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Romantic Story : जीने की इच्छा – आभा और अरुण का क्या रिश्ता था

Romantic Story : ‘‘जल्दी करो मां. मुझे देर हो रही है. फिर ट्रेन में जगह नहीं मिलेगी,’’ अरुण ने कहा.

मां बोलीं, ‘‘तेरी गाड़ी तो 12 बजे की है. अभी तो 7 भी नहीं बजे हैं.’’

‘‘मां, तुम समझती क्यों नहीं हो. मैं यार्ड में ही जा कर डब्बे में बैठ जाऊंगा. प्लेटफार्म पर सभी जनरल डब्बे बिलकुल भरे हुए ही आते हैं,’’ अरुण बोला.

उन दिनों ‘श्रमजीवी ऐक्सप्रैस’ ट्रेन पटना जंक्शन से 12 बजे खुल कर अगले दिन सुबह 5 बजे नई दिल्ली पहुंचती थी. अरुण को एक इंटरव्यू के लिए दिल्ली जाना था. अगले दिन सुबह के 11 बजे दिल्ली के दफ्तर में पहुंचना था.

अरुण के पिता किसी प्राइवेट कंपनी में चपरासी थे. अभी कुछ महीने पहले ही वे रिटायर हुए थे. वे कुछ दिनों से बीमार थे. वे किसी तरह 2 बेटियों की शादी कर चुके थे. सब से छोटे बेटे अरुण ने बीए पास करने के बाद कंप्यूटर की ट्रेनिंग ली थी. वह एक साल से बेकार बैठा था.

अरुण 1-2 छोटीमोटी ट्यूशन करता था. उस के पास स्लीपर क्लास के भी पैसे नहीं थे, इसीलिए पटना से दिल्ली जनरल डब्बे में जाना पड़ रहा था.

मां ने कहा, ‘‘बस हो गया. मैं ने  परांठा और भुजिया एक पैकेट में पैक कर दिया है. तुम याद से अपने बैग में रख लेना.’’

पिता ने भी बिस्तर पर पड़ेपड़े कहा, ‘‘जाओ बेटे, अपने सामान का खयाल रखना.’’

अरुण मातापिता को प्रणाम कर स्टेशन के लिए निकल पड़ा. यार्ड में जा कर एक डब्बे में खिड़की के पास वाली सिंगल सीट पर कब्जा जमा कर उस ने चैन की सांस ली.

ट्रेन प्लेटफार्म पर पहुंची, तो चढ़ने वालों की बेतहाशा भीड़ थी. अरुण जिस खिड़की वाली सीट पर बैठा था, वह इमर्जैंसी खिड़की थी. एक लड़की डब्बे में घुसने की नाकाम कोशिश कर रही थी. उस लड़की ने अरुण के पास आ कर कहा, ‘‘आप इमर्जैंसी खिड़की खोलें, तो मैं भी डब्बे में आ सकती हूं. मेरा इस ट्रेन से दिल्ली जाना बहुत जरूरी है.’’

अरुण ने उसे सहारा दे कर खिड़की से अंदर डब्बे में खींच लिया. लड़की पसीने से तरबतर थी. दुपट्टे से मुंह का पसीना पोंछते हुए उस ने अरुण को ‘थैंक्स’ कहा.

थोड़ी देर में गाड़ी खुली, तो अरुण ने अपनी सीट पर जगह बना कर लड़की को बैठने को कहा. पहले तो वह झिझक रही थी, पर बाद में और लोगों ने भी बैठने को कहा, तो वह चुपचाप बैठ गई.

तकरीबन 2 घंटे बाद ट्रेन बक्सर पहुंची. यह बिहार का आखिरी स्टेशन था. यहां कुछ लोकल मुसाफिरों के उतरने से राहत मिली.

अरुण के सामने वाली सीट खाली हुई, तो वह लड़की वहां जा बैठी.

अरुण ने लड़की का नाम पूछा, तो वह बोली, ‘‘आभा.’’

अरुण बोला, ‘‘मैं अरुण.’’

दोनों में बातें होने लगीं. अरुण ने पूछा, ‘‘पटना में तुम कहां रहती हो?’’

आभा बोली, ‘‘सगुना मोड़… दानापुर के पास.’’

‘‘मैं बहादुरपुर… मैं पटना के पूर्वी छोर पर हूं और तुम पश्चिमी छोर पर. दिल्ली में कहां जाना है?’’

‘‘कल मेरा एक इंटरव्यू है.’’

‘‘वाह, मेरा भी कल एक इंटरव्यू है. बुरा न मानो, तो क्या मैं जान सकता हूं कि किस कंपनी में इंटरव्यू है?’’

आभा बोली, ‘‘लाल ऐंड लाल ला असोसिएट्स में.’’

अरुण तकरीबन अपनी सीट से उछल कर बोला, ‘‘वाह, क्या सुहाना सफर है. आगाज से अंजाम तक हम साथ रहेंगे.’’

‘‘क्या आप भी वहीं जा रहे हैं?’’

अरुण ने रजामंदी में सिर हिलाया और मुसकरा दिया. रातभर दोनों अपनीअपनी सीट पर बैठेबैठे सोतेजागते रहे थे.

ट्रेन तकरीबन एक घंटा लेट हो गई थी. इस के बावजूद काफी देर से गाजियाबाद स्टेशन पर खड़ी थी. सुबह के 7 बज चुके थे. अरुण नीचे उतर कर लेट होने की वजह पता लगाने गया.

अरुण अपनी सीट पर बैठते हुए बोला, ‘‘गाजियाबाद और दिल्ली के बीच में एक गाड़ी पटरी से उतर गई है. आगे काफी ट्रेनें फंसी हैं. ट्रेन के दिल्ली पहुंचने में काफी समय लग सकता है.’’

आभा यह सुन कर घबरा गई. अरुण ने उसे शांत करते हुए कहा, ‘‘डोंट वरी. हम दोनों यहीं उतर जाते हैं. यहीं फ्रैश हो कर कुछ चायनाश्ता कर लेते हैं. फिर यहां से आटोरिकशा ले कर सीधे कनाट प्लेस एक घंटे के अंदर पहुंच जाएंगे.’’

दोनों ने गाजियाबाद स्टेशन पर ही चायनाश्ता किया. फिर आटोरिकशा से दोनों कंपनी पहुंचे. दोनों ने अलगअलग इंटरव्यू दिए. इस के बाद कंपनी के मालिक मोहनलाल ने दोनों को एकसाथ बुलाया.

मोहनलाल ने दोनों से कहा, ‘‘देखो, मैं भी बिहार का ही हूं. दोनों की क्वालिफिकेशंस एक ही हैं. इंटरव्यू में दोनों की परफौर्मेंस बराबर रही है, पर मेरे पास तो एक ही जगह है. अब तुम लोग बाहर जा कर तय करो कि किसे नौकरी की ज्यादा जरूरत है. मुझे बता देना, मैं औफर लैटर इशू कर दूंगा.’’

अरुण और आभा दोनों ने बाहर आ कर बात की. अपनीअपनी पारिवारिक और माली हालत बताई.

आभा की मां विधवा थीं. उस की एक छोटी बहन भी थी. वह पटना के कंप्यूटर इंस्टीट्यूट में पार्ट टाइम नौकरी करती थी, पर उसे बहुत कम पैसे मिलते थे. परिवार को उसी को देखना होता था.

अरुण ने आभा के पक्ष में सहमति जताई. आभा को वह नौकरी मिल गई.

मालिक मोहनलाल अरुण से बहुत खुश हुआ और बोला, ‘‘नौकरी तो तुम भी डिजर्व करते थे. मैं तुम से बहुत खुश हूं. वैसे तो किराया देने का कोई करार नहीं था. फिर भी मैं ने अकाउंटैंट को कह दिया है कि तुम्हें थर्ड एसी का अपडाउन रेल किराया मिल जाएगा. जाओ, जा कर पैसे ले लो.’’

अरुण ने पैसे ले लिए. आभा उसे धन्यवाद देते हए बोली, ‘‘यह दिन मैं कभी नहीं भूलूंगी. मिस्टर मोहनलाल ने मुझे बताया कि तुम ने मेरी खाितर बड़ा त्याग किया है.’’

दोनों ने एकदूसरे का फोन नंबर लिया और संपर्क में रहने को कहा.

अरुण जनरल डब्बे में बैठ कर पटना लौट आया. उस ने किराए का काफी पैसा बचा लिया था. मातापिता को जब पता चला कि उसे नौकरी नहीं मिली, तो वे दोनों उदास हो गए.

कुछ ही दिनों में अरुण के पिता चल बसे. अरुण किसी तरह 2-3 ट्यूशन कर अपना काम चला रहा था. जिंदगी से उस का मन टूट चुका था. कभी सोचता कि घर छोड़ कर भाग जाए, तो कभी सोचता गंगा में जा कर डूब जाए. फिर अचानक बूढ़ी मां की याद आती, तो आंखों में आंसू भर आते.

एक दिन अरुण बाजार से कुछ सामान खरीदने गया. एक 16-17 साल का लड़का अपने कंधे पर एक बैग लटकाए कुछ बेच रहा था. उस के एक पैर में पोलियो का असर था. लाठी के सहारे चलता हुआ वह अरुण के पास आ कर बोला, ‘‘भैया, क्या आप को पापड़ चाहिए? 10 रुपए का एक पैकेट है.’’

अरुण ने कहा, ‘‘नहीं चाहिए पापड़.’’

लड़के ने थैले से एक शीशी निकाल कर कहा, ‘‘आम का अचार है. चाहिए? पापड़ और अचार दोनों घर के बने हैं. मां बनाती हैं.’’

अरुण के मन में दया आ गई. उस के पास 5 रुपए ही बचे थे. उस ने लड़के को देते हुए कहा, ‘‘मुझे कुछ चाहिए तो नहीं, पर तुम इसे रख लो.’’

अरुण ने रुपए उस के हाथ में पकड़ा दिए. दूसरे ही पल वह लड़का गुस्से से बोला, ‘‘मैं विकलांग हूं, पर भिखारी नहीं. मैं मेहनत कर के खाता हूं. जिस दिन कुछ नहीं कमा पाता, मांबेटे पानी पी कर सो जाते हैं.’’

इतना बोल कर उस लड़के ने रुपए अरुण को लौटा दिए. पर वह अरुण की आंखों में उम्मीद की किरण जगा गया. वह सोचने लगा, ‘जब यह लड़का जिंदगी से हार नहीं मान सकता है, तो मैं क्यों मानूं?’

अरुण के पास दिल्ली में मिले कुछ रुपए बचे थे. वह कोलकाता गया. वहां के मंगला मार्केट से थोक में कुछ जुराबें, रूमाल और गमछे खरीद लाया. ट्यूशन के बाद बचे समय में न्यू मार्केट और महावीर मंदिर के पास फुटपाथ पर उन्हें बेचने लगा.

इस इलाके में सुबह से ले कर देर रात तक काफी भीड़ रहती थी. अरुण की अच्छी बिक्री हो जाती थी.

शुरू में अरुण को कुछ झिझक होती थी, पर बाद में उस का इस में मन लग गया. इस तरह उस ने देखा कि एक हफ्ते में तकरीबन 7-8 सौ रुपए, तो कभी हजार रुपए की बचत होती थी.

इस बीच बहुत दिन बाद उसे आभा का फोन आया. उस ने कहा, ‘‘अगले हफ्ते मेरी शादी होने वाली है. कार्ड पोस्ट कर दिया है. तुम जरूर आना और मां को भी साथ लाना.’’

अरुण मां के साथ आभा की शादी में सगुना मोड़ उस के घर गया. आभा ने अपनी मां, बहन और पति से उन्हें मिलवाया और कहा, ‘‘मैं जिंदगीभर अरुण की कर्जदार रहूंगी. मुझे नौकरी अरुण की वजह से ही मिली थी.’’

शादी के बाद आभा दिल्ली चली गई. अरुण की दिनचर्या पहले जैसी हो गई.

एक दिन आभा का फोन आया. उस ने कहा, ‘‘मेरे पति गुड़गांव की एक गारमैंट फैक्टरी में डिस्पैच सैक्शन में हैं. फैक्टरी से मामूली डिफैक्टिव कपड़े सस्ते दामों में मिल जाते हैं. तुम चाहो, तो इन्हें बेच कर अच्छाखासा मुनाफा कमा सकते हो.’’

अरुण बोला, ‘नेकी और पूछपूछ… मैं गुड़गांव आ रहा हूं.’

इधर अरुण उस पापड़ वाले लड़के का स्थायी ग्राहक हो गया था. उस का नाम रामू था. हर हफ्ते एक पैकेट पापड़ और अचार की शीशी उस से लिया करता था. अब अरुण महीने 2 महीने में एक बार दिल्ली जा कर कपड़े लाता और उन्हें अच्छे दाम पर बेचता.

धीरेधीरे अरुण का कारोबार बढ़ता गया. उस ने कंकड़बाग में एक छोटी सी दुकान किराए पर ले ली थी. बीचबीच में कोलकाता से भी थोक में कपड़े लाया करता. कारोबार बढ़ने पर उस ने एक बड़ी दुकान ले ली.

अरुण की शादी थी. उस ने आभा को भी बुलाया. वह भी पति के साथ आई थी. अरुण ने उस पापड़ वाले लड़के को भी अपनी शादी में बुलाया था.

शादी हो जाने के बाद जब अरुण अपनी मां के साथ मेहमानों को विदा कर रहा था, अरुण ने आभा को उस की मदद के लिए थैंक्स कहा.

आभा ने कहा, ‘‘अरे यार, नो मोर थैंक्स. हिसाब बराबर. हम दोस्त  हैं.’’

फिर अरुण ने रामू को बुला कर सब से परिचय कराते हुए कहा, ‘‘आज मैं जोकुछ भी हूं, इस लड़के की वजह से हूं. मैं तो जिंदगी से निराश हो चुका था. मेरे अंदर जीने की इच्छा को इस स्वाभिमानी मेहनती रामू ने जगाया.’’

तब अरुण रामू से बोला, ‘‘मुझे अपनी दुकान में एक सेल्समैन की जरूरत है. क्या तुम मेरी मदद करोगे?’’

रामू ने हामी भर कर सिर झुका कर अरुण को नमस्कार किया.

अरुण बोला, ‘‘अब तुम्हें घूमघूम कर सामान बेचने की जरूरत नहीं है. मैं ने यहां के विधायक को अर्जी दी है तुम्हें अपने फंड से एक तिपहिया रिकशा देने की. तुम उसे आसानी से चला सकते हो और आजा सकते हो.’’

अरुण, आभा, रामू और बाकी सभी की आंखें खुशी से नम थीं. तीनों एकदूसरे के मददगार जो बने थे.

Emotional Story : वापसी – क्या वापस लौटा पूनम का फौजी पति

Emotional Story : आंगन में तुलसी के चबूतरे पर लगी अगरबत्ती की खुशबू ने पूरे घर को महका दिया था. पूनम अभीअभी पूजा कर के रसोईघर में गई ही थी कि दादी मां ने रोज की तरह चिल्लाना शुरू कर दिया था, “अरी ओ पूनम, पूजापाठ का ढकोसला खत्म हो गया तो चायवाय मिलेगी कि नहीं.

“ऐसे भी कौन सा सुख दिया है भगवान ने… मेरे हंसतेखेलते परिवार की सारी खुशियां छीन लीं,” बोलते हुए दादी मां ने गुस्से से अपनी भौएं सिकोड़ ली थीं.

पूनम ने रसोईघर में से झांकते हुए कहा, “चाय बन गई है दादी मां, अभी लाती हूं.”

माथे पर बिंदी, दोनों कलाइयां कांच की चूड़ियों से भरी हुईं, लाल रंग के सलवारकमीज में पूनम किसी नई दुलहन सी दिख रही थी.

दादी मां को चाय दे कर पूनम मुड़ी ही थी कि उन्होंने फुसफुसाना शुरू कर दिया, “आदमी का तो कुछ अतापता नहीं है… जिंदा भी है कि नहीं, फिर भी न जाने क्यों इतना बनसंवर कर रहती है…”

पूनम ने सबकुछ सुन कर भी अनसुना कर दिया था. और करती भी क्या. उस के दिन की शुरुआत रोज ऐसे ही दादी मां के तीखे शब्दों से होती थी.

दादी मां को चाय देने के बाद पूनम अपने ससुर को चाय देने के लिए उन के कमरे में जाने लगी, तो उन्होंने उसे आवाज दे कर कहा, “पूनम बेटा, मेरी चाय बाहर ही रख दे, मैं उधर ही आ कर पी लूंगा.”

“जी पापा,” बोल कर पूनम वापस चली आई थी.

पूनम के ससुर शशिकांतजी रिटायर्ड आर्मी आफसर थे. उन का बेटा मोहित भी सेना में जवान था. पूनम मोहित की पत्नी थी. 3 साल पहले ही मोहित और पूनम का ब्याह हुआ था और ब्याह के 2-4 दिन बाद ही मोहित को किसी खुफिया मिशन पर जाने के लिए सेना में वापस बुला लिया गया था.

इस बात को 3 साल बीत चुके थे, पर अब तक मोहित वापस नहीं लौटा था और न ही उस की कोई खबर आई थी, इसलिए फौज की तरफ से उसे गुमशुदा घोषित कर दिया गया था.

मोहित के लापता होने की खबर से शशिकांतजी की पत्नी को गहरा सदमा लगा था, जिस के चलते वे कोमा में चली गई थीं. डाक्टर का कहना था कि मोहित की वापसी ही उन के लिए दवा का काम कर सकती है.

पूनम को विश्वास था कि मोहित जिंदा है और एक दिन जरूर वापस आएगा. उस के इस विश्वास को कायम रखने के लिए शशिकांतजी पूरा सहयोग देते थे. उन्हें पूनम का पहनओढ़ कर रहना पसंद था. मोहित के हिस्से का लाड़प्यार भी वे पूनम पर ही लुटाते थे.

पूनम ने फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया हुआ था. उस की शादी के कुछ समय बाद ही उस के ससुर ने एक बुटीक खुलवा दिया था.

तब दादी मां ने इस बात का भरपूर विरोध करते हुए कहा था कि समय काटने के लिए घर के काम कम होते हैं क्या. पर शशिकांतजी ने उन की एक न सुनी थी.

सास की बीमारी के बाद घर के कामकाज की पूरी जिम्मेदारी पूनम के कंधों पर आ गई थी. बुटीक के साथ वह घर भी बखूबी संभाल रही थी. पर दादी मां हमेशा उस से नाराज ही रहती थीं. उन्हें पूनम का साजसिंगार करना, गाड़ी चलाना, बुटीक जाना बिलकुल नहीं सुहाता था. वे पूनम को ताने मारने का एक भी मौका अपने हाथों से जाने नहीं देती थीं.

समय बीतता जा रहा था. मोहित की मां की तबीयत में कोई सुधार नहीं था. इस बीच पूनम के मातापिता कई बार उसे अपने साथ घर ले जाने के लिए आए, पर हर बार उन्हें खाली हाथ ही लौटना पड़ा. पूनम का कहना था कि मोहित वापस आएगा तो उसे यहां न पा कर परेशान होगा और उस के परिवार की जिम्मेदारी भी अब मेरी है. अब ससुराल ही मेरा मायका है.

शशिकांतजी को पूनम की ऐसी सोच और समझदारी पर बहुत गर्व होता था.

एक दिन शशिकांतजी के करीबी दोस्त कर्नल मोहन घर आए और बोले, “शशि, मैं एक प्रस्ताव ले कर तेरे पास आया हूं.”

“कैसा प्रस्ताव?” शशिकांतजी ने पूछा.

इस के बाद उन दोनों दोस्तों ने बहुत देर तक साथ में समय बिताया और बातें कीं, फिर कर्नल मोहन जातेजाते बोले, “मुझे तेरे जवाब का इंतजार रहेगा.”

कर्नल मोहन के जाने के बाद शशिकांतजी काफी दिन तक किसी गहरी सोच में डूबे रहे. पूनम ने कई बार पूछने की कोशिश की, पर उन्होंने ‘चिंता की कोई बात नहीं’ बोल कर उसे टाल दिया. पर मन ही मन वे पूनम के लिए एक बड़ा फैसला ले चुके थे, जिस की चर्चा पूनम के मातापिता से करने के लिए आज वे उस के मायके जा रहे थे. पूनम इस बात से पूरी तरह बेखबर थी.

पूनम के बुटीक जाते ही शशिकांतजी घर से निकल गए थे. उन्हें अचानक यों देख कर पूनम के मातापिता थोड़े चिंतित हो उठे थे. पूनम के पिताजी ने हाथ जोड़ कर शशिकांतजी से पूछा, “आप अचानक यहां, सब ठीक तो है न?”

“हांहां, सब ठीक है. चिंता की कोई बात नहीं…” शशिकांतजी बोले, “मैं ने पूनम के लिए एक फैसला लिया है, जिस में आप दोनों की राय लेना जरूरी था.”

यह सुन कर पूनम के मातापिता एकदूसरे की तरफ हैरानी से देखने लगे. पूनम की मां ने बड़े ही उतावलेपन से पूछा, “कैसा फैसला भाई साहब?”

शशिकांतजी ने कहा, “पूनम के दूसरे ब्याह का फैसला.”

“यह आप क्या कह रहे हैं… यह कैसे मुमकिन है…” पूनम के पिता ने हैरानी से.

शशिकांतजी बोले, “क्यों मुमकिन नहीं है? मोहित की वापसी अब एक सपने जैसी है. चार दिन की शादी को निभाने के लिए पूनम अपनी पूरी जिंदगी अकेलेपन के हवाले कर दे, ऐसा मैं नहीं होने दे सकता. उस बच्ची के विश्वास पर अपने यकीन की मोहर अब और नहीं लगा सकता. बिना किसी दोष के वह एक अधूरेपन की सजा क्यों काटेगी…”

“पर भाई साहब…” पूनम की मां ने बीच में बोलना चाहा तो शशिकांतजी ने उन्हें रोकते हुए कहा, “माफ कीजिएगा, पर मेरी बात अभी पूरी नहीं हुई है.”

इतना कह कर वे आगे बोले, “मैं अपने बेटे के मोह में पूनम के भविष्य की बलि नहीं चढ़ने दूंगा. आज मेरी जगह मोहित भी होता तो पूनम के लिए इस तरह की अधूरी जिंदगी उसे कभी स्वीकार नहीं होती.

“आप दोनों ने उसे जन्म दिया है. उस की जिंदगी का इतना बड़ा फैसला लेने के पहले आप को इस की सूचना देना मेरा फर्ज था, इसलिए चला आया वरना पूनम का कन्यादान करने का फैसला मैं ले चुका हूं. अब आज्ञा चाहता हूं.”

शशिकांत जी के जाने के बाद पूनम के मातापिता बहुत देर तक सोचते रहे कि वे अपनी बेटी के भविष्य के बारे में इतनी गहराई से नहीं सोच पाए, पर शशिकांतजी जैसे लोग बहू को बेटी की जगह रख कर अपनी सोच का लैवल कितना ऊपर उठाए हुए हैं. पूनम के दूसरे ब्याह के बारे में सोचते समय मोहित का चेहरा न जाने कितनी बार उन की आंखों के सामने घूमा होगा.

पूनम के मायके से लौटने के बाद शशिकांतजी अपने कमरे से बाहर नहीं आए थे. पूनम शाम की चाय ले कर उन के कमरे में ही चली गई थी. चाय का कप टेबल पर रखते हुए उस ने पूछा, “क्या हुआ पापा? तबीयत ठीक नहीं है क्या?”

“सब ठीक है बेटा,” उन्होंने जवाब दिया और कहा, “आ थोड़ी देर मेरे पास बैठ, तुझ से कुछ बात करनी है.”

“जी पापा,” बोल कर पूनम उन के पास बैठ गई.

शशिकांतजी ने एक गहरी सांस ली और बोलना शुरू किया, “मोहित की गैरमौजूदगी में तू ने इस घर की जिम्मेदारियों के साथसाथ हम सब को भी बहुत अच्छे से संभाला है. अपने छोटेबड़े हर फर्ज को तू ने प्यार और अपनेपन से निभाया है. इतना ही नहीं, अपनी दादी मां के रूखे बरताव के बाद भी तू कभी उन की सेवा करने से पीछे नहीं हटी. अगर मैं यह कहूं कि मोहित की कमी तू ने कभी महसूस ही नहीं होने दी, तो यह गलत नहीं होगा.

“पर अब नहीं बेटा. मैं चाहता हूं कि मोहित की चंद यादों का जो दायरा तू ने अपने आसपास बना रखा है, उसे तोड़ कर तू बाहर निकले और जिंदगी में आगे बढ़े…”

पूनम ने कहा, “आज अचानक ऐसी बातें क्यों कर रहे हैं आप? कुछ हुआ है क्या? मोहित की कोई खबर आई क्या? बोलिए न पापा, क्या हुआ है?” पूनम बेचैन हो उठी थी.

शशिकांतजी ने भरे हुए गले से कहा, “कोई खबर नहीं आई मोहित की और न ही आएगी. उस की वापसी की उम्मीद अब छोड़नी होगी हमें.”

पूनम जोर से चिल्लाते हुए बोली, “नहीं पापा, ऐसा मत कहिए…” इतने साल से पति के बिछड़ने का दर्द जो उस ने अपने अंदर दबा कर रखा था, वह आज आंसुओं की धार के साथ बहता जा रहा था.

शशिकांतजी ने पूनम के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “आज यह लाचार और बेबस पिता तुझ से कुछ मांगना चाहता है बेटा, मना मत करना. बहुत सोचसमझ कर मैं ने तेरा कन्यादान करने का फैसला लिया है.”

पूनम ने चौंकते हुए कहा, “पापा, आप भी…” कमरे से बाहर जातेजाते वह रुकी और बोली, “आप गलत कह रहे हैं पापा, अगर मोहित की कमी मैं पूरी कर पाती तो मम्मी आज अस्पताल में कोमा में न होतीं, दादी मां को मुझ से इतनी नफरत न होती और आज आप मुझे इस घर से विदा करने की बात नहीं करते,” ऐसा बोल कर वह तेजी से कमरे से बाहर निकल गई.”

पूनम के जाने के बाद शशिकांतजी सोच में पड़ गए थे कि ‘आप भी’ से पूनम का क्या मतलब था.

इस बात को 8 दिन बीत चुके थे. शशिकांतजी अपने फैसले पर अटल थे. उन के इस फैसले से दादी मां बहुत नाराज थीं और दादी मां ने उन से बात करना बंद कर दिया था. पर उन्होंने हार नहीं मानी थी.

शशिकांतजी एक बार फिर पूनम को समझाने की उम्मीद से उस के बुटीक पहुंच गए थे. उन्हें देखते ही पूनम ने कहा, “अरे पापा, आप यहां कैसे?”

“कुछ नहीं बेटा, शाम की सैर के लिए निकला था…” शशिकांतजी बोले, “सोचा तुझे देख लेता हूं… तेरा काम खत्म हो गया होगा तो साथ में घर चलेंगे.”

पूनम ने कहा, “पापा, मुझे थोड़ा समय और लगेगा.”

“ठीक है…” शशिकांतजी बोले, “मैं बाहर तेरा इंतजार करता हूं, आ जाना.”

थोड़ी देर बाद बुटीक बंद कर के पूनम अपनी कार ले कर बाहर आ गई. शशिकांतजी ने उस से कहा, “आज मैं गाड़ी चलाता हूं.”

कार चलाते हुए शशिकांतजी ने फिर अपनी बात शुरू की और पूनम से कहा, “तू ने मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया बेटा… और उस दिन तू ने ‘आप भी’ ऐसा क्यों कहा था?”

पूनम ने कहा, “मोहित ने मिशन पर जाने से पहले मुझे कसम दी थी कि अगर वह वापस नहीं लौटा तो मैं उस के इंतजार में अपनी पूरी जिंदगी नहीं निकालूंगी और एक नई शुरुआत करूंगी. उस दिन आप ने भी वही बात कह दी. आप ही की तरह शायद वह भी मुझे अपने से दूर करना चाहता था.”

शशिकांतजी को इस बात की बहुत खुशी हो रही थी कि मोहित के बारे में उन की सोच गलत नहीं थी. वह भी पूनम के लिए इस तरह की अधूरी जिंदगी नहीं चाहता था.

शशिकांतजी अपने फैसले पर अब और ज्यादा मजबूत हो गए थे. उन्होंने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “तुझे याद है, कुछ दिन पहले कर्नल मोहन अपने घर आए थे. वे अपने बेटे गौरव के लिए तेरा हाथ मांगने आए थे.

“गौरव की पहली पत्नी का शादी के 4 महीने बाद ही देहांत हो गया था. वह अमेरिका में बहुत बड़ी कंपनी में काम करता है. वह अभी यही है और कुछ दिन में वापस जाने वाला है, इसलिए उन्हें शादी की जल्दी है.

“कर्नल मोहन को मैं बहुत सालों से जानता हूं. वे बेहद सुलझे और समझदार लोग हैं. तू बहुत खुश रहेगी… और तुझे तो गौरव के साथ अमेरिका में ही रहना होगा. इस रिश्ते के लिए हां कह दे बेटा,” शशिकांतजी ने जोर देते हुए पूनम से कहा.

पूनम ने जवाब दिया, “मुझे नहीं पता था पापा कि आप के लाड़प्यार का कर्ज मुझे एक दिन आप से दूर जा कर चुकाना पड़ेगा.”

शशिकांतजी ने पूनम और गौरव का रिश्ता तय कर दिया. पूनम के मातापिता को भी खबर कर दी गई.

शादी का दिन आ चुका था. बंगले की सजावट शशिकांतजी ने पूनम की पसंद के लाल गुलाब के फूलों से कराई थी.

बरात जैसे ही बंगले के सामने पहुंची तो शशिकांतजी ने सभी का स्वागत किया. थोड़ी देर बाद पूनम की मां उसे मंडप में ले जाने के लिए आईं, तो पूनम ने कस कर अपनी मां के हाथों को पकड़ा और कहा, “मुझ से यह नहीं होगा मां. मेरा मन बहुत घबरा रहा है. पता नहीं क्यों बारबार ऐसा लग रहा है कि मोहित यहीं कहीं आसपास है.

“मैं किसी और से शादी नहीं कर सकती. यह सब होने से रोक दो मां,” पूनम अपनी मां के सामने हाथ जोड़ कर रोते हुए बोली और बेसुध हो कर जमीन पर गिर पड़ी.

पूनम की मां उस के बेसुध होने की सूचना देने बाहर आईं तो उन्होंने देखा कि फौज की एक गाड़ी बंगले के बाहर आ कर रुकी है. उस में से सेना के 2 जवान उतरे, फिर उन्होंने हाथ पकड़ कर काला चश्मा पहने एक शख्स को गाड़ी से नीचे उतारा.

विवाह समारोह में आए सभी लोगों की नजरें बड़ी हैरानी से उस शख्स को देख रही थीं. उसे देखते ही शशिकांतजी की आंखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा.

“मोहित… मेरे बेटे, तू ने बहुत इंतजार कराया,” बोलते हुए शशिकांतजी ने उसे अपने सीने से लगा कर बेटे की वापसी की तड़प को शांत कर दिया.

पूनम की मां खुशी से भागते हुए अंदर गईं और उन्होंने पूनम के ऊपर पानी के छींटे मारे, फिर जोर से उसे झकझोर कर बोलीं, “उठ बेटा, बाहर जा कर देख… तेरे विश्वास ने आज तेरे सुहाग की वापसी कर ही दी.”

पूनम सभी मर्यादाओं को लांघ कर गिरतीपड़ती भागते हुए बाहर गई और मोहित से जा लिपटी. वह फूटफूट कर रोते हुए बोली, “आखिर आप ने मेरे विश्वास की लाज रख ही ली मोहित.”

शोरगुल की आवाज से दादी मां भी बाहर आ गई थीं और मोहित को देख कर अपने आंसुओं के बहाव को रोक नहीं पाई थीं.

मोहित ने पूनम से कहा, “मेरी वापसी एक अधूरेपन के साथ हुई है पूनम. लड़ाई में मैं अपनी दोनों आंखें गंवा चुका हूं. जिसे अब खुद हर समय सहारे की जरूरत पड़ेगी वह तुम्हारा सहारा क्या बनेगा.”

पूनम ने चिल्लाते हुए कहा, “यह कैसी बात कर रहे हैं आप. हम पूरी जिंदगी के साथी है. हमें एकदूसरे के सहारे और हमदर्दी की नहीं, बल्कि साथ की जरूरत है…” इतना कह कर पूनम ने अपना हाथ मोहित के आगे बढ़ाया और कहा, “आप देंगे न मेरा साथ?”

गौरव इतनी देर से दूर खड़ा हो कर सब देख रहा था. उस ने मोहित का हाथ पकड़ कर अपने हाथों से पूनम के हाथ में दे दिया.

पूनम कर्नल मोहन के पास गई और हाथ जोड़ कर बोली, “मुझे माफ कर दीजिए अंकल. इस घर और मोहित को छोड़ कर मैं कहीं नहीं जा सकती.”

कर्नल मोहन ने पूनम के सिर पर हाथ रख कर अपना आशीर्वाद दे दिया.

Sexual Tips : मुझे चिंता है मेनोपौज से मेरी कामेच्छा खत्म न हो जाए

Sexual Tips : मेरी उम्र 51 साल की है. मैं और मेरे पति अच्छा वैवाहिक जीवन जी रहे हैं. सैक्स लाइफ अच्छी है. मैं अब मेनोपौज के दौर से गुजर रही हूं. मेरे पति रोज मेरे साथ सैक्स करते हैं और मैं भी एंजौय करती हूं. लेकिन डर लग रहा है कि मेनोपौज से मेरी कामेच्छा खत्म न हो जाए और मेरे पति मुझ से खुश न रह पाएं. क्या मेरा ऐसा सोचना सही है?

यह सच है कि मेनोपौज के कारण महिलाओं की कामेच्छा कम हो जाती है या कई महिलाओं में यह बिलकुल खत्म हो जाती है लेकिन सभी महिलाओं के केस में ऐसा नहीं होता. महिलाओं में कुछ थोड़े बदलाव देखने को मिलते हैं. कई रिसर्च में यह सामने आया है कि कुछ महिलाओं में मेनोपौज के बाद कामेच्छा और बढ़ जाती है. मेनोपौज का अनुभव व्यक्तिगत तौर पर अलगअलग हो सकता है. जबकि कुछ महिलाओं के अनुभवों में समानताएं हो सकती हैं.

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Best Friend : ‘फ्रैंड्स विद बैनिफिट्स’ का चलन आखिर है क्या?

Best Friend : मैं ने इसी साल अपनी स्कूलिंग खत्म की है. अब मैं कालेज जाती हूं. आजकल एक बात ‘फ्रैंड्स विद बेनिफिट्स’ बहुत बोली जाती है. मैं इस रिलेशनशिप को अच्छी तरह समझ नहीं पाती. थोड़ा कन्फ्यूज्ड हूं. जरा मुझे क्लीयर करेंगे क्या?

यह एक यूनिक प्रकार का फिजिकल रिलेशनशिप होता है जिस में दोनों व्यक्ति दोस्त होते हैं लेकिन साथ ही एक बौयफ्रैंड और गर्लफ्रैंड वाला रिश्ता शेयर करते हैं. इस रिश्ते को स्टिंग अटैच भी कहा जाता है.

फ्रैंड्स विद बेनिफिट्स ऐसा इंटीमेट रिलेशनशिप है जिस के कुछ नियम होते हैं. ये नियम दोनों ही पार्टनर्स को एकसमान मानने पड़ते हैं. वे चाहें तो इस रिलेशनशिप में एकदूसरे की सहमति के साथ नए नियम भी बना सकते हैं. हालांकि हर मामले में फ्रैंड्स विद बेनिफिट्स का मतलब केवल फिजिकल रिलेशनशिप नहीं होता. कुछ लोग इस प्रकार के रिश्तों में केवल एकदूसरे से मिलना व बात करना पसंद करते हैं.

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Unwanted Hair : दिक्कत यह है कि मेरी बौडी पर काफी बाल हैं

Unwanted Hair : मेरी उम्र 27 साल है. मैं रैगुलर जिम जाता हूं. अब मेरी बौडी जिम जाने से मस्कुलर हो गई है. छाती और पीठ के बाल तो बिलकुल भी अच्छे नहीं लगते. उन की वजह से बौडी खूबसूरत नहीं लगती. ऐब्स वगैरह अच्छी तरह नहीं दिखते. क्याक्या तरीके हैं बाल साफ करने के, बताने की कृपा करें.

आप कूल दिखने के लिए छाती और पीठ के बाल हटाना चाहते हैं, बिलकुल सही सोच रहे हैं कि परफैक्ट लुक के लिए अनचाहे बालों से छुटकारा जरूरी है. लड़कों के बाल काफी हार्ड होते हैं, उन्हें आसानी से नहीं निकाला जा सकता. फिर भी शेविंग, वैक्सिंग, ट्रिमिंग, हेयर रिमूवल क्रीम, थ्रेडिंग से अनवांटेड हेयर से राहत पा सकते हैं. आजकल रेजर की मदद से छाती और पीठ के अनचाहे बालों को भी शेव किया जा रहा है. इस के लिए नहाने का समय सब से उपयुक्त होता है. शेविंग के बाद मौइश्चराइजर जरूर लगाएं.

ट्रिमर की मदद से बालों को ट्रिम कर सकते हैं. हेयर रिमूवल क्त्रीम की मदद से भी बालों को हटा सकते है. बालों पर 10-15 मिनट क्रीम लगा कर छोड़ दें, फिर स्पेटुला की मदद से बालों को हटा दें. वैक्सिंग करना भले ही मुश्किल लगता है लेकिन इस से बाल जड़ से निकलते हैं और ग्रोथ होने में 20 से 22 दिन लगते हैं.

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Friendship : मेरी फ्रैंड हर बात में इंटरफेयर करती है, मैं क्या करूं?

Friendship : मेरी उम्र 24 साल है. कालेज टाइम में मेरी एक बहुत अच्छी फ्रैंड बन गई थी. हम दोनों एकदूसरे के बहुत करीब हैं, सारी बातें शेयर करते हैं. अभी हाल ही में मेरा एक बौयफ्रैंड बना है. मैं ने यह बात अपनी फ्रैंड को बताई तो उस का रिऐक्शन कुछ अजीब लगा मुझे, जैसे मैं ने बौयफ्रैंड बना कर कोई बहुत बड़ी गलती कर दी हो. अब वह रोज मुझ से मेरे बौयफ्रैंड के बारे में पूछती रहती है जैसे वह क्या बातें करता है, कहांकहां गए तुम घूमने, कितने क्लोज आ गए हो, जरा उस से बच कर रहा कर, लड़के लोग धोखेबाज होते हैं आदि. मतलब कि मुझे उस से दूर रहने की सलाह देती रहती है. मैं तंग आ गई हूं. मैं क्या करूं कि जिस से वह मुझ से नाराज न हो और मुझ से मेरे बौयफ्रैंड के बारे में पूछे भी न?

लगता है आप की फ्रैंड आप को ले कर कुछ ज्यादा ही पजेसिव है. आप की या तो वह ज्यादा ही केयर करती है या फिर आप का बौयफ्रैंड बनाना उसे अच्छा नहीं लगा. कारण कुछ भी हो सकता है. आप की लाइफ है, आप की मरजी है कि बौयफ्रैंड बनाएं या न. किसी दूसरे को इस में दखलंदाजी करने का हक नहीं.

आप चाहती हैं कि आप की फ्रैंड की दखलंदाजी न हो और उसे किसी बात का बुरा भी न लगे तो उस से अपने बौयफ्रैंड की कोई बात मत कीजिए. वह पूछे भी तो गोलमोल जवाब दें. बात को दूसरी तरफ घुमा दें. मजाकमजाक में यह भी कह दें कि छोड़ न उसे, हम अपनी बात करते हैं. समझदार होगी तो समझ जाएगी कि आप अपने बौयफ्रैंड की बात उस से नहीं करना चाहतीं.

वैसे भी, यदि आप की लव लाइफ अच्छी चल रही है तो उसे यारदोस्तों से ज्यादा शेयर न करें. ऐसे दोस्तों से तो अपनी पर्सनल लाइफ के बारे में बात न ही करें जो आप को हर छोटी बात में गलत सलाह देते हों. कुछ बातें ऐसी होती हैं जो अपने तक ही सीमित रखनी ठीक होती हैं.

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Financial Planning : युवाओं के सपनों के घर पर डाका

Financial Planning : नौकरीपेशा होम लोन ले कर अपने सपनों का आशियाना खरीद लेते हैं. लेकिन यहां समस्या तब आती है जब किसी सूरत में वे लोन नहीं चुका पाते. ऐसे में कई बार उन्हें अपने घर से हाथ धोना पड़ता है.

प्राइवेट सैक्टर में काम करने वाले 36 साल के राहुल ने बैंक से लोन ले कर दिल्ली में 2 कमरे का फ्लैट बुक कराया. बिल्डर ने उसे 2 साल बाद पजेशन देने की बात कही. उस ने सोचा, धीरेधीरे लोन चुकता कर देगा, फिर तो यह घर उस का अपना हो जाएगा और उसे किराए के घर में नहीं रहना पड़ेगा. 2 साल बाद उसे अपने घर का पजेशन मिल गया और वह अपनी पत्नी के साथ अपने नए घर में रहने भी लगा. सबकुछ सही चल रहा था. बैंक का लोन भी वह हर महीने भर रहा था. तभी अचानक एक दिन उस की पत्नी की तबीयत बहुत खराब हो गई, जिस के कारण उसे अपनी पत्नी को अस्पताल में भरती करवाना पड़ा, जहां डाक्टर ने कुछ टैस्ट कराए. पता चला कि उस की पत्नी की ओवरी में गांठ है और जल्द ही उस का औपरेशन करवाना पड़ेगा. इलाज तो हुआ लेकिन पत्नी की बीमारी में राहुल की सारी जमापूंजी खत्म हो गई, बल्कि उसे अपने रिश्तेदार से कर्ज भी लेना पड़ गया.

रिकवरी एजेंसियों का तकाजा

राहुल की आर्थिक स्थिति इतनी खस्ता हो गई कि वह 3 महीने अपने घर की ईएमआई नहीं भर पाया. लोन न भर पाने के कारण रिकवरी एजेंसियों का स्टाफ उस के मोबाइल पर लगातार कौल कर वसूली के लिए दबाव बनाने लगा. हर बार राहुल का यही कहना था कि अभी उसे पैसों की थोड़ी तंगी है, इसलिए पैसा आते ही वह ईएमआई चुका देगा.

लेकिन रिकवरी एजेंसी अब उसे व्हाट्सऐप कौल करने लगी. उस से भी बात न बनी तो बदतमीजी वाले मैसेज भेजने लगी. कौल पिक न करने पर रैफरैंस में लिखवाए गए उस के एक रिश्तेदार के नंबर पर कौल कर बोला गया कि अपने रिश्तेदार से कहो, फोन उठाए और लोन भरे वरना उस का घर बैंक अपने कब्जे में ले लेगा. लेकिन वह लोन चुकाता कहां से जब उस के पास पैसे ही नहीं थे तो? ईएमआई न चुका पाने के कारण एक दिन बैंक ने राहुल का घर सील कर दिया और राहुल अपने परिवार सहित सड़क पर आ गया.

एक मोबाइल शौप विक्रेता का कहना है कि उस की छोटी सी मोबाइल शौप थी. वह एक बड़ी दुकान खरीद कर अपना बिजनैस बड़ा करना चाहता था, इसलिए उस ने बैंक से 20 लाख रुपए का लोन ले कर और बड़ी दुकान खरीद ली. सोचा, दुकान अच्छी चल रही है तो जल्द ही लोन चुकता कर देगा.

लेकिन उस का सोचा हुआ, हुआ नहीं, क्योंकि, वहां उस जगह पर उस के कंपीटिशन में और कई मोबाइल शौप्स खुल गईं. उस का धंधा मंदा पड़ने लगा. आखिरकर, उस शख्स ने अपनी दुकान का सारा माल बेच दिया, क्योंकि कोई फायदा नहीं हो रहा था उसे. अब जब कमाई ही बंद हो गई तो बैंक का लोन कहां से भरता वह.

2 महीने तक बैंक का लोन नहीं भर पाने के कारण उसे बैंक से फोन आने लगे. लेकिन उस ने बैंक का फोन उठाना बंद कर दिया. फिर बैंक वालों ने उस के एक पहचान वालों से यह कहलवाया कि अगर उस ने लोन नहीं भरा तो उस की दुकान कब्जे में ले लेंगे. उस पर भी उस ने कोई ऐक्शन नहीं लिया तो हार कर बैंक को उस की दुकान को सील करना पड़ा.

घर खरीदना सपना

कोरोना महामारी के समय कंपनियों द्वारा कर्मचारियों की सैलरी में कटौती और छंटनी का असर रियल एस्टेट सैक्टर पर खूब देखने को मिला. बिल्डर और विभिन्न प्रोजैक्ट्स में फ्लैट बुक कराने वाले खरीदारों को एक नई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा था क्योंकि बैंक फ्लैट के खरीदारों को लोन जारी करने के लिए नई सैलरी स्लिप मांग रहे थे.

कंपनियों में सैलरी में कटौती और जौब तथा व्यापक स्तर पर छंटनी के कारण बैंक पहले यह सुनिश्चित कर लेना चाहता था कि उन का लोन डूबेगा नहीं. राहुल का कहना है कि होम लोन समय से न चुका पाने के कारण उस के साथ ऐसा बरताव किया गया जैसे वह कोई अपराधी हो. उस का घर जब्त कर लिया गया और अब वह अपने एक रिश्तेदार के यहां रहने को मजबूर है.

नौकरीपेशा को लोन लेने में आसानी

लोन की ईएमआई में चूक कोई अपराध नहीं है, हालांकि लोन चुकाने के लिए जारी किए गए चैक का बाउंस होना निगोशिएबल इंस्ट्रूमैंट्स एक्ट 1881 के तहत एक अपराध जरूर माना जा सकता है. घर खरीदना हर व्यक्ति का सपना होता है. आज की तारीख में घर खरीदना थोड़ा आसान हो गया है. यह आसानी होम लोन ने बनाई है. होम लोन न सिर्फ हमें अपने घर खरीदने के फैसले को टालने से रोकता है, बल्कि यह हमें टैक्स बचाने में भी मदद करता है. नौकरी की शुरुआत में ही युवाओं की घर, गाड़ी खरीदने की महत्त्वाकांक्षा होती है. इसलिए वे होम लोन ले कर अपने सपनों का आशियाना खरीद लेते हैं, क्योंकि नौकरीपेशा लोगों को लोन आसानी से मिल जाता है. लेकिन यहां समस्या तब आती है जब किसी सूरत में आप नौकरी खो देते हैं या आप को सैलरी नहीं मिल रही होती है. इस स्थिति में तो कोई भी होम लोन चुकाने में सक्षम नहीं होगा. ऐसे में व्यक्ति बैंक के डर से छिपने की कोशिश करता है, क्योंकि समय पर ईएमआई न चुका पाने के कारण बैंक से कौल आनी शुरू हो जाती हैं. जब आप बैंक की कौल नहीं उठाते तो बैंक ऐक्शन लेता है और वह आप का घर, दुकान जब्त कर लेता है.

युवा आ रहे हैं तनाव में

आर्थिक संकट से जूझ रहे युवा समय पर ईएमआई न चुका पाने के कारण तनाव में आ सकते हैं क्योंकि कई बार रिकवरी एजेंट्स धमकियां देते हैं कि अगर जल्द से जल्द लोन भुगतान नहीं किया गया तो वे उन के घर व औफिस आएंगे. यहां तक बोला जाता है कि जब बेइज्जती होगी तब भुगतान करोगे. ऐसे में साथियों व पड़ोसियों के सामने कलैक्शन एजेंटों के आने की आशंका के चलते लोग मानसिक रूप से परेशान हो सकते हैं. अगर आप के साथ भी कुछ ऐसा हो रहा हो तो परेशान न हों. रिजर्व बैंक के मुताबिक, लोन लेने वाले शख्स के भी कुछ अधिकार होते हैं.

बैंक से करें बात

किसी वजह से होम लोन न चुका पाने की स्थिति में सब से पहले उस बैंक से बात करें जहां से आप ने लोन लिया है. उसे अपनी आर्थिक स्थिति से अवगत कराएं और कहें कि लोन ईएमआई देने के लिए कुछ समय चाहिए. बेहतर होगा कि अपनी समस्या लिखित में बताएं, ताकि आप के पास उस का प्रूफ भी रहे. इस के लिए ईमेल करना अच्छा औप्शन हो सकता है.

बची रकम रीस्ट्रक्चर कराएं

आप बैंक से बात कर के बची रकम को रीस्ट्रक्चर करवा सकते हैं. इस से लोन की ईएमआई कम हो जाती है. हालांकि लोन चुकाने का कुल समय बढ़ जाता है. लोन की बची रकम को रीस्ट्रक्चर करवाने से बैंक को भी फायदा होता है, क्योंकि उसे पहले के मुकाबले ज्यादा रकम मिलती है. इसलिए ज्यादातर बैंक इस बात को आसानी से मान लेते हैं.

जुर्माना हटवाने के लिए कहें

अगर होम लोन की ईएमआई चुकाने में 2-3 महीने से ज्यादा समय हो जाए तो बैंक का जुर्माना काफी हो जाता है. इतने समय में अगर आप के पास पैसों का इंतजाम हो जाता है तो बैंक से जुर्माना हटाने के लिए कह सकते हैं.

बैलेंस ट्रांसफर करवाएं

आप किसी दूसरे बैंक से बात कर उस से बैलेंस के बारे में जानकारी ले सकते हैं. काफी बैंक ऐसे होते हैं जो कस्टमर के लोन को चुकाते हैं और बदले में नया लोन देते हैं. अमूमन लोन की रकम पहले वाले लोन से ज्यादा होती है.

लोन का सैटलमैंट कराएं

अगर आप लोन चुकाने में पूरी तरह असमर्थ हैं और बहुत ज्यादा रकम आप के पास नहीं है तो आप बैंक से लोन का सैटलमैंट करने के लिए भी कह सकते हैं. इस प्रक्रिया में बैंक लोन की बाकी बची पूरी रकम को नहीं लेते बल्कि शेष रकम का कुछ हिस्सा ही ले कर लोन बंद कर देते हैं.

पुलिस में कर सकते हैं शिकायत

अगर आप लोन की किस्त नहीं चुका पा रहे हैं और बैंक का कोई रिकवरी एजेंट आप को धमकी दे रहा है तो आप इस की शिकायत पुलिस में कर सकते हैं क्योंकि लोन न चुका पाना सिविल विवाद के दायरे में आता है. ऐसे में बैंक या उस का कोई रिकवरी एजेंट मनमानी नहीं कर सकता. कोई भी बैंक या रिकवरी एजेंट सुबह 8 बजे से शाम 7 बजे तक ही कौल कर सकता है या घर आ सकता है. अगर वह ऐसा नहीं करता है तो आप उस की शिकायत बैंक या पुलिस से कर सकते हैं.

लोन की किस्त न चुकाने पर नुकसान

जुर्माना लग सकता है, आप का सिबिल स्कोर खराब हो सकता है, घर जब्त होने का जोखिम, लोन ट्रांसफर में कठिनाई, कानूनी परिणाम, भविष्य में लोन या क्रैडिट कार्ड मिलने की संभावना कम हो जाना. वैसे, बैंक एकदम से ग्राहक के खिलाफ ऐक्शन नहीं लेता. ऐसे मामले में बैंक की ओर से पहले समस्या का समाधान निकालने की कोशिश की जाती है, ताकि बैंक को ग्राहक की संपत्ति जब्त कर नीलाम करने की जरूरत न पड़े. लेकिन जब नोटिस के बावजूद ग्राहक की तरफ से कोई ध्यान नहीं दिया जाता और तीसरी किस्त भी मिस हो जाती है तो बैंक लोन अकाउंट को एनपीए मान लेता है और उधारकर्ता को डिफौल्टर घोषित कर देता है.

लोन के एनपीए बन जाने के बाद भी बैंक एकदम से संपत्ति की नीलामी नहीं करता. बैंक होम लोन डिफौल्टर को कानूनी कार्रवाई का नोटिस देता है और फिर उधारकर्ता को छूटी हुई ईएमआई का भुगतान करने के लिए 60 दिन यानी कि 2 महीने तक का समय देता है.

इस के बावजूद उधारकर्ता का जवाब नहीं आता तो घर नीलाम कर दिया जाता है. नीलामी के मामले में बैंक को पब्लिक नोटिस जारी करना पड़ता है. इस नोटिस में असेट का उचित मूल्य, रिजर्व प्राइस, तारीख और नीलामी के समय का जिक्र किया जाता है. अगर बौरोअर को लगता है कि असेट का दाम कम रखा गया है तो वह नीलामी को चुनौती दे सकता है.

Hindi Kahani : नीला पत्थर – काकी अपने पति से क्यों परेशान रहती थी?

Hindi Kahani : ‘‘कहीं नहीं जाएगी काकी…’’ पार्वती बूआ की कड़कती आवाज ने सब को चुप करा दिया. काकी की अटैची फिर हवेली के अंदर रख दी गई. यह तीसरी बार की बात थी. काकी के कुनबे ने फैसला किया था कि शादीशुदा लड़की का असली घर उस की ससुराल ही होती है. न चाहते हुए भी काकी मायका छोड़ कर ससुराल जा रही थी. हालांकि ससुराल से उसे लिवाने कोई नहीं आया था. काकी को बोझ समझ कर उस के परिवार वाले उसे खुद ही उस की ससुराल फेंकने का मन बना चुके थे कि पार्वती बूआ को अपनी बरबाद हो चुकी जवानी याद आ गई. खुद उस के साथ कुनबे वालों ने कोई इंसाफ नहीं किया था और उसे कई बार उस की मरजी के खिलाफ ससुराल भेजा था, जहां उस की कोई कद्र नहीं थी.

तभी तो पार्वती बूआ बड़ेबूढ़ों की परवाह न करते हुए चीख उठी थी, ‘‘कहीं नहीं जाएगी काकी. उन कसाइयों के पास भेजने के बजाय उसे अपने खेतों के पास वाली नहर में ही धक्का क्यों न दे दिया जाए. बिना किसी बुलावे के या बिना कुछ कहेसुने, बिना कोई इकरारनामे के काकी को ससुराल भेज देंगे, तो वे ससुरे इस बार जला कर मार डालेंगे इस मासूम बेजबान लड़की को. फिर उन का एकाध आदमी तुम मार आना और सारी उम्र कोर्टकचहरी के चक्कर में अपने आधे खेतों को गिरवी रखवा देना.’’

दूसरी बार काकी के एकलौते भाई की आंखों में खून उतर आया था. उस ने हवेली के दरवाजे से ही चीख कर कहा था, ‘‘काकी ससुराल नहीं जाएगी. उन्हें आ कर हम से माफी मांगनी होगी. हर तीसरे दिन का बखेड़ा अच्छा नहीं. क्या फायदा… किसी की जान चली जाएगी और कोई दूसरा जेल में अपनी जवानी गला देगा. बेहतर है कि कुछ और ही सोचो काकी के लिए.’’

काकी के लिए बस 3 बार पूरा कुनबा जुटा था उस के आंगन में. काकी को यहीं मायके में रखने पर सहमति बना कर वे लोग अपनेअपने कामों में मसरूफ हो गए थे. उस के बाद काकी के बारे में सोचने की किसी ने जरूरत नहीं समझी और न ही कोई ऐसा मौका आया कि काकी के बारे में कोई अहम फैसला लेना पड़े. काकी का कुसूर सिर्फ इतना था कि वह गूंगी थी और बहरी भी. मगर गूंगी तो गांव की 99 फीसदी लड़कियां होती हैं. क्या उन के बारे में भी कुनबा पंचायत या बिरादरी आंखें मींच कर फैसले करती है? कोई एकाध सिरफिरी लड़की अपने बारे में लिए गए इन एकतरफा फैसलों के खिलाफ बोल भी पड़ती है, तो उस के अपने ही भाइयों की आंखों में खून उतर आता है. ससुराल की लाठी उस पर चोट करती है या उस के जेठ के हाथ उस के बाल नोंचने लगते हैं.

ऐसी सिरफिरी मुंहफट लड़की की मां बस इतना कह कर चुप हो जाती है कि जहां एक लड़की की डोली उतरती है, वहां से ही उस की अरथी उठती है. यह एक हारे हुए परेशान आदमी का बेमेल सा तर्क ही तो है. एक अकेली छुईमुई लड़की क्या विद्रोह करे. उसे किसी फैसले में कब शामिल किया जाता है. सदियों से उस के खिलाफ फतवे ही जारी होते रहे हैं. वह कुछ बोले तो बिजली टूट कर गिरती है, आसमान फट पड़ता है.

अनगनित लोगों की शादियां टूटती हैं, मगर वे सब पागल नहीं हो जाते. बेहतर तो यही होता कि अपनी नाकाम शादी के बारे में काकी जितना जल्दी होता भूल जाती. ये शादीब्याह के मामले थानेकचहरी में चले जाएं, तो फिर रुसवाई तो तय ही है. आखिर हुआ क्या? शीशा पत्थर से टकराया और चूरचूर हो गया.

काकी का पति तो पहले भी वैसा ही था लंपट, औरतबाज और बाद में भी वैसा ही बना रहा. काकी से अलग होने के बाद भी उस की जिंदगी पर कोई खास असर नहीं पड़ा. काकी के कुनबे का फैसला सुनने के बाद तो वह हर तरफ से आजाद हो चुका था. उस के सुख के सारे दरवाजे खुल गए, मगर काकी का मोह भंग हो गया. अब वह खुद को एक चुकी हुई बूढ़ी खूसट मानने लगी थी. भरी जवानी में ही काकी की हर रस, रंग, साज और मौजमस्ती से दूरी हो गई थी. उस के मन में नफरत और बदले के नागफनी इतने विकराल आकार लेते गए कि फिर उन में किसी दूसरे आदमी के प्रति प्यार या चाहत के फूल खिल ही न सके.

किसी ने उसे यह नहीं समझाया, ‘लाड़ो, अपने बेवफा शौहर के फिर मुंह लगेगी, तो क्या हासिल होगा तुझे? वह सच्चा होता तो क्या यों छोड़ कर जाता तुझे? उसे वापस ले भी आएगी, तो क्या अब वह तेरे भरोसे लायक बचा है? क्या करेगी अब उस का तू? वह तो ऐसी चीज है कि जो निगले भी नहीं बनेगा और बाहर थूकेगी, तो भी कसैली हो जाएगी तू.

‘वह तो बदचलन है ही, तू भी अगर उस की तलाश में थानाकचहरी जाएगी, तो तू तो वैसी ही हो जाएगी. शरीफ लोगों का काम नहीं है यह सब.’

कोई तो एक बार उसे कहता, ‘देख काकी, तेरे पास हुस्न है, जवानी है, अरमान हैं. तू क्यों आग में झोंकती है खुद को? दफा कर ऐसे पति को. पीछा छोड़ उस का. तू दोबारा घर बसा ले. वह 20 साल बाद आ कर तुझ पर अपना दावा दायर करने से रहा. फिर किस आधार पर वह तुझ पर अपना हक जमाएगा? इतने सालों से तेरे लिए बिलकुल पराया था. तेरे तन की जमीन को बंजर ही बनाता रहा वह.

‘शादी के पहले के कुछ दिनों में ही तेरे साथ रहा, सोया वह. यह तो अच्छा हुआ कि तेरी कोख में अपना कोई गंदा बीज रोप कर नहीं गया वह दुष्ट, वरना सारी उम्र उस से जान छुड़ानी मुश्किल हो जाती तुझे.’

कुनबे ने काकी के बारे में 3 बार फतवे जारी किए थे. पहली बार काकी की मां ने ऐसे ही विद्रोही शब्द कहे थे कि कहीं नहीं जाएगी काकी. पहली बार गांव में तब हंगामा हुआ था, जब काकी दीनू काका के बेटे रमेश के बहकावे में आ गई थी और उस ने उस के साथ भाग जाने की योजना बना ली थी.

वह करती भी तो क्या करती. 35 बरस की हो गई थी वह, मगर कहीं उस के रिश्ते की बात जम नहीं रही थी. ऐसे में लड़कियां कब तक खिड़कियों के बाहर ताकझांक करती रहें कि उन के सपनों का राजकुमार कब आएगा. इन दिनों राजकुमार लड़की के रंगरूप या गुण नहीं देखता, वह उस के पिता की जागीर पर नजर रखता है, जहां से उसे मोटा दहेज मिलना होता है. गरीब की बेटी और वह भी जन्म से गूंगीबहरी. कौन हाथ धरेगा उस पर? वैसे, काकी गजब की खूबसूरत थी. घर के कामकाज में भी माहिर. गोरीचिट्टी, लंबा कद. जब किसी शादीब्याह के लिए सजधज कर निकलती, तो कइयों के दिल पर सांप लोटने लगते. मगर उस के साथ जिंदगी बिताने के बारे में सोचने मात्र की कोई कल्पना नहीं करता था.

वैसे तो किसी कुंआरी लड़की का दिल धड़कना ही नहीं चाहिए, अगर धड़के भी तो किसी को कानोंकान खबर न हो, वरना बरछे, तलवारें व गंड़ासियां लहराने लगती हैं. यह कैसा निजाम है कि जहां मर्द पचासों जगह मुंह मार सकता था, मगर औरत अपने दिल के आईने में किसी पराए मर्द की तसवीर नहीं देख सकती थी? न शादी से पहले और शादी के बाद तो कतई नहीं. पर दीनू काका के फौजी बेटे रमेश का दिल काकी पर फिदा हो गया था. काकी भी उस से बेपनाह मुहब्बत करने लगी थी. मगर कहां दीनू काका की लंबीचौड़ी खेती और कहां काकी का गरीब कुनबा. कोई मेल नहीं था दोनों परिवारों में. पहली ही नजर में रमेश काकी पर अपना सबकुछ लुटा बैठा, मगर काकी को क्या पता था कि ऐसा प्यार उस के भविष्य को चौपट कर देगा.

रमेश जानता था कि उस के परिवार वाले उस गूंगी लड़की से उस की शादी नहीं होने देंगे. बस, एक ही रास्ता बचा था कि कहीं भाग कर शादी कर ली जाए.

उन की इस योजना का पता अगले ही दिन चल गया था और कई परिवार, जो रमेश के साथ अपनी लड़की का रिश्ता जोड़ना चाहते थे, सब दिशाओं में फैल गए. इश्क और मुश्क कहां छिपते हैं भला. फिर जब सारी दुनिया प्रेमियों के खिलाफ हो जाए, तो उस प्यार को जमाने वालों की बुरी नजर लग जाती है.

काकी का बचपन बड़े प्यार और खुशनुमा माहौल में बीता था. उस के छोटे भाई राजा को कोई चिढ़ाताडांटता या मारता, तो काकी की आंखें छलछला आतीं. अपनी एक साल की भूरी कटिया के मरने पर 2 दिन रोती रही थी वह. जब उस का प्यारा कुत्ता मरा तो कैसे फट पड़ी थी वह. सब से ज्यादा दुख तो उसे पिता के मरने पर हुआ था. मां के गले लग कर वह इतना रोई थी कि मानो सारे दुखों का अंत ही कर डालेगी. आंसू चुक गए. आवाज तो पहले से ही गूंगी थी. बस गला भरभर करता था और दिल रेशारेशा बिखरता जाता था. सबकुछ खत्म सा हो गया था तब.

अब जिंदा बच गई थी तो जीना तो था ही न. दुखों को रोरो कर हलका कर लेने की आदत तब से ही पड़ गई थी उसे. दुख रोने से और बढ़ते जाते थे.

रमेश से बलात छीन कर काकी को दूर फेंक दिया गया था एक अधेड़ उम्र के पिलपिले गरीब किसान के झोंपड़े में, जहां उस के जवान बेटों की भूखी नजरें काकी को नोंचने पर आमादा थीं.

काकी वहां कितने दिन साबुत बची रहती. भाग आई भेडि़यों के उस जंगल से. कोई रास्ता नहीं था उस जंगल से बाहर निकलने का.

जो रास्ता काकी ने खुद चुना था, उस के दरमियान सैकड़ों लोग खड़े हो गए थे. काकी के मायके की हालत खराब तो न थी, मगर इतने सोखे दिन भी नहीं थे कि कई दिन दिल खोल कर हंस लिया जाए. कभी धरती पर पड़े बीजों के अंकुरित होने पर नजरें गड़ी रहतीं, तो कभी आसमान के बादलों से मुरादें मांगती झोलियां फैलाए बैठी रहतीं मांबेटी.

रमेश से छिटक कर और फिर ससुराल से ठुकराई जाने के बाद काकी का दिल बुरी तरह हार माने बैठा था. अब काकी ने अपने शरीर की देखभाल करनी छोड़ दी थी. उस की मां उस से अकसर कहती कि गरीब की जवानी और पौष की चांदनी रात को कौन देखता है.

फटी हुई आंखों से काकी इस बात को समझने की कोशिश करती. मां झुंझला कर कहती, ‘‘तू तो जबान से ही नहीं, दिल से भी बिलकुल गूंगी ही है. मेरे कहने का मतलब है कि जैसे पूस की कड़कती सर्दी वाली रात में चांदनी को निहारने कोई नहीं बाहर निकलता, वैसे ही गरीब की जवानी को कोई नहीं देखता.’’

मां चल बसीं. काकी के भाई की गृहस्थी बढ़ चली थी. काकी की अपनी भाभी से जरा भी नहीं बनती थी. अब काकी काफी चिड़चिड़ी सी हो गई थी. भाई से अनबन क्या हुई, काकी तो दरबदर की ठोकरें खाने लगी. कभी चाची के पास कुछ दिन रहती, तो कभी बूआ काम करकर के थकटूट जाती थी. काकी एक बार खाट से क्या लगी कि सब उसे बोझ समझने लगे थे.

आखिरकार काकी की बिरादरी ने एक बार फिर काकी के बारे में फैसला करने के लिए समय निकाला. इन लोगों ने उस के लिए ऐसा इंतजाम कर दिया, जिस के तहत दिन तय कर दिए गए कि कुलीन व खातेपीते घरों में जा कर काकी खाना खा लिया करेगी.

कुछ दिन तक यह बंदोबस्त चला, मगर काकी को यों आंखें झुका कर गैर लोगों के घर जा कर रहम की भीख खाना चुभने लगा. अपनी बिरादरी के अब तक के तमाम फैसलों का काकी ने विरोध नहीं किया था, मगर इस आखिरी फैसले का काकी ने जवाब दिया. सुबह उस की लाश नहर से बरामद हुई थी. अब काकी गूंगीबहरी ही नहीं, बल्कि अहल्या की तरह सर्द नीला पत्थर हो चुकी थी.

Online Hindi Story : मझधार – नेहा हमेशा चुपचाप क्यो रहती थी?

Online Hindi Story : पूरे 15 वर्ष हो गए मुझे स्कूल में नौकरी करते हुए. इन वर्षों में कितने ही बच्चे होस्टल आए और गए, किंतु नेहा उन सब में कुछ अलग ही थी. बड़ी ही शांत, अपनेआप में रहने वाली. न किसी से बोलती न ही कक्षा में शैतानी करती. जब सारे बच्चे टीचर की गैरमौजूदगी में इधरउधर कूदतेफांदते होते, वह अकेले बैठे कोई किताब पढ़ती होती या सादे कागज पर कोई चित्रकारी करती होती. विद्यालय में होने वाले सारे कार्यक्रमों में अव्वल रहती. बहुमखी प्रतिभा की धनी थी वह. फिर भी एक अलग सी खामोशी नजर आती थी मुझे उस के चेहरे पर. किंतु कभीकभी वह खामोशी उदासी का रूप ले लेती. मैं उस पर कई दिनों से ध्यान दे रही थी. जब स्पोर्ट्स का पीरियड होता, वह किसी कोने में बैठ गुमनाम सी कुछ सोचती रहती.

कभीकभी वह कक्षा में पढ़ते हुए बोर्ड को ताकती रहती और उस की सुंदर सीप सी आंखें आंसुओं से चमक उठतीं. मेरे से रहा न गया, सो मैं ने एक दिन उस से पूछ ही लिया, ‘‘नेहा, तुम बहुत अच्छी लड़की हो. विद्यालय के कार्यक्रमों में हर क्षेत्र में अव्वल आती हो. फिर तुम उदास, गुमसुम क्यों रहती हो? अपने दोस्तों के साथ खेलती भी नहीं. क्या तुम्हें होस्टल या स्कूल में कोई परेशानी है?’’

वह बोली, ‘‘जी नहीं मैडम, ऐसी कोई बात नहीं. बस, मुझे अच्छा नहीं लगता. ’’

उस के इस जवाब ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया जहां बच्चे खेलते नहीं थकते, उन्हें बारबार अनुशासित करना पड़ता है, उन्हें उन की जिम्मेदारियां समझानी पड़ती हैं वहां इस लड़की के बचपन में यह सब क्यों नहीं? मुझे लगा, कुछ तो ऐसा है जो इसे अंदर ही अंदर काट रहा है. सो, मैं ने उस का पहले से ज्यादा ध्यान रखना शुरू कर दिया. मैं देखती थी कि जब सारे बच्चों के मातापिता महीने में एक बार अपने बच्चों से मिलने आते तो उस से मिलने कोई नहीं आता था. तब वह दूर से सब के मातापिता को अपने बच्चों को पुचकारते देखती और उस की आंखों में पानी आ जाता. वह दौड़ कर अपने होस्टल के कमरे में जाती और एक तसवीर निकाल कर देखती, फिर वापस रख देती.

जब बच्चों के जन्मदिन होते तो उन के मातापिता उन के लिए व उन के दोस्तों के लिए चौकलेट व उपहार ले कर आते लेकिन उस के जन्मदिन पर किसी का कोई फोन भी न आता. हद तो तब हो गई जब गरमी की छुट्टियां हुईं. सब के मातापिता अपने बच्चों को लेने आए लेकिन उसे कोई लेने नहीं आया. मुझे लगा, कोई मांबाप इतने गैर जिम्मेदार कैसे हो सकते हैं? तब मैं ने औफिस से उस का फोन नंबर ले कर उस के घर फोन किया और पूछा कि आप इसे लेने आएंगे या मैं ले जाऊं?

जवाब बहुत ही हैरान करने वाला था. उस की दादी ने कहा, ‘‘आप अपने साथ ले जा सकती हैं.’’ मैं समझ गई थी कोई बड़ी गड़बड़ जरूर है वरना इतनी प्यारी बच्ची के साथ ऐसा व्यवहार? खैर, उन छुट्टियों में मैं उसे अपने साथ ले गई. कुछ दिन तो वह चुपचाप रही, फिर धीरेधीरे मेरे साथ घुलनेमिलने लगी थी. मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मैं किसी बड़ी जंग को जीतने वाली हूं. छुट्टियों के बाद जब स्कूल खुले वह 8वीं कक्षा में आ गई थी. उस की शारीरिक बनावट में भी परिवर्तन होने लगा था. मैं भलीभांति समझती थी कि उसे बहुत प्यार की जरूरत है. सो, अब तो मैं ने बीड़ा उठा लिया था उस की उदासी को दूर करने का. कभीकभी मैं देखती थी कि स्कूल के कुछ शैतान बच्चे उसे ‘रोतली’ कह कर चिढ़ाते थे. खैर, उन्हें तो मैं ने बड़ी सख्ती से कह दिया था कि यदि अगली बार वे नेहा को चिढ़ाते पाए गए तो उन्हें सजा मिलेगी.

हां, उस की कुछ बच्चों से अच्छी पटती थी. वे उसे अपने घरों से लौटने के बाद अपने मातापिता के संग बिताए पलों के बारे में बता रहे थे तो उस ने भी अपनी इस बार की छुट्टियां मेरे साथ कैसे बिताईं, सब को बड़ी खुशीखुशी बताया. मुझे ऐसा लगा जैसे मैं अपनी मंजिल का आधा रास्ता तय कर चुकी हूं. इस बार दीवाली की छुट्टियां थीं और मैं चाहती थी कि वह मेरे साथ दीवाली मनाए. सो, मैं ने पहले ही उस के घर फोन कर कहा कि क्या मैं नेहा को अपने साथ ले जाऊं छुट्टियों में? मैं जानती थी कि जवाब ‘हां’ ही मिलेगा और वही हुआ. दीवाली पर मैं ने उसे नई ड्रैस दिलवाई और पटाखों की दुकान पर ले गई. उस ने पटाखे खरीदने से इनकार कर दिया. वह कहने लगी, उसे शोर पसंद नहीं. मैं ने भी जिद करना उचित न समझा और कुछ फुलझडि़यों के पैकेट उस के लिए खरीद लिए. दीवाली की रात जब दिए जले, वह बहुत खुश थी और जैसे ही मैं ने एक फुलझड़ी सुलगा कर उसे थमाने की कोशिश की, वह नहींनहीं कह रोने लगी और साथ ही, उस के मुंह से ‘मम्मी’ शब्द निकल गया. मैं यही चाहती थी और मैं ने मौका देख उसे गले लगा लिया और कहा, ‘मैं हूं तुम्हारी मम्मी. मुझे बताओ तुम्हें क्या परेशानी है?’ आज वह मेरी छाती से चिपक कर रो रही थी और सबकुछ अपनेआप ही बताने लगी थी.

वह कहने लगी, ‘‘मेरे मां व पिताजी की अरेंज्ड मैरिज थी. मेरे पिताजी अपने मातापिता की इकलौती संतान हैं, इसीलिए शायद थोड़े बदमिजाज भी. मेरी मां की शादी के 1 वर्ष बाद ही मेरा जन्म हुआ. मां व पिताजी के छोटेछोटे झगड़े चलते रहते थे. तब मैं कुछ समझती नहीं थी. झगड़े बढ़ते गए और मैं 5 वर्ष की हो गई. दिनप्रतिदिन पिताजी का मां के साथ बरताव बुरा होता जा रहा था. लेकिन मां भी क्या करतीं? उन्हें तो सब सहन करना था मेरे कारण, वरना मां शायद पिताजी को छोड़ भी देतीं.

‘‘पिताजी अच्छी तरह जानते थे कि मां उन को छोड़ कर कहीं नहीं जाएगी. पिताजी को सिगरेट पीने की बुरी आदत थी. कई बार वे गुस्से में मां को जलती सिगरेट से जला भी देते थे. और वे बेचारी अपनी कमर पर लगे सिगरेट के निशान साड़ी से छिपाने की कोशिश करती रहतीं. पिताजी की मां के प्रति बेरुखी बढ़ती जा रही थी और अब वे दूसरी लड़कियों को भी घर में लाने लगे थे. वे लड़कियां पिताजी के साथ उन के कमरे में होतीं और मैं व मां दूसरे कमरे में. ‘‘ये सब देख कर भी दादी पिताजी को कुछ न कहतीं. एक दिन मां ने पिताजी के अत्याचारों से तंग आ कर घर छोड़ने का फैसला कर लिया और मुझे ले कर अपने मायके आ गईं. वहां उन्होंने एक प्राइवेट स्कूल में नौकरी भी कर ली. मेरे नानानानी पर तो मानो मुसीबत के पहाड़ टूट पड़े. मेरे मामा भी हैं किंतु वे मां से छोटे हैं. सो, चाह कर भी कोई मदद नहीं कर पाए. जो नानानानी कहते वे वही करते. कई महीने बीत गए. अब नानानानी को लगने लगा कि बेटी मायके आ कर बैठ गई है, इसे समझाबुझा कर भेज देना चाहिए. वे मां को समझाते कि पिताजी के पास वापस चली जाएं.

‘‘एक तरह से उन का कहना भी  सही था कि जब तक वे हैं ठीक है. उन के न रहने पर मुझे और मां को कौन संभालेगा? किंतु मां कहतीं, ‘मैं मर जाऊंगी लेकिन उस के पास वापस नहीं जाऊंगी.’

‘‘दादादादी के समझाने पर एक बार पिताजी मुझे व मां को लेने आए और तब मेरे नानानानी ने मुझे व मां को इस शर्त पर भेज दिया कि पिताजी अब मां को और नहीं सताएंगे. हम फिर से पिताजी के पास उन के घर आ गए. कुछ दिन पिताजी ठीक रहे. किंतु पिताजी ने फिर अपने पहले वाले रंगढंग दिखाने शुरू कर दिए. अब मैं धीरेधीरे सबकुछ समझने लगी थी. लेकिन पिताजी के व्यवहार में कोई फर्क नहीं आया. वे उसी तरह मां से झगड़ा करते और उन्हें परेशान करते. इस बार जब मां ने नानानानी को सारी बातें बताईं तो उन्होंने थोड़ा दिमाग से काम लिया और मां से कहा कि मुझे पिताजी के पास छोड़ कर मायके आ जाएं. ‘‘मां ने नानानानी की बात मानी और मुझे पिताजी के घर में छोड़ नानानानी के पास चली गईं. उन्हें लगा शायद मुझे बिन मां के देख पिताजी व दादादादी का मन कुछ बदल जाएगा. किंतु ऐसा न हुआ. उन्होंने कभी मां को याद भी न किया और मुझे होस्टल में डाल दिया. नानानानी को फिर लगने लगा कि उन के बाद मां को कौन संभालेगा और उन्होंने पिताजी व मां का तलाक करवा दिया और मां की दूसरी शादी कर दी गई. मां के नए पति के पहले से 2 बच्चे थे और एक बूढ़ी मां. सो, मां उन में व्यस्त हो गईं.

‘‘इधर, मुझे होस्टल में डाल दादादादी व पिताजी आजाद हो गए. छुट्टियों में भी न मुझे कोई बुलाता, न ही मिलने आते. मां व पिताजी दोनों के मातापिता ने सिर्फ अपने बच्चों के बारे में सोचा, मेरे बारे में किसी ने नहीं. दोनों परिवारों और मेरे अपने मातापिता ने मुझे मझधार में छोड़ दिया.’’ इतना कह कर नेहा फूटफूट कर रोने लगी और कहने लगी, ‘‘आज फुलझड़ी से जल न जाऊं. मुझे मां की सिगरेट से जली कमर याद आ गई. मैडम, मैं रोज अपनी मां को याद करती हूं, चाहती हूं कि वे मेरे सपने में आएं और मुझे प्यार करें.

‘‘क्या मेरी मां भी मुझे कभी याद करती होंगी? क्यों वे मुझे मेरी दादी, दादा, पापा के पास छोड़ गईं? वे तो जानती थीं कि उन के सिवा कोई नहीं था मेरा इस दुनिया में. दादादादी, क्या उन से मेरा कोई रिश्ता नहीं? वे लोग मुझे क्यों नहीं प्यार करते? अगर मेरे पापा, मम्मी का झगड़ा होता था तो उस में मेरा क्या कुसूर? और नाना, नानी उन्होंने भी मुझे अपने पास नहीं रखा. बल्कि मेरी मां की दूसरी शादी करवा दी. और मुझ से मेरी मां छीन ली. मैं उन सब से नफरत करती हूं मैडम. मुझे कोई अच्छा नहीं लगता. कोई मुझ से प्यार नहीं करता.’’ वह कहे जा रही थी और मैं सुने जा रही थी. मैं नेहा की पूरी बात सुन कर सोचती रह गई, ‘क्या बच्चे से रिश्ता तब तक होता है जब तक उस के मातापिता उसे पालने में सक्षम हों? जो दादादादी, नानानानी अपने बच्चों से ज्यादा अपने नातीपोतों पर प्यार उड़ेला करते थे, क्या आज वे सिर्फ एक ढकोसला हैं? उन का उस बच्चे से रिश्ता सिर्फ अपने बच्चों से जुड़ा है? यदि किसी कारणवश वह बीच की कड़ी टूट जाए तो क्या उन दादादादी, नानानानी की बच्चे के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं? और क्या मातापिता अपने गैरजिम्मेदार बच्चों का विवाह कर एक पवित्र बंधन को बोझ में बदल देते हैं? क्या नेहा की दादी अपने बेटे पर नियंत्रण नहीं रख सकती थी और यदि नहीं तो उस ने नेहा की मां की जिंदगी क्यों बरबाद की, और क्यों नेहा की मां अपने मातापिता की बातों में आ गई और नेहा के भविष्य के बारे में न सोचते हुए दूसरे विवाह को राजी हो गई?

‘कैसे गैरजिम्मेदार होते हैं वे मातापिता जो अपने बच्चों को इस तरह अकेला घुटघुट कर जीने के लिए छोड़ देते हैं. यदि उन की आपस में नहीं बनती तो उस का खमियाजा बच्चे क्यों भुगतें. क्या हक होता है उन्हें बच्चे पैदा करने का जो उन की परवरिश नहीं कर सकते.’ मैं चाहती थी आज नेहा वह सब कह डाले जो उस के मन में नासूर बन उसे अंदर ही अंदर खाए जा रहा है. जब वह सब कह चुप हुई तो मैं ने उसे मुसकरा कर देखा और पूछा, ‘‘मैं तुम्हें कैसी लगती हूं? क्या तुम समझती हो मैं तुम्हें प्यार करती हूं?’’ उस ने अपनी गरदन हिलाते हुए कहा, ‘‘हां.’’ और मैं ने पूछ लिया, ‘‘क्या तुम मुझे अपनी मां बनाओगी?’’ वह समझ न सकी मैं क्या कह रही हूं. मैं ने पूछा, ‘‘क्या तुम हमेशा के लिए मेरे साथ रहोगी?’’

जवाब में वह मुसकरा रही थी. और मैं ने झट से उस के दादादादी को बुलवा भेजा. जब वे आए, मैं ने कहा, ‘‘देखिए, आप की तो उम्र हो चुकी है और मैं इसे सदा के लिए अपने पास रखना चाहती हूं. क्यों नहीं आप इसे मुझे गोद दे देते?’’

दादादादी ने कहा, ‘‘जैसा आप उचित समझें.’’ फिर क्या था, मैं ने झट से कागजी कार्यवाही पूरी की और नेहा को सदा के लिए अपने पास रख लिया. मैं नहीं चाहती थी कि मझधार में हिचकोले खाती वह मासूम जिंदगी किसी तेज रेले के साथ बह जाए.

Hindi Kahani : सुखद भूल – इरफाना, खाला जान से क्या कहना चाहती थी

Hindi Kahani : ‘आजाद’ अनजाने में हुई भूल से इरफाना घबरा रही थी और जब खाला ने भी घर में तूफान खड़ा कर दिया तो वह रोंआसी हो उठी पर अपने अम्मीअब्बा का फैसला सुन कर तो वह खुशी से पागल हो उठी. उस ने किताबें उठाईं और कालेज जाने के लिए ज्यों ही घूमी, दरवाजे पर आ खड़ी नसीम ने उसे टोक दिया, ‘‘आपा, कालेज जाने से पहले मां से मिल लें, वे आप को अभी बुला रही हैं.’’ ‘‘अच्छा, मैं आ रही हूं.’’ इरफाना सहन में निकल आई. उसे बड़ा अजीब लगा, क्योंकि नसीम, गुलू और नफीसा उसे तिरछी दृष्टि से देख रही थीं. शायद शरारत से वे मुसकरा भी रही थीं.

वह तब खाला के कमरे में आ गई थी. नेकू ने, जो दूर के रिश्ते में उस की खाला लगती थी, उसे खा जाने वाली नजरों से देखा, सिर से पांव और पांव से सिर तक. नेकू खाला की इस दृष्टि में आश्चर्य के साथसाथ घोर अविश्वास भी झलक रहा था. वह छूटते ही बोली, ‘‘इरफाना, कैसी गुजर रही है? खैरियत तो है?’’ ‘‘जी,’’ अटपटे सवाल पर वह अचकचा गई. ‘‘हूं,’’ एक लंबा हुंकारा और फिर इरफाना की अवहेलना करते हुए खालाजान ने पानदान को खोल कर पान लगाया. सरौते से छालियां काटीं और मुंह में गिलौरी दबा कर डबिया बंद कर दी. तब रेशमी रूमाल से हाथ व होंठ पोंछ डाले. फिर तकिए के सहारे आड़ीतिरछी हो कर एक खत निकाल कर उसे दिखलाया, ‘‘यह क्या है? पहचानती हो यह खत?’’ उस खत को देखते ही इरफाना चौंकी. यह रंगीन खत उस का ही लिखा हुआ था.

जुबेर के नाम. वह प्रेमपत्र था. ‘‘यह तुम्हारा लिखा हुआ ही है न?’’ गलत लिफाफे में बंद हो गया, क्यों?’’ नेकू खाला ने पीक में रंगे अधरों पर एक कुटिल मुसकान ला कर जब घुड़का तो सहमी आवाज में उस ने जवाब दिया, ‘‘जी.’’ ‘‘बहुत खूब, क्या शानदार बीएड कर रही हो. क्या कमाल के कारनामे हैं तुम पढ़नेवालियों के. इरफाना, तुम से तो मेरी बेपढ़ी बेटियां लाख भलीं,’’ खाला ने दरवाजे से लगी खड़ी नसीम, गुलू और नफीसा की ओर इशारा कर दिया. फिर पलट कर चीखीं, ‘‘तुम लाख धूल झोंकने की कोशिश करो पर इश्क नहीं छिपता.’’ नेकू बहुत गुस्से में थी पर उस के चेहरे को इरफाना ने नहीं देखा. वह खामोश खड़ी फर्श ताकती रही, बस. ‘‘अपनी किताबें इधर लाओ.’’

खाला ने उसी अंदाज में किताबें जब्त कर लीं और कड़े शब्दों में हिदायत दी, ‘‘आज से कालेज नहीं जाओगी, समझीं?’’ इरफाना रोंआसी हो कर जब अपने कमरे में लौटी तो उस के पीछे नसीम भी थी. नसीम ने देखा, आपा की बड़ीबड़ी आंखों में आंसू भर आए थे. वह उस के पास पलंग पर बैठ कर हमदर्दी जताते हुए बोली, ‘‘आप ने यह क्या किया. आप तो पढ़ाई में बड़ी होशियार थीं. संगीत, खेलकूद और नेकनामी में आप का डंका बजता है. फिर यह भूल कैसे हो गई? कौन है जुबेर?’’ इरफाना ने कोई जवाब नहीं दिया. उसे बड़ी ग्लानि हुई, क्योंकि हमेशा नसीहत सुनने वाली नसीम आज उसे नसीहत कर रही थी. उसे अपनी लापरवाही पर रोना आ रहा था. उस ने इस गली के डाकिए से अनुनयविनय की थी कि एक रंगीन खत है जो खाला को न दे कर उसे दे दिया जाए और अकरम साहब के तो हरगिज हाथ न लगे. लेकिन दाढ़ी वाला यह डाकिया बड़ा कांइयां है.

वह खत आखिर खाला को दे ही गया, दुश्मन कहीं का. वैसे पिछले दिन से ही इस खत को ले कर वह काफी परेशान थी, जब डाक्टर जुबेर का उसे कालेज में फोन मिला था. जुबेर ने बताया था, ‘‘मेरे लिफाफे में तुम ने अपने अब्बा को लिखा खत शायद भूल से बंद कर दिया. उसे पा कर मुझे हंसी छूट रही है क्योंकि अब्बा के पते वाला लिफाफा भी इस में निकला है.’’ लेकिन इस खबर के साथ ही इरफाना के तो पसीने छूटने लगे थे. उस ने 3 लिफाफों पर पते लिखे. एक पर जुबेर का, दूसरे पर अपने अब्बा का और तीसरा अब्बा वाले लिफाफे में डालने के लिए जवाबी, जिस पर अपने खालू अकरम मियां का पता लिखा था. फिर उस ने खत लिखे और लिफाफों में बंद कर तुरंत लैटरबौक्स में छोड़ आई. जुबेर वाले लिफाफे में अब्बाजान को लिखा पत्र और वहां के ठिकाने वाला लिफाफा बंद हो गया और जवाबी लिफाफे में अपने प्रेमी जुबेर को लिखा खत बंद हो गया, जो खाला के हाथ में पड़ गया. इरफाना के अम्मीअब्बू नागौर में सरकारी नौकरी में थे और वह उन की एकलौती लाड़ली बेटी थी.

नागौर के मुसलमान बड़े रुढ़ीवादी हैं मगर इरफाना के अब्बा और अम्मी उदार दिल रहे हैं. उन्होंने बेटी को बावजूद मुल्लेमौलवियों के विरोध के बीए तक पढ़ाया और वही बेटी अब जोधपुर में बीएड कर रही थी. इरफाना को होस्टल में न रख कर उन्होंने उसे एक दूर के रिश्ते की खाला के घर में रखा और बराबर खर्च भेजते रहे. इस नेकू खाला का घर बंबा महल्ले में स्टेडियम के करीब ही था. खाला के पति अकरम मियां की साइकिल की दुकान थी और वह उसी में मस्तव्यस्त रहता था. उस ने तीनों बेटियों को न तो कभी मुंह लगाया और न ही प्राथमिक से आगे पढ़ाया पर तीनों बेटियां बावजूद कड़े परदे के काफी तेजतर्रार व फैशनपरस्त थीं. अकरम मियां के घर से कोई जवान लड़की किसी गैर को प्रेमपत्र लिखे, यह डूब मरने की बात थी. अकरम ने उस दिन अपनी साइकिल की दुकान ही न खोली. उस ने तीनों बेटियों के बयान लिए और फिर उन का किसी तरह का दखल न पा कर पड़ोस वाले हाजीजी की बेटी से पूछताछ की गई थी. हाजी की पुत्री आबेदा पर इरफाना का राज जाहिर था. फिर जुबेर और इरफाना ने कभी कोई गलत कदम भी न उठाया था. सो, उस ने सबकुछ इतमीनान से बता दिया.

अब तो अकरम और कथित खाला के तनबदन में आग लग गई. पर लड़की युवा, पढ़ीलिखी और पराई थी, सो तनिक पूछताछ कर के उस के मांबाप को बुलवा लेना ही उचित समझा गया. उन्हें डर था कि कहीं इरफाना का असर उन की बेटियां न ग्रहण कर लें. दोपहर में नेकू खाला इरफाना के कमरे में आईं, ‘‘तुम ने आज खाना नहीं खाया?’’ ‘‘जी, मेरे सिर में दर्द है.’’ ‘‘दर्द है,’’ नेकू की पेशानी में बल पड़ गए और त्योरियां चढ़ गईं, ‘‘देखो, मैं तुम्हें बाहर तो हरगिज न निकलने दूंगी,’’ फिर वह तूतड़ाक पर उतर आई, ‘‘चाहे तू खाना खा या न खा. तेरा क्या भरोसा, ऐसे में तू उस कम्बख्त के साथ कहीं भाग जाए तो हमारी तो नाक ही कट जाएगी. पता है, हमारे घर में तू किसी की अमानत है?’’ इरफाना ने कोई जवाब नहीं दिया. वह नतमस्तक किताब के पन्ने उलटती रही. ‘‘अच्छा, बता, यह जुबेर कौन है?’’ ‘‘डाक्टर है, खालाजान.’’ ‘‘भाड़ में जाए डाक्टर. मैं पूछती हूं किस बिरादरी से है?’’ ‘‘शिया मुसलमान है.’’ ‘‘शिया,’’ खाला को एकाएक पसीने छूट गए, ‘‘तोबा, ऐसे काफिर से इश्क लड़ाती है. बेगैरत, शरम नहीं आती तुझे? तू सुन्नी, तेरा बाप सुन्नी और हम सब सुन्नी मुसलमान. खैर, खाना खा.’’ ‘‘कहा न, मुझे भूख नहीं है.’’ ‘‘ठीक है, तेरे अम्मीअब्बा आ जाएं तो खा लेना,’’

और नेकू खाला पांव पटकती हुई वहां से चली गई. उन्होंने अपनी बेटियों को पुकार कर हिदायत दी, ‘‘खबरदार, जो किसी ने इरफाना से कोई बात की.’’ ‘तो इस ने अम्मीअब्बा को भी नागौर से बुला लिया है,’ इरफाना यह सोच कर कांप उठी. अब खैर नहीं. बाप का स्वभाव उस से छिपा नहीं था. ‘अब… मारी जाऊंगी मैं?’ वह बुदबुदाई. जुबेर मंडोर में डाक्टर था. वह हफ्तेदोहफ्ते में इरफाना से मिलता था. इस बीच वे पत्रों द्वारा ही एकदूसरे से संपर्क बनाए रखते थे. वे अकसर अपने भविष्य को सुनियोजित करने की सोचते, उन का प्रेम सात्विक और गंभीर था. जुबेर इरफाना को बीएड कालेज के पते पर पत्र डालता और कभीकभी फोन भी कर देता. अगस्त में सांस्कृतिक सप्ताह के आयोजन के दौरान संगीत में रुचि होने के कारण जुबेर इरफाना के करीब आया, परिचय हुआ, घनिष्ठता बढ़ी और फिर 2 युवा मनों में प्रेम की कोकिला कूकने लगी, जिस की रागिनी उन्हें भा गई. इरफाना के अम्मीअब्बा जोधपुर पहुंच गए. नेकू खाला अम्मी को एक तरफ अपने कमरे में ले गई और बहन को अचानक बुलावे का सबब सुबूत सहित बयान करने लगी. खालू उस वक्त अपनी साइकिल की दुकान पर थे. नसीम सिलाई की मशीन छोड़ कर दीवार से लग चुकी थी. गुलू रसोई में थी और नफीसा कपड़े धो कर सुखा रही थी. उन सबों की निगाहें चाहे जिधर रही हों, कान उस कमरे की ओर ही लगे थे जहां इरफाना के मामले की सुनवाई हो रही थी. अब्बा बाहर बैठक में तनहा बैठे सिगरेट पी रहे थे. इरफाना ने चाहा कि बाप से मिल ले, अभी मौका है. मगर उस के पांव न उठे. अपराधभावना ने उसे दबोच रखा था. अब वह खिड़की का पल्ला कुछ भिड़ा कर अपनी अम्मी का चेहरा देखती रही केवल इस वास्ते कि इस खत की अम्मी पर देखें क्या प्रतिक्रिया होती है. किंतु अम्मी तो खामोश बैठी खाला की नफरतकारी सुन रही थीं.

अम्मी ने खाला के हाथ से खत ले कर पढ़ा था. फिर भी वे शांत दिखीं. लगा, कहीं गहरे खो गई हैं. खाला के नाचते हाथ, चढ़ती नाक, सिकुड़ती आंखें, परेशान पेशानी और विवर्ण होता चेहरा यह साबित कर रहा था कि इरफाना ने अक्षम्य अपराध कर दिया है. अम्मी ने तभी पुकारा, ‘‘इरफाना, यहां आओ तो.’’ पुकार सुनते ही इरफाना की घिग्घी बंध गई. भयभीत हिरणी सी वह अपनी मां के सामने आ कर खड़ी हो गई. कुछ देर के लिए उस कमरे में खेलने वाली खामोशी पसर गई. नीची गरदन किए इरफाना ने महसूस किया, अम्मी अपनी एकलौती औलाद को ऊपर से नीचे तक देख रही हैं, फिर वे धीरे से बोलीं, ‘‘इरफाना, यह खत तुम्हारा ही लिखा हुआ है न?’’ ‘‘हां,’’ उस ने स्वीकृति में गरदन हिलाई. वह खाला और अम्मी के मध्य खड़ी पसीनापसीना हो रही थी कि एकाएक अम्मी कुरसी से उठीं. इरफाना सहम गई. सोचा, अब पिटाई होगी. किंतु ऐसा कुछ न हुआ.

अम्मी ने उस की खाला से कहा, ‘‘हम हाजीजी की बेटी आबेदा से बात करने बीएड कालेज जा रहे हैं,’’ और जब वे बाहर निकलीं तो नसीम ने कहा, ‘‘लेकिन खाना खा कर जाएं. देखिए न, सब तैयार ही है.’’ ‘‘नहीं, खाना ऐसे में कैसे खा लें? लौट कर सोचेंगे,’’ और मम्मी बैठक से अब्बाजी को साथ ले कर स्टेडियम वाली सड़क पर निकल गईं. वे कालेज नहीं, पब्लिक पार्क में पहुंच कर एक लौन में बैठ गए. कुछ देर की चुप्पी के बाद अब्बा ने पूछा, ‘‘इन लोगों ने अचानक हमें क्यों बुलवाया है?’’ खयालों में खोई अम्मी चौंकी, ‘‘अ…वो अपनी इरफाना को इन लोगों ने कालेज नहीं जाने दिया, पिछले 3 दिनों से.’’ ‘‘भला क्यों?’’ अब्बा चकित हो रहे थे. ‘‘उस का एक लड़के से प्रेम हो गया है. देखो, यह खत इन्होंने सुबूत में मुझे दिखाया है.’’ अम्मी ने बेटी का लिखा प्रेमपत्र उन्हें थमा दिया और पूरी कहानी कह सुनाई. अब्बा ने हैरान हो कर वह खत कई बार पढ़ा और फिर वे स्वयं भी कहीं गहरे खो से गए.

फिर सूनी हवेली में अपने जोड़े के साथ बैठे अनुभवी कपोत की तरह धीरगंभीर स्वर में बोले, ‘‘यह किस्सा इरफाना और जुबेर का है या हमारातुम्हारा?’’ अब्बा ने अम्मी की आंखों में आंखें डाल दीं. ‘‘इसी उलझन में मैं हूं,’’ अम्मी भी उसी भावना में बह रही थीं. उन की आंखों में अपना 22 साल पहले का जमाना घूम गया. वे दोनों एकसाथ कालेज में पढ़ते थे और उन के प्रेमपत्र भी तब पकड़े गए थे. अम्मी लखनऊ की शिया मुसलमान थीं, जबकि अब्बा सुन्नी और राजस्थान के रहने वाले. उन दोनों ने हिम्मत और सूझ से काम लिया और परस्पर शादी कर डाली. वे भले ही शियासुन्नी का झमेला पसंद न करते हों पर घरवाले तो दकियानूसी ही थे. सो, अम्मी ने सब को छोड़ा और राजस्थान आ गईं.

‘‘खैर, यह बताओ, यह लड़का कौन है?’’ ‘‘जो मैं हूं,’’ अम्मी थोड़ा मुसकराईं, ‘‘यानी शिया.’’ ‘‘अच्छा है. हमें यही उम्मीद थी कि हमारी बेटी शियासुन्नी का फर्क मिटाने की कोशिश करेगी.’’ और दोनों को लगा, उन का भोगा हुआ अतीत परदा हटा कर सामने आ खड़ा हुआ है. अब तो वे परस्पर नजरें चुराने लगे. इस के बाद कुछ इधरउधर की बातें करने के बाद एक निश्चय के साथ वे कालेज की तरफ चले गए और काफी देर बाद घर लौटे. घर में घुसते ही दोनों की दृष्टि कमरे में बैठी इरफाना पर टिकी. वह उदास, निराश, भविष्य के प्रति आशंकित अन्यमनस्क सी निढाल हुई कुरसी पर बैठी थी. दोपहर में साइकिल की दुकान बंद कर अकरम मियां भी घर आ गए. उन्होंने भी इरफाना के अब्बा को भारी उलाहना दिया. खाना खाते वक्त हर निवाले पर इरफाना की बुराई करते जा रहे थे, जिसे सुन कर अब्बा बेचैन से हो गए. उन्होंने बहुत कम खाया, लगा, गले में कुछ फंसता जा रहा है. आखिर उन्होंने हाथ धो लिए और बाहर बैठक में आ कर सिगरेट सुलगा ली. उन्होंने आबेदा से हुई बात, इरफाना के शिक्षकों से हुई बात और जुबेर से संबंधित पूछताछ सब पर बारीबारी से विचार किया और आश्वस्त हो कर बेटी को आवाज दे दी, ‘‘इरफाना, जरा बाहर बैठक में आओ, बेटी.’’

‘अब आई शामत,’ इरफाना का कलेजा कांप गया. वह बाप के पास आ खड़ी हुई. ‘‘जी, अब्बाजी’’ ‘‘अपना सामान बांधो. हम यहां से अभी चलेंगे.’’ ‘‘मगर अब्बाजी…’’ वह कुछ कहना चाह रही थी कि बाप ने बात काट दी, ‘‘मगर क्या? हमें इन दकियानूसों के बीच नहीं रहना. मैं ने पहले ही कहा था, होस्टल में रह लो. अब भी तो रहना पड़ेगा. यह रसीद देखो, मैं तुम्हारी होस्टल की फीस जमा करा आया हूं.’’ इरफाना अवाक रह गई. उस की रुलाई फूट पड़ी, ‘‘अब्बा, आप मुझे पीटेंगे तो नहीं? मैं ने बड़ी गलती कर दी,’’ बेटी बाप के कदमों में बैठ गई. ‘‘हमारी समझदार बेटी कभी गलती नहीं करेगी. जुबेर को मैं ‘तय’ करता या तुम्हारी अम्मी. फिर जब तुम ने खुद ही उसे तय कर लिया तो सोने में सुहागा. तुम्हारे खालाखालू रुढ़ीवादी हैं. इन के सुलूक का बुरा न मानना. ऐसों को नजरअंदाज कर देना ही समझदारी है. आओ, हम इन्हें छोड़ दें.’’ अब्बा तनिक रुक कर फिर बोले, ‘‘उठो, अपनी अम्मी और सामान को ले कर बाहर आ जाओ, खाना बाहर ही खाएंगे. तुम भूखी हो न? खैर, मैं टैक्सी ला रहा हूं.’’ और इरफाना जब उठ खड़ी हुई तो लगा, समझदार बाप ने सयानी बेटी के प्यार को सम्मान दे कर आसमान तक ऊंचा उठा दिया था.

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