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Family Story in Hindi : घुटने का दर्द – एक गृहिणी की जिंदगी को बयां करती कहानी

Family Story in Hindi : रोज बस वही घर, घर के काम, बच्चों, पति को देखना. कुछ सुकून देता था स्वाति को, तो वह था छत पर आ कर पड़ोस की सहेली सुनीता से जीभर के बातें करना. पर कमबख्त उस के घुटने के दर्द ने उस से यह सुख भी छीन लिया.

कामवाली झाड़ूपोंछा कर के जा चुकी थी. स्वाति बचा हुआ काम जल्दीजल्दी निबटा रही थी. रैक में धुले हुए बरतन लगा कर किचन की सफाई पूरी की और एक गहरी सांस ली. बस, अब वह फ्री थी अपनी खुशियों के समुद्र में गोते लगाने के लिए.

उस ने एक पल को मुंह उठा कर ऊपर की ओर देखा, यह खुला आसमान जैसे अब कुछ देर के लिए उस का अपना था. बस, फिर तो चप्पल पहनी और झाटपट आंगन से छत की सीढि़यां चढ़ गई. मुंडेर से झांका तो दिल खुश हो गया, उधर, सुनीता भी बालटी में कपड़े लिए ऊपर आ रही थी.

दोनों ने एकदूसरे को मुसकरा कर देखा और दोनों अपनीअपनी छत पर मुंडेर के पास आ कर खड़ी हो गईं.

‘‘वाशिंग मशीन ठीक करा ली तू ने?’’ स्वाति ने धुले कपड़े देख कर पूछा.

‘‘कहां दीदी, हाथ से ही धोए हैं.’’

‘‘अरे, मेरी मशीन से धो लेती, कहा तो था उस दिन भी.’’

‘‘अरे दीदी, कपड़े धोतेधोते दस काम और भी निबटा लेती हूं. अब वहां आ कर धोने लगी तो यहां का काम तो रुक ही जाएगा. वैसे, ‘कल आएगा मिस्त्री’ ये कह कर गए हैं. काम तो निबट ही जाता है, दीदी. और बस, आप से बातें कर के जी हलका हो जाता है.’’

‘‘यह तो है. एक तू ही तो है जिस से जीभर कर बातें कर लेती हूं. पूरे दिन में एक यही समय तो अपना होता है जिस का इंतजार रहता है और इसीलिए सुबह जल्दी सारा काम भी खत्म कर लेती हूं.’’

‘‘हां दीदी, यही तो है. आज काम ज्यादा था तो पोहा बना लिया था नाश्ते में. नमन को टिफिन में भी वही दे दिया.’’

‘‘मैं ने तो परांठे ही बनाए. आरव 12वीं में आ गया मगर टिफिन में परांठासब्जी ही ले कर जाता है. इसीलिए सब्जी काट कर रख दी थी रात ही.’’

‘‘अरे, हां दीदी, रात कैसा शोर हो रहा था, क्या बात हो गई?’’

‘‘अरे वही, पिछली गली में कुछ कहासुनी हो गई. वही बिमला के पति से,

और क्या.

घर से शुरू हो कर महल्लेपड़ोस को पार करती इन की बातें दुनियाजहान नाप लेतीं. यही खुशी थी, यही चाहत, यही तमन्ना, यही दुनिया.

एक गृहस्थन को और क्या ही अपेक्षा होती है दुनिया से. पति के दफ्तर और बच्चों के स्कूलकालेज जाने के बाद क्या बचता है, भला. अपनी इस चारदीवारी की दुनिया में कोई बात करने को मिल जाए अपने जैसा, तो घर में रहते ही पूरी दुनिया की सैर हो जाती है.

बाहर कहां जाएं, क्यों जाएं, किस के लिए जाएं. रोजरोज बाहर जाने का कोई कारण भी तो होना चाहिए न. रोज शौपिंग पर निकलने वाली औरतों में से वह न थी. यह तो फुजूलखर्ची ही है.

दरअसल, कोई 10 साल पहले इन्होंने इस कालोनी में अपना घर बनाया था. तब यह कालोनी भी नईनई बस रही थी. स्वाति और उस के परिवार के यहां आने के कोई एक साल बाद ही सुनीता के पति ने भी यहीं अपने प्लौट में मकान बनाना शुरू कर दिया और सालभर में रहने भी आ गए. सुनीता का बेटा नमन भी यहीं पैदा हुआ था और तब स्वाति ने सुनीता के घरपरिवार की बड़ी जिम्मेदारी उठाई थी. आसपास ज्यादा बसावट नहीं थी. इन के अलावा कुछ ही और परिवार थे. बस, धीरेधीरे इन की दोस्ती पक्की होती चली गई.

स्वाति छत पर कपड़े सुखाने जाती और तभी सुनीता भी कपड़े सुखाने ऊपर आ जाती. बस, फिर तो दोनों घंटों बातें करतीं.

कई घंटे बातें कर के जो ऊर्जा महसूस होती उस का मुकाबला नहीं. 12 बजे के आसपास सुनीता के घर की घंटी बजती जब उस का बेटा स्कूल से आता. तब ये दोनों ही अपनेअपने घरों को वापस नीचे आ जातीं अगली सुबह फिर छत पर बतियाने का अरमान लिए.

इधर स्वाति का बेटा आरव दोपहर तक घर आ जाता और बेटी अवनि कालेज से शाम तक ही लौटती.

उस दिन सुबह से ही घुटने के दर्द ने स्वाति को परेशान कर रखा था. यों तो यह दर्द अकसर ही होता था लेकिन उस दिन पेनकिलर से भी ज्यादा आराम नहीं आ रहा था. स्वाति की तकलीफ देख पति ने औफिस से छुट्टी ले ली और उसे डाक्टर को दिखाने दोनों अस्पताल आ गए.

डाक्टर ने परचे पर दवाई लिख दी, एक्सरसाइज भी बता दी और एक बात जो सख्ती से मना की वह थी, ‘सीढि़यां नहीं चढ़नी आप को.’

डाक्टर ने स्वाति के पति को खास हिदायत दी कि इन्हें किसी भी तरह सीढि़यां न चढ़ने दी जाएं जबकि पैदल चलना जरूरी है आधा घंटा.

अब पति तो हिदायत पर अमल करवा कर रहेंगे. रहासहा बच्चों को भी बता देंगे कि किसी कीमत पर मम्मी को सीढि़यां नहीं चढ़ने देना. कपड़े सुखाना, अचार, पापड़ को धूप लगाना आदि सब काम अवनि या आरव करेंगे.

‘सीढि़यां नहीं चढ़ना’ सुन कर तो स्वाति का दिल धक से रह गया. यह क्या कह दिया, अब कैसे छत पर जाऊंगी.

स्वाति रोंआसी हो गई.

‘‘अरे यार, क्या रखा है छत पर,’’ पति ने कहा.

‘क्या रखा है?’ उस के दिल से आवाज आई, ‘सारे दिन की खुशियों की चाबी है छत पर ये क्या जानें,’ वह चिढ़ गई.

वैसे तो इस कालोनी में ये लोग पिछले 10 साल से रह रहे हैं लेकिन ज्यादा मिलनाबैठना तो बस सुनीता से ही है.

अब उसे रहरह कर घुटने के दर्द पर गुस्सा आ रहा था.

यों ही कई सप्ताह बीत गए. सुनीता भी अकसर मिलने आ जाती, हालचाल पूछ लेती और चली जाती. अब वह छत पर खड़े हो कर घंटों बातें करने का सिलसिला थम गया था. अकेले पड़ेपड़े उस का मन घबरा जाता. टीवी में तो मन पहले भी कम ही लगता था उस का. मोबाइल भी बस कुछ देर ही सुहाता उस को. दिल करता सुनीता से आमनेसामने बात करे. खुले आसमान का आलिंगन भरे, अपनी कहे, उस की सुने, हंसेमुसकराए. लेकिन अब तो खुद भी एकएक सीढ़ी जैसे घुटनों पर भारी पड़ने लगी थी. और फिर डाक्टर की बात, ‘अगर लापरवाही की तो घुटने घिस जाएंगे, फिर तो नी रिप्लेसमैंट ही करना होगा.’

नी रिप्लेसमैंट के ख्याल से ही उस को चक्कर आ गया. ‘इस से तो अच्छा है, ऐसे ही चुपचाप पड़ी रहूं, नी रिप्लेसमैंट के झांझाट से तो बच जाऊंगी.’ वह सोच रही थी.

लेकिन मनुष्य तो एक सामाजिक प्राणी है न. यों अकेले पड़ जाने से तो मानसिक रूप से बीमार हो सकता है. यही हुआ भी.

कई सप्ताह यों ही बीत गए. अब तो इस अकेलेपन से मायूसी होने लगी थी.

लेकिन उस दिन अखबार में दिखे विज्ञापन ने स्वाति के दिल में उम्मीद की एक किरण जगा दी.

यहां किसी एनजीओ ने एक फिजियोथेरैपिस्ट सैंटर की ओपनिंग की थी. अखबार के कोने में इसी सैंटर का विज्ञापन छपा था. देख कर स्वाति को खुशी हुई कि चलो, अब सैंटर पास में खुल गया है तो घुटनों की सही ऐक्सरसाइज हो जाया करेगी और फिर तो मैं सीढि़यां भी चढ़ पाऊंगी. यह सोच कर वह मुसकरा दी. जहां चाह वहां राह. उस ने सैंटर जाने का निश्चय कर लिया.

और अगले ही शनिवार को पति के साथ फिजियोथेरैपी सैंटर पहुंच गई. फिजियोथेरैपी सैंटर सोसाइटी के आखिरी छोर पर बनी एक बिल्डिंग में सैटअप किया गया था. किसी बड़े एनजीओ ने यहां बढि़या इंटीरियर तैयार किया था. रिसैप्शन हौल में गद्दीदार सोफे, एसी की ठंडक, चमचमाता फ्लोर वगैरह, कुल मिला कर आकर्षक एंबिएंस था.

हौल में अच्छीखासी वेटिंग थी. वह एक सोफे पर जा कर बैठ गई. आसपास अधिकतर महिलाएं ही थीं. इन में से कई वे थीं जो कभी मार्केट आतेजाते दिख जाती थीं और कईयों को वह पहली बार देख रही थी. शायद वे लोग दूर से आए थे. पति ने रिसैप्शन से परचा बनवाया और आ कर बैठ गए.

‘‘आप को देर नहीं हो रही?’’

‘‘थोड़ा लेट चला जाऊंगा.’’

‘‘नहीं, आप जाएं, यहां काफी समय लग जाएगा.’’ उस ने कहा तो पति भी समय रहते औफिस के लिए निकल गए.

20-25 मिनट बाद रिसैप्शनिस्ट ने उसे डाक्टर के पास अंदर भेज दिया.

डाक्टर ने चैकअप कर के असिस्टैंट को निर्देश दिए और फिर उस असिस्टैंट ने उसे बैड पर लिटा दिया. वह हाथों का हलका दबाव बना कर ऐक्सरसाइज करा रही थी. ‘‘मसल वीक हैं आप की. मसल स्ट्रैंथ करना होगा,’’ वह बता रही थी.

फिर एक ऐक्सरसाइज वाली मशीन को घुटनों पर लगा दिया. इलैक्ट्रिक वेव से मांसपेशियों को आराम मिल रहा था.

उस ने लेटेलेटे नजर दौड़ाई. आसपास के बैड पर कई महिलाएं मौजूद थीं. कंधा, कमर, स्पाइन सभी तरह के दर्द की मरीज थीं यहां और वैसी ही मशीनें भी. ‘ये सारे मसल पेन महिलाओं को ही होते हैं क्या.’ एक बार उस के मन में खयाल आया. ‘हां शायद, उम्र का महिलाओं की मसल्स पर सब से पहले असर होता होगा या फिर महिलाएं लापरवाह होती हैं अपनी सेहत को ले कर, इसलिए जल्दी शिकार बनती हैं बोन वीकनैस की या फिर जन्म से ही कमजोरियां ले कर आती हैं,’ पता नहीं क्याक्या सोचे जा रही थी वह कि उसे खुद ही हंसी आ गई.

इलैक्ट्रिक वेव थेरैपी का एक सैशन पूरा हो गया था. अब थोड़ी हलकी ऐक्सरसाइज की बारी थी. वो बाहर सोफे पर बैठ कर अब अपनी बारी का इंतजार करने लगी.

यहां पड़ोस की कई वे महिलाएं नजर आ रही थीं जिन से कभी आतेजाते बातचीत हो जाया करती थी. कुछ तो दूर की सोसाइटी से भी आई थीं. बातोंबातों में पता चला, सभी इस फिजियोथेरैपी सैंटर के खुलने से बहुत खुश थीं. कोई दोढाई घंटे की ऐक्सरसाइज के बाद अच्छा लग रहा था. उस दिन घर आ कर खूब गहरी नींद सोई थी वह.

ऐसे ही कोई एक सप्ताह गुजर गया. उस ने एक दिन की भी छुट्टी नहीं की थी. एक रूटीन बन गया था और कई सहेलियां भी बन गई थीं. अब तो रिसैप्शन पर अपनी बारी का इंतजार करना भी नहीं अखरता था. बातों में कितना समय निकल जाता, पता ही नहीं चलता. बल्कि रोज सैंटर जाने के लिए हर दिन के अलगअलग कपड़े वह बड़ी फिक्र से हैंगर में लगा कर रखती थी. अब हर दिन, एक नया दिन होने लगा था. रोज अच्छे से तैयार होना, अच्छा सा सूट या कभी जौगर पहन लेना, बाल संवारना. हलका मेकअप कर के वह जब तैयार होती तो एक अलग ही लैवल का कौन्फिडैंस फील करती. अब सुनीता को देखे हुए ही कई सप्ताह बीत जाते थे. कहां उस से मिले बिना दिन नहीं गुजरता था और कहां यह वक्त.

अब फिजियोथेरैपी शुरू हुए कोई डेढ़ महीना हो गया था. स्वाति के घुटनों के दर्द में आराम आने लगा था.

अब कभी सीढि़यां चढ़नी पड़तीं तो दर्द नहीं होता था लेकिन यह क्या, अब उसे कोई दूसरी चीज परेशान कर रही थी. वाकई इस दर्द से नजात पा कर खुश नहीं थी वह. ऐसा कैसे हो सकता है. अब तो आराम मिल गया, अब जहां चाहे जाए और सीढि़यां चढ़े, कोई नहीं रोकेगा, अपनी प्यारी सुनीता से छत पर जा कर जीभर बातें कर सकेगी. तो अब कहीं किसी कोने कुछ चुभ क्यों रहा था. और वह क्या था जो दर्द खत्म होने पर दर्द दे रहा था. नहीं, ऐसा तो कुछ नहीं, उस ने खुद को झाठलाया. अब क्यों जाना है मुझे सैंटर. बस, कुछ ही दिन में रोजरोज सैंटर जाने से छुट्टी. न रोज तैयार होने का झांझाट, न घर को खाली छोड़ने की फिक्र और न ही रोज ढेरों सहेलियों से मुलाकात, न बातें, न दिल हलका करने का इत्मीनान, न सब के साथ बैठ कर खिलखिलाने वाली हंसी, न हर दिन के नए होने का एहसास…नहीं, कुछ नहीं.

उदासी के जज्बे अपने काले पंख फैलाने लगे. फिर वही घर और मैं, सिर्फ मैं. मैं और मेरी तनहाई.

अरे मगर सुनीता, हां, सुनीता तो है न. हूं, है तो.

अब तो कब से मिली ही नहीं उस से. बस, फोन पर ही थोड़ी बातचीत हो जाती थी. क्या कहेगी वह, भूल ही गई मैं उसे. मैं ऐसा कैसे कर सकती हूं. सोच में डूबी हुई वह छत पर पहुंच गई. बादलों की आवाजाही से दोपहर भी गरम न थी. हलकी हवा से मौसम खुशनुमा हो गया था. उस ने मुंडेर से झांका और सुनीता को आवाज दी. कई बार में भी जब कोई जवाब न आया तो वह परेशान हो गई और फौरन ही घर को लौक कर के सुनीता के पास पहुंच गई.

सुनीता बैड पर लेटी थी. सहेली को देख कर सुनीता की खुशी का ठिकाना न रहा. वह उठ बैठी लेकिन दर्द की लकीरें उस के चेहरे पर नुमायां थीं.

‘‘दीदी, महीनाभर हो गया, कमरदर्द ने बहुत परेशान कर रखा है, दवाएं खा रही हूं.’’

स्वाति को दुख हो रहा था कि इतने समय से सहेली की खबर ही नहीं ली उस ने. अपने दर्द और उस के इलाज में पिछला सब भूल ही गई वह.

‘‘अरे, परेशान क्यों होती है, मेरी तरह तू भी फिजियोथेरैपी करा ले. देख, मेरे घुटनों में आराम आ गया.’’

‘‘क्या, सच आप को आराम हुआ है?’’ सुनीता आश्चर्यमिश्रित खुशी से देख रही थी.

‘‘हांहां, बहुत फर्क पड़ गया. अब तो सीढि़यां भी आराम से चढ़ जाती हूं मैं.’’

‘‘अच्छा, लेकिन दीदी, उस में तो रोज जाना होगा और मुझा से तो…’’ सुनीता उदास होने लगी.

‘‘अरे, क्या बात कर रही है, मैं हूं न. मैं तुझे रोज ले कर जाऊंगी सैंटर पर.’’

‘‘सही बताओ, दीदी. आप कैसे रोजरोज?’’

‘‘अरे, तू बेफिक्र रह. अब यह मेरी जिम्मेदारी,’’ यह कहते हुए स्वाति खुशी से फूली नहीं समा रही थी.

अब मैं रोज सैंटर जाऊंगी, सारी सहेलियों से मिलूंगी. इतना सोचनेभर से दिल में खुशी के लड्डू फूट रहे थे. ‘‘ठीक है, तो कल तैयार रहना, मैं आ जाऊंगी जल्दी.’’ दिल की खुशी से पैदा होने वाला जोश पैर जमीन पर नहीं टिकने देता. अब वह कल पहनने के लिए अलमारी से नया सूट निकाल रही थी. Family Story in Hindi

Romantic Story in Hindi : वसंत का आशियाना – इश्क के खुमार ने क्या गुल खिलाया?

Romantic Story in Hindi : मिस चंद्रिका पूरे औफिस के लिए गौसिप का केंद्र बन गई थी. घोषाल बाबू जिन्हें इन सब बातों से कोई सरोकार न था उन का बैलेंस भी बिगड़ गया उसे देख कर. ऐसा बिगड़ा कि डगमगाने लगे.

औफिस में जनसंपर्क अधिकारी के रूप में मिस चंद्रिमा की नियुक्ति हुई थी. उस के मेकअप व पहनावे की चर्चा जोरों पर थी. मिस चंद्रिमा के औफिस में प्रवेश करते ही जैसे खुशबू और ताजगी का झांका प्रवेश कर जाता. उस के कपड़े, उस की चाल, उस का अंदाज देखते ही रहते सारे कर्मचारी. औफिस के आधे दर्जन लोगों ने तो अपना कुछ वक्त इसी खोज में लगा दिया था कि वह जो परफ्यूम लगाती है, उस का नाम क्या है.

‘अरे भाई, वह मिलता कहां है?’

इस में गलती किसी की न थी. वह थी ही बला की खूबसूरत. किसी विदेशी डौल जैसी. उस का रंग बड़ा ही अलौकिक था दूधिया गुलाबी कह सकते हैं. प्रकृति ने बड़ी बारीकी से रचा था उसे.

‘मुझा से कब बात करेगी?’

‘कब मेरे करीब से गुजरेगी’ औफिस के हर पुरुष की ख्वाहिश बनने लगी थी. अपने टिफिन बौक्स में क्या है, इस से ज्यादा ध्यान अब इस बात पर रहने लगा था कि आज चंद्रिमा ने कौन से रंग की ड्रैस पहनी होगी, कौन सा रंग उसे सूट करता है, कौन सा रंग सूट नहीं करता. यह तो था पुरुष वर्ग का खेमा.

महिलाएं इन सब बातों से अलग जोड़घटाव में लगी रहती थीं कि ‘कितने मिनट बौस की केबिन में थी वह?’

‘कितनी बार मैनेजर से बात की?’

‘बात करते वक्त हावभाव कैसे थे?’

उस पर अपनी क्रियाप्रतिक्रिया दे कर अपनी बौद्धिक क्षमता को दर्शाने जैसा था.

मिस चंद्रिमा के आने के बाद से औफिस का माहौल बदल गया था.

कंपनी के अकाउंट सैक्शन में घोषाल बाबू वरिष्ठ अधिकारी के पद पर 25 साल से नौकरी करते हुए 50 की उम्र पार कर चुके थे. बड़े ही सभ्य विचारधारा के व्यक्ति थे. वे गर्व से कहते, ‘आज तक हम एक बार भी बीमार नहीं हुए, इस का कारण जानते हो, मेरा पत्नी मिताली है.’

मिताली 45 वर्षीया साधारण कदकाठी की संभ्रांत महिला थी जो कि रविंद्र संगीत में विशेष रुचि रखती थी. आसपास का परिवेश परिष्कृत रखने वाली एक साधारण रंगरूप की स्वामिनी थी वह. पति और बेटा दोनों के लिए खास डाइट चार्ट बना रखा था उस ने. उन्हें कब क्या खाना है, क्या पहनना है सब पर निगरानी रखती थी वह. यही वजह थी कि आज तक घोषाल बाबू ने कभी हौस्पिटल का मुंह न देखा था. उन का बेटा तपोन घोषाल विदेश में रह कर दंत चिकित्सक की पढ़ाई कर रहा था. यूनिवर्सिटी की तरफ से छात्रवृत्ति मिल रही थी वरना कलकत्ता के पार्क स्ट्रीट के पैकर्स एंड मूवर्स कंपनी के अकाउंटैंट की इतनी औकात कहां होती है कि बेटे को विदेश भेज पाते.

फरवरी महीने में औफिस में सर्वर डाउन होने की वजह से कर्मचारी अपनेअपने पेमैंट की जानकारी लेने बारीबारी से घोषाल बाबू के पास आ रहे थे. चंद्रिमा सब से आखिर में पहुंची. घोषाल बाबू फाइल बंद कर चुके थे. खुशबू का एक जबरदस्त झांका अंदर आया, जैसे शांत जल में किसी ने कंकर फेंक दिया हो. चंद्रिमा ने मुसकराहट बिखेरी, इस से घोषाल बाबू भी घायल हुए बिना न रह सके.

‘‘सौरी घोषाल बाबू, मैं थोड़ा लेट हो गई,’’ घोषाल बाबू को फाइलें बांधते हुए देख मिस चंद्रिमा ने कहा.

घोषाल बाबू ने नजरें उठा कर देखा. शाम तक शरीर और मन दोनों थक कर चूर हो जाते थे. मेहनत के चलते पसीने से केबिन भरा होता था. ऐसे में चंद्रिमा के परफ्यूम की खुशबू ने मनमस्तिष्क को उद्वेलित कर दिया था.

अपने स्वभाव के मुताबिक ‘ओ नकचढ़ी कल आना’ घोषाल बाबू कह सकते थे लेकिन ऐसा कह न पाए.

किसी यंत्रवश खाली चेयर की तरफ इशारा कर चंद्रिमा को बैठने का आदेश दे दिया.  फाइल खुलने लगी. चंद्रिमा की हर बात का जवाब देना उन्हें अच्छा ही नहीं बल्कि परम कर्तव्य लग रहा था. ऐसा नहीं कि मिस चंद्रिमा का रूपलावण्य चर्चा बन कर उन की केबिन में पहले नहीं आया था पर उस वक्त उन्हें ये बातें बेकार लगी थीं. उस पर उन्होंने अन्य कर्मचारियों को फटकार भी लगाई थी.

‘चरित्र और स्वभाव सुंदर होने चाहिए न कि चेहरा’ कह कर नैतिक मूल्यों का ज्ञानदीप जला गए थे.

फिर आज यह सब क्या था. शायद यही वह सत्य था कि प्यार की संवेदना उम्र की मुहताज नहीं होती और इसी सत्य को वे झाठला नहीं पा रहे थे. पत्नी के बालों को काला करने के आग्रह पर ‘रंग से क्या होता है, अंदर की जिंदादिली देखिए’ जुमला आराम से पढ़ कर आगे बढ़ जाते थे. उसी बालों की सफेदी को बारबार हाथ रख कर छिपाने की कोशिश जारी थी. डर था कि कहीं उम्र का फासला बातचीत में बाधक न बन जाए. आखिर में चंद्रिमा ने मुसकरा कर ‘थैंक यू, घोषाल बाबू’ कहा तो वह सुख मिला जो सूखते गले को मटके का शीतल जल दे जाता है. घड़ी देखी तो रात के 8 बज चुके थे. मिताली इंतजार कर रही थी. घर का दरवाजा पहले से खुला था.

‘किसी शायर की गजल ड्रीमगर्ल, किसी झाल का कमल ड्रीमगर्ल’ घोषाल बाबू गुनगुनाते अंदर आए तो मिताली आश्चर्य में पड़ गई. आज तक कभी ‘ओम जय जगदीश’ तक न गुनगुनाने वाला इंसान आज यह गाना गा रहा था.

‘क्या हुआ बोलो?’ मिताली ने उन की खुशी में शामिल होने की कोशिश की. चेहरे पर आई मुसकराहट को लगभग छिपा कर खुश होने की वजह को बड़ी सफाई से टाल गए वे. मन के चलचित्र कक्ष में चंद्रिमा बैठी थी. जल्दी से खाना खा कर बिस्तर पर लेट कर उस पल को जीना चाहते थे. उस वक्त घोषाल बाबू को पत्नी की कोई भी बात उन्हें रास्ते में आ रहे रोड़े की भांति लग रही थी. मिताली अपनी दैनिक दिनचर्या में लगी हुई थी. खाना खाने के बाद वह वास्तुदोष का खयाल रखते हुए घर की शांति के लिए जूठे बरतन धोने लगी.

घोषाल बाबू पर चंद्रिमा की आसक्ति इतनी बढ़ गई थी कि पत्नी को बीपी की मैडिसिन देना भी भूल गए. अगली सुबह पत्नी से पहले उठ कर जौगिंग पर चले गए. पिछले 2 दशकों से पत्नी आग्रह कर रही थी, कभी ध्यान नहीं दिया था. पति को बिस्तर पर न पा कर मिताली चिंतित हुई- ऐसा तो कभी नहीं हुआ था. फोन लगाया तो रिंग सामने रखे फोन में बजने लगी. घर के जरूरी काम निबटाने के बाद गरम पानी दे कर उन्हें जगाती थी.

जरूरत पड़ने पर हाथपैर दबाना भी सामान्य क्रिया जैसा था लेकिन आज प्रकृति को शुक्रिया कर संतुष्ट हो रही थी. देर आए दुरुस्त आए जुमले को मन ही मन दोहराया और बाकी काम समेटने लगी. घोषाल बाबू ने जौगिंग करतेकरते कमरे में प्रवेश किया. गरम पानी के ठंडा हो जाने पर चिल्लाना चाहते थे लेकिन थोड़ी देर बाद चंद्रिमा से मुलाकात होगी यह सोचते ही शांत हो गए.

‘‘मीतू, तुम क्या वह बालों को काला करने के लिए बोलती रहती हो, सोचा, आज तुम्हारी बात मान ही लूं,’’ घोषाल बाबू ने छोटे से आईने में बालों का निरीक्षण करते हुए कहा.

मिताली की खुशी का ठिकाना न रहा क्योंकि आज घोषाल बाबू ने उस की बात जो मान ली थी.

‘‘लेकिन आज तो गुरुवार है, आज तो शैंपू नहीं लगा सकते,’’ नियमनिष्ठा का पालन करने वाली मिताली ने याद दिलाया.

‘‘धत तेरी की, तुम्हारा गुरुवार, शनिवार, तुम ही लगाओ तो,’’ घोषाल बाबू का बावला मन आज प्रेम के प्रथम किरण में खुद को आह्लादित करने को व्याकुल था. पत्नी की अवहेलना करने में तनिक भी देर न लगी.

‘‘ठीक है, यहां बैठो, लगाती हूं,’’ मिताली ने बेमन से कहा और बालों को काला करने लगी.

घोषाल बाबू नहाने चले गए. तब तक मिताली ने बैड पर कपड़े सजा कर रख दिए- सफेद शर्ट, ब्लैक पैंट और मैचिंग ब्लैक टाई.

कभी उन्हें यह सजावट दुनिया की नायाब वस्तु लगती थी पर आज श्यामश्वेत का मिश्रण लग रही थी.

खुद से अलमारी खोली, सारे एकजैसे ही कपड़े थे.

‘‘मीतू, मेरे लिए केवल फीके रंग के कपड़े ही क्यों?’’ घोषाल बाबू ने बेमन से कपड़े पहनते हुए कहा.

मिताली ने आश्चर्यभरी निगाहों से पति की ओर देखा. पिछले ही दिनों बेटे द्वारा भेजे गए मैरून और डीप ब्लू शर्ट को यह कह कर ठुकरा दिया था कि ‘परिधान का रंग व्यक्ति के व्यक्तित्व और उम्र के साथ चरित्र को भी निखारता है’ पर औफिस जाते समय शांति रखने वाली मिताली ने बहस को चुप रह कर रोक दिया था.

कल तो पेमैंट वजह थी लेकिन आज ऐसा क्या करें कि मिस चंद्रिमा केबिन में आए, घोषाल बाबू दिनभर इसी फिराक में रहे. अपने द्वारा बनाए गए दायरे को तोड़ कर लक्ष्य तक पहुंचना नहीं चाहते थे वे.

इन बातों को बीते कुछ दिन हो गए थे. जीवन की गाड़ी फिर से पुराने रास्ते पर आ गई थी लेकिन कहीं न कहीं चंद्रिमा नाम की खुशबू जीवन में बस गई थी. फिर एक दिन थकेहारे घोषाल बाबू शाम को जब गाड़ी को पार्किंग से निकाल सड़क पर ला रहे थे कि दूर से ही मिस चंद्रिमा दिख गई, सोचा, गाड़ी रोक कर कह दें, ‘आ जाओ, छोड़ देता हूं’ पर जबान चिपक गई थी, आंखें स्थिर हो गई थीं. कुछ भी न कह पाए. तभी मिस चंद्रिमा ने खुद ही गाड़ी रोकने का इशारा किया. मुंहमांगी मुराद पूरी हो गई. गाड़ी रुक गई. चंद्रिमा पीछे की सीट पर बैठ गई.

गाड़ी में परफ्यूम की भीनीभीनी खुशबू फैल गई थी. बैकमिरर से देखा, ‘कौन कहता है यह सांझा की चंद्रिमा है, यह तो भोर का तारा है.’ चालक का हाले दिल तो यह था कि सफर खत्म ही न हो. न चाहते हुए भी घोषाल बाबू बैकमिरर से उस रूपसी को निहार रहे थे. कभी खुद पर खुद ही शरमा जाते. इस बीच चंद्रिमा के कई फोनकौल्स आए जिस से घोषाल बाबू इतना तो जान गए कि वह एक सिंगल मदर है और उस के जीवन में कई परेशानियां हैं. मन किया उस के पास जाएं, उस से बातें करें, कह दें कि अपने दर्द मुझे दे दो. इसी सोच में पड़े खयालीपुलाव पकाते रहे. तभी फोन की घंटी बजी. घोषाल बाबू ने बेखयाली में ही फोन उठाया.

‘‘घोषाल बाबू, ताड़ाताड़ी आसुन आप की मिसेज गिरने की वजह से बेहोश हो गई है,’’ पड़ोसी दत्तो बाबू का फोन था.

अचानक से दिमाग सुन्न पड़ गया. पवित्र गंगा की तरह अविरल बहने वाली मिताली जिस के स्नेह ने जीवन को सींचा था वह अस्वस्थ हो गई थी. वह हर चीज जिस की आवश्यकता थी, मांगने से पहले सामने ला कर रख देती थी. आज उसे अपने पति की जरूरत थी और वे छी:छी:.

फोन डिसकनैक्ट हो चुका था.

कैसे? कब? घोषाल बाबू जानना चाहते थे. वापस कौल किया तो दत्तो बाबू का फोन आउटऔफ रेंज बता रहा था. जो चंद्रिमा अब तक छिटकी हुई चांदनी लग रही थी, अमावस में बदल गई थी. उस के परफ्यूम की खुशबू से दम घुटने लगा था. मीतू तो कोई खुशबू नहीं लगाती, फिर भी हमारा बगीचे सा महकता है. उस की सलोनी छवि आंखों के सामने तैरने लगी.

‘‘मैडम, प्लीज उतर जाइए, यहां से आप का रास्ता दूसरी तरफ जाता है,’’ घोषाल बाबू ने नीची नजरों से चंद्रिमा से कहा.

चंद्रिमा इस तरह के व्यवहार के लिए तैयार न थी. उस ने घोषाल बाबू की ओर देखा, आज तक किसी पुरुष ने इतने रूखे स्वर में बात तो दूर, देखा भी न था. वह उतर गई.

‘अचानक से क्या हो गया घोषाल बाबू को’ मन ही मन वह सोचने लगी.

मुझे माफ करना, तुम्हारा वक्त मैं ने किसी और को दिया. मैं तुम्हारा दोषी हूं. गाड़ी की स्पीड बढ़ती ही जा रही थी. किसी तरह घर पहुंचे. शुक्र था केवल पैर ही फिसला था, हड्डियां नहीं टूटी थीं.

घर पहुंचे तो सामने एंबुलैंस देखा. मन और ज्यादा बेचैन हो गया. अनायास आंखों में आंसू आ गए. उन्हें याद नहीं कि पिछली बार वे कब रोए थे या फिर मिताली ने ऐसी नौबत ही नहीं आने दी थी.

कमरे के अंदर आए. मिताली लेटी हुई थी. आंखें बंद थीं. डाक्टर साहब बगल में बैठे थे. बीपी जांच रहे थे.

‘‘क्या हुआ है डाक्टर साहब,’’ बेचैन घोषाल बाबू ने जानना चाहा.

‘‘चिंता की बात नहीं है. बहुत दिनों से बीपी की दवा नहीं ले रही थीं, यही वजह है कि चक्कर आ गया,’’ डाक्टर साहब ने अपना बैग समेटते हुए कहा.

याद आया रात को दोनों एकदूसरे को दवा देते थे लेकिन कुछ दिनों से… अपनी गलती का एहसास हुआ, बगल में बैठ कर फूटफूट कर रोने लगे घोषाल बाबू जैसे पश्चात्ताप के आंसू निकल रहे थे. किसी को कुछ समझा नहीं आ रहा था.

‘‘रोते क्यों हैं आप?’’ एक ने पूछा.

‘‘जिस जीवनसंगिनी ने पिछले 30 सालों में कभी छुट्टी नहीं ली उसे मैं छुट्टी देने जा रहा था. उसे दवा न देना मेरी गलती थी. मैं जानता था उसे बीपी है, फिर भी मैं रात को जल्दी सो जाता था बिना उसे दवा खिलाए. आज उसे कुछ हो जाता तो मैं तपोन को क्या मुंह दिखाता, अपनेआप से क्या कहता,’’ दहाड़ें मार कर रोने लगे.

भावावेश में आ कर घोषाल बाबू ने मिताली के माथे को चूमा. धीरेधीरे स्थिति सामान्य हुई. पड़ोसी अपनेअपने घरों को चले गए. अगली सुबह मिताली देर तक सोई रही. घोषाल बाबू ने पूरे घर को साफ किया. झाड़ू, पोंछा, बरतन सबकुछ करते गए. पत्नी की तबीयत खराब होने से घर अस्तव्यस्त हो चुका था जिसे अपने खोएखोए खयालों में रहने की वजह से उन्होंने ध्यान नहीं दिया था.

पति को चाय बनाते देख ‘‘मैं करती हूं न, तुम रहने दो’’ और मिताली ने हाथ पकड़ लिया.

‘‘तुम ने बहुत किया है, मैं ही कभी समझा नहीं पाया तुम्हें. तुम पर चिल्लाना, तुम्हें डांटना अब और नहीं. तुम बैठो, मैं तुम्हें चाय पिलाता हूं, वह भी अदरक वाली,’’ घोषाल बाबू ने टौवेल को कंधे पर संभालते हुए कहा.

‘‘क्यों? आज औफिस नहीं जाना?’’

‘‘नहीं. मैं ने 10 दिनों की छुट्टी ली है. अभी से सिर्फ और सिर्फ तुम्हें देखना चाहता हूं, तुम्हारे साथ जीना चाहता हूं,’’ घोषाल बाबू ने मिताली के बाजुओं को थामते हुए कहा.

मिताली का चेहरा शरम से लाल हो रहा था. घोषाल बाबू ने मीतू की छलकती आंखों में अपने चेहरे को देखा, करीब आए, उसे बांहों में भर लिया. कामकाज में व्यस्त हो कर जीवन के जिन नाजुक पलों को अनदेखा करते जा रहे थे उन्हें समेट लिया. उम्र के उस पड़ाव में जिसे पतझाड़ नाम दे कर अनदेखा कर दिया जाता है, उन्होंने मिल कर वसंत का आशियाना बना दिया. Romantic Story in Hindi

Best Hindi Story : ये ऐड्रैस बताना प्लीज

Best Hindi Story : आप ने न जाने कितनी बार अनजान जगहों पर अनजान लोगों से कोई न कोई ऐड्रैस जरूर पूछा होगा. जब हम खुद किसी जगह के बारे में नहीं जानते तो दूसरों से पूछना मजबूरी हो जाती है. फिर यह अच्छी बात भी है कि महान देश के महान नागरिक ऐसे पते बताने में पूरी दिलचस्पी लेते हैं. लेकिन यह साधारण सी बात हमारे दिमाग में अकसर हलचल पैदा करती है कि हमें आज तक ऐसा कोई शख्स नहीं मिला जो हमारे द्वारा पूछे गए किसी भी ऐड्रैस को बताने में अपनेआप को असमर्थ बताता हो. वह कभी हार ही नहीं मानता, चाहे सही ऐड्रैस जानता हो या नहीं. वह बताने का कर्तव्य सौ फीसदी पूरी निष्ठा के साथ निभाता है.

लोग पता बताने में ऐसे गंभीर, दत्तचित्त हो कर डूब जाते हैं कि अपने अति जरूरी काम छोड़ कर एक दक्ष गाइड की तरह कुछ न कुछ निर्देशन अवश्य करते हैं. कोई भी महानुभाव हरगिज ऐसा नहीं कहता, ‘सौरी, मुझे इस ऐड्रैस का कोई अनुमान नहीं.’ हमारी पूरी जिंदगी इसी खोजबीन में निकल गई, अब तो उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच गए जहां सठिया जाने के पूरे चांस रहते हैं लेकिन इस अद्भुत विषय पर हमारा अघोषित शोध आज भी बदस्तूर जारी है. हम इस अंतहीन विषय को ले कर भारत के अनेकानेक राज्य, शहर, जिले, गांव, ढाणी की जनता पर सर्वे कर चुके, परिणाम हमेशा रोचक ही निकलते हैं.

हम तो आप को भी सुझाव देंगे कि यदि आप के पास फालतू का समय है और करने को कोई काम नहीं तो निठल्ले पड़े रहने से बेहतर होगा कि आप भी हमारे अभियान से जुड़ें. इस मुहिम से शहर की जनता की सामाजिक संवेदनशीलता को मापसकते हैं. प्रयोग करना चाहें तो, कागज के एक पुर्जे पर कोई भी गलतसलत पता लिख डालें और निकल पड़ें किसी भी शहर, कसबे के बाशिंदों की आईक्यू को जांचने. शहर के व्यस्त चौराहे, बाजार, गलीनुक्कड़ पर खड़े लोगों की मुफ्त सेवा लेनी शुरू करें. हम दावा करते हैं कि अब आप को कुछ नहीं करना है, जो भी करना है वह सामने वाला करेगा. वह आप के गलत पते को भांप भी जाए तो भी इस अनसुलझी पहेली अथवा चुनौती को स्वीकार कर उसे सुलझाने में डूब जाएगा.

हमें लगता है शायद यह हमारी मनोवैज्ञानिक कमजोरी है. जन्मभूमि से जुड़ी हमारी भावनाएं हमें अपने शहर के प्रति अनजान होने की बात कतई स्वीकार नहीं करने देतीं. जानतेबूझते हम गलत पते को भी पहचानने का स्वांग-नाटक करते हैं. ऐसी स्थिति में कुछ साधारण किस्म के लोग मिल सकते हैं जो फौरी तौर पर आप को सीधेउलटे हाथ जा कर बाईं या दाईं गली में मुड़ने और वहां जा कर पता करने जैसी बात कह देंगे लेकिन कुछ अति गंभीर और शहर के प्रति पूर्ण प्रतिबद्ध ऐसे नागरिक भी मिल जाएंगे जो बड़े कौन्फिडैंस से निर्देशन देंगे, जैसे वे सौ प्रतिशत उस ऐड्रैस को जानतेपहचानते हैं. हम बस, लोगों की इसी कला से मोहित और अभिभूत हैं.

इस अभियान में हम ने एक बार अभिनव प्रयोग किया. हमारे एक मित्र जो एम आई रोड, जयपुर में रहते हैं, उन के पति को पुरानी दिल्ली में खोजना शुरू किया. आप आश्चर्य करेंगे कि लोगों ने इस पूर्णत: गलत पते को पहचानने में भी पूरी गंभीरता दिखलाई जैसे वे उस पते से बखूबी परिचित हों. चालाकी कर पते की स्लिप पर केवल जयपुर की जगह दिल्ली लिख दिया, बाकी पूरा पता वही रहने दिया जो जयपुर का था. लेकिन इस से कोई फर्क नहीं पड़ा. एमआई रोड, जो जयपुर की पहचान है, को कुछ लोगों ने दिल्ली में बड़ी आसानी से पहचान लिया, जैसे वे उसी जगह के बाशिंदे हों. हो सकता है उन में से कुछ सज्जन हमें ही मूर्ख बना रहे हों लेकिन इस संपूर्ण कवायद में मजा भरपूर आ रहा था.

एक और बानगी देखिए, एक सज्जन सपत्नीक बाइक से कहीं जल्दी जाने की फिराक में थे लेकिन हमारे द्वारा वह गलत पता पूछे जाने पर भी बड़े मनोयोग से उस पते को पहचानने में पिल पड़े. अपनेआप को पूर्ण सामाजिक और शालीन होने का प्रमाण प्रस्तुत करते हुए हमारा मार्गदर्शन करने लगे. उन के बताने का अंदाज ऐसा आत्मविश्वास से लबरेज था कि लगा, जैसे यदि अपनी पत्नी के साथ न होते तो शायद हमें अपनी गाड़ी पर बिठा कर उस पते पर पहुंचा आते. लेकिन हम ने उन्हें ज्यादा परेशान करना उचित नहीं समझा. धन्यवाद देते हुए अपने इस टैलेंट हंट के सर्च अभियान से उन्हें मुक्त किया.

अब बताइए क्या कहेंगे? है न निराली बात. जो जगह दिल्ली में है ही नहीं, उसे भी लोग जबरदस्ती पहचान रहे हैं. यही नहीं, वहां तक पहुंचने का सहज रास्ता भी बताया जा रहा है. आप हमारी इस बुरी आदत पर हंस सकते हैं लेकिन यह सच है. हम जहां भी जाते हैं, अपनी इस तकनीक को जरूर आजमाते हैं. असल में, अब यह हमारे लिए एक ऐसा थर्मामीटर बन चुका है जिस से हम गांव, शहर, महानगरों के निवासियों की संवेदना की जांचपड़ताल करने से बाज नहीं आते. अब 21वीं सदी में तो इंटरनैट, फेसबुक, मोबाइल, स्मार्टफोन आ गए लेकिन हमारा फार्मूला आज भी, अचूक और गारंटिड बना हुआ है. पनवाड़ी की दुकान पर खड़े रसिकजन, चाय की थड़ी, चौराहे पर जमा भीड़, यहां तक कि ट्रैफिक पुलिस का तथाकथित मुस्तैद सिपाही भी हमारी इस अनोखी मुहिम में निशुल्क भागीदार बनता है और यथायोग्य अपनी मुफ्त की सलाहसेवा प्रदान करता ही करता है.

कछ लोगों का पता बताने का लहजा ऐसा होता है कि दिल कुरबान हो जाए या फिर अपना सिर पीट लिया जाए. ऐसे जनाब अपनी इठलाती जबान से मौखिक रूप से ही पूरे शहर का नक्शा ऐसा खींचते हैं कि वहां तैनात पोस्टमैन भी शरमा जाए. एक बार लखनऊ में हम ने एक बुजुर्गवार से मजाकमजाक में एक पता पूछ लिया. आप से क्या छिपाना, दरअसल हम तो दिल्लगी करने के मूड में थे, इसलिए नवाबों के शहर लखनऊ की सरजमीं पर पैर रखते ही सामने सड़क पर गुजर रहे एक जहीन किस्म के नवाबी संस्करण से वह पता पूछने से पूर्व भूमिका बांधने की गरज से इतना पूछ बैठे, ‘क्या जनाब, लखनऊ में ही रहते हैं?’ उन्हें हमारे इस तरह सवाल पूछने पर सख्त एतराज हुआ, लगा, जैसे हम ने उन की लखनवी जड़ों को खुली चुनौती दे डाली हो. बहरहाल, हमारी तहजीब पर तौबा करते हुए वे उस पते को समझाने लगे जिस से हम बखूबी पहले से परिचित थे कि वह पता शर्तिया गलत व झूठा था.

उन के अंदाज का आप भी मुलाहिजा फरमाएं. उन्होंने पहले अपनी सफेद दाढ़ी पर हाथ फिराया, अचकन ठीक कर खंखारते हुए गला साफ कर खालिस शायराना उर्दू की ऐसी तकरीर झाड़ने लगे कि हमें बेहोशी आने लगी. लगे हाथ हमारा तआर्रुफ (परिचय), जन्मस्थान, शिक्षा, मजहब, ब्याहशादी, बालबच्चों, नौकरी, तनख्वाह सहित जरूरी स्टेटस पूछ डाला. हम सेर तो जनाब सवा सेर. लेकिन हम इस रस्साकशी को बीच अधर में छोड़ने को कतई तैयार नहीं थे. सो उन की तकरीर को बड़े अदब से सुनते रहे. हमारे हाथ में वह कागज था जिस पर मुंबई का पता लिखा था, केवल शहर चेंज कर लखनऊ लिख डाला था ताकि लोगों को कन्फ्यूज कर मजा ले सकें. उन की तकरीर शुरू हुई, ‘‘जनाब, सब से पहले एक आटो लें, उस से किराया तय करें ताकि बाद में किसी तरह का झंझट न हो. फिर सामने वाले चौक से दाएं मुड़ें, वहां से आगे 2 चौराहे पार कर बाईं तरफ की रोड पर जाएं. फिर 4 फ्लाईओवर पार कर नूरानी महल की ओर आगे बढ़ें, तकरीबन 3 किलोमीटर चल कर सीधे हाथ को मुड़ जाएं. वहां 2 कालोनियां पार कर जनता फ्लैट्स मिलेंगे. ये जनाब वहीं कहीं रहते मिलेंगे.’’

हम उन की काबिलीयत पर कायल थे लेकिन हमें खुद पर शक हो रहा था कि क्या वास्तव में पता बदलने की कारस्तानी हम ने की भी है या नहीं. कहीं सच में हमारे मित्र मुंबई छोड़ कर लखनऊ तो नहीं आ बसे हैं? खैर, समझनासमझ के इस खेल में कतई स्पष्ट नहीं हो पाया कि कौन कितना समझ पाया था. जनाब से विदा ले कर हम अब अपनी मंजिल की तरफ रुख्सत हुए कि तपाक से एक आवाज सुनाई पड़ी. पीछे देखा तो वे ही बुजुर्गवार हमें अचरजभरी नजरों से ऐसे निहार रहे थे जैसे क्लास में कोई विद्यार्थी, टीचर द्वारा पूरा लेसन समझाने के बाद भी बेसिक गलती कर रहा हो. हम ने तौबा की और उन से छिपतेछिपाते अपने ठिकाने की तरफ बढ़ लिए.

सच में, हमारी यह अंतहीन खोज आज भी जारी है. इस का एक सुंदर पहलू और है, यदि आप के साथ कोई महिला है और इस अवस्था में आप किसी से कोई पता पूछते हैं तो पता बताने वालों की गंभीरता, शालीनता, समर्पण, सेवाभाव दोगुनातीनगुना हो जाता है. हमारी यह खोज निष्फल ही सही लेकिन यह सत्य है कि यह कवायद हमारे इंसान होने, दूसरों की समस्या के प्रति संवेदनशील होने का सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करती है. सामाजिक होने का यही तो फायदा है वरना पश्चिमी देशों की संस्कृति में यह खासीयत कहां मिलेगी. वहां फीस चुकाने के बाद भी गारंटी नहीं कि आप को ‘सर्विस प्रोवाइड’ कर ही दी जाए. हम भारतीयों का दिल बहुत बड़ा है और इस में अपने अलावा दूसरों के लिए भी खाली जगह हमेशा रहती है. हम दूसरों के लिए इतना सोच लें, यह तथ्य भी क्या कम है? हम ने मजाक किया, आप ने हमें सहन किया, यह भी तो हमारे उदारमना होने का संकेत है. धन्यवाद. Best Hindi Story

Husband Wife Story : बीवी और कुत्ता

Husband Wife Story : जसबीर की पत्नी खो गई. वे पुलिस में रिपोर्ट लिखवाने गए. इंस्पैक्टर ने पूछा, ‘कब खोई तुम्हारी पत्नी?’ जसबीर ने कहा, ‘7 दिन हो गए.’ इंस्पैक्टर हैरान हुआ, बोला, ‘मियां, 7 दिन हो गए, और आज आप आ रहे हैं रिपोर्ट लिखवाने? होश ठिकाने हैं न आप के? 7 दिनों तक कर क्या रहे थे?’ जसबीर ने कहा, ‘मुझे पहले यकीन ही नहीं हुआ. मैं तो चाहता था कि काश, पत्नी मुझे छोड़ कर चली जाए. जब पूरी तरह भरोसा हुआ कि हां, वह भाग गई है तभी मैं आया रिपोर्ट लिखवाने. अब तक तो वह बहुत दूर निकल गई होगी. आप खोजना भी चाहें तो भी उसे खोज नहीं पाएंगे. इसलिए चला आया रिपोर्ट लिखवाने.’

इंस्पैक्टर ने रिपोर्ट लिखना शुरू किया. उस ने जसबीर से पूछा, ‘आप की पत्नी की लंबाई कितनी थी?’ जसबीर ने कहा, ‘अब ऐसे भी कठिन सवाल मत किया करो. अपनी पत्नी को भी कोई नापता है क्या?’ इंस्पैक्टर ने पूछा, ‘लंबाई?’ कुछ पल के बाद जसबीर ने कहा, ‘यही मंझोले कद की होगी और क्या.’ इंस्पैक्टर ने पूछा, ‘कोई खास बात, कि जिस से उन्हें पहचाना जा सके?’ तो जसबीर ने कहा, ‘बड़ी बुलंद आवाज है उस की. दहाड़ दे तो पहाड़ हिल जाए, दिल कांपने लगें.’ लेकिन इंस्पैक्टर ने कहा, ‘आवाज का क्या, वे दहाड़ कर बोलें या कभी न भी बोलें. कोई ऐसा चिह्न बताओ जिस के सहारे उन्हें पहचानना आसान हो.’

जसबीर ने कहा, ‘कुछ नहीं, इंस्पैक्टर.’ फिर कहा, ‘दुख की बात यह है कि वह मेरे कुत्ते को भी साथ ले कर गई है.’ इंस्पैक्टर ने कहा, ‘ठीक है, कुत्ते की भी रिपोर्ट लिखवा दो.’ पहचान की बात आई तो जसबीर ने कहा, ‘अल्सेशियन कुत्ता, ढाई फुट लंबा, रंग काला. उस का एक कान सफेद रंग का है. बालों की लंबाई एक इंच, पिछले हर पैर की 2-2 उंगलियों के नाखून टूटे हुए हैं. हिंदी भाषा अच्छी तरह समझता है…’ उस ने पूरा ब्योरा अच्छी तरह से लिखा दिया. एक बात आखिर तक उस की समझ में हीं आई कि आखिर इंस्पैक्टर उस की तरफ अजीब नजरों से क्यों देख रहा था. Husband Wife Story

Family Story in Hindi : सीरियल औन अनाज गौन

Family Story in Hindi : ‘‘यह क्या, खाने में बैगन बनाए हैं… तुम्हें पता है न कि मुझे बैगन बिलकुल पसंद नहीं हैं. फिर क्यों बनाए? तुम चुनचुन कर वही चीजें क्यों बनाती हो, जो मुझे पसंद नहीं?’’ इन्होंने मुंह बना कर थाली परे सरकाते हुए कहा.

मैं भी थोड़ी रुखाई से बोली, ‘‘तो रोजरोज क्या बनाऊं? वही आलूमटर, गोभी…? सब्जियों के भाव पता हैं? आसमान छू रहे हैं. इस महंगाई में यह बन रहा है न तो इसे भी गनीमत समझो… जो बना है उसे चुपचाप खा लो.’’

ये चिढ़ते स्वर में बोले, ‘‘मुझे क्या अपने मायके वालों जैसा समझ रखा है कि जो बनाओगी चुपचाप खा लूंगा, जानवरों की तरह?’’

उफ, एक तो मेरे मायके वालों को बीच में लाना उस पर भी उन की तुलना जानवरों से करना. मैं ऐसे उफनी जैसे जापान के समुंदर में लहरें उफनती हैं, ‘‘मेरे मायके वाले आप की तरह नहीं हैं, वे चादर देख कर पैर फैलाते हैं. हुंह, घर में नहीं दाने और अम्मां चली भुनाने. पल्ले है कुछ नहीं पर शौक रईसों जैसे… इस महंगाई के जमाने में आप जो मुझे ला कर देते हैं न उस में तो बैगन की सब्जी भी नसीब नहीं हो सकती है… आए बड़े मेरे मायके वालों को लपेटने… पहले खुद की औकात देखो, फिर मेरे मायके की बात करो.’’

ये भी भड़क गए, ‘‘जितना देता हूं न वह कम नहीं है. बस, घर चलाने की अक्ल होनी चाहिए… मैं तुम्हारी जगह होता तो इस से भी कम में घर चलाता और ऊपर से बचत कर के भी दिखाता.’’

मेरी कार्यकुशलता पर आक्षेप? दक्षता से घर चलाने के बाद भी कटाक्ष? मैं भला कैसे चुप रह सकती थी… बोलना जरूरी था, इसलिए बोली, ‘‘बोलना बहुत आसान होता है… खाली जबान हिलाने से कुछ नहीं होता… 2 दिन घर संभालना पड़े तो नानीदादी सब याद आ जाएंगे. यह तो मैं ही हूं, जो आप की इस टुच्ची तनख्वाह में निर्वाह कर रही हूं… दूसरी कोई होती तो कब की छोड़ कर चली गई होती.’’

‘‘मैं ने तुम्हें रोका नहीं है. मेरी कमाई से पूरा नहीं पड़ रहा न, तो ढूंढ़ लो कोई ऐसा जिस की कमाई पूरी पड़ती हो… अच्छा है मुझे भी शांति मिलेगी,’’ कह इन्होंने जोर से हाथ जोड़ दिए.

अब तो मेरे सब्र का बांध टूट गया. जारजार आंसू बहने लगे. रोतेरोते ही बोली, ‘‘आ गई न दिल की बात जबान पर… आप चाहते ही हो कि मैं घर छोड़ कर चली जाऊं ताकि आप को छूट मिल जाए, मुझे नीचा दिखाने का बहाना मिल जाए. ठीक है, मैं चली जाऊंगी. देखती हूं कैसे रहोगे मेरे बिना… एक दिन बैगन की सब्जी क्या बना दी. इतना बखेड़ा कर दिया. अब चली जाऊंगी तो बनाते रहना, जो मन में आए और खाते रहना.’’और फिर मैं डाइनिंग टेबल से उठ कर अपने कमरे में आ गई और धड़ाम से दरवाजा बंद कर लिया.

दूसरे दिन बालकनी में कपड़े सुखा रही थी. कल का झगड़ा चेहरे पर पसरा हुआ था. उदासी आंखों के गलियारे में चक्कर लगा रही थी. बोझिल मन कपड़ों के साथ झटका जा रहा था. मैं अपने काम में व्यस्त थी और मेरी पड़ोसिन अपने काम में. पर वह पड़ोसिन ही क्या जो अपनी पड़ोसिन में बीमारी के लक्षण न देख ले और बीमारी की जड़ को न पकड़ ले. अत: उस ने पूछा, ‘‘लगता है भाई साहब से झगड़ा हुआ है?’’

खुद को रोकतेरोकते भी मेरे मुंह से निकल ही गया, ‘‘हां, इन्हें और काम ही क्या है सिवा मुझ से झगड़ने के.’’

पड़ोसिन हंस दी, ‘‘वजह से या बेवजह?’’

‘‘झगड़ा ही करना है तो फिर कोई भी वजह ढूंढ़ लो और झगड़ा कर लो. मैं तो कहती हूं ये आदमी शादी ही इसलिए करते हैं कि घर में ले आओ एक प्राणी, एक गुलाम, एक सेविका, एक दासी जो इन के लिए खाना पकाए, घर संवारे, इन के कपड़े धोए और बदले में या तो आलोचना सहे या फिर झगड़ा झेले. हुंह…’’ कह मैं ने कपड़े जोर से झटके.

मेरी पड़ोसिन खिलखिला कर हंस दी, ‘‘अरे, पर झगड़ा हुआ क्यों?’’

मैं ने बताया, ‘‘इन्हें बैगन पसंद नहीं और कल मैं ने बैगन की सब्जी बना दी. बस फिर क्या था सब्जी देखते ही भड़क उठे.’’

पड़ोसिन की हंसी नहीं रुक रही थी. बड़ी मुश्किल से हंसीं रोक कर बोली, ‘‘अच्छा, यह बता कि तुम लोग खाना खाते समय टीवी बंद रखते हो?’’

मैं ने हैरानी से कहा, ‘‘हां, मगर टीवी का और खाने का क्या संबंध?’’

उस ने कहा, ‘‘है टीवी और खाने का बहुत गहरा संबंध है. मेरे यहां तो सभी टीवी देखतेदेखते खाना खाते हैं. सब का ध्यान टीवी में रहता है तो किसी का इस तरफ ध्यान ही नहीं जाता कि खाने में क्या बना है और कैसा बना है? है न बढि़या बात? वे भी खुश और मैं भी टैंशन फ्री वरना तो रोज की टैंशन कि क्या बनाया जाए… अब तू ही बता रोजरोज बनाएं भी क्या?’’

मैं ने कहा, ‘‘वही तो… रोज सुबह उठो तो सब से पहले यही प्रश्न क्या बनाऊं? सच कहूं आधा समय तो इस क्या बनाऊं, क्या बनाऊं में ही निकल जाता है. ऊपर से फिर यह भी पता नहीं कि इन्हें पसंद आएगा या नहीं, खाएंगे या नहीं और फिर वही झगड़ा.’’

पड़ोसिन ने सुझाव दिया, ‘‘हां तो तू वही किया कर जैसे ही ये खाना खाने बैठें टीवी चला दिया. उन का ध्यान टीवी पर रहेगा तो खाने पर ध्यान नहीं जाएगा और फिर झगड़ा नहीं होगा.’’

मैं उस की सलाह सुन भीतर आ गई. फिर मन ही मन तय कर लिया आज से ही मिशन डिनर विद टीवी शुरू…

शाम को मैं ने टीवी देखना शुरू किया. स्टार प्लस, सब, जी, सोनी देखतेदेखते ही खाना बनाया. टीवी देखतेदेखते ही खाना लगाया और टीवी दिखातेदिखाते ही खिलाया. आश्चर्य, ये भी सीरियल देखतेदेखते आराम से खाना खा गए. हालांकि सब्जी इन की मनपसंद थी फिर भी कुछ बोले नहीं. न आह न वाह. फिर तो रोज का काम हो गया. मैं खाना बनाती, ये टीवी देखतेदेखते खा लेते. सब कुछ शांति से चलने लगा. पर अब दूसरी मुसीबत शुरू हो गई. इन का पूरा ध्यान टीवी में रहने लगा. मुझे गुस्सा आने लगा. जब देखो आंखें फाड़फाड़ कर सीरियल की हीरोइनों को देखते रहते. मेरा खून खौलता रहता. हद तो यह भी थी कि टीवी देखतेदेखते बस खाते रहते, खाते रहते गोया गब्बर की तरह यह डायलौग रट लिया हो कि जब तक यह टीवी चलेगा हमारा खाना चलेगा. अब मेरा किचन का बजट गड़बड़ाने लगा. एक दिन ये टीवी देखतेदेखते खाना खा रहे थे. जैसे ही इन्होंने एक और रोटी की डिमांड की मैं भड़क गई, ‘‘मैं ने यहां ढाबा नहीं खोल रखा है, जो रोटी पर रोटी बनाती रहूं और खिलाती रहूं… तोंद देखी है अपनी, कैसी निकल रही है.’’

इन्होंने टीवी में नजरें गड़ाए हुए ही जवाब दिया, ‘‘अब तुम खाना ही इतना अच्छा बनाती हो तो मैं क्या करूं? मन करता है खाते रहो खाते रहो… लाओ अब जल्दी से 1 चपाती और लाओ.’’

उफ यह… कुछ दिनों पहले तक तो खाने पर झगड़ा करते थे और अब खाना खाने बैठते हैं तो उठने का नाम ही नहीं लेते. अत: गुस्से से इन की थाली में चपाती रखते हुए मैं ने कहा, ‘‘बंद करो अब खाना खाना भी और टीवी देखना भी, कहीं ऐसा न हो चंद्रमुखी की आंखों में डूब ही जाओ…’’

इन्होंने कौर मुंह में दबाते हुए कहा, ‘‘तो प्रिया कपूर की जुल्फें है न, उन्हें पकड़ कर बाहर निकल आएंगे.’’

मैं गुस्से से तिलमिला गई, ‘‘और मैं जो हड्डियां तोड़ूंगी तब क्या करोेगे?’’

ये हंसने लगे, ‘‘तो डाक्टर निधि है न, इलाज के लिए.’’

मेरा मन किया कि टेबल पर पड़े सारे बरतन उठा कर पटक दूं… एक परेशानी से निकलना चाह रही थी दूसरी में उलझ गई.

अब मैं खाने में कुछ भी बनाऊं ये कुछ नहीं कहते. दाल पतली और बेस्वाद हो ‘लापतागंज’ की इंदुमति के चटपटेपन के साथ खा लेंगे. आलूमटर की सब्जी में मटर न मिलें तो ‘बड़े अच्छे लगते हैं’ के गोलू राम को गटक लेंगे. प्लेट से सलाद गायब हो तो ‘तारक मेहता’ के सेहत भरे संवाद हैं न? मीठानमकीन नहीं है पर ‘चौटाला’ की मीठीनमकीन बातें तो हैं न? आज पनीर नहीं बना कोई बात नहीं टोस्टी की टेबल पर से कुछ उठा लेंगे.

मतलब यह कि इधर सीरियल चलने लगे. उधर मेरा सीरियल (अनाज) उड़ने लगा. अब तो जो भी बनाऊं अच्छा लगे न लगे सीरियल के साथ चटखारे ले ले कर खाने लगे. मैं अब फिर परेशान हूं कि क्या करूं क्या न करूं. कुछ समझ में नहीं आ रहा.

महंगाई से निबटने और झगड़े से बचने के लिए सीरियल दिखातेदिखाते खाना खिलने की सलाह पर अमल किया था. पर मेरे साथ तो उलटा हो गया. अब सब कुछ मुझे डबल बनाना पड़ता है वरना भूखा रह गया का आलाप सुनना पड़ता है. Family Story in Hindi

Hindi Satire Story : अफसरी के चंद नुसखे

Hindi Satire Story : सरकारी अफसरी के मजे लेने हैं जनाब तो अपने मातहत बाबुओं पर चुनिंदा नुसखे आजमाइए, फिर देखिए, कैसे ये कामचोर, चापलूस और भ्रष्ट बाबू ‘पग घुंघरू बांध’ आप के इशारे पर ताताथइया करते नजर आते हैं.

अगर आप भारत की प्रथम श्रेणी सेवा में भरती हुए हैं और शीघ्र ही आप को किसी कार्यालय का कार्यभार मिलने वाला है तो आप को सफलतापूर्वक कार्यालय संचालित करने व अपने मातहतों से निष्ठापूर्वक इच्छित कार्य करवाने के कुछ उपाय बताए जा रहे हैं. इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़ें और उन पर अमल करें. आप एक सफल अधिकारी सिद्ध होंगे और 10 साल की सेवा के बाद आप को श्रेष्ठ अधिकारी का मैडल व 15 साल की सेवा के बाद अति विशिष्ट अधिकारी का मैडल मिल जाएगा.

सर्वप्रथम कार्यभार संभालते ही आप एक गोष्ठी आयोजित करें और उस में सभी से अकड़ कर बात करें. यह सिद्ध करने का प्रयत्न करें कि आप बहुत ही ईमानदार, कठोर व अनुशासित अधिकारी हैं. कार्यालय में किसी प्रकार की कामचोरी, भ्रष्टाचार व अनुशासनहीनता आप बरदाश्त नहीं करते. कार्य में लापरवाही बरतने के लिए आप कर्मचारी को निलंबित ही नहीं करते बल्कि त्वरित कार्यवाही कर के उसे बरखास्त भी कर देते हैं.

धीरेधीरे आप कर्मचारियों और कनिष्ठ अधिकारियों के चरित्र का अध्ययन करें. आप के पदभार ग्रहण करते ही कुछ चाटुकार, कामचोर, भ्रष्ट और बौस के प्रति सेवाभाव वाले कर्मचारीअधिकारी आप के इर्दगिर्द गुड़ के ऊपर मक्खी की तरह मंडराने लगेंगे. ये प्रथम श्रेणी के कर्मचारी होते हैं. उन से आप को होशियार होने की आवश्यकता नहीं है, बस उन के गुणों को पहचानने की आवश्यकता है. वे आप के प्रत्येक व्यक्तिगत कार्य के लिए सब से उपयुक्त प्राणी हैं. वे कार्यालय का कार्य भले ही न करते हों, अधिकारी के व्यक्तिगत कार्य पूरी निष्ठा, लगन और अनुशासन से करते हैं. प्रत्येक कार्यालय में ऐसे 10 से 20 प्रतिशत कर्मचारी होते हैं.

अब हम प्रथम श्रेणी के ऐसे कर्मचारियों की चर्चा विस्तार से करते हैं. इस किस्म के कर्मचारी या कनिष्ठ अधिकारी कभी समय पर कार्यालय नहीं आते और कार्यालय में आने के बाद भी कभी अपनी सीट पर नहीं मिलते. उन का प्रिय स्थान होता है कार्यालय की कैंटीन या जाड़े के दिनों में बाहर के खूबसूरत, हरेभरे लौन, जिन पर पसर कर ये मूंगफली चबाते हैं या ताश के पत्ते फेंटते दिखाई पड़ते हैं. उन को बौस कभीकभार ही ढूंढ़ता है, जब उसे कोई अपना व्यक्तिगत कार्य करवाना होता है, वरना वे खुले सांड़ की तरह सड़क पर विचरती खूबसूरत और कमसिन गायों को ताकते रहते हैं.

एक सक्षम अधिकारी के नाते आप इस श्रेणी के कर्मचारियों से निम्न प्रकार के कार्य करवा सकते हैं :

  1. कर्मचारियों की योग्यता पहचान कर उन्हें भिन्नभिन्न कार्यों में लगा सकते हैं, जैसे बच्चों को स्कूल छोड़ना और लाना, बाजार से खाद्य सामग्री व घरेलू सामान की खरीदारी, नातेरिश्तेदारों के बच्चों को स्कूलकालेज में ऐडमिशन दिलवाना, यात्राटिकट करवाना, अतिथियों के लिए गेस्टहाउस आदि का प्रबंध करना, बौस के दौरे पर खानेपीने की व्यवस्था से ले कर वातानुकूलित गाड़ी का प्रबंध आदि करना. प्रथम श्रेणी के कर्मचारी इन कार्यों को विधिवत व पूरी कर्मण्यता के साथ पूरा करते हैं.
  2. आप को जमीन खरीद कर उस पर मकान बनवाना है तो ऐसे कर्मचारी आप के बड़े काम आएंगे. आप को कुछ करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. बौस के व्यक्तिगत कार्य करवाने की उन में इतनी क्षमता होती है कि प्रौपर्टी डीलर और रजिस्ट्रार स्वयं आ कर आप के कार्यालय में आप के प्लौट या फ्लैट की रजिस्ट्री कर जाएंगे.
  3. मकान बनवाने के लिए नक्शा बनवाने से ले कर, ठेकेदार से बात करने और भवन सामग्री का प्रबंध करने तक का सारा कार्य वे बहुत आसानी और सुविधा से कर देते हैं. आप को भवन निर्माण के अंतिम चरण तक कहीं जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती. बस, निर्माण की गति और गुणवत्ता देखने के लिए कभीकभार अवश्य पधार सकते हैं.
  4. गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय से वे बौस के विदेश जाने के कार्यक्रम भी बनवा देते हैं. संबंधित अधिकारी से फाइल को त्वरित गति से हरी झंडी दिलवा कर बौस को विदेश भेज देते हैं.
  5. पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसैंस, पैन कार्ड आदि तुरंत बनवा देते हैं.
  6. बेगम को खरीदारी करनी हो तो उन्हें साथ भेज दीजिए, सारी खरीदारी मुफ्त हो जाती है, आप की बचत हो जाती है.
  7. किसी एक विश्वसनीय कर्मचारी को आप बहुत ही गोपनीय कार्य के लिए चुन सकते हैं, जैसे आप के लिए सुविधाशुल्क वसूलने का कार्य. इस कार्य में वे इतनी ईमानदारी बरतते हैं कि आप के कान को भी भनक नहीं लगने देते और सारा माल आप के बताए हुए निर्दिष्ट स्थान तक पहुंच जाता है.
  8. आप के घर में कोई सगासंबंधी आए तो उसे घुमानेफिराने के लिए आप परेशान न हों, बस उन्हीं में से किसी कर्मचारी को लगा दें. वह आप के रिश्तेदार को आप से भी बड़ा बौस मान कर नगर के सभी स्थलों का भ्रमण मुफ्त में करवा देगा, अच्छे से अच्छे रेस्तरां में भोजन करवा देगा और आप की जेब से एक कौड़ी भी खर्च नहीं होगी.
  9. ऐसे कर्मचारी बिना किसी स्वार्थ के होलीदीवाली आप के परिवार के सभी सदस्यों के लिए महंगेमहंगे उपहार लाते हैं, इसलिए आप इन की सदैव प्रशंसा करते रहें.
  10. चूंकि ऐसे कर्मचारी आप के सारे व्यक्तिगत कार्य करवाते हैं, इसलिए उन को हमेशा प्रोत्साहित करते रहें. समयसमय पर उन को नकद इनाम के साथसाथ श्रेष्ठतम कर्मचारी का प्रमाणपत्र भी देते रहें. अवधि होने पर सरकार से उन के लिए पदक की अनुशंसा करें. 15 अगस्त और 26 जनवरी पर सरकार प्रतिवर्ष इस प्रकार के कर्मचारियों और अधिकारियों को पदक देती है.
  11. ऐसे कर्मचारी बिना अस्पताल में भरती हुए, कुछ लाइलाज बीमारियों का इलाज करवाने के मैडिकल बिल हर महीने जमा करते हैं, आप आंख मूंद कर उन को पास कर दें, अन्यथा वे वास्तव में बीमार पड़ जाते हैं. ऐसी स्थिति में आप के सभी आवश्यक कार्य रुक सकते हैं.

वहीं, दूसरी श्रेणी के कर्मचारी और कनिष्ठ अधिकारी वे होते हैं जो सरकारी काम के प्रति पूरी तरह से समर्पित होते हैं. वे घुग्घू प्रकार के जीव होते हैं जो बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के मन लगा कर, पूरी ईमानदारी, निष्ठा और लगन से कार्यालय का काम करते रहते हैं और हमेशा डांट खाते रहते हैं. आप उन को अच्छी तरह पहचान लीजिए और उन से ज्यादा से ज्यादा काम करवाने के लिए आप निम्नलिखित उपायों को उपयोग में लाएं ?:

इस प्रकार के कर्मचारी और अधिकारी चाहे जितना ही अच्छा और साफसुथरा कार्य करें, आप उन के अच्छे कार्य की कभी तारीफ न करें, वरना वे गरूर में आ जाएंगे और यह समझ कर कि आप उन के ऊपर निर्भर करते हैं, वे कार्य के प्रति कोताही, लापरवाही और ढीलापोली करने लगेंगे.

आप ऐसे कर्मचारियों और कनिष्ठ अधिकारियों को कार्य में लापरवाही बरतने के लिए हमेशा डांटते रहें. कार्य अगर समय से पहले भी कर के दे दें, तब भी आप उन से कहें कि कार्य में देरी क्यों लगाई? उन को डांटने का काम आप प्रथम श्रेणी के कर्मचारियों के सामने करें.

ऐसे कर्मचारियों या कनिष्ठ अधिकारियों को कभी भी आप अपने सामने कुरसी पर बैठने के लिए न कहें, चाहे आप के सामने उन से छोटा कर्मचारी आप का व्यक्तिगत कार्य करने के लिए बैठा हो. इस से उन के मन में हीनभावना आएगी और भविष्य में अधिक अनुशासन के साथ आप के समक्ष पेश होंगे.

कभी कभी उन को डराने के लिएज्ञापन भी देते रहें और उन पर अनुशासनात्मक कार्यवाही करने की धमकी भी देते रहें. ज्ञापन के प्रत्युत्तर पर चेतावनी अवश्य दें.

इस प्रकार के जीव से आप कभी भी सीधे मुंह बात न करें. चूंकि वे अनुशासित और कार्य के प्रति समर्पित जीव होते हैं, उन को कार्य करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं आता, इसलिए आप को खुश रखने के लिए वे और अधिक ईमानदारी से कार्य करते हैं. उन के ही कारण कार्यालय का काम कभी अधूरा नहीं रहता, परंतु उन को इस बात का एहसास न होने दें, वरना वे काम करना बंद कर देंगे.

ऐसे कर्मचारियों को सदैव किसी न किसी काम में उलझाए रखें. काम न हो, तब भी उन्हें कोई न कोई काम देते रहें, जैसे फाइलों में पृष्ठ संख्या डालें, पुरानी फाइलों के कवर बदलें, नष्ट करने वाली पुरानी फाइलों की सूची बनाएं आदि. कार्यालय में बहुत से ऐसे निरर्थक कार्य होते हैं जिन में घुग्घू टाइप के कर्मचारियोंअधिकारियों को आप उलझाए रख सकते हैं और वे पिद्दी की तरह यह सोच कर खुश होते हैं कि बौस उन के ऊपर बहुत अधिक भरोसा करते हैं, इसलिए हर प्रकार के छोटेबड़े काम उन्हीं से करवाते हैं. उन को यह नहीं मालूम पड़ता कि बौस उन का शोरबा बना कर धीरेधीरे चुस्की ले कर पी रहे हैं.

ऐसे कर्मचारियों से निरर्थक कार्य करवाने व उन्हें व्यस्त रखने का लाभ यह होता है कि उन्हें कभी यह सोचने का मौका नहीं मिलता कि उन का शोषण किया जा रहा है.आप स्वयं किसी मामले में कोई फैसला न लें, ऐसे में आप पर कोई जिम्मेदारी आ सकती है. इसलिए ऐसे मामलों को घुमा कर कनिष्ठ अधिकारी की मेज पर लौटा दें और कुछ ऐसी जानकारियां मांग लें, जिन का उत्तर देने में कनिष्ठ अधिकारी और कर्मचारी को अत्यधिक समय लग जाए और तब तक मूल प्रश्न ही दब कर रह जाए या उस की प्रासंगिकता समाप्त हो जाए.

भूले से भी कभी ऐसे कर्मचारियों और अधिकारियों को कोई पारितोषिक, इनाम या श्रेष्ठता का प्रमाणपत्र न दें, बल्कि उन की वार्षिक रपट में भी कभी उत्तम या श्रेष्ठ कर्मचारी की श्रेणी न दें. उन को बस औसत श्रेणी ही दें, या अधिकतम देना ही पड़े तो ‘अच्छा’ की श्रेणी से अधिक न दें.

ऐसी श्रेणी के कर्मचारीअधिकारी कभीकभी किसी के उकसाने पर अगर कोई प्रतिवेदन देते हैं कि उन से अत्यधिक कार्य लिया जाता है या काम के अनुरूप उन को प्रोत्साहन नहीं दिया जाता तो उस पर कभी विचार न करें और अगर करें भी तो उस पर ‘विश्वसनीय नहीं’ की टिप्पणी के साथ बंद कर दें. साथ ही, भविष्य में अनुशासित और सावधान रहने की चेतावनी दे कर व्यक्तिगत पंजिका में दर्ज भी करवा दें. प्रतिवेदन देने वाला कर्मचारीअधिकारी भविष्य में भूल कर भी अपने प्रति किसी ज्यादती की शिकायत नहीं करेगा.   ऐसे कर्मचारियों को कभी अवकाश न दें. मन मार कर देना भी पड़े तो आवश्यकता से कम अवकाश दें, ताकि वे हमेशा दबाव में रहें और आप का हर जायजनाजायज कहना मानते रहें.

मुझे विश्वास है कि अगर आप ने उपरोक्त सुझावों पर अमल किया तो आप एक अनुशासित और ईमानदार अधिकारी के रूप में प्रतिष्ठित हो जाएंगे और फिर आप के खिलाफ कोई सांस लेने की जुर्रत भी नहीं कर पाएगा. तब आप मनमाने ढंग से सरकारी कार्यों को उलटापुलटा कर के बेहिसाब ‘कमाई’ कर सकते हैं. तुलसीदासजी डंके की चोट पर कह गए हैं कि ‘भय बिनु प्रीत न होय गुसाईं’ अर्थात आप अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को डरा कर रखेंगे, तभी वे आप का सम्मान करेंगे.हमारे बुजुर्गों के अनुभवों से लाभ उठाएं और एक सफल अधिकारी बन कर दिखाएं. Hindi Satire Story

Satire Story in Hindi : हा हा…कार

Satire Story in Hindi : कम्बख्त कार के कारनामे भी अजीबोगरीब हैं. कभी किसी बेकार के साथ चमत्कार करती है तो कभी मक्कार को दुत्कार देती है. दरअसल ‘कार’ से जुड़े इस नए शब्दकोष ने लोगों की जिंदगी में कैसे हाहाकार मचा रखा है, आप भी बूझिए.

अब से 2 दशक पहले तक कार शानोशौकत, दिखावे और विलास की वस्तु समझी जाती थी. पैसे वाले ही इसे खरीद पाते थे. आम जन इसे अपनी पहुंच से दूर समझते थे और अनावश्यक भी. लोग दालरोटी के जुगाड़ को ही अपना लक्ष्य समझते थे. संजय गांधी ने पहली बार देश के लोगों को छोटी कार का सपना दिखाया और मारुति कार जब देश में बनने लगी तो इस ने स्कूटर वालों के कार के सपनों को हकीकत में बदल दिया और बदल दीं इस के साथ कई परिभाषाएं और अर्थ. अब तो कहावत बन गई है कि ‘पति चाहे अनाड़ी हो पर पास में एक गाड़ी हो तो जिंदगी सब से अगाड़ी रहती है.’

तो भाइयो, गाड़ी आजकल लगभग सब के पास है और जिन के पास नहीं है वे भी अपना शौक टैक्सी से पूरा कर लेते हैं. हां, गाड़ी यानी कार के इस्तेमाल के आधार पर समाज 3 वर्गों में बंट गया है. पहला वर्ग तो वह है जो रोजरोज के आनेजाने में अपनी कार का ही इस्तेमाल करता है, दूसरा कोई साधन इस्तेमाल नहीं करता. दूसरा वर्ग वह है जो अपनी कार में सप्ताह में एक दिन, अकसर रविवार को अपने परिवार सहित सैर को निकलता है और शाम की चायनाश्ता किसी रेस्तरां, रिश्तेदार या मित्र के पास करता है. तीसरे वर्ग में वे लोग आते हैं जो अपनी कार की सफाई तो पूजा की तरह रोज करते हैं, पर उस का इस्तेमाल कभीकभार ही करते हैं, जैसे किसी शादीब्याह में या परिवार के किसी गंभीर बीमार को अस्पताल में ले जाने में.

खैर, कहने का तात्पर्य यह कि कार अब के जमाने में परिवार का अंग बन चुकी है. इस के सर्वव्यापक अस्तित्व के कारण कई शब्दों के अर्थ और परिभाषाएं बदल चुकी हैं. यहां छोटी कार के आगमन से जो ‘कार वाले’ बन गए हैं उन की ओर से कुछ शब्दों की नई परिभाषाएं व अर्थ प्रस्तुत किए जा रहे हैं. भाषाशास्त्रियों से विनम्र निवेदन है कि निम्नलिखित परिभाषाओं को शब्दकोष में विधिवत सम्मिलित करें :

बेकार : जिस व्यक्ति के पास आज के समय में कार नहीं है, उसे लोग (खासकर महिलाएं) ‘बेकार’ कहते हैं, चाहे वह कोई भी चंगी नौकरी या व्यवसाय क्यों न करता हो. यानी कार नहीं है तो अच्छाखासा बंदा बेकार है.

साकार : जिस व्यक्ति के पास ‘कार’ हो उसे ‘साकार’ कहते हैं यानी दुनिया को वही नजर आता है जिस के पास कार होती है. पैदल, यहां तक कि दुपहिया वाहन वालों का भी अस्तित्व खतरे में है.

निराकार : साधन संपन्न होते हुए भी जो व्यक्ति जानबूझ कर कार नहीं खरीदता उसे ‘निराकार’ कहा जाता है. कार कंपनियां ऐसे ही ‘निराकार’ सज्जनों को साकार बनाने का भरसक प्रयत्न करती रहती हैं.

चमत्कार : जिस व्यक्ति की आय का साधन भले ही लोगों को नजर न आए, फिर भी उस ने कार रखी है, तो उसे लोग ‘चमत्कार’ कहते हैं. हमारे महल्ले के मंदिर के पुजारी ने कार रखी है. उसे भी लोग ‘चमत्कार’ कहते हैं. यह दीगर है कि ऐसे चमत्कारों पर आयकर विभाग की नजर भी रहती है.

बदकार : कई कार मालिक बड़े रसिक होते हैं. अपने दोस्तों को अपनी कार में बिठा कर वे किसी एकांत स्थान पर रुक कर कार में शराब पीने का आनंद लेते हैं और कई तो अवैध कर्म भी करते हैं. ऐसे कार मालिकों को ‘बदकार’ कहा जाए तो क्या नुकसान है?

स्वीकार : जिस व्यक्ति ने अपने ससुर से दहेज में कार स्वीकार की हो उसे ‘स्वीकार’ की संज्ञा देना उचित होगा.

मक्कार : बैंक से ऋण ले कर कार तो खरीद ली पर ऋण की किस्त चुकाने में जो आनाकानी करता है, ऐसे कार मालिक को ‘मक्कार’ कहना बिलकुल सही होगा. बैंकों से अनुरोध है कि वे इस शब्द को अपनी शब्दावली में शामिल कर लें.

स्वर्णकार : जिस व्यक्ति ने अपनी पत्नी के सोने के गहने बेच कर कार खरीदने का दुस्साहस किया हो उसे ‘स्वर्णकार’ कहलाने का हकदार होना चाहिए.

पैरोकार : कार का ऐसा मालिक जो पैदल चलने में अपना अपमान समझता हो यानी कार के बाहर अपने पैर भी न रखता हो, उसे ‘पैरोकार’ कहना उचित होगा.

सरोकार : जो कार मालिक सिर्फ कार वालों से ही मिलनाजुलना पसंद करते हैं, उन्हीं में ब्याहशादी का संबंध स्थापित करने में विश्वास रखते हैं और बाकी दुनिया से कोई सरोकार रखना नहीं चाहते उन्हें ‘सरोकार’ कह कर बुलाया जाए.

चीत्कार : कारें भी कई तरह की होती हैं और चलाने वाले भी. जो व्यक्ति अपनी कार को भीड़भाड़ वाले इलाके में भी चीते की गति से चलाता हुआ ले जाता है उसे ‘चीत्कार’ कहना उपयुक्त होगा. पर अगर उस से किसी को टक्कर लग जाए तो लोग अपनेआप ही उसे ‘फटकार’ कहने लगेंगे.

ललकार : जो व्यक्ति अपने पड़ोसी से ज्यादा महंगी कार खरीद कर ले आए और रोज अपने घर से निकलते वक्त उक्त पड़ोसी के घर के सामने अपनी महंगी कार का हौर्न बारबार बजाए, ऐसे को हम ‘ललकार’ कहना पसंद करेंगे.

हाहाकार : जिस व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को देखते हुए पड़ोसियों को कोई उम्मीद न हो कि वह भी कभी कार खरीद सकता है और वह अचानक नई कार खरीद कर अपने दरवाजे के सामने खड़ी कर दे तो पड़ोसियों के घरों में तो हाहाकार मचना स्वाभाविक है. ऐसा कारनामा करने वाले को ‘हाहाकार’ कहना कोई अतिशयोक्ति न होगी.

फनकार : कई ऐसे धुरंधर हैं जो महीनों तक बिना ड्राइविंग लाइसैंस और गाड़ी के रजिस्टे्रशन के अपनी कार चलाते रहते हैं. पर क्या मजाल कि कोई पुलिस वाला उन का चालान कर दे. जिस महानुभाव को ऐसा फन हासिल हो, उसे ‘फनकार’ कहा जाए तो क्या हर्ज है?

चित्रकार : इस परिभाषा को लिखने से पहले मैं दुनिया छोड़ चुके महान आर्टिस्ट एम एफ हुसैन और उन की जमात के लोगों से क्षमा मांगता हूं. कई व्यक्तियों को अपनी कार के शीशों और बौडी पर अजीबोगरीब स्टिकर सजाने का जनून होता है. इसी प्रकार के व्यक्ति को, जिस ने अपनी कार को कैनवास की तरह इस्तेमाल किया हो, उसे ‘चित्रकार’ के नाम से सम्मानित किया जाए.

कलाकार : वैसे तो किसी कवि या लेखक के लिए कार खरीदना असंभव जैसा है फिर भी कई हिम्मत वाले लेखक घर के खर्चों में कटौती कर के कार खरीदने का सपना पूरा कर लेते हैं. ऐसे ही किसी कवि या लेखक को जिस ने कार रखी हो, ‘कलाकार’ कहना उचित होगा.

फुफकार : कई कार चालक बड़े गुस्सैल होते हैं. पैट्रोल की महंगाई ने ज्यादातर को ऐसा बना दिया है. वे अपना गुस्सा अपने विरोधी पर अपनी कार के साइलैंसर से धुआं फेंक कर निकालते हैं. ऐक्सिलरेटर को बारबार दबा कर ऐसा धुआं फेंकेंगे मानो कोई सांप फुफकार रहा हो. ऐसे गुस्सैल कारचालक को ‘फुफकार’ ही कहना चाहिए.

दुत्कार : अमीर लोगों को अब इस बात की ईर्ष्या होती है कि ऐरेगैरे आदमियों ने भी कार रख ली है, चाहे छोटी कार ही क्यों न हो. तो अब कई अमीर लोगों ने अपनी बड़ी कारों में प्रैशर हौर्न फिट करवा लिए हैं. जब वे कोई छोटी कार देखते हैं तो उस से आगे निकलते हुए बारबार अपने प्रैशर हौर्न से बड़ी भयावह आवाज पैदा करते हैं, मानो छोटी कार वालों को दुत्कार रहे हों. ऐसे ईर्ष्यालु, अमीर कार मालिक को ‘दुत्कार’ के नाम से नवाजा जाए.

नकारा : जिस व्यक्ति ने बहुत ही पुराने मौडल की कार खरीदी हो और जैसेतैसे हांक कर कार वालों की श्रेणी में रहने का प्रयास करता हो, उसे ‘नकारा’ कहना बिलकुल सही होगा.

कार सेवा : अपनी कार की हर रोज, साप्ताहिक या मासिक धुलाई और साफसफाई को आजकल ‘कार सेवा’ कहते हैं.

नाटककार : कार के ऐक्सिडैंटल डैमेज के झूठे बिल बना कर जो कार मालिक बीमा कंपनियों से पैसा ऐंठता है, उन जैसा नाटककार और कहां मिलेगा, इसलिए उसे ‘नाटककार’ कहा जाए.

हमारे पास अभी शब्द तो और भी बहुत हैं जिन की परिभाषाएं और अर्थ बदल चुके हैं पर स्थानाभाव से अभी इतना ही लिख कर समाप्त करता हूं. ऐसा न हो कि ‘सरकार’ ही मुझ से नाराज हो जाए. जब ये परिभाषाएं शब्दकोश में शामिल हो जाएंगी तो यह ‘कथाकार’ और बहुत से अर्थ व परिभाषाएं ले कर आप के सामने उपस्थित हो जाएगा. आप स्वयं भी जानकार हैं इसलिए अपनी प्रतिक्रिया अवश्य बताइए, धन्यवाद. Satire Story in Hindi

Satirical Story In Hindi : सरकारी बाबू

Satirical Story In Hindi : जब से बाबू लोगन की नकेल कसने के लिए बायोमीट्रिक हाजिरी मशीन लगी है, हर बाबू के कान खड़े हो गए हैं. हालांकि घबराने की बात नहीं है क्योंकि इन्होंने समय का पाबंद होने के बजाय इस मशीन से निबटने का बेहतरीन आइडिया निकाल लिया है. क्या है वह आइडिया, जरा आप भी दिमागी घोड़े  दौड़ाइए.

हमारे सरकारी दफ्तर में सभी कर्मचारियों को समय का पाबंद बनाने के लिए उन के फिंगर इंप्रैशन और फोटो रिकौर्ड में लेने के बाद इलैक्ट्रौनिक ‘बायोमीट्रिक हाजिरी प्रणाली’ की नई व्यवस्था चालू कर दी गई. नई व्यवस्था के बाद अब यदि हमारे दफ्तर के कर्मचारियों को ‘सरकारी पिंजरे में बंद पशुपक्षी’ कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति न होगी.

पशु इसलिए क्योंकि हाथी, घोड़ों, कुत्तों, यहां तक कि गधे जैसा स्वभाव व व्यवहार करने वाले लोग भी यहां पाए जाते हैं, जो अपने अहंकार के आगे इंसान को इंसान नहीं समझते. पक्षी इसलिए कि यहां पर कोयल की सुरीली आवाज वाली और मोर जैसी सुंदर, आकर्षक, शृंगारयुक्त व सुडौल महिलाएं भी होती हैं और बगुला भगत तो एक नहीं कई होते हैं. विशेषकर जिन्हें अपने दूरदराज के क्षेत्रों में स्थानांतरण व शीघ्र ही पदोन्नति पाने की चिंता होती है, उन्हें आला अधिकारियों का बगुला भगत बनते देर नहीं लगती.

कर्मचारियों को समय का पाबंद बनाने के लिए लगी बायोमीट्रिक हाजिरी प्रणाली मशीन लगने के बाद एक कर्मचारी ने अपने साथियों से कहा, ‘‘साथियो, सुबह साढ़े 9 बजे बायोमीट्रिक मशीन में अपनी हाजिरी लगा कर सभी लोग दफ्तर के गार्डन में पीछे की तरफ आ जाया करो. अब तो एकएक ताश की बाजी सुबहसुबह 10 से 11 के बीच में भी हो जाया करेगी और लंच टाइम में तो हमें कोई रोक ही नहीं सकता.’’

दूसरे कर्मचारी ने भी चुसकी ली और बोला, ‘‘साथियो, बायोमीट्रिक मशीन में सुबहशाम अपनी हाजिरी के लिए उंगली (फिंगर इंप्रैशन) लगाना ठीक है, परंतु यदि गलती से भी कहीं और लगा दी तो अच्छा नहीं होगा. इसलिए इसे रास्ते चलते अपनी आदत मत बना लेना. गलती से भी यदि आप की उंगली भीड़भाड़ में किसी महिला के शरीर से टच हो गई तो जेल की हवा भी खानी पड़ सकती है. पता होना चाहिए कि महिलाओं के संबंध में कानून व्यवस्था अब बहुत सख्त हो गई है.’’

लेखानुभाग में उपस्थित एक क्लर्क पुरुष बोला, ‘‘साथियो, सुबहसवेरे बायोमीट्रिक मशीन में उंगली लगा कर सीधे ही सभी लोग सभागार में पहुंच जाया करो. थोड़ी गपशप और चायशाय हो जाया करेगी. काम तो 11 बजे से पहले नहीं शुरू हो पाएगा. जब तक सफाई कर्मचारी कक्ष का अच्छी तरह से झाड़ूपोंछा नहीं कर लेते तब तक हम तो अपने कक्ष में बिलकुल भी नहीं बैठ सकते.’’

दूसरा क्लर्क पुरुष बोला, ‘‘अरे यार, क्या बात करते हो, केवल गपशप और चायशाय से क्या होगा. मेरी राय में तो समय बिताने के लिए अब करना है कुछ नया काम, सुबहसुबह ही किसी कोने में इंटरनैट खोल कर बैठिए और देखिए तमाम ब्लू फिल्में.’’

उस के इतना कहते ही सभी ने जोरदार ठहाका लगाते हुए एक स्वर में कहा, ‘‘हां, आप ठीक कह रहे हैं, यही ठीक रहेगा.’’

दफ्तर में बायोमीट्रिक हाजिरी मशीन लग जाने के कारण संभ्रांत महिलाओं की चिंता थी कि सुबह साढ़े 9 बजे तक दफ्तर आने और शाम को 7 बजे से पहले न जाने पर उन के घर के कई काम अधूरे रह जाते हैं.

उन की समस्या सुन कर एक समझदार साथी ने अपनी महिला साथी की समस्या का समाधान कुछ इस प्रकार किया और बोला, ‘‘मैडम, आप तो एक इलैक्ट्रिक कुकिंग प्लेट, कुछ बरतन व जरूरी मसाले आदि ला कर यहीं अपनी अलमारी में रख लीजिए और सुबहसुबह साढ़े 9 बजे आ कर बायोमीट्रिक मशीन में अपनी हाजिरी लगा कर तुरंत दफ्तर के पास वाली मार्केट चली जाया कीजिए और वहां से ताजी सब्जियां खरीद कर ले आया कीजिए. शाम तक उसे धो कर व काटकूट कर सायं 5 बजे के बाद उसे अपने दफ्तर के कक्ष में ही तैयार कर, यहीं से सब्जी पका कर ही 6 बजे के बाद घर ले जाया करें और पहुंचते ही चपातियां सेंक कर अपने परिवार के सदस्यों को सर्व कर दिया करें.’’

वे बोलीं, ‘‘कैसी बातें करते हैं, किसी अधिकारी ने देख लिया तो?’’

समझदार साथी ने पलट कर जवाब दिया, ‘‘मैडम, इस में डरने वाली कोई बात नहीं है. जब अधिकारी अपने कक्ष में इलैक्ट्रिक कैटल और नाश्ते का सामान रख सकते हैं तो आप भला क्यों नहीं रख सकतीं. आप तो खांमखां डर रही हैं.’’

एक कर्मचारी ने बताया, ‘‘दफ्तर में जब से बायोमीट्रिक मशीन लगी है मैं ने तो अपने सुबह के टहलने के समय में परिवर्तन कर लिया है और यहां साढ़े

9 क्या, 9 बजे ही आ जाता हूं और हाजिरी मशीन में अपनी उंगली का इंप्रैशन लगा कर सीधे ही पास वाले गार्डन में जा कर 11 बजे तक चक्कर लगाता हूं और फिर दफ्तर लौट कर कैंटीन में चाय पीता हूं तब जा कर सीट पर बैठ कर 2-4 फाइलें निबटा देता हूं. तब तक लंच टाइम हो जाता है. इसी प्रकार शाम को पहले 5 बजे घर भाग जाया करता था. अब 4 बजे निकलता हूं और पास वाले सुपर मार्केट से शाम के 6 बजे तक सामान गाड़ी में डाल कर ले आता हूं और यहां आ कर मशीन में दफ्तर छोड़ने के लिए उंगली का इंप्रैशन लगाता हूं और वापस घर चला जाता हूं.’’

साथी बोला, ‘‘यार, तुम्हारे कमरे की लाइट व कंप्यूटर वगैरह कौन स्विच औफ करता है?’’

वह बोला, ‘‘मुझे उस की बिलकुल भी परवा नहीं है. प्रत्येक तल पर सुरक्षा संतरी किस लिए है. वह खुली देखता होगा तो खुद ही बंद कर देता होगा. आखिर उसे भी तो कुछ काम करना चाहिए…वह भी तो तनख्वाह लेता है.’’

सच कहूं तो मुझे तो अपने दफ्तर में बायोमीट्रिक मशीन द्वारा हाजिरी लगने से केवल एक लाभ ही दिखाई दे रहा है कि जिन सरकारी कर्मचारियों को अपने दफ्तर के कार्यदिवसों में खुलने का समय व बंद होने का समय मालूम ही नहीं था, इस बहाने उन्हें पता चल गया वरना पूरी 60 वर्ष की नौकरी हो जाती और वे रिटायर भी हो जाते, उन्हें सरकारी दफ्तर के प्रत्येक दिन का सही कार्यसमय ही न मालूम हो पाता.

बंदा तो पहले घर से ही देरी से दफ्तर आता था और जल्दी चला जाता था, इसलिए अपनी सीट पर नहीं मिलता था और अब अपने कार्यदिवसों में आता तो जल्दी है और प्रत्येक दिन जाता भी दफ्तर के समाप्त होने के निर्धारित समय के बाद है मगर फिर भी वह दिनभर सीट पर कम ही दिखता है. कहां जाता है और क्याक्या करता है, किसी को पता ही नहीं रहता.

जिस किसी से पूछो कि फलां कर्मचारी कहां है तो यही कहते मिलता है कि आए तो हैं लेकिन कहां हैं, पता नहीं. देखिए, उन का चश्मा और पैन तो उन की सीट पर रखा है और कंप्यूटर भी औन है न. बायोमीट्रिक हाजिरी मशीन के कंप्यूटरीकृत सौफ्टवेयर में ताकझांक करने पर वह वहां सुबह साढ़े 9 बजे तक रोजाना ही दफ्तर आता है और शाम को भी सायं 6 बजे के बाद ही दफ्तर छोड़ता है. वहां लगे हुए उस के फिंगर इंप्रैशन व फोटो तो यही सत्यापित करते हैं. इसलिए दफ्तर के आला अधिकारियों द्वारा कभी भी उस की एक क्या, आधे दिन तक की भी, न तो छुट्टी काटी जा सकती है और न ही वेतन. Satirical Story In Hindi

कोटा कचौरी, स्वाद का अनुपम खजाना

Famous Kota Kachori : कोटा की कचौरी सिर्फ एक नाश्ता नहीं, बल्कि कोटा की पहचान है. इस के बिना यहां की दावतें भी अधूरी रहती हैं. आइए यहां के जायके को ले कर एक खास आनंद की अनुभूति लीजिए.

कोटा, राजस्थान का एक प्रमुख शहर, जिस ने कोचिंग के लिए शैक्षणिक नगरी के रूप में पूरे देश के मानचित्र पर एक अलग पहचान बनाई.
कोचिंग के साथसाथ यहां की कचौरियों का जायका लोगों की जबान पर कब चढ़ गया, पता ही नहीं चला.

कचौरी, जी हां, एक स्वाद से भरपूर व्यंजन जिसे लोग किसी भी समय खाने का मन रखते हैं.

यों तो कचौरी उत्तर भारत में सभी जगह बनाई जाती है लेकिन राजस्थान के कोटा शहर की कचौरी का स्वाद अनूठा होता है.

उड़द की दाल से बनने वाली कचौरी दो तरह की चटनी के साथ दी जाती है. खट्टी चटनी और मीठी चटनी कचौरी के स्वाद को दोगुना कर देती हैं.

कचौरी के स्वाद के लिए लोग इस पर नमकीन डाल कर भी खाते हैं. तीखी हींग के साथ, तेज मिर्च इस के जायके को और बढ़ा देती है.

शहर में अनेक, सिर्फ कचौरी और नमकीन की दुकानें हैं, जो दिनभर कचौरी बनाने में व्यस्त हैं.

सुबह के समय तो प्रसिद्ध दुकानों पर खासी भीड़ होती है.

देश के विभिन्न हिस्सों से आए कोचिंग छात्र न केवल कचौरी खाते हैं बल्कि यहां से अपने घर भी भेजते हैं. कई दिनों तक खराब न होने वाली ये कचौरियां विदेश तक में भेजी जाती हैं.

कचौरी, दाल के अलावा, आलू प्याज की भी बनाई जाती है, जो बड़ी होती है और स्वाद से भरपूर होती है. आलू, प्याज की कचौरी एक दिन के बाद खराब हो जाती है.

कोटा के कुछ लोग तो प्रतिदिन कचौरी का सेवन करते हैं. उन का कहना है कि बिना कचौरी खाए उन का दिन पूरा नहीं होता.

प्रसिद्ध कचौरी की दुकान वाले प्रतिदिन हजारों की संख्या में कचौरी बनाते हैं. उन के कारीगर फ्री नहीं रहते.

रतलामी, जय अंबे, जोधपुर, रतन, सुवालाल, जैन यहां की प्रमुख दुकानें हैं. हर दुकान की अपनी खासीयत है. किसी के स्वाद में हींग तेज है तो किसी की चटनी में स्वाद है. यहां इसी कचौरी के मसाले से छोटी कचौरियां भी बनाई जाती हैं.

कचौरी कोटा का प्रमुख व्यंजन है. इस के बिना यहां की दावतें भी अधूरी रहती हैं. दफ्तरों, पिकनिक, घरेलू आयोजनों सभी में कचौरी ने अपना विशिष्ट स्थान बना रखा है.

कचौरी, कोचिंग, कोटा डोरिया और कोटा स्टोन के लिए मशहूर कोटा देश अहम राज्य राजस्थान का एक प्रमुख शहर है. तो आइए यहां के जायके के साथ एक खास आनंद की अनुभूति लीजिए.

मेरा पूरा यकीन है कि यहां की कचौरी का स्वाद आप जीवनभर याद रखेंगे. Famous Kota Kachori

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