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धोनी के खेल ने खेल कर दिया

हम भारतीयों का भी जवाब नहीं. अगर कल के मैच में महेंद्र सिंह धोनी ने भारत को हरवा दिया होता तो यकीनन वे ही इस सदी के सब से बड़े विलेन बनते. इस की एक बड़ी वजह यह है कि उन का पिछला साल कुछ खास नहीं गया था. अब उन्होंने 3 मैचों में लगातार 3 हाफ सैंचुरी लगा तो दी हैं पर उन्होंने अपना मैच फिनिशर का वह अलहदा रंग नहीं दिखाया है जो वे अकसर दिखाते रहे हैं. आज उन की वनडे इंटरनैशनल मैचों में 70वीं हाफ सैंचुरी का जो राग अलापा जा रहा है वह थोड़ा सा बेसुरा है. बेसुरा इसलिए कि इस वनडे सीरीज में उन का नाम आना खुद में चौंकाने वाली बात थी. उन पर वर्ल्ड कप से पहले एक दांव खेला गया था. वे 37 साल के हो चुके हैं और क्रिकेट में इतनी उम्र में खिलाड़ी रिटायरमैंट की दहलीज पर खड़े होते हैं.

लेकिन महेंद्र सिंह धोनी के लिए यह सीरीज डूबते को तिनके का सहारा साबित हुई है. इस सीरीज पर ही बात करें तो भारत और औस्ट्रेलिया के खिलाफ सिडनी में हुए पहले वनडे मैच में भारत को 34 रनों की हार मिली थी. इस की गाज उन्हीं पर गिरी थी. उन्होंने 96 गेंदों में सिर्फ 51 रन बनाए थे. उन्होंने अपने पहले 6 रन 37 गेंदों में बनाए थे. उन की फिफ्टी 93 गेंदों पर बन गई थी. बाद की 3 गेंदों में वे महज एक ही रन बटोर सके थे. इतने समय बाद लगी यह फिफ्टी हार के चलते फीकी पड़ गई थी.

पिछले 10 सालों की बात करें तो भारतीय बल्लेबाजों में यह तीसरी सब से धीमी पारी थी. इस से पहले महेंद्र सिंह धोनी ने साल 2017 में  वैस्टइंडीज के खिलाफ 108 गेंदों में फिफ्टी लगाई थी.

एडिलेड में हुए दूसरे वनडे मैच में महेंद्र सिंह धोनी जरूर अपने रंग में दिखे थे और उन्होंने तेज खेलते हुए 54 गेंदों में नाबाद 55 रन बनाए थे. लेकिन साथ ही हमें दिनेश कार्तिक की पारी को भी नहीं भूलना चाहिए. उन्होंने महज 14 गेंदों में 25 रन ठोंक डाले थे. लेकिन यह पारी माही का मनोबल बढ़ाने के लिए काफी थी.

मेलबर्न में हुए तीसरे वनडे मैच की स्क्रिप्ट तो मानो माही को देख कर ही लिखी गई थी. टॉस जीत कर पहले गेंदबाजी करने का कप्तान विराट कोहली का फैसला भारत के हक में साबित हुआ. ऑस्ट्रेलिया ने 50 ओवर पूरे न खेल कर 230 रन बनाए थे. भारत के लिए सीरीज जीतने का यह शानदार मौका बन गया था. पर भारत ने अपने पहले 3 विकेट 113 के स्कोर पर गंवा दिए. लोग फिर धोनी की और देखने लगे. वे एक छोर पर जरूर जमे रहे थे लेकिन उन से बड़े शॉट्स नहीं लग पा रहे थे. वह तो भला हो केदार जाधव का जिन्होंने शुरुआत में जमने में थोड़ा समय लिया लेकिन बाद में भारत को जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई. धोनी भी कम नहीं रहे. स्टेडियम से दर्शकों की आती ‘माही मार रहा है’ की आवाज ने उन का हौसला बढ़ाया. उन्हें पता था कि अगर वे अंत तक क्रीज पर रहेंगे तो भारत के जीतने के चांस ज्यादा बढ़ जाएंगे. ऐसा ही हुआ भी. उन्होंने 114 गेंदों पर नाबाद 87 रनों की मैच जिताऊ साहसिक पारी खेली.

अब भारतीय क्रिकेट टीम का अगला पड़ाव न्यूजीलैंड में है. वहां की गड़बड़झाला पिचों और बिदकते मौसम में महेंद्र सिंह धोनी अपनी बल्लेबाजी के कितने इंद्रधनुष बिखेरेंगे, इस पर सब की नजर रहेगी

आम बजट का शिगूफा : किसानों के लिए बन रही लुभाती योजना

3 राज्यों में करारी हार के बाद भारतीय जनता पार्टी की सरकार के कान भी तन गए हैं. कांग्रेस शासित तीनों राज्यों में कुरसी संभालते ही मुख्यमंत्रियों ने किसानों को खुश करने के लिए कर्जमाफी का ऐलान कर उन्हें तोहफा तो दे ही दिया है. भले ही इस का फायदा कुछ ही किसानों को मिले. क्योंकि उस में शर्त ही कुछ ऐसी है कि 2 लाख तक के ही कर्जे माफ होंगे. नीति आयोग ने कहा है कि सभी किसानों को इनकम सपोर्ट के रूप में हर साल प्रति हेक्टेयर 15,000 रुपए दिए जा सकते हैं. इस के लिए नीति आयोग ने डायरैक्ट बैनेफिट ट्रांसफर के जरीए अपफ्रंट सब्सिडी का सुझाव दिया है.

नीति आयोग ने कहा है कि उर्वरक, बिजली, फसल बीमा, सिंचाई और ब्याज में छूट देने के साथ ही खेतीबारी से जुड़ी हर तरह की सब्सिडी की जगह इनकम ट्रांसफर की व्यवस्था अपनाई जाए.

तेलंगाना और ओडिशा सरकार ने किसानों को मदद देने के लिए कृषि कर्जमाफी के बजाय इनकम सपोर्ट का सिस्टम अपनाया है. कई राज्यों में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस सरकारों ने कर्जमाफी का ऐलान किया था. इस पर केंद्र ने कहा है कि ऐसी कर्जमाफी से असल समस्या खत्म नहीं होती है.

एग्रीकल्चर सैक्टर को हर साल 2 लाख करोड़ रुपए से भी ज्यादा की इनपुट सब्सिडी मिलती है. देश में अगर खेती वाले रकबे को ध्यान में रखा जाए तो यह इनपुट सब्सिडी प्रति हेक्टेयर 15,000 रुपए बनती है. वहीं पौलिसी बनाने वालों की दलील थी कि सब्सिडी से आम आदमी का भला नहीं हो पा रहा है. उन का कहना है कि कुछ मामलों में इस का प्राकृतिक संसाधनों पर बुरा असर भी पड़ता है.

नीति आयोग का मानना है कि एक ऐसा मैकेनिज्म बनाने का विचार है, जिस से खेती सैक्टर की परेशानी दूर हो, सब्सिडी वाले यूरिया और बिजली का गलत इस्तेमाल रुके और किसानों को आर्थिक आजादी मिले. इस से सब्सिडी वाले फर्टिलाइजर को दूसरी इंडट्रियों में ले जाने की हरकत भी रुकेगी.

सरकार का मानना है कि खेतीबारी से ही आमदनी बढ़ाई जाए तो बात बनेगी. इस के अलावा सीधे किसानों को पैसा देने से उन्हें फसल चुनने की आजादी मिलेगी और फिर्टिलाइजर हो या बिजली, केवल सब्सिडी वाले आइटम को ध्यान में रख कर काम नहीं करना होगा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2015 में कहा था कि सरकार साल 2022-23 तक किसानों की आमदनी को दोगुना करना चाहती है. इस के लिए 10 फीसदी सालाना से ज्यादा की ग्रोथ रेट की जरूरत है, लेकिन कृषि उत्पादन की रफ्तार इस से कहीं ज्यादा पीछे चल रही है, जिस के चलते खेती की आमदनी में गिरावट आ रही है.

अनुमान यह भी है कि खेतीबारी से आमदनी इतनी नहीं होगी कि खेती पर निर्भर 53 फीसदी परिवारों को गरीबी से उबारा जा सके क्योंकि उन के पास जमीन कम है. कई परिवारों के पास तो एक हेक्टेयर से भी कम जमीन है.

हालांकि केंद्र सरकार को ऐसे प्रोग्राम में भागीदारी के लिए राज्यों को राजी करना होगा. अभी खेती में सब्सिडी का आधा हिस्सा राज्य सरकार देती है. यह कम दाम पर बिजली और नहरों से सिंचाई सुविधा के रूप में भी होती है. फर्टिलाइजर सब्सिडी केंद्र की ओर से आती है वहीं बीज पर सब्सिडी केंद्र और राज्य मिल कर देते हैं.

वहीं दूसरी ओर लखनऊ में योगी सरकार के आम बजट पर चुनावी छाप पड़नी तय है. एक ओर प्रयागराज में पैसा खुल कर खर्च किया जा रहा है, हैलीकौप्टर से फूल बरसाए जा रहे हैं वहीं आम बजट में किसानों को लुभाने की खास कवायद होगी. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वित्त विभाग के अधिकारियों के साथ बजट की तैयारियों में इस पर भी ध्यान दिया है.

लोकसभा का चुनाव भले ही नरेंद्र मोदी के चेहरे पर होगा, लेकिन आकलन योगी सरकार के कामकाज का भी माना जाएगा इसलिए पिछले 2 साल में किए गए कामों के साथ ही इस बार के बजट में जनता तक तुरंत फायदा पहुंचाने की योजनाओं पर ध्यान दिया जाएगा.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सभी सैक्टरों के लिए पैसा आवंटन करने को कहा है. साथ ही, गरीबों, कमजोर तबकों  को सीधा फायदा पहुंचाने वाली योजनाओं पर वे खासा ध्यान दे रहे हैं, वहीं किसानों के लिए भी ऐसी योजनाएं आ सकती हैं. दूसरी ओर निर्धनों के लिए नई पैंशन स्कीम की संभावनाएं भी तलाशने को कहा गया है.

आम बजट में किसानों को खुश करने के लिए कहीं सब्सिडी के रूप में ज्यादा छूट दे कर तो कहीं कर्जमाफी दे कर संभावनाएं तलाशी जा रही हैं तो कहीं इन योजनाओं को बना कर तुरत अमलीजामा पहनाने की कोशिश की जा रही है. किसानों के लिए अब नए बाजार तलाशे जा रहे हैं. किसानों के चेहरे की मुसकान बनी रहे, ऐसी योजनाओं का खाका खींचा जा रहा है, पर लोकसभा चुनाव में ऊंट किस करवट बैठेगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा.

इस मौत का जिम्मेदार आखिर है कौन?

एक शख्स करीब 3 महीने पहले अपनी 9 साल की मासूम भांजी के साथ हुए रेप की घटना में न्याय के लिए दरबदर भटका. पुलिस से ले कर प्रतिनिधियों तक के दरवाजे खटखटाए पर न तो उसे कहीं न्याय मिला और न ही दिलासा. मजबूरन उस ने खुदकुशी कर ली.

यह सनसनीखेज वारदात उत्तरी दिल्ली के बुराडी स्थित स्वरूप नगर थाने की है. खुदकुशी करने वाला शख्स एक सरकारी स्कूल में गार्ड की नौकरी करता था, जहां 17 जनवरी को उस का शव मिलने से सनसनी फैल गई. पुलिस ने शव को बरामद कर पोस्टमार्टम कराने के बाद परिजनों को सौंप दिया है और आगे की तफ्तीश में जुटी है.

सच्चाई जान कर रौंगटे खड़े हो जाएंगे

वारदात के बाद जो सच्चाई सामने आ रही है उसे जान कर किसी के भी रौंगटे खड़े हो जाएं.  दरअसल, मृतक शख्स अपनी 9 साल की भांजी के साथ कथित तौर पर हुए रेप की घटना से दुखी था. वह चाहता था कि आरोपियों पर कानूनी कारवाई हो. वह रेप के आरोपियों को सजा दिलाने में आगे आया तो उस के साथ मारपीट की जाने लगी, मानसिक प्रताड़ना और धमकियां दी जाने लगीं.

मरने से पहले क्या किया उस ने

यह शख्स जब पुलिस के पास गया तो वहां भी उसे उचित सहायता नहीं मिली. मजबूरन उस ने वीडियो में पूरी व्यथा रिकौर्ड की, आरोपियों के नाम पत्र लिख कर खुदकुशी कर ली.

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आरोप है कि मृतक गार्ड की भांजी के साथ करीबन 3 महीने पहले पड़ोस के ही नाबालिग लड़के ने रेप किया था. आरोपी को पुलिस ने पकड़ा भी था. केस को खत्म करने को ले कर दूसरे पक्ष से दबाव बनाया जाने लगा. जब लड़की का मामा मृतक गार्ड नहीं माना तो उसे धमकियां दी जाने लगीं. उस के साथ मारपीट भी की गई.

पुलिस ने नहीं दिया साथ

पीड़ित परिवार ने आरोप लगाया है कि पुलिस मदद करने के बजाय उलटे हमें ही धमकाती रही. इस बात से गार्ड काफी डरा हुआ था. रात के समय जब वह बुराडी के कादीपुर स्थित राजकीय विद्यालय में चौकीदारी करने गया तो सुबह उस का शव पंखे से झूलता हुआ मिला. उस ने पंखे से फांसी लगा कर खुदकुशी कर ली.

खुदकुशी से पहले उस ने जो वीडियो बनाया और जो कुछ कहा वह हैरान कर देने वाला है.

इस घटना ने एक बार फिर दिल्ली की कानून व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाए हैं. मृतक शख्स अगर आरोपियों को कानूनी रूप से सजा दिलाना चाहता था तो उसे कानून पर ही भरोसा करना चाहिए था न कि आत्महत्या कर लेनी चाहिए थी.

सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि कानून व्यवस्था पर से उस का भरोसा टूटता नजर आया और उसे हर जगह निराशा हाथ लगी तो उस ने खुद को समाप्त करने की योजना बना डाली.

इस मौत का जिम्मेदार कौन

इस सनसनीखेज वारदात के बाद लोगों में गुस्सा है तो वहीं घटना ने सियासी रंग दिखाने भी शुरू कर दिए हैं. घटना के बाद जाहिर है कोई कानून को कोसेगा तो कोई पुलिस को. कोई अफसोस जाहिर कर रहा होगा कि आत्महत्या समाधान नहीं है, व्यवस्था से लड़ाई लड़नी चाहिए. मौत को गले लगाना तो खुद अपनेआप में एक अपराध है.

पर यह भी सही है कि समय रहते शायद इस शख्स को कहीं से न्याय की उम्मीद नहीं मिली. न तो कानून का सहारा मिला न ही लोगों और न ही नेताओं का साथ मिला.  सवाल वही है, जिस का शायद ही कोई जवाब दे पाए- इस मौत का जिम्मेदार आखिर है कौन?

DSLR कैमरों पर भारी, स्मार्टफोन्स की शातिर कैमराकारी

आप अपने स्मार्टफोन से दिन भर में किए गए कौल्स और फोटो क्लिक्स के नंबर्स देखेंगे तो जान जायेंगे कि आपका फोन कौल्स से ज्यादा तस्वीरें क्लिक करने में जाया हो रहा है. इस बात पर हम भले ही गौर न करते हों लेकिन स्मार्टफोन्स कंपनियां बराबर नजर रखती हैं कि उनके यूजर्स फोन के किस फीचर का इस्तेमाल सबसे ज्यादा करते हैं. और जब उन्हें पता चलता है कि हम अपने फोन से कौल्स कम और सेल्फियां ज्यादा खींचते हैं, तो वे भी अपने हार्डवेयर में कैमरे को अधिक से अधिक इन्हैंस करने पर जोर देती हैं.

वीजीए से डिजिटल तक

यह सिलसिला पहले मोबाइल कंपनियों द्वारा वीजीए कैमरों से शुरू हुआ और फिर मेगापिक्सल की लड़ाई में तब्दील हो गया. हर कंपनी अपने फोन को ज्यादा से ज्यादा मेगा पिक्सल की क्वालिटी वाले कैमरे के साथ बाजार में उतारती है. मानो वे बात करने की टाकिंग डिवाइस नहीं बल्कि कैमरा बेच रहे हैं. उपभोक्ता भी इसमें रूचि लेता है और इस रुचि के चक्कर में बाजार से डिजिटल कैमरे आउट हो गए.

हर कोई शादी, बारात और बर्थ दे पार्टीज में और ट्रेवल के दौरान मोबाइल से बेहतरीन तस्वीरें निकालने लगा तो डिजिटल कैमरों की जरूरत खत्म हो गयी. सिर्फ बड़े और शाही फंक्शस के लिए DSLR जैसे प्रोफेशनल कैमरे ही अस्तित्व में रह गए.

हालांकि जब से स्‍मार्टफोन्‍स में 2 डुअल रियर कैमरे और 24 मेगापिक्‍सल तक के फ्रंट कैमरे आना शुरु हुए हैं,  तब से लोगों को शानदार तस्‍वीरें लेने के लिए DSLR जैसे प्रोफेशनल कैमरे की याद नहीं आती. पर अगर आपके पास इतने हाईपावर कैमरे वाला स्‍मार्टफोन अबतक नहीं है, तो कोई बात नहीं क्योंकि अब इन की तकनीक पर मोबाइल कंपनियां नजर लगा चुकी हैं. लिहाजा ऐसे स्मार्ट फोन बाजार में उतार रही हैं जो आपके मोबाइल कैमरे को ऐसी पावर देंगी, जिससे DSLR लेवल की तस्‍वीरें खींचना आप‍के लिए हंसी खेल हो जाएगा.

DSLR लेवल के मोबाइल कैमरे

मोबाइल्स में कैमरे को अपग्रेड कर उन्हें नए लेवल पर ले जाने के लिए OnePlus ने कमर कस  ली है. OnePlus 6T के अच्छे रिस्पोंस के बाद अब स्मार्टफोन मेकर कंपनी वनप्लस नए स्मार्टफोन पर काम कर रही है जिसका नाम OnePlus 7 बताया जा रहा है.  इसकी कुछ पिक्स और फीचर इंटनेट पर लीक हो चुके हैं और इन पर भरोसा किया जाये तो वनप्लस 7 में DSLR जैसा कैमरा होगा.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, वनपल्स 7 के कैमरे से आप 10 गुना तक जूम कर पाएंगे और क्वालिटी खराब नहीं होगी. यानी जो काम DSLR जैसे प्रोफेशनल कैमरे करते हैं वही काम यह स्मार्टफोन भी कर सकेगा. इस फीचर के तहत औल-स्क्रीन डिस्प्ले होगी जिसमें किसी भी प्रकार की नौच नहीं दी गई. वनप्लस 7 में फ्रंट कैमरा स्लाइडर मौजूद हो सकता है. इस तरह का सेल्फी कैमरा हम पहले Vivo Nex में देख चुके हैं. भारत में यह स्मार्टफोन करीब 38,990 की कीमत में लौन्च हो सकता है. लेकिन सवाल यही है कि फोन का इस्तेमाल बात करने के लिए हैं या तस्वीरे खींचने के लिए.

जाहिर है सबका जवाब यही होगा कि अगर फोन बात करने के साथ तसवीरें भी अच्छी खींचें तो बुराई क्या है. आजकल तो शौर्ट फिल्म्स और रिपोर्टिंग भी हाई रेजोल्यूशन वाले मोबाइल कैमरों से होने लगी है. लिहाजा कोई भी DSLR जैसे प्रोफेशनल कैमरे का भार नहीं उठाना चाहता. जब पौकेट में कैमरा आ जाए तो किसे चाहिए DSLR. हालांकि प्रोफेशनल फोटोग्राफी अभी भी DSLR पर ही निर्भर है. और मोबाइल्स इस के विकल्प बन सकेंगे, कहना मुश्किल है.

पर हां, इतना जरूर है कि जो अपने मोबाइल कमरों से बेहतर क्वालिटी या कहें DSLR के लेवल की तस्वीरें लेने के लिए Snapseed, Google Camera,  Retrica, Camera 360 Ultimate और Candy Camera जैसी एप्लीकेशंस के भरोसे बैठते थे उन्हें अब अपने फोन में ये फीचर मिल जाएगा.

खुद की ही दुश्मन है तकनीक

तकनीक जैसे-जैसे अपग्रेड होती हैं, अपने पुराने वर्जन्स को लील जाती है. जैसे सांप अपने ज्यादातर अंडों को निगल जाता है, कुछ बच जाते हैं, वैसे ही नई तकनीक पुरानी और आउटडेटेड तकनीक को निगल जाती है. कभी DSLR यानी Digital Single Lens Reflex  रील पर फोटो कैप्चर करने वाले SLR कैमरे की तकनीक को खा गया था. अब इसे कोई और खाने को तैयार है. यह कुछ कुछ लौ औफ नेचर जैसा है. जहां सर्वाइवल चैन बनी है, ऊपर वाला नीचे वाले को खाता है अपने सर्वाइवल के लिए.

सहेली को न बताएं हर राज

जन्म से मिले रिश्तों के अलावा हर इंसान के जीवन में अपने बनाए कुछ रिश्ते भी होते हैं, जिन में दोस्त या सहेलियों का स्थान काफी महत्वपूर्ण होता है. खासतौर पर महिलाएं और लड़कियां पक्की सहेलियों से अपने दिल की हर बात शेयर करना चाहती हैं. हर राज बांटना चाहती हैं.

ख्याल रखें कुछ बातें ऐसी भी होती हैं जिन का जिक्र सहेलियों के आगे कभी भी नहीं करना चाहिए क्योंकि आज जो आप की सहेली है या आप के क्लोज है उस से भविष्य में रिश्ते खराब भी हो सकते हैं. ऐसे में यदि वह किसी गलत व्यक्ति के आगे आप के राज खोल दे या स्वयं ही ब्लैकमेल करने लगे तो आप क्या करेंगी? इसलिए अपने दिल में कुछ राज दबा कर रखना जरूरी है.

कुछ राज जो सहेली से कभी शेयर न करें

आर्थिक स्थिति का खुलासा : कई दफा बातों ही बातों में हम अपनी सहेली के आगे अपनी या अपने बौयफ्रेंड /पति की अमीरी का जिक्र बढ़चढ़ कर कर जाते हैं. ऐसी बातों से बचना चाहिए क्योंकि समय का कोई भरोसा नहीं. कब आप की सहेली के दिमाग में खुराफात पैदा हो और कब वह इस का फायदा उठाने का प्रयास करें या फिर आप के बौयफ्रेंड को ही आप से चुरा ले, इस का आप अंदाजा भी  नहीं लगा सकेंगी.

इसी तरह आर्थिक कमजोरी और बुरे हालातों की चर्चा कर आप  सहेली की नजरों में अपनी वैल्यू घटा सकती हैं. इसलिए बेहतर होगा कि आप अपनी वास्तविक आर्थिक स्थिति की जानकारी कभी भी सहेली को न दें.

बैंक और इंवेस्टमेंट डिटेल्स : कभी भूल कर भी अपनी सहेली के आगे अपने बैंक के कागजात खोल न बैठें और न ही उस से यह सब बातें शेयर करें कि आप ने कहां कहां और कितने रुपए इन्वेस्ट किये हैं या फिर आप की आगे की फाइनेंशियल प्लानिंग क्या है. जरूरत पड़ने पर भी कभी अपने एटीएम कार्ड का पासवर्ड सहेली को न बताएं. वह कभी भी इन जानकारियों का गलत इस्तेमाल कर सकती है.

बौयफ्रेंड /पति  से जुड़ी सीक्रेट बातें : अपनी सहेली से बौयफ्रेंड के घर का एड्रेस, फोन नंबर या बौयफ्रेंड के साथ अपनी पर्सनल तस्वीरें शेयर न करें. कभी इस बात का ढिंढोरा न पीटे कि आप का बौयफ्रेंड बहुत अमीर है या आप उस से कब और कहां मिलने जा रही हैं. ऐसे में सहेली के लिए आपके बौयफ्रेंड को चुराने की संभावना बढ़ जाती है. इसी तरह पति से जुड़ी जानकारियां, पतिपत्नी से जुड़ी पर्सनल बातें, कभी सहेली से डिसकस न करें. संभव है आप की हितैषी बनने का नाटक करते करते वह आप के लिए ही गड्ढा खोद दे.

बिजनेस सीक्रेट्स : यदि आप कोई बिजनेस चला रही हैं या उस की तैयारी कर रही हैं तो इस बाबत हर बात खोल कर सहेली से न बताएं. खासतौर पर यदि आप एक बड़े व्यवसाय की नींव रख रही है तो उस से जुड़े बिजनेस सीक्रेट्स कभी भी सहेली से डिस्कस न करें क्योंकि वह इस का गलत फायदा भी उठा सकती है.

अपने एक्स के बारे में : महिलाएं /लड़कियां अक्सर भावनाओं में बह कर अपने दिल का हर हाल सहेली से बता देती हैं. यदि आप का कोई अतीत है  और वह अब आप की जिंदगी में नहीं है. आप वर्तमान जीवनसाथी या बौयफ्रेंड के साथ खुश हैं तो फिर अपने एक्स का जिक्र भूल कर भी सहेली से न करें और न ही उस की कोई तस्वीर ही दिखाएं. यदि आप की सहेली को यह सब पता चल गया तो वह आप से रिश्ता बिगड़ने पर अपनी खुन्नस निकाल सकती है. ब्लैकमेलिंग से ले कर आप के पति या बौयफ्रेंड को भड़काने तक के लिए इस  जानकारी को जरिया बना सकती है.

जिंदगी में हुआ कोई ऐसा हादसा जिस ने आप को शर्मिंदा किया हो : आप ने जिंदगी में कितने  भी सम्मान और तरक्की के काम किए हो उन की चर्चा अधिक नहीं होती. मगर कोई ऐसा हादसा हुआ हो जिस ने आप की नजरें नीचे की तो  उस बात को उछालने के लिए लोग हमेशा तैयार मिलेंगे. भले ही आप अपनी सहेली पर कितना भी यकीन करती हों, मगर इस संदर्भ में उस पर कभी भी यकीन मत कीजिए. क्योंकि समय और रिश्ते बदलते देर नहीं लगते.

हेयर मेकओवर से पहले दें इन बातों पर ध्यान

अक्सर महिलाएं अपनी पर्सनालिटी को निखारने व लुक को सवारने के लिए नए नए हेयर स्‍टाइल और तरह तरह के हेयर कलर को ट्राई करना पसंद करती हैं. लेकिन कोई भी हेयर स्‍टाइल और हेयर कलर अपनाने से पहले इस बात को समझ लें कि बाजार में जो कुछ भी ट्रेंड में है, वह जरूरी नहीं है कि आप पर भी सूट करे. इसलिए अगली बार जब भी आप अपने बालों का मेकओवर करवाने की सोंचे तो नीचे दिये हुए निर्देशों का पालन करना बिल्‍कुल भी ना भूलें.

गलत हेयरकट

जब भी आप नया हेयरकट करवाने जाएं तो अपनी हेयरस्‍टाइल को बोलें की आप पर जो भी हेयरस्‍टाइल सूट करेगा उसका सैंपल आपको दिखाएं. अगर आपके बाल पतले हैं तो उनका हेयरस्‍टाइल बाउंस देने वाला हो. याद रखें कि दिल के शेप के चेहरे वाले बालों में सेंटर पार्टिंग नहीं होनी चाहिये. मिडिल पार्टीशन उन्‍हीं पर अच्‍छी लगती है जिनका चेहरा चौकोर हो, साइड पार्टीशन गोल चेहरे पर और ओवल चेहरे पर बीच का पार्टीशन अच्‍छा दिखता है.

हेयर कलर

चमकदार रेड, बरगन्‍डी और कौपर रेड भारतीय महिलाओं पर अच्‍छा दिखता है. यह हेयर कलर तभी लगवाने चाहिये जब आपको पूरी तरह से लगे कि ये आप की स्‍किन टोन कर सूट करेगें.

समय समय पर हेयरकट

बाल बीच से कमजोर हो जाते हैं और फिर दो मुंहे बन जाते हैं. समय समय पर हेयरकट करवाने से बाल स्‍वस्‍थ्‍य दिखते हैं. इसलिए यह आपके लिए बेहद जरूरी है कि अच्छए और स्वस्थ बालों के लिए आप हर छ: महीने पर उन्हें ट्रिम करवाएं.

पतले बालों के लिये

अगर आपके बाल बहुत पतले हैं तो कभी भी रेजर हेयरकट न करवाएं क्‍योंकि इससे बाल और भी ज्‍यादा पतले और कम दिखाई देने लगेगें. इसके अलावा आप लेयर या ब्‍लंट बाटम हेयरकट करवाएं, इससे बालों में वौल्‍यूम आएगा. पतले बालों में कभी भी चिपचिपा हेयर प्रोडक्‍ट न लगाएं.

खानपान की आदतें नहीं बदली तो हमें भुगतने होंगे बुरे अंजाम

धरती के लिए और खुद को स्वस्थ रखने के लिए बेहद जरूरी है कि हम अपने खानपान की आदतों में बड़ा बदलाव करें. हाल ही में एक जर्नल में 50 पन्नों की एक रिपोर्ट पेश की गई है जिसमें लोगों को उनके खानपान में बदलाव करने के सुझाव दिया गया हैं. रिपोर्ट में दुनिया की बढ़ती आबादी के संदर्भ में दुनिया की सबसे बड़ी चुनौती सेहतमंद भोजन को बताया गया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि 2050 तक दुनिया की आबादी 10 अरब के पार हो जाएगी. तब लोगों की सबसे बड़ी समस्या केवल भूख मिटाने की नहीं बल्कि सेहतमंद भोजन की होगी.

रिपोर्ट की माने तो दुनिया भर में बिमारी के जिम्मेदार कारकों में 6 कारक हमारी आहार से संबंधित हैं. असुरक्षित यौन संबंधों और नशीले पदार्थों के सेवन के मुकाबले खराब खानपान की वजह से ज्यादा बीमारियां और मौतें हो रही हैं.

रिपोर्ट में ये बात सामने आई है कि अनहेल्दी डाइट के कारण से करीब 11 मिलियन लोग समय से पहले मौत का शिकार हो रहे हैं. खान-पान में बदलाव करके ये मौतें रोकी जा सकती हैं. इसमें कहा गया है कि चीनी और रेड मीट की वोश्वीक खपत को आधा करना जरूरी है और सब्जियों, फलों की मात्रा को दुगना करने की बात कही गई है.

कई जानकारों का मानना है कि मनुष्य अभी बेहद ही भयंकर स्थिति में है. वर्तमान में करीब एक अरब लोग भुखमरी का शिकार है जबकि 2 अरब लोग अस्वस्थ आहार बहुत ज्यादा खा रहे हैं. नतीजतन, लोग मोटापा, हार्ट की समस्याएं और डायबिटीज जैसी बीमारियों के ज्यादा शिकार हो रहे हैं.

स्टडी में संसाधनों के अधिकतम खपत पर भी बात की गई है. रिपोर्ट के मुताबिक, 40 फीसदी भूमि का प्रयोग खेती में किया जा रहा है और इसमें 70 फीसदी ताजे पानी की भी खपत हो रही है. अनाजों के उत्पादन की वजह से 30 फीसदी कार्बन उत्सर्जन भी हो रहा है.स्टडी में प्रतिदिन 2500 कैलोरी की डाइट लेने की बात कही गई है.

कर्ड राइस रेसिपी

सामग्री

– पके हुए चावल (१/२ कप)

– ताज़ा दही (२ कप)

– नारियल का तेल/ अन्य तेल (१ टेबल-स्पून)

– सरसों (१ टी-स्पून)

– ज़ीरा (१ टी-स्पून)

– उड़द दाल (१ टेबल स्पून)

– हरी मिर्च, कड़ी पत्ता

–  हींग (१/२ टी स्पून)

– नमक (स्वादानुसार)

–  कटा हुआ हरा धनिया (२ टेबल-स्पून)

बनाने की विधि

– चावल और दही को एक बाउल में मिलाकर, आलू मैशर का प्रयोग कर, हल्के हाथों से     मसल लें और एक तरफ रख दें.

– कढ़ाई में तेल गरम करें और सरसों डालें.

– जब बीज चटकने लगे, ज़ीरा, उड़द दाल, हरी मिर्च, कड़ी पत्ते और हींग डालकर,   लगातार हिलाते हुए मध्यम आंच पर 1 मिनट तक भुन लें.

– चावल-दही का मिश्रण, नमक और धनिया डालकर अच्छी तरह मिला लें.

–  और गरमा गरम परोसें.

‘‘बौम्बैरिया : यातना दायक फिल्म’’

गवाह की सुरक्षा के अहम मुद्दे पर अति कमजोर पटकथा व घटिया दृष्यों के संयोजन के चलते ‘बौम्बैरिया’ एक घटिया फिल्म बनकर उभरती है. बिखरी हुई कहानी, कहानी का कोई ठोस प्लौट न होना व कमजोर पटकथा के चलते ढेर सारे किरदार और कई प्रतिभाशली कलाकार भी फिल्म‘‘बौम्बैरिया को बेहतर फिल्म नहीं बना पाए.

फिल्म की शुरूआत होती है टीवी पर आ रहे समाचारनुमा चर्चा से होती है. चर्चा पुलिस अफसर डिमैलो के गवाह को सुरक्षा मुहैया कराने और अदालत में महत्वपूर्ण गवाह के पहुंचने की हो रही है.फिर सड़क पर मेघना (राधिका आप्टे) एक रिक्शे से जाते हुए नजर आती हैं. सड़के के एक चौराहे पर एक स्कूटर की उनके रिक्शे से टक्कर होती है और झगड़ा शुरू हो जाता है. इसी झगड़े के दौरान एक अपराधी मेघना का मोबाइल फोन लेकर भाग जाता है. और फिर एक साथ कई किरदार आते हैं. पता चलता है कि मेघना मशहूर फिल्म अभिनेता करण (रवि किशन) की पीआर हैं. उधर जेल में वीआईपी सुविधा भोग रहा एक नेता (आदिल हुसैन )अपने मोबाइल फोन के माध्यम से कई लोगों के संपर्क में बना हुआ है. वह नहीं चाहता कि महत्वपूर्ण गवाह अदालत पहुंचे. पुलिस विभाग में उसके कुछ लोग हैं, जिन्होने कुछ लोगों के फोन टेप करने रिक्शे किए है और इन सभी मोबाइल फोन के बीच आपस में होने वाली बात नेता जी को अपने मोबाइल पर साफ सुनाई देती रहती है. पुलिस कमिश्नर रमेश वाड़िया (अजिंक्य देव) को ही नहीं पता कि फेन टेप करने की इजाजत किसने दे दी. नेता ने अपनी तरफ से गुजराल (अमित सियाल) को सीआईडी आफिसर बनाकर मेघना व अन्य लेगों के खिलाफ लगा रखा है. अचानक पता चलता है कि फिल्म अभिनेता  करण की पत्नी मंत्री ईरा (शिल्पा शुक्ला) हैं और वह पुनः चुनाव लड़ने जा रही हैं, तो वहीं एक प्लास्टिक में लिपटा हुआ पार्सल की तलाश नेता व गुजराल सहित कईयों को है, यह पार्सल स्कूटर वाले भ्रमित कूरियर प्रेम (सिद्धांत कपूर) के पास है.तो वहीं एक रेडियो स्टेशन पर दो विजेता अभिनेता करण कपूर से मिलने के लिए बैठे है, पर अभिनेता करण कपूर झील में नाव की सैर कर रहे हैं. तो एक पात्र अभिषेक (अक्षय ओबेराय) का है, वह मेघना के साथ क्यों रहना चाहता है, समझ से परे हैं. कहानी इतनी बेतरीब तरीके से चलती है कि पूरी फिल्म खत्म होने के बाद भी फिल्म की कहानी समझ से परे ही रह जाती है. यह सभी पात्र मुंबई की चमत्कारिक सड़क पर चमत्कारिक ढंग से मिलते रहते हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो नेता के किरदार में आदिल हुसैन को छोड़कर बाकी सभी कलाकार खुद को देहराते हुए नजर आए हैं.

पिया सुकन्या निर्देशित फिल्म ‘बौम्बैरिया’ में संवाद है कि : ‘मुंबई शहर संपत्ति के बढ़ते दामों और बेवकूफों की सबसे  बड़ी तादात वाला शहर है.’’शायद इसी सोच के साथ उन्होने एक अति बोर करने वाली फिल्म का निर्माण कर डाला. पिया सुकन्या की सोच यह है कि मुंबई शहर के लोगां के दिलां में अराजकता बसती है. पिया सुकन्या ने दर्शकों को एक थकाउ व डरावने खेल यानी कि ‘पजल’ को हल करने के लिए छोड़कर अपने फिल्मकार कर्म की इतिश्री समझ ली है.

एक घंटा अड़तालिस मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘बौम्बेरिया’ का निर्माण माइकल ई वार्ड ने किया है. फिल्म की निर्देशक पिया सुकन्या, पटकथा लेखक पिया सुकन्या, माइकल ईवार्ड और आरती बागड़ी, संगीतकार अमजद नदीम व अरको प्रावो मुखर्जी,कैमरामैन कार्तिक गणेश तथा इसे अभिनय से संवारने वाले कलाकार हैं- राधिका आप्टे, आदिल हुसैन, सिद्धांत कपूर,अक्षय ओबेराय, अजिंक्य देव, शिल्पा शुक्ला,रवि किशन व अन्य.

रेटिंग : एक स्टार

72 आवर्स : कमजोर पटकथा के बावजूद सराहनीय प्रयास..

बौलीवुड में बायोपिक फिल्में काफी बन रही हैं. ‘‘72 आवर्स मर्टियार हूं नेवर डाइड’भी 1962 में भारत-चीन युद्ध के समय तीन सौ चीनी सैनिकों के साथ लगातर 72 घंटे तक युद्ध करते हुए शहादत पाने वाले राइफलमैन जसवंत सिंह रावत की बायोपिक फिल्म है. फिल्म का मर्म समझने के लिए फिल्म में सूत्रधार का संवाद ‘‘तुम्हारे आने वाले कल के लिए उन्होंने अपना आज कुर्बान कर दिया’’ काफी है. गणतंत्र दिवस से पहले इस फिल्म का सिनेमाघरो में पहुंचना एक अच्छा प्रयास है. मगर कमजोर पटकथा के चलते फिल्म अपना प्रभाव छोड़ने में असफल रहती है.

फिल्म की कहानी गढ़वाल में एक गरीब और अभावग्रस्त परिवार में पले बढ़े जसवंत सिंह रावत (अविनाश ध्यानी) हैं. बड़ी मुश्किल से उसके पिता गुमान रावत (वीरेंद्र सक्सेना) उसे साइकल खरीदने के लिए पैसे देते हैं, मगर कुछ गलत लोग उससे यह पैसा छीन लेते हैं. उसके बाद वह अपनी घरेलू जिम्मेदारीयों का निर्वाह करने और अपने बूढ़े लीना रावत (अलका अमीन) व  पिता गुमान रावत (वीरेंद्र सक्सेना) के कंधों का भार कम करने के लिए फौज में फर्ती हो जाते हैं. फौज की कड़ी ट्रेनिंग और सक्षम फौजी बनने के बाद वह अपने घर खुशहाली लाता है. पर छुट्टी खत्म होते ही पता चलता है कि चीन ने हमारे देश पर हमला कर दिया है. अपनी जांबाजी के साथ राइफलमैन जसंवत सिंह गढ़वाल राइफल की चौथे बटालियन के फौजियों के साथ असम के लिए निकल पड़ता है. असम से उनकी पलटन को तवांग और अरूणाचल प्रदेश के नाभा में भेजा जाता है, जहां उनकी पलटन को रक्षा कैंप तैयार करना है. तब जसवंत सिंह रावत अपने कर्नल को आश्वस्त करते हुए कहते हैं- ‘‘हम लोग लौटें ना लौटें, ए बक्से लौटें न लौटें, लेकिन हमारी कहानियां लौटती रहेंगी…’’उगश्त के दौरान जसवंत की मुलाकात वहां के गांव की लड़की नूरा (येशी देमा) से होती है. नूरा, जसवंत से प्रेम करने लगती हैं और उससे वादा करती है कि जसवंत के सीने पर लगने वाली गोली को वह खुद झेल लेगी. जल्द ही ऐतिहासिक जंग शुरू हो जाती है. जहां पलटन को सैनिकों की गिनी चुनी तादाद ठंड से बचाव के लिए गरम कपड़ों का अभाव और सीमित गोला बारूद जैसी चुनौतीयों का सामना करना पड़ता है. कर्नल (शिशिर शर्मा) मदद न मिलने पर फैसला लेने की जिम्मेदारी हवलदार सीएम सिंह(मुकेश तिवारी) को सोंपता है. पलटन के कई जवानों के शहीद और घायल होने के बाद हवलदार अपनी पोस्ट को छोड़कर जाने का निर्णय लेते हैं. मगर राइफलमैन जसवंत सिंह रावत को यह मंजूर नहीं.

वह अपनी पोस्ट पर डटे रहने का फैसला करते हैं. इस फैसले पर टिके रहने के लिए उन्हें अपनी जान की बाजी लगानी पड़ती है. इस जंग में अकेले रह जाने पर उसका साथ देने नूरा आती है, मगर वह भी शहीद हो जाती है. इसके बावजूद जसवंत सिंह रावत हार नहीं मानते और लगातार 72 घंटो तक पोस्ट पर डटे रहकर 300 से भी ज्यादा चीनी सैनिकों का खात्मा करते हैं.

एक अच्छे मकसद के साथ बनायी गयी अविनाश ध्यानी की यह फिल्म कमजोर पटकथा के चलते लड़ खड़ा गयी है. इंटरवल से पहले फिल्म की कहानी सधी हुई लगती है, मगर इंटरवल के बाद फिल्म गड़बड़ा गयी. लेखक, निर्देशक व अभिनेता की एक साथ कई जिम्मेदारी निभाते हुए बतौर लेखक अविनाश ध्यानी मात खा गए. इंटरवल के बाद कई दृश्यों में दोहराव नजर आता है. फिल्मकार गढ़वाल राइफल के जवानों की वीरता व जांबाजी की भावना को उकेरने में सफल रहे हैं. मगर क्लायमेक्स से पहले नूरा व जसवंत की प्रेम कहानी के दृश्य अस्वाभाविक व अविश्वसनीय नजर आते हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो राइफलमैन जसवंत सिंह रावत के किरदार में अविनाश ध्यानी ने पूरा न्याय किया है. नूरा के किरदार में येशा देमा आकर्षित करती हैं. अन्य कलाकार भी अपने अपने किरदारों में फिट बैठे हैं.

फिल्म‘‘72 आवर्स-मर्टियार हूं नेवर डाइड’’ का निर्माण जे एस रावत, तरूण सिंह रावत, प्रशील रावत, लेखक व निर्देशक अविनाश ध्यानी, संगीतकार असलम केई, कैमरामैन हरीश नेगी और कलाकार हैं- अविनाश ध्यानी, वीरेंद्र सक्सेना, अलका अमीन, मुकेश तिवारी, शिशिर शर्मा, गिरीश सहदेव, प्रशील रावत, संजय बोस व अन्य.

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