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EU-India- Trade Deal : सरित प्रवाह – ईयू-भारत ट्रेड समझौता

EU-India- Trade Deal : ईयू यानी यूरोपीय यूनियन से भरता का ट्रेड समझौता सुपर पौवरों की आपसी रेस में एक अच्छा कदम है चाहे यह यूरोप के 27 छोटेछोटे मगर बेहद अमीर देशों और बहुत बड़े मगर बेहद गरीब भारत के लिए लाभ का होगा या नहीं, इस बारे में अभी नहीं कहा जा सकता क्योंकि इस कस्टम ड्यूटी फैसले को लागू करने में महीनोंसालों लगेंगे.

भारत को अपना कच्चा व घटिया बना माल बेचने के लिए बाजार चाहिए ताकि वह यूरोप, अमेरिका और चीन से आने वाले महंगे व ऊंची तकनीकी वाले सामान को खरीद सके. यूरोप अब तक भारत के सामान पर बहुत ही ज्यादा ड्यूटी लगाता था क्योंकि वह चाहता था कि देश के लोग देश में बना घटिया क्वालिटी का सामान खरीदें या फिर बेहद महंगा यूरोपीय सामान खरीदें जिस पर सरकार मोटा मुनाफा कमाए.

अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों के बाद यूरोप और भारत दोनों कोई साथी ढूंढ रहे हैं जो अमेरिका के फैलाए कीचड़ में से निकलने के लिए हाथ थाम सके. यह हाथ अमेरिका जैसा मजबूत और बड़ा होगा, इस में संदेह है लेकिन फिर भी जब कीचड़ में फंस रहे हो, तो पतली रस्सी भी कुछ आस बनाती है.

भारत और यूरोप का आपसी व्यापार खासा है और भारत का निर्यात ज्यादा है. बहुत ज्यादा ड्यूटी की वजह से आयात कम है. ताजा फैसले के तहत भारत ने अपनी कस्टम ड्यूटियां कम कर के यूरोप के उच्च तकनीक वाले सामान को आने दिया है. यूरोप ने बहुत से सामान पर ड्यूटी काटी है लेकिन इस से भारत का निर्यात बढ़ेगा, इस का तो बस अंदाजा लगाया जा सकता है. फिलहाल तो यह डोनाल्ड ट्रंप के मुक्के के जवाब में कंकर फेंकने का काम नजर आता है.

यूरोप में बहुत सी तकनीकी चीजें बन रही हैं और अमेरिका उस का बड़ा बाजार है. भारत उन चीजों को खरीद सकेगा, यह उम्मीद नहीं है. गाडिय़ां जो आएंगी, वे एकएक करोड़ रुपए की होंगी और यदि उन पर 10-20 लाख रुपए ड्यूटी कम भी हो जाए तो ऐसा नहीं होगा कि लोग लाइन लगा कर खरीदेंगे.

यह न भूलें कि यूरोप के देशों की प्रतिव्यक्ति वार्षिक आय 3,000 डौलर से 1,00,00 डौलर तक की है जबकि भारत अभी 2,500 डौलर पर सिसक रहा है. यदि भारत की जीडीपी में 6-7 फीसदी की भी बढ़ोतरी होती है तो भी प्रतिव्यक्ति आय में 100 डौलर तक का ही इजाफा होगा. यूरोप के सामान का यहां सिर्फ अमीर उमराव खरीदार हैं जो पिछले दशक में बड़ी तेजी से बढ़े हैं.

यूरोपीय यूनियन के साथ हुए समझौते से फायदा होगा तो यहां के अनपढ़ और पढ़लिखे बेरोजगार युवाओं को होगा जो वहां बस सकते हैं. लेकिन यह न भूलें कि वहां हर देश में गरीब देशों से आने वाले फूहड़, बदबूदार लोगों, जो अपने धर्म की कूड़े की टोकरी सिर पर रख कर आ रहे हैं, का सड़कों पर विरोध हो रहा है. वे लोग भारतीय सामान तो ले लेंगे, भारतीयों का खुलेदिल से स्वागत करेंगे, इस की उम्मीद नहीं है. उर्सुला वोन डेर लेयन के साथ मुसकराती फोटो के पीछे बहुतकुछ छिपा है, यह न भूलें. EU-India- Trade Deal

Family Story in Hindi : प्रतीक्षा – विनायक का असली रूप क्या था ?

Family Story in Hindi : विनायक से शादी कर के तृप्ति को अपनेआप पर गुमान हो रहा था लेकिन वह समझ नहीं पाई कि पीतल पर चढ़ा सोने का पानी ज्यादा चमकता है. विनायक का असली रूप तो कुछ और ही था.

तृप्ति चंडीगढ़ में किराए के मकान की बालकनी में खड़ी अपलक दृष्टि से सामने का दृश्य निहार रही थी. बालकनी के ठीक सामने एक झील दिखाई देती थी. झील के किनारे खड़े ताड़ के वृक्ष उस के सौंदर्य में चारचांद लगा रहे थे. झील के किनारे पक्षियों का आनाजाना लगा रहता था.

क्रौंच पक्षी का जोड़ा बड़े प्यार से इधरउधर विहार कर रहा था कि तभी एक चील आसमान से उड़ती हुई आई और एक क्रौंच पक्षी को अपनी चोंच में दबा कर उड़ गई. दूसरा पक्षी जोरजोर से शोर मचाने लगा. वह सिर पटकपटक कर झील के किनारे बेचैनी से इधरउधर घूमने लगा.

उस का रुदन तृप्ति को बेचैन कर रहा था. इतने शांत, सरस और सुंदर वातावरण में उस के अश्रुकोष से 2 गरमगरम मोती लुढ़क कर गालों पर आ गए. तभी उस की 7 वर्षीया बेटी ईषा ने उस का हाथ पकड़ कर पूछा, ‘‘मम्मी, आप क्यों रो रही हो?’’

‘‘बस, वैसे ही, बेटा’’ संक्षिप्त सा उत्तर दे कर तृप्ति ने उसे आलिंगनबद्ध कर लिया. रुलाई थी कि रुकने का नाम नहीं ले रही थी. ‘‘मम्मी, आप अब बहुत रोने लगी हो और जब हम रोते हैं तो कहती हो अच्छे बच्चे रोते नहीं. गंदे बच्चे रोते हैं.’’

छोटी सी बच्ची के पास तृप्ति को चुप कराने के लिए शब्द नहीं थे. वह अभी इतनी छोटी थी कि तृप्ति उसे अपनी बात भी नहीं समझी सकती थी लेकिन उस के मन में न रुकने वाला तूफान उठ खड़ा हुआ था. उस चील में उसे राफिला खान नजर आ रही थी जो उस के जीवन में चील की भांति आई और उस से उस के पति को छीन कर ले गई. वह उस के जीवन में सुनामी की भांति आई और हंसतेखेलते परिवार को रौंद कर चली गई.

तृप्ति कमरे में आ कर बच्ची को आलिंगनबद्ध कर बिस्तर पर लुढ़क गई. इतने में उस का बेटा आरव भी पास आ कर लेट गया. मां की थपकी से दोनों बच्चे सो गए लेकिन तृप्ति की आंखों से नींद गायब थी. नींद की जगह अविरल आंसुओं ने ले ली. अनचाहे विचारों ने उस के मस्तिष्क पर कब्जा कर लिया. उस का दम घुट रहा था.

उस के विवाह को 12 वर्ष बीत गए लेकिन शांति उसे 12 घंटे भी न मिली. विवाह के थोड़े दिनों बाद ही पति का व्यवहार उस के दिमाग पर क्षयरोग की भांति उस के शरीर को खा रहा था. सभी उस से कमजोरी का कारण पूछते. उदासी उस के चेहरे पर चिपक गई थी. मुसकराहट स्पष्ट आवरण सी दिखती.

अति संस्कारी परिवार की यह बिटिया इस समाज की स्वच्छंदता से संघर्ष कर रही थी और आखिर में हार गई लड़तेलड़ते. कहते हैं लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती और कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

मेरठ के मध्यम परिवार की यह लड़की 12 साल पहले एक उच्चमध्य परिवार में बहू बन कर आई थी. अपने समय पर गर्व और अपने पति की अदाओं पर मुग्ध थी. थोड़ी सी आत्ममुग्धा भी थी क्योंकि पति ने बताया था, ‘30-35 लड़कियों को देखने के बाद तुम्हारा चुनाव किया है. इतने आकर्षक चेहरे में कि मुंह से न ही नहीं निकला. मेरे मन ने तुम्हारे जैसे चेहरे की ही कल्पना की थी.’

यह बात सही भी लगी क्योंकि जब विनायक अपनी मां, बड़ी मौसी, मौसा के साथ उसे देखने आया तो एक बार में ही हां कर दी. फिर लोकल मौसा, मौसी, उन की युवा लड़कियों को बुलाया, सलाह ली और अति शीघ्रता से बाजार से मिठाई का डब्बा मंगवा कर 2100 रुपए से टीका कर दिया. सास ने अपने हाथों के कंगन उतार कर तृप्ति के हाथों में पहना दिए. तृप्ति के मातापिता ने भी रिश्ता पक्का होने पर मोहर लगा दी.

शुरू में दिन बड़े आराम से बीत रहे थे लेकिन कभीकभी रिश्तेदारों की खुसुरफुसुर उस का विश्वास भंग कर देती थी. उन की बातों का रुख अलग होता लेकिन आशय कुछ और. नानी ने एक बार कहा, सामने वाली लड़की सीमा विनायक के चारों तरफ मंडराती थी पर विनायक ने ही नहीं कर दी. हम ने तो कम्मो को कहा भी था कि करोड़पति घर की लड़की है.

वैश्य लड़की ब्राह्मण घर में बहू बन कर आ जाएगी तो समस्या क्या है. आजकल तो जातपांत को भी कोई नहीं पूछता. वैसे भी, बनिए ब्राह्मण के रहनसहन में, खानपान में कोई खास फर्क नहीं होता. तभी दूसरी मौसी ने ताना मारा, ‘अरे, वह मुल्ली कितनी सुंदर थी, कमलेश दीदी तो उस से भी शादी करने को तैयार थीं पर विनायक मना कर दिया.’

पता नहीं वे सब ऐसा कह कर उस के चरित्र का बखान कर रही थीं या तृप्ति के सौंदर्य का क्योंकि सास की साथ वाली अध्यापिकाएं भी कह कर गई थीं, ‘बहू तो तुम छांट कर लाई हो, दीदी. बहू के एकएक नाकनक्श प्रकृति ने अपने हाथों से तराशे हैं. ब्यूटी कौंटैस्ट में भाग लेती तो मिस यूनिवर्स चुनी जाती. नाक भी सुतवां, आंखें तो मानो नशे से भरे दो प्याले हों.’ तभी सास हंस कर बोली, ‘आज तो मुझे बहू की नजर उतारनी पड़ेगी.’

शुरू में तो सब ठीक रहा. मानो जन्नत की सैर के दिन थे. रिश्तेदारों के घर आनाजाना, होटल में खानापीना. पूरे परिवार की लिविंगस्टाइल देख कर तृप्ति अपने पर गर्व महसूस करती थी. अपने परिवार को हेय दृष्टि से देखने लगी. उसे क्या पता था पौलिश किया पीतल सोने से अधिक चमक मारता है. इतनी चमक कि आंखें चुंधिया जाती हैं. अब धीरेधीरे उस की आंखों के सामने से धुंध हटने लगी.

मां का अपने बेटे पर कोई नियंत्रण नहीं था. बाप की अकाल मृत्यु के कारण दोनों बेटे बेलगाम घोड़े थे. मां सिंगल पेरैंटस होने के कारण कमाने में लगी रही. सहारनपुर से आई दिल्ली जैसे शहर की आधुनिकता ने उस की आंखों पर परदा डाल दिया. दोनों बेटों की गर्लफ्रैंड्स घर आतीजाती थीं. कुछ का व्यवहार तो बड़ा संदेहास्पद था लेकिन अति आधुनिकता की पट्टी बंधी होने के कारण मां को कुछ दिखाई न देता था.

सामने रहने वाली लड़की सीमा शादीशुदा और एक 2 वर्षीय बच्चे की मां थी. उस लड़की का ससुराल और तृप्ति का मायका एक ही शहर में था. इस का लाभ विनायक ने भरपूर उठाया. शायद, उसे पसंद करने का एक कारण सीमामोह भी हो. वह हर सप्ताह की छुट्टी में सीमा से मिलने की योजना बना लेता और तृप्ति से बड़े प्यार से कहता, ‘चलो, तुम्हें तुम्हारे मायके घुमा  लाऊं.’ यह सुन कर तृप्ति का मन मयूर नृत्य करने लगता क्योंकि शादीशुदा लड़की के लिए मायके का आकर्षण और भी अधिक बढ़ जाता है.

इधर, वह पहले से ही सीमा से मिलने की योजना किसी होटल में कमरा औनलाइन ही बुक करा कर बना लेता. यह सिलसिला 3 सालों तक चलता रहा. वह तो एक दिन सामने रहने वाली लड़की का भाई दनदनाता हुआ आया. विनायक की कनपटी पर पिस्तौल तान दी और साफ शब्दों में धमकी दी कि मेरी शादीशुदा बहन की जिंदगी से निकल जा, वरना कनपटी उड़ा दूंगा.

पहली बार सास को भीगी बिल्ली बनी देख रही थी क्योंकि पानी वहीं समाता है जहां झील होती है. आज शेरनी की भांति दहाड़ने वाली सास की जबान पर ताला लगा था.

तृप्ति चुपचाप दृश्य निहारने के अलावा क्या कर सकती थी. सुबूत के तौर पर उस ने मैसेज दिखा दिए. वैसे भी, ये सब मैसेज सीमा के पति ने पकड़े थे और अपने साले से शिकायत की थी तथा तलाक की धमकी दी थी. सास की बोलती बंद और तृप्ति के तोते उड़ गए. इतनी अश्लील बातें तो पति व पत्नी के बीच भी नहीं होतीं. वास्तव में यह कहावत गलत है कि प्रेम अंधा होता है. सच तो यह है कि प्रेम तो बहुत पवित्र होता है, वासना अंधी होती है. लोग भ्रमवश प्रेम और वासना में अंतर नहीं कर पाते.

मन ने तो चेतावनी दे दी कि ऐसे व्यक्ति के साथ रहना गलत है जो कामांध है. चरित्रहीन व्यक्ति की कथनीकरनी एक नहीं होती. झीठ उस का सब से बेहतरीन हथियार होता है. ऐसे व्यक्ति उस भ्रमर के समान हैं जो फूल का रस पी कर उड़ जाते हैं. उन्हें दूसरों की भावनाओं से लेनादेना नहीं.

परिवारजनों ने भी तृप्ति को विनायक से अलग होने का सुझीव दिया लेकिन तृप्ति उस के साथ सावित्री बन कर खड़ी हो गई. उस ने मन में प्रतिज्ञा की कि वह अपने पति को कुमार्ग से हटा कर सुमार्ग पर ले आएगी तभी तो धर्मपत्नी के गौरव को प्राप्त कर सकेगी.

धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि पत्नी पति के कुमार्गी हो जाने पर उसे सुमार्ग पर ले आती है, इसीलिए पत्नी को धर्मपत्नी कहते हैं क्योंकि स्त्री में दया, ममता और चरित्र बल पुरुष की अपेक्षा अधिक होता है.

तनमन से समर्पित तृप्ति सोच नहीं सकती थी कि विनायक 2 बच्चों का बाप हो कर भी चरित्रहीनता की सारी सीमाएं पार कर सकता है. घर में आनेजाने वाली राफिला खान का आनाजाना बहुत बढ़ गया. तीजत्योहार हो, जन्मदिन हो, भजनकीर्तन या माता की चौकी हो, वह घर में आ कर बैठ जाती और फिर जाने का नाम ही न लेती. या कोई भी अवसर.

इस लिवइन रिलेशनशिप की परंपरा ने विवाह की पवित्रता को नष्ट कर दिया है. कानून ने इस संबंध से उत्पन्न हुए बच्चों को समान अधिकार दे कर स्त्रीपुरुष को अनैतिक मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित कर दिया है.

लिवइन रिलेशनशिप कानून ने भी भारतीय परंपरागत सांस्कृतिक विरासत को नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. अब कानून की तलवार सिर से हट गई. विवाह सात जन्मों का बंधन नहीं, पवित्र बंधन नहीं बल्कि ऐयाश लोगों के लिए सुगम साधन बन गया और नैतिक लोग उन के कर्मों का दंश झेल रहे थे जबकि विधर्मी लाभ उठा रहे थे.

वह बच्चों के जन्म पर भी आई थी. बच्चों के पिता विनायक के बारे में भलीभांति जानते हुए भी राफिला ने चील की भांति विनायक को दबोच लिया. उसे पता है कि संपत्ति में उस का हिस्सा हो या न, बच्चे का तो होगा.

आज की महिला व पुरुष को विवाहित स्त्री व पुरुष ही पसंद आते हैं. पहले विवाह की पवित्रता का सम्मान करते हुए प्रेमीप्रेमिका खुद रास्ते से हट जाते थे. अपने प्रेम को युगल दंपती के जीवन से दफन कर देते थे ताकि उन की गृहस्थी बरबाद न हो या उन की बदनामी न हो. अब तो दांपत्य जीवन बरबाद करने का, विवाहित महिला या पुरुष को प्राप्त करने का जनून है लोगों में.

दोनों की गतिविधियों से केवल तृप्ति परेशान रहती थी. रिटायर्ड सास अब जिंदगी को एंजौय करना चाहती थी. कर्तव्यबोध का दूरदूर भी नामोनिशान न था. व्हाट्सऐप पर देरदेर तक बातें करना, फेसबुक देखना, रील्स देखना उन का शौक बन गया. वैसे भी, मोबाइल ने व्यक्ति को जितना दिया है उस से अधिक छीन लिया है. जितना लोगों को पास कर दिया है उतना ही सामने बैठे हुए लोगों को दूर कर दिया है. बच्चा हो, जवान हो या बूढ़ा, सभी के मनोरंजन की सामग्री मोबाइल में है. यह जितना ज्ञान परोस रहा है उतनी अश्लीलता भी.

मोबाइल जब हाथ में हो तो सामने बैठा व्यक्ति भी नजर के सामने से गायब. तृप्ति की सास भी मोबाइल ऐडिक्ट. छोटे शहर से आई कम्मो को आधुनिकता की चकाचौंध में अब दोनों बेटों के दोष दिखाई नहीं देते थे. लड़का विवाहित हो या अविवाहित; गर्लफ्रैंड रखना शौक. उन के बीच में सीमाओं का बंधन नहीं. अति आधुनिकता प्रदर्शन की होड़ में सब कृत्य स्वीकार.

छोटे बेटे ने एक बंगाली लड़की से प्रेमविवाह किया. शादी के तीनचार साल से पहले ही दोनों साथसाथ घूमतेफिरते थे. लड़की का घर में भी आनाजाना था. इतने प्रेमपाश में बंधा हुआ था पर शादी के 2 वर्ष बीत जाने पर एक बच्चे का पिता होने पर भी कौल सैंटर में अपनी बौस से दिल लगा बैठा.

मां ने पीरफकीर, मुल्लामौलवी, पंडितज्योतिषाचार्य की ड्योढी पर खूब नाक रगड़ी लेकिन कुछ नहीं हुआ. पत्नी ने गुस्से में तोड़फोड़ कर, गाड़ी ठोंक कर, हारपिक पी कर, वाशबेसिन तोड़ कर अपना गुस्सा, अपना अवसाद निकाला. आपसी समझीते से तलाक होने के बाद भी फिर दोनों का वैवाहिक जीवन प्रारंभ हो गया. अब अजीब हो गई थीं समाज की कहानियां. लिवइन रिलेशनशिप ने प्रेम के नाम से अब वासना को खुल कर तांडव करने का अवसर दे दिया था.

एक दिन विनायक ने भी खुल कर घोषणा कर दी कि उस ने जौब छोड़ कर राफिला के साथ वैन में नौनवेज का बिजनैस आरंभ कर दिया है लेकिन कुछ दिनों बाद वैन खटारा बन कर खड़ी थी. अब दोनों ने मिल कर नौनवेज का रैस्टोरैंट खोल लिया. रैस्टोरैंट क्या, दोनों का साथसाथ रहने का बहाना था. वैसे तो नौनवेज का बिजनैस होने के कारण घर वाले नाराज थे लेकिन व्यापार उन्नत हो रहा है, सोच कर खुश थे क्योंकि अकसर रात के कभी 12 बजे, कभी 2 बजे मोबाइल पर संदेश आ जाता था कि ग्राहक अधिक हैं, मैं घर नहीं आ सकूंगा.

जुड़वां बच्चों को अकेली तृप्ति संभालती, अकसर रात आंखों में ही कट जाती. कोई बच्चा पलंग से गिर जाता. दोनों एकसाथ रोते तो चुप कराना मुश्किल. अकसर एक रोता तो दूसरा सोता हुआ भी जाग कर रोने लगता. एक बच्चे की टौयलेट साफ करती, दूसरा चिल्लाए जाता. न सास का सहारा, न पति का साथ और तब तृप्ति के मुंह से निकल जाता कि सोने को भी नहीं मिलता. वास्तव में वह सुहागन हो कर विधवा का जीवन जी रही थी. अमीर घर की चारदीवारी में बंदिनी का सा जीवन लेकिन उसे विश्वास था कि एक दिन उस का पति लौट आएगा.

एक वर्ष बाद पता चला कि रैस्टोरैंट में लाखों रुपए बरबाद हो गए.

वास्तव में वह रैस्टोरैंट नहीं, साथ रहने का सार्थक बहाना था. बिजनैस के ठप होने पर सास ने खरीखोटी सुनाई. 16 लाख रुपए मां के बिजनैस में स्वाह कर दिए थे, 3 लाख रुपए तृप्ति के क्योंकि एक वर्ष तृप्ति ने केंद्रीय विद्यालय में अस्थायी अध्यापिका के रूप में कार्य किया था. गर्भवती होने के कारण एटीएम कार्ड भी पति के हाथ में.

हार कर विनायक ने फिर किसी एमएनसी कंपनी में नौकरी कर ली. बेंगलुरु में पोस्टिंग हो गई. अभी बेंगलुरु गए हुए तृप्ति को 2 ही माह ही बीते थे कि विनायक पुणे का बहाना कर अपने छोटे बच्चों की जिम्मेदारी पत्नी पर छोड़ कर प्रथम लौकडाउन से पहले दिन दिल्ली उसी राफिला खान के पास आ गया. मत पूछो केवल कल्पना करो कि एक अनजान शहर में 2 माह पूर्व आई 2 छोटे जुड़वां बच्चों की मां ने उन दिनों को कैसे बिताया होगा. बारबार फोन करने पर, बच्चों की तबीयत खराब बताने पर उस ने औनलाइन सामान भिजवाने की व्यवस्था कर दी लेकिन तृप्ति की तबीयत बिगड़ने पर उस की कोई सुध न ली.

सामान भिजवाने के बाद तो उस ने फोन उठाना ही बंद कर दिया. तृप्ति की छोटी बहन ने नोएडा में रहते हुए औनलाइन दवा की व्यवस्था की. मांबाप की, भाईबहनों की जान अटकी पड़ी थी. जब प्रत्येक व्यक्ति अपने परिजनों के बारे में चिंतित था, अपनों की सलामती के लिए प्रार्थना कर रहा था, विनायक अपनी प्रेमिका के साथ रंगरेलियां मनाने में व्यस्त था. बीच में सरकार ने इमरजैंसी फ्लाइट की भी व्यवस्था की लेकिन वह नहीं पहुंचा.

3 माह बाद जब वापस पहुंचा तो तृप्ति ने पलकपांवड़े बिछा दिए पति के स्वागत में. यूट्यूब पर रैसिपी पढ़ कर नईनई डिशें बना डालीं. उसे उस का विश्वास यही यकीन दिलाता रहा कि मेरा पति लौकडाऊन में फंस गया है. उस के क्वारंटाइन की भी अलग कमरे में व्यवस्था की ताकि छोटे बच्चे प्रभावित न हों लेकिन आने के समय भी शक उत्पन्न हुआ क्योंकि पुणे से आने वाली फ्लाइट के यात्रियों को 7 दिनों के क्वारंटाइन की व्यवस्था थी और दिल्ली से आने वाली फ्लाइट के यात्रियों के लिए 3 दिन की.

तृप्ति के पूछने पर उस ने कहा कि वह दिल्ली से आने वाली फ्लाइट के यात्रियों की लाइन में खड़ा हो गया था. एनआरआई भाई ने तृप्ति को समझीया कि अलगअलग फ्लाइट से आने वालों के गेट भी अलगअलग होते हैं और सारा डाटा कंप्यूटर में फीड होता है. और कोरोनाकाल में तो विशेष सावधानी बरती जा रही थी, फिर यह कैसे हो सकता है कि वह अपने को दिल्ली से आने वाला बता दे.

भ्रम टूट गया, सत्य उजागर हो गया जब 3 दिन बाद राफिला का फोन आया. वह विनायक से लड़ रही थी. न जाने क्या सोच कर विनायक ने फोन तृप्ति के हाथों में दे दिया और राफिला ने सारा राज उस के कानों में उड़ेल दिया. सब सुन तृप्ति के होश उड़ गए. वह घायल शेरनी की भांति पति पर टूट पड़ी लेकिन हृष्टपुष्ट विनायक ने प्रहार पर प्रहार कर उसे अधमरा कर दिया. थप्पड़, घूंसे और लात तृप्ति पर बरसा दिए. फोन पर सूचना देने पर मातापिता ने 112 पर फोन करने को कहा लेकिन तृप्ति के कोमल हृदय में अब भी पति के लिए सौफ्टकौर्नर सुरक्षित था.

चतुरचालाक सास ने आननफानन अपने छोटे बेटे से तत्काल एयर टिकट करा तृप्ति को दिल्ली बुला लिया. एयरपोर्ट से जा कर मांबाप उसे घर ले आए. दोनों मासूम बच्चे तिनके की भांति कांप रहे थे लेकिन नाटकखोर पति ने अपनी चालाकी के मोहरे फेंक कर तृप्ति का दिल पिघला दिया. माफी, रोनाधोना, आत्महत्या की धमकी से प्रभावित हो तृप्ति ने मातापिता को पुलिस में शिकायत और कानूनी कार्रवाई करने से रोक दिया.

सास, देवर और देवरानी मनाने आईं और रेगिस्तान की शुष्क धरती में मीठा झीरना खोजने की तृष्णा में तृप्ति फिर छली गई. शातिर विनायक के पास अब धोखा देने का अच्छा बहाना था. आईटी क्षेत्र में कार्यरत सभी वर्क फ्रौम होम कर रहे थे लेकिन उस ने ऐलान कर दिया कि उस की नाइट ड्यूटी है. उस ने तृप्ति पर भी सर्विस करने का दबाव यह कह कर बनाया कि कम्फर्ट जोन से बाहर निकलो. बेचारी गृहस्थी बचाने के लालच में इस शर्त को भी मान गई.

विनायक को मौका मिल गया. अब बच्चे स्कूल जाने लगे. बच्चे दिन में अपने पिता के पास रहते और रात को तृप्ति के पास क्योंकि वह दिन में वर्क फ्रौम होम करता और रात को नाइट ड्यूटी के नाम पर राफिला के पास चला जाता. विनायक और तृप्ति केवल नाम के लिए साथ रहते थे. मिलते कभी न थे.

ऐसा नहीं कि तृप्ति बेवकूफ थी या उस के मातापिता अनजान थे कि वे विनायक के बारे में न जानते हों लेकिन उस के अटूट, असीम प्रेम व दृढ़ विश्वास ने उन के पैरों में बेडि़यां डाल दीं. सब को पता था कि वह नाइट ड्यूटी के नाम से कहां जाता है, कहां रहता है.

जब सबकुछ ही खुद करना है तो यहां क्यों रहना. यह सोच कर तृप्ति मेरठ आ गई. मां ने महिला थाने में शिकायत कराई. एसओ ने फौरन ऐक्शन लिया और विनायक को थाने में बुला लिया. ससुराल में फोन करने पर देवर ने फोन उठाया और सत्य का साथ दिया. बाहर निकल कर पति ने फिर माफी मांगने का ढोंग किया.

राफिला को केवल मित्र बताया और विश्वास दिलाया कि 17-18 साल पहले से हमारी दोस्ती है. तुम पत्नी हो, वह तुम्हारी जगह कभी ले सकती है क्या? इन दोनों बच्चों का जीवन क्यों बरबाद करती हो? हमारी लड़ाई में इन बच्चों का भविष्य स्वाहा हो जाएगा.

औरत की यही त्रासदी है, कभी मांबाप के नाम पर, कभी भाई के नाम पर, कभी पति के नाम पर और कभी औलाद के भविष्य के नाम पर बलि चढ़ती आई है. तृप्ति ने भी सोच लिया कि मैं इन बच्चों का भविष्य इतना उज्ज्वल नहीं बना पाऊंगी जितना हम बना पाएंगे. एक हाथ और दो हाथों की शक्ति में जमीनआसमान का अंतर होता है. महिला थाने के अधिकारियों ने भी तृप्ति को समझी दिया क्योंकि सरकार का भी मानना है कि घर तोड़ने का नहीं, जोड़ने का ही प्रयास करना चाहिए.

अब बेटी तृप्ति ने मांबाप पर महिला थाने का सहारा लेने को रायता फैलाने का काम बता दिया. इसलिए मातापिता सबकुछ जानते हुए अंधे, गूंगे और बहरे बने हुए थे लेकिन सती सावित्री का विश्वास जब धराशायी हो गया जब एक शाम जल्दी में वह अपना जी मेल लौगआउट करना भूल गया और तृप्ति को रात में  लैपटौप पर कुछ काम करना पड़ा लेकिन एक मेल पढ़ते ही उस की हालत खराब हो गई, वह अपना काम करना भूल गई.

वह जैसेजैसे मेल पढ़ती गई, सुबूत मिलते गए. वह सुबूतों के अभाव में विश्वास नहीं करना चाहती थी. आज सुबूत भी उस के सामने थे. विनायक और राफिला का एक बेटा था. जिस अस्पताल में बच्चा पैदा हुआ, जहां उस का इलाज चला सब सुबूत.

अब तो तृप्ति का विश्वास चकनाचूर हो गया. उस की प्रतीक्षा समाप्त हो गई. उस का विश्वास टूट गया था. उस ने बच्चों को साथ लिया और अपनी कंपनी से कहसुन कर ट्रांसफर ले कर चंडीगढ़ आ गई. उस ने शहर से दूर कंपनी के पास मकान किराए पर लिया. अब उसे किसी की प्रतीक्षा नहीं थी. राफिला नामक चील उस के विनायक नामक क्रोंच को हमेशा के लिए ले कर उड़ गई थी और इन परिस्थितियों से समझीता करना अब आत्मसम्मान को बिलकुल स्वीकार नहीं था. Family Story in Hindi

Raja Saheb Movie Review : “फिल्म तंत्रमंत्र के चक्कर में भेजा फ्राई करती है”

Raja Saheb Movie Review : अभिनेता प्रभास तेलुगू सिनेमा का जानामाना ऐक्टर है. उस का नाम भारतीय सिनेमा के सब से अधिक कमाई करने वाले ऐक्टरों में लिया जाता है. 24 से अधिक फिल्मों में अभिनय कर चुके उसे 7 फिल्मकेयर पुरस्कार, नामांकन 24 से अधिक फिल्मों में और एक एसआईएमए पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं.

प्रभास ने 2015 में आई ब्लौकबस्टर ऐक्शन फिल्म ‘बाहुबलि : द बिगनिंग’ 2017 में आई उस की सीक्वल ‘बाहुबलि 2 : द कंक्लुजन में दोहरी भूमिका निभाई, जिस की सीक्वल उस समय की सब से अधिक कमाई करने वाली भारतीय फिल्म बन गई. अभिनेता प्रभास को अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिली. इस के बाद उस ने कई फिल्मों में अभिनय किया. ये फिल्में दक्षिणभारतीय फिल्मों के साथसाथ हिंदी में भी रिलीज की गईं.

‘राजा साहब’ शीर्षक से पहले भी कुछ फिल्में आ चुकी हैं. नई ‘राजा साहब’ को तेलुगू के साथसाथ हिंदी में भी बनाया गया है. यह कौमेडी एक फैंटेसी हौरर फिल्म है.

‘राजा साहब’ प्रभास के फैंस के लिए मसाला एंटरटेनर हो सकती है लेकिन यह अपने कमजोर लेखन और वीएफएक्स के कारण दर्शकों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती. फिल्म बिखरी हुई लगती है. बड़ेबड़े सेट, भारी बजट (400-450 करोड़ रुपए) और तामझाम होते हुए भी समझ नहीं आता कि निर्देशक आखिर बनाना क्या चाह रहा है. फिल्म तंत्रमंत्र के चक्कर में भेजा फ्राई करती है.

फिल्म के निर्देशक मारुति ने इस की कहानी और पटकथा खुद लिखी है. समझ नहीं आता कि निर्देशक से फिल्म की कहानी और पटकथा क्यों लिखवाई जाती है. भई, जो आप का काम है वही ठीक से कर लो तो अच्छा है.

इस फिल्म की कहानी काफी बोझिल है. मध्यांतर तक कहानी इतनी ज्यादा उलझ जाती है कि क्लाइमैक्स तक आप सोचते रह जाते हैं कि क्या बना डाला है. फिल्म को हौरर के नाम पर प्रचारित किया है परंतु फिल्म का हौरर दर्शकों को डरा नहीं पाता. हां, कुछ जगहों पर कौमेडी जरूर हंसाती है. मसालों की डोज ज्यादा हो गई है जिस से फिल्म बेस्वाद होने लगती है.

कहानी थकाऊ और सिरखपाऊ है. राजा (प्रभास) अपनी अल्जाइमर पीड़ित दादी गंगम्मा (जरीना वहाब) की जिद पर कि उस का पति कनक राजू (संजय दत्त) जिंदा है और वह हैदराबाद में है, वह अपने दादा को ढूंढने के लिए निकल पड़ता है. ढूंढ़तेढूंढ़ते वह हैदराबाद की पुरानी रहस्यमयी हवेली तक जा पहुंचता है जहां तंत्रमंत्र के कई राज छिपे हैं. वहां जा कर कनक राजू का सामना इस हकीकत से होता है कि उस की दादी देवनगर साम्राज्य की राजकुमारी है. इस पहेली को सुलझाने के लिए वह अपने अंकल वीटी की गणेश से मदद मांगता है. इसी दौरान उस की मुलाकात भैरवी मालविका मोहननी से होती है. उस के जरिए वह दादा की भूतिया हवेली में पहुंचता है, जहां उस का मुकाबला अब भूत बन चुके अपने दादा से होता है. राजू अपने दोस्तों के साथ मिल कर इस भूत का मुकाबला करता है और हवेली से बाहर निकलने का रास्ता खोजता है. दिमागी खेल में उलझी इस कहानी में राजू हालात का सामना करता है और सुरक्षित बाहर निकल आता है.

एक तो घोर अंधविश्वासों वाली कहानी, दूसरे पटकथा का कोई ओरछोर नहीं, दर्शक बेचारे अपना सिर धुनते रह जाते हैं. आज 21वीं सदी में भूत, भूतिया महल आदि में कौन अपना सिर खपाता है. दर्शक सोचते रह जाते हैं कि यह सब अचानक कैसे हो गया. मालविका का किरदार अचानक प्रभास तक कैसे पहुंचा? कई किरदार तो 1-2 सीन के लिए ही लिए गए हैं, जो न तो कौमेडी क्रिएट करते है, न ही कहानी से उन का कोई लेनादेना है.

बैकग्राउंड में शोरगुल ज्यादा है. संपादन बिखराबिखरा है. फिल्म में 3-3 हीरोइनें हैं, मगर किसी का किरदार जम नहीं पाया. जरीना वहाब का काम अच्छा है. संजय दत्त अपने किरदार में फिट है. प्रभास की डबिंग खराब हुई है. फिल्म की लंबाई ज्यादा है, कम की जा सकती थी. हौरर, कौमेडी, फेंटसी, इमोशंस में कहीं कोई तालमेल नहीं है. सिनेमेटोग्राफी औसत है. वीएफएक्स अधूरे लगते हैं. Raja Saheb Movie Review

Rahu Ketu Movie Review : “एक बेतुकी और अटपटी कौमेडी फिल्म”

Rahu Ketu Movie Review : बौलीवुड में भेड़चाल है. यदि एक फिल्मकार कौमेडी बनाता है और उस की फिल्म सफल हो जाती है तो उस की देखादेखी अन्य फिल्मकार भी कौमेडी फिल्में बनाने लगते हैं. नतीजा यह होता है कि किसीकिसी हफ्ते तो बहुत सी कौमेडी फिल्में रिलीज हो जाती हैं और दर्शकों का भेजा फ्राई होने लगता है कि क्या देखें क्या न देखें.

‘राहुकेतु’ भी एक बेतुकी और अटपटी कौमेडी फिल्म है जिसे 2026 के शुरू में ही रिलीज किया गया है. उसी के साथ, उसी हफ्ते कई और कौमेडी फिल्मों को भी रिलीज किया गया है. यानी, मुकाबला तगड़ा है.

राहुकेतु के बारे में हमारे धर्मशास्त्रों में बहुतकुछ लिखा हुआ है. इन दोनों को 8वां और 9वां गृह बताया गया है. अंधविश्वासों को मानने वाले राहुकेतु के बारे में व्याख्या करते हुए लिखते हैं कि राहु एक ऐसा सिर है जिस का कोई शरीर नहीं है. ये ग्रह अधूरी इच्छाओं को प्रकट करते हैं. इन्हें अशुभ ग्रह माना जाता है.

हिंदू धर्मग्रंथों में राहुकेतू को राक्षस बताया गया है. धर्मग्रंथों में यह भी बताया गया है कि इन की उत्पत्ति समुद्र मंथन के दौरान शुरू हुई. इन्होंने धोखे से देवताओं का अमृत पी लिया था. अंधविश्वासी हिंदुओं के अंदर राहुकेतु भय पैदा करते हैं. ज्योतिषी अंधविश्वासी लोगों को राहुकेतु का भय दिखा कर उन की जेबें हलकी करते हैं जबकि राहुकेतु एक मिथ्या है.

हिंदू पौराणिक कथाओं पर आधारित कौमेडी बहुत कम देखने को मिली है, मगर निर्देशक ने 2 मूर्खों को ले कर इसे अटपटी कौमेडी के रूप में बनाया है. वरुण शर्मा को राहु बताया गया है और पुलकित सम्राट को केतु. दोनों ही राहुकेतु जैसे अशुभ हैं.

कहानी की शुरुआत चुरुलाल शर्मा (मनुऋषि चड्ढा) नामक एक लेखक की जादुई नोटबुक से होती है. इस नोटबुक से 2 किरदार राहु और केतु असल जिंदगी में आ जाते हैं. इन का मकसद भ्रष्टाचार से लड़ऩा है लेकिन वे खुद मुसीबतों में फंस जाते हैं. मीनू टैक्सी नाम की एक युवती उस जादुई नोटबुक को चुरा लेती है और राहुकेतु को अपने इशारों पर नचाने लगती है. वह उन का भाग्य तय करती है. राहु और केतु को ड्रगमाफिया से लड़ कर इसे वापस लाना है. इस दौरान वे अपनी शक्तियों को पहचानते हैं और अपने बारे में सचाई पता लगाते हैं.

उन की खोज उन्हें ड्रग माफिया के जाल में ले जाती है जहां उन्हें अपराधियों और भाग्य दोनों को मात देनी पड़ती है. आखिरकार राहु और केतु सभी बाधाओं को पार करते हुए मीनू टैक्सी से नोटबुक वापस ले कर अपने भाग्य का नियंत्रण अपने हाथ में ले लेते हैं और अपनी कहानी को फिर से लिखते हैं.

यह कौमेडी एकदम नीरस है और उलझी हुई है. इसे देखने जाने से पहले दिमाग को घर पर रख कर जाना पड़ेगा. निर्देशक ने फिल्म ‘फुकरे’ में आए वरुण शर्मा और सम्राट पुलकित को रिपीट किया है. दोनों मंदबुद्धि दोस्तों की भूमिका में हैं. दोनों कलाकारों की जुगलबंदी ध्यान खींचती है.

फिल्म में कुछ कमियां रह गई हैं. मध्यांतर के बाद वाला हिस्सा लंबा और बिखरा हुआ है. विजुअल्स अच्छे हैं. बैकग्राउंड म्यूजिक और गाने कहानी की रफ्तार को बनाए रखते हैं. संपादन में कसावट की कमी है. चुटकुले दर्शकों पर असर नहीं छोड़ पाते.

वरुण शर्मा ने राहु के किरदार में कौमेडी से एक बार फिर दर्शकों का दिल जीत लिया है. वहीं पुलकित सम्राट के अभिनय में गहराई है. मीनू टैक्सी के रूम में शालिनी पांडे ने अपने चुलबुल अंदाज से नई ऊर्जा भरी है. फिल्म का क्लाइमैक्स चौंकाता है. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. Rahu Ketu Movie Review

Noida techie death : नोएडा सेक्टर–150 – युवराज की मौत का जिम्मेदार गड्ढा नहीं, प्रशासन है

Noida techie death : नोएडा सेक्टर-150 में हुए दर्दनाक हादसे ने सिर्फ एक युवा सौफ्टवेयर इंजीनियर की जान नहीं ली, बल्कि एक पूरे परिवार की दुनिया उजाड़ दी. इस हादसे के बाद से हर गुजरते दिन के साथ सवाल गहराते गए कि लापरवाही किस की थी, जिम्मेदारी कौन लेगा और क्या दोषियों पर सच में कार्रवाई होगी?

नोएडा के सेक्टर-150 में 27 वर्षीय सौफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की दर्दनाक मौत कोई “दुर्घटना” भर नहीं है; यह उस शासकीय उदासीनता, प्रशासनिक लापरवाही और जवाबदेही के सन्नाटे का परिणाम है, जो वर्षों से शहर की सड़कों पर पसरा हुआ है. चमकते बिल्डर ब्रोशर, स्मार्टसिटी के दावे और हाई एंड इंफ्रास्ट्रक्चर के नारों के बीच एक युवा इंजीनियर की जान चली गई और हमेशा की तरह सवाल हवा में तैरते रह गए. यह हादसा बताता है कि दिल्ली एनसीआर में तेजी से फैलती शहरीकरण की कहानी में सुरक्षा, निगरानी और मानवीय संवेदनशीलता को कितनी बेरहमी से हाशिए पर धकेल दिया गया है.

Noida techie death
घटनास्थल की फोटो, मौके पर मौजूद प्रशासनिक अधिकारी

सेक्टर-150 में युवराज की जान सिर्फ एक गड्ढे ने नहीं ली, बल्कि उन जिम्मेदारियों ने ली है जो दशकों से फाइलों में दफन हैं. कितने दुःख की बात है कि जब शहर का एक होनहार इंजीनियर एक गैरजिम्मेदार बिल्डर द्वारा खोदे गए गड्ढे में भरे पानी में डूब रहा था, तब नोएडा पुलिस, फायर ब्रिगेड की गाड़ियां और आपदा प्रबंधन की टीम मौके पर मौजूद थी, मगर युवराज को बचाने के लिए पानी में कोई नहीं उतरा. उन के पास बहाने कई थे- पानी बहुत ठंडा है, हम में से किसी को तैरना नहीं आता, अंधेरा और कोहरा घना है, पानी के नीचे खड़ी सरियां हैं, कोई पानी में उतरा तो सरिया गड़ने का डर है, आदिआदि.

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युवराज को बचाने की भरसक कोशिश करने वाले डिलीवरी बॉय की फोटो और युवराज की फोटो

युवराज के पिता किनारे पर खड़े अपने बेटे को आंख के आगे धीरेधीरे पानी में अंदर डूबता हुआ देख रहे थे, अधिकारियों से उसे बचा लेने की मिन्नतें कर रहे थे, मगर वह नामर्द प्रशासन की भीड़ थी, जो बस युवराज की मौत का तमाशा देखने के लिए वहां आ जुटी थी. चश्मदीदों में कोई मर्द था तो वह डिलीवरी बौय, जो अंततः प्रशासनिक अधिकारियों की निर्लज्जता देख खुद कमर में रस्सा बांध कर उस पानी में कूद पड़ा और 30-40 मिनट तक उस अंधेरे में पानी के भीतर डूबे युवराज मेहता को ढूंढता रहा. अगर कुछ देर पहले वह युवराज तक पहुंच जाता तो शायद युवराज को जीवित निकाल लाता, मगर अफसोस, जब तक वह युवराज तक पहुंचा, युवराज के प्राणपखेरू उड़ चुके थे.

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युवराज को श्रद्धांजलि अर्पित करते परिजन

क्या है मामला?

युवराज मेहता रोजाना की तरह अपने औफिस से घर आ रहा था. कोहरा अधिक होने और उस खतरनाक 90 डिग्री के मोड़ पर कोई रौशनी न होने के कारण उस की कार टूटी सड़क पर अचानक उछल कर उस कई फुट गहरे गड्ढे में भरे पानी में जा गिरी. यह गड्ढा एक एक बहुमंजिली इमारत खड़ी करने के इरादे से बिल्डर ने खुदवाया था और कई महीनों से यह ऐसे ही पानी से भरा हुआ था, और इस खतरे की तरफ से नोएडा पुलिस और नोएडा अथौरिटी में अपनी आंखें मूंद रखी थी. न तो वहां रौशनी की व्यवस्था थी, न खतरे से आगाह करने के लिए कोई बोर्ड लगाया गया था. नोएडा के सेक्टर–150 जैसे “प्राइम लोकेशन” में यदि बुनियादी सुरक्षा मानकों का पालन नहीं हो रहा है तो बाकी जगहों का हाल समझा जा सकता है.

प्रशासन की लापरवाही का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इंजीनियर युवराज मेहता के साथ हुए दर्दनाक हादसे के कुछ दिन पहले ही उसी जगह से एक ट्रक भी फिसल कर पानी से भरे 70 फुट गहरे प्लाट में गिरने वाला था, मगर ट्रक का पहिया किनारे पर फंसने के कारण ट्रक आधा हवा में लटक गया. तब भी ट्रक ड्राइवर को सकुशल स्थानीय लोगों ने उतारा था. ट्रक हादसा भी कोहरे के चलते हुआ था.

वीडियो में साफ तौर पर कोहरा दिखाई दे रहा है, लेकिन वहां कोई साइनबोर्ड या बैरिकेडिंग उस हादसे के बाद भी नहीं लगाई गई. रात 12 बजे ट्रक फंसा और अगले चार घंटे तक वहीं फंसा रहा. ये तो ट्रक ड्राइवर गुरविंदर सिंह की किस्मत अच्छी थी कि उस की जान बच गई. ट्रक ड्राइवर का कहना था कि 2-3 पुलिसकर्मी वहां आए तो थे लेकिन मदद नहीं मिली. नोएडा प्राधिकरण और पुलिस अधिकारियों की लापरवाही का सबूत यह कि ट्रक हादसे वाले दिन के वीडियो फुटेज में पुलिस दिखाई दे रही है. मगर उन्होंने किया कुछ नहीं. मगर अगले दिन दोपहर में नोएडा अथौरिटी की टीम आई और उल्टा ड्राइवर गुरविंदर सिंह को धमका कर बोली- इस टूटे नाले की मरम्मत का पैसा कौन देगा? ये है योगी प्रशासन की संवेदनशीलता. 31 दिसंबर की देर रात ट्रक के टकराने की वजह से ही किनारे की दीवार टूट गई थी. अगर नाले की उस दीवार की समय रहते मरम्मत कर दी गई होती तो युवराज मेहता के साथ हुआ जानलेवा हादसा टाला जा सकता था.

युवराज की मौत का असली गुनहगार?

हर दुर्घटना के पीछे कारण होते हैं – खुले गड्ढे, अधूरे काम, अपर्याप्त साइन बोर्ड, खराब लाइटिंग, टूटी सड़कों की मरम्मत में देरी और सड़कोंमोड़ों पर उपस्थित खतरे के प्रति कोई आगाह करने वाला संदेश न लिखा जाना. सवाल यह नहीं कि युवराज मेहता के साथ क्या हुआ, असल सवाल यह है कि क्यों हुआ? सवालों की जद में नोएडा प्राधिकरण और नोएडा पुलिस है. सवाल यह कि क्या क्षेत्र में चल रहे निर्माण कार्यों की नियमित सुरक्षा औडिट होती थी? क्या चेतावनी संकेत, बैरिकेडिंग और रात की रोशनी पर्याप्त थी? और अगर नहीं, तो इस की जिम्मेदारी किस की है? कौन है युवराज की मौत का असली गुनहगार? क्या सिर्फ वो अकेला बिल्डर जिस ने गड्ढा खोद कर छोड़ दिया?

इन सवालों के जवाब सीधे नोएडा प्राधिकरण के उन अफसरों तक जाते हैं, जिन के हस्ताक्षर फाइलों पर हैं, जिन की निगरानी में ठेके दिए जाते हैं और जिन की जिम्मेदारी में सड़कें, फुटपाथ और सार्वजनिक स्थल बनते हैं. सवाल यह है कि जब बजट करोड़ों का है तो सुरक्षा के इंतजाम शून्य क्यों हैं? सवाल यह भी कि जब घटनास्थल पर बचाव और राहत टीमें मौजूद थीं और युवराज न सिर्फ जीवित था बल्कि अपनी कार के ऊपर खड़ा हो कर लगातार अपने मोबाइल फोन की टौर्च जला कर मदद के लिए चीख रहा था, तो रैस्क्यू में देरी क्यों हुई? और सब से बड़ा सवाल यह कि इतनी बड़ी लापरवाही के बाद भी किसी अफसर पर योगी सरकार की गाज अब तक क्यों नहीं गिरी?

नोएडा अथौरिटी के सीईओ लोकेश एम. जिन पर शहर के रखरखाव और ब्लैक स्पौट्स को खत्म करने की जिम्मेदारी है, उन्हें अब तक तलब क्यों नहीं किया गया? लोकेश एम से पूछा जाना चाहिए कि क्या वे कभी अपने शानदार एसी दफ्तरों से बाहर निकल कर शहर के हालात से दोचार होते हैं?

शहर में ट्रैफिक से ले कर फायर और सुरक्षा तक संभालने की जिम्मेदारी पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह की है. नोएडा प्राधिकरण के साथ तालमेल बिठा कर रिफ्लेक्टर और चेतावनी बोर्ड लगवाना पुलिस का काम था. मौके पर अंधेरा था और मौत का मुंह महीनों से खुला हुआ था, आखिर पुलिस को यह खतरा दिखाई क्यों नहीं दिया?

मौके पर पहुंची फायर ब्रिगेड की निकम्मी टीम तमाशबीन बनी रही और मरते हुए युवराज का वीडियो बनाती रही. जब वह डूब गया तो सीएफओ प्रदीप चौबे कहते हैं – टीम में किसी को तैरना नहीं आता था और हमारे पास इक्विपमेंट भी नहीं थे. कितना हास्यास्पद है कि हाईटेक नोएडा की हाईटैक फायर ब्रिगेड के पास किसी की जान बचाने के लिए एक नाव और एक लाइफ जैकेट तक नहीं थी. पर्याप्त समय होने पर भी अगर युवक को नहीं बचाया गया तो इस का मतलब है प्रबंधन ट्रेनिंग के नाम पर उत्तर प्रदेश में केवल खानापूर्ति होती है.

Noida techie death
सिस्टम की भेंट चढ़े युवराज की पुरानी फोटो और घटनास्थल का दृश्य

दुर्घटना या लापरवाही?

सब से बड़ा सवाल तो शहर की डीएम मेधा रूपम से पूछा जाना चाहिए जो जिले की डिजास्टर मैनेजमैंट हैड हैं. मगर इन की घड़ी तो इतनी सुस्त है कि ये घटना के चौथे दिन घटनास्थल पर पहुंची और एसडीएम तीसरे दिन. ये है योगी सरकार के प्रशासनिक तंत्र की हकीकत. इन तमाम जिम्मेदारों से अबतक कोई सवाल नहीं हुआ बल्कि मामले को ठंडा करने की कवायतों के साथ बिल्डर अभय कुमार को अरेस्ट कर जेल भेजने और दोएक और बिल्डरों को गिरफ्तार करने के बाद सब अपनेअपने खोल में दुबक गए हैं.

एक एसआईटी बना दी गई है. उस की रिपोर्ट आ जाएगी और शहर का हाल जस का तस बना रहेगा. हर बड़े हादसे के बाद वही रटीरटाई स्क्रिप्ट – जांच के आदेश, समिति का गठन, और कुछ दिनों बाद खामोशी. क्या कभी यह तय हुआ कि दोषी अधिकारी पर व्यक्तिगत कार्रवाई होगी? क्या कभी मुआवजे से आगे बढ़ कर प्रिवैंटिव एक्शन लिया गया, ताकि अगली जान बच सके?  क्या सेक्टर–150 में चल रहे सभी कार्यों की सेफ्टी कंप्लायंस रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी? हादसे से पहले आखिरी निरीक्षण कब हुआ था, और किस अधिकारी ने किया? क्या जिम्मेदार अफसरों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी, या यह मामला भी “दुर्घटना” कह कर दफन कर दिया जाएगा?

खुलती सिस्टम की पोल

नोएडा को निवेश का हब बनाने की होड़ में विकास की रफ्तार तेज है, पर सुरक्षा की चाल बेहद सुस्त. स्मार्ट सिटी का दावा तब खोखला लगता है, जब स्मार्ट लाइटिंग, सुरक्षित फुटपाथ, स्पष्ट साइनज और समयबद्ध मरम्मत जैसी बुनियादी चीजें गायब हों. विकास का असली पैमाना ऊंची इमारतें नहीं, सुरक्षित नागरिक जीवन है. नोएडा में अक्सर ठेकेदार बदल जाते हैं, अफसर ट्रांसफर हो जाते हैं, लेकिन सिस्टम वही रहता है, जहां जवाबदेही फाइलों के बीच गुम हो जाती है. युवराज की मौत ने इसी सिस्टम की पोल खोली है.

युवराज मेहता के परिवार के लिए न्याय का अर्थ सिर्फ आर्थिक सहायता नहीं है. न्याय तो तब होगा जब दोषियों की पहचान होगी, कार्रवाई होगी, और शहर में ऐसी परिस्थितियां दोहराई नहीं जाएंगी. न्याय तब होगा जब नोएडा प्राधिकरण यह मानेगा कि शहर का हर नागरिक उसकी जिम्मेदारी है और हर लापरवाही की कीमत किसी की जिंदगी हो सकती है.

युवराज की मौत हमें एक कड़वी सच्चाई से रूबरू कराती है कि प्रशासनिक लापरवाही जानलेवा हो सकती है. यह घटना एक चेतावनी कि अगर आज भी जिम्मेदार अफसर कटघरे में नहीं आए, अगर आज भी जवाबदेही तय नहीं हुई तो अगली खबर फिर किसी और युवराज की होगी. Noida techie death

EU India Trade : यूरोपीय यूनियन और भारत का बाजार

EU India Trade : अमेरिका से ठुकराए जाने पर यूरोपीय यूनियन को अचानक भारत का बाजार याद आने लगा है. डोनाल्ड ट्रंप ने एकएक कर के यूरोप के सब नेताओं को नाराज ही नहीं कर दिया, उन का व्यक्तिगत मखौल उड़ा कर बातचीत तक के रास्ते बंद भी कर दिए हैं. यूरोप और कनाडा अब भारत की मार्केट को ढूंढ रहे हैं कि क्या 145 करोड़ की जनता अमेरिका की 30 करोड़ की जनता के बराबर की खरीदारी कर पाएगी?

भारत चाहे तीसरी या चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था होने का ढोल पीटता रहे, यूरोप के देश अच्छी तरह समझते हैं कि उन के सम्मलित 20 ट्रिलियन डौलर की खपत के लिए 4 ट्रिलियन डौलर की अर्थव्यवस्था बेकार है. भारत अमेरिका से भी कुछ ज्यादा नहीं खरीद सकता था और यूरोप से भी नहीं खरीद सकता क्योंकि देशों के सामान महंगे हैं चाहे बढिय़ा क्यों न हों. जहां भारत में प्रतिव्यक्ति आय 2,500 से 2,600 डौलर है वहीं यूरोप के देशों की प्रतिव्यक्ति आय 3,000 से 1,00,000 डौलर तक है.

भारत का आकार बड़ा है और सरकार के पास कर का मोटा पैसा जमा हो जाता है. यहां के 200 के करीब धन्ना सेठ विलासिता की चीजें भी खरीद रहे हैं और इंडस्ट्रियल सामान भी क्योंकि 145 करोड़ जनता को कपड़ा, मशीनें, घरेलू उपयोग की चीजें तो चाहिए ही, पर भारत की खरीदारी की क्षमता बेहद सीमित ही है, यह अमेरिका भी जानता है और यूरोप भी.

अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को अपने दूसरी टर्म में भाव देना बंद कर दिया था क्योंकि उन्हें समझ आ गया था कि यहां पोला ढोल ज्यादा है, ठोस कम. भारत चंद हवाई जहाज, कुछ युद्धपोत, बंदूकें, तोपें खरीद ले पर उतना तो पिछड़ा पाकिस्तान भी खरीद लेता है. फिर भी अमेरिका से पल्ला झाडऩे के बाद यूरोप केवल जनसंख्या का समर्थन पाने के लिए अब भारत की ओर रुख कर रहा है.

यह हमारे नेताओं की खूबी होगी कि वे भी अमेरिका द्वारा ठुकराए जाने के बाद यूरोप को सहर्ष स्वीकार ही नहीं करें, उन की खुले दिमाग वाली जीवनशैली अपनाएं. अमेरिका पिछले कुछ दशकों में कट्टरपंथी चर्च भक्त बनना जा रहा था और यूरोप चर्च को छोड़ रहा है. यह यूरोप के लिए फायदेमंद साबित होगा क्योंकि अगर धर्म आड़े नहीं रहेगा तो यूरोप चीन की तरह फिर से आगे बढ़ सकता है. यूरोप की थकान अमेरिकी कल्चर के दबाव के कारण थी.

भारत से यूरोप को उम्मीद कम करनी चाहिए पर यह फैसला यूरोपीय नेताओं का है. हमें अगर वे भाव दे रहे हैं जबकि हम हर रोज ज्यादा कट्टर होते जा रहे है तो खुश ही होना चाहिए. जब तक यह भाव मिले, लाभ उठाओ. EU India Trade

Romantic Story in Hindi : कायरता का प्रायश्चित्त – मिताली किस ओर खिंची जा रही थी ?

Romantic Story in Hindi :

सरिता, बीस साल पहले,

जनवरी (द्वितीय) 2006

पतिपत्नी का रिश्ता तन से ज्यादा मन से मजबूत बनता है लेकिन मन की डोर किसी और के साथ जुड़ी हो तब. मिताली इसी अनजान डोर से मिहिर की तरफ खिंची जा रही थी.

डा. मिहिर ने जैसे ही अपने चेहरे के सामने से किताब हटाई और सामने बैठे मरीज की तरफ देखा तो वे चौंक गए.

चौंकी तो मिताली भी थी पर उस ने अपनेआप को संयत कर लिया था.

‘‘अरे मिहिर, आप?’’ मिताली बोली, ‘‘मैं ने तो सोचा भी नहीं था कि आप यहां हो सकते हैं.’’

‘‘कहो, मिताली, कैसी हो और क्या हुआ तुम्हें जो एक डाक्टर की जरूरत पड़ गई?’’ डा. मिहिर सामान्य स्वर में बोले.

‘‘मिहिर, मैं तो ठीक हूं पर यहां मैं अपने पति नवीन को दिखाने आई हूं,’’ मिताली बोली, ‘‘पिछले 3-4 माह से उन की तबीयत कुछकुछ खराब रहती थी पर इधर कुछ दिनों से काफी अधिक अस्वस्थ रहने लगे हैं,’’ कह कर मिताली ने डा. मिहिर का परिचय नवीन से करवाया, ‘‘नवीन, डा. मिहिर का घर कानपुर में मेरी बूआ के घर के बगल में है. मेरे फूफाजी और मिहिर के डैडी बचपन के दोस्त हैं.’’

डा. मिहिर ने नवीन का चैकअप किया व कुछ टैस्ट करवाने का परामर्श दिया जिस की रिपोर्ट ले कर अगले दिन आने को कहा.

मिताली व नवीन चले गए पर डा. मिहिर का मन उचट गया. एक बार उन के मन में आया कि वे घर लौट जाएं लेकिन जब अपने मरीजों का ध्यान आया जो कई दिन पहले नंबर लगवा चुके थे और काफी दूरदूर से आए थे तो उन्होंने अपनेआप को संभाल लिया और चपरासी से मरीजों को अंदर भेजने के लिए कह दिया.

शाम के समय मिहिर को किसी दोस्त के घर पार्टी में जाना था पर वह वहां न जा कर सीधे घर आ कर चुपचाप बिस्तर पर लेट गए.

डा. मिहिर को बारबार एक ही बात चुभ रही थी कि जिस मिताली के कारण अपना घर, डैडी का अच्छाखासा नर्सिंग होम छोड़ कर उसे इस अनजान शहर में आ कर अपनी प्रैक्टिस जमानी पड़ी वही मिताली उन के शांत जीवन में कंकड़ फेंकने के लिए यहां भी आ गई.

‘‘साहब, चाय लेंगे या कौफी?’’ हरिया ने अंदर आ कर पूछा.

‘‘नहीं, मैं कुछ नहीं लूंगा,’’ मिहिर ने छोटा सा जवाब दिया तो वह चला गया.

उस के जाते ही मिहिर का मन अतीत के सागर में गोते लगाने लगा.

मिताली को पहली बार मिहिर ने रस्तोगी अंकल की बेटी रानी के जन्मदिन की पार्टी में देखा था. यों तो वह रानी के घर वालों के मुंह से मिताली की सुंदरता की चर्चा पहले भी सुन चुका था पर उस दिन जो उसे देखा तो बस देखता ही रह गया था.

हालांकि मिहिर भी कम हैंडसम न था, उस पर संपन्न परिवार का इकलौता लड़का, साथ में डाक्टरी की पढ़ाई. पार्टी में आई तमाम लड़कियों की नजरें उस पर टिकी थीं और वे उस से बातें करने को आतुर थीं पर मिहिर जिस से बात करना चाहता था वह अपनी सहेलियों से बातें करने में व्यस्त थी.

काफी देर बाद मिहिर को मिताली से बात करने का मौका मिला.

‘आप का नाम मिताली है?’ बातचीत शुरू करने के उद्देश्य से मिहिर ने पूछा.

‘हां, पर आप को मेरा नाम कैसे पता चला?’ मिताली ने उसे आश्चर्य से देखते हुए प्रतिप्रश्न किया.

‘सिर्फ नाम ही नहीं, मैं तो आप के बारे में और भी बहुतकुछ जानता हूं,’ मिहिर ने कहा तो मिताली की आंखें आश्चर्य से फैल गईं.

‘अच्छा, और क्याक्या जानते हैं आप मेरे बारे में?’ उस ने पूछा.

‘यही कि आप रानी के मामा की बेटी हैं और एमबीए की छात्रा हैं. संगीत सुनना, बैडमिंटन खेलना, कविताएं लिखना आप की हौबी है,’ मिहिर बोला.

‘हां, आप कह तो सच रहे हैं पर मेरे बारे में इतना सबकुछ आप कैसे जानते हैं? क्या मैं आप का परिचय जान सकती हूं?’ मिताली ने कहा.

‘मैं रानी का पड़ोसी हूं. मेरा नाम मिहिर है. मैं मैडिकल अंतिम वर्ष का छात्र हूं. आजकल छुट्टियों में घर आया हूं,’ मिहिर ने अपना परिचय दिया.

तभी मिताली को किसी ने पुकारा और वह वहां से चली गई. मिहिर भी घर लौट आया. उस की आंखों की नींद व मन का चैन उड़ चुका था. दिनरात, सोतेजागते, उठतेबैठते बस उसे मिताली ही नजर आती थी.

उस दिन मिहिर अपनी छोटी बहन रूपाली के साथ शौपिंग करने गया था. रूपाली बुटीक में अपने लिए कपड़े पसंद कर रही थी. मिहिर बोर होने लगा तो वह बाहर आ गया. अचानक उस की नजर सामने की गिफ्ट शौप की तरफ गई तो वह चौंक पड़ा. वहां मिताली कुछ खरीद रही थी. मिहिर उस ओर बढ़ चला.

‘हाय, मिताली, कैसी हो और यहां कैसे?’ मिताली के करीब जा कर मिहिर ने पूछा.

‘अरे मिहिर, आप और यहां. दरअसल आज मेरी एक फ्रैंड का जन्मदिन है. मैं उसी के लिए गिफ्ट खरीदने आई हूं, और आप?’ मिताली ने उस से कहा.

‘मैं अपनी बहन रूपाली के साथ आया हूं. वह सामने की दुकान से कपड़े खरीद रही है. बोर होने लगा तो अंदर से बाहर आ गया और तुम यहां दिख गईर्ं.’

मिताली ने एक टेबल लैंप पैक करवा लिया. वह पैसे देने के लिए मुड़ी तो मिहिर ने उसे फिर शो केसों की तरफ बुला लिया और एक सफेद संगमरमर से बने ताजमहल की तरफ इशारा करते हुए बोला, ‘मिताली, देखो तो जरा यह कैसा लग रहा है?’

‘बहुत खूबसूरत है,’ मिताली बोली.

मिहिर ने सोचा, क्यों न वह अपने प्यार का इजहार मिताली को यह सुंदर उपहार दे कर करे, यह सोच कर उस ने वह ताजमहल और साथ में एक खूबसूरत पत्थर का बना कीमती ब्रेसलैट भी खरीद लिया.

तभी मिहिर को ढूंढ़ते हुए वहां रूपाली भी आ गई और मिताली को देख कर उस से बातें करने लगी.

मिहिर मन ही मन खुश हुआ कि चलो वह सफाई देने से बच गया वरना न जाने कितनी देर तक उस की छोटी बहन उस से सिर्फ इसलिए लड़ती कि वह उसे बिना बताए क्यों चला आया.

‘अच्छा अब मैं चलती हूं,’ घड़ी की तरफ नजर डालते हुए मिताली बोली.

‘मिताली, हमारे साथ ही चलो न, मुझे मेरी दोस्त के घर छोड़ कर मिहिर भैया तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ देंगे.’

रूपाली के इस आग्रह को मिताली टाल न सकी और उस के साथ चल दी.

रूपाली को उस की दोस्त के घर छोड़ कर मिहिर ने एक रैस्तरां के सामने गाड़ी रोक दी और मिताली से बोला, ‘चलो, कौफी पी कर घर चलेंगे.’

‘मिहिर, देर हो जाएगी और अभी मुझे अपनी फ्रैंड के घर भी जाना है.’

‘मिताली, ज्यादा देर नहीं लगेगी. प्लीज, चलो न.’

मिहिर के इस आग्रह को मिताली मान गई.

दोनों कोने की एक खाली टेबल पर आ कर बैठ गए.

मिहिर यह सोच कर अपने दिल की बात नहीं कह पा रहा था कि यह उन दोनों की दूसरी मुलाकात है और मिताली कहीं उसे सड़क छाप आशिक न समझ ले.

‘मिहिर, आप ने वह ब्रैसलेट रूपाली को नहीं दिया?’ मिताली सहज ही बोली.

‘मिताली,’ मिहिर बोला, ‘मैं ने वह ब्रैसलेट और ताजमहल उस लड़की के लिए खरीदा है जिसे मैं बहुत प्यार करता हूं और शादी भी करना चाहता हूं. पर…’

‘पर क्या, मिहिर?’

‘पर मिताली, वह मुझे प्यार करती है या नहीं, यह मैं नहीं जानता.’

‘तो क्या अभी तक आप ने अपने दिल की बात उस लड़की से नहीं कही?’ मिताली ने कौफी का आखिरी घूंट भरते हुए पूछा.

‘नहीं, डरता हूं, कहीं वह नाराज न हो जाए. वैसे, तुम बताओ मिताली, क्या वह लड़की मेरा प्रेम स्वीकार कर लेगी?’

‘मैं क्या बताऊं मिहिर, पता नहीं उस लड़की के दिल में आप के प्रति क्या है? अच्छा, अब हमें चलना चाहिए,’ मिताली उठ खड़ी हुई.

मिहिर ने मिताली को उस के घर छोड़ दिया और जब तक वह अंदर नहीं चली गई तब तक उसे देखता रहा.

दूसरे दिन मिताली से मिलने मिहिर उस के घर गया तो पता चला कि वह अपनी सहेलियों के साथ सुबह ही एक हफ्ते के लिए शिमला घूमने गई है. मिहिर निराश लौट आया.

मिताली के वापस आने से पहले ही मिहिर की छुट्टियां समाप्त हो गईं और वह वापस होस्टल चला आया. अब मिहिर जब भी खाली होता, उस के कानों में मिताली की खनकती हंसी गूंजती रहती. वह यह सोच कर अपने मन को समझ लेता कि इस बार घर लौटेगा तो अपने दिल की बात मिताली से जरूर कह देगा.

इंतजार की घड़ी कितनी ही लंबी हो, खत्म होती ही है. आखिर मिहिर की परीक्षाएं समाप्त हो गईं और उसी दिन वह घर के लिए चल पड़ा.

मिहिर जब घर पहुंचा तो शाम का धुंधलका छाने लगा था. उसे देख रूपाली खुश होती हुई बोली, ‘भैया, आप बड़े ही ठीक मौके पर आए हैं. मुझे मिताली के घर तक जाना है, आप गाड़ी से छोड़ देंगे क्या?’

मिताली का नाम सुनते ही मिहिर के शरीर में बिजली सी दौड़ गई. वह बोला, ‘हां, मैं थका नहीं हूं. बस, एक कप कौफी पी कर चलता हूं.’

रूपाली को कौफी लाने के लिए बोल कर मिहिर तैयार होने चला गया. तैयार होते समय वह मन ही मन सोच रहा था कि आज वह मिताली से अपने प्यार का इजहार कर ही देगा. चलते वक्त उस ने वह ताजमहल और ब्रैसलेट भी ले लिया जो वह संभाल कर घर में रख गया था.

रास्तेभर रूपाली मिहिर से उस के दोस्तों और होस्टल के बारे में बातें करती रही. मिहिर भी उस के हर सवाल का जवाब दे रहा था.

मिताली का घर बिजली की रंगबिरंगी झलरों से जगमगाता देख कर मिहिर ने छोटी बहन से पूछा, ‘रूपाली, क्या आज मिताली के घर पर कोई फंक्शन है?’

‘हां, भैया, मैं तो आप को बताना ही भूल गई कि आज मिताली की सगाई है,’ कह कर रूपाली गाड़ी से उतर कर आगे बढ़ गई और जातेजाते कह गई कि गाड़ी पार्क कर आप भी आ जाना.

मिहिर को लगा जैसे उस की आंखों के आगे अंधेरा छा रहा है. वह वहां ठहर न सका और उसी क्षण वापस लौट आया. उस के तमाम सपने शीशे की तरह टूट गए थे जो लगभग एक साल से मिताली को ले कर देखता आया था.

मिहिर ने अंत में वह शहर छोड़ने का फैसला कर लिया. उस के डैडी ने समझने की बहुत कोशिश की लेकिन मिहिर को वह शहर, हर पल शूल

की तरह चुभता था. सो, उस ने कानपुर छोड़ कर इस शहर में आ कर अपनी प्रैक्टिस जमाई.

‘‘साहब, खाना तैयार है, लगा दूं?’’ हरिया ने आ कर उस से पूछा तो मिहिर की तंद्रा भंग हुई और वह जैसे सपने से जाग गया.

‘‘नहीं, मुझे भूख नहीं है. तुम खा लो. हां, मेरे लिए बस, एक कप कौफी भर बना देना,’’ इतना कह कर डा. मिहिर उठे और कंप्यूटर खोल कर कुछ काम करने लगे.

अगले दिन रिपोर्ट ले कर मिताली व नवीन उस के क्लीनिक पर आए. रिपोर्ट देख कर उस ने बता दिया कि कोई गंभीर बीमारी नहीं है और दवाइयों का परचा लिख कर उन्हें दे दिया. जाते समय मिताली व नवीन मिहिर को अपने घर आने का निमंत्रण दे गए.

मिहिर के इलाज से नवीन ठीक हो रहा था. पति को ठीक होता देख कर मिताली भी अब पहले की तरह खिलीखिली रहने लगी थी. उसे खुश देख कर मिहिर को एक अजीब सी संतुष्टि का एहसास होता.

मिताली व नवीन कई बार मिहिर से घर आने को कह चुके थे. एक दिन वह उधर से निकल रहा था तो सोचा, चलो आज मिताली से मिल ही लें और बिना किसी पूर्व सूचना के मिताली के घर पहुंच गया. नवीन और मिताली अभी औफिस से नहीं लौटे थे. घर पर आया थी. सो, मिहिर ड्राइंगरूम में बैठ कर उन की प्रतीक्षा करने लगा.

बैठेबैठे मिहिर बोर होने लगा तो टेबल पर रखी पत्रपत्रिकाएं ही उलटनेपलटने लगा. तभी उस की नजर एक डायरी पर पड़ी और वह उस डायरी को उठा कर देखने लगा.

डायरी के पहले पन्ने पर मिताली लिखा देख कर मिहिर के मन में उत्सुकता जागी और वह अंदर के पन्नों को खोल कर पढ़ने लगा. एक पृष्ठ पर लिखा था :

‘मैं ने मिहिर के बारे में सुना था. आज रानी के जन्मदिन की पार्टी में उस से मुलाकात भी हो गई. मैं ने अपने जीवनसाथी की जो कल्पना की थी उस पर मिहिर बिलकुल खरा उतरता है.’

कुछ पन्नों को छोड़ कर फिर लिखा था :

‘आज मैं मिहिर से दूसरी बार मिली. बातों में पता चला कि वह किसी और लड़की से प्यार करता है जिस के लिए उस ने आज ही प्यारा सा ताजमहल व ब्रैसलेट खरीदा है. कितनी नसीब वाली होगी वह लड़की जिसे मिहिर प्यार करता है.’

मिहिर आश्चर्यचकित रह गया. तो क्या मिताली भी उसे चाहती थी? खैर, इस में अब संदेह ही कहां था? उस की कायरता का नतीजा मिताली को और उसे भी भुगतना पड़ रहा है.

डायरी जहां से उठाई थी वहीं रख कर मिहिर आंखें बंद किए सोचता रहा कि यदि उस दिन रैस्तरां में हिम्मत कर मिताली से प्यार का इजहार कर दिया होता तो आज उसे अकेलेपन का विषाद न झेलना पड़ता.

‘‘अरे, मिहिर आप. अचानक बिना पूर्व सूचना दिए?’’ मिताली कमरे में घुसती हुई बोली.

‘‘मिताली, मैं ने सोचा अचानक, बिना पहले से बताए तुम्हारे घर आ कर तुम्हें चौंका दूं. क्यों, कैसा लगा मेरा यह आइडिया?’’

‘‘बहुत अच्छा डा. साहब,’’ नवीन ने कहा, ‘‘आप हमारे घर आए, यह हमारे लिए गर्व की बात है.’’

मिताली ने आया को चायनाश्ता लाने का निर्देश दिया और खुद नवीन के बगल में आ कर बैठ गई.

कुछ देर इधरउधर की बातें होती रहीं. फिर मिहिर ने कहा, ‘‘अब आप लोग मेरे घर कब आ रहे हैं? ऐसा करो मिताली, नवीनजी को ले कर इसी इतवार को आ जाओ.’’

‘‘मिहिर, इस इतवार को तो नवीनजी का बहुत व्यस्त कार्यक्रम है.’’

‘‘मिताली, तुम अकेले ही चली जाना,’’ नवीन बोले, ‘‘मैं फिर कभी चला जाऊंगा.’’

मिहिर घर लौट कर आया तो उस की बेचैनी और बढ़ गई थी.

मिताली इतवार को नियत समय पर मिहिर के घर पहुंच गई. घर में इधरउधर देख कर बोली, ‘‘मिहिर, और कोई दिखाई नहीं दे रहा है, क्या सब लोग कहीं गए हैं?’’

‘‘मिताली, मैं यहां अकेला रहता हूं. दरअसल, मैं जिस लड़की से प्यार करता था उस की शादी कहीं और हो गई. मैं ने निश्चय किया था कि उस के अलावा किसी और लड़की से मैं विवाह नहीं करूंगा और मैं ने ऐसा ही किया.’’

मिताली उसे देख कर हैरान रह गई, बोली, ‘‘पर मिहिर, कब तक व कैसे अकेले जीवन व्यतीत करेंगे आप?’’

‘‘मिताली, मैं अकेला बेशक हूं पर उस की यादें मेरे साथ हैं. वही मेरे जीने का सहारा है. यही नहीं, मैं तो अब उसे अकसर प्रत्यक्ष अपनी आंखों से देखता हूं.’’

‘‘तो क्या वह भी इसी शहर में है?’’

‘‘हां, मिताली,’’ मिहिर बोला, ‘‘क्या तुम उस से मिलना चाहोगी, अच्छा चलो, मैं तुम्हें अभी उस से मिलवाता हूं,’’ और भाववेश में मिताली को ले जा कर मिहिर शीशे के सामने खड़ा कर के बोला, ‘‘देखो मिताली, यही है मेरा प्यार.’’

‘‘मिहिर, यह क्या मजाक है?’’ दूर छिटक कर मिताली गुस्से से बोली.

मिहिर ने उसे सबकुछ सचसच बता डाला और अलमारी से निकाल कर वह ताजमहल व ब्रैसलेट उस के सामने रख दिया.

हतप्रभ खड़ी मिताली कभी मिहिर को तो कभी ब्रैसलेट व सफेद संगमरमर के ताजमहल को देख रही थी जिस पर छोटेछोटे शब्दों में खुदा था, ‘मिताली के लिए’.

मिताली एक अजीब दुविधाजनक स्थिति लिए घर लौटी थी. एक तरफ नवीन था जिस के नाम का मंगलसूत्र उस के गले में पड़ा है, दूसरी तरफ मिहिर, जिस के प्यार का अंकुर कभी उस के मन में फूटा था, किंतु वह फूल पुष्पित न हो सका. और आज इतने सालों बाद न जाने कैसे अनायास ही उस में कोंपलें निकलने लगीं.

मिताली रातभर करवटें बदलती रही. सुबह उठी तो सो न पाने के कारण आंखें लाल और सिर में तेज दर्द हो रहा था. नवीन उस की हालत देख कर परेशान हो उठा. अभी तक नौकरानी नहीं आई थी. सो, वह खुद ही चाय बना लाया.

‘‘मिताली, शायद तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है,’’ चाय का प्याला उस की तरफ बढ़ाते हुए नवीन बोला.

‘‘तैयार हो जाओ, मैं औफिस चलते समय तुम्हें डा. मिहिर को दिखा दूंगा.’’

मिहिर के क्लीनिक में काफी भीड़ थी. सो, नवीन मिताली को छोड़ कर औफिस चला गया. मिताली का जब नंबर आया तो दोपहर हो चुकी थी. मिहिर ने मिताली की जांच की, कुछ दवाएं दीं और बोला, ‘‘चलो, आज हम दोनों बाहर लंच करते हैं.’’

आज मिताली बिना किसी विरोध के मिहिर के साथ चल दी. दोनों ने होटल में खाना खाया, बातें कीं. फिर मिताली घर लौट आई और मिहिर क्लीनिक लौट गया. मिताली का साथ मिहिर को आनंदित करता, उस में नए उत्साह का संचार हो जाता. मिताली को भी मिहिर का साथ सुखद लगता. अब वे हमेशा मिलते रहते.

उस दिन दोपहर से ही आसमान में बादल सूरज के साथ आंखमिचौली कर रहे थे. मिताली को बादलों वाले मौसम में बाहर घूमने में बड़ा मजा आता था. सो, दफ्तर से जल्दी घर लौट आई और फिर शाम को तैयार हो कर वह मिहिर से मिलने क्लीनिक चल दी.

मिहिर भी क्लीनिक से निकलने की तैयारी कर रहा था. दोनों गाड़ी में बैठ कर मिहिर के घर आ गए.

‘‘मिताली, कितना अच्छा लगता है जब तुम साथ होती हो,’’ मिहिर उस की आंखों में झंकते हुए बोला, ‘‘कभीकभी सोचता हूं कि यहां आ कर मैं ने कितना अच्छा किया, यदि यहां न आता तो तुम शायद कभी न मिलतीं.’’

‘‘मिहिर, यदि आप ने अपने दिल की बात तभी मुझ से कह दी होती तो आज आप को यों अकेला जीवन व्यतीत न करना पड़ता.’’

‘‘हां, मिताली, तुम ठीक कहती हो पर क्या हम अपनी गलती सुधार नहीं सकते?’’

‘‘मिहिर, कुछ गलतियां ऐसी होती हैं जो कभी सुधारी नहीं जा सकतीं. अच्छा, अब मैं चलती हूं, काफी देर हो गई,’’ कौफी का खाली कप मेज पर रखती हुई मिताली बोली.

मिताली बाहर निकली, किंतु तेज बारिश शुरू हो गई थी. उस ने सोचा कि वह निकल जाए पता नहीं कब बारिश बंद हो, किंतु इतने खराब मौसम में मिहिर ने उसे जाने नहीं दिया. उस ने कहा कि बारिश बंद हो जाएगी तो वह खुद उसे छोड़ आएगा.

आज जैसे कुदरत भी उन्हें मिलाने को तैयार थी. मिताली की बुद्धि ने भावनाओं के ज्वार के सामने हथियार डाल दिए. उन्हें उचितअनुचित का भी ध्यान न रहा. मिहिर के प्रति मिताली के मन में निकली प्रेम की कोंपलों ने आखिर उस रेशमी डोर को काट ही डाला जिस से मिताली नवीन के साथ बंधी थी.

सुबह बारिश रुकी तो मिताली घर आई पर उस के दिल में एक अपराधबोध था कि उस ने ऐसा क्यों किया पर वह भी क्या करती, मिहिर की आवाज कानों में पड़ते ही या उस के सामने रहते हुए उसे अपनी सुध ही कहां रहती है जो वह सहीगलत का फैसला कर पाती.

‘‘अरे मिताली, तुम रातभर कहां थीं,’’ नवीन बेचैन हो कर बोले, ‘‘मैं पूरी रात तुम्हें ले कर परेशान होता रहा.’’

‘‘नवीन, कल शाम को मैं डा. मिहिर के क्लीनिक दवा लेने गई थी. लौटते समय एक सहेली के यहां चली गई. मैं तो बारिश में ही आ रही थी पर उस ने यह कह कर आने नहीं दिया कि इस बरसात में जा कर तुम अपनी तबीयत और खराब करोगी क्या?’’

‘‘मिताली, आज शाम की टे्रन से सीमा दीदी 3-4 दिनों के लिए यहां आ रही हैं. रात में जीजाजी का फोन आया था. कोई चीज मंगानी हो तो बता देना. दोपहर में मैं किसी से भिजवा दूंगा,’’ नवीन ने कहा.

मिताली ने सामान की सूची नवीन को दे दी. करीब हफ्तेभर रह कर सीमा दीदी वापस चली गईं तब मिताली औफिस गई और फिर वहां से मिहिर के घर चली गई.

मिताली को देखते ही मिहिर बोला, ‘‘अरे तुम कहां थीं, न घर आईं न ही फोन किया. कहीं तुम उस दिन की घटना से नाराज तो नहीं हो?’’

मिताली कुछ बोली नहीं. उस ने मिहिर का माथा छू कर देखा तो वह तप रहा था.

‘‘अपने प्रति इतनी लापरवाही ठीक नहीं है, मिहिर. आप सब का इलाज कर सकते हैं, अपना नहीं,’’ मीठी झिड़की देते हुए मिताली बोली.

‘‘मिताली, मेरी बीमारी सिर्फ तुम ही दूर कर सकती हो. अकेलेपन की यह पीड़ा अब मैं और बरदाश्त नहीं कर सकता, न तन से न मन से. तुम मेरे जीवन में आ जातीं तो जीने की राह आसान हो जाती,’’ अपने दिल की बात मिहिर ने मिताली के समक्ष जाहिर कर दी.

‘‘मिहिर, क्या नवीन को छोड़ देना सही होगा?’’ मिताली ने तर्क पेश किया.

‘‘मेरे लिए मिताली, सही और गलत क्या है यह मैं नहीं जानता. बस, इतना जानता हूं कि तुम मेरा प्यार हो और नवीन तुम पर थोपा गया है. तुम्हारा व उस का साथ तो मात्र संयोग है.’’

सच ही तो कह रहे हैं मिहिर. मिताली ने सोचा. नवीन के साथ शादी तय करने के बाद ही तो घर वालों ने उसे बताया था जबकि मिहिर को मैं ने पसंद किया था. मेरा पहला प्यार है मिहिर.

‘‘मिताली, आज तुम्हारी पसंद तुम्हारे सामने है, जिसे अपनाने में तुम्हें संकोच नहीं करना चाहिए. अपनी इच्छानुसार जीना हर व्यक्ति का अधिकार है. मिताली, तुम मेरे जीवन में आ जाओ. यही हमारी कायरता का प्रायश्चित्त होगा.’’

सच. आखिर सारा दोष मिहिर का तो नहीं, वह भी बराबर की दोषी है. यदि मिहिर ने संकोचवश अपने दिल की बात उस से नहीं कही तो उस ने भी कहां अपने प्यार का इजहार किया था. मिहिर कायर थे तो वही कहां हिम्मती थी. नहीं, अब और अकेलेपन की पीड़ा नहीं उठाने देगी वह. मिहिर के जीवन में आ कर खुशियां भर देगी. मिताली ने मन ही मन फैसला किया तो मिहिर के प्रति उस के हृदय में सहानुभूति की बाढ़ सी आ गई.

मिताली ने फोन उठाया और नवीन का नंबर मिला कर बोली, ‘‘नवीन, मैं ने एक बार बताया था न कि मैं ने किसी से प्यार किया था. वह कोई और नहीं बल्कि डा. मिहिर हैं. आज मैं ने अपना खोया हुआ प्यार दोबारा पा लिया है.’’

‘‘मिताली, तुम यह क्या बहकीबहकी बातें कर रही हो,’’ नवीन बोला, ‘‘प्लीज, जल्दी घर आओ. पतिपत्नी के रिश्ते क्या इतने सहज हैं जो तोड़ दिए जाएं.’’

‘‘नवीन, मुझे क्या करना है क्या नहीं, अपनी जिंदगी किस के साथ व्यतीत करनी है किस के साथ नहीं, यह मुझ से बेहतर और कौन जान सकता है? मैं ने काफी सोचसमझ कर फैसला लिया है. रही बात कानूनी कार्रवाई की, तो वह हम बाद में पूरी कर लेंगे,’’ कह कर मिताली ने फोन बंद कर दिया. Romantic Story in Hindi

Family Story in Hindi : दीवार के उस पार – इला क्या अमला का नजरिया बदल सकी ?

Family Story in Hindi : प्यार ही तो है जो दूसरों को अपना बना लेता है. इला यह बात अच्छी तरह समझती थी लेकिन अमला को वह अपना नहीं बना पा रही थी.  कैसी दीवार थी उन दोनों के बीच?

‘‘फिर पड़ोसियों के लिए तुम ने 3 प्लेट्स लगा लीं? हर त्योहार पर अपना दिल दुखी करवाने से थकतीं नहीं? अभी उतरा मुंह ले कर आओगी,’’ कहतेकहते आमिर ने किचन में काम करती अपनी पत्नी इला की लंबी, गोरी, सुराहीदार गरदन को चूम लिया. इला ने बनावटी गुस्सा दिखाया, ‘परेशान मत करो.’ फिर पता नहीं उसे क्या सूझ, आमिर की तरफ घूम गई और उस के चारों तरफ अपनी सुंदर बांहें फैला दीं, ‘‘आमिर, कितना अच्छा लगता है न, हर त्योहार कैसा सुंदर लगता है. मैं तो कहती हूं कि हर इंसान को इंटरकास्ट शादी करनी चाहिए. दोनों तरफ के त्योहार मनाने में कितना मजा आता है.’’

‘‘पर हम तो सब फैस्टिवल्स मनाते हैं, मम्मी.’’ बच्चों के आने की आहट पर इला अब तक अपना काम करने लगी थी, बोली, ‘‘हां, हर त्योहार सैलिब्रेट करना चाहिए,’’ अब आमिर के साथसाथ स्वरा और हर्षिल ने भी एक कोने में रखी थाली से पिन्नी उठा कर खानी शुरू कर दी थी. स्वरा की नजर 3 प्लेट्स पर पड़ी, ‘‘उन आंटी को भी दोगी जो हर बार आप के साथ इतना मिसबिहेव करती हैं.’’

‘‘हां, अच्छा तो नहीं लगता पर फ्लोर के 2 फ्लैट्स में त्योहार पर कुछ दूं और एक को न दूं तो मुझे अच्छा नहीं लगता.’’ हर्षिल ने कहा, ‘‘पर वह आंटी हमें बिलकुल अच्छी नहीं लगतीं, मम्मी. मत दो उन्हें कुछ.’’

आमिर ने कहा, ‘‘पिन्नी अच्छी बनी हैं, इला. उसे मत दो. क्यों ऐसे घर में दे कर आती हो जहां मुझे पूरा यकीन है कि यह सब डस्टबिन में जाता होगा. इस से अच्छा तो किसी गरीब को दे देना. वाचमैन को दे दो, हाउसकीपिंग वालों को दे दो, धोबी को दे दो. इस घर में क्यों देती हो?’’

इला ने शांत भाव से कहा, ‘‘रिलैक्स. तुम लोग ठीक कह रहे हो. मुझे उस घर में बारबार इंसल्ट करवाने के बाद कुछ भी नहीं देना चाहिए. चलो, अगली बार से उसे कुछ नहीं दूंगी. सचमुच, हर बार मन दुखता है.’’

सब ने एकएक पिन्नी और उठाई. इला ने तीनों पेपर प्लेट्स के ऊपर एकएक टिश्यूपेपर रख दिया, कहा, ‘‘तुम लोग खाओ, मैं सब को दे कर आती हूं.’’

मलाड की कामधेनु सोसाइटी की इस बिल्डिंग के तीसरे फ्लोर पर 4 फ्लैट हैं. एक में इला, उस के सामने वाले फ्लैट में एक साउथ इंडियन फैमिली रहती है जिस में

2 बुजुर्ग श्रीनिवासन अंकल और ज्योति आंटी ही हैं, तीसरे साइड वाले फ्लैट में एक महाराष्ट्रियन कुलकर्णी फैमिली है जो एक जौइंट फैमिली है और चौथे फ्लैट में अमला अपने पति विजय और एक 7 साल के बच्चे के साथ रहती है. फ्लोर पर 2 लिफ्ट्स हैं. हमेशा की तरह सब से पहले इला ने ज्योति आंटी, फिर कुलकर्णी फैमिली को ‘हैप्पी लोहड़ी’ कहते हुए प्लेट्स दीं.’’

फिर  दिल पर पत्थर रख कर एक ठंडी सांस ले कर इला ने अमला के फ्लैट की घंटी बजाई. दरवाजा खुला, अमला की कर्कश आवाज आई, ‘‘क्या है?’’

‘‘हैप्पी लोहड़ी, ये आप के लिए. मैं ने पिन्नी बनाई हैं.’’

अमला ने प्लेट झटके से ली और दरवाजा झट से इला के मुंह पर बंद कर दिया. इस में कुछ भी नया नहीं था. 3 साल से यही हो रहा था. अमला 3 साल पहले ही इस फ्लैट में आई थी. इला मन ही मन उदास सी हुई, चुपचाप अपने फ्लैट में चली गई. आमिर और बच्चों ने उसे ध्यान से देखा, समझ गए, वही हुआ है जो हमेशा होता रहा है.

इला अपने परिवार में खूब खुश थी. विजातीय आमिर से प्रेमविवाह किया था, हाउसवाइफ थी. इला की सहेली विनी की शादी में दोनों मिले थे. थोड़ी मस्ती, शरारत के मूड में दोनों की अच्छी बौंडिंग हो गई थी. फिर चल निकला था एक सिलसिला मुहब्बत का, लंबीलंबी बेचैन रातों का, एकदूसरे की कौल्स के इंतजार में कटते दिनरात का.

दोनों के घरवाले नहीं माने थे. सो, आमिर ने मुंबई ट्रांसफर लिया और दोनों के दोस्तों के साथ इला मुंबई चली आई थी. ऐसी स्थिति में दोस्तों का जो साथ जरूरी है, वही आमिर और इला का सहारा बना था. दोस्त दोनों की शादी करवा कर वापस लखनऊ चले गए थे और ये दोनों अपने प्यार के संसार में रमते चले गए थे. समय के साथ दोनों के परिवार वालों के तेवर कुछ नरम तो हुए पर दीवार बनी रही.

इला और आमिर ने धर्म की हर दीवार को अपनी लाइफ से निकाल फेंका था. यही शिक्षा बच्चों को भी दी थी. सब हर त्योहार सैलिब्रेट करते. आमिर दीवाली पर घर सजा देता. इला लोहड़ी पर पकवान बनाती. क्रिसमस पर वह केक बेक करती. ईद पर दावत होती. दोस्त आते. सब ठीक था पर जब से अमला आई थी, इला का मन त्योहार पर जरूर दुखता. इला की आदत थी कि वह त्योहारों पर जब भी कुछ बनाती, फ्लोर पर रहने वालों से जरूर शेयर करती. वह हंसमुख, मिलनसार स्वभाव की थी. उसे लोग पसंद करते.

आमिर भी ऐसा ही था. बिल्डिंग में किसी को भी कोई परेशानी होती, वह हाजिर रहता. सब के काम आता. आज लोहड़ी से पहले भी जब इला अमला को ईद पर ड्राईफ्रूट्स से सजी सुंदर सी प्लेट में सेंवईं देने गई थी. उस ने ऐसे ही बहुत ही रुखाई से प्लेट ली थी जिसे बाद में अपनी मेड से भिजवा दिया था. आमिर और इला सब समझ ही रहे थे कि मुसलिम पति और हिंदू पत्नी का यह जोड़ा अमला को नागवार गुजरता है. कई बार ऐसा होता कि कभी आतेजाते अमला और इला मिलते, अमला एक झटके से तुरंत इला की तरफ पीठ कर लेती. कभी उस की तरफ देखती भी नहीं. उस के चेहरे से ही समझ आ जाता कि अमला को यह परिवार बिलकुल पसंद नहीं है. कई बार अमला का बेटा अर्णव इला को देख कर मुसकराता, अमला तुरंत उसे अपनी ओर खींच लेती.

आज भी यही हुआ था. इला को हमेशा इस बात पर दुख होता कि कुछ लोग अपने इर्दगिर्द अपने धर्म की दीवार के अंदर ही रह जाते हैं, वे देखते ही नहीं कि धर्म की दीवार के उस पार दुनिया कितनी सुंदर हो सकती है. कई बार ऐसा हुआ था कि अमला और इला एकसाथ लिफ्ट की तरफ बढ़े पर फिर अमला का तना चेहरा देख कर इला सीढि़यों की तरफ बढ़ गई थी. नीचे से ढोल का शोर सुना तो इला खिड़की की तरफ भागी. उसे यह देख कर बहुत मजा आया कि आमिर और बच्चे सब के साथ मिल कर डांस कर रहे थे. तीनों रंगबिरंगे हो चुके थे. आमिर ने उसे फिर देखा, हंस दिया, इशारा किया, ‘बस, खाना खा कर आ रहे हैं.’ थोड़ी देर में हर्षिल आया, ‘‘मम्मी, पापा ने आप के लिए खाना भेजा है. ये सारे डब्बे जल्दी से खाली कर के दे दो. कैटरर के हैं.’’

इला को आमिर पर बहुत प्यार आया, बोली, ‘‘अब तुम लोग भी जल्दी आ जाओ.’’ लोहड़ी अच्छे से बीत गई. सब का दिन बहुत अच्छा बीता था.

कुछ दिन और बीते. जीवन सामान्य गति से चलता रहा. एक दिन आमिर औफिस में था, बच्चे स्कूल गए हुए थे. इला ने सोचा, पार्लर हो आती हूं. उस ने जैसे ही लिफ्ट में पैर रखा, अचानक अमला भी लिफ्ट में घुसी. उस ने ध्यान ही नहीं दिया था कि इला भी लिफ्ट में है. जब देखा तो उस की तरफ पीठ कर ली. यह लिफ्ट अभी 12 दिनों पहले ही नई बनी थी. दूसरी लिफ्ट में काम चल रहा था. 10वीं फ्लोर से जैसे ही लिफ्ट 8वीं फ्लोर के थोड़ा ऊपर और 9वीं फ्लोर के थोड़ा नीचे पहुंची, अचानक रुक गई.

बाहर वाले को समझ आ सकता था कि लिफ्ट अटक गई है. अमला बेचैन हो गई. इला से बात करनी नहीं थी, इधरउधर देखती रही, फिर इला की तरफ पलटी. एक वाइट टौप, रंगबिरंगी सी स्कर्ट, गले में स्टाइलिश सा स्कार्फ डाले इला को आज पहली बार अमला ने ध्यान से देखा था. इला चुपचाप ऊपरनीचे देखती रही. उस ने इमरजैंसी बटन दबाया. कोई नहीं आया तो वह इंतजार करने लगी. अमला जोरजोर से वाचमैनवाचमैन चिल्लाने लगी. इला समझ गई कि वह घबरा रही है. इला ने कहा, ‘‘अमला, दसबीस मिनट लगेंगे, कोई आ जाएगा. वौचमैन तक आवाज नहीं जाएगी. घबराओ मत.’’

पर अमला को जैसे पैनिक अटैक आ रहा था. वह चीखने लगी तो इला ने उस के कंधे पर हाथ रखा, उसे तसल्ली दी, ‘‘रिलैक्स. ऐसा हो जाता है. नई लिफ्ट है, ठीक हो जाएगी. इधर से कोई निकलेगा तो देख लेगा.’’

अमला अचानक चुप हुई. इला को देखने लगी, कैसी शांत सी खड़ी है यह. जरा भी नहीं घबरा रही है. मेरे कंधे पर हाथ रखा.

अमला को रोना आ गया, ‘‘मुझे सफोकेशन हो रहा है. मेरा दम घुट रहा है.’’ इला ने उसे गले लगा लिया, मुसकराई, ‘‘कुछ नहीं हो रहा है. देखो, चैनल से बाहर की हवा आ रही है, लिफ्ट पूरी तरह से बंद थोड़े है.’’ इला के स्नेहभरे स्पर्श से अमला को कुछ राहत मिली. प्रेमपूर्ण स्पर्श में बड़े से बड़े दुख को कम करने की ताकत होती है.

‘‘अपने हसबैंड को फोन करती हूं.’’

‘‘वे औफिस में होंगे. जब तक वे आएंगे, हम लिफ्ट से बाहर निकल चुके होंगे.’’

आजकल लिफ्ट में काम चल रहा था. यह नई लिफ्ट थी, दूसरी लिफ्ट चल रही थी पर उस में भी काम चल रहा था. इतने में कोई सीढ़ी से उतरा. 10वीं फ्लोर के संजय गुप्ता थे. इन दोनों को लिफ्ट में फंसे देख कर हैरान, परेशान से बोले, ‘‘मैं वाचमैन को भेजता हूं. आप दोनों बिलकुल परेशान मत हो. फोन चल रहा है?’’

‘‘नहीं,’’ इला ने जवाब दिया. संजय के जाते ही थोड़ी देर बाद सीढि़यां चढ़ते हुए भागता हुआ सा वाचमैन सुधीर आया. वाचमैन सब को पहचानते ही हैं. वह बोला, ‘‘संजय सर ने बताया तो लिफ्ट वाले को फोन कर के पूछा था, उन्होंने बताया है कि उन्हें आने में टाइम लगेगा, डेढ़दो घंटे में वे लोग आ कर ठीक कर पाएंगे. मैडम, चैनल से कोई पानी की छोटी बोतल देने की कोशिश करूं?’’

‘‘नहीं, सुधीर. मेरे बैग में पानी है,’’ कह कर इला ने अमला से पूछा, ‘‘तुम्हें चाहिए, तो बता दो.’’

डेढ़दो घंटा सुन कर अमला सुधीर पर गुस्सा होने लगी, ‘‘लिफ्ट वाले को बोलो, अभी आए. फौरन. उस का दिमाग खराब हो गया है कि यह सुन कर भी कि कोई लिफ्ट में फंसा है, 2 घंटे बता रहा है.’’

‘‘मैडम, वह अंधेरी में है. उस ने कहा, वह निकल रहा है, जल्दी ही आ जाएगा. आप को पानी दूं?’’

‘‘दफा हो जाओ,’’ अमला चिल्लाई.

सुधीर डांट खा कर नीचे चला गया. अब आतेजाते लोग थोड़ी देर रुकते, परेशानी समझते पर कोई कुछ कर नहीं सकता था. अमला ने चिढ़ते हुए बोला, ‘‘अच्छा है, मेरा बेटा स्कूल में है. उस के आने तक तो निकल ही जाएंगे.’’

‘‘हां.’’

अमला बेचैन सी लिफ्ट के बाहर देखती, गुस्से में कुछ बड़बड़ाती. इला ने अमला को कनखियों से देखा, उस से कम ही उम्र की थी अमला. इस टाइम कुरते और जीन्स में थी, बाल यों ही लपेट रखे थे. देखने में सुंदर थी. उस से बात करने की गरज से यों ही पूछ लिया, ‘‘तुम कहां जा रही थीं?’’

‘‘टेलर के पास. यही टाइम मिलता है जब अर्णव स्कूल में होता है. ऐसे ही काम निबटाती हूं. तुम कहां जा रही थीं?’’

‘‘पार्लर. मैं भी बच्चों के स्कूल के टाइम के हिसाब से ही अपना रूटीन रखती हूं. मैं क्या, सारी मांएं यही करती हैं,’’ इला मुसकराई.

अमला ने सोचा, यह कितनी शांत रहती है. जब से हम लिफ्ट में फंसे हैं, यह आराम से सब हैंडल कर रही है. उस ने पूछ लिया, ‘‘तुम्हें लिफ्ट में फंसने से दिक्कत नहीं हो रही है, कोई परेशानी नहीं हो रही है? आराम से शांत खड़ी हो?’’

इला बड़ा प्यारा मुसकराई, अमला को वह पहली बार अच्छी लगी.

इला ने दोस्ताना लहजे में कहा, ‘‘तुम्हारी बात का जवाब बाद में जरूर दूंगी. पहले तुम बताओ कि तुम मुझ से इतना चिढ़ती क्यों हो?’’

अमला के चेहरे पर शर्मिंदगी के भाव आए, क्या कहती. उस की ऐसी सोच क्यों है, कैसे बताए. इला ने उसे कुछ दुविधा में देखा, तो कहा, ‘‘चलो, कुछ न कहना चाहो तो छोड़ो, कोई बात नहीं.’’

अमला चुप रही, फिर कहा, ‘‘थोड़ी देर नीचे ही बैठ जाएं? खड़ेखड़े पैर दुखने लगेंगे.’’

‘‘रुको, कोई आता है तो उस से बिछाने के लिए कुछ मांग लेंगे.’’

अमला और इला बीचबीच में अपना नैटवर्क भी चैक कर रही थीं. अमला अचानक बोली, ‘‘मेरा नैटवर्क आया.’’

‘‘जल्दी से किसी पड़ोसी से कुछ बिछाने के लिए मांग लो.’’

अमला ने चौथी फ्लोर पर रहने वाली एक फ्रैंड शैली को फोन कर के सब बात जल्दी से बता दी. वह फौरन भागी आई, कहा, ‘‘ओह, यह तो बड़ी परेशानी में फंस गईं तुम दोनों. यह लो एक चादर,’’ कहती हुई लिफ्ट के बीच की डिजाइन से चादर दे दी. फिर पूछा, ‘‘कुछ बिस्कुट दूं?’’

‘‘नहीं, अभी नाश्ता किया ही था, कुछ नहीं चाहिए.’’

‘‘अच्छा, कुछ भी चाहिए तो मुझे फोन करते रहना. मैं सेक्रेटरी और चेयरमैन से बात करती हूं. ऐसा नहीं होना चाहिए था. कोई बुजुर्ग होता तो? यह गलत है.’’

अमला को फिर लिफ्ट वाले पर गुस्सा आ गया, इला चुप रही. शैली चली गई. अमला ने चादर बिछाई, कहा, ‘‘बैठ जाओ. मुझे तो थकान होने लगी थी. मेरा तो वैसे ही बीपी हाई रहता है.’’

इला उस के साथ बैठ गई. दोनों लिफ्ट में बैठी थीं. आनेजाने वाला कोई रुक जाता, लिफ्ट वाले को कोसता, कोई फ्रैंड हंसने लगती, कोई हमदर्दी दिखाता. अमला ने फिर खुद ही बात शुरू की, ‘‘मुझे पता है कि तुम ने मुझे कभी कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है पर मुझे बचपन से अपने यहां आने वाले धर्मगुरुओं से यही शिक्षा मिली है कि दूसरे धर्म के लोगों से दूर रहना है. वे हमारे बराबर नहीं हैं. आमिर मुझे हमेशा एक समझदार, मिलनसार इंसान लगा है पर मैं तुम लोगों से दूर रहती हूं. मैं पढ़ीलिखी हूं, धर्मगुरुओं को बहुत झेल भी चुकी हूं, अपने दर्द किसी से कभी बांट नहीं पाई. धर्मगुरुओं के चक्कर में मैं ने अपनी मानसिक शांति खोई है.’’

उस की उदास, थकी सी आवाज सुन कर इला चौंकी, ‘‘क्या हुआ? तुम मुझ से अपने दुख बता सकती हो, अगर चाहो तो.’’

अमला ने बहुत ध्यान से इला को देखा. अब इला का स्नेहिल, गंभीर चेहरा देख उसे लगा जैसे इला उस की कोई सहेली है. अमला पता नहीं अंदर से कितना भरी हुई थी, कहने लगी, ‘‘तुम लोगों से मैं बहुत नफरत करती रही. मुझे तुम लोग बिलकुल पसंद नहीं थे पर साथ ही साथ वह धर्मगुरु, वह पाखंडी भी मुझे आज तक नहीं भूला जिस ने मेरे साथ अकेले में खूब छेड़छाड़ की, मेरे वीडियो भी बना लिए, मुझे ब्लैकमेल भी किया. आज तक भी मैं उस से डरती हूं. शादी के बाद भी डरी सी रहती हूं. उस पाखंडी ने मेरी पूरी पर्सनैलिटी बदल दी.’’ यह कहतेकहते अमला का स्वर भर्रा गया.

इला को उस पर बहुत तरस आया. उस ने अमला के हाथ पर हाथ रख दिया. थोड़ी देर सोचती रही, फिर कहा, ‘‘अमला, मैं सब समझ गई. तुम हम लोगों से नफरत करती हो, इस के पीछे क्या कारण हैं. यह समझना मुश्किल है भी नहीं. हमारे समाज में हर धर्म ने अपनीअपनी दीवार खड़ी कर रखी है. हम अपनी चारदीवारों में अपनी सीमित सोच के साथ जिए जा रहे हैं. दीवार के उस पार के लोगों को अपने से कमतर समझते हैं. ये दीवारें जब तक नहीं ढहेंगी, अमला का परिवार यों ही इला के परिवार से नफरत करता रहेगा.

‘‘तुम पूछ रही थी न कि मैं लिफ्ट में फंसने पर शांत कैसे खड़ी हूं, वह इसलिए कि यह परेशानी तो कोई परेशानी ही नहीं है. अभी लिफ्ट वाला आएगा, हम बाहर निकल जाएंगे. मैं ने तो इस से कई ज्यादा परेशानियां झेली हैं. एक ब्राह्मण परिवार की बेटी हो कर एक विधर्मी से प्रेम विवाह किया है. अंदाजा लगा सकती हो कि क्याक्या झेला होगा और तुम जैसे पड़ोसी मिल जाएं तो एक मैंटल टौर्चर हर त्योहार पर मिलता है. तुम्हें अंदाजा है कि जबजब तुम ने मेरे मुंह पर अपना दरवाजा बंद किया है, मुझे कैसा लगा होगा? सोच सकती हो वह अपमान, हर बार हर त्योहार पर.

‘‘यह समाज हमेशा धर्म की दीवार खड़ी करता रहा है. इन दीवारों के सहारे ही टिका है हर धर्म और तुम जैसी महिलाएं अपना नुकसान करवाने के बाद भी इसी के फेर में पड़ी हैं और हम जैसों से नफरत किए जा रही हैं. होना क्या चाहिए, पता है, निडर हो कर अपने पाखंडी गुरु को ऐसी डांट लगाओ कि वह तुम से डरता घूमे. यह क्या बात हुई कि तुम्हारे साथ नाइंसाफी हुई और तुम ही घुटघुट कर जी रही हो, दोस्त.

‘‘यह समाज, यह धर्म का चक्कर डरे हुए को और डराता है. मैं अपने प्रेम विवाह के बाद इस समाज के ताने झेलझेल व सब से निबट कर और मजबूत होती गई हूं और मुझे अपने और अपने परिवार पर गर्व होता है कि हमारी सोच को किसी धर्म की कोई दीवार बांध कर नहीं रख सकी.’’

अमला सांस रोके हुए इला को बोलते सुनती रही. इतने में कई लोगों के आने की आहटें आईं. दोनों खड़ी हो गईं. लिफ्ट का काम करने वाले 3 लोग थे, ‘‘सौरी मैडम, सौरी मैडम’’ कहते हुए उन्होंने 10 मिनट में दरवाजा खोल दिया. फिर एक स्टूल इला को पकड़ाया. उस पर पैर रख कर दोनों एकएक कर के बाहर आईं. लिफ्ट वालों ने बहुत माफी मांगी और अमला व इला अपनेअपने फ्लैट की तरफ बढ़ गईं.

इला ने अपना फ्लैट खोलते हुए कहा, ‘‘आज तो हम ने बहुत बातें कर लीं. अच्छा हुआ, लिफ्ट खराब हो गई.’’ अमला कुछ बोली नहीं, बस, मुसकरा कर अपने फ्लैट में चली गई.

शाम को आमिर और बच्चों ने पूरी बात सुनी. आमिर ने उसे गले लगा लिया, ‘‘आज तो बहुत थक गई होगी? और उस पर अमला का साथ, उफ, मेरी प्यारी पत्नी दोदो टौर्चर झेल कर आई है.’’

शाम 7 बजे इला के फ्लैट की घंटी बजी. आमिर ने दरवाजा खोला. विजय, अमला और अर्णव को देख आमिर को कुछ समझ नहीं आया. अमला के हाथ में मिठाई के डब्बे थे. इतने में इला भी अंदर से निकल आई थी. वह भी सब को देख कर चौंकी, ‘‘तुम लोग!’’

‘‘हां, भाई, हम लोग. ये तुम सब के लिए मिठाई.’’

‘‘पर किसलिए?’’

‘‘ओहो, बैठने तो दो,’’ करीने से सजे लिविंगरूम में आती हुई अमला सुंदर, स्टाइलिश सोफे पर बैठती हुई बोली. विजय और अर्णव भी हंसते हुए उस के पास बैठ गए. विजय हंसा, ‘‘आमिर, अमला को आज लिफ्ट में शायद बहुत मजा आया है. जैसे ही मैं औफिस से आया, सबकुछ बता कर बोली, ‘आज इला के घर

जाना है.’’

सब हंसने लगे, थोड़ी देर के बाद इला ने पूछा, ‘‘आप लोग कुछ लेंगे?’’

जवाब अमला ने दिया, ‘‘हां, पहले चाय, फिर आज खाना भी खा कर जाएंगे. तुम भी थकी होगी, ज्यादा कुछ नहीं, कुछ शौर्टकट में बना लेना, पुलाव भी चलेगा.’’

इला, आमिर, स्वरा और हर्षिल हैरानी से नए मेहमानों का मुंह देख रहे थे. बस, इला जानती थी कि यह हृदय परिवर्तन कैसे हुआ. जब आपस में बैठ कर मन की बात की जाएगी तभी तो बात बनेगी न. वह खुश थी कि आज उस ने एक और इंसान को अपने धर्म की दीवार के उस पार भी देखने के लिए तैयार कर लिया है. Family Story in Hindi

One Two Cha Cha Cha Movie Review : “दर्शकों को एंटरटेन करती साफसुथरी कौमेडी फिल्म”

One Two Cha Cha Cha Movie Review : हम फिल्में क्यों देखते हैं? मनोरंजन के लिए. मगर आजकल ज्यादातर फिल्में ऐसी बन रही हैं जो मनोरंजन तो क्या करेंगी, उलटे भेजा फ्राई कर देती हैं. कौमेडी फिल्में भी ऐसी बन रही हैं जिन में फूहड़ता, अश्लीलता और द्विअर्थी संवाद भरे होते हैं. बौलीवुड वालों ने इसी सब को कौमेडी का पर्याय मान लिया है. साफसुथरी कौमेडी फिल्में यदाकदा ही आती हैं जो दर्शकों को गुदगुदाती हैं, एंटरटेन करती हैं और उन के भेजे को फ्रैश करती हैं. ‘वन टू चा चा चा’ एक साफसुथरी कौमेडी फिल्म है जो दर्शकों को पूरी तरह से एंटरटेन करती है.

फिल्म की कहानी मोतिहारी शहर से शुरू होती है जहां जायसवाल परिवार में उत्सव का माहौल है. परिवार के बड़े बेटे संजू (ललित प्रभाकर) की शादी/सगाई की तैयारियां चल रही हैं. तभी परिवार के सब से बड़े कुंआरे और सनकी चाचा (आशुतोष राणा) ऐलान कर देते हैं कि उन्हें भी अब शादी करनी है. चाचा की जिद देख डाक्टर इसे बाइपोलर कहते हैं और सलाह देते हैं कि उन्हें रांची के मानसिक अस्पताल ले जाना चाहिए.
यहीं से शुरू होती है मुख्य कहानी. चाचा के 2 भतीजे और उन का एक दोस्त चाचा को बांध कर और बेहोश कर एक वैन में डाल कर रांची के लिए निकलते हैं. इस रोड ट्रिप में कई मुसीबतें और हंसी के फौआरे छूटते हैं.

इस सफर में ऐसेऐसे किरदार जुड़ते जाते हैं कि कहानी का ग्राफ पूरी तरह बदल जाता है. एक सस्पैंड किया नारको अफसर, एक डांसर जिस का नाम शोभा है, जेल से भागा शातिर अपराधी भूरा सिंह और एक जोशीला पुलिस वाला- कहानी में ऐसे ट्विस्ट आते हैं जहां गोलियां चलती है, बैंक डकैती की प्लानिंग होती है और उन सब के हाथ ड्रग्स का जखीरा भी लग जाता है. दर्शक खुद को इन किरदारों के साथ इस पागलपन में शामिल महसूस करने लगता है.

आशुतोष राणा की यह कौमेडी बनावटी नहीं, स्वाभाविक लगती है. उस ने ‘वन टू चा चा चा’ शीर्षक 1978 की बौलीवुड फिल्म ‘शालीमार’ से लिया है. इस फिल्म का शीर्षक इसी गीत पर आधारित है. उस फिल्म में धर्मेंद्र, जीनत अमान और अरुणा ईरानी कलाकार थे. इस गाने को उषा उत्थप और अनुप ने गाया था और राहुलदेव बर्मन ने संगीत दिया था. One Two Cha Cha Cha Movie Review

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