नए साल की राजनीति में दिलचस्पी की इकलौती बात सिर्फ यही रहेगी कि क्या भाजपा मई में होने वाले लोकसभा चुनाव में 2014 जैसा प्रदर्शन दोहरा पाएगी और नरेंद्र मोदी फिर से प्रधानमंत्री बन पाएंगे या नहीं. 2018 के हाल देखते तो इन दोनों ही सवालों के जवाब भाजपा के लिहाज से उत्साहजनक नहीं है, क्योंकि 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में वोटर ने उसे बेरहमी से नकार दिया है. सबका साथ सबका विकास का उसका नारा अच्छे दिनों की तरह खोखला साबित हुआ है. जाहिर है लोकसभा के लिए उसे अपनी रणनीति बदलना पड़ेगी. संभावना इस बात की ज्यादा है कि भाजपा को अपने परंपरागत मुद्दों की तरफ लौटने का जोखिम उठाना ही पड़ेगा.

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