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VIDEO : ये थी वनडे क्रिकेट की सबसे बड़ी पारी, नहीं देख पाए तो यहां देखें

वनडे क्रिकेट इतिहास में अब तक सात दोहरे शतक लग चुके हैं. बड़े से बड़े लक्ष्यों को एक शानदार पारी की बदौलत हासिल किया जा चुका है. लेकिन क्या आप बता सकते हैं कि वनडे क्रिकेट की सर्वश्रेष्ठ पारी कौन सी थी.

इसे तलाशने के लिए आपको पूरे 34 साल पीछे जाना होगा. इंग्लैंड के मैनचेस्टर के मैदान पर वेस्टइंडीज के विव रिचर्ड्स ने ऐसी पारी खेली थी जिसे क्रिकेट के बाइबल माने जानें वाले विजडन ने वनडे क्रिकेट इतिहास की सबसे बड़ी पारी माना था.

रिचर्ड्स लगभग 10 साल अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में बिता चुके थे. उनके जैसा आक्रामक और कौन्फिडेंट बल्लेबाज शायद ही उस दौर में कोई रहा था. इसी आक्रामकता के साथ उन्होंने 31 मई 1984 में ऐसी पारी खेली जिसे आज भी लोग वनडे क्रिकेट की सबसे बड़ी और अच्छी पारी मानते हैं.

ये उस वक्त की वेस्टइंडीज टीम थी जिसे लगातार दो विश्व कप में जीतने के बाद हार मिली थी और टीम अपनी बादशाहत फिर से हासिल करने के लिए लड़ रही थी.

रिचर्ड्स ने खेली 189 रनों की पारी

इंग्लैंड के खिलाफ वेस्टइंडीज के कप्तान क्लाइव लौयड ने टौस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का फैसला किया, लेकिन फैसला गलत साबित हुआ 11 रन पर दो बड़े बल्लेबाज पवेलियन लौट चुके थे. 43 रन तक टीम ने अपना तीसरा विकेट गंवा दिया था. एक तरफ रिचर्ड्स थे लेकिन दूसरी तरफ इंग्लैंड के गेंदबाज वेस्टइंडीज के बल्लेबाजों को पवेलयिन भेज रहे थे.

आपको यकीन नहीं होगा कि टीम के 100 से पहले 6 विकेट गिर चुके थे. लेकिन अंग्रेजों के हर सीम और रफ्तार का जवाब रिचर्ड्स अपने बल्ले से दे रहे थे. रिचर्ड्स ने 170 गेंद में नाबाद 189 रनों की पारी खेली थी जिसमें 21 चौके और 5 गगनभेदी छक्के शामिल थे.

ये पारी तब आई जब टीम का और कोई भी बल्लेबाज 27 से ज्यादा रन नहीं बना पाया था. सिर्फ दो खिलाड़ी दहाई के आंकड़े को पार कर पाए था.

वेस्टइंडीज का 9वां विकेट 41वें ओवर में 166 रन पर गिरा था, उसके बाद रिचर्ड्स ने माइकल होल्डिंग के साथ मिलकर टीम के स्कोर को निर्धारित 55 ओवर में 272 तक पहुंचाया.

होल्डिंग ने इसमें सिर्फ 12 रनों का योगदान दिया था. दूसरी तरफ रिचर्ड्स ने इंग्लैंड के हर गेंदबाजों को जमकर धोया. इयान बोथम उनके खास निशाने पर रहे थे.

वेस्टइंडीज को मिली थी जीत

रिचर्ड्स की चमत्कारी और हैरतअंगजे बल्लेबाजी के बाद वेस्टइंडीज की चिर-परिचित गेंदबाजी के आगे इंग्लैंड के बल्लेबाजों की एक न चली और पूरी टीम 168 रन पर औल आउट हो गई. गार्नर ने सबसे अधिक 3 विकेट झटके तो होल्डिंग और रिचर्ड्स ने दो-दो विकेट लिए. इंग्लैंड के लिए लैंब ने सबसे अधिक 75 रन बनाए थे.

विजडन की लिस्ट में महान पारी

विजडन ने 1 फरवरी 2002 को टेस्ट और वनडे की सबसे बेहतरीन पारियों की लिस्ट जारी की थी. रिचर्ड्स की इस पारी को कपिल देव, सनथ जयसूर्या और ब्रायन लारा जैसे बल्लेबाजों से कहीं आगे माना था. सचिन तेंदुलकर इस लिस्ट में टौप टेन में भी शामिल नहीं थे.

न अमिताभ आए न गोविंदा, बौलीवुड के दोगले चेहरे से खफा कादर खान का परिवार

कादर खान नहीं रहे. लेकिन वे पहली बार नहीं मरे हैं, इस से पहले वे कई बार अफवाहों की मौत मारे जा चुके हैं. लेकिन हर बार उनके बेटे सरफराज अफवाहों को खारिज कर उनके जिंदा होने की तसल्ली दे देते थे. लेकिन इस बीते साल की आखिरी शाम उनकी जिंदगी की आखिरी शाम साबित हुई. लेखक, शिक्षक, और अदाकारी का एक साथ लोहा मनवाने वाले कादर खान ताउम्र अमिताभ बच्चन की एहसान फरामोशी पर अपना दर्द बयान करते रहे. उन्होंने अमिताभ की न सिर्फ कई सफल फिल्में लिखीं, बल्कि उन्हें संवाद अदायगी का लहजा भी सिखाया, लेकिन असफल और एकाकी दौर में अमिताभ ने उनसे दूरी बना कर रखी, इसका उन्हें दुःख रहा.

अमिताभ तो कादर खान से इसी बात से चिढ़ गए थे कि उन्होंने अमिताभ को उनके सितारा दिनों में ‘सर’ कहकर नहीं पुकारा. क्योंकि वे बिग बी को काफी पहले से ‘भाईजान’ कहते थे. शायद उनका ईगो हर्ट हो गया होगा. और फिर उन्होंने कादर खान को अपनी फिल्मों से  बाहर का रास्ता दिखवाना शुरू कर दिया. यह खुदा गवाह के दिनों की बात है. कुछ इसी तरह का तंज हास्य अभिनेता महमूद को भी था. कभी अमिताभ को अपने घर पनाह देने वाले महमूद जब बदहाली में घिरे तो सबसे पहला साथ छोड़ने वाले अमिताभ ही थे.

न अमिताभ आये न गोविंदा

बहरहाल कादर खान के निधन के कुछ दिन बाद उनके बेटे सरफराज खान ने चुप्पी तोड़ी है. उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री के बड़े सितारों पर दोगले और स्वार्थी होने का आरोप लगाया है. सरफराज के मुताबिक एक दौर में फिल्मों में रीढ़ बन चुके कई सीनियर कलाकार बाद में या तो एकाकी जीवन जीते हैं या फिर आर्थिक अभाव में किसी सरकारी अस्पताल में दम तोड़ देते हैं.

एक वक्त में उन्होंने कई लोगों की मदद की होती है, जो अब स्टार्स बन चुके हैं लेकिन कोई उनके एहसान याद नहीं करता. सिर्फ उके साथ फोटो खिंचवाकर अपने फैन्स के बीच महान बनने का स्वांग रचते हैं. खुद कादर खान अपने आखिर के सालों में फिल्म इंडस्ट्री में उपेक्षित हुए. मजबूरन बेटों के साथ कनाडा शिफ्ट होना पड़ा. जब तक वे सक्रिय थे, अमिताभ बच्चन से लेकर गोविंदा, शक्ति कपूर और डेविड धवन जैसे लोग उनके आगे पीछे घूमते रहे. जब उनकी सेहत गिरने लगी तो सबने उनसे दामन छुड़ा लिया.

सरफराज तो यहां तक कहते हैं कि जिस गोविंदा ने उनके पिता को ‘फादर फिगर’ कहा था, उसने आखिरी सालों में कभी अपने इस ‘फादर फिगर’ की सुध नहीं ली. यहां तक कि उन की मौत के बाद उन्होंने परिवार को एक फोन करना भी मुनासिब नहीं समझा. इसी तरह से अन्य कलाकारों ने भी ट्वीटरबाजी करके उन्हें याद करने का खानापूर्ति कर ली.

हालांकि कादर खान शायद इंडस्ट्री के मौकापरस्त मिजाज को समझ चुके थे, इसलिए उन्होंने अपने बेटों को किसी से कोई उम्मीद करने से आगाह कर दिया था. फिर भी बीता समय और वो दिन कहां भूलते हैं, लिहाजा वे अपने आखिरी दिनों में भी अमिताभ को याद करते रहे. यह अलग बात है कि जब वे कई बार इलाज कराने स्वदेश आये, तो अमिताभ ने उनसे मिलना भी गंवारा नहीं समझा. आज वे ट्वीटर पर जमकर श्रद्धांजलि दे रहे हैं.

उगते सूरज को सलाम

बहरहाल, यह फिल्म इंडस्ट्री का ही नहीं दुनिया का दस्तूर बन चुका है. काम आ चुके बुजुर्ग काम निकल जाने के बाद फल के छिलके सरीखे अकेलेपन के कूड़ेदान में सुपुर्द कर दिए जाते हैं, अगर कमाऊ हैं तो संतानें कुछ ध्यान दे लेती हैं लेकिन अंत उनका भी अवसाद, तिरस्कार और अकेलेपन में ही गुजरता है. संयोगवश कादर खान ने अपने आखिरी दिनों में इसी थीम पर बेस्ड एक फिल्म ‘उमर’ भी की थी. ऐसे में कोई ताज्जुब नहीं कि कादर खान के साथ यह रवैया अपनाया जा रहा है.

उनके पहले भी कई बड़े कलाकार दर्दनाक अंत के साथ दुनिया से गए. परवीन बाबी 2005 में अपने फ्लैट में मृत पाई गई थी. कई दिनों से किसी ने खबर नहीं ली तो शव भी सड़ चुका था. अचला सचदेव को बेटे और बेटी द्वारा बुढ़ापे में छोड़ दिया गया था. बेटा अमेरिका में था,  बेटी पुणे में. फिर भी कोई साथ नहीं आया तो फिल्म वाले कहां से आते. ए के हंगल आखिरी समय अपना इलाज नहीं करा सके. राज किरण कथित तौर पर पिछले 10 सालों से अमेरिका के एक पागल खाने में भर्ती हैं. उनकी देखभाल करने के लिए कोई भी व्यक्ति नहीं है. एक भोजपुरी अभिनेत्री को भिखारी बन सड़कों पर घूमते देखा गया है. ललिता पंवार और मोहन चोटी भी ऐसे ही अपनों की हिकारत में मरे.

बहरहाल, साल के आखिरी दिनों में कादर खान और फिल्म मेकर मृणाल सेन का जाना उगते सूरज को सलाम करने के रिवाज से वाकिफ करा गया.

फोन खरीदने से पहले इन बातों का रखें ध्यान

क्या आप साल 2019 में अपना पहला स्मार्टफोन खरीदने जा रहे हैं? अगर हां, तो आपको ये खबर जरूर पढ़नी चाहिए. हम आपको स्मार्टफोन्स खरीदने से पहले कुछ ऐसी बातों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनकी मदद से आप अपने स्मार्टफोन को अपनी पसंद का स्मार्टफोन बना सकते हैं.

डिस्प्ले

फोन में अच्छे विजुअल एक्सपीरियंस, कलर डेप्थ और रियेलिटी पिक्चर के लिए जरूरी है कि आपके फोन का डिस्प्ले एचडी हो या उससे उपर. कलर एक्सपीरियंस और रियल व्यू के लिए जरूरी है कि आपके फोन का रेजोल्यूशन 1920X1080 पिक्सल या उससे ज्यादा का हो.

एस्पेक्ट रेशियो

अगर आपको अच्छा विजुअल एक्सपीरियंस चाहिए तो आप उन स्मार्टफोन्स को खरीदिए जिनका एस्पेक्ट रेशियो 18:9 का हो. 18:9 का एस्पेक्ट रेशियो आपके स्क्रीन को ज्यादा रियल बनाता है. पिक्चर में ज्यादा डेप्थ मिलता है. अगर आप बड़ा स्क्रीन पसंद करते हैं तो 5.8 इंच से ज्यादा का डिस्प्ले आपके लिए सही रहेगा.

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बैटरी

अगर आपके स्मार्टफोन में हाई फीचर्स दिए गए हैं, तो सबसे पहले फोन की बैटरी को जरूर चेक करें. स्मार्टफोन की बैटरी 3,000 एमएएच या उससे उपर की होनी चाहिए. इससे कम की बैटरी में आपका स्मार्टफोन कम बैटरी बैकअप देगा और आप अपने स्मार्टफोन का मजा नहीं उठा पाएंगे.

कैमरा

स्मार्टफोन में बैजल लेस डिस्प्ले के बाद ड्यूल कैमरा बढ़ती मांगों में से एक है. हालांकि सिंगल रियर कैमरा भी काफी है अगर आपका कैमरा पावरफुल है, लेकिन अगर फोन में ड्यूल कैमरा हो तो फोटो की क्वालिटी कई गुना बढ़ जाती है. इस फीचर की मांग का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि स्मार्टफोन कंपनियां अपने प्रोडक्ट्स में ड्यूल रियर और फ्रंट कैमरा दोनों देने लगी हैं.

स्टोरेज

कई स्मार्टफोन्स में माइक्रो एसडी कार्ड का विकल्प नहीं होता है. ऐसे में 32 जीबी या उससे ज्यादा का स्टोरेज फोन सही रहेगा. इससे आपको बार-बार लो स्टोरेज का नोटिफिकेशन देखने को नहीं मिलेगा.

रैम

रैम की मदद से आपका फोन तेज काम करता है. आपके फोन के ऐप्स तेजी से लोड होते हैं. रैम की वजह से आपको फोन तेजी से मल्टी टास्किंग कर सकेगा. अगर आपका फोन हाई फीचर वाला है, तो इस बात का ध्यान दें कि फोन का रैम 3 जीबी से कम का न हो.

औपरेटिंग सिस्टम

एंड्रौयड ओरियो 8 सबसे लेटेस्ट औपरेटिंग सिस्टम है. ऐसे में अगर आपके फोन में ये ओएस नहीं है, तो इस बात का ख्याल रखें कि आपके फोन में कम से कम एंड्रौयड नौगट का औपरेटिंग सिस्टम हो.

पिता करते हैं धूम्रपान तो बच्चों को होंगी ये बीमारियां

गर्भावस्था के समय महिलाओं को चेतावनी दी जाती है कि वो धूम्रपान से दूर रहें. इस दौरान उनके खानपान का सीधा असर गर्भ में पल रहे बच्चे पर होता है. ऐसे में खानपान को ले कर उन्हें ज्यादा सचेत रहने की जरूरत रहती है. लेकिन निकोटीन से पुरुषों के संपर्क में आने से भी बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव होता है. इस बात की पुष्टि एक अध्ययन में हुई है.

बता दें कि हाल में हुए एक अध्ययन में ये बात सामने आई कि निकोटीन लेने के बाद पिता भले ही समान्य व्यव्हार करें, लेकिन बेटे और बेटियों पर इसका नकारात्मक असर होता है. इसके कारण हाइपरएक्टिविटी, अटेंशन डेफिसिट और कौगनिटिव इनफ्लेक्सिविटी जैसी संज्ञानात्मक गड़बड़ियां हो सकती हैं.

आम तौर पर डाक्टर पुरुषों को चेतावनी नहीं देते हैं कि उनके धूम्रपान करने से बच्चों को भी परेशानी हो सकती है. यह नुकसान तब भी हो सकता है जब मां धूम्रपान ना करती हों.

आंकड़ों की माने तो आज की पीढ़ी के बच्चों और बड़ों में जो संज्ञानात्मक बीमारियां पाई जाती हैं, उनका कारण एक-दो पीढ़ी पहले निकोटीन का अत्यधिक संपर्क हो सकता है.

कंपनी निदेशक बनने से पहले

आमतौर पर जब कोई अपना व्यवसाय शुरू करता है तो बड़े या मध्यम स्तर पर कार्य करने के लिए एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की स्थापना करता है, जिस में वह शख्स खुद व पार्टनर्स निदेशक बनते हैं. एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनाने के लिए कम से कम 2 निदेशकों का होना जरूरी है.

व्यक्ति अपने दोस्तों, रिश्तेदारों या अपने विश्वासपात्र कर्मचारियों में से किसी से निदेशक बनने को कहता है. संबंध खराब न हो जाएं या नौकरी न छीन ली जाए, इस भय से लोग निदेशक बनने की हामी भर देते हैं. इस में आमतौर पर कंपनी या व्यवसाय में निवेश करना जरूरी नहीं होता. यह तो सिर्फ एक औपचारिकता होती है. हां, इस व्यक्ति विशेष को अपने नाम के आगे निदेशक लिखने का बोनस जरूर मिल जाता है.

कुछ वर्षों पहले तो कंपनियां बनाने की एक अजीब सी होड़ लगी थी. कंपनियां बना कर बाजार में शेयर बेच कर यानी कि पब्लिक इश्यू ला कर जनता से पैसा बटोरने की होड़ थी. नियम लचीले थे. कंपनी के निम्न स्तर के कर्मचारियों तक को निदेशक बना दिया जाता था. अब समय बदल गया है. सरकार ने कानूनों और सूचनाओं पर लगाम कस दी है. अब सावधान रहना जरूरी है.

निदेशक बनने से पहले

निदेशक बनने के लिए सहमति देने से पहले विचार कर लें कि आप को अपनी तमाम निजी जानकारियां कंपनी को देनी होंगी. इन में आप का आधार नंबर, पैन नंबर, घर का पता, हस्ताक्षर, रिश्तेदारों का विवरण और आप की फोटो शामिल है. सो, यह सुनिश्चित कर लें कि आप को इस में कोई असुविधा न हो. इस के अलावा आप को यह मान कर चलना होगा कि आप के नाम का इस्तेमाल कंपनी में होगा.

निदेशक बनने की हामी भरने से पहले आप कंपनी के बारे में तमाम जानकारी हासिल कर लें, जैसे :

–           कंपनी के दफ्तर कहांकहां हैं. इस की फैक्टरियां कहां पर हैं.

–           संचालक मंडल में और निदेशक कौन हैं, उन का पूरा विवरण.

–           कंपनी के बैंक अकाउंट कहां पर हैं और उन्हें कौन औपरेट करता है.

–           कंपनी के मुख्य अधिकारियों, इंटर्नल तथा बाहरी औडिटरों के नाम व पते.

–           कंपनी पर कितना कर्ज है.

–           कंपनी पर कितने मुकदमे चल रहे हैं.

–           आयकर और अन्य विभागों में कंपनी की क्या स्थिति है.

उपर्युक्त मदों पर संतुष्ट होने के बाद निदेशक बनने की सहमति दें. याद रखें कि एक बार अगर आप निदेशक बन गए तो फिर आप जिम्मेदारियों में तब तक फंसे रहेंगे जब तक कि इस्तीफा न दे दें.

निदेशक बनने के बाद

एक बार अगर आप निदेशकमंडल में शामिल हो जाते हैं तो कंपनी का अभिन्न अंग बन जाते हैं. सो, आप को समयसमय पर बोर्ड मीटिंग में जाना चाहिए और मासिक, त्रैमासिक, अर्धवार्षिक व वार्षिक अकाउंट्स हासिल करने चाहिए, साथ ही कंपनी से एक सर्टिफिकेट लेना चाहिए कि कंपनी ने सभी रिटर्न्स दाखिल किए हैं और सभी कानूनों, जिन में लेबर से संबंधित कानून भी शामिल हैं, का पूरी तरह पालन किया है.

विशेषतौर पर आप को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कंपनी का कोईर् चैक बाउंस तो नहीं हो रहा है, क्योंकि चैक बाउंसिंग के मामले में आप की भी जिम्मेदारी बनती है, बेशक चैक पर आप के हस्ताक्षर न हों.

कई बार सुना गया है कि बड़ेबड़े नामों पर मुकदमे हो गए हैं जो सिर्फ नाममात्र के निदेशक थे और उन्होंने न तो किसी चैक पर हस्ताक्षर किए थे, न ही इस बारे में उन्हें कोई जानकारी थी.

हो सकते हैं जवाबदेह

कई बार छोटी या बंद हो रही प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों में ऐसी परिस्थितियां पैदा हो जाती हैं जब आप को व आप के दूसरे सहयोगियों को निदेशक बना दिया जाता है और मालिक खुद उस कंपनी के संचालकमंडल में नहीं होते या किसी बहाने से बाहर निकल जाते हैं. ऐसी कंपनियों में अगर केवल 2-3 ही अंशधारक हैं और वे आपस में लड़ पड़ते हैं, सहयोग नहीं देते हैं, तो मुसीबत आप के गले आ पड़ती है. आप का लेनादेना नहीं, अंशधारक आपसी लड़ाई की वजह से मीटिंग में नहीं आते और जवाबदेही आप की बन जाती है.

अंशधारक नहीं आएंगे, तो मीटिंग नहीं होगी और अगर मीटिंग नहीं होगी तो वार्षिक खाते मंजूर नहीं होंगे और अगर वार्षिक खाते मंजूर नहीं हुए तो आप उसे फाइल नहीं कर सकते. अगर समय पर फाइलिंग नहीं हुई तो निदेशक होने के नाते आप से पूछताछ होगी.

सरकार को कानून में बदलाव करना चाहिए कि कम से कम छोटीछोटी कंपनियों में कंपनी के असली मालिकों यानी कि शेयरहोल्डरों को ही जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, न कि उन निदेशकों को जिन के पास कोई मालिकाना हक ही नहीं है.

गलती शेयर होल्डर्स यानी कि अंशधारक करें और सवाल पूछे जाएं उन निदेशकों से जो काम करने के लिए निदेशक बने थे.  सो, कंपनी विभाग को इस बारे में ऐसे कानून बनाने चाहिए कि निदेशकों पर बेवजह की मार न पड़े. कुछ बेईमानों को पकड़ने के लिए मूर्ख व दंभी सरकारी अफसरों ने सभी को लपेटे में ले लिया है.

कंपनी एक कृत्रिम इकाई है और निदेशक मंडल कंपनी की आंख और कान है. कंपनी के किसी काम के लिए निदेशकमंडल निजी तौर पर सामान्यतया जिम्मेदार नहीं होते, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में यह आवरण हट जाता है

और निदेशकमंडल की निजी जिम्मेदारी आ जाती है. ऐसा तब होता है जब कंपनी कानून तोड़ती है या किसी गैरकानूनी काम में लिप्त पाई जाती है. सो, निदेशक होने के नाते यह आप का दायित्व है कि आप सुनिश्चित करें कि कंपनी में कोई गैरकानूनी काम नहीं हो रहा है वरना गाज आप पर भी गिर सकती है.

कंपनी में अगर महिला कर्मचारी भी कार्य कर रही हैं तो आप सुनिश्चित कर लें कि उन की सुरक्षा के तमाम उपाय किए जा रहे हैं और इस बाबत जितने भी कानून हैं, उन के प्रावधानों का पालन किया जा रहा है.

विधानसभा चुनाव परिणाम : भाजपा का उत्तरायण शुरू?

महाभारत मूलतया एक राजनीतिक उपन्यास है जो यह धारणा तथ्य में बदलता है कि राजनीति छल, द्वेष, प्रतिशोध और हिंसा का दूसरा नाम है और सत्ताप्राप्ति के लिए किया गया अधर्म भी धर्म है. मौजूदा भारतीय राजनीति इस का अपवाद नहीं है जिस में सभी राजनेता, खासतौर से शासक वर्ग 1950 के संविधान की अवहेलना कर महाभारत के संविधान का ही अनुसरण कर रहे हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि लोकतंत्र के चलते वे पूरी तरह निरंकुश नहीं हो पा रहे हैं, लेकिन आंशिक रूप से ही सही, हो रहे हैं.

महाभारत के शांति पर्व के तहत राजधर्मानुशासन के अध्याय में भीष्म और युधिष्ठिर का संवाद बड़ा दिलचस्प है, जिस में भीष्म युधिष्ठिर को समझा रहे हैं कि :

–  विनयपूर्वक ब्राह्मणों को प्रसन्न करना राजा का सनातन कर्तव्य है.

–  यदि ब्राह्मणों के पास जीविका का अभाव हो तो राजा उन की जीविका का प्रबंध करे.

– खेती, पशुपालन और वाणिज्य ये तीनों सभी लोगों की जीविका के साधन हैं परंतु तीनों वेद ऊपर के लोकों में रक्षा करते हैं. वे ही यज्ञों द्वारा समस्त प्राणियों की उत्पत्ति और वृद्धि हेतु (वजह) हैं. इसलिए कौरवनंदन, तुम शत्रुओं को जीतो, प्रजा की रक्षा करो और नाना प्रकार के यज्ञ करो.

महाभारत और तमाम दूसरे सैकड़ों धर्मग्रंथों में इसी तरह के निर्देश राजाओं को ऋ षियों ने दिए हैं कि वे ब्राह्मणों को दान दें. यज्ञहवन करें. पंडितों की रक्षा करें. उन्हें पालनेपोसने पर महज इसलिए खजाना लुटा दें कि वे जाति से ब्राह्मण हैं. शूद्रों को प्रताडि़त करें जिस से वे अपनी हैसियत न भूलें और गुलामी करते रहें. ऋषिमुनियों के भोगविलास का प्रबंध भी राजा करे और राज्य में सालभर भव्य व खर्चीले आयोजन होते रहें जिस से प्रजा अपने अधिकारों की बात न सोच पाए और पंडेपुजारियों की झोली अपनी मेहनत की कमाई से भरते हुए खुद कंगाली में जीती रहे.

5 राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों को हर कोई अपने नजरिए से देख रहा है जिस में सुखद हैरानी की बात यह है कि कोई भी इन बातों से इनकार नहीं कर पा रहा कि इस में हिंदुत्व या राममंदिर निर्माण नहीं था, गौरक्षा के नाम पर बेकुसूर मुसलमानों और दलितों की हत्या से उपजा आक्रोश नहीं था. 2,989 करोड़ रुपए की कीमत वाली चीन में बनी सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति पर आम लोगों का ध्यान नहीं था, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की चुनावप्रचार में अनर्गल पौराणिक बयानबाजी नहीं थी और सब से ज्यादा अहम बात जो ऐसे कई मुद्दों का सार है कि नरेंद्र मोदी सरकार साढ़े 4 सालों से नागपुर के आरएसएस मुख्यालय से नहीं चल रही थी.

ये चुनाव खासतौर से मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे हिंदीभाषी राज्यों के लिए इस लिहाज से अहम थे कि वे 2019 के लोकसभा चुनाव की बाबत वोटर का मूड दिखाएंगे, इस लिहाज से और ज्यादा अहम हो गए थे कि क्या देश की जनता सनातन धर्मवर्ण व्यवस्था और ब्राह्मण पूजा को स्वीकृति देती है या नहीं, जिस की प्रत्यक्ष कोशिशें नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही शुरू हो गई थी.

नतीजों का अहम पहलू

3 हिंदीभाषी राज्यों और 2 गैरहिंदी राज्यों में मुद्दे कहने को ही राजनीतिक थे पर हकीकत में लड़ाई 2 विचारधाराओं के बीच थी और ऐसी थी कि चुनावी शोरशराबे में डूबे मतदाता समाचारपत्रों या चैनलों से अपने मन की बात नहीं कह पाए पर जब ईवीएम मशीनें खुलीं तो साफ हो गया कि ज्यादा लोगों ने अपने विवेक की आवाज पर ही वोट डाला था. वे हिंदुत्व के पाखंडों से छुटकारा पाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने भाजपा के बजाय कांग्रेस को चुना.

नतीजे यह तो बताते हैं कि ऐसे लोगों की तादाद अभी बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन इतनी तो है कि वे लोकतंत्र को कायम रख सकें. नतीजों के बाद विश्लेषकों के लिए विश्लेषण करना बड़ा आसान काम होता है ठीक वैसे ही जैसे घुड़दौड़ के बाद यह बताना कि अमुक घोड़ा क्यों जीता और फलां क्यों हारा.

मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस को बहुमत से 2-2 सीट से दूर रहना पड़ा. इस की वजह जानने के लिए बहुत गहराई में जाना जरूरी है, क्योंकि ये चुनाव महज एक राजनीतिक घटना नहीं थे बल्कि एक बहुत बड़ा बदलाव है. जिस की वजह भाजपा का सनातनी एजेंडा ज्यादा है जिस के प्रभाव से तीनों राज्यों के मुख्यमंत्री खुद को अलग नहीं रख पाए औैर उस का हिस्सा बन कर अपनी हार की वजह बने. यह भी न भूलें कि 2014 के मुकाबले भाजपा को मध्य प्रदेश में 55 प्रतिशत के मुकाबले 41 प्रतिशत वोट मिले और राजस्थान में 2014 के मुकाबले 38.80 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ में 48.70 प्रतिशत के मुकाबले 33 प्रतिशत.

उदाहरण मध्य प्रदेश का लें तो बगैर किसी पूर्वाग्रह के कहा जा सकता है कि शिवराज सिंह चौहान ने वाकई कुछ ऐसी योजनाएं चलाई थीं जिन का फायदा आम लोगों को मिला था. शायद इसीलिए भाजपा इस राज्य में सम्मानजनक तरीके से हारी, उसे 230 में से 108 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस 114 पर अटक कर रह गई.

शिवराज सिंह चौहान के धार्मिक पाखंड उन्हें महंगे पड़ गए, जिन्होंने उन की विकास की छवि पर पौराणिक ग्रहण लगा दिया था. भाजपाई होने के नाते यह स्वाभाविक बात थी कि वे 13 साल धर्मकर्म की राजनीति विकास के समानांतर करते रहे, लेकिन विकास भी कोई ऐसा नहीं हुआ था कि लोग उन के धार्मिक पाखंडों को नजरअंदाज करने को मजबूर हो जाते.

अपनी धार्मिक आस्थाओं के सार्वजनिक प्रदर्शन की कीमत शिवराज सिंह चौहान को कुरसी गंवा कर चुकानी पड़ी. जनता के पैसों यानी सरकारी खजाने को उन्होंने बेरहमी से धार्मिक समारोहों में लुटाया और इतना ही नहीं, यह जताने की नाकाम कोशिश भी की कि जो थोड़ीबहुत खुशहाली है, वह धर्म की वजह से है.

अपनी चर्चित 148-दिवसीय नमामि देवी नर्मदे यात्रा के दौरान शिवराज सिंह चौहान ने तबीयत से पंडेपुजारियों को दानदक्षिणा दी. नर्मदा नदी के किनारे घाटघाट पर पूजाअर्चना की. घंटेघडि़याल बजाए तो साफ लगा कि वे भी भीष्म के निर्देशों पर चल रहे हैं कि राजा ब्राह्मणों की जीविका का प्रबंध करे. बात यहीं खत्म नहीं हो जाती. उन्होंने 4 साधुसंतों को मंत्री का दर्जा भी दे दिया. यह और बात है कि इस पर खूब विवाद हुए लेकिन तब तक शिवराज सिंह का पाखंडी चेहरा उजागर हो चुका था.

हुआ यों, पंडेपुजारियों ने और मुफ्त की मलाई की मांग करते उन पर चढ़ाई शुरू कर दी. मंदिरों के पुजारी उन से खैरात मांगते जगहजगह उन के खिलाफ सार्वजनिक प्रदर्शन करते नजर आए.

दर्शनशास्त्र से स्नातकोत्तर शिवराज सिंह चौहान भूल गए कि वे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत चुने गए मुख्यमंत्री हैं, उन्हें किसी वशिष्ठ या द्रोणाचार्य ने नियुक्त नहीं किया है. यह भूल उन्हें कितनी महंगी पड़ी, यह 11 दिसंबर को उजागर भी हुआ.

अपने पूरे कार्यकाल में वे धर्मगुरुओं की खुशामद करते रहे और जब भी किसी संवदेनशील मुद्दे ने सिर उठाया तो आरएसएस के इशारे पर फैसले लेते रहे. उज्जैन कुंभ के दौरान भी शिवराज सिंह चौहान पूरे धार्मिक रंग में थे. यहां भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और आरएसएस ने मिल कर सामाजिक समरसता का नारा दिया था जिस के तहत भगवा खेमे के नेताओं और संतों ने दलित संतों के साथ डुबकी लगाई थी और उन के साथ खाना भी खाया था.

यह वह वक्त था जब नरेंद्र मोदी का पौराणिक चेहरा सामने आने लगा था और भाजपा का दलित प्रेम कितना बड़ा छल है, यह भी उजागर होने लगा था. उन्हीं दिनों जगहजगह दलित अत्याचार शबाब पर थे, दलितों की जगहजगह पिटाई की जा रही थी, दलित दूल्हों को घोड़ी पर चढ़ने नहीं दिया जा रहा था, उन्हें सलीके के कपड़े और जूते पहनने तक पर प्रताडि़त किया जा रहा था. और तो और, उन्हें नाइयों के यहां हजामत करवाने पर भी पीटा जा रहा था.

यह इत्तफाक नहीं था कि ऐसा भाजपाशासित प्रदेशों गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान वगैरह में ज्यादा हो रहा था. यह हार्ड हिंदुत्व का वह नजारा था जिस का वर्णन धर्मग्रंथों में इफरात से है.

बहरहाल, शिवराज सिंह चौहान की हालत उस फिजीशियन और सर्जन जैसी हो गई थी जो अच्छी तरह जानतासमझता है कि दिल की धड़कन रुकने से मौत होती है, लेकिन धर्मग्रंथों को वह नकार नहीं पाता और मानता है कि इसी शरीर में कहीं आत्मा रहती है जो होती तो है पर दिखती नहीं.

ऐसा कोई सप्ताह नहीं गया होगा जब शिवराज सिंह ने किसी मंदिर में पूजापाठ न की हो. मतदान के बाद तो हवा भांपते वे इतने घबरा गए थे कि हर ब्रैंडेड मंदिर में जा कर उन्होंने पूजाअर्चना और अनुष्ठान किए और जहां खुद नहीं जा पाए, वहां उन की पत्नी साधना सिंह गईं.

साफ है कि धार्मिक ढकोसले शिवराज सिंह को महंगे पड़े जो दलितों को पुजारी बनाने तक की बात करने लगे थे. लेकिन ब्राह्मणों के विरोध के चलते वे ऐसा कर नहीं पाए. हालांकि यह बात दलितों के भले की ही थी, लेकिन हुआ वही जो धर्मग्रंथों में लिखा है कि दान का हकदार केवल ब्राह्मण हैं. दलितों को पुजारी बनाने की बात पर ब्राह्मणों ने उन्हें खुलेआम श्राप भी दिया था जो 11 दिसंबर को फलीभूत भी हुआ तो इस की वजह ब्राह्मण वोटों का भाजपा से किनारा कर लेना था, जिस की बड़ी वजह एट्रोसिटी एक्ट भी बना.

बनियों और ब्राह्मणों की पार्टी कही जाने वाली भाजपा ने जब संसद में सुप्रीम कोर्ट का फैसला बदलते एट्रोसिटी एक्ट बहाल किया था तो ऊंची जाति वालों ने जम कर बवाल मचाया था. इस के पहले सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर 2 अप्रैल को हुई हिंसा से दर्जनभर दलित मारे गए थे. इत्तफाक से दलित विद्रोह का केंद्र भी मध्य प्रदेश रहा था. लेकिन यह कहना गलत होगा कि केवल सवर्ण वोट के कारण भाजपा हारी क्योंकि मध्य प्रदेश अकेले में भाजपा ने 2014 के मुकाबले 14 प्रतिशत वोट खोए जो सारे सवर्णों के नहीं हो सकते.

संसद में दलितों के सामने भाजपा ने घुटने टेके थे. तो सवर्णों ने ऐलान कर दिया था कि अब वे भाजपा को वोट नहीं देंगे यह धौंस आरएसएस और भाजपा दोनों के लिए सिरदर्दी और चिंता की थी जिन के हाथ से दलित और सवर्ण दोनों छिटक रहे थे. तीनों राज्यों में इस मुद्दे का असर पड़ा और भाजपा को बड़े पैमाने पर दोनों ही तबकों के वोटों का नुकसान हुआ.

इसलिए विदा हुईं महारानी

राजस्थान में हालत थोड़ी अलग थी. मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया वाकई महारानियों की तरह पेश आईं और किसान, कर्मचारी व युवा वहां त्राहित्राहि करते रहे. वसुंधरा राजे पूरे 5 साल पूजापाठ और तंत्रमंत्र में उलझी रहीं. मतगणना वाले दिन भी वे बांसवाड़ा के त्रिपुरा सुंदरी के मंदिर में दिनभर कैद रही थीं, लेकिन जनता का फैसला पहले ही ईवीएम में कैद हो चुका था जिसे त्रिपुरा सुंदरी बदल नहीं पाई.

वसुंधरा राजे भगवान भरोसे ही सरकार चलाती रहीं, जिन की कोई पकड़ प्रशासन पर नहीं रही. राजस्थान की जनता उन से इस कदर नाराज थी कि चुनाव के काफी पहले से ही उन का विरोध जगहजगह होने लगा था. इस के अलावा उन के राज में ही सब से ज्यादा हत्याएं गौरक्षा के नाम पर हुईं और अफसोस की बात यह रही कि धार्मिक पूर्वाग्रहों के चलते वे किसी पीडि़त के यहां सांत्वना देने भी नहीं पहुंचीं. राजस्थान की जनता उन से काफी खफा और नाउम्मीद हो गई थी और शायद उन का भगवान भी जिस ने तंत्र, मंत्र और अनुष्ठानों के आह्वानों पर ध्यान नहीं दिया.

छत्तीसगढ़ में भाजपा की फजीहत

छत्तीसगढ़ में भाजपा की ऐतिहासिक फजीहत हुई. अब तक कि सब से कम सीटें उसे मिलीं. यहां रमन सिंह भी 3 बार से मुख्यमंत्री थे. वसुंधरा राजे की तरह वे भी प्रशासन से अपनी पकड़ खो चुके थे. लेकिन महज इसी वजह से भाजपा 90 में से 18 सीटों पर नहीं सिमटी, बल्कि इस में रमन सिंह की हिंदूवादी इमेज ने भी खासा असर डाला.

छत्तीसगढ़ में अंदरूनी लड़ाई हिंदू बनाम आदिवासी हो गई थी. भाजपा कार्यकर्ता तक यह मान बैठे थे कि अब आदिवासियों ने खुद को हिंदू मान लिया है. खुद रमन सिंह अधिकांश वक्त मंदिरों में पूजापाठ करते नजर आए और उन्होंने आदिवासी इलाकों में बड़े पैमाने पर धार्मिक आयोजन किए. इन में राजिम कुंभ और बस्तर का प्रसिद्ध दशहरा प्रमुख थे जिन्हें उन्होंने हिंदू चोला ओढ़ाने की कोशिश की.

नक्सल प्रभावित आदिवासी बाहुल्य इस राज्य में बढ़ती धार्मिक हलचल से आदिवासी दहशत में आ गए थे, क्योंकि वे घोषित तौर पर खुद को हिंदू नहीं मानते, बल्कि खुद की प्रकृति का उपासक मानते हैं. उन की शांत जिंदगी में हिंदूवादी संगठनों का बढ़ता दखल भाजपा की दुर्दशा की बड़ी वजह बना.

छत्तीसगढ़ के शहरी इलाकोें में जीएसटी को ले कर व्यापारियों की नाराजगी का खमियाजा भी भाजपा को भुगतना पड़ा और बढ़ती बेरोजगारी के अलावा धान उत्पादक किसानों की बदहाली भी उसे महंगी पड़ी.

रहीसही कसर योगी आदित्यनाथ ने चुनावप्रचार के दौरान यहां रामलला के ननिहाल होने का वास्ता देते मंदिर बनाने की बात कह कर पूरी कर डाली. रमन सिंह ने आदित्यनाथ के न केवल पैर छुए थे बल्कि उन की वैदिक विधिविधान से पुरोहितों की मौजूदगी में पूजा भी की थी.

धर्म के भरोसे हो चले रमन सिंह भी खारिज कर दिए गए तो कांग्रेस को बैठेबिठाए छप्पर फाड़ कर रिकौर्ड 68 सीटें मिल गईं.

इन राज्योंं के चुनावी नतीजे हर लिहाज से अहम हैं जो बड़े पैमाने पर 2019 के लोकसभा चुनाव पर भी असर डालेंगे, जिसे ले कर भगवा खेमे में खासी बेचैनी है, क्योंकि बाजी अब उस के हाथ से खिसकती नजर आ रही है.

दिलचस्प बात यह भी है कि इन्हीं तीनों राज्यों से साल 2013 में मोदी लहर शुरू हुई थी और इन्हीं राज्यों पर अटक कर कम भी हो गई है. अब मोदी विरोधी लहर दूसरे राज्यों में भी फैलनी तय दिख रही है.

वजनदार राहुल, हलके होते मोदी

5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में मुद्दे केवल प्रादेशिक या स्थानीय ही नहीं थे बल्कि वोटर ने बारीकी से नरेंद्र मोदी के साढ़े 4 साल के कार्यकाल का मूल्यांकन कर भी वोट डाला है. उसे बेहतर मालूम है कि यह वाकई सत्ता का सैमीफाइनल है और उस का वोट 2019 के लोकसभा चुनाव का एक्जिट पोल साबित होगा.

2014 से ही नरेंद्र मोदी और भाजपा से वैचारिक स्तर पर जूझ रहे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का भगवा खेमे ने बहुत हलके स्तर पर जा कर मजाक उड़ाया है, ठीक वैसे ही जैसे वैदिक काल में शूद्रों, अपाहिजों और महिलाओं का उड़ाया जाता था. यह राहुल गांधी का आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति ही कही जाएगी जो उन्होंने इस घटिया दुष्प्रचार के आगे घुटने नहीं टेके और उस का मुकाबला पूरी दृढ़ता व गंभीरता से करते हुए जता दिया कि अब पप्पू बनने की बारी भाजपा की है.

2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने जम कर राहुलसोनिया सहित पूरे गांधीनेहरू परिवार को कोसा था पर तब यह राजनीतिक मुद्दा था और एक हद तक प्रासंगिक भी था. इस के बाद भी तमाम राज्यों के चुनावप्रचार और अपनी चुनाव से इतर सभाओं में भी नरेंद्र मोदी ने यह सिलसिला छोड़ा नहीं तो लोग चकरा उठे कि अब कुछ करोधरो भी, कब तक अतीत में जीते रहोगे. जाहिर है लोग अपने वोट और समर्थन का सिला नरेंद्र मोदी से मांग और चाह रहे थे.

विधानसभा चुनाव प्रचार में भी नरेंद्र मोदी राहुल गांधी को कोसते रहे और एक सभा में तो उन्होंने अपनी न सही पर प्रधानमंत्री पद की मर्यादा भुलाते सोनिया गांधी को कांग्रेस की विधवा कह दिया तो लोगों ने तालियां नहीं बजाईं बल्कि उन की तरफ से और नाउम्मीद हो उठे. दरअसल, नरेंद्र मोदी पूरी जनता को भाजपा कार्यकर्ता समझने की भूल कर बैठे थे.

पूरे प्रचार में उन के पास अपनी उपलब्धियों के नाम पर गिनाने लायक कुछ ठोस नहीं था, क्योंकि उन्होंने ऐसा कुछ किया ही नहीं जिसे जनता के सामने जता कर वोट हासिल किए जा सकें. बड़ीबड़ी और चाशनी में डूबी बातें वे जरूर करते रहे, लेकिन 4 वर्षों में उस गंगा का पानी बहुत बह चुका है जिस की साफसफाई के वादे पर केंद्र सरकार अभी तक योजनाएं ही बना रही है और अरबों रुपए कागजों में फूंक चुकी है.

मिजोरम व तेलंगाना भी हारे

केवल हिंदी भाषी राज्यों में ही भाजपा मुंह के बल नहीं गिरी, बल्कि मिजोरम और तेलंगाना में भी उस की खासी फजीहत हुई. इन दोनों राज्यों में कांग्रेस को भी मुंह की खानी पड़ी. मिजोरम में वह सत्ता गंवा बैठी और तेलंगाना में उम्मीद के मुताबिक उसे सीटें नहीं मिलीं. यहां तेलुगूदेशम पार्टी से गठबंधन के  साथ उसे 119 में से महज 21 सीटें ही मिलीं. मिजोरम में भी वह 40 में से केवल 5 सीटें ही हासिल कर पाई.

भाजपा को इन दोनों ही राज्यों में एकएक सीट मिली जिस से साबित हुआ कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी, जो पूर्वोत्तर में छा चुकी थी, अब प्रभाव खोने लगी है और दक्षिण भारत भी उस के प्रभाव में आने से पहले उन से छिटकने लगा है. अब मिजोरम में एमएनएफ और तेलंगाना में फिर से चंद्रशेखर राव वाली टीआरएस 88 सीटें ले कर सत्ता पर काबिज हो गई है. टीआरएस भाजपा की पार्टी है क्योंकि चंद्रशेखर राव भी घोर अंधविश्वासी हैं. यह गलतफहमी है. राजेंद्र प्रसाद श्यामाचरण शुक्ल और संपूर्णानंद भी घोर अंधविश्वासी थे पर कांग्रेसी थे.

पंजाब, गुजरात और कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा के लिए यह कड़ा इम्तिहान था, क्योंकि राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ हिंदुत्व के पुराने गढ़ हैं. पूरे चुनावप्रचार में नरेंद्र मोदी इस द्वंद्व में दिखे कि जनता से क्या कहें, हिंदुत्व की बात करें, राहुल गांधी का मजाक बनाएं या फिर विकास की वे उपलब्धियां गिनाएं जो वजूद में हैं ही नहीं. साढ़े 4 वर्षों में उन की लोकप्रियता का ग्राफ कितना गिरा है कि वे पांचों राज्यों की उन की चुनावी सभाओं में कम होती भीड़ से भी दिखा.

लोग चाहते थे कि वे अपना किया बताएं, लेकिन नरेंद्र मोदी तो राहुल गांधी की आलोचना कर उन्हें नामदार और झूठों का शहंशाह कहते रहे. कांग्रेस को भी उन्होंने जम कर कोसा और 70 साल का बहीखाता खोल कर बैठ गए कि देखिए, एक ही परिवार के लोग देश में लूटखसोट करते रहे और अब हमें काम नहीं करने दे रहे.

यह बेचारगी की हद थी और जनता को बेवकूफ समझने की गलती भी जो यह पूछने और सोचने लगी है कि आप को सत्ता हम ने कुछ करने को दी है और आप हैं कि राहुल गांधी, नेहरू परिवार और कांग्रेस के सम्मोहन से बाहर ही नहीं आ पा रहे. 2016 तक मजबूत और करिश्माई नेता माने जाते रहे नरेंद्र मोदी का जादू बेवजह उतरता नहीं दिखा रहा.

क्यों और कैसे राहुल गांधी उन पर भारी पड़ रहे हैं, इस को समझने के लिए नरेंद्र मोदी के अब तक के कार्यकाल पर भी लोगों ने नजर डाली कि नोटबंदी एक बेतुका और सनकभरा फैसला था, जिस में न कालाधन वापस आया, न ही भ्रष्टाचार कम हुआ, न ही आतंकवाद थमा और न ही जाली नोट छपने बंद हुए.

देर से ही सही, अमीरों को यह समझ आया कि नरेंद्र मोदी ने उन्हें नोटबंदी के जरिए पापी ठहराते सजा दी है और जीएसटी के जरिए व्यापारियों को पापी के साथसाथ चोर भी ठहराया है. अब ये पाप धोने, मूर्तियों, गंगा स्नान, कुंभ मेले के जरिए भगवा खेमे ने साधुसंतों को ठेका दे दिया गया है यानी इन से छीना पैसा अब घूमफिर कर पंडेपुजारियों के पास चला जाएगा.

किसानों की बदहाली और जीएसटी के फैसले पर भी व्यापारीवर्ग की नाराजगी विधानसभा चुनाव में देखने में आई जिसे महाभारत के ही शांति पर्व के राजधर्मानुशासन के नजरिए से ही देखें तो भीष्म, युधिष्ठिर से यह भी कहते हैं कि:

– ऊंचे या नीचे भाव से माल खरीदने वाले और व्यापार के लिए दूरदराज के क्षेत्रों में जाने वाले वैश्य राज्य में भारी करों की भारी मार से पीडि़त हो कर बेचैन तो नहीं हो रहे, यह देखना राजा का कर्तव्य है.

– किसान लोग अधिक लगान दिए जाने के कारण अत्यंत कष्ट पा कर राज्य छोड़ कर तो नहीं जा रहे, क्योंकि किसान ही राजाओं का भार ढोते हैं और वे ही दूसरे लोगों का भरणपोषण करते हैं.

किसानों की बदहाली

भले ही व्यापार और किसानी का तरीका बदल गया हो, लेकिन मोदीराज में उन की बदहाली वही है जिस की चेतावनी भीष्म ने युधिष्ठिर को दी है. नरेंद्र मोदी ने ब्राह्मणों के भरणपोषण वाला सबक तो याद रखा, लेकिन व्यापारियों और किसानों वाले सबक पर ध्यान नहीं दिया कि जीएसटी से व्यापारी व्यापार छोड़ देने की हद तक त्रस्त हैं और किसान चूंकि कहीं और नहीं जा सकते, इसलिए भुखमरी से तंग आ कर आत्महत्या कर रहे हैं या फिर शहरों की तरफ भाग कर मेहनतमजदूरी करते जैसेतैसे पेट भर पा रहे हैं. उन की जमीनें या तो ऊंची जाति वालों ने हथिया ली हैं या फिर औनेपौने दामों में खरीद ली हैं.

आम लोगों की परेशानियों से बेपरवाह नरेंद्र मोदी महंगी से महंगी मूर्तियां गढ़वा रहे हैं. हर जगह पूजापाठ कर रहे हैं, गंगा की सफाई के नाम पर अरबों रुपए फूंक रहे हैं. कांग्रेस नेता शशि थरूर का यह ताना सटीक ही लगता है कि मोदीराज में मुसलिमों के मुकाबले गायें ज्यादा सुरक्षित हैं.

अब यह भी बात है कि भगवा खेमा और पौराणिकवादी दलितों की तरह मुसलमानों की गिनती भी मनुष्यों में नहीं करते, क्योंकि हिंदू धर्मग्रंथ ऐसा निर्देश बहुत स्पष्ट रूप से देते हैं.

सच तो यह है कि आरएसएस के इशारे पर नाचने वाले नरेंद्र मोदी और उन की सरकार अपने उत्तरार्द्ध में पूरी तरह मनुस्मृति को लागू करने पर उतारू हो आई है, लेकिन इस तरह कि कोई उस की मंशा पर उंगली न उठा पाए. इस के बाद भी मंशा छिपाए नहीं छिपती. नतीजों के बाद की एक प्रतिक्रिया बताती है कि भाजपा की नजर में दलितों की हैसियत क्या है.

हार का ठीकरा दलितों के सिर

सुरेंद्र सिंह उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की बैरियर सीट से भाजपा के विधायक हैं. हार पर प्रतिक्रिया के साथसाथ दलितों के प्रति सदियों से सनातनियों के दिमाग में भरी भड़ास इसे कहेंगे जिसे उन्होंने यह कहते व्यक्त किया कि ये नतीजे दलितों को सिर पर चढ़ाने का नतीजा है. सुरेंद्र सिंह भी 3 राज्यों में भाजपा की हार की वजह एट्रोसिटी एक्ट को ठहराते हैं. मंशा और मैसेज साफ है कि भाजपा दलितों की वजह से हारी, सवर्णों की वजह से नहीं. प्रसंगवश बताना जरूरी है कि ये वही विधायक हैं जिन्होंने सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर की तुलना कुत्ते से कर डाली थी.

यहां यह प्रसंग और भी प्रासंगिक है कि सुरेंद्र सिंह की क्या गलती है, जब खुद उन के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राजस्थान के अजमेर की एक सभा में हनुमान को दलित करार दे दिया था यानी भाजपाइयों और भगवाइयों की नजर में दलित कुत्तों और बंदरों सरीखे चौपाए हैं.

ऐसे नेताओं पर नरेंद्र मोदी का कोई जोर नहीं चलता, लेकिन राहुल गांधी उन के मुकाबले पूरी शालीनता और सतर्कता से पेश आ रहे हैं, जो भी कांग्रेसी किसी भी तरह की आपत्तिजनक टिप्पणी नरेंद्र मोदी पर करता है वे उसे या तो नसीहत देते हैं या फिर दिखावे को सही, बाहर का रास्ता दिखा कर जनता की नजरों में चढ़ने का मौका नहीं चूकते.

इंदौर में एक पत्रकार वार्त्ता में राहुल गांधी ने कहा था कि वे प्रेम की राजनीति करने में भरोसा करते हैं. नरेंद्र मोदी और दूसरे भाजपा नेताओं को निशाने पर लेते उन्होंने यह भी कहा था कि जाने क्यों कुछ लोग उन से नफरत करते हैं.

पर बात सीधेसीधे राहुल गांधी के हिंदू होने न होने को ले कर थी. भाजपा हमेशा उन्हें इस मुद्दे पर घेरती रही है. जवाब में राहुल गांधी ने पूजापाठ करने के लिए मंदिरों में जाना शुरू कर दिया. खुद को जनेऊधारी ब्राह्मण भी बता दिया और पूछे जाने पर खुद का गोत्र भी राजस्थान के बीकानेर से उजागर कर दिया कि वे कौल ब्राह्मण हैं और उन का गोत्र दत्तात्रेय है.

हिंदू दिखना राहुल गांधी की सियासी मजबूरी बना कर शायद अब भाजपा खुद पछता रही होगी, क्योंकि राहुल गांधी के इस सौफ्ट हिंदुत्व को जनमानस ने सहज स्वीकार कर लिया है.

लेकिन समझदारी दिखाते राहुल गांधी धर्म की व्याख्या नहीं करते और न ही हिंदुत्व के मूलभूत सिद्धांतों की बात करते हैं. नरेंद्र मोदी को पछाड़ते वे एक बयान में यह भी कह चुके हैं, ‘‘मैं सभी धर्मों का आदर करता हूं.’’ इसलिए वे मसजिद में जा कर टोपी भी पहन लेते हैं और भाजपाइयों की तरह जैन मुनियों के पैरों में भी सिर झुकाते हैं.

इतना ही नहीं, नरेंद्र मोदी पर वे व्यक्तिगत हमले भी नहीं करते. नरेंद्र मोदी के सोनिया गांधी को कांग्रेस की विधवा कहने पर वे तिलमिलाए नहीं, नहीं तो उन के पास भी जवाब देने के कई कारण थे यानी हो उलटा रहा है. नरेंद्र मोदी राहुल गांधी को नहीं उकसा पा रहे और राहुल गांधी नरेंद्र मोदी को उकसाने में  कामयाब हो रहे हैं. इस से उन की छवि एक गंभीर और परिपक्व नेता की बन रही है. 3 राज्यों के नतीजे इस की गवाही भी देते हैं.

तीसरी अहम बात जो कांग्रेस की

3 राज्यों में वापसी की बड़ी वजह बनी, वह राहुल गांधी द्वारा नरेंद्र मोदी पर किए गए राजनीतिक और प्रशासनिक हमले थे. उन्होंने नोटबंदी और जीएसटी जैसे अहम मुद्दों पर भी नरेंद्र मोदी को घेरा और बेरोजगारी व भ्रष्टाचार पर भी नहीं बख्शा, लेकिन राफेल डील पर ‘चौकीदार ही चोर है’ उन्होंने वैसे ही सुनाया जैसे 2014 में नरेंद्र मोदी ने ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ नारे को भुनाया था.

2019 पर पड़ेगा असर

3 गढ़ों की दुर्दशा देख कर भाजपाई हैरानपरेशान हैं, खासतौर से राजनीति के शोमेन अमित शाह जिन की चुनावजिताऊ इमेज और इलैक्शन मैनेजमैंट के चिथड़े उड़ गए हैं.

ये नतीजे 2019 के लोकसभा चुनाव पर जरूर असर डालेंगे, जिन के चलते भाजपा को नए सिरे से रणनीति तैयार करनी पड़ेगी. राममंदिर निर्माण पर उस का प्रयोग शुरुआती दौर में ही खुद हिंदुओं ने ही खारिज कर दिया है. अयोध्या से ले कर दिल्ली तक साधुसंतों का जमावड़ा रहा, लेकिन इस बार हिंदुओं ने कोई दिलचस्पी इस में नहीं दिखाई. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत काफी पहले भाजपा की हालत और संभावित हार भांप गए थे, इसलिए वापस मंदिर निर्माण की तरफ मुड़ना ही उन्होंने बेहतर समझा.

मोहन भागवत की मंशा ब्राह्मणों और दूसरे सवर्णों का समर्थन बनाए रखने की थी जो एट्रोसिटी एक्ट विवाद के बाद बिखरने लगा था.

अब इस मुद्दे पर भगवा खेमा क्या करेगा, यह देखना बेहद दिलचस्प बात होगी. हालफिलहाल तो इसे कानून और अध्यादेश की आड़ में टाला जा रहा है. लेकिन मोहन भागवत को यह एहसास भी है कि अगर इतना होहल्ला होने के बाद इसे सरकार के भरोसे छोड़ा तो भी सौदा घाटे का है और 1992 जैसा बवाल मचाया तो घाटा और बढ़ेगा, क्योंकि 26 सालों में हिंदुओं की 2 पीढि़यां बदल गई हैं, जो दंगाफसाद या हिंसा नहीं चाहतीं.

निश्चितरूप से लोग बदलाव चाहते थे और यह रुझान लोकसभा चुनाव तक भी बरकरार रहेगा, जिस की बड़ी वजह देश में पनपते भय और आतंक के माहौल के अलावा फलतेफूलते खर्चीले धार्मिक आयोजन हैं, साथ ही, बेकाबू होती महंगाई से भी लोग त्रस्त हैं.

बेकार है चमत्कार की आस

बदलाव बहुत ज्यादा सार्थक होगा, ऐसा कहने की भी कोई वजह नहीं क्योंकि कांग्रेस कोई चमत्कारी पार्टी या राहुल गांधी देवता नहीं हैं? लोकतंत्र में लोग सिर्फ पार्टी बदलते हैं, हालात नहीं. अमेरिका इस की बेहतर मिसाल है जहां डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद भी समस्याएं ज्यों की त्यों हैं. यही भारत में होना है. हां, इस बात की जरूर संभावना है कि अगर 2019 में केंद्र सरकार बदली तो नई सरकार कुछ ऐसी योजनाएं जरूर चला सकती है जो लोगों को दीर्घकालिक फायदा दे सके.

पर किसी चमत्कार की आस किसी से भी रखना बेकार की बात है. सरकार कोई भी आए, वह पंडापुरोहितवाद से पूरी तरह मुक्त नहीं होगी और न पौराणिकवादी व्यवस्था को खत्म कर पाएगी, जिस की जड़ें देश में गहरे तक फैली हैं. 3 राज्यों में मतदाताओं ने इन के पाताल तक जाने के खतरे को कम किया है.

मनुवाद के विरोधी राजीतिक दलों को जरूर इन नतीजों से उम्मीद बंधी है कि अगर एक हो कर लड़ा जाए तो जरूर नरेंद्र मोदी को हराया जा सकता है और यह मिथक या भ्रम तोड़ा जा सकता है कि भाजपा अपराजेय पार्टी है और अगले 50 सालों तक राज करेगी, जैसा कि उस के बड़बोले अध्यक्ष अमित शाह दावा करते रहते हैं, जिन का गरूर अपने ही गढ़ ढहने से टूटा है.

नैचुरल निखार पाना चाहती हैं तो ये नुसखे आपके बड़े काम आएंगे

सही उत्पाद के चयन के साथसाथ त्वचा को निखारने में सही पोषण मिलना भी बहुत जरूरी होता है. इसलिए प्राकृतिक निखार प्राप्त करने के लिए कुछ सावधानियां बरतने के अलावा भी कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है:

त्वचा का प्रकार जानें: अपनी त्वचा के प्रकार को जानना बहुत जरूरी है, क्योंकि कई तरह के लोशन हैं, जो विभिन्न तरह की त्वचा के लिए बनाए गए हैं. अत: सब से पहले त्वचा विशेषज्ञ के पास जाएं और उन से अपनी त्वचा के बारे में जानकारी लें.

पानी की न हो कमी: चेहरे को निखारने और निखार कायम रखने में पानी की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण होती है. पर्याप्त मात्रा में पानी का सेवन करने से त्वचा साफ नजर आती है. इसलिए प्रतिदिन 8-10 गिलास पानी का सेवन जरूर करें. यह आप की सेहत के लिए बहुत जरूरी है.

क्लींजर: यह त्वचा की देखभाल के रूटीन का सब से महत्त्वपूर्ण हिस्सा है. यह त्वचा की सारी गंदगी को दूर कर उसे साफ रखता है, जिस से चेहरे पर ताजगी आती है और त्वचा सुंदर और बेदाग नजर आती है. इसलिए यह बहुत जरूरी है कि अपनी त्वचा के प्रकार के अनुसार अपने लिए क्लींजर का चुनाव करें.

गुलाबजल को सब से बेहतरीन क्लींजर माना जाता है. इस की सब से बड़ी खासीयत यह है कि यह सभी प्रकार की त्वचा के लिए काम करता है और इस का कोईर् दुष्प्रभाव भी नहीं होता है. रोज क्लींजर का प्रयोग करने से त्वचा में ताजगी बरकरार रहती है.

फेस पैक: घर पर बना नैचुरल उत्पाद सब से अधिक प्रभावी माना जाता है, क्योंकि इस में कुछ जरूरी सामग्री होती है, जो त्वचा के लिए बहुत ही फायदेमंद होती है.

घर में फेस पैक बनाने के लिए 2 बड़े चम्मच चने का आटा, 1 चुटकी चंदन का पाउडर, 1/2 चम्मच हलदी पाउडर, 1 चुटकी कपूर और थोड़ा सा गुलाबजल ले कर पेस्ट बना लें. फिर इसे चेहरे पर समान रूप से लगाएं और 20 मिनट तक लगा रहने के बाद पानी से धो लें. त्वचा को निखारने के लिए इस पैक को सप्ताह में 1 बार जरूर लगाएं, त्वचा निखर उठेगी.

इसी तरह एक और घरेलू फेस पैक बनाने के लिए 1 चम्मच ऐलो वेरा जैल, 1 चुटकी हलदी, 1 चम्मच दूध और 1 चम्मच शहद ले कर अच्छी तरह मिला लें. इस मिश्रण को चेहरे और गरदन पर लगाएं. 20 मिनट लगा रहने के बाद हलके गरम पानी से धो लें. इस मिश्रण का सप्ताह में 2 बार प्रयोग करें. ऐलोवेरा जैल त्वचा की समस्याओं को दूर करने के लिए बेहतरीन नुसखा है. यह त्वचा की सभी प्रकार की समस्याओं को दूर करता है. यह चेहरे की सूजन भी कम करता है.

टोनर: टोनर आप की त्वचा में नमी की मात्रा को संतुलित करता है, जिस से यह सुनिश्चित हो जाता है कि त्वचा सूखेगी नहीं. यह त्वचा को टोन कर उसे हाइड्रेट रखता है. फेस मास्क का प्रयोग करने के बाद टोनर का प्रयोग करने से चेहरे की ताजगी बरकरार रहती है.

नारियल का तेल: नारियल के तेल की मौइश्चराइजिंग क्षमता सब से बेहतरीन होती है. रोजाना चेहरे और गरदन पर हलके गरम नारियल के तेल का प्रयोग करें. रातभर लगा रहने दें. यह सूखी और सुस्त त्वचा के लिए बहुत बेहतरीन है. त्वचा के संपर्क में आने के बाद यह घंटों तक नमी बनाए रखता है. नारियल तेल में फैटी ऐसिड होता है जो कि त्वचा के लिए बहुत अच्छा माना जाता है. इस में पाया जाने वाला फेनोलिक कंपाउंड त्वचा के लिए ऐंटीऔक्सिडैंट की तरह काम करता है, जिस से त्वचा में प्राकृतिक निखार आता है.

नारियल के 1 बड़े चम्मच तेल में चीनी मिला कर प्रयोग करें, यह बहुत ही बेहतरीन ऐक्सफोलिएटर है. इस का प्रयोग स्क्रब की तरह किया जा सकता है. इस का सप्ताह में 1-2 बार प्रयोग करें.

स्वस्थ आहार: स्वस्थ त्वचा के लिए सब से जरूरी है स्वस्थ आहार. अधिक से अधिक फलों का सेवन करें. ये नैचुरल स्वीटनर की तरह काम करते हैं. अपनी डाइट में ज्यादा से ज्यादा सब्जियां शामिल करें. इन में मौजूद विटामिन और मिनरल त्वचा और शरीर को स्वस्थ रखेंगे.

– निर्मल रंधावा, मेकअप आर्टिस्ट, इंडिका मेकओवर

अरबी शहजादी को दिया, मिशेल को लिया

पिछली यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान वर्ष 2010 में हुए एंगलोइतालवी कंपनी अगस्ता वैस्टलैंड के साथ हुए 12 एडब्लू-101 वीवीआईपी हैलिकौप्टर्स सौदे में बिचौलिए की भूमिका निभाने वाले ब्रिटिश नागरिक क्रिश्चियन मिशेल के दुबई से भारत में प्रत्यर्पण को भले ही मोदी सरकार की बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है, मगर इस जीत के पीछे एक महिला की आजादी और उस के मानवाधिकार को रौंदने वाली क्रूर कहानी को अनसुना नहीं किया जा सकता है.

बोफोर्स तोप घोटाले में दलाली के आरोपी इतावली व्यवसायी ओतावियो क्वात्रोची को भले ही कभी भारत न लाया जा सका, मगर ब्रिटिश नागरिक क्रिश्चियन मिशेल के प्रत्यर्पण में सफल रही मोदी सरकार अपनी इस उपलब्धि पर फूली नहीं समा रही है.

भारत लाए गए क्रिश्चियन मिशेल पर आरोप है कि उस ने 3,600 करोड़ रुपए की हैलिकौप्टर डील में 360 करोड़ रुपए की रिश्वत से गांधी परिवार और यूपीए सरकार के कई मंत्रियों की जेबें गरम कीं. हालांकि इन सभी आरोपों को मिशेल लगातार नकार रहे हैं. वे फिलहाल सीबीआई की हिरासत में हैं.

क्रिश्चियन मिशेल के प्रत्यर्पण का सेहरा प्रधानमंत्री मोदी के जेम्स बौंड अजीत डोभाल के सिर बंधा है. कहा जा रहा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने एक साल पहले एक क्रैक टीम बना कर इस मिशन को आखिर सफल बनाया.

गौरतलब है कि क्रिश्चियन मिशेल के खिलाफ रैड कौर्नर नोटिस 2015 से जारी है. डोभाल ने मिशेल के प्रत्यर्पण के लिए एक टीम गठित की थी, जिस में सीबीआई के जौइंट डायरैक्टर साई मनोहर समेत कुल 4 सदस्य शामिल थे. इस टीम में सीबीआई के अलावा रौ के अधिकारी भी शामिल थे.

यह टीम मिशेल के प्रत्यर्पण के लिए दुबई गई थी, मगर उस के सामने उस समय मुश्किल खड़ी हो गई जब मिशेल के वकील ने दुबई की कोर्ट में अपना पक्ष मजबूती से रखते हुए कहा कि मिशेल ब्रिटिश नागरिक हैं और उन्हें किसी तीसरे देश से भारत प्रत्यर्पित नहीं किया जा सकता.

लेकिन सितंबर 2018 में अचानक दुबई कोर्ट ने सभी दावों को खारिज करते हुए कहा कि मिशेल को प्रत्यर्पित किया जा सकता है. आखिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि मोदी सरकार की कोशिशें कामयाब हो गईं और क्रिश्चियन मिशेल को भारत लाया जा सका? वह क्या वजह थी कि दुबई सरकार ने मिशेल के प्रत्यर्पण में आ रही तमाम बाधाओं को एक झटके में दूर कर दिया?

अगर यूनाइटेड नेशंस से आ रही खबरों और मानवाधिकार संस्थानों की मानें तो वह वजह थी दुबई की भगोड़ी शहजादी शेख लतीफा अल मकतूम, जो आजाद जिंदगी जीने की चाह में मार्च 2018 से दुबई से फरार हुईं और भारतीय समुद्रतट पर उस वक्त गिरफ्तार हुईं जब वे यहां राजनीतिक शरण की इच्छा ले कर पहुंची थीं.

लतीफा के एवज में मिशेल

यूनाइटेड नेशंस के मानवाधिकार संस्थान और दुबई की शाहजादी शेख लतीफा अल मकतूम के वकीलों का कहना है कि क्रिश्चियन मिशेल का प्रत्यर्पण दुबई के आका और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई एक डील का नतीजा है. भारतीय समुद्रतट पर गिरफ्तार शहजादी शेख लतीफा अल मकतूम को ससम्मान, बिना किसी शोरगुल के दुबई को वापस सौंपने के बदले में क्रिश्चियन मिशेल को भारत के हाथों सौंपा गया है.

दरअसल, यूनाइटेड अरब अमीरात के प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन राशिद की बेटी शेख लतीफा, जिस ने अपने पिता की क्रूरता से तंग आ कर आजाद जिंदगी की तलाश में 3 लाख पौंड की रकम जमा की और 4 मार्च, 2018 को दुबई से फरार हो गई थीं.

32 वर्षीया राजकुमारी शेख लतीफा दुबई छोड़ कर अमेरिका में शरण लेना चाहती थीं. इस के लिए उन्होंने अपनी मार्शल आर्ट ट्रेनर टीना और फ्रांसीसी जासूस हर्व जौबर्ट से मदद ली थी. टीना की मदद से वे पहले दुबई से ओमान पहुंचीं और वहां से हर्व जौबर्ट द्वारा उपलब्ध एक जहाज के जरिए भारत की समुद्री सीमा तक पहुंच गईं. मगर यहां गोवा के निकट भारतीय कोस्टगार्ड और सुरक्षा एजेंसियों ने शेख लतीफा को गिरफ्तार कर लिया. कहा जा रहा है कि उन की गिरफ्तारी के वक्त यूनाइटेड अरब अमीरात के भी कुछ अधिकारी वहां मौजूद थे.

शेख लतीफा ने भारतीय अधिकारियों से राजनीतिक शरण की मांग की, मगर उन की मरजी के खिलाफ कोस्टगार्ड उन्हें गिरफ्तार कर के ले गई. मोदी सरकार ने इस की सूचना दुबई सरकार को दी और इस वादे पर कि दुबई की राजशाही अपनी अदालत पर दबाव बना कर क्रिश्चियन मिशेल के प्रत्यर्पण में होरही बाधाओं को दूर कर उसे भारत को सौंप देगी.

शहजादी शेख लतीफा को उन की इच्छा के विरुद्ध गुपचुप तरीके से दुबई वापस उन के घर पहुंचा दिया गया. उस दिन से आज तक शहजादी शेख लतीफा को सार्वजनिक रूप से नहीं देखा गया है, हालांकि दुबई सरकार ने एक बयान जारी कर इतना जरूर कहा है कि शहजादी अपने घर में स्वस्थ और सुरक्षित हैं.

उधर, दुबई की कोर्ट, जो अब तक ब्रिटिश नागरिक क्रिश्चियन मिशेल के भारत प्रत्यर्पण में तमाम उलझनें व कानूनी अड़चनें बता रही थी, ने दुबई के आका के इशारे पर तमाम अड़चनें एक झटके में दूर कर दीं और मिशेल को भारतीय अधिकारियों के हवाले करने का फैसला सुना दिया.

राधा स्टर्लिंग ने लगाया आरोप

दुबई में शेख लतीफा की पैरवी करने वाली राधा स्टर्लिंग ने दावा किया है कि भारत सरकार ने दुबई से क्रिश्चियन मिशेल के प्रत्यर्पण को ले कर जो डील की, उस के कारण एक बालिग महिला के जीवन जीने के अधिकार और आजादी को छीना गया है. उन्होंने आरोप लगाया है कि भारत सरकार ने एक महिला के हक पर डाका डाल कर अपनी राजनीतिक मंशा को पूरा किया है.

राधा स्टर्लिंग कहती हैं कि दोनों देशों के बीच इस मसले पर अंतर्राष्ट्रीय नियमों का भी उल्लंघन किया गया क्योंकि प्रत्यर्पण का जो काम कोर्ट प्रक्रिया के तहत किया जाता है, वह भारत और दुबई के राजनयिकों के बीच हुआ और एक ब्रिटिश नागरिक मिशेल के भारत प्रत्यर्पण से पहले ब्रिटिश सरकार को भी इस की कोई सूचना नहीं दी गई.

अंधे के हाथ बटेर

क्रिश्चियन मिशेल का प्रत्यर्पण मोदी सरकार के लिए बिलकुल वैसा ही है, जैसे अंधे के हाथ बटेर लग गई हो. भले ही क्रिश्चियन मिशेल के प्रत्यर्पण का क्रैडिट पीएम मोदी के जैम्स बौंड अजीत डोभाल को दिया जा रहा हो, पर इस में अहम वजह है शेख लतीफा की घर वापसी. न दुबई की शहजादी घर से भागी होती, न भारतीय सुरक्षा एजेंसी के हाथ लगती और न उन को वापस लौटाने के एवज में क्रिश्चियन मिशेल का प्रत्यर्पण हुआ होता.

गौरतलब है कि दुबई में रह रहे क्रिश्चियन मिशेल को यूनाइटेड अरब अमीरात प्रशासन ने फरवरी 2017 में तब गिरफ्तार किया था जब भारत सरकार ने उस के प्रत्यर्पण के लिए अनुरोध किया था. इस के बाद से ही भारत सरकार उसे लाने के लिए कोशिश में लगी हुई थी. इस के लिए सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय के बड़े अधिकारियों ने कई बार यूएई का दौरा किया और वहां अगस्ता वैस्टलैंड हैलिकौप्टर सौदे में हुए कथित घोटाले से जुड़े साक्ष्य, आरोपपत्र, गवाहों के बयान और दूसरे दस्तावेज रखे थे. मगर मिशेल का प्रत्यर्पण नहीं हो पा रहा था. इसी बीच 4 मार्च, 2018 को शहजादी शेख लतीफा घर से निकल भागीं और भारतीय समुद्रतट पर उन की गिरफ्तारी ने क्रिश्चियन मिशेल का प्रत्यर्पण आसान बना दिया.

बता दें कि वर्ष 2002 से ले कर अब तक करीब 20 लोगों को सऊदी अरब से भारत लाया जा चुका है. इन में से 9 प्रत्यर्पण यूपीए सरकार के दौरान हुए थे. संयुक्त अरब अमीरात से लाए क्रिश्चियन मिशेल का मामला थोड़ा अलग इसलिए है, क्योंकि 2002 से अब तक हुए 20 में से 19 प्रत्यर्पित लोग भारतीय थे, जबकि क्रिश्चियन मिशेल ब्रिटिश नागरिक हैं. क्रिश्चियन मिशेल को भारत ला कर मोदी सरकार कांग्रेस पर शिकंजा कसना चाहती है, जिस के शासनकाल में हैलिकौप्टर सौदा हुआ था. भाजपा का आरोप है कि इस सौदे में मिशेल के जरिए लाखों रुपए यूपीए सरकार के मंत्रियों और गांधी परिवार की जेब में गए हैं.

घर से क्यों भागीं शहजादी

दुबई के शासक शेख मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम की 6 बीवियां और 30 बच्चे हैं. शहजादी शेख लतीफा उन की कम मशहूर पत्नी की 3 बेटियों में से एक हैं. कहा जाता है कि शेख लतीफा उग्र स्वभाव वाली महिला हैं और उन का इलाज चल रहा था. मगर लतीफा का आरोप है कि शाही महल में उन्हें कैद कर के रखा जाता है और वे सामान्य जिंदगी जीने के लिए तरस रही हैं. यही वजह थी कि वे देश छोड़ कर फरार हुईं. इस से पहले वे 7 बार फरार होने की नाकाम कोशिश कर चुकी थीं. जिस के बाद उन को नजरबंद कर के रखा जाने लगा.

शेख लतीफा के वकील कहते हैं कि 3 वर्षों से उन्हें अस्पताल में ही बंधक बना कर रखा  गया था. ब्रिटिश मीडिया को भेजे अपने मोबाइल संदेश में राजकुमारी कहती हैं कि उन्होंने 16 साल की उम्र में एक बार देश छोड़ कर भागने की कोशिश की थी. इसलिए तब से सब उन्हें शक की निगाह से देखते हैं. उन्हें अपने ही घर में आजाद जिंदगी जीने की इजाजत नहीं है.

शेख लतीफा ने अपने कई वीडियो शूट किए हैं और बारबार दुनिया को यह बताने की कोशिश की है कि उन के साथ वहां कुछ अच्छा नहीं हो रहा है. एक वीडियो में लतीफा कहती हैं कि जब 16 साल की उम्र में वे भागीं, तो उन्हें पकड़ लिया गया और उस के बाद 3 साल तक उन्हें जेल में रख कर टौर्चर किया गया. लतीफा ने एक वीडियो में अपने पिता को काफी क्रूर और भयानक बताया है.

कहा जा रहा है कि साल 2000 के बाद से शेख लतीफा के देश छोड़ कर बाहर जाने पर पाबंदी लगी हुई है. उन पर चौबीसों घंटे निगाह रखी जाती है. यहां तक कि वे गाड़ी भी नहीं चला सकती हैं. कुछ जानवरों को छोड़ कर उन का कोई दोस्त नहीं है. दुबई में वे ठीक से सामाजिक जीवन भी नहीं जी पा रही हैं

दोस्तों ने की मदद

शेख लतीफा की इस बार की फरारी में उन के फ्रांस के पूर्व जासूस दोस्त हर्व जौबर्ट और मार्शल आर्ट ट्रेनर दोस्त टीना ने उन की मदद की.

टीना 2014 में दुबई के शाही आवास में लतीफा को ब्राजील का मार्शल आर्ट सिखाने गई थीं. टीना से लतीफा की अच्छी दोस्ती हो गई थी और उन के संपर्क में आने के बाद उन्होंने एक बार फिर भागने की प्लानिंग करनी शुरू की. टीना ने लतीफा की मदद की और उन्हें एक छोटी रबर की नाव उपलब्ध करा दी. जिस पर सवार हो कर टीना और शेख लतीफा समंदर के रास्ते निकल पड़ीं.

समुद्र की तेज लहरों का सामना करते हुए वे दोनों अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर पहुंचने में सफल हो गईं, जहां उन का फ्रांसीसी दोस्त हर्व जौबर्ट अमेरिकी झंडा लगे एक छोटे जहाज में उन का इंतजार कर रहा था. इस जहाज पर पहुंच कर लतीफा को पहली बार लगा कि उन्हें दुबई के शाही महल में होने वाली क्रूरता से मुक्ति मिल गई है, मगर उन की यह खुशी ज्यादा दिनों तक रह न सकी.

कहानी में भारत की ऐंट्री

लतीफा फ्रैंच जासूस हर्व जौबर्ट और अपनी दोस्त टीना के साथ भारतीय समुद्रतट की ओर बढ़ीं. लतीफा को उम्मीद थी कि भारत में उन्हें राजनीतिक शरण मिल जाएगी और यहां वे सुरक्षित रहेंगी. उन की प्लानिंग थी कि भारत पहुंचने के बाद वे फ्लोरिडा के लिए फ्लाइट ले लेंगी. लतीफा बाद में फ्लोरिडा में राजनीतिक शरण लेना चाहती थीं.

लतीफा को भारतीय सेना ने गिरफ्तार कर लिया था, इस के बारे में आवाज डौटकौम वैबसाइट ने 13 मार्च, 2018 को ही एक अपील जारी की थी कि नरेंद्र मोदी लतीफा को आजाद करें, पर मोदी ने नहीं सुनी. मगर इस से पहले कि लतीफा भारत पहुंच कर यहां राजनीतिक शरण ले पातीं, गोवा तट से महज

30 मील पहले ही उन को 3 भारतीय और 2 अमीराती युद्धपोतों ने घेर लिया. कमांडोज ने लतीफा के फ्रैंच दोस्त, टीना और अन्य क्रू मैंबर्स के साथ मारपीट की और उस के बाद वे शेख लतीफा को अपने साथ ले कर चले  गए.

फिर हुई बड़ी डील

दुबई की राजकुमारी के पकड़े जाने के बाद भारत सरकार ने दुबई सरकार को इस की जानकारी दी. कहा जा रहा है कि शेख लतीफा को ससम्मान वापस घर भेजने के बदले में मिशेल क्रिश्चियन को भारत को सौंपे जाने की डील दुबई के शासक के साथ फाइनल हुई. और जो काम बीते 2 सालों से संभव नहीं हो रहा था, वह आननफानन हो गया.

गौरतलब है कि संयुक्त अरब अमीरात से क्रिश्चियन मिशेल के प्रत्यर्पण का निवेदन भारत सरकार ने करीब 19 महीने पहले किया था. उस के खिलाफ रैड कौर्नर नोटिस भी नवंबर 2015 में जारी हो चुका था. इतने वक्त में भी उस के प्रत्यर्पण के मामले में कोई गति नहीं देखी गई. मगर शेख लतीफा के भारत के तट पर पकड़े जाने और उन्हें वापस दुबई भेजे जाने के एक हफ्ते के अंदर ही क्रिश्चियन मिशेल के प्रत्यर्पण की सारी कार्यवाही पूरी हो गई.

मार्च के बाद नहीं दिखीं

शेख लतीफा के मददगारों और वकीलों का आरोप है कि मार्च के बाद  शेख लतीफा को किसी ने नहीं देखा है. उन्होंने यूनाइटेड नेशंस से इस मामले में दखल देने की अपील की और कहा कि राजकुमारी के गायब होने के पीछे भारत और यूएई के शासक जिम्मेदार हैं.

मानवाधिकार संगठन एमनैस्टी इंटरनैशनल का आरोप है कि भारत के कमांडोज ने बोट पर मौजूद सभी लोगों को बंदूक दिखा कर चुप रहने के लिए धमकाया और सिर्फ शेख लतीफा को अपने साथ ले गए, जबकि लतीफा ने उन से राजनीतिक शरण की मांग की थी.

इस पूरे मामले में यूनाइटेड नेशंस की एक संस्था ने भारत सरकार को पत्र भी लिखा है. मानवाधिकार कार्यकर्ता लगातार इस 32 साल की राजकुमारी के लिए चिंतित हैं, जो मार्च में पकड़े जाने के बाद से ही गायब चल रही हैं. हालांकि दुबई के शासक ने यह दावा किया है कि राजकुमारी अपने घर में हैं और सेफ हैं.

शम्सा भी हुई थीं फरार

लतीफा से पहले दुबई के शासक शेख मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम की एक अन्य बेटी भी भागने की कोशिश कर चुकी है. यह किस्सा थोड़ा पुराना है. लतीफा से बड़ी राजकुमारी शम्सा ने वर्ष 2000 में ब्रिटेन के सरे एस्टेट से भागने की कोशिश की थी. कुछ हफ्ते बाद 19 साल की शम्सा को कैंब्रिज से पकड़ कर दुबई लाया गया था. यह मामला आज भी अनसुलझा है, क्योंकि यूनाइटेड किंगडम पुलिस को जांच के लिए दुबई आने की अनुमति नहीं मिली थी. भागने की कोशिश के बाद से शम्सा आज तक सार्वजनिक जीवन में नहीं देखी गई हैं. शम्सा के बाद शेख लतीफा ने 7 सालों के दौरान कई बार भागने की कोशिश की, जिस में इस बार वे कामयाब रहीं, मगर भारत के क्षेत्र में आने पर भारतीय सुरक्षा एजेंसी ने उन्हें पकड़ लिया. और लोकतांत्रिक व भारतीय मूल्यों की हत्या कर के अरब सागर में कांटे के साथ डाल दिया ताकि मिशेल नाम की व्हेल मछली को पकड़ा जा सके.

मंजिल (भाग-9): सुहास की किस बात ने कर दिया सब को हैरान

पूर्व कथा

पुरवा का पर्स चोर से वापस लाने में सुहास मदद करता है. इस तरह दोनों की जानपहचान होती है और मुलाकातें बढ़ कर प्यार में बदल जाती हैं. सुहास पुरवा को अपने घर ले जाता है. वह अपनी मां रजनीबाला और बहन श्वेता से उसे मिलवाता है. रजनीबाला को पुरवा अच्छी लगती है. उधर पुरवा सुहास को अपने पिता से मिलवाने अपने घर ले आती है तो उस के पिता सहाय साहब सुहास की काम के प्रति लगन देख कर खुश होते हैं.

इंजीनियर लड़के गौरव से श्वेता का विवाह तय हो जाता है. मिठाई  के डब्बे के साथ बहन की सगाई का निमंत्रण ले कर सुहास सहाय साहब के घर जाता है. सहाय साहब सुहास की तारीफ करते हुए अपने मित्रों को बताते हैं कि वह उस के लिए मोटरपार्ट्स की दुकान खुलवा रहे हैं.

श्वेता की सगाई पर आए सहाय साहब के परिवार से मकरंद वर्मा परिवार के सभी सदस्य उत्साहपूर्वक मिलते हैं.

सुहास व्यापार शुरू कर देता है, लेकिन कई बार काम के लिए बंध कर बैठना उस के लिए मुश्किल हो जाता क्योंकि किसी भी जगह जम कर रह पाना उस के स्वभाव में नहीं था.

अंतत: श्वेता के विवाह का दिन आ जाता है. उस दिन पुरवा का सजाधजा रूप देख कर सुहास दीवाना हो जाता है. पुरवा से शीघ्र विवाह करने के लिए सुहास दुकान पर मन लगा कर काम करने लगता है और शीघ्र ही पुरवासुहास का धूमधाम से विवाह हो जाता है.

पुरवा महसूस कर रही थी कि सुहास का ध्यान समाजसेवा में अधिक रहता है. वह दूसरों की मदद के लिए दुकान पर भी ध्यान न देता.

एक दिन श्वेता ससुराल से लड़झगड़ कर मायके आती है. पुरवा के समझाने पर वह उलटा पुरवा को ही सुहास द्वारा कुछ न कमाने का ताना देती है. यह बात सच थी इसीलिए पुरवा सब चुपचाप सुन लेती है लेकिन अब उस के दिमाग में श्वेता के शब्द गूंज रहे थे.

पुरवा अब निरंतर सुहास को उस की जिम्मेदारी का एहसास कराने की कोशिश करती. शीघ्र ही वह दिन भी आता है जब पुरवा को पता चलता है कि वह मां बनने वाली है. सुहास पापा बनने के सुखद एहसास से झूम उठता है.

अब पुरवा सुहास को आने वाले बच्चे के लिए जिम्मेदारी से कारोबार संभालने के लिए समझाती है.

थोड़े दिनों बाद पुरवा को पता चलता है कि सुहास पुराना कारोबार खत्म कर कंप्यूटर का कार्य आरंभ करना चाहता है तो वह हैरान हो जाती है और बेचैनी से सुहास के घर लौटने की प्रतीक्षा करने लगती है. लेकिन वह बेला भाभी के पति सागर को अस्पताल ले जाने के पीछे रात देर से घर आता है, पुरवा की तबीयत खराब होने पर अस्पताल में भरती कराया जाता है. उस का हालचाल पूछने बेला घर आती है तो पुरवा उस से थोड़ी तीखी बात करती है, तब सुहास पुरवा पर बिगड़ता है. सुहास से नाराज पुरवा अपने मातापिता के साथ मायके चली जाती है. सुहास के व्यवहार को ले कर वह विचारमंथन करती है.

आखिरकार एक दिन सुहास पुरवा को मनाने ससुराल पहुंच जाता है. पुरवा वापस जने की शर्त रखती है कि वह घर के गैराज में बुटीक खोलेगी और इस काम में वह उस की मदद करेगा. बुटीक की शुरुआत करने में  सुहास से ज्यादा रजनीबाला पुरवा की मदद करती है. बुटीक निर्माण जोरशोर से शुरू हो जाता है. एक दिन सागर और बेला आते हैं और बताते हैं कि सुहास ने राजनीति ज्वाइन कर ली है, सुन कर सब चौंक जाते हैं.

अब आगे…

हाल बहुत बड़ा था. पार्टी के लोग वहां जमा थे. सुहास को ले कर जब आकाश वहां पहुंचा तो एक पल को सुहास घबरा सा गया. हाल के बीचोंबीच गाव तकिए के सहारे जो व्यक्ति बैठा था और दूसरों को कुछ निर्देश दे रहा था उस की ओर इशारा कर के आकाश ने सुहास के कान में धीरे से कहा, ‘‘यह शुक्लाजी हैं, जा कर इन्हें प्रणाम कर लो.’’

सुहास ने आगे बढ़ कर शुक्लाजी को प्रणाम किया. आकाश तुरंत बोला, ‘‘भाईजी, यह सुहास है, कुछ दिन पहले ही इस ने अपनी पार्टी में कदम रखे हैं. अपने मकरंद वर्माजी का छोटा बेटा है.’’

‘‘अच्छाअच्छा…इन्हें भी चुनाव के काम में लगाइए,’’ शुक्लाजी ने सहज स्वर में कहा.

पार्टी के लोगों के साथ यह दोनों भी बैठ गए. भावी योजनाओं पर चर्चा होने लगी. पार्टी के कुछ प्रमुख लोगों ने अपने सुझाव दिए. सुहास सब ध्यान से देखसुन रहा था. जब मीटिंग समाप्त हो गई तब शुक्लाजी ने आकाश से कहा, ‘‘देखो आकाश, 17 को जो मीटिंग तय हुई थी उसे कुछ दिन आगे के लिए टाल देना.’’

‘‘जी, भाईजी,’’ आकाश ने विनम्रता से कहा.

शुक्लाजी को सभी सदस्य अधिकतर भाईजी कह कर ही संबोधित करते थे. केवल शुक्लाजी के हमउम्र सहयोगी ही उन्हें नरेन नाम से पुकारते थे. उन की बात पर पार्टी के वयोवृद्ध सदस्य फतेहसिंह ने हंसते हुए कहा, ‘‘क्यों शुक्ला, कुछ खास है क्या?’’

शुक्लाजी मुसकरा दिए और बोले, ‘‘कुछ खास नहीं है सिंह साहब, विदेश से पढ़ कर हमारी नातिन आ रही है. उस की नानी का मन है कि पार्टी रखी जाए.’’

‘‘यह तो बहुत अच्छा है. हमें बुलाओगे या टरकाने वालों की लिस्ट में रखोगे,’’ फतेहसिंहजी ने मजाकिया लहजे में कहा.

‘‘अरे, नहीं. ऐसा कैसे हो सकता है. आप सभी आइए.’’

चलते समय शुक्लाजी ने आकाश से फुसफुसा कर कहा, ‘‘घर आ कर जरा काम संभाल लेना.’’

उन की बात सुहास ने सुन ली थी. आकाश जब बाहर निकला तो सुहास लपक कर उस के साथ हो लिया, चलतेचलते बोला, ‘‘आकाश, जब भाईजी के घर जाना तो मुझे भी साथ ले चलना.’’

आकाश हंस दिया, ‘‘समझदार हो, राजनीति के पहले कदम पर बहुत जल्दी पांव जमा लोगे.’’

पुरवा और मां बहुत देर से सुहास की प्रतीक्षा कर रही थीं. सुहास आया तो मां ने कहा, ‘‘आज बहुत देर हो गई, कहां थे?’’

सुहास ने मां की बात सुनीअनसुनी करनी चाही पर मां ने फिर टोक दिया, ‘‘कितनी अजीब बात है, हमें दूसरों से तुम्हारी खबरें सुनने को मिलती हैं. तुम अपना काम छोड़ कर राजनीति वालों के पीछे भाग रहे हो, यह क्या ठीक है?’’

सुहास ढिठाई से हंस दिया और बोला, ‘‘आज हंस लो मां, गुस्सा कर लो पर एक दिन अपने बेटे पर गर्व करोगी.’’

‘‘जाओ, हाथमुंह धो लो,’’ पुरवा ने कहा तो आश्चर्य से उसे देख कर सुहास बोला, ‘‘अरे, आज तुम ने कोई भाषण नहीं दिया.’’

‘‘हां, जरूरत नहीं समझी,’’ पुरवा ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया और आंख मूंद कर पलंग पर लेट गई.

सुहास निकट पहुंचा और माथे पर हाथ रख कर बोला, ‘‘मुझे मालूम है पुरू, मैं एक योग्य पति साबित नहीं हो पाया हूं पर अब जो मैं करना चाहता हूं वह एक अच्छा पिता बनने की चाहत है, और कुछ नहीं.’’

सुहास ने देखा पुरवा की आंखों से कुछ बूंदें टपक कर उस के गालों पर ढुलक गई थीं. सुहास ने झुक कर उस की बंद गीली पलकों पर चुंबन ले लिया.

लान में कई कुरसियां पड़ी थीं.  पुरवा धीरेधीरे टहलते हुए आ कर एक कुरसी पर बैठ गई. डाक्टर की राय से नित्य प्रात: टहलने का कार्यक्रम वह लान में घूम कर ही पूरा कर लेती थी. थोड़ी देर में मां भी आ कर वहीं बैठ गईं और बोलीं, ‘‘कैसी तबीयत है इस समय? रात को तुम्हारी तबीयत बहुत ढीली थी.’’

‘‘घूमने से अच्छा लग रहा है,’’ पुरवा ने कहा.

‘‘शाम तक एकदम ठीक हो जाओगी न?’’ मां ने किंचित चिंता जाहिर करते हुए पूछा तो पुरवा हंस कर बोली, ‘‘आप चिंता न करें मांजी, मैं शाम को आप को भागतीदौड़ती मिलूंगी.’’

कितनी चिंता रहती है मां को, पुरवा ने सोचा, जिसे इस समय सब से अधिक उस की चिंता करनी चाहिए वह जाने किन लोगों की देखभाल में जुटा रहता है. ऐसी बातें सोचते ही पुरवा का मन खिन्न हो उठता था.

‘‘सुहास कहां है?’’ मां ने पूछा.

‘‘तैयार हो रहे हैं. शायद कोई पार्टी मीटिंग है,’’ पुरवा ने उदासी से कहा. ‘‘जाने यह क्या नया रोग लगा लिया है अब,’’ मां ने भी उदासी से कहा. ‘‘जाने कब एक समझदार और जिम्मेदार व्यक्ति बनेगा. काश, राजनीति में ही कुछ ठोस काम कर के दिखाए.’’

‘‘मां, उम्मीद पर दुनिया कायम है, और इस उदाहरण पर मैं आज भी गहरी आस्था रखती हूं कि सुहास अवश्य अब एक नई दिशा में सफलता प्राप्त कर के दिखाएंगे.’’

‘‘मैं भी तो इसी आशा पर जी रही हूं. शायद मेरे पालनपोषण में ही कुछ कमी रह गई है,’’ मां ने बहुत दुखी मन से कहा. तभी सुहास बाहर आ गया.

घड़ी की तरफ देखते हुए सुहास बोला, ‘‘मां, मैं जा रहा हूं पर जल्दी आ जाऊंगा.’’

‘‘शाम को पुरवा के बुटीक का उद्घाटन होना है. यह याद रहेगा कि नहीं,’’ मां ने कहा.

‘‘याद कैसे नहीं रहेगा,’’ उस ने पुरवा की ओर प्यार से देखा, ‘‘आज पुरू का एक सपना साकार होने वाला है तो याद तो रहेगा ही.’’

सुहास आकाश के घर पहुंचा तो वह तैयार खड़ा था.

‘‘देखो, तुम्हारा फोन मिलते ही चल पड़ा,’’ सुहास ने प्रसन्नता से कहा.

‘‘चलो भई, तुम भी इन बड़ेबड़े नेताओं की सेवा का लाभ उठा लो,’’ आकाश ने हंस कर कहा.

‘‘सेवा कैसी, बड़े हैं और फिर इतने मधुर स्वभाव के हैं. उन के निकट रह कर कुछ सीखने को मिलेगा,’’ सुहास ने अपना पक्ष स्पष्ट किया.

‘‘तरक्की करेगा बच्चे,’’ आकाश ने व्यंग्य किया.

शुक्लाजी के घर दोनों पहुंचे तो वहां काफी भीड़ थी. सभी उन को घेरे हुए थे. सुहास यह समझ गया कि वे सभी लोग या तो कुछ कार्य करने को उत्सुक थे अथवा उन के बताए कार्यों का विवरण उन्हें दे रहे थे.

धीरेधीरे आकाश भी उन के निकट पहुंच गया और साथ में सुहास भी. शुक्लाजी दोनों को देख कर मुसकराए और उन का अभिवादन स्वीकार किया. आकाश से बोले, ‘‘अरे, आकाश, अच्छा हुआ तुम आ गए. भई वह तुम्हारा खास हलवाई चाहिए.’’

‘‘जी, भाईजी, उस से मैं बात करते हुए ही यहां आया हूं,’’ आकाश ने तुरंत कहा.

‘‘यह बहुत अच्छा किया,’’ शुक्लाजी गद्गद स्वर में बोले, ‘‘उस के हाथों में जादू है. उसे आज ही यहां बुला लो तो मैं उसे विस्तार से सब समझा दूंगा.’’

आकाश अपना मोबाइल आन कर के कुछ दूर चला गया.

सुहास ने अवसर देख कर झट से कहा, ‘‘भाईजी, मेरे योग्य कोई सेवा.’’

शुक्लाजी पुन: मुसकराए. एक व्यक्ति उन के पास खड़ा हो कर कुछ बातें धीरेधीरे करने लगा तभी आकाश आ गया और उन्हें हलवाई के बारे में बताने लगा.

सुहास को लगा कि शुक्लाजी के निकट पहुंचने के लिए अभी उसे धैर्य रखना पड़ेगा.

अचानक शुक्लाजी ने उस की तरफ देखा और अपने निकट बुलाया. सुहास प्रसन्नता से खिल उठा. शुक्लाजी बोले, ‘‘सुना है आप की जानपहचान का दायरा बहुत बड़ा है. हर जाति, हर धर्म वालों से बहुत अच्छे संबंध हैं.’’

‘‘जी हां, भाईजी,’’ सुहास ने दोनों हाथ जोड़ दिए.

‘‘हमें आप जैसे नवयुवकों की ही जरूरत है. आप हमारे चुनावी अभियान में बहुत सहायता कर सकते हैं.’’

‘‘आप आज्ञा दीजिए, भाईजी,’’ सुहास के मन में प्रसन्नता की लहर किसी झरने सी बह चली थी जो थमने का नाम ही नहीं ले रही थी. शुक्लाजी ने भी उसी उत्साह से कहा, ‘‘अभी तो आप पार्टी के लिए जेनरेटर वालों को साधिए, बहुत जरूरी है. आजकल बत्ती कब गुल हो जाए पता नहीं चलता.’’

सुहास ने उसी समय से कार्य पर जुट जाना अपना परम कर्तव्य समझा और वहां से द्रुत गति से चल पड़ा.

पुरवा के बुटीक का उद्घाटन करने के लिए मां ने शहर की प्रमुख समाज सेविका मनोरमा जैन को बुलाया था. उन के अलावा और भी गण्यमान्य लोग आने वाले थे. उद्घाटन के बाद जलपान की व्यवस्था थी.

बुटीक फूलों व आम के पत्तों से सजा हुआ था. ऊपर नया बोर्ड चमक रहा था जिस पर लिखा था : ‘पुरवाई बुटीक.’

अतिथि आने लगे थे. इस अवसर पर पुरवा के मम्मीपापा भी आए थे. सुहास की मां और पापा बड़ी बेचैनी से उस की प्रतीक्षा कर रहे थे. पुरवा भी मन ही मन सुहास के लापरवाह स्वभाव पर खीज रही थी. कई बार सुहास ने मोबाइल खरीदने की इच्छा जाहिर की थी पर पुरवा ने फुजूल खर्च कह कर रोक दिया था, पर इस समय उस को लग रहा था कि सुहास से निरंतर संपर्क बनाए रखने के लिए उस की यह इच्छा भी पूरी कर ही दी जानी चाहिए. आज पुरवा का बहुत बड़ा स्वप्न पूरा हो रहा था, इसलिए उस की प्रसन्नता का कोई अंत नहीं था. ऐसे में वह सुहास की हर गुस्ताखी नजरअंदाज करने को तैयार थी.

जब पंडाल पूरी तरह भर गया और मनोरमा जैन पधार गईं तब मां ने पुरवा से पूछा, ‘‘अब क्या करें? सुहास तो अभी तक नहीं आया. उस की पार्टी के दफ्तर में 2 बार फोन किया पर वह कहां है यह पता नहीं चला.’’

पुरवा ने कुछ पल सोचा फिर बोली, ‘‘अब कार्यक्रम तो होगा ही मां, आप फीता कटवाइए.’’

मनोरमाजी ने चमकती हुई नई कैंची से फीता काट कर ‘पुरवाई बुटीक’ का उद्घाटन किया और तालियों की गड़गड़ाहट में बधाइयों का तांता लग गया.

मां ने प्यार से पुरवा को गले लगा लिया तो दोनों की आंखें मारे खुशी के भीग गईं. 2 पीढि़यों में कुछ कर गुजरने के उत्साह का वह अनोखा संगम था. पुरवा की मम्मी ने उसे प्यार करते हुए कहा, ‘‘अगर आप पुरवा को इस तरह नहीं संभालती तो यह दिन अभी नहीं आता.’’

जलपान के बाद एकएक कर के सभी विदा हो गए. मनोरमाजी ने सब को संबोधित करते हुए जो भाषण दिया था उस का टेप भी संभाल कर रख लिया गया. पुरवा इस महत्त्वपूर्ण दिन की हर बात संजो कर रखना चाहती थी. इसीलिए एक फोटोग्राफर भी बुला लिया गया था.

अपने बुटीक में बैठ कर पुरवा बारबार सोच रही थी कि आखिर वह कुछ कर पाने में सफल हो ही गई है. कहां सोचा था उस ने कि नौकरी करने की जिद करतेकरते एक दिन वह अपना व्यवसाय शुरू कर देगी. सचमुच जीवन कब कौन सा रंग दिखाए यह सोचना कठिन है. लग रहा था कि खेल ही खेल में उस के हाथों में जिंदगी का मकसद आ गया है.

बहुत देर बाद सुहास ने चहकते हुए घर में कदम रखा, ‘‘देखो तो पुरवा, मैं तुम्हारे लिए क्या उपहार लाया हूं.’’

उस के एक हाथ में फूलों का गुलदस्ता था और दूसरे में एक लिफाफा. पुरवा के कुछ बोलने से पहले ही मां ने कुछ क्रोध से कहा, ‘‘अब घर की याद आई है. सारे मेहमान तुम्हारी प्रतीक्षा कर के चले गए.’’

‘‘इतनी लापरवाही अच्छी बात नहीं है,’’ पापा ने भी रुष्ट स्वर में कहा.

‘‘सौरी पापामम्मा, पर आप सुनेंगे तो आप का सारा क्रोध अपनेआप दूर हो जाएगा,’’ सुहास ने उन्हें मनाने के स्वर में कहा. फिर वह पुरवा के हाथ में गुलदस्ता पकड़ाते हुए बोला, ‘‘नई कामयाबी की बधाई.’’

‘‘धन्यवाद सुहास, इस सफलता के हिस्सेदार तुम भी हो.’’

‘‘हां, तभी तो…’’ उस ने चहक कर दूसरे हाथ का लिफाफा पुरवा को पकड़ा दिया, ‘‘देखो तो अपना उपहार.’’

‘‘क्या है यह?’’ पुरवा उसे खोलने लगी.

सुहास अदा के साथ हंसने लगा तो मांपापा ने उत्सुकता से कहा, ‘‘ऐसा क्या है जो इतनी अदा से मुसकरा रहा है.’’

पुरवा ने तब तक अंदर से कागज निकाल लिया था. पढ़तेपढ़ते वह भी मुसकरा पड़ी, ‘‘अरे, यह तो हमारी बुटीक के लिए बहुत बड़ा आर्डर है.’’

अब तो मांपापा भी सारा क्रोध भूल कर प्रसन्नता से खिल उठे थे.

‘‘थैंक्स सुहास, बहुत बड़ा उपहार दिया है तुम ने.’’

रात को सोने से पहले सुहास ने पुरवा से क्षमायाचना करते हुए कहा, ‘‘नाराज तो नहीं हो न?’’

पुरवा ने पहले ही सोच लिया था कि आज वह अपनी खुशी में ग्रहण नहीं लगने देगी, इसीलिए हंस कर बोली, ‘‘नहीं सुहास, तुम काम ही तो कर रहे थे.’’

सुहास ने चैन से आंखें मूंद लीं और कहा, ‘‘कल एक और बड़ा कार्य करना है पुरवा.’’

‘‘वह क्या?’’ पुरवा ने पूछा.

‘‘भाईजी ने सुझाया है कि मैं पार्षद के लिए नामांकनपत्र भर दूं तो शायद कल यह कार्य भी हो जाए.

पुरवा लेटतेलेटते उठ कर बैठ गई, ‘‘सच?’’

‘‘तुम्हें अच्छा लगा पुरू?’’ पुरवा का उत्साहित चेहरा देख कर सुहास भी खुश हो गया.

‘‘हां, सुहास,’’ पुरवा की आंखों में एक अनोखी सी चमक कौंध उठी थी. उस चमक के बीच कहीं भूलेबिसरे सपनों के जाग उठने की आहट भी थी.

पार्टी आफिस में बहुत गहमागहमी थी. निर्वाचन को कुल 2 दिन शेष थे. प्रचार का कार्य भी बस, समाप्त होने को था. सुहास जैसेजैसे इस नए कार्यक्षेत्र में धंसता जा रहा था, वैसेवैसे उस का रोमांच भी बढ़ रहा था. हर पल उस को लगता था कि शायद वह इसी कार्य को सब से अधिक लगन से कर सकता है.

पुरवा ने उसे मोबाइल अपनी तरफ से उपहार में देते हुए कहा, ‘‘यह ‘पुरवाई बुटीक’ के उद्घाटन की खुशी में मेरी ओर से तुम्हारे लिए.’’

‘‘इस की आजकल बहुत जरूरत थी पुरवा, पर मुझे स्वयं क्यों नहीं यह खयाल आया?’’

पुरवा मुसकरा कर बोली, ‘‘पत्नी इसीलिए तो होती है कि भूलीबिसरी बातों का ध्यान रख सके.’’

सुहास ने प्यार से उस के कपोल का चुंबन ले लिया और कहा, ‘‘तुम देखना पुरवा, अब मैं सचमुच कुछ बन कर दिखाऊंगा. बस, तुम इसी तरह सदा मेरा उत्साह बढ़ाती रहना.’’

बहुत दिनों बाद पुरवा को सुहास में अपना पुराना प्रेमी और पति नजर आया था. सुहास को भी लगने लगा था कि वही पुरानी पुरवा हर पल उसे साथ देने को हर मोड़ पर खड़ी है.

प्रचार का कार्य समाप्त हो चुका था. सुहास देर रात से घर पहुंचा तो पता चला कि पुरवा को सब अस्पताल ले गए हैं. मांपापा दोनों घर पर नहीं थे. नौकर ने बताया कि सागर और बेला भी साथ ही गए हैं.

‘‘और मुझे खबर नहीं दी गई,’’ सुहास परेशान हो उठा.

‘‘बहूरानी ने मना कर दिया था,’’ घर के पुराने नौकर बंशी ने कहा.

सुहास जल्दी से अस्पताल पहुंचा. पुरवा ‘लेबररूम’ में थी. मां ने उसे देखते ही कहा, ‘‘पुरवा जानती थी कि आजकल तुम वास्तव में बहुत व्यस्त हो इसीलिए उस ने तुम्हें अभी फोन न करने के लिए मना किया था.’’

सागर और बेला ने सुहास की परेशानी भांपते हुए समझाया, ‘‘भई, हमेशा तुम दूसरों के लिए दौड़ते हो तो आज हमें भी तो अवसर मिलना चाहिए न.’’

‘‘फिर भी, इस समय उस को मेरे साथ की सख्त जरूरत होगी.’’

‘‘पुरवा तुम्हारा यह हाल देखती तो मन ही मन खुश जरूर होती,’’ बेला ने मजाक किया.

‘‘इस समय मैं उस से मिल तो सकता हूं,’’ सुहास ने व्यग्रता से कहा.

‘‘नहीं, वह लेबररूम में है,’’ मां ने सुहास को समझाया.

इतनी देर में पुरवा के मम्मीपापा भी वहां पहुंच गए. सब को प्रतीक्षा थी एक शुभ समाचार की.

रात 10 बजे के लगभग सुहास का मोबाइल बज उठा. उधर से आकाश था.

‘‘कहो, आकाश?’’ सुहास टहलते हुए कुछ दूर चला गया था. आकाश की घबराई हुई आवाज आई, ‘‘जल्दी चले आओ सुहास. यहां दूसरी पार्टी वालों से झड़प में गोली चल गई है.’’

‘‘क्या?’’ सुहास परेशान हो बोला, ‘‘किसी को लगी तो नहीं?’’

‘‘भाईजी की बांह चीर कर गोली निकल गई है. हम उन्हें ले कर सिटी अस्पताल जा रहे हैं,’’ आकाश ने कहा.

‘‘मैं सिटी अस्पताल में ही हूं. तुम पहुंचो जल्दी,’’ सुहास ने बेचैनी से सामने देखा. परिवार वाले चिंता में या तो टहल रहे थे या बैठेबैठे करवट बदल रहे थे.

बड़ा विचित्र सा अनुभव था सुहास के लिए. पत्नी एक जीव को धरती पर लाने के लिए अपने जीवन से संघर्ष कर रही थी. दूसरी तरफ उस का नया कार्यक्षेत्र उसे बुला रहा था. उसे बारबार पुरवा के साथ की जरूरत महसूस हो रही थी. एक वही तो है जो सुहास को हर अवस्था में मानसिक सहारा देती है.

सुहास का मन अपने लिए ही छटपटा उठा. यह कैसी बेचारगी है. पुरवा ठीक ही कहती है कि आगे बढ़ते समय इधरउधर नहीं देखते हैं. बढ़ने का मतलब है बस अपने लक्ष्य को साधना. उस समय पुरवा की बात याद कर के उस के व्याकुल मन को बड़ी राहत सी महसूस हुई. वह धीरेधीरे चल कर पापा के पास पहुंचा और बोला, ‘‘पापा, भाईजी को गोली लगी है और वह इसी अस्पताल में आ रहे हैं. मैं जरा देख कर आता हूं.’’

सुहास चला गया पर परिवारजन के मन में नई उथलपुथल छोड़ गया. एक तरफ वे लोग पुरवा के लिए चिंतित थे दूसरी तरफ यह एक नया तूफान. देर तक खामोशी रही. सब से पहले पुरवा के पापा ने कहा, ‘‘यह राजनीति का खेल भी अब बहुत खराब होता जा रहा है.’’

‘‘अभी क्यों, यह तो हमेशा से ऐसा ही है,’’ सुहास के पापा ने चिंता व्यक्त की.

‘‘अब सुहास को कौन समझाए. अच्छाभला काम शुरू किया, पर सब छोड़छाड़ कर राजनीति में कूद पड़ा,’’ पुरवा की मम्मी व्यग्रता से बोलीं.

मां चुपचाप सुनती रहीं. उन का सारा ध्यान पुरवा की ओर लगा हुआ था.

भाईजी को रात भर के लिए अस्पताल में ही रोक लिया गया. गोली बांह को चीरती हुई निकल गई थी अत: पट्टी बांध कर उन्हें रात भर डाक्टरी निरीक्षण में रखा गया था, पर वह वापस जाने की जिद कर रहे थे. इतने कष्ट में भी उन्हें बस, होने वाले चुनाव की चिंता थी.

सुहास का आधा ध्यान पुरवा में लगा हुआ था पर तुरंत वापस जाना भी संभव नहीं था.

पार्टी के काफी सदस्य वहां उपस्थित थे. कलपरसों क्या करना है, आगे क्या होने वाला है इसी विषय पर चर्चा कर रहे थे.

सुहास की चिंतित मुद्रा देख कर आकाश निकट आ गया. उस की पीठ पर सांत्वना का स्पर्श भरा हाथ रख कर बोला, ‘‘भाईजी तो रात भर यहीं रहने वाले हैं. तुम्हें अभी भाभीजी के पास होना चाहिए.’’

सुहास ने विवशता से उसे देखा और कहा, ‘‘मैं 23 नंबर के कमरे में हूं, जरूरत पड़े तो फौरन बुला लेना.’’

वहां पहुंचते ही सब के खिले हुए चेहरे देख सुहास उत्सुकता से बोला, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘बधाई हो, तुम्हें पापा कहने वाली प्यारी सी गुडि़या आ गई है,’’ मां ने जैसे ही बताया वह कमरे की ओर दौड़ा तो पापा ने टोका, ‘‘अभी वार्डरूम में आने वाली है. सागर और बेला उसे लेबररूम से ले कर आ रहे हैं.’’

सुहास का मन पुरवा और अपनी बच्ची को देखने के लिए व्याकुल हो रहा था. पुरवा की मम्मी भी स्ट्रेचर के साथ ही आ रही थीं. आते ही सुहास को उन्होंने व सागर और बेला ने भी बधाई दी, कुछ देर के लिए सब ने उसे अकेले ही कमरे में जाने दिया.

पुरवा उसे देख कर धीरे से मुसकराई. बच्ची को झुक कर प्यार करते हुए सुहास बोला, ‘‘कैसी हो?’’

‘‘मेरी पदोन्नति हो गई है. पत्नी थी, अब मां भी बन गई हूं.’’

‘‘और मेरी भी तो हो गई है,’’ सुहास ने उस के माथे का चुंबन लेते हुए अपनी खुशी जाहिर की. तभी नर्स वहां आ गई. बोली, ‘‘लक्ष्मी आई है आप के घर. बहुत सुंदर बेबी है.’’

अस्पताल से घर आने तक सुहास अधिकतर पुरवा के निकट ही बना रहा. भाईजी चूंकि उसी अस्पताल में थे अत: उसे अधिक देर को कहीं नहीं जाना पड़ता था, पर पुरवा को घर पहुंचा कर उस का कार्य भाईजी के लिए बढ़ गया. पार्टी के लिए अब सुहास आकाश से भी अधिक विश्वसनीय हो गया था.     -क्रमश:

कुंआरों को खुशी का हक

अविवाहित व्यक्ति का खुशी से दूर का भी वास्ता नहीं. यही नहीं, अविवाहित होना एक विकट समस्या है. जब तक इस का समाधान नहीं होता, तो खुशी पाने या ढूंढ़ने का कोई हक ही नहीं. अविवाहित कवियों या गणितज्ञों की तरह ही होते हैं जो कल्पनालोक में रहते हैं या प्रश्न हल करने में लगे रहते हैं. कुछ अविवाहित खुश रहते दिख सकते हैं, पर ऐसे विरले ही मिलेंगे. ज्यादातर दुखी हैं और अकेले ही जूझ रहे हैं.

लोगों का नजरिया

लोग यों घूर कर देखते हैं मानो अविवाहित व्यक्ति कोई अजूबा हो. अगर बेचारे के बाल सफेद हो रहे हो (जो कि आज के नौजवानों में भी आम बात हो गई है), तो बस आफत ही समझिए. लोगों की निगाहें इस तरह पीछे लगी रहती हैं जैसे बेचारे ने कत्ल कर दिया हो. हर निगाह यही पूछती सी लगती है कि क्या बात है? अब तो अंकलजी लगने लगे हो, फिर भी कुंआरे हो? जरूर कोई गड़बड़ है.

लड़की कुंआरी हो तो कोई बात नहीं, कहीं नौकरी कर रही हो तो उस की इज्जत और बढ़ जाती है. लोग सही कहते हैं कि देखो, कैसे घर चला रही है. या देखो, बेचारी शादी का प्रबंध भी खुद ही कर रही है. पर लड़का हो, तो लोग यही कहते हैं कि जरूर कुछ बुरी लतों में लगा होगा, वरना अच्छे लड़के क्या यों कुंआरे रहते हैं.

कुसूर क्या कुंआरों का

अब जब हर प्रतियोगिता की आयुसीमा बढ़ा दी गई है. विश्वविद्यालय आधे समय बंद रहते हैं तो जाहिर है कि हर काम देर से होगा. ऐसे में बेचारे लड़के का क्या कुसूर है जो अभी अकेला ही है. पर नहीं, जमाना तो गिद्ध की निगाह डाल रहा है कि देखो, इतना लूमड़ हो गया है, नालायक. अगर बेचारा बेकार हुआ तो लोग यह भी कह देंगे कि रिकशा चला डालो बेटा, क्योंकि गांधीजी कह गए हैं कि हर काम की अपनी शान है.

किराए पर मकान नहीं

कुंआरा कहीं बाहर नौकरी पा जाता है, तो और भी परेशानी. अकेले को घर क्या, कमरा देने में भी लोगों को एतराज होता है. खासतौर से उन को जिन के यहां जवान बेटियां हों. सब यही सोचने लगते हैं जैसे यह लफंगा रातदिन सिर्फ लड़कियां ताकेगा. शायद उस के पास और कुछ काम ही नहीं है.

कुछेक और आगे बढ़ जाते हैं और सोचते हैं कि इस के यहां सिर्फ इसी की तरह के कुंआरे धमकेंगे और देररात शराब की महफिलें होंगी और उन्हें व पड़ोसियों की लड़कियों को खासतौर से सुनासुना कर जोरजोर से वाहियात गाने गाए जाएंगे. हो सकता है ये बातें कुछ हद तक सही हों पर इतना तो सोचिए कि लड़कियां पास नहीं होंगी तो ये कुंआरे शादी करने के उत्तम अवसरों से वंचित रह जाएंगे. और बाद में, यही जमाने वाले उन से कहेंगे कि क्यों लल्ला, शादी क्यों नहीं की अब तक?

कितनी गलत नीति अपनाते हैं जमाने वाले. अजी, इसी तरह से तो हमें राष्ट्रीय एकीकरण के सुंदर अवसर मिलते हैं पर लोग हैं कि इन का लाभ भी नहीं उठाने देते.

कुंआरों पर संदेह

किसी तरह घर पा लिया तो बेचारे लड़के की शामत, क्योंकि काम करने वाली रखे तो पड़ोसी उसे संदेह की दृष्टि से देखने लगते हैं. लड़का नौकर रखे तो वह उस की चीजों पर अपना पैदाइशी हक समझने लगता है. उस पर, सब यही समझते हैं कि अकेला है, सो, खूब बढ़ाचढ़ा कर पैसे वसूल करो. शायद यह भी सोचते हैं कि पुरुष है, झगड़ा नहीं करेगा.

यही लोग महिला को देख कर वस्तुओं के दाम में कमी भी करते हैं और लपक कर काम भी करने लगते हैं. अगर बेचारा खुद काम करता है तो कहते हैं देखो, इतना कंजूस है. अगर सामान यों ही डाले रखें तो कहेंगे कि देखो, कितना गंदा रहता है. जरूर इस के परिवार में रहनसहन का ऐसा ही ढंग होगा.

और तो और, कहीं मिलने जाए और उस की जानपहचान में कोई कुंआरी हो, तो लोग तुरंत इस बालक की नीयत में खोट देखने लगेंगे, भले ही वह कन्या में जरा भी रुचि न रखता हो. तुरंत उस का घर में आनाजाना नियंत्रित होने लगेगा.

लड़कियों की मुसीबत

बालक पसंद आ गया (वैसे ऐसा बहुत कम होता है, क्योंकि हमारे यहां के मातापिता पचासों तरह से लड़कों की परीक्षा लेते हैं) तो तुरंत उस के घर वालों को घेरने में जुट जाएंगे. उधर, घर वाले यह सोचेंगे कि लो, जरा सा घर के बाहर क्या निकला कि कदम बहकने लगे, जैसे सारी गलती इसी की हो. अब बताइए कि इन सब परेशानियों से जूझता हुआ भला कौन खुश रह सकता है और अविवाहित महिलाओं की तो पूछिए ही मत.

वे बेचारी तो और भी दुखी होती हैं. कहीं अकेले रहने का सवाल ही नहीं, हालांकि पचासों ऐसे सज्जन मिलेंगे जो उन्हें घर देने को तैयार होंगे. अगर किसी रिश्तेदार के यहां टिकीं, तो भी हमारे दिलफेंक युवा तुरंत सेवा के लिए तैयार हो जाएंगे. अगर होस्टल में हैं तो 2-4 ऐसे फालतू युवा दरवाजे के आसपास नजर आने लगेंगे.

और तो और, छोटेछोटे सब्जी वाले भी उन को देख कर इमरान खान बनने लग जाते हैं. और रिकशे वालों की तो स्पीड महिलाओं को बैठाने के बाद तीनगुना हो जाती है. सहकर्मी बिना किसी काम के उन की मेज पर आने लगते हैं या फिर ऊंची आवाज में गंदे जोक्स सुनाएंगे. उस पर भी बेचारी को हमेशा खुशखुश तथा सुंदर नजर आना बहुत जरूरी होता है.

अविवाहित महिला का अफसर इस चक्कर में रहता है कि उसे देर तक रोके रखे. अविवाहित युवा का अफसर इस चक्कर में रहता है कि कैसे इस से घर का काम भी करवा लिया जाए. संगीसाथी इस चक्कर में होते हैं कि कैसे इस के यहां डेरा डाल कर मुफ्त में मौज उड़ाई जाए. किसी को भी यदि उस शहर में काम होगा तो झट इस बेचारे कुंआरे के यहां आ टपकेगा. फिर ठाट से जब चाहेगा आएगा, जब मन होगा जाएगा और उस का सामान भी इस्तेमाल करेगा. कोई विरोध या आपत्ति करने वाला है ही नहीं.

इसलिए वे दोएक चीजें भी उठा कर ले जा सकते हैं. ऐसे में गैस की समस्या सब से बड़ी है. बेचारे के गैस सिलैंडर पर सब की निगाहें रहती हैं. इस्तरी वगैरह तो जब चाहे मांग कर ले जाएं. और जब चाहें एकदो मेहमान उस के कमरे में ठहरा दें. अकेले का घर तो धर्मशाला के बराबर है. अब ऐसे में एक अविवाहित अकेला न महसूस करे तो क्या करे. वह यही सोचता है कि सब उस के अविवाहित होने का लाभ उठा रहे हैं पर वह दूसरों के विवाहित होने का लाभ नहीं उठा पाता.

खैर नहीं कुंआरे व कुंआरियों की

अब यदि ऐसा ही एक अकेला एक अपनी ही जैसी अकेली से मिल जाए तो तुरंत दिल की घंटी बजने लगती है. पर वहां भी यह जालिम जमाना बीच में आ जाता है. फौरन ही अफवाह उड़ जाती है कि फलांफलां के बीच कुछ चल रहा है. शादीशुदा यह सलाह देने लगते हैं कि मोहब्बत जरा सोच कर करो और कुंआरे या कुंआरियों दोनों के बीच खाई डालने की सोचते हैं कि कहीं उन का मामला ठीक न बैठ जाए. मातापिता फटाफट अपनी ही बिरादरी में शादी करने का जुगाड़ करने में लग जाते हैं.

कुंआरों का दर्द

आपाधापी में बेचारे कुंआरे और कुंआरियां यह भूल जाते हैं कि उन की मित्रता हुई है. अभी प्रेम होने में देर है. ज्यादातर मामलों में टांयटांय फिस हो कर हमारे अविवाहित फिर दुखी हो जाते हैं. मतलब यह कि हर व्यक्ति चाहता यही है कि अविवाहित तुरंत शादी कर ले, पर हर तरह से उस की शादी होने में बाधा डाल कर उसे दुख देता रहता है. पर आशा की एक ही किरण है कि देरसबेर ज्यादातर दुखी अविवाहित शादी कर के दुखी विवाहित हो जाते हैं.

हां, उन कुंआरों की बात जरा पेचीदा है क्योंकि जिन कन्याओं को वे देखते हैं, वे उन की तरफ कम देखती हैं और जिन कुंआरों की तरफ देखती हैं, उन्हें वे नहीं देखते. इसलिए अभी भी दोनों ही अविवाहित बने हुए हैं.

मगर वो सुनयना कहां है जो इन कुंआरों को देख रही हो, जब हम भी उसे ताक रहे हों. कहीं आप तो नहीं? अगर हैं तो तुरंत संपर्क करें और समस्या का समाधान कर लें.

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