पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल पर आधारित ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ का ट्रेलर जारी होने के साथ ही फिल्म पर विवाद शुरू हो गया है. यह ट्रेलर भाजपा द्वारा अपने ट्वीटर हैंडल से जारी किया गया है. कांग्रेस ने फिल्म की स्क्रिनिंग को बाधित करने की चेतावनी दी है और मांग की है कि फिल्म को रिलीज करने से पहले उस की स्पेशल स्क्रिनिंग की व्यवस्था की जाए. जो दृश्य तथ्यों पर आधारित नहीं हों उन्हें हटाया जाए.

कांग्रेस का आरोप है कि यह फिल्म भाजपा का दुष्प्रचार है और उन के द्वारा किया जा रहा राजनीतिक स्टंट है.

भाजपा ने इस फिल्म को दिलचस्प बताते हुए कहा कि इस में दिखाया गया है कि कैसे एक परिवार ने देश को 10 वर्षों तक बंधक बना कर रखा था. फिल्म को ले कर दोनों पार्टियों की ओर से बहस और बयानबाजी जारी है.

दरअसल ’द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ फिल्म पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल पर लिखी पुस्तक पर आधारित है. फिल्म में मनमोहन सिंह को सहानुभूति का पात्र दिखाने की कोशिश की गई है.

’द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ पत्रकार संजय बारू द्वारा लिखी गई पुस्तक है जिस पर सुनील बोहरा और धवल गाडा ने इसी नाम से फिल्म बनाई है. फिल्म में मनमोहन सिंह का किरदार अभिनेता अनुपम खेर ने निभाया है. सोनिया गांधी का रोल जर्मन अभिनेत्री सुजैन बर्नेट, राहुल गांधी का अर्जन माथुर, प्रियंका गांधी का अहाना कुमरा ने निभाया है.

संजय बारू मई 2004 से अगस्त 2008 तक मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार थे. पुस्तक 2014 में पेंगुइन इंडिया द्वारा प्रकाशित इस किताब में आरोप लगाया गया है कि अपने कैबिनेट और यहां तक कि प्रधानमंत्री कार्यालय तक मनमोहन सिंह के नियंत्रण में नहीं थे. इस के बजाय कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पास अधिक शक्ति थी.

हालांकि पुस्तक जारी होने के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय ने नाराजगी जताते हुए पुस्तक के दावों का नकार दिया था. पीएमओ द्वारा प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार द्वारा पद का दुरुपयोग और व्यावसायिक लाभ कमाने की मंशा करार दिया गया.

बाद में संजय बारू ने पीएमओ के इस बयान को मूर्खतापूर्ण बताते हुए कहा था कि उन्होंने यूपीए-1 के अपने उन्हीं अनुभवों के आधार पर किताब लिखी है जिसे उन्होंने नजदीक से देखा और जाना है.

संजय बारू ने लिखा था कि यह स्वाभाविक है कि एक नेता या तो प्रशंसा का पात्र हो या घृणा का, पर उपहास का पात्र नहीं बनना चाहिए. उन्होंने [मनमोहन सिंह] कई गलतियां कीं. इस किताब में उस का उल्लेख करने में झिझक नहीं है. पहला कार्यकाल ठीक रहा पर दूसरा कार्यकाल वित्तीय घोटालों और बुरी खबरों से भरपूर रहा. उन्होंने राजनीति पर से नियंत्रण खो दिया था और पीएमओ असरहीन हो गया था.

हमारे यहां फिल्मों को ले कर विवाद कोई नई बात नहीं है. ज्यादातर कंटेंट को ले कर विवाद खड़ा करने का मकसद धार्मिक या राजनीतिक  रहा है. पीके, ओएमजी, पदमावत, उड़ता पंजाब जैसी फिल्मों पर धार्मिक और राजनीतिक धंधेबाजों ने बवाल उठाया था. उन का उद्देश्य अपनी धंधेबाजी का नुकसान था.

’द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ फिल्म कोई धार्मिक कंटेंट वाली नहीं है जिस से धर्म के धंधेबाजों को ठेस पहुंच रही हो. यह विशुद्घ रूप से राजनीतिक फिल्म है और इस पर विवाद राजनीतिक नफानुकसान को ले कर है.

2019 के आम चुनाव सामने है इसलिए भाजपा चाहती है, फिल्म के जरिए कांग्रेस को बदनाम किया जाए और राजनीतिक फायदा उठाया जाए. उधर कांग्रेस को लगता है कि इस से उसे राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है इसलिए कांग्रेस शासित राज्यों में फिल्म को बैन करने की बातें उठ रही हैं.

इंदिरा गांधी पर बनी फिल्म किस्सा कुर्सी का पर्दे पर आने से पहले ही विवादों में इस कदर घिरी कि उसे लोग देख ही नहीं पाए. फिल्म को हमेशाहमेशा के लिए डिब्बाबंद कर दिया गया.

प्रधानमंत्री कार्यालय में क्या हो रहा था, किस का नियंत्रण था, कैसा नियंत्रण था, कौन पावरफुल था? लोकतंत्र में यह देखने, जानने का हक इस देश की जनता को है. राजनीतिक दलों में से किस को फायदा होगा, किस को नुकसान, इसे भी नहीं रोका जा सकता.

अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देशों में राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों पर स्वतंत्र रूप से पुस्तकें लिखी जाती रही हैं. फिल्में भी बनी हैं पर भारत की तरह उन पर कभी विवाद होते नहीं सुने गए.

भाजपा इस फिल्म को ले कर ज्यादा उत्साहित इसलिए है क्योंकि यह उस के प्रतिद्वंद्वी को कमतर दिखाती है. दूसरा फिल्म में मुख्य रोल मनमोहन सिंह की भूमिका अदा करने वाले अनुपम खेर की पत्नी किरण खेर भाजपा की सांसद हैं और वह खुद भी पार्टी के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं. वह कांग्रेस पर तो हमलावर रहते ही हैं, हिंदुत्व पर हमेशा बड़बोलापन जाहिर करते रहते हैं.

अगर मनमोहन सिंह के कार्यकाल में पीएमओ सोनिया गांधी के नियंत्रण में था तो क्या अब नरेंद्र मोदी का पीएमओ संघ के नागपुर कार्यालय से नियंत्रित नहीं है?

राजनीतिक पार्टियां फिल्मों को अपने नफानुकसान को तोल कर दर्शकों के हक का हनन करती आईर् है. दर्शकों को फिल्म देखने का उतना ही अधिकार है जितना किसी लेखक, निर्देशक, निर्माता को अभिव्यक्ति का संवैधानिक हक प्राप्त है. क्या गलत है, क्या सही है यह तय करने का अधिकार दर्शकों को है. उन्हें इस से वंचित नहीं किया जा सकता. फिल्म अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है.

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