पूर्व कथा

पुरवा का पर्स चोर से वापस लाने में सुहास मदद करता है. इस तरह दोनों की जानपहचान होती है और मुलाकातें बढ़ कर प्यार में बदल जाती हैं. सुहास पुरवा को अपने घर ले जाता है. वह अपनी मां रजनीबाला और बहन श्वेता से उसे मिलवाता है. रजनीबाला को पुरवा अच्छी लगती है. उधर पुरवा सुहास को अपने पिता से मिलवाने अपने घर ले आती है तो उस के पिता सहाय साहब सुहास की काम के प्रति लगन देख कर खुश होते हैं.

इंजीनियर लड़के गौरव से श्वेता का विवाह तय हो जाता है. मिठाई  के डब्बे के साथ बहन की सगाई का निमंत्रण ले कर सुहास सहाय साहब के घर जाता है. सहाय साहब सुहास की तारीफ करते हुए अपने मित्रों को बताते हैं कि वह उस के लिए मोटरपार्ट्स की दुकान खुलवा रहे हैं.

श्वेता की सगाई पर आए सहाय साहब के परिवार से मकरंद वर्मा परिवार के सभी सदस्य उत्साहपूर्वक मिलते हैं.

सुहास व्यापार शुरू कर देता है, लेकिन कई बार काम के लिए बंध कर बैठना उस के लिए मुश्किल हो जाता क्योंकि किसी भी जगह जम कर रह पाना उस के स्वभाव में नहीं था.

अंतत: श्वेता के विवाह का दिन आ जाता है. उस दिन पुरवा का सजाधजा रूप देख कर सुहास दीवाना हो जाता है. पुरवा से शीघ्र विवाह करने के लिए सुहास दुकान पर मन लगा कर काम करने लगता है और शीघ्र ही पुरवासुहास का धूमधाम से विवाह हो जाता है.

पुरवा महसूस कर रही थी कि सुहास का ध्यान समाजसेवा में अधिक रहता है. वह दूसरों की मदद के लिए दुकान पर भी ध्यान न देता.

एक दिन श्वेता ससुराल से लड़झगड़ कर मायके आती है. पुरवा के समझाने पर वह उलटा पुरवा को ही सुहास द्वारा कुछ न कमाने का ताना देती है. यह बात सच थी इसीलिए पुरवा सब चुपचाप सुन लेती है लेकिन अब उस के दिमाग में श्वेता के शब्द गूंज रहे थे.

पुरवा अब निरंतर सुहास को उस की जिम्मेदारी का एहसास कराने की कोशिश करती. शीघ्र ही वह दिन भी आता है जब पुरवा को पता चलता है कि वह मां बनने वाली है. सुहास पापा बनने के सुखद एहसास से झूम उठता है.

अब पुरवा सुहास को आने वाले बच्चे के लिए जिम्मेदारी से कारोबार संभालने के लिए समझाती है.

थोड़े दिनों बाद पुरवा को पता चलता है कि सुहास पुराना कारोबार खत्म कर कंप्यूटर का कार्य आरंभ करना चाहता है तो वह हैरान हो जाती है और बेचैनी से सुहास के घर लौटने की प्रतीक्षा करने लगती है. लेकिन वह बेला भाभी के पति सागर को अस्पताल ले जाने के पीछे रात देर से घर आता है, पुरवा की तबीयत खराब होने पर अस्पताल में भरती कराया जाता है. उस का हालचाल पूछने बेला घर आती है तो पुरवा उस से थोड़ी तीखी बात करती है, तब सुहास पुरवा पर बिगड़ता है. सुहास से नाराज पुरवा अपने मातापिता के साथ मायके चली जाती है. सुहास के व्यवहार को ले कर वह विचारमंथन करती है.

आखिरकार एक दिन सुहास पुरवा को मनाने ससुराल पहुंच जाता है. पुरवा वापस जने की शर्त रखती है कि वह घर के गैराज में बुटीक खोलेगी और इस काम में वह उस की मदद करेगा. बुटीक की शुरुआत करने में  सुहास से ज्यादा रजनीबाला पुरवा की मदद करती है. बुटीक निर्माण जोरशोर से शुरू हो जाता है. एक दिन सागर और बेला आते हैं और बताते हैं कि सुहास ने राजनीति ज्वाइन कर ली है, सुन कर सब चौंक जाते हैं.

अब आगे…

हाल बहुत बड़ा था. पार्टी के लोग वहां जमा थे. सुहास को ले कर जब आकाश वहां पहुंचा तो एक पल को सुहास घबरा सा गया. हाल के बीचोंबीच गाव तकिए के सहारे जो व्यक्ति बैठा था और दूसरों को कुछ निर्देश दे रहा था उस की ओर इशारा कर के आकाश ने सुहास के कान में धीरे से कहा, ‘‘यह शुक्लाजी हैं, जा कर इन्हें प्रणाम कर लो.’’

सुहास ने आगे बढ़ कर शुक्लाजी को प्रणाम किया. आकाश तुरंत बोला, ‘‘भाईजी, यह सुहास है, कुछ दिन पहले ही इस ने अपनी पार्टी में कदम रखे हैं. अपने मकरंद वर्माजी का छोटा बेटा है.’’

‘‘अच्छाअच्छा…इन्हें भी चुनाव के काम में लगाइए,’’ शुक्लाजी ने सहज स्वर में कहा.

पार्टी के लोगों के साथ यह दोनों भी बैठ गए. भावी योजनाओं पर चर्चा होने लगी. पार्टी के कुछ प्रमुख लोगों ने अपने सुझाव दिए. सुहास सब ध्यान से देखसुन रहा था. जब मीटिंग समाप्त हो गई तब शुक्लाजी ने आकाश से कहा, ‘‘देखो आकाश, 17 को जो मीटिंग तय हुई थी उसे कुछ दिन आगे के लिए टाल देना.’’

‘‘जी, भाईजी,’’ आकाश ने विनम्रता से कहा.

शुक्लाजी को सभी सदस्य अधिकतर भाईजी कह कर ही संबोधित करते थे. केवल शुक्लाजी के हमउम्र सहयोगी ही उन्हें नरेन नाम से पुकारते थे. उन की बात पर पार्टी के वयोवृद्ध सदस्य फतेहसिंह ने हंसते हुए कहा, ‘‘क्यों शुक्ला, कुछ खास है क्या?’’

शुक्लाजी मुसकरा दिए और बोले, ‘‘कुछ खास नहीं है सिंह साहब, विदेश से पढ़ कर हमारी नातिन आ रही है. उस की नानी का मन है कि पार्टी रखी जाए.’’

‘‘यह तो बहुत अच्छा है. हमें बुलाओगे या टरकाने वालों की लिस्ट में रखोगे,’’ फतेहसिंहजी ने मजाकिया लहजे में कहा.

‘‘अरे, नहीं. ऐसा कैसे हो सकता है. आप सभी आइए.’’

चलते समय शुक्लाजी ने आकाश से फुसफुसा कर कहा, ‘‘घर आ कर जरा काम संभाल लेना.’’

उन की बात सुहास ने सुन ली थी. आकाश जब बाहर निकला तो सुहास लपक कर उस के साथ हो लिया, चलतेचलते बोला, ‘‘आकाश, जब भाईजी के घर जाना तो मुझे भी साथ ले चलना.’’

आकाश हंस दिया, ‘‘समझदार हो, राजनीति के पहले कदम पर बहुत जल्दी पांव जमा लोगे.’’

पुरवा और मां बहुत देर से सुहास की प्रतीक्षा कर रही थीं. सुहास आया तो मां ने कहा, ‘‘आज बहुत देर हो गई, कहां थे?’’

सुहास ने मां की बात सुनीअनसुनी करनी चाही पर मां ने फिर टोक दिया, ‘‘कितनी अजीब बात है, हमें दूसरों से तुम्हारी खबरें सुनने को मिलती हैं. तुम अपना काम छोड़ कर राजनीति वालों के पीछे भाग रहे हो, यह क्या ठीक है?’’

सुहास ढिठाई से हंस दिया और बोला, ‘‘आज हंस लो मां, गुस्सा कर लो पर एक दिन अपने बेटे पर गर्व करोगी.’’

‘‘जाओ, हाथमुंह धो लो,’’ पुरवा ने कहा तो आश्चर्य से उसे देख कर सुहास बोला, ‘‘अरे, आज तुम ने कोई भाषण नहीं दिया.’’

‘‘हां, जरूरत नहीं समझी,’’ पुरवा ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया और आंख मूंद कर पलंग पर लेट गई.

सुहास निकट पहुंचा और माथे पर हाथ रख कर बोला, ‘‘मुझे मालूम है पुरू, मैं एक योग्य पति साबित नहीं हो पाया हूं पर अब जो मैं करना चाहता हूं वह एक अच्छा पिता बनने की चाहत है, और कुछ नहीं.’’

सुहास ने देखा पुरवा की आंखों से कुछ बूंदें टपक कर उस के गालों पर ढुलक गई थीं. सुहास ने झुक कर उस की बंद गीली पलकों पर चुंबन ले लिया.

लान में कई कुरसियां पड़ी थीं.  पुरवा धीरेधीरे टहलते हुए आ कर एक कुरसी पर बैठ गई. डाक्टर की राय से नित्य प्रात: टहलने का कार्यक्रम वह लान में घूम कर ही पूरा कर लेती थी. थोड़ी देर में मां भी आ कर वहीं बैठ गईं और बोलीं, ‘‘कैसी तबीयत है इस समय? रात को तुम्हारी तबीयत बहुत ढीली थी.’’

‘‘घूमने से अच्छा लग रहा है,’’ पुरवा ने कहा.

‘‘शाम तक एकदम ठीक हो जाओगी न?’’ मां ने किंचित चिंता जाहिर करते हुए पूछा तो पुरवा हंस कर बोली, ‘‘आप चिंता न करें मांजी, मैं शाम को आप को भागतीदौड़ती मिलूंगी.’’

कितनी चिंता रहती है मां को, पुरवा ने सोचा, जिसे इस समय सब से अधिक उस की चिंता करनी चाहिए वह जाने किन लोगों की देखभाल में जुटा रहता है. ऐसी बातें सोचते ही पुरवा का मन खिन्न हो उठता था.

‘‘सुहास कहां है?’’ मां ने पूछा.

‘‘तैयार हो रहे हैं. शायद कोई पार्टी मीटिंग है,’’ पुरवा ने उदासी से कहा. ‘‘जाने यह क्या नया रोग लगा लिया है अब,’’ मां ने भी उदासी से कहा. ‘‘जाने कब एक समझदार और जिम्मेदार व्यक्ति बनेगा. काश, राजनीति में ही कुछ ठोस काम कर के दिखाए.’’

‘‘मां, उम्मीद पर दुनिया कायम है, और इस उदाहरण पर मैं आज भी गहरी आस्था रखती हूं कि सुहास अवश्य अब एक नई दिशा में सफलता प्राप्त कर के दिखाएंगे.’’

‘‘मैं भी तो इसी आशा पर जी रही हूं. शायद मेरे पालनपोषण में ही कुछ कमी रह गई है,’’ मां ने बहुत दुखी मन से कहा. तभी सुहास बाहर आ गया.

घड़ी की तरफ देखते हुए सुहास बोला, ‘‘मां, मैं जा रहा हूं पर जल्दी आ जाऊंगा.’’

‘‘शाम को पुरवा के बुटीक का उद्घाटन होना है. यह याद रहेगा कि नहीं,’’ मां ने कहा.

‘‘याद कैसे नहीं रहेगा,’’ उस ने पुरवा की ओर प्यार से देखा, ‘‘आज पुरू का एक सपना साकार होने वाला है तो याद तो रहेगा ही.’’

सुहास आकाश के घर पहुंचा तो वह तैयार खड़ा था.

‘‘देखो, तुम्हारा फोन मिलते ही चल पड़ा,’’ सुहास ने प्रसन्नता से कहा.

‘‘चलो भई, तुम भी इन बड़ेबड़े नेताओं की सेवा का लाभ उठा लो,’’ आकाश ने हंस कर कहा.

‘‘सेवा कैसी, बड़े हैं और फिर इतने मधुर स्वभाव के हैं. उन के निकट रह कर कुछ सीखने को मिलेगा,’’ सुहास ने अपना पक्ष स्पष्ट किया.

‘‘तरक्की करेगा बच्चे,’’ आकाश ने व्यंग्य किया.

शुक्लाजी के घर दोनों पहुंचे तो वहां काफी भीड़ थी. सभी उन को घेरे हुए थे. सुहास यह समझ गया कि वे सभी लोग या तो कुछ कार्य करने को उत्सुक थे अथवा उन के बताए कार्यों का विवरण उन्हें दे रहे थे.

धीरेधीरे आकाश भी उन के निकट पहुंच गया और साथ में सुहास भी. शुक्लाजी दोनों को देख कर मुसकराए और उन का अभिवादन स्वीकार किया. आकाश से बोले, ‘‘अरे, आकाश, अच्छा हुआ तुम आ गए. भई वह तुम्हारा खास हलवाई चाहिए.’’

‘‘जी, भाईजी, उस से मैं बात करते हुए ही यहां आया हूं,’’ आकाश ने तुरंत कहा.

‘‘यह बहुत अच्छा किया,’’ शुक्लाजी गद्गद स्वर में बोले, ‘‘उस के हाथों में जादू है. उसे आज ही यहां बुला लो तो मैं उसे विस्तार से सब समझा दूंगा.’’

आकाश अपना मोबाइल आन कर के कुछ दूर चला गया.

सुहास ने अवसर देख कर झट से कहा, ‘‘भाईजी, मेरे योग्य कोई सेवा.’’

शुक्लाजी पुन: मुसकराए. एक व्यक्ति उन के पास खड़ा हो कर कुछ बातें धीरेधीरे करने लगा तभी आकाश आ गया और उन्हें हलवाई के बारे में बताने लगा.

सुहास को लगा कि शुक्लाजी के निकट पहुंचने के लिए अभी उसे धैर्य रखना पड़ेगा.

अचानक शुक्लाजी ने उस की तरफ देखा और अपने निकट बुलाया. सुहास प्रसन्नता से खिल उठा. शुक्लाजी बोले, ‘‘सुना है आप की जानपहचान का दायरा बहुत बड़ा है. हर जाति, हर धर्म वालों से बहुत अच्छे संबंध हैं.’’

‘‘जी हां, भाईजी,’’ सुहास ने दोनों हाथ जोड़ दिए.

‘‘हमें आप जैसे नवयुवकों की ही जरूरत है. आप हमारे चुनावी अभियान में बहुत सहायता कर सकते हैं.’’

‘‘आप आज्ञा दीजिए, भाईजी,’’ सुहास के मन में प्रसन्नता की लहर किसी झरने सी बह चली थी जो थमने का नाम ही नहीं ले रही थी. शुक्लाजी ने भी उसी उत्साह से कहा, ‘‘अभी तो आप पार्टी के लिए जेनरेटर वालों को साधिए, बहुत जरूरी है. आजकल बत्ती कब गुल हो जाए पता नहीं चलता.’’

सुहास ने उसी समय से कार्य पर जुट जाना अपना परम कर्तव्य समझा और वहां से द्रुत गति से चल पड़ा.

पुरवा के बुटीक का उद्घाटन करने के लिए मां ने शहर की प्रमुख समाज सेविका मनोरमा जैन को बुलाया था. उन के अलावा और भी गण्यमान्य लोग आने वाले थे. उद्घाटन के बाद जलपान की व्यवस्था थी.

बुटीक फूलों व आम के पत्तों से सजा हुआ था. ऊपर नया बोर्ड चमक रहा था जिस पर लिखा था : ‘पुरवाई बुटीक.’

अतिथि आने लगे थे. इस अवसर पर पुरवा के मम्मीपापा भी आए थे. सुहास की मां और पापा बड़ी बेचैनी से उस की प्रतीक्षा कर रहे थे. पुरवा भी मन ही मन सुहास के लापरवाह स्वभाव पर खीज रही थी. कई बार सुहास ने मोबाइल खरीदने की इच्छा जाहिर की थी पर पुरवा ने फुजूल खर्च कह कर रोक दिया था, पर इस समय उस को लग रहा था कि सुहास से निरंतर संपर्क बनाए रखने के लिए उस की यह इच्छा भी पूरी कर ही दी जानी चाहिए. आज पुरवा का बहुत बड़ा स्वप्न पूरा हो रहा था, इसलिए उस की प्रसन्नता का कोई अंत नहीं था. ऐसे में वह सुहास की हर गुस्ताखी नजरअंदाज करने को तैयार थी.

जब पंडाल पूरी तरह भर गया और मनोरमा जैन पधार गईं तब मां ने पुरवा से पूछा, ‘‘अब क्या करें? सुहास तो अभी तक नहीं आया. उस की पार्टी के दफ्तर में 2 बार फोन किया पर वह कहां है यह पता नहीं चला.’’

पुरवा ने कुछ पल सोचा फिर बोली, ‘‘अब कार्यक्रम तो होगा ही मां, आप फीता कटवाइए.’’

मनोरमाजी ने चमकती हुई नई कैंची से फीता काट कर ‘पुरवाई बुटीक’ का उद्घाटन किया और तालियों की गड़गड़ाहट में बधाइयों का तांता लग गया.

मां ने प्यार से पुरवा को गले लगा लिया तो दोनों की आंखें मारे खुशी के भीग गईं. 2 पीढि़यों में कुछ कर गुजरने के उत्साह का वह अनोखा संगम था. पुरवा की मम्मी ने उसे प्यार करते हुए कहा, ‘‘अगर आप पुरवा को इस तरह नहीं संभालती तो यह दिन अभी नहीं आता.’’

जलपान के बाद एकएक कर के सभी विदा हो गए. मनोरमाजी ने सब को संबोधित करते हुए जो भाषण दिया था उस का टेप भी संभाल कर रख लिया गया. पुरवा इस महत्त्वपूर्ण दिन की हर बात संजो कर रखना चाहती थी. इसीलिए एक फोटोग्राफर भी बुला लिया गया था.

अपने बुटीक में बैठ कर पुरवा बारबार सोच रही थी कि आखिर वह कुछ कर पाने में सफल हो ही गई है. कहां सोचा था उस ने कि नौकरी करने की जिद करतेकरते एक दिन वह अपना व्यवसाय शुरू कर देगी. सचमुच जीवन कब कौन सा रंग दिखाए यह सोचना कठिन है. लग रहा था कि खेल ही खेल में उस के हाथों में जिंदगी का मकसद आ गया है.

बहुत देर बाद सुहास ने चहकते हुए घर में कदम रखा, ‘‘देखो तो पुरवा, मैं तुम्हारे लिए क्या उपहार लाया हूं.’’

उस के एक हाथ में फूलों का गुलदस्ता था और दूसरे में एक लिफाफा. पुरवा के कुछ बोलने से पहले ही मां ने कुछ क्रोध से कहा, ‘‘अब घर की याद आई है. सारे मेहमान तुम्हारी प्रतीक्षा कर के चले गए.’’

‘‘इतनी लापरवाही अच्छी बात नहीं है,’’ पापा ने भी रुष्ट स्वर में कहा.

‘‘सौरी पापामम्मा, पर आप सुनेंगे तो आप का सारा क्रोध अपनेआप दूर हो जाएगा,’’ सुहास ने उन्हें मनाने के स्वर में कहा. फिर वह पुरवा के हाथ में गुलदस्ता पकड़ाते हुए बोला, ‘‘नई कामयाबी की बधाई.’’

‘‘धन्यवाद सुहास, इस सफलता के हिस्सेदार तुम भी हो.’’

‘‘हां, तभी तो…’’ उस ने चहक कर दूसरे हाथ का लिफाफा पुरवा को पकड़ा दिया, ‘‘देखो तो अपना उपहार.’’

‘‘क्या है यह?’’ पुरवा उसे खोलने लगी.

सुहास अदा के साथ हंसने लगा तो मांपापा ने उत्सुकता से कहा, ‘‘ऐसा क्या है जो इतनी अदा से मुसकरा रहा है.’’

पुरवा ने तब तक अंदर से कागज निकाल लिया था. पढ़तेपढ़ते वह भी मुसकरा पड़ी, ‘‘अरे, यह तो हमारी बुटीक के लिए बहुत बड़ा आर्डर है.’’

अब तो मांपापा भी सारा क्रोध भूल कर प्रसन्नता से खिल उठे थे.

‘‘थैंक्स सुहास, बहुत बड़ा उपहार दिया है तुम ने.’’

रात को सोने से पहले सुहास ने पुरवा से क्षमायाचना करते हुए कहा, ‘‘नाराज तो नहीं हो न?’’

पुरवा ने पहले ही सोच लिया था कि आज वह अपनी खुशी में ग्रहण नहीं लगने देगी, इसीलिए हंस कर बोली, ‘‘नहीं सुहास, तुम काम ही तो कर रहे थे.’’

सुहास ने चैन से आंखें मूंद लीं और कहा, ‘‘कल एक और बड़ा कार्य करना है पुरवा.’’

‘‘वह क्या?’’ पुरवा ने पूछा.

‘‘भाईजी ने सुझाया है कि मैं पार्षद के लिए नामांकनपत्र भर दूं तो शायद कल यह कार्य भी हो जाए.

पुरवा लेटतेलेटते उठ कर बैठ गई, ‘‘सच?’’

‘‘तुम्हें अच्छा लगा पुरू?’’ पुरवा का उत्साहित चेहरा देख कर सुहास भी खुश हो गया.

‘‘हां, सुहास,’’ पुरवा की आंखों में एक अनोखी सी चमक कौंध उठी थी. उस चमक के बीच कहीं भूलेबिसरे सपनों के जाग उठने की आहट भी थी.

पार्टी आफिस में बहुत गहमागहमी थी. निर्वाचन को कुल 2 दिन शेष थे. प्रचार का कार्य भी बस, समाप्त होने को था. सुहास जैसेजैसे इस नए कार्यक्षेत्र में धंसता जा रहा था, वैसेवैसे उस का रोमांच भी बढ़ रहा था. हर पल उस को लगता था कि शायद वह इसी कार्य को सब से अधिक लगन से कर सकता है.

पुरवा ने उसे मोबाइल अपनी तरफ से उपहार में देते हुए कहा, ‘‘यह ‘पुरवाई बुटीक’ के उद्घाटन की खुशी में मेरी ओर से तुम्हारे लिए.’’

‘‘इस की आजकल बहुत जरूरत थी पुरवा, पर मुझे स्वयं क्यों नहीं यह खयाल आया?’’

पुरवा मुसकरा कर बोली, ‘‘पत्नी इसीलिए तो होती है कि भूलीबिसरी बातों का ध्यान रख सके.’’

सुहास ने प्यार से उस के कपोल का चुंबन ले लिया और कहा, ‘‘तुम देखना पुरवा, अब मैं सचमुच कुछ बन कर दिखाऊंगा. बस, तुम इसी तरह सदा मेरा उत्साह बढ़ाती रहना.’’

बहुत दिनों बाद पुरवा को सुहास में अपना पुराना प्रेमी और पति नजर आया था. सुहास को भी लगने लगा था कि वही पुरानी पुरवा हर पल उसे साथ देने को हर मोड़ पर खड़ी है.

प्रचार का कार्य समाप्त हो चुका था. सुहास देर रात से घर पहुंचा तो पता चला कि पुरवा को सब अस्पताल ले गए हैं. मांपापा दोनों घर पर नहीं थे. नौकर ने बताया कि सागर और बेला भी साथ ही गए हैं.

‘‘और मुझे खबर नहीं दी गई,’’ सुहास परेशान हो उठा.

‘‘बहूरानी ने मना कर दिया था,’’ घर के पुराने नौकर बंशी ने कहा.

सुहास जल्दी से अस्पताल पहुंचा. पुरवा ‘लेबररूम’ में थी. मां ने उसे देखते ही कहा, ‘‘पुरवा जानती थी कि आजकल तुम वास्तव में बहुत व्यस्त हो इसीलिए उस ने तुम्हें अभी फोन न करने के लिए मना किया था.’’

सागर और बेला ने सुहास की परेशानी भांपते हुए समझाया, ‘‘भई, हमेशा तुम दूसरों के लिए दौड़ते हो तो आज हमें भी तो अवसर मिलना चाहिए न.’’

‘‘फिर भी, इस समय उस को मेरे साथ की सख्त जरूरत होगी.’’

‘‘पुरवा तुम्हारा यह हाल देखती तो मन ही मन खुश जरूर होती,’’ बेला ने मजाक किया.

‘‘इस समय मैं उस से मिल तो सकता हूं,’’ सुहास ने व्यग्रता से कहा.

‘‘नहीं, वह लेबररूम में है,’’ मां ने सुहास को समझाया.

इतनी देर में पुरवा के मम्मीपापा भी वहां पहुंच गए. सब को प्रतीक्षा थी एक शुभ समाचार की.

रात 10 बजे के लगभग सुहास का मोबाइल बज उठा. उधर से आकाश था.

‘‘कहो, आकाश?’’ सुहास टहलते हुए कुछ दूर चला गया था. आकाश की घबराई हुई आवाज आई, ‘‘जल्दी चले आओ सुहास. यहां दूसरी पार्टी वालों से झड़प में गोली चल गई है.’’

‘‘क्या?’’ सुहास परेशान हो बोला, ‘‘किसी को लगी तो नहीं?’’

‘‘भाईजी की बांह चीर कर गोली निकल गई है. हम उन्हें ले कर सिटी अस्पताल जा रहे हैं,’’ आकाश ने कहा.

‘‘मैं सिटी अस्पताल में ही हूं. तुम पहुंचो जल्दी,’’ सुहास ने बेचैनी से सामने देखा. परिवार वाले चिंता में या तो टहल रहे थे या बैठेबैठे करवट बदल रहे थे.

बड़ा विचित्र सा अनुभव था सुहास के लिए. पत्नी एक जीव को धरती पर लाने के लिए अपने जीवन से संघर्ष कर रही थी. दूसरी तरफ उस का नया कार्यक्षेत्र उसे बुला रहा था. उसे बारबार पुरवा के साथ की जरूरत महसूस हो रही थी. एक वही तो है जो सुहास को हर अवस्था में मानसिक सहारा देती है.

सुहास का मन अपने लिए ही छटपटा उठा. यह कैसी बेचारगी है. पुरवा ठीक ही कहती है कि आगे बढ़ते समय इधरउधर नहीं देखते हैं. बढ़ने का मतलब है बस अपने लक्ष्य को साधना. उस समय पुरवा की बात याद कर के उस के व्याकुल मन को बड़ी राहत सी महसूस हुई. वह धीरेधीरे चल कर पापा के पास पहुंचा और बोला, ‘‘पापा, भाईजी को गोली लगी है और वह इसी अस्पताल में आ रहे हैं. मैं जरा देख कर आता हूं.’’

सुहास चला गया पर परिवारजन के मन में नई उथलपुथल छोड़ गया. एक तरफ वे लोग पुरवा के लिए चिंतित थे दूसरी तरफ यह एक नया तूफान. देर तक खामोशी रही. सब से पहले पुरवा के पापा ने कहा, ‘‘यह राजनीति का खेल भी अब बहुत खराब होता जा रहा है.’’

‘‘अभी क्यों, यह तो हमेशा से ऐसा ही है,’’ सुहास के पापा ने चिंता व्यक्त की.

‘‘अब सुहास को कौन समझाए. अच्छाभला काम शुरू किया, पर सब छोड़छाड़ कर राजनीति में कूद पड़ा,’’ पुरवा की मम्मी व्यग्रता से बोलीं.

मां चुपचाप सुनती रहीं. उन का सारा ध्यान पुरवा की ओर लगा हुआ था.

भाईजी को रात भर के लिए अस्पताल में ही रोक लिया गया. गोली बांह को चीरती हुई निकल गई थी अत: पट्टी बांध कर उन्हें रात भर डाक्टरी निरीक्षण में रखा गया था, पर वह वापस जाने की जिद कर रहे थे. इतने कष्ट में भी उन्हें बस, होने वाले चुनाव की चिंता थी.

सुहास का आधा ध्यान पुरवा में लगा हुआ था पर तुरंत वापस जाना भी संभव नहीं था.

पार्टी के काफी सदस्य वहां उपस्थित थे. कलपरसों क्या करना है, आगे क्या होने वाला है इसी विषय पर चर्चा कर रहे थे.

सुहास की चिंतित मुद्रा देख कर आकाश निकट आ गया. उस की पीठ पर सांत्वना का स्पर्श भरा हाथ रख कर बोला, ‘‘भाईजी तो रात भर यहीं रहने वाले हैं. तुम्हें अभी भाभीजी के पास होना चाहिए.’’

सुहास ने विवशता से उसे देखा और कहा, ‘‘मैं 23 नंबर के कमरे में हूं, जरूरत पड़े तो फौरन बुला लेना.’’

वहां पहुंचते ही सब के खिले हुए चेहरे देख सुहास उत्सुकता से बोला, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘बधाई हो, तुम्हें पापा कहने वाली प्यारी सी गुडि़या आ गई है,’’ मां ने जैसे ही बताया वह कमरे की ओर दौड़ा तो पापा ने टोका, ‘‘अभी वार्डरूम में आने वाली है. सागर और बेला उसे लेबररूम से ले कर आ रहे हैं.’’

सुहास का मन पुरवा और अपनी बच्ची को देखने के लिए व्याकुल हो रहा था. पुरवा की मम्मी भी स्ट्रेचर के साथ ही आ रही थीं. आते ही सुहास को उन्होंने व सागर और बेला ने भी बधाई दी, कुछ देर के लिए सब ने उसे अकेले ही कमरे में जाने दिया.

पुरवा उसे देख कर धीरे से मुसकराई. बच्ची को झुक कर प्यार करते हुए सुहास बोला, ‘‘कैसी हो?’’

‘‘मेरी पदोन्नति हो गई है. पत्नी थी, अब मां भी बन गई हूं.’’

‘‘और मेरी भी तो हो गई है,’’ सुहास ने उस के माथे का चुंबन लेते हुए अपनी खुशी जाहिर की. तभी नर्स वहां आ गई. बोली, ‘‘लक्ष्मी आई है आप के घर. बहुत सुंदर बेबी है.’’

अस्पताल से घर आने तक सुहास अधिकतर पुरवा के निकट ही बना रहा. भाईजी चूंकि उसी अस्पताल में थे अत: उसे अधिक देर को कहीं नहीं जाना पड़ता था, पर पुरवा को घर पहुंचा कर उस का कार्य भाईजी के लिए बढ़ गया. पार्टी के लिए अब सुहास आकाश से भी अधिक विश्वसनीय हो गया था.     -क्रमश:

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