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डार्क लिपस्टिक लगाने का ये है सही तरीका

लिपस्टिक आपके मेकअप का एक अहम हिस्सा होता है. इसे लगाने से चेहरे की खूबसूरती निखर कर आती है और चेहरे पर चार चांद लग जाता है. लेकिन लिपस्टिक लगाते समय यह बेहद जरूरी है कि जो जो लिपस्टिक फैशन में चल रही हो वही लगाएं. इसके अलावा अगर आपको डार्क लिपस्टिक लगाना है तो पहले इस खबर पर एक नजर डाल लें. आज हम आपको बताएंगे कि डार्क लिपस्टिक को किस विधि से लगाएं.

डार्क लिपस्टिक हर मौसम और समय पर नहीं चलती. इसलिए बेहतर होगा कि आप किसी रात की पार्टी में डार्क लिपस्टिक को लगाएं. डार्क लिपस्टिक को फैलने से बचाने के लिये इसे टिशू पेपर पर पोंछे, जिससे इसका अत्‍यधिक रंग निकल जाए. आइये जानते हैं कि डार्क लिपस्टिक को लगाने की क्‍या-क्‍या विधि है.

कंसीलर लगाएं

लिपस्टिक लगाने से पहले अपने होठों को कंसीलर या फाउंडेशन लगा कर ढंके. इसे लगा कर थोड़ी देर के लिये सूखने दें, फिर पाउडर लगा कर लूज कर लें. ऐसा करने से लिपस्टिक बहुत देर तक सेट रहती है.

लाइनिंग जरुरी

डार्क लिपस्टिक लगाने से पहले लिप लाइनर लगाएं, जिससे आपको पता हो कि लिपस्टिक को रेखा के अंदर ही रखना है. लिप लाइनर लिपस्टिक से मेल खाती हुई हो नहीं तो बहुत खराब लगेगी. लाइन को ज्‍यादा डार्क न करें.

ब्‍लौटिंग

जब आप अपना पहला कोट लगा लें, तब अपने होठों को टिशू पेपर के बीच में दबा कर अत्‍यधिक लिपस्टिक निकाल दें. पहले कोट को अगर ब्‍लौटिंग पेपर पर पोंछ लिया तो समझिये कि आपकी लिपस्टिक ज्‍यादा न तो फैलेगी और न ही मिटेगी.

लेयर

लिपस्टिक की दूसरी कोट ब्रश से लगाना बहुत ही जरुरी है. आपको इस लेयर को दुबारा किसी पेपर पर पोंछने की आवश्‍यकता नहीं है.

यहां जानें, बाल झड़ने के 9 प्रमुख कारण

क्या आपके बाल भी भारी मात्रा में झड़ते हैं? ऐसे में हो सकता है कि आप गंजेपन की ओर अग्रसर हो रहे हों. कई बार हम यह नहीं समझ पाते कि बाल क्यों झड़ रहे हैं, लेकिन एक शोध में पाया गया है कि पुरुषों में गंजेपन का कारण अक्सर जेनेटिक होता है यानी कि आनुवांशिक तौर पर भी आपको यह परेशानी विरासत में मिल सकती है, जबकि स्त्रियों में बाल झड़ने के पीछे मुख्य कारण तनाव या मानसिक परेशानी होती है. इसके अलावा भी बाल झड़ने और गंजेपन के कई कारण हो सकते हैं. तो आइए जानते हैं इसकी 9 बड़ी वजहें.

हेयर स्टाइल टूल

नहाने के बाद लोग अक्सर अपने बालों को सुखाने के लिए हेयर ड्रायर की मदद लेते हैं. यह बाल सुखाने और हेयरस्टाइल बनाने का एक आसान तरीका हो सकता है, पर कई अध्ययन से पता चला है कि प्रतिदिन इसका प्रयोग आपके बालों के लिए ठीक नही है. लगातार अपने बालों को सीधा या घुंघराला बनाने के लिए किए जाने वाले ट्रीटमेंट से भी बाल झड़ते हैं.

नींद की समस्या

न सोने का असर आंखों के साथ-साथ सिर पर भी दिखता है. इंसोमिया, नार्कोलेप्सी और अन्य सोने संबंधी विकार बालों की सेहत पर बुरा असर डालते हैं. कई बार तो यह गंजेपन का कारण भी बन जाता है.

जंक फूड

जंक फूड पर ज्यादा निर्भर रहने से पोषण संबंधी कमी होती है, जो कि गंजेपन का कारण हो सकता है. वहीं खानपान में ठीक तरह से ध्यान न देने से भी बाल बड़ी मात्रा में झड़ते हैं.

हार्मोन परिवर्तन

गर्भावस्था और प्रसव के दौरान शरीर में हार्मोन के स्तर में होने वाले उतार-चढ़ाव से भी भारी मात्रा में बाल झड़ते हैं. थाइराइड इंबैलेंस, मासिक धर्म का बंद हो जाना और अन्य हार्मोन से संबंधित अवस्था में भी बाल तेजी से झड़ते हैं.

तनाव

आज की इस भाग-दौड़ भरी जिंदगी में हमारे शरीर से बड़ी मात्रा में ऊर्जा बाहर निकलती है, जिससे तनाव का स्तर बढ़ता है. ज्यादातर लोगों में यह देखा गया है कि भारी तनाव के कारण उनके बाल झड़ते हैं. ज्यादा तनाव लेने के कारण भी इंसान गंजेपन का शिकार हो सकता है.

आनुवंशिक कारण

बाल झड़ने के पीछे की एक खास वजह आनुवंशिक भी हो सकती है, इसमें आप ज्यादा कुछ नहीं कर सकते. आप सिर्फ उचित आहार और बेहतर लाइफस्टाइल के जरिए बाल झड़ने की संभावना को कम कर सकते हैं. साथ ही आप उन चीजों से खुद से बचा सकते हैं, जो बाल झड़ने में सहायक होता है.

रसायनिक उत्पाद

वर्तमान में शैंपू, कंडीश्नर और यहां तक कि हेयर औयल भी रसायनयुक्त होते हैं, जो कि बालों को कई तरह से नुकसान पहुंचाते हैं. आज के अधिकतर कास्मेटिक उत्पाद में हानिकारक रसायन रहते हैं, जो बालों को कमजोर करने के साथ-साथ बालों से संबंधित अन्य समस्याओं को भी जन्म देते हैं.

दवाईयां

आज की जीवनशैली तेजी से बदल रही है. इस कारण मानसिक कष्ट भी बढ़ रहा है. जब इसके लिए हम उपचार कराते हैं और दवाई का प्रयोग करते हैं तो यह बाल की सेहत को और खराब कर देता है. कुछ ड्रग्स का अति प्रयोग और भारी खुराक का सीधा संबंध बाल झड़ने और गंजेपन से होता है.

अप्रिय मौसम

आपके औफिस या घर में लगा एयर कंडीश्नर आपके लिए आरामदायक और सुखद तो हो सकता है, पर आपके बालों के लिए भी हो ऐसा जरूरी नही है. चूंकि बाल काफी नाजुक होते हैं, इसलिए वातावरण में बदलाव का असर इसपर सबसे ज्यादा पड़ता है. ऐसे में जरूरी है कि बालों का अच्छे से ख्याल रखा जाए.

2018 : खान की तिकड़ी बुरी तरह परास्त, नए कलाकारों ने मारी बाजी

पिछले एक दशक से भी अधिक समय से बौलीवुड में खान कलाकारों की तिकड़ी का दबदबा बना हुआ था. मगर 2018 में आमिर खान (फिल्म ‘‘ठग्स औफ हिंदोस्तान’’), सलमान खान (फिल्म ‘‘रेस 3’’) और शाहरुख खान (फिल्म ‘‘जीरो’’) की तिकड़ी एक साथ बाक्स आफिस पर बुरी तरह से मात खा गयी. जबकि इन तीनों खान कलाकारों से कई गुना अधिक नवोदित व युवा कलाकारों की फिल्मों ने बाक्स आफिस पर कमाकर नए रिकार्ड बना डाले.

स्टारडम के मद में चूर खान कलाकारों की यह तिकड़ी शायद इस बात को भूल गई कि स्टारडम पाने के संघर्ष से कहीं ज्यादा बड़ा संघर्ष उसे बरकरार रखने का होता है और स्टारडम पाने के बाद उसे सहेज कर रखने के लिए ज्यादा समझदारी से कदम उठाना चाहिए. पीआर का काम होता है कि वह कलाकार के स्टारडम को बढ़ाने के उपाय करे न कि ऐसा काम करे जिससे कलाकार की स्टारडम पर ही सवालिया निशान लगने शुरू हो जाएं. पर शायद इन खान कलाकारों के पास इन सब बातों पर विचार करने लिए समय का घोर अभाव है. यह महज संयोग ही कहा जाएगा कि पहली बार इस वर्ष इन तीनों खान कलाकारों का निजी और इनकी प्रदर्शित फिल्मों का प्रचार एक ही पीआर कंपनी कर रही थी.

खान कलाकारों की इस तिकडी को राज कुमार राव, पंकज त्रिपाठी, विक्की कौशल, आयुष्मान खुराना जैसे कलाकारों की तरफ से जबरदस्त टक्कर मिली. इनकी फिल्में न सिर्फ बाक्स आफिस पर सफल हुईं, बल्कि सौ करोड़ क्लब का भी हिस्सा बनी. इन कलाकारों ने साबित कर दिखाया कि अब खान कलाकारों को भी खुद को बदलने की जरुरत है. अब परंपरागत मुंबईया मसाला फिल्मों या फिल्मों में महज सपने बेचने की बजाय कुछ यथार्थपरक विषयों वाली फिल्में करनी होंगी. अब दर्शक को  यर्थाथवाद का आकर्षण चाहिए न कि महज शगूफेबाजी.

मगर अफसोस की बात यह रही कि खान कलाकारों की तिकड़ी गत वर्ष व अपनी पिछली असफलताओं से सबक सीखने के बजाय पुराने ढर्रे पर काम करते रहे और सोशल मीडिया के नकली जुमलों को सच मानकर खुद को स्टार कलाकार मानने की भूल कर बैठे. इन कलाकारों को यह समझ लेना चाहिए कि सोशल मीडिया उनके स्टारडम को नुकसान पहुंचाने में अहम भूमिका निभा रहा है. इतना ही नही इनकी पीआर टीम भी इन्हे महज सोशल मीडिया का झांसा देकर गलत पाठ पढ़ा रही है. इन खान कलाकारों को याद रखना चाहिए कि समय के साथ समाज व सिनेमा में बहुत कुछ बदला है. इस बदलाव को समझकर चौथे खान कलाकार यानी कि अभिनेता सैफ अली खान ने ‘‘बाजार’’ जैसी यथार्थपरक फिल्म की और सफलता बटोरने में कामयाब रहे.

गत वर्ष से सबक सीखकर जिन फिल्मकारों व कलाकारों ने 2018 में फिल्म के कंटेट, कहानी व पटकथा पर खास ध्यान दिया, उनकी फिल्में सफल रहीं. फिर चाहे वह ‘राजी’ हो या ‘बधाई हो’ हो या ‘बागी 2’ हो या ‘बाजार’ हो. अभी भी बौलीवुड को क्षेत्रीय सिनेमा की फिल्मों से सीखने की जरुरत है. क्षेत्रीय सिनेमा के फिल्मकार एस एस राजामौली ने ‘बाहुबली’ को हिंदी में डब करके प्रदर्शित कर दूसरी क्षेत्रीय फिल्मों के लिए बौलीवुड में जगह पैदा की. जिसका फायदा कन्नड़ के सुपर स्टार यश ने अपनी फिल्म ‘केजीएफ’ को हिंदी में डब करके प्रदर्शित कर शाहरुख खान की फिल्म ‘जीरो’ को जबरदस्त टक्कर दी.

कहां चूके सलमान खान?

2018 में सबसे पहले 15 जून 2018 को रेमो डिसूजा निर्देर्शित फिल्म ‘‘रेस 3’’ प्रदर्शित हुई, जो कि बाक्स आफिस पर सफलता के झंडे नहीं गाड़ सकी. इससे पहले 2017 में सलमान खान की फिल्म ‘‘ट्यूबलाइट’’ बुरी तरह मात खा चुकी थी. फिल्म ‘‘रेस 3’’ में सलमान खान ने अपने कई दोस्त कलाकारों का जमावड़ा किया था, मगर वह इस फिल्म की पटकथा पर ध्यान नहीं दे पाए. जबकि लेखक ने इस फिल्म की पटकथा आधे मन से अति घटिया व तर्कविहीन लिखी थी. लेखक ने फिल्म में किसी भी किरदार को सही ढंग से चित्रित नहीं किया.

उस पर निर्देशक ने भी सब कुछ सलमान खान के भरोसे छोड़कर फिल्म को फिल्मा कर दर्शकों के सामने रख दिया. परिणामतः इसे डूबने से सलमान खान के समर्पित प्रशंसक और ‘ईद’ का अवसर भी न बचा पाया. फिल्म ‘‘रेस 3’’ को सिर्फ बाक्स आफिस पर ही नुकसान नहीं हुआ, बल्कि इससे सलमान खान की अपनी इमेज को भी धक्का लगा. पूरे विश्व में सर्वाधिक खराब फिल्मों की सूची में ‘रेस 3’ को रखा जा रहा है. ‘रेस 3’ के असफल होने के बाद सलमान खान के प्रशंसकों ने सोशल मीडिया पर मुहिम चलायी कि अब उन्हें सलमान खान की फिल्म ‘दबंग 3’ नहीं देखनी है.

सलमान खान ने अपनी असफलताओं से कोई सबक नहीं सीखा और वही पुराने ढर्रे की बड़े बजट की फिल्में खुद भी करते रहे और अपने बहनोई आयुष शर्मा को हीरो लेकर भी उन्होंने ‘लव यात्री’ नामक मसाला फिल्म बनाकर उसके करियर के शुरू होने से पहले ही उस पर विराम लगा दिया.

जबकि नेपोटिज्म की चर्चाओं के बीच सैफ अली खान व अमृता सिंह की बेटी सारा अली खान  फिल्म ‘‘केदारनाथ’’ से अपनी बेहतरीन उपस्थिति दर्ज कराने में सफल रहीं. यदि फिल्मकार ने इस फिल्म को यथार्थ तक सीमित रखा होता, तो यह फिल्म सफलता के नए रिकार्ड बना सकती थी.

शाहरुख खान की गलती

2014 में प्रदर्शित सफलतम फिल्म ‘‘हैप्पी न्यू ईयर’’ के बाद शाहरुख खान की ‘दिलवाले’, ‘फैन’, ‘रईस’, ‘जब हैरी मेट सैजल’ के बाद ‘जीरो’ पांचवी लगातार असफल होने वाली फिल्म है. जबकि ‘‘जीरो’’ से शाहरुख खान के साथ साथ फिल्म के निर्देशक आनंद एल राय को भी काफी उम्मीदें थीं. फिल्म ‘जीरो’ की असफलता के लिए शाहरुख खान ही पूरी तरह से दोषी माने जा रहे हैं. लोग सवाल कर रहे हैं कि उन्होंने एक गलत कहानी व पटकथा क्यों चुनी? बौलीवुड में शाहरुख खान की इस असफलता से गैर फिल्मी परिवारों से आने वाली प्रतिभाएं भी निराश हुई हैं.

अब तक गैर फिल्मी परिवार से आने वाली प्रतिभाएं शाहरुख खान की सफलता को अपना आदर्श मानकर सफलता पाने के लिए कठिन संघर्ष करती रही हैं. लेकिन 2018 में ऐसी प्रतिभाओं के सपनों पर भी कुठाराघात हुआ है. शायद इस बात को शाहरुख खान न समझ पाएं.

दो सौ करोड़ के बजट की फिल्म ‘‘जीरो’’ में शाहरुख खान के साथ कटरीना कैफ व अनुष्का शर्मा की मुख्य भूमिका रही. मगर फिल्म को साल की सबसे बड़ी सफल फिल्म बनाने के लिए मेहमान कलाकार के तौर पर इस फिल्म में सलमान खान, स्व. श्री देवी, जूही चावला, करिश्मा कपूर सहित कई दूसरे दिग्गज कलाकारों को भी जोड़ा गया. इसके बावजूद यह फिल्म अब तक सौ करोड़ भी बाक्स आफिस पर नहीं इकट्ठा कर सकी. नौवें दिन तक यह फिल्म लगभग 86 करोड़ ही इकट्ठा कर सकी.

मिर खान ने किया निराश

बौलीवुड में आमिर खान के फिल्म की कहानी व पटकथा को चुनने की सदैव चर्चा हुआ करती थी, मगर अति फूहड़ फिल्म ‘‘ठग्स आफ हिंदोस्तान’’ की असफलता ने आमिर खान के इस कौशल पर सवलिया निशान लगाते हुए उन्हे भी असफल कलाकार बना दिया. इतना ही बौलीवुड में अब तक सफलता को लेकर आमिर खान को ही सबसे अधिक भरोसेमंद कलाकार माना जा रहा था, पर अब लोगों का उन पर से भी भरोसा उठ गया. बाक्स आफिस पर फिल्म ‘‘ठग्स आफ हिंदोस्तान’’ के बुरी तरह से मात खाने के बाद आमिर खान अंदर तक हिल गए. उन्होंने कुछ समय के लिए अभिनय से सन्यास लेने का ऐलान करने के अलावा दर्शकों व अपने प्रशंसकों से माफी भी मांगी.

चौराहे पर बौलीवुड

खान की तिकड़ी के साथ ही कई दिग्गज कलाकारों की फिल्में भी इस वर्ष असफल हुई हैं, इससे 2018 की समाप्ति पर बौलीवुड ऐसे चौराहे पर खड़ा हुआ नजर आ रहा है, जहां उसकी समझ में नहीं आ रहा है कि 2019 में उनकी नैय्या कैसे पार होगी? अन्यथा अब तक बौलीवुड का हर बड़ा फिल्मकार बड़ी आसानी से इन खान कलाकारों या दूसरे दिग्गज यानी कि ‘ए’ श्रेणी के कलाकारों पर पैसा लगाकर बेहिचक फिल्में बनाता रहा है.

उग्र हिंदुत्व के नाम रहेगी 2019 की राजनीति

नए साल की राजनीति में दिलचस्पी की इकलौती बात सिर्फ यही रहेगी कि क्या भाजपा मई में होने वाले लोकसभा चुनाव में 2014 जैसा प्रदर्शन दोहरा पाएगी और नरेंद्र मोदी फिर से प्रधानमंत्री बन पाएंगे या नहीं. 2018 के हाल देखते तो इन दोनों ही सवालों के जवाब भाजपा के लिहाज से उत्साहजनक नहीं है, क्योंकि 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में वोटर ने उसे बेरहमी से नकार दिया है. सबका साथ सबका विकास का उसका नारा अच्छे दिनों की तरह खोखला साबित हुआ है. जाहिर है लोकसभा के लिए उसे अपनी रणनीति बदलना पड़ेगी. संभावना इस बात की ज्यादा है कि भाजपा को अपने परंपरागत मुद्दों की तरफ लौटने का जोखिम उठाना ही पड़ेगा.

ये मुद्दे देश का बच्चा बच्चा जानता है कि उग्र हिन्दुत्व के हैं, मसलन यह नारा कि रामलला हम आएंगे , मंदिर वहीं बनाएंगे और धारा 370 वगैरह यानि भाजपा अब जाति के बजाय खालिस धर्म की राजनीति करने मजबूर होगी, मजबूर इसलिए कि विकास के दावे और भ्रष्टाचार उन्मूलन पर वह कुछ नहीं कर पाई है. पर क्या महान हिन्दू धर्म और संस्कृति के नाम पर सवर्णों के साथ दलित और सभी पिछड़े उसका साथ देंगे, 2019 की राजनीति का दारोमदार इसी सवाल के जवाब पर टिका है.

निश्चित रूप से भाजपा हिन्दू धर्म के गौरवशाली और वैभवशाली अतीत की वापसी की बात करेगी, वह भी इस तरीके से कि इसमें मनुवाद और वर्ण व्यवस्था न दिखे, दिखे तो वह कथित रामराज्य जिसमें कथित रूप से सब बराबर होते हैं और शेर और बकरी दोनों एक घाट पर पानी पीते हैं, सब की खुशहाली की बात का ढिंढोरा भी भाजपा पीटेगी. अब वह यह नहीं कहेगी कि दलितों को सवर्णों के बराबर का दर्जा दिये जाने की कोशिशें की जा रहीं हैं, बल्कि वह यह कहेगी कि हिन्दू एकता को बड़ा खतरा मुसलमान हैं हम इन्हें भगाने या खदेड़ने की नहीं बल्कि उनकी मुश्के कसने की बात कर रहे हैं.

तीन राज्यों में मुंह की खाने के बाद गौर से देखें तो भाजपा की कोशिश जमीनी दलित नेताओं को साधने की रही है, इनमें अपना दल की अनुप्रिया पटेल और लोजपा के रामविलास पासवान प्रमुख हैं. इनकी ही तरह गैर जमीनी लेकिन बुद्धिजीवी और दलित समुदाय में लोकप्रिय नेता उदित राज जैसों को वह हनुमान और जामवंत की तरह गले से लगाए रखने की पूरी कोशिश कर रही है जिससे उसकी दलित विरोधी छवि ढकी रहे. इस बाबत वह कुछ नुकसान उठाने का और त्याग करने का ड्रामा भी कर रही है.

इस कवायद का दूसरा अहम पहलू 2019 की राजनीति का गठबंधनीय पहलू भी है जो अभी आकार नहीं ले पाया है खासतौर से उत्तरप्रदेश में जहां सबसे ज्यादा 80 सीटें हैं. अगर सपा बसपा एक साथ लड़े तो भाजपा की दुर्गति होना अभी से तय दिख रहा है और अगर साथ न भी लड़े तो भी भाजपा के लिए 70 से ज्यादा सीटें सपना ही रहेंगी. 40 सीटों वाले बिहार में उसकी बेचारगी जेडी यू को 17 सीटें देने पर दिख ही चुकी है, जबकि अकेले उसने 2014 में यहां 22 सीटें जीती थीं. 54 सीटों वाले महाराष्ट्र में उसकी सहयोगी शिवसेना ने भाजपा की हवा तंग कर ही रखी है.

ऐसा हर एक राज्य में है, इसलिए हैरानी नहीं होनी चाहिए कि अपनी सीटें बढ़ाने भाजपा फिर से यज्ञ हवन और कर्मकांडों की बाढ़ ला दे, जिससे एट्रोसिटी एक्ट के मसले को भूलकर सवर्ण वोट उसे थोक में मिले. कुंभ की जोरदार तैयारियां और भारीभरकम खर्च इस तरफ इशारा भी कर रहा कि भाजपा की हर मुमकिन कोशिश यह है कि नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसलों के जख्म लोग भूल जाएं.

पर क्या ये चालें कारगर होंगी, इसे लेकर भगवा खेमे में संशय है, जिसकी बड़ी वजह नरेंद्र मोदी का उतरता जादू भी है.  नितिन गडकरी को आगे लाने की चर्चाएं बताती हैं कि मोदी अब गारंटेड नहीं रह गए हैं. 2014 में भाजपा को जिताने और मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए अपना तन मन धन तक दांव पर लगा देने वाले कारोबारी बाबा रामदेव भी कहने लगे हैं कि पता नहीं 2019 में पीएम कौन होगा.

गैर भाजपाई दल अभी खामोश हैं जिनकी भूमिका देश भर में निर्णायक होगी. तीन राज्यों के नतीजों के बाद गली चौराहों का विश्लेषण तो दो टूक कह रहा है कि भाजपा घटकर और कांग्रेस बढ़कर 150-150 सीटें ले जाएंगी और बाकी 240 क्षेत्रीय दलों के पाकेट में रहेंगी, ऐसे में जो सौदेबाजी में उदारता दिखाएगा वह फिर दिल्ली का सुल्तान होगा. गली चौराहों के जानकारों का हुजूम बेहिचक मानता है कि खरीद फरोख्त में भाजपा भारी पड़ेगी, क्योंकि उसके पास पैसों की कमी नहीं. दरअसल में अब गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, दिल्ली, छतीसगढ़, हिमाचल, पंजाब और हरियाणा में भाजपा का ग्राफ काफी नीचे आ चुका है, जहां उसने लगभग क्लीन स्वीप 2014 में कर दिया था क्योंकि तब मोदी लहर थी जो अब नहीं है.

ऐसे में भाजपा अपने पुराने हिन्दुत्व वाले तेवरों में दिखे तो बात कतई हैरानी की नहीं होगी. विकास, समरसता और धर्मनिरपेक्षता जैसे मुद्दे उसके संस्कारों से मेल नहीं खाते हैं और न ही इन पर उसे वोट मिलते हैं. 2014 में एक बार ऐसा हो गया था तो खुद वोटर अब पछता रहा है. अब सहारा राम का ही बचा है जिसके बाबत रणनीति तैयार हो रही है और फायर ब्रांड नेत्री उमा भारती भोपाल में कह भी चुकीं हैं कि अगर मोदी–योगी के राज में भी मंदिर नहीं बना तो जनता के लिए बात किसी सदमे से कम नहीं होगी.

चुनावी साल मुंह बाए खड़ा है लेकिन 2018 भाजपा का दिल तोड़ गया है, खासतौर से देश का दिल कहे जाने वाले मध्यप्रदेश ने उसे त्रिशंकु की तरह अधर में लटका दिया है. संकट में धैर्य नहीं बल्कि धर्म का दामन थामने वाली भाजपा का हवन कुंड विधर्मियों की आहुति के लिए तैयार है. मई जून में जो धुंआ उठेगा, उसका रंग भगवा होगा या नहीं, यह जिम्मेदारी आम लोगों को उठानी है जिनके लिए साल 2019 सबसे बड़ी चुनौती होगा कि किस के हाथों में देश सुरक्षित रहेगा.

‘‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’’ फिल्म पर विवाद

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल पर आधारित ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ का ट्रेलर जारी होने के साथ ही फिल्म पर विवाद शुरू हो गया है. यह ट्रेलर भाजपा द्वारा अपने ट्वीटर हैंडल से जारी किया गया है. कांग्रेस ने फिल्म की स्क्रिनिंग को बाधित करने की चेतावनी दी है और मांग की है कि फिल्म को रिलीज करने से पहले उस की स्पेशल स्क्रिनिंग की व्यवस्था की जाए. जो दृश्य तथ्यों पर आधारित नहीं हों उन्हें हटाया जाए.

कांग्रेस का आरोप है कि यह फिल्म भाजपा का दुष्प्रचार है और उन के द्वारा किया जा रहा राजनीतिक स्टंट है.

भाजपा ने इस फिल्म को दिलचस्प बताते हुए कहा कि इस में दिखाया गया है कि कैसे एक परिवार ने देश को 10 वर्षों तक बंधक बना कर रखा था. फिल्म को ले कर दोनों पार्टियों की ओर से बहस और बयानबाजी जारी है.

दरअसल ’द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ फिल्म पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल पर लिखी पुस्तक पर आधारित है. फिल्म में मनमोहन सिंह को सहानुभूति का पात्र दिखाने की कोशिश की गई है.

’द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ पत्रकार संजय बारू द्वारा लिखी गई पुस्तक है जिस पर सुनील बोहरा और धवल गाडा ने इसी नाम से फिल्म बनाई है. फिल्म में मनमोहन सिंह का किरदार अभिनेता अनुपम खेर ने निभाया है. सोनिया गांधी का रोल जर्मन अभिनेत्री सुजैन बर्नेट, राहुल गांधी का अर्जन माथुर, प्रियंका गांधी का अहाना कुमरा ने निभाया है.

संजय बारू मई 2004 से अगस्त 2008 तक मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार थे. पुस्तक 2014 में पेंगुइन इंडिया द्वारा प्रकाशित इस किताब में आरोप लगाया गया है कि अपने कैबिनेट और यहां तक कि प्रधानमंत्री कार्यालय तक मनमोहन सिंह के नियंत्रण में नहीं थे. इस के बजाय कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पास अधिक शक्ति थी.

हालांकि पुस्तक जारी होने के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय ने नाराजगी जताते हुए पुस्तक के दावों का नकार दिया था. पीएमओ द्वारा प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार द्वारा पद का दुरुपयोग और व्यावसायिक लाभ कमाने की मंशा करार दिया गया.

बाद में संजय बारू ने पीएमओ के इस बयान को मूर्खतापूर्ण बताते हुए कहा था कि उन्होंने यूपीए-1 के अपने उन्हीं अनुभवों के आधार पर किताब लिखी है जिसे उन्होंने नजदीक से देखा और जाना है.

संजय बारू ने लिखा था कि यह स्वाभाविक है कि एक नेता या तो प्रशंसा का पात्र हो या घृणा का, पर उपहास का पात्र नहीं बनना चाहिए. उन्होंने [मनमोहन सिंह] कई गलतियां कीं. इस किताब में उस का उल्लेख करने में झिझक नहीं है. पहला कार्यकाल ठीक रहा पर दूसरा कार्यकाल वित्तीय घोटालों और बुरी खबरों से भरपूर रहा. उन्होंने राजनीति पर से नियंत्रण खो दिया था और पीएमओ असरहीन हो गया था.

हमारे यहां फिल्मों को ले कर विवाद कोई नई बात नहीं है. ज्यादातर कंटेंट को ले कर विवाद खड़ा करने का मकसद धार्मिक या राजनीतिक  रहा है. पीके, ओएमजी, पदमावत, उड़ता पंजाब जैसी फिल्मों पर धार्मिक और राजनीतिक धंधेबाजों ने बवाल उठाया था. उन का उद्देश्य अपनी धंधेबाजी का नुकसान था.

’द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ फिल्म कोई धार्मिक कंटेंट वाली नहीं है जिस से धर्म के धंधेबाजों को ठेस पहुंच रही हो. यह विशुद्घ रूप से राजनीतिक फिल्म है और इस पर विवाद राजनीतिक नफानुकसान को ले कर है.

2019 के आम चुनाव सामने है इसलिए भाजपा चाहती है, फिल्म के जरिए कांग्रेस को बदनाम किया जाए और राजनीतिक फायदा उठाया जाए. उधर कांग्रेस को लगता है कि इस से उसे राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है इसलिए कांग्रेस शासित राज्यों में फिल्म को बैन करने की बातें उठ रही हैं.

इंदिरा गांधी पर बनी फिल्म किस्सा कुर्सी का पर्दे पर आने से पहले ही विवादों में इस कदर घिरी कि उसे लोग देख ही नहीं पाए. फिल्म को हमेशाहमेशा के लिए डिब्बाबंद कर दिया गया.

प्रधानमंत्री कार्यालय में क्या हो रहा था, किस का नियंत्रण था, कैसा नियंत्रण था, कौन पावरफुल था? लोकतंत्र में यह देखने, जानने का हक इस देश की जनता को है. राजनीतिक दलों में से किस को फायदा होगा, किस को नुकसान, इसे भी नहीं रोका जा सकता.

अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देशों में राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों पर स्वतंत्र रूप से पुस्तकें लिखी जाती रही हैं. फिल्में भी बनी हैं पर भारत की तरह उन पर कभी विवाद होते नहीं सुने गए.

भाजपा इस फिल्म को ले कर ज्यादा उत्साहित इसलिए है क्योंकि यह उस के प्रतिद्वंद्वी को कमतर दिखाती है. दूसरा फिल्म में मुख्य रोल मनमोहन सिंह की भूमिका अदा करने वाले अनुपम खेर की पत्नी किरण खेर भाजपा की सांसद हैं और वह खुद भी पार्टी के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं. वह कांग्रेस पर तो हमलावर रहते ही हैं, हिंदुत्व पर हमेशा बड़बोलापन जाहिर करते रहते हैं.

अगर मनमोहन सिंह के कार्यकाल में पीएमओ सोनिया गांधी के नियंत्रण में था तो क्या अब नरेंद्र मोदी का पीएमओ संघ के नागपुर कार्यालय से नियंत्रित नहीं है?

राजनीतिक पार्टियां फिल्मों को अपने नफानुकसान को तोल कर दर्शकों के हक का हनन करती आईर् है. दर्शकों को फिल्म देखने का उतना ही अधिकार है जितना किसी लेखक, निर्देशक, निर्माता को अभिव्यक्ति का संवैधानिक हक प्राप्त है. क्या गलत है, क्या सही है यह तय करने का अधिकार दर्शकों को है. उन्हें इस से वंचित नहीं किया जा सकता. फिल्म अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है.

धर्मिक यात्राओं के प्रबंधन में जुटी पुलिस

उत्तर प्रदेश पुलिस का पहला काम नेताओं की सुरक्षा और दूसरा का धर्मिक यात्राओें का प्रबंधन इसके बाद बचे समय में कानून व्यवस्था और अपराध प्रबंधन का काम. उत्तर प्रदेश में पुलिस कुछ इस तरह से अपने काम की प्राथमिकता रखती है. हर दिन किसी न किसी महापुरूष का जन्मदिन उसकी मूर्ति और जुलूस की सुरक्षा करनी होती है. हर त्यौहार पर तमाम धर्मिक संगठन धर्मिक यात्रायें निकालते है इनमें कोई झगड़ा न हो इसकी जिम्मेदारी पुलिस की प्राथमिकता में है. जिन जिन त्यौहारो में जुलूस नहीं निकलते थे उनमें भी जुलूस निकलने लगे. ऐसे धर्मिक जूलूसों को निकालने से पहले ना तो किसी तरह की अनुमति ली जाती है और ना ही कोई सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम किया जाता है. जुलूस में पैदल और मोटर साइकिलों का प्रयोग किया जाता है और वाहन सुरक्षा का कोई नियम पालन नहीं होता. बेबस पुलिस एक भी मोटर वाहन एक्ट में चालान नहीं कर पाती है.

सामाजिक मुद्दों के जानकार मानते है कि अब धर्मिक जुलूस धर्म से अधिक राजनीति और समाज पर दबाव दिखाने के लिये आयोजित होते है. धर्म के नाम पर प्रशासन इनके खिलाफ कोई कदम नहीं उठा पाता है. ऐसे में यह निरकुंश होकर सड़को को जाम करते हैं. कई जुलूसों में अस्त्राशस्त्रा का भी खुलकर प्रयोग होता है जो एक तरह से आतंक फैलाता है. ऐसे धर्मिक जुलूस बहुतायत में तनाव और झगड़ों की वजह बनता है. दलित चिंतक राम चन्द्र कटियार कहते है जिस प्रदेश का मुखिया संत महंत हो वहां धर्मिक जुलसों पर पांबदी कैसे लग सकता है?’

पुलिस विभाग के एक अधिकारी कहते हैं हमारें लिए सबसे पहली प्राथमिकता धर्म के नाम पर निकलने के नियंत्रण की होती है. पुलिस विभाग के पास लोगों की संख्या कम है. ऐसे में पुलिस विभाग अपनी प्राथमिकता के अनुसार काम करती है. नेताओं की सुरक्षा के बाद धर्मिक जुलूस और कानून व्यवस्था मुद्दे पर काम करती है. यह सच है कि पुलिस पर काम का इतना दबाव है कि वह अपराध की विवेचना में समय नहीं दे पाती. ऐसे में छोटेछोटे अपराधों पर पुलिस का ध्यान नहीं जा पाता. यह जरूरी है कि ऐसे धर्मिक जुलूसों में कमी लाई जाए.

ऐसे पाएं दो मुंहे बालों से छुटकारा

हर लड़की को लंबे बाल पसंद होते हैं पर कई लड़कियां लंबे बाल सिर्फ इसलिए नहीं रखती क्‍योंकि उन्‍हें डर होता है कि कहीं स्‍पिलिट इंड यानी दो मुंहे बाल उनके बालों का टेक्‍सचर खराब न कर दें. अगर आपके लंबे घने बाल दो मुंहे हो गए हैं तो वो देखने में बहुत ही खराब लगते हैं. दो मुंहे बाल तभी होते हैं जब आप उनका ठीक से ध्‍यान नहीं रखती. खैर अगर आप भी दो मुंहे बालों से परेशान हैं और उनसे छुटकारा पाना चाहती हैं तो हमारे दिये हुए कुछ टिप्‍स पढ़ लीजिये, आपको जरुर मदद मिलेगी.

ब्‍लो ड्रायर का प्रयोग न करें: लंबे बालों को सुखाने में टाइम लगता है इसलिये लड़कियां ब्‍लो ड्रायर का प्रयोग करती हैं. मगर ब्‍लो ड्रायर की गर्मी से बाल दो मुंहे हो जाते हैं. इसलिए अपने बालों को हमेशा पंखे के नीचे या धूप में ही सुखाएं. जब तक बहुत जरूरी न हो तब तक ब्लो ड्रायर का इस्तेमाल न करें.

कंडीशनर की जगह करें अंडे का इस्तेमाल : बाजार में मिलने वाले कंडीशनरों का प्रयोग न करें इसके बदले अंडे को अपने बालों में लगाएं. इससे सूखे बालों और दोमुंहे बालों से मुक्‍ती मिलेगी. अंडे से बालों में चमक भी आती है.

सोने से पहले बांधे बालों को : रात को बिना बांधे हुए बाल तकिये से रगड़ खा कर दो मुंहे हो जाते हैं. पोनी टेल बनाने के बजाए बालों की चोटी बनाएं, जिससे वे टूटे नहीं.

यात्रा के दौरान बांध बालों को : लंबे बालों को हमेशा बांध कर रखें खासतौर पर जब आप बाइक पर हों या ट्रेन व गाड़ी से किसी लंबे सफर पर जा रही हों. ऐसा इसलिए क्योंकि सफर के दौरान धूल और मिट्टी आपके बालों को काफी नुकसान पहुंचाते हैं और जब बाल बंधे होते हैं तो वह सुरक्षित होते हैं.

गरम आयरन का प्रयोग न करें : रौड की गर्मी और दबाव बालों में दरार पैदा कर देता है. तो बालों को सीधा करने के चक्‍कर में उन्‍हें बरबाद न करें नहीं तो आगे चल कर आपको पछताना पड़ सकता है.

महिलाओं की पसंद बनते डायमंड के गहने

देश के युवावर्ग पर बौलीवुड का असर हमेशा से है, इस में दो राय नहीं. युवावर्ग में युवक हो या युवती, दोनों ही हीरोहीरोइन के पहनावे को अपनाते रहे हैं.  इसी क्रम में फिल्मी अभिनेत्रियों के जेवरों को भी युवतियां अपनाती रही हैं. यहां तक कि युवतियों के परिवार के पुरुषमहिला दोनों सदस्य फिल्मी फैशन अपनाने को अपने घरों की युवतियोंमहिलाओं को प्रोत्साहित करते भी रहते हैं.  हालांकि, युवतियां खुद भी इस में पीछे नहीं हैं.

फिल्म इंडस्ट्री की हालिया चर्चित शादी (रणवीर-दीपिका) की तस्वीरें सोशल मीडिया पर जल्दी अपलोड नहीं हुईं तो उन की एक फौलोअर संगीता काफी बेचैन हो गईं. मेडिकल व्यवसाय से जुड़ी संगीता जानना चाहती थी कि उस की फेवरिट अदाकारा ने जिन्दगी के सब से खास अवसर पर कौन से जेवर पहने हैं.

नवदम्पती ने अपनी शादी की तस्वीरें अपलोड कीं तो संगीता की नजर सब से पहले नई दुलहन की ज्वेलरी पर गई. संगीता कहती है, ‘दीपिका पादुकोण ने सब्यसाची हेरिटेज ज्वेलरी कलेक्शन की शानदार ज्वेलरी पहन रखी थी. हालांकि, मेरी नजरें उन के मंगलसूत्र पर ठहरीं. वह सिंपल था, लेकिन लाजवाब था.  उस के बीच में एक मौडर्न नग जड़ा था. उस की कीमत 18-20 लाख रुपए तो रही होगी.’  संगीता की उम्र 36 साल है, उस की शादी 4 साल पहले हुई थी.

युवतियों या महिलाओं, जो भी कह लें, में संगीता अकेली ऐसी नहीं है. ज्यादातर महिलाएं अब अपने मातापिता या पति की मरजी से नहीं, बल्कि अपनी पसंद की ज्वेलरी खरीद रही हैं.

दुनिया के जानेमाने डी बीयर्स ग्रुप की डायमंड माइनिंग कंपनी डायमंड ब्रैंड फौरएवरमार्क के प्रेसिडेंट सचिन जैन कहते हैं, ‘महिलाओं को पहले उन के जीवनसाथी डायमंड गिफ्ट में देते थे. आज महिलाएं अपनी खुशी, इन्वेस्टमेंट के तौर पर या फिर बोनस खर्च करने के लिए गहने खरीद रही हैं.’  यह हकीकत है कि आज काफी महिलाएं आर्थिक मामले में फिट हैं यानी वे खुद खासा पैसा कमा रही हैं. वहीं, अपनी पसंद की ज्वेलरी खरीदने वाली वैसी महिलाएं भी हैं जिन का पारिवारिक संपत्ति में पूरा दखल है.

दिलचस्प यह है कि युवाओं के चलते देश में डायमंड की मांग बढ़ रही है. डी बीयर्स की हालिया रिपोर्ट से पता चलता है कि युवा और जेनरेशन जेड (मिड-1990 से ले कर 2000 के शुरूआती दौर में जन्में लोग) का 2017 की कुल ग्लोबल डायमंड बिक्री में दोतिहाई हिस्सा था. इस के चलते डायमंड की बिक्री 82 अरब डौलर के नए रिकार्ड पर पहुंच गई थी.

ज्वेलरी स्टोर चेन ओआरआरए के एक सीनियर एग्जीक्यूटिव कहते हैं कि शादियां भी अब डायमंड ज्वेलरी के लिए बड़ा प्लेटफार्म बन रही हैं. परिवार के करीबी रिश्तेदार एक ही डिजाईन व एक ही धातु की ज्वेलरी को दोहराना पसंद नहीं करते हैं. इस के चलते भी डायमंड ज्वेलरी का कारोबार काफी फलफूल रहा है.

डायमंड प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (डीपीए) के लिए भारत काफी अहम मार्केट बन गया है. डीपीए दुनिया की दिग्गज डायमंड माइनिंग कंपनियों का इंटरनेशनल अलायन्स है. इस में एएलआरआरए, डी बीयर्स, डोमिनियन डायमंड कोर्प, जेम डायमंड्स, लुकारा डायमंड कोर्प, पेट्रा डायमंड्स, आरजेड मुरोवा होल्डिंग्स और रियो टिंटो डायमंड्स जैसी कम्पनियां शामिल हैं.

डीपीए का कहना है, ‘अगर पारंपरिक रूप से देखा जाए तो हीरे के गहने शादी, जन्मदिन और एनिवर्सरी जैसे खास मौकों पर पहने जाते हैं. हालांकि, अब लोगों की अहमियत और प्राथमिकताएं बदल रही हैं, जिन्दगी को ले कर नजरिया अब व्यापक हो गया है. लोगों ने अब खास मौकों की परिभाषा को जरुरत के हिसाब से बदल लिया है.

दरअसल, आधुनिक पीढ़ी जिन्दगी के हर पल को सेलिब्रेट करना चाहती है. अब छोटीछोटी खुशियों में डायमंड ज्वेलरी बड़ी भूमिका निभाने लगी है. भारत में जेम और ज्वेलरी उद्योग का आकार तकरीबन 35 अरब डौलर का है, जिस में डायमंड ज्वेलरी की भागीदारी तकरीबन 16 फीसदी है.

जानिए क्यों बीच सीरीज से भारत लौटें रोहित शर्मा

औस्ट्रेलिया में अपनी धूम मचा रही भारतीय क्रिकेट टीम के धाकड़ बल्लेबाज रोहित शर्मा भारत लौट आए हैं. इस वजह से वे सिडनी में होने वाले आखिरी टैस्ट मैच में नहीं खेल पाएंगे.

दरअसल, मेलबर्न में खेले गए ‘बौक्सिंग डे’ टैस्ट मैच में औस्ट्रेलिया को हराने के कुछ घंटों बाद ही रोहित शर्मा के लिए एक और बड़ी खुशखबरी मिली थी कि वे अब पिता बन गए हैं. उन के घर एक बेटी आई है.

रोहित की पत्नी रितिका की चचेरी बहन और बौलीवुड कलाकार सोहेल खान की पत्नी सीमा खान ने सोशल मीडिया पर यह जानकारी साझा की थी. लिहाजा, रोहित ने बिना समय गंवाए मुंबई के लिए फ्लाइट पकड़ी और वे घर के लिए रवाना हो गए.

अपनी ही तरह के अलग बल्लेबाज रोहित शर्मा पहली बार पिता बने हैं. उन की पत्नी रितिका ने एक बेटी को जन्म दिया है. अब रोहित शर्मा 3 जनवरी से शुरू हो रहे इस टैस्ट सीरीज के आखिरी मैच में नहीं खेल सकेंगे. याद रहे कि उन्होंने मेलबर्न में नाबाद अर्धशतकीय पारी खेली थी. उन की जगह सिडनी टैस्ट मैच में हार्दिक पंड्या को टीम में जगह दी जा सकती है.

वैसे, रोहित शर्मा ने औस्ट्रेलिया के कप्तान रह चुके माइकल क्लार्क के साथ एक प्रमोशनल वीडियो में अपनी पत्नी के प्रेग्नेंट होने का खुलासा करते हुए कहा था, ‘मैं पिता बनने के लिए और इंतजार नहीं कर सकता. हमारी जिंदगी में यह गेम चेंजर साबित होने वाला है. मैं उस समय का बेसब्री से इंतजार कर रहा हूं, जब मुझे पिता बनने की जानकारी मिलेगी. यह हमारी जिंदगी को बदल देने वाला पल होगा.’

रोहित शर्मा को पिता बनने की बधाई. उम्मीद है कि जब वे वनडे मैचों के लिए दोबारा औस्ट्रेलिया जाएंगे तब अपने बल्ले से धमाका करेंगे.

 

सुनील शर्मा

मुस्लिम महिलाओं ने उठाये तीन तलाक कानून पर सवाल

तीन तलाक कानून बनने के बाद मुस्लिम महिलाओं को क्या हासिल होगा? अब यह प्रश्न सामने है. केन्द्र सरकार ने जो मसौदा ‘मुस्लिम महिला विवाह अधिकारों का संरक्षण विधेयक – 2017’ में रखा है उसकी कमियों को लेकर जागरूक मुस्लिम महिलाओं ने अपने तर्क रखे हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता नाइश हसन कहती हैं ‘इस कानून में महिलाओं के मुद्दे गायब दिख रहे हैं.’ नाइश कहती हैं, ‘आदमी तीन तलाक देता है तो औरतों को फौरन घर से बाहर कर देता है. अगर कानून में यह प्रावधान होता कि पति की गैरमौजूदगी में पति के परिवार का कोई भी रिश्तेदार महिला को घर से बेदखल नहीं कर सकेगा तो महिला के हित में होता.’

नाइश हसन कहती हैं, ‘कई पति अपनी पत्नी को तीन तलाक देकर पत्नी और बच्चों को बिना कोई गुजारे के लायक पैसा देकर गायब रहते हैं, उनका क्या किया जायेगा? इस कानून में उनको भी लाना चाहिये था. पति के जेल जाने के बाद पत्नी और उसके बच्चों का गुजारा कैसे होगा? इस विषय में भी कानून मौन है. इन कानूनों को जोड़े बिना तीन तलाक कानून से औरतों को कोई राहत नहीं मिलने वाली. ऐसे में औरतों पर बोझ बढ जायेगा. पति अपनी जमानत के लिये कोर्ट के चक्कर लगायेगा. पत्नी भरणपोषण के लिये कोर्ट के चक्कर लायेगी. ऐसे में पूरा परिवार परेशान हो जायेगा.” नाइश का मानना है कि यह बिल जल्दबाजी में वोटो की गोलबंदी के लिहाज से तैयार किया गया है. अगर औरतों की व्यथा को ध्यान में रखा जाता तो शायद यह सार्थक होता.

औल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लौ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर ने कहा,”यह बिल परिवार को बरबाद करने वाला है. तीन साल की सजा का प्रावधान ठीक नही है. बिल के तीन तलाक को अपराध बना दिया गया है.  जिससे परिवार में सुधार की गुजाइंश खत्म हो गई है. ऐसे में अब लोग शादियां करने से डरेंगे. कानून ऐसा होना चाहिये जिसमें पति तीन तलाक देने से डरे और आपस में सुलह की गुजाइंश भी बनी रहे. कानून बनने से पहले इसके सभी पहलुओं पर विचार हो. ऐसे में विपक्ष की मांग के अनुसार कानून बनाने से पहले ज्वाइंट सलेक्ट कमेटी में इसको भेजा जाये.”

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