1992 में प्रदर्शित अति लोकप्रिय सीरियल ‘‘हसरतें’’ सहित अब तक पचास से अधिक सीरियलों में अभिनय कर चुके अभिनेता धर्मेश व्यास इन दिनों ‘मुबू’ टीवी चैनल के सीरियल ‘‘गुजरात भवन’’ के कारण काफी सुर्खियां बटोर रहे हैं. जबकि चार साल पहले उन्होंने टीवी से दूरी बना ली थी, पर अब ‘गुजरात भवन’ से टीवी पर वापसी की है.

पिछले छब्बीस वर्ष के अंदर आपने टीवी इंडस्ट्री में किस तरह के बदलाव देखे?

सच कहूं, तो पहले टीवी क्लासी था और अब टीवी पर क्या दिखाया जा रहा है, यह मेरी समझ से परे है. पहले हम लोग बड़ी मेहनत करते थे, कहानी, चरित्र के साथ साथ हर एपीसोड को बेहतर ढंग से लिखा जाता था. उस वक्त हम कलाकार, लेखक व निर्देशक एकसाथ बैठकर कहानी व चरित्र के साथ साथ हर दृष्य को समझते थे. पर अब टीवी की हालत यह है कि चैनल, निर्माता व निर्देशक को एक अच्छे कलाकार की जरूरत नहीं रही. अब उन्हें एक सुंदर चेहरे वाले ऐसे इंसान की तलाश रहती है, जिसकी याददाश्त तेज हो. जो कई पन्नों के संवाद चंद मिनटों में याद करके कैमरे के सामने धड़ाधड़ बोलता जाए. जिसकी वजह से अब किसी भी सीरियल में कोई मजा नहीं रहा. लेकिन मैं इन दिनों सीरियल ‘गुजरात भवन’ कर रहा हूं, जिसकी बात कुछ अलग है. इसमें जिंदगी का रस है.

आखिर चैनल के सीरियलों की हालत खराब क्यों हुई?

इसकी मूल वजह जरूरत से ज्यादा प्रतिस्पर्धा के बढ़ने के साथ साथ दर्शकों में धैर्य न होना रहा. आज से 25-26 वर्ष पहले 1992 में मेरा एक सीरियल ‘हसरतें’ प्रसारित होता था, जो कि पूरे सात वर्ष चला था. यह सीरियल दूसरी भाषाओं में आज भी प्रसारित हो रहा है. इसके दर्शक भी रौयल थे. अब तो हर सास बहू सीरियल में ऐसी किचन पौलीटिक्स दिखायी जाती है, जो किसी घर में नजर नही आएगी. पर इसका असर औरतों के बीच बहुत गलत जा रहा है. जब सास बहू सीरियलों की टीआरपी घटी, तो अचानक हौरर सीरियल शुरू कर दिए गए. निर्माता निर्देशक और चैनल भूल जाता है कि टीवी पूरा परिवार एक साथ बैठकर देखता है. इसलिए जरूरी है कि हौरर या सेक्स प्रधान कार्यक्रम परोसने की बजाए कुछ सेंसिबल कार्यक्रम प्रसारित किए जाएं. आज की तारीख में सच कहूं तो मुझे सिर्फ ‘स्टार प्लस’ का सीरियल कुल्फी कुमार बाजेवाला पसंद आ रहा है. इस सीरियल के हीरो मोहित मलिक ने आठ साल पहले मेरे बेटे का किरदार निभाया था.इ सी वजह से मैंने इस सीरियल को देखा और मुझे बहुत अच्छा लगा. अन्यथा टीवी पर ऐसा कोई कार्यक्रम नहीं है,जिसे देखने की इच्छा हो.

तो आपके अनुसार क्या नया होना चाहिए?

दूसरों को सलाह देने वाला मैं कौन होता हूं.

अब वेब सीरीज काफी लोकप्रिय हो रही हैं. इसका टीवी पर क्या असर पड़ेगा?

माना कि अब वेबसीरीज का बहुत अच्छा सिलसिला शुरू हुआ है. हां! मैं यह मानता हूं कि वेबसीरीज सिर्फ शहरों तक ही सीमित हैं. ग्रामीण इलाके में वेबसीरीज का प्रभाव नहीं पहुंच रहा है. ग्रामीण इलाके में तो सबसे अधिक दूरदर्शन चल रहा है. और ‘जी अनमोल’ जैसे कुछ सैटेलाइट चैनल भी देखे जा रहे हैं. वेबसीरीज के लिए फिलहाल दर्शकों को नेटफिलक्स, अमेजन, औल्ट बालाजी के लिए वार्षिक शुल्क देना पड़ता है, जोकि लोग देना नहीं चाहते. ऐसे में यह दर्शक दूरदर्शन और सैटेलाइट चैनल मुफ्त में देखना पसंद कर रहे हैं. इस हिसाब से देखा जाए तो टीवी और थिएटर को वेबसीरीज या दूसरे माध्यम से नुकसान नही है.

आपके हिसाब से टीवी में किस तरह के सुधार की जरूरत है?

कहानी और पटकथा पर ध्यान देने की जरूरत है. पहले हम लोग पूरी पटकथा पर ही नहीं, हर एपीसोड की पटकथा पर बैठकर विचार विमर्श करते थे. कलाकारों की भी राय ली जाती थी. अब ऐसा नहीं होता है. अब तो पूरे एपीसोड की स्क्रिप्ट भी नहीं आती है. सेट पर शूटिंग के दौरान सीन आ जाता है, कई बार तो ऐसा होता है कि कैमरामैन, निर्माता, निर्देशक सहित पूरी टीम सेट पर बैठकर इंतजार करती रहती है कि कब चैनल से स्वीकृति पाकर सीन उन तक पहुंचेगा? मैं किसी भी लेखक को गलत नही मानता. हमारे यहां उम्दा लेखक हैं. हमारे यहां मौजूद लेखकों की काबीलियत पर शक करना बहुत गलत है. चैनल की आपसी प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ गयी है कि किसी चैनल के किसी सीरियल में कोई ट्रैक लोकप्रिय हो जाए, तो दूसरा चैनल अपने सीरियल में वही ट्रैक जबरन डालता है. इससे कहानी और लेखक दोनों मर जाते हैं.

2019 में टीवी की क्या हालत होगी?

यदि टीवी में इसी तरह के कार्यक्रम आए, तो 2019 में टीवी में बहुत कुछ अच्छा होगा, ऐसा मुझे नहीं लगता. टीवी का नुकसान निर्माता निर्देशक और चैनल के कर्ताधर्ता ही कर रहे हैं. मेरे हिसाब से 2019 में टीवी में काफी उतार चढ़ाव आने वाले हैं.

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