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सरोगेसी बिल 2016 हुआ और भी सख्त

मां बनना हर औरत का सपना होता है. उस की यही चाहत होती है कि वह मां बने. उस का खुद का बच्चा हो, पर कभीकभी ऐसे हालात हो जाते हैं जिस में दंपती को इस सुख से वंचित होना पड़ता है. वजह चाहे कोई हो. तभी तो ऐसेऐसे रास्ते तलाशे जाते हैं जिस में किसी न किसी तरह से दंपती को बच्चा हासिल हो. भले ही चाहे गोद लिया हुआ बच्चा हो या सरोगेसी यानी किराए की कोख के जरीए बच्चा हो. पर अब भारत में इस पर सख्त नियम बन गए हैं. इसे लोकसभा में भी पारित कर दिया है.

19 दिसंबर 2018 में भारत में सरोगेसी (नियामक) विधेयक, 2016 लोकसभा में ध्वनिमत से पास हो गया. यह विधेयक सरोगेसी यानी किराए की कोख के प्रभावी नियमन को सुनिश्चित करेगा, व्यावसायिक यानी कारोबारी सरोगेसी को प्रतिबंधित करेगा और बेऔलाद भारतीय दंपतियों की जरूरतों के लिए सरोगेसी की इजाजत देगा यानी अब यह कारोबार नहीं बल्कि परोपकार का साधन रहेगा. एक महिला अपनी लाइफ साइकिल में केवल एक बार ही किसी के लिए सरोगेसी कर सकेगी.

बता दें कि भारत में सरोगेसी यानी किराए की कोख का बाजार लगभग 60 अरब रुपए से ज्यादा का है. सरोगेसी के बनाए गए प्रावधानों में उल्लंघन करने पर बिल में कठोर सजा सुनिश्चित की गई है. यह नई व्यवस्था आम लोगों के साथ ही साथ खास लोगों को भी प्रभावित करेगी जो सरोगेसी के जरीए बच्चा चाहते हैं.

वैसे, जिन के औलाद नहीं है उन के लिए यह बेहतरीन चिकित्सा विकल्प है. इस के जरीए कोई भी औलाद का सुख पा सकता है. इस की जरूरत तब पड़ती है जब किसी औरत के गर्भाशय में संक्रमण हो या फिर बांझपन की समस्या हो.

सब से पहले अभिनेता आमिर खान और उन की निर्देशक पत्नी किरण राव को सरोगेसी यानी किराए की कोख के जरीए बच्चे का सुख हासिल हुआ है. हालांकि इस अभिनेता की पूर्व पत्नी रीना दत्ता से एक बेटी और एक बेटा है.

इस के बाद तो सरोगेसी की होड़ सी लग गई. ज्यादातर फिल्मी सितारों ने सरोगेसी से औलाद सुख हासिल किया. तुषार कपूर, करण जौहर शाहरुख खान के अलावा और भी बहुत से फिल्मी सितारों ने सरोगेसी को आजमाया.

क्या है सरोगेसी?

सरोगेसी में एक अन्य महिला और दंपती के बीच एक एग्रीमैंट होता है. जो दंपती अपना खुद का बच्चा चाहता है यानी इस में बच्चे के जन्म होने तक एक अन्य महिला की कोख को किराए पर लिया जाता है.

यह परिस्थिति तब पैदा होती है जब कोई महिला किसी वजह से पेट से नहीं हो पाती. या तो महिला के गर्भाशय में संक्रमण हो या फिर बच्चे को जन्म देने में परेशानी हो, बारबार बच्चा गिर जाता हो यानी  बारबार आईवीएफ तकनीक फेल हो रही हो. ऐसे दंपतियों को भी शामिल किया गया है जिन के बच्चे शारीरिक या मानसिक रूप से सक्षम नहीं हैं या किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं.

सरोगेसी 2 प्रकार की होती है. ट्रेडिशनल में पिता के शुक्राणुओं को एक दूसरी औरत के अंडाणुओं के साथ निषेचित किया जाता है. इस में जैनेटिक संबंध सिर्फ पिता से होता है, जबकि जेस्टेसशनल में मातापिता के अंडाणु व शुक्राणुओं का मेल परखनली विधि से करवा कर भ्रूण को सरोगेट मदर की बच्चे दानी में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है. इस में बच्चों का जैनेटिक संबंध मातापिता दोनों से होता है.

भारत में पैसों की खातिर बहुत सी महिलाएं सरोगेट मदर बनने को तैयार हो जाती हैं. ऐसी मां का शुरू से आखिर तक पूरा खयाल रखा जाता है.

कभीकभी सेरोगेसी के केस में कुछ झगड़े भी हो जाते हैं. कई बार बच्चे को जन्म देने के बाद सरोगेट मां भावनात्मक लगाव के चलते बच्चे को देने से मना कर देती है और ऐसी स्थिति में विवाद की स्थिति बन जाती है.

कई बार ऐसा भी होता है जब जन्म लेने वाली संतान विकलांग होती है या फिर किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित होती है तो इच्छुक दंपती उसे लेने से मना कर देते हैं.

इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने कुछ प्रावधान बना कर बदलाव किए हैं. कैबिनेट से पास होने के बाद लोकसभा में भी यह बिल 19 दिसंबर 2018 को पास हो गया.

इस सरोगेसी रेगुलेशन बिल 2016 में यह साफ है कि अविवाहित पुरुष या महिला, ङ्क्षसगल, लिवइन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़े और समलैंगिक जोड़े भी अब सरोगेसी के लिए आवेदन नहीं कर सकते हैं, वहीं अब केवल रिश्तेदार में मौजूद महिला ही सरोगेसी के जरीए मां बन सकती है. जो महिला किसी और दंपती के बच्चे को अपनी कोख से जन्म देने को तैयार हो जाती है उसे ‘सरोगेट मदरÓ कहा जाता है.

सितंबर, 2016 में सरकार ने उस बिल को मंजूरी दे दी जिस में सरोगेसी यानी किराए की कोख वाली मां के अधिकारों की हिफाजत के उपाय सुझाए गए हैं. साथ ही, जन्मे बच्चों के मांबाप को कानूनी मान्यता भी देने का प्रावधान है.

दुनिया में सर्वाधिक भारत में ही सरोगेसी से संबंधित मामले होते हैं. अगर पूरी दुनिया में साल में 500 मामले होते हैं तो उन में से 300 सिर्फ भारत में ही होते हैं. भारत में गुजरात, मुंबई, दिल्ली जैसे राज्यों में यह सुविधाएं आसानी से मिल जाती हैं.

अमेरिका में सरोगेसी का खर्चा तकरीबन 50 लाख रुपए से ज्यादा है वहींभारत में यह सुविधा महज 10 से 15 लाख रुपए में मिल जाती है.

भारत में सरोगेसी पर पाबंदी लगाने वाला कोई सख्त कानून नहीं था, जबकि ब्रिटेन और कुछ दूसरे देशों में सरोगेट मदर को मां का दर्जा मिला हुआ है. फ्रांस, नीदरलैंड्स, नार्वे में कामर्शियल सरोगेसी की इजाजत नहीं है.

भारत में उन महिलाओं की स्थिति दयनीय है जो पैसे के लिए दूसरे का भू्रण वहन करती हैं. भला दूसरे बच्चे को कौन भारतीय औरत अपनी कोख में पालना चाहेगी, लेकिन गरीबी या भूख क्या नहीं करवा देती.

आमतौर पर 18 से 35 साल तक की गरीब महिलाएं सरोगेट मां बनने के लिए तैयार हो जाती हैं. इस काम के लिए उन्हें 4-5 लाख रुपए तक मिल जाते हैं. इस अवधि में अच्छा खानापीना और पूरी सुखसुविधा उन्हें मिलती है.

28 वर्षीय महिला रामवती पेट से है. उस के पेट में पल रहा भू्रण एक चीनी दंपती का है. इस के लिए उसे 5 लाख रुपए मिलेंगे. यह राशि उस के नए घर के लिए काफी होगी और अपने दोनों बच्चों को अंगरेजी स्कूल में पढ़ाने का उस का सपना भी पूरा हो जाएगा.

अगर सरोगेट मां जुड़वां बच्चों को जन्म देती है तो उसे तकरीबन सवा 6 लाख रुपए मिलता है. अगर किसी कारणवश बच्चा पेट से गिर गया तो उसे तकरीबन 38,000 रुपए दे कर विदा कर दिया जाता है. बच्चा चाहने वाले दंपती से अस्पताल तकरीबन 18 लाख रुपए लेता है.

भारत में दुनिया के एकतिहाई गरीब रहते हैं. औरतों के इस रुझान के पीछे गरीबी सब से अहम वजह है. इस के पीछे कई वजहें हैं. एक तो यहां अच्छी तकनीक मुहैया है वहीं लागत भी काफी कम है. इस के अलावा यहां का कानून भी अनुकूल है.

भारतीय कानून के अनुसार, पैदा होने वाली संतान पर सरोगेट मदर का न तो हक होता है न ही जिम्मेदारी, वहीं पश्चिमी देशों में जन्म देने वाली मां ही असली मां मानी जाती है और जन्म प्रमाणपत्र पर उसी का नाम होता है. लेकिन सरोगेट मां की सामाजिक ङ्क्षजदगी इतनी आसान नहीं होती क्योंकि इसे बुरी नजर से देखा जाता है.

भारत में सरोगेसी कानून लागू होने से क्या होंगे बदलाव

भारत में सरोगेसी के नाम पर बहुत शोषण होता है. कई सालों से दुनियाभर के लिए भारत सरोगेसी का अरबों का बाजार बना हुआ है. लेकिन अब सरकार की ओर से इस पर कई नियम लगाए जा रहे हैं.

यह बिल सदन में साल 2016 से ही लंबित था. स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जेपी नड्ïडा ने कहा कि यह बिल एक ऐतिहासिक विधेयक है. इस बिल के मुताबिक, पतिपत्नी अब कामॢशयल सरोगेसी का रास्ता नहीं चुन सकते. वे अपने परिवार में ही किसी करीबी रिश्तेदार की मदद ले सकते हैं. लेकिन अगर उन का परिवार इतना बड़ा नहीं है कि उन का कोई करीबी रिश्तेदार इस के लिए तैयार न हो, तो उन के लिए गोद लेना ही एक रास्ता होगा. वे सरोगेसी नहीं अपना सकते.

23 से 50 साल की उम्र और 26 से 55 साल की उम्र वाली महिला और पुरुष ही बच्चे पैदा करने की कूवत न रखने वाले भारतीय विवाहित दंपती नैतिक सरोगेसी अपना सकते हैं, न कि पैसा दे कर खरीद सकते हैं.

शोषण को रोकने के लिए अब परोपकारी सरोगेसी से ही गुजरने की अनुमति दी गई है. मतलब, उन्हें इस के बदले में कोई पैसा नहीं मिलेगा. अपनी मरजी से वह इस में शामिल होगी. इस के लिए उसे केवल मैडिकल खर्च और इंश्योरैंस कवर मिलेगा.

अविवाहित और समलैंगिक जोड़े सरोगेसी के लिए अप्लाई नहीं कर सकते.

इस बिल को कैबिनेट ने 24 अगस्त, 2017 को पास किया था. सदन में इसे नवंबर, 2016 में रखा गया था. बाद में इसे संसद की स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण की एक स्थायी समिति को भेज दिया गया था. जब यह बिल लागू होगा तब केंद्र एक नैशनल सरोगेसी बोर्ड का गठन करेगा.

हालांकि राज्यों को भी सरोगेसी बोर्ड जैसी संस्था का गठन करना होगा. केंद्र इस के लिए सूचना जारी करेगा. इस सूचना के 3 महीने के भीतर बोर्ड बनाना होगा.

कोई भी व्यक्ति, संगठन, क्लिनिक, लैब या ऐसी कोई जगह किसी भी तरह की कामॢशयल सरोगेसी नहीं करवा सकते.

इस बिल के लागू होने के बाद सरोगेसी का कोई इश्तिहार देना, सरोगेसी से पैदा हुए बच्चे को छोडऩा, सरोगेट मदर का शोषण करना, भू्र्रण बेचना या सरोगेसी के मकसद से आयात करना गैरकानूनी होगा.

इन नियमों का उल्लंघन करने वालों को 5 साल से 10 साल तक की सजा और 5 लाख से 10 लाख रुपए तक का जुर्माना हो सकता है.

बता दें कि भारत के ला कमीशन ने अपनी 228वीं रिपोर्ट में सरोगेसी पर रोक लगाने की सिफारिश की थी. कहा था कि भारत में सरोगेसी के नाम पर बहुत शोषण होता है. इस के बाद ही सरोगेसी कानून को लाने की मांग बढ़ गई थी.

नए बिल के मुताबिक अब विदेशी दंपती भी भारत में आ कर सरोगेसी या किराए की कोख ले कर बच्चा पैदा नहीं कर पाएंगे.

ङ्क्षसगल पैरेंट, समलैंगिक जोड़े, बिना शादी के साथ रहने वाले दंपती को भी सरोगेसी के जरीए संतान पैदा करने की इजाजत नहीं होगी.

ऐसे मातापिता जिन की पहले से अपनी संतान है यो गोद लिया हुआ बच्चा है वे भी अब सरोगेसी से संतान नहीं रख पाएंगे.

एक महिला एक ही बार सरोगेट मां बन पाएगी. किसी अविवाहित को सरोगेट मां नहीं बनाया जा सकेगा.

देशभर में चल रहे 2000 से ज्यादा सरोगेसी क्लिनिक को अब रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होगा.

सरोगेसी कानून को इसलिए सख्त किया गया है क्योंकि इस की आड़ मेंदेश में कई कारोबार चल रहे थे. सरोगेसी में लड़की पैदा होने पर भू्रण हत्या के मामले भी तेजी से बढ़े थे.

बिल में सुधार की मांग भी उठी

सरकार ने इस बिल के जरीए व्यावसायिक सरोगेसी को प्रतिबंधित कर दिया है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्ïडा ने कहा कि व्यावसायिक सरोगेसी को प्रतिबंधित करने की विधि आयोग की सिफारिश के बाद यह विधेयक लाया गया है. वहीं तृणमूल कांग्रेस की काकोली घोष ने समलैंगिकों और समान ङ्क्षलग के दंपतियों के लिए विकल्पों की इजाजत दे कर इस की सीमा बढ़ाने की मांग की. साथ ही, उन्होंने अपने शरीर को शेप में रखने के मकसद से सरोगेसी का इस्तेमाल करने वालों पर भी रोक लगाने की मांग की.

उन्होंने कहा कि हमारे देश में चल रही फैशन सरोगेसी को रोकना चाहिए. मैं नाम नहीं लेना चाहती, लेकिन फिल्मी सितारों और उन के रिश्तेदार केवल इस लिए सरोगेट माताओं का इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि वे अपनी शेप को बिगडऩे नहीं देना चाहते.

उन्होंने एआरटी यानी सहायक प्रजनन तकनीक मसौदा विधेयक की तर्ज पर विधेयक पर सार्वजनिक बहस की मांग की. साथ ही, बिना एक आईवीएफ लैबोरेटरी के, बिना टैस्ट ट्यूब बेबी के हम सरोगेट नहीं कर सकते. इसलिए इन दोनों विधेयकों को साथ लाना चाहिए.

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की सुप्रिया सुले ने कहा कि विधेयक उन्हीं दंपतियों को सरोगेसी की इजाजत देता है, जो गर्भधारण नहीं कर सकते.

सुषमा स्वराज ने इशारोंइशारों में फिल्मी हस्तियों पर भी निशाना साधा. उन्होनें कहा कि जरूरत के बिना सरोगेसी का उपयोग करने वालों के लिए ये एक शौक की तरह है.

शादी करने से क्यों कतराती है युवा पीढ़ी

आज के दौर में युवा पीढ़ी शादी करने से कतराती है तो इसके बहुत से कारण हो सकते हैं. वहीं बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो शादी ही नहीं करना चाहते. शादी न करने वाले लोगों का आंकड़ा पिछले काफी समय में बढ़ गया है. जबकि भारत में शादी को एक खूबसूरत रिश्ता माना जाता है, इसके जरिए दो इंसानों का ही नहीं बल्कि दो परिवारों का भी मेल होता है. तो चलिए इस लेख के जरिए जानते हैं कि युवा पीढ़ी शादी करने से आखिर क्यों कतराती है.

शादी के बाद समझौते – जिंदगी एक बार ही मिलती है और स्वभाविक है कि आप इसे अपनी इच्छा के मुताबिक जीना चाहते हैं. लेकिन शादी के बाद आपको अपने साथी की इच्छाओं के बारे में ज्यादा सोचन पड़ता है. आपका साथी क्या चाहता है? उसे किस चीज की जरुरत है. इन सबके बीच आपको उन सभी चीजों के साथ समझौता करना होता है जो आपको खुशी देती हैं. शादी के बाद लोगों को कई तरह के समझौते करने होते हैं लेकिन हर इंसान अपनी जिंदगी और इच्छाओं के साथ समझौता नहीं करना चाहता इसलिए वे शादी करने से इंकार कर देते हैं.

शादी का खर्च – आजकल शादियों में काफी पैसे खर्च होते हैं. यह एक बड़ा कारण है जिसके चलते लोगों का मानना है कि शादी करना एक बेकार का फैसला है. जिस तरह की व्यवस्था के साथ हमारे समाज में शादी होती है उस पर लाखों रुपये खर्च हो जाते हैं और कुछ परिवार तो इसके कारण कर्ज में भी डूब जाते हैं. इसलिए नई पीढ़ी के युवा इस तरह की फिजूलखर्ची से खुद को बचाने के लिए शादी से दूरी बना रहे हैं.

अकेले रहना  – हर इंसान के सोचने का तरीका अलग होता है. अधिकतर लोग मानते हैं कि जिंदगी जीने के लिए एक साथी की जरुरत होती है और अकेले जिंदगी काटना बेहद मुश्किल होता है. हालांकि अब ये सोच बदल गई है. अब बहुत से लोगों का मानना है कि अकेले रहना उनके लिए बेहतर है और वो अपनी जिंदगी को अकेले रह कर अच्छे से एक्सप्लोर कर सकते हैं.

जिंदगी में परिवर्तन – यह एक बड़ा कारण है जिसकी वजह से युवा शादी से कतराने लगे हैं. उनका मानना है कि शादी के बाद लोगों के बीच सहजता और स्वभाविकता खत्म हो जाती है. जिससे उनकी शादीशुदा जिंदगी में बहुत सी मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं.

शादी का असफल होना – पिछले कुछ सालों में भारत में तलाक के मामलों में तेजी आई है. यह एक बड़ा कारण है जिसकी वजह से लोग शादी का फैसला लेने में सहज महसूस नहीं करते.

आप भी बन सकते हैं अपने घर के मालिक

घर चाहे छोटा हो पर अपना हो, यह सब का सपना होता है. जाहिर है आप भी अपना खुद का घर/फ्लैट चाहते होंगे. सवाल यह है कि ऐसा हो कैसे? ऐसा हो सकता है. इसके लिए चाहिए होगा पैसा, वह भी हो जाएगा कुछ आसन से प्रयोगों के साथ.

गुजरे 30 दशकों में हमारे पर्सनल फाइनैंस को हैंडल करने के तरीके में काफी बदलाव हुए हैं, लेकिन फिर भी एक फ्लैट खरीदना हमारे लिए आज भी उतना ही अहम है जितना यह हमारे पेरेंट्स के लिए हुआ करता था.

एस्पिरेशन इंडेक्स स्टडी, जिसे इंडियन मिलेनियल्स के फाइनैंशियल टारगेट्स का सर्वे करने के लिए किया गया था, में 47 फीसदी जवाब देने वालों ने कहा कि वे अपने दूसरे सभी टारगेट्स से ज्यादा एक फ्लैट खरीदने के टारगेट को प्राथमिकता देते हैं. जबकि 61 फीसदी मिलेनियल्स इसे हासिल करने के लिए लोन लेने से भी पीछे हटने वाले नहीं हैं.

इस से यह पता चलता है कि यंग प्रोफेशनल्स के पास डाउनपेमेंट करने के लिए या घर के कर्ज की रेगुलर मासिक किस्त चुकाने के लिए पैसे नहीं हैं. इसलिए, अपनी जरूरतों और इच्छाओं को पूरा करने के बीच आने वाली पैसे के कमी को पूरा करने के लिए आप को कुछ स्मार्ट फाइनेंशियल मैनेजमेंट और इन्वेस्टमेंट टिप्स की मदद लेनी होगी.

अपनाएं फाइनेंशियल डिसिप्लिन

आप की कितनी इन्कम है, उस हिसाब से खर्च और बचत करें. फाइनेंशियल डिसिप्लिन आगे चल कर काफी फायदेमंद साबित हो सकता है, चाहें आप की इच्छा बड़ी हो या छोटी. इसके लिए एक बजट तैयार करें और उसी बजट के हिसाब से चलें. अपने खर्च पर नजर रख कर आप अपने बेकार के खर्च में कटौती कर सकते हैं. बेहतर परिणाम के लिए आप अपनी इन्कम और फाइनेंशियल देनदारी में कोई बदलाव होने पर अपने बजट में भी जरूर बदलाव करें.

फ्लैट की डाउन पेमेंट के पैसों का इंतजाम करने के लिए अभी से इन्वेस्टमेंट शुरू कर दें. अगर आप कुंवारे/कुंवारी हैं तो अभी आप की फाइनेंशियल देनदारियां और आप पर डिपेंड रहने वाले लोगों की तादाद कम होगी, इसलिए इस समय आप ज्यादा बचत कर सकते हैं. अपनी बचत का कुछ हिस्सा ज्यादा रिटर्न देने वाले इन्वेस्टमेंट में लगाएं ताकि आप को अपने डाउन पेमेंट के लिए जरूरी रकम का इंतजाम करने में मदद मिल सके. इस के अलावा, आप इन्वेस्टमेंट कर के टैक्स बेनिफिट का भी भरपूर लाभ उठा सकते हैं.  इस से आप का अच्छा क्रेडिट स्कोर भी बन सकता है.

तरहतरह के कर्ज लें

फ्लैट खरीदने के लिए बैंक या किसी फाइनेंशियल कंपनी से होम लोन के वास्ते आप को गारंटर यानी जमानतदार की जरुरत पड़ती है. लेकिन एक होम लोन उस समय ज्यादा अफोर्डेबल बन जाता है जब आप के पास एक अच्छा क्रेडिट स्कोर होता है.  इसलिए आगे के लिए अभी से इसे तैयार करने की शुरुआत कर दें.

आप को बस हर महीने अपने क्रेडिट कार्ड बिल का फुल पेमेंट करना है और अपने क्रेडिट लिमिट से ज्यादा खर्च नहीं करना है. आप कुछ अलगअलग टाइप के लोन भी ले सकते हैं, जैसे एक अनसिक्योर्ड पर्सनल लोन और एक सिक्योर्ड कार्ड लोन, जो आप के स्कोर को बढ़ाने में मदद कर सकते हैं. लेकिन हां, कोई भी लोन लेने से पहले अपनी मासिक किस्त का कैलकुलेशन जरूर कर लें, साथ ही, समय पर किस्त चुकाएं, तभी आप का स्कोर बढ़ सकता है.

खरीदने वाले फ्लैट का सिलेक्शन

जब आप फ्लैट खरीदने का मन बना लें तो नंबर एक की प्रौपर्टी को ही तलाश करें. रेरा के साथ रजिस्टर्ड बिल्डर के साथ साथ एक परफेक्ट घर की तलाश के दौरान अपने टारगेट्स को ध्यान में रखना न भूलें. एक ऐसा घर खरीदें जिस में आप की फैमिली आराम से रह सके.

इसके अलावा, ऐसा घर चुनें जो आप के बजट के भीतर हो, जिस के लिए आप को अपनी कैपेसिटी से ज्यादा लोन न लेना पड़े. एक औनलाइन ईएमआई कैलकुलेटर की मदद से अपने होम लोन से जुड़े खर्च का अंदाजा लगाएं और अपने कर्ज व इन्कम के अनुपात को कम रखें. यदि आप अभी घर नहीं खरीद सकते हैं तो कम से कम उस के लिए अभी से इन्वेस्टमेंट करना जरूर शुरू कर दें.

घर से जुड़े अन्य खर्चों पर भी गौर करें 

अब जब आप फ्लैट के मालिक बनने जा रहे हैं तो उससे जुड़े कई खर्चों पर भी ध्यान से गौर कर लें. होम लोन की मदद से या होम लोन के बिना एक घर खरीदने के कुल खर्च पर सोचविचार करते समय उसमें स्टाम्प ड्यूटी, रजिस्ट्रेशन, ब्रोकरेज और शिफ्टिंग का खर्च जोड़ना न भूलें.

इसके अलावा ऐसा भी हो सकता है कि आप नया फर्नीचर खरीदना चाहते हों, इंटीरियर वर्क करवाना चाहते हों, इलेक्ट्रौनिक सामान खरीदना चाहते हों, या लैंडस्केपिंग या स्ट्रक्चरल मोडिफिकेशन करवाना चाहते हों. कुछ प्रौपर्टी के लिए आप को सालाना या मासिक मेंटेनेंस फीस और पार्किंग स्पेस के लिए कुछ अतिरिक्त चार्ज भी देने पड़ सकते हैं. इस तरह के खर्चों को अनदेखा करने पर बाद में आप की इन्कम पर काफी दबाव पड़ सकता है.

बड़े आराम से और बिना किसी परेशानी के घर खरीदने के अपने सपने को पूरा करने के लिए इन टिप्स को हमेशा याद रखें.

चीज पेपर राइस बौल

सामग्री

– 1 कप बासमती चावल पके

– 1 बड़ा चम्मच लाल, पीली व हरी शिमलामिर्च बारीक कटी

– 2 बड़े चम्मच कौटेज चीज कद्दूकस किया

– 1 बड़ा चम्मच मोजरेला चीज

– 1 बड़ा चम्मच कौर्नफ्लोर

– 1 हरीमिर्च कटी

– 2 बड़े चम्मच धनियापत्ती कटी

– 1 बड़ा चम्मच चाट मसाला

– तलने के लिए पर्याप्त तेल

– 1/2 कप बैडक्रंब्स

– नमक व कालीमिर्च स्वादानुसार.

विधि

– तेल व ब्रैडक्रंब्स छोड़ कर बाकी सारी सामग्री को एक बाउल में थोड़ा सा पानी मिला कर मिश्रण तैयार करें.

– तैयार मिश्रण की बौल्स बना कर ब्रैडक्रंब्स में कोट करें और सुनहरा होने तक तलें.

– सौस के साथ गरमगरम परोसें.

वन पैन नूडल्स

सामग्री

– 1 पैकेट नूडल्स

– 1 बड़ा चम्मच लाल, पीली व हरी शिमलामिर्च बारीक कटी

– 1 शकरकंदी जूलियंस में कटी हुई

– 2 बड़े चम्मच मटर

– 5-6 फ्रैंचबींस

– 1 प्याज छोटा

– 2-3 फ्लोरेट्स गोभी

– 1 टमाटर

– 1 बड़ा चम्मच तेल

– 50 ग्राम पनीर

विधि

– एक कड़ाही में तेल गरम कर कटी प्याज, सभी शिमलामिर्च, शकरकंदी, फ्रैंचबींस, गोभी, मटर व नमक डाल कर पकाएं.

– टमाटर में हरीमिर्च डाल कर मिक्सी में पीस लें.

– सब्जियों के पकने पर टमाटर व 1 कप पानी डाल कर 1-2 मिनट तक पकाएं. इस में पनीर के टुकड़े डालें.

– फिर नूडल्स डाल कर 4-5 मिनट तक पका कर गरमगरम सर्व करें.

हंसमुख लड़कों को क्यों डेट करती हैं लड़कियां

लड़कियों को हंसमुख और खुशमिजाज़ लड़के बहुत ज्यादा पसंद होते हैं, क्योंकि ऐसे लड़के हमेशा हंसाते हैं और टेंशन फ्री रखने में मदद करते हैं. इसलिए हर लड़की हंसमुख लड़कों को डेट करना पसंद करती हैं और ऐसे लड़कों से अट्रैक्ट भी होती हैं. ऐसे लड़के जिंदगी को खुलकर जीना जानते हैं और हर परिस्थिति में ना सिर्फ खुद को बल्कि अपने पार्टनर को भी खुश रखने का तरीका ढूढ़ लेते हैं.

आइए जानते हैं, हंसमुख लड़कों को डेट करने के क्या फायदे हैं.

हंसमुख लड़के चेहरे पर हंसी लाना जानते हैं – वैसे तो वो इंसान सभी को पसंद होते हैं जो दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाना जानते हो. लेकिन खासकर लड़कियों को ऐसे लड़के बहुत पसंद होते हैं जो उनके चेहरे पर मुस्कान लाना जानते हो क्योंकि ऐसे लड़कों को पता होता है कि अगर आप किसी कारण से तनाव में हैं तो आपको किस तरह खुश करें.

हमेशा मनोरंजन करते हैं – जो लड़के हमेशा हंसते हैं और खुश रहते हैं वो दूसरों का मनोरंजन करते हैं और दूसरों को भी खुश रखते हैं. ऐसे लड़के बोरिंग नहीं होते हैं और ना ही दूसरों को बोर होने देते हैं. वो ऐसी बातें बोलते हैं जिससे हंसी आ जाती है. इससे चीजें रोमांचक हो जाती हैं. इसलिए हर लड़की ऐसे लड़के के साथ जिंदगी बिताना चाहती है.

दोस्त और परिवार वालों का दिल जीत लेते हैं – अपने खुशमिजाज होने के कारण वो हमेशा अपने आस-पास के लोगों का दिल जीत लेते हैं. लड़कियों को ऐसे लड़के इसलिए पसंद होते हैं क्योंकि उन्हें ऐसा लगता है कि वो अपने परिवार या दोस्तों से उस लड़के को मिलवाएगी तो वह आसानी से उनका दिल जीत लेगा.

दूसरों को भी खुश रखते हैं – ऐसे लड़के हमेशा दूसरों के तनाव और दुख को कम करने की कोशिश में रहते हैं. इस वजह से भी लड़कियां ना चाहते हुए भी उनकी ओर आकर्षित हो जाती हैं. अच्छी-अच्छी बातें बोलने की कोशिश करते हैं ताकि दूसरों के चेहरे की मुस्कान बनी रहे.

सामाजिक स्थितियों को संभालना जानते हैं- ऐसे लड़कों के साथ सबसे अच्छी बात ये है कि वे सभी के साथ बड़ी जल्दी घुल मिल जाते हैं. वे अच्छे से जानते हैं कि समाजकि स्थितियों को किस तरह से मैनेज किया जाता है. अपने खुशमिजाज़ व्यवहार की वजह से लोगों के बीच जल्दी ही काफी प्रसिद्धि बटोर लेते हैं.

किसी तरह के ड्रामे में खुद को शामिल नहीं करते हैं – ऐसे लड़के कभी भी अपनी परेशानी के कारण भीड़ में किसी तरह का ड्रामा नहीं करते हैं. उन्हें अपनी भावनाओं पर नियंत्रण होता है इसलिए लड़कियां ऐसे लड़कों से अधिक आकर्षित होती हैं.

स्वास्थ्य संबंधित शोध व आंकड़ों पर आंख बंद कर भरोसा क्यों?

देश में स्वास्थ्य एक ऐसी समस्या है जो अमीर हो या गरीब सबके लिए अलार्मिंग सिचुएशन होती है. अस्पतालों में लगी लंबी कतारें बताती हैं कि हम दिनबदिन अस्वस्थ होते जा रहे हैं. लेकिन इसमें एक बड़ा वर्ग ऐसा भी होता है जो अस्पताल या डौक्टर के पास जाने के बजाए अखबारों, पत्रिकाओं और टीवी से हेल्थ प्रोग्राम देखपढ़ अपनी स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान खोजता है. हालांकि यह गंभीर बीमारियां नहीं होती लेकिन ‘मोटापे से कैसे छुटकारा पाएं’, आंखों की रोशनी बढाने के लिए या ‘याददाश्त बढ़ाने के नुस्खे’, ‘पाचन सही करने के देसी उपाय’, ‘बौडी बिल्डर बनने के 10 टिप्स’ जैसे टौपिक्स पर आम लोग यही से पढ़कर और आजमाकर अपना इलाज या डाइट बना लेते हैं. फिर इसके बाद कई गंभीर मामले में भी वे इन्ही रिपोर्ट्स के आधार पर ट्रीटमेंट लेने लगते हैं.

हालांकि हेल्थ के मामले में कोई भी दावा या नुस्खा आजमाने से पहले डौक्टर की राय लेने की बात बार-बार दोहराई जाती है, लेकिन चूंकि इस तरह की हेल्थ सोल्यूशन में किसी विदेशी यूनिवर्सिटी की रिसर्च और या मेडिकल जर्नल का हवाला दिया जाता है लिहाजा पढ़ने वाले इन पर आंख बंद कर भरोसा कर लेते हैं.

इतना ही नहीं आजकल यूट्यूब पर ‘झट से बाल उगाने’ या ‘बेली कम करने’ से लेकर ‘सेक्स पावर बढ़ाने की जानकारियां’ व इलाज के वीडियो अमेच्योर लेवल पर बनाकर अपलोड किया जा रहे हैं और मिलियंस में देखे जा रहे हैं. जाहिर है इनको भी फौलो किया जा रहा है.

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि हेल्थ के मद्देनजर इस तरह की हेल्थ रिसर्च, मेडिकल जर्नल के दावों-आंकड़ों और वीडियोज पर आंख मूँद कर भरोसा किया जा सकता है. सीधा सा जवाब है नहीं. इन पर भरोसा नहीं किया जा सकता है. क्योंकि ज्यादातर जानकारियां यहां वहां से लिखी, पढ़ी या सुनीसुनायी बातों के आधार पर दी गयी होती हैं. यानी नीम हकीम खतरा ए जान वाली स्थिति होती है.

कई बार तो एक रिपोर्ट दावा करती है कि फलां चीज खाने से यह फायदा होता है जबकि उसी को खाने से बीमारी होती है, बताने वाली रिपोर्ट्स भी पढ़ने को मिल जाती है. लिहाजा कन्फ्यूजन के हालात पैदा होते हैं. जबकि इसका सही जवाब सिर्फ हेल्थ एक्सपर्ट ही दे सकते हैं और हमने इस मामले में बात की ऐसी ही संस्था हील फाउंडेशन से, जो सालों से इस क्षेत्र में जागरूकता मुहिम चला रही है.

हील फाउंडेशन इस दिशा में सालों से काम कर रहा है कि हेल्थ से जुड़े लेखों, जानकारियों या प्रोग्राम्स में कोई भी शोध या आंकड़ा आंख बंद कर पाठकों तक न पहुंचाया जाए, बल्कि इसकी हेल्थ एक्सपर्ट्स, चिकित्सा विज्ञानियों से एक बार नहीं बल्कि कई बार पुष्टि करके लोगों तक पहुंचाया जाए. क्योंकि एक गलत जानकारी किसी की जान पर भारी पड़ सकती है.

हील के कर्ताधर्ता और इंडिया वर्चुअल हौस्पिटल के संस्थापक मैनेजिंग पार्टनर स्वदीप श्रीवास्तव बताते हैं कि, देश में हेल्थ रिपोर्टिंग को लेकर मीडिया जो भी जानकारी लोगों तक पहुंचाती है वो डाटा, फैक्ट्स, दुष्परिणाम आदि जांच करने के बाद पहुंचाई जाए, तो लोगों को इसका सही फायदा मिले वर्ना इसे भ्रमित लोग हेल्थ हैजार्ड में फंस सकते हैं.

इसके लिए वे हर साल हेल्थ मीडिया सम्मेलन का देश के अलग अलग हिस्सों में आयोजन भी करते हैं. इस माह भी दिल्ली में हेल्थ मीडिया सम्मेलन का छठा संस्करण आयोजित हुआ. जो स्वास्थ्य पत्रकारों, अस्पतालों, फार्मा उद्योग और उद्योग के अन्य भागीदारों के बीच एक सेतु के तौर पर स्थापित करता दिखा.

स्वदीप कहते हैं कि इस सम्मेलन का उद्देश्य हेल्थकेयर उद्योग में नवीनतम गतिविधियों से हेल्थ लेखकों और संपादकों को रूबरू कराना और हेल्थकेयर के समग्र सुधार में हेल्थ मीडिया की भूमिका और जिम्मेदारी बढ़ाना था. इसके लिए स्वास्थ्य से जुड़े ज्वलंत मुद्दों के बारे में अपना ज्ञान बढ़ाने और अपने साथियों के साथ नेटवर्क स्थापित करने के लिए स्वास्थ्य विषयों पर लिखने वाले 75 पत्रकार एक ही प्लेटफोर्म पर जमा हुए और इस सब्जेक्ट को लेकर वृहद् चर्चा भी हुई.

इस दौरान बतौर चीफ गेस्ट केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री अश्वनी चौबे भी इस विषय को गंभीरता से लोगों के बीच उठाते दिखे और स्वास्थ्य को लेकर कई चिंताजनक आंकड़े भी जाहिर किये. उनके मुताबिक “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि स्वतंत्रता मिलने के सात दशकों बाद भी 62.58 प्रतिशत नागरिकों के पास स्वास्थ्य बीमा की सुविधा नहीं है. इसके परिणाम स्वरूप, हर साल करीब 4 प्रतिशत नागरिक इलाज के खर्च के चलते गरीबी के दुष्चक्र में फंस जाते हैं. सरकार 58 मेडिकल कौलेजों को अपग्रेड कर रही है और 73 मेडिकल कौलेजों में सुपर स्पेशियलिटी ब्लॉक स्थापित कर रही है जिससे इस समस्या से निपटने में मदद मिल सके.”

यहां फर्जी स्वास्थ्य समाचारों की समस्या और हेल्थकेयर क्षेत्र में विश्वास बहाली जैसे विषयों पर बात करने के लिए चिकित्सा जगत के कई नामी डौक्टर भी जुड़े और सबने फर्जी हेल्थ रिपोर्ट्स और भामक आंकड़ों को लेकर सावधानी बरतने पर जोर दिया.

इस बहस में पदम भूषण विजेता और फोर्टिस हौस्पिटल के चेयरमैन डौक्टर अशोक सेठ, एम्स के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डौक्टर शक्ति कुमार गुप्ता और भारतीय जनसंचार संस्थान के महानिदेशक के.जी. सुरेश ने कई दिलचस्प जानकारियां और हेल्थ टिप्स दिए, जबकि विश्व बैंक में वरिष्ठ आहार विशेषज्ञ आशी कठुरिया ने फूड फोर्टिफिकेशन, फूड सेफ्टी, अधिक वसा, चीनी और नमक वाले खाने का सेवन घटाने और जीवन के 1000 दिन का संदेश फैला रहे ईट राइट मूवमेंट पर अपनी बात साझा की.

गौरतलब है की यह मूवमेंट एफएसएसएआई द्वारा चलाया जा रहा है. सिप्ला और महर्षि आयुर्वेद ने निःशुल्क पुलमोनरी फंक्शन टेस्ट और आयुर्वेद जांच की व्यवस्था की.

बहरहाल, आज हम जो भी मीडिया खासतौर से सोशल मीडिया में स्वास्थय समाधान का दावा करती जानकारियां पढ़ते हैं, वे एक तरफा या अधूरी व भ्रामक होती हैं. उन पर आंख बंद कर के भरोसा करने के बजाए आम लोगों को चाहिए कि वे हेल्थ एक्सपर्ट्स से ही राय लेकर कोई भी ट्रीटमेंट आजमायें और मीडिया रिपोर्ट्स लिखने वालों से लेकर डिजिटल दुनिया में स्वघोषित नीम हकीमों और वैद्यों से भी अपील है कि वे चुटकी में हर हेल्थ प्रोब्लम का हल अप्रमाणित रिसर्च और आंकड़ों के आधार पर जनता को बताकर उन्हें बरगलाए नहीं. थोड़ी सी मेहनत करें. आंकड़ों का सही मतलब समझें, संबंधित जानकारों से पुष्टि करें. इसके बाद पब्लिश्ड या अपलोड करें.

बेवजह नहीं है इशांत और जडेजा की झड़प

पर्थ में खेला गया दूसरा टैस्ट मैच हम हार चुके हैं और उस की टीस भी भूल चुके हैं, पर उस हार से ज्यादा एक और मामला तूल पकड़ गया है और वह है उस टैस्ट मैच के चौथे दिन मैदान पर हुई इशांत शर्मा और रविंद्र जडेजा की तीखी बहस. इसे ऑस्ट्रेलिया के मीडिया ने हाथोंहाथ लपका और भारतीय खेमे में फूट के तौर पर दिखाया.

दरअसल, उस बहस के दौरान इशांत और जडेजा के बीच क्या बातचीत हुई थी, वह सब स्टंप में लगे माइक से रेकॉर्ड हो गया था और उस की पूरी डिटेल्स विदेशी मीडिया ने जारी की.

इशांत और जडेजा किस वजह से भिड़े थे यह तो साफ नहीं हो सका है पर यह तो साफ है कि इशांत को जडेजा का हाथ दिखाना या किसी तरह का निर्देश देना पसंद नहीं आया था जबकि जडेजा का कहना था कि वे टीम का हिस्सा हैं और अपनी बात रख सकते हैं.

अंदाजा तो यह भी लगाया जा रहा है कि पर्थ टैस्ट मैच की पूर्व संध्या तक भारतीय प्लेइंग इलेवन में इशांत की जगह जडेजा को शामिल किया जाना तय था. संभव है कि इस बात को ले कर दोनों के बीच तल्खी हो गई और इशांत ने सब्सिट्यूट के तौर पर उतरे जडेजा के कुछ हिदायत देने को दिल से लगा लिया हो.

सवाल उठता है कि जब कोई भी 2 खिलाड़ी इस तरह मैदान पर टीम भावना को छोड़ कर अपनी तल्खी एकदूसरे के सामने रखते हैं तो इस का मतलब क्या होता है? क्या भारतीय क्रिकेट टीम ने ऑस्ट्रेलियाई मीडिया को बैठेबिठाए एक मसाला दे दिया है? क्या भारतीय खेमे में फूट पड़ चुकी है?

दरअसल, इस तरह के मामलों में जितने मुंह उतनी बातें होती हैं. कुछ लोग दबी जबान में कह रहे हैं कि पर्थ टैस्ट के दौरान इशांत शर्मा और रविंद्र जडेजा के बीच हुई तीखी बहस की भूमिका पहले से तैयार हो रही थी और उस दिन गुस्सा मैदान पर फूट पड़ा.

एडिलेड में पहला टैस्ट मैच जीतने के बाद कोच रवि शास्त्री और कप्तान विराट कोहली का मानना था कि पर्थ की तेज और उछाल भरी पिच पर 4 तेज गेंदबाज खेलने चाहिए जबकि टीम का एक खेमा यह मान रहा था कि एक स्पिनर को भी रखना चाहिए. तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी ने तो प्रेस कॉन्फ्रेंस में कह दिया था कि टीम को एक स्पिनर भी खिलाना चाहिए था.

पर्थ में चूंकि रविचंद्रन अश्विन को चोट लगने की वजह से बाहर बिठाया गया था तो रविंद्र जडेजा को चांस मिलना तय माना जा रहा था लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हो सकता है कि जडेजा इस बात से खफा रहे हों और मामला बिगड़ गया.

यह मामला किस हद तक बिगड़ा है यह तो बाद में पता चलेगा पर इतना तो साफ है कि टीम में ऐसी बहस कमजोर कड़ी मानी जाती है. साल 2016 की बात है. यूएई में खेले जा रहे पीएसएल मैच के दौरान मैदान पर उलझे पाकिस्तानी खिलाड़ी वहाब रियाज और अहमद शहजाद पर पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने भारी जुर्माना लगाने के साथ कड़ी चेतावनी दी थी.

यह घटना क्वेटा ग्लेडिएटर्स और पेशावर जाल्मी टीम के बीच हुए एक मैच के दौरान की थी जिस में दोनों पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने एकदूसरे को धक्का देने के साथ अपशब्द कहे थे.

इस पूरे मामले को मैच रैफरी रोशन महानामा ने गंभीरता से लिया था और शहजाद पर मैच फीस का 30 प्रतिशत और रियाज पर 40 प्रतिशत जुर्माना लगाया था.

तब पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के एक अधिकारी ने कहा था, “खिलाड़ियों को सलीके से पेश आने के लिए कहा गया है क्योंकि ऐसी घटनाओं से पाकिस्तान क्रिकेट की इमेज खराब होती है.

ऐसे ही एक बार इंडियन प्रीमियर लीग 2013 के छठवें सीजन में रॉयल चैलेंजर्स बंगलोर और कोलकाता नाइटराइडर्स के बीच हुए एक मैच के दौरान विराट कोहली और गौतम गंभीर के बीच जबरदस्त लड़ाई हो गई थी. उस घटना ने काफी सुर्खियां बटोरी थीं और इस के बाद यह चर्चा फैल गई थी कि गंभीर और कोहली के बीच बिलकुल भी नहीं पटती है.

ऐसे और भी कई उदाहरण हैं जब एक ही टीम के खिलाड़ी आपस में ही उलझ गए थे, जो टीम की एकता के लिए कतई ठीक बात नहीं है. अभी हमें ऑस्ट्रेलिया में कई मैच खेलने हैं और अगर उन में जीतना है तो ऐसी तल्खी वाली बातों से बचना होगा. उम्मीद है इशांत शर्मा और रविंद्र जडेजा के बीच का मामला उतना बड़ा न निकले जितना उसे विदेशी मीडिया पेश कर रहा है.

अंजीर की बरफी

सामग्री

– 100 ग्राम अंजीर

– 1 बड़ा चम्मच खसखस

– 1/2 कप चीनी

– 1 बड़े चम्मच पानी

– थोड़ा सा पिस्ता.

विधि

– अंजीर को पूरी रात पानी में भिगोए रख कर सुबह ग्रांइडर में पीस लें.

– फिर 1-2 मिनट तक पकाएं.

– अब एक अन्य पैन में चीनी पिघला कर उस में अंजीर मिक्स्चर, पिस्ता व खसखस डाल कर घी लगी ट्रे में डाल मनचाही शेप दे कर सर्व करें.

  • व्यंजन सहयोग : सारिका मेहता

पोहा फिरनी

सामग्री

– 1 कप पोहा

– 1 लिटर दूध

– 5-6 बादाम कटे

– 1/2 कप चीनी

– 1 छोटा चम्मच केवड़ा

– सजाने के लिए चेरी.

विधि

– पोहा चर्न कर इस में दूध व चीनी मिलाएं और चलाते हुए गाढ़ा होने तक पकाएं.

– अब इस में बादाम और केवड़ा मिला कर चेरी से सजा कर ठंडाठंडा सर्व करें.

  • व्यंजन सहयोग : सारिका मेहता
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