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अपनाएं ये 5 उपाय और करें क्रैक हील की छुट्टी

हम सब जानते हैं कि क्रैक हील होने पर दर्द बहुत होता है साथ ही चलने में भी परेशानी होती है. सर्द हवाएं, नमी ना पहुंचना और पैरों की सही देखभाल ना करने की वजह से यह समस्‍या पैदा होती है. यदि सर्दियों की वजह से आपके पैर फटने लग गए हैं तो अब आप भी अपने क्रैक हील की छुट्टी कर सकती हैं. इसके लिए आपको बस यहां दिए गए कुछ उपाय अपनाने होंगे.

  • गरम पानी में सेंधा नमक, नींबू का रस, ग्‍लिसरीन और गुलाबजल डालिये. फिर उस पानी में अपने पैरों को 10-15 मिनट के लिये डुबोइये, फिर प्‍यूमिक स्‍टोन से एडियों को स्‍क्रब कर लीजिये. अब अपने पैरों को सुखा लीजिये, फिर नींबू, ग्‍लिसरीन और गुलाबजल मिला कर एडियों पर लगा लीजिये और मोजे पहन लीजिये. ऐसा 2-3 दिनों तक कीजिये.
  • रूखेपन की वजह से एड़िया फटने पर आप पैरों को औयल मसाज दें. यह तिल, नारियल या कोई भी वेजिटेबल औयल हो सकता है. रोज रात में सोने से पहले 3-5 दिनों तक के लिये मसाज कीजिये.
  • जब क्रैक बहुत गहरा हो गया हो और कोई इलाज काम ना आ रहा हो तो मोमबत्‍ती की मोम पिघला कर उसमें सरसों का तेल मिला कर गरम कर लें और गरम पानी में पैर भिगोने के बाद इस पेस्‍ट को क्रैक हील पर लगा लें. यह काम रात को सोने से पहले करें और बाद में मोजे पहन लें. ऐसा कम से कम हफ्तेभर करें.
  • पका केला लीजिये और उसे अपनी एड़ियों पर मल दीजिये. इसे 15 मिनट तक के लिये लगा रहने दीजिये और फिर पैरों को धो लीजिये. इससे आपकी एड़ियां मुलायम बन जाएंगी.
  • प्राकृतिक स्‍क्रबर यदि आपकी एडियों की त्‍वचा इसलिये फटती हैं क्‍योंकि वह रूखी है, तो उसे प्राकृतिक स्‍क्रबर से स्‍क्रब कीजिये. स्‍क्रब बनाने के लिये शहद, एप्‍पल साइडर वेनिगर और चावल का आटा मिला कर गाढा पेस्‍ट तैयार कीजिये. यदि क्रैक बहुत गहरा है तो उसमें बादाम तेल मिला लीजिये. फिर अपने पैरों को गरम पानी में भिगोइये और इस पेस्‍ट से स्‍क्रब कीजिये.

प्यार : सोच और वास्तविकता में है काफी फर्क

प्यार, ये शब्द सुनते ही हम ठहर जाते हैं. प्यार दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज होती है, ये हर चीज में जान डाल सकती है. और यही कारण है कि इंसान हो या पशु, सब प्यार के तलाश में भटकते रहते हैं. लेकिन सवाल यह है कि में प्यार है क्या? क्या आप जानते हैं कि वास्तव में प्यार होता  क्या है?

कभी-कभी ऐसा होता है, हम प्यार का मतलब गलत तरह से भी निकाल लेते हैं और ऐसे में इस बात को समझ नहीं पाते हैं कि हमारे चारों तरफ प्यार है. और जब हम प्यार का सही मतलब समझने लगते हैं, तो हमें अपना जीवन और पूरी दुनिया सबसे हसीन और खूबसूरत लगने लगती है, जिससे हम सबसे ज्यादा खुश और संतुष्ट महसूस करते हैं. तो आइये जानते हैं, प्यार के बारे में हम  क्या सोचते हैं और वास्तव में सच्चा प्यार क्या है?

सच्चा प्यार इमोशनल अटैचमेंट से अलग होता है – यह हमेशा लोगों के बीच एक आम गलतफहमी होती है कि अगर आप भावनात्मक रूप से किसी से जुड़ें हुए हैं तो वह सच्चा प्यार है. लेकिन दोनों में काफी अंतर होता है.

सच्चा प्यार क्या है – सच्चा प्यार का मतलब किसी को पाना नहीं होता है. बल्कि उसके लिए अपनी खुशी कुर्बान करना होता है. सच्चा प्यार सिर्फ शारीरिक आकर्षण नहीं होता है. जब आप प्यार में होते हैं तो आपको अपने आस-पास की चीजें खूबसूरत लगने लगती हैं. आप अपने पार्टनर के लिए बहुत ऐसी चीज करते हैं जिससे उनके चेहरे पर खुशी आ जाती है.

प्यार, आकर्षण और वासना में अंतर–  प्यार, आकर्षण और वासना के बीच कन्फ्यूज नहीं होना चाहिए, क्योंकि इन तीनों के बीच एक स्पष्ट अंतर होता है. अगर आप इन तीनों को मिला देंगे तो यह आपके लिए हानिकारक अनुभव हो सकता है. किसी को देखकर अगर आपको सिर्फ उससे शारीरिक संबंध बनाने का ख्याल आता है तो वह प्यार नहीं होता है. अगर आपको सिर्फ कोई अच्छा लगता है तो आपको उसके साथ कुछ समय बिताना अच्छा लगता है, लेकिन अगर आप किसी से सच्चा प्यार करते हैं तो आप उसके साथ अपनी पूरी जिंदगी बिताना चाहते हैं.

क्या पहली नजर में प्यार होता है – जी हां, पहली नजर में प्यार होता है. अक्सर लोगों में यह गलतफहमी होती है कि पहली नजर में जो होता है वो प्यार नहीं आकर्षण होता है लेकिन ऐसा नहीं है. पहली नजर में हुए प्यार से भी लोग शादी तक पहुंच जाते हैं.

अमेरिका में शिक्षकों को बंदूक देने की सिफारिश : क्या हथियार बांटना ही सुरक्षा की गारंटी

हाथों में हथियार देने की पैरवी कर के किसी भी तरह से अपराध रोकने या सुरक्षा की गारंटी नहीं दी जा सकती. लेकिन अमेरिका में स्कूलों में बढ़ती गोलीबारी की घटनाओं को देखते हुए डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा गठित आयोग ने शिक्षकों को बंदूकें देने की सिफारिश की है. इस सिफारिश की विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने तो आलोचना की ही है, सुरक्षा का यह उपाय कई बुद्धिजीवियों के भी गले नहीं उतर रहा है.

अमेरिका में पिछले कुछ समय से स्कूलों में गोलीबारी की कई घटनाएं हो चुकी हैं. 18 मई 2018 को टैक्सास के सांता फे हाईस्कूल में हुई गोलीबारी में 10 लोग मारे गए और 13 घायल हुए थे. फरवरी 2018 में फ्लोरिडा के मेर्जरी स्टोनमैन डगलस हाईस्कूल में 17 मारे गए. अक्तूबर 2015 में ओरेगौन के उपकुआ कम्युनिटी कौलेज में हुई गोलीबारी में 10 लोगों की जान चली गई थी. दिसंबर 2012 में कनेक्टिकट के सैंडी हुक एलिमेंटरी स्कूल के छात्र ने 28 को गोलियों से भून दिया था. अप्रैल 2007 में वर्जीनिया टेक स्कूल के एक छात्र ने 32 छात्रों और शिक्षकों को मार डाला था.

स्कूलों में लगातार वारदातें बढ़ रही थीं. 1990 के दशक में अमेरिकी स्कूलों में 10 घटनाएं हुईं जिन में 36 लोगों की जानें गईं. 2000 से मई 2018 के बीच गोलीबारी की 22 घटनाएं हुईं इन में 66 लोग मारे गए. इन वारदातों में 77 फीसदी से अधिक गोलीबारी की घटनाओं में दोषी की उम्र 13 से 29 साल थी.

फ्लोरिडा के मेर्जरी स्टोनमैन डगलस हाईस्कूल की घटना के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शिक्षा मंत्री बेस्टी डावोस की अगुवाई में स्कूल सेफ्टी पैनल का गठन किया था.

इस घटना को ले कर अमेरिका में बंदूक रखने की संस्कृति पर नियंत्रण के लिए बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे.

ट्रम्प को सौंपी गई 180 पन्नों की रिपोर्ट में आयोग ने स्कूल में तैनात कर्मचारियों को बंदूक से लैस करने का सुझाव दिया है. आयोग का दावा है कि अगर यह सिफारिशें मानी गईं तो इस से ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों के स्कूलों को ज्यादा लाभ होगा क्योंकि वहां पुलिस को पहुंचने में अधिक समय लग जाता है.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि शिक्षा विभाग, गार्ड सहित अन्य पदों पर सेना और पुलिस बल से सेवानिवृत्त होने वाले अफसरों की तैनाती कर सकता है. ये अफसर सुरक्षा व्यवस्था बढाने के साथसाथ असरदार शिक्षक की भूमिका भी निभा सकते हैं.

अमेरिकी स्कूलों में हुईं गोलीबारी की वारदातों में कहीं न कहीं गोरेकालों के बीच भेदभाव की सोच छिपी रही है. इसीलिए 2014 में ओबामा सरकार ने गोलीबारी की घटनाओं के बाद गोरे और लातिन अमेरिकी छात्रों से भेदभाव की शिकायतों से निपटने के लिए निलंबन व निष्कासन जैसे कठोर कदमों का विकल्प तलाशने के दिशानिर्देश देने पड़े थे.

भारत में फूलन देवी जैसे अनगिनत उदाहरण हैं जो भेदभावजनित अपराधी हैं. यहां के  गांवों में आए दिन ऊंचनीच के भेदभाव के चलते गोलीबारी की घटनाएं हो रही हैं. कभी दलित दूल्हे को घोड़ी से उतारने के लिए, कभी जुलूस निकालने, कभी आरक्षण की मांग तो कभी मंदिर में घुसने, तालाब का पानी लेने या खानेपीने की चीजें छू लेने पर होती रहती हैं.

दरअसल हथियार का जवाब हथियार नहीं हो सकता. जितने हाथों में हथियार होंगे, अपराध उतने ही ज्यादा होंगे. हथियार चाहे वैध हो या अवैध. स्कूलों के कर्मचारियों के हाथों में हथियार थमाने से वारदातें नहीं घटेंगी, अमेरिकी समाज में व्याप्त भेदभाव की सोच को खत्म करने से थमेंगी.

जीरो : अपने नाम को सार्थक करती फिल्म…

‘तनु वेड्स मनु’, ‘रांझणा’, ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न’ जैसी फिल्मों के सर्जक आनंद एल राय अब शाहरुख खान, अनुष्का शर्मा और कैटरीना कैफ के साथ फिल्म ‘‘जीरो’’ लेकर आए हैं, मगर इस फिल्म में उनकी अपनी निर्देशन शैली की कोई छाप नजर नहीं आती.

फिल्म ‘‘जीरो’’ की कहानी मेरठ निवासी छोटे कद (चार फुट छह इंच) के यानी बौने इंसान बउआ सिंह (शाहरुख खान) की है, जिससे उनकी मां (शीबा चड्ढा) और उनके पिता (तिग्मांशु धूलिया) दोनों बहुत परेशान रहते हैं. बउआ सिंह अपने पिता के पैसे लोगों में बांटते रहते हैं. बउआ सिंह मशहूर अभिनेत्री बबिता कुमारी (कैटरीना कैफ) की फिल्मों के दीवाने हैं. वह एक नृत्य प्रतियोगिता का फार्म महज इसलिए भरते हैं कि विजेता को बबिता कुमारी के हाथों पुरस्कार मिलना है. 38 साल की उम्र हो गयी है पर बउआ सिंह की शादी नहीं हुई है. शादी के लिए उन्हें कोई लड़की ही नहीं मिल रही है. वह अपनी शादी के लिए लड़की तलाश रहे हैं. इसके लिए वह बार बार अपने दोस्त गुड्डू सिंह (मोहम्मद जीशान अयूब) के साथ इंटरनेट के माध्यम से शादी कराने वाली संस्था के पांडे जी (ब्रजेंद्र काला) के पास बार बार जाते रहते हैं. एक दिन पांडे जी के आफिस में आफिया (अनुष्का शर्मा) की तस्वीर देखकर वह उस पर लट्टू हो जाते हैं.

सेरेब्रल पल्सी की बीमारी से ग्रसित आफिया अमरीका में नासा की वैज्ञानिक है, जिसने मंगल ग्रह पर अंतिरक्ष यान भेजा है और मंगल ग्रह पर दूसरा अंतरिक्ष यान भेजने की तैयारी कर रही है, जिसमें वह एक बंदर यानी कि चिंपांजी या किसी मनुष्य को भेजकर प्रयोग करना चाहती है. वह एक समारोह का हिस्सा बनने व शादी के लिए लड़के की तलाश में पूरे परिवार के साथ भारत आयी हुई है. पांडेजी के कहने पर आफिया व बउआ सिंह की मुलाकात होती है. दोनों में प्यार होता है. फिर उनके बीच सेक्स/शारीरिक संबंध भी बन जाते हैं और शादी की तैयारी शुरू हो जाती है.

तभी बउआ की मुलाकात शराब में धुत बबिता कुमारी से हो जाती है. शराब के नशे में धुत बबिता कुमारी,  बउआ सिंह का चुंबन लेकर चली जाती है. मजेदार बात यह है कि अब बउआ को लगता है कि वह शादी के लिए तैयार नहीं है. मगर पिता के दबाव में बउआ दूल्हा बन बारात लेकर आफिया के यहां पहुंचते हैं, तभी उनका जिगरी दोस्त गुड्डू सिंह बताता है कि नृत्य प्रतियोगिता के लिए बउआ का चयन हो गया है. तब बउआ सिंह, आफिया से मिलकर शादी तोड़कर वहां से भागकर नृत्य प्रतियोगिता का हिस्सा बनने पहुंचते हैं. विजेता बनकर वह बबिता कुमारी से पुरस्कार लेते हैं, फिर वह बबिता कुमारी के दीवाने हो जाते हैं. बबिता कुमारी उनकी बातों से प्रभावित होकर उन्हें अपने साथ रख लेती है, पर एक दिन जब बबिता कुमारी से मिलने पहुंचे उनके प्रेमी (अभय देओल) के खिलाफ बउआ सिंह कुछ कह देते हैं, तो बबिता कुमारी नाराज होकर बउआ सिंह को बेइज्जत कर भगा देती है और तब बउआ सिंह को फिर से आफिया की याद आती है. वह अपने दोस्त गुड्डू सिंह के साथ अमेरीका नासा पहुंचकर आफिया से मिलने का प्रयास करते हैं. बउआ सिंह से नाराज आफिया अब चिंपांजी के बजाय मंगल यान में बउआ सिंह को भेजने का निर्णय लेती है, इसमें उनके प्रेमी (आर माधवन) की भी सहमति है. इस बीच पता चलता है कि आफिया, बउआ सिंह की बेटी की मां बन चुकी है. बहरहाल, मंगल यान के साथ अंतरिक्ष में बउआ सिंह को भेजा जाता है और पंद्रह साल बाद यह अंतरिक्ष यान प्रशांत महासागर में गिरता है.

ऐसा पहली बार हुआ है, जब फिल्म ‘‘जीरो’’ प्रदर्शन से पहले ही शाहरुख खान द्वारा बौने का चुनौतीपूर्ण किरदार निभाने को लेकर अत्याधिक चर्चा में रही और दर्शकों के मन में इस फिल्म ने काफी उत्सुकता जगायी थी. मगर यह फिल्म दर्शकों के साथ साथ शाहरुख खान के प्रशंसकों को बुरी तरह निराश करती है. वीएफएक्स का बेहतर उपयोग किए जाने के बावजूद फिल्म ‘जीरो’ अपने नाम को ही सार्थक करती है.

पूरी फिल्म में दर्शक बौने इंसान की बजाय शाहरुख खान को उनकी इमेज के अनुरूप देखता रहता है. वह फिल्म में बौने इंसान के दर्द के साथ कहीं नजर नहीं आते. अलबत्ता वह हर दृश्य में खुद को दोहराते हुए ही नजर आते हैं. बालों की स्टाइल व अपने चिरपरिचित मैनेरिजम के साथ कच्छा बनियान पहने हुए शाहरुख खान बार बार अपनी पिछली बुरी तरह से असफल फिल्म ‘‘फैन’’ की ही याद दिलाते हैं.

जिसे ‘जीरो’ में दर्शक बर्दाश्त नहीं कर पाता. मजेदार बात यह है कि वह बौने हैं, मगर गायन या नृत्य करते समय कहीं भी कुछ भी परेशानी या असहजता नहीं होती, जबकि कुछ तो भिन्नता होनी चाहिए थी. पर हर वक्त शाहरुख खान अपनी चिरपरिचित शैली में ही नजर आते हैं. बउआ के किरदार मे शाहरुख खान बौने के रूप में सागर में गोता लगाते हुए बहुत कुछ कर सकते थे, पर वह तो देशभक्त बन कुछ करने का ऐसा प्रयास करते हैं कि वह अविश्वसनीय हो जाता है.

चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में दो लोग (बउआ सिंह और आफिया) घनिष्ठता बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं, यह एक महान आधार हो सकता था. मगर इसे भी लेखक व निर्देशक दोनों सही परिप्रेक्ष्य में पेश करने में विफल रहे हैं. हालात यह है कि फिल्म के शुरू होने के दस मिनट बाद ही दर्शक सोचने लगता है कि इस सिरदर्द से कब छुटकारा मिलेगा.

बतौर निर्देशक आनंद एल राय बुरी तरह से मात खा गए हैं. फिल्म की कहानी से लेकर कुछ भी ऐसा नहीं है, जो कि विश्वसनीय लगे. हर दृश्य अविश्वसनीयता से भरा हुआ है. फिल्म में इंटरवल के बाद नासा की ट्रेनिंग का हिस्सा बेवजह लंबा खींचा गया है, जो कि दर्शकों को बोर करने के साथ ही फिल्म को बद से बदतर बनाता है. आनंद एल राय ने एक अच्छे विषय को उठाया, मगर स्टार कलाकार के चक्कर में तहस नहस कर डाला. वह शाहरुख खान को सुपर हीरो बनाने व अंतरिक्ष के चक्कर में ऐसा फंसे कि इंसानी रिश्तों, संवेदनाओं, मानवता आदि सब कुछ भुला बैठे. इतना ही नहीं वह अब तक की अपनी फिल्मों की पहचान यानी कि छोटे शहर, वहां की मिट्टी व छोटे शहरों के परिदृश्य से ऐसा भागे कि फिल्म को डुबा डाला.

फिल्म के निर्माता के तौर पर आनंद एल राय और गौरी खान ने कुछ कंपनियों व प्रोडक्ट के साथ इस फिल्म की ब्रांडिंग कर पैसे जरुर बटोर लिए. इसके अलावा दोनों ने इस फिल्म में अपने संबंधों के आधार पर कई कलाकारों को मेहमान कलाकार के तौर पर जोड़कर फिल्म में चार चांद लगाने का असफल प्रयास किया. पूरी फिल्म देखकर अहसास होता है कि फिल्मकार ने कहानी, पटकथा, चरित्र चित्रण व निर्देशन आदि पर ध्यान देने की बजाय अन्य चीजों पर अपना ध्यान केंद्रित रखा.

फिल्म के लेखक हिमांशु शर्मा इस बार बुरी तरह मात खा गए. उन्होंने शीरीरिक रूप से कुछ कमी वाले किरदार तो गढ़ दिए, पर वह यह भूल गए कि इन किरदारों के साथ किस तरह कहानी गढ़ी जाए. किरदारों के बीच कोई आपसी संबंध ही नहीं बन पाता. इतना ही नहीं इस बार हिमांशु शर्मा ने सड़क छाप संवाद लिखे हैं. भारतीय संस्कृति में एक पिता घर के अंदर अपने बेटे को बुरा भला कहता है, मगर वह दूसरों के सामने अपने बेटे को अपमानित नहीं करता है. मगर फिल्म ‘जीरो’ में बउआ सिंह के पिता शादी के समय बउआ सिंह के होने वाले ससुर से कहते हैं – ‘‘इसे अमेरीका ले जाकर घर में रखकर टिकट लगवा कर…’’ अफसोस की बात है कि फिल्म के निर्देशक आनंद एल राय ने भी इन संवादो को संभालने का प्रयास नहीं किया.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो चार फुट छह इंच के बउआ सिंह के किरदार में कहीं भी शाहरुख खान प्रभावित नहीं करते. सेलेब्रल पल्सी से ग्रसित आफिया के किरदार में अनुष्का शर्मा ने अविश्वसनीय अभिनय किया है. काश इस फिल्म में अभिनय करने से पहले उन्होंने सोनाली बोस निर्देशित फिल्म ‘‘मार्गरीटा विद ए स्ट्रा’’ में कल्कि कोचलीन के अभिनय को देखकर कुछ सीख लेती. कैटरीना कैफ का किरदार बहुत ही छोटा है, उन्हें ऐसी फिल्में करने की जरुरत क्यों पड़ रही है, यह वही जानें. अभय देओल व आर माधवन की प्रतिभा को जाया किया गया है. मोहम्मद जीशान अयूब ने जरुर ठीक ठाक अभिनय किया है.

दो घंटे 44 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘जीरो’’ का निर्माण गौरी खान ने ‘रेड चिली इंटरटेनमेंट’ और आनंद एल राय ने ‘कलर येलो प्रोडक्शन’ के बैनर तले किया है. फिल्म के निर्देशक आनंद एल राय, लेखक हिमांशु शर्मा, संगीतकार अजय तुली, कैमरामैन मनु आनंद तथा कलाकार हैं – शाहरुख खान, अनुष्का शर्मा, कैटरीना कैफ, अभय देओल, आर माधवन, तिग्मांशु धूलिया, शीबा, ब्रजेंद्र काला, मोहम्मद जीशान अय्यूब के अलावा मेहमान कलाकार काजोल, जुही चावला, सलमान खान, श्रीदेवी, आलिया भट्ट, करिश्मा कपूर, दीपिका पादुकोण, गणेश आचार्य व रेमो डिसूजा.

धर्म का नहीं राजनीति का कुंभ

कुंभ के आयोजन पर 2019 के आम चुनाव की राजनीति को साफ देखा जा सकता है. इसके चलते अब कुंभ धर्म का नहीं राजनीति का कुंभ बनकर रह जा रहा है.

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार कुंभ को अपने सरकारी प्रचार प्रसार का जरीया बना रही है. कुंभ की तैयारी में पूरी सरकारी मशीनरी जुट गई है. कुंभ का आयोजन इलाहाबाद में होता था. इलाहाबाद का नाम बदल कर प्रयागराज हो गया है. इस बार प्रयागराज में सरकार कुंभ को नये अंदाज में मनाने जा रही है. इसके बीच ही प्रयागराज से सटे वाराणसी जिले में 100 से ज्यादा मेहमानों को बुलाया जा रहा है. इसका नाम भी कुंभ से जोडकर ‘प्रवासी कुंभ’ रखा जा गया है.

वैसे यह प्रवासी भारतीयों का सम्मेलन है. 21 से 23 जनवरी 2019 के बीच होने वाले इस आयोजन में अभिनेता अमिताभ बच्चन को भी जोड़ा गया है. इसमें अयोध्या से जुडी राम की कहानी भी दिखाई जायेगी. काशी के 200 सालों की कहानी भी बताई जायेगी. असल में काशी में हो रहे ‘प्रवासी कुंभ’ को भी प्रयागराज के आयोजित कुंभ से जोडकर तैयार किया गया है.

इलाहाबाद में कुंभ के महत्व को देखें तो हर 6 साल के बाद अर्द्व कुंभ और 12 साल के बाद कुंभ का आयोजन यहां होता रहा है. पिछला कुंभ 2013 में हुआ था. इस हिसाब से 2019 में अर्द्व कुंभ और 2025 में कुंभ का आयोजन होना है. 2019 के अर्द्व कुंभ के समय ही लोकसभा के आम चुनाव होने हैं. भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने कुंभ को चुनाव में धर्मिक मुददा बनाने के लिये अर्द्व कुंभ को ही कुंभ का नाम दे दिया है.

यही नहीं सरकार इसके प्रचार प्रसार में भी कोई कसर नहीं छोड़ रही है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्यपाल राम नाइक के साथ यहां की तैयारियों को देखा. इस मौके पर ‘इलाहाबाद’ के नाम को बदल कर ‘प्रयागराज’ करने की घोषणा भी कर दी है. जनवरी 2019 में कुंभ स्नान के पहले प्रधनमंत्री नरेंद्र मोदी के यहां आने की तैयारी है. दिसम्बर माह में यहां प्रधनमंत्री का दौरा प्रस्तावित है. वह कुंभ से जुड़ी तमाम योजनाओं को शिलान्यास कर कुंभ के आयोजन को भव्य रूप प्रदान करेंगे.

3 राज्यों में चुनावी हार के बाद भी जिस तरह से भाजपा कुंभ के आयोजन को लेकर सरकारी प्रचार में लगी है उससे साफ लग रहा है कि 2019 के चुनाव में हिदुत्व ही पार्टी का मुददा होगा. विकास की बात केवल कहने भर के लिये होगी. हिन्दी क्षेत्रों में हार के बाद भी पार्टी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रा योगी आदित्यनाथ को ही अपना सबसे बडा चुनाव प्रचारक बनायेगी.

जनवरी माह में पार्टी कार्यकारणी की बैठक है इसमें इसी के मद्देनजर फैसला लिया जायेगा. पार्टी के बड़े तबके की राय है कि हिंदुत्व के सहारे ही सरकारी की नाकामी को छिपाया जा सकता है. भाजपा के लिये जातीय खेमेबंदी सबसे घातक होगी. ऐसे में वह जाति के बजाय धर्म पर फोकस करना चाहती है. राजनीतिक जानकार भी मानते है कि कुंभ से ही भाजपा का चुनावी प्रचार शुरू हो जायेगा.

कांग्रेस की तरफ लौटता आदिवासी वोट

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव नतीजों ने एक बात आईने की तरह साफ कर दी है कि 15 साल बाद फिर आदिवासियों ने कांग्रेस पर पहले सा भरोसा जताया है जहां 90 में से रिकार्ड 68 सीटें कांग्रेस के खाते में गईं.

यही बात मध्यप्रदेश से भी साबित हुई है कि यहां भी आदिवासी समुदाय ने कांग्रेस को इफरात से वोट दिया है नहीं तो साल 2003, 2008 और फिर 2013 के विधानसभा चुनावों में आदिवासी इलाकों से कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया था जिसके चलते उसे सत्ता गंवाना पड़ी थी. आजादी के बाद से ही आदिवासी कांग्रेस को वोट देते रहे थे उसका यह परम्परागत वोट जब उससे बिदका तो एक वक्त में लगने लगा था कि अब आदिवासी समुदाय भी भगवा रंग में रंग चुका है और खुद को हिन्दू मानने लगा है.

लेकिन हालिया 2018 के नतीजों ने भाजपा और आरएसएस की यह गलत या खुशफहमी दूर कर दी है और इकलौता संदेश यह दिया है कि कांग्रेस की तरफ उसके वापस लौटने की वजह यह नहीं है कि वह कोई उनकी बहुत बड़ी हिमायती या हमदर्द पार्टी है बल्कि वजह यह है कि हिंदूवादी उसकी सामाजिक ज़िंदगी में हद से ज्यादा दखल देने लगे थे.

धर्मांतरण के मसले पर ईसाई मिशनरियों को कोसते रहने वाले भगवा खेमे ने आदिवासियों को न केवल हिन्दू देवी देवताओं की तस्वीरें बांटना शुरू कर दिया था बल्कि आदिवासी इलाकों में इफरात से पूजा पाठ भी शुरू कर दिये थे जिसका हर मुमकिन विरोध आदिवासी तरह तरह से यह दलील देते करते रहे थे कि वे हिन्दू नहीं हैं और यह जबरिया हिन्दुत्व उन पर थोपना बंद किया जाये.

हिंदूवादियों ने इस पर गौर नहीं किया नतीजतन विधानसभा चुनाव में आदिवासियों का गुस्सा और एतराज ईवीएम के जरिये फूटा तो भाजपा सकते में आ गई कि यह क्या हो गया अब उसकी नई चिंता 2019 के लोकसभा चुनाव हैं जिनमें 29 में से 10 लोकसभा सीटों पर आदिवासी निर्णायक भूमिका निभाते हैं ये सभी सीटें 2013 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के खाते में गईं थीं .

जयस ने करवाए वोट ट्रांसफर

विधानसभा चुनाव के पहले तक निमाड इलाके में जय आदिवासी शक्ति युवा संगठन यानि जयस की खूब चर्चा रही थी. इसके मुखिया डाक्टर हीरालाल अलावा ने कोई 80 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का ऐलान करते ही कांग्रेस और भाजपा दोनों की नींद उड़ा दी थी. हीरालाल अलावा एम्स जैसे नामी इंस्टिट्यूट की नौकरी छोड़कर सियासी मैदान में कूदे थे. उन्होंने बड़े पैमाने पर आदिवासी युवाओं को जयस से जोड़ने में कामयाबी हासिल कर ली थी. खासतौर से निमाड इलाके में तो साफ हो गया था कि जयस यहां दोनों पार्टियों का खेल बिगाड़ेगी और तीसरी ताकत बनकर उभरेगी.

चुनाव के ठीक पहले तक किसी से गठबंधन या समझौते से इंकार कर रहे अलावा ने जब जयस का विलय बिना किसी शर्त के कांग्रेस में कर लिया तो हर किसी को हैरानी हुई थी कि अब शायद ही आदिवासी उन्हें पूछें. वजह हीरालाल अलावा भाजपा के साथ साथ कांग्रेस को भी बराबरी से कोसते रहते थे कि उसने आजादी के बाद से ही आदिवासियों के लिए खास कुछ नहीं किया फिर एकाएक ही कांग्रेस से उनके हाथ मिला लेने की वजह किसी की भी समझ से परे थी. लोगों और राजनैतिक जानकारों ने यह मान लिया था कि जयस की भ्रूण हत्या हो गई और कुछ कर दिखाने से पहले ही उसका वजूद खत्म हो गया जिसका फायदा भाजपा को मिलेगा.

पर हुआ उल्टा जब नतीजे आए तो आदिवासी इलाकों खासतौर से निमाड में कांग्रेस का परचम लहरा रहा था खुद हीरालाल अलावा ने धार जिले की मनावर सीट से भाजपा की दिग्गज नेत्री और पूर्व मंत्री रंजना बघेल को लगभग 39 हजार वोटों से हराकर सभी को हैरान कर दिया क्योंकि धार की 8 सीटों में से 6 कांग्रेस को मिलीं और महज 2 पर ही भाजपा जीत दर्ज कर पाई. यानि जयस का वोट अपनी जगह से हिला नहीं था और आदिवासियों ने जयस के कांग्रेस में विलय के फैसले पर कोई एतराज न जताकर उसे समर्थन ही दिया था. कैसे जयस का वोट कांग्रेस को ट्रांसफर हुआ इस और ऐसे दूसरे मुद्दों पर जब इस प्रतिनिधि ने हीरालाल अलावा से बात की तो उन्होने बताया कि अगर जयस अलग से लड़ती तो विलाशक कम से कम 4.6 सीटें ले जाती और 8.10 पर दूसरे नंबर पर आती.

एक सधे राजनेता की तरह समीकरणों का खुलासा करते अलावा बताते हैं कि लेकिन इससे जयस के गठन का मकसद पूरा नहीं हो रहा था क्योंकि फिर कांग्रेस निमाड में उतनी सीटें नहीं ले जा पाती जितनी कि वह ले गई. हमारा मकसद हिंदूवादियों को खदेड़ना था जिसमें हम कामयाब भी रहे हैं. भाजपा ने मुझे घेरने और मनाने में कोई कसर या लालच नहीं छोड़ा था वह चाहती थी कि जयस अलग से लड़े इसके पीछे उसकी मंशा वोटों के बटबारे और बाद में तोडफोड की थी.

बिलाशक फैसले के लिए यह मुश्किल वक्त था अलावा कहते हैं एक तरफ आदिवासियों की उम्मीदें थीं और दूसरी तरफ उनके हितों से जुड़े मुद्दे थे जिनकी चर्चा जब मैंने राहुल गांधी से की तो वे मेरी भावनाओं से सहमत हुये. यह कोई सौदेबाजी नहीं थी बल्कि अब तक की गई मेहनत का सही जगह निवेश कर ज्यादा से ज्यादा रिटर्न लेने का तरीका था.  भाजपा ने जयस को और मुझे बदनाम करने और हमारे कार्यकर्ताओं को तोड़ने भी तरह तरह की साजिशें रचीं थीं जिन्हें आदिवासियों ने समझदारी दिखाते नाकाम कर दिया तो मुझे अपने फैसले पर खुशी ही हुई क्योंकि दांव पर आदिवासियों की गैरत और वजूद था. इस मामले पर मीडिया ने भी मुझे नजरंदाज किया था और अभी भी कर रहा है तो लगता है कि सब कुछ ठीकठाक और निष्पक्ष नहीं है. राष्ट्रीय स्तर पर सिर्फ सरस सलिल ने हमारी बात की और उठाई थी.

अब कांग्रेस हीरालाल अलावा को मंत्री बनाती है या नहीं यह देखना दिलचस्पी की बात होगी आदिवासी समुदाय से डाक्टर होने के नाते उनकी स्वभाविक दावेदारी स्वास्थ विभाग पर बनती है लेकिन आंकड़ों में देखें तो उनका यह दावा सच के बेहद नजदीक दिखता है कि कांग्रेस के सत्ता में होने की एक बड़ी वजह जयस और आदिवासी वोट हैं . धार से लगे खरगोन जिले की भी 8 में से 6 सीटें कांग्रेस को मिली हैं जबकि निमाड और मालवा को जोड़ते उज्जैन की 8 में से 5 सीटें वह ले गई है. भाजपा के गढ़ बनते जा रहे खंडवा में भाजपा 8 में से 3 सीटें ही जीत पाई.

निमाड से बाहर की आदिवासी सीटों पर भी कांग्रेस को उम्मीद से ज्यादा फायदा मिला है. महकौशल के आदिवासी बाहुल्य जिले मंडला में उसे 8 में से 6 सीटें मिली हैं और विदर्भ से लगे बैतूल में भी 8 में से 5 सीटें ले गई है. कमलनाथ की लोकसभा छिंदवाड़ा में तो भाजपा खाता भी नहीं खोल पाई.

अब कांग्रेस कैसे आदिवासियों का समर्थन बरकरार रखेगी यह मुख्यमंत्री कमलनाथ पर निर्भर है नहीं तो शिवराज सिंह चौहान ने तो आदिवासियों का वैसा ही मज़ाक बनाकर रख दिया था जैसा कभी कांग्रेस बनाती थी मसलन मोर पंख लगाकर उनके साथ नाचना गाना और हाथ में तीर कमान या भाला पकड़कर फोटो खिंचवाना. आदिवासी संस्कृति के स्वाभिमान को समझकर और उनकी सामाजिक ज़िंदगी में दखल देकर ही उनके वोट लिए जा सकते हैं यह बात अगर कांग्रेस समझ पाई और उस पर अमल कर पाई तो तय है लोकसभा चुनाव में भी उसकी बढ़त बनी रहेगी.

 

दस साल बाद अभिनय में वापसी करेंगी टैरो कार्ड रीडर मुनिषा खटवानी

टीवी सीरियल ‘‘तंत्रा’’ में मुनिषा मामी के किरदार को निभा रही मशहूर टैरो कार्ड रीडर मुनिषा खटवानी ने पूरे दस साल बाद अभिनय में वापसी की है. अपनी इस वापसी से वह काफी उत्साहित हैं. हाल ही में जब मुनीषा खटवानी से हमारी मुलाकात हुई, तो हमने उनसे टीवी पर अभिनेत्री के तौर पर वापसी को लेकर सवाल किया.

इस पर मुनिषा खटवानी ने कहा – ‘‘मैं टीवी पर अभिनेत्री के तौर पर वापसी से काफी खुश हूं. मैं एक बेहतरीन सीरियल का हिस्सा हूं. लेकिन ‘तंत्रा’ में अभिनय करना मेरे लिए बहुत आसान नही रहा. क्योंकि मैंने पहले कभी किसी डेली सोप में अभिनय नहीं किया था, जबकि ‘तंत्रा’ एक डेलीसोप है.

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लेकिन मुझे खुशी है कि मैं एक बार फिर से सेट पर वापस आयी हूं और बहुत अच्छे अनुभव हो रहे हैं. मैं सीरियल के निर्माता सिद्धार्थ कुमार तिवारी और कलर्स चैनल की शुक्रगुजार हूं, जिन्होंने मेरी अभिनय क्षमता पर भरोसा कर मुझे इस सीरियल के साथ जोड़ा.’’

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सीरियल ‘‘तंत्रा’ ’के अपने किरदार की चर्चा करते हुए मुनिषा खटवानी ने आगे कहा – ‘‘मैं इस सीरियल में अपने आपको ही निभा रही हूं. मैं मुनिषा मामी बनी हूं, जो कि मनीष व जुही की सिस्टर इन लौ है. मैं इस घर की युवा मामी हूं, जोकि हमेशा खूबसूरत मेकअप किए रहती है. मैं काफी सामाजिक हूं और हर दिन अखबार में अपनी तस्वीर देखना पसंद करती हूं. मुझे लगता है कि मैं इस किरदार के साथ रिलेट करती हूं. अभिनय में मुझे बहुत ज्यादा मेहनत करने की जरुरत नहीं पड़ रही है, क्योंकि मैं निजी जिंदगी में भी ऐसी ही हूं. यह सीरियल स्पिरिट व सुपरस्टीशन पर है, जिन पर मेरा यकीन है, क्योंकि मै टैरो कार्ड रीडर भी हूं.’’

नमक का ज्यादा सेवन है खतरनाक, हो सकती हैं ये बीमारियां

शरीर में आयोडीन की मात्रा का होना जरूरी है और खाने वाला नमक आयोडीन का मुख्य स्रोत है. जानकारों की माने तो दिनभर में व्यक्ति को 5 ग्राम से ज्यादा नमक का सेवन नहीं करनी चाहिए.

स्टडी में पाया गया है कि देश के कई हिस्सों में लोग निर्धारित मात्रा से ज्यादा नमक का सेवन कर रहे हैं. दिल्ली और हरियाणा में नमक का सेवन प्रतिदिन 9.5 ग्राम और आंध्र प्रदेश में प्रतिदिन 10.4 ग्राम होता है, जो डब्ल्यूएचओ द्वारा निर्धारित मात्रा से कहीं ज्यादा है.

सेहत विशेषज्ञों की माने तो खाने में ज्यादा नमक के सेवन से रक्तचाप पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है. ये बीमारी धीरे धीरे कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों का भी कारण बन सकती है. वहीं संतुलित मात्रा में नमक का सेवन करने से दिल की बीमारी का खतरा 25 फीसदी कम हो जाता है. इसके साथ ही दिल की बीमारी से मरने की संभावना भी 20 फीसदी कम हो जाता है.

जानकारों का मानना है कि भारतीय आहार सोडियम से भरपूर रहते हैं. ऐसे में और ज्यादा नमक का सेवन गैर-संक्रमणीय बीमारियों के खतरे को और ज्यादा बढ़ा देता है. इससे व्यक्ति के गुर्दे पर काफी बुरा असर पड़ता है. ब्लडप्रेशर और हाइपरटेंशन का खतरा भी बढ़ जाता है.

हाई ब्लडप्रेशर के मरीजों के धमनियों के कठोर होने की संभावना तेज हो जाती है. इससे शरीर में रक्त प्रवाह में परेशानी आती है. इसके साथ ही चेहरे में औक्सीजन के प्रवाह में कमी आती है और त्वचा सूखने लगता है. इसके अलावा त्वचा पर तेजी से झुर्रियां भी पड़ सकती हैं. इससे व्यक्ति की उम्र बढ़ी हुई दिखती है. स्वास्थ्य पर और भी कई नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं. इस लिए जरूरी है कि नमक का सेवन हम संतुलित मात्रा में ही करें. इसका असंतुलित सेवन हमारे लिए काफी हानिकारक है.

आपकी आंखें बताएंगी कितने तनाव में हैं आप

मानसिक बीमारी को देख पाना संभव नहीं है. केवल पीड़ित उसे महसूस करता है. इस बीमारी को समझने में भी काफी वक्त निकल जाता है. पीड़ित अक्सर इस बीमारी के बारे में दूसरों से चर्चा करने से कतराते हैं. जिसके कारण इसका स्वरूप और बड़ा हो जाता है. तनाव, डिप्रेशन या मानसिक बीमारी से संबंधित एक शोध में कुछ नई बातें  सामने आईं हैं. स्टडी के मुताबिक इंसान की आंख की पुतली के साइज के आधार पर पता लगाया जा सकता है कि कोई व्यक्ति कितने तनाव में है.

कोलंबिया के एक विश्लविद्यालय में हुए हालिया शोध में ये बात सामने आई है. शोध में कहा गया है कि व्यक्ति की आखों को देख कर उसके दिमाग को समझा जा सकता है. इससे व्यक्ति के तनाव को समझ कर समस्या का इलाज किया जा सकता है.

मानसिक सेहत का पता लगाने के लिहाज से ये शोध काफी अहम रहा. इसमें कहा कि इंसान की आंख की पुतली से लोगों की मानसिक सेहत का पता लगाया जा सकता है. असल में जब हम कोई जटिल काम करते हैं, तो इंसान की आंखें अनिश्चित रूप से काम करने लगती हैं. इससे लोगों के मानसिक सेहत का पता लगाने में काफी मदद मिलती है.

शोधकर्ताओं का मानना है कि इस शोध से आए नतीजों से कामगर लोगों को होने वाली मानसिक तनाव का शिकार होने से पहले अपने तनाव के स्तर को जानने में भी मदद मिलेगी.

करवाचौथ पर मौत का उपहार : प्यार में ये क्या कर बैठा मंजीत

29अक्तूबर, 2018 को सुबह के करीब 8 बजे थे. तभी रोहिणी जिले के थाना बवाना के ड्यूटी अफसर हैडकांस्टेबल जितेंद्र कुमार मीणा को सूचना मिली कि दरियापुर-बवाना रोड पर वर्मी कंपोस्ट पोली फार्म के पास एक महिला को किसी ने गोली मार दी है. महिला स्कूटी से जा रही थी.

ड्यूटी अफसर ने इस सूचना से इंसपेक्टर राकेश कुमार को अवगत करा दिया. इंसपेक्टर राकेश कुमार तुरंत एएसआई राजेश कुमार, कांस्टेबल यशपाल, अनिकेत आदि को ले कर घटनास्थल की ओर रवाना हो गए.

घटनास्थल थाने से पश्चिम दिशा में करीब 3 किलोमीटर दूर था, इसलिए वह जल्द ही वहां पहुंच गए. उन्हें वर्मी कंपोस्ट पोली फार्म के सामने सड़क पर सफेद रंग की स्कूटी नंबर डीएल 11 एसपी 7044 पड़ी मिली, जिस में चाबी लगी हुई थी.

वहीं पर 2 लेडीज बैग, एक हेलमेट और एक जोड़ी जूती पड़ी थी. पास में सड़क पर ही थोड़ा खून भी था और कारतूस का एक खोखा भी पड़ा था. आसपास के लोगों ने बताया कि एक महिला स्कूटी से जा रही थी, तभी किसी ने उसे गोली मार दी. कुछ लोग उसे महर्षि वाल्मीकि अस्पताल ले गए हैं.

कांस्टेबल यशपाल को घटनास्थल पर छोड़ कर इंसपेक्टर राकेश कुमार महर्षि वाल्मीकि अस्पताल चले गए. वहां उन्होंने डाक्टरों से बात की तो पता चला, उस महिला की मौत हो चुकी है. महिला कौन है और कहां रहती है. पुलिस के लिए यह जानना जरूरी था.

इस के लिए पुलिस ने घटनास्थल से मिले बैगों की तलाशी ली तो पता चला मृतका का नाम सुनीता है और वह बवाना के दादा भैया वाली गली के रहने वाले मंजीत की पत्नी है. वह सोनीपत के फिरोजपुर गांव में गवर्नमेंट सीनियर सैकेंडरी गर्ल्स स्कूल में टीचर थीं. मृतका के बारे में जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने बवाना स्थित मृतका के ससुराल वालों को सूचना दे दी.

कुछ ही देर में मृतका का पति मंजीत और घर के अन्य लोग महर्षि वाल्मीकि अस्पताल पहुंच गए. उन्होंने जब वहां सुनीता की लाश देखी तो फफकफफक कर रोने लगे.

मृतका की शिनाख्त हो जाने के बाद इंसपेक्टर राकेश कुमार ने इस की सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी और कांस्टेबल अनिकेत को अस्पताल में छोड़ कर वह फिर से घटनास्थल पर पहुंच गए.

सबूत जुटाने के लिए उन्होंने क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को भी घटनास्थल पर बुला लिया. कुछ ही देर में डीसीपी (रोहिणी) रजनीश गुप्ता भी घटनास्थल पर पहुंच गए. इस के बाद अस्पताल पहुंच कर उन्होंने मृतका  के ससुराल वालों से बात की.

मृतका के पति मंजीत ने बताया कि वह सोनीपत के एक सरकारी स्कूल में टीचर थी. रोजाना की तरह वह आज सुबह करीब 7 बजे अपनी स्कूटी से ड्यूटी के लिए निकली थी. पता नहीं किस ने उसे गोली मार दी. पूछताछ में मंजीत ने बताया कि उस की किसी से कोई दुश्मनी भी नहीं है.

माहौल गमगीन होने की वजह से उस समय उन्होंने मंजीत से ज्यादा पूछताछ करनी जरूरी नहीं समझी, लेकिन इतना तो वह जानते ही थे कि सुनीता की हत्या के पीछे कोई न कोई वजह जरूर रही होगी और वह आज नहीं तो कल जरूर सामने आ जाएगी.

इंसपेक्टर राकेश कुमार को कुछ निर्देश दे कर रजनीश गुप्ता वहां से चले गए. उन के जाने के बाद इंसपेक्टर राकेश कुमार ने मौके से बरामद सबूत अपने कब्जे में ले लिए और अज्ञात हत्यारों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर केस की जांच शुरू कर दी.

राकेश कुमार ने जांच की शुरुआत मृतका सुनीता की ससुराल से ही की. पति मंजीत ने बताया कि घर में वह वह नौर्मल रहती थी. किसी को भी उस से किसी तरह की शिकायत नहीं थी. वह स्कूटी से ही स्कूल आतीजाती थी. पुलिस ने मंजीत से सुनीता के मायके वालों का पता और फोन नंबर ले कर उन लोगों को बवाना थाने बुला लिया.

पुलिस को मिली महत्त्वपूर्ण जानकारी

सुनीता के मातापिता थाना बवाना पहुंच गए. उन्होंने बताया कि मंजीत सुनीता को अकसर परेशान करता रहता था. साथ ही यह भी कि मंजीत का किसी मौडल के साथ चक्कर चल रहा था, जो मुंबई में रहती है. सुनीता इस का विरोध करती थी तो वह सुनीता को प्रताडि़त करता था. इसी के चलते मंजीत सुनीता पर तलाक लेने का दबाव डाल रहा था. ये बातें उस ने मायके वालों को बताई थीं.

पुलिस के लिए यह जानकारी महत्त्वपूर्ण थी. लिहाजा पुलिस ने सुनीता के पति मंजीत के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स से पता चला कि मंजीत की मुंबई के किसी फोन नंबर पर अकसर बातें होती थीं. जांच में वह नंबर एंजल गुप्ता का निकला. एंजल गुप्ता कोई आम लड़की नहीं थी बल्कि एक मशहूर मौडल थी और बौलीवुड की कई फिल्मों में काम कर चुकी थी.

काल डिटेल्स से केस की स्थिति साफ हो गई. साथ ही पुलिस को सुनीता के मातापिता के बयानों में भी सच्चाई नजर आने लगी. लिहाजा इंसपेक्टर राकेश कुमार ने मंजीत को पूछताछ के लिए थाने बुला लिया.

मंजीत से उस की पत्नी सुनीता के मर्डर के बारे में पूछताछ की गई तो पहले वह इधरउधर की बातें कर के पुलिस को गुमराह करने की कोशिश करता रहा, लेकिन सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने अपना अपराध न केवल स्वीकारा बल्कि उस की हत्या में शामिल रहे लोगों के नामों का भी खुलासा कर दिया.

उस से पूछताछ के बाद पता चला कि सुनीता की हत्या के मामले में मंजीत की प्रेमिका एंजल गुप्ता के मुंहबोले पिता राजीव गुप्ता का भी हाथ था.

राजीव ने ही भाड़े के हत्यारों से 10 लाख रुपए में सुनीता की हत्या का सौदा किया था. मंजीत से हुई पूछताछ के बाद सुनीता की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह एक मौडल के प्यार की कहानी थी.

सीधीसादी जिंदगी थी सुनीता की

मूलरूप से हरियाणा की रहने वाली सुनीता का विवाह दिल्ली के बवाना में रहने वाले मंजीत के साथ हुआ था. मंजीत प्रौपर्टी डीलर था. सुनीता पति से ज्यादा पढ़ीलिखी थी, इस के बावजूद उस ने खुद को ससुराल में ढाल लिया था. पति की आर्थिक स्थिति भी मजबूत थी और उस का प्रौपर्टी का काम भी अच्छा चल रहा था. लिहाजा सुनीता को ससुराल में किसी तरह की परेशानी नहीं थी.

धीरेधीरे समय अपनी गति से बीतता रहा. सुनीता एक बेटी और एक बेटे की मां बन गई. फिलहाल उस की बेटी 16 साल की है और बेटा 12 साल का.

सुनीता सोनीपत के फिरोजपुर गांव स्थित गवर्नमेंट सीनियर सैकेंडरी गर्ल्स स्कूल में पढ़ाती थी. ससुराल बवाना से स्कूल की दूरी लगभग 20 किलोमीटर थी, इसलिए स्कूल आनेजाने के लिए सुनीता ने एक स्कूटी खरीद ली थी. उसी से वह स्कूल के लिए सुबह करीब 7 बजे घर से निकल जाती थी.

सुनीता अपने गृहस्थ जीवन से खुश थी, लेकिन 2 साल पहले उस की खुशियों में ग्रहण लगना शुरू हो गया था. दरअसल, दिल्ली की एक पार्टी में मंजीत की मुलाकात एंजल गुप्ता नाम की एक मौडल से हुई. एंजल गुप्ता बेहद खूबसूरत थी और बौलीवुड की कई फिल्मों में छोटामोटा काम कर चुकी थी.

जसवीर भाटी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘भूरी’ के आइटम सांग ‘ओ मेरा झुमका..मेरा ठुमका बदनाम हो गया’ में भी एंजल गुप्ता ने अपने जलवे बिखेरे थे. वह एक्ट्रैस बनने की दौड़ में थी. एंजल गुप्ता का असली नाम शशिप्रभा था. बताया जाता है कि वह मूलरूप से उत्तर प्रदेश की रहने वाली थी.

उस की मां दिल्ली में सीपीडब्ल्यूडी में नौकरी करती है और आर.के. पुरम सेक्टर-4 के सरकारी क्वार्टर में रहती है. उस के पिता का देहांत काफी दिनों पहले हो चुका था. मौडलिंग के क्षेत्र में आने के बाद शशिप्रभा एंजल गुप्ता के नाम से जानी जाने लगी थी. एंजल गुप्ता कुछ दिनों तक तो दिल्ली में ही मौडलिंग करती रही, फिर मन में बौलीवुड के हसीन सपने ले कर मुंबई चली गई.

मुंबई जाने के लिए एंजल गुप्ता के मुंहबोले पिता राजीव गुप्ता ने उस की हर तरह से मदद की. मुंबई में एंजल ने जो फ्लैट किराए पर लिया था, उस का हर महीने का किराया 50 हजार रुपए था, जो राजीव ही देता था. मुंबई जा कर एंजल फिल्मों में काम पाने के लिए संघर्ष करने लगी. उस की मेहनत रंग लाई और उसे कुछ फिल्मों में काम मिल गया. इस के बाद वह और ऊंचाई पर पहुंचने के सपने देखने लगी.

एंजल के मुंहबोले पिता राजीव गुप्ता दिल्ली रोहिणी सैक्टर-3 में रहते थे. वह एक बिजनैसमैन हैं और दक्षिणी दिल्ली में उन के रेस्तरां और होटल हैं. वह एंजल गुप्ता को हर तरह से सपोर्ट करते थे.

आकर्षक कदकाठी वाला मंजीत पहली मुलाकात में ही एंजल का दीवाना हो गया था. पार्टी में मिलने के बाद से एंजल और मंजीत की फोन पर बातें होने लगीं. धीरेधीरे एंजल का झुकाव भी मंजीत की तरफ हो गया. समयसमय पर दोनों की मुलाकातें भी होने लगीं, जिस से दोनों और नजदीक आते गए.

धीरेधीरे दोनों के संबंध इस स्थिति तक पहुंच गए कि वह शादी करने की सोचने लगे थे. लेकिन इस में सब से बड़ी समस्या मंजीत की पत्नी सुनीता थी. अपनी ब्याहता के रहते हुए एंजल से शादी नहीं कर सकता था.

सुनीता को पता चली हकीकत

पति पर आंखें मूंद कर विश्वास करने वाली सुनीता इस बात से काफी दिनों तक तो अंजान रही. बाद में जब मंजीत ने उसे मानसिक रूप से परेशान करना शुरू किया तब भी वह कुछ नहीं समझ पाई. उस की समझ नहीं आया कि अचानक मंजीत में यह बदलाव कैसे आ गया. सुनीता ने कई बार मंजीत को फोन पर बात करते देखा. फोन पर हो रही बातचीत सुनने के बाद सुनीता समझ गई कि मंजीत का जरूर किसी लड़की से चक्कर चल रहा है.

अंतत: जैसेतैसे सुनीता यह पता लगाने में सफल हो गई कि मुंबई में रहने वाली एक मौडल से मंजीत के प्रेमिल संबंध हैं. सुनीता ने इस बारे में मंजीत से पूछा तो पहले तो वह इस बात को टालने की कोशिश करता रहा लेकिन फिर बोला, ‘‘अगर तुम्हारे मन में इस तरह का कोई शक हो गया है तो मुझ से तलाक ले लो.’’

‘‘नहीं, मैं न तो तलाक नहीं दूंगी और नहीं लूंगी, तुम्हें उस लड़की से बात भी बंद करनी होगी.’’

सुनीता के इतना कहते ही मंजीत ने उसे खूब खरीखोटी सुनाई. सुनीता समझ नहीं पा रही थी कि अपने घर को कैसे संभाले. विपरीत हालातों में मन को शांत रखने के लिए वह रोजमर्रा की डेली डायरी लिखती थी. तनाव की बातें वह डायरी में लिख देती थी. जब वह ज्यादा परेशान होती तो मायके में बात कर के अपना मन हलका कर लेती थी.

मायके वालों ने भी मंजीत को बहुत समझाया लेकिन वह एंजल गुप्ता के प्यार में अंधा हो चुका था इसलिए किसी के समझाने का उस पर कोई असर नहीं हुआ. नतीजा यह निकला कि मंजीत और उस के ससुराल वालों के बीच छत्तीस का आंकड़ा बन गया.

बताया जाता है कि एंजल मंजीत पर शादी करने का दबाव बना रही थी. इस बारे में उस ने अपने मुंहबोले पिता राजीव गुप्ता से बात की. राजीव ने उसे भरोसा दिया कि वह उस की शादी मंजीत से कराने में पूरी मदद करेगा.

मई, 2017 में सुनीता और एंजल के बीच फोन पर तीखी नोंकझोंक हुई, जिस में सुनीता ने एंजल को गुस्से में काफी कुछ कह दिया. बताया जाता है कि तब एंजल ने उसे अंजाम भुगतने की धमकी भी दी थी.

एंजल सुनीता द्वारा की गई इस बेइज्जती का बदला लेना चाहती थी, इसलिए उस ने बढ़ाचढ़ा कर यह बात मंजीत को बताई ताकि वह सुनीता पर भड़के. उस ने साफ कह दिया कि वह ऐसा अपमान बरदाश्त नहीं कर सकती. अगर मुझे चाहते हो तो या तो सुनीता को तलाक दो या फिर बेइज्जती का बदला लो.

इस बात को ले कर एंजल, राजीव और मंजीत ने एक मीटिंग की. बताया जाता है कि इस मीटिंग में राजीव ने सुनीता को ठिकाने लगाने में 10 लाख रुपए खर्च करने को कह दिया. मंजीत इस के लिए तैयार हो गया. क्योंकि सुनीता तलाक देने को राजी नहीं थी, उस के पास उसे ठिकाने लगाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था.

राजीव जानता था कि उस के ड्राइवर दीपक के बदमाशों से संबंध हैं, इसलिए उस ने दीपक से सुनीता की हत्या के बारे में बात की. दीपक 10 लाख रुपए में यह काम कराने को तैयार हो गया. राजीव ने बतौर एडवांस उसे ढाई लाख रुपए दे दिए. दीपक ने मेरठ के रहने वाले शहजाद सैफी उर्फ कालू, धर्मेंद्र और विशाल उर्फ जौनी से बात की.

शूटर पहुंच गए दिल्ली

योजना को अंजाम देने के लिए 25 अक्तूबर, 2018 को राजीव गुप्ता, दीपक, धर्मेंद्र, शहजाद और विशाल बवाना पहुंचे. लेकिन तब तक सुनीता स्कूल के लिए निकल चुकी थी. 27 अक्तूबर को करवाचौथ का त्यौहार था. एकतरफ मंजीत जिस पत्नी की हत्या के तानेबाने बुन रहा था, तो पत्नी इस सब से अनभिज्ञ पति की लंबी आयु की कामना के लिए करवाचौथ का व्रत रखे हुए थी.

किराए के जो बदमाश बाहर से दिल्ली आए हुए थे, वह खाली हाथ अपने घर नहीं लौटना चाहते थे. लिहाजा उन्होंने हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के पास किराए का एक कमरा ले लिया. साथ ही सुनीता को स्कूल जाते वक्त उस की हत्या करने की योजना बना ली.

योजना के अनुसार, 29 अक्तूबर को अलसुबह राजीव गुप्ता अपनी डस्टर कार संख्या डीएल8सी जेड4306 से बदमाशों को हजरत निजामुद्दीन से बवाना ले गया. सुनीता किसी भी हालत में न बच पाए, इस के मद्देनजर दीपक और धर्मेंद्र वर्मी कंपोस्ट फार्म, दरियापुर के पास पोजीशन ले कर खड़े हो गए. जबकि शहजाद और विशाल गांव बवाना में राजीव गांधी स्टेडियम के पास बाइक ले कर खडे़ हो गए. उन के हाथों में .315 बोर के तमंचे थे.

सुबह 7 बजे के करीब सुनीता अपनी स्कूटी से जैसे ही स्कूल के लिए निकली तो उस के पति मंजीत ने इंतजार कर रहे बदमाशों को मिस्ड काल दी. यह उन के लिए एक इशारा था. इशारा पाते ही बदमाश सतर्क हो गए. तभी राजीव गुप्ता वहां से चला गया. उधर सुनीता घर से करीब 7 किलोमीटर दूर दरियापुर गांव के नजदीक पहुंची तो वहां घात लगाए बदमाशों ने सुनीता पर फायर कर दिया.

उस समय करीब साढ़े 7 बजे थे. गोलियां लगते ही सुनीता गिर गई. वह सड़क पर तड़प रही थी, तभी उधर से गुजर रहे लोगों ने उसे महर्षि वाल्मीकि अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. पता चला कि सुनीता के सीने पर 3 गोलियां मारी गई थीं.

मंजीत से पूछताछ के बाद उस के घर की तलाशी ली गई तो पुलिस को सुनीता की पर्सनल डायरी मिली, जिस में उस ने काफी कुछ लिखा था. मंजीत की निशानदेही पर पुलिस ने प्रेमिका एंजल गुप्ता उर्फ शशिप्रभा व उस के मुंहबोले पिता राजीव गुप्ता को भी गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने एंजल गुप्ता की निशानदेही पर मयूर विहार में रहने वाली उस की मौसी के घर से 2 मोबाइल फोन भी बरामद किए, जिन का इस्तेमाल वारदात में हुआ था. इन तीनों को गिरफ्तार कर पुलिस ने न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

इस के बाद दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने वारदात में शामिल रहे दीपक और शहजाद सैफी उर्फ कालू को गिरफ्तार कर लिया. इन दोनों ने भी पुलिस के सामने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. पुलिस ने इन दोनों को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक धर्मेंद्र और विशाल पुलिस की पकड़ में नहीं आए थे.

  कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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