Download App

Family Story in Hindi : पछतावा – “सोमनाथ के बेटेबहू पछतावे के अलावा कुछ नहीं कर सकते थे”

Family Story in Hindi : सोमनाथ और उस की पत्नी कमला की मृत्यु के बाद उन के दोस्त शशिकांत को एक सच का खुलासा करना था. एक ऐसा सच जिसे जान कर सोमनाथ के बेटेबहू पछतावे के अलावा कुछ नहीं कर सकते थे…

मे रे बचपन का पक्का दोस्त सोमनाथ करीब 5 साल पहले मेरे खाली पड़े मकान में किराए पर रहने आया था. उसे गुजरे हुए 1 साल से ज्यादा हो गया. कल उस की पत्नी कमला की तेरहवीं की रस्म पूरी हो गई. मैं उन दोनों की अनुपस्थिति में उन के घर जाते हुए अजीब सा महसूस कर रहा हूं.

‘‘मैं एक जरूरी काम से शाम को घर आऊंगा. सब लोग मुझे घर पर मिलना,’’ सोमनाथ के बड़े बेटे राकेश को ऐसी सूचना मैं ने सुबह फोन पर दे दी.

जब मैं उन के घर पहुंचा तो राकेश की 4 वर्षीय बेटी शिखा मुझे देखते ही मुझ से लिपट गई. मैं ने उसे चाकलेट दी. मेरे गाल पर पप्पी दे कर वह बाहर खेलने भाग गई.

राकेश की पत्नी अलका मेरे लिए पानी का गिलास ले आई. राकेश का छोटा भाई रोहित अपनी पत्नी दिव्या के साथ कमरे में मौजूद था. सभी मेरे बोलने की प्रतीक्षा बेचैनी से करने लगे.

पानी पी कर मैं ने गला खंखारा और गंभीर लहजे में उन सब से पूछा, ‘‘जो बातें मैं करने आया हूं उन के बारे में कुछ अंदाजा लगा सकते हो तुम लोग?’’

मैं कुछ देर चुप रहा मगर कोई कुछ नहीं बोला. फिर एक गहरी सांस छोड़ कर मैं ने ही आगे कहा, ‘‘अतीत में कुछ बातें ऐसी घटी हैं कि जिन्हें तुम्हारे दिवंगत पिता और मेरे अलावा कोई नहीं जानता. कमला भाभी भी उन से अनजान थीं. मैं कुछ घटनाओं की याद तुम्हें दिलाता चलूं तो मेरी बात तुम सब बेहतर ढंग से समझ पाओगे.’’

वे सभी बड़ी उत्सुकता से मेरे आगे बोलने का इंजतार करने लगे. मेरे अपने दिमाग में पुरानी यादें हलचल मचाने लगी थीं.

मैं ने अलका को गंभीर लहजे में संबोधित किया, ‘‘मैं अपनी बात 5 साल पहले के उस दिन से शुरू करता हूं जिस दिन तुम ने आत्महत्या करने की कोशिश की थी. सोमनाथ ने अपनी सहायता के लिए उस दिन मुझे बुलाया था.

‘‘अपने दोस्त का घबरा कर पीला पड़ा चेहरा मुझे आज भी याद है. वह आते ही मुझ से बोला था : ‘मेरी बहू नींद की गोलियां खा कर बेहोश पड़ी है. मेरे साथ अस्पताल चलो, शशिकांत,’ सोमनाथ के चेहरे पर उस दिन हवाइयां उड़ रही थीं.

‘‘मेरी जानपहचान का दायरा बहुत बड़ा है. अपने परिचित डा. सुशील के नर्सिंग होम में अलका को अपनी कार में मैं ही ले कर गया था.

‘‘मेरे रसूख के कारण ही सोमनाथ और कमला भाभी पुलिस के झंझट से बचे थे उस दिन.’’

‘‘मांजी के साथ जो रातदिन मेरा झगड़ा रहता था उस से परेशान हो कर मैं ने वह मूर्खता की थी,’’ अलका ने बेचैनी भरे अंदाज में सफाई दी.

‘‘तुम सासबहू के झगड़े से पूरा घर परेशान था. तुम ने आत्महत्या की कोशिश की तो सोमनाथ बुरी तरह डर भी गया. वह तुम्हें अलग करने को तैयार था पर उस के लिए राकेश राजी नहीं होता था,’’ मेरे मन की उदासी धीरेधीरे बढ़ने लगी.

‘‘मैं बड़ा बेटा हो कर बूढ़े व बीमार मातापिता को कैसे छोड़ कर अलग हो जाता?’’ आवेश के कारण राकेश का चेहरा लाल हो उठा.

मैं ने आगे बोलना शुरू किया,

‘‘डा. सुशील के नर्सिंग होम में एक दिन रुक कर अलका मायके चली गई थी. उस के मातापिता और बड़ेबड़े भाइयों ने सोमनाथ और कमला भाभी से खूब झगड़ा किया था. ‘अगर हमारी बेटी को कुछ हो गया तो सब को जेल में चक्कियां पिसवा दूंगा,’ ऐसी धमकी अलका के पिता ने सरेआम दी थी सोमनाथ को.

‘‘रोहित के साथ राकेश के सालों ने मारपीट भी की थी. अपने जीजा को भी कड़वी व चुभने वाली बातें कहने से वे नहीं चूके थे. ऊपर से अलका ने राकेश की सौगंध खा कर रोते हुए कहा था, ‘मैं अपनी जान दे दूंगी पर तुम्हारी मां के साथ उस घर में नहीं रहूंगी.’

‘‘नर्सिंग होम के सामने एक बाग था. वहां की एक बैंच पर सोमनाथ और मैं जा बैठे थे. उस दिन अपने दोस्त को किसी बच्चे की तरह बिलखबिलख कर रोते देख मेरी भी आंखें भर आई थीं.

‘‘रोरो कर सोमनाथ का मन कुछ हलका हुआ तो हम दोनों समस्या का समाधान ढूंढ़ने को देर तक माथापच्ची करते रहे थे, ‘कमला और अलका दोनों का अपनीअपनी जबानों पर नियंत्रण नहीं है. दोनों कड़वी और चुभती बातें करने में बहुत माहिर हैं,’ सोमनाथ ने समस्या का एक पहलू बयान किया था.

‘‘ ‘उन के बीच टकराव का मुख्य कारण क्या है?’ मैं ने चिंतित लहजे में पूछा था.

‘‘ ‘कमला खुद को घर की मालकिन समझती है. वह अलका पर हुक्म चलाना अपना अधिकार मानती है. दूसरी तरफ अलका ने उस से दबने से साफ इनकार कर दिया है. किसी तरह की रोकटोक से उसे गुस्सा आ जाता है.’

‘‘ ‘और अब तो अलका ने भविष्य में कमला भाभी के साथ न रहने की सौगंध भी खा ली है,’ मैं बोला.

‘‘ ‘और राकेश हम दोनों से दूर रहने को तैयार नहीं है. मेरी समझ में नहीं आता कि इस समस्या का समाधान कैसे होगा?’ पूछते हुए सोमनाथ की आंखें फिर से भर आई थीं.

‘‘मैं ने गहरे सोचविचार के बाद अपने दोस्त को समस्या हल करने का रास्ता सुझा दिया था, ‘चूंकि अलका अलग रहना चाहती है, इसलिए तुम राकेश को अलग होने को मजबूर कर दो. दूसरी तरफ अलका और भाभी के घर की मालकिन होने के घमंड को तोड़ने के लिए तुम मकान को ही बेच डालो.’

‘‘मेरा यह सुझाव सुन कर सोमनाथ बुरी तरह चौंका था, ‘ऐसा करने से क्या समस्या हल हो जाएगी?’

‘‘ ‘बिलकुल.’

‘‘ ‘कैसे?’

‘‘ ‘मैं तुम्हें समझाता हूं…’ अपनी बात सोमनाथ को कहनेसमझाने में मुझे पूरे 2 घंटे लगे थे.

‘‘मेरा दोस्त मेरे कहे पर पूरी ईमानदारी से चला. अलका द्वारा आत्महत्या के प्रयास को बहाना बना कर उन्होंने राकेश पर घर छोड़ देने का जबरदस्त दबाव बनाया था. मकान बेचने का फैसला भी उन्होंने सब को सुना दिया था.

‘‘तंग आ कर राकेश अपना सामान ससुराल में ले गया. बापबेटे के बीच बातचीत बंद हो गई थी. रोहित होस्टल में चला गया. सोमनाथ कमला भाभी को ले कर गांव चला गया. कुछ दिन बाद उन्होंने अपना घर खाली कर दिया.

‘‘महीने भर के अंदर उस मकान में नए लोग आ गए. तुम्हें याद होगा, मकान के बिकने की खबर तुम दोनों तक मैं ने ही पहुंचाई थी.

‘‘मकान बिकने के बाद तुम अपने ससुराल में रहने को मजबूर हो गए थे, राकेश. कितने दिन रुके थे तुम वहां?’’  मैं ने सामने बैठे राकेश से पूछा.

‘‘करीब 2 महीने,’’ राकेश ने बेचैन लहजे में जवाब दिया.

‘‘वहां तुम बहुत मजबूरी में रहे. किराए पर मकान ले कर अच्छी तरह रहना तुम्हारी सीमित आय में संभव नहीं था. इस चक्कर में तुम्हारे संबंध अपनी ससुराल वालों से भी बिगड़ गए थे न?’’

‘‘मेरे पिताजी के घर में इतनी जगह नहीं थी जो बेटीदामाद को जिंदगी भर आराम से रख लेते,’’ अपने मायके का पक्ष ले कर अलका तुनकी.

उस की बात को अनसुना कर मैं ने आगे कहा, ‘‘अपने इस मकान में किराएदार के रूप में आ कर रहने का प्रस्ताव मैं ही तुम्हारे पास ले कर गया था, क्या यह याद है तुम्हें?’’

‘‘बिलकुल याद है. आप के कारण ही हम सब लोग फिर से एकसाथ रहने की स्थिति में आए थे,’’ राकेश ने कृतज्ञता दर्शाई.

‘‘तो फिर मेरी शर्त भी तुम्हें याद होगी?’’

‘‘आप चाहते थे कि मां और पिताजी को भी हम साथ रखें. अपने दोस्त के हित को ध्यान में रख कर आप ने किराए में पूरे 2 हजार रुपए कम कर के मुझे आर्थिक संकट में फंसने से भी बचा लिया था,’’ राकेश भावुक हो उठा.

‘‘कमला भाभी भी तब तक गांव की जिंदगी से बुरी तरह ऊब कर लौटने की इच्छुक थीं. मेरा मकान किराए पर ले कर तुम ने सब के एकसाथ रहने का रास्ता खोल दिया था.’’

‘‘हर महीने 3 हजार रुपए निकालना मेरे लिए कठिन था और आज भी है. अब मां और पिताजी दोनों नहीं रहे हैं. आप किराया बढ़ाने की बात करने आए हैं क्या?’’ राकेश चिंतित हो उठा.

मैं ने मुसकरा कर जवाब दिया, ‘‘किराए के बारे में बातें हम बाद में कर लेंगे. पहले मेरे एक सवाल का जवाब दो.’’

‘‘पूछिए.’’

‘‘तुम नहीं, अलका जवाब देगी,’’ मैं अलका की ओर मुखातिब हुआ और पूछा, ‘‘इस घर में आ कर तुम ने कभी आत्महत्या करने की कोशिश क्यों नहीं की? यहां तो तुम अपने सासससुर के साथ रहती थीं?’’

कुछ देर सोचने के बाद अलका बोली, ‘‘अंकल, यहां आ कर मांजी ने मेरे पीछे पड़ना कम कर दिया था.’’

‘‘उन में आए बदलाव का कारण बता सकती हो तुम?’’

‘‘शायद यही कि पहले मैं उन के घर में रहती थी और यहां वह अपने बेटे के घर में रह रही थीं.’’

‘‘मेरे दोस्त को तुम सासबहू दोनों को शांति के साथ एकसाथ रहते देख कर बड़ी खुशी हुई थी. मरते वक्त वह इस चिंता से मुक्त था कि कहीं परिवार टूट कर बिखर न जाए,’’ अचानक ही मेरा गला भर आया तो कमरे का माहौल गमगीन हो उठा.

मैं ने थोड़ा रुक कर आगे कहना शुरू किया, ‘‘कमला भाभी और तुम दोनों ही बदली थीं. सास बहूबेटे को घर से निकल जाने की धमकी नहीं दे पाती थी. जबकि तुम्हारे लिए सासससुर के साथ रहना जरूरी था अलका, नहीं तो किराए में मेरी तरफ से मिलने वाली 2 हजार रुपए की रियायत जाती रहती.

‘‘सोमनाथ और मैं ने मिल कर जो योजना बनाई थी उस में हमें आशातीत सफलता मिली थी.’’

वहां बैठे सभी जन मेरी तरफ जिज्ञासा भरी नजरों से देखने लगे.

‘‘अब मैं तुम्हें एक रहस्य की बात बताने जा रहा हूं,’’ मैं ने अपनी आवाज धीमी की, ‘‘तुम लोगों को सोमनाथ ने बताया था कि उस ने मकान बेच दिया था. उस के बेचने से मिले 15 लाख रुपए सट्टे के चक्कर में डूब गए. यह जानकारी भी बाद में उसी ने तुम सब को दी थी. यह दोनों बातें सच नहीं थीं.’’

‘‘तब सच क्या है?’’ रोहित ने आगे झुक कर चौंकते हुए तनाव भरे लहजे में पूछा.

‘‘सच तो यह है कि सोमनाथ ने कभी अपना मकान बेचा ही नहीं था.’’

‘‘लेकिन अंकल, तब से उस मकान में जो लोग रह रहे हैं वे क्या किराएदार हैं?’’ रोहित बोला. उस के साथसाथ सभी हैरान नजर आ रहे थे.

‘‘किराएदार हैं वे जरूर पर मेरे किराएदार हैं. उन से किराया मैं वसूल करता हूं हर महीने.’’

‘‘पर आप किराया कैसे वसूल कर सकते हैं उस मकान का जिसे पिताजी ने आप को कभी बेचा ही नहीं था.’’

‘‘मेरे मकान में तुम सब रह रहे हो, इसीलिए मैं उस मकान का किराया लेता आ रहा हूं.’’

‘‘फिर इस मकान का किराया हर महीने हम से भी क्यों लेते हैं आप?’’ राकेश बोला. उन सब की आंखों में राकेश द्वारा पूछे गए इस सवाल की झलक मैं साफ देख रहा था.

अपने बैग में से बैंक की एक पासबुक निकाल कर मैं ने राकेश को पकड़ाई और भावुक स्वर में बोला, ‘‘पिछले 5 सालों से जो भी किराया मैं ने तुम से लिया है, वह सब शिखा के नाम से बैंक में जमा हो रहा है. ऐसा करने का निर्णय तुम्हारे पिता का था मेरे बच्चो.’’

एकएक कर के उस पासबुक को सब ने पढ़ा. अचानक ही अलका फफकफफक कर रो पड़ी तो हम सब बुरी तरह चौंके.

दिव्या अपनी जेठानी को चुप कराने लगी. मैं ने देखा, राकेश और रोहित की पलकें भी नम हो उठी थीं. मेरी अपनी आंखों से आंसू की बूंदें ढुलक कर गालों पर आ गई थीं.

‘‘मैं बहुत बुरी हूं…बहुत स्वार्थी हूं…बाबूजी को कितना प्यार था हम सब से…हमारे हित में कितना कुछ कर गए वह…और मैं बददिमाग उन की ठीक से सेवा भी नहीं कर सकी…’’ रुंधे गले से गुजरे वक्त को याद करती अलका खुद को लगातार कोसे जा रही थी.

सोमनाथ व कमला भाभी के मरने पर वह औपचारिक ढंग से रोई थी लेकिन इस वक्त उस की आंखों से दुख व पश्चात्ताप के असली आंसू बह रहे थे.

कुछ देर रो लेने के बाद वह सिर झुका कर बेहद उदास सी खामोश बैठ गई.

‘‘अलका, मेरी बातें ध्यान से सुनो,’’ मैं ने उस का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया, ‘‘तुम ने कभी राकेश की कसम खाई थी कि तुम कमला भाभी के साथ अपने ससुर के घर में नहीं रहोगी. अब वह नहीं रही हैं. तुम अगले महीने उस घर में लौट सकती हो क्योंकि किराएदार इस महीने के अंत में वहां से चले जाएंगे.

‘‘कमला भाभी की जगह अब तुम अपने परिवार की बड़ी बन गई हो और राकेश ने सोमनाथ की जगह ले ली है. अब घर को जोड़ कर रखना तुम दोनों की जिम्मेदारी होगी. कोई काम ऐसा न करना जिस से तुम्हारे सासससुर की…’’ कहतेकहते मेरा गला रुंध गया.

राकेश उठ कर मेरी छाती से आ लगा और भावुक लहजे में बोला, ‘‘शशिकांत अंकल, आप के कारण हम सब को मां और पिताजी की कमी कम खलेगी. आप अपना आशीर्वाद भरा हाथ सदा हमारे सिर पर रखना.’’

रोहित को इशारे से अपने पास बुला कर मैं ने उसे भी छाती से लगाया. अलका और दिव्या ने आगे आ कर मेरे पांव छुए और आशीर्वाद पाया. तभी शिखा बाहर से भागती हुई आई और मेरी गोद में चढ़ गई.

मेरे दोस्त सोमनाथ और कमला भाभी की तसवीर सामने दीवार पर टंगी थी. मुझे लगा, अपने परिवार को यों इकट्ठा व प्यार और अपनेपन से भरा देख कर वह दोनों बड़े संतुष्ट भाव से मुसकराने लगे थे. Family Story in Hindi

Romantic Story in Hindi : निदान – ‘‘आप की आंखें बहुत सुंदर हैं और बहुत साफ भी.’’

Romantic Story in Hindi : आज पहली बार मुझे लग रहा है कि जीवन केवल आज में नहीं होता. जीवन तो कल भी होगा. आज का उत्तर हमें कल भी देना पड़ सकता है. आने वाला कल हमें हजार बार रुला सकता है, सैकड़ों बार शरम से झुका सकता है और न जाने कितनी बार यह सोचने पर मजबूर कर सकता है कि कल हम ने जो फैसला लिया था वह वह नहीं होना चाहिए था जो हुआ था.

‘‘आप क्या सोचने लगे, डाक्टर सुधाकर. भीतर चलिए न, चाय का समय समाप्त हो गया.’’

मैं सेमिनार में भाग लेने मुंबई आया हूं. आया तो था अपना कल, अपना आज संवारने, अपने पेशे में सुधार करने, कुछ समझने, कुछ जानने लेकिन अब ऐसा लगने लगा है कि जिसे पहले नहीं जानता था और शायद भविष्य में भी न जान पाऊं… उस में जाननेसमझने के लिए बहुत कुछ है.

अपने ही समाज में जड़ पकड़े कुछ विकृतियां क्यों पनप कर विशालकाय समस्या बन गईं और क्यों हम उन्हें काट कर फेंक नहीं पाते? क्यों हम में इतनी सी हिम्मत नहीं है कि सही कदम उठा सकें? कुछ अनुचित जो हमारी जीवन गति में रुकावट डालता है. उसे हम क्यों अपने जीवन से निकाल नहीं पाते? मेरा आज क्या हो सकता था उस का अंदाजा आज हो रहा है मुझे. मैं ने क्या खो दिया उस का पता आज चला मुझे जब उसे देखा.

‘‘आप की आंखें बहुत सुंदर हैं और बहुत साफ भी.’’

‘‘मैं चश्मा लगाती हूं पर आज लैंस लगाए हैं,’’ एक पल को चौंका था मैं.

‘‘आप के पापा से मेरे पापा ने बात की थी कि मैं चश्मा लगाती हूं, आप को पता है न.’’

‘‘हां, पापा ने बताया था.’’

याद आया था मुझे. मुसकरा दी थी वह. मानो चैन की सांस आई हो उसे. अच्छी लगी थी वह मुझे. महीने भर हमारी सगाई की बात चली थी. तसवीरों का आदानप्रदान हो चुका था जिस कारण वह अपनीअपनी सी भी लगने लगी थी.

‘‘डाक्टरी के पेशे में एक चीज बहुत जरूरी है और वह है हमारी अपनी अंतरात्मा के प्रति जवाबदेही…’’

ऐसी ही तो मानसिकता पसंद थी मुझे. सोच रहा था कि जीवनसाथी के रूप में मेरे ही पेशे की कोई मेधावी डाक्टर साथ हो तो मैं जीवन में तरक्की कर सकता हूं.

एक दिन मेरे पिताजी ने अखबार में शादी का विज्ञापन देखा तो झट से फोन कर दिया था. दूरी बहुत थी हमारे और उस के शहर में. हम कानपुर के थे और वह जम्मू की.

पिताजी ने फोन करने के बाद मुझे बताया था कि उन्होंने अपना फोन नंबर दे दिया है. शाम को लड़की के पापा आएंगे तो अपना पता देंगे ऐसा उत्तर उस की मां ने दिया था.

बात चल पड़ी थी. बस, आड़े थी तो जाति की सभ्यता और दहेज को ले कर हमारी खुल्लमखुल्ला बातें. महीने भर में हमारे बीच कई बार विचारों का आदानप्रदान हुआ था.

मेरे पिता ने पूरा आश्वासन दिया था कि दहेज की बात न होगी और उस के बाद ही वे हमारे शहर आने को मान गए थे. बहुत अच्छा लगा था हमें उस का परिवार. उन को देखते ही लगा था मुझे कि बस, ऐसा ही परिवार चाहिए था.

बड़े ही सौम्य सभ्य इनसान. हम से कहीं ज्यादा अच्छा जीवनस्तर होगा उन का, यह उन्हें देखते ही हम समझ गए थे आज 7 साल बाद वही सेमिनार में वही लड़की भाषण दे रही थी :

‘‘एक अच्छा होम्योपैथ सब से पहले एक अच्छा इनसान हो यह उस की सफलता के लिए बहुत जरूरी है. जो इनसान अपने पेशे के प्रति ईमानदार नहीं है वह अपने पेशे की उस ऊंचाई को कभी नहीं छू सकता जिस ऊंचाई को डाक्टर क्रिश्चियन फिड्रिक सैम्युल हैनेमन ने छुआ था. एक सफल डाक्टर को उस के बैंक बैलेंस से कभी नहीं नापा जाना चाहिए क्योंकि डाक्टरी का पेशा किसी बनिए का पेशा कभी नहीं हो सकता.’’

ऐसा लगा, उस ने मुझे ही लक्ष्य किया हो. आज सुबह से परेशान हूं मैं. तब से जब से उसे देखा है.

नजर उठा कर मैं सामने नहीं देख पा रहा हूं क्योंकि बारबार ऐसा लग रहा है कि उस की नजर मुझ पर ही टिकी है.

मैं अपने पेशे के प्रति ईमानदार नहीं रह पाया और न ही अपनी अंतरात्मा के प्रति. मैं एक अच्छा इनसान नहीं बन पाया. क्या सोचा था क्या बन गया हूं. 7-8 साल पहले मन में कैसी लगन थी. सोचा था एक सफल होम्योपैथ बन पाऊंगा.

उस के शब्द बारबार कानों में बज रहे हैं. क्या करूं मैं? इनसान को जीवन में बारबार ऐसा मौका नहीं मिलता कि वह अपनी भूल का सुधार कर पाए.

मेरी जेब में पड़ा मोबाइल बज उठा. मैं बाहर चला आया. मेरी पत्नी का फोन है. पूछ रही है जो सामान उस ने मंगाया था मैं ने उसे खरीद लिया कि नहीं. एक ऐसी औरत मेरे गले में बंध चुकी है जिसे मैं ने कभी पसंद नहीं किया और जिसे मेरा पेशा कभी समझ में नहीं आया. वास्तव में आज मैं केवल बनिया हूं, एक डाक्टर नहीं.

‘कैसे डाक्टर हो तुम? डाक्टरों की बीवियां तो सोनेचांदी के गहनों से लदी रहती हैं. मेरे पिता ने 10 लाख इसलिए नहीं खर्च किए थे कि जराजरा सी चीज के लिए भी तरसती रहूं.’ कभीकभार वह प्यार भरी झिड़की दे कर कहती.

सच है यह, उस के पिता ने 10 लाख रुपए मेरे पिता की हथेली पर रख कर एक तरह से मुझे खरीद लिया था. यह भी सच है कि मैं ने भी नानुकुर नहीं की थी, क्योंकि हमारी बिरादरी का यह चलन ही है जिसे पढ़ालिखा या अनपढ़ हर युवक जानेअनजाने कब स्वीकार कर लेता है पता नहीं चलता.

हमारे घरों की लड़कियां बचपन से लेनदेन की यह भाषा सुनती, बोलती  जवान होती हैं जिस वजह से उन के संस्कार वैसे ही ढल जाते हैं. हमारी बिरादरी में भावनाएं और दिल नहीं मिलाए जाते, जेब और औकात मिलाई जाती है.

जेब और औकात मिलातेमिलाते कब हम अपनी राह से हट कर किसी की भावनाओं को कुचल गए थे हमें पता ही नहीं चला था.

मुझे याद है, जब उस के मातापिता 7 साल पहले उसे साथ ले कर आए थे.

मेरे पिता ने पूछा था, ‘आप शादी में कितना खर्च करना चाहते हैं. यह हमारा आखिरी सवाल है, आप बताइए ताकि हम आप को बताएं कि 5 लाख रुपए कहांकहां और कैसेकैसे खर्च करने हैं.’

सबकुछ तय हो गया था पर पिताजी द्वारा पूछे गए इस अंतिम प्रश्न ने उस रिश्ते को ही अंतिम रूप दे दिया जो अभी नयानया अंकुरित हो रहा था.

‘आप ने अपनी बेटी को क्याक्या देने के बारे में सोच रखा है?’

मेरी मौसी ने भी हाथ नचा कर पूछा था. भौचक रह गए थे उस के मातापिता. एक कड़वी सी हंसी चली आई थी उन के होंठों पर. कुछ देर हमारे चेहरों को देखते रहे थे वे दोनों. हैरान थे शायद कि मेरे पिता अपने कहे शब्दों पर टिके नहीं रह पाए थे. सब्र का बांध मेरे पिता टूट जाने से रोक नहीं पाए थे’, ‘आखिर बेटी पैदा होती है तो मांबाप सोचना शुरू करते हैं. आप ने क्या सोचा है?’ पुन: पूछा था मेरी मौसी ने.

‘हम अपने लड़कों का सौदा नहीं करते और न यह बता सकते हैं कि बेटी को क्याक्या देंगे. यह तो हमारा प्यार है जिसे हम सारी उम्र बेटी पर लुटाएंगे. अपने प्यार का खुलासा हम आप के सामने कैसे करें?’

‘बहुएं भी तब आप के घरों में ही जला कर मारी जाती हैं. न आप लोग खुल कर मांगते हैं न ही आप के मन की मंशा सामने आती है. हमारी बिरादरी में तो सब बातें पहले ही खोल ली जाती हैं. बेटी के बाप की हिम्मत होगी तो माथा जोड़े नहीं तो रास्ता नापे.’ मौसी ने फिर अपना अक्खड़पन दर्शाया था.

अवाक् रह गए थे उस के मातापिता. मेरे पिता कोशिश कर रहे थे सब संभालने की. किसी तरह खिसिया कर बोले थे, ‘बहनजी ने फोन पर बताया था न… 5 लाख तक आप खर्च…’

‘अपनी इच्छा से हम 50 लाख भी खर्च कर सकते हैं. माफ कीजिएगा, आप की मांग पर एक पैसा भी नहीं.’

शीशे सा टूट गया था वह रिश्ता जिस के पूरा होने पर मैं क्याक्या करूंगा, सब सोच रखा था. मेरे क्लीनिक में उस की कुरसी कहां होगी और मेरी कहां. कुछ नहीं कर पाया था मैं. पिता के आगे जबान खोल ही न पाया था.

शायद यह हमारी कल्पना से भी परे था कि वह लोग इतनी लंबीचौड़ी प्रक्रिया के बाद इनकार भी कर सकते हैं. हमारा व्यवहार इतना अशोभनीय था कि कम से कम उस का क्षोभ मुझे सदा रहा. अपनी मुंहफट मौसी का व्यवहार भी सालता रहता है मुझे. क्या जरूरत थी उन्हें ऐसा बोलने की.

उस के पिता कुछ देर चुप रहे. फिर बोले थे, ‘आप का एक ही बेटा है. अच्छा होगा आप अपनी बिरादरी में ही कहीं कोई योग्य रिश्ता देखें. मुझे नहीं लगता हमारी बच्ची आप के साथ निभा पाएगी. देखिए साहब, हम तो शुरू से ही आप से कह रहे थे कि आप के और हमारे रिवाजों में जमीनआसमान का अंतर है तब आप ने कहा था, आप को डाक्टर बहू चाहिए. और अब हम देख रहे हैं कि आप की नजर हमारी बेटी पर कम हमारी जेब पर ज्यादा है.

‘हमारी बिरादरी में लड़के वाला मुंह फाड़ कर मांगता नहीं है, लड़की वाला अपनी यथाशक्ति सदा ज्यादा ही करने का प्रयास करता है क्योंकि अपनी बच्ची के लिए कोई  कमी नहीं करता. शरम का एक परदा हमेशा लड़के वाले और लड़की वालों में रहता है. यह भी सच है, बहुएं जल कर मर जाती हैं. उन में भी दहेज के मसले इतने ज्यादा नहीं होते जितने दिखाने का आजकल फैशन हो गया है.’

मुझे आज भी अपनी मां का चेहरा याद है जो इस तरह मना करने पर उतर गया था. हालात इतनी सीधीसादी चाल चल रहे थे कि अचानक पलट जाने की किसी को आशंका न थी.

‘मुझे कोई मजबूरी तो है नहीं जो अपनी बच्ची इतनी दूर ब्याह कर सदा के लिए सूली पर चढ़ जाऊं. अच्छे लोगों की तलाश में हम इतनी दूर आए थे, वह भी बारबार आप लोगों के बुलाने पर वरना ऐसा भी नहीं है कि हमारी अपनी बिरादरी में लड़के नहीं हैं. क्षमा कीजिएगा हमें.’

लाख हाथपैर जोड़े थे तब मेरे पिता ने. कितना आश्वासन दिया था कि हम कभी दहेज के बारे में बात नहीं करेंगे लेकिन बात निकल गई थी हाथ से.

आज मैं जब सेमिनार में चला आया हूं तो कुछ सीखा कब? पूरा समय अपना ही कल और आज बांचता रहा हूं. 3 दिन में न जाने कितनी बार मेरा उस से आमनासामना हुआ लेकिन मेरी हिम्मत ही नहीं हुई उस से बात करने की.

तीसरा दिन आखिरी दिन था. उस ने मुझे फोन किया. कहा, समय हो तो साथ बैठ कर एक प्याला चाय पी लें.

उस के सामने बैठा तो ऐसा लगा  जैसे 7-8 साल पीछे लौट गया हूं जब पहली बार मिलने पर अपने पेशे के बारे में क्याक्या बातें की थीं हम ने.

‘‘कैसे हैं आप, डाक्टर सुधाकर?’’

आत्मविश्वास उस का आज भी वैसा ही है जिस से मैं प्रभावित हुए बिना रह न पाया था.

‘‘आप मुझ से बात करना चाहते हैं न?’’

उस के इस प्रश्न पर मैं अवाक् रह गया. मुझे तो याद नहीं मैं ने कोई एक भी प्रयास ऐसा किया था. कर ही नहीं पाया था न.

‘‘एक अच्छा डाक्टर वह होता है जो सामने वाले के हावभाव देख कर ही उस की दवा क्या होगी, उस का पता लगा ले. नजर भी तेज होनी चाहिए.’’

चुप रहा मैं. क्या पूछता.

‘‘आप बिना वजह अपनेआप को कुसूरवार क्यों मान रहे हैं, डाक्टर सुधाकर?’’ उस ने कहा, ‘‘नियम यह है कि बिना जरूरत इनसान को दवा न दी जाए. एक स्वस्थ प्राणी अगर दवा खा लेगा तो उसी दवा का मरीज हो जाएगा.’’

मैं ने गौर से उस का चेहरा देखा. चश्मे से पार उस की आंखों में आज भी वही पारदर्शिता है.

‘‘पुरानी बातें भूल जाइए, हम अच्छे दोस्त बन कर बात कर सकते हैं. मैं जानती हूं कि आप एक बेहद अच्छे इनसान हैं. क्या सोच रहे हैं आप? प्रैक्टिस कैसी है आप की? आप की पत्नी भी…’’

‘‘कुछ भी…कुछ भी अच्छा नहीं है मेरा,’’ बड़ी हिम्मत की मैं ने इतनी सी बात स्वीकार करने में. इस के बाद जो झिझक खुली तो शुरू से अंत तक सब कह सुनाया उसे.

‘‘मैं हर पल घुटता रहता हूं. ऐसा लगता है चारों तरफ बस, अंधेरा ही है.’’

‘‘आप की प्रकृति ही ऐसी है. आप जिस इनसान की ओर से सब से ज्यादा लापरवाह हैं वह आप खुद हैं. आप अपने परिवार को दुखी नहीं कर सकते, सब को सम्मान देना चाहते हैं लेकिन अपने आप को सम्मान नहीं देते.

‘‘8 साल पहले भी आप के जूते जगहजगह से उधड़े थे और आज भी. अपने कपड़ों का खयाल आप को तब भी नहीं था और आज भी नहीं है. क्या आप केवल पैसे कमाने की मशीन भर हैं? पहले मांबाप के लिए एक हुंडी और अब परिवार के लिए? क्या आप के लिए कोई नहीं सोचता, अपनी इच्छा का सम्मान कीजिए, डाक्टर सुधाकर. दबी इच्छाएं ही आप का दम हर पल घुटाती रहती हैं.

‘‘इतने साल पहले आप पिता या मौसी के सामने सही निर्णय न कर पाए, उस का भी यही अर्थ निकलता है कि आप के जीवन में आप से ज्यादा दखल आप के रिश्तेदारों का है. आप अपने लिए जी नहीं पाते इसीलिए घुटते हैं. अपने घर वालों को अपने मूल्य का एहसास कराएं. यह एक शाश्वत सत्य है कि बिना रोए मां भी बच्चे को दूध नहीं पिलाती.’’

मुझ में काटो तो खून नहीं. क्या सचमुच मेरे जूते फटे हैं? क्या 8 साल पहले जब हम मिले थे तब भी मेरा व्यक्तित्व साफसुथरा नहीं था?

‘‘आप के अंदर एक अच्छा इनसान तब भी था और आज भी है. जो नहीं हो पाया उसे ले कर आप दुखी मत रहिए. भविष्य में क्या सुधार हो सकता है इस पर विचार कीजिए. पत्नी ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं है तो अब आप क्या कर सकते हैं. उसी में सुख खोजने का प्रयास कीजिए. दोनों बेटों को अच्छा इनसान बनाइए.’’

‘‘उन में भी मां के ही संस्कार हैं.’’

‘‘कोशिश तो कीजिए, आप एक अच्छे डाक्टर हैं, मर्ज का इलाज तो अंतिम सांस तक करना चाहिए न.’’

‘‘मर्ज वहां नहीं, मर्ज कहीं और है. मर्ज हमारे रिवाजों में है, बिरादरी में है.’’

‘‘मैं ने कहा न कि जो नहीं हो पाया उस का अफसोस मत कीजिए. वह सब दोबारा न हो इस के लिए अपने बच्चों से शुरुआत कीजिए जिस की कोशिश आप के पिता चाह कर भी न कर पाए थे.’’

‘‘आप को मेरे पिता भी याद हैं?’’ हैरान रह गया मैं. मुझे याद है मेरे पिता ने तो इन से बात भी कोई ज्यादा नहीं की थी.

‘‘हां, मेरी याददाश्त काफी अच्छी है. वह बेचारे भी अंत तक डाक्टर बहू की चाह और बिरादरी को जवाबदेही कैसे देंगे, इन्हीं दो पाटों में पिसते नजर आ रहे थे. ऐसा नहीं होता तो वह मेरे पापा से क्षमा नहीं मांगते. वह भी बिरादरी की जंजीरों को तोड़ नहीं पाए थे.’’

‘‘आप सब समझ गई थीं तो अपने पिता को मनाया क्यों नहीं था.’’

हंस पड़ी थी वह. उस के सफेद मोतियों से दांत चमक उठे थे.

‘‘जो इनसान अपने अधिकार की रक्षा आज तक नहीं कर पाया वह मेरे मानसम्मान का क्या मान रख पाता? शक हो गया था मुझे. आप मेरे लिए योग्य वर नहीं थे.

‘‘रुपयापैसा आज भी मेरे लिए इतना महत्त्व नहीं रखता. मैं भी आप के योग्य नहीं थी. अलगअलग शैलियों के लोग एकसाथ खुश नहीं न रह सकते थे. भावनाओं को महत्त्व देने वालों का बैंक बैलेंस इतना नहीं होता जितना शायद आप को अच्छा लगता. बेमेल नाता निभ न पाता. बस, इसीलिए…’’

8 साल पहले का वह सारा प्रकरण किसी कथा की तरह मेरे सामने था.

‘‘संजोग में शायद ऐसा ही था. मैं ने कहा न, आप दोषी तब भी नहीं थे और आज भी नहीं हैं. बस, जरा सा अपना खयाल रखिए, अपने मन की कीजिए. सब अच्छा हो जाएगा.’’

डा. विजयकर के सेमिनार में मैं कितने प्रश्न ले कर आया था, कितने ही मरीजों के बारे में पूछना चाहता था लेकिन क्या पता था कि सब से बड़ा बीमार तो मैं खुद हूं जो कभी अपने अधिकार, अपनी इच्छा का सम्मान नहीं कर पाया…तभी मौसी की आवाज काट देता, पिता की इच्छा को नकार देता तो बनती बात कभी बिगड़ती नहीं. आज अनपढ़ अक्खड़ पत्नी के साथ निभानी न पड़ती.

पता नहीं कब वह उठ कर चली गई. सहसा होश आया कि मैं ने उस के बारे में कुछ पूछा ही नहीं. कैसा परिवार है उस का? उस के पति कैसे हैं? पर गले का मंगलसूत्र, कीमती घड़ी और कानों में दमकते हीरे उसे मुझ से इक्कीस ही दर्शाते हैं. आत्मविश्वास और दमकती सूरत बताती है कि वह बहुत सुखी है, बहुत खुश है. एक अच्छे इनसान की खोज में वह अपने मातापिता के साथ इतनी दूर आई थी न, मैं ही पत्थर निकला तो वह भी क्या करती.

कितना सब हाथ से निकल गया न. उठ पड़ा मैं. मन भारी भी था और हलका भी. भारी यह सोच कर कि मैं ने क्या खो दिया और हलका यह सोच कर कि अभी भी पूरा जीवन सामने पड़ा है. अपने बेटों का जीवन संवार कर शायद अपनी पीड़ा का निदान कर पाऊं. Romantic Story in Hindi

Family Story in Hindi : मोहभंग – आंचल को शादी के बाद पति के बारे में क्या पता चला ?

Family Story in Hindi : किट्टी पार्टी की समाप्ति पर रागिनी अंसल ने सभी 11 महिलाओं को एकएक इंपोर्टेड लिपस्टिक दे कर विदा किया. वैसे तो पार्टी के आयोजन को भव्य बनाने के लिए सभी महिलाएं एक से एक बढ़चढ़ कर प्रयास करती थीं पर रागिनी अंसल का मुकाबला कोई भी महिला नहीं कर पाती थी.

5 साल पहले अंसल दंपती ने उस पौश कालोनी में यह विशाल बंगला खरीदा था. उन के आते ही कालोनी की महिलाएं उन को अपनी किट्टी पार्टी में शामिल करने पहुंच गई थीं. उस पहली मुलाकात में भी रागिनी ने बिदा करते समय सब को एकएक आयातित सेंट की बोतल दी थी और साथ में यह भी कहा था, ‘‘आप सब ने मुझे अपनी किट्टी पार्टी में शामिल कर जो एहसान किया है उस के बदले यह उपहार कुछ भी नहीं है.’’

आयातित उपहार पा कर महिलाएं खुश होती थीं, पर प्रेमा भगत कुछ ज्यादा ही खुश होती थी जो रागिनी अंसल की अनुभवी आंखों से छिपा नहीं था. वह ताड़ गई थीं कि इस औरत में विदेशी सामान के प्रति मोह कुछ ज्यादा ही है. इस तरह रागिनी अंसल ने 5 साल की किट्टी पार्टी की हर सदस्य को 6 उपहार दे डाले थे, सेंट, म्यूजिकल गुडि़या, नेल पालिश, नाइटक्रीम, लिपस्टिक तथा एक शो पीस, जिस का अजीब सा जिगजैग आकार था. इस शो पीस को सब ने बड़े गर्व से अपने ड्राइंगरूम में सजा लिया था.

उपहार देते हुए अकसर रागिनी अंसल कहतीं, ‘‘क्या करूं, इतना सबकुछ है पर भोगने वाला कोई नहीं. बस, एक भतीजा है, वह भी विवाह नहीं करता. कोई लड़की उसे पसंद ही नहीं आती. परिवार बढ़े तो कैसे बढ़े?’’

जब से रागिनी ने अपने कुंआरे भतीजे के बारे में महिलाओं को बताया है तब से प्रेमा भगत अपनी बेटी आंचल का उस के साथ विवाह करने का सपना देखने लगी. पर मन की बात नहीं कह पाती क्योंकि करोड़ों में खेलने वाली रागिनी अंसल के सामने वह अपनेआप को बौना समझती थी. यद्यपि रागिनी अंसल आंचल के रूपलावण्य पर मुग्ध थीं पर वह खुद आगे बढ़ कर लड़की वालों से बात चलाना हेय समझती थीं.

इन सब से बेखबर आंचल अपनी दुनिया में व्यस्त थी. वह अपनी मां के एकदम विपरीत थी. इंजीनियरिंग कर के वह बंगलौर की एक प्रतिष्ठित कंपनी में कार्यरत थी. उसे विदेश व विदेशी वस्तुएं तनिक भी नहीं लुभाती थीं.

सादा जीवन उच्च विचार की सोच वाली आंचल के साथ की लड़कियों ने जहां बाल कटवाए हुए थे वहीं वह अपने लंबे काले घने केशों को एक चोटी में बांधे रखती थी.

प्रेमा भगत बेटी के इस तरह से रहने पर अकसर खीज उठती, ‘‘पता नहीं यह लड़की किस पर गई है. तनिक भी कपड़े पहनने का ढंग नहीं है. इस के साथ की सब लड़कियां इंजीनियर बन कर अपने सहयोगियों के साथ प्रेम विवाह कर विदेश चली गईं पर यह अभी तक यहीं बैठी हुई है.’’

आंचल मां की बातें सुन कर हंस देती. उस पर मां की बड़बड़ का तनिक भी असर नहीं होता.

इस बार की किट्टी पार्टी से लौट कर प्रेमा भगत ने ठान ली थी कि वह आज आंचल से बात कर के ही रहेगी. जैसे ही बेटी घर आई उस ने रागिनी अंसल से मिली लिपस्टिक को दिखाते हुए पूछा, ‘‘आंचल, इस का शेड कैसा है? आयातित है, रागिनी अंसल ने दी है.’’

आंचल ने लिपस्टिक बिना हाथ में लिए दूर से देख कर कहा, ‘‘अच्छा शेड है मां, आप पर खूब फबेगा.’’

‘‘मैं अपनी नहीं तेरी बात कर रही हूं.’’

‘‘मैं तो लिपस्टिक नहीं लगाती.’’

‘‘क्यों नहीं लगाती? कब तक ऐसे चलेगा? दूसरी लड़कियों की तरह तू क्यों नहीं ओढ़तीपहनती और अपनी मार्केट वेल्यू बढ़ाती.’’

‘‘मार्केट वेल्यू? मां, मैं क्या कोई बेचने की वस्तु हूं?’’ नाराज हो गई आंचल.

मांबेटी की बातचीत को ध्यान से सुन रहे पिता स्थिति बिगड़ती देख पत्नी को झिड़कने वाले अंदाज में बोले, ‘‘पढ़ीलिखी बेटी से कैसे बात करनी है इस की तुम्हें जरा भी तमीज नहीं,’’ और फिर बेटी को दुलार कर दूसरे कमरे में ले गए. पिता ने रात के एकांत में प्रेमा से पूछा, ‘‘क्यों, आंचल के लिए कोई लड़का ढूंढ़ रखा है क्या?’’

‘‘ढूंढ़ना क्या है, समझ लीजिए कि अपनी पकड़ के अंदर है. केवल आंचल को उस के अनुसार ढालना बाकी है.’’

फिर अपने पति को रागिनी अंसल के अमेरिका प्रवासी भतीजे तथा उन के विशालकाय बंगले के बारे में बता कर बोली, ‘‘रागिनी के न कोई आगे है न कोई पीछे. सबकुछ अपनी आंचल का होगा. ऐश करेगी वह अमेरिका में जा कर.’’

भारतीय संस्कृति के परिवेश में डूबे बापबेटी को विदेश में बसने के नाम से बड़ी कोफ्त होती थी. वैसे भी वह अपनी इकलौती बेटी को इतनी दूर भेजने के पक्ष में नहीं थे. बोले, ‘‘कोई यहीं का लड़का ढूंढ़ना चाहिए ताकि आंचल हमारी आंखों से ओझल न हो.’’

2 माह बाद रागिनी अंसल के यहां तीसरा चेहरा देख कर कालोनी के लोग चौंक उठे. एक नौजवान चोटियां बांधे अंसल दंपती के साथ कार में अकसर दिखाई देता. पता लगा कि वही उन का भतीजा देव अंसल है.

प्रेमा भगत उसे देख कर कुछ निराश हुई. बेटी आंचल को दिखाया तो वह बोली, ‘‘इस अजीबोगरीब चुटियाधारी जानवर को मुझ से दूर ही रखो मां, अन्यथा मैं इसे स्वयं खदेड़ दूंगी.’’

मां ने समझाया, ‘‘बेटी, आदमी का रूप नहीं, धन देखा जाता है.’’

आंचल ने मुंह बिचकाया, ‘‘ऊंह, पैसा तो मेरे पास भी बहुत है पर आकर्षक व्यक्तित्व पसंद है.’’

मां बेटी को समझाने में लगी ही थी कि रागिनी अंसल का निमंत्रण आ गया. अपने भतीजे से परिचय कराने के लिए सभी सपरिवार अगले दिन शाम पार्टी में आमंत्रित थे.

आंचल जाने को तैयार नहीं थी, पर मां के रोनेधोने के कारण तैयार हुई. पार्टी क्या थी, एक अच्छाखासा बड़ा आयोजन था जिस में शहर के तमाम बड़ेबड़े उद्योगपति, बड़ेबड़े नेता, सरकारी अफसर सपरिवार आए थे. उन के साथ उन के परिवार की बेटियां भी आई थीं जो एक से बढ़ कर एक डिजाइन की पोशाक पहने अपने शरीर की नुमाइश लगाने में लगी हुई थीं. आंचल सब से अलग कुरसी पर बैठी हाथ में ठंडा पेय ले कर उन्हें देखने में लगी हुई थी.

अचानक देव अंसल ने आंचलके पास आ कर हाथ बढ़ाते हुए विनम्रता के साथ डांस के लिए आग्रह किया तो आंचल ने बेहद शालीनता से मना कर दिया. तभी प्रेमा भगत दनदनाती हुई आई और बोली, ‘‘यह आंचल है, मेरी बेटी. पसंद आई तुम्हें?’’

उस के इस बेतुके सवाल पर देव चौंक पड़ा और आंचल नाराज हो कर पिता के साथ घर चली आई.

अगले दिन अंसल दंपती के घर लड़कियों के मातापिता की ओर से देव के लिए विवाह प्रस्तावों की झड़ी लग गई. रागिनी अंसल के जोर दे कर पूछने पर देव बोला, ‘‘मुझे आंचल पसंद है.’’

चौंक गईं रागिनी. क्योंकि भगत दंपती की ओर से कोई प्रस्ताव नहीं आया था. एक सप्ताह के बाद रागिनी अंसल को भतीजे के लिए झुकना पड़ा. उन्होंने प्रेमा भगत को फोन लगाया और बोलीं, ‘‘आप ने मेरे भतीजे को देख कर अभी तक अपनी कोई राय नहीं दी.’’

‘‘क्यों नहीं, क्यों नहीं रागिनीजी, मैं ने आप के भतीजे को देखा और पसंद भी किया पर आप को क्या बताऊं…’’ कहतेकहते प्रेमा रुक गई.

‘‘नहीं, आप को बात तो बतानी ही पड़ेगी,’’ श्रीमती अंसल की रौबीली आवाज सुन कर प्रेमा भगत का मुख अपनेआप खुल गया और वह बोल पड़ी, ‘‘आंचल को देव की चुटिया पसंद नहीं है.’’

आंचल की नापसंदगी सुन कर रागिनी को धक्का सा लगा और उन्होंने आहत हो कर फोन रख दिया.

यह पता चलते ही देव अंसल ने आम भारतीय युवाओं की तरह तुरंत बाल कटवा लिए और पहुंच गया आंचल के आफिस. देव को इस नए रूप में सामने खड़ा देख कर आंचल चौंक उठी.

देव बड़ी विनम्रता के साथ आंचल से बोला, ‘‘मिस, क्या आज शाम आफिस के बाद आप मेरे साथ एक कप चाय पीना पसंद करेंगी?’’

उस के निमंत्रण में एक अनोखी आतुरता का भाव देख कर आंचल मना नहीं कर सकी.

इस पहली मुलाकात के बाद तो दोनों की शामें एकसाथ गुजरने लगीं.

दोनों के ही घर वाले देव व आंचल की मुलाकातों से अनजान थे पर बाहर वालों की नजरों से कब तक बचे रहते, खासकर तब जब मामला अंसल परिवार से जुड़ा हो. दोनों के घर वालों को जब उन के आपस में मिलने की जानकारी हुई तो भगत परिवार बेहद खुश हुआ पर रागिनी अंसल के पैरों तले धरती खिसक गई.

इस बीच देव ने आंचल के सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया. आंचल ने भी हां कर दी. बेटी के हां करने की बात सुन कर प्रेमा भगत ने उसे खुशी से चूमते हुए कहा, ‘‘आखिर बेटी किस की है.’’

एक भव्य समारोह में देव व आंचल का विवाह हो गया. चूंकि अंसल परिवार के साथ रिश्ता हुआ था और आंचल के मांबाप ने यह पता लगाने की कोशिश नहीं की कि देव अमेरिका के किस शहर में रहता है तथा वहां काम क्या कर रहा है. फिर भी आंचल के बौस केशवन ने उस का त्यागपत्र अस्वीकार करते हुए उसे समझाया, ‘‘आंचल, मैं तुम्हारे पिता समान हूं. बहुत अनुभवी हूं. अनजान देश में अनजान पुरुष के साथ जा रही हो. बेशक देव तुम्हारा पति है पर तुम उस के बारे में अधिक तो नहीं जानतीं इसलिए नौकरी मत छोड़ो. वहां न्यूयार्क में भी हमारी कंपनी की एक शाखा है, मैं तुम्हारी पोस्टिंग वहीं कर दे रहा हूं. अवश्य ज्वाइन कर लेना.’’

देव को बिना बताए आंचल ने वहां का नियुक्तिपत्र संभाल कर रख लिया था.

एअरपोर्ट पर विदा करने आए लोगों की भीड़ देख कर आंचल को अपने भाग्य पर रश्क होने लगा. लगभग 16 घंटे का हवाई सफर था पर देव अपने ही खयालों में खोया था. बड़ा विचित्र लगा आंचल को.

पहली बार आंचल को ध्यान आया कि देव ने अपने बिजनेस के बारे में उसे कुछ भी नहीं बताया था. पूछने पर बोला, ‘‘दूर जा रही हो तो खुद ही सब देख लेना. न्यूयार्क शहर की सीमा से लगा मेरा कारखाना है, कारों के कलपुर्जे बनते हैं.’’

आश्वस्त हुई आंचल जान कर.

न्यूयार्क पहुंच कर अगले ही दिन सुबह देव कारखाने चला गया तो उस विशालकाय बंगले में आंचल अकेली ही रह गई. देव जब तीसरे दिन भी नहीं लौटा तो चौथे दिन बोर हो कर आंचल ने नौकरी ज्वाइन करने का मन बनाया.

कंपनी की न्यूयार्क शाखा के बौस रेमंड ने उस का बेहद गर्मजोशी से स्वागत किया. पूरे स्टाफ से परिचय करवाया. पति के रूप में देव अंसल का नाम सुनते ही वहां अचानक चुप्पी छा गई. आंचल ने चौंक कर रेमंड की ओर देखा तो उन्होंने इशारे से आंचल को अपने केबिन में बुलाया और पूछा, ‘‘क्या वास्तव में तुम्हारे पति देव अंसल ही हैं?’’

रेमंड के प्रश्न और स्टाफ के लोगों की चुप्पी को देख कर उसे किसी अनहोनी का पूर्वाभास हो रहा था.

कुछ रुक कर रेमंड ने फिर पूछा, ‘‘मैडम, देव अंसल से आप का विधिवत विवाह हुआ है? या आप दोनों की ‘लिव इन’ व्यवस्था है?’’

‘‘यह ‘लिव इन’ व्यवस्था क्या होती है, मैं समझी नहीं, सर. स्पष्ट बताइए,’’ आंचल कांपते हुए बोली.

‘‘जब बिना विवाह के लड़का और लड़की पतिपत्नी की तरह साथ रहने लगते हैं तो उसे ‘लिव इन’ व्यवस्था कहते हैं,’’  रेमंड बोले, ‘‘विश्वास नहीं होता कि देव अंसल जैसे व्यक्ति ने विवाह कैसे कर लिया. वह तो ‘लिव इन’ व्यवस्था का पक्षधर है. तकरीबन 2 साल पहले अरुणा नाम की एक लड़की देव के साथ ‘लिव इन’ थी. गर्भवती हो गई तो देव पर विवाह के लिए जोर डालने लगी तब देव ने उसे अपने घर से निकाल बाहर किया. सुनते हैं उस ने…’’

‘‘आत्महत्या कर ली,’’ आंचल ने उन का वाक्य पूरा किया.

चौंक कर रेमंड ने आंचल की ओर देखा और बोले, ‘‘नहीं, उस ने आत्महत्या नहीं की थी, उस की हत्या हुई थी. पुलिस को देव पर शक था. वह इस मामले में जेल भी गया था पर सुबूत के अभाव में छूट गया.’’

आंचल याद करने लगी अरुणा को, जो उस के साथ कालिज में पढ़ती थी और अचानक पता चला कि उस को किसी एन.आर.आई. से प्रेम हो गया था और वह हमेशा के लिए अमेरिका चली गई थी.

रेमंड ने बताया कि देव ने अपने कारखाने में ही एक छोटा सा बंगला बनवा रखा है. वहां आजकल मिली नाम की एक अमेरिकन लड़की ‘लिव इन’ व्यवस्था में देव के साथ रह रही है,’’ फिर कुछ रुक कर बोले, ‘‘यहां आने वाले कुछ भारतीय पुरुष दोहरा मानदंड अपनाते हैं, अकेले में यहां कुछ और भारत में मातापिता तथा रिश्तेदारों के सामने कुछ अलग मुखौटा ओढ़े रहते हैं.’’

आंचल सोच रही थी कि देव का असली चेहरा सब के सामने लाना होगा ताकि वह आगे किसी लड़की की भावनाओं से खिलवाड़ न कर सके.

अपने दफ्तर के एक अमेरिकन सहयोगी के साथ वह अंसल के कारखाने की ओर चल पड़ी.

ठिकाने पर पहुंच कर आंचल ने देखा कि कारखाने के पश्चिमी छोर पर स्थित बंगला दूर से ही लुभा रहा था. वह कारखाने के सामने वाले दरवाजे से न जा कर बंगले की दूसरी तरफ वाले दरवाजे से अंदर घुसी. कुत्तों के भौंकने की आवाज सुन कर अंदर से एक बेहद खूबसूरत युवती बाहर निकली. बड़े ही सहज भाव से आंचल ने आगे बढ़ कर उस का अभिवादन किया और बोली, ‘‘मैं आंचल हूं. देव से मिलने के लिए भारत से यहां आई हूं.’’

उस लड़की ने अंगरेजी में कहा, ‘‘देव बाहर गया है. एक घंटे के बाद लौटेगा. आप यहां बैठ कर इंतजार कर सकती हैं.’’

आंचल यही तो चाहती थी. उसे अंदर ले जाते हुए मिली ने अपना परिचय दिया, ‘‘मैं देव की पत्नी मिली हूं.’’

तपाक से आंचल बोली, ‘‘मैं भी देव की कानूनन ब्याहता पत्नी हूं. उस ने 15 दिन पहले भारत में मुझ से विवाह किया था.’’

एक घंटे बाद जब देव लौटा तो मिली और आंचल को एकसाथ एक सोफे पर बैठा देख कर बौखला गया. वह घबरा कर उलटे पांव वापस लौटने ही वाला था कि दोनों ने उसे लपक कर पकड़ लिया और अंदर ले जा कर एक कमरे में बंद कर दिया.

इस के बाद आंचल और मिली ने फोन कर पुलिस को बुलाया और देव को धोखा दे कर विवाह करने के अपराध में पुलिस के हवाले कर दिया. यही नहीं दोनों ने मिल कर अरुणा की संदेहास्पद मौत की फाइल को दोबारा खुलवा दिया.

बेटी आंचल को सहीसलामत वापस पा कर प्रेमा भगत एक अलग ही सुकून महसूस कर रही थी. रागिनी अंसल ने किट्टी ग्रुप से हमेशा के लिए अपना नाता तोड़ लिया तथा उन की भव्य पार्टी में अपनीअपनी बेटियों को सजा कर लाए मातापिता एकदूसरे से यही कह रहे थे, अच्छा हुआ जो हम बालबाल बच गए. Family Story in Hindi

Bangladesh Elections 2026 : सरित प्रवाह – बंगलादेश में चुनाव

Bangladesh Elections 2026 : 12 फरवरी को बंगलादेश में चुनाव अगर हुए, तो जो भी पार्टी जीतेगी वह भारत की विरोधी ही होगी. वर्ष 1971 में इंदिरा गांधी ने शेख मुजीबुर्रहमान को शरण देने के बाद सेना को सहायता दे कर बंगलादेश को जिस पश्चिमी पाकिस्तानी आतंक से बचाया था, बाद के बंगलादेश और भारत के नेताओं ने उसे ब्रह्मपुत्र में बहा दिया. बंगलादेश काफी सालों तक अस्थिर बना रहा और उस के गरीब लोग बर्मा (म्यांमार) और भारत में नौकरी पाने की जुगत में घुसते रहे.

अवामी लीग की शेख हसीना ने 2008 से 2024 के बीच भारत से संबंध सुधारे, तो बंगलादेश दक्षिण एशिया का सब से ज्यादा प्रगतिशील देश बन गया और उस की प्रतिव्यक्ति आय पाकिस्तान से लगभग दोगुनी व भारत से भी ज्यादा हो गई. शेख हसीना ने कोई लोकतांत्रिक शासन लागू किया हो, ऐसा नहीं है. वे भी डिक्टेटर थीं. नतीजतन, बंगलादेश में अगस्त 2024 में जनविद्रोह फैल गया. जेन जी ने शेख हसीना के घर तक हमला कर दिया. यह उस डिक्टेटरशिप का नतीजा था जो शेख हसीना ने बंगलादेश पर थोपी थी.

वर्ष 1977 में जनरल जियाउर रहमान ने शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या के बाद सत्ता संभाली और 1981 तक राज किया. वे व उन की पार्टी भारत और हिंदू विरेधी थे. उन दिनों भारत में भारतीय जनता पार्टी ने राममंदिर का मसला उठा दिया था और भारत के अल्पसंख्यक मुसलमान भयभीत रहने लगे थे कि हिंदूवादी पार्टी सत्ता में न आ जाए. वर्ष 1990 में भारत में मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू किए जाने के बीच उभरे दंगों ने भारतीय जनता पार्टी की बढ़ती पहुंच साबित कर दी थी, उधर बंगलादेश में जियाउर रहमान की हत्या के बाद उन की पत्नी खालिदा जिया को बंगलादेश में जगह मिल गई.

वर्ष 2004 में भारत में यूपीए सरकार का बनना और बंगलादेश में शेख हसीना की सरकार बनना दोनों देशों में धार्मिक उदारीकरण का संकेत था. 2014 के बाद बंगलादेश में अंदरूनी चूंचूं शुरू हो गई क्योंकि भारत में हिंदूवादी संगठनों ने एकएक कर के मुसलमानों की जगह घेरनी शुरू कर दी थी. इसी की छिपी प्रतिक्रिया बंगलादेश में हुई जहां शेख हसीना के खिलाफ माहौल गरमाने लगा और वे सत्ता में बने रहने के लिए हर डिक्टेटर की तरह फोर्स का इस्तेमाल करने लगीं.

अगस्त 2024 में बंगलादेश में आई जेन जी की क्रांति पर भारत की घटनाओं की छाया नहीं थी, यह नहीं माना जा सकता. जैसेजैसे भारत में हर कदम पर मुसलमानों के खिलाफ खोजखोज कर, बहाने बनाबना कर ऐक्शन लिए जा रहे थे, वैसे ही बंगलादेश में शेख हसीना के भारत प्रेम पर फुसफुसाहट बढ़ रही थी. अगस्त 2024 के बाद छात्रों ने रिवोल्ट कर शेख हसीना को भगा दिया और अब नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस की सरकार कट्टरपंथी जमाते इसलामी और बंगलादेश नैशनलिस्ट पार्टी की कठपुतली बनती जा रही है.

भारत में राममंदिर आंदोलन ने पाकिस्तान, श्रीलंका, माले और बंगलादेश के लोगों की सोच पर क्या असर डाला होगा, यह किसी प्यू रिसर्च से नहीं पता चल सकता. धार्मिक गुस्सा वर्षों तक रहता है जो लोगों को सालता रहता है. इस का कोई तार्किक कारण होना जरूरी नहीं है क्योंकि धर्म खुद अतार्किक व काल्पनिक कहानियों पर आधारित होता है.

बंगलादेश का चुनाव, जिस में शेख हसीना की अवामी लीग पर प्रतिबंध है, बीएनपी या जमाते इसलामी में से किसी को भी चुनें, वह भारतविरोधी और पाकिस्तानप्रेमी होगी. वर्ष 1971 में बंगलादेश गरीबों का देश था, आज वह आर्थिक रूप से सक्षम है. वह भारत के मंदिरमंदिर करने वालों के लिए चुनौती है.

न्यायिक व्यवस्था की दुर्गति

यह हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था की दुर्गति की निशानी है कि हमारे यहां ज्यादातर समाचार किसी के अपराध करने के आरोप पर, कोई एफआईआर करने के, या जमानत मिलने के होते हैं, वास्तव में केस में क्या हुआ और किस तरह झठे मामलों में अभियुक्त बरी हुए या नहीं. अदालतें, विशेषतया निचली अदालतें अपने पास जमानत देने का हक इस तरह रखती हैं मानो उन के पास, हरेक के पास, एटम बम इस्तेमाल करने का हक है, जिस से वे किसी का भी कैरियर, उस का परिवार नष्ट कर सकें और उस में उन्हें पाश्विक आनंद आता हो.

आमतौर पर समाचारपत्रों की खबरें पढ़ने पर लगता है कि जमानत मिलने पर जश्न मनाया जाता है उतना, जितना कि बरी होने पर नहीं. हौलीवुड में ऐसी बहुत सी फिल्में बनती रहती हैं जिन में एक खब्ती को दिखाया जाता है जिस ने पूरी दुनिया या अमेरिकी राष्ट्रपति या किसी स्कूल को निशाने पर ले लिया है. वह सिर्फ मौज के लिए धमका रहा है या नष्ट करने को उतारू है. तब फिल्म का हीरो उस को ऐन मौके पर दबोच लेता है और हजारों को मरने से बचा लेता है. हमारे न्यायिक अधिकारी ऐसे तो नहीं लेकिन जमानत देने के अधिकार का उपयोग न्याय व्यवस्था का कुछ रोब जताने के लिए किया जाता है.

यह एकदम गलत है. सुप्रीम कोर्ट कितने ही मामलों में कह चुका है कि न्यायिक सिद्धांत है ‘बेल, नौट जेल’ यानी ‘जमानत, जेल नहीं.’ पर यह आदेश वे तब देते हैं जब अभियुक्त कई अदलातों से गुजरता हुआ सुप्रीम कोर्ट पहुंचता है. ऐसे मामलों में भी सुप्रीम कोर्ट ट्रायल कोर्ट वरिष्ठ कोर्ट, उच्च न्यायालय वगैरह को फटकार नहीं लगाता कि जेल भेजा ही क्यों गया, बेल क्यों नहीं दी गई. जबकि अभी तक ट्रायल शुरू नहीं हुआ और गुनाह साबित करने में तो सालों लगते हैं.

मजेदार बात यह है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक कहे जाने वाले देश अमेरिका का हाल इस से भी बुरा है. वहां कई बार सिर्फ 50 डौलर की फाइन न देने पर जेल भेज दिया जाता है जहां सरकार 50 डौलर से ज्यादा करदाताओं का पैसा खर्च करती है और मामूली अपराध करने के आरोपी का जीवन नष्ट किया जाता है.

यह उदासीनता तब है जब देश में काले कोट पहने वकीलों की भरमार है. मंचों पर न्याय व्यवस्था और संवैधानिक अधिकारों की दुहाई दी जाती है. जबकि, सैकड़ों लोगों को जेलों में सड़ाया गया, फिर सालदोसाल बाद जमानत दी गई और आखिर में बरी कर दिया गया.

यह मामला करप्शन का नहीं है. यह मामला सिर्फ जजों की मानसिकता का है कि वे न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखने के लिए जेल का डर जनता में रखना चाहते हैं. आमतौर पर यह सोच होती है कि यदि सब को जमानत पर छोड़ा जाने लगा तो न्याय व्यवस्था का डर खत्म हो जाएगा. किसी भी घटना का जिस पर आरोप लगे उसे दोचार दिन या महीनेभर तो जेल में गुजारने दो ताकि न्याय के प्रति आदर और भय दोनों बने रहें.

न्याय के प्रति आदर तब ही होता है जब लगे कि पुलिस, अदालत, जेल समाज के साथी हैं, दुश्मन नहीं. वे आदर के पात्र हैं, भय के नहीं. वे पौराणिक धर्मगुरुओं की तरह नहीं हैं जो हर समय श्राप देने का हथियार बगल में रखते थे. वे जनता की समस्याओं को समझते हैं. वे जानते हैं कि लंबी न्याय प्रक्रिया अपनेआप में भयावह और सजा देने के लिए काफी है जब एक आरोप पर

30-40 बार अदालत में पेश होना वैसे भी जरूरी है जमानत हो या न हो.

अफसोस यह है कि भारत हो या अमेरिका या शायद दूसरे कई देशों की न्यायिक प्रणाली जहां मामला दर्ज होते ही आरोपी पर शक इतना हो जाता है कि न्यायिक अधिकारी उसे जेल भेजना ही सामाजिक प्राथमिकता मानता है. यह एकदम गलत है. यह तो डिक्टेटरशिप में भी गैरजरूरी है. लोकतंत्र में तो यह संवैधानिक व्यवस्था के ही खिलाफ है.

भारतीय पासपोर्ट

पिछले साल के मुकाबले भारतीय पासपोर्ट की पौवर यानी कितने देश बिना वीजा के भारतीय पासपोर्टधारकों को अपने देश में घुसने देते हैं, 5 स्तर कम हो कर अब 85वें स्तर पर है. दुनिया के 196 देशों में से केवल 57 देश भारतीय नागरिकों को सुरक्षित समझते हैं जहां वीजा की जरूरत नहीं है.

‘दुनिया की तीसरी सब से बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रही है’ का ढोल इस तरह के आंकड़ों से लगातार फटता रहता है और हमारी सरकार बारबार सूईधागे से इसे सीती रहती है. जो देश बिना वीजा के भारतीय नागरिकों को आने देते हैं उन्हें भरोसा होता है कि भारतीय अपने देश से ऊब कर या बेरोजगारी से तंग आ कर उस के देश में बिनबुलाया मेहमान नहीं बनेगा. 2006 में जब भारत में अंधभक्तों के अनुसार ‘गुलामी’ चल रही थी, हमारे पासपोर्ट की रैंक 71 थी क्योंकि तब दुनिया के देशों को भरोसा होने लगा था कि भारतीय नागरिक उन के यहां बस कर बोझ नहीं बनेंगे.

अब रामजी की सरकार बनने के बावजूद एकएक कर के कई देशों से भारतीयों को निकालने की कवायद चल रही है. अमेरिका तो जंजीरों में बांध कर भारतीयों को लौटा रहा है. आज कम देश ही भारतीयों को अपने यहां बसने देना चाहते हैं. यह एक अपमानजनक स्थिति है खासतौर पर जब देश के नेता रोजाना चालीस बार देश की महानता का गुणगान गाते हों.

यह कोरी विडंबना है कि एक तरफ हम अपनी सभ्यता, संस्कति, महान धर्म की बात करते हैं, खुद को सब से पुरानी सभ्यता होने का दावा करते हैं जबकि दूसरी ओर हमारे यहां बसे लोग ही यहां से भागने की जुगत में रहते है और गैरकानूनी ढंग से छोटेबड़े कितने ही देशों में बसने के लिए चले जाते हैं.

अमेरिकी नागरिक 196 देशों में से 180 देशों में बिना वीजा के जा सकते हैं. चीनी 82 देशों में. सिंगापुर, साउथ कोरिया और जापान के नागरिक 193, 190 व 189 देशों में जा सकते हैं. हमारी असली उन्नति तब होगी जब दुनिया के दूसरे लोग हमारे यहां आ कर बसने को उत्सुक हों. लोकतंत्र होने के बावजूद बाहर के लोग यहां आ कर बसना नहीं चाहते और 1947 में स्वतंत्रता मिलने के बाद लगभग सारे ब्रिटिश सैनिक, अफसर ही नहीं, धीरेधीरे गोरे व्यापारी अपना व्यापार बंद कर के चले गए.

गोवा के 1962 में आजाद होने के बाद सैकड़ों भारतीय मूल के गोवाई पुर्तगाल चले गए थे क्योंकि पुर्तगाल ने कुछ समय तक दरवाजे खोल रखे थे.

पासपोर्ट की शक्ति असल में यह दर्शाती है कि जारी करने वाले देश की दुनिया की नजरों में क्या हैसियत है. हमारे 85वें रैंक के मुकाबले पाकिस्तान का रैंक 103वां, बंगलादेश का 100वां और अफगानिस्तान का 110वां है. 24 देश अफगानों को भी बिना वीजा के आने देते हैं जबकि 57 देश भारतीयों को.

देश को ढोल बजाने में समय गंवाने की जगह अपना जीवनस्तर सुधारने में लगाना चाहिए. यह पक्का है कि 100 की जगह चाहे 1,000 मंदिर बना लो, दुनिया के देशों में हम वहीं के वहीं रहेंगे. Bangladesh Elections 2026

Satirical Story in Hindi : पंडित की गाय – पंडित की रातों की नींद किस ने उड़ा दी थी ?

Satirical Story in Hindi : गाय के नाम पर लिया पैसा पंडित के लिए धर्मसंकट बन गया था. गांव भर में उन के नाम की पगड़ी उछाली जा रही थी. समझ नहीं पा रहे थे कि अपनी हो रही थूथू से वे कैसे बचें?

डिताइन चिल्लाचिल्ला कर परेशान, ‘‘अरे, पूजापाठ ही करते रहोगे कि गाय को भी ढूंढ़ने जाओगे. रात से वह गाय गायब है और अब सूरज चढ़ आया है.’’

‘‘चुप भी रहो, पंडिताइन. हम वे लोग हैं जो पूजापाठ के चक्कर में पानीपत का तीसरा युद्ध हार गए थे लेकिन बिना नहाएधोए, बिना पूजापाठ किए युद्ध के मैदान में न उतरे थे. तुम्हें एक गाय की पड़ी है, पूजापाठ के लिए हम ने देश को संकट में डाल दिया था. यकीन न हो तो इतिहास की किताब उठा कर देख लो.’’

‘‘हायहाय, पंडितजी कैसी बात करते हो? मेरी भोली गाय की तुलना वह भी भयंकर युद्ध से. गाय की तुलना करनी थी तो किसी भोलीभाली स्त्री से करते, किसी शर्मीले भले आदमी से करते. मारी नहीं जाती तुम से एक मक्खी और बात करते हो युद्ध की.’’

पंडित जानते थे कि पंडिताइन ने यदि एक बार बोलना शुरू कर दिया तो हरिकथा की तरह बोलती चली जाएगी, रुकने का नाम ही नहीं लेगी.

इसलिए पंडित अपना पूजापाठ समाप्त कर के गाय की तलाश में निकल पड़े. चलतेचलते वे सोचने लगे कि काश, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार होती और वे रामपुर के आजम खां की तरह मंत्री होते तो पूरे पुलिस अमले को गाय ढूंढ़ने में लगा देते. जब मंत्री की भैंस ढूंढ़ने में पुलिस का अमला लग सकता है तो गाय ढूंढ़ने में क्यों नहीं? गाय तो भैंस के मुकाबले कितनी पवित्र और पूजनीय है लेकिन न उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार है और न वे आजम खां की तरह मंत्री. उन का समय इतना बुलंद कहां?

गाय ढूंढ़तेढूंढ़ते पंडित गांव से बाहर आए तो पता चला रात में कसाइयों ने खुले मैदान में एक गाय काट डाली है जिस के कुछ अवशेष अभी भी इधरउधर पड़े हैं. पंडित शंकाग्रस्त हो कर उस मैदान की ओर झटपट दौड़े. उन की शंका सही निकली. रात में काटी गई गाय उन की ही थी. अब पंडितजी क्या करें?

पंडित किसी चुनाव हारे हुए प्रत्याशी की तरह चुपचाप चारपाई पर आ कर बैठ गए.

उन्हें चुनाव में हारे, लुटेपिटे प्रत्याशी की तरह मुंह लटकाए देख पंडिताइन के मुंह से तोप के गोले की तरह प्रश्न निकला, ‘‘क्या हुआ, नहीं मिली गाय?’’

यह सुन कर पंडित घबरा गए. वे क्या जवाब दें? पहले तो सोचा पंडिताइन को खुदबखुद पता चलने दो लेकिन पंडिताइन बिना जाने चुप न रहने वाली थी. पंडित ने सच उगल दिया. इधर पंडित ने सच उगला उधर पंडिताइन ने हायतोबा मचानी शुरू कर दी.

अड़ोसीपड़ोसी इकट्ठे हुए तो उन्होंने पंडित से थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने को कहा लेकिन पंडित इस पर गूंगी औरत की तरह चुप. जब गांव वालों ने उन पर रिपोर्ट दर्ज कराने का दबाव डाला तो पंडित ने बड़ी मासूमियत से कहा, ‘‘भाइयो, जिन कसाइयों ने गाय को मारा है उन के और मेरे खेत अगलबगल ही हैं. जब वे गाय को काट सकते हैं तो मुझेभी.’’

यह कहतेकहते पंडित का गला भर्रा गया. वे आगे न बोल सके लेकिन गांव वालों ने उन की कायरता के आगे झकने से मना कर दिया. गाय का कटना गांव में बहुत बड़ा अपशकुन था और गांव वाले गौहत्या पर आसानी से चुप बैठने वाले न थे. गांव वालों ने पंचायत बुला ली. दोनों पक्ष हाजिर हो गए.

पंचायत में तय हुआ कि गौहत्या करने वाले कसाई गाय का तीनगुना जुर्माना दें वरना मामले को थाने ले जाया जाएगा. कसाई थाने में मारपिटाई और कोर्टकचहरी के मामले को अच्छे से समझते थे, इसलिए वे तीनगुना जुर्माना भरने के लिए तैयार हो गए.

2 घंटे में कसाइयों ने पंचों को गवाह बना कर डेढ़ लाख रुपए पंडित के हाथों में थमा दिए. पंडित उस समय तो इस फैसले से खुश हो गए लेकिन बाद में उन्हें लगा कि गांव वाले उन के बारे में तरहतरह की बातें बना रहे हैं.

अगले दिन पंडित ने रात के अंधेरे में एक चौपाल पर बैठे कुछ लोगों की बातों को कान लगा कर सुना.

‘‘ससुर, बड़ा पंडत बना फिरता है. पंडत नहीं चांडाल है. गाय पर ही पैसा खा गया,’’ गांव का शौकीन जाट कह रहा था.

‘‘चौधरी, सही कह रहे हो. औरों को तो बड़ा सनातन का ज्ञान पेलता है. खुद गौमाता पर पैसा खा गया. न जाने कैसा पंडत है?’’ थप्पन दलित ने कहा.

‘‘हांहां, हमें तो बताता है कि गाय में करोड़ों देवताओं का वास होता है. गाय पूजनीय होती है. जब पैसा जेब में आ गया तो धर्मकर्म सब ताक पर उठा कर रख दिया,’’ सोमू धोबी ने व्यंग्यबाण छोड़ा.

‘‘भैया, कुछ भी कहो, हम पूजापाठी तो ज्यादा नहीं लेकिन गाय पर पैसा न खाते. इतना धर्मकर्म तो बचा ही है. कानून के अनुसार थाने जाते और ससुर इन कसाइयों को हथकड़ी जरूर पहनवा देते. पैसा रखा हमारी जूती पर, पहले सम्मान है. हमारी पगड़ी है,’’ शौकीन ने मूछों पर ताव देते हुए कहा.

पंडित ये बातें सुन कर सकपका गए. उन को लगा उन से भारी भूल हो गई. उन्हें कसाइयों से पैसा नहीं पकड़ना चाहिए था. उन की तो गांव में बड़ी थूथू हो रही है. अब वे क्या करें?

पंडित उलटे पांव वापस लौटे. सारी बात उन्होंने पंडिताइन से बताई. पंडिताइन और भी ज्यादा धर्मभीरु थी. उस ने कहा, ‘‘मुझेतो लगता है जी, गांव वालों की बात बिलकुल सही है. हमें गाय पर पैसे नहीं पकड़ने चाहिए थे. यह तो अधर्म हो गया, पाप हो गया.’’

पंडित और पंडिताइन को पाप का पैसा घर में रखने पर रातभर नींद नहीं आई. वह पैसा उन के लिए जी का जंजाल बन गया. अंत में उन्होंने और बड़े पंडित से सलाह की. बड़े पंडित ने कहा, ‘‘इस पाप के पैसे से छुटकारा पाने का एक सुंदर उपाय है.’’

‘‘वह क्या?’’

‘‘इस पैसे को किसी गौशाला में दान कर आओ. इस से यह पैसा गौसेवा में लग जाएगा और तुम्हारा पुण्य हो जाएगा.’’

‘‘हां, यह ठीक रहेगा.’’

पंडित और पंडिताइन को लगा कि अब उन्हें पाप के पैसे से मुक्ति मिल जाएगी.

पंडित गांव के 2-3 लोगों को गवाह बना कर अपने साथ गौशाला ले गए और गौशाला के प्रबंधक गोपाल को डेढ़ लाख रुपए भेंट कर दिए. गोपाल इस से बहुत खुश हुआ. वह पंडित की दानशीलता के गुणगान करने लगा. पंडित चौड़ी मुसकान लिए वापस आए. आज पंडितजी और पंडिताइन चैन की नींद सोए.

लेकिन 2 दिनों बाद ही गोपाल पंडित के दरवाजे पर खड़ा चिल्ला रहा था, ‘‘अरे, आप कैसे कलियुगी पंडित हो? गाय पर पैसा खाते हो. खुद तो पापी हो ही, हमें भी पाप का भागी बना रहे हो. ये रखो अपने पाप के पैसे. हमें और हमारी गायों को नहीं चाहिए ऐसी पाप की दौलत और आज के बाद हमारी गौशाला की तरफ फटकना भी मत, कलियुगी पंडित.’’

ऐसी खरीखोटी सुना कर गोपाल वहां से चला गया. न जाने पंडित के किस दुश्मन ने जा कर गोपाल से सच उगल दिया था.

पंडित की जान फिर से आफत में आ गई. अब तो वे उस पैसे को छूने से भी डरते थे. दानदक्षिणा में चाहे कितना पैसा भी मिल जाए, वह सब मंजूर था, लेकिन यह पैसा, न बाबा न. पंडित को यह पैसा कतई मंजूर न था. अब पंडित उस पैसे का क्या करें? पाप का पैसा फिर से घर में आ गया. जब तक उस पैसे से मुक्ति नहीं, पाप से मुक्ति नहीं.

पंडित की समस्या को जान कर शौकीन जाट उन के पास पहुंचा और उन के पैंताने बैठ कर बोला, ‘‘पंडितजी, देखो, मैं तो पूजापाठ और पापपुण्य में ज्यादा विश्वास करता नहीं. इसलिए ऐसी बातों से मुझेपाप भी नहीं लगता. भूतप्रेत उस से चिपटते हैं जो भूतप्रेत में विश्वास करता है.’’

पंडित ने एक बार शौकीन की तरफ अजीब सी नजरों से देखा, फिर पूछा, ‘‘शौकीन, अपने मन की बात कह. क्या कहना चाहता है?’’

‘‘पंडितजी, मैं यों कहूं, आप चाहो तो उस पाप के पैसे से मुक्ति पा सको और वह मुक्ति आप को मैं दिला सकूं.’’

पंडित गंभीर हो कर बोले, ‘‘वह कैसे, शौकीन? पापों से मुक्ति दिलाने का ठेका तो हमारा है. जाट कब से यह काम करने लगे?’’

‘‘पंडितजी, आप तो जानते ही हो. हम जाट घीदूध के कितने शौकीन होते हैं. आप वह पाप के डेढ़ लाख रुपए मुझेदे दो. आप की कसम 2 बढि़या नस्ल की गाय ले आऊंगा. आप का पैसा सच्चे मायनों में गौसेवा में लग जाएगा. आप के यहां भी कुछ दूधघी पहुंचा दिया करूंगा.’’

‘‘न भाई न, मुझेपाप का भागी नहीं बनना.’’

‘‘ठीक है, पंडितजी. सारे पाप का भागी मैं ही बन जाऊंगा.’’

पंडित सोचने लगे, यह शौकीन जाट बचपन से ही मूर्ख है. लोग पाप से मुक्ति चाहते हैं और यह अपनी मरजी से पाप का भागी बन रहा है. फिर बाद में कोई बात न हो, इसलिए उन्होंने कहा, ‘‘देख शौकीन, बाद में कुछ हो जाए तो मुझेकुछ मत कहना. तुम यह पाप का पैसा ले जाओगे तो पाप के पूरे के पूरे भागी तुम ही बनोगे.’’

‘‘पंडितजी, आप इस की चिंता रंच मात्र भी मत करो. मैं आप को किसी बात का दोष न दूंगा.’’

पंडितजी पापरूपी डेढ़ लाख रुपए से पिंड छुड़ाते हुए बोले, ‘‘ले शौकीन, इस पाप के पैसे को तू ही रख और चाहे जो कर. मेरे लिए तो यह पाप का पैसा था, अब तू इसे भोग.’’

‘‘हां पंडितजी, इस की चिंता आप मत करो. पाप को मैं देख लूंगा. आने दो जरा उसे. तेल पिलाया हुआ मोटा लट्ठ उसी के लिए रखा हुआ है. अगर वह धोखे से भी मेरे घर की ओर आ गया तो उस की खैर नहीं.’’

शौकीन जाट उन पैसों से बढि़या नस्ल की 2 दुधारू गायें ले आया. उन के 2 सुंदर सलोने बछड़े भी थे. जब शौकीन अपने घेर (गौशाला) में गाय दुहता और दूध की बाल्टी भरता तो पंडितजी अपनी छत से उसे टुकुरटुकुर देखते और सोचते कि इसे न जाने कब पाप लगेगा.

शौकीन उन को देख कर मुसकरा कर कहता, ‘‘आ जाओ, पंडितजी. दूध, छाछ कुछ तो पी लो. दूध न पिओ तो भगोना भर कर खीर ही भिजवा दूं.’’

लेकिन पंडित उसे हाथ के इशारे से मना कर देते. उन्होंने बहुत दिन इंतजार किया कि जाट के घर पाप आएगा लेकिन उन्होंने देखा कि जाट के परिवार के लोग तो उस पाप के पैसे से खरीद कर लाई गई गायों के दूध को पीपी कर दिनोंदिन हृष्टपुष्ट होते जा रहे हैं.

पंडित को भी धीरेधीरे यह यकीन होने लगा कि जाट के तेल पिलाए मोटे लट्ठ को देख कर शायद पाप उधर आने से डर रहा है.

हां, सोयू और थप्पन जरूर आएदिन शौकीन के घर से छाछ, मट्ठा ले जाते देखे जा सकते थे. पंडित को यह बात आज तक समझ में नहीं आई थी. Satirical Story in Hindi

Bikaner Cinema Culture : बातचीत – ‘‘बीकानेर में सिनेमा संस्कृति मर गई’’ – डाक्टर कुमार गणेश

Bikaner Cinema Culture : डाक्टर कुमार गणेश रंगमंच से जुड़े कलाकार हैं. उन्होंने कई नाटकों को न सिर्फ लिखा है बल्कि उन का निर्देशन भी किया है. वे बीकानेर से खास जुड़े रहे हैं जहां सिनेमाई संस्कृति को लगातार कमजोर होते देख रहे हैं.

राजस्थान में बीकानेर ऐसा शहर है जहां हजारों हवेलियां व कोठियां हैं. बीकानेर शहर ने बौलीवुड को कई मशहूर गीतकार, गायक, अभिनेता आदि दिए हैं. बीकानेर शहर में ‘रजिया सुल्तान’, ‘लैला मजनूं’ व ‘क्षत्रिय’ सहित सैकड़ों फिल्मों की शूटिंग की गई है. बीकानेर के सिनेमा के साथ जुड़ाव को ले कर पूर्व प्रोफैसर व रंगकर्मी डाक्टर कुमार गणेश से खास बातचीत की गई, पेश हैं उस के अंश :

आप प्रोफैसर व रंगकर्मी हैं. आप को सिनेमा का शौक कब महसूस हुआ. इस सवाल के जवाब में प्रोफैसर व रंगकर्मी डाक्टर कुमार गणेश बताते हैं, ‘‘सच तो यह है कि मुझे सिनेमा का शौक नहीं, बल्कि सिनेमा का जनून है. यह जनून आज का नहीं बल्कि अबोध उम्र से है. जब मैं अबोध था, तब के और आज के मेरे पैतृक शहर बीकानेर की सिनेमाई तसवीर में जबरदस्त अंतर है. पिछले 4-5 वर्षों के अंतराल में मेरा बीकानेर शहर वहीं पहुंच चुका है जब मैं महज 4-5 वर्ष का था.

‘‘बीकानेर में उस वक्त सब से पुराना थिएटर ‘गंगा थिएटर’ था, जिस का निर्माण रजवाड़ों ने किया था. इस थिएटर का निर्माण उस वक्त के नामचीन सम्राट व शासक गंगा सिंह के नाम पर करवाया गया था. गंगा सिंह ने लंदन के एक मशहूर पार्क की थीम पर बीकानेर शहर में एक पार्क बनवाया था, जिस का नाम रखा था- पब्लिक पार्क और वहीं पर ‘गंगा थिएटर’ बना था.

‘‘गंगा थिएटर अपनेआप में एक विरासत समेटे हुए है. पृथ्वीराज कपूर ने गंगा थिएटर में अपने नाटक के शो किए हैं. उन नाटकों में पृथ्वीराज कपूर ने स्वयं अभिनय किया था. मेरे घर से मेरे परिवार की पुश्तैनी दुकान के डेढ़ किलोमीटर के क्षेत्र में सभी थिएटर आ जाते थे. सब से पहले प्रकाश चित्र आता था. प्रकाश चित्र से 150 मीटर की दूरी पर ‘विश्व ज्योति’ थिएटर हुआ करता था. अब तो इस का ढांचा भी नहीं बचा. दो दशक पहले इसे ढहा दिया गया था. अब तो यहां पर शौपिंग मौल है. विश्वज्योति से आगे बढ़ने पर मिनर्वा थिएटर. इन सभी थिएटरों में रिलीज होने वाली फिल्मों के पोस्टर इन के आसपास की चाय की गुमटी या दुकान पर फिल्म के प्रचार के मकसद से ही लगते थे.’’

बचपन से सिनेमाई जनून

आप की परवरिश रूढि़वादी परिवार में हुई तो फिर सिनेमा का जनून कहां से आया? यह पूछने पर वे बताते हैं, ‘‘जी हां, हमारे घर में सिनेमा देखना दंडनीय अपराध हुआ करता था. दूसरी बात उन दिनों तांगों में फिल्म का प्रचार हुआ करता था. मैं बात कर रहा हूं 1975 के आसपास की. तब तांगे की पिछली सीट पर एक आदमी माइक ले कर बैठा रहता था और आगे व पीछे दोनों तरफ लाउडस्पीकर लगे रहते थे. तांगे पर फिल्म के गाने बजते थे. हम तांगे पर पोस्टर देखते, तांगे पर जो गाने बजते, वे सुनते थे.

‘‘इस ने मेरे अंदर सिनेमा के प्रति जनून पैदा किया. इस के अलावा उन दिनों फिल्म्स डिवीजन की गाडि़यां महल्लों में जा कर कुछ खास तरह की फिल्में दिखाया करती थीं. तब परदे के बजाय सफेद रंग में रंगीन दीवारों का सहारा लिया जाता था.

Bikaner Cinema Culture (3)
डाक्टर कुमार गणेश का बचपन से रंगमंच व थिएटरों की तरफ झुकाव था, उन्होंने बीकानेर में बेहद करीब से थिएटरों को सिमटते देखा है.

‘‘1994 में मैं एक कोचिंग क्लास में पढ़ाने लगा था. तब अपने सहशिक्षक के साथ 24 जुलाई, 1994 में पहली बार फिल्म सिनेमाघर में जा कर देखी थी. दोस्तों के कहने पर प्रकाश चित्र में ‘बैंडिट क्वीन’ देखने पहुंचा तो पता चला कि फिल्म शुरू हो चुकी है. हम वहां से निकल कर गंगा थिएटर गए, जहां पर फिल्म ‘बौंबे’ देखी. ‘सूरज टौकीज’ में मैं ने ‘हम आप के हैं कौन’ देखी थी. टौकीज में ही मैं ने सुनील दर्शन की फिल्म ‘ये रिश्ता द लव औफ बौंड’ देखी.

‘‘गंगा थिएटर में एक बार जादूगर ओ पी शर्मा आए थे तो उन का शो देखने ‘गंगा थिएटर’ गया था. मुझे गंगा थिएटर का आनंद लेने जाना अच्छा लगता था. सिंगल थिएटर में फिल्म देखने का मजा ही अलग होता है. मल्टीप्लैक्स में तो ऐसा लगता है जैसे हम शौपिंग मौल में आए हैं. मल्टीप्लैक्स में पौपकौर्न संस्कृति में ऐसा लगता है कि हम दुकान में आ गए हैं, खापी रहे हैं और फिल्म तो ऐसे ही देखने को मिल गई. मतलब हम खापी रहे हैं और आंखों के सामने से फिल्म जा रही है. अब चारों सिंगल थिएटर ध्वस्त किए जा चुके हैं. एक तरह से बीकानेर में सिनेमा संस्कृति मर गई.

‘‘मैं पूरी जिम्मेदारी से कह रहा हूं कि सिनेमाघरों के हिसाब से बीकानेर शहर वीरान हो चुका है. सिर्फ बीकानेर शहर ही नहीं बल्कि पूरे बीकानेर संभाग में ये चारों थिएटर अपना मुकाम रखते थे. मानगढ़, गंगानगर, चुरू में भी इन थिएटरों की तूती बोलती थी. मुझे सिरहाने पर रेडियो या टेप रिकौर्डर रख कर गाने सुनने की आदत तब से रही है जब मैं 8वीं कक्षा में पढ़ता था.

‘‘मेरे बीकानेर शहर के ही गीतकार पंडित भरत व्यास थे. उन का फिल्म ‘रानी रूपमती’ में गाना था, ‘लौट के आ जा मेरे मीत, तुझे मेरे गीत बुलाते हैं…’ उस की तर्ज पर मैं ने तीसरी कक्षा में गाना सुनाया था, ‘आ लौट के आजा मेरे राम, तुझे भाई भरत बुलाते हैं…’ मुझे आज भी याद है कि कई वर्षों तक मेरे साथ पढ़ने वाले बच्चे मुझे चिढ़ाते थे.’’

बीकानेर ने दी कई सिनेमाई हस्तियां

बीकानेर शहर ने बौलीवुड को क्या गीतकार, अभिनेता व संगीतकार भी दिए हैं? इस के जवाब में वे कहते हैं, ‘‘आप ने एकदम सही कहा. बीकानेर शहर के सब से बड़े नाम गीतकार पंडित भरत व्यास थे, जिन्हें खोज कर शांताराम अपने साथ ले गए थे. पंडित भरत व्यास ने ‘मालिक तेरे बंदे…’ गीत लिखा था. भरत व्यास ने बौलीवुड में सैकड़ों गीत लिखे, राजस्थानी में भी गीत लिखे, फिल्म भी बनाई. उन के छोटे भाई बी एम व्यास ने ‘दो आंखें बारह हाथ’ सहित कई फिल्मों में अभिनय किया. वे अकसर खलनायक की भूमिकाएं किया करते थे. वे ऐतिहासिक फिल्मों में जोधपुर वाले अभिनेता महिपाल भंडारी और अनीता गुहा के साथ खलनायक के किरदार निभाते थे. दिलीप कुमार की भाभी और नासिर खान की पत्नी बेगम पारा का संबंध बीकानेर से था.

Bikaner Cinema Culture (2)

‘‘बीकानेर तो बेगम पारा का मायका था. उन के पिता बीकानेर की अदालत में जज थे. पाकिस्तान की मशहूर गायिका रेशमा की पैदाइश का ताल्लुक बीकानेर से है. ‘मिर्जा गालिब’ व ‘पाकीजा’ जैसी फिल्मों के संगीतकार गुलाम मोहम्मद भी बीकानेर से ही थे.

‘‘राज कपूर की फिल्म ‘बरसात’ के शीर्ष गीत ‘बरसात में मिले हम सजन, हम से मिले…’ इस के संगीतकार शंकर जयकिशन थे लेकिन इस गाने के लिए शंकर जयकिशन को ढोलक व तबलावादक गुलाम मोहम्मद की मदद लेनी पड़ी जोकि बाद में ‘पाकीजा’ के संगीतकार बने.

‘‘हम याद दिला दें कि गुलाम मोहम्मद और रामलाल, संगीतकार शंकर जयकिशन से सीनियर थे. चांद परदेसी का भी संबंध बीकानेर से ही है. चांद परदेसी ने परदेसी नाम से फिल्म ‘बंजारन’ में संगीत दिया था. इस फिल्म का लोकप्रिय गाना है, ‘चंदा रे मेरी पतियां ले जा, संजना को पहुंचाना है…’ यह राजस्थानी लोकगीत पर ही आधारित था. इस के गीतकार पंडित मधुर थे. इस गाने की रिकौर्डिंग के वक्त लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, परदेसी के सहायक थे. फिल्म ‘एक बार चले आओ’ का संगीत दिया था गीतकार समीर ने. कमल राजस्थानी भी बीकानेर से थे, जिन्होंने सब से पहले अनवर को गाने का अवसर दिया था.

‘‘अनवर, अरशद वारसी के सौतेले बड़े भाई थे. मैं ने पंडित रामकृष्ण महेंद्र से 3 साल तक 1992 में शास्त्रीय संगीत सीखा था. कमल राजस्थानी ने जीतेंद्र व ऋषि कपूर की फिल्म ‘गैरतमंद’ में संगीत दिया था और इस के एक गीत ‘मेरे महबूब ढूंढ़ा तुझे गली गली, डगरडगर तेरे बिना उदास…’ को पंडित रामकृष्ण महेंद्र ने अपनी आवाज में रिकौर्ड किया था. पंडित रामकृष्ण महेंद्र ने ही मुझे इस गीत की रिकौर्डिंग के वक्त कमल राजस्थानी से मिलवाया था. इकबाल के लिए मैं ने एक फिल्म की पटकथा व गीत लिखे थे. पर यह फिल्म रिलीज नहीं हुई थी.

‘‘मैं ने राजस्थानी फिल्म के लिए भी गीत लिखे हैं. नीरज राजपुरोहित भी बौलीवुड में अच्छा काम कर रहे हैं. नवल व्यास ने अमिताभ बच्चन के साथ कुछ एड फिल्में भी की हैं. राजा हसन का संबंध भी बीकानेर से ही है. राजा हसन के पिता रफीक सागर ने फिल्म ‘क्षत्रिय’ का गीत ‘सपने में सखी मोरे नंद गोपाल…’ को संगीत दिया था. इसे कविता कृष्णमूर्ति ने गाया था.’’

Bikaner Cinema Culture (4)
राजा हसन भारतीय प्लेबैक सिंगर हैं, जिन्होंने कई गाने गाए हैं. उन का संबंध भी बीकानेर, राजस्थान से है.

मरणासन स्थिति में रंगमंच

बीकानेर में रंगमंच की क्या स्थिति रही है? यह पूछने पर वे बोले, ‘‘मैं ने खुद कई नाटक लिखे. कई नाटकों का निर्देशन किया और अभिनय भी किया. हिंदी में सब से अधिक एकपात्रीय नाटक मेरे हैं. राजस्थानी भाषा में पहला एकपात्रीय नाटक मैं ने 1997 में लिखा. बीकानेर का रंगमंच काफी समृद्ध रहा है. पृथ्वीराज कपूर तो अपनी नाटक कंपनी ‘पृथ्वी थिएटर’ को ले कर पूरे देश में भ्रमण किया करते थे. बीकानेर में रंगमंच की जड़ें मोहन सिंह मधुप से पहले की मानता हूं. वे सरदार पटेल मैडिकल कालेज में आर्टिस्ट थे.

‘‘अर्जुन हिंगोरानी की फिल्म ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ में धर्मेंद्र को अभिनय करने का अवसर मिला था. उस वक्त मोहन सिंह, धर्मेंद्र के संघर्ष के दिनों के साथी थे. उन्होंने रंगमंच पर काफी काम किया. लक्ष्मी नारायण माथुर बहुत बड़े रंगकर्मी थे. लेखन परंपरा में निर्माही व्यास बहुत बड़ा नाम हुआ करता था. निर्देशक के तौर पर एस डी चौहाण, जगदीश सिंह चौहाण, प्रदीप भटनागर, इकबाल बड़े नाम हैं. उस के बाद मेरा नाम आता है. आजादी से पहले भी बीकानेर का रंगमंच समृद्ध था. अशोक जोशी, रमेश शर्मा, राम सहाय हर्ष, सुदेश व्यास, हरीश पी शर्मा भी रंगमंच पर बेहतरीन काम करते आए हैं. मनोरंजक नाटक जगत में सूरज सिंह पंवार बहुत बड़ा नाम है.’’

आप ने 1994 में पहली बार सिनेमाघर में फिल्म देखी थी. तब से अब तक आप ने सिनेमा को किस तरह से बनते या बिगड़ते देखा? इस पर वे कहते हैं, ‘‘उस वक्त हिंदी सिनेमा संगीत पर ही टिका हुआ था. 50 से 70 का तो स्वर्णिम काल था. 70 से 80 ठीकठाक रहा. मगर 80 से 90 का दौर तो मारधाड़ व हिंसा वाली फिल्मों का ही रहा. 1991 से 1999 के दौर में गाने बहुत मीठे बने लेकिन जिन कलाकारों पर फिल्माए गए और जिस तरह की ये फिल्में थीं, लगता था कि इन फिल्मों के निर्देशकों को संगीत की समझ ही नहीं है.

Bikaner Cinema Culture (5)
एक समय बीकानेर का रंगमंच काफी समृद्ध हुआ करता था. कई नामी कलाकार इन रंगमंचों से जुड़ते थे. पृथ्वीराज कपूर व इंदीवर जैसी शख्सियतों का इन रंगमंचों से जुड़ाव था.

‘‘वास्तव में 1987 से 1989 आतेआते हिंदी सिनेमा के निर्देशक फिल्में बनाना भूल गए थे. अच्छी फिल्में तो तब भी नहीं बनती थीं. तकनीकी रूप से उस दौर की फिल्में समृद्ध होना शुरू हुई थीं. 2000 से फिल्म की तकनीक समृद्ध हुई, पर फिल्ममेकिंग मर गई. पिछले 25 वर्षों में हमारी फिल्में रोबोटिक हो गई हैं. ऐसा लगता है कि ये फिल्में असैंबल की जा रही हैं.

‘‘90 के दशक में ‘अपहरण’ व ‘राजनीति’ वाले प्रकाश झा की जगह ‘दिल क्या करे’ वाले प्रकाश झा ही नजर आते हैं. आप उन पर या सुभाष घई या अशोक ठाकरिया पर दांव खेल सकते थे. उन दिनों यशराज फिल्म्स और धर्मा प्रोडक्शन भी अच्छा काम कर रहे थे. अब तो फिल्म का संगीत मरता जा रहा है. पिछले 25 वर्षों से सिनेमा में मरणासन्न स्थिति है.’’

सिनेमा को फिर से उठाने की जरूरत

ऐसी स्थिति में सिनेमा फिर से पल्लवित कैसे हो सकता है? इस पर वे अपनी राय यों बयां करते हैं, ‘‘पहली बात तो हिंदी सिनेमा के संगीत पक्ष को मजबूत किया जाए. हिंदी संगीत का प्रतिनिधि संगीत तो लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का संगीत है. फिर वे लोग सिनेमा बनाएं जिन्हें स्टोरीटैलिंग की समझ हो. इतना होगा तो हिंदी सिनेमा एक बार फिर से उठ खड़ा होगा.’’

बीकानेर शहर में फिल्मों की शूटिंग भी बहुत हुईं, इस पर आप क्या कहना चाहेंगे? इस पर वे बोले, ‘‘बीकानेर को हजार हवेलियों का शहर कहा जाता है. लोकेशन के हिसाब से काफी बेहतरीन. बीकानेर में बेशुमार रेत के टीले हुआ करते थे. ‘लैला मंजनूं’, ‘रजिया सुलतान’, ‘अलीबाबा चालीस चोर’, ‘मुगल ए आजम’ को यहीं पर फिल्माया गया. फिल्म ‘क्षत्रिय’ को बीकानेर के किलों में फिल्माया गया. गरमी में जब लू चलती थी तो हर दूसरे दिन टीले की जगह बदल जाती थी. इंदीवर साहब लिखा गीत, ‘एक तारा बोले…’ देश के हालात पर कटाक्ष था. 5 या 6 अंतरे वाला यह गाना है. इस गाने के आखिरी बंद को बीकानेर की हृदयस्थली दम्माणी चौक पाटा पर फिल्माया गया. चौक के बीचोंबीच लंबेलंबे लकड़ी के पाटा बने हुए हैं जिस पर छतरी है.

‘‘उस वक्त के रजवाड़े के अनुसार, राजा की तरफ से पाटे पर छतरी लगाने की अनुमति नहीं थी पर दम्माणी चौक को यह विशेष छूट दी गई थी.’’ Bikaner Cinema Culture

Liver Disease Awareness : लिवर सिरोसिस – लापरवाही न बरतें

Liver Disease Awareness : लिवर सिरोसिस एक जानलेवा बीमारी है जिस का कोई इलाज होम्योपैथी या आयुर्वेद में नहीं है लेकिन इस बीमारी की समय से पहचान और एलोपैथिक के अनुशासित इलाज से मौत के समय को कुछ साल दूर धकेला जा सकता है. कैसे, जानिए.

सलोनी का पति अनुज लंबे समय से लिवर की बीमारी से जूझ रहा था. रुद्रप्रयाग में रहने वाले और पेशे से पत्रकार अनुज की उम्र अभी सिर्फ 35 साल थी. उस की 5 साल पहले ही शादी हुई थी और 3 साल पहले उन के घर में नन्हे अंकुर की किलकारी गूंजी थी. कोई 2 साल पहले अनुज को पीलिया के लक्षण दिखे तो उस ने एक झड़फूंक करने वाले से पीलिया झड़वाया. उस ने कई दिनों तक पीलिया झड़ा और उस के बाद किसी जड़ी की माला अनुज के गले में पहना दी, कहा, ‘जैसेजैसे यह जड़ी सूखेगी, पीलिया पूरी तरह खत्म हो जाएगा.’ जड़ी तो हफ्तेभर में सूख गई और उस के साथ अनुज का शरीर भी सूखने लगा. नौकरी की भागमभाग में अनुज ने खुद पर ध्यान नहीं दिया. दिनभर फील्डवर्क और रात में दोस्तों के साथ शराब पार्टी कर के जब वह 11-12 बजे घर पहुंचता था तो उसे अपना होश नहीं रहता था.

अनुज की कमजोरी बढ़ती जा रही थी. भूख भी खत्म हो गई थी. मगर शराब की तलब नहीं छूटी. जब उसे चलनेफिरने में भी लड़खड़ाहट महसूस होने लगी तो एक दिन उस ने एक होम्योपैथिक डाक्टर को दिखाया. 6 महीने उस का इलाज चला मगर फायदा कुछ नहीं हुआ. उलटे, उस का पेट फूलने लगा.

सलोनी ने सलाह दी कि किसी सरकारी अस्पताल में दिखा ले. अनुज ने ऋषिकेश जा कर एम्स में दिखाया तो वहां डाक्टर ने तुरंत एडमिट होने के लिए कहा. वहां उस के कई टैस्ट हुए. पता चला कि अनुज लिवर सिरोसिस बीमारी की आखिरी स्टेज पर है. उस का लिवर 80 परसैंट तक सड़ चुका है. इस की वजह थी शराब और इलाज में लापरवाही.

एम्स में भरती होने के बाद अनुज के पेट से पानी निकाला गया. उस के बाद कई इंजैक्शन और दवाएं चढ़ीं. 2 हफ्ते बाद डाक्टर ने कई इंस्ट्रक्शंस और दवाओं की लिस्ट के साथ उस को डिस्चार्ज किया. उस को शराब न पीने की सख्त हिदायत थी, मगर अनुज शराब की लत छोड़ नहीं पाया, जिस के कारण हर दोतीन महीने में उस के पेट में पानी भरने लगा. सलोनी उस को ले कर अस्पताल दौड़ती, जहां डाक्टर पेट में नीडल डाल कर धीरेधीरे पानी बाहर निकालते थे.

यह प्रोसैस दोढाई घंटे तक चलता था और उस के बाद अनुज को एल्बुमिन नामक दवा चढ़ाई जाती थी. एल्बुमिन एक महंगी दवा थी, जिसे पानी निकालने के बाद चढ़ाना आवश्यक होता था क्योंकि उस के बिना अनुज का मानसिक संतुलन गड़बड़ा जाता था, वह पागलों जैसी हरकतें करने लगता था या फिर लंबी बेहोशी में चला जाता था.

यह सिलसिला कोई 8 महीने तक चला. अनुज के इलाज में सलोनी की सारी जमापूंजी खत्म हो गई, गहने भी बिक गए. मगर अनुज की सेहत में कोई सुधार न हुआ. लिवर इस हद तक सड़ चुका था कि लिवर ट्रांसप्लांट भी संभव न था. आखिरकार, एक दिन पेट से पानी निकालने की प्रक्रिया के दौरान अस्पताल में ही अनुज की मृत्यु हो गई.

जानलेवा बीमारी

लिवर सिरोसिस एक धीमी लेकिन बेहद खतरनाक बीमारी है. लिवर सिरोसिस के मामले भारत और दुनियाभर में बढ़ रहे हैं, जिस का मुख्य कारण शराब का अत्यधिक सेवन, मोटापा, मधुमेह (डायबिटीज) और हेपेटाइटिस बी और सी जैसे वायरल इंफैक्शन हैं, जो लिवर में स्थायी निशान पैदा करते हैं और स्थिति को गंभीर बना देते हैं, जिस से थकान, भूख न लगना, पेट में तरल पदार्थ जमा होना (जलोदर) और लिवर कैंसर का खतरा बढ़ जाता है. इस बीमारी का एक कारण खेतों में भारी मात्रा में होने वाला कीटनाशकों का छिड़काव भी है.

लिवर सिरोसिस एक जानलेवा बीमारी है जिस का कोई इलाज होम्योपैथी या आयुर्वेद में नहीं है लेकिन इस बीमारी की समय से पहचान और एलोपैथिक के अनुशासित इलाज से मौत के समय को कुछ साल दूर धकेला जा सकता है. लापरवाही इसे घातक बना देती है और जीवन जल्दी समाप्त हो जाता है.

अगर शुरुआती स्टेज में सही इलाज मिल जाए और बीमारी रोक ली जाए तो लिवर की बची हुई क्षमता सुरक्षित रख सकते हैं और लिवर ट्रांसप्लांट के बाद मरीज 10 से 15 साल तक जी सकता है. गंभीर अवस्था होने पर एकदो साल से अधिक जीवन नहीं बचता और वह भी बहुत दर्द के साथ बीतता है.

क्या हैं लक्षण?

जब लिवर रक्त को शुद्ध करने, विषाक्त पदार्थों को तोड़ने, थक्के बनाने वाले प्रोटीन का उत्पादन करने और वसा और वसा में घुलनशील विटामिन के अवशोषण में मदद करने में असमर्थ होता है तब लिवर सिरोसिस के लक्षण उभरते हैं. अकसर, जब तक विकार आगे नहीं बढ़ जाता तब तक लिवर सिरोसिस के कोई लक्षण नहीं दिखते. लिवर सिरोसिस के कुछ लक्षणों में शामिल हैं-

थकान : लगातार और अस्पष्टीकृत थकान एक सामान्य प्रारंभिक लक्षण है.

पीलिया : यकृत द्वारा संसाधित वर्णक बिलिरूबिन के निर्माण के कारण त्वचा और आंखों का पीला पड़ना.

खुजली (प्रूरिटस) : त्वचा में खुजली एक आम शिकायत है जो अकसर रक्त प्रवाह में पित्त लवण के संचय से संबंधित होती है.

पेट में गड़बड़ : पेट में दाहिनी तरफ दर्द या भारीपन की अनुभूति होती है.

वजन कम होना : सिरोसिस के कारण भूख कम लगती है और वजन घटने लगता है.

सूजन (एडेमा) : लिवर की खराब कार्यप्रणाली और रक्त वाहिकाओं में दबाव बढ़ने से पैरों और टखनों में सूजन होने के साथ दर्द रहने लगता है.

आसानी से चोट लगना और रक्तस्राव होना : क्षतिग्रस्त लिवर पर्याप्त मात्रा में थक्का बनाने वाले प्रोटीन का उत्पादन करने में कठिनाई महसूस कर सकता है, जिस के कारण आसानी से चोट लगना और रक्तस्राव होना शुरू हो जाता है.

स्पाइडर एंजियोमास : त्वचा पर, विशेष रूप से शरीर के ऊपरी हिस्से पर, छोटी मकड़ी जैसी रक्त वाहिकाएं दिखाई दे सकती हैं.

गहरा मूत्र : मूत्र का रंग गहरा हो सकता है. मल का रंग पीला या मिट्टी जैसा हो सकता है.

बढ़ी हुई तिल्ली : सिरोसिस के कारण बढ़ी हुई तिल्ली (स्प्लेनोमेगाली) हो सकती है.

भ्रम और मानसिक परिवर्तन : हेपेटिक एन्सेफैलोपैथी के रूप में जाना जाने वाला मस्तिष्क में सिरोसिस से संबंधित परिवर्तन भ्रम, विस्मृति और व्यक्तित्व में परिवर्तन का कारण बन सकता है.

गाइनेकोमेस्टिया : पुरुषों में, सिरोसिस हार्मोन असंतुलन का कारण बन सकता है, जिस से स्तनवृद्धि हो सकती है.

Liver Disease Awareness (2)
लिवर सिरोसिस एक जानलेवा बीमारी है. थकान, पेट में गड़बड़ी, मूत्र की समस्या जैसे इस के शुरुआती लक्षणों को पहचानते हुए ट्रीटमैंट करवा लेना जरूरी है.

लगातार बुखार : सिरोसिस के कारण शरीर का तापमान बढ़ा हुआ रहता है. पूरे शरीर में दर्द रहता है.

दवाओं के प्रति संवेदनशीलता में वृद्धि : खराब लिवर के कारण दवाओं के चयापचय में कठिनाई हो सकती है, जिस के परिणामस्वरूप दवाओं के दुष्प्रभावों का खतरा बढ़ जाता है.

सावधानी की जरूरत

लिवर सिरोसिस की बीमारी में खानपान और दवाओं के सेवन में काफी सावधानी रखनी चाहिए. इस बीमारी का पता चलने पर शराब पीना तुरंत बंद कर दें. यह सब से ज्यादा जरूरी है. शरीर में सूजन और पेट में पानी भरने की समस्या से बचने के लिए नमक कम लें. तलाभुना, बहुत मसालेदार और जंक फूड से परहेज की सलाह डाक्टर देते हैं. प्रोटीन संतुलित मात्रा में और डाक्टर की सलाह से लें. खाने में ज्यादातर फल, हरी सब्जियां और साबुत अनाज खाएं. कच्ची और बासी चीजों को खाने से बचें. बिना डाक्टर की सलाह के कोई दवा, घरेलू नुस्खा, आयुर्वेदिक दवाएं या टौनिक न लें.

दर्द निवारक दवाएं जैसे कुछ पेनकिलर लिवर और किडनी के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं. लिवर की कंडीशन समझने के लिए एलएफटी जांच, अल्ट्रासाउंड, एंडोस्कोपी आदि नियमित कराते रहें. पेट में पानी, खून की उलटी, काले मल जैसे लक्षणों पर तुरंत डाक्टर को दिखाएं. ज्यादा नींद, भ्रम, चिड़चिड़ापन, बोलने में लड़खड़ाहट जैसी बातें हेपेटिक एन्सेफैलोपैथी के संकेत हो सकते हैं. ऐसे में तुरंत अस्पताल जाएं. Liver Disease Awareness

Mountain Tourism Rules : मुद्दा – पहाड़ पर पर्यटन के हों नए नियम

Mountain Tourism Rules : हर साल पहाड़ों पर कोई न कोई भयंकर प्राकृतिक आपदा घटती रहती है जिस में जानमाल की हानि होती है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पहाड़ों पर इंसानों ने अतिरिक्त बोझ लाद दिया है और ऐसा पर्यटन बढ़ाने के चलते हुआ है.

उत्तराखंड के धराली में 60 सैकंड में जो तबाही हुई थी उस में 4 लोगों के मरने और तमाम लोगों के गायब होने की घटना घटी. इस का कारण ऊंचाई पर स्थित खीर गंगा नदी के जलग्रहण क्षेत्र में बादल फटने से आई बाढ़ देखते ही देखते कई घरों, होमस्टे और बाजार को अपने साथ बहा ले गई. आफत ऐसी आई कि लोग भाग भी न सके. मलबे में कई लोग दब गए. करीब 20 से 25 होमस्टे पूरी तरह से नष्ट हो गए. घटना के समय लोगों के पास भागने तक का समय न था.

40 से 50 इमारतें पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गईं. सब से अधिक तबाही धराली के मुख्य बाजार क्षेत्र में हुई जहां कई होटल, दुकानें और घर पूरी तरह से नष्ट हो गए. बहुत भारी बारिश के कारण भूस्खलन और अचानक बाढ़ का खतरा लगातार बढ़ गया. सरकार को कक्षा 1 से 12 तक के स्कूल और आंगनवाड़ी केंद्र बंद रखने का आदेश जारी करना पड़ा. उत्तराखंड की धरती एक बार फिर प्राकृतिक आपदा की मार झेल रही है.

धराली की त्रासदी ने एक बार फिर बताया है कि कैसे जलवायु परिवर्तन और पहाड़ी इलाकों की नाजुक भौगोलिक स्थिति मिल कर कहर बरपा सकते हैं. जरूरत इस बात की है कि उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति समझ कर योजनाएं बनाई जाएं. सड़कों पर बस, कार का चलना केवल सेना और सर्विस के लिए हो. पर्यटन के लिए पहाड़ों पर पैदल ही लोग जाएं. होटल की जगह टैंट का प्रयोग करें.

धार्मिक यात्राओं से नुकसान में पहाड़

औल वेदर रोड के नाम पर जब से हिमालय को छलनी किया जाना शुरू हुआ है तब से हिमालय श्रेणी के पहाड़ और खतरनाक हो गए हैं. हिमालय को कच्चा पहाड़ कहा जाता है. यह पूरा इलाका भूकंप के खतरनाक जोन में आता है. इस के अलावा भी यहां आपदाएं आती रहती हैं. उत्तराखंड के जोशीमठ में घरों में दरारें आनी शुरू हुई थीं. लोग घर छोड़ कर जाने को मजबूर हुए थे. इस का कारण जोशीमठ के आसपास की खुदाई होनी थीं. जोशीमठ ऊंचाई पर बसा कसबा है. वहां कोई भी निर्माण खतरनाक साबित हो सकता है.

हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड समेत लगभग सभी हिमालयी राज्यों को बिजली परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर हिमालय को छलनी किया गया है. उत्तराखंड में ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक बन रही रेल लाइन के चक्कर में 30 से ज्यादा गांवों में दरारें पड़ने लगी हैं. कई सुरंगें भी बनाई गई हैं. हर बड़े प्रोजैक्ट के साथ कुछ गांव और घर खत्म हो जाते हैं. हिमालय की गोद में बसे किसी भी राज्य की आबादी करोड़ों में नहीं है. दूसरे राज्यों से आने वाले पर्यटक यहां के लिए खतरा बनते जा रहे हैं.

हिमालय की गोद में बसे राज्यों में बहुमंजिली इमारतों की जगह नहीं है. पर्यटकों की सुविधा के लिए इन को बनाया जा रहा है. विकास के नाम पर पानी बहाव के अनेक रास्ते बंद हो गए हैं जबकि पहाड़ों से रिसाव बना हुआ है. यही रिसाव लोगों के घरों, प्रोजैक्ट तक पहुंचता है जो दरोदीवारों को कमजोर करता है. नतीजतन, हलका सा भूकंप आने पर इमारतें धराशायी हो जाती हैं. इस तरह की घटनाएं आमतौर पर होती हैं पर उन की चर्चा नहीं होती, जानमाल का नुकसान न हो तो शोर भी नहीं होता.

Mountain Tourism Rules (2)

1977-78 में बाढ़ आई थी. खूब पानी आया लेकिन उस के बहाव के रास्ते में कोई बाधा नहीं थी तो नुकसान न के बराबर हुआ. साल 2013 में आई वैसी ही बाढ़ ने बहुतकुछ तबाह कर दिया. देश में हिमालय के पहाड़ों की बनावट अलग किस्म की है. बड़े प्रोजैक्ट्स विनाश का कारण हैं. अगर इन्हें नहीं रोका गया तो और विनाश होगा. पूरे हिमालय के लिए एक पृथक विकास मौडल बनाए जाने की जरूरत है.

हिमालय है क्या?

हिमालय दो शब्दों ‘हिम’ और ‘आलय’ से मिल कर बना है. इस का अर्थ होता है ‘बर्फ का घर’. यह एशिया की बड़ी पर्वत शृंखला है जो अपनी ऊंचाई पर हमेशा बर्फ से ढकी रहती है. इस क्षेत्र में बड़ीबड़ी परियोजनाओं के बनने से पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है. इस से इस के पहाड़ों में तमाम तरह की परेशानियां आ रही हैं. हिमालय पर्वत शृंखला दक्षिणपूर्व एशिया में चीन और भारत के बीच स्थित है. यह एशिया में एक प्राकृतिक बाउंड्री का निर्माण करती है. यह उत्तर में तिब्बती पठार के मैदानों और दक्षिण में भारतीय उपमहाद्वीप के बीच विभाजन रेखा का काम करती है.

दुनियाभर के पहाड़ों में हिमालय सब से युवा माना जाता है. इस का निर्माण लगभग 5 करोड़ वर्ष पहले भारतीय प्लेट यूरेशियन प्लेट के टकराने से हुआ है. यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिस ने पृथ्वी की कई पर्वत शृंखलाओं को आकार दिया. प्लेटों के टकराने से उत्पन्न अत्यधिक दबाव के कारण अवसादी चट्टानें ऊपर उठ गईं. समय के साथ ये चट्टानें मुड़ गईं और ऊपर की ओर धकेल दी गईं जिस से हिमालय की ऊंची चोटियां बनी हैं. हिमालय वलित पर्वत हैं जो टैक्टोनिक प्लेटों के हिलने से बनते हैं और उन के किनारे आपस में टकराने से सिकुड़ जाते हैं. परिणामस्वरूप, पृथ्वी की पपड़ी में वलित पर्वत बनते हैं.

हिमालय पश्चिम से पूर्व तक लगभग 2,500 किलोमीटर तक फैला है. इस पर्वतमाला की चौड़ाई लगभग 200 से 400 किलोमीटर तक है. इस की चौड़ाई पूरी लंबाई में एकसमान नहीं है और भौगोलिक क्षेत्र के अनुसार इस में काफी भिन्नता है. ऊंचाई की बात करें तो हिमालय पर्वत सब से ऊंचा है. दुनिया के सब से ऊंचे पर्वत माउंट एवरेस्ट सहित पृथ्वी की अधिकांश ऊंची चोटियां हिमालय में ही स्थित हैं. यहां 30 से ज्यादा चोटियां 25 हजार फुट से भी ऊंची हैं. हिमालय 5 देशों भूटान, भारत, नेपाल, चीन और पाकिस्तान में फैला हुआ है. हिमालय पाकिस्तान से शुरू हो कर पूर्व की ओर भारत, नेपाल, भूटान और चीन की पूर्वी सीमा तक फैला हुआ है.

जरूरत है नई प्लानिंग की

हिमालय का यह क्षेत्र हमेशा से ही आकर्षण का केंद्र रहा है. इस क्षेत्र में पर्यटन बढ़ाने के लिए विकास की तमाम योजनाएं चलने लगीं. धार्मिक पर्यटन को सरल बनाने के लिए सड़कों के साथ ही साथ कार, बसों के आवागमन को सरल बना दिया गया है. इस से वहां का आधारभूत ढांचा बदलने लगा है, जो इस क्षेत्र को नुकसान पहुंचा रहा है. ऐसे में जरूरी है कि इस क्षेत्र में बाहरी आवागमन को कम किया जाए. सड़कों का प्रयोग केवल सेना और सर्विस के लिए होना चाहिए.

पर्यटकों की कार, बस और दूसरी गाडि़यों को केवल एक हजार मीटर की ऊंचाई तक ही जाना चाहिए. जैसे, अगर पर्यटकों को मसूरी जाना हो तो उन की गाडि़यां केवल देहरादून तक जाएं. वहां उन को पार्क करवा दिया जाए. इस के आगे की दूरी उन को पैदल तय करने को कहा जाए. पहाड़ की दूरी तय की जा सकती है. तमाम धार्मिक पर्यटन करने वाले कांवड़ यात्रा के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर की यात्रा करते हैं. सो, उन्हें पहाड़ों पर भी पैदल जाना चाहिए.

पैदल चलें और टैंट में रहें

पहाड़ पर जाने वालों के लिए नियम बना देना चाहिए कि वे पैदल चलें और टैंट में रहें. कार, बस और हैलिकौप्टर का प्रयोग केवल सेना और सर्विस के लिए हो. पर्यटक पैदल चल सकें, तभी पहाड़ पर जाएं. कुछ कांवड़ यात्राएं 100 किलोमीटर दूर की होती हैं. सुल्तानगंज से देवघर तक की कांवड यात्रा 120 किलोमीटर लंबी है. इस में 2 दिन लगते हैं. तीसरे दिन वहां जल चढ़ा देना जरूरी होता है. गंगोत्री से रामेश्वरम की यात्रा 3 हजार किलोमीटर लंबी है. गंगोत्री से ऋषिकेष 258 किलोमीटर लंबी होती है. इस में 3 से 4 दिन लग जाते हैं. जब लोग इतनी लंबी यात्रा कर सकते हैं तो देहरादून से मसूरी भी जा सकते हैं. देहरादून से मसूरी की दूरी केवल 40 किलोमीटर ही है.

ऋषिकेश से केदारनाथ की दूरी

227 किलोमीटर ही है. यह गंगोत्री से ऋषिकेश कांवड़ यात्रा से कम है. ऐेसे में केदारनाथ जाने वालों को अपनी गाडि़यां ऋषिकेश-हरिद्वार में छोड़ देनी चाहिए. यहां से पैदल केदारनाथ की यात्रा करें. इस से सड़कें खराब नहीं होंगी, जल्द उन को बनाना नहीं पड़ेगा और पर्यावरण को नुकसान न होगा. ऋषिकेश से बद्रीनाथ की दूरी 350 किलोमीटर है. यह भी गंगोत्री से ऋषिकेश कांवड़ यात्रा से कम ही है.

जब कांवड़ यात्रा या कुंभ स्नान के लिए पैदल चला जा सकता है तो पहाड़ों पर जाने के लिए भी कार, बस, हैलिकौप्टर का प्रयोग नहीं होना चाहिए. इन का प्रयोग केवल सेना और सर्विस के लिए हो. पहाड़ों का आधारभूत ढांचा वहां बनने वाले होटलों से भी खराब हो रहा है.

ऐसे में स्थायी होटल में रहने की जगह पर टैंट में रहना चाहिए. टैंट उपलब्ध कराए जा सकते हैं. प्रयागराज में कुंभ के दौरान कईकई महीने रुकने के लिए लोग टैंट का ही प्रयोग करते हैं. सरकार वहां पूरी एक टैंट सिटी बना देती है.

पहाड़ों को नुकसान से बचाने के लिए होटलों की जगह पर टैंट का प्रयोग करना चाहिए. पहाड़ पर स्थायी निर्माण केवल वहीं के गांव वालों के ही बनने चाहिए. बाहर से जाने वाले पर्यटक केवल टैंट में रहें और पैदल ही जाएं. आज भी तमाम ऊंची चोटियां हैं जहां केवल लोग पैदल ही जा सकते हैं और टैंट में रह सकते हैं. पर्वतारोहण करने वाले इसी तरह से रहते हैं. ऐसे में केवल धार्मिक यात्रा करने वालों के लिए पहाड़ों को क्यों खराब किया जा रहा है? Mountain Tourism Rules

Marriage Impact on Women : औरत के सपनों पर शादी का ग्रहण

Marriage Impact on Women : औफिस में कितने घंटे बैठना है, फील्ड वर्क करना चाहिए या नहीं, देर तक रुकना ठीक है या नहीं, यहां तक कि घर से बाहर कब और क्यों निकलना है इन सब पर पति और परिवार के सदस्य नियम तय करने लगते हैं. धीरेधीरे यह आजादी सिकुड़ती चली जाती है और महिला, जो कल तक आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी थी, आज अपनी ही जिंदगी के फैसलों के लिए सफाई देने को मजबूर हो जाती है.

राजेश प्राइवेट नौकरी में था. छह महीने या साल भर से ज्यादा कहीं टिक नहीं पाता था. उस की शादी जब रोमा से हुई थी तो राजेश सहित उस का पूरा परिवार बहुत खुश था. रोमा ने नर्सिंग की डिग्री ली हुई थी और वह एक सरकारी अस्पताल में काम कर रही थी. शादी के बाद रोमा ने नौकरी नहीं छोड़ी. दरअसल ससुराल वालों की तरफ से नौकरी छोड़ने का कोई दबाव उस पर नहीं आया. वजह यह कि उस की सैलरी राजेश की सैलरी से तीन गुना थी, लिहाजा सासससुर ने बहू को सिर आंखों पर रखा. शुरू के 2 साल तो आराम से निकल गए. बहू की तनख्वाह का हिसाबकिताब ससुर जी रखने लगे, हालांकि बेटा कितना कमाता है और कहां उड़ाता है, यह पूछने की हिम्मत उन की कभी नहीं हुई.

Marriage Impact on Women (1)
सांकेतिक तस्वीर

दो साल बाद जब रोमा मां बनी तो उस की जिम्मेदारियां बढ़ गईं. पति से भी कुछ अपेक्षाएं बढ़ीं. सुबह अगर वह किचन में सब के लिए जल्दीजल्दी नाश्ताखाना बना रही है तो आशा करने लगी कि राजेश उस दौरान बच्चे की देखभाल करे. मगर राजेश की तो नींद ही नहीं खुलती थी. बच्चा रोता, कपड़े गीले करता तो राजेश का पारा चढ़ जाता और वह बारबार रोमा को आवाजें लगाता. 3 महीने की लीव के बाद जब रोमा ने दोबारा अस्पताल जाना शुरू किया तो यह कह कर उस को बच्चा साथ ले जाने के लिए मजबूर किया गया, कि उस को हर 3 घंटे पर मां का दूध मिलना चाहिए.

दरअसल 8 से 10 घंटे बच्चे की जिम्मेदारी उठाने को न तो राजेश तैयार था और न उस के मातापिता. रोमा शाम 7 बजे जब बच्चे के साथ घर पहुंचती तब भी उस की सास से इतना नहीं होता कि वह उस के लिए एक प्याली चाय बना दे. रात का खाना भी रोमा को ही बनाना होता था.

एक दिन रोमा ने क्रेडिट कार्ड से अपने और अपने बेटे के लिए कुछ गर्म कपड़े खरीदे. अब चूंकि क्रेडिट कार्ड राजेश ने बनवा कर दिया था और उस में फ़ोन नंबर उसी का था, तो उस को तुरंत मैसेज आ गया. राजेश ने फोन कर के रोमा से पूछा – तुम कहां हो? क्या क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल किया है? ये 3500 रुपए का क्या खरीदा है? अस्पताल में ड्यूटी के लिए जाती हो, या मार्केटिंग करने?

Marriage Impact on Women (2)
सांकेतिक तस्वीर

इतने सारे सवाल और ताने सुन कर रोमा का सिर भन्ना गया. सोचने लगी – सुबह से शाम तक काम की चक्की मैं पिस रही हूं और अपनी कमाई से अपने लिए दो स्वैटर नहीं खरीद सकती, बच्चे के लिए बाबा सूट नहीं ले सकती? क्यों कर रही हूं इतनी मेहनत? दूसरी सुबह रोमा एक सूटकेस में अपने और बच्चे के कपड़े डाल कर अपने मायके चली गई. सब से पहला काम उस ने यह किया कि अपने बैंक में फोन कर के उस ने औनलाइन पैसा ट्रांसफर न करने की एप्लिकेशन दी और दूसरे बैंक में एक नया अकाउंट खोल कर सारा पैसा उस में ट्रांसफर करवाया.

उधर राजेश और उस का परिवार यह सोच रहा था कि गुस्सा है इसलिए मायके गई है. गुस्सा उतरने पर लौट आएगी मगर रोमा फिर वापस नहीं लौटी. राजेश ने कई चक्कर उस के घर के लगाए मगर हर बार रोमा ने लौटने से मना कर दिया. छह साल हो गए. न उस ने राजेश को तलाक दिया और न ससुराल से कोई वास्ता रखा. बेटे को अपनी तनख्वाह से पाल रही है और अपने परिवार में रह कर पहले से ज्यादा खुश है. अब उस के समय और उस की तनख्वाह पर सिर्फ उस का हक है. ससुराल में तो हर चीज पर हक़ खतम हो गया है. वहां जैसे वह बंधुआ मजदूर थी. शादी कर के तो उस की सारी आजादी ही छिन गई थी. वह बस कोल्हू का बैल बन कर रह गई थी. घर पर भी काम करो और बाहर भी काम करो.

कभी बीमार हो तो कोई हाल भी नहीं पूछता था. सास को तो लगता था काम न करने के बहाने बना रही है. मायके में हल्का सा सिर दर्द भी हो तो मां जबरदस्ती आराम करने के लिए कमरे में भेज देती है. बच्चे की भी सारी जिम्मेदारी मातापिता और छोटी बहन ने उठा रखी है. अब रोमा को न तो अस्पताल का काम कोई बोझ लगता है और न घर का.

सुनीता मिश्रा एक दैनिक अखबार की अच्छी रिपोर्टर थी. पत्रकारिता की दुनिया में उस की कुछ खबरों ने काफी चर्चा पाई. उस को बड़े चैनल में काम करने की बड़ी ख्वाहिश थी. इस के लिए उस ने काफी मेहनत भी की. मेहनत रंग लाई और एक राष्ट्रीय चैनल में उस को नियुक्ति मिल गई. वहां अपना हुनर और अनुभव दिखाने का उसे अच्छा मौका भी मिला. अपना असाइनमैंट पूरा करने के लिए वह दिन और रात नहीं देखती थी. शहर से बाहर जा कर रिपोर्टिंग करनी हो तो भी हर वक्त वह तैयार रहती थी. पत्रकारिता में उस का भविष्य बहुत उज्जवल था, मगर इसी बीच उस की शादी हो गई.

शादी के बाद उस के देर शाम या रात में किसी न्यूज को कवर करने जाने पर पति और सास रोकटोक करने लगे. सास कहती – अपनी ड्यूटी दिन की ही लगवाया करो. हमारे यहां लड़कियां शाम के बाद घर से बाहर नहीं रहती हैं. धीरेधीरे सुनीता का फील्ड वर्क सिमटने लगा. उस के अनुभव, उस का हुनर सब डिब्बा बंद होने लगे. पत्रकारिता में उज्जवल भविष्य पर ग्रहण लग गया. फिर उस ने डेस्क वर्क ले लिया. मगर हर समय शहर भर में खबरों की तलाश में उड़ने वाली सुनीता डेस्क पर ज्यादा दिन नहीं बैठ पाई और उसने नौकरी से रिजाइन कर दिया. आजकल वह घर में रहती है और एक घरेलू नौकर वाले सारे काम करती है.

Marriage Impact on Women (4)
सांकेतिक तस्वीर

हमारे भारतीय समाज में शादी के बाद उच्च शिक्षा प्राप्त और अच्छी नौकरी कर रही महिलाओं की आजादी सिमट जाती है या पूरी तरह खत्म हो जाती है. उन के काम करने के तरीके, कार्यालय में बिठाए घंटे, फील्ड वर्क, यहां तक कि घर से बाहर आनेजाने पर भी पति और परिवार के सदस्य अनकहेकहे प्रतिबंध लगाने लगते हैं. यह नियंत्रण केवल व्यवहार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सोच और निर्णय क्षमता पर भी असर डालता है. परिणामस्वरूप महिला की कार्यक्षमता का ह्रास होने लगता है और वह अपने ज्ञान, अनुभव और अपनी क्षमताओं का पूरा उपयोग नहीं कर पाती है.

लगातार दबाव और अपेक्षाओं के बोझ तले दबी महिला एक समय ऐसा महसूस करने लगती है मानों वह घर और दफ्तर, दोनों जगह केवल जिम्मेदारियां निभाने की मशीन बन कर रह गई हो. घर में उस से आदर्श बहू, पत्नी और एक अच्छी मां की भूमिका निभाने की उम्मीद की जाती है, वहीं दफ्तर में वही प्रदर्शन, वही लक्ष्य और वही प्रतिस्पर्धा बनी रहती है. इस दोहरे बोझ के बीच उस की अपनी इच्छाएं, सपने और पहचान कहीं खोने लगते हैं.

तनाव, अपराधबोध और आत्मग्लानि के इस चक्र में फंसी महिला धीरेधीरे खुद को घर की नौकरानी समझने लगती है, जिस का काम केवल सब को संतुष्ट रखना है. जब सहयोग के बजाय सवाल, शक और नियंत्रण मिलते हैं, तो काम बोझ बन जाता है. अंततः वह या तो नौकरी छोड़ देती है, ताकि घर की शांति बनी रहे, या फिर आत्मसम्मान की रक्षा के लिए रिश्ते से बाहर निकलने का कठिन निर्णय लेती है.

यह स्थिति केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक समस्या है. एक तरफ हम महिलाओं की शिक्षा, आत्मनिर्भरता और सशक्तिकरण के नारे लगाते हैं, दूसरी तरफ़ विवाह के बाद उन से त्याग, चुप्पी और सीमित दायरों में सिमट जाने की अपेक्षा करते हैं. यह दोहरा मापदंड न केवल महिला के व्यक्तित्व को कुचलता है, बल्कि समाज की प्रगति को भी बाधित करता है.

समाधान नियंत्रण में नहीं, सहयोग में है, साझेदारी में है. पति और परिवार यदि महिला के काम को सम्मान दें, उस के समय और पेशेवर आवश्यकताओं को समझें, तो न केवल महिला की क्षमता खिल कर सामने आएगी, बल्कि परिवार और समाज दोनों समृद्ध होंगे. यदि घर के भीतर निर्णय साझा हों, जिम्मेदारियां बराबरी से बंटी हों और महिला को अपने करियर के लिए स्वतंत्र वातावरण मिले, तो उस की क्षमता पूरे आत्मविश्वास के साथ खिल कर सामने आती है.

इस का लाभ केवल महिला तक सीमित नहीं रहता बल्कि उस का पूरा परिवार आर्थिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से अधिक सशक्त होता है, और समाज को एक जागरूक, संतुलित और उत्पादक नागरिक मिलती है. असल जरूरत सोच में बदलाव की है, जहां शादी किसी महिला की उड़ान के पंख न कतर दे, बल्कि उसे और ऊंचा उड़ने का भरोसा दे. Marriage Impact on Women

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें