‘सपने दिखाने वाले नेता लोगों को अच्छे लगते हैं, लेकिन दिखाये हुए सपने अगर पूरे नहीं किये तो जनता उनकी पिटाई भी करती है, इसलिए सपने वही दिखाओ जो पूरे हो सकते हैं. मैं सपने दिखाने वालों में से नहीं हूं, जो भी बोलता हूं, वह डंके की चोट पर बोलता हूं.’ चुनावी मौसम में मोदी-कैबिनेट के केन्द्रीय सड़क और परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का ऐसा बयान ‘सपनों के सौदागर’ पर सीधा और तीखा हमला है. यह पहला मौका नहीं है जब नितिन गडकरी ने अपनी ही सरकार और प्रधान पर चोट की है, वह इससे पहले भी कई अवसरों पर ऐसे तीखे बयान दे चुके हैं, जिसके चलते मोदी-शाह की जोड़ी बगलें झांकने को मजबूर हुई है. लेकिन गडकरी के बयानों पर मोदी-शाह की चुप्पी आश्चर्यजनक है. जिस मोदी-शाह की जोड़ी के सामने भाजपा के बड़े-बड़े नेता कभी कुछ नहीं बोल पाये, वहां नितिन गडकरी लगातार ऐसी हिमाकत कैसे कर रहे हैं, यह विश्लेषण का विषय है. मोदी सरकार में अपने कामकाज में दूसरों से बेहतर प्रदर्शन करने वाले गडकरी इन दिनों जो कुछ भी बोल रहे हैं, उसे केवल चर्चा में बने रहने के लिए दिया जाने वाला बयान नहीं कहा जा सकता है, उनके बयानों की अहमियत का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह उनके बयानों को अनसुनी करने को विवश हो रहे हैं. इसके पीछे वजह है. माना जा रहा है कि भाजपाई किले के अन्दर आजकल मोदी-शाह रक्षात्मक स्थिति में हैं और आक्रामक तरीके से बयानबाजी कर रहे नितिन गडकरी के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ताकत काम कर रही है. गडकरी के बयानों के निहितार्थ गहरे हैं और मोदी के लिए इसमें स्पष्ट संकेत छिपा है. ये बात ठीक है कि नितिन गडकरी ने अब तक कोई मोर्चा नहीं खोला है, लेकिन वे ऐसा कभी नहीं करेंगे, इसकी गारंटी कोई नहीं दे रहा है.

कहना गलत न होगा कि पांच साल में जनता और आरएसएस दोनों पर से मोदी लहर उतर चुकी है. इसकी बड़ी वजह है. दरअसल 2014 में सत्ता में आने की छटपटाहट में नरेन्द्र मोदी ने जनता के आगे सपनों के बड़े-बड़े तम्बू तान दिये. अब उन तम्बूओं में बड़े-बड़े छेद हो चुके हैं. मोदी के दिखाये सपनों में से ज्यादातर पूरे ही नहीं हो सकते थे, मगर फिर भी दिखाये गये ताकि येन-केन-प्रकारेण सत्ता पर काबिज हुआ जा सके. वह जनता जिसके वोट से सरकार तय होती है, उसमें से सत्तर प्रतिशत गरीब हैं, उनमें से भी ज्यादातर अनपढ़ और बेरोजगार हैं, ऐसे में जब मोदी ने उनको 15-15 लाख रुपये का लालच दिखाया, दो करोड़ रोजगार हर साल देने का वादा किया, आय दुगना कर देने का लालच दिया, कौशल विकास का नारा दिया, तो सब निहाल हो गये. भावुकता, अतिविश्वास और अच्छे दिन की उम्मीद में लोगों ने मोदी को सिर-आंखों पर बिठा लिया और सत्ता सौंप दी.

जनता से किये मोदी के वादे कभी पूरे ही नहीं होने थे, इस सत्य पर नितिन गडकरी के उस बयान ने ठप्पा लगा दिया, जब फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर के साथ बातचीत के दौरान मराठी में बोलते हुए गडकरी कह गये, ‘हमने वादे तो कर दिये थे, हमें क्या पता था कि हम सत्ता में आ जाएंगे और वादे पूरे करने होंगे!’ इस बातचीत का वीडियो खूब वायरल हुआ और मोदी-शाह पर भारी गुजरा, फिर भी दोनों चुप्पी इख्तियार किये रहे क्योंकि सच को नकारते भी कैसे? हाल ही में पांच राज्यों के चुनाव में जब पांचों राज्यों में भाजपा की लुटिया डूबी, तब भी नितिन गडकरी यह कहने से नहीं चूके कि – ‘नेतृत्व को जीत का श्रेय और हार की जिम्मेदारी दोनों लेनी चाहिए. अगर मैं पार्टी अध्यक्ष हूं और मेरे सांसद और विधायक ठीक से काम नहीं कर रहे हैं तो यह किसी और की नहीं, मेरी ही जिम्मेदारी होगी.’ गडकरी के निशाने पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह थे. गडकरी के वार से शाह तिलमिलाये तो जरूर, मगर बोल कुछ नहीं पाये.

संघ से खास नजदीकियां रखने वाले नितिन गडकरी अपनी साफगोई के लिए जाने जाते हैं. पर यह समझना भूल होगी कि वे बिना सोचे समझे कुछ भी बोल देते हैं. गडकरी मंजे हुए राजनेता हैं. वे अपने लक्ष्य को कभी आंखों से ओझल नहीं होने देते. वे जो कुछ भी बोलते हैं उसके मायने होते हैं. उनकी ताकत संघ से आती है. वे भी नागपुर के रहने वाले हैं, जहां संघ का आधार है. ऐसे में गडकरी किसकी शह पर अपने बेबाक तेवर दिखा रहे हैं, यह समझना मुश्किल नहीं है.

असदुद्दीन ओवैसी का ट्वीट

एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी ने नितिन गडकरी के हालिया बयान – ‘सपने दिखाने वाले नेता लोगों को अच्छे लगते हैं, लेकिन दिखाये हुए सपने अगर पूरे नहीं किये तो जनता उनकी पिटाई भी करती है, इसलिए सपने वही दिखाओ जो पूरे हो सकते हैं…’ पर ट्वीट करते हुए कहा – ‘पीएम मोदी जी, सर, गडकरी आपको आईना दिखा रहे हैं और वह भी बड़ी चतुराई से.’

ओवैसी के ट्वीट का असर यह हुआ कि भाजपा के प्रवक्ताओं को सफाई देनी पड़ी कि नितिन गडकरी का बयान विपक्ष के नेताओं के लिए था, ना कि नरेंद्र मोदी के लिए, क्योंकि प्रधानमंत्री जी सपने नहीं दिखाते हैं, सपने पूरे करते हैं.

क्या अकेले पड़ गये हैं मोदी-शाह

भाजपा खेमे से जो खबरें छन-छन कर आ रही हैं, उससे तो यही लगता है कि पार्टी के भीतर मोदी-शाह की जोड़ी अकेली पड़ गयी है. संघ से उनकी दूरी लगातार बढ़ती जा रही है, तो भाजपा के बड़े नेताओं से भी उन्हें कोई खास सपोर्ट नहीं मिल रहा है. भाजपा के बड़े नेताओं की बात करें तो वित्त मंत्री अरुण जेटली लगातार बीमार चल रहे हैं, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज किन कारणों से अगला चुनाव नहीं लड़ना चाहतीं, यह अभी स्पष्ट नही हुआ है. शायद उन्हें शिकायत होगी कि पांच साल में मोदी जी खुद तो 150 देशों की यात्राएं कर आये, मगर विदेश मंत्री होने के बावजूद उन्हें एक बार भी साथ चलने का न्योता नहीं दिया. उधर गंगा प्रोजेक्ट पर बुरी तरह फेल रही उमा भारती से जब ये प्रोजेक्ट छीन कर नितिन गडकरी को दे दिया गया, तो उन्होंने भी चुनाव न लड़ने का ऐलान कर दिया है. पार्टी के वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी अपना अपमान भला क्योंकर भूलने लगे? आडवाणी साहब को बड़ी उम्मीद थी कि चलो प्रधानमंत्री न बन पाये तो कम से कम राष्ट्रपति की कुर्सी पर ही बैठ जाते, मगर उनकी यह कामना मोदी जी ने पूरी ही नहीं होने दी, ऐसे में आडवाणी साहब का आशीर्वाद अब नरेन्द्र मोदी को नसीब होगा, ऐसा सोचना भी खामख्याली है. रह गये राजनाथ सिंह, तो गम्भीर, सभ्य और शालीन नेता ‘बड़बोलों’ के बीच चुप रहने और दूर रहने में ही ज्यादा समझदारी मानते हैं. मनोज तिवारी, स्मृति ईरानी, पियूष गोयल, प्रकाश जावड़ेकर, देवेन्द्र फणनवीस, वसुन्धरा राजे जैसे नेता नितिन गडकरी के आगे तो बौने हैं ही, संघ के अन्दर भी इनकी कोई पूछ नहीं है. अब अगर भाजपा के पूर्व अध्यक्ष रहे नितिन गडकरी लगातार मोदी-शाह पर हमलावर हो रहे हैं, तो इसके पीछे संघ की रणनीति को समझना मुश्किल नहीं है.

संघ का प्लान-बी

हिन्दुत्व, राम मन्दिर और जनता से जुड़े मुद्दों पर आलोचना का सामना कर रही मोदी-शाह की जोड़ी के खिलाफ नितिन गडकरी अगर इतने बोल्ड बयान दे रहे हैं, तो यह संघ के समर्थन और निर्देश के बिना तो नहीं हो सकता. नागपुर से ताल्लुक रखने वाले नितिन गडकरी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चहेते नेताओं में शुमार हैं. ऐसे में उनके बयान से एक बड़ा संदेश ये आ रहा है कि संघ उनकी मार्फत सरकार को चेताना चाहती है. राजनीतिक गलियारों में भी इस बात के कयास लगाये जाने लगे हैं कि अगर नरेन्द्र मोदी-अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा को 2019 में बहुमत नहीं मिला तो फिर नितिन गडकरी का नाम आगे किया जा सकता है. इसे कई लोग तो संघ के प्लान-बी के तौर पर भी देख रहे हैं.

2014 के आम चुनावों के समय संघ हिन्दुत्व को बड़ा मुद्दा बनाना चाहता था. हिन्दू राष्ट्र और राम मन्दिर उसका मुख्य मुद्दा था मगर उस वक्त गडकरी की तुलना में मोदी हिन्दुत्व का बड़ा चेहरा लग रहे थे. गुजरात की छवि हिन्दुत्व की प्रयोगशाला की भी थी, इन सबने मिलकर 2014 में मोदी को गडकरी से आगे कर दिया. मगर सत्ता में आने के बाद मोदी अपनी हिन्दुत्व वाली छवि को पीछे छोड़ते हुए विकास पुरुष की छवि बनाने में लग गये. हालांकि इसका कोई बहुत ज्यादा फायदा न उन्हें हुआ, न देश को और न गरीब जनता को. हिन्दुत्व और विकास के बीच मोदी उलझ गये, जिसके चलते न तो विकास हुआ और न भारत हिन्दू राष्ट्र बन पाया. इसने संघ को बुरी तरह निराश किया.

अब फिर लोकसभा चुनाव सामने है. चुनावी रणनीतियां तैयार हो रही हैं. ऐसे में शाह-मोदी के खिलाफ गडकरी के तीखे बयान भाजपा में नेतृत्व परिवर्तन की सुगबुगाहट के तौर पर देखे जा रहे हैं. आखिर भाजपा की नय्या का खेवैय्या तो संघ ही है. ऐसे में जब मोदी कैबिनेट के सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी मोदी को ही निशाने पर लेते हुए यह कहते हैं कि जनता से उतने ही वायदे करने चाहिए, जितने पूरे किये जा सकें, तो वहीं खुद अपने ऊपर टिप्पणी करते हुए वह यह कहने से भी नहीं चूकते हैं कि मैं उतने ही वायदे करता हूं जो मैं पूरे कर सकूं, तो उनके इस बयान को नरेन्द्र मोदी के 2014 के वादों से जोड़ कर देखा जाना चाहिए. भूतल परिवहन मंत्री के तौर पर नितिन गडकरी को बेहद सक्षम मंत्रियों में गिना जाता है. इसके अलावा भी उनकी कई उपलब्धियां हैं. नितिन गडकरी पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं और वे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुके हैं. उनके पास उमा भारती के तबादले के बाद जल संसाधन मंत्रालय का भी प्रभार है. संघ के चहेते तो वह हैं ही, निर्भीक और ईमानदार भी माने जाते हैं. भाजपा का ‘160 क्लब’ भी अब सक्रिय हो चुका है, यह उन लोगों का गुट है जो मोदी के नेतृत्व में 160 या उससे कम सीटें आने की स्थिति में सत्ता परिवर्तन का राग छेड़ेगा. नागपुर के रहने वाले मराठी ब्राह्मण नितिन गडकरी को संघ का प्रियपात्र माना जाता है. माना जाता है कि वे ये सारी बातें संघ की मर्जी के खिलाफ जाकर नहीं कर रहे हैं. ऐसे में अगर 2019 में मोदी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है, तो संघ के आदेश पर नितिन गडकरी शीर्ष पद के लिए अपनी दावेदारी भी पेश कर सकते हैं.

कैसा है मोदी-शाह और गडकरी का रिश्ता?

मोदी-कैबिनेट में नितिन गडकरी को भले ही सड़क और परिवहन मंत्रालय जैसी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गयी हो और उमा भारती के गंगा सफाई में निष्फल रहने के बाद गंगा सफाई परियोजना भी उन्हें दे दी गयी, मगर इसका मतलब यह हरगिज नहीं है कि वह मोदी-शाह की गुडबुक में भी हैं.  सरकार में रहते हुए सरकार पर टीका-टिप्पणी गडकरी और मोदी के सम्बन्धों में दूरियों को ही उजागर करती है. हालिया बयानों पर कुछ लोगों का मत है कि नितिन गडकरी मन के साफ आदमी हैं, इसलिए उनकी बातों को बहुत तूल देने की जरूरत नहीं है, वे जो कुछ बोलते हैं भावावेश में बोलते हैं. जब इतनी बड़ी पार्टी और इतनी बड़ी सरकार की बात हो तो उसमें व्यक्तिगत सम्बन्धों का बहुत रोल नहीं रह जाता है. अगर सम्बन्ध अच्छे नहीं होते तो वह प्राइम मिनिस्टर की कैबिनेट में कैसे होते? वगैरह, वगैरह. मगर भाजपा और संघ में गहरी पैठ रखने वालों का आंकलन मोदी-शाह से गडकरी के रिश्ते को ‘मजबूरी का रिश्ता’ ही मानता है.

2014 में जब भाजपा भारी बहुमत से जीत कर सत्ता में आयी थी, तब नितिन गडकरी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, लेकिन उनकी चाह की परवाह न करते हुए मोदी-शाह की जोड़ी ने देवेन्द्र फड़णवीस को महाराष्ट्र की गद्दी सौंप दी, जो महाराष्ट्र की राजनीति में गडकरी के सामने बच्चे थे. इसने गडकरी के मन में खटास पैदा की. हालांकि केन्द्रीय मंत्री का पदभार ग्रहण करने के बाद गडकरी ने एक अच्छा जनसेवक होने की अपनी छवि बनाने में बड़ी कामयाबी हासिल की. उनकी देखरेख में देश में बहुत तेजी से नेशनल हाईवे बने. उन्होंने लगातार इस बात को रेखांकित भी किया कि वह जो वादा करते हैं, उसे डंके की चोट पर पूरा करते हैं, वहीं मोदी की विफलताओं पर भी वह अपने बयानों से लगातार चोट करते रहे. हालांकि संघ से सम्बन्ध रखने वालों का मानना है कि अगर गडकरी की इच्छा पर उन्हें महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बना दिया जाता, तो शिवसेना से उनके बेहतरीन सम्बन्धों का फायदा भाजपा को खूब होता, जो देवेन्द्र फड़णवीस या मोदी-शाह के बस की बात ही नहीं है. गडकरी और शिवसेना के आपसी सम्बन्ध कितने मधुर हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि शिवसेना की ओर से ऐसे बयान आने शुरू हो चुके हैं कि अगर गडकरी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए सामने आता है, तो वह भाजपा का समर्थन करेंगे. शिवसेना के इस रुख से मोदी-शाह की जोड़ी सहमी हुई है.

खैर, बात करते हैं मोदी-शाह और गडकरी के रिश्तों की, तो यह रिश्ता मधुर नहीं, मजबूरी है. याद होगा कि जब 2009 में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, वेंकैया नायडू और अनंत कुमार को पीछे छोड़ते हुए मराठी ब्राह्मण नितिन गडकरी को पार्टी का अध्यक्ष बनाया था, तब नरेन्द्र मोदी भाजपा के इकलौते मुख्यमंत्री थे, जो नितिन गडकरी को शुभकामनाएं देने दिल्ली नहीं पहुंचे थे.

भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद नितिन गडकरी भाजपा से अलग हुए संजय जोशी को भाजपा में वापस ले आये थे. कभी भाजपा प्रचारक के तौर पर मोदी और संजय जोशी की दोस्ती हुआ करती थी, जो बाद में राजनीतिक दुश्मनी में बदल गयी. बाद में मोदी संजय जोशी को देखना भी पसन्द नहीं करते थे. ऐसे में जब नितिन गडकरी ने संजय जोशी को 2012 में यूपी का चुनाव संयोजक बनाया तो मोदी को यह पसंद नहीं आया था. नरेन्द्र मोदी ने धमकी दी कि संजय जोशी को नहीं हटाया गया, तो वे चुनाव प्रचार के लिए उत्तर प्रदेश नहीं जाएंगे. पर गडकरी ने उनकी नहीं सुनी और मोदी उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार करने नहीं गये. गडकरी के अध्यक्ष रहते तब उत्तर प्रदेश में भाजपा बुरी तरह हारी थी. इसके बाद हुआ 2012 का मुंबई अधिवेशन, जिसमें मोदी ने संजय जोशी के पार्टी से इस्तीफे की मांग रख दी. हालांकि नितिन गडकरी को लगा कि मोदी उनके इस्तीफे की मांग पर अड़ेंगे नहीं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इस अधिवेशन के लिए संजय जोशी तो दिल्ली से ट्रेन पकड़कर मुंबई पहुंच गये, लेकिन नरेन्द्र मोदी अहमदाबाद से मुंबई जाने के बदले उदयपुर चले गये. आखिर में गडकरी को नहीं चाहते हुए भी संजय जोशी का इस्तीफा लेना पड़ा था, तब कहीं जाकर नरेन्द्र मोदी मुंबई अधिवेशन में शामिल हुए. इस बात की फांस भी कहीं न कहीं तो गडकरी के सीने में अभी तक धंसी हुई है.

अमित शाह को इंतजार करवाते थे गडकरी

जिन दिनों नितिन गडकरी भाजपा के अध्यक्ष थे, उन दिनों अमित शाह को अदालत के एक आदेश के चलते गुजरात से तड़ीपार किया गया था. गुजरात में उनके घुसने पर पाबन्दी थी. तब शाह को दिल्ली में शरण लेनी पड़ी थी. अमित शाह जब भी दिल्ली में पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी से मुलाकात करना चाहते थे, उन्हें घंटों इंतजार में बिठाया जाता था. उस समय सचमुच शाह के बुरे दिन चल रहे थे. गडकरी महाराष्ट्र से उठकर अचानक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गये थे. पर समय का चक्र घूमा. पूर्ति घोटाले का आरोप लगने के बाद गडकरी दोबारा भाजपा अध्यक्ष नहीं बन पाये. वर्ष 2014 दिसम्बर में जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का नाम तय होना था, तब अमित शाह के हाथ बदला लेने का मौका लगा. नितिन गडकरी शिद्दत से चाहते थे कि उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाये मगर अमित शाह जो कि तब तक भाजपा अध्यक्ष बन चुके थे, ने उनका नाम खारिज कर दिया. उससे भी बड़ा धक्का गडकरी को इस बात से लगा कि नागपुर के देवेन्द्र फड़णवीस, जिन्हें वे अपने सामने बच्चा मानते थे, को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बना दिया गया. हालांकि संघ के डर के कारण गडकरी को नजरअंदाज करना मोदी-शाह के बस की बात नहीं थी, लिहाजा गडकरी को केन्द्रीय मंत्री का पद मिला. तब से मौके का इंतजार कर रहे गडकरी के हाथ शायद अब मौका लगा है. अब वह गाहे-बगाहे मोदी-शाह पर बयानों के बाण चला रहे हैं. पांच राज्यों के चुनाव नतीजे आने के बाद से आम चर्चा यह बनी हुई है कि मोदी का जादू पहले जैसा नहीं रहा. माना जा रहा है कि लोकसभा में भाजपा की सीटें घटेंगी और कांग्रेस की बढ़ेंगी. प्रियंका गांधी वाड्रा के आने के बाद तो भाजपा के लिए राह और कठिन हो गयी है. ऐसे में भाजपा की नय्या पार लगाने के लिए एक ऐसे चेहरे की जरूरत है, जो क्लीन हो, ईमानदार हो, मेहनती हो और संघ विचारधारा से मेल खाता हो. तो क्या ये माना जाना चाहिए कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर नितिन गडकरी का परोक्ष हमला अपनी दावेदारी की पेशकदमी है? राजनीति की बारीक समझ रखने वाले तो यही मानते हैं.

सबको साथ लेकर चलने का बड़ा गुण है गडकरी में

नितिन गडकरी ने अपने मंत्रालय के कामकाज से तो नाम कमाया ही है, इन पांच सालों में उन्होंने अपनी ऐसी छवि बनायी है, जो काम करवाने में भी माहिर है और जिसे समझौतों से भी परहेज नहीं है. इससे बढ़ कर जो गुण गडकरी में है, वह है मिलनसारिता का. नितिन गडकरी मौजूदा समय के कार्यकर्ताओं के बीच बेहद लोकप्रिय हैं. आज जब कुछ नेताओं के दरवाजे कार्यकर्ताओं के लिए नहीं खुलते हैं, वहीं गडकरी हर रोज देर रात तक भाजपा के सैकड़ों कार्यकर्ताओं से मिलते देखे जाते हैं. नितिन गडकरी के सम्बन्ध सभी दलों के राजनेताओं से अच्छे बताये जाते हैं. यहां तक कि उन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल तक से उनके सम्बन्ध बेहतर बताये जाते हैं. छब्बीस जनवरी को नितिन गडकरी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ राजपथ पर गुफ्तगू करते हुए देखे गये. शिवसेना के साथ उनकी नजदीकियां किसी से छिपी नहीं हैं. बल्कि मोदी के नाम पर लगातार रार ठान रही शिवसेना गडकरी का नाम अगले लोकसभा चुनाव में पीएम पद के प्रत्याशी के तौर पर उछाल रही है. यानी अगर अगले लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा बहुमत से कुछ पीछे ठिठक जाती है और दूसरे दलों से समर्थन की जरूरत पड़ती है तो ऐसे में नितिन गडकरी को आगे प्रोजेक्ट किया जा सकता है.

पहले भी चले हैं गडकरी के बयान-बाण

नितिन गडकरी अपने हालिया बयान से ही चर्चा में नहीं आये हैं, इससे पहले भी वह कई मौकों पर ऐसे बयान दे चुके हैं, जिसकी चोट मोदी-शाह को गहरी पड़ी है.

07 जनवरी, 2019

इधर लोकसभा चुनाव सामने देखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 10 फीसदी सवर्ण आरक्षण का पत्ता फेंका, तो वहीं नागपुर में स्वयंसेवी महिला संगठन (एसएचजी) के कार्यक्रम में नितिन गडकरी ने कहा कि वो जात-पात और आरक्षण व्यवस्था में यकीन नहीं रखते. गडकरी ने कहा, ‘इस देश में इंदिरा गांधी जैसी नेता थीं. वो अपने वक्त के तमाम दिग्गज पुरुष नेताओं से बेहतर थीं. क्या इंदिरा गांधी ने कभी आरक्षण का सहारा लिया? इंदिरा गांधी को अपनी ताकत साबित करने और कांग्रेस में पुरुष नेताओं से बेहतर प्रदर्शन करने के लिए महिलाओं को आरक्षण देने की जरूरत नहीं थी.’

24 दिसंबर, 2018

नवंबर-दिसंबर, 2018 में देश के पांच राज्यों में हुए चुनाव में भाजपा की हार पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को निशाने पर लेते हुए नितिन गडकरी बोले, ‘अगर मैं पार्टी का अध्यक्ष हूं और मेरे सांसद-विधायक अच्छा काम नहीं कर रहे हैं तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? जाहिर है मैं.’ दिल्ली में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के इस सालाना लेक्चर कार्यक्रम में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि चुनाव में हार की जिम्मेदारी पार्टी प्रमुख की होती है.

22 दिसंबर, 2018

नितिन गडकरी ने महाराष्ट्र के पुणे में भी हिंदी पट्टी के तीन राज्यों – मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा को मिली चुनावी हार पर ‘नेतृत्व’ को ‘हार और विफलताओं’ की भी जिम्मेदारी लेने की बात कही. यहां उन्होंने कहा, ‘सफलता के कई दावेदार होते हैं, लेकिन विफलता में कोई साथ नहीं होता. सफलता का श्रेय लेने के लिए लोगों में होड़ रहती है, लेकिन नाकामी को कोई स्वीकार नहीं करना चाहता, सब दूसरे की तरफ उंगली दिखाने लगते हैं.’

21 दिसंबर, 2018

एक टीवी कार्यक्रम के दौरान नितिन गडकरी ने भाजपा नेताओं को मीडिया में कम बोलने की नसीहत दे डाली. उन्होंने कहा, ‘हमारे पास इतने नेता हैं और हमें उनके सामने (टीवी पत्रकारों) बोलना पसंद है, इसलिए हमें उन्हें कुछ काम देना है. उन्होंने एक फिल्म के सीन का जिक्र करते हुए कहा कि कुछ लोगों के मुंह में कपड़ा डाल कर उनका मुंह बंद करने की जरूरत है.

हालांकि बाद में उन्होंने अपनी सलाह देने वाले बयान पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा था कि पार्टी में प्रवक्ता होते हैं जो आधिकारिक तौर पर बोलते हैं. लेकिन कुछ लोग हैं, वे जब भी मीडिया में बोलते हैं तो विवाद पैदा हो जाता है. इससे पार्टी की छवि खराब होती है. किसी को ऐसी बातें नहीं बोलनी चाहिए, जिससे विवाद पैदा हो.

04 अगस्त, 2018

महाराष्ट्र के औरंगाबाद में नितिन गडकरी ने रोजगार और आरक्षण को लेकर बड़ा बयान दिया था. केन्द्रीय मंत्री ने मराठा आंदोलन पर कहा था कि आरक्षण रोजगार देने की गारंटी नहीं है, क्योंकि नौकरियां कम हो रही हैं. उन्होंने कहा, ‘आरक्षण तो एक ‘सोच’ है जो चाहती है कि नीति निर्माता हर समुदाय के गरीबों पर विचार करें. मान लीजिए कि आरक्षण दे दिया जाता है, लेकिन नौकरियां नहीं हैं, क्योंकि बैंक में आईटी (इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी) के कारण नौकरियां कम हुई हैं. सरकारी भर्ती रुकी हुई है. नौकरियां कहां हैं?’ बाद में गडकरी के इसी बयान का हवाला देकर विपक्षी पार्टियों ने मोदी सरकार को घेरा था.

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