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Romantic Story in Hindi : गलती का एहसास – कैसे हुआ अनीता को अपनी गलती का एहसास?

Romantic Story in Hindi : सौरभ दफ्तर के काम में बिजी था कि अचानक मोबाइल फोन की घंटी बजी. मोबाइल की स्क्रीन पर कावेरी का नाम देख कर उस का दिल खुशी से उछल पड़ा.

कावेरी सौरभ की प्रेमिका थी. उस ने मोबाइल फोन पर ‘हैलो’ कहा, तो उधर से कावेरी की आवाज आई, ‘तुम्हारा प्यार पाने के लिए मेरा मन आज बहुत बेकरार है. जल्दी से घर आ जाओ.’

‘‘तुम्हारा पति घर पर नहीं है क्या?’’ सौरभ ने पूछा.

‘नही,’ उधर से आवाज आई.

‘‘वह आज दफ्तर नहीं आया, तो मुझे लगा कि वह छुट्टी ले कर तुम्हारे साथ मौजमस्ती कर रहा है,’’ सौरभ मुसकराते हुए बोला.

‘ऐसी बात नहीं है. वह कुछ जरूरी काम से अपने एक रिश्तेदार के घर आसनसोल गया है. रात के 10 बजे से पहले लौट कर नहीं आएगा, इसीलिए मैं तुम्हें बुला रही हूं. तनमन की प्यास बुझाने के लिए हमारे पास अच्छा मौका है. जल्दी से यहां आ जाओ.’

‘‘मैं शाम के साढ़े 4 बजे तक जरूर आ जाऊंगा. जिस तरह तुम मेरा प्यार पाने के लिए हर समय बेकरार रहती हो, उसी तरह मैं भी तुम्हारा प्यार पाने के लिए बेकरार रहता हूं.

‘‘तुम्हारे साथ मुझे जो खुशी मिलती है, वैसी खुशी अपनी पत्नी से भी नहीं मिलती है. हमबिस्तरी के समय वह एक लाश की तरह चुपचाप पड़ी रहती है, जबकि तुम प्यार के हर लमहे में खरगोश की तरह कुलांचें मारती हो. तुम्हारी इसी अदा पर तो मैं फिदा हूं.’’

थोड़ी देर तक कुछ और बातें करने के बाद सौरभ ने मोबाइल फोन काट दिया और अपने काम में लग गया.

4 बजे तक उस ने अपना काम निबटा लिया और दफ्तर से निकल गया.

सौरभ कावेरी के घर पहुंचा. उस समय शाम के साढ़े 4 बज गए थे. कावेरी उस का इंतजार कर रही थी.

जैसे ही सौरभ ने दरवाजे की घंटी बजाई, कावेरी ने झट से दरवाजा खोल दिया. मानो वह पहले से ही दरवाजे पर खड़ी हो.

वे दोनों वासना की आग से इस तरह झुलस रहे थे कि फ्लैट का मेन दरवाजा बंद करना भूल गए और झट से बैडरूम में चले गए.

कावेरी को बिस्तर पर लिटा कर सौरभ ने उस के होंठों को चूमा, तो वह भी बेकरार हो गई और सौरभ के बदन से मनमानी करने लगी.

जल्दी ही उन दोनों ने अपने सारे कपड़े उतारे और धीरेधीरे हवस की मंजिल की तरफ बढ़ते चले गए.

अभी वे दोनों मंजिल पर पहुंच भी नहीं पाए थे कि किसी की आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘यह सब क्या हो रहा है?’’

वे दोनों घबरा गए और झट से एकदूसरे से अलग हो गए.

सौरभ ने दरवाजे की तरफ देखा, तो बौखला गया. दरवाजे पर कावेरी का पति जयदेव खड़ा था. उस की आंखों से अंगारे बरस रहे थे.

उन दोनों को इस बात का एहसास हुआ कि उन्होंने मेन दरवाजा बंद नहीं किया था.

कावेरी ने झट से पलंग के किनारे रखे अपने कपड़े उठा लिए. सौरभ ने भी अपने कपड़े उठाए, मगर जयदेव ने उन्हें पहनने नहीं दिया.

जयदेव उन को गंदीगंदी गालियां देते हुए बोला, ‘‘मैं चुप रहने वालों में से नहीं हूं. अभी मैं आसपड़ोस के लोगों को बुलाता हूं.’’

कावेरी ने जयदेव के पैर पकड़ लिए. उस ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘प्लीज, मुझे माफ कर दीजिए. अब ऐसी गलती कभी नहीं करूंगी.’’

‘‘मैं तुम्हें हरगिज माफ नहीं कर सकता. तुम तो कहती थीं कि मैं कभी किसी पराए मर्द को अपना बदन छूने नहीं दूंगी. फिर अभी सौरभ के साथ क्या कर रही थीं?’’

कावेरी कुछ कहती, उस से पहले जयदेव ने सौरभ से कहा, ‘‘तुम तो अपनेआप को मेरा अच्छा दोस्त बताते थे. यही है तुम्हारी दोस्ती? दोस्त की पत्नी के साथ रंगरलियां मनाते हो और दोस्ती का दम भरते हो. मैं तुम्हें भी कभी माफ नहीं करूंगा.

‘‘फोन कर के मैं तुम्हारी पत्नी को बुलाता हूं. उसे भी तो पता चले कि उस का पति कितना घटिया है. दूसरे की पत्नी के साथ हमबिस्तरी करता है.’’

‘‘प्लीज, मुझे माफ कर दो. मेरी पत्नी को कावेरी के बारे में पता चल जाएगा, तो वह मुझे छोड़ कर चली जाएगी.

‘‘मैं कसम खाता हूं कि अब कभी कावेरी से संबंध नहीं बनाऊंगा,’’ सौरभ ने गिड़गिड़ाते हुए कहा.

सौरभ के गिड़गिडाने का जयदेव पर कोई असर नहीं हुआ. उस ने सौरभ से कहा, ‘‘मैं तुम दोनों को कभी माफ नहीं कर सकता. तुम दोनों की करतूत जगजाहिर करने के बाद आज ही कावेरी को घर से निकाल दूंगा. उस के बाद तुम्हारी जो मरजी हो, वह करना. कावेरी से संबंध रखना या न रखना, उस से मुझे कोई लेनादेना नहीं.’’

जयदेव चुप हो गया, तो कावेरी फिर गिड़गिड़ा कर उस से माफी मांगने लगी. सौरभ ने भी ऐसा ही किया. जयदेव के पैर पकड़ कर उस से माफी मांगते हुए कहा कि अगर वह उसे माफ नहीं करेगा, तो उस के पास खुदकुशी करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं रह जाएगा, क्योंकि वह अपनी पत्नी की नजरों में गिर कर नहीं जी पाएगा.

आखिरकार जयदेव पिघल गया. उस ने सौरभ से कहा, ‘‘मैं तुम्हें माफ तो नहीं कर सकता, मगर जबान बंद रखने के लिए तुम्हें 3 लाख रुपए देने होंगे.’’

‘‘3 लाख रुपए…’’ यह सुन कर सौरभ की घिग्घी बंध गई. उस का सिर भी घूमने लगा.

बात यह थी कि सौरभ की माली हालत ऐसी नहीं थी कि वह जयदेव को 3 लाख रुपए दे सके. उसे जितनी तनख्वाह मिलती थी, उस से परिवार का गुजारा तो चल जाता था, मगर बचत नहीं हो पाती थी.

सौरभ ने अपनी माली हालत के बारे में जयदेव को बताया, मगर वह नहीं माना. उस ने कहा, ‘‘तुम्हारी माली हालत से मुझे कुछ लेनादेना नहीं है. अगर तुम मेरा मुंह बंद रखना चाहते हो, तो रुपए देने ही होंगे.’’

सौरभ को समझ नहीं आ रहा था कि वह इस मुसीबत से कैसे निबटे?

सौरभ को चिंता में पड़ा देख कावेरी उस के पास आ कर बोली, ‘‘तुम इतना सोच क्यों रहे हो? रुपए बचाने की सोचोगे, तो हमारी इज्जत चली जाएगी. लोग हमारी असलियत जान जाएंगे.

‘‘तुम खुद सोचो कि अगर तुम्हारी पत्नी को सबकुछ मालूम हो जाएगा, तो क्या वह तुम्हें माफ कर पाएगी?

‘‘वह तुम्हें छोड़ कर चली जाएगी, तो तुम्हारी जिंदगी क्या बरबाद नहीं हो जाएगी? मेरी तो कोई औलाद नहीं है. तुम्हारी तो औलाद है, वह भी बेटी. अभी उस की उम्र भले ही 6 साल है, मगर बड़ी होने के बाद जब उसे तुम्हारी सचाई का पता चलेगा, तो सोचो कि उस के दिल पर क्या गुजरेगी. तुम से वह इतनी ज्यादा नफरत करने लगेगी कि जिंदगीभर तुम्हारा मुंह नहीं देखेगी.’’

सौरभ पर कावेरी के समझाने का तुरंत असर हुआ. वह जयदेव को 3 लाख रुपए देने के लिए राजी हो गया, मगर इस के लिए उस ने जयदेव से एक महीने का समय मांगा. कुछ सोचते हुए जयदेव ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें एक महीने की मुहलत दे सकता हूं, मगर इस के लिए तुम्हें कोई गारंटी देनी होगी.’’

‘‘कैसी गारंटी?’’ सौरभ ने जयदेव से पूछा.

‘‘मैं कावेरी के साथ तुम्हारा फोटो खींच कर अपने मोबाइल फोन में रखूंगा. बाद में अगर तुम अपनी जबान से मुकर जाओगे, तो फोटो सब को दिखा दूंगा.’’

मजबूर हो कर सौरभ ने जयदेव की बात मान ली. जयदेव ने कावेरी के साथ सौरभ का बिना कपड़ों वाला फोटो खींच कर अपने मोबाइल में सेव कर लिया.

शाम के 7 बजे जब सौरभ कावेरी के फ्लैट से बाहर आया, तो बहुत परेशान था. वह लगातार यही सोच रहा था कि 3 लाख रुपए कहां से लाएगा?

सौरभ कोलकाता का रहने वाला था. उलटाडांगा में उस का पुश्तैनी मकान था. उस की शादी अनीता से तकरीबन 8 साल पहले हुई थी.

सौरभ की पत्नी अनीता भी कोलकाता की थी. अनीता जब बीए के दूसरे साल में थी, तभी उस के मातापिता ने उस की शादी सौरभ से कर दी थी. सौरभ ने उस की पढ़ाई छुड़ा कर उसे घर के कामों में लगा दिया. अनीता भी आगे नहीं पढ़ना चाहती थी, इसलिए तनमन से घर संभालने में जुट गई थी.

शादी के समय सौरभ के मातापिता जिंदा थे, मगर 2 साल के भीतर उन दोनों की मौत हो गई थी. तब से अनीता ने घर की पूरी जिम्मेदारी संभाल ली थी.

मगर शादी के 5 साल बाद अचानक सौरभ ने अपना मन अनीता से हटा लिया था और वह मनचाही लड़की की तलाश में लग गया था.

बात यह थी कि एक दिन सौरभ ने अपने दोस्त के घर ब्लू फिल्म देखी थी. उस के बाद उस का मन बहक गया था. ब्लू फिल्म की तरह उस ने भी मजा लेने की सोची थी.

उसी दिन दोस्त से ब्लू फिल्म की सीडी ले कर सौरभ घर आया. बेटी जब सो गई, तो टैलीविजन पर उस ने अनीता को फिल्म दिखाना शुरू किया.

कुछ देर बाद अनीता समझ गई कि यह कितनी गंदी फिल्म है. फिल्म बंद कर के वह सौरभ से बोली, ‘‘आप को ऐसी गंदी फिल्म देखने की लत किस ने लगाई?’’

‘‘मैं ने यह फिल्म आज पहली बार देखी है. मुझे अच्छी लगी, इसलिए तुम्हें दिखाई है कि फिल्म में लड़की ने अपने मर्द साथी के साथ जिस तरह की हरकतें की हैं, उसी तरह की हरकतें तुम मेरे साथ करो.’’

‘‘मुझ से ऐसा नहीं होगा. मैं ऐसा करने से पहले ही शर्म से मर जाऊंगी.’’

‘‘तुम एक बार कर के तो देखो, शर्म अपनेआप भाग जाएगी.’’

‘‘मुझे शर्म को भगाना नहीं, अपने साथ रखना है. आप जानते नहीं कि शर्म के बिना औरतें कितनी अधूरी रहती हैं. मेरा मानना है कि हर औरत को शर्म के दायरे में रह कर ही हमबिस्तरी करनी चाहिए.

‘‘आप अपने दिमाग से गंदी बातें निकाल दीजिए. हमबिस्तरी में अब तक जैसा चलता रहा है, वैसा ही चलने दीजिए. सच्चा मजा उसी में है. अगर मुझ पर दबाव बनाएंगे, तो मैं मायके चली जाऊंगी.’’

उस समय तो सौरभ की बोलती बंद हो गई, मगर उस ने अपनी चाहत को दफनाया नहीं. उस ने मन ही मन ठान लिया कि पत्नी न सही, कोई और सही, मगर वह मन की इच्छा जरूर पूरी कर के रहेगा.

उस के बाद सौरभ मनचाही लड़की की तलाश में लग गया. इस के लिए एक दिन उस ने अपने दोस्त रमेश से बात भी की. रमेश उसी कंपनी में था, जिस में वह काम करता था.

रमेश ने सौरभ को सुझाव दिया, ‘‘तुम्हारी इच्छा शायद ही कोई घरेलू औरत पूरी कर सके, इसलिए तुम्हें किसी कालगर्ल से संबंध बनाना चाहिए.’’

सौरभ को रमेश की बात जंच गई. कुछ दिन बाद उसे एक कालगर्ल मिल भी गई.

एक दिन सौरभ रात के 9 बजे कालगर्ल के साथ होटल में गया. वह कालगर्ल के साथ मनचाहा करता, उस से पहले ही होटल पर पुलिस का छापा पड़ गया. सौरभ गिरफ्तारी से बच न सका.

सौरभ ने पत्नी को बताया था कि एक दोस्त के घर पार्टी है. पार्टी रातभर चलेगी, इसलिए वह अगले दिन सुबह ही घर आ पाएगा या वहीं से दफ्तर चला जाएगा. इसी वजह से पत्नी की तरफ से वह बेखौफ था.

गिरफ्तारी की बात सौरभ ने फोन पर रमेश से कही, तो अगले दिन उस ने जमानत पर उसे छुड़ा लिया.

सौरभ को लगा था कि उस की गिरफ्तारी की बात कोई जान नहीं पाएगा. मगर ऐसा नहीं हुआ. न जाने कैसे धीरेधीरे दफ्तर के सारे लोगों को इस बात का पता चल गया. शर्मिंदगी से सौरभ कुछ दिनों तक अपने दोस्तों से नजरें नहीं मिला पाया, लेकिन 2-3 महीने बाद वह सामान्य हो गया. इस में उस के एक दोस्त जयदेव ने मदद की था.

जयदेव 6 महीने पहले ही पटना से तबादला हो कर यहां आया था. कालगर्ल मामले में सौरभ दफ्तर में बदनाम हो गया था, तो जयदेव ने ही उसे टूटने से बचाया था.

एक दिन जयदेव उसे अकेले में ले गया और तरहतरह से समझाया, तो उस ने अपने दोस्तों से मुकाबला करने की हिम्मत जुटा ली.

अब दफ्तर में सारे दोस्त सौरभ से पहले की तरह अच्छा बरताव करने लगे, तो सौरभ ने जयदेव की खूब तारीफ की और उस से दोस्ती कर ली.

दोस्ती के 6 महीने बीत गए, तो एक दिन जयदेव सौरभ को अपने घर ले गया.

जयदेव की पत्नी कावेरी को सौरभ ने देखा, तो उस की खूबसूरती पर लट्टू  हो गया.

कुछ देर तक कावेरी से बात करने पर सौरभ ने महसूस किया कि वह जितनी खूबसूरत है, उस से ज्यादा खुले विचार की है.

सौरभ जयदेव के घर से जाने लगा, तो कावेरी उसे दरवाजे पर छोड़ने आई. कावेरी उस से बोली, ‘जब भी मौका मिले, आप  बेखटक आइएगा. मुझे बहुत अच्छा लगेगा.’

उस समय जयदेव वहां पर नहीं था, इसलिए सौरभ ने मुसकराते हुए मजाकिया लहजे में कहा, ‘‘क्या मैं जयदेव की गैरहाजिरी में भी आ सकता हूं?’’

‘‘क्यों नहीं? आप का जब जी चाहे आ जाइएगा, मैं स्वागत करूंगी.’’

‘‘तब तो मैं जरूर आऊंगा. देखूंगा कि उस की गैरहाजिरी में आप मेरा स्वागत कैसे करती हैं?’’

‘‘जरूर आइएगा. देखिएगा, मैं आप को निराश नहीं होनें दूंगी. तनमन से स्वागत करूंगी. जो कुछ चाहिएगा, वह सबकुछ दूंगी. घर जा कर सौरभ कावेरी की बात भूल गया. भूलता क्यों नहीं? उस की बात को उस ने मजाक जो समझ लिया था.’’

एक हफ्ता बाद जयदेव के कहने पर सौरभ उस के घर फिर गया. मौका पा कर कावेरी ने उस से कहा, ‘‘आप तो अपने दोस्त की गैरहाजिरी में आने वाले थे? मैं इंतजार कर रही थी. आप आए क्यों नहीं? कहीं आप मुझ से डर तो नहीं गए?’’

सौरभ सकपका गया. वह कावेरी से कुछ कहता, उस से पहले वहां जयदेव आ गया. फिर तो चाह कर भी वह कुछ कह न सका.

उस के बाद सौरभ यह सोचने पर मजबूर हो गया कि कहीं कावेरी उसे चाहती तो नहीं है?

बेशक कावेरी उस की पत्नी से ज्यादा खूबसूरत थी, मगर वह उस के दोस्त की पत्नी थी, इसलिए वह कावेरी पर बुरी नजर नहीं रखना चाहता था. फिर भी वह उस के मन की चाह लेना चाहता था.

3 दिन बाद ही सुबहसवेरे दफ्तर से छुट्टी ले कर सौरभ कावेरी के घर पहुंच गया.

सौरभ को आया देख कावेरी चहक उठी, ‘‘मुझे उम्मीद नहीं थी कि मेरे रूप का जादू आप पर इतनी जल्दी असर करेगा.’’

सौरभ ने भी झट से कह दिया, ‘‘आप का जादू मुझ पर चल गया है, तभी तो मैं दोस्त की गैरहाजिरी में आया हूं.’’

‘‘आप ने बहुत अच्छा किया. देखिएगा, मैं आप को निराश नहीं करूंगी. मैं जानती हूं कि आप अपनी पत्नी से खुश नहीं हैं, वरना कालगर्ल के पास जाते ही क्यों? मैं आप को वह सबकुछ दे सकती हूं, जो अपनी पत्नी से आप को नहीं मिला.’’

सौरभ हैरान रह गया. उस ने कभी नहीं सोचा कि कोई औरत इस तरह खुल कर अपने दिल की बात किसी मर्द से कह सकती है.

सौरभ कावेरी से कुछ कहता, उस से पहले ही वह बोली, ‘‘आप मुझे बेहया समझ रहे होंगे. मगर ऐसी बात नहीं है. बात यह है कि मैं आप को अपना दिल दे बैठी हूं…

‘‘दरअसल, जिस तरह आप अपनी पत्नी से संतुष्ट नहीं हैं, उसी तरह मैं भी अपने पति से संतुष्ट नहीं हूं. जब मैं ने आप को देखा, तो न जाने क्यों मुझे लगा कि अगर आप मेरी जिंदगी में आ जाएंगे, तो मेरी प्यास भी बुझ जाएगी.’’

कावेरी को सौरभ ने बुरी नजर से कभी नहीं देखा था. मगर कावेरी ने जब उसे अपने दिल की बात कही, तो उसे लगा कि उस से संबंध बनाने में कोई बुराई नहीं है.

उस के बद सौरभ ने अपनेआप को आगे बढ़ने से रोका नहीं. झट से उस ने कावेरी को बांहों में भर लिया. उस के होंठों और गालों को चूम लिया.

कावेरी ने कोई विरोध नहीं किया. कुछ देर बाद वह बोली, ‘‘आप बैडरूम में चलिए, मैं दरवाजा बंद कर के आती हूं.’’

सौरभ बैडरूम में चला गया. दरवाजा बंद कर कावेरी बैडरूम में आई, तो सौरभ ने बगैर देर किए उसे बांहों में भर लिया. उस के बाद दोनों अपनीअपनी हसरतों को पूरा करने में लग गए.

सौरभ जैसा चाहता था, कावेरी ने ठीक उसी तरह से उस की हवस को शांत किया.

सौरभ ने कावेरी की तारीफ करते हुए कहा, ‘‘मुझे आप से जो प्यार मिला है, वह मैं कभी नहीं भूल सकता.’’

‘‘यही हाल मेरा भी है सौरभजी. मेरी शादी हुए 5 साल बीत गए हैं. देखने में मेरे पति हट्टेकट्टे भी हैं, मगर उन से मैं कभी संतुष्ट नहीं हुई. अब मैं आप से एक गुजारिश करना चाहिती हूं.’’

‘‘गुजारिश क्यों? हुक्म कीजिए. मैं आप की हर बात मानूंगा,’’ कहते हुए सौरभ ने कावेरी के होंठों को चूम लिया.

‘‘आप शादीशुदा हैं. मैं भी शादीशुदा हूं. हम चाह कर भी कभी एकदूसरे से शादी नहीं कर सकते, लेकिन मैं चाहती हूं कि हम दोनों का संबंध जिंदगीभर बना रहे. हम दोनों कभी जुदा न हों. क्या ऐसा हो सकता है?’’

कावेरी ने जैसे उस के दिल की बात कह दी हो, इसलिए झट से उस ने कहा, ‘‘क्यों नहीं हो सकता. मैं भी तो यही चाहता हूं.’’

उस दिन के बाद जब भी मौका मिलता, सौरभ दफ्तर न जा कर कावेरी के घर चला जाता था.

इस तरह 4 महीने बीत गए. इस बीच सौरभ ने 7-8 बार कावेरी से हमबिस्तरी की. हर बार कावेरी ने उसे पहले से ज्यादा मस्ती दी.

सौरभ ने यह मान लिया था कि कावेरी के साथ उस का संबंध जिंदगीभर चलेगा. दोनों के बीच कोई दीवार नहीं आएगी, मगर उस का सोचा नहीं हुआ. आज जो कुछ भी हुआ, उस की सोच से परे था.

सौरभ अपने घर आया, तो वह बहुत परेशान था. अनीता ने उस की परेशानी ताड़ ली. अनीता ने उस से पूछ लिया, ‘‘क्या बात है? आप बहुत परेशान दिखाई दे रहे हैं?’’

सौरभ ने बहाना बना दिया, ‘‘परेशान नहीं हूं. थका हुआ हूं.’’

सौरभ ने अनीता पर शक तो नहीं होने दिया, मगर उसी दिन से उस की सुखशांति छीन गई. दिनरात वह इस फिराक में रहने लगा कि 3 लाख रुपए का इंतजाम वह कैसे करे?

25 दिन बीत गए, मगर रुपए का इंतजाम नहीं हुआ, तो सौरभ ने मकान पर रुपए लेने का फैसला किया.

सौरभ मकान पर रुपए लेता, उस से पहले अनीता को सबकुछ मालूम हो गया. वह चुप रहने वालों में से नहीं थी.  वह सौरभ से बोली, ‘‘मुझे पता चला है कि आप मकान पर 3 लाख रुपए लेना चाहते हैं. सच बताइए कि रुपए की ऐसी क्या जरूरत आ पड़ी कि आप को मकान गिरवी रखना पड़ रहा है? कहीं आप किसी बजारू लड़की के चक्कर में तो नहीं पड़ गए हैं.’’

सौरभ घबरा गया. उस ने सच छिपाने की बहुत कोशिश की, लेकिन अनीता के सामने उस की एक न चली.

‘‘मैं जानती थी कि आप का शौक एक दिन आप को डुबो देगा.’’

‘‘कैसा शौक?’’ सौरभ हकला गया.

‘‘ब्लू फिल्म की तरह हरकतें करने का शौक,’’ सौरभ हैरान रह गया.

‘‘मैं जानती हूं कि आप अपना शौक पूरा करने के लिए कालगर्ल के साथ होटल में गए थे. वहां रेड पड़ी और पुलिस ने आप को गिरफ्तार कर लिया. अगले दिन आप के दोस्त ने आप को जमानत पर छुड़ाया. मैं ने आप से इसलिए कुछ नहीं कहा कि शर्मिंदगी से आप मुझ से नजरें नहीं मिला पाएंगे.’’

अब सौरभ ने भी अपनी गलती मानने मे देर नहीं की. कावेरी के साथ अपने नाजायज संबंध के बारे में सबकुछ बताने के बाद अनीता से उस ने माफी मांगी. उस से कहा कि वह ऐसी गलती नहीं करेगा.

‘‘मैं तो आप को माफ करूंगी ही, क्योंकि मैं अपना घर तोड़ना नहीं चाहती. मगर सवाल है कि कावेरी के चक्रव्यूह से आप कैसे निकलेंगे?’’

‘‘कैसा चक्रव्यूह?’’

‘‘आप अभी तक यही समझ रहे हैं कि कावेरी के साथ हमबिस्तरी करते समय उस के पति ने आप को अचानक देख लिया और आप के साथ सौदा कर लिया?’’

‘‘मैं तो यही समझ रहा हूं,’’ सौरभ बोला.

लेकिन सच यह नहीं है. मेरी सोच यह है कि कावेरी और उस के पति ने मिल कर आप को फंसाया है. अगर ऐसा नहीं होता, तो उस का पति आप के साथ सौदा क्यों करता? पत्नी की बेवफाई देख कर उसे अपने घर से निकाल देता या माफ कर देता. आप के साथ सौदा किसी भी हाल में नहीं करता.’’

कुछ सोचते हुए अनीता ने कहा, ‘‘जो होना था, वह तो हो गया. अब आप चिंता मत कीजिए. कावेरी के चक्रव्यूह से मैं आप को निकालूंगी.’’

‘‘आप तो जानते ही हैं कि मेरा मौसेरा भाई जयंत पुलिस इंस्पैक्टर है. जब उसे सारी बात बताऊंगी, तो वह हकीकत का पता लगा लेगा और सबकुछ ठीक भी कर देगा.’’

उसी दिन अनीता सौरभ के साथ जयंत से मिली. सारी बात जानने के बाद जयंत अगले दिन से छानबीन में जुट गया.

4 दिन बाद जयंत ने अनीता को फोन पर कहा, ‘‘छानबीन करने के बाद मैं ने जयदेव और कावेरी को गिरफ्तार कर लिया है. दोनों ने अपनाअपना गुनाह कबूल कर लिया है. अब जीजाजी को किसी से डरने की जरूरत नहीं है.

‘‘दरअसल, जयदेव और कावेरी का यही ध्ांधा था. कोलकाता से पहले दोनों पटना में थे. वहां कई लोगों को अपना शिकार बनाने के बाद जयदेव ने अपना ट्रांसफर कोलकाता करा लिया था.

‘‘जब जीजाजी को कालगर्ल के साथ पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था, तो उन के दफ्तर के ही किसी ने थाने में उन्हें देख लिया और दफ्तर में सब को बता दिया.

‘‘दफ्तर बदनाम हो गया, तो जयदेव ने उन्हें अपना अगला शिकार बनाने का फैसला कर लिया.

‘‘अपनी योजना के तहत जयदेव ने पहले जीजाजी से दोस्ती की, उस के बाद उन्हें अपनी पत्नी कावेरी से मिलाया.

‘‘उस के बाद कावेरी ने अपना खेल शुरू किया. उस ने जीजाजी पर अपने रूप का जादू चलाया और उन के साथ वही सब किया, जो अब तक औरों के साथ करती आई थी.’’

जयदेव और कावेरी की सचाई जानने के बाद सौरभ ने राहत की सांस ली. अनीता को अपनी बांहों में भर कर उस की खूब तारीफ की.

अनीता ने भी सौरभ को निराश नहीं किया. रात में बिस्तर पर उस ने शर्म छोड़ कर उस के साथ वैसा ही सबकुछ किया, जिस की चाह में वह कावेरी के चंगुल में फंस गया था.

भरपूर मजे के बाद सौरभ ने अनीता से कहा, ‘‘तुम तो सबकुछ कर सकती हो, फिर उस दिन जब मैं ने ऐसा करने के लिए कहा था, तो मना क्यों किया था?’’

‘‘सिर्फ मैं ही नहीं, हर पत्नी अपने पति के साथ ऐसा कर सकती है, मगर सभी ऐसा करती नहीं हैं, कुछ ही करती हैं.’’

‘‘जिस तरह मेरा मानना है कि औरतों को शर्म के दायरे में रह कर हमबिस्तरी करनी चाहिए, उसी तरह बहुत सी पत्नियां ऐसा मानती हैं. इसी वजह से बहुत सी पत्नियां ब्लू फिल्म की तरह हरकतें नहीं करतीं.’’

‘‘मैं ने आज शर्म की दीवार तोड़ कर आप का मनचाहा तो कर डाला, मगर बराबर नहीं कर सकती, क्यों कि मुझे बेहद शर्म आती है.’’

अनीता के चुप होते ही सौरभ ने कहा, ‘‘अब इस की जरूरत भी नहीं है. मैं समझ गया कि गलत चाहत में लोग बरबाद हो जाते हैं. मैं अपनी गलत चाहत को आदत नहीं बनाना चाहता, इसलिए हमबिस्तरी के समय वैसा ही सबकुछ चलेगा, जैसा अब तक चलता रहा है.’’

अनीता खुशी से सौरभ से लिपट गई. सौरभ ने भी उसे अपनी बांहों में कस लिया. Romantic Story in Hindi

Satirical Story In Hindi : ऐसी मांगने वालियों से तोबा

Satirical Story In Hindi : अभी मेरी नींद खुली ही थी कि मधुरिमा की मधुर आवाज सुनाई दी. वास्तव में यह खतरे की घंटी थी. मैं अपना मोरचा संभालती, इस से पहले ही स्थूल शरीर की वह स्वामिनी अंदर पहुंच चुकी थी. मैं अपने प्रिय प्रधानमंत्री की मुद्रा में न चाहते हुए भी मुसकरा कर खड़ी हो गई. वह आते ही शुरू हो गईं, ‘‘अरे, नीराजी, आप सो कर उठी हैं? आप की तबीयत ठीक नहीं लग रही. अभी मैं सिरदर्द की दवा भेज देती हूं. और हां, भाई साहब और छोटी बिटिया नहीं दिख रहे?’’

मैं जबरदस्ती मुलायमियत ला कर बोल पड़ी, ‘‘यह तो अभी स्नानघर में हैं और बिटिया सोई है.’’ ‘‘आप की बिटिया तो कमाल की है. बड़ी होशियार निकलेगी. और हां, खाना तो बनाना शुरू नहीं किया होगा.’’

मैं उन की भूमिका का अभिप्राय जल्दी जानना चाह रही थी. सारा काम पड़ा था और यह तो रोज की बात थी. ‘‘नहीं, शुरू तो नहीं किया, पर लगता है आप के सारे काम हो गए.’’ ‘‘ओह हो,’’ मधुरिमा हंस कर बोलीं, ‘‘नहीं, मैं तो रोज दाल बनाती हूं न.’’

मैं ने आश्चर्य से कहा, ‘‘दाल तो मैं भी रोज बनाती हूं.’’ ‘‘पर मैं तो दाल में जीरे का छौंक लगाती हूं.’’

‘‘वह तो मैं भी करती हं, इस में नई बात क्या है?’’ ‘‘वह क्या है, नीराजी कि आज दाल बनाने के बाद डब्बा खोला तो जीरा खत्म हो गया था. सोचा, आप ही से मांग लूं,’’ मधुरिमा ने अधिकार से कहा. फिर बड़ी आत्मीयता से मेरी पत्रिकाएं उलटने लगीं.

मैं ने तो सिर पकड़ लिया. थोड़ा सा जीरा मांगने में इतनी भूमिका? खैर, यह तो रोज का धंधा था. मुझे तो आदत सी पड़ गई थी. यह मेरे घर के पास रहती हैं और मेरी सभी चीजों पर अपना जन्मसिद्ध अधिकार जताती हैं. इस अधिकार का प्रयोग इन्होंने दूसरों के घरों पर भी किया था, पर वहां इन की दाल नहीं गली. और फिर संकोचवश कुछ न कहने के कारण मैं बलि का बकरा बना दी गई. अब तो यह हालत है कि मेरी चीजें जैसे इस्तिरी, टोस्टर वगैरह इन्हीं के पास रहते हैं. जब मुझे जरूरत पड़ती है तो कुछ देर के लिए उन के घर से मंगवा कर फिर उन्हीं को वापस भी कर देती हूं क्योंकि जानती हूं कुछ ही क्षणों के बाद फिर मधुर आवाज में खतरे की घंटी बजेगी. भूमिका में कुछ समय बरबाद होगा और मेरा टोस्टर फिर से उन के घर की शोभा बढ़ाएगा.

पूरे महल्ले में लोग इन की आदतों से परिचित हैं. और घर में इन के प्रवेश से ही सावधान हो जाते हैं. यह निश्चित है कि यह कोई न कोई वस्तु अपना अधिकार समझ कर ले जाएंगी. फिर शायद ही वह सामान वापस मिले. सुबह होते ही यह स्टील की एक कटोरी ले कर किसी न किसी घर में या यों कहिए कि अकसर मेरे ही घर में प्रवेश करती हैं. मैं न चाहते हुए भी शहीद हो जाती हूं. यह बात नहीं कि इन की आर्थिक स्थिति खराब है या इन में बजट बनाने की या गृहस्थी चलाने की निपुणता नहीं है. यह हर तरह से कुशल गृहिणी हैं. हर माह सामान एवं पैसों की बचत भी कर लेती हैं. पति का अच्छा व्यवसाय है. 2 बेटे अच्छा कमाते भी हैं. बेटी पढ़ रही है. खाना एवं कपड़े भी शानदार पहनती हैं. फिर भी न जाने क्यों इन्हें मांगने की आदत पड़ चुकी है. जब तक कुछ मांग नहीं लेतीं तब तक इन के हाथ में खुजली सी होती रहती है.

इन की महानता भी है कि जब आप को किसी चीज की अचानक जरूरत आ पड़े और इन से कुछ मांग बैठें तो सीधे इनकार नहीं करेंगी. अपनी आवाज में बड़ी चतुराई से मिठास घोल कर आप को टाल देंगी और आप को महसूस भी नहीं होने देंगी. पहले तो आप का व परिवार का हालचाल पूछती हुई जबरदस्ती बैठक में बैठा लेंगी. फिर चाय की पत्ती में आत्मीयता घोल कर आप को जबरन चाय पिला देंगी. आप रो भी नहीं सकतीं और हंस भी नहीं सकतीं. असमंजस में पड़ कर उन की मिठास को मापती हुई घर लौट जाएंगी.

इधर कुछ दिनों से मैं इन की आदतों से बहुत परेशान हो गई थी. मेरे पास चीनी कम भी होती तो उन के मांगने पर देनी ही पड़ती. इस से मेरी दिक्कतें बढ़ जातीं. दूध कम पड़ने पर भी वह बड़े अधिकार से ले जातीं. पहले तो मेरे घर पर न होने पर वह मेरे नौकर से कुछ न कुछ मांग ले जाती थीं. अब खुद रसोई में जा कर अपनी आवश्यकता के अनुसार, हलदी, तेल वगैरह अपनी कटोरी में निकाल लेती हैं. इस बीच अगर मैं लौट आई तो मुझ पर मधुर मुसकान फेंकती हुई आगे बढ़ जाती हैं. अदा ऐसी, मानो कोई एहसान किया हो मुझ पर. मैं तो बिलकुल आज की पुलिस की तरह हाथ बांध कर अपनी चीजों का ‘सती’ होना देखती रहती. उन के चले जाने पर पति से इस की चर्चा जरूर करती पर झुंझलाती खुद पर ही. मेरा बजट भी गड़बड़ाने लगा, सामान भी जल्दी खत्म होने लगा.

होली के दिन तो गजब ही हो गया. मैं जल्दीजल्दी पुए, पूरियां, मिठाई वगैरह बना कर मेज पर सजा रही थी. मेहमान आने ही वाले थे. इधर मेहमान आने शुरू हुए उधर मधुरिमा खतरे की घंटी बजाती हुई आ पहुंचीं. दृढ़ निश्चय कर के मैं अपना मोरचा संभालती कि उन्होंने एक प्यारी सी मुसकान मुझ पर थोप दी और मेरी मदद करने लगीं. मैं भीतर ही भीतर मुलायम पड़ने लगी. सोचा, आज होली का दिन है, शायद आज कुछ नहीं मांगेंगी. पर थोड़ी भूमिका के बाद उन्होंने भेद भरे स्वर में मुझे अलग कमरे में बुलाया. मैं शंकित मन से उधर गई. उन्होंने अधिकारपूर्वक मुझ से कहा, ‘‘नीराजी, आज तो पिंकू के पिताजी बैंक नहीं जा सकते. कुछ रुपए, यही करीब 200 तक मुझे दे दो. मैं कल ही लौटा दूंगी.’’

मेरे ऊपर तो वज्र गिर पड़ा. मैं इनकार करती, इस के पहले ही वह बोल पड़ीं, ‘‘नीरा बहन, तुम तो दे ही दोगी. मैं जानती थी.’’ मैं असमंजस में थी. वह फिर बोलीं, ‘‘देखो, जल्दी करना. तुम रुपए निकालो, तब तक मैं रसोई से 1 किलो चीनी ले आती हूं. थैली मेरे पास है. आज मेवों की गुझिया बनाने की सोच रही हूं. तुम लोगों को भी चखने को दे जाऊंगी.’’

मैं अभी कुछ कहना ही चाहती थी कि और भी मेहमान आ पहुंचे. मैं ने जल्दी से पर्स से 200 रुपए निकाले. सोचा, आगे देखा जाएगा. मधुरिमा ने जल्दी से रुपए लपक लिए और रसोई की ओर चली गईं. मैं इधर मेहमानों में फंस गई. 1 घंटे के बाद जब सारे मेहमान चले गए तो फिर वह आईं. मैं गुस्से से कुछ कहने ही वाली थी कि उन्होंने मोहक मुसकान फेंक कर कहा, ‘‘नीराजी, आप मालपुए बहुत अच्छे बनाती हैं. सोचा, चख लूं.’’

मैं ठंडी पड़ गई, ‘‘हांहां, क्यों नहीं?’’ थोड़े से मालपुए बचे थे. कुछ निकाल कर मैं ने उन्हें दिए.

‘‘नहीं, नीराजी, मैं तो बस थोड़ा सा चख लूंगी,’’ यह कह कर उन्होंने पूरा खाना खाया. फिर बोलीं, ‘‘वाह, बहुत स्वादिष्ठ हैं. अभी मैं बच्चों को बुला कर लाती हूं. वे भी थोड़ा चख लेंगे. फिर रात को पूरा खाना खाने हम लोग आएंगे’’ मेरी आंखों के आगे तो पूरी पृथ्वी घूम गई. अभी इस आघात से उबर भी नहीं पाई थी कि वह सपरिवार चहकते हुए आ पहुंचीं. साथ में फफूंदी लगा आम का मरियल सा अचार एक छोटी कटोरी में था. पति व बिटिया मेहमानों को छोड़ने बस अड्डे गए थे. सोचा, आज हमारा उपवास ही सही. किसी तरह लड़खड़ाते कदमों से रसोई की ओर बढ़ी.

पर उस से पहले मधुरिमा ने कहा, ‘‘आप बैठिए, नीराजी. थक गई होंगी. मैं निकाल लेती हूं.’’ मेरे मना करतेकरते उन्होंने सारी बचीखुची रसद निकाल कर बाहर की और सब लोग चखने बैठ गए.

मेरे हाथ में अचार की कटोरी थी और मैं मन ही मन सुलग रही थी. सोचा, कटोरी कूड़ेदान में फेंक दूं. खैर, सब लोग रात में खाना खाने का वादा कर के जल्दी ही मेरे पुए चख कर चले गए. मेरे लिए कुछ भी नहीं बचा था. पति के आने पर मैं ने सारी बातें कहीं. वह भी बहुत दिनों से इसी समस्या पर विचार कर रहे थे. पहले तो उन्होंने मेरी बेवकूफी पर मेरी ख्ंिचाई की. फिर होटल से ला कर खाना खाया. शाम तक वह कुछ विचार करते रहे और फिर रात में खुश हो कर मधुरिमा के आने से पहले ही हमें सैर कराने ले गए. बाहर ही हम ने खाना खा लिया. उन्होंने 10 दिन की छुट्टी ली. मैं ने कारण पूछा तो बोले कि समय पर सब जान जाओगी. मैं मूक- दर्शक बन कर अगली खतरे की घंटी का इंतजार करने लगी.

दूसरे दिन सुबह ही मधुरिमा अपनी चिरपरिचित मुद्रा में खड़ी हो गईं. मैं तो पहले ही अंदर छिप चुकी थी. आज मेरे पति ने मोरचा संभाला था. ‘‘अरे, भाई साहब, आप? नीराजी किधर गईं?’’

‘‘वह तो अपनी सहेली के घर गई हैं. मुझ से कह गई हैं कि आप के आने पर जो कुछ भी चाहिए आप को मैं दे दूं. बोलिए, क्या चाहती हैं आप?’’

मधुरिमा सकपका गईं. अपने जीवन में शायद पहली बार उन को इस तरह की बातों का सामना करना पड़ रहा था. वह रुकरुक कर बोलीं, ‘‘बात यह है, भाई साहब कि आज पिंकू के सिर में दर्द है. मैं तो खुद बाजार नहीं जा सकती. मिट्टी का तेल भी खत्म हो गया है. सोचा, आप से मांग लूं. मैं कनस्तर ले कर आई हूं. 4 लिटर दे दीजिए.’’ ‘‘देखिए, मधुरिमाजी, मैं अभी बाजार जा रहा हूं. आप पैसे दे दें. मैं अभी तेल ले आता हूं. मेरा भी खत्म हो चुका है,’’ मेरे पति ने हंस कर कहा.

अब तो मधुरिमा को काटो तो खून नहीं. मरियल आवाज में बोलीं, ‘‘रहने दीजिए, फिर कभी मंगवा लूंगी. अभी तो मुझे कहीं जाना है,’’ यह कह कर वह तेजी से चली गईं. मैं छिप कर देख रही थी और हंसहंस कर लोटपोट हो रही थी. 3-4 दिन चैन से गुजरे. मेरे वे 200 रुपए तो कभी लौटे नहीं. लेकिन खैर, एक घटना के बाद मुझे हमेशा के लिए शांति मिल गई. एक दिन सुबहसुबह फिर वह मुझे खोजती हुई सीधे मेरे कमरे में पहुंचीं. पर मैं तो पहले ही खतरे की घंटी सुन कर भंडारगृह में छिप गई थी. वह निराश हो कर वहीं बैठ गईं. मेरे पति ने अंदर आ कर उन को नमस्ते की और आने का कारण पूछा.

मधुरिमा ने सकपका कर कहा, ‘‘भाई साहब, नीराजी को बुला दीजिए. यह बात उन्हीं से कहनी थी.’’ ‘‘मधुरिमाजी, आप को मालूम नहीं, नीरा की बहन को लड़का हुआ है. इसलिए वह तड़के ही उठ कर शाहदरा अपनी बहन के पास गई हैं. अब तो कल ही लौटेंगी आप मुझ से ही अपनी समस्या कहिए.’’

पहले तो वह घबराईं. फिर कुछ सहज हो कर कहा, ‘‘भाई साहब, मेरे पति आप की बहुत तारीफ कर रहे थे. सचमुच आप जैसा पड़ोसी मिलना मुश्किल है.’’ ‘‘यह तो आप का बड़प्पन है.’’

‘‘नहींनहीं, सचमुच नीराजी भी बहुत अच्छी हैं. मेरे घर में तो सभी उन से बहुत प्रभावित हैं. इतना अच्छा स्वभाव तो कम ही देखनेसुनने को मिलता है.’’ मेरे पति आश्चर्य से उन्हें देख रहे थे और सोच रहे थे कि क्या यही बात इन को कहनी थी.

फिर मधुरिमा ने वाणी में मिठास घोल कर कहा, ‘‘भाई साहब, जब तक नीराजी नहीं आती हैं, मैं आप का खाना बना दिया करूंगी.’’ ‘‘जी शुक्रिया, खाना तो मैं खुद भी बना लेता हूं.’’

इस के बाद 1 घंटे तक वह भूमिका बांधती रहीं. पर असली बात बोलने का साहस ही नहीं कर पा रही थीं. अंत में उन्होंने मेरे पति से विदा मांगी. पर जैसे ही पति ने दरवाजा बंद करना चाहा, वह अचानक बोल पड़ीं, ‘‘भाई साहब, 50 रुपए यदि खुले हों तो दे दीजिए.’’ ‘‘अच्छा तो रुपए चाहिए थे. आप को पहले कहना चाहिए था. मैं आप को 50 के बदले 100 रुपए दे देता. पर आप ने मेरा समय क्यों बरबाद किया? खैर, कोई बात नहीं,’’ मेरे पति ने जल्दी से पर्स खोल कर 150 रुपए निकाले और कहा, ‘‘मैं आप को 150 रुपए दे रहा हं. मुझे वापस भी नहीं चाहिए. पर कृपया, हमारा समय बरबाद न किया करें.’’

मधुरिमा खिसियानी बिल्ली की तरह दरवाजे की लकड़ी को टटोलने लगीं.

‘‘भाई साहब, इतने रुपए देने की क्या जरूरत थी. मुझे तो बस…’’ ‘‘नहींनहीं, मधुरिमाजी, आप सब ले जाइए. मैं खुशी से दे रहा हूं. हां, कल मैं आप के घर खाना खाने आ रहा हूं. नीरा ने कहा था कल आप छोले बनाने वाली हैं. सचमुच आप बहुत स्वादिष्ठ छोले बनाती हैं. यहां से प्याज, अदरक आप खुशी से ले जा सकती हैं.’’

‘‘नहीं, भाई साहब, ऐसी कोई बात नहीं. कल ही तो स्वादिष्ठ खीर बनाई थी, पर बच्चों ने सारी खत्म कर दी. सोचा था, आप को जरूर खिलाऊंगी,’’ मेरे पति ने आश्चर्य से मुंह फैला कर कहा, ‘‘अच्छा फिर दूध, चावल और पतीला किस के घर से लिया था आप ने?’’ अब तो मधुरिमा का रुकना मुश्किल था, ‘‘अच्छा, भाई साहब, चलती हूं,’’ कहती हुई और बेचारगी से मुंह बना कर वह तेजी से घर की ओर भागीं.

उस दिन के बाद मधुरिमा ने मांगने की आदत छोड़ दी. इस घटना का जिक्र भी उन्होंने किसी से नहीं किया क्योंकि इस में उन की ही बेइज्जती का डर था. मेरे परिवार से नाराज भी नहीं हो सकीं क्योंकि इस से बात खुलने का डर था. फलस्वरूप उन से हमारे संबंध भी ठीक हैं और हम शांति से गुजरबसर कर रहे हैं. Satirical Story In Hindi

Satirical Story In Hindi : गोदीकरण से निराकरण – जनता की आंखों में क्यों आए आंसू?

Satirical Story In Hindi : सरकार ने सार्वजनिक घोषणा करते हुए ऐतिहासिक लालकिले को एक निजी समूह को गोद दे दिया है. सरकार का कहना है कि पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए ऐसा किया गया है. सरकारी गोदी में पहले से ही काफी टै्रफिक है, इसीलिए सरकार ने ट्रैफिक को निजी गोदी की तरफ डाइवर्ट करने के लिए यह कदम उठाया है. इस पर विपक्ष ने अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए सरकार के कदम पर सवाल उठाए हैं. सरकार के कदम और विपक्ष के सवालों के बीच की लयबद्धता, गणतंत्र दिवस पर होने वाली परेड की तालबद्धता की तरह उच्चकोटि की होती है.

जिस तरह प्राचीन ऐतिहासिक धरोहरों को गोद दिए जाने का सिलसिला शुरू हुआ है, उस के बाद तो अशिक्षा और भुखमरी के मन में भी देशी घी के लड्डू आरडीएक्स की तरह फूट रहे हैं कि शायद उन को भी गोद लेने वाला कोई संपन्न व्यक्ति पैदा हो जाए. प्राचीन धरोहरें हमारी महानताओं और अपेक्षाओं का बोझ उठातेउठाते सरकारी वैबसाइट्स की तरह थक गई थीं.

‘डोबली स्पीकर’ से समय की यही पुकार थी कि प्राचीन धरोहरों की थकान और लू उतारने के लिए उन्हें गोद में ले कर रिवाइटल और स्नेह का इंजैक्शन दिया जाए. जमीन और उस की जायदाद से जुड़े कुछ जागरूक किस्म के लोग अफवाह और भय फैला रहे हैं कि सरकार के पास देश की विरासत को संभालने की क्षमता नहीं है, इसलिए वह इन विरासतों को निजी हाथों में दे रही है, जबकि सरकार का कहना है कि वह इन प्राचीन विरासतों को निजी हाथों में इसलिए दे रही है ताकि सरकारी हाथ, सरकारी विरासत अर्थात अकर्मण्यता, की देखरेख करने के लिए हमेशा फ्री और सतर्क रहें.

गोद लेनेदेने की परंपरा हमारे देश में रिश्वत लेनेदेने की तरह सनातन है, जिस का सम्मान और गुणगान करते हुए हम ने आजादी के बाद से ही भ्रष्टाचार और गरीबी जैसे शिशुओं को कुशलतापूर्वक गोद ले लिया था, जो अब प्रौढ़ होने के बाद भी बड़े आराम से हमारी गोद में जीवनयापन कर अपनापन महसूस कर रहे हैं.

गोद लेने की प्रक्रिया पूरी तरह गोपनीय रहे, इसीलिए चुनावों के द्वारा इसे लोकतांत्रिक जामा पहनाया गया है. चुनाव के समय नेता जनता के सामने करबद्ध होते हैं. जिस में जनता पिघल कर नेता को आलिंगनबद्ध कर 5 साल के लिए गोद ले लेती है. फिर 5 साल में नेता गोद के जरिए कब सिर पर चढ़ जाता है, पता ही नहीं चलता. गोद के जरिए सिर तक चढ़ने का सफर जो नेता जितनी जल्दी पूरा कर लेता है वह उतनी ही जल्दी जननेता बन जाता है.

जमीन से जुड़ा नेता बनने के लिए जनता के सिर पर चढ़ कर उस के पैरोंतले जमीन खिसकाना सब से महत्त्वपूर्ण कार्य होता है और इस का पहला चरण, पार्टी आलाकमान के चरणों से होते हुए जनता के गोद लेने से शुरू होता है.

निजी हाथों को प्राचीन धरोहरों से पीला कर के सरकार ने कन्यादान की अपनी जिम्मेदारी निभाई है. अब यह कहना गलत होगा कि सरकार ने विरासत को बचाने के लिए कुछ नहीं किया. प्राचीन ऐतिहासिक धरोहरों को निजी समूह को गोद देने का कार्य अच्छा है, क्योंकि इस से सरकार ने कई निजी समूहों की सूनी गोद और जेब भरी हैं.

इस गोदीकरण पर निजीकरण का आरोप लगाना केवल राजनीतिक उपकरण माना जाना चाहिए. गोदीकरण से ही समस्याओं का निराकरण संभव है, क्योंकि गोद लेने से समस्याओं के प्रति अपनत्व और ममत्व का भाव डालनलोड होगा जोकि समस्याओं को खत्म करने के बजाय उन के साथ हमारे सहअस्तित्व की भावना को मजबूत करेगा. Satirical Story In Hindi

Satirical Story In Hindi : परदेसियों से न अंखियां मिलाना

Satirical Story In Hindi : परदेसी शब्द से मेरा पहला परिचय भारतीय फिल्मों के माध्यम से ही हुआ. बचपन से ही मुझे फिल्में देखने का तथा पिताजी को न दिखाने का शौक था. इन शौकों की टकराहट में प्राय: पिताजी को ही अधिक सफलता मिलती थी इसलिए मुझ बदनसीब को रेडियो से सुने गानों से ही संतोष करना पड़ता था. इसी संतोष के दौरान जब मैं ने यह गाना सुना कि ‘परदेसियों से न अंखियां मिलाना…’ तो मैं बहुत परेशान हो उठा. मेरा हृदय नायिका के प्रति दया से भर उठा. मैं ने सोचा कि आखिर परदेसियों से अंखियां मिलाने में क्या परेशानी है. यह बेचारी क्यों बारबार इस तरह की बात कर रही है. इस पंक्ति को बारबार दोहराने से मुझे लगा कि वाकई कोई गंभीर बात है वरना वह एक बार ही कह कर छोड़ देती. बहुत कशमकश के बाद भी जब मेरे बालमन को समाधान नहीं मिला तो मैं विभिन्न लोगों से मिला. सभी लोगों ने अपनीअपनी बुद्धि के हिसाब से जो स्पष्टीकरण दिए उस से मेरा दिमाग खुल गया.

सब से पहले मैं अपने इतिहास के टीचर से मिला. सभी टीचर मुझे शुरू से ही रहस्यमय प्राणी लगते थे. जिन मुश्किल किताबों और सवालों के डर से मुझे बुखार आ जाता था वे उन्हें मुंहजबानी याद थीं. जो गणित के सवाल मुझे पहाड़ की तरह लगते थे वे उन्हें चुटकियों में हल कर देते थे. इतिहास के मास्टरजी ने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा. फिर बोले, ‘‘परदेसियों से अंखियां लड़ाना वाकई एक गंभीर समस्या है. यह इतिहास का खतरनाक लक्षण है. इतिहास गवाह है कि जब भी हम ने परदेसियों से अंखियां लड़ाईं, हमें क्षति उठानी पड़ी. मुहम्मद गोरी ने जयचंद से अंखियां लड़ाईं, जिस से हमारे देश में दिल्ली सल्तनत की नींव पड़ी. दौलत खां लोदी ने बाबर से अंखियां मिलाईं और हमारे भारत में मुगल आ गए.

इसी तरह ईस्ट इंडिया कंपनी को लें. ये परदेसी कंपनी हमारे यहां सद्भावनापूर्ण तरीके से व्यापार करने आई थी. बातों ही बातों में लड़ाई गई अंखियों के परिणाम में हमें गुलामी झेलनी पड़ी. अंगरेजों के अंखियां लड़ाने का तरीका सर्वाधिक वैज्ञानिक था. उन्होंने कभी निजाम से, कभी मराठों से, कभी सिखों से, कभी गोरखों तथा कभी राजपूतों से अंखियां लड़ाईं. इन में से प्रत्येक को उन्होंने अपना कहा, किंतु हुए किसी के नहीं. इस के बाद में अपने मकानमालिक से मिला. उन का कहना था, ‘‘परदेसियों से अंखियां मिलाने में तो परेशानियां ही परेशानियां हैं. ये परदेसी कभी भरोसे लायक नहीं होते. आप ने यदि थोड़ी सी भी अंखियां मिला ली हैं तो बस, फिर समझो कि टाइम पर किराया नहीं मिलेगा और तो और, अंखियां मिलाने के बाद अतिक्रमण का भी खतरा है.’’

फिर मैं नेताजी के पास चला गया. नेताजी मेरे पड़ोस में ही रहते थे. तब राजनीति के बारे में, मैं अधिक नहीं जानता था. बस, इतना अवश्य जानता था कि भारत में बहुदलीय व्यवस्था है क्योंकि नेताजी प्राय: नईनई पार्टियां बदलते रहते थे. वह मेरे इस सवाल पर मुसकराए और बोले, ‘‘बेटा, तुम इस देश के भविष्य हो. तुम क्यों इन चक्करों में पड़ कर अपना भविष्य अंधकारमय कर रहे हो. तुम्हें अभी बहुत आगे बढ़ना है. परदेसियों की अंखियों के चक्कर में पड़ कर तुम देश की सेवा से मुंह मोड़ना चाहते हो. नहीं, यह बिलकुल गलत है. तुम हमारी पार्टी में आ जाओ. फिर हम…’’

उन की बातें सुन कर मैं भाग निकला और हड़बड़ाहट में शर्माजी से जा टकराया. शर्माजी एक सरकारी दफ्तर में बाबू थे. ऐसे दफ्तर में जहां हजारों रुपए महीने की ऊपरी आय थी. उन्होंने मेरी हड़बड़ाहट का कारण जानना चाहा, ‘‘क्या बात है बेटा, क्या पहाड़ टूट पड़ा है?’’ मैं ने उन्हें ईमानदारी से अपनी समस्या बतला दी. उन्होंने मेरी बात सुन कर जोर से ठहाका लगाया और बोले, ‘‘बेटा, अगर परदेसियों से ही अंखियां मिलाने में रह जाता तो 2 लड़कियों की शादी कैसे करता. परदेसियों से अंखियां मिलाने का मतलब है मुफ्त में काम कर देना. इसीलिए मैं न तो आफिस में आने वाले से सीधे मुंह बात करता और न अंखियां मिलाता. यह एक सफल प्रशासक के गुण हैं.’’

मैं असमंजस में पड़ापड़ा सोचता रहा. तभी डाक्टर अंकल आते दिखाई दिए. मैं तेजी से उन के पास गया. वह जल्दी में थे फिर भी उन्होंने मेरी बात सुनी. ‘‘वैसे परदेसियों से अंखियां मिलाने में कोई परेशानी तो नहीं है. फिर भी यह सावधानी रख लेना जरूरी है कि परदेसियों को आईफ्लू तो नहीं है. ‘‘यदि आंख मिलाना अधिक जरूरी हो तो चश्मा लगा लेना चाहिए और फिर भी कुछ हो जाए तो आईड्राप की 2-2 बूंद हर 6 घंटे में और गोलियां…’’

बाकी मेरे बस के बाहर था. मैं ने सरपट दौड़ लगाई. इतिहास के झरोखे से आईफ्लू की खिड़की तक का सफर वाकई बहुत लंबा हो गया था. परदेसियों से अंखियां मिलाने के संदर्भ में जो भयावह कल्पनाएं उपरोक्त सज्जनों ने मेरे दिमाग में बिठा दीं उस का नतीजा यह है कि आज तक मैं किसी परदेसी से अंखियां नहीं लड़ा पाया. और परिणाम में… परिणाम यही रहा कि आज तक मेरी शादी नहीं हो पाई. Satirical Story In Hindi

मार्च 2026 के फर्स्ट इश्यू में “आप के पत्र व अनुभव”

Social Interest :

प्रतिभा होना जरूरी

दिसंबर (द्वितीय) अंक में प्रकाशित लेख ‘नैपोटिज्म सफलता की गारंटी नहीं’ पढ़ा. लेख बेहद सटीक व सारगर्भित महसूस हुआ. लेख में प्रकाशित विचारों से मैं पूर्णतया सहमत हूं. नैपोटिज्म माध्यम मात्र हो सकता है लेकिन आप इस के सहारे शतप्रतिशत सफलता के शिखर पर पहुंच जाएं, ऐसा बिलकुल नहीं है. बौलीवुड हो या फिर कोई दूसरी फील्ड, सफल होने के लिए अपने अंदर का हुनर ही काम आता है.

भारतीय सिनेमा की बात करें तो पुराने दिग्गज कलाकार कादर खान, ओम पुरी, नसीरुद्दीन शाह, शक्ति कपूर और गुलशन ग्रोवर औसत शक्लसूरत होने के बावजूद इंडस्ट्री में अपना परचम लहराने में कामयाब रहे. वहीं दूसरी तरफ सुपरस्टार जितेंद्र के बेटे तुषार कपूर, सुरेश ओबेराय के बेटे विवेक ओबेराय व सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के बेटे अभिषेक बच्चन अपनी कामचलाऊ ऐक्टिंग के कारण टिके हुए हैं. चमकधमक तो हर किसी को विरासत में मिल जाती है लेकिन चमक को बरकरार अपनी प्रतिभा से ही रखा जा सकता है.

हमेशा की तरह सभी कहानियां लाजवाब व शानदार लगीं. यदि संभव हो तो पत्रिका में किसी इनामी प्रतियोगिता का समावेश कर दिया जाए जिस से पाठक प्रोत्साहन को बल मिलता रहे. – विमल वर्मा

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लापरवाही बरदाश्त नहीं

आप पैसे दे कर कोई वस्तु या सेवा हासिल करते हैं. उस का यूज करना आप का हक है. बात आरक्षित कोच में यात्रा कर रहे ट्रेन यात्रियों की है. कोच में सवार यात्रियों ने गंदगी, कौकरोच निकलने की शिकायत की. कोच अटैंडैंट ने इसे अनसुना कर दिया. मजबूर यात्रियों ने ट्रेन रोक कर हंगामा किया. कोच की साफसफाई की गई. कीटनाशक का छिड़काव किया गया. इस काम में यात्रियों को देरी हुई सो अलग.

वैसे, यह कोई नई बात नहीं है. डब्बे में गंदगी होना, टौयलेट में सीट गंदी होना, पानी न आना ये सब लापरवाही है. इस के जिम्मेदार दरअसल बेमन से कार्य को अंजाम देते हैं.

रोडवेज बसों में भी ऐसी ही स्थिति है. कभी ये रास्ते में खड़ी हो जाती हैं, कभी यात्रियों से धक्का लगवाया जाता है. अकसर मैकेनिकल मिस्टेक कह कर जिम्मेदार लोग अपना पल्ला झाड़ लेते हैं. कहने का मतलब यह है कि आप कोई सुविधा फ्री तो नहीं दे रहे हैं, पैसे ले रहे हैं. सो, इस तरह की लापरवाही बरदाश्त के बाहर है. – सीमा गुप्ता

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बच्चों के मुख से

मेरी 3 वर्षीया बेटी सौम्या ने कहीं से, किसी से ‘दादागीरी’ शब्द सुन लिया था, उस ने मुझ से पूछा, ‘‘दादागीरी का क्या मतलब होता है? मैं ने समझाया, ‘‘जब एक व्यक्ति, दूसरे व्यक्ति से अपनी इच्छा जबरदस्ती पूरी करवाता है. यह उस व्यक्ति की ‘दादागीरी’ मानी जाती है.’’

रात के 9 बज रहे थे, सौम्या कार्टून देख रही थी, उस की दादी ने उस से कहा, ‘‘सौम्या, रिमोट दो, मैं सीरियल देखूंगी, चलो दे दो, अच्छे बच्चे की तरह बात मानो.’’ सौम्या ने कुछ पल उन्हें एकटक देखा तथा बोल पड़ी, ‘‘दादीजी, ये आप की ‘दादीगीरी’ है, आप मेरे साथ जबरदस्ती कर रही हैं?’’ उस का इतना कहना था कि उस की ‘दादी मां’ सहित हम सभी हंस पड़े. संध्या

मेरी नातिन जोकि अभी 3 साल की है वह मेरे पास ही रहती है. मैं ने उसे सुबह सो कर उठने पर टौयलेट जाने की आदत डाली है. एक दिन उसे आलस आने पर भी मैं उस के पीछे लगी रही कि वह टौयलेट जा कर आए लेकिन वह मन से जाने को तैयार नहीं हो रही थी. अचानक मेरे काफी जोर देने पर वह मुझ से बाली, ‘‘नानी तुम मेरे शरीर पर बैटरी लगा दो न. जिस से मैं जल्दी से टौयलेट कर सकूं.’’

उस की यह बात सुन कर मैं तो दंग रह गई और मुझे बहुत ही हंसी आई. – शशी माहेश्वरी

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मेरे नाती आयुष को चश्मा पहनना बहुत अच्छा लगता है. जब भी वह मुझे चश्मे में देखता है तो चश्मे को लेने की जिद करता है.

एक बार वह मेरे साथ एक बरात में गया. वहां घोड़ी को मोतियों की लडि़यों से सजाया गया था. घोड़ी की आंख के चारों ओर मोतियों की लड़ी थी. आयुष बड़े ध्यान से घोड़ी को देख रहा था. जब लड़का घोड़ी पर बैठने लगा तो आयुष बोला, ‘‘अरे मम्मी, घोड़ा तो नानी की तरह चश्मा लगाए है.’’ उस की बात सुन कर आसपास खड़े सभी लोग हंसने लगे. – उपमा मिश्रा

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Satirical Story In Hindi : ले बजट दे बजट – आश्वासनभरे नए पैकेज पर बजाओ ताली

Satirical Story In Hindi : हर साल की तरह इस साल भी बजट आया है, आश्वासनों की नई पैकिंग में पुरानी उम्मीदें सजा कर. फर्क बस इतना है कि आंकड़े मोटे होते जा रहे हैं और जनता की थाली पतली. मंच पर तालियां बजती हैं, स्क्रीन पर ग्राफ चढ़ते हैं और जमीन पर आदमी अपनी चादर नापता रह जाता है.

बजट में क्या है, इस की राय आजकल नेताओं से पूछी जा रही है. पक्ष वालों के तर्क हैं कि बजट संतुलित है, आम आदमी को ध्यान में रख कर बनाया गया है लेकिन विपक्ष को कभी भी सतारूढ़ दल का बजट भाया ही नहीं.

आजकल बजट में आम आदमी की रायशुमारी नहीं ली जा रही है. रायशुमारी ली जा रही है तो बजट बनाने वालों के चेलेचपाटों की जिन को बजट से कोई मतलब नहीं. उन को बजट हमेशा संतुलित लगता है. ऐसे चेलेचपाटे सावन में अंधे हुए होते हैं, इसीलिए इन को हमेशा हर तरफ हरियाली महसूस होती है. बजट में बात किस की हो रही है और मतलब किस को है, इन से क्या लेनादेना.

बजट की बात आती है तो आम आदमी और मध्यवर्ग वाले कान में रूई ठूंस लेता है. अंधरा के जैसन दिन वैसन रात. कल भी कमाना था, आज भी कमाना है. बिना कमाए कल भी सरकार खाने को नहीं देती थी, आज भी नहीं देगी.

न तो मध्यवर्ग को और न निम्नवर्ग को मतलब है, इस बजट से. कौन सा सस्ता होने पर लोग सोना खरीद कर रख ले रहे हैं. यहां तो दाल जुटती है तो भात नहीं. भात जुटता है तो सब्जी नहीं. पांव हमेशा से चादर से बाहर. कल भी जनता भीख मांगती थी, आज भी मांग रही है. 5 किलो अनाज वह कल भी पाती थी, आज भी पाती है.

बाकी, सरकार रील्स बनाने की ट्रेनिंग तो देगी ही. बड़े लोग तो रील्स पहले से बना ही रहे हैं. सरकार तो पहले से ही कह रही है, रील्स बना कर रोजगार पाइए.

टैक्स स्लैब, 6 लाख, 12 लाख, 20 लाख जैसे टैक्स और स्लैब्स बहुत भारीभरकम शब्द हैं. सब को समझ में नहीं आता है. टैक्स स्लैब समझ कर करना भी क्या है. जब न तो 10-20 लाख रुपए होंगे एकसाथ, न उन को पता है, न ही उन्होंने एकसाथ देखे हैं. न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी. यह बात मध्यवर्ग और निम्नमध्यवर्ग को समझ में नहीं आती है.

जिन स्टील फ्रेम वालों और खरबपतियों को समझ में आती है वे बंद एसी कमरों में जुगाली कर रहे हैं. उन को मतलब नहीं है. टीवी महंगा हुआ है या सस्ता, उन को मतलब नहीं है. सोना महंगा हुआ है या सस्ता, किलोदोकिलो भर कर रखा है लौकर में. ये एसी में बंद लोग हैं. उन को इस बात से मतलब नहीं है.

निम्नमध्यवर्ग और छोटा वर्ग तो चुनाव के समय या सत्यनारायण कथा का लंगर खाने को आतुर हैं या फिर लाइन में लगे हुए हैं 5 किलो अनाज के लिए. यह वर्ग तो किसी की शादीब्याह का कार्ड खोजता है जीमने के लिए. उन को बस खाने से मतलब है. उन का काम तो प्याज का दाम कम हुआ है या नहीं, यह जानना है. आटे का दाम कम हुआ है कि नहीं, यह जानना है. दाल का बजट हर सरकार में खराब रहा है.

भाईसाहब, इन लोगों के लिए बजट भारीभरकम शब्द है. दूध का दाम कम कर दीजिए, पनीर सस्ता कर दीजिए. सैंसेक्स-निफ्टी कितना ऊपरनीचे हुआ है, इस से किसी को क्या मतलब.

बजट के बाद होली आती है. काजू, बादाम, गिरी का भाव कम हुआ है कि नहीं, इन को यह जानना होता है. सब से खराब बात, रिफाइंड तेल कंपनियों द्वारा आम जनता का शोषण करने की है. वजन 750 एमएल और दाम एक लिटर का ले रही हैं 170-170 रुपए. अच्छा बेटा, होशियार बन रहे हो. 140 रुपए का कितना चाहिए, एक पैकेट रिफाइंड, 550 एमएल मिलेगा. क्या कहा, अव्वल तो एक लिटर मिलेगा ही नहीं और मिल भी गया तो एक लिटर 190 रुपए से कम में नहीं मिलेगा. पैनलटी इन पर होनी चाहिए. आईटीआर देर से भरने से आम आदमी को फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वह तो जानता भी नहीं है कि आईटीआर होता क्या है.

बाकी, शराब की शिकायत तो हमेशा से रही है. चूंकि होली का समय होने वाला है इसलिए सरकार को शराब पर ध्यान देना चाहिए. शराब के दाम और उस पर टैक्स में बेतहाशा कमी होनी चाहिए. शराबियों को लगता है कि सरकार उस की दुश्मन है. शराबी सरकार का सब से बड़ा दोस्त है. वही सब से ज्यादा टैक्स और अंडर टेबल पैसे स्टील फ्रेम और पौलिटिशियनों को देता है. वही सैकड़ों अपराध कर के ऊपरी कमाई कराता है. उस का खयाल न रखना अपनों से दगाबाजी होगी.

अरे नहीं भाई, बजट के महीनेभर तक चीजों के दाम, जैसे दूध, दही, पनीर, आटा, चावल, दाल, रिफाइंड पर सब की नजर रहती है. बजट में सब से सस्ता सिलैंडर होता है. फिर महीनेमहीने बढ़ता जाता है. अगले बजट तक दोचारसौ रुपए का इजाफा हो ही जाता है. फिर रामनवमी आ जाती है. झंडा खरीदना है. अप्रैल आ गया है. किताबकौपी, एडमिशन, रीएडमिशन.

क्या किताब बदल दी, अभी तो पिछले साल बदली थी. अच्छा, स्कूलड्रैस भी बदल गई. जूतामोजा और टाई भी नए लेने होंगे. अरे, डायरी तो हर साल खरीदनी पड़ती है. बैग भी फट गया है, अच्छा बैग भी लेना है. लंबाचौड़ा बजट. ले बजट, दे बजट. सरकार की प्रायोजित रामनवमी आ गई है. लो, अब रामनवमी का बजट बनाना है. सरकार खुद जम कर खर्च करती है.

हर बार बजट पहले साल से भी ज्यादा अच्छा नहीं, अस्त्रशस्त्र  की नुमाइश अच्छी होनी है. रामराज्य फिर आएगा, हर घर भगवा छाएगा. जो राम का नहीं वह किसी काम का नहीं. जो राम को लाए हैं हम उन को लाएंगे. सरकार को आम आदमी की गलियों की नहीं, रिलीजियस टूरिज्म की चिंता है सो वह जम कर सड़कें बनवा रही है.

गरमी आ गई. हाथपंखा का दाम इधर बहुत बढ़ गया है. गरमी लग रही है. कूलर लेना है. एसी खराब है. बिजली नहीं आ रही है. पावर कट ज्यादा हो रही है. अरे, बिजली बिल ज्यादा आ जाएगा एसी कम चलाओ. रात में छत पर सोना है. बिजली नहीं है आज. शाम को 2 घंटे एसी चला कर छोड़ देने से सारी रात रूम ठंडा रहता है. बारबार आनाजाना मत करो. गरमी ज्यादा है. एसी काम नहीं कर रहा है. बिजली का बजट कम कैसे हो. आप वाले अरविंद केजरीवाल को तो जेल में बंद कर दिया और फिर हरवा दिया. भई, बिजली टैक्स कम कर देते.

फिर जहां जून बीता, न्यूज चैनलों में नीचे लिखा आता है- आज से फलाना दूध 4 रुपए लिटर महंगा. अब साल के 6 महीने निकल चुके हैं. जुलाई आषाढ़ का महीना है. नमक लगा कर भुट्टा खाइए. लो, सब्जी में आग लग गई है. टमाटर 100 रुपए किलो. प्याज भी 80 रुपए किलो. तब तक सावन आ जाता है. यह ‘बोर्ड विवाद’ का महीना है. सब को बोर्ड लिखवाना है खानेपीने की दुकानों पर. आखिर, आस्था का महीना है. पवित्र महीना सावन. फूलों की वर्षा हो रही है कांवडि़यों पर. अब लोगों में भक्तिभाव का संचार है. लोग बजट की बात और महंगाई की बात भूल चुके हैं. अब्दुल और राम की पहचान जरूरी है. भादों में जन्माष्टमी की तैयारी चल रही है. जन्माष्टमी का बजट. दुकानें बरसात में खालीखाली रह रही हैं. आमदनी जीरो. दसदस दिनों तक बोहनी नहीं हो रही. बजट गड़बड़ा रहा है दुकानदारों का. एक ग्राहक नहीं. बोहनी नहीं हो रही. दुकानदार दुकान खोलता है और बंद करता है. 2 महीने तक दुकानदारी चौपट.

मुंबई में दहीहांडी कार्य्रक्रम चल रहा है. गोविंदाओं के चोटिल होने पर चर्चा चल रही है. जितीया आ गया है. खीरा सौ रुपए किलो बिक रहा है. सब्जी वाले का सिर ग्राहक ने किलो वाले बाट से फोड़ दिया है. गणेश उत्सव आ गया. गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ. लो, आ गया दशहरा.  रावण का वध होना है. कपड़े खरीदने हैं घर के सब लोगों के लिए. लो, फिर बजट बिगड़ गया है. लो, दीपावली आ गई. रंगाईपुताई का खर्चा. बजट बिगड़ गया है फिर से. मुंह का स्वाद भी बिगड़ जाता है. पटाखे जलाने हैं. पूजा का सामान. फिर जायका बिगड़ गया है मुंह का. लोगों को घर जाना है. छठ पूजा के लिए ट्रेन पकड़नी है. छठ का बजट अलग है. दऊरा लेना है, सूप लेना है, परसादी खरीदनी है. उस का बजट बनाना है.

लो, इस बार बारिश ज्यादा हुई है. सब्जियों के दाम आसमान पर हैं. फूलगोभी 120 रुपए किलो बिक रही है. लोग पावपाव किलो खरीद रहे हैं. आलूप्याज दहाई पर हैं. नया आलू महंगा है लेकिन सोने से सस्ता. अव्वल मटर दिखाई नहीं देती है. मिलती है तो 200 रुपए किलो. आदमी मटर क्यों खाएगा. मुरगा न खाएगा. 200 रुपए किलो. बरबाद ही होना है तो अच्छे से होना है. लीजिए फिर से 25 दिसंबर आ गया है. मनाइए क्रिसमस डे. लो, नया साल भी आ ही गया है. पूरे महीनेभर का वीकैंड है.

नईनई योजनाएं बनानी हैं. काम या योजनाओं पर अमल अगले साल से होगा. आज नया साल है. इरादे बनाने का दिन है. काम तो होता ही रहता है. जीवन पड़ा हुआ है काम करने के लिए. जो काम पैंडिंग पड़ा है वह तो जनवरी में नहीं होगा, भाईसाहब. अब फरवरी का इंतजार कीजिए. फरवरी में देखते हैं. सोचते हैं काम करने के बारे में. फिर से बजट आ गया है, बजट बिगाड़ने के लिए. अच्छा, सोने की बात. जनता तो सो रही है और सोना अपोजिशन और सरकार में बैठे लोग खरीद रहें हैं. बजट पर फिर बात होगी. तब तक झल बजाइए, रील्स बनाइए. संस्थान खुल गए हैं. डिबेट में फिर पूछ रहा है पत्रकार, बजट कैसा है इस बार का! Satirical Story In Hindi

Family Story in Hindi : जड़ों से जुड़ा जीवन – अपनी यादों को फिर जी सकी मिली

Family Story in Hindi :

सरिता, बीस साल पहले, मार्च (प्रथम) 2006

दिल के तार अभी भी जुड़े हुए थे मिली के अपनी जन्मभूमि से, उस मिट्टी से, उस बाल आश्रम से. अनेक यादें थीं फरीदा अम्मा की जेहन में. आखिरकार आज वह इन सब के बीच खड़ी थी लेकिन सबकुछ कितना बदलाबदला सा था.

मुख्य सड़क से घर की ओर मुड़ते ही मिली सहसा ठिठक गई. दूर से ही देखा कि पोर्च में डैड की गाड़ी खड़ी थी.

‘डैड इस समय घर में,’ यह सोच कर ही मिली का दिल बैठ गया. स्कूल से घर लौटने का सारा उत्साह जाता रहा. दिन के दूसरे पहर में, डैड का घर में होने का मतलब है वे बैठ कर पी रहे होंगे.

शराब पी लेने के बाद डैड और भी अजनबी हो जाते हैं. उन के मन के भाव उन की आंखों में उतर आते हैं. तब मिली को डैड से बहुत डर लगता है. सामने पड़ने में उलझन होती है.

मिली ने धीरे से दरवाजा खोला. दरवाजे की ओर डैड की पीठ थी. हाथ में गिलास थामे वे टैलीविजन देख रहे थे. दबेपांव मिली सीढि़यां चढ़ कर अपने कमरे में पहुंच गई और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया. बैग को कमरे में एक ओर पटका और औंधेमुंह बिस्तर पर जा पड़ी. कितनी देर तक मिली यों ही लस्तपस्त पड़ी रही.

अचानक मिली को हलका सा शोर सुनाई दिया तो वह चौंक कर उठ बैठी. शायद आंख लग गई थी. नीचे वैक्यूम क्लीनर के चलने की धीमी आवाज आ रही थी.

‘अरे हां,’ मिली के मुंह से अपनेआप बोल फूट पड़े, ‘आज तो फ्राइडे है, साप्ताहिक सफाई का दिन.’ उस ने खिड़की से नीचे झंका तो पोर्च में मिसेज स्मिथ की छोटी कार खड़ी थी. डैड की गाड़ी गायब थी, शायद वे कहीं निकल गए थे.

मिली ने झटपट ब्लेजर हैंगर में टांगा. जूते रैक पर लगाए और गरम पानी के बाथटब में जा बैठी.

नहाधो कर मिली नीचे पहुंची तो मिसेज स्मिथ डिशवाशर और वाशिंग मशीन लगा कर साफसफाई में लगी थीं.

शुक्रवार को मिसेज स्मिथ के आने से मिली डिशवाशिंग से बच जाती है वरना स्कूल से लौट कर लंच के बाद डिशवाशर लगाना, बरतन पोंछना व सुखाना उसी का काम है.

मिली को बड़े जोर से भूख लग आई तो उस ने फ्रिज खोल कर अपनी प्लेट सजाई और माइक्रोवेव में उसे लगा कर खिड़की के पास आ कर खड़ी हो गई. सुरमई सांझ बिलकुल बेआवाज थी.

ऐसी खामोशी में मिली का मन अतीत की गलियों में भटकने लगा और गुजरा समय कितना कुछ आंखों के आगे तिर आया.

बरसों बीत गए. मिली तब यही कोई 5 साल की रही होगी. सब समझते हैं कि मिली सबकुछ भूल चुकी है पर मिली कुछ भी तो नहीं भूल पाई है.

वह देश, वह शहर और उस की गलियां व घर और इन सब के साथ फरीदा अम्मा की यादें जुड़ी हैं और उस के ढेरों साथी, बालसखा, उस की यादों में आज भी बने हुए हैं.

तब वह मिली नहीं, मृणाल थी. उस के हुड़दंग करने पर फरीदा अम्मा उसे लंबेलंबे बालों से पकड़तीं और उस की पीठ पर धौल जड़ देतीं. बचपन की बातें सोचते ही मिली को पीठ पर दर्द का एहसास होने लगा और अनायास ही उस का हाथ अपने बौबकट बालों पर जा पड़ा. डाइनिंग टेबल पर मुंह में फिश-चिप्स का पहला टुकड़ा रखते ही मिली की जबान को माछेरझेल का स्वाद याद हो आया और याद आ गईं कोलकाता की छोटीछोटी शामें, बाल आश्रम के गलियारों में गुलगपाड़ा मचाते हमजोली, नाराज होती फरीदा अम्मा, नन्हेमुन्नों को पालने में झलाती, सुलाती वेणु मौसी.

तब लंबेलंबे गलियारों व बरामदों वाला बाल आश्रम ही उस का घर था. पहली बार स्कूल गई तो घर और आश्रम में अंतर का भेद खुला. साथ ही, उसे यह भी पता चला कि उस के मातापिता नहीं थे, वह अनाथ थी.

उस दिन स्कूल से लौट कर अबोध मिली ने पहला प्रश्न यही पूछा था, ‘फरीदा अम्मा, मेरी मां कहां हैं?’

फरीदा बरसों से अनाथाश्रम में काम कर रही थीं. एक नहीं अनेक बार वह इस सवाल का पहले भी सामना कर चुकी थीं. मिली के इस प्रश्न से वे एक बार फिर दुखी व बेचैन हो उठीं. उन के उस मौन पर मिली ने अपने सवाल को नए रूप में दोहराया, ‘फरीदा अम्मा, मेरा घर कहां है? मां मुझे यहां क्यों छोड़ गईं?’

नन्हे सुहेल को गोद में थपकी देते हुए फरीदा ने सहजता से उत्तर दिया, ‘रही होगी बेचारी की कोई मजबूरी.’

‘यह मजबूरी क्या होती है, अम्मा?’ उलझन में पड़ी मिली ने एक और प्रश्न किया.

मिली के एक के बाद एक प्रश्नों से फरीदा अम्मा झल्ला पड़ीं. तभी सुहेल जाग कर जोरजोर से रोने लगा था. सहम कर मृणाल ने अपना मुंह फरीदा की गोद में छिपा लिया और सुबकने लगी.

फरीदा ने पहले तो सुहेल को चुप कराया, फिर मिली को बहलाया और उस के सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं, ‘रो मत, बिटिया, मैं तो हूं तेरी मां. चलोचलो, अब हम दोनों मिल कर तुम्हारी किताब का नया पाठ पढ़ेंगे.’

मृणाल को अब खेलतेखाते उठतेबैठते बस एक ही इंतजार रहता कि मां आएगी, उसे दुलार कर गोद में बिठाएगी. स्कूल तक छोड़ने भी चलेगी-सोहम की मां जैसे. विदुला की मम्मी तो उस का बस्ता भी उठा कर लाती हैं. उस की भी मां होतीं तो यही सब करतीं न. पर वे मुझे छोड़ कर गईं ही क्यों?

फिर एक दिन लंदन से ब्र्र्राउन दंपती एक बच्चा गोद लेने आए और उन्हें मिली उर्फ मृणाल पसंद आ गई. सारी औपचारिकताएं पूरी होने पर काउंसलर ने उसे पास बैठा कर सबकुछ स्नेह से समझया :

‘मिली, तुम्हारे मौमडैड आए हैं. वे तुम्हें अपने साथ ले जाएंगे, खूब प्यार करेंगे. खेलने के लिए तुम्हें ढेरों खिलौने देंगे.’

मिली चौंक कर चुपचाप सबकुछ सुनती रही थी. फरीदा अम्मा भी यही सब दोहराती रहीं पर मिली खुश नहीं हो पाई. बाहर से देख कर लगता, मिली बहल गई है पर भीतर ही भीतर तो वह बहुत भयभीत है.

ऐसा पहले भी हो चुका है, कुछ लोग आ कर अपना मनपसंद बच्चा अपने साथ ले जाते हैं. अभी कुछ महीने पहले ही कुछ लोग नन्ही ईना को ले गए थे. ईना कितनी छोटी थी, बिलकुल जरा सी. वह हंसीखुशी उन की गोद में बैठ कर हाथ हिलाती चली गई थी पर मिली तो बड़ी है. सब समझती है कि उस का सबकुछ छूट रहा था. फरीदा अम्मा, घर, स्कूल संगीसाथी.

मृणाल का रोना फरीदा अम्मा सह नहीं पातीं. आतेजाते अम्मा उसे बांहों में भर कर गले से लगाती, फिर जोर से खिलखिलाती. मिली भी उन का भरपूर साथ देती, आतेजाते उन की गोद में छिपती, उन के आंचल से लिपटती.

जाने का दिन भी आ गया. सारी कार्रवाई पूरी हो गई. अब तो बस, नए देश, नए नगर जाना था.

चलने से पहले अंतिम बार फरीदा ने मृणाल को गोद में बैठा कर गले से लगाया तो मिली फुसफुसाते, गिड़गिड़ाते हुए बोली, ‘फरीदा अम्मा, जब मेरी असली वाली मां आएंगी तो तुम उन्हें मेरा पता जरूर दे देना,’ इतना कहतेकहते मिली का गला रुंध गया था.

मिली का इतना कहना था कि फरीदा अम्मा का सब्र का बांध टूट गया और दोनों मांबेटी एकदूसरे से लिपट कर रो पड़ी थीं.

आखिर फरीदा ने ही धीरज धरा. अपनी पकड़ को शिथिल किया. फिर आंचल से आंसू पोंछे. भरे गले से बच्ची को समझया, ‘जा बेटी, जा, बीती को भूल जा. अब यही तेरे मातापिता हैं, बिलकुल सच्चे, बिलकुल सगे. तू तो बड़ी तकदीर वाली है बिटिया जो तुझे इतना अच्छा घर मिला, अच्छा परिवार मिला. यहां क्या रखा है? वहां अच्छा खाएगी, अच्छा पहनेगी, खूब पढ़ेगी और बड़ी हो कर अफसर बनेगी. मेरी बच्ची यश पाए, नाम कमाए, स्वस्थ रहे, सुखी रहे, सौ बरस जिए, जा बिटिया, जा. मुड़ कर न देख, अब निकल ही जा.’ यह कहतेकहते फरीदा ने उसे गोद से उतारा और मिली उर्फ मृणाल की उंगली मिसेज ब्राउन को पकड़ा दी.

नई मां की उंगली पकड़ कर मिली, मृणाल से मर्लिन बन गई. नया परिवार पा कर कितना कुछ पीछे छूट गया पर यादें हैं कि आज भी साथ चलती हैं. बातें हैं कि भूलती ही नहीं.

घर के लाल कालीन पर पैर रखते ही मिली को लाल फर्श वाले बाल आश्रम के लंबे गलियारे याद आ जाते जिन पर वह यों ही पड़ी रहती थी, बिना चादरचटाई के. उन गलियारों की स्निग्ध शीतलता आज भी उस के पोरपोर में रचीबसी है.

मिली को शुरुआत में लंदन बड़ा ही नीरव लगा था. सड़कों पर कोलकाता जैसी भीड़ नहीं थी और पेड़ भी वहां जो थे, हरेभरे न थे. सबकुछ जैसे स्लेटी. मिली को कुछ भी अपना न दिखता. दिल हरदम देश और अपनों के छूटने के दर्द से भरा रहता. मन करता कि कुछ ऐसा हो जाए जो फिर वह वापस वहीं पहुंच जाए.

मौम उस का भरसक ध्यान रखतीं. खूब दुलार करतीं. डैड कुछ गंभीर से थे. कुछकुछ विरक्त और तटस्थ भी. उसे गोद लेने का मौम का ही मन रहा होगा, ऐसा अब अनुमान लगाती है मिली.

यहां सब से भला उस का भाई जौन है, उस से 8 साल बड़ा, खूब लंबा, ऊंचा, गोराचिट्टा. मिली ने उसे देखा तो देखती ही रह गई.

पहले परिचय पर घुटनों के बल बैठ कर जौन ने उस के छोटेछोटे हाथों को अपने दोनों हाथों में ले लिया, फिर हौले से उसे अंक में भर लिया. कैसा स्नेह था उस स्पर्श में, कैसी ऊष्मा थी उस आलिंगन में, मानो पुरानी पहचान हो.

मिली के मन में आता कि वह उसे दादा कह कर बुलाए. अपने देश में तो बड़े भाई को दादा कह कर ही पुकारते हैं पर यहां संभव न था. यहां और वहां में अनेक भेद गिनतेबुनते मिली हर पल हैरानपरेशान रहती.

अपनी अलग रंगत के कारण मिली स्कूल में भी अलग पहचानी जाती. सहज ही सब से घुलमिल न पाती. कैसी दूरियां थीं जो मिटाए न मिटतीं. सबकुछ सामान्य होते हुए भी कुछ भी सहज न था. मिली को लगता, चुपचाप कहीं निकल जाए या फिर कुछ ऐसा हो जाए कि वह वापस वहीं पहुंच जाए पर ऐसा कुछ भी न हुआ. मिली धीरेधीरे उसी माहौल में रमने लगी. मां के स्नेह के सहारे, भाई के दुलार के बल पर उस ने मन को कड़ा कर लिया. अच्छी बच्ची बन कर वह अपनी पढ़ाई में रम गई.

अंधेरा घिरने लगा था. गुडनाइट बोल कर मिसेज स्मिथ कब की जा चुकी थीं और मिली स्थिर सी अब भी वहीं डाइनिंग टेबल पर बैठी थी, अपनेआप में गुमसुम.

दरवाजे में चाबी का खटका सुन मिली अतीत की गलियों से निकल कर वर्तमान में आ गई.

एक हाथ में बैग, दूसरे में कौपीकिताबों का पुलिंदा लिए ब्राउन मौम ने प्रवेश किया और सामने बेटी को देख मुसकराईं.

मिली के सामने खाली प्लेट पड़ी देख वह कुछ आश्वस्त सी हुईं.

‘‘ठीक से खाया, गुड, वैरी गुड.’’

इकतरफा एकालाप. फिर बेटी के सिर पर हाथ फेरती हुई बोलीं, ‘‘मर्लिन, मैं ऊपर अपने कमरे में जा रही हूं, बहुत थक गई हूं. नहा कर कुछ देर आराम करूंगी. फिर पेपर सैट करना है, डिनर मैं खुद ले लूंगी. मुझे डिस्टर्ब न करना. अपना काम खत्म कर सो जाना,’’ कहतेकहते मिसेज ब्राउन सीढि़यां चढ़ गईं और मिली का दिल बैठ गया.

‘काम, काम, काम. जब समय ही न था तो उसे अपनाया ही क्यों? साल पर साल बीत गए, फिर भी यह सवाल बारबार सामने पड़ जाता. समाजसेवा करेंगी, सब की समस्याएं सुलझती फिरेंगी पर अपनी बेटी के लिए समय ही नहीं है. यह सोच कर मिली चिढ़ गई.

जब से जौन यूनिवर्सिटी गया था, मिली बिलकुल अकेली पड़ गई थी. सुविधासंपन्न परिवार में सभी सदस्यों की दुनिया अलग थी. सब अपनेआप में, अपने काम में व्यस्त और मग्न थे.

पहले ऐसा न था. लाख व्यस्तताओं के बीच भी वीकएंड साथसाथ बिताए जाते. कभी पिकनिक तो कभी पार्टी, कभी फिल्म तो कभी थिएटर. यद्यपि मूड बनतेबिगड़ते रहते थे, फिर भी वे हंसतेबोलते रहते. हंसीखुशी के ऐसे क्षणों में मौम अकसर ही कहती थीं, ‘मर्लिन थोड़ी और बड़ी हो जाए, फिर हम सब उस को इंडिया घुमाने ले जाएंगे.’

मिली सिहर उठती. उसे रोमांच हो आता. उस का मन बंध जाता. उसे मौम की बात पर पूरा यकीन था.

डैड भी तब मां को कितना प्यार करते थे. उन के लिए फूल लाते, उपहार लाते और उन्हें कैंडिल लाइट डिनर पर ले जाते. मौम खिलीखिली रहतीं लेकिन डैड के एक अफेयर ने सबकुछ खत्म कर दिया. घर में तनातनी शुरू हो गई. मौम और डैड आपस में लड़नेझगड़ने लगे. परिवार का प्रीतप्यार गड़बड़ा गया. उन्हीं दिनों जौन को यूनिवर्सिटी में प्रवेश मिल गया. भाई के दूर जाते ही अंतर्मुखी मिली और भी अकेली पड़ गई.

मौम और डैड के बीच का वादविवाद बढ़ता गया और एक दिन बात बिगड़ कर तलाक तक जा पहुंची. तभी डैड की गर्लफ्रैंड ने कहीं और विवाह कर लिया और मौमडैड का तलाक टल गया. उन्होंने आपस में समझौता कर लिया. बिगड़ती बात तो बन गई पर दिलों में दरार पड़ गई. अब मौम और डैड 2 द्वीप थे जिन्हें जोड़ने वाले सभी सेतु टूट चुके थे.

उन के रिश्ते बिलकुल ही रिक्त हो चुके थे. मन को मनाने के लिए मौम ने सोशल सर्विस शुरू कर ली और डैड को पीने की लत लग गई. कहने को वे साथसाथ थे, पर घर घर न था.

मिली को अब इंतजार रहता तो बस, जौन के फोन का लेकिन जब उस का फोन आता तो वह कुछ बोल ही न पाती. भरे मन और रुंधे गले से बोलती उस की आंखें, बोलते उस के भाव.

जौन फोन पर झिड़कता, ‘‘मर्लिन, मुंह से कुछ बोल. फोन पर गरदन हिलाने से काम नहीं चलता.’ और मिली हंसती. जौन खिलखिलाता. बहुत सी बातें बताता. नए दोस्तों की, ऊंची पढ़ाई की. वह मिली को भी अच्छाअच्छा पढ़ने को प्रेरित करता. खुश रहने की नसीहतें देता. मिली उस की नसीहतों पर चल कर खूब पढ़ती.

मिसेज ब्राउन ने अपने को पूरी तरह से काम में झेंक कर अपनी सेहत को खूब नकारा था. अचानक वे बीमार पड़ीं और डाक्टर को दिखाया तो पता चला कि उन्हें कैंसर है और वह अंतिम स्टेज में है.

मिली ने सुना तो सकते में आ गई. लेकिन मौम बहादुर बनी रहीं. जौन मिलने आया तो उसे भी समझबुझ कर वापस भेज दिया. उस की पीएचडी पूरी होने वाली थी. उस की पढ़ाई का हर्ज हो, यह मिसेज ब्राउन को मंजूर न था.

मां के समझने पर मिली सामान्य बनी रहती और रोज स्कूल जाती. बीमार अवस्था में भी मौम अपना और उस का भी पूरा खयाल रखतीं. डैड अपनेआप में ही रमे रहते. पीते और देर रात गए घर लौटते थे.

इधर मौम का इलाज चलता रहा, उधर अमेरिका के फ्लोरिडा विश्वविद्यालय में पढ़ाई पूरी होते ही जौन को नौकरी मिल गई. यह जानने के बाद कि उसे फौरन नौकरी जौइन करनी है, मौम ने उसे घर आने के लिए और अपने से मिलने के लिए साफ और सख्त शब्दों में मना करते हुए कह दिया कि उसे सीधा वहीं से रवाना होना है.

उस दिन बिस्तर में बैठेबैठे ही मौम ने पास बैठी मिली का हाथ अपने दोनों हाथों के बीच रख लिया, फिर धीरे से बहुत प्रयास कर उसे अपने अंक में भर लिया. मिली डर गई कि मौम को अंत की आहट लग रही है. मिली ने भी मौम की क्षीण व दुर्बल काया को अपनी बांहों में भर लिया.

‘‘मर्लिन मेरी बच्ची, मैं तेरे लिए क्याक्या करना चाहती थी लेकिन लगता है सारे अरमान धरे के धरे रह जाएंगे. लगता है अब मेरे जाने का समय आ गया है.’’

‘‘नहीं, मौम. नहीं, तुम ने सबकुछ किया है. तुम दुनिया की सब से अच्छी मां हो,’’ रुदन को रोक, रुंधे कंठ से मिली बस, इतनाभर बोल पाई और अपना सिर मौम के सीने पर रख दिया.

कांपते हाथों से मिसेज ब्राउन बेटी का सिर सहलाती रहीं और एकदूसरे से नजरें चुराती दोनों ही अपनेअपने आंसुओं को छिपाती रहीं.

मिली भाई को बुलाना चाहती तो मौम कहतीं, ‘‘उसे वहीं रहने दे. तू है न मेरे पास. वह आ कर भी क्या कर लेगा. वह कद से लंबा जरूर है पर उस का दिल चूहे जैसा है. अब तो तुझे ही उस का ध्यान रखना होगा, मर्लिन.’’

मौम की हालत बिगड़ती देख अकेली पड़ गई मिली ने एक दिन घबरा कर चुपचाप भाई को फोन लगाया और उसे सबकुछ बता दिया.

आननफानन जौन आ पहुंचा और फिर देखते ही देखते सबकुछ बीत गया. मौम चुपके से सबकुछ छोड़ कर इस दुनिया को अलविदा कह गईं.

उस रात मां के चेहरे पर और दिनों सी वेदना न थी. कैसी अलगअलग सी दिख रही थीं. मिली डर गई. वह समझ गई कि मौम को मुक्ति मिल गई है. मिली ने उन को छू कर देखा, वे जा चुकी थीं. मिली समझ ही न पाई कि वह हंसे या रोए. अंतस की इस ऊहापोह ने उसे बिलकुल ही भावशून्य बना दिया. हृदय का हाहाकार कहीं भीतर ही दब कर रह गया.

लोगों का आनाजाना, अंतिम कर्म, चर्च सर्विस, मिली जैसे सबकुछ धुएं की दीवार के पार से देख रही थी. होतेहोते सबकुछ हो गया. फिर धीरेधीरे धुंधलका छंटने लगा. कुहरा भी कटने लगा. मिली की भावनाएं पलटीं तो मां के बिना घर बिलकुल ही सूना लगने लगा था.

कुछ ही दिनों बाद डैड अपनी एक महिला मित्र के साथ कनाडा चले गए. जैसे जो हुआ उन्हें, बस, उसी का इंतजार था.

सत्र समाप्ति पर था. मिली नियमित स्कूल जाती और मेहनत से पढ़ाई करती पर एक धुकधुकी थी जो हरदम उस के साथसाथ चलती. अब तो जौन भी चला जाएगा, फिर कैसे रहेगी वह अकेली इस सांयसांय करते सन्नाटेभरे घर में.

मौम क्या गईं अपने साथसाथ उस का सपना भी लेती गईं. सपना अपने देश जा कर अपने शहर कोलकाता देखने का था. सपना अपनी फरीदा अम्मा से मिल आने का था. टूट चुकी थी मिली की आस. अब कोई नहीं करेगा इंडिया जाने की बात. काश, एक बार, सिर्फ एक बार वह अपना देश और कोलकाता देख पाती.

स्कूल का सत्र समाप्त होने पर जौन उसे अपने साथ ले जाने की बात कर रहा था. अब वह कैसे उस से कहे कि मुझे इंडिया ले चलो. देश दिखा लाओ.

मौम के जाने पर ही भाईबहन ने जाना कि वे बिन बोले, बिन कहे कितना कुछ सहेजेसंभाले रहती थीं. अब वे चाहे जितना कुछ करते, कुछ न कुछ काम रह ही जाता.

उस दिन जौन मां के कागज सहेजनेसंभालने में व्यस्त था. बैंक पेपर्स, वसीयत, रसीदें, टैक्स पेपर्स तथा और भी न जाने क्याक्या. इतने सारे तामझम के बीच जौन एकदम से बोल पड़ा, ‘‘मर्लिन, इंडिया चलोगी?’’

मिली हैरान, क्या कहती? ओज के अतिरेक में उस की आवाज ही गुम हो गई और आंखों में आ गया अविश्वास और आश्चर्य.

‘‘यह देखो मर्लिन, मौम तुम्हारे भारत जाने का इंतजाम कर के गई हैं, पासपोर्ट, टिकट, वीजा और मुझे एक चिट्ठी भी, छुट्टियां शुरू होते ही बहन को इंडिया घुमा लाओ. और यह चिट्ठी तुम्हारे लिए.’’

मिली ने कांपते हाथों से लिफाफा पकड़ा और धड़कते दिल से पत्र पढ़ना शुरू किया :

‘‘प्यारी बेटी, मर्लिन,

‘‘कितना कुछ कहना चाहती हूं पर अब जब कलम उठाई है तो भाव जैसे पकड़ में ही नहीं आ रहे. कहां से शुरू करूं और कैसे, कुछ भी समझ नहीं पा रही हूं. कुछ भावनाएं होती भी हैं बहुत सूक्ष्म, वाणी वर्णन से परे, मात्र मन से महसूस करने के लिए. कैसेकैसे सपनों और अरमानों से तुम्हें बेटी बना कर भारत से लाई थी कि यह करूंगी, वह करूंगी पर कितना कुछ अधूरा ही रह गया. समय जैसे यों ही सरक गया.

‘‘कभीकभी परिस्थितियां इंसान को कितना बौना बना देती हैं. मनुष्य सोचता कुछ है और होता कुछ है. फिर भी हम सोचते हैं, समय से सब ठीक हो जाएगा पर समय भी साथ न दे तो?

‘‘मैं तुम्हारी दोषी हूं, मर्लिन. तुम्हें तुम्हारी जड़ों से उखाड़ लाई. तुम्हारी उम्र देखते हुए साफ समझ रही थी कि तुम्हें बहलाना, अपनाना कठिन होगा पर क्या करती, स्वार्थी मन ने दिमाग की एक न सुनी. दिल तुम्हें देखते ही बोला, तुम मेरी हो, सिर्फ मेरी. तब सोचा था तुम्हें तुम्हारे देश ले जाती रहूंगी और उन लोगों से मिलवाती रहूंगी जो तुम्हारे अपने हैं पर जो चाहा, कभी कर न पाई. तुम्हारे 18वें जन्मदिन का यह उपहार है मेरी ओर से. तुम भाई के साथ भारत जाओ और घूम आओ. अपनी जननी जन्मभूमि से मिल आओ. मैं साथ न हो कर भी सदा तुम्हारे साथ चलूंगी. तुम दोनों मेरे ही तो अंश हो. ऐसी संतान सब को कहां  मिलती हैं.

‘‘जीवन के बाद भी यदि कोई जीवन है तो मेरी कामना यही रहेगी कि मैं बारबार तुम दोनों को ही पाऊं. अगली बार तुम मेरी कोख में ही आना ताकि फिर तुम्हें कहीं से उखाड़ कर लाने की दोषी न रहूं.

‘‘तुम पढ़ोलिखो, आगे बढ़ो, यशस्वी बनो, अपने लिए अच्छा साथी चुनो. घरगृहस्थी का आनंद उठाओ, परिवार का उत्सव मनाओ. तुम्हारे सारे सुख अब मैं तुम्हारी आंखों से ही तो देखूंगी. इति.

‘‘मंगलकामनाओं के साथ तुम्हारी मौम.’’

मौम बिन बताए उस के लिए कितना कुछ कर गई थीं. उसे घर, धनसंपत्ति और सब से ऊपर जौन जैसा प्यारा भाई दे गई थीं.

मौम की अंतिम इच्छा को कार्यरूप देने में जौन ने भी कोई कोरकसर न छोड़ी.

स्कूल का सत्र समाप्त होते ही रोमांच से छलकती मिली हवाई यात्रा कर रही थी. जहाज में बैठी मिली को लग रहा था कि बचपन जैसे बांहें पसारे खड़ा हो. गुजरा, भूला समय किसी चलचित्र की तरह उस की आंखों के सामने चल रहा था.

पिछवाड़े का वह बूढ़ा बरगद जिस की लंबी जटाओं से लटक कर वह हमउम्र बच्चों के साथ झले झलती थी और वेणु मौसी देख लेती तो बस, छड़ी ले कर पीछे ही पड़ जाती. बच्चों में भगदड़ मच जाती. गिरतेपड़ते बच्चे इधरउधर तितरबितर हो जाते पर मौसी का कोसना देर तक जारी रहता.

विमान ने कोलकाता शहर की धरती को छुआ तो मिली का मन आकाश की अनंत ऊंचाइयों में उड़ चला.

बाहर चटकचमकीली धूप पसरी पड़ी थी. विदेशी आंखों को चौंध सी लगी. बाहर निकलने से पहले काले चश्मे चढ़ गए. चौडे़ हैट लग गए पर मान से भरी मिली यों ही बाहर निकल गई मानो कह रही हो कि अरे, धूप का क्या डर, यह तो मेरी अपनी है.

मिली के मन से एक आह सी निकली, ‘तो आखिर, मैं आ ही गई अपने नगर, अपने शहर.’ जौन ने भारत के बारे में लाख पढ़ रखा था पर जो आंखों से देखा तो चकित रह गया. ज्योंज्यों गंतव्य नजदीक आ रहा था, मिली के दिल की धुकधुकी बढ़ती जा रही थी. कई सवाल मन में उठ रहे थे.

कैसी होंगी फरीदा अम्मा? पहचानेंगी तो जरूर. एकाएक ही सामने पड़ कर चौंका दूं तो? तुरंत न भी पहचाना तो क्या, नाम सुन कर तो सब समझ जाएंगी. मृणाल, मृणालिनी कितना प्यारा लग रहा था आज उसे अपना वह पुराना नाम.

लोअर सर्कुलर रोड के मोड़ पर जिस बड़े से फाटक के पास टैक्सी रुकी वह तो मिली के लिए बिलकुल अजनबी था, लेकिन ऊपर लगा नामपट ‘भारती बाल आश्रम’ बिलकुल सही.

टैक्सी के रुकते ही वरदीधारी वाचमैन ने दरवाजा खोला और सामान उठवाया.

अंदर की दुनिया तो मिली के लिए और भी अनजानी थी. कहां वह लाल पत्थर का एकमंजिला भवन, कहां यह आधुनिक चलन की बहुमंजिली इमारत.

सामने ही सफेद बोर्ड पर इमारत का इतिहास लिखा था. साथ ही साथ उस का नक्शा भी बना था. मिली ठहर कर उसे पढ़ने लगी.

सिर्फ 5 वर्ष पहले ही, केवलरामानी नाम के सिंधी उद्योगपति के दान से यह बिल्ंिडग बन कर तैयार हुई थी. मिली भौचक सी रह गई. लाल गलियारे और हरे गवाक्ष, ऊंची छतों वाला शीतल आवास काल के गाल में समा चुका था. मिली अनमनी हो उठी.

रिसैप्शन पर बैठी लड़की ने रजिस्टर में उन का नामपता मिलाया. गेस्ट हाउस में उन की बुकिंग थी. कमरे की चाबी निकाल कर जब लड़की उन का लगेज लिफ्ट में लगवाने लगी तो मिली ने डरतेडरते पूछा, ‘‘क्या मैं पहली मंजिल पर बनी नर्सरी को देखने जा सकती हूं?’’

लड़की ने बहुत शिष्टता से कहा, ‘‘मैम, उस के लिए आप को औफिस से अनुमति लेनी होगी और औफिस शाम को 5 बजे के बाद ही खुलेगा.’’

‘‘तो आप ऊपर से फरीदा अम्मा को बुलवा दीजिए, प्लीज,’’ मिली ने हिचक के साथ अनुरोध किया.

लड़की ने जब यह कहा कि वह यहां की किसी फरीदा अम्मा को नहीं जानती तो मिली निराश सी हो गई. उस का लटका चेहरा देख

कर जौन ने लिफ्ट में उसे टोकते हुए कहा, ‘‘चीयर अप सिस्टर, वी आर इन इंडिया.’’

मिली बेमन से हंस दी.

मिली ने विशेष आग्रह कर के अपने लिए मछली का झेल और भात मंगवाया. पहले उसे यह बंगाली खाना पसंद था पर आज 2 चम्मच से अधिक नहीं खा पाई, जीभ जलने लगी. आंखों में जल भर आया.

मिली की हताशा पर जौन हंस कर बोला, ‘‘चलो, चलो, पानी पियो, मुंह पोंछो. यह लो, मेरे सैंडविच खाओ.’’

जौन की लाख कोशिशों के बाद भी मिली अधीर और उदास ही बनी रही. इतने बदलावों ने उस के मन में इस शंका को भी जन्म दिया कि कहीं अगर फरीदा अम्मा भी… और इस के आगे वह और कुछ नहीं सोच सकी.

मिली के लिए 2 घंटे 2 युगों के बराबर गुजरे. 5 बजे कार्यालय खुला और जैसे ही संचालक महोदय आए, मिली सब को पीछे छोड़ती हुई जौन को साथ ले कर उन के पास पहुंच गई.

संचालक, मिलन मुखर्जी, आश्रम की बाला को बरसों बाद वापस आया जान  कर खूब खुश हुए और आदरसत्कार कर मिली से इंगलैंड के बारे में, उस के परिवार के बारे में बात करते रहे. मिली ने अधीरता से जब नर्सरी देखने के लिए आज्ञापत्र मांगा तो मुखर्जी महोदय होहो कर हंस दिए और बोले, ‘‘अरे, तुम्हारे लिए कैसा आज्ञापत्र? तुम तो हमारी अपनी हो, यह तो तुम्हारा अपना घर है. चलो, मैं दिखाता हूं तुम्हें नर्सरी.’’

बड़ा सा हौल. छोटेछोटे पालने. नन्हेमुन्ने बच्चे. कितने सलोने, कितने सुंदर. वह भी तो ऐसे ही पलीबढ़ी है, यह सोचते ही मिली का मन फिर उमड़नेघुमड़ने लगा.

हौल में बच्चों को पालनेपोसने वाली मौसियां उत्सुकता से मिलीं. वे सब जौन को देखे जा रही थीं. मुखर्जी बाबू ने बड़े अभिमान से मिली का परिचय दिया कि यहीं की बच्ची है मृणालिनी, अब लंदन से अपने भाई के साथ आई है.

हौल में हलचल सी मच गई. खूब मान मिला. मिली के साथसाथ लंबे जौन ने भी सब को खूब प्रभावित किया.

मिली बच्चों से मिली. बड़ों से मिली लेकिन उस फरीदा अम्मा से नहीं मिल पाई जिस के लिए समंदर पार कर वह भारत आई थी.

‘‘बाबा, फरीदा अम्मा कहां हैं?’’ उसे याद है बचपन में संचालक को सभी बच्चे बाबा ही कह कर बुलाते थे. आज मुखर्जी बाबू के लिए भी मिली के पास वही संबोधन था.

‘‘कौन? फरीदा बेगम. अरे, वह 4-5 साल पहले तक यहीं थी. उस की नजर कमजोर हो गई थी. मोतियाबिंद का औपरेशन भी हुआ पर अधिक उम्र होने के कारण वह काम नहीं कर पाती थी, लेकिन रहती यहीं थी. फिर एक दिन उस का बेटा सेना से स्वैच्छिक अवकाश ले कर आ गया और वह अपने साथ फरीदा को भी ले गया,’’ मुखर्जी ने पूरी जानकारी एकसाथ दे दी.

अम्मा चली गई हैं, यह जानते ही मिली का चेहरा सफेद पड़ गया. उस के निरीह चेहरे को देख कर जौन ने एक और प्रयत्न किया, ‘‘आप

के पास उन का कोई पता तो होगा ही मिस्टर मुखर्जी?’’

‘‘हां, हां, क्यों नहीं. आप उस से मिलने जाएंगे? खूब खुश होगी वह अपनी पुरानी बच्ची से मिल कर.’’ मुखर्जी बाबू आनंदित हो उठे. मिली की जाती जान जैसे वापस लौट आई.

पुराने खातों की खोज हुई. कोलकाता के उपनगर दमदम से भी आगे, नागेर बाजार के किसी पुराने इलाके का पता लिखा था.

अगले दिन, संचालक ने उन के जाने के लिए टूरिस्ट कार की व्यवस्था कर दी.

अम्मा के लिए फलफूल लिए गए. चौडे़ बौर्डर वाली बंगाली धोती खरीदी गई. मिली बहुत खुश थी. आखिर दूरियां नापतेनापते जब वे दिए गए पते पर पहुंचे तो पता चला कि वहां तो कोई और परिवार रहता है. पड़ोसियों से पूछताछ की लेकिन पक्के तौर पर कोई कुछ कह न सका. शायद वे अपने गांव उड़ीसा चले गए थे, जहां उन की जमीन थी पर वहां का पता किसी को मालूम न था.

मिली की तो जैसे सुननेसमझने की शक्ति ही जाती रही. फिर रुलाई का ऐसा आवेग उमड़ा कि उस की हिचकियां बंध गईं. जौन ने उसे संभाल लिया. बांहों में उसे बांध कर उस का सिर सहलाया. स्नेह से समझया पर मिली तो जैसे कुछ सुननेसमझने के लिए तैयार ही न थी.

उस का कातर कं्रदन जारी रहा तो जौन घबरा उठा. कंधे झकझेर कर उस ने मिली को जोर से डांटा, ‘‘मिली, बहुत हुआ, अंब बंद करो यह नादानी.’’

‘‘यहां आना तो बेकार ही हो गया न, जौन,’’ मिली रोंआसे स्वर से बोली.

‘‘यह तो बेवकूफों वाली बात हुई,’’ जौन फिर नाराज हुआ, ‘‘अरे, अपने भाई के साथ तुम वापस अपने देश आई हो. मैं तो पहली बार ही इंडिया देख रहा हूं और इसे तुम बेकार कहती हो. असल में मिली, तुम्हारी अपेक्षाएं ही गलत हैं. तुम ने सोचा, तुम जो जैसा जहां छोड़ गई हो वह वैसा का वैसा वहीं पाओगी. बीच के समय का तुम्हें जरा भी विचार नहीं.

तुम्हें तुम्हारा पुराना भवन न दिखा तो तुम निराश हो गईं. फरीदा अम्मा न मिलीं तो तुम हताश हो उठीं. तनिक यह भी सोचो कि बिल्ंिडग कितनी सुविधामयी है. फरीदा अम्मा अपने परिवार के साथ सुख से हैं. यह दुख की बात है कि तुम उन से नहीं मिल पाईं पर इस बात को दिल से तो न लगाओ. जिन को चाहती हो, प्यार करती हो उन को अपना आदर्श बनाओ. जुझरू, बहादुर और सेवामयी बनो, फरीदा अम्मा जैसे.’’

भाई की बातों को ध्यान से सुनती मिली एकाएक ही बोल पड़ी, ‘‘जौन, मैं तो अभी कितनी छोटी हूं, मैं भला क्या कर सकती हूं.’’

‘‘तुम क्याक्या कर सकती हो, समय आने पर सब समझ जाओगी. फिलहाल तो तुम इस संस्था को कुछ दान दो जिस ने तुम्हें पाला, पोसा, बड़ा किया, प्यार दिया. मौम तुम्हें कितना सारा पैसा दे कर गई हैं. आओ, मैं तुम्हें चैक भरना बताऊं.’’

दोनों भाईबहनों ने ‘भारती बाल आश्रम’ के नाम एक चैक बनाया जिसे चुपचाप गलियारे में रखे दानपात्र में डाल दिया.

‘‘कोलकाता घूम कर शांतिनिकेतन चलेंगे, फिर नालंदा और बोधगया देखेंगे. उस के बाद आगरा का ताज देख कर दिल्ली पहुंचेंगे और दिल्ली दर्शन के बाद वापस लंदन लौट चलेंगे. इस ट्रिप में तो बस, इतना ही घूमा जा सकता है.’’

आंख खुली तो मिली ने देखा एक सितारा अभी भी अपनी पूरी निष्ठा से दमक रहा था. मिली इस सितारे को पहचानती है, यह भोर का तारा है.

फरीदा अम्मा कहती थीं, भोर का यह तारा भूलेभटकों को राह दिखाता है, दिशाहारों की उम्मीद जगाता है. बड़ा ही हठीला है पूरब दिशा का यह सितारा. किरणें उसे लाख समझएं पर जब तक सूरज खुद नहीं आ जाता, यह जिद्दी तारा जाने का नाम ही नहीं लेता. इसी हठी सितारे के आकर्षण में बंधी मिली बिस्तर से उठ खड़ी हुई.

पीछे की बालकनी खोल मिली ने बाहर कदम रखा ही था कि सहसा ठिठक गई. सामने जटाजूटधारी बरगद खड़ा था. वही वैभवशाली वटवृक्ष. पहले से कहीं ऊंचा, उन्नत, विराट और विशाल.

मिली ने हाथ आगे बढ़ा कर हौले से पेड़ के पत्तों को सहलाया, धीरे से उस की डालों को छुआ, मानो पूछ रही हो कि  पहचाना मुझे? मैं मिली हूं जो कभी तुम्हारी छांव में खेलती थी, तुम्हारी जटाओं पर झलती थी और इस तरह एक बार फिर मिली बचपन में भटकने लगी थी.

अचानक मसजिद से अजान की आवाज उभरी तो कहीं मंदिर के घंटे घनघना उठे और यह सब सुनते ही मिली को अभिमान हो आया कि कैसी विशाल, विराट, भव्य और उदार है उस की मातृभूमि.

मौम सच कहती थीं, हर जीवन अपनी जड़ों से जुड़ा होता है. मनुष्य अपनी माटी से अनायास ही आकर्षित होता है. अपनी जमीन और अपनी मिट्टी ही देती है व्यक्ति को असीम ऊर्जा और अलौकिक आनंद.

दिन चढ़ने लगा था. कोलकाता शहर के विहंगम विस्तार पर सूरज दमक रहा था. सड़कों पर गलियों में धूप पसर रही थी. सूरज की किरणों के साथ ही जैसे संपूर्ण शहर जाग उठा था.

मिली को अचानक ही लंदन की याद हो आई. शांत, सौम्य लंदन. लंदन उस का अपना नगर, अपना शहर, जहां बर्फ भी गिरती है तो चुपचाप बेआवाज. सर्द मौसम में, पेड़ों की फुनगियों पर, घरों की छतों पर, सड़कों और गलियों में. यहां से वहां तक बस चांदी ही चांदी, बर्फ की चांदी. मिली के मन में जैसे बर्फ की चांदी बिखर गई. मिली अकुला उठी. उसे अपना घर याद हो आया. भोर का सितारा तो न जाने कब, कहां निकल गया था. अब तो उसे भी जाना था, वापस अपने घर. Family Story in Hindi

Family Story in Hindi : सौतेली मां – सुमन क्यों सह रही थी मोहिका की नफरत?

Family Story in Hindi : सुमन ने तो पहली बार मिलते ही मोहिका को अपनी बेटी मान लिया था लेकिन मोहिका थी कि सुमन को सिर्फ सौतेली मां ही मानती रही. सुमन मोहिका की यह नफरत फिर भी सहती जा रही थी.

घड़ी की सूई की तरह सुमन का कलेजा धकधक कर रहा था. मन में बुरेबुरे विचार आजा रहे थे. समझ नहीं आ रहा था उसे कि वह क्या करे. पति विराज हफ्तेभर बाद औफिस टूर से लौट कर आराम से सो रहे थे, इसलिए उसे सोते से जगा भी नहीं सकती वह लेकिन उसे कैसे नींद आ सकती है जब जवान बेटी घर से बाहर हो.

विराज और सुमन की बेटी मोहिका बोल कर तो यही गई थी कि वह साढ़े 10 बजे तक घर आ जाएगी लेकिन रात के 12 बजने को हैं और अभी तक उस का अतापता नहीं है. दरअसल, मोहिका अपने एक दोस्त के जन्मदिन की पार्टी में गई थी. उस ने कहा था कि वह जल्दी आ जाएगी. मगर अभी तक वह घर नहीं आई है, फोन भी नहीं उठा रही. अब तो उस का फोन बंद आ रहा है. उस के कई दोस्तों को कौल कर के पूछा उस ने मोहिका के बारे में लेकिन सब ने यही कहा कि उन्हें कुछ नहीं पता कि वह कहां है.

क्या करूं अब मैं, हां, राजवी से पूछती हूं. शायद उसे पता हो क्योंकि मोहिका ने कहा था कि वह राजवी के साथ ही यश के जन्मदिन की पार्टी में जाने वाली है. अपने मन में सोच उस ने राजवी को फोन लगाया. उस ने भी यही उत्तर दिया कि उसे नहीं पता कि मोहिका कहां है.

‘‘अरे, ऐसेकैसे नहीं पता है मोहिका तुम्हारे साथ ही पार्टी में गई थी न?’’ सुमन को गुस्सा आ गया अब. एक तो वह वैसे ही मोहिका के फोन बंद आने को ले कर परेशान है, ऊपर से यह राजवी कह रही है कि उसे नहीं पता कि वो कहां है.

‘‘देखो बेटा, मैं क्या कह रही हूं, मोहिका तुम्हारे साथ ही यश के जन्मदिन की पार्टी में गई थी न, तो तुम्हें तो पता होगा न कि वह कहां है.’’ उस पर राजवी बोली कि नहीं, वह उस के साथ पार्टी में नहीं गई थी बल्कि वह और आदिल साथ में यश की पार्टी में गए थे.

‘‘आदिल, यह आदिल कौन है?’’ वह पूछ ही रही थी कि तभी दरवाजे पर बाइक रुकने की आवाज आई. वह दौड़ कर बालकनी में गई. तब तक बाइक फुर्र हो चुकी थी. पता ही नहीं चल पाया कि कौन था वह लड़का. सुमन झटक कर दरवाजा खोलने गई. अपने सामने मोहिका को सहीसलामत देख सुमन की जान में जान आई लेकिन दूसरे ही पल उस का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया क्योंकि यह कोई टाइम है घर आने का? पता भी है उसे, इतनी देर में वह कितनी मौतें मरी है.

दिल्ली शहर वैसे भी लड़कियों के लिए सेफ नहीं रहा अब. और जब जवान बेटी यों इतनी रात गए घर से बाहर हो तो मां को तो चिंता होगी ही न. ऊपर से उस का फोन भी बंद आ रहा था. उसे लगा कि कहीं मोहिका के साथ कुछ गलत तो नहीं हो गया. इंसान की फितरत है कि उस के दिमाग में पहले नैगेटिव विचार ही आते हैं.

‘‘कहां थी तुम इतनी देर तक और यह लड़का कौन था जो तुम्हें बाइक से छोड़ कर गया? बोलो? तुम्हारा फोन भी बंद आ रहा था, क्यों? पता भी है मेरी क्या हालत हो गई थी?’’

सुमन की बातों का कोई जवाब दिए बगैर मोहिका सीधे अपने कमरे में चली गई.  जैसे उसे कोई फर्क ही नहीं पड़ा उस की बातों का. ‘‘मैं तुम से कुछ पूछ रही हूं मोहि, जवाब क्यों नहीं देती? कहां और किस के साथ थी तुम इतनी रात तक?’’

‘‘नहीं दूंगी, क्या करोगी?’’ तन कर मोहिका बोली, ‘‘और होती कौन हो आप मुझ से इस तरह से सवाल करने वाली, हां? मैं जहां जाऊं, जब आऊं, जिस के साथ जाऊं मेरी मरजी.’’

‘‘मोहिका,’’ तभी पीछे से विराज गरजा, यह क्या तरीका है अपनी मां से बात करने का? वह कुछ पूछ रही है, जवाब दो?

‘‘नहीं दूंगी, क्योंकि यह मेरी मां नहीं है, समझे आप,’’ कह कर उस ने इतनी जोर से अपने कमरे का दरवाजा बंद किया कि सुमन कांप उठी.

‘‘मोहिका, दरवाजा खोलो,’’ विराज ने जोर से दरवाजे पर मुक्का मारा, फिर आगे कहा, ‘‘दरवाजा खोलो. वरना मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.’’

‘‘नहीं खोलूंगी, तोड़ दो दरवाजा. जो करना है, कर लो. मैं दरवाजा नहीं खोलूंगी,’’ वह भी कमरे से गरजी, ‘‘क्यों पीछे पड़े हो मेरे? जीने क्यों नहीं देते मुझे? बोलो मर जाऊं?’’

‘‘न, नहीं बेटा, ऐसा मत कहो. देखो, देखो हम कुछ नहीं बोल रहे हैं, तुम्हें जो करना है, करो,’’ बाहर से सुमन घिघियाते हुए बोली और उस ने हाथ जोड़ कर विराज से भी चुप रहने को कहा. डर गई वह कि कहीं मोहिका कुछ कर न ले. अगर उस ने कुछ कर डाला तो फिर क्या वह जी पाएगी उस के बगैर?

‘‘आप तो चुप ही रहो,’’ धड़ाक से दरवाजा खोलते हुए वह बोली, ‘‘आप ने ही मेरे पापा को मेरे खिलाफ भड़काया है न. सबकुछ तो छीन लिया आप ने मुझ से. अब जीने भी नहीं दोगी?’’

‘‘ज्यादा बकवास कर रही है. यह तुम्हें जीने नहीं दे रही या तुम इसे…’’ विराज आगे कुछ और बोलता, उस से पहले ही सुमन ने उस का हाथ पकड़ लिया और आंख के इशारे से चुप रहने को कहा. सुमन जानती है मोहिका के स्वभाव को. बहुत जिद्दी है. कुछ नहीं समझती, उलटे और चिल्लाने लगती है. इतनी रात गए, आसपड़ोस के लोग क्या सोचेंगे, यह सोच कर उस ने विराज को चुप रहने का इशारा किया. विराज तो थोड़ी देर बाद सो गया लेकिन सुमन की आंखों से नींद गायब हो चुकी थी. कैसे नींद आती उसे जब उस की ही बेटी उस पर इलजाम पर इलजाम लगाए जा रही तो.

उस की आंखों से टपटप कर आंसू बहे जा रहे थे यह सोच कर कि मोहिका को तो उस ने उसी दिन अपनी बेटी मान लिया था जब विराज उसे देखने आए थे और कहा था कि वह सिर्फ अपनी बेटी मोहिका की खातिर दूसरा विवाह कर रहे हैं, ताकि उस की बेटी को एक मां मिल सके. सुमन ने भी एक मां की तरह मोहिका को अपने सीने से लगा लिया था लेकिन शादी के इन 18 सालों में मोहिका ने कभी उसे अपनी मां नहीं माना.

मोहिका जब 3 साल की थी तभी एक गंभीर बीमारी के चलते उस की मां चल बसी. बूढ़ी दादी ने जैसेतैसे कर उसे कुछ दिन संभाला लेकिन उस के जीवन का भी क्या भरोसा, यही सोच कर उस ने अपने बेटे विराज से कहा कि अपनी बेटी के लिए वह दूसरा विवाह कर ले. विराज अपनी मां की बातों से सहमत तो हुआ पर कोई ऐसी लड़की मिल नहीं रही थी उसे जो एक बच्चे के पिता से विवाह को तैयार हो. किसी को भी बच्चे की झंझट नहीं चाहिए थी.

तभी उसे सुमन के बारे में पता चला. सुमन का भी पहले एक विवाह हो चुका था. पति फौज में था लेकिन शादी के एक साल बाद ही उस का फौजी पति एक युद्ध में शहीद हो गया. बेटे के गम में सुमन के ससुर भी दुनिया से चल बसे तो ससुराल वालों ने उसे अपशगुनी कह कर घर से निकाल दिया.

यहां मायके में भी भाईभाभी उसे बोझ समझने लगे थे. उस की बूढ़ी मां तो खुद बेटेबहू पर आश्रित थी तो वह क्या ही कहती लेकिन रोजरोज बेटी की दुर्दशा होते देख वह रोती और सोचती कि काश, फिर से बेटी का घर बस जाए तो वह चैन से जी पाए.

तभी एक दिन सुमन की चचेरी बहन उस के लिए विराज का रिश्ता ले कर आई. उस ने बताया कि विराज की पहली पत्नी मर चुकी है और उस की एक 4 साल की बेटी है. अगर सुमन की शादी विराज से हो जाती है तो उसे इस नरक से छुटकारा तो मिल ही जाएगा, एक बच्ची को उस की मां भी मिल जाएगी. उस ने यह भी कहा कि वह विराज को सुमन के बारे में सबकुछ बता चुकी है और वह सुमन से शादी के लिए तैयार है लेकिन सुमन का मत भी जानना जरूरी था कि क्या वह एक बच्चे के पिता से विवाह करने को तैयार है. कहीं बाद में ऐसा न हो कि मासूम सी मोहिका नैग्लेक्ट हो जाए? इसलिए सारी बात शादी से पहले ही क्लियर हो जाए तो अच्छा. और इस के लिए सुमन और विराज का एकदूसरे से मिलना जरूरी था.

उस दिन जब विराज अपनी बेटी मोहिका को ले कर सुमन से मिलने उस के घर पहुंचा तो बिना कोई सवाल किए उस ने मोहिका को अपनी गोद में उठा लिया और उसे पुचकारने लगी थी और मोहिका भी कैसे सुमन से लिपट गई थी जैसे वह उसे बहुत पहले से जानती हो.

शादी के बाद जब वह विराज के घर उस की दुलहन बन कर आई, उसी दिन से उस ने मोहिका को अपनी बेटी मान लिया था. उस के जीवन में मोहिका का सब से पहला स्थान था. उस का खानापीना, उस की देखभाल की सारी जिम्मेदारी सुमन ने ओढ़ ली थी. मोहिका की आंखों से ही वह सोती और उस की आंखों से ही जागती थी. उस की आंखों में कभी एक बूंद आंसू भी आ जाए तो वह तड़प उठती थी.

कोई भी मां अपनी बेटी को इस हद तक प्यार नहीं करती होगी जैसे सुमन मोहिका से करती थी. उस के सुख के लिए वह अपने सुखचैन की परवा न करती थी. मोहिका भी सुमन का आंचल पकड़े घूमती रहती. कोई उसे अपने पास बुलाता तो वह जा कर सुमन की गोद में छिप जाती थी. उस वक्त सुमन निहाल हो उठती थी.

उस वक्त मोहिका 6 साल की थी जब सुमन की तबीयत बहुत खराब हो गई और उसे अस्पताल में भरती करवाना पड़ा था लेकिन वह एक दिन भी अस्पताल में नहीं रह पाई मोहिका के बिना. उसे देख कर कोई कह ही नहीं सकता था कि वो मोहिका की सगी मां नहीं है.

वक्त के साथ जैसेजैसे मोहिका बड़ी होती जा रही थी, उस के व्यवहार में बदलाव दिखने लगा था. बहुत जिद्दी हो गई थी वह. कुछ सुनती ही नहीं थी सुमन की. कुछ बोलने पर चिल्लाती, घर के सामान फेंकती और अपनी नानीमौसी से फोन पर सुमन की शिकायत करती कि उस की मां बहुत बुरी औरत है.

वह जबतब अपनी नानी के घर जाने की जिद करती. उस के जिद्दीपन पर सुमन जब कड़े से उसे समझती कि वहां बारबार जाने से उस की पढ़ाई पर असर पड़ेगा, घर में जो मैम उसे ट्यूशन पढ़ाने आती हैं, वह वापस चली जाएंगी, इसलिए रोजरोज वहां जाने की जरूरत

ही क्या है? तो वह रोतेबिलखते फोन पर अपनी नानी से सुमन की शिकायत करती और कहती वह उसे यहां से आ कर ले जाए. उस की नानी उसे समझने के बजाय सुमन को ही खूब खरीखोटी सुना डालतीं और कहतीं कि सौतेली मां कभी सगी नहीं बन सकती.

सुमन खूब रोती और सोचती कि सौतेली मां इतनी बुरी क्यों मानी जाती है समाज में? आखिर, क्यों एक मां के पीछे सौतेली शब्द जोड़ दिया गया है. मां तो मां होती है, फिर इसे सौतेली कह कर कलंकित क्यों किया जाता रहा है? अब और क्या करे वह मोहिका के लिए जिस से सब को लगे कि सच में वह उसे अपनी बेटी मानती है.

मोहिका की मां बनना सुमन के लिए इतना भी आसान न था. रोज वह नईनई चुनौतियों से गुजरती थी. साबित करना पड़ता था उसे कि सच में वह मोहिका को अपनी बेटी मानती है. चलो, यह भी ठीक है लेकिन अब मोहिका भी उसे सौतेली मां समझने लगी थी. उसे लगता कि वह उसे उस के पापा से अलग कर देगी, सबकुछ छीन लेगी और अपना बच्चा होते ही मोहिका को इस घर से दूर कर देगी. ये सारी बातें उस के दिमाग में उस की नानी ही भरती थीं. सब पता था सुमन को लेकिन फिर भी चुप थी.

विराज से कुछ कह भी नहीं सकती थी इस बारे में, क्योंकि उस पर काम का वैसे ही बहुत लोड था तो वह उसे क्या ही टैंशन देती लेकिन सुमन जिस तनाव और परेशानी से गुजर रही थी, वही जान रही थी. एक दिन उस ने मोहिका को अपने पास बिठा कर समझना चाहा कि जैसा वह समझ रही है, ऐसा कुछ भी नहीं है और उस की नानी उसे गलत बात सिखा रही हैं, इसलिए उन की बातों पर ध्यान न दे लेकिन उस की बात समझने के बजाय मोहिका अपनी मां से ही लड़ने लगी कि वह उसे उस की नानी के खिलाफ भड़काने की कोशिश कर रही है.

मोहिका सुमन की कोई भी बात नहीं सुनती. वह जो कहती उस का उलटा ही करती और जब विराज उसे उस की गलतियों पर डांट लगाता तो उसे लगता कि उस की नानी सही ही कहती है कि उस की सौतेली मां उसे पापा से दूर कर देगी जबकि विराज उसे इसलिए डांट लगाता क्योंकि वह बहुत जिद्दी हो गई थी. पढ़ाईलिखाई से भी उस का ध्यान भटकने लगा था जबकि सुमन तो और उसे रोकती कि जाने दो, बच्ची है अभी. बड़ी होगी तो सब समझ जाएगी.

‘‘बच्ची नहीं रही अब. बड़ी हो चुकी है यह,’’ विराज ने आंख कड़ी करते हुए कहा था, ‘‘हर बात में जिद, गुस्सा सही नहीं है, सुमन. तुम मां हो इस की, समझओ इसे दुनियादारी के बारे में.’’ लेकिन सुमन की कहां कुछ सुनती थी वह जो उसे समझती कुछ. मोहिका को तो अपनी नानी की बातें ही सच लगती थीं. उसे तो अपनी नानी सगी और सुमन दुश्मन लगती थी. तभी तो बातबात पर वह सुमन की गलतियां निकालती, उस पर चीखतीचिल्लाती, उसे भलाबुरा कहती और सुमन सब सह जाती थी यह सोच कर कि बच्ची है अभी.

मोहिका की नानी का घर यहीं दिल्ली में ही है, इसलिए अकसर वह उन के घर जाती रहती थी और वहां से वह मोहिका का ब्रेनवाश कर के भेजती थी क्योंकि वहां से आते ही सुमन के साथ उस का व्यवहार बहुत खराब हो जाता था.

उस रोज मोहिका अपने मांपापा के कमरे से आती आवाज कान लगा कर सुन रही थी. उस के पापा सुमन से कह रहे थे कि नहीं, अब वह उस की जान जोखिम में नहीं डाल सकता है. इसलिए जो हो रहा है, होने दो. उस पर सुमन बोली कि नहीं, यह सही नहीं है. वह ऐसा नहीं कर सकती है. इसलिए वह अस्पताल जा रही है. मोहिका को दोनों की बातें कुछ समझ नहीं आईं. इसलिए वह वहां से हट गई. शाम को जब वह घर आई तो पता चला कि सुमन अस्पताल में भरती है.

सुमन के घर में न होने के कारण मोहिका अपनी नानी के घर चली गई. इधर अस्पताल से घर आने के बाद भी सुमन बीमार ही रही. शारीरिक दुर्बलता के कारण उस से ठीक से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था. विराज ने एक औरत को रख दिया जो पूरे दिन सुमन की देखभाल कर सके और उस के खानेपीने का ध्यान रख सके. वह औरत सुमन का बहुत ध्यान रखती थी. उस के हाथपांव भी दबाती लेकिन यह बात मोहिका की नानी को सहन नहीं हो पा रही थी. इसलिए उस ने मोहिका के मन में सुमन के खिलाफ और जहर भरना शुरू कर दिया कि उस की सौतेली मां उस के पापा की सारी कमाई अपने ऐशोआराम में लुटा देगी.

मोहिका को भी लगने लगा कि सुमन उस के पापा के सारे पैसे अपने पर लुटा देगी. यह घरपैसे सब ले लेगी वह. मतलब कि मोहिका के मन में उस की नानी ने इतना जहर भर दिया कि सुमन उसे अपनी दुश्मन नजर आने लगी.

सुमन समझ रही थी लेकिन क्या करती. कुछ कहती तो और बुरी बनती. मोहिका एक नाजुक डाल है जिसे जबरदस्ती नहीं, बल्कि धीरेधीरे ही झकाया जा सकता है और वह यही कोशिश कर रही थी. मगर उस की सारी कोशिश व्यर्थ जा रही थी, क्योंकि उस की नानी आग में घी डालने का काम जो कर रही थीं.

मोहिका भले ही अपनी सौतेली मां को अपना दुश्मन समझने लगी थी और उस से नफरत करने लगी थी लेकिन सुमन ऐसा कैसे कर सकती थी क्योंकि उस ने तो दिल से मोहिका को अपनी बेटी माना था और यह रिश्ता मरते दम तक नहीं टूट सकता था.

खैर, दिन यों ही बीतते जा रहे थे. मोहिका अब 22 साल की युवती बन चुकी थी और कालेज के थर्ड ईयर में चली गई थी. उस का रूपयौवन खूब निखर आया था. सुमन उस पर निहाल हुई जाती थी. मन करता उस का कि बेटी को गले से लगाए, उसे प्यार करे, उस के बाल संवारे लेकिन हिम्मत नहीं पड़ती थी उस की.

भले ही मोहिका की नानी अब इस दुनिया में नहीं रहीं लेकिन उस ने मोहिका के मन में सुमन के खिलाफ जो जहर का बीज बोया, अब वह पौधा बन चुका था. उसे सुमन एक आंख नहीं सुहाती थी, यहां तक कि, विराज का उस से हंस कर बातें करना, कुछ ला कर देना, कहीं बाहर घुमाने ले कर जाना उसे बरदाश्त नहीं होता था. जब भी विराज कुछ ऐसा करना चाहता, वह कोई न कोई अड़ंगा लगा देती, ताकि दोनों साथ में समय न बिता सकें. सुमन सब समझते हुए भी चुप रहती और बरदाश्त करती, क्योंकि इस के सिवा उस के पास और कोई चारा भी तो नहीं था लेकिन विश्वास था उसे कि एक न एक दिन सारी धुंध छंट जाएगी और मोहिका उस के पास वापस लौट आएगी.

विराज का टूरिंग जौब था. वह ज्यादातर बाहर ही जाता रहता है. पैसे तो बहुत थे इस जौब में लेकिन अपने परिवार के साथ समय बिताने का उसे बहुत कम ही मौका मिल पाता पर इस बात को ले कर निश्चिंत था कि सुमन है मोहिका को संभालने के लिए. हां, सुमन तो है ही और वह आज भी अपनी सभी जिम्मेदारियां वैसे ही निभा रही है लेकिन इधर मोहिका में अजीब तरह का बदलाव देख दंग थी सुमन. देररात तक फोन पर किसी से हंसहंस कर बातें करना और सुमन पर नजर पड़ते ही ‘आई कौल यू लेटर’ बोल कर फोन रख देना, समय से पहले कालेज चले जाना और देर से आना, आखिर क्या है ये सब? ये सब बात वह विराज से भी नहीं बोल सकती, वरना मोहिका की नजर में वह और बुरी बन जाएगी. युवा अवस्था दौर ही ऐसा होता है. युवा बच्चों के कदम डगमगा जाते हैं. कहीं मोहिका भी कुछ गलत तो नहीं. नहींनहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. मैं फालतू की बातें सोच रही हूं, सुमन अपने दिमाग को झटकते हुए खुद को चुप करा देती लेकिन फिर सोचती कि एक बार पूछने में हर्ज ही क्या है. इतना तो पूछ ही सकती है कि वह कौन है जिस से वह देररात तक बातें करती रहती है लेकिन अगर वह गुस्सा हो गई तो? सुमन के मन में कितने सारे सवाल फन उठा कर खड़े हो जाएं लेकिन उस की हिम्मत नहीं होती मोहिका से कुछ कहने या पूछने की, दिन यों ही बीतते जा रहे थे.

‘‘आदिल, सच बताओ, तुम मुझ से प्यार तो करते हो न?’’ रोज की तरह उस कौफीहाउस में बैठी मोहिका ने आदिल का हाथ अपने हाथ में लेते हुए पूछा. आदिल और मोहिका स्कूल के समय से दोस्त थे और अब यह दोस्ती प्यार का रूप ले चुकी थी. दोनों ने अपनी शादी को ले कर कई सारे सपने बुन डाले थे. ‘‘बोलो न आदिल, प्यार तो करते हो न, मुझ से?’’

‘‘हां, पर आज अचानक से यह सवाल क्यों?’’

‘‘बस, ऐसे ही,’’ मोहिका बोली, ‘‘जानते हो, जब तुम उस सौम्या से बात करते हो न तो मेरा कलेजा जल उठता है. कल तुम जब उस से हंसहंस कर बात कर रहे थे न तो मेरा तो मन किया कि मैं उस का गला ही दबा दूं,’’ मोहिका ने दांत भींचते हुए कहा.

‘‘अरे, बसबस,’’ आदिल हंसा, ‘‘पागल, ऐसा कुछ भी नहीं है. तुम्हें तो पता है, मैं और सौम्या वौलीबौल में हैं, तो उसी के बारे में डिस्कस कर रहे थे.’’

‘‘वह सब मुझे नहीं पता, पर तुम उस से ज्यादा बात नहीं करोगे, समझे,’’ मोहिका ने मासूम सा मुंह बनाते हुए कहा.

‘‘ठीक है भई, नहीं करूंगा, बस,’’ यह कह कर आदिल ने 2 कप कौफी और्डर किया और फिर दोनों कौफी पीते हुए बातें करने लगे कि तभी मोहिका के फोन पर सुमन का फोन आ गया.

‘‘यह लो मदर इंडिया का फोन आ गया. पर मैं उठाने वाली नहीं, भले बजता रहे फोन,’’ मोहिका ने मुंह बनाते फोन को एक तरफ रख दिया और आदिल से बातें करने लगी. फिर सुमन का कई बार फोन आया पर वह इग्नोर ही करती रही.

‘‘अरे, फोन उठा तो लो. पता नहीं कोई जरूरी बात करनी हो उन्हें?’’ आदिल के बहुत कहने पर भी उस ने सुमन का फोन नहीं उठाया.

‘‘अजीब हो तुम भी, क्या प्रौब्लम है तुम्हें उन से? समय तुम्हारा अच्छा है कि तुम्हारे पास मां तो है, सौतेली ही सही. कोई तो है घर में जो तुम्हारी चिंता करती है. मैं ने तो अपनी मां को देखा तक नहीं. मुझे जन्म देते ही वे चल बसीं. जान ही नहीं पाया कभी कि मां होती क्या है और उन का प्यार कैसा होता है. सही कह रहा हूं. तुम समय की बलवान हो जो तुम्हारे पास मां है.’’ आदिल की बात पर मोहिका ने अजीब सा मुंह बनाया.

‘‘ऐसे मुंह मत बनाओ, सही कह रहा हूं मैं. तुम कहती हो कि वे तुम्हारी सौतेली मां हैं और तुम से प्यार नहीं करतीं. अगर ऐसा ही है तो वे अपना बच्चा करतीं न? बोलो, क्यों नहीं किया आज तक? कभी यह सोचा है तुम ने? तुम्हें ही वे प्यार करती रहीं, तुम्हें ही अपना सबकुछ मानती रहीं और तुम ने क्या दिया उन्हें- नफरत, बेइज्जती, तिरस्कार? लेकिन इस के बावजूद, वे तुम्हारी इतनी चिंता करती हैं और तुम कहती हो कि वे तुम से प्यार नहीं करतीं?

‘‘मुझे यह सब नहीं पता कि उन्होंने अपना बच्चा क्यों नहीं किया और मैं जानना भी नहीं चाहती. मैं तो बस यही जानती हूं कि वह औरत मेरी सौतेली मां है और सौतेली मां कभी अपनी मां नहीं बन सकती.’’

‘‘अब तुम्हारी यही सोच है तो मैं क्या ही कह सकता हूं लेकिन एक बार उन्हें जानने की कोशिश जरूर करना वरना बाद में पछतावे के सिवा कुछ हाथ नहीं आएगा, समझ लो,’’ कह कर आदिल चलता बना और वह उसे जाते देखती रह गई.

रोज की तरह मोहिका रात के 8 बजे घर पहुंची और फिर डुप्लीकेट चाबी से दरवाजा खोल कर अंदर आ गई. सुमन ने कैसरोल में खाना रख दिया था. खाना खा कर वह अपने कमरे में जा कर सो गई. आधी रात को सुमन के कमरे से जोरजोर से खांसने की आवाज से मोहिका की नींद खुल गई. पापा घर पर नहीं थे इसलिए मोहिका सुमन के कमरे में चली गई उसे देखने.

‘‘क्या हुआ आप को? कुछ चाहिए? पानी, पानी चाहिए? लाती हूं.’’ जब वह सुमन को पानी देने लगी तो उस का हाथ उसे आग जैसा गरम लगा, ‘‘आप को बुखार है?’’

‘‘हां, सुबह से मन ठीक नहीं लग रहा है,’’ धीरे से सुमन बोली.

‘‘दवा ली आप ने?’’ मोहिका के पूछने पर वह बोली कि उस से उठा नहीं जा रहा है.

‘‘कहां पर है दवा?’’ इशारे से सुमन ने बताया कि उस अलमारी के पहले खाने में बुखार की दवा रखी है.

‘‘ठीक है,’’ कह कर वह अलमारी से दवा निकालने ही लगी कि भरभरा कर ऊपर से एक फाइल उस के सिर पर आ कर गिरी. ‘‘यह क्या है, मैडिकल की फाइल लग रही है.’’ वह पन्ना पलट कर देखने लगी तो उस की आंखें फटी की फटी रह गईं. ‘अबौर्शन, नाम- सुमन कश्यप.’

मोहिका ने पलट कर सुमन को देखा, जो बेसुध पड़ी थी. यानी मां ने अपना अबौर्शन करवाया वह भी 2 बार. पर क्यों, जब वे मां बन सकती थीं, फिर क्यों इन्होंने अपना बच्चा अबौट करवाया. मोहिका को आदिल की कही बात याद आने लगी जो उस ने कहा था कि कभी पूछा उस ने कि सुमन ने अपना बच्चा क्यों नहीं किया? अगर वह उस से सच में प्यार नहीं करती है तो अपना बच्चा करती न? क्यों नहीं किया फिर?

ओह, इतना बड़ा त्याग किया इन्होंने मेरे लिए. और मैं इन से नफरत करती रही आज तक?

‘‘मां, मुझे माफ कर दो’’ कह कर मोहिका सुमन से लिपट कर फूटफूट कर रोने लगी. सुमन तो घबरा ही गई एकदम से कि मोहिका को क्या हो गया.

‘‘क्या हुआ, बेटा, रो क्यों रही हो? किसी ने तुम से कुछ कहा क्या? बोलो न?’’ सुमन की बात पर मोहिका सिसकसिसक कर कहने लगी कि उस से उसे समझने में बड़ी भूल हो गई. वे उसे माफ कर दें.

‘‘पागल, मेरी बेटी,’’ सुमन ने मोहिका का माथा चूम लिया, ‘‘ऐसी कोई बात नहीं है, बेटा.’’

‘‘मां, एक बात पूछूं आप से, आप ने अपना बच्चा क्यों नहीं किया?’’

‘‘इसलिए, क्योंकि मैं पहले से ही एक प्यारी सी बेटी की मां थी तो फिर और बच्चा करने की क्या जरुरत थी,’’ प्यार से मोहिका का सिर सहलाते हुए सुमन कहने लगी, ‘‘मेरा प्यार, मेरा सबकुछ सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए है मेरी बच्ची. मैं इसे किसी के साथ बांट थोड़े न सकती थी.’’

‘‘मां, आप कितनी अच्छी हो और मैं ने आप को कितना गलत समझ लिया. अरे, मैं दवा देना तो भूल ही गई आप को.’’

‘‘अब कोई दवा की जरूरत नहीं है. मैं बिलकुल ठीक हो गई, देखो,’’ सुमन खिलखिला कर हंसते हुए बोली, ‘‘वैसे मुझे आदिल से कब मिलवा रही हो?’’

‘‘आदिल, लेकिन आप को आदिल के बारे में कैसे पता?’’ एक बच्ची की तरह अपने आंसू पोंछते हुए सवालिया नजर से मोहिका बोली.

‘‘सब पता है मुझे. यह भी कि तुम दोनों एकदूसरे से प्रेम करते हो. बोलो, मैं सच कह रही हूं?’’ सुमन की बात पर मोहिका शरमा गई और फिर फफक कर रोने लगी. सुमन भी रोए जा रही थी. मांबेटी के इन आंसुओं में सारी धुंध छंट चुकी थी. अब कोई गिलाशिकवा नहीं था उन के बीच. Family Story in Hindi

Widow Property Rights : विधवा बहू की संपत्ति में किस का अधिकार?

Widow Property Rights :

झंझट से बचने के लिए वसीयत जरूरी

65 साल की विधवा प्रेमा कुमारी के कोई संतान नहीं. 5 वर्ष पहले उस के पति की मृत्यु हो चुकी थी. इस के बाद से ही प्रेमा कुमारी बीमार रहती थी. एक दिन अचानक उस की मौत हो गई. अब सब से बड़ा सवाल यह है कि प्रेमा कुमारी की जमीन किस के उत्तराधिकार में जाएगी? वह संपत्ति जो विधवा की पैतृक नहीं है उस का क्या होगा?

कोविड के दौरान एक युवा दंपती की मौत हो जाती है. अब लड़के की मां अपने बेटे की संपत्ति पर अपना हक समझाती है और लड़की की मां अपनी बेटी की संपत्ति पर अपना अधिकार समझा रही थी. एक मामले में निसंतान दंपती की मृत्यु के बाद पुरुष की बहन संपत्ति को अपना समझा रही थी. आज के दौर में महिलाएं नौकरी में हैं, उन की अपनी स्वअर्जित आय होती है. इस आय, जो विधवा की संपत्ति है उस पर किस का अधिकार होगा?

भारत में उत्तराधिकार का अधिकार व्यक्तिगत कानूनों के अंतर्गत आता है. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के अनुसार हिंदू अविभाजित परिवार में बहू को विवाह की तिथि से ही परिवार के सदस्य का दर्जा मिल जाता है. बहू को संपत्ति में अपने पति के हिस्से या तो पति द्वारा स्वेच्छा से हस्तांतरित या पति की मृत्यु के बाद प्राप्त अधिकार के माध्यम से परिवार की संपत्ति में हिस्सा मिलता है.

बहू उस संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं जता सकती जो विशेष रूप से उस की ससुराल वालों की अपनी बनाई संपत्ति हो. ससुराल में बहू को केवल अपने पति के हिस्से पर ही अधिकार प्राप्त होगा. बड़ा सवाल यह है कि विधवा की संपत्ति में अधिकार मायके वालों का होगा या ससुराल वालों का?

सुप्रीम कोर्ट ने नि:संतान हिंदू विधवा की संपत्ति के उत्तराधिकार पर कहा कि हिंदू विवाह में जब कोई महिला शादी करती है, तो उस का गोत्र बदल जाता है. यह सदियों से चली आ रही परंपरा है और वह इस परंपरा को तोड़ना नहीं चाहता. ऐसे में उस की संपत्ति उस के मायके वालों के बजाय ससुराल वालों को मिलती है. अगर कोई महिला चाहे तो वह वसीयत के जरिए अपनी संपत्ति का बंटवारा कर सकती है.

हिंदू विवाह कानून की धारा 15(1)(बी) के तहत यदि किसी निसंतान विधवा की बिना वसीयत के मौत हो जाती है तो उस की संपत्ति उस के पति के वारिसों को मिलती है न कि उस के मायके वालों को. ऐसे में जरूरी है कि विधवा अपनी संपत्ति की वसीयत जरूर करे, जिस से उस की संपत्ति उस के अनुसार सही वारिस को मिल सके. Widow Property Rights

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