महाभारत मूलतया एक राजनीतिक उपन्यास है जो यह धारणा तथ्य में बदलता है कि राजनीति छल, द्वेष, प्रतिशोध और हिंसा का दूसरा नाम है और सत्ताप्राप्ति के लिए किया गया अधर्म भी धर्म है. मौजूदा भारतीय राजनीति इस का अपवाद नहीं है जिस में सभी राजनेता, खासतौर से शासक वर्ग 1950 के संविधान की अवहेलना कर महाभारत के संविधान का ही अनुसरण कर रहे हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि लोकतंत्र के चलते वे पूरी तरह निरंकुश नहीं हो पा रहे हैं, लेकिन आंशिक रूप से ही सही, हो रहे हैं.

महाभारत के शांति पर्व के तहत राजधर्मानुशासन के अध्याय में भीष्म और युधिष्ठिर का संवाद बड़ा दिलचस्प है, जिस में भीष्म युधिष्ठिर को समझा रहे हैं कि :

–  विनयपूर्वक ब्राह्मणों को प्रसन्न करना राजा का सनातन कर्तव्य है.

–  यदि ब्राह्मणों के पास जीविका का अभाव हो तो राजा उन की जीविका का प्रबंध करे.

– खेती, पशुपालन और वाणिज्य ये तीनों सभी लोगों की जीविका के साधन हैं परंतु तीनों वेद ऊपर के लोकों में रक्षा करते हैं. वे ही यज्ञों द्वारा समस्त प्राणियों की उत्पत्ति और वृद्धि हेतु (वजह) हैं. इसलिए कौरवनंदन, तुम शत्रुओं को जीतो, प्रजा की रक्षा करो और नाना प्रकार के यज्ञ करो.

महाभारत और तमाम दूसरे सैकड़ों धर्मग्रंथों में इसी तरह के निर्देश राजाओं को ऋ षियों ने दिए हैं कि वे ब्राह्मणों को दान दें. यज्ञहवन करें. पंडितों की रक्षा करें. उन्हें पालनेपोसने पर महज इसलिए खजाना लुटा दें कि वे जाति से ब्राह्मण हैं. शूद्रों को प्रताडि़त करें जिस से वे अपनी हैसियत न भूलें और गुलामी करते रहें. ऋषिमुनियों के भोगविलास का प्रबंध भी राजा करे और राज्य में सालभर भव्य व खर्चीले आयोजन होते रहें जिस से प्रजा अपने अधिकारों की बात न सोच पाए और पंडेपुजारियों की झोली अपनी मेहनत की कमाई से भरते हुए खुद कंगाली में जीती रहे.

5 राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों को हर कोई अपने नजरिए से देख रहा है जिस में सुखद हैरानी की बात यह है कि कोई भी इन बातों से इनकार नहीं कर पा रहा कि इस में हिंदुत्व या राममंदिर निर्माण नहीं था, गौरक्षा के नाम पर बेकुसूर मुसलमानों और दलितों की हत्या से उपजा आक्रोश नहीं था. 2,989 करोड़ रुपए की कीमत वाली चीन में बनी सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति पर आम लोगों का ध्यान नहीं था, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की चुनावप्रचार में अनर्गल पौराणिक बयानबाजी नहीं थी और सब से ज्यादा अहम बात जो ऐसे कई मुद्दों का सार है कि नरेंद्र मोदी सरकार साढ़े 4 सालों से नागपुर के आरएसएस मुख्यालय से नहीं चल रही थी.

ये चुनाव खासतौर से मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे हिंदीभाषी राज्यों के लिए इस लिहाज से अहम थे कि वे 2019 के लोकसभा चुनाव की बाबत वोटर का मूड दिखाएंगे, इस लिहाज से और ज्यादा अहम हो गए थे कि क्या देश की जनता सनातन धर्मवर्ण व्यवस्था और ब्राह्मण पूजा को स्वीकृति देती है या नहीं, जिस की प्रत्यक्ष कोशिशें नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही शुरू हो गई थी.

नतीजों का अहम पहलू

3 हिंदीभाषी राज्यों और 2 गैरहिंदी राज्यों में मुद्दे कहने को ही राजनीतिक थे पर हकीकत में लड़ाई 2 विचारधाराओं के बीच थी और ऐसी थी कि चुनावी शोरशराबे में डूबे मतदाता समाचारपत्रों या चैनलों से अपने मन की बात नहीं कह पाए पर जब ईवीएम मशीनें खुलीं तो साफ हो गया कि ज्यादा लोगों ने अपने विवेक की आवाज पर ही वोट डाला था. वे हिंदुत्व के पाखंडों से छुटकारा पाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने भाजपा के बजाय कांग्रेस को चुना.

नतीजे यह तो बताते हैं कि ऐसे लोगों की तादाद अभी बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन इतनी तो है कि वे लोकतंत्र को कायम रख सकें. नतीजों के बाद विश्लेषकों के लिए विश्लेषण करना बड़ा आसान काम होता है ठीक वैसे ही जैसे घुड़दौड़ के बाद यह बताना कि अमुक घोड़ा क्यों जीता और फलां क्यों हारा.

मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस को बहुमत से 2-2 सीट से दूर रहना पड़ा. इस की वजह जानने के लिए बहुत गहराई में जाना जरूरी है, क्योंकि ये चुनाव महज एक राजनीतिक घटना नहीं थे बल्कि एक बहुत बड़ा बदलाव है. जिस की वजह भाजपा का सनातनी एजेंडा ज्यादा है जिस के प्रभाव से तीनों राज्यों के मुख्यमंत्री खुद को अलग नहीं रख पाए औैर उस का हिस्सा बन कर अपनी हार की वजह बने. यह भी न भूलें कि 2014 के मुकाबले भाजपा को मध्य प्रदेश में 55 प्रतिशत के मुकाबले 41 प्रतिशत वोट मिले और राजस्थान में 2014 के मुकाबले 38.80 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ में 48.70 प्रतिशत के मुकाबले 33 प्रतिशत.

उदाहरण मध्य प्रदेश का लें तो बगैर किसी पूर्वाग्रह के कहा जा सकता है कि शिवराज सिंह चौहान ने वाकई कुछ ऐसी योजनाएं चलाई थीं जिन का फायदा आम लोगों को मिला था. शायद इसीलिए भाजपा इस राज्य में सम्मानजनक तरीके से हारी, उसे 230 में से 108 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस 114 पर अटक कर रह गई.

शिवराज सिंह चौहान के धार्मिक पाखंड उन्हें महंगे पड़ गए, जिन्होंने उन की विकास की छवि पर पौराणिक ग्रहण लगा दिया था. भाजपाई होने के नाते यह स्वाभाविक बात थी कि वे 13 साल धर्मकर्म की राजनीति विकास के समानांतर करते रहे, लेकिन विकास भी कोई ऐसा नहीं हुआ था कि लोग उन के धार्मिक पाखंडों को नजरअंदाज करने को मजबूर हो जाते.

अपनी धार्मिक आस्थाओं के सार्वजनिक प्रदर्शन की कीमत शिवराज सिंह चौहान को कुरसी गंवा कर चुकानी पड़ी. जनता के पैसों यानी सरकारी खजाने को उन्होंने बेरहमी से धार्मिक समारोहों में लुटाया और इतना ही नहीं, यह जताने की नाकाम कोशिश भी की कि जो थोड़ीबहुत खुशहाली है, वह धर्म की वजह से है.

अपनी चर्चित 148-दिवसीय नमामि देवी नर्मदे यात्रा के दौरान शिवराज सिंह चौहान ने तबीयत से पंडेपुजारियों को दानदक्षिणा दी. नर्मदा नदी के किनारे घाटघाट पर पूजाअर्चना की. घंटेघडि़याल बजाए तो साफ लगा कि वे भी भीष्म के निर्देशों पर चल रहे हैं कि राजा ब्राह्मणों की जीविका का प्रबंध करे. बात यहीं खत्म नहीं हो जाती. उन्होंने 4 साधुसंतों को मंत्री का दर्जा भी दे दिया. यह और बात है कि इस पर खूब विवाद हुए लेकिन तब तक शिवराज सिंह का पाखंडी चेहरा उजागर हो चुका था.

हुआ यों, पंडेपुजारियों ने और मुफ्त की मलाई की मांग करते उन पर चढ़ाई शुरू कर दी. मंदिरों के पुजारी उन से खैरात मांगते जगहजगह उन के खिलाफ सार्वजनिक प्रदर्शन करते नजर आए.

दर्शनशास्त्र से स्नातकोत्तर शिवराज सिंह चौहान भूल गए कि वे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत चुने गए मुख्यमंत्री हैं, उन्हें किसी वशिष्ठ या द्रोणाचार्य ने नियुक्त नहीं किया है. यह भूल उन्हें कितनी महंगी पड़ी, यह 11 दिसंबर को उजागर भी हुआ.

अपने पूरे कार्यकाल में वे धर्मगुरुओं की खुशामद करते रहे और जब भी किसी संवदेनशील मुद्दे ने सिर उठाया तो आरएसएस के इशारे पर फैसले लेते रहे. उज्जैन कुंभ के दौरान भी शिवराज सिंह चौहान पूरे धार्मिक रंग में थे. यहां भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और आरएसएस ने मिल कर सामाजिक समरसता का नारा दिया था जिस के तहत भगवा खेमे के नेताओं और संतों ने दलित संतों के साथ डुबकी लगाई थी और उन के साथ खाना भी खाया था.

यह वह वक्त था जब नरेंद्र मोदी का पौराणिक चेहरा सामने आने लगा था और भाजपा का दलित प्रेम कितना बड़ा छल है, यह भी उजागर होने लगा था. उन्हीं दिनों जगहजगह दलित अत्याचार शबाब पर थे, दलितों की जगहजगह पिटाई की जा रही थी, दलित दूल्हों को घोड़ी पर चढ़ने नहीं दिया जा रहा था, उन्हें सलीके के कपड़े और जूते पहनने तक पर प्रताडि़त किया जा रहा था. और तो और, उन्हें नाइयों के यहां हजामत करवाने पर भी पीटा जा रहा था.

यह इत्तफाक नहीं था कि ऐसा भाजपाशासित प्रदेशों गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान वगैरह में ज्यादा हो रहा था. यह हार्ड हिंदुत्व का वह नजारा था जिस का वर्णन धर्मग्रंथों में इफरात से है.

बहरहाल, शिवराज सिंह चौहान की हालत उस फिजीशियन और सर्जन जैसी हो गई थी जो अच्छी तरह जानतासमझता है कि दिल की धड़कन रुकने से मौत होती है, लेकिन धर्मग्रंथों को वह नकार नहीं पाता और मानता है कि इसी शरीर में कहीं आत्मा रहती है जो होती तो है पर दिखती नहीं.

ऐसा कोई सप्ताह नहीं गया होगा जब शिवराज सिंह ने किसी मंदिर में पूजापाठ न की हो. मतदान के बाद तो हवा भांपते वे इतने घबरा गए थे कि हर ब्रैंडेड मंदिर में जा कर उन्होंने पूजाअर्चना और अनुष्ठान किए और जहां खुद नहीं जा पाए, वहां उन की पत्नी साधना सिंह गईं.

साफ है कि धार्मिक ढकोसले शिवराज सिंह को महंगे पड़े जो दलितों को पुजारी बनाने तक की बात करने लगे थे. लेकिन ब्राह्मणों के विरोध के चलते वे ऐसा कर नहीं पाए. हालांकि यह बात दलितों के भले की ही थी, लेकिन हुआ वही जो धर्मग्रंथों में लिखा है कि दान का हकदार केवल ब्राह्मण हैं. दलितों को पुजारी बनाने की बात पर ब्राह्मणों ने उन्हें खुलेआम श्राप भी दिया था जो 11 दिसंबर को फलीभूत भी हुआ तो इस की वजह ब्राह्मण वोटों का भाजपा से किनारा कर लेना था, जिस की बड़ी वजह एट्रोसिटी एक्ट भी बना.

बनियों और ब्राह्मणों की पार्टी कही जाने वाली भाजपा ने जब संसद में सुप्रीम कोर्ट का फैसला बदलते एट्रोसिटी एक्ट बहाल किया था तो ऊंची जाति वालों ने जम कर बवाल मचाया था. इस के पहले सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर 2 अप्रैल को हुई हिंसा से दर्जनभर दलित मारे गए थे. इत्तफाक से दलित विद्रोह का केंद्र भी मध्य प्रदेश रहा था. लेकिन यह कहना गलत होगा कि केवल सवर्ण वोट के कारण भाजपा हारी क्योंकि मध्य प्रदेश अकेले में भाजपा ने 2014 के मुकाबले 14 प्रतिशत वोट खोए जो सारे सवर्णों के नहीं हो सकते.

संसद में दलितों के सामने भाजपा ने घुटने टेके थे. तो सवर्णों ने ऐलान कर दिया था कि अब वे भाजपा को वोट नहीं देंगे यह धौंस आरएसएस और भाजपा दोनों के लिए सिरदर्दी और चिंता की थी जिन के हाथ से दलित और सवर्ण दोनों छिटक रहे थे. तीनों राज्यों में इस मुद्दे का असर पड़ा और भाजपा को बड़े पैमाने पर दोनों ही तबकों के वोटों का नुकसान हुआ.

इसलिए विदा हुईं महारानी

राजस्थान में हालत थोड़ी अलग थी. मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया वाकई महारानियों की तरह पेश आईं और किसान, कर्मचारी व युवा वहां त्राहित्राहि करते रहे. वसुंधरा राजे पूरे 5 साल पूजापाठ और तंत्रमंत्र में उलझी रहीं. मतगणना वाले दिन भी वे बांसवाड़ा के त्रिपुरा सुंदरी के मंदिर में दिनभर कैद रही थीं, लेकिन जनता का फैसला पहले ही ईवीएम में कैद हो चुका था जिसे त्रिपुरा सुंदरी बदल नहीं पाई.

वसुंधरा राजे भगवान भरोसे ही सरकार चलाती रहीं, जिन की कोई पकड़ प्रशासन पर नहीं रही. राजस्थान की जनता उन से इस कदर नाराज थी कि चुनाव के काफी पहले से ही उन का विरोध जगहजगह होने लगा था. इस के अलावा उन के राज में ही सब से ज्यादा हत्याएं गौरक्षा के नाम पर हुईं और अफसोस की बात यह रही कि धार्मिक पूर्वाग्रहों के चलते वे किसी पीडि़त के यहां सांत्वना देने भी नहीं पहुंचीं. राजस्थान की जनता उन से काफी खफा और नाउम्मीद हो गई थी और शायद उन का भगवान भी जिस ने तंत्र, मंत्र और अनुष्ठानों के आह्वानों पर ध्यान नहीं दिया.

छत्तीसगढ़ में भाजपा की फजीहत

छत्तीसगढ़ में भाजपा की ऐतिहासिक फजीहत हुई. अब तक कि सब से कम सीटें उसे मिलीं. यहां रमन सिंह भी 3 बार से मुख्यमंत्री थे. वसुंधरा राजे की तरह वे भी प्रशासन से अपनी पकड़ खो चुके थे. लेकिन महज इसी वजह से भाजपा 90 में से 18 सीटों पर नहीं सिमटी, बल्कि इस में रमन सिंह की हिंदूवादी इमेज ने भी खासा असर डाला.

छत्तीसगढ़ में अंदरूनी लड़ाई हिंदू बनाम आदिवासी हो गई थी. भाजपा कार्यकर्ता तक यह मान बैठे थे कि अब आदिवासियों ने खुद को हिंदू मान लिया है. खुद रमन सिंह अधिकांश वक्त मंदिरों में पूजापाठ करते नजर आए और उन्होंने आदिवासी इलाकों में बड़े पैमाने पर धार्मिक आयोजन किए. इन में राजिम कुंभ और बस्तर का प्रसिद्ध दशहरा प्रमुख थे जिन्हें उन्होंने हिंदू चोला ओढ़ाने की कोशिश की.

नक्सल प्रभावित आदिवासी बाहुल्य इस राज्य में बढ़ती धार्मिक हलचल से आदिवासी दहशत में आ गए थे, क्योंकि वे घोषित तौर पर खुद को हिंदू नहीं मानते, बल्कि खुद की प्रकृति का उपासक मानते हैं. उन की शांत जिंदगी में हिंदूवादी संगठनों का बढ़ता दखल भाजपा की दुर्दशा की बड़ी वजह बना.

छत्तीसगढ़ के शहरी इलाकोें में जीएसटी को ले कर व्यापारियों की नाराजगी का खमियाजा भी भाजपा को भुगतना पड़ा और बढ़ती बेरोजगारी के अलावा धान उत्पादक किसानों की बदहाली भी उसे महंगी पड़ी.

रहीसही कसर योगी आदित्यनाथ ने चुनावप्रचार के दौरान यहां रामलला के ननिहाल होने का वास्ता देते मंदिर बनाने की बात कह कर पूरी कर डाली. रमन सिंह ने आदित्यनाथ के न केवल पैर छुए थे बल्कि उन की वैदिक विधिविधान से पुरोहितों की मौजूदगी में पूजा भी की थी.

धर्म के भरोसे हो चले रमन सिंह भी खारिज कर दिए गए तो कांग्रेस को बैठेबिठाए छप्पर फाड़ कर रिकौर्ड 68 सीटें मिल गईं.

इन राज्योंं के चुनावी नतीजे हर लिहाज से अहम हैं जो बड़े पैमाने पर 2019 के लोकसभा चुनाव पर भी असर डालेंगे, जिसे ले कर भगवा खेमे में खासी बेचैनी है, क्योंकि बाजी अब उस के हाथ से खिसकती नजर आ रही है.

दिलचस्प बात यह भी है कि इन्हीं तीनों राज्यों से साल 2013 में मोदी लहर शुरू हुई थी और इन्हीं राज्यों पर अटक कर कम भी हो गई है. अब मोदी विरोधी लहर दूसरे राज्यों में भी फैलनी तय दिख रही है.

वजनदार राहुल, हलके होते मोदी

5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में मुद्दे केवल प्रादेशिक या स्थानीय ही नहीं थे बल्कि वोटर ने बारीकी से नरेंद्र मोदी के साढ़े 4 साल के कार्यकाल का मूल्यांकन कर भी वोट डाला है. उसे बेहतर मालूम है कि यह वाकई सत्ता का सैमीफाइनल है और उस का वोट 2019 के लोकसभा चुनाव का एक्जिट पोल साबित होगा.

2014 से ही नरेंद्र मोदी और भाजपा से वैचारिक स्तर पर जूझ रहे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का भगवा खेमे ने बहुत हलके स्तर पर जा कर मजाक उड़ाया है, ठीक वैसे ही जैसे वैदिक काल में शूद्रों, अपाहिजों और महिलाओं का उड़ाया जाता था. यह राहुल गांधी का आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति ही कही जाएगी जो उन्होंने इस घटिया दुष्प्रचार के आगे घुटने नहीं टेके और उस का मुकाबला पूरी दृढ़ता व गंभीरता से करते हुए जता दिया कि अब पप्पू बनने की बारी भाजपा की है.

2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने जम कर राहुलसोनिया सहित पूरे गांधीनेहरू परिवार को कोसा था पर तब यह राजनीतिक मुद्दा था और एक हद तक प्रासंगिक भी था. इस के बाद भी तमाम राज्यों के चुनावप्रचार और अपनी चुनाव से इतर सभाओं में भी नरेंद्र मोदी ने यह सिलसिला छोड़ा नहीं तो लोग चकरा उठे कि अब कुछ करोधरो भी, कब तक अतीत में जीते रहोगे. जाहिर है लोग अपने वोट और समर्थन का सिला नरेंद्र मोदी से मांग और चाह रहे थे.

विधानसभा चुनाव प्रचार में भी नरेंद्र मोदी राहुल गांधी को कोसते रहे और एक सभा में तो उन्होंने अपनी न सही पर प्रधानमंत्री पद की मर्यादा भुलाते सोनिया गांधी को कांग्रेस की विधवा कह दिया तो लोगों ने तालियां नहीं बजाईं बल्कि उन की तरफ से और नाउम्मीद हो उठे. दरअसल, नरेंद्र मोदी पूरी जनता को भाजपा कार्यकर्ता समझने की भूल कर बैठे थे.

पूरे प्रचार में उन के पास अपनी उपलब्धियों के नाम पर गिनाने लायक कुछ ठोस नहीं था, क्योंकि उन्होंने ऐसा कुछ किया ही नहीं जिसे जनता के सामने जता कर वोट हासिल किए जा सकें. बड़ीबड़ी और चाशनी में डूबी बातें वे जरूर करते रहे, लेकिन 4 वर्षों में उस गंगा का पानी बहुत बह चुका है जिस की साफसफाई के वादे पर केंद्र सरकार अभी तक योजनाएं ही बना रही है और अरबों रुपए कागजों में फूंक चुकी है.

मिजोरम व तेलंगाना भी हारे

केवल हिंदी भाषी राज्यों में ही भाजपा मुंह के बल नहीं गिरी, बल्कि मिजोरम और तेलंगाना में भी उस की खासी फजीहत हुई. इन दोनों राज्यों में कांग्रेस को भी मुंह की खानी पड़ी. मिजोरम में वह सत्ता गंवा बैठी और तेलंगाना में उम्मीद के मुताबिक उसे सीटें नहीं मिलीं. यहां तेलुगूदेशम पार्टी से गठबंधन के  साथ उसे 119 में से महज 21 सीटें ही मिलीं. मिजोरम में भी वह 40 में से केवल 5 सीटें ही हासिल कर पाई.

भाजपा को इन दोनों ही राज्यों में एकएक सीट मिली जिस से साबित हुआ कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी, जो पूर्वोत्तर में छा चुकी थी, अब प्रभाव खोने लगी है और दक्षिण भारत भी उस के प्रभाव में आने से पहले उन से छिटकने लगा है. अब मिजोरम में एमएनएफ और तेलंगाना में फिर से चंद्रशेखर राव वाली टीआरएस 88 सीटें ले कर सत्ता पर काबिज हो गई है. टीआरएस भाजपा की पार्टी है क्योंकि चंद्रशेखर राव भी घोर अंधविश्वासी हैं. यह गलतफहमी है. राजेंद्र प्रसाद श्यामाचरण शुक्ल और संपूर्णानंद भी घोर अंधविश्वासी थे पर कांग्रेसी थे.

पंजाब, गुजरात और कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा के लिए यह कड़ा इम्तिहान था, क्योंकि राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ हिंदुत्व के पुराने गढ़ हैं. पूरे चुनावप्रचार में नरेंद्र मोदी इस द्वंद्व में दिखे कि जनता से क्या कहें, हिंदुत्व की बात करें, राहुल गांधी का मजाक बनाएं या फिर विकास की वे उपलब्धियां गिनाएं जो वजूद में हैं ही नहीं. साढ़े 4 वर्षों में उन की लोकप्रियता का ग्राफ कितना गिरा है कि वे पांचों राज्यों की उन की चुनावी सभाओं में कम होती भीड़ से भी दिखा.

लोग चाहते थे कि वे अपना किया बताएं, लेकिन नरेंद्र मोदी तो राहुल गांधी की आलोचना कर उन्हें नामदार और झूठों का शहंशाह कहते रहे. कांग्रेस को भी उन्होंने जम कर कोसा और 70 साल का बहीखाता खोल कर बैठ गए कि देखिए, एक ही परिवार के लोग देश में लूटखसोट करते रहे और अब हमें काम नहीं करने दे रहे.

यह बेचारगी की हद थी और जनता को बेवकूफ समझने की गलती भी जो यह पूछने और सोचने लगी है कि आप को सत्ता हम ने कुछ करने को दी है और आप हैं कि राहुल गांधी, नेहरू परिवार और कांग्रेस के सम्मोहन से बाहर ही नहीं आ पा रहे. 2016 तक मजबूत और करिश्माई नेता माने जाते रहे नरेंद्र मोदी का जादू बेवजह उतरता नहीं दिखा रहा.

क्यों और कैसे राहुल गांधी उन पर भारी पड़ रहे हैं, इस को समझने के लिए नरेंद्र मोदी के अब तक के कार्यकाल पर भी लोगों ने नजर डाली कि नोटबंदी एक बेतुका और सनकभरा फैसला था, जिस में न कालाधन वापस आया, न ही भ्रष्टाचार कम हुआ, न ही आतंकवाद थमा और न ही जाली नोट छपने बंद हुए.

देर से ही सही, अमीरों को यह समझ आया कि नरेंद्र मोदी ने उन्हें नोटबंदी के जरिए पापी ठहराते सजा दी है और जीएसटी के जरिए व्यापारियों को पापी के साथसाथ चोर भी ठहराया है. अब ये पाप धोने, मूर्तियों, गंगा स्नान, कुंभ मेले के जरिए भगवा खेमे ने साधुसंतों को ठेका दे दिया गया है यानी इन से छीना पैसा अब घूमफिर कर पंडेपुजारियों के पास चला जाएगा.

किसानों की बदहाली और जीएसटी के फैसले पर भी व्यापारीवर्ग की नाराजगी विधानसभा चुनाव में देखने में आई जिसे महाभारत के ही शांति पर्व के राजधर्मानुशासन के नजरिए से ही देखें तो भीष्म, युधिष्ठिर से यह भी कहते हैं कि:

– ऊंचे या नीचे भाव से माल खरीदने वाले और व्यापार के लिए दूरदराज के क्षेत्रों में जाने वाले वैश्य राज्य में भारी करों की भारी मार से पीडि़त हो कर बेचैन तो नहीं हो रहे, यह देखना राजा का कर्तव्य है.

– किसान लोग अधिक लगान दिए जाने के कारण अत्यंत कष्ट पा कर राज्य छोड़ कर तो नहीं जा रहे, क्योंकि किसान ही राजाओं का भार ढोते हैं और वे ही दूसरे लोगों का भरणपोषण करते हैं.

किसानों की बदहाली

भले ही व्यापार और किसानी का तरीका बदल गया हो, लेकिन मोदीराज में उन की बदहाली वही है जिस की चेतावनी भीष्म ने युधिष्ठिर को दी है. नरेंद्र मोदी ने ब्राह्मणों के भरणपोषण वाला सबक तो याद रखा, लेकिन व्यापारियों और किसानों वाले सबक पर ध्यान नहीं दिया कि जीएसटी से व्यापारी व्यापार छोड़ देने की हद तक त्रस्त हैं और किसान चूंकि कहीं और नहीं जा सकते, इसलिए भुखमरी से तंग आ कर आत्महत्या कर रहे हैं या फिर शहरों की तरफ भाग कर मेहनतमजदूरी करते जैसेतैसे पेट भर पा रहे हैं. उन की जमीनें या तो ऊंची जाति वालों ने हथिया ली हैं या फिर औनेपौने दामों में खरीद ली हैं.

आम लोगों की परेशानियों से बेपरवाह नरेंद्र मोदी महंगी से महंगी मूर्तियां गढ़वा रहे हैं. हर जगह पूजापाठ कर रहे हैं, गंगा की सफाई के नाम पर अरबों रुपए फूंक रहे हैं. कांग्रेस नेता शशि थरूर का यह ताना सटीक ही लगता है कि मोदीराज में मुसलिमों के मुकाबले गायें ज्यादा सुरक्षित हैं.

अब यह भी बात है कि भगवा खेमा और पौराणिकवादी दलितों की तरह मुसलमानों की गिनती भी मनुष्यों में नहीं करते, क्योंकि हिंदू धर्मग्रंथ ऐसा निर्देश बहुत स्पष्ट रूप से देते हैं.

सच तो यह है कि आरएसएस के इशारे पर नाचने वाले नरेंद्र मोदी और उन की सरकार अपने उत्तरार्द्ध में पूरी तरह मनुस्मृति को लागू करने पर उतारू हो आई है, लेकिन इस तरह कि कोई उस की मंशा पर उंगली न उठा पाए. इस के बाद भी मंशा छिपाए नहीं छिपती. नतीजों के बाद की एक प्रतिक्रिया बताती है कि भाजपा की नजर में दलितों की हैसियत क्या है.

हार का ठीकरा दलितों के सिर

सुरेंद्र सिंह उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की बैरियर सीट से भाजपा के विधायक हैं. हार पर प्रतिक्रिया के साथसाथ दलितों के प्रति सदियों से सनातनियों के दिमाग में भरी भड़ास इसे कहेंगे जिसे उन्होंने यह कहते व्यक्त किया कि ये नतीजे दलितों को सिर पर चढ़ाने का नतीजा है. सुरेंद्र सिंह भी 3 राज्यों में भाजपा की हार की वजह एट्रोसिटी एक्ट को ठहराते हैं. मंशा और मैसेज साफ है कि भाजपा दलितों की वजह से हारी, सवर्णों की वजह से नहीं. प्रसंगवश बताना जरूरी है कि ये वही विधायक हैं जिन्होंने सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर की तुलना कुत्ते से कर डाली थी.

यहां यह प्रसंग और भी प्रासंगिक है कि सुरेंद्र सिंह की क्या गलती है, जब खुद उन के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राजस्थान के अजमेर की एक सभा में हनुमान को दलित करार दे दिया था यानी भाजपाइयों और भगवाइयों की नजर में दलित कुत्तों और बंदरों सरीखे चौपाए हैं.

ऐसे नेताओं पर नरेंद्र मोदी का कोई जोर नहीं चलता, लेकिन राहुल गांधी उन के मुकाबले पूरी शालीनता और सतर्कता से पेश आ रहे हैं, जो भी कांग्रेसी किसी भी तरह की आपत्तिजनक टिप्पणी नरेंद्र मोदी पर करता है वे उसे या तो नसीहत देते हैं या फिर दिखावे को सही, बाहर का रास्ता दिखा कर जनता की नजरों में चढ़ने का मौका नहीं चूकते.

इंदौर में एक पत्रकार वार्त्ता में राहुल गांधी ने कहा था कि वे प्रेम की राजनीति करने में भरोसा करते हैं. नरेंद्र मोदी और दूसरे भाजपा नेताओं को निशाने पर लेते उन्होंने यह भी कहा था कि जाने क्यों कुछ लोग उन से नफरत करते हैं.

पर बात सीधेसीधे राहुल गांधी के हिंदू होने न होने को ले कर थी. भाजपा हमेशा उन्हें इस मुद्दे पर घेरती रही है. जवाब में राहुल गांधी ने पूजापाठ करने के लिए मंदिरों में जाना शुरू कर दिया. खुद को जनेऊधारी ब्राह्मण भी बता दिया और पूछे जाने पर खुद का गोत्र भी राजस्थान के बीकानेर से उजागर कर दिया कि वे कौल ब्राह्मण हैं और उन का गोत्र दत्तात्रेय है.

हिंदू दिखना राहुल गांधी की सियासी मजबूरी बना कर शायद अब भाजपा खुद पछता रही होगी, क्योंकि राहुल गांधी के इस सौफ्ट हिंदुत्व को जनमानस ने सहज स्वीकार कर लिया है.

लेकिन समझदारी दिखाते राहुल गांधी धर्म की व्याख्या नहीं करते और न ही हिंदुत्व के मूलभूत सिद्धांतों की बात करते हैं. नरेंद्र मोदी को पछाड़ते वे एक बयान में यह भी कह चुके हैं, ‘‘मैं सभी धर्मों का आदर करता हूं.’’ इसलिए वे मसजिद में जा कर टोपी भी पहन लेते हैं और भाजपाइयों की तरह जैन मुनियों के पैरों में भी सिर झुकाते हैं.

इतना ही नहीं, नरेंद्र मोदी पर वे व्यक्तिगत हमले भी नहीं करते. नरेंद्र मोदी के सोनिया गांधी को कांग्रेस की विधवा कहने पर वे तिलमिलाए नहीं, नहीं तो उन के पास भी जवाब देने के कई कारण थे यानी हो उलटा रहा है. नरेंद्र मोदी राहुल गांधी को नहीं उकसा पा रहे और राहुल गांधी नरेंद्र मोदी को उकसाने में  कामयाब हो रहे हैं. इस से उन की छवि एक गंभीर और परिपक्व नेता की बन रही है. 3 राज्यों के नतीजे इस की गवाही भी देते हैं.

तीसरी अहम बात जो कांग्रेस की

3 राज्यों में वापसी की बड़ी वजह बनी, वह राहुल गांधी द्वारा नरेंद्र मोदी पर किए गए राजनीतिक और प्रशासनिक हमले थे. उन्होंने नोटबंदी और जीएसटी जैसे अहम मुद्दों पर भी नरेंद्र मोदी को घेरा और बेरोजगारी व भ्रष्टाचार पर भी नहीं बख्शा, लेकिन राफेल डील पर ‘चौकीदार ही चोर है’ उन्होंने वैसे ही सुनाया जैसे 2014 में नरेंद्र मोदी ने ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ नारे को भुनाया था.

2019 पर पड़ेगा असर

3 गढ़ों की दुर्दशा देख कर भाजपाई हैरानपरेशान हैं, खासतौर से राजनीति के शोमेन अमित शाह जिन की चुनावजिताऊ इमेज और इलैक्शन मैनेजमैंट के चिथड़े उड़ गए हैं.

ये नतीजे 2019 के लोकसभा चुनाव पर जरूर असर डालेंगे, जिन के चलते भाजपा को नए सिरे से रणनीति तैयार करनी पड़ेगी. राममंदिर निर्माण पर उस का प्रयोग शुरुआती दौर में ही खुद हिंदुओं ने ही खारिज कर दिया है. अयोध्या से ले कर दिल्ली तक साधुसंतों का जमावड़ा रहा, लेकिन इस बार हिंदुओं ने कोई दिलचस्पी इस में नहीं दिखाई. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत काफी पहले भाजपा की हालत और संभावित हार भांप गए थे, इसलिए वापस मंदिर निर्माण की तरफ मुड़ना ही उन्होंने बेहतर समझा.

मोहन भागवत की मंशा ब्राह्मणों और दूसरे सवर्णों का समर्थन बनाए रखने की थी जो एट्रोसिटी एक्ट विवाद के बाद बिखरने लगा था.

अब इस मुद्दे पर भगवा खेमा क्या करेगा, यह देखना बेहद दिलचस्प बात होगी. हालफिलहाल तो इसे कानून और अध्यादेश की आड़ में टाला जा रहा है. लेकिन मोहन भागवत को यह एहसास भी है कि अगर इतना होहल्ला होने के बाद इसे सरकार के भरोसे छोड़ा तो भी सौदा घाटे का है और 1992 जैसा बवाल मचाया तो घाटा और बढ़ेगा, क्योंकि 26 सालों में हिंदुओं की 2 पीढि़यां बदल गई हैं, जो दंगाफसाद या हिंसा नहीं चाहतीं.

निश्चितरूप से लोग बदलाव चाहते थे और यह रुझान लोकसभा चुनाव तक भी बरकरार रहेगा, जिस की बड़ी वजह देश में पनपते भय और आतंक के माहौल के अलावा फलतेफूलते खर्चीले धार्मिक आयोजन हैं, साथ ही, बेकाबू होती महंगाई से भी लोग त्रस्त हैं.

बेकार है चमत्कार की आस

बदलाव बहुत ज्यादा सार्थक होगा, ऐसा कहने की भी कोई वजह नहीं क्योंकि कांग्रेस कोई चमत्कारी पार्टी या राहुल गांधी देवता नहीं हैं? लोकतंत्र में लोग सिर्फ पार्टी बदलते हैं, हालात नहीं. अमेरिका इस की बेहतर मिसाल है जहां डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद भी समस्याएं ज्यों की त्यों हैं. यही भारत में होना है. हां, इस बात की जरूर संभावना है कि अगर 2019 में केंद्र सरकार बदली तो नई सरकार कुछ ऐसी योजनाएं जरूर चला सकती है जो लोगों को दीर्घकालिक फायदा दे सके.

पर किसी चमत्कार की आस किसी से भी रखना बेकार की बात है. सरकार कोई भी आए, वह पंडापुरोहितवाद से पूरी तरह मुक्त नहीं होगी और न पौराणिकवादी व्यवस्था को खत्म कर पाएगी, जिस की जड़ें देश में गहरे तक फैली हैं. 3 राज्यों में मतदाताओं ने इन के पाताल तक जाने के खतरे को कम किया है.

मनुवाद के विरोधी राजीतिक दलों को जरूर इन नतीजों से उम्मीद बंधी है कि अगर एक हो कर लड़ा जाए तो जरूर नरेंद्र मोदी को हराया जा सकता है और यह मिथक या भ्रम तोड़ा जा सकता है कि भाजपा अपराजेय पार्टी है और अगले 50 सालों तक राज करेगी, जैसा कि उस के बड़बोले अध्यक्ष अमित शाह दावा करते रहते हैं, जिन का गरूर अपने ही गढ़ ढहने से टूटा है.

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