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Trending Debate : 90 घंटे काम तो कब आराम ?

Trending Debate : लार्सन एंड टूब्रो कंपनी के चेयरमैन एसएन सुब्रह्मण्यम के वर्कप्लेस पर हफ्ते में 90 घंटे काम करने वाले बयान पर गरमागरम बहस छिड़ी हुई है. कोई सुब्रह्मण्यम को गरिया रहा है तो कोई उन का समर्थन कर रहा है.

दिल्ली स्थित एक पोस्ट औफिस में शाम 4.45 पर लता एक जरूरी पत्र स्पीड पोस्ट करवाने पहुंची. काउंटर पर बैठी महिला ने उन से कहा, “आप को जल्दी आना चाहिए. अब तो स्पीड पोस्ट नहीं हो रही है.”

लता ने कहा, “अभी तो 5 बजने में पूरे 15 मिनट बाकी हैं. अभी से कैसे बंद हो गया? मैं सुबह जब साढ़े दस बजे आई थी तब आप की सीट खाली पड़ी थे. पता चला आप देर से आती हैं. 10 मिनट इंतजार कर के मैं अपने औफिस चली गई. अब भी मैं समय से आई हूं तो आप कह रही हैं कि जल्दी आना चाहिए?

“मैडम आप कल आइएगा. मैं सारे पैसे काउंट कर के भीतर जमा कर आई हूं. आज का हिसाब पूरा हो गया है. आप की वजह से मुझे फिर से हिसाब कर के भीतर जमा करना पड़ेगा.”

“तो आप को 5 बजे के बाद हिसाब करना चाहिए. पोस्ट औफिस तो 5 बजे बंद होता है. आपने पहले क्यों कर दिया?”

जब काउंटर पर बैठी महिला कर्मचारी ने स्पीड पोस्ट करने से साफ मना कर दिया तब लता ने पोस्ट औफिस के मैनेजर से लिखित में उस की शिकायत कर दी. यही नहीं उन्होंने फेसबुक पर भी यह बात वायरल कर दी. अगले दिन उस महिला कर्मचारी को उस काउंटर से हटा दिया गया. हालांकि इस से उस की कामचोरी की आदत नहीं जाएगी. वह जिस सीट पर होगी वहां समय से पहले ही काम बंद कर देगी.

यह हाल एक पोस्ट औफिस का नहीं, बल्कि अधिकांश सरकारी दफ्तरों का है. कर्मचारी न तो समय से अपनी सीट पर पहुंचते हैं, न ही पूरे वक़्त काम करते हैं. 5 बजने से पहले ही सीट से उठ कर चलते बनते हैं. जाड़ों के दिनों में तो अधिकांश दफ्तरों के कर्मचारी दोपहर की धूप खाने के लिए घंटों अपनी सीट से गायब रहते हैं. कुछ दफ्तर के बाहर मूंगफली खाते या चाय पीते नजर आते हैं.

भारत की धरती को धर्म की धरती कहा जाता है. यहां सदियों से ऋषिमुनियों, साधुसंतों को बहुत मान सम्मान दिया जाता है. उन्हें सिरमाथे पर बिठाया जाता है. पर ज़रा गंभीरता से सोचें तो क्या इन लोगों की देश के विकास में कोई भूमिका है? क्या वे किसी प्रकार का श्रम करते हैं? क्या वे अपनी मेहनत का खाते हैं? नहीं. ये निठल्ले लोग हैं, मेहनत मशक्कत और जिम्मेदारियों से दूर भागे लोग हैं. ये सिर्फ दूसरों की मेहनत की कमाई खाते हैं और हम इन्हें सिरमाथे पर बिठाते हैं. हमारे देश में न काम करने वालों को सिर पर चढ़ा कर रखा जाता है.

हम बेटी के लिए रिश्ता ढूंढते हैं तो चाहते हैं कि लड़का सरकारी नौकरी वाला मिल जाए. क्यों? क्योंकि वहां फुर्सत ज़्यादा है. पैसा अधिक है. ऊपरी कमाई है. हम मेहनती और काम में व्यस्त रहने वाले लड़के की जगह एक निठल्ला और कामचोर दामाद चाहते हैं. यह हम भारतीयों की मानसिकता है जो धर्म से प्रेरित है. हम आरामतलब लोग हैं और इसीलिए विकास के मार्ग पर कछुआ चाल चल रहे हैं.

प्राइवेट नौकरियों वाले समय के अभाव का रोना रोते हैं परन्तु देश अगर कुछ तरक्की कर रहा है तो उस का श्रेय प्राइवेट सैक्टर को ही जाता है. सरकार भी जानती है कि उस के कर्मचारी जो काम 100 दिन में करेंगे, प्राइवेट आदमी दो दिन में कर देगा. यही वजह है कि अधिकांश सैक्टर चाहे रेलवे हो, विद्युत या इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट सब प्राइवेट हाथों में चले गए हैं. वहां कम्पटीशन ज्यादा है. इसलिए कर्मचारियों के लिए काम के घंटे ज्यादा हैं.

मुंबई की लोकल ट्रेनों में औफिस से घर लौटने वाली महिलाओं को अपनी सीट पर बैठ कर सब्जी काटते हुए भी देखा जाता है क्योंकि घर पहुंचतेपहुंचते उन्हें इतनी देर हो जाती है कि परिवार के लिए खाना बनाने का थोड़ा सा समय बचता है. कई कर्मचारी तो रोड साइड पर बने ढाबों से पकी हुई सब्जी दाल खरीद कर ले जाते हैं ताकि घर पहुंच कर सिर्फ रोटी ही बनानी पड़े. इन कर्मचारियों के पास इतना समय ही नहीं बचता कि वे अपने बच्चों के साथ कुछ क्वालिटी टाइम बिता सकें. उन के साथ शाम को कहीं घूमने जा सकें. या उन की पढ़ाई के विषय में ही कुछ पूछ सकें.

रेखा एक रियल एस्टेट कंपनी में काम करती है. उस का औफिस सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक है. आएदिन औफिस के बाद मीटिंग्स होती हैं या उस को क्लाइंट वगैरह से मिलने जाना होता है. जिस के चलते घर लौटते लौटते कई बार तो 10 बज जाते हैं. घर लौट कर भी रेखा अपने लैपटौप पर लगी रहती हैं. उस की पगार अच्छी है. पति से तलाक हो चुका है क्योंकि इतनी अच्छी पगार छोड़ कर वह घर संभालने का काम नहीं करना चाहती थी. उस के काम के घंटे तय नहीं हैं. मगर पगार अच्छी होने के कारण उस को अपना काम बोझ नहीं लगता. वह विभिन्न लोगों से मिलती है, औफिस की पार्टियां एन्जोय करती है. क्योंकि उस ने अपने ऊपर घर गृहस्थी की कोई जिम्मेदारी नहीं ओढ़ी है. वह अपने फ्लैट में अकेली रहती है. इसलिए देर रात लौटने पर उस के सामने किसी की सवालिया आंखें नहीं होतीं.

शरबती गोरखपुर चौरीचौरा की निवासी है. वह पति के साथ खेतों पर काम करती है. सुबह 5 बजे से उस की दिनचर्या शुरू होती है. भैसों को दुहना, उन को चारापानी देना, सब के लिए खाना बनाना, फिर खेतों में जा कर पति और देवर के साथ शाम तक काम करना, लौट कर खाना बनाना, सब को खिलाना, बर्तन मांजना, सास की सेवा करना ऐसे बहुत सारे काम वह प्रतिदिन करती है. शरबती को बमुश्किल 5 घंटे का वक़्त ही आराम करने का मिल पाता है. यानी 19 घंटे वह काम करती है, जिस का उस को कोई भुगतान नहीं मिलता. कुछ कमीबेशी हो जाए तो पति की गालियां अलग से खाती है.

देश में भले श्रम कानून बना हो मगर आम भारतीय गृहणी सुबह 4 बजे से रात 11 बजे तक निरंतर कोई न कोई काम करती रहती है. उस के लिए काम के घंटे तय नहीं हैं. किसानों के लिए काम के घंटे तय नहीं हैं. वह साल भर खेतों में हाड़तोड़ मेहनत करता है. पुलिस वालों की ड्यूटी 24 घंटों की होती है. युद्ध का मौक़ा आता है तो सेना रात दिन लड़ती है. वहां कोई श्रम कानून काम नहीं करता. अभी अमेरिका के लौस एंजेलिस में आग लगी तो फायरमैन 36-36 घंटे लगे रहे हैं.

भारत में काम और कर्मचारियों के विभिन्न प्रकार हैं. कुछ लोगों से बहुत ज्यादा काम लिया जाता है और कुछ लोगों से कम, कुछ ऐसे भी हैं जो बिलकुल निठल्ले हैं. कुछ लोग वह काम करते हैं जो उन्हें पसंद होता है. इसलिए उस में कितना भी वक्त दें उन्हें अखरता नहीं है. और अगर उस में पेमेंट भी अच्छा हो तो सोने पर सुहागा. मगर अधिकांश लोग अपने परिवार के भरण पोषण के लिए काम करते हैं. यह काम उन की मजबूरी है. पेमेंट ठीक है तो उस काम का वह अच्छा आउटपुट भी देते हैं. अगर पेमेंट ठीक नहीं है तो मजबूरी में किए जा रहे ऐसे काम का आउटपुट भी कुछ ख़ास नहीं होता है. फिर चाहे वह कितने ही घंटे उस काम को देदे. कुछ लोगों को उन के 10 से 12 घंटे के काम का भी बहुत थोड़ा भुगतान होता है. इन में मजदूर वर्ग और गृहणियां शामिल हैं.

काम के घंटों को ले कर यह विभिन्न प्रकार का विवरण इसलिए है क्योंकि हाल ही में लार्सन एंड टूब्रो कंपनी के चेयरमैन एसएन सुब्रह्मण्यम ने अपने कर्मचारियों को सम्बोधित करते हुए कहा, “मुझे अफ़सोस है कि मैं आप को रविवार को भी काम पर नहीं बुला पा रहा हूं. अगर मैं आप से रविवार को भी काम करा सकता, तो मुझे ज्यादा ख़ुशी होती क्योंकि मैं रविवार को काम करता हूं. आप को सप्ताह में 90 घंटे काम करना चाहिए. अपने घर में बैठ कर आप क्या करते हैं? आप अपनी पत्नी को कितनी देर निहार सकते हैं और पत्नी अपने पति को कितनी देर निहार सकती है?”

उन्होंने यह बात इस सवाल के जवाब में कही थी कि कंपनी ने शनिवार को काम पर आना अनिवार्य क्यों कर दिया?

एसएन सुब्रह्मण्यम के इस वक्तव्य के बाद सोशल मीडिया, अख़बारों और टीवी स्क्रीन पर काम के घंटों को ले कर एक गरमागरम बहस छिड़ी हुई है. कोई सुब्रह्मण्यम को गरिया रहा है तो कोई उन का समर्थन कर रहा है. बड़ेबड़े दिग्गज काम के घंटों पर अपनी राय पेश कर रहे हैं. इस में फ़िल्मी सितारों से ले कर उद्योगपति तक शामिल हैं. यह मामला अब इतना तूल पकड़ चुका है कि बिहार में काराकट से सीपीआई-एमएल सांसद राजा राम सिंह ने बाकायदा श्रम मंत्री मनसुख मांडविया को पत्र लिख कर सुब्रह्मण्यम के बयान को श्रम कानूनों के उल्लंघन का मामला करार दे दिया है.

लेबर, टेक्सटाइल पर संसद की स्थाई समिति के सदस्य और बिहार में काराकाट से सीपीआई-एमएल सांसद राजा राम सिंह ने श्रम मंत्री मनसुख मांडविया को पत्र लिख कर कहा है, “एलएंडटी के चेयरमैन ने हाल में बयान दिए हैं कि कर्मचारियों को हफ्ते में 90 घंटे काम करना चाहिए. कुछ समय पहले इन्फ़ोसिस के कोफाउंडर नारायण मूर्ती ने कहा था कि युवाओं को हफ्ते में 70 घंटे काम करना चाहिए. लम्बे वर्क आवर से प्रोडक्टिविटी बढ़ती नहीं घट जाती है. श्रम कानूनों का उल्लंघन न होने देना सरकार की जिम्मेदारी है. सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि वर्कर्स को हफ्ते में 48 घंटे की कानूनी सीमा से ज्यादा काम के लिए मजबूर न किया जाए.”

सुब्रह्मण्यम के बयान पर बड़ी आपत्ति महिलाएं भी जता रही हैं क्योंकि एसएन सुब्रह्मण्यम ने अपने वक्तव्य में कहा कि आप घर में बैठ कर कितनी देर अपनी पत्नी को निहारेंगे?

शशि कहती हैं, “घर पर कौन सा पति दिन भर पत्नी को निहारता है? एक संडे का दिन हमें मिलता है साथ रहने का. बच्चे भी पिता का साथ चाहते हैं. पूरे हफ्ते इंतज़ार करते हैं. मैं अपने कुछ कामों में उन की हेल्प चाहती हूं. कभी रिश्तेदारी में जाना होता है. कभी डाक्टर के पास किसी जांच के लिए जाना होता है. हमारे रिश्तेदार भी संडे के दिन ही मिलने आते हैं. अब संडे भी औफिस बुला लो तो फिर घरपरिवार की जरूरत क्या है? इन को वहीं रख लो औफिस में. सुब्रह्मण्यम साहब की पत्नी उन को भाव न देती होंगी इसलिए वे अपना संडे भी औफिस में बिताते हैं. सब की पत्नियां उन की पत्नी की तरह थोड़ी हैं.”

वर्क लाइफ बैलेंस को ले कर छिड़ी बहस के बीच उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने भी अपनी राय रखी है. विकसित भारत यंग लीडर्स डायलोग 2025 कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा, “मेरी पत्नी वंडरफुल है, मुझे उसे निहारना अच्छा लगता है.”

आनंद महिंद्रा ने कहा कि वह काम के घंटों की जगह काम की गुणवत्ता में विश्वास करते हैं. यही नहीं, इंटरनेट मीडिया पर बहुत एक्टिव रहने से जुड़े एक सवाल पर उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा, “मैं उस प्लेटफौर्म पर इतना एक्टिव हूं तो इस का मतलब यह नहीं कि मैं अकेला हूं. इंटरनेट मीडिया अमेजिंग बिज़नेस टूल है. मुझे इस पर 11 मिलियन लोगों का फीडबैक प्राप्त होता है. मैं घर और औफिस के कामों में बैलेंस रखता हूं. मेरी पत्नी बहुत प्यारी है, मुझे उसे निहारते रहना अच्छा लगता है.”

आनंद महिंद्रा ने कहा कि मौजूदा बहस गलत है, क्योंकि यह काम घंटों पर जोर देती है. उन्होंने युवाओं से कहा, “मैं नारायण मूर्ति और अन्य लोगों का बहुत सम्मान करता हूं. इसलिए मैं इसे गलत नहीं समझूंगा, लेकिन मुझे लगता है कि यह बहस गलत दिशा में जा रही है. मेरा मानना है कि हमें काम की गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए, काम के घंटों पर नहीं. इसलिए यह 40, 70 या 90 घंटे की बात नहीं है. यह काम के आउटपुट पर निर्भर करता है. अगर 10 घंटे काम कर के अच्छा आउटपुट दे रहे हैं तो आप दुनिया बदल सकते हैं. मेरा मानना है कि किसी कंपनी में ऐसे लीडर होने चाहिए जो समझदारी से निर्णय लें, समझदारी से चुनाव करें.”

परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताने की जरूरत पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि अगर आप घर पर समय नहीं बिता रहे हैं, अगर आप दोस्तों के साथ समय नहीं बिता रहे हैं, अगर आप पढ़ नहीं रहे हैं, अगर आप के पास सोचनेसमझने का समय नहीं है, तो आप फैसला लेने में सही इनपुट कैसे लाएंगे? एक व्यक्ति तभी बेहतर निर्णय ले सकता है जब उस की जिंदगी का संतुलन सही हो.

बता दें कि अभी कुछ वक्त पहले इनफोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ती ने भी सप्ताह में 70 घंटे काम करने की सलाह दी थी. उन के बाद लार्सन एंड टूब्रो (एलएंडटी) के चेयरमैन एसएन सुब्रह्मण्यम ने अपने कर्मचारियों को सप्ताह में 90 घंटे काम करने का सुझाव देते हुए कहा कि पत्नी को कितना निहारोगे? रविवार को भी काम करो.

गौरतलब है कि वर्क लाइफ बैलेंस पर यह बहस ऐसे समय छिड़ी है जब कई देशों में 4 दिन के वर्क वीक का प्रयोग चल रहा है. ओयो के सह संस्थापक और सीईओ रितेश अग्रवाल का कहना है कि काम के घंटों की अवधारणा सही नहीं है. उन्होंने कहा, “काम के लिए सही अवधारणा यह है कि आप को पूरे मन से काम करना चाहिए. हर कोई विकसित भारत मिशन के लिए पूरे मन से काम कर रहा है. कुछ लोग दिन में केवल 4 घंटे में प्रोडक्टिव हो सकते हैं, जबकि कुछ लोगों को 8 घंटे लग सकते हैं. हर किसी का काम करने का अपना तरीका और रास्ता हो सकता है.”

यह सच है कि भारत में प्रोडक्टिविटी अन्य देशों के मुकाबले कम है मगर यहां वर्कर्स का वेतन भी बहुत कम है. दूसरी तरफ सरकारी महकमों ने काम न करने की ऐसी मानसिकता फैला रखी है कि लोग आलसी और कामचोर ज्यादा हो गए हैं. वे अपने आराम के आगे देश के विकास की बात सोच ही नहीं पाते. ऐसे में जब नारायण मूर्ति या सुब्रह्मण्यम जैसे लोग काम के घंटे बढ़ाने की बात करते हैं तो आलोचना का बाजार गर्म हो जाता है.

दरअसल चीजें प्राइवेट और सरकारी दोनों जगहों पर समान रूप में लागू किए जाने की आवश्यकता है. देश के विकास में दोनों ही सेक्टर महत्वपूर्ण हैं. प्राइवेट सेक्टर वालों का खून चूस लो और सरकारी महकमे के लोग अय्याशियां करते रहें, इस से देश का विकास नहीं होगा.

प्रोडक्टिविटी बढ़ाने के लिए वर्कर्स में उत्साह जागृत करने की जरूरत है. उत्साह तभी जागृत होगा जब वेतन बढ़िया होगा. इस के लिए कामकाजी माहौल भी बेहतर होने चाहिए. वर्कर्स की स्किल बढ़ाने के लिए तकनीक में अधिक से अधिक निवेश की जरूरत है. अच्छी मशीनरी लगाईं जाए. मौसम के हिसाब से वर्क फ्लोर पर सुविधाएं हों, जो कई देशों में होती हैं. वर्क एनवायरनमेंट बेहतर होगा तो 90 घंटे का काम कम समय में भी हो सकता है और उस की क्वालिटी भी अच्छी होगी.

चीन में हफ्ते में 40 घंटे काम का समय तय है. लेबर लौ औफ चाइना के अनुसार, चीन के लोग रोजाना 8 घंटे और सप्ताह में 40 घंटे काम करते हैं. यहां के लोग सप्ताह में 5 दिन ही काम करते हैं. इसलिए पूरे सप्ताह में यहां के लोग 40 घंटे ही काम करते हैं. हालांकि, चीन के विशेष क्षेत्रों में 996 वर्क कल्चर भी प्रभावी है. इस का मतलब यह है कि टैक्नोलौजी और वित्त क्षेत्र में कर्मचारियों से सप्ताह में 6 दिन, सुबह 9 से रात 9 बजे तक काम लिया जाता है, लेकिन यह सप्ताह में 72 घंटे ही होता है. हालांकि, चीन की सरकार ने हाल के वर्षों में 996 वर्क कल्चर और अनियमित कामकाजी घंटे को नियंत्रित करने के लिए कदम भी उठाए हैं.

चीन में सप्ताह में 40 घंटे का कामकाजी समय संतुलित और कुशलता से कार्य को बढ़ावा देता है. कर्मचारियों को आराम का समय मिलता है, जिस से उन की उत्पादकता में बढ़ोतरी होती है. नियमित कामकाजी घंटे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद करते हैं. तनाव और बर्नआउट कम होता है. लंबे घंटों यानी 996 वर्क कल्चर के विपरीत 40 घंटे की सीमा कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाती है.

जापान में भी श्रम मानक अधिनियम लागू है. इस का मकसद, काम करने की ऐसी स्थितियां सुनिश्चित करना है जो श्रमिकों की जरूरतों को पूरा करें. जापान में, एक सामान्य कार्य सप्ताह में प्रतिदिन 8 घंटे और पूर्णकालिक कर्मचारियों के लिए प्रति सप्ताह 40 घंटे के वैधानिक कार्य घंटे हैं. ओवरटाइम की सीमा महीने में 45 घंटे और साल में 360 घंटे है. इन सीमाओं का उल्लंघन करने पर कंपनी को जुर्माना और जेल हो सकती है.

जापान में श्रम मानक कानून के तहत मजदूरी और अन्य प्राथमिक कार्य स्थितियों के लिए न्यूनतम मानक तय किए गए हैं. जापान में कर्मचारियों को कई तरह के अवैतनिक अवकाश भी मिलते हैं, जैसे कि मातृत्व अवकाश, शिशु देखभाल अवकाश, परिवार देखभाल अवकाश और नर्सिंग अवकाश. जापान में, नियोक्ता को कर्मचारियों के साथ ईमानदारी से परामर्श करना होता है. जापान में, नियोक्ता को कर्मचारियों के साथ प्रतिकूल व्यवहार करना मना है.

अमेरिका में तो परिवार और चिकित्सा अवकाश अधिनियम (एफएमएलए) 50 या उस से ज्यादा कर्मचारियों वाले नियोक्ताओं को कर्मचारियों को सालाना 12 हफ्ते तक का अवैतनिक अवकाश देने की बाध्यता देता है.

भारत में सरकारी कर्मचारियों और प्राइवेट कर्मचारियों के काम के घंटे, काम के तरीके और आउटपुट में जमीन आसमान का अंतर है. सरकारी कर्मचारी जहां 7 – 8 घंटे की ड्यूटी में आधा वक़्त गप्पे मारने, घूमने, खाने और चाय पीने में व्यतीत करते हैं वहीं प्राइवेट जौब वाला 9 – 10 घंटे अपनी सीट पर बैठ कर भी कभीकभी अच्छा आउटपुट नहीं दे पाता क्योंकि वह थक चुका होता है. जब किसी मजबूरीवश वह ऐसी नौकरी में आता है जहां काम के घंटे बहुत अधिक हैं और वेतन कम है तो उस के लिए ऐसी नौकरी एक उबाऊ चीज हो जाती है. आप उस को 10 की जगह 14 घंटे बिठा लीजिए, आउटपुट जीरो ही रहेगा.

इस के विपरीत यदि नौकरी पसंद की हो, उत्साहित करने वाली हो, वेतन ज्यादा हो, नियोक्ता अपने कर्मचारी के ओवरटाइम और अवकाश का ख्याल रखता हो, वहां कर्मचारी चाहे 4 घंटे काम करे या 10 घंटे, उस का आउटपुट बहुत अच्छा होगा. वह कम समय में भी अच्छा रिजल्ट देगा.

इस बात पर भी चिंतन जरूरी है कि कोई भी व्यक्ति नौकरी इसलिए करता है ताकि वह अपने परिवार का भरण पोषण कर सके और उन के साथ जिंदगी को एंजोय कर सके. उस के लिए परिवार प्रथम है. यदि उस से हफ्ते के सातों दिन काम करवाया जाए और उस को अपने परिवार के साथ हंसनेबोलने, घूमनेफिरने का वक़्त ही न मिले तो ऐसा काम न सिर्फ उस के लिए भार बन जाएगा, उस काम में उस का इंटरेस्ट ख़त्म हो जाएगा, उस का आउटपुट बेकार होगा, बल्कि उस की सेहत भी खराब होती चली जाएगी. वह डिप्रेशन, तनाव और बीपी का मरीज बन जाएगा.

विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि वयस्कों को रात में 7 से 9 घंटे सोना चाहिए. जो वयस्क रात में 7 घंटे से कम सोते हैं, उन में 7 या उस से अधिक घंटे सोने वालों की तुलना में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं अधिक होती हैं. वह समय से पहले बूढ़ा हो जाता है. उस की कार्यक्षमता घट जाती है. यदि वह अपनी समस्याएं और अपने काम के तनाव को किसी के साथ शेयर नहीं कर पाता, तो जल्दी ही उस का मानसिक संतुलन गड़बड़ा जाएगा. ऐसे व्यक्ति से अच्छे काम की उम्मीद करना ही व्यर्थ है.

दुनिया भर में औसतन वीकली वर्क औवर 40-50 घंटे के बीच हैं. कई देशों में तो हफ़्ते में सिर्फ 4 दिन ही काम लिया जाता है. भारत में भी मजदूरों और दफ्तरों में वर्कर्स के लिए श्रम कानून के तहत काम के घंटे तय हैं. अधिनियम के अनुसार, 6 दिनों में प्रति सप्ताह अधिकतम 48 घंटे काम करना अनिवार्य है, तथा किसी भी कर्मचारी को प्रतिदिन 9 घंटे या सप्ताह में 48 घंटे से अधिक काम करने की अनुमति नहीं है.

कारखाना अधिनियम, 1948 और दुकानें एवं प्रतिष्ठान अधिनियम (एसईए) के मुताबिक, मजदूरों को रोजाना 9 घंटे या हफ्ते में 48 घंटे से ज्यादा काम नहीं कराया जा सकता. इस में एक घंटे का आराम या भोजन अवकाश शामिल है. अगर कोई मजदूर सामान्य काम के घंटों से ज्यादा काम करता है, तो उसे ओवरटाइम वेतन का हक मिलता है. नाबालिग मजदूरों को रोजाना साढ़े 4 घंटे से ज्यादा काम नहीं कराया जा सकता. नाबालिग मजदूरों को रात में काम करने की अनुमति नहीं है. लड़कियों को सिर्फ़ सुबह 8 बजे से शाम 7 बजे के बीच काम करने की अनुमति है.

भारत में काम के घंटों को ले कर कई कानून हैं, जिन में से एक न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948 भी है. इस अधिनियम के तहत, कामकाजी हफ़्ते को 40 घंटे या रोजाना 9 घंटे तक सीमित किया गया है.

दफ्तरों में वर्कर्स के लिए काम के घंटे को ले कर कई कानून हैं. न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948 के मुताबिक, कामकाजी सप्ताह 40 घंटे या प्रतिदिन 9 घंटे तक सीमित है. कारखाना अधिनियम 1948 और दुकानें एवं प्रतिष्ठान अधिनियम (एसआई) के मुताबिक, काम के लिए हर दिन 9 घंटे और हर सप्ताह 48 घंटे का समय तय है.

श्रम संहिता-2020 के तहत, काम के घंटों को बढ़ा कर प्रतिदिन 12 करने का प्रावधान है, लेकिन सप्ताह में यह अधिकतम घंटे 48 तक सीमित रहे. अगर कोई कर्मचारी अपने तय वक्त से ज्यादा काम करता है, तो उसे ओवरटाइम का पैसा मिलना चाहिए. ओवरटाइम वेतन की गणना सामान्य मजदूरी की नियमित दर से दोगुनी दर पर कराई जाती है. हर 5 घंटे काम के बाद 30 मिनट का ब्रेक देना होगा.

भारत में श्रम कानूनों, श्रमिकों के वेतन, निवेश, तकनीक और सुविधा आदि पर गहन मंथन की जरूरत है. सरकारी और प्राइवेट सेक्टर में जो जमीन आसमान का अंतर है उस में कोई बीच का रास्ता तलाश करना होगा. एक व्यक्ति हफ्ते में 48 घंटे काम करे और दूसरा व्यक्ति 90 घंटे काम करे तो ऐसी व्यवस्था में तो समाज और देश में तनाव ही बढ़ेगा.

Hindi Story : भाभी! आप ना मत कहना

Hindi Story : चाय की ट्रे हाथों में थामें समीरा ने कमरे में जैसे ही प्रवेश किया उसकी नज़रें सुवित से मिलीं जिसे देखते ही धड़कनें बेतहाशा धड़कने लगीं. एक क्षण के लिए दिमाग ने काम करना ही बंद कर दिया. नीरजा ने कहा था कि उसके ब्वॉयफ्रेंड से मिलकर होश उड़ जाएंगे मगर यह सब सचमुच होगा इस बात का ज़रा भी इल्म न था.

“मेरे होश उड़ाने वाला शख़्स इस संसार से कूच कर चुका है” उस वक़्त उसे ख़ामोश कर दिया था मगर उसका अतीत इस तरह से सामने आ टपकेगा ये कहाँ जानती थी. फटाफट रसोई में आ गई. कहीं उसके चेहरे की सफ़ेदी उसका हाल-ए-दिल बयां न कर दे.

सुवित नीरजा का रिश्ता लेकर आया था. इस बात पर पूरा परिवार बहुत खुश था. एनआरआई डॉक्टर स्वयं चलकर घर तक आया था. बिना किसी दान-दहेज़ की मांग के सामने से आया रिश्ता भला कौन छोड़ता. परिवार में बस दो भाई हैं सुवित और सक्षम. नीरजा व सक्षम फैशन टेक्नोलॉजी कर एक ही ऑफिस में साथ काम कर रहे हैं.

नीरजा ने सुबह ऑफिस जाने के पहले बस इतना ही बताया कि लड़के वाले रिश्ता लेकर आएंगे और अब दोनों ही परिवार आमने-सामने थे. जब सबको रिश्ता इतना ही पसंद था तो तय तो होना ही था इसमें समीरा भला क्या कर लेती मगर सुवित इस घर का दामाद बना तो वह अपने दिल को कैसे संभालेगी यही सब सोचती कचौरियाँ तले जा रही थी कि सुवित की आवाज़ ने चौंका दिया.

“वाशरूम किधर है?”

“इस ओर…… ”

“जाना किसे है.. तुमसे बात करनी है…तुम कैसी हो?”

“ये सही वक़्त नहीं….. ”

“सही वक़्त तो कभी न था तुम्हारे पास…. तब मायके में कचौरियाँ तलती थीं अब यहाँ……. ”

“कहना क्या चाहते हो?”

“शादी करना चाहता हूँ…”

“विधवा से?”

“अपने प्यार से…”

“और नीरजा का क्या होगा?”

“तुम अब भी वही हो…बिना जाने समझे कुछ भी सोच लेने की आदत गई नहीं….!”

हाँ वह पहले भी सुवित को अपनी सहेली के साथ बातें करते देख गलतफहमी का शिकार हो गई थी जबकि दोनो उसके जन्मदिन की पार्टी प्लान कर रहे थे. वह वाक़या याद आते ही सकुचा गई तो समीर आगे बढ़ा.

“बेवकूफ! वो मेरे छोटे भाई ‘सक्षम’ की गर्लफ्रैंड है…हम नीरजा के लिए सक्षम का रिश्ता लेकर आये हैं।”

“ओह!”

समीरा को गुलाबी पड़ते देख समीर की शरारत जाग गई.

“वैसे लगे हाथ अपनी बात भी कर लें…”

यह सुनते ही उसके कपोल गर्म हो गए. घबड़ा कर इधर-उधर देखने लगी. क्या कहती.. उसके पास कहने -सुनने के लिए कुछ रह ही नहीं गया था. आदित्य के जाने के बाद उसने खुद को ससुरालवालों की सेवा में झोंक दिया था. रात दिन बस यही सोचती कि भले ही उसने अपना पति खोया पर उन्होंने अपना बेटा और नीरजा ने भाई खोया है. आदित्य से जुड़े लोग और उनके प्रति फ़र्ज़ ही मानो उसके जीने का मक़सद बन गए थे. सुबह शाम नीरजा की भाई बन जाती और उसके ऑफिस जाने के बाद सास ससुर का बेटा. वह भी नीरजा पर खूब स्नेह लुटाते. उसे कभी नाम से नहीं बल्कि बेटा ही कहकर पुकारते. कहना अतिशयोक्ति न होगी समीरा अपने ससुराल की ही होकर रह गई थी कि उसकी तपस्या भंग करने सुवित आ पहुँचा. उसे इस गुस्ताख़ी से बात करते देख जैसे जम गई हो. उसकी मन: स्थिति महसूस कर सुवित वापस लिविंग रूम में आकर बैठ गया.

“आपकी बेटी नीरजा लाखों में एक है..सक्षम और वह एक-दूसरे से प्यार करते हैं…एक- दूसरे को अच्छी तरह जानते- समझते हैं पर यहाँ मैं आपकी बहू समीरा के लिए अपने बड़े बेटे ‘सुवित’ का रिश्ता लेकर आया हूँ. मैं पहले समीरा के घर गया था पर उन लोगों का कहना है कि समीरा के जीवन के सभी फैसले उसके ससुराल वालों पर निर्भर करते हैं. उसने बड़े दुःख देखे हैं, शादी के एक वर्ष के भीतर ही कार एक्सीडेंट में पति को खोने के बाद स्वयं को सबसे दूर कर लिया है. जबकि उसकी उम्र ही क्या है? अगर आपकी व समीरा की ‘हाँ’ है तो एक ही मंडप में दोनों शादियाँ निपटा लें? आप इस विषय में क्या सोचते हैं? मैं आपके जवाब की प्रतीक्षा करूँगा.” सुवित के पिताजी यह कह कर चले गए।

समीरा कहाँ तैयार थी? शादी उसके लिए जितना ही सुखद था उतना ही दुखद भी. बस ननद नीरजा ने ही उसे संभाला था. जाने क्या था ननद में कि उसमें उसकी जान बसती थी. तुरंत उसे फ़ोन मिलाया. जबकि वह लगातार हँसे जा रही थी.

“भाभी जान! देखा! होश ग़ुम हो गए न मिलकर? हम साथ- साथ हैं..साथ जियेंगे-साथ मरेंगे!” समीरा को छेड़ते हुए बोली.

“अच्छा.. ये सब आपको पता था तो पहले क्यों न बताया?”

“कम ऑन भाभी..पहले बताती तो क्या आप सुवित भैया को घर बुलाते? आप सभी के इंकार शुरू हो जाते. घरवालों से भी सारे डिटेल्स इसलिए ही छुपाए.

सुवित भैया और आप एक -दूसरे को जानते हैं,ये बात सक्षम ने ही मुझे बताया. जब सुवित भाई ने मेरे फ़ेसबुक पर हम दोनों की साथ की फोटोज देखीं तो उन्होंने पूरी कहानी सक्षम को बताई कि आपकी मर्ज़ी जाने बिना आपकी शादी कर दी गई तो वह भी USMLE देकर अमेरिका में सेटल हो गए मगर दूरियाँ भी दूरियाँ न ला सकीं. आपके लिए उनकी चाहत अभी भी वैसे ही बरक़रार है यह जानने के बाद ही हमने यह योजना बनाई. सक्षम की बात सुनते ही वह फ़ौरन इंडिया आ गए. आपकी मर्ज़ी जाने बिना रिश्ता करना उन्हें मुनासिब नहीं लगा. अब तो सारे शंकाओं का समाधान हो गया न भाभी! अब प्लीज़ आप न मत कहना!”

समीरा निशब्द थी. उसकी ननद,उसकी सच्ची सहेली बन गई थी और सास -ससुर माता-पिता. उन्होंने भी इस रिश्ते को सहर्ष स्वीकार कर लिया क्योंकि उनके बाद समीरा अकेली न पड़ जाए यही चिंता उन्हें भी खाए जा रही थी.

फिर क्या था? शुभ मुहूर्त देख कर दोनों जोड़े ब्याहे गए. ससुर के हाथों कन्यादान होता देख सबकी आँखे भर आईं. एक और हाथ आशीर्वाद दे रहे थे जिसे बस समीरा महसूस कर रही थी और मन ही मन आदित्य को धन्यवाद दे रही थी.

लेखिका – आर्या झा 

Hindi Story : हवस

Hindi Story : कार्तिक पूरी तरह से टूट चुका था. हवस की आग ने उसे जला दिया था. अब उस की जिंदगी के अगले कई साल जेल की सलाखों के पीछे गुजरेंगे. हवस की इस आग में उस के सपने, मांबाप के अरमान सब भस्म हो गए. उस का दिल बारबार बस यही सोचता कि काश, वह अपने मन को हवस के दलदल में न फंसने देता और अपनी पढ़ाईलिखाई पर ध्यान देता…

6 महीने पहले की ही तो बात है. कल्पना गुमला से रांची आई थी. कार्तिक की उस से कालेज में जानपहचान हुई थी जो धीरेधीरे दोस्ती में बदल गई थी.

कार्तिक कल्पना के साथ कभी फिल्म देखने जाता तो कभी पार्क में घूमने. कल्पना हर बात में, हर काम में उस का साथ देती थी.

गांव से आई कल्पना भोलीभाली लड़की थी. कार्तिक उस की हर इच्छा पूरी करता था. मोटरसाइकिल से घुमाना, सिनेमा दिखाना, होटल में खिलाना, गिफ्ट देना सबकुछ, पर उस के मन में कभी भी कल्पना के प्रति प्यार नहीं था. वह तो उस के गदराए बदन का मजा लेना चाहता था. पर शायद कल्पना इसे प्यार समझने लगी थी.

जब कार्तिक को लगा कि कल्पना उस के प्रेमजाल में फंस चुकी है तो उस ने धीरेधीरे अपने पर फैलाने शुरू किए. पहले हाथों से छूना, फिर चूमना, गले लगाना और धीरेधीरे सबकुछ. यहां तक कि पार्क के कोने में उस ने कल्पना के साथ हर तरह का शारीरिक सुख भोग लिया था. इसी तरह कभी सिनेमाघर में, तो कभी किसी होटल में वह अपनी ख्वाहिश को पूरा करता रहता था.

कार्तिक कल्पना के शरीर के बदले उस पर खर्च करता था और उस की नजर में हिसाब बराबर हो रहा था. पर कल्पना की बात अलग थी. वह कार्तिक को अपना प्रेमी मानती थी और उस से शादी करना चाहती थी.

एक बार कल्पना को महसूस हुआ कि कार्तिक के साथ जिस्मानी रिश्ता बनाने से वह पेट से हो गई है. उस ने उसे बताया था, ‘कार्तिक, मैं तुम्हारे बच्चे की मां बनने वाली हूं.’

यह सुन कर कार्तिक चौंका था, पर जल्दी ही सहज हो कर उस ने कहा था, ‘अभी हम दोनों को पढ़ाई पूरी करनी है. किसी लेडी डाक्टर से मिल कर इस समस्या से छुटकारा पा लेते हैं.’

‘मुझे कोई एतराज नहीं, पर आगे चल कर हमें शादी करनी ही है तो अगर हम अभी शादी कर बच्चे को आने दें तो इस में क्या हर्ज है?’ कल्पना ने प्रस्ताव रखा था.

‘शादी…’ कार्तिक चौंका था, पर यह सोच कर कि कहीं कल्पना का शरीर दोबारा न मिले इसलिए बोला था, ‘अभी पढ़ाई, फिर कैरियर, उस के बाद शादी.’

कल्पना ने इसे शादी की रजामंदी मान कर लेडी डाक्टर से मिल कर बच्चा गिरवा दिया था. कार्तिक और कल्पना पहले की तरह मजे से रहने लगे थे. पर अब कार्तिक सावधान था. बच्चा न ठहरे, इस के लिए वह उपाय कर लेता था.

इसी बीच कल्पना को भनक लग गई कि कार्तिक उस से नहीं बल्कि उस के शरीर से प्यार करता है. उस की शादी की बात कहीं और चल रही है. उस ने फोन कर कार्तिक को रेलवे स्टेशन बुलाया.

रेलवे स्टेशन से कुछ ही दूरी पर एक सुनसान जगह थी जहां वे पहले भी कई बार मिले थे. कार्तिक ने वहां झाडि़यों के पीछे उस के साथ जिस्मानी रिश्ते भी बनाए थे. कार्तिक मन में जिस्मानी सुख पाने की उमंग लिए वहां जा पहुंचा.

कल्पना के चेहरे पर तनाव देख कर वह हंस कर बोला, ‘क्या हुआ, फिर लेडी डाक्टर के पास चलना पड़ेगा क्या? पर अब तो हम काफी संभल कर चल रहे हैं.’

‘सीरियस हो जाओ कार्तिक. तुम मुझ से शादी करोगे न?’ कल्पना ने उदास हो कर पूछा था.

‘पागल हो रही हो. अभी शादी की बात कैसे सोच सकते हैं हम?’ कार्तिक जोश में आ कर बोला था.

कहां वह जिस्मानी मजा लेने की बात सोच कर आया था, कहां कल्पना उसे दूसरी बातों में उलझाए हुए थी.

‘मैं अभी की बात नहीं कर रही…4 साल बाद ही सही, पर शादी तुम मुझ से ही करोगे. मैं ने तुम्हें अपना सबकुछ इसीलिए सौंपा है,’ कल्पना बोली थी.

‘दोस्ती अलग चीज है, शादी अलग चीज है. मैं तुम्हारी दोस्ती की कीमत अदा करता रहा हूं. शादी की बात तो सोचो ही मत,’ कार्तिक ने बेरुखी से कहा था. उस का मन उचाट हो आया था. सारा जोश जाता रहा था.

‘मैं अपना सबकुछ तुम्हें तुम्हारी कीमत के चलते नहीं प्यार के चलते सौंपती रही, लेकिन मुझे नहीं पता था कि तुम मेरे प्यार को पैसे से तोल रहे हो. पर अगर तुम प्यार को पैसे से खरीद रहे थे तो मैं भी अपने प्यार को ताकत के बल पर पा लूंगी. मेरे चाचा और मामा नक्सली हैं. जब चाहें तुम्हें और तुम्हारे परिवार को मिटा सकते हैं,’ कहते हुए कल्पना को गुस्सा आ गया था.

कार्तिक कल्पना की बात सुन कर डर गया था. वह जानता था कि कल्पना जहां से आई है, वहां नक्सलियों का अड्डा है. वह आएदिन नक्सली वारदातों की खबरें अखबार में पढ़ता था.

कुछ दिन पहले ही कार्तिक के परिवार वालों ने किसी लड़की से उस की शादी की बात भी चला रखी थी. उसे लगा, अगर कल्पना जिंदा रहेगी तो रंग में भंग डालेगी. उस ने झपट कर कल्पना की गरदन पकड़ ली और उस पर तब तक दबाव बनाता गया जब तक कि उस ने शरीर ढीला नहीं छोड़ दिया.

कार्तिक को अभी भी यकीन नहीं हुआ कि कल्पना ने दम तोड़ दिया है तो उस ने अपनी बैल्ट से फिर उस का गला दबा दिया व चुपचाप अपने घर आ गया.

कार्तिक मन ही मन घबराया हुआ था पर जिस जगह पर उस ने कल्पना की लाश छोड़ी थी उधर किसी का आनाजाना न के बराबर होता था. कौएकुत्ते उसे नोंच कर खा जाएंगे यही सोच कर वह अपने मन को संतोष देता था. पर 2 दिनों के बाद एकाएक पुलिस ने उसे दबोच लिया. शायद किसी ने लाश की सूचना पुलिस को दे दी थी और पुलिस उस तक पहुंच गई.

Sonu Sood : कमजोर पटकथा और बिना सिरपैर की कहानी, हॉलीवुड फिल्म की नकल है ‘फतेह’

Sonu Sood : रेटिंग:: एक स्टार
निर्माता : सोनल सूद, जी स्टूडियो और शक्ति सागर प्रोडक्शन
लेखक : सोनू सूद व अंकुर पजनी
निर्देशक : सोनू सूद
कलाकार : सोनू सूद, जैकलीन फर्नांडीस, नसीरूद्दीन शाह, विजय राज, दिव्येंदु भट्टाचार्य, प्रकाश बेलावड़ी, शिव ज्योति राजपूत, सूरज जुमान
अवधिः 2 घंटे 10 मिनट

51 वर्षीय सोनू सूद ने अपने अभिनय कैरियर की शुरुआत 1999 में तमिल फिल्म में अभिनय करते हुए की थी. 2001 तक वह तमिल, तेलुगु फिल्में ही करते रहे. 2002 में उन्होंने फिल्म ‘जिंदगी खूबसूरत’ से हिंदी फिल्मों में कदम रखा था. 2009 तक सोनू सूद ने 29 हिंदी फिल्मों में अभिनय कर लिया पर उन की कोई खास पहचान नहीं बनी. 2010 में सोनू सूद ने सलमान खान के साथ फिल्म ‘दबंग’ में विलेन छेदी सिंह का किरदार निभाया और स्टार बन गए. उस के बाद वह बतौर विलेन दक्षिण की ही फिल्मों में ज्यादा व्यस्त हो गए. आज भी वह दक्षिण की ही फिल्में कर रहे हैं.

सोनू सूद ने कोविड के दौरान लोगों की मदद कर निजी जीवन में एक मददगार इंसान की इमेज के साथ उभरे. लेकिन शायद सोनू सूद अभिनय भूल गए हैं, इस का संकेत उन्होंने 2022 की असफल फिल्म ‘सम्राट पृथ्वीराज’ में अभिनय कर दे चुके थे. पर अब लगभग 3 साल बाद वे सिर्फ अभिनेता ही नहीं बल्कि बतौर लेखक, निर्देशक, निर्माता फिल्म ‘फतेह’ ले कर आए हैं जोकि एक नहीं कई बौलीवुड और हौलीवुड फिल्मों का मिश्रण है.

जिन लोगों ने हौलीवुड फिल्म ‘द इक्वलाइजर’ देखी है, उन्हें एहसास होगा कि यह तो 90% हौलीवुड फिल्म की ही नकल है जबकि फिल्म ‘फतेह’ के ट्रेलर लांच ईवेंट में जोर दे कर दावा किया गया था कि इस फिल्म की कहानी, स्क्रिप्ट और इस का एकएक दृश्य उन के अपने दिमाग की उपज है, जिस पर उन्होेंने 2 साल से ज्यादा मेहनत की है.

लेकिन ‘फतेह’ देखने के बाद एहसास हुआ कि वह उस दिन मीडिया से सफेद झूठ बोल रहे थे.

कहानी : एक पूर्व विशेष औपरेशन अधिकारी फतेह सिंह (सोनू सूद) पंजाब के मोंगा गांव में बहुत शांतपूर्ण जीवन जीता है. वह एक डेरी फौर्म में बैठता है जबकि उस का अतीत अंधकारमय है. उस की पड़ोसिन निमृत कौर (शिव ज्योति राजपूत) एक लोन देने वाले एप की कंपनी में काम करती है और खतरनाक साइबर अपराध सिंडिकेट का शिकार बन जाती है. निमृत कौर की तलाश में फतेह सिंह दिल्ली पहुंचता है और एक एथिकल हैकर खुशी शर्मा (जैकलीन फर्नाडिस) से मुलाकात होती है. यह खोज अंततः उसे साइबर अपराध सिंडिकेट के स्वामी रजा (नसीरुद्दीन शाह) तक ले जाती है. लेकिन वास्तव में फतेह कौन है? जब तक वह खुशी शर्मा को अपनी अतीत की कहानी नहीं बताता, वह कुछ समय पहले भंग हुई एक गुप्त इकाई का सदस्य था. इसी ईकाई के सदस्य रजा भी थे. खैर,अंततः फतेह राष्ट्रव्यापी धोखे के जाल को उजागर करने और न्याय के लिए लड़ने के लिए अपने संयुक्त कौशल का उपयोग करता है.

समीक्षा : फिल्म ‘फतेह’ साइबर अपराध माफिया के खिलाफ युद्ध के साथ नए जमाने की ऐक्शन थ्रिलर फिल्म होने का वादा करती है. मगर अफसोस यह फिल्म कई फिल्मों की नकल करते हुए महज अति रंजित हिंसा और खूनखराब ही परोसती है. एक ऐसी हिंसा या यों कहें कि फिल्म का ऐक्शन सिरदर्द के अलावा कुछ नहीं देता. माना कि ऐक्शन में नयापन है, मगर यह ऐक्शन पूरी तरह से मशीनी लगता है. इस तरह की फिल्म तो बच्चे वीडियोगेम के रूप में खेलने में ही आनंद लेते हैं. पर इस फिल्म से बच्चे दूर ही रहें, क्योंकि इसे सेंसर बोर्ड ने ‘ए’ प्रमाणपत्र दिया है.

10 जनवरी, 2025 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई 2 घंटे 10 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘फतेह’ कमजोर दिल वालों को देखने से दूर ही रहना चाहिए. अति कमजोर पटकथा वाली इस फिल्म में कहानी का कोई सिरपैर ही नहीं है. साइबर क्राइम को ले कर हर आम इंसान व गांव के गरीबों तक के मन में बहुत बड़ा डर पैदा करने के अलावा यह फिल्म कुछ नहीं करती.

सोनू सूद की फिल्म की कहानी का केंद्र पंजाब का एक गांव है। शायद सोनू सूद को पता ही नहीं है कि साइबर क्राइम के शिकार शहरवासी ज्यादा आसानी से हो रहे हैं. लेकिन सोनू सूद भी उन्हीे में से हैं, जिन्हें खुद कहानी कहने की खुजली है, पर उस कहानी या विषय पर शोधकार्य करना गंवारा नही. साइबर अपराध माफिया के खिलाफ युद्ध को छोड़ कर, सोनू सूद की ‘फतेह’ में कुछ भी नया नहीं है, लेकिन अफसोस वह इस पर भी ठीक से बात नहीं कर पाए. सच तो यह है कि फिल्म ‘फतेह’ में ‘जय हो’, ‘पठान’, ‘एनीमल’,‘मार्को’ ,‘किल’ व हौलीवुड फिल्म ‘द इक्वलाइजर’,मार्टिन स्कौर्सेस की फिल्म ‘आइरिशमैन’, कियानू रीव्स की ‘जौन विक’ और जैसन स्टेथम की आधा दर्जन फिल्मों का अति घटिया नकल ही है. फिल्म ‘फतेह’ के ऐक्शन दृश्य 2014 में प्रदर्षित हौलीवुड फिल्म ‘द इक्वलाइजर’ की याद दिलाते हैं. इतना ही नहीं ‘फतेह’ देखते वक्त बीचबीच में सलमान खान की फिल्म ‘जय हो’, शाहरुख खान की ‘पठान’ तक की याद आ जाती है.

याद रखने वाली बात तो यह है कि फिल्म ‘एनिमल’ का एक मैराथन ऐक्शन दृश्य 2003 में प्रदर्षित कोरियाई फिल्म ‘ओल्डबौय’ से प्रेरित था.

सोनू सूद ही लेखक, निर्देशक अभिनेता हैं,तो उन्होंने सब कुछ अपने ही इर्दगिर्द रखते हुए फिल्म का गुड़गोबर कर डाला. सोनू सूद का सारा ध्यान खुद को परदे पर बनाए रखने व इंटरनेशनल स्तर का ऐक्शन परोसने में ही रहा. मगर वह यह भूल गए कि ऐक्शन के साथ कहानी में इमोशंस, मानवीय संवेदनाएं भी चाहिए. पर इस फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है. फिल्म में कहानी तो छोड़िए, किरदार भी ठीक से परिभाषित नहीं किए गए. सोनू सूद उर्फ फतेह दोनों हाथ में बंदूक से गोली चलाए जा रहे हैं। सैकड़ों लोग मर रहे हैं, मरते समय इंसान के जो भाव होते हैं, जो आह निकलती है, वैसा कुछ भी नहीं है. घायल इंसान भी चुप रहता है. सब कुछ मशीन जैसा नजर आता है.

पूरी फिल्म में दर्शक को परेशान कर देने वाली भयंकर हिंसा व खून ही खून है.फिल्म का वीएफएक्स भी बहुत खराब है. सिर्फ लेखक ही नहीं निर्देशक के तौर पर भी सोनू सूद बुरी तरह से मात खा गए हैं.

अभिनय : 51 साल की उम्र में सोनू सूद ने शुरुआत में बेहतरीन ऐक्शन दृश्य अंजाम दिए हैं. पर फिर वह पस्त नजर आने लगते हैं और ऐसा तब से होता है, जब उन के सिर से हौलीवुड फिल्म ‘द इक्वलाइजर’ का खुमार उतर जाता है. फतेह सिंह के किरदार में सोनू सूद का अभिनय कुछ ठीकठाक है। कई दृश्य ऐसे हैं जहां सोनू सूद का चेहरा एकदम सपाट भावशून्य नजर आता है. कई दृश्यों मे तो वह वाशिंगटन के बहुत अधिक प्रखर अभिनेता रौबर्ट मैक्कल के एक हलके देसी संस्करण बन कर रह गए. जैकलीन के हिस्से करने को कुछ आया ही नहीं. वैसे भी जैकलीन फर्नाडिस को अभिनय नहीं आता. अपनी सुंदरता के बल पर फिल्में पा जाती हैं. नई लड़की शिव ज्योति राजपूत छोटे किरदार में अपनी अभिनय की छाप छोड़ जाती हैं. दिव्येंदु भट्टाचार्य, विजय राज, नसिरूद्दीन शाह जैसे कलाकारों की प्रतिभा को जाया किया गया है.

New Trend : अलग बिस्तर पर सोना कहीं स्लीप डिवोर्स की वजह तो नहीं

New Trend : हाल के दिनों में शादी टूटने के मामले बढ़ रहे हैं. इस में स्लीप डिवोर्स का ट्रैंड आग में घी का काम कर रहा है. जानते हैं क्या है यह कान्सैप्ट और कैसे यह पति पत्नी के रिश्ते में दूरियां लाने का काम कर रहा है.

“पति की गैरमौजूदगी में पत्नी मोबाइल पर करती थी. मायके में बात, टूटने की कगार पर पहुंचा रिश्ता”, “पति-पत्नी के बीच ‘कबाब में हड्डी’ बना डॉगी, विदेशी नस्ल के पालतू के लिए शादीशुदा घर टूटने की कगार पर”

हाल के दिनों में शादी टूटने के मामले बढ़ रहे हैं और सात जन्मों का बंधन माने जाने वाला यह रिश्ता अलगाव की कगार पर है. जो पतिपत्नी हमेशा एकदूसरे के साथ रहने की कसम खाते हैं, छोटी-छोटी वजहों से अपनी शादी को अलविदा कह रहे हैं.

ऐसे में हाल ही में प्रचलित स्लीप डिवोर्स का ट्रैंड आग में घी का काम कर रहा है. ‘स्लीप डिवोर्स’ जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि ये ‘नींद के लिए आपसी अलगाव’ का एक कान्सेप्ट है. इसे ऐसे समझा जा सकता है कि अच्छी नींद पाने के लिए पति-पत्नी अलग कमरों, अलग बिस्तर पर या फिर अलगअलग समय पर सोते हैं. पार्टनर के खर्राटे की आवाज, एसी के तापमान, पंखे की गति या कुछ और चीजों को लेकर पार्टनर्स में बहस उन की नींद को प्रभावित न करे इसलिए भारत समेत कई अन्य देशों में भी ये चलन तेजी से बढ़ता हुआ देखा जा रहा है.

रिलेशनशिप एक्स्पर्ट्स के अनुसार लेकिन अगर लंबे वक्त तक इसी रूटीन को फौलो किया जाए, तो इस का खामियाजा आपसी रिश्तों को उठाना पड़ सकता है. इस रूटीन से न केवल कपल्स के बीच की रोमांटिक लाइफ खत्म होती है पार्टनर के साथ इमोशनल अटैचमेंट में भी कमी आती है.

आम बोलचाल की भाषा में ‘साथ सोना’ का मतलब सैक्सुअल रिश्ते से लगाया जाता है लेकिन रिश्ते और प्यार की साइकोलौजी में साथ सोना सिर्फ सैक्सुअल एक्टिविटी तक सीमित नहीं है. पतिपत्नी के रिश्ते में , मन मिलाने इमोशनल अटैचमेंट के लिए कडलिंग, साथ सोना भी बेहद जरूरी है.

मनोविज्ञान के क्षेत्र में प्रतिष्ठित जर्नल ‘Current Directions in Psychological Science’ की एक रिपोर्ट बताती है कि बिना सैक्सुअल रिलेशन भी कपल्स साथ सोएं तो उन का रिश्ता काफी मजबूत होता है. वे इमोशनली एकदूसरे के करीब आते हैं और उन की बौन्डिंग मजबूत होती जाती है. अगर किसी शख्स के साथ उस का पार्टनर बेफिक्र हो कर, यानी घोड़े बेच कर सोए तो इस का मनोवैज्ञानिक मतलब है कि पार्टनर उस की मौजूदगी में सेफ और कंफर्टेबल महसूस कर रहा है, रिश्ते की यह पहली शर्त है.

इस रिसर्च की को-औथर एमिली इंपेट के अनुससर “ जब पार्टनर एक-दूसरे के फिजिकल टच में आते हैं तो हैप्पी हौर्मोन रिलीज होता है. पार्टनर्स को खुशी महसूस होती है. उन का दिमाग संकेत करता है कि पार्टनर की मौजूदगी अच्छी और खुशी देने वाली है. दोनों में प्यार अपने आप गहरा हो जाता है.” ध्यान रहे कि फिजिकल टच का मतलब सिर्फ सैक्सुअल रिलेशन नहीं है.

मनोविज्ञान की रिसर्च और रिश्ते की स्टडी के अनुसार कपल्स का साथ सोना उन के रिश्ते की मजबूती के लिए बेहद जरूरी है. बिस्तर अलग होते ही कपल्स के रिश्ते में भी एक दीवार-सी खिंच जाती है.

स्लीप डिवोर्स के साइड इफैक्ट्स –

इमोशनल कनेक्शन का ब्रेकअप

दिनभर की दौड़ भाग के बाद रात को सोते समय कपल्स एकदूसरे के साथ अपनी दिनचर्या को शेयर करते हैं लेकिन स्लीप डिवोर्स के चलते अकेले सोने से कपल्स उन सभी चीजों से वंचित रह जाते हैं. जब आप का पार्टनर, आप को सुनने वाला व्यक्ति आप के आसपास नहीं रहता है तो दो लोगों के बीच बनने वाला इमोशनल कनैक्शन भी खत्म होने लगता है.

इंटिमेसी की कमी

टचिंग, किसिंग, कडलिंग और स्पूनिंग पार्टनर के साथ रिश्ते को मज़बूत बनाते हैं. स्लीप डिवोर्स के दौरान व्यक्ति शुरुआत में अपने पार्टनर को मिस करने लगता है और फिर उसी रूटीन को फौलो करने लगता है. इस से सैक्सुअल लाइफ प्रभावित होती है, जिस से कपल्स के बीच इंटिमेसी की कमी होने लगती है.

अकेलापन का एहसास

स्लीप क्वालिटी को बढ़ाने की चाहत में स्लीप डिवोर्स को अपनाने वाले कपल्स दूरदूर सोने से खुद को अकेला महसूस करने लगते हैं. इस से संबधों में दूरियां बढ़ने लगती हैं और ये उन के बीच मिसअंडरस्टैंडिग का कारण भी बन जाता है और वे खुद को इनसिक्योर समझने लगते हैं.

रिश्ते में फिजिकल टच इंप्रूव करने के तरीके

पतिपत्नी के रिश्ते में मजबूती के लिए दोनों पार्टनर का एक छत के नीचे रहते हुए एकदूसरे की मौजूदगी और भावनात्मक लगाव का एहसास कराना बेहद जरूरी है.

• गले लगाना, हाथ मिलाना, लिपट कर सोना, साथ बैठ कर भी रिश्ते में फिजिकल टच को इंप्रूव किया जा सकता है.
• बात करते हुए या कहीं घूमते पार्टनर का हाथ अपने हाथों में थाम कर भी रिश्ते में इमोशनल अटैचमेंट को बढ़ाया जा सकता है.
• अगर पूरी रात साथ नहीं सोया जा सकता तो कम से कम कुछ घंटों की नींद पार्टनर के साथ कडलिंग करते हुए जरूर ली जा सकती है.
• खुशी हो या गम, पार्टनर को गले लगा कर, साथ में बैठ कर टीवी देख कर, कुछ साथ में पढ़ते हुए फिजिकल टच को बढ़ाया जा सकता है.

साथ सोना कल्चरली और इमोशनली कपल्स के रिश्ते में बेहद जरूरी है. ऐसे में किसी भी कारण से अगर रोमांटिक पार्टनर्स अलगअलग सोएं तो उन के रिश्ते में दूरियां आना स्वाभाविक है.

Kolkata Rape case : “बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ”के साथ बेटी को न्याय भी दिलाओ

Kolkata Rape case : कोलकाता के एक मैडिकल कालेज के कैंपस के अंदर ड्यूटी कर रही एक महिला डाक्टर की रेप कर के उन की हत्या कर दी गई. मारी गई डाक्टर की गरदन की हड्डी टूटी हुई थी, दोनों आंखों, मुंह और हाथों पर चोट के निशान थे. अंदरूनी अंगों में गंभीर चोट पाई गई थी.

पर लगता है कि सरकार को कोई फर्क नही पड़ता है. सब अपनी-अपनी राजनीति कर रहे हैं, क्योंकि नेताओं के साथ रेप जैसी वारदात नहीं होती है न, बल्कि बहुत से तो खुद इस में लिप्त पाए जाते हैं.

तो फिर क्यों बनेंगे सख्त कानून, जब रखवाले ही गलत नीयत रखते हैं. दुष्कर्म की सजा काट रहे बाबाओं को आसानी से पैरोल मिल जाती है. ‘एनिमल’ जैसी फिल्म, जिस में औरत को पीटा जाता है, उस से यौन हिंसा की जाती है, को अवार्ड दिया जाता है.

आज भी जब पूरा देश किसी न किसी रेप कांड के खिलाफ कैंडल मार्च कर रहा होता है, तब भी कोई न कोई दरिंदा देश के किसी न किसी कोने में खुलेआम रेप कर रहा होता है.

यह सरकार की आधी आबादी के खिलाफ साजिश सी लगती है. लड़कियों को घर में बंद रखने और न पढ़नेलिखने देने की साजिश लगती है. दरअसल, लड़कियां और औरतें घर में बंद हो जाएं, ये रात को अकेली बाहर न निकलें , उन नौकरियों में न जाएं, जहां रात को काम करना पड़े, भले ही वे कितनी ही पढ़ीलिखी और काबिल क्यों न हों.

‘बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ’ तो सरकार ने बताया है, लेकिन पढ़ने के बाद बेटी बच पाएगी इस की कोई गारंटी है, यह सरकार ने नहीं बताया.

दरअसल, सरकार चाहती है कि लड़कियां घर बैठ कर सिर्फ पूजापाठ, व्रतउपवास कर के भूखी रहें. साल के 365 दिन कोई न कोई व्रत करें, धर्म का पालन करें , सिर्फ पति की सेवा करें, पति को परमेश्वर मानें. वे शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से कमजोर और खोखली हो जाएं.

वैसे, जो अपराध लड़कियों के साथ हो सकते हैं, वे लड़कों के साथ भी हो सकते हैं, फिर लड़कों को देर रात घर से बाहर न निकलने की ताकीद क्यों नहीं की जाती?

साल 2014 के बाद औरतों की सिक्योरिटी के लिए कोई कानून नहीं बने हैं. आज भी उन्हें मर्दों के मुकाबले केवल दोतिहाई कानूनी अधिकार हासिल हैं, जो साफतौर पर उन के प्रति सरकार की उदासीनता को दिखाता है.

देशभर में रात्रि जागरण हो सकते हैं, देर रात गरबा, डांडिया के कार्यक्रम हो सकते हैं, पर वहां भी लड़कियों और औरतों के साथ अपराध होते हैं, फिर उन पर रोक क्यों नहीं लगाई जाती?

आखिर सरकार यह लैंगिक असमानता क्यों कर रही है? औरतों के साथ आखिर यह भेदभाव क्यों? अगर धर्मग्रंथों में भी देखा जाए तो अहल्या हो या सीता… औरतों के साथ वहां भी मर्दों द्वारा छलकपट, नाइंसाफी और शोषण किया गया है.

दुख की बात तो यह है कि कभी लेडी पुलिस के साथ, कभी महिला शिक्षक के साथ, कभी महिला अधिकारी के साथ, कभी महिला कर्मचारी के साथ तो कभी महिला डाक्टर के साथ बलात्कार और शोषण की खबरें आती ही रहती हैं.

वे कहीं भी महफूज नहीं हैं. न मां की कोख में, न किसी अस्पताल में, न चलती बस में, न स्कूल की वैन में, न स्कूल के किसी कमरे में, न औफिस से ड्यूटी करते देर रात, न कैब के इंजतार में, न हाल में, न मौल के बाथरूम में, न अपने भविष्य के सपनों को पूरा करने के लिए लंबी दूरी की ट्रेन में, न घर में, न आसपड़ोस में, न पार्क में, न मेट्रो में, न आसमान के ऊपर उड़ते हुए हवाईजहाज में, न पढ़लिख कर इंजीनियरिंग करने का सपना देखते हुए देश के टौप आईआईटी संस्थान में, न पिता के घर में, न पति के घर में, न अनाथालय में, न बालिका सुधारगृह में, न किसी बाबा के आश्रम में, न मीडिया के संस्थान में, न मेले में, न खेल के अखाड़े में.

इस के अलावा वे किसी भी दिन महफूज नहीं हैं. न आजादी के उत्सव के दिन, न दीवाली और होली के दिन, न दुर्गापूजा के दिन, न नवरात्र के दिन, न गंगा किनारे, न मंदिर के द्वारे. आज देश की बेटियों की अस्मत हर जगह हर दिन लूटी जा रही है.

सोशल मीडिया पर, ओटीटी पर बेहूदगी की हद को पार करती अनगिनत फिल्में, सीरियल, म्यूजिक वीडियो, रील्स, जहां आसानी से किसी भी बच्चे, नौजवान और अधेड़ के दिमाग में यौन हिंसा करने के लिए फ्री का कंटैंट भरा जा रहा है.

आजकल की पीढ़ी को मांबहन की गाली देना, रेव पार्टी करना, ड्रग्स लेना, पूल पार्टी करना, यौन अपराध करना नौर्मल और कूल लगता है. फ्री की बस, फ्री का राशन, फ्री की दवा… नतीजा जिन हाथों को मजदूरी या कोई दूसरा काम कर के अपने परिवार का पेट भर कर थकहार कर घर आ कर चैन से सोना था, वे हाथ आज निठल्ले बैठे फेसबुक, इंस्टा पर अश्लील रील और पोर्न फिल्मों को देख रहे हैं और नतीजा यह है कि आज के समाज में बेटियों पर बुरी नजर रखने वाले लोग हर जगह मौजूद हैं. लड़कियों को मांबहन की गाली देने वाला एल्विश यादव आजकल की युवा पीढ़ी का फेवरेट बना हुआ है.

एक ऐसे समाज की रचना हो चुकी है जहां हम इन सब खबरों के इतने आदी हो चुके हैं कि अब हमें ऐसी घटनाये ज्यादा विचलित नहीं करती हैं, जो बेहद दुखद है.

आखिर सरकार द्वारा बलात्कार के बाद पीड़ित के साथ क्रूरतम अमानवीय व्यवहार कर के बलात्कारियों का मनोबल क्यों बढ़ाया जा रहा है? बलात्कारियों के समर्थन में रैलियां निकाल कर महिमामंडन किया जा रहा है. जब से बलात्कारियों को छद्म तरीके से कोर्ट को अंधेरे में रख कर रिहाई कराई जा रही है, तब से इन बलात्कारी दरिंदों के जोश सातवें आसमान पर हैं.

जब से किसी बलात्कारी को जेल से रिहा होने पर फूल माला पहनाते हुए तिलक टीका लगा कर और मिठाई खिलाकर स्वागत किया जाने लगा है, तब से ये बलात्कारी बिलकुल ही निश्चिंत हो गए हैं कि कोई न कोई तो बचा ही लेगा. यह सब सरकार का सिखाया हुआ महसूस होता है.

Allu Arjun को जेल, उधर तिरुपति मंदिर में भी भगदड़, दोषी कौन ?

Allu Arjun : एक तरह के हादसे पर कानून दो तरह से कैसे काम कर सकता है? क्या यह न्याय और संविधान दोनों का अपमान नहीं?

तिरुपति बालाजी मंदिर में टोकन लेने के दौरान हुई भगदड में 6 लोगों की मौत हो गई और दूसरे 25 लोग घायल हो गए. टोकन लेने के लिए 4 हजार से अधिक लोग यहां जुटे थे. तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) द्वारा 10 जनवरी से 19 जनवरी तक वैकुंठ एकादशी और वैकुंठ द्वार दर्शनम कार्यक्रम चलता है. 10 दिन तक चलने वाले इस विशेष दर्शन में लोगों को टोकन लेना पड़ता है. दर्शन करने के लिए हजारों की संख्या में लोग जाते हैं. इस को व्यवस्थित करने के लिए टोकन सिस्टम शुरू किया गया.
टोकन काउंटर सुबह 5 बजे से खुलता है. उसी दिन के दर्शन के लिए टोकन जारी किया जाता है. इस के जरिए कोई भी व्यक्ति 50 रुपए का टोकन ले कर दर्शन करने जा सकता है. टोकन सिस्टम में एक वीआईपी कैटेगरी सिस्टम भी है. जिस में 300 रुपए का टोकन लेना पड़ता है. इस से जल्दी दर्शन करने की संभावना भी बढ़ जाती है. टोकन के लिए कांउटर विश्नु निवासम तिरुपति रेलवे स्टेशन के सामने, श्रीनिवासम कौम्प्लेक्स तिरुपति मुख्य बस स्टेशन के सामने, गोविंदराज सतराम तिरुपति रेलवे स्टेशन के पीछे बने हैं.
दर्शन के लिए टोकन लेने के लिए आधार कार्ड आवश्यक है. एक बार टोकन लेने के बाद, अगला टाइम स्लौट दर्शन 30 दिनों के बाद ही लिया जा सकता है. 12 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए टोकन जारी नहीं किया जाता उन के लिए प्रवेश निशुल्क है. टोकन जारी करते समय भक्त की फोटो ली जाती है. जारी किए गए दर्शन टोकन दूसरों परिवार के सदस्यों सहित किसी को भी नहीं दे सकते. बुजुर्गों और विकलांगों के लिए स्पैशल दर्शन की व्यवस्था भी की गई है. मंदिर के पास एक अलग प्रवेश द्वार से रोज दो अलगअलग स्लौट में सुबह करीबन 9 बजे और दूसरे स्लौट में दोपहर 3 बजे एंट्री मिलती है.

घटना के दिन क्या हुआ ?

10 जनवरी से 19 जनवरी 2025 में दर्शन के लिए टोकन बांटने का काम 9 जनवरी से शुरू होना था. 8 जनवरी की शाम को ही टोकन लेने वालों की भीड़ लग गई. भीड़ बढ़ने से भभगदड़ मच गई. जिस में 6 की मौत और 25 घायल हो गए. रोज 40 हजार टोकन बांटने की व्यवस्था के अनुसार पहले 3 दिन में सवा लाख लोगों को टोकन बांटने थे. इस के लिए 9 केंद्रों पर 94 सेंटर बनाए गए थे. इन में श्रीनिवासम, विष्णु निवासम, रामचन्द्र पुष्करणी, अलीपीरी भूदेवी कौम्पलैक्स, एमार पल्ली जेडपी हाईस्कूल, बैरागी पटेठा रामनायडू हाई स्कूल, सत्यनारायण पुरम जेडपी हाईस्कूल और इंदिरा मैदान में टोकन जारी करने की व्यवस्था थी.
तिरुपति मंदिर के खास वैकुंठ द्वार दर्शनम के लिए टोकन लेने के बाद ही अंदर जा सकते हैं. वैकुंठ द्वार दर्शनम के लिए मंदिर परिसर में कुल 8 जगहों पर टोकन बांटे जाने थे. एक दिन पहले से ही टोकन के लिए श्रद्धालुओं की लंबी लाइन थी. दर्शन के लिए टोकन मिल जाए इस के लिए खूब चढ़ाऊपरी लगी थी. जैसे ही गेट खुला भक्त अपना धैर्य खो बैठे. पहले टोकन पाने के लिए वे आगे बढ़े और देखते ही देखते स्थिति बिगड़ गई. अचानक भगदड़ मची और देखते ही देखते लाशें बिछ गईं.
भगदड़ एमचीएम स्कूल के काउंटर पर पर मची. भगदड़ तब मची जब टोकन बांटना शुरू भी नहीं हुआ था. पुलिस उपाधीक्षक ने जैसे ही गेट खोले तुरंत ही सभी लोग आगे बढ़ने लगे. इस से भगदड़ मच गई. सोशल मीडिया पर दिखाई पड़ रहे वीडियो में भीड़ एकदूसरे पर धक्का मुक्की करती दिखाई दे रही थी. इस के बाद पुलिस, मंदिर प्रबंधन और नेताओं का आना जारी हो गया.

भगवान जिम्मेदार नहीं ?

तिरुपति में हुई घटना में सब से अलग बात यह दिखी कि पुलिस द्वारा किसी को दोषी नहीं ठहराया गया. घटना की वजह जिन भगवान की मूर्ति थी उन को जिम्मेदार क्यों नहीं माना गया ? सामान्य तौर पर इस तरह के हादसों के लिए पुलिस किसी न किसी को जिम्मेदार ठहरा कर जेल भेज देती है, भले ही वह इंसान वहां मौजूद भी न रहा हो. ताजा मामला फिल्म अभिनेता अल्लू अर्जुन का था.
हैदराबाद में 4 दिसंबर को संध्या थिएटर में ‘पुष्पा 2‘ की स्क्रीनिंग थी. फिल्म देखने के लिए पहले से ही वहां भारी भीड़ इकट्ठा हुई थी. इस बीच अभिनेता अल्लू अर्जुन भी वहां पहुंच गए थे. उन को देखने के लिए वहां भगदड़ मच गई. अल्लू अर्जुन की एक झलक पाने को दर्शक अंदर घुसने की कोशिश करने लगे. इस से लोगों को सांस लेने में परेशानी होने लगी. वहां भगदड़ मच गई. पुलिस ने भीड़ को काबू करने के लिए लाठीचार्ज भी किया.
इस में रेवती नाम की महिला की मौत हो गई, जिस की उम्र 39 साल थी. वह पति और दो बच्चों बेटी सान्विका और बेटे श्रीतेज के साथ ‘पुष्पा 2‘ देखने गई थी. अचानक हुई दर्शकों की धक्कामुक्की में रेवती और उन का बेटा दब गए. पुलिस ले अल्लू अर्जुन, उन की सिक्योरिटी एजेंसी और थिएटर के मालिक के खिलाफ धारा-105 (गैर-इरादतन हत्या) और 118(1) (जानबूझकर चोट पहुंचाना) के तहत मुकदमा कायम कर जेल भेज दिया.
हैदराबाद पुलिस ने अल्लू अर्जुन को महिला की मौत का आरोपी बनाया. उन के खिलाफ गैर इरादतन हत्या का भी केस दर्ज किया. 13 दिसंबर को चिक्कड़पल्ली पुलिस ने अल्लू अर्जुन को उन के घर से हिरासत में लिया. इस के बाद उन्हें चिक्कड़पल्ली पुलिस स्टेशन ले गई. जहां उन से पूछताछ के बाद बयान दर्ज कर मेडिकल चेकअप के लिए उस्मानिया अस्पताल ले जाया गया. इस के बाद उन को 14 दिनों के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था.
अल्लू अर्जुन ने इस हादसे पर गहरा दुख जताया था और परिवार को 25 लाख रुपए की मदद का ऐलान किया था. अल्लू अर्जुन ने कहा था कि वह महिला की मौत से आहत हैं और उन के परिवार की मदद के लिए हमेशा खड़े हैं. इस के बाद भी पुलिस ने अल्लू अर्जुन सहित थिएटर के मालिक संदीप, थिएटर के मैनेजर नागराजू और बालकनी के सुपरवाइजर को भी हिरासत में लिया था. अल्लू अर्जुन को पुलिस ने जिस तरह से गिरफ्तार किया वह पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया था. गिरफ्तारी के समय वह घर में चाय पर रहे थे. उन को चाय खत्म नहीं करने दिया गया. पत्नी स्नेहा रेड्डी रोने लगीं.

बच जाते हैं नेता और भगवान

मंदिरों में भगवान के नाम पर दर्शकों की भीड़ को बुलाया जाता है. फिल्म देखने के लिए दर्शक अपने मन से टिकट लेकर आते हैं. जब अल्लू अर्जुन पर मुकदमा कायम हो सकता है तो तिरूपति में भगवान पर मुकदमा कायम क्यो नहीं हो सकता ? नेता और भगवान तो इस तरह के मामले मे बच जाते हैं. दूसरी तरफ ऐक्टर, सिनेमाघर का मालिक और मकान मालिक को जेल भेज दिया जाता है. नेता और भगवान बच जाते हैं.
13 जून 1997 को सन्नी देओल, सुनील शेट्टी की फिल्म बौर्डर रिलीज हुई थी. भारतपाकिस्तान युद्ध पर बनी इस फिल्म को देखने के लिए देशभर में थिएटर्स के दर्शकों की भीड़ जुट गई थी. साउथ दिल्ली के उपहार सिनेमाघर में 160 लोगों की क्षमता वाला हौल खचाखच भरा था. 3 बजे वाला शो था. कोई 4 बजे सिनेमाघर की पार्किंग में आग लगी, जिस का धुआं हौल में भर गया. लोगों के निकलने के लिए एक ही दरवाजा था, जो गेटकीपर बंद कर के कहीं निकल गया था क्योंकि शो छूटने में पूरे 2 घंटे बाकी थे. हौल में धुआं भरता गया, लोगों का दम घुटता गया. लोग निकलने की पुरजोर कोशिश करते रहे लेकिन बाहर नहीं जा पाए. एक के बाद एक 59 लोगों ने दम तोड़ दिया.
सिनेमा घर चलाने वाले सुशील अंसल और प्रणव अंसल पर गैर इरातन हत्या का मामला तो दर्ज हुआ कि सिनेमा घर को भी सीज कर दिया गया. कई सालों तक केस चला. जांचें हुईं. पूरा परिवार तबाह हो गया. देखें तो उन की कोई गलती नहीं थी. कोई भी मालिक अपनी संपत्ति जला कर किसी की हत्या करना चाहेगा क्या ? इस तरह की बहुत सारी घटनाओं में उन लोगों को जिम्मेदार माना जाता है जो उस के मालिक होते हैं. इस के विपरीत लखनऊ में साड़ी कांड हुआ था. जिस में 22 महिलाओं की भगदड़ में मौत हो गई. 12 अप्रैल को भाजपा नेता लालजी टंडन के जन्मदिन पर महानगर के चन्द्रशेखर आजाद पार्क में साड़ी वितरण कार्यक्रम रखा गया था. इस में भगदड मची. जिस में 22 औरतों की मौत हो गई कई अन्य घायल हो गई.
नेता के खिलाफ कोई मुकदमा कायम नहीं हुआ था. इसी तरह से 2013 में इलाहाबाद में आयोजित महाकुंभ में रेलवे स्टेषन पर रेलगाडी का प्लेटफौर्म बदले जाने के बाद इधर से उधर पहुंचने में भगदड़ मच गई. रेलवे के फुटबिज पर ही लोगों के गिरने से बड़ा हादसा हो गया था. जिस में 35 लोगों की मौत हो गई थी. इस के बाद भी उस समय के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और नगर मंत्री आजम खान पर कोई मुकदमा कायम नहीं हुआ. नेता और भगवान को बचा लिया जाता है. 2025 के कुंभ के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ निमंत्रण तो बांट रहे हैं पर क्या वह सुरक्षा की जिम्मेदारी भी ले रहे हैं ?
मंदिरों और मेले में हादसे कोई नई बात नहीं है. लोग मंदिर और मेले में अपनी खुशी के लिए प्रार्थना करने जाते हैं. यहां उन को जब मौत मिलती है तो इस के लिए मंदिर के भगवान और नेता को जिम्मदार नहीं माना जाता है. जबकि किसी कारखाने, सिनेमा, घर निर्माण के समय कोई हादसा हो जाता है तो उस के मालिक को जिम्मेदार मान लिया जाता है. सिनेमा घर में फिल्म देखने आई महिला के लिए अल्लू अर्जुन को जिम्मेदार मान लिया गया लेकिन तिरूपति में भगवान की मूर्ति को जिम्मेदार क्यों नहीं माना जा सकता ? उस जगह के वही तो मालिक हैं.

दरअसल, सुबह से ही हजारों श्रद्धालु वैकुंठद्वार दर्शन टोकन के लिए तिरुपति के विभिन्न टिकट केंद्रों पर कतार में खड़े थे. तभी श्रद्धालुओं को बैरागी पट्टीडा पार्क में कतार में लगने की अनुमति दी गई. वैकुंठद्वार दर्शन दस दिन के लिए खोले गए हैं, जिस के चलते टोकन के लिए हजारों की संख्या में लोग जुट रहे हैं. भगदड़ मचने से वहां अफरातफरी मच गई, जिस में 6 लोगों की मौत हो गई.
इस में मल्लिका नाम की एक महिला भी शामिल है. घटना के पश्चात हालात बिगड़ता देख स्थानीय पुलिस ने मोर्चा संभाला और स्थिति को नियंत्रित किया. बताया जा रहा है कि दर्शन के लिए टोकन की लाइन वैकुंठद्वार दर्शन के लिए 4000 लोग लाइन में खड़े थे. स्थिति को ले कर मंदिर समिति के चेयरमैन बीआर नायडू ने आपातकालीन बैठक की मगर बात वही ढाक के तीन पात है.
मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने भगदड़ में छह श्रद्धालुओं की मौत पर औपचारिक गहरा दुख जताया है. मुख्यमंत्री ने कहा- “वे इस घटना से बहुत दुखी हैं.” यह घटना उस समय हुई जब बड़ी संख्या में श्रद्धालु टोकन लेने के लिए एकत्र हुए थे. मुख्यमंत्री ने घटना में घायलों को दिए जा रहे उपचार के बारे में अधिकारियों से फोन पर बात की.
मुख्यमंत्री समयसमय पर जिला और टीटीडी अधिकारियों से बात कर के मौजूदा स्थिति से अवगत हैं. मुख्यमंत्री ने उच्च अधिकारियों को घटना स्थल पर जा कर राहत उपाय करने का आदेश दिया है, ताकि घायलों को बेहतर उपचार मिल सके. आप को बताते चलें कि तिरुपति बालाजी मंदिर में पहले भी कई भगदड़ की घटनाएं हुई हैं. यहां कुछ प्रमुख घटनाओं की जानकारी दी जा रही है:
1. 2013: तिरुपति बालाजी मंदिर में भगदड़ की घटना में 8 लोगों की मौत हुई थी और कई घायल हुए थे.
2. 2008: तिरुपति बालाजी मंदिर में भगदड़ की घटना में 2 लोगों की मौत हुई थी और कई घायल हुए थे.
3. 2005: तिरुपति बालाजी मंदिर में भगदड़ की घटना में 4 लोगों की मौत हुई थी और कई घायल हुए थे.
4. 1997: तिरुपति बालाजी मंदिर में भगदड़ की घटना में 10 लोगों की मौत हुई थी और कई घायल हुए थे.
इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि तिरुपति बालाजी मंदिर और अन्य मंदिरों में भगदड़ की घटनाएं पहले भी हुई हैं और अब इन्हें रोकने के लिए मंदिर प्रशासन और पुलिस को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए.

मंदिरों, सभागृह में भगदड़ की घटनाएं कई कारणों से होती हैं

दरअसल कुछ प्रमुख तीर्थस्थल हैं, जहां हर साल लाखों श्रद्धालु आते हैं. भारी भीड़ के कारण भगदड़ की घटनाएं हो जाती हैं. मंदिर प्रशासन और पुलिस को सुरक्षा इंतजामों को बढ़ाना चाहिए, लेकिन कई बार यह इंतजाम पर्याप्त नहीं होते हैं.
कई श्रद्धालु भगदड़ की घटनाओं के लिए खुद जिम्मेदार होते हैं. वे भीड़ में शामिल होने के लिए जल्दबाजी करते हैं और सुरक्षा नियमों का पालन नहीं करते हैं. मंदिर की व्यवस्था में कमी के कारण भगदड़ की घटनाएं हो सकती हैं. मंदिर प्रशासन को भी व्यवस्था में सुधार के लिए सतर्क होना चाहिए.
इन कारणों को देखते हुए, यह कहा जा सकता है कि भगदड़ की घटनाओं के लिए एक ही व्यक्ति या संस्था जिम्मेदार नहीं है. इस के लिए मंदिर प्रशासन, पुलिस, श्रद्धालु और सरकार सभी जिम्मेदार हैं. इस समस्या का समाधान करने के लिए, मंदिर प्रशासन और पुलिस को सुरक्षा इंतजामों को बढ़ाना चाहिए, श्रद्धालुओं को सुरक्षा नियमों का पालन करना चाहिए और सरकार को मंदिर की व्यवस्था में सुधार करना चाहिए.
स्मरण रहे कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, जहां विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों के लोग रहते हैं. लेकिन यहां धर्म, धार्मिकता और आस्था के बीच में अंधविश्वास भी बहुत ज्यादा है. यह अंधविश्वास कई बार लोगों को गलत दिशा में ले जाता है और समाज में कई समस्याएं पैदा करता है.
धर्म और धार्मिकता की बात करें तो भारत में बहुत सारे धर्म हैं और हर धर्म के अपने अनुयायी हैं. लेकिन यहां धर्म के नाम पर कई बार लोगों को गलत जानकारी दी जाती है और उन्हें अंधविश्वास की ओर धकेला जाता है.
आस्था की बात करें तो यह एक अच्छी चीज है, लेकिन जब आस्था अंधविश्वास में बदल जाती है तो यह समाज के लिए हानिकारक हो जाती है. भारत में बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो अंधविश्वास के कारण अपने जीवन को बर्बाद कर लेते हैं.

अंधविश्वास के कारण भारत में कई समस्याएं हैं जैसे कि:

– लोगों को गलत जानकारी दी जाती है और उन्हें अंधविश्वास की ओर धकेला जाता है.
– लोग अपने जीवन को बर्बाद कर लेते हैं और अपने परिवार को भी बर्बाद कर लेते हैं.
– समाज में कई समस्याएं पैदा होती हैं जैसे कि गरीबी, बेरोजगारी और शिक्षा की कमी.
– लोगों को अपने अधिकारों के बारे में जानकारी नहीं होती है और वे अपने अधिकारों का उपयोग नहीं कर पाते हैं.
इस समस्या का समाधान करने के लिए, हमें अपने समाज में जागरूकता फैलानी चाहिए. हमें लोगों को अंधविश्वास के बारे में जानकारी देनी चाहिए और उन्हें अपने अधिकारों के बारे में जानकारी देनी चाहिए. हमें अपने समाज में शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए ताकि लोगों को अपने अधिकारों के बारे में जानकारी हो और वे अपने जीवन को बेहतर बना सकें.
मंदिरों में जमघट भीड़ लगने की अपेक्षा अपनेअपने गांव, शहर या घर में ही पूजा पाठ कर के भी ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है. यह एक अच्छा विकल्प हो सकता है क्योंकि मंदिरों में भीड़ के कारण कई बार लोगों को परेशानी होती है और वे अपनी पूजापाठ को शांति से नहीं कर पाते हैं.

 

लेखक : शैलेन्द्र सिंह, सुरेशचंद्र रोहरा 

OYO Hotels बना प्यार का दुश्मन, कुंवारों की एंट्री बंद

 OYO Hotels  : संविधान का अनुच्छेद 21 हर तरह की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बात करता है. इसी कड़ी में अनुच्छेद 301 बहुत साफ करता है कि दो बालिगों को रजामंदी से देश में कहीं भी सैक्स करनी की आजादी है. कैसे Oyo कानून और संविधान का खुला उल्लंघन कर रहा है, आप भी जानिए –

शुरुआत मेरठ से हुई है, खात्मा कहां होगा कहा नहीं जा सकता क्योंकि इस मामले पर यह धार्मिक कहावत लागू नहीं होती कि ऊपर वाला एक दरवाजा बंद करता है तो दूसरे कई खोल भी देता है. यहां तो नीचे वाले ही प्यार पर पहरे बिठाने उतारू हो आए हैं जिस में उपर वाला भी कुछ नहीं कर सकता. करना तो अब प्रेमियों को ही पड़ेगा क्योंकि शुरुआत हो चुकी है दिल्ली और एनसीआर सहित कई दूसरे शहरों में भी मेरठ वाली धमक सुनाई देना शुरू हो गई है.

समझें बजरंग दल का मंसूबा और उसकी मंशा

बेंगुलुरु इस कहर या ज्यादती का अगला पड़ाव है वहां प्यार के शास्वत दुश्मन कट्टर संगठन बजरंगदल ने बीबीएमपी यानी बृहद बेंगुलुरु महानगर पालिका के कमिश्नर तुषार गिरिनाथ और बेंगुलुरु शहर के पुलिस आयुक्त बी दयानंद से एक्शन लेने कहा है. इस हिंदूवादी संगठन द्वारा दिए ज्ञापन में मांग की गई है कि बेंगलुरु शहर में भी मेरठ जैसा नियम लागू किया जाना चाहिए. अर्थात अविवाहित जोड़ों को होम स्टे, लाज, सर्विस अपार्टमेंट और अन्य होटलों में भी कमरे नहीं दिए जाने चाहिए. बजरंग दल के मंसूबे और मंशा तो इस से आगे भी कुछ और हैं लेकिन बात पहले मेरठ की जहां से सदाचार की क्रांति शुरू हुई जिस से उत्साहित तमाम छोटे बड़े शहरों में कट्टरवादी संगठन मुगले ए आजम के जिल्लेलाही के रोल में न दिखें तो बात हैरत वाली होगी.
मेरठ में होस्पिटेलिटी कम्पनी ओयो ने एलान किया है कि अब कुंवारे कपल्स को रूम नहीं दिए जाएंगे. ओयो होटल्स में रुकने वाले कपल्स को रिलेशनशिप सर्टिफिकेट देना होगा. इस फैसले के पीछे ओयो ने बड़ा सात्विक कारण यह बताया है कि मेरठ के लोगों ने अविवाहित कपल्स को कमरा न देने की अपील की थी. इस के अलावा देश भर के खिलाफ कई याचिकाएं भी दायर की गई हैं.

कुछ दिन पहले ही ट्रेवल पीडिया 2024 द्वारा जारी की गई रिपोर्ट में बताया गया था कि अनमैरिड कपल्स ओयो के जरिये ज्यादा रूम बुक करते हैं. यह और बात है कि इतनी मामूली बात के लिए किसी सर्वे की जरूरत नहीं थी. हर किसी को यह सच मालूम था. ऐसा लगता है कि प्यार करने वालों से आजादी और सहूलियत छीनने एक आधार तैयार किया जा रहा है. नहीं तो कहा तो यह भी जा सकता था कि ओयो का सब से ज्यादा इस्तेमाल युवा करते हैं. रिपोर्ट में यह इशारा भी किया गया है कि होटल से आएदिन आपत्तिजनक वीडियो वायरल होते रहते हैं. ( गोया कि अब खत्म हो जाएंगे.)
ओयो के नए दिशानिर्देशों के मुताबिक विवाहित जोड़े रूम बुक करा सकते हैं लेकिन इस के लिए उन्हें औनलाइन या औफलाइन अपने पतिपत्नी होने का प्रमाण देना पड़ेगा. यानी असली पतिपत्नी के यह कह देने भर से काम नहीं चलेगा कि वे वाकई पतिपत्नी हैं. अब अपने पतिपत्नी होने का कौन सा सबूत वे पेश करेंगे यह भगवान जाने क्योंकि देश में 95 फीसदी शादियां परम्परागत तरीके से होती हैं जिस का मैरिज सर्टिफिकेट विदेश जाने के लिए पासपोर्ट जैसे दस्तावेज की जरूरत न हो तो नहीं बनवाया जाता. समाज और कानून उन के कहने भर से ही उन्हें पतिपत्नी मान लेते हैं हां कोई एक एतराज जताए या कोई विवाद हो तो जरुर शादी होने का सबूत पेश करना पड़ता है अब ओयो अपनी इमेज चमकाते बड़ी मासूमियत से कह रहा है कि इस से यानी चेक इन नियमों को बदलने से होटल में रूम लेने वाले परिवारों छात्रों और धार्मिक यात्रियों को सुरक्षित अनुभव मिलेगा.

ऐसा कतई नहीं था कि अब तक ओयो रूम लेने वाले अनमैरिड कपल्स जिन्हें और जिन के पवित्र प्यार को एक झटके में ओयो द्वारा पाप और नाजायज करार दे दिया गया है कोई गदर करते थे बल्कि वे तो चुपचाप कमरे में बंद हो कर अपने प्यार को परवान चढ़ा रहे होते थे जिस में किसी को डिस्टर्ब करने की बात की कोई गुंजाईश ही नहीं थी. उलटे उन का डर या मंशा तो यह रहती थी कि कोई उन्हें डिस्टर्ब न करे.
यह झमेला कैसे कानून और संविधान का खुला उल्लंघन कर रहा है इसे जानने से पहले थोड़ा सा ओयो के बारे में जान लें कि कैसे इस ने कानून और संविधान का ही सहारा ले कर अरबों का आर्थिक साम्राज्य खड़ा किया और अब यह सोचना बेमानी है कि वही इसे ध्वस्त कर रहा है बल्कि इस के पीछे ओयो के फाउंडर और मुखिया रीतेश अग्रवाल की मंशा और पैसा समेटने की है.

31 वर्षीय रीतेश ओडिशा के कटक के एक गांव में पैदा हुआ थे जिन के पिता की किराने की छोटी सी दुकान हुआ करती थी. रीतेश पढ़ाई के लिए कोटा होते हुए दिल्ली पहुंचे लेकिन मन न लगने या कमजोर होने के कारण बीटेक की पढ़ाई उन्होंने बीच में छोड़ दी और दिल्ली में सिम कार्ड बेचने लगे.
व्यवसायिक बुद्धि के धनी इस युवा ने 2013 में ओयो की स्थापना की और ऐप के जरिये कारोबार चलाया और फैलाया जो आज लगभग 800 करोड़ रु का है. इस बाबत उन्हें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तारीफ प्रोत्साहन और पुरुस्कार तीनों मिले. देखते ही देखते ओयो के जरिये लोगों को सस्ते और किफायती रूम मिलने लगे. इन में हर तरह के लोग थे, छात्र, बिजनेसमेन धर्मिक यात्री, शौकीन घुमक्कड़, सैलानी और इन से भी ज्यादा और अहम ये कपल्स जिन्हें प्यार रोमांस और सैक्स के लिए एकांत सुरक्षित जगह की दरकार रहती थी.
देखते ही देखते ओयो की पहचान कुंवारे कपल्स से होने लगी जो बिना किसी डर से बेहद सस्ते में कमरा बुक कराते थे और अपने तन मन की जरूरत पूरी करने के बाद अपनेअपने ठिकानों या घर लौट जाते थे. यह कोई हर्ज की या गैरकानूनी बात नहीं थी बल्कि एक नया कांसैप्ट और व्यवस्था थी जिस में सब कुछ कानून के तहत चल रहा था इसलिए ओयो ने जम कर नोट छापे.
लेकिन अब खुलेआम कानून को धता रीतेश बता रहे हैं. कोई कानून उन्हें यह फैसला लेने या व्यवस्था करने की इजाजत नहीं देता कि अनमैरिड कपल्स को होटल में कमरा नहीं दिया जाएगा. यह ठीक वैसी ही बात है कि दलितों का मंदिर में प्रवेश वर्जित है जबकि कोई कानून इस की भी इजाजत नहीं देता.

ऐसा भी नहीं है कि रीतेश को एकाएक ही धर्म, संस्कृति और समाज का लिहाज हो आया हो बल्कि वे अब चाहते यह हैं कि कुंवारे कपल्स 2 रूम बुक कराएं जिस से ओयो की आमदनी दोगुनी हो. अगर ऐसा नहीं है तो सामाजिक संगठनों के अपील की दलील बेहद खोखली है क्योंकि कहीं कोई सार्वजनिक विरोध या प्रदर्शन ओयो के विरोध में नही हुआ था. छिटपुट जो हुआ वह कतई इतना असर डालने वाला नहीं था जितना कि मासूमियत से वे जाहिर कर रहे हैं.
अब प्यार करने वाले क्या करेंगे और कहां जाएंगे यह सवाल भी बेमानी है क्योंकि ओयो के पहले भी युवा प्यार कर रहे थे और सैक्स भी कर रहे थे. गांव देहातों में ओयो नहीं हैं लेकिन वहां के युवा झाड़ियों, खेत खलिहानों और मंदिरों, खंडहरों तक में प्यार की जगह और मौके ढूंढे लेते हैं.
हां इतना जरुर है कि इस में उन्हें कई दुश्वारियों और परेशानियों का सामना करना पड़ता है. अब ओयो के इस फैसले के बाद शहरी युवाओं को भी दिक्कत होगी लेकिन वे खुद अपना रास्ता बना और ढूंढे लेंगे. हालांकि बेहतर विकल्प खुद ओयो अघोषित रूप से दे चुका है कि अब 2 कमरे बुक करो और हमें दोगुना पैसा दो

Emotional Story : रोबीली सास

Emotional Story :  मां के फोन वैसे तो संक्षिप्त ही होते थे पर इतना महत्त्वपूर्ण समाचार भी वह सिर्फ 2 मिनट में बता देंगी, मेरी कल्पना से परे ही था. ‘‘शुचिता की शादी तय हो गई है. 15 दिन बाद का मुहूर्त निकला है, तुम सब लोगों को आना है,’’ बस, इतना कह कर वह फोन रखने लगी थीं.

‘‘अरे, मां, कब रिश्ता तय किया है, कौन लोग हैं, कहां के हैं, लड़का क्या करता है?’’ मैं ने एकसाथ कई प्रश्न पूछ डाले थे. ‘‘सब ठीकठाक ही है, अब आ कर देख लेना.’’

मां और बातें करने के मूड में नहीं थीं और मैं कुछ और कहती तब तक उन्होंने फोन रख दिया था. लो, यह भी कोई बात हुई. अरे, शुचिता मेरी सगी छोटी बहन है, इतना सब जानने का हक तो मेरा बनता ही है कि कहां शादी तय हो रही है, कैसे लोग हैं. अरे, शुचि की जिंदगी का एक अहम फैसला होने जा रहा है और मुझे खबर तक नहीं. ठीक है, मां का स्वास्थ्य इन दिनों ठीक नहीं रहता है, फिर शुचिता की शादी को ले कर पिछले कई सालों से परेशान हो रही हैं. पिताजी के असमय निधन से और अकेली पड़ गई हैं. भाई कोई है नहीं, हम 3 बहनें ही हैं. मैं, नमिता और शुचिता. मेरी और नमिता की शादी हुए काफी अरसा हो गया है पर पता नहीं क्यों शुचिता का हर बार रिश्ता तय होतेहोते रह जाता था. शायद इसीलिए मां इतनी शीघ्रता से यह काम निबटाना चाह रही हों.

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जो भी हो, बात तो मां को पूरी बतानी थी. शाम को मैं ने फिर शुचिता से ही बात करनी चाही थी पर वह तो शुरू से वैसे भी मितभाषी ही रही है. अभी भी हां-हूं ही करती रही. ‘‘दीदी, मां ने बता तो दिया होगा सबकुछ…’’ स्वर भी उस का तटस्थ ही था.

‘‘अरे, पर तू तो पूरी बात बता न, तेरे स्वर में भी कोई खास उत्साह नहीं दिख रहा है,’’ मैं तो अब झल्ला ही पड़ी थी. ‘‘उत्साह क्या, सब ठीक ही है. मां इतने दिन से परेशान थीं, मैं स्वयं भी अब उन पर बोझ बन कर उन की परेशानी और नहीं बढ़ाना चाहती. अब यह रिश्ता तो जैसे एक तरह से अपनेआप ही तय हो गया है, तो अच्छा ही होगा,’’ शुचिता ने भी जैसेतैसे बात समाप्त ही कर दी थी.

राजीव तो अपने काम में इतने व्यस्त थे कि उन को छुट्टी मिलनी मुश्किल थी. मेरा और बच्चों का रिजर्वेशन करवा दिया. मैं चाह रही थी कि 4-5 दिन पहले पहुंचूं पर मैं और नमिता दोनों ही रिजर्वेशन के कारण ठीक शादी वाले दिन ही पहुंच पाए थे. मेरी तरह नमिता भी उतनी ही उत्सुक थी यह जानने के लिए कि शुचि का रिश्ता कहां तय हुआ और इतनी जल्दी कैसे सब तय हो गया पर जो कुछ जानकारी मिली उस ने तो जैसे हमारे उत्साह पर पानी ही फेर दिया था.

जौनपुर का कोई संयुक्त परिवार था. छोटामोटा बिजनेस था. लड़का भी वही पुश्तैनी काम संभाल रहा था. उन लोगों की कोई मांग नहीं थी. लड़के की बूआ खुद आ कर शुचिता को पसंद कर गई थीं और शगुन की अंगूठी व साड़ी भी दे गई थीं.

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‘‘मां,’’ मेरे मुंह से निकल गया, ‘‘जब इतने समय से रिश्ते देख रहे हैं तो और देख लेते. आप को जल्दी क्या थी. ऐसी क्या शुचि बोझ बन गई थी? अब जौनपुर जैसा छोटा सा पुराना शहर, पुराने रीतिरिवाज के लोग, संयुक्त परिवार, शुचि कैसे निभेगी उस घर में.’’ ‘‘सब निभ जाएगी,’’ मां बोलीं, ‘‘अब मेरे इस बूढ़े शरीर में इतनी ताकत नहीं बची है कि घरघर रिश्ता ढूंढ़ती रहूं. इतने बरस तो हो गए, कहीं जन्मपत्री नहीं मिलती, कहीं दहेज का चक्कर… और तुम दोनों जो इतनी मीनमेख निकाल रही हो, खुद क्यों नहीं ढूंढ़ दिया कोई अच्छा घरबार अपनी बहन के लिए.’’

मां ने तो एक तरह से मुझे और नमिता दोनों को ही डपट दिया था. यह सच भी था, हम दोनों बहनें अपनेअपने परिवार में इतनी व्यस्त हो गई थीं कि जितने प्रयास करने चाहिए थे, चाह कर भी नहीं कर पाए.

खैर, सीधेसादे समारोह के साथ शुचिता ब्याह दी गई. मैं और नमिता दोनों कुछ दिन मां के पास रुक गए थे पर हम रोज ही यह सोचते कि पता नहीं कैसे हमारी यह भोलीभाली बहन उस संयुक्त परिवार में निभेगी. हम लोग ऐसे परिवारों में कभी रहे नहीं. न ही हमें घरेलू काम करने की अधिक आदत थी. पिताजी थे तब काफी नौकरचाकर थे और अभी भी मां ने 2 काम वाली बाई लगा रखी थीं और खाना भी उन्हीं से बनवा लेती थीं.

फिर शुचि का तो स्वभाव भी सरल सा है. तेजतर्रार सास, ननदें, जेठानी सब मिल कर दबा लेंगी उसे. जब चचेरा भाई रवि विदा कराने गया तब हम लोग यही सोच कर आशंकित थे कि पता नहीं शुचि आ कर क्या हालचाल सुनाए. पर उस समय तो उस की सास ने विदा भी नहीं किया. रवि से यह कह कर कि महीने भर बाद भेजेंगी, अभी किसी बच्चे का जन्मदिन है, उसे भेज दिया था.

उधर रवि कहता जा रहा था, ‘‘दीदी, शुचि दीदी को आप ने कैसे घर में भेज दिया, वह घर क्या उन के लायक है. छोटा सा पुराने जमाने का मकान, उस में इतने सारे लोग…अब आजकल कौन बहुओं से घूंघट निकलवाता है, पर शुचि दीदी से इतना परदा करवाया कि मेरे सामने ही मुश्किल से आ पाईं. ‘‘ऊपर से सास, ननदें सब तेजतर्रार. सास ने तो एक तरह से मुझे ही झिड़क दिया कि बहू से घर का कामकाज तो होता नहीं है, इतना नाजुक बना कर रख दिया है लड़की को कि वह चार जनों का खाना तक नहीं बना सकती, पर गलती तो इस की मां की है जो कुछ सिखाया नहीं. अब हम लोग सिखाएंगे.

‘‘सच दीदी, इतनी रोबीली सास तो मैं ने पहली बार देखी.’’ रवि कहता जा रहा है और मेरा कलेजा बैठता जा रहा था कि इतने सीधेसादे ढंग से शादी की है, कहीं लालची लोग हुए तो दहेज के कारण मेरी बहन को प्रताडि़त न करें. वैसे भी दहेज को ले कर इतने किस्से तो आएदिन होते रहते हैं.

शुचि से मिलना भी नहीं हो पाया. मां से भी इस बारे में अधिक बात नहीं कर पाई. वैसे भी हृदय रोग की मरीज हैं वे.

शुचि से फोन पर कभीकभार बात होती तो जैसा उस का स्वभाव था हांहूं में ही उत्तर देती. बीच में दशहरे की छुट्टियों में फिर मां के पास जाना हुआ था. सोचा कि शायद शुचि भी आए तो उस से भी मिलना हो जाएगा पर मां ने बताया कि शुचि की सास बीमार हैं…वह आ नहीं पाएगी.

‘‘मां, इतने लोग तो हैं उस घर में फिर शुचि तो नईनवेली बहू है, क्या अब वही बची है सास की सेवा को, जो चार दिन को भी नहीं आ सकती,’’ मैं कहे बिना नहीं रह पाई थी. मुझे पता था कि उस की ननदें, जेठानी सब इतनी तेज हैं तो शुचि दब कर रह गई होगी. उधर मां कहे जा रही थीं, ‘‘सास का इलाज होना था तो पैसे की जरूरत पड़ी. शुचि ने अपने कंगन उतार कर सास के हाथ पर धर दिए…सास तो गद्गद हो गईं.’’

मैं ने माथे पर हाथ मारा. हद हो गई बेवकूफी की भी. अरे, छोटीमोटी बीमारी का तो इलाज यों ही हो जाता है फिर पुश्तैनी व्यापार है, इतने लोग हैं घर में… और सास की चतुराई देखो, जो थोड़ा- बहुत जेवर शुचि मायके से ले कर गई है उस पर भी नजरें गड़ी हैं. उधर मां कहती जा रही थीं, ‘‘अच्छा है उस घर में रचबस गई है शुचि…’’

मां भी आजकल पता नहीं किस लोक में विचरण करने लगी हैं. सारी व्यावहारिकता भूल गई हैं. शुचि के पास कुछ गहनों के अलावा और है ही क्या. मेरा तो मन ही उचट गया था. घर आ कर भी मूड उखड़ाउखड़ा ही रहा. राजीव से यह सब कहा तो उन का तो वही चिरपरिचित उत्तर था.

‘‘तुम क्यों परेशान हो रही हो. सब का अपनाअपना भाग्य है. अब शुचि के भाग्य में जौनपुर के ये लोग ही थे तो इस में तुम क्या कर सकती हो और मां से क्या उम्मीद करती हो? उन्होंने तो जैसे भी हो अपना दायित्व पूरा कर दिया.’’ फोन पर पता चला कि शुचि बीमार है, पेट में पथरी है और आपरेशन होगा. दूसरी कोई शिकायत हो सकती है तो पहले सारे टेस्ट होंगे, बनारस के एक अस्पताल में भरती है.

‘‘तुम लोग देख आना, मेरा तो जाना हो नहीं पाएगा,’’ मां ने खबर दी थी. नमिता भी छुट्टी ले कर आ गई थी. वहीं अस्पताल के पास उस ने एक होटल में कमरा बुक करा लिया था.

‘‘रीता, मैं तो 2 दिन से ज्यादा रुक नहीं पाऊंगी, बड़ी मुश्किल से आफिस से छुट्टी मिली है,’’ उस ने मिलते ही कहा था. ‘‘मैं भी कहां रुक पाऊंगी, छोटू के इम्तहान चल रहे हैं, नौकर भी आजकल बाहर गया हुआ है. बस, दिन में ही शुचि के पास बैठ लेंगे, रात को तो जगना भी मुश्किल है मेरे लिए,’’ मैं ने भी अपनी परेशानी गिना दी थी.

सवाल यह था कि यहां रुक कर शुचि की देखभाल कौन करेगा? कम से कम 10 दिन तो उसे अस्पताल में ही रहना होगा. अभी तो सारे टेस्ट होने हैं. हम दोनों शुचि को देखने जब अस्पताल पहुंचे तो पता चला कि उस की दोनों ननदें आई हुई हैं. बूढ़ी सास भी उसे संभालने आ गई हैं और उन लोगों ने काटेज वार्ड के पास ही कमरा ले लिया था.

दबंग सास बड़े प्यार से शुचि के सिर पर हाथ फेर रही थीं. ‘‘फिक्र मत कर बेटी, तू जल्दी ठीक हो जाएगी, मैं हूं न तेरे पास. तेरी दोनों ननदें भी अपनी ससुराल से आ गई हैं. सब बारीबारी से तेरे पास सो जाया करेंगे. तू अकेली थोड़े ही है.’’

उधर शुचि के पति चम्मच से उसे सूप पिला रहे थे, एक ननद मुंह पोंछने का नैपकिन लिए खड़ी थी. ‘‘दीदी, कैसी हो?’’ शुचि ने हमें देख कर पूछा था. मुझे लगा कि इतनी बीमारी के बाद भी शुचि के चेहरे पर एक चमक है. शायद घरपरिवार का इतना अपनत्व पा कर वह अपनी बीमारी भूल गई है. पर पता नहीं क्यों मेरे और नमिता के सिर कुछ झुक गए थे. कई बार इनसानों को समझने में कितनी भूल कर देते हैं हम. मैं ऐसा ही कुछ सोच रही थी.

लेखिका- डॉ कासमा चतुर्वेदी

Hindi Stories : पान खाए सैयां हमारो

Hindi Stories :  शाम के 6 बजे जब सब 1-1 कर घर जाने के लिए अपनाअपना बैग समेटने लगे तो सिया ने चोरी से एक नजर अनिल पर डाली. औफिस में नया आया सब से हैंडसम, स्मार्ट, खुशमिजाज अनिल उसे देखते ही पसंद आ गया था. वह मन ही मन उस के प्रति आकर्षित थी.

अनिल ने भी एक नजर उस पर डाली तो वह मुसकरा दी. दोनों अपनीअपनी चेयर से लगभग साथ ही उठे. लिफ्ट तक भी साथ ही गए. 2-3 लोग और भी उन के साथ बातें करते लिफ्ट में आए. आम सी बातों के दौरान सिया ने भी नोट किया कि अनिल भी उस पर चोरीचोरी नजर डाल रहा है.

बाहर निकल कर सिया रिकशे की तरफ जाने लगी तो अनिल ने कहा, ‘‘सिया, कहां जाना है आप को मैं छोड़ दूं?’’‘‘नो थैंक्स, मैं रिकशा ले लूंगी.’’‘‘अरे, आओ न, साथ चलते हैं.’’‘‘अच्छा, ठीक है.’’

अनिल ने अपनी बाइक स्टार्ट की, तो सिया उस के पीछे बैठ गई. अनिल से आती परफ्यूम की खुशबू सिया को भा रही थी. दोनों को एकदूसरे का स्पर्श रोमांचित कर गया. बनारस में इस औफिस में दोनों ही नए थे. सिया की नियुक्ति पहले हुई थी.

अचानक सड़क के किनारे होते हुए अनिल ने ब्रेक लगाए तो सिया चौंकी, ‘‘क्या हुआ?’’‘‘कुछ नहीं,’’ कहते हुए अनिल ने अपनी पैंट की जेब से गुटका निकाला और बड़े स्टाइल से मुंह में डालते हुए मुसकराया.‘‘यह क्या?’’ सिया को एक झटका सा लगा.‘‘मेरा फैवरिट पानमसाला.’’‘‘तुम्हें इस की आदत है?’’

‘‘हां, और यह मेरी स्टाइलिश आदत है, है न?’’ फिर सिया के माथे पर शिकन देख कर पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’‘‘तुम्हें इन सब चीजों का शौक है?’’‘‘हां, पर क्या हुआ?’’‘‘नहीं, कुछ नहीं,’’ कह कर वह चुप रही तो अनिल ने फिर बाइक स्टार्ट कर ली.धीरेधीरे यह रोज का क्रम बन गया. घर से आते हुए सिया रिकशे में आती, औफिस से वापस जाते समय अनिल उसे उस के घर से थोड़ी दूर उतार देता. धीरेधीरे दोनों एकदूसरे से खुलते गए.

अनिल का सिया के प्रति आकर्षण बढ़ता गया. मौडर्न, सुंदर, स्मार्ट सिया को वह अपने भावी जीवनसाथी के रूप में देखने लगा था. कुछ ऐसा ही सिया भी सोचने लगी थी. दोनों को विश्वास था कि उन के घर वाले उन की पसंद को पसंद करेंगे.

अनिल तो सिया के साथ अपना जीवन आगे बढ़ाने के लिए शतप्रतिशत तय कर चुका था पर सिया एक पौइंट पर आ कर रुक जाती थी. अनिल की लगातार मुंह में गुटका दबाए रखने की आदत पर वह जलभुन जाती थी. कई बार उस ने इस से होने वाली बीमारियों के बारे में चेतावनी भी दी तो अनिल ने बात हंसी में उड़ा दी, ‘‘यह क्या तुम बुजुर्गों की तरह उपदेश देने लगती हो. अरे, मेरे घर में सब खाते हैं, मेरे मम्मीपापा को भी आदत है, तुम खाती नहीं न, इसलिए डरती हो. 2-3 बार खाओगी तो स्वाद अपनेआप अच्छा लगने लगेगा. पहले मेरी मम्मी भी पापा को मना करती थीं. फिर धीरेधीरे वे गुस्से में खुद खाने लगीं और अब तो उन्हें भी मजा आने लगा है, इसलिए अब कोई किसी को नहीं टोकता.’’

सिया के दिल में क्रोध की एक लहर सी उठी पर अपने भावों को नियंत्रण में रखते हुए बोली, ‘‘पर अनिल, तुम इतने पढ़ेलिखे हो, तुम्हें खुद भी यह बुरी आदत छोड़नी चाहिए और अपने मम्मीपापा को भी समझाना चाहिए.’’

‘‘उफ सिया. छोड़ो यार, आजकल तुम घूमफिर कर इसी बात पर आ जाती हो. हमारे मिलने का आधा समय तो तुम इसी बात पर बिता देती हो. अरे, तुम ने वह गाना नहीं सुना, ‘पान खाए सैयां हमारो…’ फिर हंसा, ‘‘तुम्हें तो यह गाना गाना चाहिए, देखा नहीं कभी क्या कि वहीदा रहमान यह गाना गाते हुए कितनी खुश होती हैं.’’‘‘वे फिल्मों की बातें हैं. उन्हें रहने दो.’’

अनिल उसे फिर हंसाता रहा पर वह उस की इस आदत पर काफी चिंतित थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह अनिल की इस आदत को कैसे छुड़ाए.एक दिन सिया अपने मम्मीपापा और बड़े भाई राहुल से मिलवाने अनिल को घर ले गई. अनिल का व्यक्तित्व कुछ ऐसा था कि देखने वाला तुरंत प्रभावित होता था. सब अनिल के साथ घुलमिल गए. बातें करतेकरते जब ऐक्सक्यूज मी कह कर अनिल ने अपनी जेब से पानमसाला निकाल कर अपने मुंह में डाला, तो सब उस की इस आदत पर हैरान से चुप बैठे रह गए.

अनिल के जाने के बाद वही हुआ जिस की उसे आशा थी. सिया की मम्मी सुधा ने कहा, ‘‘अनिल अच्छा लगा पर उस की यह आदत …’’ सिया ने बीच में ही कहा, ‘‘हां मम्मी, मुझे भी उस की यह आदत बिलकुल पसंद नहीं है. क्या करूं समझ नहीं आ रहा है.’’

थोड़े दिन बाद ही अनिल सिया को अपने परिवार से मिलवाने ले गया. अनिल के पापा श्याम और मम्मी मंजू अनिल की छोटी बहन मिनी सब सिया से बहुत प्यार से पेश आए. सिया को भी सब से मिल कर बहुत अच्छा लगा. मंजू ने तो उसे डिनर के लिए ही रोक लिया. सिया भी सब से घुलमिल गई. फिर वह किचन में ही मंजू का हाथ बंटाने आ गई. सिया ने देखा, फ्रिज में एक शैल्फ पान के बीड़ों से भरी हुई थी.

‘‘आंटी, इतने पान?’’ वह हैरान हुई.‘‘अरे हां,’’ मंजू मुसकराईं, ‘‘हम सब को आदत है न. तुम तो जानती ही हो, बनारस के पान तो मशहूर हैं.’’‘‘पर आंटी, हैल्थ के लिए…’’‘‘अरे छोड़ो, देखा जाएगा,’’ सिया के अपनी बात पूरी करने से पहले ही मंजू बोलीं.किचन में ही एक तरफ शराब की बोतलों का ढेर था. वह वौशरूम में गई तो वहां उसे जैसे उलटी आने को हो गई. बाहर से घर इतना सुंदर और वौशरूम में खाली गुटके यहांवहां पड़े थे. टाइल्स पर पड़े पान के छींटों के निशान देखते ही उसे उलटी आ गई. सभ्य, सुसंस्कृत दिखने वाले परिवार की असलियत घर के कोनेकोने में दिखाई दे रही थी. ‘अगर वह इस घर में बहू बन कर आ गई तो उस का बाकी जीवन तो इन गुटकों, इन बदरंग निशानों को साफ करते ही बीत जाएगा,’ उस ने इन विचारों में डूबेडूबे ही सब के साथ डिनर किया.

डिनर के बाद अनिल सिया को घर छोड़ आया. घर आने के बाद सिया के मन में कई विचार आ जा रहे थे. अनिल एक अच्छा जीवनसाथी सिद्ध हो सकता है, उस के घर वाले भी उस से प्यार से पेश आए पर सब की ये बुरी आदतें पानमसाला, शराब, सिगरेट के ढेर वह अपनी आंखों से देख आई थी. घर आ कर उस ने अपने मन की बात किसी को नहीं बताई पर बहुत कुछ सोचती रही. 2-3 दिन उस ने अनिल से एक दूरी बनाए रखी. सिया के इस रवैए से परेशान अनिल बहुत कुछ सोचने लगा कि क्या हुआ होगा पर उसे जरा भी अंदाजा नहीं हुआ तो शाम को घर जाने के समय वह सिया का हाथ पकड़ कर जबरदस्ती कैंटीन में ले गया, वहां बैठ कर उदास स्वर में पूछा, ‘‘क्या हुआ है, बताओ तो मुझे?’’

सिया को जैसे इसी पल का इंतजार था. अत: उस ने गंभीर, संयत स्वर में कहना शुरू किया, ‘‘अनिल, मैं तुम्हें बहुत पसंद करती हूं, पर हम इस रिश्ते को आगे नहीं बढ़ा पाएंगे.’’अनिल हैरानी से चीख ही पड़ा, ‘‘क्यों?’’

‘‘तुम्हें और तुम्हारे परिवार को जो ये कुछ बुरी आदतें हैं, मुझ से सहन नहीं होंगी, तुम एजुकेटेड हो, तुम्हें इन आदतों का भविष्य तो पता ही होगा. भले ही तुम इन आदतों के परिणामों को नजरअंदाज करते रहो पर जानते तो हो ही न? मैं ऐसे परिवार की बहू कैसे बनूं जो इन बुरी आदतों से घिरा है? आई एम सौरी, अनिल, मैं सब जानतेसमझते ऐसे परिवार का हिस्सा नहीं बनना चाहूंगी.’’

अनिल का चेहरा मुरझा चुका था. बड़ी मुश्किल से उस की आवाज निकली, ‘‘सिया, मैं तो तुम्हारे बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता.’’‘‘हां अनिल, मैं भी तुम से दूर नहीं होना चाहती पर क्या करूं, इन व्यसनों का हश्र जानती हूं मैं. सौरी अनिल,’’ कह उठ खड़ी हुई.अनिल ने उस का हाथ पकड़ लिया, ‘‘अगर मैं यह सब छोड़ने की कोशिश करूं तो? अपने मम्मीपापा को भी समझांऊ तो?’’

‘‘तो फिर मैं इस कोशिश में तुम्हारे साथ हूं,’’ मुसकराते हुए सिया ने कहा, ‘‘पर इस में काफी समय लगेगा,’’ कह सिया चल दी.आत्मविश्वास से सधे सिया के कदमों को देखता अनिल बैठा रह गया.आदतन हाथ जेब तक पहुंचा, फिर सिर पकड़ कर बैठा रह गया.

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