Download App

मजाक: ब्लैक मार्केटियों की गूगल मीट

जैसे ही अखिल भारतीय ब्लैक मार्केट महासंघ के प्रैसिडैंट को इस बात के पुख्ता सुबूत मिलने शुरू हुए कि देश में महामारी की तीसरी लहर हर हाल में आ कर रहेगी, हर चीज को देश में आने से रोका जा सकता है पर महामारी की तीसरी लहर को नहीं, तो उन्होंने देशहित में देशभर के तमाम कोरोना माल की ब्लैक मार्केटिंग करने वालों की जनहित में गूगल मीट पर आपात मीटिंग बुलाई. गूगल मीट पर जब देश के नामचीन ब्लैक मार्केटिए जुट गए तो उन्होंने फ्रंटलाइन महामारी ब्लैकियों को संबोधित करते कहा, ‘‘हे मेरे देश के ब्लैक मार्केट के बेताज बादशाहो, बड़ी प्रसन्नता की बात है कि आप के इम्तिहान की घड़ी एक बार फिर आ रही है. इम्तिहान की घड़ी बोले तो आप को सूचित करते हुए मु झे प्रसन्नता हो रही है कि महामारी की तीसरी लहर अब कभी भी आ सकती है. ‘‘इस बात को सरकार ने स्वीकार कर लिया है.

सरकार कह रही है कि अगर जनता ने सावधानी नहीं बरती तो तीसरी लहर का आना लाजिमी है. और हम तो जानते ही हैं कि हमारे देश में सबकुछ बरता जाता रहा है पर सावधानी हरगिज नहीं. देरसवेर जनता का लापरवाही से प्रेम ही हमारे बाजार की चकाचौंध बढ़ाता रहा है. ‘‘मित्रो, आप ने अपना अदम्य साहस बताते हुए महामारी की दूसरी लहर में जिस तरह से महामारी से संबंधित सामग्री खुद को जोखिम में डाल मनमाने दामों पर जनता को हर हाल में मुहैया करवा उस की जान बचाई वह काबिलेतारीफ है. इस के लिए आप सब को साधुवाद. आप सब की जितनी प्रशंसा की जाए, कम है. आप ने दिनरात एक कर अपनी जान की परवा किए बगैर छिपछिप कर जिस तरह लोगों की जान बचाई वह मानवता के इतिहास में सदैव याद रहेगा. ‘‘अब जो खास बात मैं आप से शेयर करना चाहता हूं, जिस के लिए यह गूगल मीट रखी गई है, वह यह कि तीसरी लहर को ले कर हमें अभी से पूरे दिमाग से तैयारी शुरू करनी होगी.

महामारी की हर बीमारी से संबंधित हर सामान अपने गोदामों में अभी से जल्दीजल्दी इकट्ठा करना शुरू करना होगा ताकि समय आने पर पिछली दफा की तरह जनता को इधरउधर न भागना पड़े. ‘‘मित्रों, पिछली लहर में आप की अहर्निश सेवाओं के चलते पता नहीं कितने जीवों की जान बची. पैसे का क्या, पैसा तो हाथपैर का मैल होता है. शास्त्रों में भी कहा गया है कि धन गया तो कुछ नहीं गया. चरित्र गया तो भी कुछ नहीं गया. पर स्वास्थ्य गया तो सबकुछ गया. मरने के बाद धनदौलत किस काम की.’’ ‘‘पर सर, जैसा कि मीडिया पर खबरें बराबर आ रही हैं कि अब की सरकार ने तीसरी लहर से निबटने की तैयारी अभी से युद्धस्तर पर शुरू कर दी है, तो ऐसे में अब की लगता है कि…’’ एक ब्लैक मार्केटिए ने तीसरी लहर में ब्लैक मार्केटिंग पर शंका जाहिर की. तो संघ के प्रैसिडैंट सीना चौड़ा कर उसे सम झाते बोले, ‘‘मित्र, सरकार की तैयारियां हम ने आज तक बहुत देखीं. यह उस की कोई नई तैयारी नहीं है. हर बार आपदा आने से पहले सरकार बड़ेबड़े दावे करती रही है. पर जब सच्च में कोई आपदा आती है तो उस के सारे इंतजाम हाथी के मुंह का जीरा हो जाते हैं. इसलिए सरकार की तैयारियों के साथ ही साथ बैकअप के रूप में हमें सरकार की तैयारियों से अधिक अपनी तैयारी रखनी होगी.

बाद में जो कुछ काम आएगा तो बस, बैकअप ही काम आएगा. हम केवल और केवल सरकार की तैयारियों के भरोसे तो देश की जनता को छोड़ नहीं सकते न? इस देश के संभ्रांत जीव होने के नाते देश के प्रति कुछ हमारा भी दायित्व बनता है कि नहीं? ‘‘मित्रों, असल में जब भी कोई आपदा आती है, सरकार की सारी तैयारियां कोने में दुबक कर छिप जाती हैं. इसलिए सरकार के बयानों पर नहीं, अपने को ब्लैक मार्केट के कामों में कंसंट्रेट करो. तीसरी लहर में सख्त जरूरत पड़ने वाली चीजों से अपने गोदाम अभी से भरने शुरू कर दो ताकि ऐन मौके पर जनता को बंद होते फेफड़े लिए इधरउधर न भागना पड़े, इधरउधर भागते हुए परेशान न होना पड़े. ‘‘प्राइवेट अस्पतालों को अभी से एडवांस दे वहां के सारे बैड बुक करवा दो ताकि तीसरी लहर के वक्त जनता को जो कहीं खाली बैड न मिलें तो हम जनता को वे बैड दिलवा नरसेवा नारायणसेवा कर सकें. स्वस्थ होती तो वह दिनरात पेट पीठ पर लिए दौड़ती रहती है पर बीमारी की हालत में जनता को कतई इधरउधर न दौड़ना पड़े. अब के ब्लैक में बेचे सामान की होम डिलीवरी भी की जा सकती है.

‘‘हमें पता है कि अपने देश की जनता लापरवाहियों की खिलाड़ी है, मस्ती की सवारी है. सावधान होते हुए भी वह लापरवाही हर हाल में करेगी ही. क्योंकि, लापरवाही उस की रगरग में बसी है. इधर उस की लापरवाही बढ़ी, तो दूसरी ओर अपने धंधे की तूती बोली.’’ ‘‘पर सर, लगता है अब के औक्सीजन का कारोबार ब्लैक में कतई नहीं होने वाला,’’ चोरबाजारी के धंधे में नयानया कदम रखने वाले ने उन से यह कहा तो उन्होंने उसी से ठहाका लगाते पूछा, ‘‘क्यों?’’ ‘‘सर, क्योंकि सरकार ने जगहजगह औक्सीजन प्लांट जो प्लांट कर दिए हैं.’’ ‘‘तो क्या हो गया. सरकार ने तो देश में स्वर्ग तक प्लांट कर दिया है. पर कहीं स्वर्ग दिखा तुम्हें? नहीं न. जिंदा जी तो छोडि़ए, स्वर्ग तो मरने के बाद भी यहां के जीवों को नहीं दिखता, मिलना तो दूर की बात है. ‘‘सरकार को होने वाली हर किस्म की सप्लाई के बारे में हम से अधिक और कौन जान सकता है? क्या पता तब वे चलें या न चलें.

चलेंगे भी तो सिस्टम में बैठे हमारे बंदे उन्हें दूसरे ही दिन जेबभराई के चक्कर में खराब कर देंगे. उन्हें पता है कि वे चलेंगे तो वे अपनी जेबें कैसे भरेंगे? ब्लैक का कारोबार ऐसे ही सरकार के प्रति निष्ठा रखने वालों की छत्रछाया में आज तक पनपता रहा है और फ्यूचर में भी यों ही अबाध पनपता रहेगा. ‘‘आज तक अपने ही सप्लायर भाइयों द्वारा जबजब सरकार को दवा से ले कर हवा तक सप्लाई करने की बारी आई है तो वह दवा और हवा कुछ और ही सप्लाई होती रही है. इसलिए, मैं आप सब से एक बार फिर अपील करता हूं कि इस से पहले कि तीसरी लहर आए, हमें अपने को सरकार से अधिक जनता की रक्षा के लिए अभी से पूरी तरह तैयार रखना होगा. जय हिंद, जय ब्लैक मार्केट.’’

वायरल होने के चुंगल में फंसी जर्नलिज्म

इंटरनैट पर धड़ल्ले से शेयर किए जाने वाले वीडियो को वायरल वीडियो कहा जाता है. आज पत्रकारिता इन्हीं वायरल वीडियोज के इर्दगिर्द सिमट कर रह गई है. सोशल मीडिया के आम चलन से पहले तक ये नेताओं, ऐक्टरऐक्ट्रैसेस के लीक्ड एमएमएस या स्टिंग औपरेशन जैसे होते थे जिन पर खूब होहल्ला मचा करता था और पत्रकार टूट पड़ते थे लेकिन समय बदलने के साथसाथ यह छिछला होता गया.

आज जर्नलिज्म तकरीबन पूरी तरह वायरल वीडियो के सहारे टिकी हुई है. सोशल मीडिया पर जो वायरल है वही खबर है वरना दूसरी कोई चीज खबर नहीं. कई बार तो बड़ेबड़े पत्रकार इस कि चपेट में ऐसे फंसे दिखते हैं, वे वीडियो जर्नलिज्म के दौरान अजीब सी बात इसलिए कर रहे होते हैं ताकि उन की कोई वीडियो वायरल हो जाए. यानी, जो वायरल है उस पर खबर बनाओ और खबर बनाते हुए उसे इतनी चटपटी बनाओ कि वह सनसनी मचाने के साथ खूब वायरल भी हो जाए.

किस तरह की पत्रकारिता होती है यहां

सोशल मीडिया पर ऐसे स्वघोषित जर्नलिस्ट भरे पड़े हैं जिन की ‘दुकान’ वायरल खबरों से चल रही है. वो किसी से कुछ ऐसा पूछते और बोलते हैं कि इंटरव्यू देने वाला उन से अटपटी बात करे. वह ऐसीऐसी बेवकूफीभरी बातें करे जिस का न सिर हो न पैर. जर्नलिज्म का एथिक इन पत्रकारों के लिए कुछ माने नहीं रखता, ये बड़ेबड़े थंबनेल में वही बातें लिख देते हैं जिन का कोई मतलब नहीं.

जैसे एक प्रतिष्ठित पत्रकार रोड पर घूमते हुए एक लड़के का इंटरव्यू करता है तो उस से उस की पढ़ाई पर सवाल करता है. लड़का बीए प्रोग्राम को ठीक से न कह कर प्लेन बीए कह देता है. फिर क्या, यही हंसीठट्टे वाली बात बन जाती है और यूट्यूब पर थंबनेल में प्लेन बीए ही चल पड़ता है. इसी तरह दूसरी वीडियो में पत्रकार के सामने भीड़ में कोई लड़का हाथ से तंबाकू रगड़ रहा होता है तो उसी को पूरी स्टोरी की हैडलाइन बना दी जाती है.

मुद्दे व्यूज, लाइक्स और शेयर की तरफ कैसे शिफ्ट हो गए हैं, यह इसी बात से समझ आ जाता है कि किसी चैनल के वीकली चल रहे प्रोग्राम में कोई युवक आता है और जुए में 96 लाख रुपए गवांने की झूठी कहानी सुनाता है जिस पर सभी सोशल मीडिया पत्रकार टूट पड़ते हैं. जर्नलिस्ट का काम फैक्टफाइंडिंग, रिसर्च और सही तथ्यों को खोज निकालने का होता है मगर इस की जगह उसे पोडकास्ट पर बुलाया जाता है, उस के लंबेलंबे इंटरव्यूज किए जाते हैं. इसे वायरल जर्नलिज्म क्यों न कहा जाए?

उस खबर को देखने का मकसद क्या है जिस का आम लोगों के जीवन पर कोई असर नहीं है. खबरों में रहना और खबर बन जाना दो अलगअलग चीजें होती हैं. खबर घटना की बनती है, उस पर निष्पक्ष नजरिया एडिटोरियल पौलिसी का होता है, मगर पत्रकार उन ख़बरों को लपकते हैं जिन में वे खुद बने रह सकें इस का उदाहरण है दिल्ली में चल रहे इंडिया टुडे के साहित्य आज तक में इन्फ्लुएंसर्स को बुलाया जाना. ये इन्फ्लुएंसर्स अपनी साहित्यिकी के चलते वहां नहीं पहुंचे बल्कि इसलिए पहुंचे कि उन के फौलोअर्स ढेरों हैं, उन से सोशल मीडिया पर वायरल होने लायक कुछ मसाला मिल सके ताकि लोग बेस्वाद हो चुके इस इवैंट को देखें.

इसी तरह का एक नाम डिजिटल न्यूज चैनल लल्लनटौप का भी है. इस के रिपोर्टर सामने वाले से कुछ अटपटी बातें करते हैं. उन से बातें निकलवाते हैं, कोई गुटका खा रहा है तो वीडियो बना रहें हैं. कुछ अजीब और अटपटा हो रहा हो तो उसे वे क्लिप में ले लेते हैं. जब वो वीडियो अपलोड होती है तो वे उसे वायरल करते हैं. उन का ध्यान खबर पर नहीं बल्कि वायरल होने वाले मसाले पर ज्यादा होता है. यही कारण भी है कि वे इसी कोशिश में लगे रहते हैं कि कैसे न कैसे कुछ मीम लायक क्लिप कट जाए.

कुछ समय पहले यूट्यूब चैनल ‘मैं मीडिया’ के संस्थापक तंज़ील आसिफ ने गिरती पत्रकारिता के स्तर और वायरल पत्रिकारिता पर अपना दुख फेसबुक पर साझा किया. उन्होंने लिखा, “जब भी मैं छोटे, स्वतंत्र मीडिया संगठनों की चुनौतियों की बात करता हूं, लोग सब से पहले यही सवाल पूछते हैं, आप लोग यूट्यूब से अच्छा कमा नहीं लेते? इस का जवाब सीधा है- नहीं. मुझे ‘मैं मीडिया’ को चलाते हुए 6 साल हो गए हैं, मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि केवल यूट्यूब की कमाई के भरोसे अच्छी पत्रकारिता नहीं चल सकती.

“शायद आप को कुछ उदाहरण याद आ रहे होंगे जैसे कि आप का पसंदीदा पत्रकार, जो मोनोलौग या वौक्स पौप कर रहा है, लेकिन यह अच्छी पत्रकारिता नहीं है. कोई और, जो लगातार आप की राजनीतिक धारणाओं की पुष्टि कर रहा है, तो वह भी अच्छी पत्रकारिता नहीं है.

“सचाई यह है कि पिछले 12 महीनों में हम ने यूट्यूब से केवल $1,975 कमाए यानी औसतन लगभग $165 (14,000 रुपए से भी कम) प्रतिमाह.

“इतना कम क्यों? क्योंकि कोई एडवरटाइजर अच्छी पत्रकारिता को पसंद नहीं करता. कुपोषण पर ग्राउंड रिपोर्ट बनाइए. कोई एडवरटाइजर नहीं मिलेगा. हिरासत में मौत पर रिपोर्ट कीजिए, तो ऐसे कंटैंट को विज्ञापन देने लायक नहीं समझा जाता. आधुनिक गुलामी पर रिपोर्ट करेंगे, तो विज्ञापन भूल जाइए. किसी बलात्कार के मामले पर ग्राउंड रिपोर्ट बनाइए, तो आप को कुछ भी नहीं मिलेगा. इत्यादिइत्यादि. दरअसल, कोई एडवरटाइजर ऐसे कंटैंट पर विज्ञापन चलाना नहीं चाहता जो विचलित करने वाला हो.”

वे आगे लिखते हैं, “अगर सही पत्रकारिता को समर्थन नहीं दिया जाएगा तो पत्रकारिता खत्म हो जाएगी, Good journalism will disappear.”

दरअसल यह कारण भी है कि कई पत्रकार इसी कशमकश में हैं. मामला एडवरटाइजमैंट से जुड़ा है, यूट्यूब पर काम कर रहे पत्रकार जब तक वायरल होने वाली ख़बरें नहीं देंगे तब तक विज्ञापन नहीं मिलेगा. जितने ज्यादा व्यूज होंगे उतना ही विज्ञापन मिलेगा. बात वायरल होने की है. इसी चलते पत्रकार अपने स्टूडियो में ऐसे लोगों को बैठा रहे हैं और पोडकास्ट कर रहे हैं जिन का दर्शकों के हित से लेनादेना भले हो या न, पर ऊलजलूल गपोड़बाजी खूब चलती है. ये ख़बरें सिर्फ समय बरबाद करती हैं.

खबर की तह में जाना अब लगभग ख़त्म हो चुका है. जो ख़बरें आती हैं वो सिर्फ सोशल मीडिया भरोसे होती हैं जिस चलते पत्रकार भी उसी पर निर्भर रहते हैं, उसी अनुसार ख़बरें चुनते हैं और ख़बरें दिखाते हैं. जैसा, वायरल हुए हिमांशु के केस में हुआ. लगभग हर मीडिया हाउस ने हिमांशु की कहानी को प्रमुखता से पब्लिश किया. उस ने बताया कि वह औनलाइन गेम की लत का शिकार हुआ था और लाखों रुपए डूबो दिया. पर बाद में पता चला यह लड़का झूठ बोल रहा था.

यहां कोई संपादन नहीं है

हर संस्था में काम करने का एक तरीका होता है, एक पौलिसी होती है, एक एडिटोरियलशिप होती है, प्रूफरीडिंग होती है, टौपिक डिस्कस होता है उस पर रिसर्च होती है और लिखे जाने के बाद वह कई हाथों से गुजरता है और उस की हर गलती को डैस्क पर पकड़ लिया जाता है. फिर वह न्यूज़ डिलीवर की जाती है. लेकिन सोशल मीडिया में कोई न्यूज़ नहीं होती है, एडिटर नहीं होता है, प्रूफ रीडर भी नहीं होते हैं. यहां एक कैमरा होता है और आप ने एक स्किप्ट लिख ली है. और वह स्किप्ट भी होने वाली घटनाओं व न्यूज़ के आधार पर तैयार नहीं की जाती बल्कि यह सोच कर तैयार की जाती है कि क्या वायरल हो सकता है.

इस तरह की पत्रकारिता में सोचने और समझने की गुंजाइश थोड़ी कम होती है. पूरा फोकस व्यूज पर होता है.

दिक्कत यह है कि इस तरह के जर्नलिज्म में सही और गलत की कोई परिभाषा नहीं है. किसी भी न्यूज़ को प्रेजेंट करने का एक सिस्टम होता है लेकिन यहां कोई सिस्टम नहीं है, कोई भी कुछ भी बोल रहा है. वो सही भी बोल सकता है और खराब भी बोल सकता है. कोई ग्राउंड रिसर्च नहीं, किसी से बात नहीं, इन का कोई सैटअप नहीं. इन्होंने सबकुछ देखने वाले के विवेक पर छोड़ दिया है. इसलिए सामने वाले को वायरल वीडियो पत्रकारिता पर ट्रस्ट इतनी जल्दी होता नहीं है. अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप कैसा कंटैंट देखना पसंद करते हैं और जो दिखाया जा रहा है उसे किस तरह लेते हैं.

औनलाइन गेम्स का विकराल खतरा

भारतीय जनता पार्टी के नेता विजय गोयल ने देश में फैलते औनलाइन गेम के खिलाफ हुंकार भरी और कहा है, इसे वे बंद करा कर दम लेंगे. उन की बात आने वाले समय में सही भी हो सकती है क्योंकि उन्होंने एक नंबर की लौटरी पर प्रतिबंध लगवा कर एक सफलता तो हासिल कर ली है.

आज हम औनलाइन गेमिंग के पक्षविपक्ष की समीक्षा करते हुए उस के नुकसान की जानकारी प्रस्तुत कर रहे हैं. दरअसल, औनलाइन गेम वे गेम हैं जो इंटरनैट के माध्यम से खेले जाते हैं. इन में निम्न प्रकार के गेम शामिल हैं-

वीडियो गेम : कंप्यूटर या गेमिंग कंसोल पर खेले जाने वाले गेम, जैसे कि फोर्टनाइट, पबजी आदि.

औनलाइन कैसिनो : जुआ और सट्टेबाजी के लिए औनलाइन प्लेटफौर्म.

मोबाइल गेम : मोबाइल फोन पर खेले जाने वाले गेम, जैसे कि कैंडी क्रश, पोकेमोन गो.

मल्टीप्लेयर गेम : एक से अधिक खिलाड़ियों द्वारा औनलाइन खेले जाने वाले गेम, जैसे कि कौल औफ ड्यूटी, माइनक्राफ्ट.

वर्चुअल रिऐलिटी (वीआर) गेम : वीआर तकनीक का उपयोग कर के खेले जाने वाले गेम, जो खिलाड़ियों को वास्तविक दुनिया जैसे अनुभव प्रदान कराते हैं.

औनलाइन गेम खेलने के लिए आप को इंटरनैट कनैक्शन और एक डिवाइस (जैसे कंप्यूटर, गेमिंग कंसोल, मोबाइल फोन आदि) की आवश्यकता पड़ती है. औनलाइन गेम खेलने से लोग दुनियाभर के लोगों के साथ जुड़ जाते हैं, नई दोस्तियां, संबंध बन जाते हैं.

दरअसल, औनलाइन गेम्स दुनियाभर में खेले जाते हैं और इन की लोकप्रियता बढ़ती ही जा रही है. भारत में यह अपने उफान पर है और इसे रोकना आवश्यक है. यहां कुछ देश और क्षेत्र बता रहे हैं जहां औनलाइन गेम्स लोकप्रिय हैं-

चीन में औनलाइन गेमिंग उद्योग बहुत विशाल है और वहां कई प्रसिद्ध गेम्स, जैसे हौनर औफ किंग्स और पबजी मोबाइल पर खेले जाते हैं.

अमेरिका में औनलाइन गेमिंग बहुत लोकप्रिय है और वहां कई प्रसिद्ध गेम्स जैसे कि फोर्टनाइट और लीग औफ लेजेंड्स खेले जाते हैं.

दक्षिण कोरिया में औनलाइन गेमिंग एक बड़ा उद्योग है और वहां कई प्रसिद्ध गेम्स, जैसे लीग औफ लेजेंड्स और डोटा 2 खेले जाते हैं.

इसी तरह हमारे देश में औनलाइन गेमिंग तेजी से बढ़ता ही जा रहा है और यहां कई प्रसिद्ध गेम्स, जैसे पबजी मोबाइल और क्लैश औफ क्लैन्स खेले जाते हैं.

यूरोप में औनलाइन गेमिंग बहुत लोकप्रिय है और वहां कई प्रसिद्ध गेम्स, जैसे फीफा और कौल औफ ड्यूटी खेले जाते हैं.

जापान में औनलाइन गेमिंग एक बड़ा उद्योग है और वहां कई प्रसिद्ध गेम्स, जैसे फाइनल फैंटसी और ड्रैगन क्वेस्ट खेले जाते हैं.

हर सिक्के के दो पहलू

जैसे कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं औनलाइन गेम के भी सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव हैं. इस से बहुत लोग बरबाद हो चुके हैं तो कुछ लोग आबाद भी हुए हैं.

औनलाइन गेम्स के नुकसानों के बारे में जानना बहुत जरूरी है. औनलाइन गेम्स के नुकसान भी हो रहे हैं-

औनलाइन गेम्स के अत्यधिक उपयोग से मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जैसे तनाव, चिंता, और अवसाद.

औनलाइन गेम्स की अत्यधिक उपयोग से नींद की कमी हो सकती है, जिस से शरीर और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है.

इस से सामाजिक अलगाव हो सकता है, जिस से दोस्तों और परिवार के साथ संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है.

आर्थिक नुकसान: औनलाइन गेम्स में पैसे लगाने से आर्थिक नुकसान हो सकता है, जैसे गेम्स में पैसे खर्च करना या धोखाधड़ी का शिकार होना.

शारीरिक स्वास्थ्य: औनलाइन गेम्स के अत्यधिक उपयोग से शारीरिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जैसे वजन बढ़ना, आंखों की समस्याएं और अन्य शारीरिक समस्याएं.

अध्ययन और काम पर प्रभाव: औनलाइन गेम्स के अत्यधिक उपयोग से अध्ययन और काम पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जैसे ग्रेड्स में कमी या काम में कम उत्पादकता.

व्यसन: औनलाइन गेम्स के अत्यधिक उपयोग से व्यसन हो सकता है, जिस से व्यक्ति को गेम्स छोड़ने में मुश्किल होती है.

धोखाधड़ी: औनलाइन गेम्स में धोखाधड़ी का खतरा रहता है, जैसे गेम्स में पैसे लगाने वाले स्कैम या व्यक्तिगत जानकारियां चोरी होना. इस तरह औनलाइन गेम्स के अत्यधिक उपयोग से आदतें खराब हो सकती हैं, जैसे जुए की आदत या अन्य नकारात्मक आदतें. औनलाइन गेम्स के अत्यधिक उपयोग से बरबादी होती है, जिस से जीवन के आवश्यक काम और गतिविधियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.

इन नुकसानों को ध्यान में रखते हुए औनलाइन गेम्स का उपयोग सीमित और जिम्मेदारी से करना चाहिए. विजय गोयल द्वारा शुरू किया गया औनलाइन गेमिंग के खिलाफ अभियान सफल हो सकता है.

इस के लिए सब से आवश्यक है

पहला- जन जागरूकता अभियान के माध्यम से लोगों को औनलाइन गेमिंग के नुकसानों के बारे में जागरूक करना आवश्यक है.

दूसरा- अभियान को सरकारी समर्थन मिलने से औनलाइन गेमिंग पर नियंत्रण करने में मदद मिल सकती है.

तीसरा- सामाजिक संगठनों का समर्थन मिलने से अभियान को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है.

चौथा- मीडिया कवरेज से अभियान को अधिक पहुंच और प्रभाव मिल सकता है.

पांचवां- युवाओं को अभियान में शामिल करने से औनलाइन गेमिंग के प्रति उन की सोच बदलने में मदद मिल सकती है.

ऐसे में औनलाइन गेमिंग उद्योग इस अभियान का विरोध कर सकता है. जिस से अभियान की प्रगति धीमी हो सकती है. सरकारी नीतियों की कमी से औनलाइन गेमिंग पर नियंत्रण करना मुश्किल हो सकता है. वहीं, लोगों की औनलाइन गेमिंग की आदत बदलना भी मुश्किल हो सकता है.

अभियान की सफलता के लिए विजय गोयल और उन की टीम को इन चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा. मगर ईमानदारी से विरोध और जागृति अभियान चलाया जाए तो हमारा देश दुनिया में मिसाल बन सकता है. औनलाइन गेमिंग एक दोधारी तलवार है, जिस के अच्छे और बुरे दोनों पहलू हैं. लेकिन यह मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं, आर्थिक नुकसान और सामाजिक अलगाव पैदा करता है. वहीं जानकार बताते हैं कि औनलाइन गेमिंग के अत्यधिक उपयोग से मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो जाती हैं.

युवाओं को इस के नुकसानों के बारे में जागरूक होना चाहिए और इस का उपयोग अपने जीवन को सुधारने के लिए करना चाहिए, न कि इस के अधीन होने के लिए.

कंजरवेटिव इन्फ्लुएंसर्स के सहारे ट्रंप की नैया पार

“मैं फटाफट उन लोगों को धन्यवाद देना चाहता हूं जिन्होंने ट्रंप को जिताने में मदद की. मैं धन्यवाद करना चाहूंगा ‘नेल्क बौयज’, थीओ वोन, बुस्सिन एंड लास्ट बट नौट द लीस्ट ‘जोए रोगन’ का.”

ये वाक्य 6 नवंबर को डोनाल्ड ट्रंप की फ्लोरिडा के वेस्ट पाम बीच के कन्वेंशन सैंटर में विक्ट्री जश्न पर स्टेज में शामिल डाना वाइट के थे. 1969 में मानचैस्टर में जन्मे डाना वाइट अमेरिकी बिसनैसमैन हैं और मौजूदा समय में अल्टीमेट फाइटिंग चैंपियनशिप (यूएफसी) के सीईओ व प्रैसिडैंट हैं.

ग्रे कोट और ब्लैक शर्ट में डाना विक्ट्री साइन दिखाते हुए स्टेज पर जब बोल रहे थे तो पीछे डोनाल्ड ट्रंप और उन की वाइफ मेलीनिया ट्रम्प मुसकरा रहे थे. जाहिर है, ट्रंप और डाना वाइट के बीच गहरे संबंध चुनाव के मद्देनजर नहीं थे.

ट्रम्प और व्हाइट की खासी हिस्ट्री रही है. यह कहना गलत न होगा कि राजनीति से दूर डाना वाइट ट्रंप के वोकल सपोर्टरों में से एक रहे हैं. इन की दोस्ती की शुरुआत 2001 में शुरू हुई थी. उस समय आयरिश-अमेरिकी कालेज ड्रौपआउट डाना वाइट मुक्केबाजी के टीचर थे. वे मिक्स्ड मार्शल आर्ट (एमएमए) चैंपियनशिप की शुरुआत कर रहे थे.

एमएमए उस दौरान प्रतिबंधों की रडार पर आ रहा था. उस समय के अमेरिकी सीनेटर जौन मैक्केन ने इसे ‘ह्युमन कौकफाइटिंग’ यानी मानव की मुरगा लड़ाई करार दिया और यूएफसी पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक कैंपेन को लीड किया था. यह वह समय था जब ट्रंप ने उन्हें बुलाया और कहा, ‘मेरे यहां आओ, यहां अपना प्रोग्राम करो, हम तुम्हें ट्रंप ताजमहल में जगह देंगे.’

डाना वाइट के अनुसार, अटलांटिक सिटी में अब बंद हो चुके कैसीनो और होटल ने यूएफसी 31 और यूएफसी 32 एमएमए इवैंट की मेजबानी की थी, जिस में ट्रंप इन लड़ाइयों को देखने आए, आखिरी तक रुके रहे. इन दोनों घटनाओं ने इस खेल को हाइप दी और आज यह दुनिया में सब से बड़ा एमएमए खेल बन गया है.

6 तारीख को आए अमेरिकी चुनाव परिणाम में डोनाल्ड ट्रंप कमला हैरिस से 226 के मुकाबले 312 सीटों से जीत गए. यह जीत बड़ी है, खासकर उस समय जब पूरी दुनिया में लिबरल और कंजरवेटिव के बीच मुकाबले में कंजरवेटिव बीस ही साबित हो रहे हैं और इस कड़ी में ट्रंप का जीतना पूरी दुनिया पर भारी पड़ने वाला है.

बहरहाल, जब डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति बनने की खुशी जाहिर कर रहे थे तब उस मंच से डाना वाइट ने जिन लोगों को धन्यवाद किया वे अमेरिका के वे दक्षिणपंथी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स थे जो हाल में काफी विवादित और पौपुलर हो चुके हैं. इन में से एक इन्फ्लुएंसर जोए रोगन थे जो डाना वाइट के करीबी दोस्त हैं और यूट्यूब पर लंबीलंबी पोडकास्ट करते हैं. इन पोडकास्ट में वाइस प्रैसिडैंट और रिपब्लिकन पार्टी के नेता जे डी वेंस जैसे चर्चित लोग भी शामिल हुए जिन का पौलिटिकल व्यू एबौर्शन, सेम सैक्स मैरिज का विरोध करना है, हालांकि एक समय था जब जे डी वेंस ट्रंप के आलोचक थे और उन्होंने ट्रंप की तुलना हिटलर से कर दी थी.

यही नहीं, एलन मस्क भी इन की चौखट पर अपना माथा टेक कर आ चुके हैं. इस के अलावा ग्रैहम हंकोक्क, जो मशहूर ब्रिटिश औथर हैं और सूडोसाइंटिफिक थ्योरी को प्रोमोट करते हैं, जिन का काम धार्मिक गपों का गुब्बारा बना कर जैसेतैसे हिस्ट्री से जोड़ देना है, वे भी पोडकास्ट में आए हैं. इन की किताबों को लें, ‘फिंगरप्रिंट्स औफ द गौड्स’, ‘अमेरिका बिफोर : की अ अर्थ लौस्ट सिविलाइजेशन’, ‘सुपरनैचुरल’ आदि सभी फालतू की थ्योरियों को जोड़ कर कुछ मिस्ट्री क्रिएट कर के लिखी गई हैं. इस तरह के औथर भारत में भी उग आए हैं जो ढेरों आधेअधूरे तथ्यों को जोड़ कर कुतर्कों को तर्क बनाने की कोशिश में लगे रहते हैं. जोए रोगन कितने महत्त्वपूर्ण इन्फ्लुएंसर साबित हुए, इस का अंदाजा इस से लगाया जा सकता है कि इन के पोडकास्ट में डोनाल्ड ट्रंप भी चुनावीप्रचार के लिए जा चुके हैं.

जोए रोगन ने एक्स पर, राइटविंग फौक्स चैनल के उस वीडियो को पोस्ट किया जिस में ट्रंप की जीत की अनाउंसमैंट की गई थी, उस में लिखा, “होली शिट, सोचो तो उन के पास बेयोन्से, एमिनेम, लेब्रोन, टेलर स्विफ्ट और कई अन्य चर्चित लोग थे और वे तब भी हार गए.”

डाना वाइट ने जिन इन्फ्लुएंसर्स के नाम लिए उन में से एक एडिन रोज भी था. एडिन रोज ने ट्रंप का खुला समर्थन किया. एडिन के यूट्यूब पर तकरीबन 45 लाख सब्सक्राइबर्स हैं. वहीं इंस्टाग्राम पर उस के लगभग 70 लाख फौलोअर्स हैं. तकरीबन 3 महीने पहले एडिन रोज के चैनल ‘एडिन लाइव’ में डोनाल्ड ट्रंप गए. यह एक तरह का चुनावी प्रचार शो था, जहां एडिन ने ‘मागा’ की कैप पहनी और लगभग 1 घंटा 17 मिनट का लाइव शो किया. एडिन रोज ने ट्रंप को रौलेक्स गिफ्ट किया. एडिन एंड्रयू टेट जैसे मिसोजनिस्ट इन्फ्लुएंसर्स के साथ लाइव स्ट्रीम भी करता है. एंड्रयू टेट अमेरिका का महिलाविरोधी, नस्लवादी इन्फ्लुएंसर है, जिस पर हर कभी मुक़दमे चलते रहते हैं.

जानकारों का मानना है कि ट्रंप ने सोशल मीडिया का उस तरह इस्तेमाल नहीं किया जैसे कमला हैरिस ने किया. रिपोर्ट्स के अनुसार ट्रंप ने कमला के मुकाबले सोशल मीडिया पर कम पैसे खर्च किए थे. जहां कमला हैरिस ने लगभग 103 करोड़ रुपए खर्च किए, वहीं ट्रंप ने लगभग 5-6 करोड़ रुपए ही खर्च किए. लेकिन इस में दिलचस्प बात यह थी कि जहां कमला ने गूगल एड में पैसे खर्च किए वहीं ट्रंप ने इन्फ्लुएंसर्स का सहारा लिया.

हालांकि ट्रंप का पूरा चुनावप्रचार एक्स के मालिक एलन मस्क के हाथों में था, जिन पर आरोप लगे कि उन्होंने ट्विटर का डाटा कहीं न कहीं ट्रंप के फेवर में इस्तेमाल किया. उन पोस्टों की रीच कम की गई जो कमला हैरिस के समर्थन में थीं और उन की बढ़ाई गई जो ट्रंप के समर्थन में थीं, यहां तक कि कई उन पोस्टों को चलने दिया जो कमला या डैमोक्रेट्स के खिलाफ नफरती थ्योरी से भरी रहती थीं. यह भी नोट किया जाए कि ट्रंप समर्थक पोस्टों को ज्यादा से ज्यादा पौपअप किया गया ताकि वे शुरुआत में दिख जाएं. यानी, एक तरह से लगभग 80 ख़राब रुपए का ट्विटर पूरा का पूरा ट्रंप के हाथों में था.

रिपब्लिकन से प्रभावित इन्फ्लुएंसर डेविड लेदरवुड, जिन का एक्स अकाउंट ‘ब्रोक बैक पैट्रियट’ के नाम से है, ने रविवार को एक्स पर पोस्ट किया, “देशभक्तो, मैं अंतिम चुनाव के लिए ट्रंप अभियान के साथ साझेदारी कर रहा हूं और हमें आप की मदद की जरूरत है.” “पोर्टल यह सुनिश्चित करने में मदद करता है कि आप का मतदाता पंजीकरण सक्रिय है ताकि आप के वोट काउंट किए जा सकें.”

वहीं, इन्फ्लुएंसर मौर्गन ब्लेयर मैकमाइकल ने चुनाव के दौरान एक्स पर पोस्ट किया, “टीम ट्रंप को आप की जरूरत है, हम जीतेंगे, अपना वोट अवश्य दें.”

एक्स ने इन तरह के लोगों को खूब पौपअप किया. यही कारण भी है कि ट्रंप समर्थक इन्फ्लुएंसर्स और सरोगेट सोशल मीडिया पर ऐसे कंटैंट लगातार ला रहे थे, उन्हें ज्यादा रीच भी मिल रही थी, जो ट्रंप के समर्थकों या वोटरों को 2024 के राष्ट्रपति चुनाव के अंतिम दिनों में वोट देने के लिए मोटीवेट कर रहे थे, मगर दूसरी तरफ कमला हैरिस की टीम ऐसा नहीं कर पाई.

इन में से दसियों क्रिएटर्स और समर्थक ट्रंप मागा कैंपेन साइट पर लिंक पोस्ट कर रहे थे जहां मतदाता अपने पंजीकरण की स्थिति की जांच कर सकते थे, अपने मतदान स्थान ढूंढ़ सकते थे और अपने मतपत्र कहां डाल सकते हैं उस की जानकारी ले सकते थे.

सीजे पियर्सन एक कंजरवेटिव क्रिएटर है, जिस के एक्स पर 5 लाख से ज्यादा फौलोअर्स हैं, ने निजी न्यूज़ चैनल में कहा कि वह चुनाव की रात के लिए पाम बीच, फ्लोरिडा में रहेगा, जो ट्रंप का मार ए लागो रिजौर्ट है. कई ट्रंप समर्थक क्रिएटर्स ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर चुनाव परिणामों की लाइव स्ट्रीम होस्ट करने या अपने दोस्तों द्वारा होस्ट की गई अन्य स्ट्रीम में शामिल हुए.

पूरे कैंपेन के दौरान ट्रंप समर्थक एक टीम की तरह काम करते रहे. अक्तूबर में जे डी वेंस और टिम वाल्ज़ के बीच उपराष्ट्रपति की बहस के दौरान इन्फ्लुएंसर ने रिपब्लिकन के समर्थन में माहौल बनाने का काम किया. पियर्सन, जैक पोसोबिएक, एशले सेंट क्लेयर और रोगन ओ हैंडली सहित कई फेमस सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स अपने फोन और कंप्यूटर के साथ फिलाडेल्फिया कौन्फ्रैंस हौल में बैठ कर डिबेट करते रहे.

इन सब में सब से बड़े इन्फ्लुएंसर एलन मस्क ने इस पूरे चुनाव में ट्रंप के फेवर में बड़ी भूमिका निभाई. बताया जाता है कि पौलिटिकल एक्शन कमेटी (पीएसी), जिसे मस्क ने बैक किया था, ने ट्रंप समर्थन में फंड रेजिंग से ले कर, डोरटूडोर कैंपेन कर के, मीम्स और पोस्टर्स से ले कर नारों को लोगों तक पहुंचाया. यह इतना इफैक्टिव था कि जो स्टेट स्विंग स्टेट कहे जाते थे और डैमोक्रेट्स को इतनी दिक्कत उन में नहीं होनी थी, वहां भी ट्रंप भारी पड़े.

अमेरिका के इस चुनाव को इन्फ्लुएंसर्स के प्रभाव से भी देखना जरूरी है. इन का असर चाहे डायरैक्ट न हो मगर ये इन्फ्लुएंसर्स माहौल बनाने का काम तो जरूर करते हैं. यही काम भारत में भी होने लगा है. राजनेता अब लोगों के पास अपनी बातों को न ले जा कर इन्फ्लुएंसर्स के पास ले कर जा रहे हैं. काम पर वोट नहीं मांगे जा रहे बल्कि डर दिखा कर, माहौल बना कर वोट मांगे जा रहे हैं, जिस के लिए नेता अधकचरी जानकारी वाले इन इन्फ्लुएंसर्स के पास जाते हैं और ये अपनी अज्ञानता का सड़ा गोबर जहांतहां फैलाते रहते हैं.

क्या पहली या दूसरी शादी छिपाई जा सकती है

भोपाल की पूजा थापक की दुखद आत्महत्या के मामले में एक दिलचस्प मोड़ 17 नवंबर को उस वक्त सामने आ गया जब उस के ससुर जीवनलाल दुबे ने यह दावा किया कि निखिल से शादी के पहले भी वह एक नायब तहसीलदार जयेश प्रताप सिंह परमार से इंदौर के आर्य समाज मंदिर में साल 2019 में शादी कर चुकी थी. जिस के दस्तावेजी सुबूत मेरे बेटे निखिल के हाथ लग गए थे. इसी कारण से दोनों में विवाद रहने लगा था. इस से पूजा गिल्ट फील करने लगी थी जिस के चलते उस ने आत्महत्या कर ली और अब परेशान मेरे परिवार वालों को किया जा रहा है. यह सब पूजा के बहनोई अवधेश शर्मा के दबाव में किया जा रहा है जो छतरपुर के कलैक्टर हैं.

खूबसूरत, हंसमुख और इंटैलीजैंट पूजा ने बीती 9 जुलाई को भोपाल के साकेत नगर स्थित अपने घर में फांसी का फंदा लगा कर आत्महत्या कर ली थी जिस का आरोप उस के पति निखिल दुबे और सास आशा दुबे पर लगा था. तब ये दोनों फरार हो गए थे. बाद में 5 अगस्त को पुलिस ने निखिल को दिल्ली से गिरफ्तार कर लिया था जो कथित तौर पर कालेज के जमाने की अपनी एक गर्लफ्रैंड के यहां फरारी काट रहा था. आशा अभी तक फरार है. निखिल सूचना एवं प्रोद्योगिकी विभाग में वैज्ञानिक है जबकि पूजा जनसंपर्क विभाग में असिस्टैंट डायरैक्टर और श्रम मंत्री प्रह्लाद पटेल की ओएसडी भी थी.

इन दोनों की शादी साल 2022 में हुई थी. शादी के कुछ दिनों बाद से ही दोनों में कलह होने लगी थी लेकिन नवंबर 2023 उन्हें एक बेटा भी हुआ था जिस की कस्टडी का विवाद भी अदालत पहुंचा था और अदालत के आदेश पर उसे नानानानी को सौंप दिया गया था.

पूजा की आत्महत्या के बाद खासा बवाल मध्य प्रदेश में मचा था और तरहतरह की चर्चाएं भी हुई थीं. दोनों के परिजनों ने एकदूसरे पर तरहतरह के इलजाम मढ़े थे, मसलन पूजा के घर वालों की तरफ से ये कि निखिल अव्वल दर्जे का शराबी था, पूजा के साथ आएदिन मारपीट करता था और अपनी मां आशा सहित दहेज के लिए उसे प्रताड़ित भी करता रहता था.

निखिल के घर वालों ने इन आरोपों का खंडन करते पूजा को ही दोषी ठहराया था. ये बातें कतई नई नहीं थीं लेकिन हैरान कर देने वाला आरोप निखिल के पिता ने पूजा के पहले से ही शादीशुदा होने का लगाया तो हर कोई चौंका क्योंकि मामला अब एकता कपूर छाप पारिवारिक टीवी सीरियलों सरीखा हो गया था जिस में दूसरीतीसरी शादी और उस का छिपाना कहानी की जान होती है. सोशल मीडिया पर पूजा और जयेश परमार की शादी का सर्टिफिकेट भी वायरल हुआ.

यह सर्टिफिकेट कितना सच्चा, कितना झूठा है, इन पंक्तियों के लिखे जाने तक इस की सत्यता की जांच नहीं हुई थी. लेकिन अगर यह सच्चा है तो जाहिर है पूजा अपनी पहली शादी की बात छिपाने में कामयाब नहीं हो पाई थी. ऐसा अकसर दूसरी शादी करने वाले कर पाते हैं या नहीं, यह उन की समझ और चालाकी पर निर्भर करता है. पर अहम सवाल यह कि लोग ऐसा करते ही क्यों हैं.

इस सवाल के दर्जनों जवाबों में से एक महत्त्वपूर्ण यह है कि अगर दूसरी शादी करने के लिए तलाक का इंतजार किया जाए तो इस प्रक्रिया में सालों गुजर जाते हैं. तब तक शादी की उम्र ढलने के साथसाथ जज्बात और जोश भी खत्म होने लगते हैं. यह बिलाशक बड़ी क़ानूनी खामी है कि तलाक के मुकदमे सालोंसाल चलते रहते हैं और पति या पत्नी वक्त रहते दूसरी शादी नहीं कर पाते, क्योंकि पहले या पहली से तलाक लिए बगैर दूसरी शादी कानूनन अपराध भारतीय दंड संहिता की धारा 495 के तहत है जिस में 10 साल तक की सजा और जुर्माना दोनों का प्रावधान है.

अगर पूजा ने भी ऐसा किया था तो क्या गलत किया था और इस का जिम्मेदार कौन है वह खुद या वह कानून जो झटपट तलाक की डिक्री नहीं देता, बल्कि सालोंसाल लगा देता है. अगर पूजा भी तलाक के लिए अदालत जाती तो 4 साल तो मामला फैमिली कोर्ट में ही अटका होता और अगले 10-12 साल उस के सुलझने के आसार भी न दिख रहे होते. अगर जीवनलाल दुबे का आरोप और पूजा-जयेश की शादी का प्रमाणपत्र सच्चा है तो लगता ऐसा भी है कि पूजा और जयेश परस्पर सहमति से अलग हो गए होंगे.

मुमकिन यह भी है कि दोनों ने हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 13 (बी) के तहत परस्पर सहमति से ही तलाक भी ले लिया हो लेकिन यह बात पूजा निखिल को बता नहीं पाई. उसे डर सचाई जानने पर निखिल के इनकार का रहा होगा, वजह, तलाकशुदा से शादी करने में लोग हिचकिचाते हैं.

एक और संभावना इस बात की भी है कि हकीकत पता चलने पर तिलमिलाया निखिल सकते में आ गया हो और पूजा को ही ब्लैकमेल व प्रताड़ित करने लगा हो जिस ने काफी नकदी और अचल संपत्ति ससुराल वालों को दी थी. पर निखिल इस के बाद भी धोखे को हजम नहीं कर पा रहा हो लेकिन बेटे का मोह और उस के भविष्य की चिंता के साथसाथ अपने परिवार की प्रतिष्ठा का खयाल भी उसे इस सच को सार्वजनिक करने से रोक रहा हो. सच कुछ भी हो लेकिन उस से निखिल के अपराध की गंभीरता कम नहीं हो जाती बशर्ते यह अदालत में साबित हो पाए कि वह वाकई पत्नी को प्रताड़ित करता था.

यानी, दूसरे जीवनसाथी के सामने पहली शादी की बात छिपाई जा सके तो सबकुछ ठीकठाक चल सकता है. ठीक इसी तरह दूसरी शादी की बात अगर छिपाई जा सके तो भी वैवाहिक जीवन सफलतापूर्वक चल सकता है. ऐसा बड़े पैमाने पर हो भी रहा है. जिन के तलाक के मुकदमे सालों से अदालतों में चल रहे हैं वे लिवइन में धड़ल्ले से रह रहे हैं. भोपाल के ही एक 37 वर्षीय कारोबारी अनिमेश (बदला नाम) की मानें तो वह पौश इलाके में अपनी पार्टनर के साथ रहते पहली पत्नी से तलाक का इंतजार कर रहे हैं जिस के होते ही वे अपनी पार्टनर से शादी कर लेंगे. यह बात उन्होंने उसे बता भी दी है. हां, अनिमेश कहते हैं तब तक हम बच्चे के बारे में नहीं सोच रहे क्योंकि तब मामला कौंप्लीकेटेड हो सकता है वह भी उस सूरत में जब तलाक की डिक्री न मिले.

अनिमेश कुछ गलत नहीं कर रहा है क्योंकि वह बिना शादी किए एक आत्मनिर्भर और नौकरीपेशा महिला के साथ उस की मरजी से रह रहा है जो कानूनन अपराध नहीं है. और पत्नी को इस का पता चल जाए तो वह कोर्ट में इसे चुनौती नहीं दे सकती और अगर देती भी है तो कुछ साबित नहीं कर सकती.

पहले जीवनसाथी के रहते दूसरी शादी का चलन बावजूद कानूनों के होने के बाद भी हमेशा रहा है. फर्क यह है कि पहले पहला जीवनसाथी, जो अकसर पत्नी होती थी, कई वजहों के चलते कोई कार्रवाई नहीं करती थी लेकिन अब करने लगी हैं तो उस का तोड़ भी लिवइन की शक्ल में निकल आया है.

जब तोड़ निकल ही आया तो अदालतों को इस से भी तकलीफ होने लगी है. 12 मार्च, 2024 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक फैसले में यह कहा है कि कोई भी विवाहित महिला पति से तलाक लिए बिना लिवइन में नहीं रह सकती. हुआ यह था कि लिवइन में रह रही महिला अदालत गई थी सुरक्षा की मांग ले कर, लेकिन एवज में अदालत ने उसे नैतिकता की घुट्टी पिला दी. बकौल इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस रेनू अग्रवाल, बगैर तलाक लिए विवाहिता लिवइन में नहीं रह सकती. ऐसे रिश्तों को मान्यता देने से अराजकता बढ़ेगी और देश का सामाजिक तानाबाना नष्ट हो जाएगा. अदालत ने याची कासगंज की पूजा कुमारी पर 2 हजार रुपए का जुर्माना भी ठोक दिया.

निचली से ले कर ऊपरी अदालतें तक पूजापाठी हैं जो नहीं चाहतीं कि तलाक की तादाद बढ़े क्योंकि यह उन की भी नजर में एक धार्मिक संस्कार है. पूजा कुमारी सुरक्षा मांगने गई थी, अपने रिश्ते के जायजनाजायज या नैतिकअनैतिक होने का सर्टिफिकेट या राय उस ने नहीं मांगी थी जो कि मुफ्त में अदालत ने दे दी. दो टूक और टू द पौइंट बात करने की हिमायत करने वाली अदालत सुरक्षा देने में असमर्थता जाहिर कर सकती थी. लेकिन उसे यह रास नहीं आया कि बिना तलाक लिए कोई महिला वयस्क महिला अपनी मरजी से सुखचैन से रहे (यानी अविवाहिता लिवइन में रहे तो यह अराजकता नहीं और न ही इस से देश का सामाजिक तानाबाना नष्ट होता). पूछना तो अदालत को यह चाहिए था कि याची के तलाक के मुकदमे में देर क्यों हो रही है जिस के चलते वह कटी पतंग सी हालत में जी रही है. और अगर लिवइन में रह भी रही है तो कौन से कानून की कौन सी धारा के तहत अदालत उसे न रहने के लिए बाध्य कर सकती है. यह न किसी ने पूछा और न ही बताया.

यह ठीक है कि लिवइन के अपने अलग झमेले हैं और वह एक आदर्श वैवाहिक विकल्प हर किसी के लिए है. उन लोगों के लिए भी जो शादी नहीं करना चाहते और उन लोगों के लिए भी जो तलाक के मुकदमे के दौरान कोई सहारा चाहते हैं और वैवाहिक जीवन सरीखे मानसिक व शारीरिक सुख भोगना चाहते हैं. उन्हें बलात रोकने का प्रावधान किसी कानून में नहीं है तो डर किस बात का. इत्मीनान से छिपाइए पहली या दूसरी शादी की बात और इत्मीनान से रहिए. धर्म, समाज और परिवार के बेजा दबाव और घुटन में पूजा कुमारियां क्यों रहें.

हमसफर: क्या रेहान अपनी पत्नी की जान बचा पाया?

रेहान ने तेल टैंकर की साइड वाली सीढ़ी से झुकते हुए अपने 2 साल के मासूम बेटे रेहम को गट्ठर की तरह खींच कर टैंकर की छत पर रख दिया, जिसे उस की बीवी रुखसार ने उठा रखा था. फिर रुखसार को बाजुओं में उठा कर सीढ़ी तक पहुंचाया, जो 7 महीने के पेट से थी.

रुखसार ने सीढ़ी के डंडे को कस कर पकड़ा और ऊपर चढ़ने लगी कि अचानक उस का पैर फिसल गया. गनीमत यह रही कि उस के दोनों हाथ सीढ़ी के डंडों पर मजबूती से जमे हुए थे और रेहान वहां से हटा नहीं था, वरना वह सीधे जमीन पर आ गिरती. फिर भी पेट पर कुछ चोट आ ही गई.

लौकडाउन में जब से कुछ ढील मिली थी, तब से मजदूरों का पलायन जोरों पर था. रेहान और उस के बीवीबच्चे दिल्ली के सीलमपुर इलाके में सिलाई का काम करते थे. कोरोना महामारी के चलते पिछले 2 महीने से काम बंद था. एक महीना अपनी कमाई से गुजरबसर हुआ, तो दूसरे महीने का खर्च फैक्टरी मालिक ने उठाया. उस के बाद फैक्टरी मालिक ने भी हाथ खड़े कर दिए.

रमजान का महीना चल रहा था और ईद का त्योहार सिर पर था, इसलिए घर जाना जरूरी भी था. कोई रास्ता न देख कर उन्होंने अपना बोरियाबिस्तर समेटा और गांव के लिए निकल पड़े. रास्ते में 4-5 मजदूर और साथ हो लिए.

वे सब सीलमपुर इलाके से पैदल चल कर नोएडा पहुंचे. वहां से आगे जाने के लिए कोई सवारी नहीं थी. मजदूरों ने एक तेल टैंकर के ड्राइवर से गुजारिश की, तो वह ले जाने को तैयार हुआ.

ड्राइवर ने बताया कि वह बरेली तक जा रहा है, वहां तक उन्हें छोड़ देगा. फिर कुल 8 मजदूर टैंकर की छत पर बैठे और खड़ी धूप से नजरें मिलाते हुए अपनी मंजिल की तरफ चल पड़े.

मुरादाबाद के एक चौराहे पर सत्तू पीने के लिए ड्राइवर ने टैंकर रोका. रेहान, उस की बीवी रुखसार और बच्चे रेहम को छोड़ कर बाकी सभी मजदूर सत्तू पीने के लिए उतर गए. वे दोनों मियांबीवी मन मसोस कर टैंकर की छत पर ही बैठे रहे.

तभी वहां मनोज की साइकिल रुकते देख रुखसार का चेहरा खिल उठा. उस ने चहकते हुए कहा, ‘‘अरे, वह देखो मनोज भैया.’’

रेहान ने मनोज को देख कर बस की छत से हांक लगाते हुए कहा, ‘‘ओ मनोज भाई. अरे, कहां रह गए थे. 2 दिन से अभी यहीं लटके हैं…’’

मनोज भी वहीं काम करता था, जहां रेहान करता था. लौकडाउन लगते ही मनोज के सेठ ने उस का हिसाब कर दिया, जिस में मनोज को 5,000 रुपए मिले. उन रुपए में से 3,500 रुपए की उस ने साइकिल खरीदी और इन लोगों से 2 दिन पहले ही अपने घर के लिए 1,100 किलोमीटर के लंबे सफर पर निकल पड़ा था.

मनोज ने गमछे से मुंह पोंछते हुए रेहान के सवाल का मुसकराते हुए जवाब दिया, ‘‘हां भाई. यह कोई हवाईजहाज थोड़ी है, साइकिल है साइकिल, जिसे खून जला कर चलाना पड़ता है. उतरो नीचे, सत्तू पीया जाए.’’

रेहान बोला, ‘‘न भाई, रहने दो, तुम पीयो, हम लोग ऐसे ही ठीक हैं.’’

मनोज रेहान की मजबूरी समझता था. उस ने कहा, ‘‘अरे, क्या खाक ठीक है. उतरो नीचे.’’

रेहान बोला, ‘‘पर, रेहम और रुखसार…’’

‘‘उन के लिए ऊपर ही पहुंचा देते हैं. पहले तुम तो नीचे उतरो.’’

रेहान टैंकर की छत से नीचे उतर आया.

मनोज ने सत्तू वाले से 4 गिलास सत्तू बनाने के लिए कहा.

रेहान बोला, ‘‘अरे, रेहम पूरा गिलास थोड़ी ही पी पाएगा. 3 गिलास ही रहने दो. वह अपनी अम्मी में से पी लेगा.’’

सत्तू वाले ने 2 गिलास उन लोगों की  तरफ बढ़ाए.

मनोज बोला, ‘‘चलो, ऊपर रुखसार को बढ़ाओ. रेहम के गिलास में से जो बचेगा, वह उस की अम्मी पी लेगी. बेचारी, एक तो बच्चे को दूध पिलाती है, ऊपर से पेट में बच्चा भी पल रहा है. कायदे से तो अकेले उस के लिए  ही 3 गिलास चाहिए, लेकिन क्या  किया जाए…

बहरहाल, सत्तू पीने के बाद मनोज बोला, ‘‘इस हालत में रुखसार को ले जाना और वह भी टैंकर की छत पर बैठा कर, बिलकुल ठीक नहीं.’’

रेहान बोला, ‘‘क्या करें भाई, दिल्ली में भी तो मरना ही था. खानेपीने के लाले पड़ रहे थे. अगर ईद का त्योहार न होता, तो कुछ दिन और रुक कर देखते. अब निकल गए हैं, आगे जो रब की मरजी.’’

अभी इन दोनों में बातचीत चल ही रही थी कि पुलिस वाले वहां आ धमके. 10-12 मजदूरों को इकट्ठा देखते ही उन की पुलिसिया ट्रेनिंग उफान मारने लगी और वे लगे ताबड़तोड़ लाठियां भांजने.

फिर क्या था, सब से पहले मनोज साइकिल पर सवार हो कर भाग खड़ा हुआ, फिर टैंकर के ड्राइवरखलासी भी भागे और छत पर बैठने वाले मुसाफिर भी.

आगेआगे मनोज की साइकिल और पीछे से घबराया हुआ टैंकर का ड्राइवर. उसे कुछ सुझाई नहीं दिया. मनोज रोड के दाएं से बाएं की तरफ मुड़ा ही था कि टैंकर उस पर चढ़ बैठा.

टैंकर की छत से रुखसार और रेहान ने मनोज को सड़क पर गिर कर तड़पते हुए देख लिया और चिल्लाने लगे. लेकिन ड्राइवर कहां रुकने वाला था. वह अपनी जान बचा कर भागता चला गया.

ये दोनों शौहरबीवी भी कहां मानने वाले थे, वे तब तक चिल्लाते रहे, जब तक ड्राइवर ने टैंकर रोक कर उन्हें उतार नहीं दिया.

फिर यह कुछ कहसुन पाते, इस के पहले ही टैंकर नौ दो ग्यारह हो गया.

रेहान और रुखसार अपने बच्चे और सामान से भरे 2 बैग समेत हादसे की जगह की तरफ दौड़ने लगे. तभी एक पुलिस की गाड़ी उन के पास आ कर रुकी और माजरा पूछा. फिर उन्हें अपनी गाड़ी में बैठाया और हादसे की तरफ चल पड़े.

जब तक वे लोग वहां पहुंचे, तब तक मनोज मर चुका था. रुखसार रोने लगी. उस की चीखें सुन कर अगलबगल में खड़े लोग भी आंखें पोंछने लगे. ऐसा लग रहा था कि मरने वाला मनोज उस का सगा भाई है.

फिर शुरू हुई लाश को ठिकाने लगाने की लंबी प्रक्रिया. अनजान जगह और अनजान लोग. साथ में मासूम बच्चा और भूखप्यास की जबरदस्त शिद्दत. लाश को कोई हाथ लगाने के लिए तैयार नहीं.

फिर भी दोनों शौहरबीवी ने हार नहीं मानी और पुलिस वालों, आनेजाने वालों और गांव वालों से चंदा और मदद ले कर मनोज का अंतिम संस्कार कर दोस्ती और इनसानियत का हक अदा किया.

अब इन के पैसे और हिम्मत दोनों ही जवाब दे चुके थे. इस बीच रुखसार अपने पेट में उठ रहे मीठेमीठे दर्द को दबाती रही. अब वहां से घर जाने की समस्या और भी गंभीर लगने लगी. चंद पैसे पास बचे थे, उन से बेटे के लिए दूध और बिसकुट खरीदा और रोते हुए रेहम को चुप कराया.

रात हो चुकी थी. गांव वालों ने कोरोना के डर से उन्हें पनाह देने से इनकार कर दिया. कहां जाएं? किस से मदद मांगें? आखिर थकहार कर वे बेचारे एक पेड़ के नीचे सो गए.

अगली सुबह एक और मुसीबत साथ ले कर आई. रुखसार दर्द से कराहने लगी. सलवार खून से सन गई. पैरों में खड़े होने की ताकत नहीं रही. उसे लगने लगा कि पेट में पल रहे बच्चे को नुकसान हो चुका है.

रुखसार की बोली लड़खड़ाने लगी. रेहान समझ रहा था कि रुखसार कहना कुछ चाह रही है और जबान से कुछ और निकल रहा है.

बड़ी मुश्किल से किसी तरह सरकारी अस्पताल पहुंचे. वहां डाक्टरों ने बाहरी के नाम पर उन्हें टरकाना चाहा, लेकिन रेहान उन के पैरों पर गिर कर रहम की भीख मांगने लगा. डाक्टरों ने सैकड़ों तरह के सवालजवाब और जांचपड़ताल के बाद रुखसार को कोरोना पौजिटिव ठहराया.

रुखसार की हालत बिगड़ती जा रही थी. डाक्टरों ने 4 यूनिट खून का इंतजाम करने के लिए कहा. रेहान समझ गया कि कुदरत की यही आखिरी आजमाइश है, जिस में वे खरा नहीं उतर सकता. उस ने डाक्टरों से कहा कि वे उस के बदन से खून का एकएक कतरा निचोड़ लें और उस की रुखसार को बचा लें. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

रुखसार ने दाएं हाथ में शौहर का हाथ थामा और बाएं हाथ में रेहम का. वह रेहम की मासूम सूरत को एकटक निहारने लगी. ऐसा लग रहा था कि वह अपने लख्ते जिगर को जीभर कर निगाहों में बसा लेना चाहती थी.

उधर रेहान अपनी हमसफर को जीभर के देख लेना चाहता था जो बीच सफर में ही उस का साथ छोड़ कर जा रही थी. रेहम अभी भी अपनी मां के जिस्म में दूध तलाश कर रहा था.

रेहान रुखसार की पथराई आंखों की तपिश बरदाश्त नहीं कर सका और गश खा कर वहीं गिर पड़ा. लेकिन इन सब बातों से बेखबर रेहम अपनी मां का दूध हुमड़हुमड़ कर खींच रहा था.

पतिया सास: आखिर क्यों पति कपिल से परेशान थी उसकी पत्नी?

कविता ने टाइम देखा. घड़ी को 6 बजाते देख चौंक गई. कपिल औफिस से आते ही होंगे. किट्टी पार्टी तो खत्म हो गई थी, पर सब अभी भी गप्पें मार रही थीं. किसी को घर जाने की जल्दी नहीं थी.

कविता ने अपना पर्स संभालते हुए कहा, ‘‘मैं चलती हूं, 6 बज गए हैं.’’

नीरा ने आंखें तरेरीं, ‘‘तुझे क्या जल्दी है? मियाबीवी अकेले हो. मुझे देखो, अभी जाऊंगी तो सास का मुंह बना होगा, यह सोच कर अपना यह आनंद तो नहीं छोड़ सकती न?’’

अंजलि ने भी कहा, ‘‘और क्या… कविता, तुझे क्या जल्दी है?  हम कौन सा रोजरोज मिलते हैं?’’

‘‘हां, पर कपिल आने वाले होंगे.’’

‘‘तो क्या हुआ? पति है, सास नहीं. आराम से बैठ, चलते हैं अभी.’’

कविता बैठ तो गई पर ध्यान कपिल और घर की तरफ ही था. दोपहर वह टीवी पर पुरानी मूवी देखने बैठ गई थी. सारा काम पड़ा रह गया था. घर बिखरा सा था. उस के कपड़े भी बैडरूम में फैले थे. ड्राइंगरूम भी अव्यवस्थित था.

वह तो 4 बजे तैयार हो कर पार्टी के लिए निकल आई थी. उसे अपनी सहेलियों के साथ मजा तो आ रहा था, पर घर की अव्यवस्था उसे चैन नहीं लेने दे रही थी.

वह बैठ नहीं पाई. उठ गई. बोली, ‘‘चलती हूं यार, घर पर थोड़ा काम है.’’

‘‘हां, तो जा कर देख लेना, कौन सी तेरी सास है घर पर, आराम से कर लेना,’’

सीमा झुंझलाई, ‘‘ऐसे डर रही है जैसे सास हो घर पर.’’

कविता मुसकराती हुई सब को बाय कह कर निकल आई. घर कुछ ही दूरी पर था. सोचा कि आज शाम की सैर भी नहीं हो पाई, हैवी खाया है, थोड़ा पैदल चलती हूं, चलना भी हो जाएगा. फिर वह थोड़े तेज कदमों से घर की तरफ बढ़ गई. सहेलियों की बात याद कर मन ही मन मुसकरा दी कि कह रही थीं कि सास थोड़े ही है घर पर… उन्हें क्या बताऊं चचिया सास, ददिया सास तो सब ने सुनी होंगी, पता नहीं पतिया सास किसी ने सुनी भी है या नहीं.

‘पति या सास’ पर वह सड़क पर अकेली हंस दी. जब उस का विवाह हुआ, सब सहेलियों ने ईर्ष्या करते हुए कहा था, ‘‘वाह कविता क्या पति पाया है. न सास न ससुर, अकेला पति मिला है. कोई देवरननद का चक्कर नहीं. तू तो बहुत ठाट से जीएगी.’’

कविता को भी यही लगा था. खुद पर इतराती कपिल से विवाह के बाद वह दिल्ली से मुंबई आ गई थी. कपिल ने अकेले जीवन जीया है, वह उसे इतना प्यार देगी कि वे अपना सारा अकेलापन भूल जाएंगे. बस, वह होगी, कपिल होंगे, क्या लाइफ होगी.

कपिल जब 3 साल के थे तभी उन के मातापिता का देहांत हो गया था. कपिल को उन के मामामामी ने ही दिल्ली में पालापोसा था, नौकरी मिलते ही कपिल मुंबई आ गए थे.

खूब रंगीन सपने संजोए कविता ने घरगृहस्थी संभाली तो 1 महीने में ही उसे महसूस हो गया कि कपिल को हर बात, हर चीज अपने हिसाब से करने की आदत है. हमेशा अकेले ही सब मैनेज करने वाले कपिल को 1-1 चीज अपनी जगह साफसुथरी और व्यवस्थित चाहिए होती थी. घर में जरा भी अव्यवस्था देख कर कर चिढ़ जाते थे.

कविता को प्यार बहुत करते थे पर बातबात में उन की टोकाटाकी से कविता को समझ आ गया था कि सासससुर भले ही नहीं हैं पर उस के जीवन में कपिल ही एक सास की भूमिका अदा करेंगे और उस ने अपने मन में कपिल को नाम दे दिया था पतिया सास.

कपिल जब कभी टूअर पर जाते तो कविता को अकेलापन तो महसूस होता पर सच में ऐसा ही लगता है जैसे अब घर में उसे बातबात पर कोई टोकेगा नहीं. वह अंदाजा लगाती है, सहेलियों को सास के कहीं जाने पर ऐसा ही लगता होगा. वह फिर जहां चाहे सामान रखती है, जब चाहे काम करती है. ऐसा नहीं कि वह स्वयं अव्यवस्थित इनसान है पर घर घर है कोई होटल तो नहीं. इनसान को सुविधा हो, आराम हो, चैन हो, यह क्या जरा सी चीज भी घर में इधरउधर न हो. शाम को डोरबैल बजते ही उसे फौरन नजर डालनी पड़ती है कि कुछ बिखरा तो नहीं है. पर कपिल को पता नहीं कैसे कहीं धूल या अव्यवस्था दिख ही जाती. फिर कभी चुप भी तो नहीं रहते. कुछ न कुछ बोल ही देते हैं.

यहां तक कि जब किचन में भी आते हैं तो कविता को यही लगता है कि साक्षात सासूमां आ गई हैं, ‘‘अरे यह डब्बा यहां क्यों रखती हो? फ्रिज इतना क्यों भरा है? बोतलें खाली क्यों हैं? मेड ने गैस स्टोव ठीक से साफ नहीं किया क्या? उसे बोलो कभी टाइल्स पर भी हाथ लगा ले.’’

कई बार कविता कपिल को छेड़ते हुए कह भी देती, ‘‘तुम्हें पता है तुम टू इन वन हो.’’

वे पूछते हैं, ‘‘क्यों?’’

‘‘तुम में मेरी सास भी छिपी है. जो सिर्फ मुझे दिखती है.’’

इस बात पर कपिल झेंपते हुए खुले दिल से हंसते तो वह भी कुछ नहीं कह पाती. सालों पहले उस ने सोच लिया था कि इस पतिया सास को जवाब नहीं देगी. लड़ाईझगड़ा उस की फितरत में नहीं था. जानती थी टोकाटाकी होगी. ठीक है, होने दो, क्या जाता है, एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल देती हूं. अब तो विवाह को 20 साल हो गए हैं. एक बेटी है, सुरभि. सुरभि के साथ मिल कर वह अकसर इस पतिया सास को छेड़ती रहती है. 2 ही तो रास्ते हैं या तो वह भी बहू बन कर इस पतिया सास से लड़ती रहे या फिर रातदिन होने वाली टोकाटाकी की तरफ ध्यान ही न दे जैसाकि वह सचमुच सास होने पर करती.

सुरभि भी क्लास से आती होगी. यह सोचतेसोचते वह अपनी बिल्डिंग तक पहुंची ही थी कि देखा कपिल भी कार से उतर रहे थे. कविता को देख कर मुसकराए. कविता भी मुसकराई और घर जा कर होने वाले वार्त्तालाप का अंदाजा लगाया, ‘‘अरे ये कपड़े क्यों फैले हैं? क्या करती हो तुम? 10 मिनट का काम था… यह सुरभि का चार्जर अभी तक यहीं रखा है, वगैरहवगैरह.’’

कपिल के साथ ही वह लिफ्ट से ऊपर आई. घर का दरवाजा खोल ही रही थी कि कपिल ने कहा, ‘‘कविता, कल मेड से दरवाजा साफ करवा लेना, काफी धूल जमी है दरवाजे पर.’’

‘‘अच्छा,’’ कह कर कविता ने मन ही मन कहा कि आ गई पतिया सास, कविता, सावधान.

किटी पार्टी औरतों का सब से बड़ा अपमान

किटी पार्टी का पूरा चलन औरतों ने अपने आप को बहकाने के लिए किया है कि हम फ्री नहीं हैं. आएदिन हमारी किटी है हम तो बहुत बिजी हैं. ठीक उस तरह जैसे कि धर्म के ठेकेदार महिलाओं को धकेलते हैं कि तुम पूजापाठ करो और बिजी रहो उसी तरह पति, पड़ोसी, दूसरे घरवाले टाइम पास करने के नाम पर किटी की तरफ धकेलते हैं.

पहले जब 5-8 बच्चे होते थे तब भी औरतों को हर समय बिजी रखने के लिए त्यौहारों की एक लंबी फेहरिस्त बनाई हुई थी ताकि औरतों को सोचनेसमझने और पढ़नेलिखने का समय तक न मिले. अब पढ़ीलिखी पर नौकरी नहीं कर रही औरतों को किट्टियां पकड़ा दी गई हैं कि वे कुछ सोचेसमझे नहीं.

यह धर्म और समाज की साजिश है और औरतें खुद इस के जाल में फंस कर इतराती फिरतीं हैं कि देखो मेरा जाल कितना सुंदर है, रेशम का है, इस में खानापीना है, दोस्त सहेलियां हैं.

‘शर्माजी की नमकीन’ फिल्म तो देखी ही होगी. वहीं ऋषि कपूर की आखिरी फिल्म जो किटी पार्टी पर ही केंद्रित है. इन किट्टियों में हाई प्रोफाइल महिलाएं इकठा होती हैं और खूब जम कर अपने पति, पड़ोसन और रिश्तेदारों के बारे में खुल कर गौसिप करती नजर आती हैं. इन किटी पार्टीज में लेडीज सिर्फ यही बातें यानि चुगलियां ही नहीं करतीं बल्कि अपने बैडरूम के सैक्स तक की बातें डिस्कस कर लेती हैं. कुछ को अफसोस है कि उन का पति अच्छा नहीं है, कुछ को अफ़सोस है उन्होंने शादी के बाद अपना कैरिअर छोड़ दिया और भी न जाने क्याक्या इन पार्टीज में होता है.

ये सभी महिलाएं अपना टाइम पास करने के लिए आती हैं और अपना समय और पैसा दोनों ही बरबाद कर के चली जाती हैं. वही समय जिसे वह किसी प्रोडक्टिव काम में लगा सकती थीं.

किटी पार्टी क्या है?

किटी पार्टी आमतौर पर कालोनी की महिलाएं मिल कर करती हैं और अधिकतर शादीशुदा महिलाएं ग्रुप बना कर इस पार्टी का आयोजन करती हैं. कई महिलाएं हफ्ते में एक बार यह पार्टी किया करती हैं, जबकि कुछ महिलाएं महीने में एक दिन इस पार्टी का आयोजन करती हैं.

कैसे काम करती है किटी?

कुछ महिलाएं मिल कर किटी बनती हैं. उस में उन की लिस्ट होती हैं जो एक ही कालोनी की हो सकती हैं और बाहर की भी होती हैं. आमतौर पर किटी में 12 महिलाएं होती हैं, ताकि एक साल का चक्र पूरा किया जा सके. अब मान लीजिए कि सभी को 2000 रुपये का योगदान करना होता है. इस तरह 24000 रुपये का फंड तैयार होगा. ये फंड आपसी सहमति या ड्रा द्वारा किसी एक महिला को दे दिया जाता है यानि की महिलाओं की किटी पार्टी में एक बजट कमेटी (BC) बनाई जाती है. इस में कुछ महिलाएं निश्चित राशि दे कर एक फंड तैयार करती हैं, और इस फंड को कमेटी की किसी एक महिला को दे दिया जाता है. हर महीने अलगअलग महिला को ये फंड दिया जाता है और इस तरह ये चक्र पूरा हो जाता है.

किटी की ही एक महिला पूरी किटी का कार्येभार संभालती है, पैसों का हिसाबकिताब भी उसी के पास होता है. वह पेमेंट का पूरा हिसाब रखती है. उस के पास डायरी होती है जिस में वह नोट करती रहती है कि किस की किटी हो चुकी है और किन की होनी बाकी है. किस का कितना हिसाब रह गया है ये भी वही देखती है. दूसरे शब्दों में कहें तो ये किटी की अकाउंटेंट होती है. यह गुलाम महिला दूसरी गुलामों की नेतागिरी कर के खूब खुश रहती है

यहां महिलाएं खुल कर मस्ती करती हैं. किटी पार्टी में हौट टौपिक, अफेयर के बारे में इन्हें बातचीत करने से परहेज नहीं है. इस के लिए शहर के कई नामी होटलों में टेबल भी बुक होते हैं. इस के अलावा वीकेंड में आउटिंग करने के लिए भी जाती हैं.

पहले घर में ही होती थी पार्टी

कुछ समय पहले तक किटी पार्टी महिलाएं अपने घरों में ही कर लिया करती थीं. हर महीने किटी से जुड़ी किसी भी एक महिला के घर को वैन्यू बना लिया जाता था. इस महिला की जिम्मेदारी होती थी कि वो अपनी सभी सहेलियों के लिए खाने और गेम का इंतजाम करेगी.

अब होटलों और रेस्टोरेंट हैं वैन्यू

किटी पार्टी ने अपना दायरा बड़ा किया और अब होटलों और रेस्टोरेंट में किटी पार्टी प्लान की जाती हैं. इस के लिए बाकायदा बुकिंग की जाती है. थीम तैयार की जाती है. इस थीम के आधार पर ही सजावट होती है. महिलाओं को भी इसी थीम के आधार पर तैयार हो कर आना होता है. इस के लिए इवेंट मैनेजर्स की मदद ली जाती है. अब अरेबियन थीम, फियर फैक्टर थीम, इलेक्शन थीम जैसे नए आइडियाज किटी पार्टी का हिस्सा होते हैं. महिलाओं के बीच फेस्टिवल्स से जुड़ी थीम होती हैं. इन किटी पार्टियों में गेस्ट स्पीकर्स और टैरो कार्ड रीडर्स भी बुलाए जाते हैं. दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे शहरों में होने वाली किटी पार्टीज में स्टैंड अप कौमेडियंस तक को न्योता दिया जाता है.

किटी से ताश खेलने की लत लग

किटी ताश का एक खेल होता है जिसे पैसे के साथ या बिना पैसे के खेला जाता है. आमतौर पर शहरी पाश्चात्य संस्कृति की महिलाओं के बीच इस तरह की पार्टी का आयोजन किया जाता है जिस में वे सब महिलाएं एकत्रित हो कर समय बिताने के लिए ताश के साथ चाय नाश्ता और कुछ गपशप करती हैं. ये ताश के हर तरह के गेम खेलती हैं जो धीरेधीरे पैसे लगाने में तब्दील हो जाता है और कुछ महिलाएं इस में पैसा हारती हैं तो कुछ जीतती भी हैं. वो बात अलग है की बहुत बड़ी रकम तो इन में नहीं लगाई जाती लेकिन इस से आदत लग जाती है जो कसीनों में जा कर ही पूरी होती है.

हर थीम के लिए कपड़ों पर हज़ारों रुपए खर्च

किटी में जाने वाली महिलाएं आएदिन पतियों की नाक में दम किए रखती हैं कि अब अगले महीने की किटी के लिए मुझे शौपिंग करनी है. और उस लाइफस्टाइल को मैनेज करने के लिए वो पतियों की जेब ढेली करती हैं. दरअसल, अब किटी पार्टी की थीम के आधार पर महिलाएं अपने डिजायनर्स से अपने कपड़े तैयार करवाती हैं. गुजराती, स्कूल, रेट्रो, बौलीवुड, कलर, मुगल-ए-आजम आदि थीम्स रखी जाती हैं. कुछ डिजायनर्स अब किटी पार्टियों के लिए किराए पर भी कपड़े उपलब्ध कराने लगे हैं. पति चूंचूं तो करते हैं पर रोकते नहीं क्योंकि वे खुद साजिश से खुश रहते हैं.

पार्टी के लिए पैसा अलग से

पहले जब घरों में किटी होती थी तब जिस की किटी निकलती थी उसे ही खानपान का इंतजाम करना पड़ता था लेकिन अब किटी होटल्स में होने लगी हैं. जहां मोटेमोटे बिल आते हैं इसलिए इन पार्टीज का बिल अलग से देना पड़ता है जोकि कई हजार तक आता है. 2 हजार की किटी के लिए होने वाली पार्टी में हिस्सा लेने के लिए 2 से 5 हजार के बीच में हर महीने अलग खर्च हो जाता है. यह पैसा असल में औरतों की अपनी बचत होती अगर किटी में बरबाद नहीं करा जाता. यह पैसा उन को आत्मबल देता जबकि किटी से वे सिर्फ कुंठा गुस्सा और थकान लातीं हैं. पति उन्हें कमजोर देखना चाहते हैं और समाज और पंडे मिल कर किटी जैसे फालतू कामों को एनकरेज करते हैं.

किटी के जरिये पैसों की सेविंग वाली बात ठीक नहीं

अकसर कहा जाता है कि महिलाएं घर खर्च से पैसे बचा कर किटी डालती हैं. ताकि उन की कुछ सेविंग हो सके. लेकिन न ही तो इन किटी में कोई ब्याज मिलता है और न ही कोई बचत होती है उल्टा इन पार्टियों और आनेजाने में अलग से पैसा खर्च होता है. ऐसे में किटी के जरीए फंड जुटाने वाली बात बेमकसद हो जाती है. अगर पैसा जुटाना मकसद होता तो पैसे का भुगतान औनलाइन किया जा सकता था, जिस से बाकी के खर्च बच जाते.

टाइम भी कम वेस्ट नहीं होता

ये किटी पार्टी दिन के समय होती हैं जोकि लगभग 4-5 घंटे चलती हैं. ये घर से कहीं दूर किसी होटल या रेस्टोरेंट में की जाती हैं जहां आनेजाने में भी बहुत समय लग जाता है. एक किटी का मतलब पूरा दिन ही लग जाना.

आउटडोर लोकेशन पर भी होती हैं महंगीमहंगी किटी पार्टी

अपने घर और शहर से निकल कर विदेशों में जा कर किटी पार्टी करने का ट्रेंड भी तेजी से बढ़ा है. महिलाएं सिंगापुर, होंगकोंग, दुबई, लाओस, वियतनाम, बाली जैसी जगहों पर किटी पार्टी कर रही हैं. किटी पार्टीज अब कुछ घंटों की ही नहीं रह गई हैं, बल्कि ये दोतीन दिन तक भी चलती हैं. अब कई कंपनी किटी पार्टी के पैकेज देती हैं. 10 महिलाओं के ग्रुप के लिए तीन दिनों की किटी पार्टी ट्रिप पर 10 -15 लाख रुपए तक लगते हैं.

साल में एक बार बड़ी पार्टी भी आयोजित करते हैं

अब किटी पार्टी सिर्फ घर पर बैठ कर खाना खाना नहीं है. अब किसी भी बड़ी पार्टी की तरह किटी पार्टी की भी प्लानिंग की जाती है. आस्था बताती है कि मेरी किटी में लगभग 100 से ज्यादा सदस्य हैं. हर महीने हम कुछ न कुछ अलग जरूर करते हैं. इस में व्यर्थ का समय लगता है और इस दौरान कुछ सीखने को नहीं मिलता. रिलैक्स करने का नाम दे कर उन्हें लूटा जाता है.

एक ही माह में कितने त्यौहारों में औरतों को वैसे ही धक्के दिला दिए जाते हैं, देखें:

अगस्त माह के बड़े तीज-त्योहार

अगस्त 2024 के तीज त्योहार

प्रदोष व्रत- 1 अगस्त,

सावन शिवरात्रि- 2 अगस्त,

श्रावण अमावस्या- 4 अगस्त,

हरियाली तीज-7 अगस्त,

नाग पंचमी-9 अगस्त,

श्रावण पुत्रदा एकादशी-16 अगस्त,

प्रदोष व्रत- 17 अगस्त,

रक्षा बंधन-19 अगस्त,

कजरी तीज-22 अगस्त, गुरुवार

जन्माष्टमी- 26 अगस्त,

अजा एकादशी-29 अगस्त.

इन में ही किटी पार्टियां भी जोड़ दी गई हैं. किटियों में इन त्योहारों को साथ मनाने के प्रोग्राम भी बन जाते हैं और जो नहीं मनातीं उन्हें तिरस्कार की नजर से देखा जाता है.

यहां सैक्स जैसे विषयों पर गौसिप करती हैं लेडीज

अजीब बात यह है कि किटी पार्टी में वह सैक्स से संबंधित टौपिक में अपने पार्टनर के परफार्मेंस, साइज, गर्थ, पोजिशन आदि की बातें करती हैं. वह इन बातों को और भी ज्यादा शेयर करती हैं, क्योंकि यहां महिलाओं का पूरा समूह होता है. अगर वह कुछ बातों का खुलासा नहीं करेंगी तो उन्हें समूह से बेदखल भी किया जा सकता है.

अपनी निजी बातों का खुलासा करना कई बार मजबूरी

कुछ महिलाएं ग्रुप में बने रहने की मजबूरी के तहत कुछ ज्यादा ही बातों को उजागर कर देती हैं. वहीं कुछ महिलाएं समूह में लाइमलाइट में आना चाहती हैं और ध्यान खींचने के लिए अपने पार्टनर से जुड़ी कुछ रोमांचक अंतरंग पलों को भी शेयर कर लेती हैं. यह बात सही नहीं होती हैं. ये महिलाएं यह सब बातें अपने घर और पति से शेयर करती हैं और फिर ये बातें फ़ैल जाती हैं.

तनाव का कारण भी बनती है किटी पार्टी

किटी के इन ग्रुप्स में कुछ महिलाएं जो खुद गंदे स्वभाव वाली, ज्यादातर अश्लील मजाक करने वाली, अलग ग्रुप बनाने वाली यानि किटी की एकता को तोड़ कर, अपना अलग ग्रुप बनाने वाली, पलपल झूठ बोलने वाली, झगड़ालू, पुरुषों के साथ में भद्दी मजाक करने वाली, दूसरों के मान सम्मान का भी ध्यान नहीं रखने वाली या यूं कहें खुद ही गढ्ढा खोद कर और खुद ही अपनी फ्रैंड को धक्का देने वाली होती हैं, एकदूसरे की टांग खींचने वाली होती हैं. जिस से आपस में लड़ाइयां भी बहुत होती हैं और ये लोग एक अनचाहे तनाव के साथ घर आती हैं.

टाइम वेस्ट करना क्या सही है?

आप खुद ही सोचिए कि आप अपने इस समय को जौब करने, कुछ अपने हौबी पूरी करने, घर का कोई काम करने, कोई सोशल वर्क करने में या कुछ नया सीखने में क्यों नहीं लगाती हैं. ये बातें आप के लिए अपमानजनक नहीं है कि इतना टाइम आप के पास फ़ालतू है ही क्यों? जिसे पास करने के लिए आप को इन किटीयों में जाना पड़े?

क्या पढ़ाईलिखाई आपने इन किटीयों के लिए की थी? 25 साल से ले कर 45 साल तक 20 साल ऐसे होते हैं, जिन में महिलाएं मेहनत कर सकती हैं. ऐसे समय में मेहनत कर के खुद को आत्मनिर्भर बना सकती हैं. पढ़ाई से जो हासिल किया है उस को अगर देश, समाज और घर के विकास में नहीं लगाएंगी तो किसी का कोई भला नहीं होगा. इसलिए खुद के लिए और समाज के लिए कुछ बेहतर करें.

सोना लुढ़का, डोनाल्ड ट्रंप हाजिर हों

दुनिया में सोने के दाम लगातार कम हो रहे हैं, और इस के पीछे एक बड़ा कारण अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की जीत माना जा रहा है. इस साल ज्यादातर समय सोने की कीमतों में तेजी रही, लेकिन ट्रंप की जीत के बाद सोने की कीमत में 4 फीसद से अधिक की गिरावट आई है.

अमेरिकी डौलर: मजबूती का दौर

अमेरिका द्वारा शुरू किए गए शुल्क और व्यापार युद्ध के कारण अन्य देशों की मुद्राओं का मूल्य नीचे गिर गया है, जिस से अमेरिकी डौलर मजबूत हुआ है. इस से सोना खरीदना अन्य मुद्राओं का उपयोग करने वाले खरीदारों के लिए अधिक महंगा हो गया है.

ट्रंप की प्राथमिकता कम करों और उच्च शुल्क की है, जिस से फेडरल रिजर्व अगले साल ब्याज दरों में कटौती करने की उम्मीद कम हो गई है. इस से सरकारी बांड अधिक ब्याज देगा, जो सोने की कीमत को नुकसान पहुंचा सकता है. निवेशक उम्मीद कर रहे हैं कि ट्रंप की जीत से अमेरिकी सरकार के कर्ज और मुद्रास्फीति में वृद्धि होगी, जो सोने की कीमत में मदद कर सकती है.

हालांकि, दुनिया भर में अस्थिरता के दौरान सोना अब भी निवेशकों के लिए एक सुरक्षित निवेश विकल्प है. पश्चिम एशिया, यूक्रेन और अन्य जगहों पर युद्ध और राजनीतिक तनाव के कारण सोना निवेशकों के पोर्टफोलियो में बना रहेगा.

अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की जीत के बाद सोने की कीमतों में गिरावट आई है, जो कई विश्लेषकों के लिए आश्चर्यजनक है. सोना, जो अकसर आर्थिक अनिश्चितता के समय में एक सुरक्षित निवेश विकल्प माना जाता है, ने अपनी चमक खो दी है और इस की कीमतें गिर गई हैं. लेकिन क्या है इस के पीछे का कारण?

अमेरिकी डौलर का मजबूत होना

अमेरिकी डौलर का मजबूत होना एक मुख्य कारण है, जो अन्य मुद्राओं के मुकाबले अपनी मजबूती के कारण सोने की कीमत को कम कर देता है. जब अमेरिकी डौलर मजबूत होता है, तो अन्य देशों के निवेशकों के लिए सोना खरीदना अधिक महंगा हो जाता है, जिस से इस की मांग कम हो जाती है और कीमतें गिर जाती हैं.

ट्रंप की आर्थिक नीतियां भी सोने की कीमतों पर असर डाल रही हैं. उन की कर दरों को कम करने और शुल्क बढ़ाने की योजना से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिल सकता है, लेकिन इस से मुद्रास्फीति भी बढ़ सकती है. इस से निवेशकों की उम्मीदें कम हो सकती हैं कि फेडरल रिजर्व अगले साल ब्याज दरों में कटौती करेगा, जिस से सोने की कीमत पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है.

भारत में सोने के दाम और….

भारत में, सोने की कीमतें भी गिर गई हैं. 24 कैरेट सोने की कीमत 73,740 रुपये प्रति 10 ग्राम और 22 कैरेट सोने की कीमत 67,540 रुपये प्रति 10 ग्राम है. यह गिरावट भारतीय निवेशकों के लिए एक अच्छा अवसर हो सकता है सोने में निवेश करने के लिए.

डोनाल्ड ट्रंप की जीत के बाद सोने की कीमतों में गिरावट एक नए युग की शुरुआत हो सकती है. अमेरिकी डौलर का मजबूत होना और ट्रंप की आर्थिक नीतियां सोने की कीमतों पर असर डाल रही हैं. भारतीय निवेशकों के लिए यह एक अच्छा अवसर हो सकता है सोने में निवेश करने के लिए. लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि निवेशक अपने निर्णय लेने से पहले बाजार की स्थिति और आर्थिक विश्लेषण को ध्यान में रखें.

सोने के दाम कम होने के कई कारण हो सकते हैं, और विशेषज्ञों के विचार भी अलग-अलग हो सकते हैं, यहां कुछ विशेषज्ञों के विचार हैं:

विशेषज्ञ कहते हैं…..

अर्थशास्त्री मानते हैं कि सोने की कीमतें अमेरिकी डौलर की मजबूती और वैश्विक आर्थिक स्थिति में सुधार के कारण कम हो रही हैं.

वित्तीय विश्लेषक मानते हैं कि सोने की कीमतें ट्रंप की आर्थिक नीतियों और फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति के कारण कम हो रही है. सोने के व्यापारी मानते हैं कि सोने की कीमतें वैश्विक मांग में कमी और सोने के उत्पादन में वृद्धि के कारण कम हो रही हैं.
निवेश विशेषज्ञ मानते हैं कि सोने की कीमतें निवेशकों की रणनीति में बदलाव और अन्य निवेश विकल्पों की ओर बढ़ते रुझान के कारण कम हो रही हैं.

अमेरिकी डालर की मजबूती सोने की कीमतों को कम कर देती है.

वैश्विक आर्थिक स्थिति में सुधार सोने की मांग को कम कर देता है.

सोने की कीमतों पर प्रभाव डालने वाले कारक:

अमेरिकी डौलर की मजबूती

वैश्विक आर्थिक स्थिति,

मांग-आपूर्ति की स्थिति, आर्थिक नीतियां, मुद्रास्फीति.

इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, यह कहना मुश्किल है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से सोने की कीमतें कम होंगी या नहीं. लेकिन यह तय है कि सोने की कीमतें समय के साथ बदलती रहती हैं, दुनिया में सोने के दाम कम होना या ज्यादा होना इस का असर अलगअलग लोगों पर अलगअलग तरीके से पड़ता है.

सोने की कीमतें कम होने से निवेशकों को सोने में निवेश करने का अच्छा मौका मिलता है, क्योंकि वे कम कीमत पर सोना खरीद सकते हैं और भविष्य में इस की कीमत बढ़ने पर मुनाफा कमा सकते हैं.

सोने की कीमतें कम होने से ज्वेलरी खरीदने वालों को फायदा होता है, क्योंकि उन्हें अपने पैसे का ज्यादा मूल्य मिलता है.

सोने की कीमतें कम होने से सोने के उत्पादकों को नुकसान होता है, क्योंकि उन्हें अपने उत्पाद के लिए कम पैसे मिलते हैं.

सोने की कीमतें कम होने से आर्थिक दृष्टिकोण से भी असर पड़ता है, क्योंकि इस से देश का विदेशी मुद्रा भंडार प्रभावित हो सकता है. इसलिए, सोने के दाम कम होना या ज्यादा होना इस का असर अलगअलग लोगों पर अलगअलग तरीके से पड़ता है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें