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राजनेताओं को जनता का सबक

नवंबर- दिसंबर में हुए 5 विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की हालत पतली होगी, इस का अंदाजा हीनों पहले होने लगा था जब जनता को नोटबंदी, पैट्रोलडीजल के बढ़ते दामों, जीएसटी के शिकंजों, गौभक्तों की हिंसक करतूतों, महिलाओं की बढ़ती असुरक्षा और भाजपा की हठधर्मी दिखने लगी थी. सरकार और पार्टी को शासनप्रशासन की नहीं, बल्कि मूर्तियों, उद्घाटनों, आरतियों, बाबाओं का आशीर्वाद लेने, अखबारों में बड़ेबड़े विज्ञापन देने की लगी रहती थी.

नरेंद्र मोदी की सरकार और अमित शाह की भाजपा ने ऐसा माहौल बना दिया था कि आमजन की तकलीफों को नजरअंदाज कर के मोदी व शाह के गुणगान किए जाने की आवाज ही सुनाई दे रही थी. पहले गुजरात और फिर कर्नाटक के चुनावों ने साफ कर दिया था कि केवल हिंदूहिंदू चिल्लाने से वोट नहीं मिलने वाले. पर मोदी, शाह और नागपुर (आरएसएस) को इस के अलावा न कुछ सूझता है, न आता है.

फिर भी लग यही रहा था कि पार्टी को कम सीटों के साथ हर राज्य में सफलता मिल ही जाएगी और इसलिए भाजपा दंभ व विश्वास से भरी थी. तभी तो मोदी ने बजाय विकास और आर्थिक मामलों की चर्चा करने के, अपनी रैलियों का इस्तेमाल जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राहुल गांधी की खिंचाई में किया.

दूसरी तरफ राहुल गांधी ने कांग्रेस ने 1905 से 2014 तक क्या किया, की चर्चा न के बराबर की जबकि लोगों की आज की तकलीफों की चर्चा ज्यादा की. उन्होंने राफेल विमानों के सौदे में हुए घोटाले की बात की जिस की भाजपा ने साफसफाई नहीं दी. चौकीदार को खुले शब्दों में राहुल ने चोर कहा पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आजादी से पहले क्या किया या बाद में, भारत में हिंदू-मुस्लिम बैर किस ने बढ़ाया, की बात की ही नहीं.

समय आया, तो जनता ने फैसला कर दिया. राजनेता इस फैसले से सबक लें, न लें, इस का उन्हें अधिकार है.

जाहिर है कि कांग्रेस जनता के ज्यादा करीब रही. कांग्रेस 3 राज्यों में जीत गई. 2 राज्यों में वह नहीं जीती पर भाजपा, जो पूरे जोरशोर से लड़ी थी, इन दोनों राज्यों में तीसरे नंबर पर, कांग्रेस के बाद रही.

कांग्रेस में कोई लाल लगे हों, ऐसा नहीं है, पर कांग्रेस देशवासियों को विभाजित नहीं करती. कांग्रेस का शासन हमेशा भ्रष्टाचार से भरा रहा है, छोटेबड़े घोटाले हुए हैं पर काफी ऐसे काम भी हुए हैं जो अब दिख रहे हैं. भाजपा ने बीते साढ़े 4 साल में या तो पिछले कामों के पूरा होने पर उस का उद्घाटन किया या नामों का शिलान्यास किया. सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति बनवाने के अलावा कोई काम है ही नहीं उस का कि जिस का गुणगान किया जा सके. वैसे यह कोई काम भी नहीं और यह मूर्ति भी भारतीयों ने नहीं बल्कि चीनियों ने बनाई.

अब 2019 के लोकसभा चुनावों का प्रचार शुरू हो गया है. कांग्रेस को यह फायदा है कि अभी जीते तीनों राज्यों में वह कुछ करे या न करे, जनता को तो मई में होने वाला आम चुनाव दिखेगा. नरेंद्र मोदी का सारा समय अब पार्टी की सीटें और साख बचाने में लगेगा. वे अब ज्यादा जोड़तोड़ भी नहीं कर सकेंगे क्योंकि अब पार्टियों के एनडीए छोड़ने का समय आ गया है, उस से जुड़ कर जोखिम लेने का नहीं, चाहे वह मई 2019 में फिर जीत जाए.

चुनावी परिणामों से भगवा गैंगों से राहत मिलेगी, तो पक्का है. अब ये गैंग उत्तर प्रदेश में ही कुछ कर पाएंगे. पर योगी आदित्यनाथ, जो भाजपा के प्रमुख प्रचारक रहे, अब मुंह छिपाते फिरेंगे और कोई जोखिम न लेंगे, ऐसी उम्मीद है. वैसे, पौराणिक इतिहास ऐसी कहानियों से भरा है जिन में हिंदू राजा अपने पुरोहितों, सहायकों के कहने पर एक के बाद एक गलत काम करते रहे हैं.

जमाना है प्लस साइज कपड़ों का, इसलिए सही ड्रैस का करें चुनाव

वह जमाना गया जब लोग प्लस साइज के पुरुष या महिला को अलग नजरों से देखते थे. उन्हें पहनने के लिए ढंग के कपडे़ नहीं मिलते थे. अपनी इस कदकाठी के लिए शर्म महसूस करते थे. अपने मोटापे को कम करने के लिए वे जिम और डाइट का सहारा लेते थे. आजकल 10 में से 1 महिला प्लस साइज की दिखती है. यह आज की जीवनशैली और खानपान का असर है. आज अधिकतर महिलाएं घरेलू खाने से अधिक जंक फूड खाती हैं, जिस की वजह से कम उम्र में ही वे प्लस साइज की हो जाती हैं. ऐसे में उन्हें सही आउटफिट की तलाश हमेशा रहती है. प्लस साइज के तहरतरह के फैशनेबल और सैक्सी कपड़े आजकल बाजार में भी आसानी से उपलब्ध हैं. डिजाइनर्स नित नए डिजाइन के प्लस साइज कपड़े बाजार में उतार रहे हैं.

कपड़ों का सही चयन

प्लस साइज महिलाओं के लिए कपड़ों का सही चयन करना बहुत जरूरी है ताकि वे सुंदर दिखें. इस बारे में जूनारोज डिजाइन ऐक्सपर्ट प्राची बताती हैं कि प्लस साइज होने में कोई बुराई नहीं है. सही ड्रैस उन्हें अच्छा लुक दे सकती है. अत: कपड़े खरीदते वक्त प्लस साइज महिलाओं को निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए:

फ्लोरल प्रिंट और प्लेन किसी भी रंग के वस्त्र आसानी से पहन सकती हैं, लेकिन सही फैब्रिक और रंग का चयन करना जरूरी है. कपड़े पहनने में आरामदायक, सही शेप के और टिकाऊ हों.

नैचुरल फैब्रिक, सिल्क, सौफ्ट कौटन, लिनेन, नायलोन, लायक्रा आदि ज्यादा अच्छे होते हैं.

हमेशा ए शेप कपड़े खरीदने की कोशिश करें. इन्हें पहन कर आप स्मार्ट लग सकती हैं. इस के अलावा ट्यूनिक विद लैगिंग, टौप विद जींस भी अच्छा लुक दे सकता है.

लेयरिंग वाली पोशाक भी प्लस साइज महिलाओं पर खूब फबती है. इस में लेस, किनारों पर बारीक ऐंब्रौयडरी काफी अच्छी लगती है.

वर्टीकल धारी वाले कपड़े प्लस साइज महिलाओं के लिए सही होते हैं, इन में वे स्लिम और अधिक हाइट वाली दिखती हैं.

डार्क कलर और छोटे प्रिंट वाले कपड़े ज्यादा पहनें.

पैंट खरीदनी हो तो डैनिम, रेयन, कौटन आदि चयन करें.

देश हो विदेश आजकल प्लस साइज कपड़ों की मांग लगातार बढ़ रही है. अब चुनौती डिजाइनर्स के लिए है कि कैसे वे अलगअलग रंगों और डिजाइनों में प्लस साइज कपड़े उतारें. लैक्मे फैशन वीक के लिए करीब 330 प्लस साइज मौडल्स रैंप पर उतरे, जिन में 17 मौडल्स का चयन किया गया. इस अवसर पर डिजाइनर वैंडील रोड्रिक कहते हैं, ‘‘हर महिला को सुंदर दिखने का अधिकार है. यही वजह है कि मैं महिलाओं के लिए अधिक कपड़े बनाता हूं, क्योंकि वे कपड़ों को सही तरीके से कैरी करती हैं और मुझे यह पसंद है. हर देश की अपनी अलग परंपराएं और संस्कृति है. उसी के आधार पर कपड़े डिजाइन करता हूं. इस के लिए मैं हर शहर और देश में घूमता रहता हूं. प्लस साइज अभी पौपुलर नहीं हुआ, बल्कि पहले से ही था, लेकिन इस की मार्केट का विकास नहीं हुआ था, जो अब होने लगा है.’’

जब करें पार्टी वियर का चुनाव

  • प्लस साइज की महिलाओं को पार्टी वियर का चुनाव करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए:
  • सब से पहले यह देखें कि किस पार्टी या अवसर पर कहां जाना है. उस के हिसाब से परिधान चुनें.
  • बौडी की नाप के अनुसार कपड़े खरीदें. इस के लिए किसी ऐक्सपर्ट की सलाह लें.
  • बौडी के किस भाग को छिपाना या किसे हाईलाइट करना है यह देख लें.
  • स्ट्रैपलैस ड्रैस न खरीदें. वी नैकलाइन और फुलस्लीव कपड़े चुनें. ये आकर्षक बनाते हैं.
  • सही अंडरगारमैट्स पहनें ताकि कपड़े आप पर सही तरह से फिट हों.
  • रंग अपने हिसाब से ही चुनें

समाज में बढ़ रहा है सिल्वर सैपरेशन का ट्रैंड

जब से नेहा की शादी हुई उसी समय से नेहा पति रौकी को किसी और के साथ कहीं नहीं जाने देती. रौकी के किसी से बात करने पर नाराज हो जाती. जब रौकी उस से पूछता कि वह उस पर शक क्यों करती है तो कहती कि वह उस से बहुत प्यार करती है.

कुछ समय बाद तो हालात ऐसे हो गए कि नेहा रोज रौकी के औफिस हर 10 मिनट बाद फोन कर पूछती कि वह क्या कर रहा है. कभी कहती कि जब घर आओ तो उस के लिए कुछ खरीद लाना, फिर जब वह कुछ खरीद कर लाता तो उस पर शक करती. कहती कि कौन गई थी यह खरीदने उस के साथ. अब तो वह अपना कामधाम छोड़ कर रौकी की जासूसी करने लगी थी. इस वजह से रौकी क्या पूरा परिवार परेशान रहने लगा.

इसी कारण रौकी अपना काम ठीक से नहीं देख पा रहा था. उस का जमाजमाया बिजनैस डूबने लगा. वह अपने परिवार और दोस्तों से दूर होता गया. नेहा की वजह से घर से बाहर अपने परिवार वालों से भी नहीं मिलता.

नेहा की अपने प्यार को सहेजने की इस सनक ने 2 परिवारों का जीवन नर्क बना दिया. अंत में एक दिन रौकी ने नेहा को छोड़ दिया. रौकी को इस से बेहतर और कुछ समझ नहीं आया. यह कैसा प्यार है, जो नेहा की सनक की भेंट चढ़ गया?

नए रिश्तों की उलझन

शोध बताते हैं कि जब 2 लोग नया रिश्ता शुरू करते हैं तब पहलेपहल सामंजस्य बैठाने में उन्हें दिक्कत आती है. अगर इस दौरान रिश्ता न संभले तो तलाक की गुंजाइश बन जाती है. मगर इतने साल बिताने के बाद बढ़ती उम्र में तलाक अपनेआप में अटपटा लगता है.

राघव एक मल्टीनैशनल कंपनी में ऊंचे पद पर कार्यरत और मिलनसार व्यक्ति था. जब घर में उस की शादी की बात शुरू हुई तो मंजरी उसे खास पसंद नहीं आई, पर परिवार की खुशी के लिए उस ने हां कर दी. परिवार वालों ने सुंदर लड़की का चुनाव किया था जो घरेलू थी ताकि वह हर कदम पर उस का साथ दे.

मंजरी को अपना लोगों से मिलनामिलाना बहुत पसंद था, पर राघव का किसी से मिलना या हंसना नहीं. धीरेधीरे वह राघव को हर बात पर टोकने लगी. राघव हंसता तो कहती कि इतना शोर क्यों मचा रहे हो? किसी महिला की तरफ देखता तो कहती कि उसे देख कर लार टपका रहे हो.

राघव अपने मित्रों के साथ कहीं जाता. तो हर थोड़ी देर में मंजरी फोन कर कहती कि गप्पें हांकने और चाय की चुसकियों से मन नहीं भरा है क्या जो अभी तक घर नहीं आए?

राघव के घर आने पर उस से झगड़ने लगती. लड़ाई से बचने के लिए अंतत: राघव ने लोगों से मिलनाजुलना ही छोड़ दिया. औफिस जाता और लौट कर अपने कमरे में कैद हो जाता. मंजरी टीवी देखने में व्यस्त रहती. धीरेधीरे राघव शराब पीने लगा. लेकिन अब भी मंजरी उस का साथ देने की जगह कहती कि नाटक करते हो. दोस्तों से मिलने के बहाने बनाते हो.

एक दिन तो हद ही हो गई. घर के सब सदस्य बैठे हुए थे. तभी मंजरी हिट का छिड़काव करने लगी. राघव ने जैसे ही यह देखा तो चीखा कि बेवकूफ औरत क्या सब की जान लेगी. इस बात का कोई असर नहीं हुआ.

अभी इस घटना को कुछ ही दिन बीते थे कि एक दिन राघव ने पैरों की सिंकाई के लिए गरम पानी मांगा तो पहले तो मंजरी ने मुंह बनाया और फिर खौलता पानी ले आई.

राघव ने मंजरी को बदलने की बहुत कोशिश की, पर जब कोई हल नहीं निकला तो उस ने मंजरी से बात करना बंद कर दिया. वह अब उस के साथ जिंदगी नहीं व्यतीत करना चाहता था, पर हर बार मातापिता के समझाने पर कि राघव ऐसा नहीं करते, समाज क्या कहेगा, एक बार बच्चा हो जाए सब सही हो जाएगा.

जिंदगी यों ही चलती रही. देखतेदेखते शादी हुए कितने साल बीत गए और इन सालों में हालात बद से बदतर होते गए. मंजरी ने बदलने या परिवार का दिल जीतने की कोई कोशिश नहीं की. कभी सास को कोसती तो कभी ससुर को गाली देती. बच्चों को भी मारतीपीटती. अगर कोई महिला रिश्तेदार कुछ समझानेबुझाने की कोशिश करती तो उसी के चरित्र पर उंगली उठाती कि राघव और उस के बीच संबंध हैं.

घर की स्थिति इतनी विकट हो गई कि कोई रास्ता ही नहीं सूझ रहा था. मंजरी के परिवार वाले भी उसे समझाने की जगह ससुराल वालों में ही दोष निकालते. हार कर बच्चों और बहनों की सलाह से राघव मंजरी को घर छोड़ आया. अब दोनों अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं, एकदूसरे पर आरोपप्रत्यारोप लगा रहे हैं.

बच्चों से फैमिली कोर्ट में जब काउंसलर ने पूछा कि वे क्या चाहते हैं, दोनों बेटियों (जिन में से एक शादीशुदा है) ने कहा कि वे नहीं चाहतीं कि मम्मी कभी वापस आए. उन्होंने पापा को कभी समझा ही नहीं. उन के न आने से घर में शांति है.

अब सवाल यह है कि ऐसी स्थिति का कारण क्या है? एक सर्वे की रिपोर्ट में चौंकाने वाली बातें सामने आईं. 2 लोगों के बीच तलाक की एक वजह सनक भी है. चाहे वह जरूरत से ज्यादा प्यार की सनक हो या जरूरत से ज्यादा गुस्से की. असल में जब एक पार्टनर दूसरे से प्यार करता है तो अपने पार्टनर से भी बदले में वही ख्वाहिश रखता है. अगर दूसरा पार्टनर इस बात की तरफ ध्यान नहीं देता तो रिश्ता मुश्किल में पड़ जाता है. रिपोर्ट के मुताबिक यह स्थिति दोनों के लिए ही खतरनाक होती है. क्योंकि एक तो यह सोचता है कि उस में कोई कमी नहीं दूसरा ही अडजस्ट नहीं कर पा रहा, जबकि दूसरा सोचता है कि वह कहां फंस गया, ऐसे में दोनों ही कुछ नए की तलाश में लग जाते हैं.

पक्की उम्र में तलाक क्यों

मशहूर लेखक कोएलो का कहना है कि अगर अलविदा कहने का हौसला नहीं है तो जिंदगी अवसरों से हमारी झोली भर कर हमें खुशामदीद भी नहीं कहेगी. यह बात तलाकशुदा लोगों पर फिट बैठती है.

भारत जैसे देश में पिछले 12 सालों में तलाक दर दोगुनी हो गई है. आखिर परिपक्व या पक्की उम्र में तलाक का कारण क्या है?

लेखक जेनिफर का कहना है, ‘‘तलाक का मतलब जिंदगी खत्म होना नहीं. अगर शादीशुदा जिंदगी निभाने में परेशानी आ रही हो तो असफल शादीशुदा जिंदगी जीने से क्या फायदा, तलाक के बाद कोई मरता नहीं. सेहत तो तब खराब होती है जब हम असफल शादीशुदा जिंदगी जी रहे होते है.’’

25वीं सालगिरह पर तलाक की ओर

सिल्वर जुबली या सिल्वर सैपरेशन यानी तलाक के बाद उन्हें जिम्मेदारियों का दंश नहीं सताता. उन के बच्चे शादी कर घर बसा चुके  होते हैं. अब अपने हिसाब से जिंदगी जीने का वक्त उन का होता है. पार्टनर की कोई टोकाटाकी नहीं. हर पल सुकून भरा. बस इसी सुकून को तरसते लोग ढलती उम्र में भी तलाक लेने में संकोच नहीं कर रहे हैं.

फैमिली कोर्ट काउंसलर सिन्हा का कहना है कि रिश्ते में कड़वाहट पड़ जाए और उस में सड़न पैदा होने लगे तो अच्छा है रिश्ता तोड़ लिया जाए? उन के मुताबिक उन का दोस्त तलाकशुदा है और उस के 2 बच्चे हैं. ऐसे में पतिपत्नी अलग रहते हुए भी बच्चों की परवरिश अच्छी तरीके से बिना किसी मनमुटाव और झगड़े के कर रहे हैं. बच्चे भी खुश है.

परिवार और समाज

– सब से पहले जरूरी है कि बच्चों के साथ संबंधों को मधुर बनाया जाए, क्योंकि वही आप की असली धरोहर हैं. उन के साथ प्यार से पेश आएं.

– अगर आप संयुक्त परिवार में रहती हैं तो पति और बच्चों के साथसाथ बुजुर्गों का भी खयाल रखें. उन की भावनाओं का सम्मान करें.

– अगर किसी रिश्तेदार से अनबन हो या वह नापसंद हो, तो रिश्ते की इस कटुता को न बढ़ाएं, बल्कि नफरत और नाराजगी को खत्म करने की कोशिश करें.

– अकसर समय के साथ आप बदल जाते हैं, लेकिन पार्टनर की वही ऐक्सपैक्टेशंस रह जाती हैं जोकि रिश्ता शुरू होने के समय थीं. लेकिन सोचिए कि यह रिश्ता जा कहां रहा है? क्या रिश्ते के साथ आप आगे बढ़ रहे हैं या फिर वहीं ठहर गए हैं जहां उस वक्त थे, जब रिश्ता शुरू हुआ था? अगर ऐसा है तो इस रिश्ते को संभालने के लिए दोबारा से सोचिए. इन सारी बातों से जितना आप प्रभावित हैं उतने ही घर के सारे सदस्य भी. हो सकता है इन सारी बातों से एक दिन परेशानियां इतनी बढ़ जाएं कि आप को अलग होना पड़ जाए. अत: अच्छा है वक्त रहते संभल जाएं.

अब क्या करेंगे शिवराज सिंह चौहान

नए साल के पहले दिन मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पुरी के समुद्र किनारे कुर्सी डाल कर बैठे चिंतन मनन कर रहे थे जिसकी उन्हें इन दिनों सख्त जरूरत भी है. दर्शन शास्त्र के छात्र रहे शिवराज सिंह को समझ आ रहा है राजनीति अनिश्चितताओं का समुच्चय है, जिसमें  एक झटके में सारा वैभव छिन जाता है, ठीक वैसे ही जैसे कभी कभी एक झटके में मिल भी जाता है. लोकतांत्रिक राजनीति में भाग्य ब्रह्मा नहीं बल्कि वोटर लिखता है, यह बात भी उन्हें बीती 11 दिसंबर को समझ आ गई थी जब राज्य में न भाजपा की सरकार रही थी और न वे मुख्यमंत्री रह गए थे. वोटर ने उन्हें खारिज कर दिया था.

अब जो करना है उन्हें ही करना है यह बात भी भ्रम ही साबित हो रही है क्योंकि भाजपा में नेता का भविष्य नागपुर से लिखा जाता है.  खुद अपनी तरफ से वे केंद्रीय राजनीति में जाने बाबत अनिच्छा जाहिर कर चुके हैं, क्योंकि वहां उनके करने लायक कुछ है नहीं, उनके क्या सिवाय नरेंद्र मोदी के किसी के पास करने कुछ नहीं है.

दिल्ली में शिवराज सिंह की कद काठी के दर्जनों भाजपाई नेताओं की फौज है जो सुबह कुल्ला कर लौन या दफ्तर मैं बैठकर मुलाकातियों को चाय पिलाया करते हैं. इन नेताओं की हालत पर कटे पक्षियों सरीखी है जिनका काम साहब की हां में हां मिलाना होता है, शायद इन्हीं को ध्यान में रखते मिर्जा गालिब काफी पहले कह गए थे कि, बना है साहिब का मुसाहिब फिरे है इतना इतराता, वगरना शहर में गालिब की आबरू क्या है.

13 साल तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह इन मुसाहिबों की फौज का हिस्सा नहीं बनना चाहते तो यह उनकी समझदारी ही है, लेकिन दिक्कत यह है कि अब उनके गृह राज्य के मुसाहिब ही उन्हें साहिब मानने तैयार नहीं, यानि सर्वमान्य तरीके से उन्हें विपक्ष का नेता स्वीकारने तैयार नहीं. जितनी परेशानियां कांग्रेस को कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाने में पेश नहीं आईं थीं उससे ज्यादा भाजपा को अपने विधानसभा नेता चुनने में आ रहीं हैं. शिवराज सिंह यह पद (उनके शब्दों में ज़िम्मेदारी) चाहते तो हैं, लेकिन वोटिंग के जरिये नहीं, वे निर्विरोध चुने जाना चाहते हैं, जिससे उनकी साख और रुतबा बना रहे.

दूसरी तरफ भाजपा का कथित लोकतंत्र है, जो इस बात पर अड़ा है कि नेता प्रतिपक्ष का चुनाव होना चाहिए. यह सुगबुगाहट विस्फोट की शक्ल में सामने न आए इसकी जिम्मेदारी गृह मंत्री राजनाथ सिंह को सौंपी गई है, जिन्हें बेहतर मालूम है कि सर पर खड़े लोकसभा चुनाव के मद्देनजर ज्यादा हो हल्ला पार्टी को नुकसान ही पहुंचाएगा. राजनाथ सिंह को यह भी मालूम है कि मध्यप्रदेश में दूसरी पंक्ति के महत्वाकांक्षी नेताओं की भरमार है जो यह कह और पूछ रही है कि क्या इस अप्रत्याशित हार के बाद भी शिवराज सिंह ही सर्वेसर्वा होंगे, हमारी कोई अहमियत नहीं, हमें क्या कभी मौका ही नहीं मिलेगा.

इसमें कोई शक नहीं कि शिवराज सिंह हार के बाद भी लोकप्रिय हैं जिसे बनाए रखने वे हर मुमकिन कोशिश कर भी रहे हैं, इसलिए दिल्ली में वे सभी बड़े मुसाहिबों से मिले और अपने मन की बात कही, अब देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा शिवराज सिंह के बारे में क्या फैसला लेती है. संभावना इस बात की ज्यादा है कि उन्हें विदिशा लोकसभा सीट से लड़ने मना लिया जाये, जहां से विदेश मंत्री सुषमा स्वराज सांसद हैं और चुनाव लड़ने से मना कर चुकी हैं. हालांकि इस विधानसभा सीट से शिवराज सिंह के चहेते मुकेश टंडन कांग्रेस के शशांक भार्गव के हाथों हार चुके हैं, लेकिन बाकी 4 सीटें भाजपा अच्छे अंतर से जीतने में कामयाब रही है जिससे उसकी उम्मीदें अभी मरी नहीं हैं.

भाजपा की ब्राह्मण लाबी नहीं चाहती कि शिवराज सिंह को प्रदेश की राजनीति में अहमियत दी जाये, इस बाबत उसके अपने तर्क भी हैं कि शिवराज सिंह की दलित हिमायती इमेज के चलते भाजपा चौथी बार सत्ता के मुहाने तक आकर फिसल गई. खासतौर से एक वायरल हुये वीडियो को हार का जिम्मेदार बताया जा रहा है जिसमें दलितों के एक कार्यक्रम में शिवराज सिंह पूरी गर्मजोशी से कह रहे हैं कि जब तक वे हैं तब तक कोई माई का लाल आरक्षण खत्म नहीं कर सकता.

यह देखना भी दिलचस्प होगा कि कहीं भाजपा जरूरत से ज्यादा कड़ाई से पेश आते शिवराज सिंह को घर न बैठाल दे, इसमे आरएसएस की भूमिका अहम होगी जो भाजपा नेताओं की जन्मकुंडली के ग्रह नक्षत्रों की चाल और दशा तय करती है.

जंगल है साम्राज्य और राजा हैं ग्रामीण

मध्य प्रदेश के गबौद गांव के निवासी पेड़पौधों की काफी हिफाजत करते हैं. जंगल ही इन का जीवन है. यहां की ऊंची पहाडि़यां और उन पर छाई हरियाली प्रकृति के प्रति इन ग्रामीणों के प्रेम की साक्षी है. पिछले 25 वर्षों से ग्राम वन समिति के लोग इन पेड़पौधों की रखवाली कर रहे हैं. मजाल क्या है जो कोई वनमाफिया इस तरफ नजर उठा कर भी देख ले. जंगल ही इन ग्रामीणों का जीवन है. जंगल और पेड़पौधों को बचाने के लिए तकरीबन 25 साल पहले इन लोगों ने यहां एक ग्रामीण वन समिति बनाई थी. छत्तीसगढ़ के महासमुंद स्थित इस इलाके में तब से यह सिलसिला चला आ रहा है.

अब गबौद और उस के आसपास के गांव का हर व्यक्ति इस का सदस्य है. सभी लोग मिलजुल कर बारीबारी से जंगलों की रक्षा करते हैं, वह भी बिना किसी स्वार्थ और मेहनताना के. ऐसा लगता है कि जंगल इन का साम्राज्य है और ये ग्रामीण इस के राजा हैं. यही नहीं, यदि कोई व्यक्ति जंगल में पेड़ काटते हुए पकड़ा जाता है तो बाकायदा उस से जुर्माने के रूप में रुपए वसूल किए जाते हैं.

ऐसे हुई शुरुआत :  महासमुंद जिले की नगर पंचायत पिथौरा से कोई 15 किलोमीटर की दूरी पर है ग्राम पंचायत सपोस का गांव गबौद. हरियाली से भरपूर इस गांव का शुद्ध वातावरण हर किसी को अपनी ओर खींचता है. यह स्थान मनमस्तिष्क को तरोताजा कर देता है. प्राकृतिक वातावरण के बारे में पूछने पर ग्रामीण बताते हैं कि आज से 25 साल पहले गबौद के आसपास के गांवों के जंगलों को तहसनहस किया जा रहा था. वन माफिया जंगलों को आरियों से काट कर मुनाफा कमा रहे थे. इस कटान के कारण गरमी में पहाड़ी चट्टानें आग उगल रही थीं, औसत वर्षा भी कम होने लगी थी, जिस वजह से सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा था. इस मुसीबत को भांप कर ग्रामीणों ने यह योजना बनाई. वे जानते थे कि कम पानी की वजह कटते जंगल हैं. इसलिए उन्होंने ग्रामीण वन समिति का गठन किया था.

बारीबारी से करते हैं रखवाली :  समिति बनने के बाद वन विभाग ने 142 हेक्टेयर में फैले जंगल की सुरक्षा की जिम्मेदारी इस समिति को सौंप दी. इस बार ग्रामीणों ने तय किया कि रोजाना 2 ग्रामीण बारीबारी से जंगल की रखवाली करेंगे. यही नहीं, पेड़पौधे काटने पर दंड का भी प्रावधान रखा गया. इसी का परिणाम है कि आज यहां के जंगल हरियाली से भरपूर हैं. यहां वन्य जीव भी काफी हैं.

सम्मान भी मिल चुका है

1999 में मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने इस समिति को इस निस्वार्थ काम के लिए पुरस्कार प्रदान किया था. पूर्व सरपंच अश्वनी विशाल ने बताया कि अपनी बारी आते ही ग्रामीण बिना किसी टालमटोल के रोटी और गुड़ को पोटली में बांध कर हाथ में डंडा ले कर जंगल की रखवाली के लिए निकल पड़ते हैं.

ग्रामीणों की भी जुड़ी है आस्था

चंद्रपाल दीवान जो वर्तमान में समिति के अध्यक्ष हैं, बताते हैं कि जंगल में स्थित पहाड़ी पर ग्रामाणों की काफी आस्था है. इसे वे जीवनदायिनी मानते हैं. जंगल में होने वाली बारिश का पानी खेतों तक आता है. इसी पर ग्रामीणों की निर्भरता है.

सोशल मीडिया से जुटाई खेती किसानी की जानकारी

इन दिनों जहां लोग सोशल मीडिया के दीवाने हैं वहीं देश का किसान भी सोशल मीडिया का भरपूर फायदा उठा रहा है. वह इंटरनैट का बेहतर इस्तेमाल कर आम किसान से उन्नत किसानी की ओर बढ़ रहा है. उसे इस प्लेटफौर्म पर खेती की नईनई तकनीक व जानकारियां हासिल होती हैं और वह इन का भरपूर इस्तेमाल कर उन्नत खेती करने में सक्षम हो रहा है.

कुछ ऐसी ही कहानी है हरियाणा के फतेहाबाद जिले के जाखल खंड के चुहुड़पुर गांव के प्रगतिशील किसान हरविंदर सिंह लाली की. इस सुशिक्षित युवा ने सूचना तकनीकी का सदुपयोग कर तरक्की की राह पकड़ी और आज अच्छा खाकमा रहा है. हरविंदर ने यूट्यूब और व्हाट्सऐप पर आधुनिक खेती की तमाम जानकारी हासिल कर अच्छी पैदावार प्राप्त की. उन्होंने अपनी फसल बेचने के लिए भी इसी प्लेटफौर्म का इस्तेमाल किया और बिचौलियों से नजात पाई.

हरविंदर ने सूचना क्रांति का भरपूर इस्तेमाल कर खेती में हाथ आजमाया और खेती के आधुनिक तौरतरीकों की खोज में लग गया. उस ने बोआई से ले कर कटाई और खाद तैयार करने की तमाम विधियों का सोशल मीडिया पर अच्छी तरह अध्ययन किया. इन तमाम तौरतरीकों के यूट्यूब पर वीडियो देखे और उन से खास जानकारी हासिल की. यही नहीं, हरविंदर ने सफल किसानों के वीडियो देख कर उन पर गहराई से सोचविचार किया, ताकि उन से कोई गलती न हो. हरविंदर कहते हैं कि उन्हें मालूम है कि यह दौर जैविक खेती का है, इसलिए वे इस में दिलोजान से लग गए. उन की महज डेढ़ एकड़ से शुरू की खेती में गुणात्मक इजाफा हुआ. जब खेती का रकबा बढ़ा तो उपज ने भी छलांग लगाई.

उन की पैदावार अब लगभग दोगुना हो गई है. धान और गेहूं की जैविक तरीके से हासिल उपज के लिए उन्होंने बाजार भी व्हाट्सऐप और फेसबुक पर ही तलाश लिया. हरविंदर सिंह ने एडवांस में ही सोशल मीडिया पर अपनी आने वाली जैविक खेती की जानकारी शेयर की और चंद मिनटों में ही उन की फसल बुक हो गई. इस की उन्हें वाजिब कीमत मिली यानी दलालों के चंगुल में फंसने से वह बच गया.

हरविंदर के अनुसार उन के 50 क्विंटल गेहूं की बुकिंग महज 20 मिनट में हो गई. वह बताते हैं कि एक प्लास्टिक के ड्रम में 20 लिटर लस्सी या छाछ और 2 किलोग्राम नीम के पत्ते तांबे के बरतन में रख देते हैं, उस में आधा किलोग्राम लहसुन डाल देते हैं. इस से कुछ दिनों बाद जैविक कीटनाशक तैयार हो जाता है. हरविंदर बताते हैं कि यदि फसल में फंगस कीट, सूंडी आदि की बीमारी लगती है तो इस जैविक कीटनाशक का इस्तेमाल करने से इन से नजात पाई जा सकती है.

ईकौमर्स : आधे से कम इंटरनेट यूजर्स करते हैं औनलाइन शौपिंग

134 अरब से ज्यादा आबादी वाले देश भारत में 50 करोड़ लोग ही इंटरनेट पर चहलकदमी करते हैं. इन में से आधे से कम यानी 25 करोड़ से भी कम इंटरनेट यूजर्स औनलाइन शौपिंग करते हैं. वहीं, अनुमान यह है कि वर्ष 2021 तक देश में इंटरनेट यूजर्स की तादाद 82.9 करोड़ हो जाएगी. रिलायंस जियो को देश में डिजिटल हाईवे खड़ा करने का श्रेय दिया जा सकता है. ऐसे में देश में इंटरनेट के जरिए औनलाइन शौपिंग सेक्टर में हैंडसम ग्रोथ होना स्वाभाविक है.

देश में अब तक औनलाइन रिटेल के इर्दगिर्द डिजिटल कौमर्स को ले कर बहस होती रही है. सच यह है कि देश में 50 करोड़ इंटरनेट यूजर्स में आधे से भी कम औनलाइन शौपिंग करते हैं. औनलाइन शौपिंग में आने वाले समय में ग्रोथ होने की उम्मीद पर ही शायद अमेरिका की एमेजौन और वौलमार्ट भारत में अरबों डौलर निवेश कर रही हैं.

वहीं, चीन के निवेशकों की भी भारत में कम दिलचस्पी नहीं है. वहां की औनलाइन दिग्गज अलीबाबा ने भारत की डिजिटल पेमेंट कंपनी पेटीएम में बड़ा निवेश किया है. उधर जापान का सौफ्टबैंक भारतीय इंटरनेट सेगमेंट के लिए बड़ा निवेशक रहा है.

अनुमान यह भी है कि भारतीय इंटरनेट कौमर्स सेक्टर के लिए 2018 की तरह 2019 में प्रदर्शन करना आसान नहीं होगा. वर्ष 2018 के 6 महीनों में जहां बड़ी बिजनेस डील हुई, वहीं दूसरी छमाही में इस पर रेगुलेटरी सख्ती का चाबुक पड़ा. पिछले वर्ष के आखिरी महीने के आखरी हफ्ते में ईकौमर्स सेक्टर के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के नियम सख्त किए जाने का एलान किया गया, जिस से देश की सब से बड़ी औनलाइन रिटेल कंपनियों की मुसीबत बढ़ गई है.

एफडीआई रूल्स में बदलाव का ईकौमर्स सेक्टर के लिए क्या मतलब है, क्या इस से इस उभरती हुई इंडस्ट्री में देसी फ्लेवर दिखेगा? इस की एक वजह यह है कि भारत के बड़े कारोबारी समूहों और घरानों ने दमदार तरीके से इस सेक्टर में एंट्री नहीं की है जबकि 2021 तक देश में इंटरनेट यूजर्स की तादाद 82.9 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है. हां, रिलायंस की योजना जरूर है, वह इस सेक्टर में इस वर्ष एंट्री करेगी.

इंटरनेट बेस्ड प्लेटफौर्म्स का ध्यान अब तक तेज ग्रोथ पर रहा है. इस के लिए उन्होंने काफी पैसे जुटाए भी हैं. हालांकि, नए ग्राहक आकर्षित करने और पुराने कस्टमर्स को साथ बनाए रखने के लिए उन्हें फेवरेट बुक या स्मार्टफोन के अलावा बहुत कुछ औफर करना होगा.

इंडस्ट्री के अनुमान से पता चलता है कि देश के आधे इंटरनेट यूजर्स ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं और 40 फीसदी यूजर्स महिलाएं हैं. ऐसे ग्राहकों तक पहुंचने और उन का ध्यान आकर्षित करने के लिए स्टार्टअप्स को नई केटेगरी बनानी होगी. उन्हें सोशल कौमर्स पर ध्यान देना होगा, जहां, छोटे बिजनेसमैन, होममेकर्स और सेल्फ एम्प्लोएड अपने सोशल नेटवर्क्स के अन्दर प्रोडक्ट्स और सेवाओं की बिक्री कर सकें. यह छोटे शहरों में पोपुलर मौडल बन सकता है जहां क्षेत्रीय भाषाओं वाले ऐप्स की लोकप्रियता बढ़ रही है. बेंगलुरु बेस्ड मीशो ऐसी ही स्टार्टअप है. वह ईकौमर्स के वर्जन 2 का चेहरा बन सकती है.

चीन का एक कंज्यूमर जहां साल में 50 औनलाइन ट्रांजेक्शन करता है, वहीं औसतन एक भारतीय ग्राहक साल में 4-5बार ही औनलाइन खरीदारी करता है. इस की वजह यह है कि फैशन और अपैरल, ग्रोसरी, फर्नीचर और कन्ज्यूमर गुड्स की ज्यादातर खरीदारी अभी भी औफलाइन स्टोर्स से की जा रही है. इसलिए, नए ईकौमर्स मौडल में औफलाइन और औनलाइन का मिलाजुला रूप दिखना चाहिए. जो कंपनियां ऐसा करेंगी, उन का साइज काफी बड़ा हो सकता है.

अनुमान है कि वर्ष 2022 तक भारत का ईकौमर्स बाजार 150 बिलियन डौलर का हो जाएगा, जो कि अभी से 4 गुना ज्यादा होगा. यानी, देश के ईकौमर्स सेक्टर में बहुत अच्छी ग्रोथ होना निश्चित है.

अफगानिस्तान में लाइब्रेरी की फंडिंग पर ट्रंप ने उड़ाया मोदी का मजाक

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अफगानिस्तान में पुस्तकालय के लिए फंडिंग करने को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मजाक उड़ाया है. उन्होंने कहा कि युद्धग्रस्त देश में इसकी कोई आवश्यकता नहीं है.

ट्रंप ने देश की सुरक्षा के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाने को लेकर भारत और अन्य देशों की आलोचना भी की. भारत ने ट्रंप के इस बयान को खारिज कर दिया है.

आपको बता दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने बुधवार को साल की पहली कैबिनेट बैठक में विदेशों में अमेरिकी निवेश कम करने के अपने रुख को सही ठहराया. इसके साथ ही भारत, रूस, पाकिस्तान और अन्य पड़ोसी देशों से अफगानिस्तान की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने को कहा.

ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी का उदाहरण देकर कहा कि दुनिया के नेता अपने योगदान का बखान कर रहे हैं जबकि उनका योगदान अमेरिका की ओर से खर्च किए गए अरबों डौलर के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता. अमेरिका के राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री मोदी के साथ अपने मित्रवत संबंधों का जिक्र तो किया लेकिन अफगानिस्तान में पुस्तकालय के लिए भारत के धन मुहैया कराने की उन्होंने आलोचना भी की.

पुस्तकालय पर कहा, इतना तो हम 5 घंटे में खर्च कर देते हैं

गौरतलब है कि भारत अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण प्रयासों में सक्रिय रूप से शामिल है. ट्रंप ने कहा, ‘मैं आपको मेरे, भारत और प्रधानमंत्री मोदी के साथ अच्छे तालमेल का उदाहरण दे सकता हूं, लेकिन वह लगातार मुझे बता रहे हैं कि उन्होंने अफगानिस्तान में पुस्तकालय बनवाया. पुस्तकालय! इतना तो हम (अफगानिस्तान में) पांच घंटे में खर्च कर देते हैं.’

उन्होंने कहा, ‘और वह (मोदी) मुझे बताते हैं. वह बहुत समझदार हैं. हमें कहना चाहिए कि अरे! पुस्तकालय के लिए धन्यवाद, लेकिन मुझे यह समझ में नहीं आता कि अफगानिस्तान में कौन इसका इस्तेमाल कर रहा है? यह ऐसी कई बातों में से एक बात है. मुझे फायदा उठाया जाना पसंद नहीं है.’

ट्रंप ने अफगानिस्तान के शांति प्रयासों में अमेरिका और अन्य देशों द्वारा उठाए जाने वाले खर्चों की तुलना की. ट्रंप ने कहा कि बहुत धनी देश अपने बलों की सहायता के लिए अमेरिका का इस्तेमाल कर रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘कोई देश इराक के लिए हमें 200 जवान भेजता है या सीरिया या अफगानिस्तान के लिए कोई बड़ा देश 100 जवान भेजता है और फिर वे मुझे 100 बार बताते हैं.’

बाबा के इलाज से पेटदर्द बना सिरदर्द

पैसा और समय बचाने के चक्कर में लोग माहिर डाक्टर के पास जाने के बजाय सड़कछाप झोलाछाप डाक्टर से इलाज कराना ज्यादा बेहतर मानते हैं और अपनी जान का जोखिम लेने को भी तैयार हो जाते हैं. ऐसे लोग सड़क किनारे फुटपाथ पर ही तंबू तान कर बड़ा सा बैनर लटका कर बैठ जाते हैं. वहां हर तरह के मर्ज का इलाज करने का दावा किया जाता है. इन की मंसा पैसा ऐंठने की ज्यादा होती है. ये लोग ज्यादा पढ़ेलिखे भी नहीं होते हैं, पर इन के पास बड़ेबड़े नेताओं के साथ फोटो खिंचवाए गए होते हैं और दावा करते हैं कि ये लोग भी इन के पास इलाज कराने के लिए आया करते थे.

सड़क के किनारे एक ओर बैठ कर हर समस्या का समाधान करनेे का दावा करने वाले ठग बाबा की सलाह कभीकभार लोगों को इतनी भारी पड़ती है कि मरीज की जान के लाले पड़ जाते हैं. आखिर में थकहार कर इन्हें बड़े अस्पतालों की ओर रुख करना पड़ता है.

पेट साफ न होने की शिकायत पर 2 नौजवान माहिर डाक्टर के बजाय एक फुटपाथिया अंगूठाटेक बाबा के पास चले गए. ठग बाबा ने उन्हें सलाह देते हुए कहा कि वे गले तक टूथब्रश से सफाई करें. इस से मुंह के साथ पेट भी साफ हो जाएगा.

जब इन नौजवानों ने ऐसा किया तो ब्रश पेट के अंदर चला गया. नौबत आंतें फटने तक की आ गई. जब इन की हालत ज्यादा बिगडऩे लगी तो दोनों को दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भरती कराया गया.

एक शख्स उत्तर प्रदेश के आगरा का रहने वाला गौरव है. गौरव को अक्तूबर, 2018 में एम्स में भरती कराया गया वहीं दिल्ली के रहने वाले आबिद को एम्स के आपातकालीन विभाग में दिसंबर, 2018 में भरती कराया गया.

दोनों अलगअलग शहर से हैं, लेकिन समस्या एक जैसी थी. उन की आहार नली के रास्ते टूथब्रश उन के पेट में चला गया था. इस की वजह से दोनों को खानेपीने में बहुत परेशानी हो रही थी. दोनों का सिटी स्कैन हुआ तो पता चला कि पेट में ब्रश अटका हुआ था. इस के बाद डाक्टरों ने एंडोस्कोपी से ब्रश निकालने की कोशिश की, पर ब्रश आड़ा हो गया. इस के बाद गैस्ट्रोइंट्रोलौजी विभाग के डाक्टरों की मदद ली गई तब जा कर कहीं ब्रश निकाला जा सका.

इन दोनों नौजवानों ने तो समय रहते अपना इलाज करा लिया और काफी मशक्कत के बाद जान बच सकी, पर आजकल लोग इन बाबाओं के झांसे आ कर कुछ भी करगुजरने को तैयार हो जाते हैं, वहीं लड़कियां भी स्लिम यानी छरहरी होने के लिए खाना खा कर उलटी कर देती हैं. ये लड़कियां उलटी करने के लिए ब्रश के पिछले हिस्से को गले में डालती हैं और इसी क्रम में ब्रश अंदर चला जाता है और जान जाने के लाले पडऩे पर अस्पताल की ओर रुख करना पड़ जाता है.

शादी की पहली रात नईनवेली दुल्हन के इस कारनामे ने उड़ाए सबके होश 

अपने रूप के जाल में उस ने कईयों को फंसाया, उन से शादी की और फिर फरार हो गई. भागने से पहले वह घर का कीमती सामान और कैश भी समेट ले जाती थी.

पंजाब के अमृतसर में ऐसा ही एक मामला सामने आया है जब एक मैरिज साइट पर खूबसूरत युवती एक परिवार को दिखी तो उस से अपने बेटे की शादी की बात चलाई.

खुद को डाक्टर बताया

उस युवती ने अपना नाम अनीशा और खुद को एक डाक्टर बताया. लङका दुबई में सैटल है और पेशे से डाक्टर है.

उस परिवार को लगा कि बेटेबहू दोनों डाक्टर होंगे तो समाज में उन का रूतबा बढेगा, धनदौलत एकसाथ बरसेंगे. लिहाजा, दोनों की शादी धूमधाम से कर दी गई. युवती अब बहू बन कर भाटिया परिवार में आ चुकी थी.

सुहागरात के बाद हुई फरार

शादी के बाद सुहागरात के दूसरे ही दिन अनीशा ने अपना रंगढंग दिखाना शुरू कर दिया. एक रात वह सब को सोता छोङ, घर में पड़ी सारी नकदी, जेवरात व अन्य कीमती सामान समेट कर फरार हो गई. सुबह जब सब की नींद खुली तो सभी के होश फाख्ता हो गए. परिवार के लोगों को यह समझते देर न लगी कि वे लुट चुके हैं.

पुलिस में शिकायत

लुटेरिन बहू की शिकायत पुलिस में की गई तो पुलिसिया तफ्तीश में खुलासा हुआ कि वह एक धोखेबाज युवती है, जो महज 8वीं पास है. इस से पहले वह कई और लोगों को भी लूट चुकी है. उस के अपराधी प्रवृत्ति पर पिता ने उसे बेदखल भी किया हुआ है.

मैरिज साइट की भी शिकायत

लूट के शिकार भाटिया परिवार ने उक्त मैरिज साइट पर भी काररवाई की मांग की है, जिस ने युवती की प्रोफाइल बिना किसी तहकीकात के अपलोड कर दी.

ध्यान दें

आप भी विवाह साइटों पर आंख मूंद कर भरोसा न करें. अपने स्तर पर जांचपड़ताल करने के बाद ही शादी के लिए हामी भरें.

सावधान रहिए….

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