Download App

बॉलीवुड कलाकारों ने बनाए हैं ऐसे अनोखे रिकॉर्डस

वैसे तो बॉलीवुड अपनी कुछ खास विशेषताओं के कारण दुनिया भर में जाना ही जाता है. इसके साथ ही हमारे हिंदी सिनेमा के कुछ सितारों और फिल्मों ने ऐसे अनोखे ओर अजीब रिकार्डस अपने नाम कर रखे रखें हैं जो शायद ही आपको कहीं देखने को मिलेंगे. तो आइये जानते हैं…

कुमार सानू : एक दिन में सबसे ज्यादा गाने रिकॉर्ड किये.

उस समय के महान और होनहार गायक कुमार सानू ने साल 1993 में एक दिन में 28 गाने रिकॉर्ड करके, एक दिन में सबसे ज्यादा गाने गाकर रिकॉर्ड करने का यह अनोखा रिकॉर्ड अपने नाम किया था.

कपूर फैमिली : लार्जेस्ट स्क्रीन फैमिली का रिकॉर्ड.

आपको ये जानकर हैरानी तो नहीं होनी चाहिए कि साल 1929 से अब तक, कपूर उपनाम के साथ, इस कपूर फैमिली ने, हिन्दी सिनेमा या बॉलीवुड को 24 से भी ज्यादा एक्टर्स, एक्ट्रेसेज और कई उम्दा कलाकार दिए हैं.

जगदीश राज : सबसे ज्यादा बार फिल्मों में पुलिस अफसर बनने का रिकॉर्ड.

हालांकि, सुनने में तो ये आपको बड़ा बोरिंग लग सकता है पर ये सच है. दुनिया का ये अनोखा रिकार्ड बनाया है, बॉलीवुड अभिनेता जगदीश राज ने. इन्होंने पूरी 144 फिल्मों में केवल पुलिस अफसर का रोल निभाया है.

फिल्म कहो न प्यार है : सबसे ज्यादा अवॉर्ड जीतने वाली फिल्म.

साल 2002 में रिलीज हुई ऋतिक रोशन और अमीषा पटेल की फिल्म कह न प्यार है, ने कुल मिलाकर 92 अवॉर्ड्स अपने नाम किए थे. अब तक ऐसी कोई और फिल्म नहीं रही है जिसे एक साथ इतने अवार्डस प्राप्त हुए हों.

आशा भोसले : मोस्ट रिकॉर्डेड आर्टिस्ट.

साल 1947 से अब तक आशा 20 अलग-अलग भाषाओं में कुल 11000 गाने रिकॉर्ड करा चुकी हैं. ये बात शायद आप जानते होंगे कि साल 2011 में आशा जी का नाम गिनीज बुक में दर्ज हुआ था.

समीर रंजन : सबसे ज्यादा गाने लिखने का रिकॉर्ड.

लगभग 2 साल पहले, 15 दिसंबर 2015 को आई एक रिपोर्ट के अनुसार, संगीतकार समीर रंजन ने 650 फिल्मों में कुल 3524 गाने लिखे हैं. ये तो वाकई एक सराहनीय रिकार्ड है.

लव एंड गॉड : सबसे लंबी प्रोडक्शन अवधि वाली फिल्म.

साल 1986 में रिलीज हुई फिल्म लव एण्ड गॉड का प्रोडक्शन 20 साल से ज्यादा चला था. इस फिल्म के दौरान साल 1964 में फिल्म के लीड एक्टर गुरु दत्त और इसके बाद साल 1971 में फिल्म के डायरेक्टर के.आसिफ की म्रत्यू हो गई थी.

बाद में अभिनेता संजीव कुमार को लीड रोल में लेकर इस फिल्म को पूरा कर रिलीज किया गया था.

सुनील दत्त : किसी भी फिल्म में सबसे कम एक्टर्स का रिकॉर्ड.

साल 1964 में सुनील दत्त ने फिल्म ‘यादें’ बनाई थी. 113 मिनिट्स की ये फिल्म सिर्फ अभिनेता सुनील दत्त पर ही फीचर्ड थी. ये तो वाकई आपनो गजब कर दिया.

ललिता पवार : अभिनेत्री के तौर पर लॉन्गेस्ट फिल्म करियर का रिकॉर्ड.

साल 1928 से 1998 तक 70 साल के करियर में ललिता पवार ने 700 से ज्यादा फिल्मों में काम किया था. उन्होंने 12 साल की उम्र में ही फिल्मों में एंट्री ली थी.

बाहुबली : द बिगनिंग : वर्ल्डस लार्जेस्ट फिल्म पोस्टर.

साल 2015 में रिलीज हुई इस फिल्म के पोस्टर का एरिया 51,598.21 वर्गफीट था, जो कि किसी फिल्म के लिए बनाए गए पोस्टर्स में अब तक सबसे बड़ा है.

अशोक कुमार : मुख्य भूमिका में रहने का सबसे लंबा बॉलीवुड करियर.

साल 1936 से बॉलीवुड कदम रखने वाले, अभिनेता अशोक कुमार ने 63 साल तक फिल्मों में काम किया. 80 के दशक में उन्हें कुछ टीवी शोज में भी देखा गया था.

खूबसूरत त्वचा के लिए लगाइये टमाटर का जूस

टमाटर से आप अपनी त्‍वचा को सुंदर व आकर्षक बना सकती हैं. अगर आपकी त्‍वचा पहले से ही आइली है तो आपको खूबसूरत और बेदाग त्‍वचा पाने के लिए टमाटर का प्रयोग करना चाहिये. आप टमाटर को फेस पैक में इस्तेमाल कर सकती हैं या फिर उसके रस को सीधे चेहरे पर लगा कर दाग धब्‍बे साफ कर सकती हैं. आइये जानते हैं सौंदर्य के लिये टमाटर का क्‍या क्‍या प्रयोग हो सकता है.

त्‍वचा चमकदार बनाए

अगर आपको चमकदार त्‍वचा चाहिये तो चंदन पाउडर, गुलाब जल और टमाटर कर जूस मिक्‍स कर के पेस्‍ट बनाएं और चेहरे पर लगाएं. इससे स्‍किन ग्‍लो करेगी.

beauty-tamato

चेहरे के बड़े पोर को कम करे

ज्‍यादा बड़े पोर्स में गंदगी आराम से जमा हो जाती है जिससे चेहरा खराब हो जाता है. इसके लिये आपको अपने चेहरे के पोर्स को कम करना होगा. टमाटर के रस को नींबू के रस के साथ मिक्‍स करें, उसमें कौटन डुबोएं और चेहरे को पोंछ लें. इससे पोर्स छोटे होंगे.

मुंहासे घटाए

टमाटर में प्राकृतिक‍ तत्‍व और विटामिन पाए जाते हैं जो एक्‍ने को कम करने में सहायक होते हैं. टमाटर से जूस निकालिये और चेहरे पर लगाइये. इसे 20 मिनट के लिये छोड़ दें और फिर ठंडे पानी से धो लें.

health benefits of tomatoes

सन टैनिंग हटाए

कुछ टमाटर लें और उन्‍हें पीस लें और उसमें थोड़ा सा ओटमील और एक चम्‍मच दही मिला लें. इस मिश्रण को अपने चेहरे और गर्दन पर अच्‍छी तरह से लगाएं और कुछ मिनट के बाद चेहरे को ठंडे पानी से धो लें. इस मिश्रण से सन टैनिंग हटती है और त्‍वचा ग्‍लो करने लगती है.

प्राकृतिक एस्‍ट्रेजेंट

इसमें बहुत सारा विटामिन सी और एंटीऔक्‍सीडेंट पाया जाता है जो कि स्‍किन से औइल साफ करने में मदद करता है.

foods helpful in joint pain

औइली स्‍किन के लिये

टमाटर के रस और नींबू के रस को एक साथ मिक्‍स कर के औइली स्‍किन को मसाज कीजिये. 20 मिनट के बाद चेहरे को ठंडे पानी से धो लीजिये.

शुभमन गिल के लिए बुरा सपना

जब टीम इंडिया से केएल राहुल और हार्दिक पांड्या को एक टेलीविजन शो में महिलाओं के खिलाफ अनर्गल बातें करने के चक्कर में बाहर कर दिया था तब उन की जगह नए नवेले शुभमन गिल और विजय शंकर को मौका दिया था.

न्यूजीलैंड के खिलाफ खेले गए चौथे वनडे मैच में जब शुभमन गिल ने मैदान पर एंट्री मारी थी तो उन के सामने कप्तान रोहित शर्मा खड़े थे जो अपना 200 वां वनडे मैच खेल रहे थे. भारत ने अपना पहला विकेट शिखर धवन के रूप में खो दिया था.

शुभमन गिल ने शुरुआत में जिस तरह से शौट खेले तो समझ आया कि यह खिलाड़ी तकनीक और तेवर का पक्का है और अगर इसे सही मौके मिले तो यह लंबी रेस का घोड़ा हो सकता है. पर आज भारत का दिन नहीं था और वह बुरी तरह हार गया. शुभमन गिल भी कोई खास करिश्मा नहीं कर पाए. वे 21 गेंदों में बस 9 रन ही बना पाए.

लेकिन अभी उन के सामने बहुत लंबा कैरियर पड़ा है और हमें याद रखना चाहिए कि अपनी धाकड़ बल्लेबाजी के लिए मशहूर शुभमन गिल ने साल 2017 में पंजाब की तरफ से रणजी ट्रौफी में खेलते हुए फर्स्ट क्लास क्रिकेट में डेब्यू किया था. तब बंगाल के खिलाफ गए एक मैच में उन्होंने अर्धशतकीय पारी खेली थी. इतना ही नहीं, भारत को साल 2018 में हुए अंडर 19 वर्ल्ड कप जिताने में शुभम गिल ने अहम भूमिका निभाई. वे इस वर्ल्ड कप में ‘मैन औफ द टूर्नामेंट’ भी चुने गए थे.

साल 1999 में पंजाब के फाजिल्का में जन्मे शुभमन गिल की बचपन से ही इस खेल में दिलचस्पी थी, जिसे उन के पिता लखविंदर सिंह ने सही समय पर पहचान लिया था.

आज के वनडे मैच में शुभमन गिल के हेलमेट पर एक तेज गेंद लगी थी जिस की मार से वे जल्दी उबर भी गए थे पर सामने गिरते दिग्गज बल्लेबाजों के विकेटों ने उन का ध्यान भंग कर दिया और वे भी आउट हो गए.

यह पहला मैच उन के लिए एक बुरे सपने जैसा है पर उम्मीद है कि अगले मैच में भी वे टीम में शामिल रह कर मैदान पर नजर आएंगे और अपनी बल्लेबाजी से लोगों का मनोरंजन करेंगे.

फालूदा कुल्‍फी बनाने की रेसिपी

सामग्री :

– कौर्न फ्लोर (400 ग्राम)

– पीला रंग ( 2-3 बूंदें)

– पानी (400 मिली)

कुल्फी के लिए

– दूध ( 500 मिली)

– शक्कर (100 ग्राम)

– छोटी इलायची पाउडर ( 01 चुटकी)

– पिस्ता (20 ग्राम छिला हुआ)

– काजू (20 ग्राम कटे हुए)

– केसर (01 चुटकी)

– पीला रंग ( 02 चुटकी)

फालूदा कुल्‍फी बनाने की विधि :

– सबसे पहले कड़ाही में पानी, कौर्नफ्लोर और पीला रंग डाल कर उसे अच्छी तरह से मिलायें और उसे   चलाते हुए मीडियम आंच पर पकायें.

– मिक्चर गाढ़ा होने पर उतार लें और फालूदा प्रेस में डालें.

– प्रेस को ठंडे पानी से भरे बर्तन के ऊपर रखें और धार बनाते हुए बिना रूके फालूदा बनाएं.

– फिर उन्हें निकाल कर फ्रिज में रख दें.

कुल्फी बनाने की विधि‍

– एक चम्मच पानी में केसर को घोल कर रख लें.

– कड़ाही में घी डाल कर गर्म करें.

– घी गर्म होने पर उसमें दूध और पीला रंग मिला दें.

– मीडियम आंच पर दूध को पकायें और लगातार चलाते रहें.

– जब दूध 1/4 रह जाए, उसमें शक्कर मिला दें.

– शक्कर घुल जाने तक दूध को चलाते रहें.

– फिर उसमें कुल्फी वाला बाकी सामान भी डाल दें और आंच से उतार लें.

– दूध के ठंडा होने पर उसे कुल्फी के सांचों में भर लें और फ्रिज में रख दें.

–  2-3 घंटे के बाद सांचों को फ्रिज से निकाल लें और उन्हें गर्म पानी में कुछ समय के लिए डुबाएं.

– इससे कुल्फी सांचों को छोड़ देगी.

– अब कुल्फी को प्लेट में निकाल लें और फालूदा डाल कर पेश करें.

ऐसे बनायें हथेलियों और पैरों को नरम

सूरज की तेज धूम, धूल-मिठ्ठी और कठोर साबुन के प्रयोग से हाथ और पैरों की त्‍वचा का बुरा हाल हो जाता है और उनमें हमेशा रूखापन बना रहता है. सर्द हवाओं का त्‍वचा पर और भी ज्‍यादा बुरा असर पड़ता है. पर यदि समय रहते ही पैरों तथा हथेलियों की त्‍वचा पर ध्‍यान दी जाए तो सब कुछ अच्‍छा हो जाएगा. आइए जानें कैसे बनाये हथेलियों और परों को नरम.

गरम पानी में पैरों को डुबाएं

अगर पैरों को गरम पानी में 10 मिनट के लिये डुबोया जाए तो आपको रिजल्‍ट जल्‍दी मिलता है.

नींबू के छिलके से स्‍क्रब करें

पैरों को गरम पानी से निकाल कर उन्‍हें साफ तौलिये से पोंछ दें. फिर नींबू के टुकड़े में हल्‍की सी चीनी डालें और उससे पैरों को रगड़े. आप को प्‍यूमिक स्‍टोन का भी इस्‍तमाल करना चाहिये.

स्‍क्रबिंग के बाद

इस विधि के बाद आपको ये नहीं भूलना चाहिये कि अब आपको दुबारा गरम पानी से पैरों को धोना है.

प्राकृतिक तेल का प्रयोग

अपने पैरों की त्‍वचा पर कौटन बौल में प्राकृतिक तेल डाल कर हल्‍के हाथों से रगडे़. इससे कठोर त्‍वचा पर नमी आएगी.

धूल मिठ्ठी से पैरों को बचाएं

अपने पैरों को धूल मिठ्ठी से बचाने के लिये मोजे जरुर पहनें. रात को पैरों पर तेल लगाएं और फिर मोजे पहन कर सोएं. इससे पैर नरम रहेंगे और साफ भी हो जाएंगे.

गरम पानी से नहाएं

आप गरम पानी से भी नहा सकती हैं, बस पानी में कुछ बूंद रोज आइय या फिर लेवेंडर तेल की डालें.

घरेलू नुस्‍खे

1 चम्‍मच तेल में 2 चम्‍मच चीनी मिला कर अपने हाथों और पैरों पर रगड़े, जिससे वे नरम हो जाएं. सूरजमुखी का तेल भी बहुत लाभकारी होता है.

वाइटहेड हटाने के आसान उपाय

अगर आपकी साफ सुथरी त्‍वचा पर वाइटहेड हो जाए तो वह देखने में बहुत बुरी लगती है. आज हम आपको वाइटहेड के बारे में जानकारी देंगें. वाइटहेड वह सफेद रंग के धब्‍बे होते हैं जो चेहरे के सबसे औयली जगह पर पैदा होते हैं. यह खासतौर पर नाक या दाढ़ी की जगह पर पाए जाते हैं. वाइटहेड होने के कई कारण हो सकते हैं जैसे, गलत खान-पान, कम पानी पीना या धूप में ज्‍यादा समय बिताना आदि. कई लोग वाइटहेड को दबा कर निकाल देते हैं पर इसको साफ करने के लिये कई घरेलू उपचार भी हैं. तो आइये जानते हैं कि वाइटहेड को किस प्रकार से साफ किया जा सकता है.

चने की दाल का स्‍क्रब

1 चम्‍मच चने की दाल को दरदार बीस लें और उसमें 1 चम्‍मच कच्‍चा दूध और 2 चम्‍मच रोज वाटर मिला लें. आप चाहें तो बादाम का पेस्‍ट भी मिला सकती हैं. इसे गाढा बना कर चेहरे पर 20 मिनट तक लगाएं. बाद में हल्‍के गरम पानी से चेहरे को धो लें.

चंदन स्‍क्रब

1 चम्‍मच चंदन पाउडर में नींबू और 2 चम्‍मच रोज वाटर मिला कर स्‍क्रब तैयार कीजिये. इसे 15 मिनट तक चेहरे पर लगाने के बाद धो लीजिये

बादाम और दूध

5-6 बादाम को पीस कर 2 चम्‍मच दूध में मिला लीजिये और गाढा पेस्‍ट बनाइये. इस पेस्‍ट से चेहरे को स्‍क्रब कीजिये. इससे वाइटहेड साफ हो जाएंगे और स्‍किन चमकदार बनेगी.

मेथी

मुठ्ठी भर मेथी ले कर उसे कूंच कर गाढा पेस्‍ट बनाएं. इसे चेहरे पर 20 मिनट के लिये लगाएं और फिर हल्‍के गरम पानी से चेहरे को धो लें.

कार्नस्‍टार्च स्‍क्रब

कार्नस्‍टार्च को सिरके के साथ मिला कर गाढा पेस्‍ट बनाइये. इसे चेहरे पर 15 मिनट तक लगाए रखने के बाद गरम पानी से धो लीजिये.

चीनी और शहद स्‍क्रब

बारीक चीनी को शहद के साथ मिलाइये और चेहरे को उससे मसाज कीजिये. फिर इसे साधारण पानी से धो लें.

ब्राउन शुगर और औलिव औयल

थोड़ी सी ब्राउन शुगर ले कर उसे औलिव औयल के साथ मिक्‍स करें. इससे चेहरे को 10 मिनट के लिये स्‍क्रब करें और फिर हल्‍के गरम पानी से चेहरे को धो लें.

चावल की रसमलाई बनाने की आसान रेसिपी

सामग्री :

– चावल  (01 कटोरी पके हुए)

– दूध (01 लीटर)

– शक्कर (50 ग्राम)

– कस्टर्ड पाउडर  (01 छोटा चम्मच)

– पिस्ता  (सजावट के लिए)

– बादाम ( सजावट के लिए)

बनाने की रेसिपी

– सबसे पहले पके हुए चावलों को सिल या चकले पर बारीक पीस लें.

– इसके बाद गैस पे कढाई रख कर दूध को उबलने को रख दें.

– जब तक दूध पक रहा है, एक कटोरी में थोडा सा पानी लेकर उसमें कस्टर्ड पाउडर घोल लें.

– दूध में उबाल आने पर कस्टर्ड पाउडर को दूध में कल्छी से चलाते हुए मिलाएं.

– इसके बाद 5 मिनट तक दूध उबालें, फिर शक्कर को दूध में डाल दें और चलाते हुए पकायें.

– जब दूध थोडा गाढा हो जाए, तो इसमे पिसे हुए चावल के छोटे-छोटे पेड़े नुमा बना कर डाल दें.

– साथ ही दूध को हल्के हाथ से चलाते रहें, नहीं तो कढ़ाही की तली में दूध लग जायेगा.

– दूध चलाते समय इस बात का ध्यान रखें कि पेड़े टूटने न पायें.

– दूध थोडा और गाढा होने पर गैस को बन्द कर दें और उसे ठंडा होने दें.

– जब दूध सामान्य टेम्प्रेचर में आ जाये, उसे 1 घंटे के लिए फ्रिज में रख दें.

लीजिए आपकी चावल की रसमलाई बनाने की विधि कम्‍प्‍लीट हुई.

क्या अकेले पड़ गये हैं मोदी ?

‘सपने दिखाने वाले नेता लोगों को अच्छे लगते हैं, लेकिन दिखाये हुए सपने अगर पूरे नहीं किये तो जनता उनकी पिटाई भी करती है, इसलिए सपने वही दिखाओ जो पूरे हो सकते हैं. मैं सपने दिखाने वालों में से नहीं हूं, जो भी बोलता हूं, वह डंके की चोट पर बोलता हूं.’ चुनावी मौसम में मोदी-कैबिनेट के केन्द्रीय सड़क और परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का ऐसा बयान ‘सपनों के सौदागर’ पर सीधा और तीखा हमला है. यह पहला मौका नहीं है जब नितिन गडकरी ने अपनी ही सरकार और प्रधान पर चोट की है, वह इससे पहले भी कई अवसरों पर ऐसे तीखे बयान दे चुके हैं, जिसके चलते मोदी-शाह की जोड़ी बगलें झांकने को मजबूर हुई है. लेकिन गडकरी के बयानों पर मोदी-शाह की चुप्पी आश्चर्यजनक है. जिस मोदी-शाह की जोड़ी के सामने भाजपा के बड़े-बड़े नेता कभी कुछ नहीं बोल पाये, वहां नितिन गडकरी लगातार ऐसी हिमाकत कैसे कर रहे हैं, यह विश्लेषण का विषय है. मोदी सरकार में अपने कामकाज में दूसरों से बेहतर प्रदर्शन करने वाले गडकरी इन दिनों जो कुछ भी बोल रहे हैं, उसे केवल चर्चा में बने रहने के लिए दिया जाने वाला बयान नहीं कहा जा सकता है, उनके बयानों की अहमियत का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह उनके बयानों को अनसुनी करने को विवश हो रहे हैं. इसके पीछे वजह है. माना जा रहा है कि भाजपाई किले के अन्दर आजकल मोदी-शाह रक्षात्मक स्थिति में हैं और आक्रामक तरीके से बयानबाजी कर रहे नितिन गडकरी के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ताकत काम कर रही है. गडकरी के बयानों के निहितार्थ गहरे हैं और मोदी के लिए इसमें स्पष्ट संकेत छिपा है. ये बात ठीक है कि नितिन गडकरी ने अब तक कोई मोर्चा नहीं खोला है, लेकिन वे ऐसा कभी नहीं करेंगे, इसकी गारंटी कोई नहीं दे रहा है.

कहना गलत न होगा कि पांच साल में जनता और आरएसएस दोनों पर से मोदी लहर उतर चुकी है. इसकी बड़ी वजह है. दरअसल 2014 में सत्ता में आने की छटपटाहट में नरेन्द्र मोदी ने जनता के आगे सपनों के बड़े-बड़े तम्बू तान दिये. अब उन तम्बूओं में बड़े-बड़े छेद हो चुके हैं. मोदी के दिखाये सपनों में से ज्यादातर पूरे ही नहीं हो सकते थे, मगर फिर भी दिखाये गये ताकि येन-केन-प्रकारेण सत्ता पर काबिज हुआ जा सके. वह जनता जिसके वोट से सरकार तय होती है, उसमें से सत्तर प्रतिशत गरीब हैं, उनमें से भी ज्यादातर अनपढ़ और बेरोजगार हैं, ऐसे में जब मोदी ने उनको 15-15 लाख रुपये का लालच दिखाया, दो करोड़ रोजगार हर साल देने का वादा किया, आय दुगना कर देने का लालच दिया, कौशल विकास का नारा दिया, तो सब निहाल हो गये. भावुकता, अतिविश्वास और अच्छे दिन की उम्मीद में लोगों ने मोदी को सिर-आंखों पर बिठा लिया और सत्ता सौंप दी.

जनता से किये मोदी के वादे कभी पूरे ही नहीं होने थे, इस सत्य पर नितिन गडकरी के उस बयान ने ठप्पा लगा दिया, जब फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर के साथ बातचीत के दौरान मराठी में बोलते हुए गडकरी कह गये, ‘हमने वादे तो कर दिये थे, हमें क्या पता था कि हम सत्ता में आ जाएंगे और वादे पूरे करने होंगे!’ इस बातचीत का वीडियो खूब वायरल हुआ और मोदी-शाह पर भारी गुजरा, फिर भी दोनों चुप्पी इख्तियार किये रहे क्योंकि सच को नकारते भी कैसे? हाल ही में पांच राज्यों के चुनाव में जब पांचों राज्यों में भाजपा की लुटिया डूबी, तब भी नितिन गडकरी यह कहने से नहीं चूके कि – ‘नेतृत्व को जीत का श्रेय और हार की जिम्मेदारी दोनों लेनी चाहिए. अगर मैं पार्टी अध्यक्ष हूं और मेरे सांसद और विधायक ठीक से काम नहीं कर रहे हैं तो यह किसी और की नहीं, मेरी ही जिम्मेदारी होगी.’ गडकरी के निशाने पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह थे. गडकरी के वार से शाह तिलमिलाये तो जरूर, मगर बोल कुछ नहीं पाये.

संघ से खास नजदीकियां रखने वाले नितिन गडकरी अपनी साफगोई के लिए जाने जाते हैं. पर यह समझना भूल होगी कि वे बिना सोचे समझे कुछ भी बोल देते हैं. गडकरी मंजे हुए राजनेता हैं. वे अपने लक्ष्य को कभी आंखों से ओझल नहीं होने देते. वे जो कुछ भी बोलते हैं उसके मायने होते हैं. उनकी ताकत संघ से आती है. वे भी नागपुर के रहने वाले हैं, जहां संघ का आधार है. ऐसे में गडकरी किसकी शह पर अपने बेबाक तेवर दिखा रहे हैं, यह समझना मुश्किल नहीं है.

असदुद्दीन ओवैसी का ट्वीट

एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी ने नितिन गडकरी के हालिया बयान – ‘सपने दिखाने वाले नेता लोगों को अच्छे लगते हैं, लेकिन दिखाये हुए सपने अगर पूरे नहीं किये तो जनता उनकी पिटाई भी करती है, इसलिए सपने वही दिखाओ जो पूरे हो सकते हैं…’ पर ट्वीट करते हुए कहा – ‘पीएम मोदी जी, सर, गडकरी आपको आईना दिखा रहे हैं और वह भी बड़ी चतुराई से.’

ओवैसी के ट्वीट का असर यह हुआ कि भाजपा के प्रवक्ताओं को सफाई देनी पड़ी कि नितिन गडकरी का बयान विपक्ष के नेताओं के लिए था, ना कि नरेंद्र मोदी के लिए, क्योंकि प्रधानमंत्री जी सपने नहीं दिखाते हैं, सपने पूरे करते हैं.

क्या अकेले पड़ गये हैं मोदी-शाह

भाजपा खेमे से जो खबरें छन-छन कर आ रही हैं, उससे तो यही लगता है कि पार्टी के भीतर मोदी-शाह की जोड़ी अकेली पड़ गयी है. संघ से उनकी दूरी लगातार बढ़ती जा रही है, तो भाजपा के बड़े नेताओं से भी उन्हें कोई खास सपोर्ट नहीं मिल रहा है. भाजपा के बड़े नेताओं की बात करें तो वित्त मंत्री अरुण जेटली लगातार बीमार चल रहे हैं, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज किन कारणों से अगला चुनाव नहीं लड़ना चाहतीं, यह अभी स्पष्ट नही हुआ है. शायद उन्हें शिकायत होगी कि पांच साल में मोदी जी खुद तो 150 देशों की यात्राएं कर आये, मगर विदेश मंत्री होने के बावजूद उन्हें एक बार भी साथ चलने का न्योता नहीं दिया. उधर गंगा प्रोजेक्ट पर बुरी तरह फेल रही उमा भारती से जब ये प्रोजेक्ट छीन कर नितिन गडकरी को दे दिया गया, तो उन्होंने भी चुनाव न लड़ने का ऐलान कर दिया है. पार्टी के वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी अपना अपमान भला क्योंकर भूलने लगे? आडवाणी साहब को बड़ी उम्मीद थी कि चलो प्रधानमंत्री न बन पाये तो कम से कम राष्ट्रपति की कुर्सी पर ही बैठ जाते, मगर उनकी यह कामना मोदी जी ने पूरी ही नहीं होने दी, ऐसे में आडवाणी साहब का आशीर्वाद अब नरेन्द्र मोदी को नसीब होगा, ऐसा सोचना भी खामख्याली है. रह गये राजनाथ सिंह, तो गम्भीर, सभ्य और शालीन नेता ‘बड़बोलों’ के बीच चुप रहने और दूर रहने में ही ज्यादा समझदारी मानते हैं. मनोज तिवारी, स्मृति ईरानी, पियूष गोयल, प्रकाश जावड़ेकर, देवेन्द्र फणनवीस, वसुन्धरा राजे जैसे नेता नितिन गडकरी के आगे तो बौने हैं ही, संघ के अन्दर भी इनकी कोई पूछ नहीं है. अब अगर भाजपा के पूर्व अध्यक्ष रहे नितिन गडकरी लगातार मोदी-शाह पर हमलावर हो रहे हैं, तो इसके पीछे संघ की रणनीति को समझना मुश्किल नहीं है.

संघ का प्लान-बी

हिन्दुत्व, राम मन्दिर और जनता से जुड़े मुद्दों पर आलोचना का सामना कर रही मोदी-शाह की जोड़ी के खिलाफ नितिन गडकरी अगर इतने बोल्ड बयान दे रहे हैं, तो यह संघ के समर्थन और निर्देश के बिना तो नहीं हो सकता. नागपुर से ताल्लुक रखने वाले नितिन गडकरी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चहेते नेताओं में शुमार हैं. ऐसे में उनके बयान से एक बड़ा संदेश ये आ रहा है कि संघ उनकी मार्फत सरकार को चेताना चाहती है. राजनीतिक गलियारों में भी इस बात के कयास लगाये जाने लगे हैं कि अगर नरेन्द्र मोदी-अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा को 2019 में बहुमत नहीं मिला तो फिर नितिन गडकरी का नाम आगे किया जा सकता है. इसे कई लोग तो संघ के प्लान-बी के तौर पर भी देख रहे हैं.

2014 के आम चुनावों के समय संघ हिन्दुत्व को बड़ा मुद्दा बनाना चाहता था. हिन्दू राष्ट्र और राम मन्दिर उसका मुख्य मुद्दा था मगर उस वक्त गडकरी की तुलना में मोदी हिन्दुत्व का बड़ा चेहरा लग रहे थे. गुजरात की छवि हिन्दुत्व की प्रयोगशाला की भी थी, इन सबने मिलकर 2014 में मोदी को गडकरी से आगे कर दिया. मगर सत्ता में आने के बाद मोदी अपनी हिन्दुत्व वाली छवि को पीछे छोड़ते हुए विकास पुरुष की छवि बनाने में लग गये. हालांकि इसका कोई बहुत ज्यादा फायदा न उन्हें हुआ, न देश को और न गरीब जनता को. हिन्दुत्व और विकास के बीच मोदी उलझ गये, जिसके चलते न तो विकास हुआ और न भारत हिन्दू राष्ट्र बन पाया. इसने संघ को बुरी तरह निराश किया.

अब फिर लोकसभा चुनाव सामने है. चुनावी रणनीतियां तैयार हो रही हैं. ऐसे में शाह-मोदी के खिलाफ गडकरी के तीखे बयान भाजपा में नेतृत्व परिवर्तन की सुगबुगाहट के तौर पर देखे जा रहे हैं. आखिर भाजपा की नय्या का खेवैय्या तो संघ ही है. ऐसे में जब मोदी कैबिनेट के सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी मोदी को ही निशाने पर लेते हुए यह कहते हैं कि जनता से उतने ही वायदे करने चाहिए, जितने पूरे किये जा सकें, तो वहीं खुद अपने ऊपर टिप्पणी करते हुए वह यह कहने से भी नहीं चूकते हैं कि मैं उतने ही वायदे करता हूं जो मैं पूरे कर सकूं, तो उनके इस बयान को नरेन्द्र मोदी के 2014 के वादों से जोड़ कर देखा जाना चाहिए. भूतल परिवहन मंत्री के तौर पर नितिन गडकरी को बेहद सक्षम मंत्रियों में गिना जाता है. इसके अलावा भी उनकी कई उपलब्धियां हैं. नितिन गडकरी पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं और वे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुके हैं. उनके पास उमा भारती के तबादले के बाद जल संसाधन मंत्रालय का भी प्रभार है. संघ के चहेते तो वह हैं ही, निर्भीक और ईमानदार भी माने जाते हैं. भाजपा का ‘160 क्लब’ भी अब सक्रिय हो चुका है, यह उन लोगों का गुट है जो मोदी के नेतृत्व में 160 या उससे कम सीटें आने की स्थिति में सत्ता परिवर्तन का राग छेड़ेगा. नागपुर के रहने वाले मराठी ब्राह्मण नितिन गडकरी को संघ का प्रियपात्र माना जाता है. माना जाता है कि वे ये सारी बातें संघ की मर्जी के खिलाफ जाकर नहीं कर रहे हैं. ऐसे में अगर 2019 में मोदी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है, तो संघ के आदेश पर नितिन गडकरी शीर्ष पद के लिए अपनी दावेदारी भी पेश कर सकते हैं.

कैसा है मोदी-शाह और गडकरी का रिश्ता?

मोदी-कैबिनेट में नितिन गडकरी को भले ही सड़क और परिवहन मंत्रालय जैसी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गयी हो और उमा भारती के गंगा सफाई में निष्फल रहने के बाद गंगा सफाई परियोजना भी उन्हें दे दी गयी, मगर इसका मतलब यह हरगिज नहीं है कि वह मोदी-शाह की गुडबुक में भी हैं.  सरकार में रहते हुए सरकार पर टीका-टिप्पणी गडकरी और मोदी के सम्बन्धों में दूरियों को ही उजागर करती है. हालिया बयानों पर कुछ लोगों का मत है कि नितिन गडकरी मन के साफ आदमी हैं, इसलिए उनकी बातों को बहुत तूल देने की जरूरत नहीं है, वे जो कुछ बोलते हैं भावावेश में बोलते हैं. जब इतनी बड़ी पार्टी और इतनी बड़ी सरकार की बात हो तो उसमें व्यक्तिगत सम्बन्धों का बहुत रोल नहीं रह जाता है. अगर सम्बन्ध अच्छे नहीं होते तो वह प्राइम मिनिस्टर की कैबिनेट में कैसे होते? वगैरह, वगैरह. मगर भाजपा और संघ में गहरी पैठ रखने वालों का आंकलन मोदी-शाह से गडकरी के रिश्ते को ‘मजबूरी का रिश्ता’ ही मानता है.

2014 में जब भाजपा भारी बहुमत से जीत कर सत्ता में आयी थी, तब नितिन गडकरी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, लेकिन उनकी चाह की परवाह न करते हुए मोदी-शाह की जोड़ी ने देवेन्द्र फड़णवीस को महाराष्ट्र की गद्दी सौंप दी, जो महाराष्ट्र की राजनीति में गडकरी के सामने बच्चे थे. इसने गडकरी के मन में खटास पैदा की. हालांकि केन्द्रीय मंत्री का पदभार ग्रहण करने के बाद गडकरी ने एक अच्छा जनसेवक होने की अपनी छवि बनाने में बड़ी कामयाबी हासिल की. उनकी देखरेख में देश में बहुत तेजी से नेशनल हाईवे बने. उन्होंने लगातार इस बात को रेखांकित भी किया कि वह जो वादा करते हैं, उसे डंके की चोट पर पूरा करते हैं, वहीं मोदी की विफलताओं पर भी वह अपने बयानों से लगातार चोट करते रहे. हालांकि संघ से सम्बन्ध रखने वालों का मानना है कि अगर गडकरी की इच्छा पर उन्हें महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बना दिया जाता, तो शिवसेना से उनके बेहतरीन सम्बन्धों का फायदा भाजपा को खूब होता, जो देवेन्द्र फड़णवीस या मोदी-शाह के बस की बात ही नहीं है. गडकरी और शिवसेना के आपसी सम्बन्ध कितने मधुर हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि शिवसेना की ओर से ऐसे बयान आने शुरू हो चुके हैं कि अगर गडकरी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए सामने आता है, तो वह भाजपा का समर्थन करेंगे. शिवसेना के इस रुख से मोदी-शाह की जोड़ी सहमी हुई है.

खैर, बात करते हैं मोदी-शाह और गडकरी के रिश्तों की, तो यह रिश्ता मधुर नहीं, मजबूरी है. याद होगा कि जब 2009 में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, वेंकैया नायडू और अनंत कुमार को पीछे छोड़ते हुए मराठी ब्राह्मण नितिन गडकरी को पार्टी का अध्यक्ष बनाया था, तब नरेन्द्र मोदी भाजपा के इकलौते मुख्यमंत्री थे, जो नितिन गडकरी को शुभकामनाएं देने दिल्ली नहीं पहुंचे थे.

भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद नितिन गडकरी भाजपा से अलग हुए संजय जोशी को भाजपा में वापस ले आये थे. कभी भाजपा प्रचारक के तौर पर मोदी और संजय जोशी की दोस्ती हुआ करती थी, जो बाद में राजनीतिक दुश्मनी में बदल गयी. बाद में मोदी संजय जोशी को देखना भी पसन्द नहीं करते थे. ऐसे में जब नितिन गडकरी ने संजय जोशी को 2012 में यूपी का चुनाव संयोजक बनाया तो मोदी को यह पसंद नहीं आया था. नरेन्द्र मोदी ने धमकी दी कि संजय जोशी को नहीं हटाया गया, तो वे चुनाव प्रचार के लिए उत्तर प्रदेश नहीं जाएंगे. पर गडकरी ने उनकी नहीं सुनी और मोदी उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार करने नहीं गये. गडकरी के अध्यक्ष रहते तब उत्तर प्रदेश में भाजपा बुरी तरह हारी थी. इसके बाद हुआ 2012 का मुंबई अधिवेशन, जिसमें मोदी ने संजय जोशी के पार्टी से इस्तीफे की मांग रख दी. हालांकि नितिन गडकरी को लगा कि मोदी उनके इस्तीफे की मांग पर अड़ेंगे नहीं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इस अधिवेशन के लिए संजय जोशी तो दिल्ली से ट्रेन पकड़कर मुंबई पहुंच गये, लेकिन नरेन्द्र मोदी अहमदाबाद से मुंबई जाने के बदले उदयपुर चले गये. आखिर में गडकरी को नहीं चाहते हुए भी संजय जोशी का इस्तीफा लेना पड़ा था, तब कहीं जाकर नरेन्द्र मोदी मुंबई अधिवेशन में शामिल हुए. इस बात की फांस भी कहीं न कहीं तो गडकरी के सीने में अभी तक धंसी हुई है.

अमित शाह को इंतजार करवाते थे गडकरी

जिन दिनों नितिन गडकरी भाजपा के अध्यक्ष थे, उन दिनों अमित शाह को अदालत के एक आदेश के चलते गुजरात से तड़ीपार किया गया था. गुजरात में उनके घुसने पर पाबन्दी थी. तब शाह को दिल्ली में शरण लेनी पड़ी थी. अमित शाह जब भी दिल्ली में पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी से मुलाकात करना चाहते थे, उन्हें घंटों इंतजार में बिठाया जाता था. उस समय सचमुच शाह के बुरे दिन चल रहे थे. गडकरी महाराष्ट्र से उठकर अचानक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गये थे. पर समय का चक्र घूमा. पूर्ति घोटाले का आरोप लगने के बाद गडकरी दोबारा भाजपा अध्यक्ष नहीं बन पाये. वर्ष 2014 दिसम्बर में जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का नाम तय होना था, तब अमित शाह के हाथ बदला लेने का मौका लगा. नितिन गडकरी शिद्दत से चाहते थे कि उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाये मगर अमित शाह जो कि तब तक भाजपा अध्यक्ष बन चुके थे, ने उनका नाम खारिज कर दिया. उससे भी बड़ा धक्का गडकरी को इस बात से लगा कि नागपुर के देवेन्द्र फड़णवीस, जिन्हें वे अपने सामने बच्चा मानते थे, को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बना दिया गया. हालांकि संघ के डर के कारण गडकरी को नजरअंदाज करना मोदी-शाह के बस की बात नहीं थी, लिहाजा गडकरी को केन्द्रीय मंत्री का पद मिला. तब से मौके का इंतजार कर रहे गडकरी के हाथ शायद अब मौका लगा है. अब वह गाहे-बगाहे मोदी-शाह पर बयानों के बाण चला रहे हैं. पांच राज्यों के चुनाव नतीजे आने के बाद से आम चर्चा यह बनी हुई है कि मोदी का जादू पहले जैसा नहीं रहा. माना जा रहा है कि लोकसभा में भाजपा की सीटें घटेंगी और कांग्रेस की बढ़ेंगी. प्रियंका गांधी वाड्रा के आने के बाद तो भाजपा के लिए राह और कठिन हो गयी है. ऐसे में भाजपा की नय्या पार लगाने के लिए एक ऐसे चेहरे की जरूरत है, जो क्लीन हो, ईमानदार हो, मेहनती हो और संघ विचारधारा से मेल खाता हो. तो क्या ये माना जाना चाहिए कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर नितिन गडकरी का परोक्ष हमला अपनी दावेदारी की पेशकदमी है? राजनीति की बारीक समझ रखने वाले तो यही मानते हैं.

सबको साथ लेकर चलने का बड़ा गुण है गडकरी में

नितिन गडकरी ने अपने मंत्रालय के कामकाज से तो नाम कमाया ही है, इन पांच सालों में उन्होंने अपनी ऐसी छवि बनायी है, जो काम करवाने में भी माहिर है और जिसे समझौतों से भी परहेज नहीं है. इससे बढ़ कर जो गुण गडकरी में है, वह है मिलनसारिता का. नितिन गडकरी मौजूदा समय के कार्यकर्ताओं के बीच बेहद लोकप्रिय हैं. आज जब कुछ नेताओं के दरवाजे कार्यकर्ताओं के लिए नहीं खुलते हैं, वहीं गडकरी हर रोज देर रात तक भाजपा के सैकड़ों कार्यकर्ताओं से मिलते देखे जाते हैं. नितिन गडकरी के सम्बन्ध सभी दलों के राजनेताओं से अच्छे बताये जाते हैं. यहां तक कि उन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल तक से उनके सम्बन्ध बेहतर बताये जाते हैं. छब्बीस जनवरी को नितिन गडकरी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ राजपथ पर गुफ्तगू करते हुए देखे गये. शिवसेना के साथ उनकी नजदीकियां किसी से छिपी नहीं हैं. बल्कि मोदी के नाम पर लगातार रार ठान रही शिवसेना गडकरी का नाम अगले लोकसभा चुनाव में पीएम पद के प्रत्याशी के तौर पर उछाल रही है. यानी अगर अगले लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा बहुमत से कुछ पीछे ठिठक जाती है और दूसरे दलों से समर्थन की जरूरत पड़ती है तो ऐसे में नितिन गडकरी को आगे प्रोजेक्ट किया जा सकता है.

पहले भी चले हैं गडकरी के बयान-बाण

नितिन गडकरी अपने हालिया बयान से ही चर्चा में नहीं आये हैं, इससे पहले भी वह कई मौकों पर ऐसे बयान दे चुके हैं, जिसकी चोट मोदी-शाह को गहरी पड़ी है.

07 जनवरी, 2019

इधर लोकसभा चुनाव सामने देखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 10 फीसदी सवर्ण आरक्षण का पत्ता फेंका, तो वहीं नागपुर में स्वयंसेवी महिला संगठन (एसएचजी) के कार्यक्रम में नितिन गडकरी ने कहा कि वो जात-पात और आरक्षण व्यवस्था में यकीन नहीं रखते. गडकरी ने कहा, ‘इस देश में इंदिरा गांधी जैसी नेता थीं. वो अपने वक्त के तमाम दिग्गज पुरुष नेताओं से बेहतर थीं. क्या इंदिरा गांधी ने कभी आरक्षण का सहारा लिया? इंदिरा गांधी को अपनी ताकत साबित करने और कांग्रेस में पुरुष नेताओं से बेहतर प्रदर्शन करने के लिए महिलाओं को आरक्षण देने की जरूरत नहीं थी.’

24 दिसंबर, 2018

नवंबर-दिसंबर, 2018 में देश के पांच राज्यों में हुए चुनाव में भाजपा की हार पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को निशाने पर लेते हुए नितिन गडकरी बोले, ‘अगर मैं पार्टी का अध्यक्ष हूं और मेरे सांसद-विधायक अच्छा काम नहीं कर रहे हैं तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? जाहिर है मैं.’ दिल्ली में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के इस सालाना लेक्चर कार्यक्रम में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि चुनाव में हार की जिम्मेदारी पार्टी प्रमुख की होती है.

22 दिसंबर, 2018

नितिन गडकरी ने महाराष्ट्र के पुणे में भी हिंदी पट्टी के तीन राज्यों – मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा को मिली चुनावी हार पर ‘नेतृत्व’ को ‘हार और विफलताओं’ की भी जिम्मेदारी लेने की बात कही. यहां उन्होंने कहा, ‘सफलता के कई दावेदार होते हैं, लेकिन विफलता में कोई साथ नहीं होता. सफलता का श्रेय लेने के लिए लोगों में होड़ रहती है, लेकिन नाकामी को कोई स्वीकार नहीं करना चाहता, सब दूसरे की तरफ उंगली दिखाने लगते हैं.’

21 दिसंबर, 2018

एक टीवी कार्यक्रम के दौरान नितिन गडकरी ने भाजपा नेताओं को मीडिया में कम बोलने की नसीहत दे डाली. उन्होंने कहा, ‘हमारे पास इतने नेता हैं और हमें उनके सामने (टीवी पत्रकारों) बोलना पसंद है, इसलिए हमें उन्हें कुछ काम देना है. उन्होंने एक फिल्म के सीन का जिक्र करते हुए कहा कि कुछ लोगों के मुंह में कपड़ा डाल कर उनका मुंह बंद करने की जरूरत है.

हालांकि बाद में उन्होंने अपनी सलाह देने वाले बयान पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा था कि पार्टी में प्रवक्ता होते हैं जो आधिकारिक तौर पर बोलते हैं. लेकिन कुछ लोग हैं, वे जब भी मीडिया में बोलते हैं तो विवाद पैदा हो जाता है. इससे पार्टी की छवि खराब होती है. किसी को ऐसी बातें नहीं बोलनी चाहिए, जिससे विवाद पैदा हो.

04 अगस्त, 2018

महाराष्ट्र के औरंगाबाद में नितिन गडकरी ने रोजगार और आरक्षण को लेकर बड़ा बयान दिया था. केन्द्रीय मंत्री ने मराठा आंदोलन पर कहा था कि आरक्षण रोजगार देने की गारंटी नहीं है, क्योंकि नौकरियां कम हो रही हैं. उन्होंने कहा, ‘आरक्षण तो एक ‘सोच’ है जो चाहती है कि नीति निर्माता हर समुदाय के गरीबों पर विचार करें. मान लीजिए कि आरक्षण दे दिया जाता है, लेकिन नौकरियां नहीं हैं, क्योंकि बैंक में आईटी (इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी) के कारण नौकरियां कम हुई हैं. सरकारी भर्ती रुकी हुई है. नौकरियां कहां हैं?’ बाद में गडकरी के इसी बयान का हवाला देकर विपक्षी पार्टियों ने मोदी सरकार को घेरा था.

जुमला-सरकार

हमारा देश ‘प्राण जाये पर वचन न जाये’, की परिपाटी वाला देश है. यह वीरों की भूमि है, उन वीरों की जिनकी कमान और जबान दोनों मायने रखती थी. जो कहा वो कर दिखाया वाला तेवर कहीं दिखता है तो बस भारत में दिखता है. यहां जनता अपने लीडर पर भरोसा करती है, उसकी बातों पर भरोसा करती है. नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने कहा – तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा, उनके एक नारे पर हजारों खड़े हो गये देश के लिए अपना खून बहाने को. हम भरोसा करते हैं कि हमारे नेता, हमारे लीडर जो कह रहे हैं, वह हमारे लिए करेंगे. हम उनके नारों पर भरोसा करके उन्हें देश की सत्ता सौंपते हैं. हमारे इसी भरोसे का नतीजा थी केन्द्र की मोदी-सरकार.

नरेन्द्र दामोदरदास मोदी, जब 2014 में चुनावी रणभूमि  पर उतरे थे तो उन्होंने देश की दुखियारी जनता से ढेरों वादे किये थे. जनता ने भी उनकी हर जुबान को सिर-माथे पर लिया, उनमें विश्वास जताया, उन्हें सत्ता पर विराजमान किया. सोचा कि जो आदमी इतना दमखम दिखा रहा है, 56 इंच की छाती ठोंक-ठोंक कर चिल्ला रहा है, उसमें कोई तो सच्चाई होगी. वह कुछ तो करेगा हमारे लिये. बड़ी-बड़ी सभाएं सजीं. बड़े-बड़े भाषण हुए. जनता अपने नेता की ऊर्जा और ताव देखकर भाव-विभोर हुई. खूब तालियां मारीं, खूब जय-जयकार के नारे लगाये, मगर पांच साल बाद जनता ठगी सी खड़ी है। पूछ रही है कि तुमको सत्ता सौंपी, हमको क्या मिला?

कलहारी गांव का रामखेलावन कहता है, ‘भईया ई विकास किसका भवा? हमरा तो न हुआ. हमरे तो अच्छे दिन नइखे आइल. लड़का मनरेगा में कमावत रहा, ऊ भी नोटबंदी में बेरोजगार हुई गवा. मोदी कहे रहे कि 15 लाख देहें, हम खाता खुलवा कर बैठें हन, अभी तक तो नहीं आये.’

2014 में सत्ता में आने की धुन ऐसी सवार थी कि बातों में, वादों में अतिश्योक्ति की परवाह किये बगैर जनता को बड़े-बड़े सपने दिखा दिये. अच्छे दिन आएंगे, हर साल दो करोड़ बेरोजगारों को रोजगार देंगे, सौ दिन में कालाधन वापस ले आएंगे, हर गरीब के खाते में 15-15 लाख रुपये डलवाएंगे, राम मन्दिर हम ही बनवाएंगे, गंगा मय्या का उद्धार हम ही करेंगे, हम स्मार्ट सिटी बनाएंगे, आदर्श गांव बनाएंगे, बुलेट ट्रेन लाएंगे, देश का विकास होगा (जैसे 2014 से पहले देश में विकास हुआ ही नहीं था), मगर पांच साल में एक भी वादा पूरा न हुआ। तमाम वादे महज जुमला बन कर रह गये और मोदी-शाह की सरकार जुमला-सरकार बन गयी.

2019 की रणभेरी बज चुकी है. मैदान सज रहा है. चारों तरफ खलबली मची है कि अबकी बार क्या नये जुमले उछाले जायें. कुछ नये पोस्टरों पर नयी लाइनें चमकने लगी हैं, जैसे –  ‘मोदी की साफ नीयत, सही विकास’ या ‘काम अधूरा, एक मौका मोदी सरकार, काम पूरा होने का’. लेकिन क्या जनता दोबारा मौका देगी? क्या वह पुराना हिसाब न पूछेगी? पूछेगी नहीं कि क्यों –

गंगा मय्या से किया वादा तोड़ा?

2014 में बनारस के घाट पर खड़े होकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था, ‘अब गंगा मैली नहीं रहेंगी. गंगा का अब उद्धार होगा’. लेकिन मां गंगा पांच साल बाद भी अपने उद्धार की राह देख रही हैं. आज भी वह मैली की मैली हैं. नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय ने दावा किया था कि 2018 तक गंगा साफ हो जाएगी. बाद में कहा गया कि गंगा मार्च 2019 तक सत्तर से अस्सी फीसदी तक साफ हो जाएगी. अब यह समय सीमा 2020 तक बढ़ा दी गयी है. मोदी-सरकार ने बीस हजार करोड़ रुपये का बजट गंगा सफाई के लिए रखा था, जिसमें से करीब चार हजार करोड़ रुपया खर्च भी हो चुका है, लेकिन सरकार को ही यह नहीं पता कि कितनी गंगा साफ हो गई? अब जनता का पैसा था, गंगा मय्या की सफाई में लगाया तो कहीं तो गंगा साफ दिखनी चाहिए थी? मगर नहीं दिख रही है. साफ है कि गंगा मय्या के नाम पर सारा पैसा भ्रष्टों ने डकार लिया. 2017 में केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट में कहा गया कि हरिद्वार में गंगा का पानी पीने के लिए तो क्या नहाने के लिए भी ठीक नहीं है. वाराणसी के घाटों के किनारे पानी में विष्ठा कोलिफार्म बैक्टीरिया का प्रदूषण 58 फीसदी बढ़ गया है, जिससे जानलेवा रोग हो रहे हैं और जलीय जीव लगातार मर रहे हैं.

कालाधन नहीं आया?

2014 में चुनाव प्रचार के दौरान नरेन्द्र मोदी ने कहा था – हमारी सरकार आयी तो सौ दिन के अन्दर विदेशी बैंकों में जमा सारा कालाधन वापस ले आएगी और वह धन इतना होगा कि हर गरीब के खाते में सरकार 15-15 लाख रुपये डलवाएगी. जनता ने उनके वादे पर भरोसा किया. पांच साल गुजर गये न काला धन आया न जनता के खाते में 15 लाख आये. कालाधन वापस लाने और गरीब के खाते में 15 लाख डालने का वादा जुमला बन कर रह गया. ऐसा जुमला जो सिर्फ 2014 के चुनाव में जीत का परचम फहराने के लिए उछाला गया था. ऐसे बड़े-बड़े सपने दिखा कर देश की गरीब, लाचार, अनपढ़ और सीधी-सादी जनता के विश्वास को छला गया. 2016 में 15 लाख रुपये के सम्बन्ध में प्रधानमंत्री कार्यालय को एक आरटीआई भेजी गयी, जिसमें पूछा गया था कि देश की गरीब जनता के खाते में 15 लाख रुपये कब आएंगे, तो उस आरटीआई के जवाब में प्रधानमंत्री कार्यालय ने कहा कि यह सवाल आरटीआई कानून के तहत सूचना के दायरे में नहीं आता.

जो बात प्रधानमंत्री ने चीख-चीख मंचों से कही, उसका जवाब प्रधानमंत्री कार्यालय सूचना के दायरे में ही नहीं मानता! जो बात लिखा-पढ़ी में नहीं कही जा सकती है, वह बात कोरी गप्प नहीं तो और क्या है? जुमलेबाजी नहीं तो और क्या है? ‘जुमलों के बादशाह’ जुमले उछालते रहे कि कालाधन लाकर गरीबों को मालामाल कर देंगे और उधर जून 2018 की स्विस नेशनल बैंक की रिपोर्ट कहती है कि स्विस बैंकों में भारतीय पूंजीपतियों का जमा पैसा 2017 में 50 प्रतिशत तक और बढ़ गया.

2016 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सीना ठोंक कर कहा था – ‘मैं चौकीदार हूं’. और इसी चौकीदार की नाक के नीचे से नीरव मोदी, मेहुल चौकसी, विजय माल्या, ललित मोदी जैसे लुटेरे देश का हजारों-करोड़ रुपया लेकर फरार हो गये.

चौकीदार के होते राफेल डील घोटाले के कीचड़ में सन गया. सीबीआई ने जांच शुरू करने की कोशिश हुई तो वहां ऐसी उठा-पटक मचायी गयी, अधिकारी को अधिकारी से ऐसा लड़ाया गया कि उस आपाधापी में राफेल की जांच ही गुम हो गयी. जुमलों के बादशाह ने कहा था – ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’ उनका यह नारा बदल कर हो गया – ‘न बताऊंगा, न बताने दूंगा’.

गम्भीर बात तो यह है कि 2016 में नोटबंदी के चलते जब जनता की छोटी-छोटी बचत के पैसे भी निकलवा कर बैंकों में भर दिये गये, उसी दौरान स्विस बैंकों में भारतीय जमाखोरों का धन 50 फीसदी बढ़ गया! नोटबंदी के वक्त प्रधानमंत्री ने कहा कि इससे कालाधन वापस आएगा, मगर दो साल बीत गये सरकार ने अब तक यह नहीं बताया कि कितना कालाधन वापस आ गया? इस बारे में आरटीआई डाली गयी तो जवाब में वित्त मंत्रालय ने कालेधन के अनुमान को लेकर तैयार की गयी तीन रिपोर्ट्स को जनता से साझा करने से ही इन्कार कर दिया. आखिर क्या छिपा रहे हैं प्रधानमंत्री जनता से? उस जनता से, जिसने उनके वादों पर भरोसा करके सत्ता की कमान सौंपी थी?

विकास की गंगा कहां बही?

2014 में चुनावी रैलियों के दौरान नरेन्द्र मोदी ने चिल्ला-चिल्ला कर जनता से पूछा था – ‘विकास चाहिए कि नहीं चाहिए?’ जनता ने चिल्ला-चिल्ला कर कहा था – ‘हां चाहिए।’ उम्मीद जग पड़ी थी कि अब देश में कि अच्छी सड़कें, गरीब के बच्चों के लिए अच्छे स्कूल, अच्छे सरकारी अस्पताल, स्मार्ट सिटी, पुल, बांध, नयी ट्रेनें, आदर्श गांव सब बन ही जाएंगे। मगर पांच साल गुजर गये, विकास होता कहीं नहीं दिखा।  न गांवों-कस्बों, शहरों की सड़कें दुरुस्त हुर्इं, न गरीब के बच्चों के लिए नये स्कूल खुले। न नये सरकारी अस्पताल खुले, न स्मार्ट शहर बसे, न आदर्श गांव बने। हद तो तब हो गयी जब प्रधानमंत्री के विकास की भद्द पीटते हुए बीते गुजरात चुनाव के दौरान कांग्रेस ने जवाबी हमले में ‘विकास पागल हो गया’ जैसा अभियान चला दिया। आखिर विकास की गंगा प्रधानमंत्री के मुख से निकलते ही क्यों सूख गयी, क्या जनता अबकी लोकसभा चुनाव में न पूछेगी?

दरअसल किसी नेता की बात पर विश्वास करना अच्छी बात है पर अंधविश्वास करना अच्छा नहीं। भारत की जनता भोली है। वह जुमलों पर अंधविश्वास कर बैठी. अच्छे दिन आएंगे

देश की जनता से सबसे क्रूर मजाक था – ‘अच्छे दिन आएंगे’. हर तरफ शोर मचा – ‘अच्छे दिन आएंगे’. 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले देशभर में इस जुमले के पक्ष में हवा बन गयी. हर आम-ओ-खास की जुबां पर यह जुमला चढ़ गया। बच्चे-बूढ़े सभी गाने लगे – मोदी जी आने वाले हैं, अच्छे दिन लाने वाले हैं. मगर एक साल के अन्दर यह वादा भी जुमला बन गया. अच्छे दिनों की सरकार सिर्फ लूट-झूठ, सूट-बूट और जुमलों तक ही सिमट कर रह गयी.

इन पांच सालों में गरीब के लिए अच्छे दिन कभी नहीं आये. आज महंगाई आसमान छू रही है. आम आदमी की कमर तोड़ दी है मंहगाई ने. नोटबंदी से कई छोटे और मंझोले उद्योग बंद हो गये. लाखों लोगों की नौकरियां चली गयीं. किसान-मजदूर कर्ज के बोझ से दब गये. नोटबंदी के कारण 100 से ज्यादा लोगों की जानें चली गयीं. महिलाओं और गरीबों की बरसों की बचत के पैसे हवा हो गये. नोटबंदी के अदूरदर्शी फैसले से देश की आर्थिक रीढ़ टूट गयी है. अर्थव्यवस्था पच्चीस साल पीछे खिसक गयी. एक साल में दो करोड़ रोजगार देने के वादे पर सवार होकर सत्ता तक पहुंची मोदी सरकार ने ढाई साल में लाखों कि संख्या में रोजगार समाप्त कर दिये. हर साल बजट में नया टैक्स और नया सेस जोड़ कर आम आदमी की जिन्दगी बदहाल कर दी. पेट्रोल 80 रुपये प्रति लीटर तक और डीजल 70 रुपये प्रति लीटर तक पहुंचा. डालर अर्श पर और रुपया फर्श पर रेंग रहा है. सबसे ज्यादा मार मिडिल क्लास के लोगों पर पड़ी है. लोग बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं. जिस तर्क के आधार पर नोटबंदी को सही ठहराने की कोशिश की थी, वह सब झूठे निकले.  नोटबंदी से देश में न आतंकवाद, नक्सलवाद, नकली करेंसी बंद हुई, न ही कालेधन में कोई कमी आयी. मगर नोटबंदी से देश की आम जनता को असहनीय कष्ठ उठाने पड़े. क्या यह था मोदी-सरकार का देश की जनता को अच्छे दिन का तोहफा?

मेक इन इंडिया, स्टैंड अप इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया जैसे जुमले खूब गूंजे पांच साल तक गूंजते रहे , मगर इसका फायदा किसको हुआ? बेरोजगारी तो ज्यों की त्यों है. आखिर इन तमाम योजनाओं के हजारों करोड़ रुपये कहां गये, जब जमीन पर कुछ भी सकारात्मक नहीं हुआ? ‘मेक इन इंडिया’ तो वास्तव में ‘फेक इन इंडिया’ निकला.

गंगा मय्या, देश का गरीब, गाय और गांव इसके लिए जितने वादे किये गये थे, सब जुमला साबित हुए. गाय-गरीब मरता है तो मरे, गंगा बदहाली की ओर बढ़ती है तो बढ़े. खुद को गंगा का बेटा कहकर गंगा को साफ करने का बीड़ा उठाने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी क्या अब बनारस के घाट पर खड़े होकर ऐसा कोई वादा दोबारा करेंगे?

आज देश की सीमा से लगे किसी भी पड़ोसी देश के साथ हमारे सम्बन्ध बहुत अच्छे नहीं हैं, जबकि एक जुमला इस सम्बन्ध में भी उछाला गया था – ‘विदेशी घरती पर मोदी का डंका’. 93 मुम्बई बम धमाकों के आरोपी दाऊद इब्राहीम को भी भारत लाकर सजा दिलाने का वादा किया गया था। 2014 में एक गुजराती चैनल को दिये इंटरव्यू में प्रधानमंत्री ने कहा था कि वह 93 के मुम्बई बम धमाकों के अपराधी दाऊद इब्राहीम को वापस लाकर सजा दिलाएंगे. उनके इस ब्यान से आम भारतीयों में आशा जगी थी, खासतौर पर मुम्बई बम धमाकों में पीड़ित लोगों को आस बंधी थी कि उन्हें कुछ तो न्याय मिलेगा. लगा था कि अब मोदी आ गये हैं तो दाऊद इब्राहिम पर भी ओसामा बिन लादेन जैसा कोई आपरेशन होगा. मोदी जी घर में घुस कर मारेंगे उसे. लेकिन हुआ क्या, ढाक के तीन पात. मई 2017 में एक आरटीआई के जवाब में भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत की किसी भी जांच एजेंसी ने विदेश मंत्रालय से दाऊद के प्रत्यर्पण की मांग तक नहीं उठायी. डौन को पकड़ने के लिए मोदी-सरकार ने कुछ नहीं किया, उलटे इनकी राजशाही में कई और डौन देश में पैदा हो गये, जो जनता के खून-पसीने के कमाई सूटकेसों में भर-भर कर टा-टा, बाय-बाय करके विदेश भाग गये.

नरेंद्र मोदी सपनों की सुनामी में देश के प्रधानमंत्री बन गये. पांच साल भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल करके, जुमलों के दम पर सरकार चलाते रहे. जुमलों के जुल्म का विस्फोट अब 2019 में देखने को मिलेगा.

2019 में प्रदूषण है दुनिया की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक

आज के समय में प्रदूषण हमारे लिए प्रमुख चुनौतियों में से एक है. शहरों की तो हालत बुरी है ही, इसके चपेट में हमारे गांव भी आ चुके हैं. आलम ये है कि प्रदूषण के कारण कई लोगों की जाने जा रही हैं. हाल ही में वर्ल्ड हेल्थ और्गेनाइजेशन (WHO) ने एक लिस्ट जारी की है. इस लिस्ट के मुताबिक, वायु प्रदूषण और बदलता मौसम 2019 के विश्व के सबसे बड़े खतरों में से एक है. इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि लोगों की खराब सेहत के लिए वायु प्रदूषण एक गंभीर कारक है.

रिपोर्ट की माने तो वायु में मौजूद माइक्रोस्कोपिक प्रदूषित तत्व सांस के जरिए शरीर में पहुंच कर फेफड़ों, दिल और दिमाग पर बुरा असर डाल रहे हैं. इसमें ये भी कहा गया है कि प्रति वर्ष 7 मिलियन से भी अधिक मौतें कैंसर, स्ट्रोक, दिल और फेफड़ों की बीमारी के कारण हो रही है.

रिपोर्ट की माने तो इनमें 90 फीसदी मौतें कम और मध्य आय वाले देशों में हो रही हैं. इन देशों में इंडस्ट्री, गाड़ियों से निकलने वाले धूंएं से ये सारी मौते हो रही हैं. जानकारों की माने तो वायु प्रदूषण  का एक कारण ईंधन भी है. ईंधन के जलने से सेहत का काफी नुकसान होता है. रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि साल 2030 और 2050 में पर्यावरण में हो रहे बदलाव के चलते समय से पहले मौत का आंकड़ा बढ़ सकता है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें