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झूठ को छूट, तर्क पर रोक

व्हाट्सऐप, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि पर नकली प्रोफाइल बना कर घृणा और भय फैलाने वाले संदेश, समाचारों, वीडियो क्लिप्स को फैलाना बहुत आसान है. ऐसा समाज, जो सदियों से झूठ को सच मानने में अपना बड़प्पन समझता है और जिसके लिए तर्क का मतलब धर्म की भावनाओं को ठेस पहुंचाना है, को इस तरह के झूठ को फैलाने में बहुत मजा आता है. असल में अंधविश्वासी, निकम्मा, निठल्ला, आसमान से पैसा टपकने पर विश्वास करने वाला यह समाज इन झूठे संदेशों को अपनी गलतफहमी को सही ठहराने का हथियार मानता है.

भारत में व्हाट्सऐप आदि ज्यादा लोकप्रिय इसलिए हैं और फेक न्यूज इसलिए फैलती हैं क्योंकि धर्मभक्तों को इन के जरिए अपनी मूर्खता को छिपाने का अवसर मिलता है. धार्मिक अंधविश्वासी संदेशों के साथसाथ डर फैलाने वाले और दूसरों को नीचा दिखाने वाले संदेश भी प्रसारित किए जाते हैं ताकि उन्हें भी सच मान लिया जाए.

कठिनाई यह होने लगी है कि जब लोग उन झूठे संदेशों के पलटवार में उत्तर देते हैं तो भक्त तिलमिला जाते हैं. पप्पू (राहुल गांधी) के बारे में आप जितने मरजी व जैसे चाहे संदेश भेज सकते हैं पर जैसे ही मोदी, योगी और शाह के बारे में कुछ कहा, तो पुलिस ढूंढ़ढांढ़ कर आप को बंद कर देगी. फिलहाल पुलिस केवल उस व्यक्ति को पकड़ सकती है जिस ने शिकायतकर्ता के मोबाइल पर धर्म या मंत्री की पोल खोलने वाला संदेश भेजा. वह उस जड़ तक अभी नहीं पहुंच सकती जिस ने संदेश बताया या वीडियो तैयार किया. लेकिन अब केंद्र की भगवा सरकार अरबों रुपए खर्च कर के व्हाट्सऐप जैसे ऐप्स की गुप्त तकनीक को खोजने पर खर्च कर रही है ताकि संदेश या वीडियो क्लिप बनाने वाले को भी पकड़ा जा सके.

अगर उद्देश्य झूठा धर्मप्रचार करने वालों को पकड़ना होता तो गलत होते हुए भी कम से कम कुछ हद तक सहन किया जा सकता था लेकिन यह साफ है कि यह कवायद केवल सरकार व सत्ताधारी पार्टी विरोधी संदेशों को जड़ से खत्म करने के लिए है. पप्पू के खिलाफ जो चाहे जैसा करे, पुलिस व सरकार कुछ न कहेंगी.

सरकार इन्फौर्मेशन टैक्नोलौजी एक्ट में कई संशोधन कर के आम चुनाव से पहले शिकंजा कस देना चाहती है ताकि मोदी के पुराने वीडियों, जिन में उन्होंने खुद घृणा फैलाने वाले भाषण दिए हैं, को कोई फौरवर्ड या रीट्वीट न कर सके. यह काम कठिन है पर सरकार के लिए असंभव नहीं है. हमारा कानून चमत्कारों की झूठी कहानियों के प्रचार को संस्कृति प्रसार के प्रमाणपत्र देता रहता है जबकि चमत्कारों के तार्किक विश्लेषणों को धर्मविरोधी कह कर पुराने कानूनों के  तहत रोकता रहता है.

आज देश में फैले अंधविश्वासों का कारण झूठे संदेशों का खुलेआम प्रसार भी है पर सरकार की, अब भाजपा की, पहले की कांग्रेस की, उन्हें रोकने की मंशा नहीं रही. डिजिटल तकनीक से झूठी खबरों पर नियंत्रण के बहाने भाजपा सरकार केवल अपनी पोल खोलने वाली तार्किक और सत्य बातों को झूठी करार दे कर रोकेगी, यह तय है. आईटी एक्ट में संशोधन असल में तर्क और सच को दबाने के लिए है यानी सच की हार होगी, जीत नहीं.

 

टिम पेन को ‘बेबीसीटर’ ऋषभ पंत का करारा जवाब

इस बार भारतीय क्रिकेट टीम ने वह कर दिखाया जिस के लिए वह कमर कस कर सात समंदर पार औस्ट्रेलिया गई थी. मेलबर्न क्रिकेट स्टेडियम में खेले गए ‘बौक्सिंग डे’ टैस्ट मैच में भारत ने मेजबान टीम को 137 रनों से हरा दिया है. इस जीत के साथ भारत ने मौजूदा टैस्ट सीरीज में 2-1 की बढ़त हासिल कर ली है.

यह भारत की टैस्ट मैचों में 150वीं जीत है. इस जीत के साथ ही भारतीय टीम ने 4 मैचों की टैस्ट सीरीज में 2-1 की अहम बढ़त बना ली है.

मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड पर जीत के लिए भारतीय टीम को 37 सालों का लंबा इंतजार करना पड़ा है. उसे यहां आखिरी बार 1981 में जीत मिली थी.

भारत की जीत के अलावा यह मैच औस्ट्रेलिया के कप्तान टिम पेन की मारक टिप्पणियों के लिए भी याद किया जाएगा जो उन्होंने भारतीय खिलाड़ियों के लिए की थीं. भारत के खिलाड़ी भी कम न थे. मैच तो जीता ही, टिम पेन को उन्हीं की जबान में जवाब भी दिया.

दरअसल, शुक्रवार, 28 दिसंबर को जब भारत के विकेटकीपर ऋषभ पंत बल्लेबाजी करने आए तब विकेट के पीछे खड़े टिम पेन ने कहा था,”अब तो एमएस (महेंद्र सिंह धौनी) की वनडे मैच की टीम में वापसी हो गई है तो तुम खाली हो जाओगे… जब मैं अपनी पत्नी को फिल्म दिखाने ले जाऊंगा, तुम मेरे बच्चों का खयाल रखना, बेबीसीटर.”

दिन बीता तो मैच का माहौल भी बदला. अगले दिन जब टिम पेन बल्लेबाजी करने आए तो ऋषभ पंत ने नहले पर दहला मार दिया. उन्होंने अपने साथी से कहा,” मयंक (अग्रवाल), तू ने कभी टेम्पररी कैप्टन के बारे में सुना है?”

इसी बात को आगे बढ़ाते हुए ऋषभ पंत ने गेंदबाजी कर रहे रविंद्र जडेजा से कहा कि (टिम) पेन का विकेट लेने लिए ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं है, वह सिर्फ बकबक करने में माहिर है.

2 टीमों के खिलाड़ियों के बीच इस तरह की बहस को इंगलिश में ‘स्लेजिंग’ कहा जाता है जिस में कुछ भी बोल कर खिलाड़ी का खेल के प्रति फोकस बिगाड़ने की कोशिश की जाती है ताकि वह मनमुताबिक प्रदर्शन न कर सके. पर कभीकभार बात इतनी ज्यादा बिगड़ जाती है कि अंपायर को बीच में आ कर दोनों खिलाड़ियों को शांत कराना पड़ता है.

भारत के स्पिनर रह चुके हरभजन सिंह और औस्ट्रेलिया के आलराउंडर एंड्रयू साइमंड्स के बीच हुआ ‘मंकी’ विवाद तो हद से ज्यादा बढ़ गया था. इस से एंड्रयू साइमंड के क्रिकेट कैरियर पर बहुत बुरा असर पड़ा था.

बहरहाल, टिम पेन और ऋषभ पंत के बीच की यह नोकझोंक आगे क्या रंग दिखाएगी, इस के लिए तो भारत और औस्ट्रेलिया के बीच होने वाले चौथे टैस्ट मैच तक का इंतजार करना होगा जो 3 जनवरी, 2019 से सिडनी में खेला जाएगा.

क्या आपने ट्राई की ये स्टाइलिश चोटी

आपकी पर्सनैलिटी को निखारने में हेयर स्‍टाइल का अहम रोल होता है. आजकल कौ‍लेज गो‍इंग गर्ल्‍स तरह-तरह कि हेयर स्‍टाइल बनाए नजर आ जाएंगी, जो कि देखने में अच्‍छी लगने के साथ ही साथ ट्रेंडी भी लगती है. आजकल खुले बालों से ज्यादा अलग अलग तरह की चोटी बनाने का बहुत चलन चल पड़ा है. एक चोटी को आप कई तरह की डिजाइन से बना सकती हैं. यदि आप कुछ नया करना चाह रही हैं तो हम आपको बताएंगे कुछ स्‍टाइलिश और बेहतरीन चोटियां बनाने के तरीके –

फिशटेल

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इसे बनाने के लिये आपको बाल के दो भाग करने होंगे. यह हेयरस्‍टाइल वेस्टर्न और ट्रेडिशनल दोनों ही तरह के ड्रेस पर अच्‍छी लगेगी. ये आपको बेहद ही स्टाइलिश लुक दोती है.

फ्रिन्ज ब्रेड

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अगर आप नहीं चाहती हैं कि आपके बाल आपकी आंखों को ढंके तो यह बेस्‍ट हेयरस्‍टाइल है. फ्रिन्‍ज ब्रेड देखने में सिर पर लगे एक हेयर बैंड की तरह लगती है. इसके लिए आगे के बालों को गुथते हुए दूसरी तरफ लेकर आते हैं. ये स्टाइल आप खुले बालों के साथ भी कर सकती हैं.

जैसमीन

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हम सब ने बचपन में अलादीन का कार्टून देखा है, जिसमें जैसमीन के बाल कुछ इसी तरह के थे. यह एक फ्रेन्‍च चोटी की तरह दिखती है. इस हेयरस्‍टाइल को पाने के लिये आपके बाल बहुत लंबे होने चाहिये.

फुल क्राउन

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यह हेयरस्‍टाइल एक कान से शुरु होते हुए सिर के दूसरे कोने तक जाता है. यह हेयरस्‍टाइल आपको बेहद ही कूल लुक देता है.

क्‍लासिक फ्रेंच

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हेयर ब्रेड यह फ्रेंच चोटी बहुत ही सुंदर और क्‍लासी लगती है. इसको देखने में लगता है कि इसे बनाना बहुत मुश्‍किल होगा पर ऐसा है नहीं.

टाई बैक चोटी

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यह कई सारे बालों को ले कर बनाई जाती है खास तौर पर कान के आस पास के बालों को ले कर. खूब सारी चोटियां बनाइये और उन्‍हें एक साथ सिर के पीछे या बगल में लक कर पिन अप कर दीजिये.

टू साइड ब्रेड्स

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यह बहुत ही स्‍टाइलिश और आसानी से बनने वाली चोटियों में से एक है. करना केवल इतना है कि सारे बालों को एक ओर कर दें और उसकी साइड पोनी बना कर चोटी बना लें.

ऐसे पाएं साफ और मुहांसे रहित त्वचा

क्या आपको भी मुंहासे बहुत सताते हैं और उनसे छुटकारा पाने का कोई रास्ता नहीं सूझता. तो अब आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है क्योंकि हम आपके लिए कुछ ऐसे उपाय लेकर आए हैं, जिसे अपनाकर आप खूबसूरत और मुंहासे रहित त्वचा पा सकते हैं.

– अपना चेहरा, मेडिकेटेड सोप से धोएं. सुनिश्चित करें कि इसमें सेलसिलिक अम्ल जरूर हो क्योंकि यह अम्ल मुहांसों को मिटाने में बहुत सहायक है.

– अखरोट स्क्रब के प्रयोग द्वारा चेहरे की मृत कोशिकायें हटायें. इससे डेड स्‍किन साफ हो जाती है जिससे चेहरा साफ दिखने लगता है.

– मुहांसों या फुंसियों पर बर्फ लगाएं. बर्फ को लंबे समय तक लगाने से मुहांसों का आकार एवं उनकी लालिमा कम करने में सहायक होगा.

– ग्रीन टी का स्क्रब भी एक अच्छा उपाय है. यह चेहरे से लाल धब्बे और खुरदुरापन काफी प्रभावशाली रूप से कम करता है.

– खीरे का मास्क भी आपके चेहरे में सुधार ला सकता है. अपने चेहरे पर लगाकर इसे छोड़ दें जब तक कि यह सूख न जाए. इसे कमरे के तापमान पर ही सुखाएं. यदि आप इस मास्क को पंखे के सामने बैठ कर सुखाते हैं तो यह आपकी कोई सहायता नहीं करेगा. इस मास्क को चेहरे पर तब तक लगाये रखें, जब तक यह अपने आप सूख न जाए. सूखने के बाद आप इसे निकालें और अपना चेहरा गर्म पानी से अच्छी तरह धो लें. यह सुनिश्चित करें कि सारा मास्क निकल जाए.

2019 में टीवी में काफी उतार चढ़ाव आने वाले हैं – धर्मेष व्यास, अभिनेता

1992 में प्रदर्शित अति लोकप्रिय सीरियल ‘‘हसरतें’’ सहित अब तक पचास से अधिक सीरियलों में अभिनय कर चुके अभिनेता धर्मेश व्यास इन दिनों ‘मुबू’ टीवी चैनल के सीरियल ‘‘गुजरात भवन’’ के कारण काफी सुर्खियां बटोर रहे हैं. जबकि चार साल पहले उन्होंने टीवी से दूरी बना ली थी, पर अब ‘गुजरात भवन’ से टीवी पर वापसी की है.

पिछले छब्बीस वर्ष के अंदर आपने टीवी इंडस्ट्री में किस तरह के बदलाव देखे?

सच कहूं, तो पहले टीवी क्लासी था और अब टीवी पर क्या दिखाया जा रहा है, यह मेरी समझ से परे है. पहले हम लोग बड़ी मेहनत करते थे, कहानी, चरित्र के साथ साथ हर एपीसोड को बेहतर ढंग से लिखा जाता था. उस वक्त हम कलाकार, लेखक व निर्देशक एकसाथ बैठकर कहानी व चरित्र के साथ साथ हर दृष्य को समझते थे. पर अब टीवी की हालत यह है कि चैनल, निर्माता व निर्देशक को एक अच्छे कलाकार की जरूरत नहीं रही. अब उन्हें एक सुंदर चेहरे वाले ऐसे इंसान की तलाश रहती है, जिसकी याददाश्त तेज हो. जो कई पन्नों के संवाद चंद मिनटों में याद करके कैमरे के सामने धड़ाधड़ बोलता जाए. जिसकी वजह से अब किसी भी सीरियल में कोई मजा नहीं रहा. लेकिन मैं इन दिनों सीरियल ‘गुजरात भवन’ कर रहा हूं, जिसकी बात कुछ अलग है. इसमें जिंदगी का रस है.

आखिर चैनल के सीरियलों की हालत खराब क्यों हुई?

इसकी मूल वजह जरूरत से ज्यादा प्रतिस्पर्धा के बढ़ने के साथ साथ दर्शकों में धैर्य न होना रहा. आज से 25-26 वर्ष पहले 1992 में मेरा एक सीरियल ‘हसरतें’ प्रसारित होता था, जो कि पूरे सात वर्ष चला था. यह सीरियल दूसरी भाषाओं में आज भी प्रसारित हो रहा है. इसके दर्शक भी रौयल थे. अब तो हर सास बहू सीरियल में ऐसी किचन पौलीटिक्स दिखायी जाती है, जो किसी घर में नजर नही आएगी. पर इसका असर औरतों के बीच बहुत गलत जा रहा है. जब सास बहू सीरियलों की टीआरपी घटी, तो अचानक हौरर सीरियल शुरू कर दिए गए. निर्माता निर्देशक और चैनल भूल जाता है कि टीवी पूरा परिवार एक साथ बैठकर देखता है. इसलिए जरूरी है कि हौरर या सेक्स प्रधान कार्यक्रम परोसने की बजाए कुछ सेंसिबल कार्यक्रम प्रसारित किए जाएं. आज की तारीख में सच कहूं तो मुझे सिर्फ ‘स्टार प्लस’ का सीरियल कुल्फी कुमार बाजेवाला पसंद आ रहा है. इस सीरियल के हीरो मोहित मलिक ने आठ साल पहले मेरे बेटे का किरदार निभाया था.इ सी वजह से मैंने इस सीरियल को देखा और मुझे बहुत अच्छा लगा. अन्यथा टीवी पर ऐसा कोई कार्यक्रम नहीं है,जिसे देखने की इच्छा हो.

तो आपके अनुसार क्या नया होना चाहिए?

दूसरों को सलाह देने वाला मैं कौन होता हूं.

अब वेब सीरीज काफी लोकप्रिय हो रही हैं. इसका टीवी पर क्या असर पड़ेगा?

माना कि अब वेबसीरीज का बहुत अच्छा सिलसिला शुरू हुआ है. हां! मैं यह मानता हूं कि वेबसीरीज सिर्फ शहरों तक ही सीमित हैं. ग्रामीण इलाके में वेबसीरीज का प्रभाव नहीं पहुंच रहा है. ग्रामीण इलाके में तो सबसे अधिक दूरदर्शन चल रहा है. और ‘जी अनमोल’ जैसे कुछ सैटेलाइट चैनल भी देखे जा रहे हैं. वेबसीरीज के लिए फिलहाल दर्शकों को नेटफिलक्स, अमेजन, औल्ट बालाजी के लिए वार्षिक शुल्क देना पड़ता है, जोकि लोग देना नहीं चाहते. ऐसे में यह दर्शक दूरदर्शन और सैटेलाइट चैनल मुफ्त में देखना पसंद कर रहे हैं. इस हिसाब से देखा जाए तो टीवी और थिएटर को वेबसीरीज या दूसरे माध्यम से नुकसान नही है.

आपके हिसाब से टीवी में किस तरह के सुधार की जरूरत है?

कहानी और पटकथा पर ध्यान देने की जरूरत है. पहले हम लोग पूरी पटकथा पर ही नहीं, हर एपीसोड की पटकथा पर बैठकर विचार विमर्श करते थे. कलाकारों की भी राय ली जाती थी. अब ऐसा नहीं होता है. अब तो पूरे एपीसोड की स्क्रिप्ट भी नहीं आती है. सेट पर शूटिंग के दौरान सीन आ जाता है, कई बार तो ऐसा होता है कि कैमरामैन, निर्माता, निर्देशक सहित पूरी टीम सेट पर बैठकर इंतजार करती रहती है कि कब चैनल से स्वीकृति पाकर सीन उन तक पहुंचेगा? मैं किसी भी लेखक को गलत नही मानता. हमारे यहां उम्दा लेखक हैं. हमारे यहां मौजूद लेखकों की काबीलियत पर शक करना बहुत गलत है. चैनल की आपसी प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ गयी है कि किसी चैनल के किसी सीरियल में कोई ट्रैक लोकप्रिय हो जाए, तो दूसरा चैनल अपने सीरियल में वही ट्रैक जबरन डालता है. इससे कहानी और लेखक दोनों मर जाते हैं.

2019 में टीवी की क्या हालत होगी?

यदि टीवी में इसी तरह के कार्यक्रम आए, तो 2019 में टीवी में बहुत कुछ अच्छा होगा, ऐसा मुझे नहीं लगता. टीवी का नुकसान निर्माता निर्देशक और चैनल के कर्ताधर्ता ही कर रहे हैं. मेरे हिसाब से 2019 में टीवी में काफी उतार चढ़ाव आने वाले हैं.

जीएसटी पर माथापच्ची

जीएसटी यानी गुड्स ऐंड सर्विसेस टैक्स में थोड़ीबहुत कमी कर के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने असल में यह जाहिर कर दिया है कि मध्य प्रदेश राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनावों में मिली हार से वे भयभीत हैं. टैक्स में कोई खास छूट नहीं दी गई है. जो वस्तुएं अब कम टैक्स के दायरे में हैं, उन का उपयोग तो कम लोग ही करते थे. ऐसे में आम व्यापारी, मजदूर, किसान या नौकरीपेशा को इन कटौतियों से फर्क नहीं पड़ने वाला.

जीएसटी की मूल खामी यह है कि यह कानून इस धारणा पर बनाया गया है कि देश के सारे व्यापारी चोर हैं और उन्हें हर समय हथकडि़यों में रखा जाए. कर कितना है, यह इतना महत्त्व का नहीं, जितना यह, कि व्यापारी के पलपल की खबर सरकार को रहेगी ताकि वह जब चाहे व्यापारी को जेल में बंद कर सके और उस के घर वालों को पटरी पर सोने को मजबूर कर दे. हर व्यापारी को मजबूर कर दिया गया कि वह कंप्यूटर खरीदे जो हर समय जीएसटी के कंप्यूटर से जुड़ा रहे.

ईवे बिल के अनुसार तो, माल ट्रक में लादने से पहले सरकारी अनुमति लेनी जीएसटी ने जबरन थोप दी. यह आजादी, जो छिन गई, ज्यादा दर्द दे रही है बजाय टैक्स की दरों के. जीएसटी ने सामान की आवाजाही पर रोक लगा दी है और हर समय डर लगा रहता है कि आज से 4-5 वर्षों बाद सामान की बिक्री से जुड़े सवाल पूछे जाएंगे तो क्या जवाब दिया जाएगा. सिनेमा टिकट थोड़ा सस्ता कर देना या महंगी गाडि़यों पर कर कम कर देना कैदियों की बेडि़यों को ढीला करना है, हटाना नहीं.

मोदी जेटली इस विचारधारा से नहीं निकल पा रहे कि हिंदू धर्म के अनुसार हर व्यक्ति जो जन्म लेता है वह पापों के प्रायश्चित्त के लिए जन्म लेता है और जीवनभर उस का काम पंडोंपुजारियों की सेवा करना है. मोदी जेटली यही सोचते हैं कि हर व्यापारी चोर है और उसे पहरे में रखा जाए. जीएसटी में किए गए सुधार इस गलतफहमी को दूर नहीं करता. देश के व्यापारी व उद्योगपति देश के नागरिकों के लिए सुख व समृद्धि लाते हैं. वे उत्पादन करते हैं, सेवाएं देते हैं, सामान इधर से उधर ले जाते हैं. उन की वजह से फैक्टरियां पैदा होती हैं. वे बचत कर पूंजी निर्माण करते हैं जिस से भुखमरी, बीमारी, बेघरी दूर होती है. वे सरकार से कई हजार गुना ज्यादा काम करते हैं. मंदिर भी उन की कृपा से चलते हैं, वे मंदिरों की कृपा से नहीं फलतेफूलते. यह मानसिकता कि, सरकार शुद्ध है और जनता अशुद्ध, कांग्रेसी और भाजपाई दोनों की है. लेकिन डिगरी में फर्क है.

कांग्रेस थोड़ी उदार थी पर उस के पी चिदंबरम जैसे ब्राह्मणवादी वित्त मंत्री भी अरुण जेटली की तरह जेल मंत्री ज्यादा थे. जनता का यह पहला दमदार कदम था जब उस ने 3 राज्यों के चुनावों में धर्म को ताक पर रख कर जीने के अधिकार को वोट दिया. नरेंद्र मोदी व उन की सरकार जनता के इस विद्रोह से अब बेचैन है, तभी जीएसटी में कमी करने का पासा फेंका है.

अनुशासन के नाम पर दबंगई: मासूमों से हैवानियत

रूह कंपा देने वाली ठंड में ऐसी वारदातें जब सामने आती हैं तो दिल सोचने पर मजबूर हो जाता है कि आखिर इन का कुसूर यही है कि वे मजबूरी में यहां लाई गई हैं. वजह कुछ भी हो, पर इस सनसनीखेज खुलासे ने कइयों की नींद हराम कर दी है.

महिला आयोग की टीम जब  रात 8 बजे दौरे पर निकली तो द्वारका, दिल्ली के शेल्टर होम की कुछ लड़कियों ने आपबीती बता कर झकझोर दिया. सदस्यों ने वहां रहने वाली 6 से 9 साल, 10 से 13 साल व 13 से 15 साल की बच्चियों से अकेले में बात की तो बड़ी उम्र की लड़कियों ने हकीकत बयां की.

‘शेल्टर होम में सजा देने के लिए लड़कियों को जबरन मिर्च पाउडर खिलाया जाता है. सब के सामने प्राइवेट पार्ट में मिर्च पाउडर डाला जाता है ताकि बड़ी लड़कियां डर कर रहें.’ ये शिकायतें द्वारका के एक प्राइवेट शेल्टर होम की लड़कियों ने लगाई हैं.

इस शेल्टर होम में इन लड़कियों की आपबीती सुन कर टीम के सदस्य चौंक गए. पुलिस को इस की सूचना दी गई और शेल्टर होम के स्टाफ के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई.

बता दें कि दिल्ली सरकार की सलाह पर दिल्ली महिला आयोग ने सभी सरकारी और प्राइवेट शेल्टर होम की जांच करने और उन में सुधार की सलाह देने के लिए एक्सपर्ट कमेटी बनाई है.

बड़ी उम्र की लड़कियों ने टीम के सदस्यों को बताया कि उन को शेल्टर होम में सारे घरेलू काम करने पड़ते हैं. यहां स्टाफ बहुत कम है, इसलिए बड़ी लड़कियां ही छोटी लड़कियों की देखभाल करती हैं. बड़ी लड़कियों से बरतन धुलवाए जाते हैं. कमरे और टायलेट साफ करवाए जाते हैं वहीं दूसरी ओर 22 लड़कियों के लिए एक ही रसोइया है. यहां खाने की क्वालिटी भी बेहद खराब होती है. बात न मानने पर छोटी बच्चियों को कड़ी सजा दी जाती है, जिस से सब लड़कियां डर कर रहती हैं.

अनुशासन के नाम पर शेल्टर होम वाले बात न मानने पर छोटी बच्चियों को जबरदस्ती मिर्च खिलाते हैं. महिला स्टाफ बच्चियों के प्राइवेट पार्ट में मिर्च डाल देती हैं. कमरा साफ न करने, स्टाफ की बात न मानने पर फुटा यानी स्केल से पीटा जाता है. गरमियों और सर्दियों की छुट्टियों में घर भी नहीं जाने दिया जाता है.

समिति की शिकायत पर द्वारका सेक्टर-23, दिल्ली थाना पुलिस ने पाक्सो व जुवैनाइल जस्टिस ऐक्ट के तहत मामला दर्ज कर छानबीन शुरू कर दी है.

बच्चों की अपील पर आयोग ने समिति से आग्रह किया कि बच्चों को दूसरी जगह न भेजा जाए, बल्कि शेल्टर होम के स्टाफ को हटाया जाए.

भले ही फौरीतौर पर कार्यवाही की गई है पर एक बात तो सच है कि शेल्टर होम भी शोषण का अड्डा बने हुए हैं. शेल्टर होम के स्टाफ को हटाना कोई समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि उन पर सख्त कार्यवाही होती तो बेहतर होता.

फर्जी डिग्रियों का धंधा

फर्जी डिग्रियों का कारोबार लगातार फैलता जा रहा है. हर राज्य से आए दिन ऐसी खबरें आती रहती हैं जहां नकली सर्टिफिकेट छाप कर बेचने वालों का भंडाफोड़ होता है. दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने दिल्ली में नकली शिक्षा बोर्ड चलाने वाले गिरोह को पकड़ा है. इस गिरोह में दो लोग उत्तरप्रदेश में एक स्कूल चलाते हैं. इन के पास से बड़ी संख्या में नकली सर्टिफिकेट बरामद हुए हैं. यह गिरोह 10वीं और 12वीं के सर्टिफिकेट बेचता था.

आरोपियों से पूछताछ में पता चला कि उनके इस फर्जी बोर्ड से पिछले 3 सालों में दिल्ली, उत्तरप्रदेश, बिहार, गुजरात और छत्तीसगढ़ के अलावा कई राज्यों के 12 हजार से ज्यादा छात्रों को सर्टिफिकेट बेचे जा चुके हैं. ये सर्टिफिकेट 5 से 10 हजार रुपए में बेचे जाते थे.

मजे की बात है कि इन नकली प्रमाणपत्रों के आधार पर युवकों को आगे की पढ़ाई के लिए एडमिशन भी मिल जाता था और नौकरी भी मिल जाती थी. उन के द्वारा दिए गए सर्टिफिकेट से छात्रों को अन्य संस्थानों में दाखिला लेते समय कोई दिक्कत न आए, इस के लिए आरोपियों ने दिल्ली के पते पर कुछ लोगों को नौकरी पर रखा हुआ था, जो छात्रों के सर्टिफिकेट वेरिफाई करते थे.

औनलाइन वेरिफिकेशन के लिए भी इन लोगों ने कई फर्जी वेबसाइट अपने बोर्ड के नाम पर बना रखी थीं, जिस से छात्रों को बड़े विश्वविद्यालयों, कौलेजों में आसानी से दाखिला मिल जाता था.

नकली डिग्रियां बेचने का काम आजकल बहुत आसान हो गया है. टैक्नोलौजी से इसे इतना सरल बना दिया है कि घर पर बैठ कर कोई भी शातिर अपराधी यह कारनामा कर सकता है. यह धंधा देश व्यापी चल रहा है तो कोई आश्चर्य नहीं है क्योंकि हमारी सरकारों के पास नकली प्रमाणपत्रों को जांचने की कोई कारगर व्यवस्था नहीं है.

हर साल न जाने कितने ऐसे एडमिशन होते हैं जो नकली प्रमाणपत्रों के आधार पर हो जाते हैं. विश्वविद्यालय, कौलेज ऐसे प्रमाणपत्रों को जांचने की जहमत नहीं उठाते. विश्वविद्यालयों, कौलेजों के सामने दिक्कत यह है कि उन के पास प्रवेश लेने वालों की इतनी भीड़ रहती हैं कि पहले एक एक कर के सब से सर्टिफिकेट वेरिफाई कराएं या दाखिला दे कर पढ़ाई शुरू कराएं.

हमारी व्यवस्था ही इतनी आलसी और निकम्मी है कि एक छोटे से काम के लिए औफिस दर औफिस और इस टेबल से उस टेबल तक चक्कर काटने पड़ते हैं. इसी में 2-4 महीने गुजर जाते हैं.

हाल में देश के प्रतिष्ठित माने जाने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ अध्यक्ष अंकिव बसौया के नकली प्रमाणपत्र के आधार पर एडमिशन का मामला सामने आया था. इस मामले में न तो दिल्ली विश्वविद्यालय ने प्रमाणपत्र वेरिफाई कराने की कोशिश की, न ही प्रमाणपत्र देने वाले विश्वविद्यालय द्वारा जांचा गया कि इस नाम का कोई छात्र उन के यहां पंजीकृत है भी या नहीं.

शिकायत और जांच की मांग की गई तब जा कर कई महीनों बाद तमिलनाडु स्थित वेल्लोर विश्वविद्यालय ने कहा कि इस नाम का कोई छात्र पंजीकृत नहीं हुआ.

अंकिव बसौया ने बीए की फर्जी मार्कशीट के आधार पर एमए (बौद्घ अध्ययन) में एडमिशन ले लिया था. फर्जीवाड़ा सामने आने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय ने इस छात्र को छात्र संघ अध्यक्ष का पद तो गंवाना पड़ा ही, विश्वविद्यालय भी छोड़ना पड़ा.

फर्जी डिग्री के कई मामले चल रहे हैं. इन में सब से चर्चित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उन की कैबिनेट मंत्री स्मृति ईरानी, दिल्ली सरकार के कानून मंत्री जितेंद्र सिंह तोमर तक की डिग्रियों पर उठे सवालों के जवाब अभी नहीं नहीं मिल पाए हैं.

देश भर में 10वीं, 12वीं से ले कर ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन और पीएचडी तक की फर्जी डिग्रियां धड़ल्ले से बिक रही हैं.

इस तरह के मामलों की जांचपड़ताल हमारे यहां इस कदर लेटलतीफ चलती है कि जब तक  निष्कर्ष सामने आता है तब तक आरोपी फायदा उठा चुका होता है और उस का कुछ नहीं बिगड़ता.

अगर कोई विधायक, सांसद चुन लिया गया हैं और बाद में पता चलता है कि उस की जीत अवैध तरीके से हुई है तो मामले की जांच जब तक पूरी होती है तब तक वह विधायक या सांसद अपना कार्यकाल पूरा कर चुका होता है. ऐसे कई मामले आए हैं.

नकली डिग्रियों का कारोबार यों ही नहीं चलता, दिक्कत यह है कि ये मामले मिलीभगत से चलते हैं लेकिन इस से नुकसान उन युवा छात्रों का होता है जिन के कई साल कड़ी मेहनत से पढ़ाई कर के डिग्रियां हांसिल करने में खर्च होते हैं. बेचने वालों और खरीदारों के तो मजे ही मजे हैं. मामला खुलने के बाद भी उन का कुछ नहीं बिगड़ता.

बगावती तेवर पर उतरे ओम प्रकाश और अनुप्रिया पटेल

भारतीय जनता पार्टी के उत्तर प्रदेश में 2 सहयोगी दल भाजपा की कार्यशैली से बेहद नाराज हैं. इनमें एक उत्तर प्रदेश में मंत्री सहयोगी ओमप्रकाश राजभर हैं तो दूसरी और केंद्र सरकार में मंत्री अनुप्रिया पटेल अंदर से खफा हैं.

पूर्वांचल के जिलों में इन दोनों ही दलों की ताकत का लाभ भजपा ने उठाया पर उनको कभी पूरा हक नही दिया. भाजपा के लिए पूर्वांचल इस लिए और भी खास है क्योकि यहां से ही पीएम नरेंद्र मोदी चुनाव लड़ते हैं. वाराणसी से चुनाव लड़ने के बाद भी उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल का अलग से कोई विकास नही हुआ.

राजभर बिरादरी में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए पीएम मोदी महाराजा सुहेलदेव के नाम पर डाक टिकट जारी कर हजारों करोड़ की योजनाओं का शिलान्यास कर रहे हैं. भजपा को लगता है कि महाराजा सुहेलदेव पर टिकट जारी कर वो पिछड़े वर्ग के दर्द पर मरहम लगा सकेगी. पिछड़े वर्ग के राजभर वोटों पर ओमप्रकाश राजभर की पार्टी की पकड़ मजबूत है.

भाजपा पूर्वांचल में अपने दोनो सहयोगी दलों अपना दल ( एस) और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी को एकजुट नही रख पा रही है. ऐसे में पार्टी की लोकसभा चुनाव में मुश्किलें बढ़ सकती है।

अपना दल (एस) और सुहेलदेव भारतीय समाज (सुभासपा) पार्टी भी भाजपा के खिलाफ हमलावर हैं. इसकी एक वजह यह भी है कि लोकसभा चुनावों में दोनो ही दल सीटों पर ज्यादा दावेदारी पेश कर रहे हैं.
दोनो ही दलों की भाजपा से नाराजगी की अलग वजहें भी है इनके अनुसार अपना दल (एस) के 9 विधायक हैं और 2 सांसद हैं.

अपना दल के कोटे से प्रदेश की भाजपा सरकार में एक ही राज्यमंत्री हैं, जय कुमार सिंह ‘जैकी’. बहुमत आने के बाद सरकार बनी तो तय हुआ कि अपना दल के अध्यक्ष आशीष पटेल को मंत्रिमंडल में लिया जाएगा. उन्हें एमएलसी भी बनाया गया. मंत्रिमंडल विस्तार में देरी के चलते यह वादा पूरा नहीं हो पाया है.
अपना दल और भाजपा के संगठन स्तर पर भी बेहतर तालमेल नहीं है. कहीं जिला संगठन से दिक्कतें हैं तो कहीं विधायकों में सामंजस्य नहीं है.

आयोगों में होने वाली तैनातियों में भी अपना दल की मांग पर ध्यान नहीं दिया गया. लखनऊ में कार्यालय की मांग पूरी नहीं हुई. बमुश्किल एक बंगला आशीष पटेल को दिया गया. एक शिकवा यह भी है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल में अनुप्रिया पटेल को राज्यमंत्री का दर्जा मिला है लेकिन विभाग में उन्हें कोई महत्वपूर्ण काम नहीं दिया गया.

मंत्री ओमप्रकाश राजभर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री जरूर हैं लेकिन असरदार विभाग नहीं होने से वह खिन्न बताए जाते हैं. यही नहीं उनकी सबसे बड़ी शिकायत है कि सहमति के बावजूद सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट को लागू कर पिछड़ों के आरक्षण में बंटवारा नहीं किया जा रहा. वादा किया गया था कि इसे अक्तूबर 2018 तक लागू कर दिया जाएगा.

लोकसभा चुनावों में सीटों की दावेदारी का है. राजभर घोसी लोकसभा सीट के साथ ही पूर्वांचल में पांच सीटें चाहते हैं. भाजपा को लगता है कि अगर एक सहयोगी की बात मानी तो दूसरा भी अपनी बात रखेगा. अपना दल के लोग अभी भाजपा से शिकायत की बात को अफवाह बता रहे है पर ओम प्रकाश राजभर अपनी शिकायत को जायज बात रहे और खुलेआम अपनी बात रख रहे.

ऐसे में यह भी माना जा रहा है कि बिहार में उपेंद्र कुशवाहा की तर्ज पर ओमप्रकाश भी बड़ा फैसला ले सकते हैं. उत्तर प्रदेश में भाजपा की सांसद साध्वी सावित्री बाई फुले ने दलित मुद्दों पर पार्टी का साथ छोड़ कर जातीय मुद्दों की राजनीति कर रहे नेताओं को मुखर होकर विरोध करने का साहस भी दे दिया है.

मार्किट में आया फोल्डेबल स्मार्टफोन

दुनिया स्मार्ट दर स्मार्ट होती जा रही है. नए साल में स्मार्टनेस में और तड़का लगेगा. स्मार्टफोन की बात करें, तो इसमें कई बदलाव होंगे.  2018 में जो स्मार्टफोन खास हैं वे 2019 में आम हो जाएंगे. हमारे देश में स्मार्टफोन के शौकीनों को कुछ महीनों के अंतराल में नए फीचर से लैस स्मार्टफोन इस्तेमाल करने को मिल रहे हैं.

आज दुनिया में इस समय स्मार्टफोन बाजार में सब से ज्यादा कम्पटीशन है. हैंडसेट निर्माता कंपनियां ग्राहकों को लुभाने के लिए नएनए फीचर्स के साथ स्मार्टफोन ला रही हैं. ऐसे में आप भी जानिए कुछ लाजवाब ट्रैंड्स के बारे में जो 2019 के दौरान बाज़ार में छाए रहेंगे.

डुअल 3, 4 और रियर कैमरा

डुअल कैमरा वर्ष 2018 के दौरान स्मार्टफोन का सब से ज़रूरी फीचर बना रहा. देशवासी 5 से 10 हज़ार रुपए वाले फोन में भी यह फीचर देख चुके हैं. हुआवे अपने ‘पी20 प्रो’ स्मार्टफोन में ट्रिपल रियर कैमरा देने वाला पहला ब्रैंड था. इस के बाद सैमसंग, एलजी और ओप्पो ने भी ट्रिपल रियर कैमरे वाले फोन लांच किए. सैमसंग तो इस से एक कदम आगे बढ़ गया. उस ने ‘ए9’ को 4 कैमरों के साथ लांच किया.

अब ऐसी सूचना आ रही है कि नोकिया 2019 में 5 कैमरों के साथ स्मार्टफोन लांच करेगी.  उम्मीद की जानी चाहिए कि इस ट्रैंड को दूसरे ब्रैंड्स भी फौलो करेंगे.

फोल्ड होने वाले फोन

काफी समय से चर्चा चल रही है कि फोल्ड होने वाला फोन भी आने वाला है.  कुछ अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों में पेश किए गए मौडल्स ने इसे ले कर उम्मीदों को बढ़ाया है. सैमसंग और हुआवे दोनों ने एलान किया है कि वे 2019 में फोल्डेबल स्मार्टफोन लांच करेंगी.

सैमसंग ने तो एक इवेंट में इस स्मार्टफोन की एक झलक दिखाई भी है. वहीं, चाइनीज कंपनी रौयल ने दुनिया का पहला फोल्डेबल स्मार्टफोन ‘फ्लेक्साई’ लांच कर लोगों को हैरान कर दिया है. इस स्मार्टफोन की बिक्री 2019 में शुरू हो जाएगी. इस तरह पहला स्मार्टफोन नए वर्ष में देखने को मिल जाएगा.  हालांकि, इस के लिए मोटी रकम चुकाने को तैयार रहना होगा.

 नौच-फ्री डिस्प्ले यानी औल स्क्रीन डिस्प्ले

नौच ट्रैंड्स की शुरुआत वर्ष 2017 में हुई थी और 2018 आतेआते इस का एंट्री लेवल स्मार्टफोन में दिखना भी आम बात हो गई.  अब तो कई लोग इसे नापसंद भी करने लगे हैं. इस बीच, कुछ स्मार्टफोन ब्रैंड्स इस से एक कदम आगे बढ़ कर ऑल-स्क्रीन डिजाइन (बगैर नौच वाला स्क्रीन डिस्प्ले यानी फुल स्क्रीन डिस्प्ले) दे रहे हैं. यह ट्रैंड लोगों को काफी लुभा भी रहा है.  इस डिजाइन के साथ ओप्पो फाइंड एक्स और वीवो नेक्स जैसे फोन मार्किट में एंट्री कर चुके हैं.

दरअसल, वाटरड्राप डिस्प्ले नौच के बाद अब हैंडसेट निर्माता कंपनियां फुल स्क्रीन डिस्प्ले दे रही हैं.  यह ट्रैंड फिलहाल फ्लैगशिप लेवल फोन में ही देखने को मिल रहा है. हालांकि, 2019 में इस के किफायती होने और बजट सेगमेंट में भी दिखने की उम्मीद है.

5जी स्मार्टफोन

अब 4जी और VoLTE टेक्नोलौजी को सपोर्ट करने वाले स्मार्टफोन काफी आम हो गए हैं. टेलिकौम विभाग ने अगस्त 2019 तक 5जी स्पेक्ट्रम की नीलामी करने का एलान किया है. ऐसे में उम्मीद है कि 2019 के आखिर तक हमें कुछ 5जी टेक्नोलौजी सपोर्ट करने वाले स्मार्टफोन देखने को मिल सकते हैं.  वन प्लस, ओप्पो और हुआवे जैसी कम्पनियां 2019 में 5जी स्मार्टफोन को लांच करने की बात कह भी चुकी हैं. वर्ष 2019 में 5जी सुविधा अमेरिका में शुरू हो जाएगी लेकिन भारत में यह सुविधा वर्ष 2022 तक शुरू हो पाएगी, ऐसा देश की सरकार का मत है.

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