महाभारत मूलतया एक राजनीतिक उपन्यास है जो यह धारणा तथ्य में बदलता है कि राजनीति छल, द्वेष, प्रतिशोध और हिंसा का दूसरा नाम है और सत्ताप्राप्ति के लिए किया गया अधर्म भी धर्म है. मौजूदा भारतीय राजनीति इस का अपवाद नहीं है जिस में सभी राजनेता, खासतौर से शासक वर्ग 1950 के संविधान की अवहेलना कर महाभारत के संविधान का ही अनुसरण कर रहे हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि लोकतंत्र के चलते वे पूरी तरह निरंकुश नहीं हो पा रहे हैं, लेकिन आंशिक रूप से ही सही, हो रहे हैं.

महाभारत के शांति पर्व के तहत राजधर्मानुशासन के अध्याय में भीष्म और युधिष्ठिर का संवाद बड़ा दिलचस्प है, जिस में भीष्म युधिष्ठिर को समझा रहे हैं कि :

-  विनयपूर्वक ब्राह्मणों को प्रसन्न करना राजा का सनातन कर्तव्य है.

-  यदि ब्राह्मणों के पास जीविका का अभाव हो तो राजा उन की जीविका का प्रबंध करे.

- खेती, पशुपालन और वाणिज्य ये तीनों सभी लोगों की जीविका के साधन हैं परंतु तीनों वेद ऊपर के लोकों में रक्षा करते हैं. वे ही यज्ञों द्वारा समस्त प्राणियों की उत्पत्ति और वृद्धि हेतु (वजह) हैं. इसलिए कौरवनंदन, तुम शत्रुओं को जीतो, प्रजा की रक्षा करो और नाना प्रकार के यज्ञ करो.

महाभारत और तमाम दूसरे सैकड़ों धर्मग्रंथों में इसी तरह के निर्देश राजाओं को ऋ षियों ने दिए हैं कि वे ब्राह्मणों को दान दें. यज्ञहवन करें. पंडितों की रक्षा करें. उन्हें पालनेपोसने पर महज इसलिए खजाना लुटा दें कि वे जाति से ब्राह्मण हैं. शूद्रों को प्रताडि़त करें जिस से वे अपनी हैसियत न भूलें और गुलामी करते रहें. ऋषिमुनियों के भोगविलास का प्रबंध भी राजा करे और राज्य में सालभर भव्य व खर्चीले आयोजन होते रहें जिस से प्रजा अपने अधिकारों की बात न सोच पाए और पंडेपुजारियों की झोली अपनी मेहनत की कमाई से भरते हुए खुद कंगाली में जीती रहे.

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