहा 8वीं कक्षा की होनहार छात्रा थी. दोनों बच्चों के प्राण तो बस, अपनी दादी में ही बसते थे.

 

गायत्री ने उन का दामन जमाने भर की खुशियों से भर दिया था और वही गायत्री इस तरह, अचानक उन्हें छोड़ गई? उन की सोच को एक झटका सा लगा.

 

‘‘दादीमां, दवा ले लीजिए,’’ पोती नेहा की आवाज से वह वर्तमान में लौटीं. उठने की कोशिश की पर बेहोशी की गर्त में समाती चली गईं.

 

 

नेहा की चीख सुन कर सब कमरे में भागे चले आए. विपुल दौड़ कर डाक्टर को बुला लाया. मां के सिरहाने बैठे विश्वनाथ की आंखें रहरह कर भीग उठती थीं.

 

‘‘इन्हें बहुत गहरा सदमा पहुंचा है, विश्वनाथ बाबू. इस उम्र में ऐसे सदमे से उबरना बहुत मुश्किल होता है. मैं कुछ दवाएं दे रहा हूं. देखिए, क्या होता है?’’

 

डाक्टर ने कहा तो विपुल और नेहा जोरजोर से रोने लगे.

 

‘‘दादीमां, तुम हमें छोड़ कर नहीं जा सकतीं. मां तुम्हारे ही भरोसे हमें छोड़ कर गई हैं,’’ नेहा के रुदन से सब की आंखें नम हो गई थीं.

 

4 दिन तक दादीमां नीम बेहोशी की हालत में पड़ी रहीं. 5वें दिन सुबह अचानक उन्हें होश आया. आंखें खोलीं और करवट बदलने का प्रयास किया तो हाथ किसी के सिर को छू गया. दादीमां ने चौंक कर देखा. उन के पलंग की पाटी से सिर टिकाए उन का बेटा गहरी नींद में सो रहा था. कुरसी पर अधलेटे विश्वनाथ का सिर मां के पैरों के पास था.

 

तभी नेहा कमरे में आ गई. दादी की आंखें खुली देख वह खुशी से चीख पड़ी, ‘‘पापा, दादीमां को होश आ गया.’’ विश्वनाथ चौंक कर उठ बैठे.

 

बेटे से नजर मिलते ही दादीमां का दिल फिर से धकधक करने लगा. मन की पीड़ा अधरों से फूट पड़ी.

 

‘‘मैं सच में आभागी हूं, बेटा. मनहूस हूं, तभी तो सोने जैसी बहू सामने से चली गई और मुझे देख, मैं फिर भी जिंदा बच गई. मेरे जैसे मनहूस लोगों को तो मौत भी नहीं आती.’’

 

‘‘नहीं मां, ऐसा मत कहो. तुम ऐसा कहोगी तो गायत्री की आत्मा को तकलीफ होगी. कोई इनसान मनहूस नहीं होता. मनहूस तो होती हैं वे रूढि़यां, सड़ीगली परंपराएं और शास्त्रपुराणों की थोथी अवधारणाएं जो स्त्री और पुरुष में भेद पैदा कर समाज में विष का पौधा बोती हैं. अब मुझे ही देख लो, गायत्री की मृत्यु के बाद किसी ने मुझे अभागा या बेचारा नहीं कहा.

 

‘‘अगर गायत्री की जगह मेरी मृत्यु हुई होती तो समाज उसे अभागी और बेचारी कह कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेता.’’

 

दादीमां आंखें फाड़े अपने बेटे का यह नया रूप देख रही थीं. गायत्री जैसे पारस के स्पर्श से उन के बेटे की सोच भी कुंदन हो उठी थी.

 

विश्वनाथ अपनी रौ में कहे जा रहा था, ‘‘मुझे माफ कर दो, मां. बचपन से ही मैं तुम्हारा प्यार पाने में असमर्थ रहा. अब तुम्हें हमारे लिए जीना होगा. मेरे लिए, विपुल के लिए और नेहा के लिए.’’

 

‘‘बेटा, आज मैं बहुत खुश हूं. अब अगर मौत भी आ जाए तो कोई गम नहीं.’’

 

‘‘नहीं मां, अभी तुम्हें बहुत से काम करने हैं. विपुल और नेहा को बड़ा करना है, उन की शादियां करनी हैं और मुझे वह सारा प्यार देना है जिस से मैं वंचित रहा हूं,’’ विश्वनाथ बच्चे की तरह मां की गोद में सिर रख कर बोला.

 

सरस्वती देवी के कानों में बहू के कहे शब्द गूंज उठे थे.

 

‘मां, जिस दिन आप का बेटा आप को वापस लौटा दूंगी, उस दिन आप के मन की मुराद पूरी होगी. आप के प्रति उन का पछतावे से भरा एहसास जल्दी ही असीम स्नेह और आदर में बदल जाएगा, देखिएगा.’

 

सरस्वती देवी ने स्नेह से बेटे को अपने अंक में समेट लिया. बहू द्वारा दिए गए इस अनमोल उपहार ने उन की शेष जिंदगी को प्राणवान कर दिया था.

 

कौन करता है इंतजार यहां

उस शाम मैं जब औफिस से घर पहुंची तो उड़ती नजर आंगन में डालते हुए अपने कमरे में दाखिल हो गयी. आंगन में तुषार और उसके कुछ दोस्त जमा थे. कुछ खुसुर-पुसुर चालू थी. मैंने आते ही तुषार को आवाज लगायी. वह भागा-भागा कमरे के दरवाजे पर आकर खड़ा हो गया. मैंने अलमारी खोलते हुए उसे झिड़की लगायी, ‘सारा दिन खेलते-खेलते दिल नहीं भरा, घर में भी धम्मा चौकड़ी मची हुई है? ये तेरे सारे दोस्त यहां क्यों जमा हैं?’

तुषार एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ मेरे पास आया. मैंने सोचा कि अभी कहेगा कि मां मैगी बना दो, मेरे और मेरे दोस्तों के लिए. भूख लगी है.

मगर पास आकर उसने धीरे से कहा, ‘मां, आपको कुछ दिखाना है…’

मैंने पर्स अलमारी में डालते हुए पलट कर पूछा, ‘क्या…?’

तुषार बोला, ‘आप आंगन में तो चलो, वहां कुछ दिखाना है….’ वह मेरी साड़ी का पल्ला पकड़ कर खींचते हुए मुझे आंगन में ले आया, जहां उसके चार दोस्त अपने बीच कुछ लिए बैठे थे. मैंने पास जाकर देखा तो मिट्ठू के पिंजरे में एक छोटी सी मैना बंद थी.

मैंने तुषार से पूछा, ‘यह कहां से आयी?’

उसने खुशी-खुशी बताया, ‘यहां कमरे की खिड़की पर बैठी थी, हमने कपड़ा डाल कर पकड़ लिया और मिट्ठू के पिंजरे में रख दिया.’

मिट्ठू को मरे तो साल भर हो गया. उसका पिंजरा मैंने गोदाम में रख दिया था. इन बच्चों ने उसे निकाल कर झाड़पोंछ कर उसमें मैना को कैद कर रखा था.

मैंने थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए पूछा, ‘कब पकड़ा इसे?’

एक बच्चा बोला, ‘आंटी, चार घंटे हो गये, पर यह कुछ खाती ही नहीं है. अब तो अंधेरा भी हो रहा है, इसको दिखायी भी नहीं देगा, फिर यह कैसे खाएगी?’

मैंने बच्चों को घुड़कते हुए कहा, ‘हर चिड़िया को पिंजरे में बंद नहीं करते हैं. तुमने चार घंटे से इसे बंद कर रखा है, इसके घरवाले परेशान हो रहे होंगे. इसकी मां रो रही होगी. खोलो पिंजरे को. जाने दो इसको.’

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तुषार ने डांट खाते ही पिंजरा खोल दिया. नन्हीं मैना चीं-चीं करती उड़ कर सामने की मुंडेर पर जा बैठी.

मैं सोच रही थी कि इस धुंधलके में पता नही बेचारी अपने घोंसले तक लौट भी पाएगी या नहीं, इतने में पास के पेड़ से छह-सात मैना उड़ कर उस छोटी मैना के पास मुंडेर पर आ बैठीं. आंगन चीं-चीं की आवाज से गूंज उठा. बच्चे अवाक होकर मुंडेर की ओर ताकने लगे. थोड़ी ही देर में उन चिड़ियों के साथ छोटी मैना उड़ चली.

मैं हैरान थी यह देखकर कि नन्ही मैना के इंतज़ार में ये तमाम चिड़ियां पिछले चार घंटे से इन पेड़ों पर बैठी थीं कि कभी न कभी तो पिंजरा खुलेगा और उनकी साथी चिड़िया उनको वापस मिल जाएगी. कितना प्यार है इनके बीच. कितना इंतजार है एक दूसरे के लिए कि रात होने के बाद भी बाकी की चिड़ियां अपने घोंसलों को वापस नहीं गयीं, अपनी साथी चिड़िया के जेल से छूटने का इंतजार करतीं वहीं डेरा जमाये रहीं. मगर हम इंसान कितनी जल्दी में होते हैं, किसी का इंतजार नहीं करते, किसी से प्यार नहीं करते, किसी पर विश्वास नहीं करते, कोई स्नेह, कोई लगाव, कोई भाईचारा, कोई रिश्ता नहीं… बस सब अपने-अपने स्वार्थ के तहत एक दूसरे के साथी हैं.

तुषार के पिता ने भी कहां इंतजार किया मेरा… मैं उनसे नाराज होकर मायके आयी थी… तुषार तब सिर्फ दो साल का था… उसकी देखभाल के लिए मैंने अपनी नौकरी छोड़ दी थी… नौकरानी उसकी देखभाल में लापरवाही करती थी… अम्मा को अपनी किटी पार्टियों से फुर्सत नहीं थी… बच्चा दिन भर रोता रहता था… भूखा रहता था… फिर बीमार रहने लगा तो मैंने नौकरी छोड़ दी. घर में आने वाले पैसे कम हो गये…. मैंने सोचा था कि दो साल में तुषार स्कूल जाने लायक हो जाएगा, तब मैं फिर कोई नौकरी ज्वाइन कर लूंगी… मगर नहीं… उनको तो घर में आने वाली मेरी मोटी तनख्वाह मुझसे और बेटे से ज्यादा प्यारी थी… अम्मा को किटीपार्टी में उड़ाने वाले पैसे कम पड़ने लगे थे… उनके सूटों की संख्या कम हो गयी थी… बहू के पैसे पर सब मौज कर रहे थे… मगर घर के चिराग की देखभाल में किसी का कोई योगदान नहीं था… बहू ने नौकरी छोड़ी तो सब दुश्मन बन गये… हर बात में ताना… हर बात में गुस्सा… आखिर आयेदिन की खिचखिच से परेशान होकर मैं तुषार को लेकर मायके चली आयी… वो चाहते तो मुझे फोन कर लेते… लेने आ जाते… मैं लौट जाती… मगर वो मुझे छोड़ कर आगे बढ़ गये… एक और नौकरीपेशा औरत के साथ… मेरा इंतजार किये बगैर…

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Yogi Aditynath : बुलडोजर जस्टिस पर सुप्रीम कोर्ट का एक्‍शन

पिछले आठ सालों में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने न जाने कितने मासूम परिवारों का आशियाना छीना, अपने चंद वोटरों को खुश करने मीडिया की वाहवाही लूटने के लिए बुलडोजर एक्शन चलाया. मगर अब सुप्रीम कोर्ट ने बुलडोजर पॉलिटिक्स पर जो सख्त एक्शन लिया है उसने भाजपा को बता दिया है कि देश मनुवाद से नहीं संविधान से चलेगा.

लखनऊ के अकबरनगर में यूपी का सबसे बड़ा बुलडोजर एक्शन : अकबरनगर में उत्तर प्रदेश सरकार ने 1800 मकानों पर बुलडोजर चलाया, जो एशिया का सबसे बड़ा ध्वस्तीकरण अभियान माना गया. इसमें लगभग 35,000 लोग बेघर हुए, जिनमें से 1800 को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत नए घर मिले. लोगों ने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन कोई राहत नहीं मिली.

विधायक शहजिल इस्लाम का पेट्रोल पंप ध्वस्त : बरेली के भोजीपुरा से सपा विधायक शहजिल इस्लाम पर मुख्यमंत्री के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी का आरोप लगा था. इसके बाद उनका पेट्रोल पंप बुलडोजर की कार्रवाई में ध्वस्त कर दिया गया. इस एक्शन पर सपा ने बदले की राजनीति का आरोप लगाया था.

वाराणसी में दो होटल जमींदोज : वाराणसी में वरुणा नदी के किनारे बने दो आलीशान होटलों पर भी बुलडोजर चलाया गया. प्रशासन के अनुसार, ग्रीन बेल्ट में बने इन होटलों को हटाने के लिए 5 बुलडोजर लगाए गए थे. कार्रवाई के दौरान होटल मालिकों और प्रशासन के बीच बहस भी हुई, जिसमें ADM सिटी आलोक कुमार का हेडशॉट विवाद में रहा.

प्रयागराज में हिंसा के आरोपी जावेद के पंप और मकान पर चला बुलडोजर : प्रयागराज हिंसा के बाद मुख्य आरोपी जावेद अहमद का मकान बुलडोजर से गिरा दिया गया. जावेद की पत्नी परवीन फातिमा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें दावा किया गया कि मकान उनके नाम पर था, फिर भी इसे अवैध तरीके से ध्वस्त किया गया. प्रशासन का कहना था कि मकान बिना नक्शे के बनाया गया था.

आजम खान की जौहर यूनिवर्सिटी का उर्दू गेट तोड़ा गया : सपा नेता आजम खान की जौहर यूनिवर्सिटी का उर्दू गेट 9 मार्च 2019 को ध्वस्त किया गया. आरोप था कि आजम खान ने अपने कार्यकाल में सरकारी जमीन पर गेट बनवाया था, जो सार्वजनिक रोड को कब्जे में ले रहा था. गेट बनाने में 40 लाख रुपये खर्च हुए थे, जिसे बीजेपी के सत्ता में आने के बाद ध्वस्त किया गया.

गोरखपुर में चला बुलडोजर : गोरखपुर के सुबा बाजार में डॉ. अश्विनी अग्रवाल की बाउंड्री वॉल, सत्यवीर यादव का सीमेंट गोदाम, अनुपम अग्रवाल की पौधशाला की बाउंड्री वाल एवं मुर्गी फार्म की बाउंड्री वॉल समेत 15 एकड़ भूमि बिना नोटिस और बिना वक़्त दिए यह कह कर खाली करवाई गयी कि इस पर अवैध कब्जा है.

फर्रुखाबाद में 23 मकान जमींदोज : उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में रविवार, 29 सितंबर को बंजर भूमि पर बने 23 मकान बुल्डोजर से जमींदोज कर दिए गए. नवाबगंज क्षेत्र के उखरा गांव में यह मकान 1990 में पंचायत की अनुमति पर बने थे. लोग पिछले 24 साल से यहां मकान बनाकर रह रहे थे, लेकिन प्रशासन ने चंद घंटे में उन्हें बेघर कर दिया. नवाबगंज क्षेत्र के उखरा गांव में 105 बीघा जमीन बंजर भूमि है। 1990 में ग्राम पंचायत ने अनिल कुमार, कृष्ण कुमार, राजकुमार, बृजपाल सिंह, सुरेश चंद्र, ब्रह्म किशोर, भूप सिंह, रामप्रकाश, राम अवतार, चरन सिंह, जितेंद्र, राजीव, गुन्नू, बृजकिशोर, ब्रह्मानंद, किशोर राम, सनोज, बलराम सिंह, गंगा सिंह, रामकिशन, रामनिवास और रामचंद्र को यह भूमि मकान बनाने के लिए दी थी। तभी से यह लोग पक्के मकान बनाकर रह रहे थे.

Satire: दालप्याज से ऊपर उठ

हे जीव, भरी जवानी में भी पपीहे की तरह दालदाल क्यों पुकार रहा है? ले, रेल नीर पी, कुछ अपने रोने को विराम दे. जमाखोरी कर गरीबों के पेट पर लात मारने वालों को मन से सलाम दे. एक गुप्त रहस्य सुन, दाल मिथ्या है, दाल भ्रम है. दाल घमंडी है, दाल बेशर्म है. ऐसी दाल न खाना सत्कर्म है. ऐसी दाल खाना नीच कर्म है. जो दाल खाते हैं वे नरक को जाते हैं. जो बिन दाल के रोटी खाते हैं वे अमरत्व पाते हैं.

दाल खाने से बौडी में प्रोटीन बढ़ता है. दाल खाने से जोड़ों में दर्द होता है. जोड़ों में दर्द होने से जीव दिनरात रोता है. तब वह घर में घर वालों की गालियां सुनता है. न जाग पाता है न हौस्पिटल में चैन से सोता है. इसलिए दालदाल मत रट. रामराम रट. दाल से ज्यादा बलशाली राम हैं. दाल से बड़ा राम का नाम है. भवसागर पार हो जाएगा. वहां जा कर तू हरदम दाल ही दाल खाएगा. तब तू दाल के टोटे से शरीर में हुई हर कमी पर विजय पाएगा. झूमेगा, गाएगा.

रोटी के साथ दाल खाना पाप है. पाप से बचने के लिए घीया खा, पालक खा, करेले खा, केले खा, सरसों का साग खा, मेरे बनाए शुगरफ्री बिस्कुट खा. मेरे नूडल्स खा. अमरत्व पा. दाल को परे छोड़. योग कर. आगे बढ़. योग आटादाल से मुक्ति दिलाता है. योग, बिन दालप्याज जीना सिखाता है. अभाव पर भाव को विजय पाने दे. दाल, प्याज के प्रति अपना भाव बदल. सरकार के प्रति अपना भाव बदल. लोकतंत्र के प्रति अपना भाव बदल. जि गी के प्रति अपना भाव बदल. जीने का सब से बेहतर तरीका अभाव नहीं, भाव है. सोच ले, दाल का अस्तित्व ही नहीं. फिर जो है ही नहीं, उस का अभाव कैसा? राम ने जैसे रावण पर विजय पाई, तू वैसे ही जिंदगी की हर अति आवश्यक जरूरत पर विजय पा. मंगल पर कदम रखने के बाद भी कोई रोता है पगले?

पता नहीं, तू दाल के लिए इतना बावला क्यों हुआ जा रहा है? सब्र कर. धैर्य रख. सरकार के कहने पर विदेशी दाल का गौना हो गया है. वह तेरे घर दुलहन बन आने को पालकी में सवार है. बस, कहारों का इंतजार है. उस के स्वागत के लिए घर में दरी बिछा. रुदालियों को बुला. हे दाल के इंद्रजाल के मारे, इस बाजार में किसी की सदा एक सी कहां रही है? जो ऊपर चढ़ा है, वह एक दिन नी

चे जरूर गिरा है. चाहे अपने कारनामों से या यारदोस्तों की मेहरबानी से. ऐसे में दाल के चढ़े रेट एक दिन जरूर नीचे आएंगे. तब हम सब मिल कर जश्न मनाएंगे. जीभर दाल खाएंगे. दाल में डट कर प्याज का तड़का लगाएंगे. दाल बंदरों को खिलाएंगे. दाल भैंसों को खिलाएंगे. इसे सबक सिखाएंगे. सब्र का फल मीठा होता है. बुरे वक्त में सरकार का साथ दे. जो बुरे वक्त में सरकार का साथ नहीं देता वह अदना होता है. अरे पगले, दाल में ऐसा क्या रखा है जो तू ने दाल न मिलने पर आसमान सिर पर उठा लिया. दाल के लिए रोना छोड़. माल के लिए रो. क्या रखा है दाल खाने में, क्या रखा है प्याज खाने में. आधी जिंदगी कट गई उल्लू बनने में, शेष जिंदगी काट उल्लू बनाने में. उल्लू बन, उल्लू बना, खुद भी हंस, औरों को भी हंसा.

दाल के सिवा और सबकुछ तो है तेरे पास. जवान बीवी है. उस से ज्यादा जवान प्रेमिका है. बिना लोन की कार है. अपने पद के अनुरूप लूटने को लोन पर चल रही सरकार है. सुन, इस संसार में सुखी कोई नहीं. सभी रो रहे हैं. क्या गृहस्थी, क्या संन्यासी, क्या धर्म, क्या जाति. कोई नाम को रो रहा है तो कोई दाम को. कोई सलाम को रो रहा है तो कोई इनाम को. कोई पुरस्कार पाने की जुगाड़ में है तो कोई पुरस्कार लौटाने की चिंघाड़ में. कोई कुरसी को रो रहा है तो कोई भात को. कोई घूंसे को रो रहा है तो कोई लात को. रोना ही हम सब की नियति है रे जीव, इसलिए चल, अपनी आंखें पोंछ और दाल के लिए रोना छोड़. रोने के लिए और भी कई आइटम हैं इस देश में दाल के सिवा. रोना है तो उन के लिए रो जो जबान को दिनरात धार दिए जा रहे हैं. खंजर से भी पैनी अपनी जबान किए जा रहे हैं. जिन के लिए जबान फूलों का गुलदस्ता नहीं, अचूक हथियार है. रोना है तो उन के लिए रो जो दिमाग से बीमार हैं. रोना है तो उन के लिए रो जो अपनेआप दो कदम तक नहीं चल सकते और दावा यह कि उन के कंधों पर ही इस देश का भार है. इसलिए, ये ले मेरा रूमाल, पों अपनी आंखों के आंसू. दाल से ऊपर उठ. प्याज से ऊपर उठ. फील कर दाल के बिना मिलने वाला परम सुख, फील कर प्याज के बिना मिलने वाला परम सुख. तू भी खुश, सरकार भी खुश. मेरी खुशी तो दोनों की खुशी में ही छिपी है.

Hindi Story : भेडि़या और भेड़ एक थाली में नहीं खाते

‘‘मां, मां…’’ लगभग चीखती हुई रूबी अपना बैग जल्दीजल्दी पैक करने लगी. मिसेज सविता उसे बैग पैक करते देख अचंभित हो बोलीं, ‘‘यह कहां जा रही है तू?’’

‘‘मां, बेंगलुरु में जौब लग गई है, वह भी 4 लाख शुरुआती पैकेज मिल रहा है. कल की फ्लाइट से निकल रही हूं.’’

सविता बोलीं, ‘‘अकेली कैसे रहेगी इतनी दूर? कोईर् और भी जा रहा है क्या?’’

रूबी मुसकराती हुई बोली, ‘‘पता है तुम क्या पूछना चाह रही हो. हां, रविश की जौब भी वहीं है. उस से बहुत सहारा मिलेगा मुझे.’’

इस पर सविता बोलीं, ‘‘तू रहेगी कहां? कोई फ्लैट या किराए का घर देख लिया है या नहीं?’’

अब रूबी की चंचल मुसकान गायब हो गई और मां को पलंग पर बैठाते हुए वह बोली, ‘‘मां, मैं और रविश वहां साथ ही रहेंगे.’’ यह सुन कर तो मां ऐसे उछल पड़ीं जैसे कि पलंग पर स्ंिप्रग रखी हो और उन के मुंह से बस यही निकला, ‘‘क्या? पागल तो नहीं हो गई तू, लोग क्या कहेंगे?’’

रूबी बोली, ‘‘जिन लोगों को तुम जानती हो, उन में से कोई बेंगलुरु में नहीं रहता, टैंशन नौट.’’

सविता ने कहा, ‘‘मति मारी गई है तेरी, भेडि़या और भेड़ कभी एक थाली में नहीं खा सकते. क्योंकि भेड़ के मांस की खुशबू आ रही हो तो भेडि़या घासफूस खाने का दिखावा नहीं करता.’’

इस पर रूबी बोली, ‘‘मां, इस भेड़ को भेडि़यों को काबू में रखना आता है. हम साथ रहेंगे अपनीअपनी शर्तों पर, शादी नहीं कर रहे हैं.’’

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गुस्से में सविता बोलीं, ‘‘अरे नालायक लड़की, छुरी सेब पर गिरे या सेब छुरी पर, नुकसान सेब का ही होता है, जवानी की उमंग में तू यह क्यों नहीं समझ रही है?’’

रूबी बोली, ‘‘मां, मैं तुम से वादा करती हूं, जब तक उसे पूरी तरह समझ नहीं लेती, उस को हाथ भी नहीं लगाने दूंगी.’’

सविता ने कहा, ‘‘भाड़ में जा, ऐसी बातें तेरे मामा से तो कह नहीं सकती. काश, आज तेरे पिता जिंदा होते.’’

रूबी बोल पड़ी, ‘‘जिंदा होते तो गर्व करते कि बेटी ने दहेज की चिंता से मुक्त कर दिया.’’

रूबी बेंगलुरु पहुंची तो रविश ने उस का गर्मजोशी से स्वागत किया. रूबी मां को तो आश्वस्त कर आई मगर वह रविश के आचार, विचार और व्यवहार को बहुत ही बारीकी से तोल रही थी. रविश ने उसे छूने की तो कोशिश नहीं की मगर उस के उभारों पर उस की ललचाई नजर वह भांप सकती थी. उस दिन तो हद हो गई जब रविश अपने स्लो नैटवर्क के कारण टैलीकौम कंपनी की मांबहन भद्दीभद्दी गालियों के साथ एक कर दे रहा था.

चरित्र और आचार की परीक्षा को जब तक रूबी भुला पाती, रविश ने टीवी देखते हुए सनी लिओनी पर अपने विचार भी जाहिर कर दिए. अब तो रूबी के सपनों की दुनिया मानो ताश के पत्तों की तरह बिखर गई. दूसरे ही दिन रूबी अपना बोरियाबिस्तर बांध अपनी कलीग के घर जाने लगी, तो रविश ने उस का रास्ता रोकते हुए पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

रूबी ने उस के आचार, विचार और व्यवहार पर लंबाचौड़ा भाषण दे दिया. रविश ने सबकुछ शांति से सुना और बोला, ‘‘अरे, इतनी सी बात, यह तो मेरे अंदर का पुरुष जब मुझ पर हावी हो जाता है, तब होता है, हमेशा ऐसा नहीं होता.’’

रूबी ने कहा, ‘‘मगर रविश, मैं ने सोचा था कि तुम बाकी मर्दों से अलग होगे.’’

रविश ने कहा, ‘‘रूबी, जो पुरुष अपने को ऐसा दिखाते हैं वे झूठे होते हैं. सच तो यह है कि हर पुरुष सुंदर स्त्री को देखते ही लालायित हो उठता है. यह नैसर्गिक आदत है उस की. मैं भी पुरुष हूं, झूठ नहीं बोलूंगा. मगर मैं भी तुम्हें मन ही मन…लेकिन तुम्हारी मरजी के बिना नहीं. अब भी तुम अलग रहना चाहती हो तो मैं नहीं रोकूंगा.’’

रूबी उस की साफसाफ बोलने की आदत और नियंत्रण देख अपने कपड़े बैग से निकाल वापस अलमारी में रखने लगी. तभी लाइट चली गई और रविश बोल पड़ा, ‘‘इस को भी अभी जाना था.’’ रूबी के घूर कर देखने पर रविश जीभ दांतों में दबा उठकबैठक लगाने लगा. और रूबी ने इस बचकानेपन पर उसे चूम लिया. आज उस ने अपने अंदर की स्त्री के संयम के किनारे को भी तोड़ दिया क्योंकि आज वह भेडि़या और भेड़ की नैसर्गिकता को समझ चुकी थी.

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एक इंजीनियर की मौत

महज 70-80 घरों वाले उस छोटे से गांव के छोटे से घर में मातम पसरा हुआ था. गिनती के कुछ लोग मातमपुरसी के लिए आए हुए थे. 28 साल की जवान मौत के लिए दिलासा देने के लिए लोगों के पास शब्द नहीं थे. मां फूटफूट कर रो रही थी. जब वह थक जाती तो यही फूटना सिसकियों में बदल जाता. बाप के आंसू सूख चुके थे और वह आसमान में एकटक देखे जा रहा था. ज्यादा लोग नहीं थे. वैसे भी गरीब के यहां कौन जाता है.

‘‘पर, विजय ने खुदकुशी क्यों की?’’ एक आदमी ने पूछा.

‘‘पता नहीं… उस ने 3 साल पहले इंजीनियरिंग पास की थी. नौकरी नहीं मिली शायद इसीलिए,’’ पिता ने जैसेतैसे जवाब दिया.

‘‘चाचा, इस सिस्टम, इन सरकारों ने जो सपने दिखाने के कारखाने खोले हैं यह मौत उसी का नतीजा है.

‘‘आप को याद होगा कि 10 साल पहले जब विजय ने इंटर पास की थी, तब वह इस गांव का पहला लड़का था जो 70 फीसदी अंक लाया था. सारा गांव कितना खुश था.

‘‘गांव के टीचरों ने भी अपनी मेहनत पर पहली बार फख्र महसूस करते हुए उसे इंजीनियरिंग करने की सलाह दी थी. तब क्या पता था कुकुरमुत्ते की तरह खुले ये कालेज भविष्य नहीं सपने बेच रहे हैं.

‘‘यह तो आप लोग भी जानते हैं कि विजय के परिवार के पास 8 एकड़ जमीन ही थी. दाखिले के समय विजय के पिताजी ने अपनी बरसों की जमापूंजी लगा दी. उस के अगले साल भी जैसेतैसे जुगाड़ हो ही गया. पर आखिरी 2 साल के लिए उन्हें अपनी 2 एकड़ जमीन भी बेचनी पड़ी.

‘‘सभी को यह उम्मीद थी कि इंजीनियरिंग होते ही 4-6 महीने में विजय की नौकरी लग जाएगी. कालेज भी नामीगिरामी है और कैंपस सिलैक्शन के लिए भी कई कंपनियां आती हैं. कहीं न कहीं जुगाड़ हो ही जाएगा.

‘‘यह किसे पता था कि आने वाली सभी कंपनियां प्रायोजित होती हैं और उन्हीं छात्रों को चुनती हैं जिन का नाम कालेज प्रशासन देता है.

‘‘कालेज प्रशासन भी उन्हीं छात्रों के नाम देता है जो उन के टीचरों से कालेज टाइम के बाद कोचिंग लेते हैं.

‘‘विजय अपने घर के हालात को बखूबी जानता था. वह फीस ही मुश्किल से भर पाता था, ऐसे में कोचिंग लेना उस के लिए मुमकिन नहीं था. ऊपर से दिक्कत यह कि उस के पास होने के एक साल पहले से उन प्रायोजित कंपनियों ने भी आना बंद कर दिया था. शायद दूसरे कालेज वालों ने ज्यादा पैसे दे कर उन्हें बुलवा लिया था.

‘‘इतने सारे इंजीनियरों के इम्तिहान पास करने के बाद सरकार के खुद के पास नौकरी के मौके नहीं थे. विजय को अपने लैवल की नौकरी मिलती कैसे?

‘‘पिछले 3 सालों से उस क्षेत्र की कोई कंपनी नहीं बची थी जहां पर विजय ने नौकरी के लिए अर्जी न दी हो. अब तो हालत यह हो गई थी कि उन कंपनियों के सिक्योरिटी गार्ड और चपरासी भी उसे पहचानने लगे थे. दूर से ही उसे देख कर वे हाथ जोड़ कर मना कर दिया करते थे.

‘‘एक दिन एक साधारण सी फैक्टरी का सिक्योरिटी गार्ड गेट पर नहीं था तो विजय मौका देख कर उस के औफिस में घुस गया और वहां बैठे उस के मालिक को अर्जी देते हुए नौकरी की गुजारिश करने लगा.

‘‘तब उस के मालिक ने कहा, ‘मेरी फैक्टरी में इंजीनियर, सुपरवाइजर, मैनेजर सबकुछ वर्कर ही है जो 50 किलो की बोरियां अपने कंधों पर उठता भी है, 200 किलो का बैरल धकाता भी है और प्रोडक्शन के लिए मशीनों को औपरेट भी करता है. शायद तुम अपनी डिगरी के चलते ये सब काम न कर पाओ.

मैं तो सरकार को सलाह दूंगा कि वह इंजीनियर बनाने के बजाय मल्टीपर्पज वर्कर बनाने के लिए इंस्टीट्यूट खोले. यह देश के फायदे में होगा.’

‘‘कारखानों, कंपनियों और सरकारी महकमों में चपरासी तक की नौकरी न मिलते देख विजय ने टीचर बनने की सोची. पर मुसीबतों ने उस का साथ यहां भी नहीं छोड़ा. सरकारी स्कूलों में उसे अर्जी देने की पात्रता नहीं थी. प्राइवेट स्कूलों में जब इंटरव्यू के लिए वह गया तो सभी इस बात से डरे हुए थे कि जब उसे अपनी फील्ड की नौकरी मिलेगी तो वह स्कूल की नौकरी बीच में ही छोड़ देगा और स्कूल के बच्चों का भविष्य अधर में लटक जाएगा.

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‘‘गांव के रीतिरिवाजों के मुताबिक, विजय की शादी भी उस के इंजीनियरिंग में दाखिला लेते ही तय कर दी गई थी. लड़की पास ही के गांव की थी. विजय जब भी गांव आता तो उस से मिलने जरूर जाता था.

‘‘विजय के इंजीनियर बनने के साथ ही उस ने भी अपनी ग्रेजुएशन पूरी कर ली थी. पर पिछले 3 सालों से विजय का कुछ होता न देख कर लड़की के घर वालों ने कहीं और शादी करने का फैसला ले लिया.

‘‘उस लड़की ने भी विजय को यह कहते हुए छोड़ दिया था कि वह जानबूझ कर जद्दोजेहद की दुनिया में नहीं जा सकती.

‘‘उस लड़की ने कहा था, ‘याद करो विजय, हम ने सुखद भविष्य के जो भी सपने देखे हैं उन में कोई संघर्ष नहीं है तो मैं अब कैसे संघर्षों को चुन सकती हूं? मैं आंखों देखी मक्खी नहीं निगल सकती.’

‘‘विजय गांव वापस आ कर खेती इसलिए भी नहीं कर सकता था, क्योंकि 2 एकड़ खेती बिकने का कुसूरवार वह अपनेआप को मानता था. वैसे भी बची हुई 6 एकड़ खेती से 3 लोगों का खर्चा निकलना मुश्किल ही था. विजय चाहता था अगर वह परिवार की कुछ मदद न कर सके तो कोई बात नहीं, पर कम से कम परिवार के लिए बोझ न बने.

‘‘मैं उसे फोन लगा कर रोज बातें किया करता था ताकि उस की हिम्मत बनी रहे. पर पिछले 15 दिनों से हालात बहुत खराब हो गए थे. जिन लोगों के साथ वह रूम शेयर कर के रहता था उन्होंने 6 महीने से पैसा न दे पाने के चलते रूम से निकाल दिया था. मैं हजार 5 सौ रुपए की मदद जरूर करता था पर वह मदद पूरी नहीं पड़ती थी.

‘‘पेट भरने के लिए वह अकसर रात में सब्जी मंडी बंद होने के बाद चला जाता था और विक्रेताओं द्वारा फेंकी गई सड़ी हुई सब्जियों और फलों के अच्छे हिस्से निकाल कर खा लेता था.

‘‘लेकिन परसों हुई घटना ने न सिर्फ उस की उम्मीदों को तोड़ दिया था, बल्कि तथाकथित इनसानियत पर से भी उस का थोथा विश्वास हमेशा के लिए उठ गया था.

‘‘रूममेट्स द्वारा निकाले जाने के बाद विजय अलगअलग फुटपाथों पर अपनी रातें बिताया करता था. परसों वह ऐसे ही किसी फुटपाथ के किनारे बैठा था. पिछले 2 दिनों से सड़ी हुई सब्जियों के अलावा उस ने कुछ खाया भी नहीं था.

‘‘तभी एक बड़ी सी कार में से एक अमीर औरत उतरी. उस के हाथों में कुछ रोटियां थीं. वह अपनी पैनी निगाहों से कुछ खोज रही थी. उसे सामने कुछ ही दूरी पर एक काला कुत्ता दिखाई पड़ा. शायद वह उसी को खोज रही थी. उस औरत ने उस कुत्ते को अपनी तरफ बुलाने की बहुत कोशिश की. रोटियां शायद वह उस काले कुत्ते को खिलाना चाहती थी.

‘‘कुत्ते ने उस औरत की तरफ देखा जरूर, पर आया नहीं. शायद उस का पेट भरा हुआ था. हार कर वह औरत उन रोटियों को वहीं रख वापस अपनी गाड़ी की तरफ चली गई.

‘‘जब विजय ने देखा कि कुत्ता रोटी नहीं खा रहा?है तो उस ने वह रोटी खुद के खाने के लिए उठा ली. कार में बैठते समय उस औरत ने सारा कारनामा देखा तो वह तुरंत कार में से उतर कर आई और विजय से रोटी छीनते हुए बोली, ‘यह रोटी मैं ने शनि महाराज की पूजा के लिए बनाई है और इसे काले कुत्ते के खाने से ही मेरी शनि बाधा दूर होगी, तुम जैसे आवारा के खाने से नहीं.’

‘‘भूखा विजय कब तक सिस्टम से, समाज से और अपनी भूख से इंजीनियरिंग की डिगरी के दम पर लड़ता? आखिरकार उस ने जिंदगी से हार मान ली और पानी में डूब कर खुदकुशी कर ली.’’

मातमपुरसी के लिए आए सब लोग चुप थे. वे समझ नहीं पा रहे थे कि किसे कुसूरवार समझें. बिना भविष्य की योजनाएं लिए चल रही सरकारों को या पकवानों के साथ पेट भर कर एयरकंडीशंड कमरों में बैठे सपने बेचने वाले अफसरों को या उन भोलेभाले लोगों को जो इन छलावों में आ कर अपना आज तो खराब कर ही रहे हैं, भविष्य के बुरे नतीजों से भी बेखबर हैं.

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