महाभारत मूलतया एक राजनीतिक उपन्यास है जो यह धारणा तथ्य में बदलता है कि राजनीति छल, द्वेष, प्रतिशोध और हिंसा का दूसरा नाम है और सत्ताप्राप्ति के लिए किया गया अधर्म भी धर्म है. मौजूदा भारतीय राजनीति इस का अपवाद नहीं है जिस में सभी राजनेता, खासतौर से शासक वर्ग 1950 के संविधान की अवहेलना कर महाभारत के संविधान का ही अनुसरण कर रहे हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि लोकतंत्र के चलते वे पूरी तरह निरंकुश नहीं हो पा रहे हैं, लेकिन आंशिक रूप से ही सही, हो रहे हैं.

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