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Online Hindi Story : मेरा घर – क्या रुद्र को स्मिता माफ कर पाई?

Online Hindi Story : स्पीच के बाद कुछ लोगों से मिलने के उपरांत स्मिता ने जैसे ही प्लेट उठाई, पीछे से एक धीमी, चिरपरिचित आवाज आई, जिसे वह वर्षों पहले भूल चुकी थी- ‘हैलो स्मिता.’

यह सुनते ही स्मिता चौंक कर मुड़ी, तो सामने रुद्र था. वह बोला, ‘‘कैसी हो स्मिता? अब तो घर लौट आओ, प्लीज.’’

रुद्र को इतने सालों बाद अपने सामने देख स्मिता को ऐसा लगा जैसे किसी ने उस की दुखती रग पर हाथ रख दिया हो. उस के जख्म फिर हरे हो गए और वह समारोह बीच में ही छोड़ वहां से निकल गई. सारे रास्ते वह विचारों में खोई रही. इतने सालों बाद रुद्र का इस प्रकार उस के समक्ष आना और घर वापस चलने को कहना, उस का मन कंपित हो उठा.

समारोह में सम्मिलित सभी गणमान्य और प्रतिष्ठित लोगों के बीच केवल एक ही नाम की चर्चा थी और वह नाम था स्मिता, जो एक बिजनैस टायकून और ‘फैशन द रिवौल्यूशन’ कंपनी की मालकिन थी. हर कोई उसे देखने और सुनने को आतुर था, क्योंकि आज का यह समारोह स्मिता को सम्मानित करने के लिए आयोजित किया गया था. आज स्मिता को बिजनैस वुमन औफ द ईयर से सम्मानित किया जाना था. सभी की निगाहें स्मिता पर ही टिकी हुई थीं.

स्मिता के सशक्त और भावपूर्ण उद्बोधन के पश्चात भोज का भी प्रावधान रखा गया था, जब रुद्र उसे मिला था.

घर पहुंचते ही वह सीधे अपने कमरे में जा, सारी बत्तियां बुझा आराम कुरसी पर बैठ कर झूलने लगी. वह रुद्र और अपने जीवन के उन पन्नों को पलटने लगी, जिन को वह अपनी जीवनरूपी किताब से हमेशा के लिए फाड़ कर फेंक देना चाहती थी, पर वह ऐसा कर न सकी, क्योंकि इस अध्याय से उसे काव्या जैसे अनमोल मोती की प्राप्ति भी हुई थी, जिस की रोशनी आज भी उस के जीवन को जगमगा रही है.

‘स्मिता, तुम अपनी यह कंपनी ‘फैशन द रिवौल्यूशन’ बंद क्यों नहीं कर देतीं? क्या जरूरत है तुम्हें अपनी यह छोटी सी कंपनी चलाने की जब मेरा खुद का इतना बड़ा बिजनैस है.’’

‘नहीं रुद्र, नहीं, यह कंपनी मेरा सपना है, इसे मैं ने अपनी कड़ी मेहनत से खड़ा किया है और फिर मैं इसे शादी के पहले से रन कर रही हूं और उस वक्त तो तुम्हें इस बात से कोई एतराज भी नहीं था, फिर आज ऐसा क्या हुआ कि तुम मुझे कंपनी बंद करने को कह रहे हो और फिर मैं घर पर बैठ कर करूंगी क्या…?’

‘क्या मतलब, करूंगी क्या? इतनी सारी औरतें घर पर बैठ कर क्या करती हैं? अपना घर संभालती हैं, पूजापाठ करती हैं, किटी पार्टी करती हैं, तुम भी वही करो,’ रुद्र ने गुस्से से कहा.

स्मिता घर पर किसी तरह का कोई झगड़ा नहीं चाहती थी, इसलिए वह शांत भाव से बोली, ‘रुद्र, मैं फैशन डिजाइनिंग में ग्रैजुएट हूं. मुझे पूजापाठ, सत्संग में कोई दिलचस्पी नहीं है और मैं जब घर बहुत अच्छी तरह से संभाल रही हूं, तो फिर मैं अपनी कंपनी क्यों बंद करूं?’

स्मिता के इतना कहते ही रुद्र का गुस्सा ज्वालमुखी की तरह फूट पड़ा और चीखते हुए कहने लगा, ‘तुम इस दुनिया की कोई पहली फैशन डिजाइनिंग में ग्रैजुएट या पढ़ीलिखी औरत नहीं हो. मां को देखो, वे अपने समय की ग्रैजुएट हैं, लेकिन उन्होंने अपना सारा जीवन इस चारदीवारी में पूजापाठ व सत्संग में गुजारा है. कभी इस तरह के प्रपंच में वे नहीं पड़ी हैं और न ही तुम्हारी तरह पापा के संग बातबात पर तर्क करती थीं. ऐसी होती है आदर्श नारी, तुम्हारी तरह बदजबान नहीं,’ कहता हुआ रुद्र चला गया.

स्मिता जड़वत सी खड़ी रही. उस की जबान पर यह बात आ कर ठहर गई कि मां ग्रैजुएट नहीं पोस्ट ग्रैजुएट हैं और वह भी संगीत विश्वविद्यालय से, लेकिन मां ने शादी के बाद गाना तो दूर वे अपने दिल के जज्बात भी कभी किसी से बयां नहीं कर पाईं, क्योंकि हमारा घर, हमारा समाज, पुरुषप्रधान है, जहां एक स्त्री को अपने मन के भावों को व्यक्त करने का कोई अधिकार नहीं. तभी मां ने स्मिता के कंधे पर धीरे से अपना हाथ रखा, तो वह मां के गले लग बिफर कर रो पड़ी.

रिश्तों में विभाजन की सीलन और गंध बढ़ती जा रही थी. रोज रुद्र कोई न कोई बहाना बना कर घर को कुरुक्षेत्र बनाने पर आमादा रहता. स्मिता घर और अपने बिखर रहे रिश्ते को समेटने का असफल प्रयास करने लगी.

अचानक कुछ समय बाद रुद्र में आ रहे परिवर्तन से स्मिता चकित थी. उसे ऐसा महसूस होने लगा कि रुद्र एकाएक उस के प्रति केयरिंग और कुछ बहुत ज्यादा ही कंसंर्ड रहने लगा है, जिस का कारण उस की समझ से परे था.

सहसा एक दिन रुद्र स्मिता को अपनी बांहों के घेरे में लेते हुए कहने लगा, ‘स्मिता, मैं चाहता हूं कि अब हमें 2 से 3 हो जाना चाहिए. अब परिवार को बढ़ाने का समय आ गया है.’

यह सुन स्मिता हैरान रह गई, अपनेआप को रुद्र से अलग करती हुई बोली, ‘रुद्र, इतनी जल्दी क्या है? शादी को अभी केवल सालभर ही तो हुआ है. अभी तो मुझे अपनी कंपनी को विस्तार देने का समय है और मुझे यह मौका भी मिल रहा है. मैं अभी

1-2 साल बच्चे के लिए तैयार नहीं हूं.’

स्मिता के इतना कहते ही रुद्र स्मिता पर बरस पड़ा. रोजरोज के क्लेश से बचने और अपना घर बचाने के लिए स्मिता ने हार मान ली. परिवार बढ़ाने के लिए वह राजी हो गई और फिर काव्या जैसी परी स्मिता की गोद में आ गई, जिस से स्मिता की जिम्मेदारी में बढ़ोतरी के साथ उस की दुनिया खुशियों से भी भर गई.

लेकिन रुद्र के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया, बल्कि अब वह बारबार काव्या और उस की देखभाल को ले कर स्मिता से झगड़ता, उसे अपनी कंपनी बंद करने को कहता, और स्वयं काव्या की जिम्मेदारी संभालने से पीछे हट जाता.

मां यदि कुछ कहतीं या स्मिता का पक्ष लेतीं तो वह मां को भी झिड़क देता. यह देख मां चुप हो जातीं. स्मिता अब समझ चुकी थी कि क्यों रुद्र को परिवार बढ़ाने की जल्दी थी. असल में वह मातृत्व की आड़ में स्मिता की प्रगति पर अंकुश लगाना चाहता था.

स्मिता घर, परिवार और बेटी काव्या के उत्तरदायित्व के साथ ही साथ बिजनैस भी बखूबी संभाल रही थी. व्यापारी वर्ग में स्मिता अपनी पहचान और एक विशेष स्थान बनाने में कामयाब होने लगी थी, जो रुद्र और उस के पुरुषत्व को नागवार गुजरने लगा और एक दिन रुद्र बेवजह अपना फ्रस्ट्रेशन, अपनी नाकामयाबी पर अपने पुरुषत्व और अहम का रंग चढ़ा स्मिता से कहने लगा, ‘अगर तुम्हें कुछ करने का इतना ही शौक है तो छोटीमोटी कोई टाइमपास 9 से 5 बजे वाली जौब क्यों नहीं कर लेतीं? क्या जरूरत है इस कंपनी को चलाने की. और सुनो, कंपनी का नाम ‘द रिवौल्यूशन’ रखने से कोई रिवौल्यूशन नहीं होने वाला, समझीं? यह मेरा घर है और यदि तुम्हें इस घर में रहना है तो मेरे अनुसार रहना होगा, वरना इस घर से निकल जाओ.’

यह सुनते ही स्मिता के सब्र का बांध टूट गया और उस ने आज रुद्र को समझाने की कोई कोशिश नहीं की. उस ने केवल इतना कहा, ‘‘यदि यह घर सिर्फ तुम्हारा है और मुझे इस घर में रहने के लिए कठपुतली की तरह तुम्हारे इशारों पर नाचना होगा तो बेहतर है कि मैं अभी इसी वक्त यह घर छोड़ दूं,’’ इतना कह कर स्मिता ने काव्या के संग उस रात घर छोड़ दिया और मां भी स्मिता के साथ हो लीं.

सारी रात स्मिता अतीत की काली स्याही में डूबी रही. दरवाजे पर हुई आहट से वह यथार्थ में लौटी.

‘‘मैडम, आप की कौफी,’’ स्मिता की मेड ने कहा.

‘‘हूं… यहां रख दो. काव्या और मां जाग गए?’’ स्मिता ने अपनी मेड से पूछा. पूरी रात जागने की वजह से स्मिता की आंखें लाल और स्वर में थोड़ा भारीपन था.

मेड ने बड़े अदब से दोनों हाथों को बांधे और सिर झुका कर जवाब दिया, ‘‘मैडम, मांजी को काफी समय हो चुका जागे. उन के स्टूडैंट्स भी आ गए हैं और मांजी संगीत की क्लास ले रही हैं, और काव्या बेबी सो रही हैं.’’

‘‘ठीक है, तुम जाओ,’’ कह कर स्मिता अपनी कौफी खत्म कर काव्या के कमरे में जा कर वहां सो रही काव्या के सिर और बालों में अपनी उंगलियां फेरती व उस के माथे को चूमती हुई बोली, ‘‘हैप्पी बर्थ डे टू माई डियर स्वीटहार्ट. आज मेरी डौल को उस के एटीन्थ बर्थ डे पर क्या चाहिए.’’

काव्या स्मिता से लिपटती हुई बोली, ‘‘मम्मा… मुझे मेरी कंप्लीट फैमिली चाहिए. मैं चाहती हूं कि पापा भी हमारे साथ रहें.’’

तभी स्मिता का फोन बजा. फोन रुद्र का था. स्मिता के फोन रिसीव करते ही रुद्र बोला, ‘‘आई एम सौरी स्मिता, मैं बहुत अकेला हो गया हूं. तुम सब प्लीज घर लौट आओ.’’

स्मिता ने सौम्य भाव से कहा, ‘‘रुद्र, मैं तुम्हें माफ कर सकती हूं, लेकिन मेरी एक शर्त है कि मैं तुम्हारे घर आ कर नहीं रहूंगी, तुम्हें मेरे घर आ कर हम सब के साथ रहना होगा.’’

रुद्र खुशीखुशी मान गया और कहने लगा, ‘‘तुम सब के चले जाने के बाद ही मुझे यह एहसास हुआ कि ईंटपत्थरों से बनी इस चारदीवारी में मेरा घर नहीं है, जहां तुम सब हो, जहां मेरा पूरा परिवार रहता है, वही मेरा घर है.’’

Best Hindi Story : किराए की कोख – सुनीता क्यों अपने ही बच्चे से प्यार करने के लिए तरसती थी

Best Hindi Story : पूरे मोहल्ले में सब से खराब माली हालत महेंद्र की ही थी. इस शहर से कोसों दूर एक गांव से 2 साल पहले ही महेंद्र अपनी बीवी सुनीता और 2 बच्चों के साथ इस जगह आ कर बसा था. वह गरीबी दूर करने के लिए गांव से शहर आया था, लेकिन यहां तो उन का खानापीना भी ठीक से नहीं हो पाता था.

महेंद्र एक फैक्टरी में काम करता था और सुनीता घर पर रह कर बच्चों की देखभाल करती थी. बड़ा बेटा 5 साल से ऊपर का हो गया था, लेकिन अभी स्कूल जाना शुरू नहीं हो पाया था.

सुनीता काफी सोचती थी कि बच्चे को किसी अगलबगल के छोटे स्कूल में पढ़ने भेजने लगे, लेकिन चाह कर भी न भेज सकती थी.

जिस महल्ले में सुनीता रहती थी, उस महल्ले में सब मजदूर और कामगार लोग ही रहते थे. ठीक बगल के मकान में रहने वाली एक औरत के साथ सुनीता का उठनाबैठना था.

जब उस को सुनीता की मजबूरी पता लगी, तो उस ने सुनीता को खुद भी काम करने की सलाह दे डाली. उस ने एक घर में उस के लिए काम भी ढूंढ़ दिया.

सुनीता ने जब यह बात महेंद्र को बताई, तो वह थोड़ा हिचकिचाया, लेकिन सुनीता का सोचना ठीक था, इसलिए वह कुछ कह नहीं सका.

सुनीता उस औरत द्वारा बताए गए घर में काम करने जाने लगी. वह काफी बड़ा घर था. घर में केवल 2 लोग ममता और रमन पतिपत्नी ही थे, जो किसी बड़ी कंपनी में काम करते थे.

दोनों का स्वभाव सुनीता के प्रति बहुत नरम था. ममता तो आएदिन सुनीता को तनख्वाह के अलावा भी कुछ न कुछ चीजें देती ही रहती थी.

रमन और ममता के पास किसी चीज की कोई कमी नहीं थी, लेकिन घर में एक भी बच्चा नहीं था.

रविवार के दिन ममता और रमन छुट्टी पर थे. काम खत्म कर सुनीता जाने को हुई, तो ममता ने उसे बुला कर अपने पास बिठा लिया. वह सुनीता से उस के परिवार के बारे में पूछती रही.

सुनीता को ममता की बातों में बड़ा अपनापन लगा, तो वह अचानक ही

उस से पूछ बैठी, ‘‘जीजी, आप के कोई बच्चा नहीं हुआ क्या?’’

ममता ने मुसकरा कर सुनीता की तरफ देखा और धीरे से बोली, ‘‘नहीं, लेकिन तुम यह क्यों पूछ रही हो?’’

सुनीता ने ममता की आवाज को भांप लिया था. वह बोली, ‘‘बस जीजी, ऐसे ही पूछ रही थी. घर में कोई बच्चा न हो, तो अच्छा नहीं लगता न. शायद आप को ऐसा महसूस होता हो.’’

ममता की आंखें उसी पर टिक गई थीं. वह भी शायद इस बात को शिद्दत से महसूस कर रही थी.

ममता बोली, ‘‘तुम सही कहती हो सुनीता. मैं भी इस बात को ले कर चिंता में रहती हूं, लेकिन कर भी क्या सकती हूं? मैं मां नहीं बन सकती, ऐसा डाक्टर कहते हैं…’’

यह कहतेकहते ममता का गला भर्रा गया था. सुनीता भी आगे कुछ कहने की हिम्मत न कर सकी थी. उस के पास शायद इस बात का कोई हल नहीं था.

ममता और रमन शादी से पहले एक ही कंपनी में काम करते थे, जहां दोनों में मुहब्बत हुई और उस के बाद दोनों ने शादी कर ली. कई साल तक दोनों ने बच्चा पैदा नहीं होने दिया, लेकिन बाद में ममता मां बनने के काबिल ही न रही. इस बात को ले कर दोनों परेशान थे.

सुनीता को ममता के घर काम करते हुए काफी दिन हो गए थे. ममता का मन जब भी होता, वह सुनीता को अपने पास बिठा कर बातें कर लेती थी. पर अब सुनीता ममता से बच्चा न होने या होने को ले कर कोई बात नहीं करती थी. दिन ऐसे ही गुजर रहे थे.

एक दिन ममता ने सुनीता को आवाज दी और उसे साथ ले कर अपने कमरे में पहुंच गई. उस ने सुनीता को अपने पास ही बिठा लिया.

सुनीता अपनी मालकिन ममता के बराबर में बैठने से हिचकती थी, लेकिन ममता ने उसे हाथ पकड़ कर जबरदस्ती बिठा ही लिया.

ममता ने सुनीता का हाथ अपने हाथ में लिया और बोली, ‘‘सुनीता, तुम से एक काम आ पड़ा है, अगर तुम कर सको तो कहूं?’’

ममता के लिए सुनीता के दिल में बहुत इज्जत थी, भला वह उस के किसी काम के लिए क्यों मना कर देती. वह बोली, ‘‘जीजी, कैसी बात करती हो? आप कहो तो सही, न करूं तो कहना.’’

ममता ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, ‘‘सुनीता, डाक्टर कहता है कि मैं मां तो बन सकती हूं, लेकिन इस के लिए मुझे किसी दूसरी औरत का सहारा लेना पड़ेगा… अगर तुम चाहो, तो इस काम में मेरी मदद कर सकती हो.’’

ममता की बात सुन कर सुनीता का मुंह खुला का खुला रह गया. उस को यकीन न होता था कि ममता उस से इतने बड़े व्यभिचार के बारे में कह सकती है.

सुनीता साफ मना करते हुए बोली, ‘‘जीजी, मैं बेशक गरीब हूं, लेकिन अपने पति के होते किसी मर्द की परछाईं तक को न छुऊंगी. आप इस काम के लिए किसी और को देख लो.’’

ममता हैरत से बोली, ‘‘अरे बावली, तुम से पराया मर्द छूने को कौन कहता है… यह सब वैसा नहीं है, जैसा तुम सोच रही हो. इस में सिर्फ लेडी डाक्टर के अलावा तुम्हें कोई नहीं छुएगा. यह समझो कि तुम सिर्फ अपनी कोख में बच्चे को पालोगी, जबकि सबकुछ मैं और मेरे पति करेंगे.’’

सुनीता की समझ में कुछ न आया था. सोचा कि भला ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई आदमी औरत को छुए भी नहीं और वह मां बन जाए.

सुनीता को हैरान देख कर ममता बोल पड़ी, ‘‘क्या सोच रही हो सुनीता? तुम चाहो तो मैं सीधे डाक्टर से भी बात करा सकती हूं. जब तुम पूरी तरह संतुष्ट हो जाओ, तब ही तैयार होना.’’

सुनीता हिचकिचाते हुए बोली, ‘‘जीजी, मैं कुछ समझ नहीं पा रही हूं… अगर मैं तैयार हो भी जाऊं, तो मेरे पति इस बात के लिए नहीं मानेंगे.’’

ममता हार नहीं मानना चाहती थी. आखिर उस के मन में न जाने कब से मां बनने की चाहत पल रही थी. वह बोली, ‘‘तुम इस बात की चिंता बिलकुल मत करो. मैं खुद घर आ कर तुम्हारे पति से बात करूंगी और इस काम के लिए तुम्हें इतना पैसा दूंगी कि तुम 2 साल भी काम करोगी, तब भी कमा नहीं पाओगी.’’

सुनीता यह सब तो नहीं चाहती थी, लेकिन ममता से मना करने का मन भी नहीं हो रहा था.

काम से लौटने के बाद सुनीता ने अपने पति से सारी बात कह दी. महेंद्र इस बात को सिरे से खारिज करता हुआ बोला, ‘‘नहीं, कोई जरूरत नहीं है इन लोगों की बातों में आने की. कल से काम पर भी मत जाना ऐसे लोगों के यहां. ये अमीर लोग होते ही ऐसे हैं.

‘‘मैं तो पहले ही तुम्हें मना करने वाला था, लेकिन तुम ने जिद की तो कुछ न कह सका.’’

सुनीता को ऐसा नहीं लगता था कि ममता दूसरे अमीर लोगों की तरह है. वह उस के स्वभाव को पहले भी परख चुकी थी. वह बोली, ‘‘नहीं, मैं यह बात नहीं मान सकती. ऐसी मालकिन मिलना आज के समय में बहुत मुश्किल काम है. आप उन को सब लोगों की लाइन में खड़ा

मत करो.’’

महेंद्र कुछ कहता, उस से पहले ही कमरे के दरवाजे पर किसी के आने की आहट हुई, फिर दरवाजा बजाया गया.

सुनीता को ममता के आने का एहसास था. उस ने झट से उठ कर दरवाजा खोला, तो देखा कि सामने ममता खड़ी थी.

सुनीता के हाथपैर फूल गए, खुशी के मारे मुंह से बात न निकली, वह अभी पागलों की तरह ममता को देख ही रही थी कि ममता मुसकराते हुए बोल पड़ी, ‘‘अंदर नहीं बुलाओगी सुनीता?’’

सुनीता तो जैसे नींद से जागी थी.

वह हड़बड़ा कर बोली, ‘‘हांहां जीजी, आओ…’’ यह कहते हुए वह दरवाजे से एक तरफ हटी और महेंद्र से बोली, ‘‘देखोजी, अपने घर आज कौन आया है… ये जीजी हैं, जिन के घर पर मैं काम करने जाती हूं.’’

महेंद्र ने ममता को पहले कभी देखा तो नहीं था, लेकिन अमीर पहनावे और शक्लसूरत को देख कर उसे समझते देर न लगी. उस ने ममता से दुआसलाम की और उठ कर बाहर चल दिया.

ममता ने उसे जाते देखा, तो बोल पड़ी, ‘‘भैया, आप कहां चल दिए? क्या मेरा आना आप को अच्छा नहीं लगा?’’

महेंद्र यह बात सुन कर हड़बड़ा गया. वह बोला, ‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. मैं तो इसलिए जा रहा था कि आप दोनों आराम से बात कर सको.’’

ममता हंसते हुए बोली, ‘‘लेकिन भैया, मैं तो आप से ही बात करने आई हूं. आप भी हमारे साथ बैठो न.’’

महेंद्र न चाहते हुए भी बैठ गया. ममता का इतना मीठा लहजा देख वह उस का मुरीद हो गया था. उस के दिमाग में अमीरों को ले कर जो सोच थी, वह जाती रही.

सुनीता सामने खड़ी ममता को वहीं बिछी एक चारपाई पर बैठने का इशारा करते हुए बोली, ‘‘जीजी, मेरे घर में तो आप को बिठाने के लिए ठीक जगह भी नहीं, आप को आज इस चारपाई पर ही बैठना पड़ेगा.’’

ममता मुसकराते हुए बोली, ‘‘सुनीता, प्यार और आदर से बड़ा कोई सम्मान नहीं होता, फिर क्या चारपाई और क्या बैड. आज तो मैं तुम्हारे साथ जमीन पर ही बैठूंगी.’’

इतना कह कर ममता जमीन पर पड़ी एक टाट की बोरी पर ही बैठ गई.

सुनीता ने लाख कहा, लेकिन ममता चारपाई पर न बैठी. हार मान कर सुनीता और महेंद्र भी जमीन पर ही बैठ गए. सुनीता ने नजर तिरछी कर महेंद्र को देखा, फिर इशारों में बोली, ‘‘देख लो, तुम कहते थे कि हर अमीर एकजैसा होता है. अब देख लिया.’’

महेंद्र से आदमी पहचानने में गलती हुई थी.

तभी ममता अचानक बोल पड़ी, ‘‘सुनीता, क्या तुम मुझे चाय नहीं पिलाओगी अपने घर की?’’

सुनीता के साथसाथ महेंद्र भी खुश हो गया. एक करोड़पति औरत गरीब के घर आ कर जमीन पर बैठ चाय पिलाने की गुजारिश कर रही थी.

सुनीता तो यह सोच कर चाय न बनाती थी कि ममता उस के घर की चाय पीना नहीं चाहेंगी. जब खुद ममता ने कहा, तो वह खुशी से पागल हो उठी,

महेंद्र और सुनीता की इस वक्त ऐसी हालत थी कि ममता इन दोनों से इन की जान भी मांग लेती, तो भी ये लोग मना न करते.

चाय बनी, तो सब लोग चाय पीने लगे. इतने में सुनीता का छोटा बेटा जाग गया. ममता ने उसे देखा तो खुशी से गोद में उठा लिया और उस से बातें करने में मशगूल हो गई.

महेंद्र और सुनीता यह सब देख कर बावले हुए जा रहे थे. उन्हें ममता में एक अमीर औरत की जगह अपने घर की कोई औरत नजर आ रही थी.

थोड़ी देर बाद ममता ने बच्चे को सुनीता के हाथों में दे दिया और महेंद्र की तरफ देख कर बोली, ‘‘भैया, मैं कुछ बात करने आई थी आप से. वैसे, सुनीता ने आप को सबकुछ बता दिया होगा.

‘‘भैया, मैं आप को यकीन दिलाती हूं कि सुनीता को सिर्फ लेडी डाक्टर के अलावा कोई और नहीं छुएगा. यह इस तरह होगा, जैसे कोयल अपने अंडे कौए के घोंसले में रख देती है और बच्चे अंडों से निकल कर फिर से कोयल के हो जाते हैं, अगर आप…’’

महेंद्र ममता की बात पूरी होने से पहले ही बोल पड़ा, ‘‘बहनजी, आप जैसा ठीक समझें वैसा करें. जब सुनीता को आप अपना समझती हैं, तो फिर मुझे किसी बात से कोई डर नहीं. इस का बुरा थोड़े ही न सोचेंगी आप.’’

ममता खुशी से उछल पड़ी. सुनीता महेंद्र को मुंह फाड़े देखे जा रही थी. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि महेंद्र इतनी जल्दी हां कह सकता है. लेकिन महेंद्र तो इस वक्त किसी और ही फिजा में घूम रहा था. कोई करोड़पति औरत उस के घर आ कर झोली फैला कर उस से कुछ मांग रही थी, फिर भला वह कैसे मना कर देता.

ममता हाथ जोड़ कर महेंद्र से बोली, ‘‘भैया, मैं आप का यह एहसान जिंदगीभर नहीं भूलूंगी,’’ यह कहते हुए ममता ने अपने मिनी बैग से नोटों की एक बड़ी सी गड्डी निकाल कर सुनीता के हाथों में पकड़ा दी और बोली, ‘‘सुनीता, ये पैसे रख लो. अभी और दूंगी. जो इस वक्त मेरे पास थे, वे मैं ले आई.’’

सुनीता ने हाथ में पकड़े नोटों की तरफ देखा और फिर महेंद्र की तरफ देखा. महेंद्र पहले से ही सुनीता के हाथ में रखे नोटों को देख रहा था.

आज से पहले इन दोनों ने कभी इतने रुपए नहीं देखे थे, लेकिन महेंद्र कम से कम ममता से रुपए नहीं लेना चाहता था, वह बोला, ‘‘बहनजी, ये रुपए हम लोग नहीं ले सकते. जब आप हमें इतना मानती हैं, तो ये रुपए किस बात के लिए?’’

ममता ने सधा हुआ जवाब दिया, ‘‘नहीं भैया, ये तो आप को लेने ही पड़ेंगे. भला कोई और यह काम करता, तो वह भी तो रुपए लेता, फिर आप को क्यों न दूं?

‘‘और ये रुपए दे कर मैं कोई एहसान थोड़े ही न कर रही हूं.’’

इस के बाद ममता वहां से चली गई. महेंद्र ने ममता के जाने के बाद रुपए गिने. पूरे एक लाख रुपए थे. महेंद्र और सुनीता दोनों ही आज ममता के अच्छे बरताव से बहुत खुश थे. ऊपर से वे एक लाख रुपए भी दे गईं. ये इतने रुपए थे कि 2 साल तक दोनों काम करते, तो भी इतना पैसा जोड़ न पाते.

दोनों के अंदर आज एक नया जोश था. अब न किसी बात से एतराज था और न किसी बात पर कोई सवाल.

जल्द ही सुनीता को ममता ने डाक्टर के पास ले जा कर सारा काम निबटवा दिया. वह सुनीता के साथ उस के पति महेंद्र को भी ले गई थी, जिस से उस के मन में कोई शक न रहे.

ममता ने अब सुनीता से घर का काम कराना बंद कर दिया था. घर के काम के लिए उस ने एक दूसरी औरत को रख लिया था. सुनीता को खाने के लिए ममता ने मेवा से ले कर हर जरूरी चीज अपने पैसों से ला कर दे दी थी. साथ ही, एक लाख रुपए और भी नकद दे दिए थे.

ममता नियमित रूप से सुनीता को देखने भी आती थी. उस ने महेंद्र और सुनीता से उस के घर चल कर रहने के लिए भी कहा था, लेकिन महेंद्र ने वहां रहने के बजाय अपने घर में ही रहना ठीक समझा.

जिस समय सुनीता अपने पेट में बच्चे को महसूस करने लगी थी, तब से न जाने क्यों उसे वह अपना लगने लगा था. वह उसे सबकुछ जानते हुए भी अपना मान बैठी थी.

जब बच्चा होने को था, तब एक हफ्ता पहले ही सुनीता को अस्पताल में भरती करा दिया गया था. जिस दिन बच्चा हुआ, उस दिन तो ममता सुनीता को छोड़ कर कहीं गई ही न थी. सुनीता को बेटा हुआ था.

ममता ने सुनीता को खुशी से चूम लिया था. उस की खुशी का ठिकाना नहीं था. लेकिन सुनीता को मन में अजीब सा लग रहा था. उस का मन उस बच्चे को अपना मान रहा था.

अस्पताल से निकलने के बाद ममता ने सुनीता को कुछ दिन अपने पास भी रखा था. उस के बाद उस ने सुनीता को और 50 हजार रुपए भी दिए.

सुनीता अपने घर आ गई, लेकिन उस का मन न लगता था. जो बच्चा उस ने अपनी कोख में 9 महीने रखा, आज वह किसी और का हो चुका था. पैसा तो मिला था, लेकिन बच्चा चला गया था.

सुनीता का मन होता था कि बच्चा फिर से उस के पास आ जाए, लेकिन अब ऐसा नहीं हो सकता था. उस की कोख किसी और के बच्चे के लिए किराए पर जो थी.

Emotional Story : झांसी की रानी – मां की आंखों में क्यों दर्द झलकता था?

Emotional Story : ‘‘पापा, आप हमेशा झांसी की रानी की तसवीर के साथ दादी का फोटो क्यों रखते हैं?’’ नवेली ने अपने पापा सुप्रतीक से पूछा था.

‘‘तुम्हारी दादी ने भी झांसी की रानी की तरह अपने हकों के लिए तलवार उठाई थी, इसलिए…’’ सुप्रतीक ने कहा. सुप्रतीक का ध्यान मां के फोटो पर ही रहा. चौड़ा सूना माथा, होंठों पर मुसकराहट और भरी हुई पनियल आंखें. मां की आंखों को उस ने हमेशा ऐसे ही डबडबाई हुई ही देखा था. ताउम्र, जो होंठों की मुसकान से हमेशा बेमेल लगती थी. एक बार सुप्रतीक ने देखा था मां की चमकती हुई काजल भरी आंखों को, तब वह 10 साल का रहा होगा. उस दिन वह जब स्कूल से लौटा, तो देखा कि मां अपनी नर्स वाली ड्रेस की जगह चमकती हुई लाल साड़ी पहने हुए थीं और उन के माथे पर थी लाल गोल बिंदी. मां को निहारने में उस ने ध्यान ही नहीं दिया कि कोई आया हुआ है.

‘सुप्रतीक देखो ये तुम्हारे पापा,’ मां ने कहा था.

‘पापा, मेरे पापा,’ कह कर सुप्रतीक ने उन की ओर देखा था. इतने स्मार्ट, सूटबूट पहने हुए उस के पापा. एक पल को उसे अपने सारे दोस्तों के पापा याद आ गए, जिन्हें देख वह कितना तरसा करता था.

‘मेरे पापा तो उन सब से कहीं ज्यादा स्मार्ट दिख रहे हैं…’ कुछ और सोच पाता कि पापा ने उसे बांहों में भींच लिया.

‘ओह, पापा की खुशबू ऐसी होती है…’

सुप्रतीक ने दीवार पर टंगे मांपापा के फोटो की तरफ देखा, जैसे बिना बिंदी मां का चेहरा कुछ और ही दिखता है, वैसे ही शायद मूंछें उगा कर पापा का चेहरा भी बदल गया है. मां जहां फोटो की तुलना में दुबली लगती थीं, वहीं पापा सेहतमंद दिख रहे थे. सुप्रतीक देख रहा था मां की चंचलता, चपलता और वह खिलखिलाहट. हमेशा शांत सी रहने वाली मां का यह रूप देख कर वह खुश हो गया था. कुछ पल को पापा की मौजूदगी भूल कर वह मां को देखने लगा. मां खाना लगाने लगीं. उन्होंने दरी बिछा कर 3 प्लेटें लगाईं.

‘सुधा, बेटे का क्या नाम रखा है?’ पापा ने पूछा था.

‘सुप्रतीक,’ मां ने मुसकराते हुए कहा.

‘यानी अपने नाम ‘सु’ से मिला कर रखा है. मेरे नाम से कुछ नहीं जोड़ा?’ पापा हंसते हुए कह रहे थे.

‘हुं, सुधा और घनश्याम को मिला कर भला क्या नाम बनता?’ सुप्रतीक सोचने लगा.

‘आप यहां होते, तो हम मिल कर नाम सोचते घनश्याम,’ मां ने खाना लगाते हुए कहा था.

‘घनश्याम हा…हा…हा… कितने दिनों के बाद यह नाम सुना. वहां सब मुझे सैम के नाम से जानते हैं. अरे, तुम ने अरवी के पत्ते की सब्जी बनाई है. सालों हो गए हैं बिना खाए,’ पापा ने कहा था. सुप्रतीक ने देखा कि मां के होंठ ‘सैमसैम’ बुदबुदा रहे थे, मानो वे इस नाम की रिहर्सल कर रही हों. सुप्रतीक ने अब तक पापा को फोटो में ही देखा था. मां दिखाती थीं. 2-4 पुराने फोटो. वे बतातीं कि उस के पापा विदेश में रहते हैं. लेकिन कभी पापा की चिट्ठी नहीं आई और न ही वे खुद. फोनतो तब होते ही नहीं थे. मां को उस ने हमेशा बहुत मेहनत करते देखा था. एक अस्पताल में वे नर्स थीं, घरबाहर के सभी काम वे ही करती थीं. जिस दिन मां की रात की ड्यूटी नहीं होती थी, वह देखता कि मां देर रात तक खिड़की के पास खड़ी आसमान को देखती रहती थीं. सुप्रतीक को लगता कि मां शायद रोती भी रहती थीं. उस दिन खाना खाने के बाद देर तक वे तीनों बातें करते रहे थे. सुप्रतीक ने उस पल में मानो जमाने की खुशियां हासिल कर ली थीं. सुबह उठा, तो देखा कि पापा नहीं थे.

‘मां, पापा किधर हैं?’ सुप्रतीक ने हैरानी से पूछा था.

‘तुम्हारे पापा रात में ही होटल चले गए, जहां वे ठहरे हैं.’ मां का चेहरा उतरा हुआ लग रहा था. माथे की लकीरें गहरी दिख रही थीं. आंखों में काजल की जगह फिर पानी था. थोड़ी देर में फिर पापा आ गए, वैसे ही खुशबू से सराबोर और फ्रैश. आते ही उन्होंने सुप्रतीक को सीने से लगा लिया. आज उस ने भी कस कर भींच लिया था उन्हें, कहीं फिर न चले जाएं.

‘पापा, अब आप भी हमारे साथ रहिएगा,’ सुप्रतीक ने कहा था.

‘मैं तुम्हें अपने साथ अमेरिका ले जाऊंगा. हवाईजहाज से. वहीं अच्छे स्कूल में पढ़ाऊंगा. बड़ा आदमी बनाऊंगा…’ पापा बोल रहे थे. सुप्रतीक उस सुख के बारे में सोचसोच कर खुश हुआ जा रहा था.

‘पर, तुम्हारी मम्मी नहीं जा पाएंगी, वे यहीं रहेंगी. तुम्हारी एक मां वहां पहले से हैं, नैंसी… वे होटल में तुम्हारा इंतजार कर रही हैं,’ पापा को ऐसा बोलते सुन सुप्रतीक जल्दी से हट कर सुधा से सट कर खड़ा हो गया था.

‘मैं कल से ही तुम्हारे आने की वजह समझने की कोशिश कर रही थी. एक पल को मैं सच भी समझने लगी थी कि तुम सुबह के भूले शाम को घर लौटे हो. जब तुम्हारी पत्नी है, तो बच्चे भी होंगे. फिर क्यों मेरे बच्चे को ले जाने की बात कर रहे हो?’ सुधा अब चिल्लाने लगी थी, ‘एक दिन अचानक तुम मुझे छोड़ कर चले गए थे, तब मैं पेट से थी. तुम्हें मालूम था न?

‘एक सुबह अचानक तुम ने मुझ से कहा था कि तुम शाम को अमेरिका जा रहे हो, तुम्हें पढ़ाई करनी है. शादी हुए बमुश्किल कुछ महीने हुए थे. तुम्हारी दहेज की मांग जुटाने में मेरे पिताजी रास्ते पर आ गए थे. लेकिन अमेरिका जाने के बाद तुम ने कभी मुझे चिट्ठी नहीं लिखी. ‘मैं कितना भटकी, कहांकहां नहीं गई कि तुम्हारे बारे में जान सकूं. तुम्हारे परिवार वालों ने मुझे ही गुनाहगार ठहराया. अब क्यों लौटे हो?’ मां अब हांफ रही थीं. सुप्रतीक ने देखा कि पापा घुटनों के बल बैठ कर सिर झुकाए बोलने लगे थे, ‘सुधा, मैं तुम्हारा गुनाहगार हो सकता हूं. सच बात यह है कि मुझे अमेरिका जाने के लिए बहुत सारे रुपयों की जरूरत थी और इसी की खातिर मैं ने शादी की. तुम मुझे जरा भी पसंद नहीं थीं. उस शादी को मैं ने कभी दिल से स्वीकार ही नहीं किया. ‘बाद में मैं ने नैंसी से शादी की और अब तो मैं वहीं का नागरिक हो गया हूं. लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद हम मांबाप नहीं बन सके. यह तो मेरा ही खून है. मुझे मेरा बेटा दे दो सुधा…’

अचानक काफी बेचैन लगने लगे थे पापा. ‘देख रहा हूं कि तुम इसे क्या सुख दे रही हो… सीधेसीधे मेरा बेटा मेरे हवाले करो, वरना मुझे उंगली टेढ़ी करनी भी आती है.’ सुप्रतीक देख रहा था उन के बदलते तेवर और गुस्से को. वह सुधा से और चिपट गया. तभी उस के पापा पूरी ताकत से उसे सुधा से अलग कर खींचने लगे. उस की पकड़ ढीली पड़ गई और उस के पापा उसे खींच कर घर से बाहर ले जाने लगे कि अचानक मां रसोई वाली बड़ी सी छुरी हाथ में लिए दौड़ती हुई आईं और पागलों की तरह पापा पर वार करने लगीं. पापा के हाथ से खून की धार निकलने लगी, पर उन्होंने अभी भी सुप्रतीक का हाथ नहीं छोड़ा था. चीखपुकार सुन कर अड़ोसपड़ोस से लोग जुटने लगे थे. किसी ने इस आदमी को देखा नहीं था. लोग गोलबंद होने लगे, पापा की पकड़ जैसे ही ढीली हुई, सुप्रतीक दौड़ कर सुधा से लिपट गया. लाल साड़ी में मां वाकई झांसी की रानी ही लग रही थीं. लाललाल आंखें, गुस्से से फुफकारती सी, बिखरे बाल और मुट्ठी में चाकू. सुप्रतीक ने देखा कि सड़क के उस पार रुकी टैक्सी में एक गोरी सी औरत उस के पापा को सहारा देते हुए बिठा रही थी.

‘‘नवेली, तुम्हारी दादी बहुत बहादुर और हिम्मत वाली थीं,’’ सुप्रतीक ने अपनी बेटी से कहा. सुप्रतीक की निगाहें फिर से मां के फोटो पर टिक गई थीं.

Divorce : अरबोंखरबों के तलाक – जब शादी टूटी तो हुईं अमीरों की जेबें हल्कीं

Divorce :  हाल में भारत समेत दुनियाभर में चर्चित लोगों के तलाक और उस के निपटान में दी जाने वाली एलिमनी रकम खासी चर्चा में रही है. जौनी डेप और एम्बर हर्ड की एलिमनी रकम पर तो लंबीचौड़ी बहस चली. सैलिब्रिटियों के तलाक और एलिमनी पर होहल्ला होता रहता है. पर यहां बात दुनिया के सब से अमीर लोगों के तलाक की जिन कि जेब तलाक लेने के बाद जरुर ढीली हुई.

• बिल और मेलिंडा गेट्स का तलाक सब से ज्यादा चर्चित रहा. 2021 में हुए इस तलाक में मेलिंडा गेट्स को लगभग 66 ख़रब 87 करोड़ 21 लाख रुपए की एलीमनी मिली, जो अब तक की सब से बड़ी रकम है.

• इस से पहले, 2019 में जेफ बेजोस और मैकेंजी बेजोस के तलाक में 38 बिलियन डौलर यानी 33 खरब 43 करोड़ 60 लाख रुपए की एलिमनी तय हुई थी.

• 1999 में एलेक और जोसेलिन विल्डेनस्टीन के तलाक में 3.8 बिलियन डौलर यानी 3,30,16,49,08,740 3 खरब 30 अरब 16 करोड़ 49 लाख रुपये की एलीमनी देनी पड़ी.

• रूपर्ट मर्डोक व अन्ना मर्डोक के तलाक में लगभग 1 खरब 47 अरब 64 करोड़ रुपए की रकम देने की बात सामने आई थी.

• 1997 में क्रेग मैक्को और वेंडी मैक्को के तलाक में भी 460 मिलियन डौलर यानी लगभग 39 अरब 95 करोड़ 30 लाख 24 हजार रुपए की एलिमनी दर्ज की गई.

• भारत में भी 2014 में, उद्योगपति विजय माल्या और उन की पत्नी समीरा के तलाक में 40 मिलियन डौलर यानी आज के हिसाब से 350 करोड़ रुपए की एलिमनी तय हुई थी.

Chhaava : अधूरे इतिहास पर बनी मूवी, विक्की कौशल व रश्मिका की कमजोर एक्टिंग, केवल अक्षय खन्ना में दिखा दम

Chhaava : रेटिंग- 2 स्टार

हमेशा कहा जाता है कि अधूरा ज्ञान सब से ज्यादा खतरनाक होता है और इतिहास को ले कर दिया गया अधूरा सत्य हमेशा विनाशक ही होता है. मगर हमारे फिल्मकार इतिहास को परदे पर सही ढंग से चित्रित न करने का संकल्प ले चुके हैं. छत्रपती शिवाजी महाराज के पुत्र और स्वराज्य की रक्षा के लिए दृढ़संकल्प रहे संभाजी महाराज के जीवन व कृतित्व पर मराठी भाषा में शिवाजी सावंत ने एक उपन्यास ‘छावा’ लिखा था. इसी उपन्यास को आधार बना कर अब फिल्मकार लक्ष्मण उतेकर हिंदी भाषा में ऐतिहासिक बायोपिक फिल्म ‘छावा’ ले कर आए हैं. जो कि 14 फरवरी से हर सिनेमाघर में रिलीज हो चुकी है.

यह फिल्म वीरता और बलिदान के साथसाथ विश्वासघात के दर्द और स्वराज की निरंतर खोज की कहानी है. कैमरामैन से फिल्म निर्देशक बने लक्ष्मण उतेकर ने 2014 में मराठी फिल्म ‘तपाल’ का निर्देशन किया था. उस के बाद 2017 में मराठी में ही ‘लालबाग ची रानी’ का निर्देशन किया. उस के बाद ‘लुका छिपी’, ‘मिमी’, ‘जरा हटके जरा बच के’ जैसी हिंदी भाषा की फिल्में निर्देशित कीं. और अब लक्ष्मण उतेकर ने पहली बार ‘छावा’ नामक ऐतिहासिक फिल्म का निर्देशन किया है.

हम ने जो इतिहास की किताबें पढ़ी तथा ‘संभाजी पर 6 भाषाओं में प्रकाशित लेखक विश्वास पाटिल की किताब ‘संभाजी’ पर ध्यान दें तो फिल्मकार लक्ष्मण उतेकर ने अधूरा व कंफ्यूज्ड करने वाला इतिहास परोसते हुए सिर्फ संभाजी की वीरता को ही चित्रित करने पर अपना सारा ध्यान लगाया है.

यूं तो फिल्म के निर्माताओं की तरफ से फिल्म के शुरू होते ही ‘अस्वीकरण’ दिया गया है कि उन्होंने किसी धर्म या इंसान का अपमान करने के लिए कोई चीज नहीं रखी है. पर फिल्म को मनोरंजक बनाने के मकसद से सिनेमाई स्वतंत्रता लेते हुए कुछ फेर बदल किए हैं. यह पहली बार हुआ है जब लंबेचौड़े डिस्क्लेमर/अस्वीकरण को आवाज भी दी गई है, वरना अबतक होता यह था कि निर्माता ‘अस्वीकरण’ परदे पर दे देते थे, जिसे दर्शक पढ़ नहीं पाता था.

पहली बार ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ ने अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए निर्माता से डिस्क्लेमर को पढ़ कर सुनाने का भी आदेश दे रखा है. पर क्या किसी भी ऐतिहासिक किरदार या घटनाक्रम के साथ ऐसा करना उचित है?

फिल्म की कहानी औरंगजेब (अक्षय खन्ना) के बढ़ते अत्याचारों व छत्रपति शिवाजी महाराज के बेटे संभाजी के जन्म से शुरू होती है. फिर फिल्म की कहानी छत्रपति शिवाजी महाराज के निधन के बाद शुरू होती है. फिर जनवरी 1681 के काल में शुरू होती है, जब मुगल बादशाह औरंगजेब को मराठा राजा छत्रपति शिवाजी महाराज के निधन की खबर मिलती है. औरंगजेब और मुगल राहत महसूस कर रहे थे और खुश थे कि वह आखिरकार दक्खन (दक्कन) के मराठा साम्राज्य पर कब्जा कर सकते हैं. लेकिन तभी छत्रपति संभाजी महाराज उर्फ छावा (विक्की कौशल) मुगल साम्राज्य के सब से कीमती शहर बुरहानपुर पर हमला करते हैं और मुगलों को हराने के साथ ही इस शहर को बरबाद कर यहां की सारी संपत्ति ले कर रायगढ़ चले जाते हैं.

संभाजी, औरंगजेब को दक्खन पर अपनी शैतानी नजर न डालने की चेतावनी देते हैं. यह खबर सुनते ही औरंगजेब आगबबूला हो जाता है और वह अपनी पूरी सेना के साथ संभाजी महाराज के वर्चस्व को खत्म करने के लिए निकल पड़ता है.

इधर 1682 और 1688 तक दोनों पक्षों के बीच कई लड़ाइयां हुईं जबकि मुगल, मराठों के कब्जे वाले किलों पर नियंत्रण चाहते थे, लेकिन वे सफल नहीं हुए. सत्ता में आने के दो साल बाद, संभाजी उर्फ संभुराजे ने प्रभावशाली परिवारों के लगभग 24 सदस्यों को मार डाला. जब उन्हें पता चला कि कुछ लोग उन की हत्या की साजिश रच रहे थे. 1685 तक, मुगलों ने संभाजी को पीछे धकेल दिया था और उन के गढ़ों पर कब्जा कर लिया था.

1 फरवरी, 1689 को, औरंगजेब ने संभाजी की सौतेली मां सोयराबाई के रिश्तेदारों व संभाजी के दरबार से जुड़े शिर्के और अन्नाजी दत्तो की मदद से धोखे से अपनी फौज के माध्यम से संभाजी को युद्ध के मैदान में गिरफ्तार किया. फिर उन्हें बंदी बना कर भयानक यातनाएं दीं. उन के सभी नाखून उखाड़ दिए गए. दोनों आंखें व जीभ कटवा दी गईं. पर संभाजी ने आह नहीं भरी. औरंगजेब को उन के अंदर दर्द नजर नहीं आया. संभाजी देश और धर्म की रक्षा के लिए मौत का सामना करने में अपनी अविश्वसनीय बहादुरी का परिचय दिया. वह स्वराज्य से समझौता करने को तैयार न हुए. उन्होंने औरंगजेब के प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया. अंततः संभाजी की 11 मार्च, 1689 को मृत्यु हो गई.

फिल्म की शुरूआत के संवाद सुनते ही दर्शक कंफ्यूज्ड हो जाता है कि वह ऐतिहासिक फिल्म ‘छावा’ देखने आया है या कोई मैथोलौजिकल फिल्म देखने आया है. संभाजी के जन्म से पहले गीता के श्लोक का हिंदी अनुवाद दोहराया जाता है कि “जबजब अधर्म व अत्याचार बढ़ता है…’’ इस के बाद ही संभाजी का जन्म होता है.

इतना ही नहीं फिल्म में संभाजी को भगवान कृष्ण तक बता दिया गया है. संभाजी के दरबारी कवि ‘कवि कलश’ का तो मानना है कि संभाजी भगवान कृष्ण हैं और वह स्वयं सुदामा हैं. हकीकत यह है कि फिल्मकार लक्ष्मण उतेकर खुद कंफ्यूज्ड है. एक तरफ वह संभाजी को भगवान कृष्ण भी कहला रहे हैं, तो दूसरी तरफ वह उन की वीरता का प्रदर्शन भी कर रहे हैं. कहानी व पटकथा में काफी झोल है.

फिल्मकार लक्ष्मण उतेकर इतिहास, ऐतिहासिक तथ्यों और संभाजी के व्यक्तित्व उन की निडरता व वीरता के बीच समुचित सामंजस्य बैठाने में बुरी तरह से असफल रहे हैं. मुगल शासक औरंगजेब एक अति खूबसूरत कोबरा सांप की तरह था, पर ‘छावा’ में औरंगजेब को बहुत ही अजीबोगरीब गेअटप दिया गया है.

इतिहासकार विश्वास पाटिल के शब्दों में कहें तो कई दृश्यों में लक्ष्मण उतेकर का औरंगजेब किसी जामा मस्जिद के सामने भीख मांगने वाला भिखारी नजर आता है. हम ने जो इतिहास के पन्नों में पढ़ा है, उस के अनुसार संभाजी महाराज के अति करीबियों ने ही उन्हें धोखा दिया था, तभी उन्हें औरंगजेब के सिपाही कैद करने में सफल हुए थे. उस के बाद औरंगजेब ने संभाजी को बहुत ही कठोर यातनांए दी थीं. पर संभाजी अपने स्वराज्य के लिए टूटे नहीं थे.

अंततः 11 मार्च 1989 के दिन औरंगजेब ने संभाजी को मौत देते हुए उन के शरीर के कई टुकड़े कर फिकवाते हुए घोषणा करवाई थी कि जो इंसान संभाजी के शरीर के टुकड़ों को एकत्र कर उन का अंतिमसंस्कार करेगा, उस के साथ अच्छा नहीं होगा. लेकिन उस गांव के गायकवाड़ परिवार ने निडर हो कर इस काम को अजाम दिया था. उस के बाद औरंगजेब ने रायगढ़ पर हमला किया.

बाद में संभाजी की पत्नी येसुबाई व संभाजी के बेटे साहू को 29 साल तक बंदी बना कर रखा था. पर फिल्म में संभाजी को कुछ यातनाएं देने के दृश्यों के बाद उन की मौत की बात कह कर फिल्म खत्म हो जाती है. फिल्म में औरंगजेब की बेटी जीनत को जरूरत से ज्यादा तवज्जों दी गई है. संभाजी को क्रूरतम यातनाएं देने का आदेश औरंगजेब देते हैं, पर फिल्मकार ने यह सारे आदेश औरंगजेब की बेटी जीनत से दिलवाए हैं, और उस वक्त औरंगजेब अपनी बेटी के आगे लाचार नजर आते हैं.

फिल्म में युद्ध के ही दृश्यों की भरमार है. बतौर निर्देशक लक्ष्मण उतेकर कुछ जगहों पर काफी निराश करते हैं. जिस तरह से उन्होंने विक्की को संभाजी महाराज के रूप में पेश किया है, उस में कई कमियां हैं. कई जगहों पर विक्की का चीखनाचिल्लाना और उन का गुस्सा बनावटी लगता है. वहीं कुछ सीन ऐसे हैं जिन्हें देख कर आप के रोंगटे खड़े हो जाएंगे. संभाजी जैसा वीर बहुत कम ही हुए हैं. संभाजी ने अपने देश/स्वराज के लिए जो यातना सही, वह दिल दहला लेने वाली हैं. अगर छोटीछोटी बातों पर थोड़ा और ध्यान दिया जाता तो शायद यह फिल्म परफैक्ट हो सकती थी.

फिल्मकार लक्ष्मण उतेकर विक्की कौशल के संभाजी के किरदार के अलावा किसी भी अन्य किरदार के साथ न्याय करने में सफल नहीं रहे. येसूबाई का किरदार महज सजावटी गुड़िया के अलावा कुछ नहीं है. फिल्म की गति काफी धीमी है. इसे एडिटिंग टेबल पर कसे जाने की जरूरत थी.

कुछ एक्शन/युद्ध दृश्य जरूर अच्छे बन पड़े हैं. ग%E

Menstruation Cups : मेंस्ट्रुअल कप के गलत यूज से खतरे

Menstruation Cups : मेंस्ट्रुअल कप महिलाओं के लिए पीरियड्स के दौरान एक आरामदायक, सस्ता, इको फ्रैंडली प्रोडक्ट है मगर इस के प्रति गलत जानकारियों या कम जानकारियों ने दिक्कतें भी खड़ी की हैं.

हाल ही में ब्रिटेन में एक मामला सामने आया, जहां एक 30 साल की महिला को महीनों तक पेट दर्द और पेशाब में खून की समस्या हुई. उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह क्यों हो रहा है, लेकिन बाद में डाक्टरों ने पाया कि उस का मेंस्ट्रुअल कप गलत तरीके से यूज किया था जिस से किडनी को मूत्राशय से जोड़ने वाली नाली (मूत्रवाहिनी) पर दबाव पड़ रहा था, जिस से उसे पेशाब निकलने में दिक्कत हो रही थी. यह एक अलग तरह का मामला है, लेकिन यह बताता है कि मेंस्ट्रुअल कप का सही उपयोग कितना जरूरी है.

कई महिलाएं मेंस्ट्रुअल कप को बिना सही जानकारी के इस्तेमाल करने लगती हैं, जिस से गलत फिटिंग, संक्रमण और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है. कुछ मुख्य बातें जो ध्यान में रखनी चाहिए:

• सही साइज चुनें– सभी के शरीर की बनावट अलग होती है, इसलिए सही साइज का कप चुनना जरूरी है.

• इस्तेमाल का सही तरीका सीखें – इसे कैसे मोड़ना, डालना और हटाना है, यह अच्छे से समझना चाहिए.

• हाइजीन का ख्याल रखें – मेंस्ट्रुअल कप को हर बार इस्तेमाल से पहले और बाद में अच्छे से साफ करना जरूरी है.

• शरीर के संकेतों को नजरअंदाज न करें – अगर कप लगाने के बाद असहज महसूस हो, पेशाब में दिक्कत हो या दर्द हो, तो तुरंत डाक्टर से सलाह लें.

Artificial Intelligence : एआई से प्रोफैशनल जौब्स बचेंगी या जाएंगी?

Artificial Intelligence : आर्टिफिशियल इंटेलिजैंस को ले कर दुनिया भर में डर का हौव्वा खड़ा किया जा रहा है. माइक्रोसौफ्ट के को-फाउंडर बिल गेट्स ने भी कहा कि एआई अधिकांश नौकरियों को खत्म कर देगा और ग्लोबल इकोनोमी को पूरी तरह बदल देगा.

सवाल यह कि किसी टैकनोलौजी के आने से नौकरियों और अर्थव्यवस्था पर असर पड़ता है? जवाब है हां. दुनियाभर में रेडियो, कंप्यूटर, टेलीविजन, मोबाइल क्रान्ति हुई. इन के आने से फर्क पड़ा, कुछ तरह की नौकरियां खत्म हुईं पर कुछ तरह की नौकरियां पैदा भी हुईं. अर्थव्यवस्था उसी हिसाब से चली और ग्लोबल हुई. पर सभी पेशे खत्म हो जाएंगे यह मानना अतिश्योक्ति है.

जानिए जिन पेशों के खत्म होने की बात की जा रही है वह खत्म होंगे या नहीं –

कोडर्स: एआई को हमारी जरूरत

आप सोच रहे होंगे कि प्रोग्रामर्स की नौकरी सब से पहले खतरे में आएगी. पर ऐसा नहीं है. हालांकि एआई कोड लिख सकता है, लेकिन वह परफैक्ट नहीं है. गलतियों को सुधारने, मौनिटर करने के लिए इंसानों की जरूरत होगी. अभी भी हमें एआई की नहीं, एआई को हमारी जरूरत है.

एनर्जी एक्सपर्ट : एआई के लिए बहुत जटिल है यह क्षेत्र

तेल, परमाणु, नवीकरणीय ऊर्जा. यह क्षेत्र बहुत ही रणनीतिक और जटिल है, जिसे पूरी तरह मशीनों पर छोड़ना संभव नहीं. इंजीनियर्स, रिसर्चर्स और टैकनीशियनों की जरूरत हमेशा रहेगी, ताकि वे इंफ्रास्ट्रक्चर को संभाल सकें, चैलेंजेस को समझ सकें और नई खोजों को कर सकें.

बायोलौजिस्ट : इंसान की जरूरत

एआई बीमारियों का निदान कर सकता है, डीएनए सीक्वेंस का विश्लेषण कर सकता है और डाक्टर्स से बेहतर तरीके से बीमारियों का पता लगा सकता है मगर यह वह बिना इंसानी समझ और क्रिएटिविटी के नहीं कर सकता.

बात क्रिएटिव फील्ड की आती है तो एआई को सब से ज्यादा मारक बताया जा रहा है. मगर एआई वही जानकारी देता है जो आप चाहते हैं वो भी किसी जानकारी के आधार पर जो इंसान ने जुटाई हो. सही या गलत की समझ न होने के चलते अभी भी वह इंसानों पर ही निर्भर है.

Apaar ID : क्या है ‘अपार’ आईडी ?

Apaar ID : सरकार को लगता है कि औन लाइन व्यवस्था से ही सब ठीक हो सकता है. शिक्षा मंत्रालय स्कूली छात्रों के लिए ‘अपार’ आईडी बनाने का काम कर रही है. इस अभियान को तेज करने के लिए उत्तर प्रदेश में 11 फरवरी को ‘अपार’ दिवस मनाया गया. इस दिन तक उत्तर प्रदेश में कक्षा 9 से 12 के छात्रों की 50 फीसदी ‘अपार’ आईडी बन चुकी थी.

महानिदेशक स्कूल शिक्षा कंचन वर्मा ने सभी बीएसए यानि बेसिक शिक्षा अधिकारियों को कहा है कि जल्द से जल्द ‘अपार’ आईडी बनाने का काम पूरा करें. ‘अपार’ यानि औटोमेटेड परमानेंट एकेडमिक अकाउंट में छात्रों का पूरा विवरण दर्ज किया जा रहा है. यह आईडी सरकारी और प्राइवेट दोनों ही स्कूलों के छात्रों की बन रही है.

अपार आईडी में छात्र का नाम, लिंग, जन्मतिथि, पता, पेरैंट्स का नाम, दोनों के आधार नंबर, स्कूल का विवरण, फोटो, मार्कशीट, सर्टिफिकेट, डिग्री, डिप्लोमा, प्रमाण पत्र, कैरेक्टर सर्टिफिकेट, स्कूल ट्रांसफर सर्टिफिकेट रहेंगे. इन में कहीं अंतर होने पर ‘अपार’ आईडी नहीं बनेगी.

सरकार का तर्क है कि ‘अपार’ आईडी के जरिए सभी छात्रों की शैक्षणिक जानकारी एक जगह पर उपलब्ध होगी. यह आधार कार्ड की तरह ही एक तरह का आईडी है. इस में छात्रों की मार्कशीट, डिग्री, सर्टिफिकेट और अन्य उपलब्धियां डिजिटल रूप से सुरक्षित रहेगी.

सरकार के तुगलकी फैसलों के चलते लोगों के पास तमाम तरह की आईडी और कार्ड बन गए हैं. इस तरह के विवरण औनलाइन दर्ज होने से गोपनीयता भंग होती है. इतनी सारी आईडी रखना सिर दर्द है. सरकार न नौकरी दे पा रही न परीक्षाओं में नकल रोक पा रही बस आईडी पर आईडी बना रही है.

Gandhi Family : राहुल गांधी के धर्म पर हायहाय क्यों

Gandhi Family : जात निकाला यानी जाति से निष्कासित कर देना या हुक्कापानी बंद कर देना तो देश में आम बात है धर्म परिवर्तन भी उतनी ही आम बात है लेकिन किसी को धर्म से ही निष्कासित कर देने की धौंस पहली दफा आम हुई है.

एक शंकराचार्य अविमुक्तेश्वारानन्द जिन्हें संत बिरादरी के लोग ही स्वयं भू शंकराचार्य कहते हैं ने कहा है कि राहुल गांधी माफी मांगें नहीं तो उन्हें हिंदू धर्म से निष्कासित कर दिया जाएगा. राहुल ने हाथरस रेप पीड़िता की वकालत करते मनु स्मृति और संविधान की तुलना यह कहते कर दी थी कि बलात्कारी खुलेआम घूमें यह मनुस्मृति कहती है.

धर्म के ठेकेदारों को तकलीफ संविधान से भी रहती है और राहुल गांधी के धर्म को ले कर भी उन के पेट में मरोड़े अकसर उठा करती हैं. इस शंकराचार्य की गिनती कांग्रेसी खेमे में होती है और इस के गुरु स्वरूपानंद गांधी परिवार के फेमिली शंकराचार्य हुआ करते थे इसलिए हर कोई हैरान है कि एकाएक ही इस की निष्ठां को यह क्या हो गया और क्या किसी को इस तरह से धर्म से निकाला जा सकता है.

Transgender : हिंदू किन्नर मुसलिम किन्नर

Transgender : किन्नरों को इस बात पर बड़ा फख्र और गुमान रहता है कि लिंग के साथसाथ उन की कोई जाति या धर्म भी नहीं होता. लेकिन अब यह गुरुर दरकता दिखाई दे रहा है. भोपाल के किन्नर हिंदू और मुसलिम समुदायों में बंट गए हैं और एकदूसरे पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगा रहे हैं.

एक सीनियर मोस्ट किन्नर सुरैया नायक ने देवी नाम के किन्नर पर हिंदूवाद फैलाने का इल्जाम मढ़ा है तो देवी किन्नर ने भी सुरैया को हाजी कहना शुरू कर दिया है और अपना पक्ष मजबूत करने बजरंगदल और संस्कृति बचाओ मंच जैसे हिंदूवादी संगठनों का समर्थन और सहानुभूति हासिल कर ली है.

दरअसल में झगड़ा गद्दी और नेग के पैसों की छीना छपटी का है जो किन्नर समुदाय में शीर्ष पर भी मौजूद है. इस के पीछे धर्म का बड़ा हाथ है जिस ने किन्नरों को भी महामंडलेश्वर का दर्जा दे दिया और उन्हें आपस में लड़ा दिया. कल को सवर्ण दलित आदिवासी और ओबीसी किन्नर भी ताल ठोकने लगें तो किसी को हैरानी नहीं होगी.

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