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‘झांसी’ ने लगाई फांसी

अगर आप किसी टेलीविजन कलाकार को सिर्फ इसलिए अपना आदर्श मानते हैं कि वह फलां सीरियल के फलां किरदार को मजबूती के साथ निभा कर दर्शकों को अपना दीवाना बना लेता है या लेती है तो आप कल्पना के सागर में गोते लगा रहे हैं क्योंकि अपने दमदार किरदार को निभाने वाले बहुत से कलाकार निजी जिंदगी में कभीकभार इतने कमजोर निकलते हैं कि वे अपनी समस्याओं का समाधान आत्महत्या जैसा कड़ा कदम उठा कर कर लेते हैं.

एक ऐसी ही दक्षिण भारतीय तेलुगु टेलीविजन हीरोइन नागा झांसी ने हैदराबाद के अपने घर पर फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. बुधवार, 6 फरवरी को 21 साल की इस खूबसूरत हीरोइन का शव श्रीनगर कौलोनी में बने उन के फ्लैट में पंखे से लटकता हुआ मिला.

यह एक दिल दहला देने वाली घटना थी और बहुत से लोगों को तो यकीन भी नहीं हुआ. दरअसल, जब नागा झांसी ने फांसी लगाईं तब वे घर पर अकेली थीं. जब उन के भाई दुर्गा प्रसाद ने दरवाजा खटखटाया तो भीतर से कोई आवाज नहीं आई और न ही कोई हलचल हुई.

इस बात से भाई परेशान हो गया और उस ने जल्दी से पड़ोसियों को वहां बुला लिया. पड़ोसी भी कोई आहट न पा कर थोड़ा चिंतित हो गए और उन्होंने दरवाजा तोड़ने का फैसला लिया. जिस बात का डर था वही हुआ. नागा झांसी आत्महत्या कर चुकी थी.

बाद में नागा झांसी के शव को गांधी अस्पताल ले जाया गया और इस मामले की जानकारी पुलिस को दी गई.

नागा झांसी ने टेलीविजन पर आने वाले सीरियल ‘पवित्र बंधन’ के अलावा कई दूसरे टीवी सीरियलों में भी काम किया था.

झांसी को जानने वालों की माने तो वे ऐक्टिंग के साथसाथ एक ब्यूटी पार्लर भी चलाती थीं. वे किसी लड़के से प्यार भी करती थीं जो उन के दूर का ही कोई रिश्तेदार बताया जाता है.

ऐसा भी सुनने में आया है कि शायद प्यार में मिले किसी धोखे से वे तनाव में जी रही थीं और यह कदम उठा बैठीं.

इसी तरह साल 2016 में हिंदी टेलीविजन सीरियल ‘बालिका वधू’ की आनंदी बनी प्रत्यूषा बनर्जी ने भी खुदखुशी कर के अपनी जीवनलीला को समाप्त कर लिया था. वे भी अपने घर पर पंखे से लटक कर झूल गई थीं. वे अपनी निजी जिंदगी में बहुत परेशान थीं और अपने बौयफ्रेंड राहुल राज सिंह के साथ रह रही थीं.

तब यह सुनने में आया था कि उन्हें ज्यादा काम नहीं मिल रहा था और राहुल राज सिंह के साथ भी उन की खटपट चल रही थी.

ऐसे और भी उदाहरण मिल जाएंगे जब किसी हीरोइन ने भरी जवानी में अपनी जान दे दी हो. पर इस की वजह क्या होती है?

दरअसल, चमकधमक से भरी यह इंडस्ट्री दूर से ही अच्छी लगती है. एक बार काम मिल जाने के बाद जमे रहना भी बड़ा मुश्किल होता है. अचानक ज्यादा पैसा मिलना भी बहुतों का दिमाग खराब कर देता है. जब काम नहीं मिलता तो रईसी की लत गलत राह पर चलने को मजबूर कर देती है या इंसान इतना तनाव में आ जाता है कि वह अपनी जान देना सब से आसान समझने लगता है.

कपिल शर्मा को ही लीजिए. अपने अनूठे हास्य से लोगों को हंसाने वाला यह इंसान अपनी कामयाबी को ही नहीं पचा पाया था. वह अपने साथी कलाकारों को कुछ भी नहीं समझता था. उसे लगता था कि उस का शो उसी के दम पर चल रहा है. कुछ हद तक ऐसा मान सकते हैं पर कपिल शर्मा ने साथी कलाकारों को नाराज कर के अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारी थी. नतीजतन, शो तो बंद हुआ ही वह खुद इस कदर तनाव में घिर गए कि इस इंडस्ट्री से ही बाहर हो गए.

पर शायद अपने अच्छे दोस्तों और आत्मविश्वास की बदौलत वह दोबारा लौट आए और अब उनका शो सही ट्रैक पर चल रहा है. पर हर किसी को दूसरा मौका नहीं मिलता है. मौत को गले लगाने के बाद तो बिलकुल भी नहीं.

सियासी शिकंजे में सीबीआई

मोदी-सरकार में जिस तरह देश की बड़ी और सम्मानित संस्थाओं की गरिमा खत्म हुई है, ऐसा इस देश के इतिहास में कभी नहीं हुआ. यह बात आइने की तरह साफ है कि सत्ता की लालसा में केन्द्र की जांच एजेंसियों को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे मोदी-शाह लोकसभा चुनाव 2019 से पहले अपने राजनीतिक विरोधियों को कानून के शिकंजे में कस देना चाहते हैं. चुनाव प्रचार से दूर रखने के लिए वह उन्हें जेल में ठूंस देना चाहते हैं. चुनावी रणभेरी बजने के साथ ही केन्द्रीय जांच एजेंसियां खूब सक्रिय दिखने लगी हैं. अखिलेश यादव, मायावती, राबर्ट वाड्रा के बहाने से गांधी परिवार और अब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मोदी-शाह के निशाने पर हैं और सत्ता की कठपुतली बनी सीबीआई जिस तरह मोदी-शाह के राजनीतिक मकसद साधने में अपनी इज्जत गंवा रही है, यह चिन्ता का विषय है. हैरानी की बात है कि आज एक व्यक्ति की सत्ता-लोलुपता के आगे देश की सम्मानित संस्थाएं अपनी गरिमा की रक्षा नहीं कर पा रही हैं!

कभी सुना था कि किसी राज्य की पुलिस ने पूछताछ के लिए आये सीबीआई के अधिकारियों को गिरफ्तार कर थाने पर बिठा लिया. कभी सुना था कि राज्य पुलिस की इतनी हिम्मत हो गयी कि उसके सिपाहियों ने सीबीआई अधिकारियों के कौलर पकड़ कर उनसे धक्का-मुक्की, मारपीट कर डाली. मगर कोलकाता में ऐसा हुआ. केन्द्र सरकार के अधीन देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी के अधिकारी 3 फरवरी 2019 को पश्चिम बंगाल की पुलिस के हाथों न सिर्फ जलील हुए, पीटे गये, बल्कि गिरफ्तार करके घंटों थाने में बिठाये गये. यही नहीं कोलकाता सीबीआई के संयुक्त निदेशक पंकज श्रीवास्तव तो मारे डर के तीन घंटे तक अपनी तेरह वर्षीय बेटी और पत्नी के साथ घर के अंदर बंद रहे. शर्मनाक! मोदी-राज में यह ताकत और यह इज्जत रह गयी है देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई की!

सत्ता के चाबुक ने सीबीआई को इतना निरीह कर दिया है कि आज जो चाहे उसे लतिया रहा है. कोई भी राज्य उसकी एंट्री पर बैन लगा रहा है. उसके अधिकारियों को बंधक बना रहा है. कोलकाता की हालिया घटना स्वतंत्र भारत के इतिहास की बड़ी और दुर्भाग्यपूर्ण घटना है, जिसने सीबीआई के काम करने के ढंग पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. केन्द्र ने इशारा किया और सीबीआई बिना वारेंट दौड़ी चली गयी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खास अधिकारी पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार को गिरफ्तार करने और वहां उनकी पुलिस के हाथों पीटी गयी. चुनावी रैलियां चल रही हैं. ममता बनर्जी ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के हेलिकॉप्टर को बंगाल में उतरने की परमिशन नहीं दी, योगी आदित्यनाथ के रैली करने में अड़ंगा लगाया तो सीबीआई को भेजा गया उन्हें डराने के लिए. मगर बंगाल की शेरनी ने दांव उलट दिया और उनकी दहाड़ के आगे सीबीआई भीगी बिल्ली बन गयी.

सीबीआई को तोताबनाने का नतीजा है पश्चिम बंगाल की घटना

सीबीआई के लिए ‘तोता’ शब्द का इस्तेमाल खुद देश की शीर्ष अदालत ने किया था. एक वक्त था जब देश में कहीं क्राइम की छोटी से छोटी घटना होने पर भी जनता सीबीआई जांच की मांग करने लगती थी. यह भरोसा था सीबीआई की निष्पक्षता पर, उसकी जांच पर, उसके काम करने के तरीके पर. मगर आज यह मांग मंद पड़ चुकी है. जाहिर है इस संस्था पर से आमजनता का भरोसा उठ चुका है. हाल में जिस तरह सीबीआई के वरिष्ठ अधिकारी खुद भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे देखे गये और जिस तरह सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा को मोदी-सरकार ने अपमानित और प्रताड़ित कर फुटबौल की तरह इधर से उधर उछाला है, उसके बाद इस संस्था की कोई साख बची नहीं है. छप्पन सालों की कमाई इज्जत मिट्टी में मिल चुकी है. पश्चिम बंगाल की घटना के बाद जब लोकसभा में देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह सीबीआई विवाद पर जवाब दे रहे थे, तो पूरे विपक्ष ने एकजुट होकर  सीबीआई को ‘तोता है’, ‘तोता है’ कहकर अपमानित किया.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था पिंजरे में बंद तोता

राजनीतिक इशारे पर काम करने वाली सीबीआई को सुप्रीम कोर्ट ने ‘पिंजरे में बंद तोता’ कहा था. यह सीबीआई के लिए शर्म की बात होनी चाहिए थी, बावजूद इसके उसने अपनी दशा और दिशा नहीं सुधारी. गौरतलब है कि कोयला खदान आवंटन घोटाले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस जांच एजेंसी को ‘पिंजरे में बंद तोता’ की संज्ञा दी थी. उस सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत को पता चला था कि सीबीआई ने राजनीतिक दबाव में आकर अपनी रिपोर्ट में कई बदलाव किये हैं और रिपोर्ट को अदालत में पेश किये जाने से पहले उसकी कॉपी तत्कालीन कानून मंत्री को भी दिखायी गयी है.

सीबीआई राजनीतिक इशारे पर काम करने के लिए इसलिए मजबूर है क्योंकि आजादी के सात दशक बाद भी इसे स्वतंत्र संस्था का दर्जा नहीं दिया गया. यह केन्द्र सरकार के अधीन संस्था है. संस्था का निदेशक हर मामले में प्रधानमंत्री को रिपोर्ट देने के लिए मजबूर है. केन्द्र सरकार कभी भी इस संस्था को अपने चंगुल से निकलने नहीं देना चाहती क्योंकि चुनाव के वक्त विरोधियों को सताने के लिए उसके हाथ में सीबीआई से बेहतर हथियार कोई नहीं है. यही वजह है कि सीबीआई कभी भी राजनेताओं से जुड़े किसी केस में ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाती है. यहां सत्ता में बैठे और सत्ता से जुड़े लोगों के केस सालों-साल लटकाये जाते हैं और मौका देखकर ओपन किये जाते हैं. केन्द्र के इशारे पर विरोधियों पर कार्रवाइयां होती हैं. यानी कुल मिला कर कहा जाये तो सीबीआई केन्द्र सरकार का पपलू है जो उसकी ही बोली बोलता है. सीबीआई के पूर्व निदेशक (स्व.) सरदार जोगिन्दर सिंह ने एक साक्षात्कार में कहा था, ‘जांच एजेंसी के पास एक वकील रखने का अधिकार तक तो है नहीं. गिरफ्तारी हो या चार्जशीट, हर बात के लिए सरकार से मंजूरी लेनी पड़ती है. इस इंतजार में कई बार साक्ष्य नष्ट हो जाते हैं. अफसोस की बात है कि आजादी के इतने सालों बाद भी यह जांच एजेंसी डीएसपीई एक्ट के तहत चल रही है. सीबीआई को पूर्ण स्वायत्तता प्रदान करने के लिए इसे संवैधानिक दर्जा देना जरूरी है. इस एजेंसी को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाने का एकमात्र यही तरीका है.’

दरअसल राजनीतिक ताकतें सीबीआई को कभी स्वतन्त्र एजेंसी नहीं बनने देंगी. वह हमेशा अपने हथियार की तरह ही इसका इस्तेमाल करना चाहती हैं. कांग्रेस ने भी अपने वक्त में इसका दुरुपयोग किया और अब मोदी-शाह खुलेआम इसका दुरुपयोग कर रहे हैं. यही कारण है कि बीते दिनों आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल सरकारें सीबीआई के मामले में केन्द्र को दी अपनी सहमति वापस ले चुकी हैं. यानि अब सीबीआई को इन राज्यों में कार्रवाई करने से पहले राज्य सरकार से अनुमति लेना होगी. इसके पीछे जांच एजेन्सी के पास संवैधानिक दर्जा न होना एक बड़ा कारण है. सीबीआई धीरे-धीरे एक बदनाम संस्था बन गयी है. वह दिन दूर नहीं जब देश के अच्छे और ईमानदार आईपीएस अधिकारी सीबीआई या इसके समकक्ष संस्थाओं में अपनी तैनाती ही नहीं चाहेंगे.

सीबीआई संवैधानिक या असंवैधानिक

सीबीआई भारत सरकार के अंतर्गत काम करती है. इसकी स्थापना 1941 में स्पेशल पुलिस इस्टेब्लिशमेंट के तौर पर आंतरिक सुरक्षा की देखरेख के उद्देश्य से की गयी थी और 1963 में संस्था का नाम बदलकर सीबीआई (सेंट्रल ब्यूरो औफ इन्वेस्टिगेशन) रखा गया. एक अप्रैल 1963 को सीबीआई एक एग्जीक्यूटिव और्डर के तहत बनी थी. दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेबलिसमेंट (डीएसपीई) एक्ट-1946, के तहत सीबीआई के गठन या उसके अधिकार क्षेत्र की बात कही जाती है. खास बात है कि डीएसपीई एक्ट में ‘सीबीआई’ शब्द ही नहीं लिखा है. इस एक्ट में संशोधन हुए, मगर सीबीआई नाम फिर भी शामिल नहीं हो सका. संविधान के किसी भी चैप्टर में सीबीआई के गठन का कहीं कोई प्रावधान ही नहीं है. यही वजह है कि ‘केन्द्रीय जांच एजेंसी’ को आज भी संवैधानिक दर्जा हासिल नहीं है, लिहाजा इसको कभी भी पूर्ण स्वायत्ता हासिल नहीं हुई. इतने सालों से सीबीआई केन्द्र सरकार के अधीन ही कार्य करती रही है. वर्ष 2013 में सीबीआई के अधिकारों को गुवाहाटी हाई कोर्ट में चुनौती दी गयी थी. तब गुवाहाटी कोर्ट ने अपने फैसले में सीबीआई को असंवैधानिक करार दे दिया था. गुवाहाटी हाईकोर्ट ने छह नवंबर 2013 को अपने फैसले में कहा था कि सीबीआई संवैधानिक संस्था नहीं है. इसके पास किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने का अधिकार नहीं है. संविधान के अनुसार केन्द्र सरकार ऐसी एजेंसी या फोर्स नहीं रख सकती. कोर्ट ने कहा था कि अगर सीबीआई को पुलिस की तरह अधिकार देने हैं, तो उसे संविधान की ‘समवर्ती सूची’ में शामिल करना होगा. मगर केन्द्र सरकार ने तुरत-फुरत इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाकर स्टे ले लिया था. तब से लेकर अब तक सुप्रीम कोर्ट में वह अपील पेंडिंग चल रही है. चूंकि सरकार को स्टे मिल गया था, इसलिए सीबीआई अपना काम कर पा रही है. सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई की संवैधानिकता से सम्बन्धित केस में सरकार हर बार नई तारीख ले लेती है. केन्द्र सरकार किसी भी कीमत पर इस पर अपना कब्जा छोड़ने को तैयार नहीं है और यही वजह है कि सीबीआई ‘तोते’ की छवि से बाहर नहीं निकल पा रही है. पूर्ण स्वायत्तता न होने के कारण जांच एजेंसी को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. उसे हर बात में केन्द्र सरकार की मंजूरी लेनी पड़ती है, जिससे मामलों की जांच में देरी होती है, नतीजा अधिकारी कोर्ट की फटकार भी खाते हैं. उनके लिए एक ओर कुआं, दूसरी ओर खाई वाली स्थिति है. इससे बचाव का एक ही तरीका है कि जांच एजेंसी को पर्याप्त स्वायत्तता और अधिकार दिये जायें.

संविधान सभा के सदस्यों की राय

संविधान सभा के सदस्य नजीरुद्दीन अहमद और डौक्टर बी.आर. अम्बेडकर ने देश में सीबीआई जैसी एक केन्द्रीय संस्था होने की बात कही थी. उनका कहना था कि ऐसी एजेंसी केन्द्र सरकार की ‘संघ सूची’ के विषयों में शामिल रहेगी. इसका काम आपराधिक मुकदमे दर्ज करना या अपराधी को गिरफ्तार करना नहीं होगा, बल्कि यह एजेंसी केन्द्र सरकार के पास विभिन्न अपराधों की जो सूचनाएं आती हैं, उन्हें क्रॉस चैक करने का काम करेगी. एजेंसी के पास सिर्फ अंतरराज्यीय अपराधों की तुलना कर उसकी रिपोर्ट केन्द्र सरकार को देने का अधिकार था. पुलिस, जो कि ‘राज्य सूची’ का विषय है, उसकी तर्ज पर यह जांच एजेंसी न तो किसी को गिरफ्तार कर सकती थी और न ही किसी से पूछताछ करने का हक इसे था. आज सीबीआई को किसी को गिरफ़्तार करने, जांच करने या पूछताछ का जो भी अधिकार मिला है, वह डीएसपीई एक्ट के तहत सम्भव हो सका है. मगर राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण सीबीआई को मिले इस अधिकार का नाजायज इस्तेमाल ही ज्यादा होता रहा. राजनीतिक विरोधियों को डराने के लिए केन्द्र सरकार ने सीबीआई का जम कर दुरुपयोग किया. सीबीआई निदेशक की नियुक्ति चूंकि प्रधानमंत्री की सहमति पर होती थी, लिहाजा वह सत्ता शीर्ष के आदेशों को मानने के लिए भी बाध्य होता है. न माने तो फुटबॉल की तरह किसी और जगह उछाल दिया जाता है. आलोक वर्मा मामले से यह स्पष्ट हो चुका है. बोफोर्स मामले से लेकर राफेल मामले तक नजर डाल लें, सीबीआई के कामकाज पर केन्द्र सरकार की मनमानी स्पष्ट दिखायी देगी.

विनीत नारायण मामले से मिली थोड़ी मजबूती

सुप्रीम कोर्ट ने विनीत नारायण मामले में सीबीआई निदेशक को थोड़ी मजबूती देने का काम किया था. इस फैसले के बाद सीबीआई निदेशक का कार्यकाल न्यूनतम दो साल कर दिया गया था. इसके बाद यह उम्मीद की गयी थी कि अब जांच एजेंसी का निदेशक केन्द्र सरकार के दबाव में आकर काम नहीं करेगा. सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद ही सीबीआई निदेशक की नियुक्ति के लिए एक तीन सदस्यीय चयन समिति का गठन हुआ, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता विपक्ष और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस शामिल होते हैं. तीनों की सहमति से सीबीआई निदेशक की नियुक्ति होती है. इसके बावजूद सीबीआई में राजनीतिक हस्तक्षेप थमा नहीं. हाल में जिस तरह सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को जबरन कुर्सी से उतारने के लिए सीवीसी तक का दुरुपयोग किया गया, वह शर्मनाक था. आलोक वर्मा राफेल मामले में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू करना चाहते थे, जो मोदी-सरकार को मंजूर नहीं था. ऐसा मामला जो मोदी-शाह के गले की हड्डी बना हुआ है और 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की मिट्टी पलीद कर सकता है, उसकी जांच भला सीबीआई के तेजतर्रार निदेशक आलोक वर्मा को कैसे करने दी जा सकती थी? लिहाजा पहले उन पर भ्रष्टाचार का आरोप उनके ही अधीनस्त अधिकारी राकेश अस्थाना के जरिये लगवाया गया और फिर दोनों के बीच लड़ाई भड़का कर ऐसा सीन क्रियेट किया गया ताकि उस बहाने से आलोक वर्मा को उनके पद से हटाया जा सके. साफ है कि केन्द्र सरकार न तो सीबीआई को स्वतन्त्र रूप से किसी मामले की जांच करने का अधिकार देने को तैयार है और न ही अपने खिलाफ कोई कार्रवाई उसे मन्जूर है. सीबीआई आज भी सत्ता की गुलाम हैऔर यही कारण है कि पिछले साल आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल सरकार ने अधिकारिक तौर पर सीबीआई को अपने राज्य में जांच करने और छापा मारने के लिए दी गयी सामान्य सहमति भी वापस ले ली. इन राज्यों का आरोप है कि सीबीआई निष्पक्ष जांच एजेंसी नहीं है. यह एजेंसी केन्द्र सरकार के इशारे पर राजनीतिक विरोधियों को जानबूझकर प्रताड़ित करती है.

खूब प्रताड़ित किये गये आलोक वर्मा

सीबीआई के निदेशक सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करते हैं तो जाहिर है सत्ता के खिलाफ अगर कोई मामला बनता है तो इसकी जांच की अनुमति सीबीआई को प्रधानमंत्री की ओर से तो कभी मिल नहीं सकती. हां, कोर्ट के आदेश से सीबीआई चाहे तो कुछ कर सकती है, मगर उसमें भी सरकार ढेरों पेंच पैदा कर देती है, लिहाजा सरकार के खिलाफ जांच के मामलों में सीबीआई इंच-इंच दूरी भी बमुश्किल तय कर पाती है. फिर कैसे सम्भव था कि राफेल जैसा मामला जो 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी-शाह और उनकी एनडीए सरकार की मिट्टी पलीद कर सकता है, उसकी जांच सीबीआई के तेजतर्रार निदेशक आलोक वर्मा कर लें? ये बात आलोक वर्मा को भी समझनी चाहिए थी, मगर वे भी क्या करते, उनके पास भी समय बहुत कम था. 31 जनवरी को अपने रिटायरमेंट के पहले ही वह इस मामले में एफआईआर दर्ज कर लेना चाहते थे, ताकि जांच शुरू हो सके. राफेल सहित भ्रष्टाचार के कई और मामले थे, जिनकी जांच आलोक वर्मा करना चाहते थे, कुछ में तो एफआईआर दर्ज भी हो चुकी थी. मगर इन मामलों में आरोपी या तो सत्ता में बैठे थे, या फिर सीबीआई के अन्दर ही मौजूद थे. तो ऐसे में आलोक वर्मा को आगे बढ़ने का मौका क्योंकर दिया जाता? लिहाजा, उन्हें भ्रष्टाचार के आरोप में लम्बी छुट्टी पर भेज दिया गया. वे इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चले गये तो सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें सीबीआई निदेशक के पद पर पुन: बहाल कर दिया. लेकिन मोदी-सरकार तो तय किये बैठी थी कि किसी भी कीमत पर आलोक वर्मा को कोई भी फाइल नहीं खोलने देगी, लिहाजा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें वहां से हटवाने का आखिरी दांव चला और अपनी अध्यक्षता में गठित एक उच्चस्तरीय समिति में 2:1 के फैसले से वर्मा को कुर्सी से फिर उतार खड़ा किया. अबकी बार उन्हें छुट्टी पर नहीं भेजा गया, बल्कि उनका तबादला करते हुए उन्हें अग्निशमक सेवा, नागरिक सुरक्षा और होम गार्ड का महानिदेशक बना दिया गया. मगर आलोक वर्मा को सरकार का यह फैैसला मंजूर नहीं हुआ और हताशा में उन्होंने सरकारी सेवा से इस्तीफा दे दिया.

अपने किये पर परदा ढापे रखने के लिए देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी के प्रमुख की जितनी फजीहत मोदी-सरकार ने की है, वह निन्दनीय है. सीबीआई में हुई यह पूरी उठा-पटक यह बात भी साफ कर ही देती है कि राफेल बहुत बड़ा घोटाला है. इसीलिए इसके खुलासे को रोकने के लिए आलोक वर्मा जैसे अधिकारी को कुर्सी से उतार कर बेइज्जत किया गया. यह घटना देश के लिए चिन्ता का विषय है. लोकतन्त्र के लिए सोच का विषय है.

कार्यमुक्त होने के बाद आलोक वर्मा ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा था, ‘झूठे, अप्रमाणित और बेहद हल्के आरोपों को आधार बनाकर मेरा ट्रांसफर किया गया. ये आरोप उस एक शख्स ने लगाये हैं, जो मुझसे द्वेष रखता है. सीबीआई उच्च सार्वजनिक स्थानों में भ्रष्टाचार से निपटने वाली एक प्रमुख जांच एजेंसी है, एक ऐसी संस्था है जिसकी स्वतंत्रता को संरक्षित और सुरक्षित किया जाना चाहिए. इसे बिना किसी बाहरी प्रभावों यानी दखलअंदाजी के कार्य करना चाहिए. मैंने संस्था की साख बनाये रखने की कोशिश की है, जबकि इसे नष्ट करने के प्रयास किये जा रहे हैं. इसे केन्द्र सरकार और सीवीसी के 23 अक्टूबर, 2018 के आदेशों में देखा जा सकता है जो बिना किसी अधिकार क्षेत्र के दिये गये थे और जिन्हें रद्द कर दिया गया.’

आलोक वर्मा के बारे में बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी का बयान भी गौर करने लायक हैं, जिन्होंने कहा कि वर्मा बेहद ईमानदार हैं, उनकी छवि साफ-सुथरी है, उन्होंने सीबीआई निदेशक से पहले दिल्ली पुलिस आयुक्त के पद पर भी ईमानदारी के साथ काम किया है. स्वामी ने पी. चिदंबरम से जुड़े केस का जिक्र करते हुए कहा कि आलोक वर्मा पर जिस अधिकारी राकेश अस्थाना ने भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है, उसने तो खुद चिदंबरम वाले मामले की फाइल लटका रखी थी, आलोक वर्मा ने ही उस केस में चार्जशीट फाइल करायी थी.

सुब्रमण्यम स्वामी भाजपा नेता हैं, किसी कांग्रेसी ने ये बात कही होती तो उसमें सियासत तलाशी जाती, केस-मुकदमों के मामले में सुब्रमण्यम स्वामी कागजात के धनी माने जाते हैं, अगर उन्होंने राकेश अस्थाना पर उंगली उठायी और आलोक वर्मा की छुट्टी पर सवाल उठाये तो मामले की गम्भीरता को समझा जा सकता है. वर्मा-अस्थाना कांड के चलते सीबीआई की साख को तो नुकसान पहुंचा ही, इस पूरे प्रकरण से मोदी-सरकार की नीयत और कर्मों का खुलासा हुआ. हालिया कोलकाता प्रकरण में ममता बनर्जी से हुई केन्द्र की तीखी नोकझोंक सोने पर सुहागा हो गयी. ममता बनर्जी ने जहां खुल कर मोदी सरकार पर हमला बोला, वहीं पूरे विपक्ष को एकजुट करके अपनी ताकत भी बढ़ा ली. इस घटना में कोलकाता के अन्दर सीबीआई अधिकारी जिस तरह सरेआम पीटे और गिरफ्तार किये गये, उसने इस संस्था की साख लगभग खत्म कर दी है.

लोगों में बढ़ रहा है कैंसर का खतरा, ऐसे बचें

दुनियाभर में कैंसर तेजी से बढ़ रहा है. जानकारों की माने तो इसके 90 फीसदी मामले मुंह और फेफड़े संबंधित होते हैं. कैंसर की तेजी से बढ़ रहे खतरे पर एक डौक्टर ने कहा कि जो मरीज उनके पास आते हैं उनमें 90 फीसदी मरीज तंबाकू के उपभोक्ता होते हैं. तंबाकू का सेवन करने वाले लोगों को कम उम्र में ही कैंसर हो जाता है.

वहीं इस तरह के कैंसर के चपेट में महिलाएं भी हैं. इसका असर उनके जीवन पर तो होता ही है पर अगर कोई गर्भवती महिला धूम्रपान या धुआं रहित तंबाकू का सेवन करती है तो उनमें एनीमिया होने का खतरा 70 प्रतिशत अधिक हो जाता है. इससे बच्चे के जान का जोखिम भी बढ़ जाता है. महिलाओं में धुआं रहित तंबाकू उपयोगकर्ताओं में मुंह के कैंसर का खतरा पुरुषों की तुलना में 8 गुना अधिक होता है.

उन्होंने कहा कि इसी तरह धुआं रहित तंबाकू सेवन करने वाली महिलाओं में हृदय रोग का खतरा पुरुषों की तुलना में दो से चार गुना अधिक होता है. इस तरह की महिलाओं में पुरुषों की तुलना में मृत्युदर भी अधिक होती है.

लंबे समय से कैंसर पर काम कर रहे एक डौक्टर का कहना है कि धूम्र रहित तंबाकू के उपयोगकर्ताओं की संख्या बढ़ी है, क्योंकि पहले के तंबाकू विरोधी विज्ञापनों में सिगरेट और बीड़ी की तस्वीरें ही दिखाई जाती थी. लोगों में धारणा बन गई कि केवल सिगरेट और बीड़ी का सेवन ही हानिकारक है, इसलिए धीरे-धीरे धुआं रहित तंबाकू की खपत बढ़ गई.

बाल बढ़ाने के लिए जरूरी है पोषण

हर लड़की का ख्वाब होता है कि उसके बाल लंबे, घने, मजबूत और स्‍वस्‍थ रहें. लेकिन दूषित पर्यावरण और खराब जीवनशैली की वजह से हमारे बालों में किसी ना किसी पोषण की कमी हो ही जाती है. जिससे हमारे बालों की ग्रोथ रूक जाती है और वह रूखे व बेजान से दिखने लगते हैं. लेकिन अगर आपको अपने बालों की चिंता है तो अभी से ही अपने आहार में कुछ ऐसे पोषण शामिल करें जिससे बालों की ग्रोथ अच्‍छी हो जाए. आइये जानते हैं कि कौन से हैं वे पोषण जो हमारे बालों में नई जान डाल सकते हैं.

प्रोटीन

हर दिन ठीक मात्रा में प्रोटीन खाइये क्‍योंकि आपके बाल प्रोटीन से बने हुए हैं और उन्‍हें सही से उगाने में प्रोटीन का बहुत बड़ा हाथ होता है. आपको यह प्रोटीन मीट, मछली, अडें, बींस और मेवों में मिलेगा.

ओमेगा 3

फैटी एसिड यह हेल्‍दी फैट्स होते हैं जो कि बालों की ग्रोथ बढाते हैं और सिर की त्‍वचा का भी ख्‍याल रखते हैं. जिन आहारों में ओमेगा 3 पाया जाता है उनमें भी कैलोरी होती है. इसलिये कभी भी इनका ओवरडोज ना लें. ओमेगा 3 मछलियों में पाया जाता है.

आयरन

महिलओं के लिये भरपूर्ण आयरन लेना आवश्‍यक है. इससे महिलाओं को एनीमिया नहीं होता और अगर शरीर में आयरन नहीं है तो शरीर में ठीक प्रकार से औक्‍सीजन नहीं दौड़ेगा जिसका मतलब है कि आपके सिर में पर्याप्‍त आयरन नहीं पहुंचेगा जिससे बालों की ग्रोथ अच्‍छी नहीं होगी.

विटामिन डी

विटामिन डी लेने से बालों की ग्रोथ अच्‍छी होती है और यह आपको धूप, मशरूम और साल्‍मन मछली लेने से मिलेगा.

मैग्‍नीशियम

मैग्‍नीशियम से भी बालों की ग्रेाथ होती है इसलिये आपको पालक, ब्राउन राइस, मेवे आदि खाइये. जिंक जिंक से बालों की मोटाई बढती है, बाल मजबूत बनते हैं इसलिये जिंक को अपने आहार में शामिल करें.

विटामिन ई युक्त फेस पैक से पाइए त्वचा पर निखार

सर्दियों के मौसम में त्‍वचा की देखभाल करना बहुत ही जरुरी होता है. इस मौसम में त्‍वचा बिल्‍कुल फटने लगती है और बेजान सी दिखने लगती है और तब जरुरत होती है कि चेहरे पर ऐसा फेस पैक लगाया जाए जो विटामिन ई से भरपूर हो. विटामिन ई वाले आहारों से बना फेस पैक लगाने से चेहरे में नमी आएगी जिससे फटी त्‍वचा सही होगी और चेहरे पर झाइयां भी गायब होने लगेंगी. तो आइये जानते हैं इसके बारे में.

औलिव औयल

एक चम्‍मच जैतून का तेल ले कर उसे चेहरे और हाथों पर लगाइये. इसके बाद 1 घंटे बाद पानी से हाथ और मुंह धोइये. इस विधि को हफ्ते में रोज कीजिये और रिजल्‍ट देखिये.

पालक

इसमें भी बहुत सारा विटामिन ई होता है जो कि सर्दियों में त्‍वचा के लिये बहुत अच्‍छा होता है. इसका पेस्‍ट बना कर चेहरे पर लगाइये. इससे झुर्रियां गायब हो जाती हैं. जब यह सूख जाए तब इसे हाथों से हटा कर चेहरे पर औलिव औयल से मसाज करें और फिर हल्‍के गरम पानी से चेहरे को धो लें.

बादाम

माना जाता है कि बादाम में बहुत सारा विटामिन ई होता है और इसे चेहरे पर लगाने से चेहरे की झाइयां गायब हो जाती हैं.

अंजीर

अंजीर को स्‍क्रब के रूप में प्रयोग कर सकते हैं. सोने से पहले एक ताजी अंजीर को चेहरे और गरदन पर लगा कर गोलाई में रगडे़ और 15 मिनट के बाद धो लें.

टमाटर

यह फल टैन को हटाने में मदद करता है. टमाटर का फेस पैक बना कर चेहरे पर लगाइये और फरक देखिये.

एक चम्‍मच बटर को चेहरे और गरदन में रात को सोते समय लगाएं. इस विधि को हर तीसरे दिन जरुर करें.

गेहूं

इसके आटे में भी बहुत सारा विटामिन ई होता है. इसका गाढा पेस्‍ट बनाएं और इसे चेहरे पर तब तक लगा रहने दें जब तक कि यह सूख ना जाए. इसके बाद इसे गरम पानी से धो लें.

पपीता

पपीते के गूदे में विटामिन ई होता है जो कि त्‍वचा के लिये अच्‍छा होता है. इसे ले कर चेहरे पर हल्‍के हाथों से मसाज करें और चेहरे को 10 मिनट बाद धो लें. इससे चेहरे की झाइयां गायब हो जाएंगी.

कद्दू

कद्दू के एक छोटे पीस को ले कर उसे पीस लें और फिर उसे रोज रात के सोने से पहले चेहरे पर लगाएं. रातभर इसे ऐसे ही रहने दें और सुबह धो लें. कद्दू में बहुत सारा विटामिन ई होता है. यह मुहांसों के दाग को ठीक करने के काम आता है.

अवाकाडो

सर्दियों में ड्राई स्‍किन को ठीक करने के लिये कच्‍चे अवाकाडों को लगाइये. जब यह सूख जाए तब साफ पानी से चेहरे को धो लीजिये.

बजट 2019 : किसान आज भी दोराहे पर

भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने 1 फरवरी 2019 को 2019-20 का आम बजट पेश कर दिया. इस बजट में किसानों को लुभाने के लिए तमाम तरह की योजनाएं हैं. इन योजनाओं का खाका ऐसा तैयार किया गया है कि किसानों को भी खुश होने का मौका मिल सके.

अंतरिम बजट पेश करते हुए कार्यवाहक वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि इस बजट में किसानों के लिए ‘प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना’ चालू की गई है. इस के तहत 3 किस्तों में हर साल किसानों के खाते में सीधे 6,000 रुपए हस्तांतरित किए जाएंगे. इस के तहत 2,000 रुपए प्रति फसल यानी 3 फसलों के लिए दिए जाएंगे. यह योजना दिसंबर, 2018 से ही मान्य होगी यानि आम चुनाव से पहले ही तमाम किसानों के खातों में पैसा पहुंच जाएगा.

इस बजट में ये योजनाएं गांव, गरीब और मिडिल क्लास को ध्यान में रख कर बनाई गई हैं. इस तरह इन योजनाओं से तकरीबन 26 करोड़ नौकरीपेशा, किसानों और असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों के लिए 3 ऐलान कर के 130 करोड़ लोगों का दिल जीत लिया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बजट पेश होने के बाद कहा कि हमारी सरकार समाज के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचना चाहती है. इस से किसानों को मजबूती और मजदूरों को सम्मान मिलेगा वहीं लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन ने बजट की तारीफ करते हुए कहा कि यह बजट सभी के लिए है और अच्छा है.

वहीं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि देश की सुरक्षा मोदी सरकार की प्राथमिकता रही है. मोदी सरकार ने अपने हर फैसले से सैनिकों का मनोबल बढ़ाया है, वहीं उन्होंने इस बजट को किसानों के लिए मील का पत्थर बताया.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि मैं हर साल किसानों के खाते में 6,000 रुपए डाले जाने के फैसले का स्वागत करता हूं. इस से पिछड़े किसानों की माली हालत में सुधार आएगा.

कार्यवाहक वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि वे लोग जो एयरकंडीशंड कमरों में बैठते हैं वे छोटे किसानों की समस्याएं कैसे समझ सकते हैं. हम ने ‘प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना’ चालू की है. यह एक ऐतिहासिक फैसला है.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कहना है कि किसानों, मिडिल क्लास, गरीबों और महिलाओं समेत यह बजट समाज के हर तबके के लिए हितकारी है. यह बजट ‘न्यू इंडिया’ के सपने को पूरा करने में मदद करेगा.

लेकिन इस बजट पर कांग्रेस का कहना है कि यह एक चुनावी जुमला बजट है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बजट पर कहा कि डियर नमो, आप के घमंड से भरे 5 सालों में हमारे किसानों की ङ्क्षजदगी बरबाद कर दी. उन्हें केवल 17 रुपए प्रतिदिन दे कर उन का अपमान किया गया है. इस पर पीयूष गोयल ने कहा कि यह किसानों का सम्मान है, अपमान नहीं.

कर्नाटक के मुख्यमंत्री कुमारस्वामी ने कहा, ‘मैं पूछना चाहता हूं कि क्या इस बजट को वित्त विभाग के अधिकारियों को पूछ कर तैयार किया गया था या पिर आरएसएस को? इस बजट में नरेंद्र मोदी ने किसानों को कौटन कैंडी थमाई है.’

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि इस सरकार की ऐक्सपायरी डेट आ गई है. किसी भी दवा के ऐक्सपायर होने के बाद उस की क्या कीमत रह जाती है?

स्वराज इंडिया के नेता योगेंद्र यादव ने कहा कि जातेजाते यह सरकार किसानों को ठग गई.

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह का मानना है कि मुझे मंत्रियों और प्रधानमंत्री से यह जानना है कि किसानों की समस्याओं के लिए क्या किया गया. इन्होंने बेरोजगार नौजवानों के लिए क्या किया? वही हमारा भविष्य हैं.

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि बजट किसानों, मजदूरों, औरतों और मिडिल क्लास के लिए एक गिफ्ट की तरह है.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके अखिलेश यादव ने ट्विटर पर लिखा, ‘एक साल के बजट में 10 साल आगे की झूठी बात है. भूमिहीन किसानों व श्रमिकों के लिए इस में कुछ भी राहत नहीं है. 5 सालों की प्रताडऩा और पीड़ा के बाद देश के किसान, व्यापारीकारोबारी, बेरोजगार नौजवान अब भाजपा से नजात पाना चाहते हैं, दिखावटी ऐलान नहीं.

कांग्रेस नेता शशि थरूर ने कहा कि यह पूरा बजट एक तरह का फुस्स पटाखा है. हम ने केवल एक ही चीज अच्छी देखी कि मिडिल क्लास को टैक्स से राहत मिली है. किसानों को 6,000 रुपए हर साल की मदद यानी 500 रुपए हर महीने पर आ कर टिकती है. क्या यह राशि उन्हें सम्मान से जीने देने के लिए काफी है?

भाजपा सरकार ने हर तबके के लिए बहुत बड़ीबड़ी घोषणाएं की हैं तो वहीं कांग्रेस पार्टी का कहना है कि यह ‘थोथा चना बाजे घना’ वाला बजट है.

बुजुर्गों की सेवा है फायदे का सौदा

फिलहाल भारत में 100 मिलियन यानी 10 करोड़ से ज्यादा बुजुर्ग हैं और 2050 तक इन की संख्या 32.4 करोड़ हो जाने की उम्मीद है जो कुल जनसंख्या का करीब 20% है. मिनिस्ट्री फौर स्टैटिसटिक्स और प्रोग्राम इंप्लीमेंटेशन के द्वारा 2016 में दी गई रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 10.39 करोड़ बुजुर्ग है जिन की उम्र 60 से ऊपर है. यह कुल जनसंख्या का करीब 8.5% है.

2015-16, एआईएससीसीओएन ( AISCCON ) सर्वे के मुताबिक अपने परिवार के साथ रह रहे 60% वृद्धों को एब्यूज और हैरेसमेंट सहना पड़ता है जब कि 39 प्रतिशत वृद्धि अकेले रहते हैं. इलेक्ट्रौनिक और सोशल मीडिया के बढ़ते जाल, जीवन की भागदौड़ और एकल परिवारों के प्रति आकर्षण ने समाज में बुजुर्गों की स्थिति पर नकारात्मक प्रभाव डाला है. घरों में जहां बुजुर्गों की उपेक्षा हो रही है वही ढलती उम्र में अकेले वक्त गुजारना पड़ता है.

हाल ही में हेल्पएज इंडिया द्वारा देश के 19 छोटेबड़े शहरों में साढ़े चार हजार से अधिक बुजुर्गों पर किए गए एक सर्वे के मुताबिक 44% बुजुर्गों का कहना है कि सार्वजनिक स्थानों पर उन के साथ बहुत बुरा सलूक होता है.

सर्वे में शामिल 53 प्रतिशत बुजुर्गों का मानना है कि समाज उन के साथ भेदभाव करता है. ढलती उम्र, धीरेधीरे काम करने और ऊंचा सुनने की वजह से लोग उन से रुखा व्यवहार करते हैं.

आमतौर पर इस स्वार्थी दुनिया में बुजुर्गों के पास अपनों का साथ नहीं होता पर रुपए पैसों के मामले में उन का दबदबा रहता है. ज्यादा कुछ नहीं तो भी अपना मकान तो होता ही है. पहले लोग सोनेचांदी की भी काफी खरीदारी करते थे.

ऐजवेल फाउंडेशन द्वारा हाल ही में किए गए एक नए अध्ययन के मुताबिक 65% बुजुर्गों के पास कोई आर्थिक स्रोत नहीं पर 35% के पास प्रौपर्टी, पैसा, सेविंगस, इन्वेस्टमेंट्स और पैतृक संपत्ति हैं.

आप भी निश्चिंत हो कर और दिल लगा कर बुजुर्गों की सेवा करें. मेवा खाने को जरूर मिलेगा. बस आप को सब्र रखना होगा. दिल से बिना कोई स्वार्थ रखे उन की सहायता करने और सहारा देने का प्रयास कीजिये.  यकीन रखिये ये आप के लिए फायदे का सौदा साबित होगा.

इस सन्दर्भ में एक उदाहरण रांची से सटे एक गांव में रहने वाले रामलाल का लिया जा सकता है. रामलाल ने शुरू से अपनी जिंदगी में गरीबी ही देखी थी. वह चौधरी रतनलाल के यहां माली का काम करता था. रतनलाल दिल के अच्छे थे. तीज त्योहार पर उस के बीवीबच्चों को पुराने कपड़े या मिठाइयां वगैरह दे देते. रामलाल भी चौधरी के साथ खुद को जुड़ा हुआ महसूस करने लगा था. समय के साथ रतनलाल बूढ़े हो चले. उन के दोनों बेटे शहरों में जा कर सेटल हो गए. घर में अकेले पतिपत्नी ही रह गए. दूसरी तरफ पत्नी की तबीयत भी खराब रहने लगी थी.  नौकरचाकर तो कई थे. पर धीरेधीरे जब उम्र के साथ चौधरी

अशक्त होने लगे और कमाई भी घटती चली गई तो नौकरों ने भी साथ छोड़ दिया. ऐसे समय में एक रामलाल ही था जिस ने चौधरी का साथ नहीं छोड़ा.

रामलाल चौधरी और उस की पत्नी की हरसंभव सेवा करता. रामलाल की बीवी भी चौधरी के घर साफसफाई का काम करने लगी. कुछ समय बाद चौधरी की पत्नी चल बसी. बस रामलाल और उस की बीवी ही थे जो वृद्धि चौधरी की देखभाल करते रहे.

एक दिन चौधरी को भी पैरालिसिस अटैक पड़ गया. बेटे ने 2 दिन के लिए आ कर अपनी हाजिरी दी और रामलाल पर सब सौंप कर फिर शहर चला गया.

चौधरी पैसों के हिसाबकिताब से ले कर घर चलाने के सभी कामों के लिए रामलाल पर निर्भर थे. रामलाल के सामने हजारों लाखों रुपए पड़े रहते. पर उस ने कभी एक पैसा भी इधरउधर नहीं किया. इधर रामलाल का बेटा शहर जा कर पढ़ना चाहता था. रामलाल ने यह बात चौधरी को बताई थी पर कभी पैसे मांगे नहीं.

समय यों बीतता रहा

एक दिन चौधरी ने रामलाल से एक वकील को बुलवाया और अपना बंगला रामलाल के नाम करवा दिया. रामलाल भौंचक्क रह गया. चौधरी ने उसे गले लगाते हुए कहा कि यह उस की मेहनत और ईमानदारी का बदला है. अपने बेटे ने जो नहीं किया वह एक गैर ने किया. तो फिर बेटे का क्या हक़? हक तो उस गैर का ही होगा न. रामलाल की आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे.

यह महज कहानी नहीं एक हकीकत है. इस तरह की घटनाएं अक्सर हम अपने आसपास देखते रहते हैं. आज जब कि एकल परिवार का जमाना है इंसान बुढ़ापे में काफी अकेला पड़ जाता है. ऐसे में यदि कोई पराया शख्स अपनों से बढ़ कर साथ देता है तो दिल तो पसीजेगा ही. यदि आप को भी किसी बुजुर्ग दंपत्ति की सेवा का अवसर मिल रहा है तो जरूर करें. तुरंत फायदा न दिखे पर आगे चल कर आप को अचानक बहुत सारा लाभ मिल सकता है.

आमतौर पर इस स्वार्थी दुनिया में बुजुर्गों के पास अपनों का साथ नहीं होता पर रुपएपैसों के मामले में उन का दबदबा रहता है.ज्यादा कुछ नहीं तो भी अपना मकान तो होता ही है. पहले लोग सोनेचांदी की भी काफी खरीदारी करते थे. आप भी निश्चिंत हो कर और दिल लगा कर बुजुर्गों की सेवा करें. मेवा खाने को जरूर मिलेगा. बस आप को सब्र रखना होगा.

कोई शौर्टकट नहीं

सेवा करें पर शौर्टकट में नहीं बल्कि दिल से पूरी ईमानदारी से करें. काम कोई भी हो अपनी लगन दिखाएं. खाना बनाना हो, देखभाल करनी हो या बाहर के काम हों , सब कुछ अपना बन कर करें. आप अपने घरवालों के लिए जैसे जीजान लगा देते हैं, एक बार इन अकेले बुजुर्गों के लिए भी वैसा कर के देखें. वे आप की झोली खुशियों से भर देंगे.

मन डोलने न दें

कई मौके ऐसे आ सकते हैं जब आप के सामने बुजुर्ग ने अपनी तिजोरी खोली हो या आप के हाथ कोई बड़ी रकम किसी को देने को भेजा हो या फिर आप की नजरों के आगे उन्हें कोई बड़ी रकम मिली हो. ऐसे में हमेशा अपना ईमान कायम रखें.

इस से आप का मन डोल गया तो उस बुजुर्ग की नजरों में आप गिर जाएंगे और फिर आप के हाथ में वह खजाना फिर कभी नहीं लगने वाला जो शायद आप का हो सकता था.

मांगे नहीं

आप जिस बुजुर्ग के संपर्क में हैं साथ हैं संभव है कि उनके पास बहुत पैसे हैं और आपको पैसों की जरूरत हो मगर बेहतर होगा कि आप कभी भी उन से रुपयों की मांग न करें. मांगने की आदत उन की नजरों में आप की इज्जत कम करती है. जितना भी जरूरी काम हो खुद ही उसे मैनेज करने का प्रयास करें. तभी एक दिन ऐसा भी आएगा जब आप को कुछ मांगना नहीं पड़ेगा बल्कि सब कुछ खुदबखुद मिल जाएगा.

खूबसूरत स्मृति का शानदार कारनामा

18 जुलाई 1996 को मुंबई में जन्मी स्मृति मंधाना ने याद रखने लायक एक रिकौर्ड बनाया है. वे भारतीय महिला टीम की ओपनिंग बल्लेबाज हैं और महिलाओं की वनडे रैंकिंग में पहले नंबर पर पहुंच गई हैं. यह कारनामा उन्होंने न्यूजीलैंड के खिलाफ खेली गई 3 वनडे मैचों की सीरीज में किया, जहां उन्होंने ताबड़तोड़ रन बनाए. इस वजह से उन्होंने शनिवार, 2 फरवरी को जारी ताजा रैंकिंग में 3 पायदान की छलांग लगाई. याद रहे कि स्मृति मंधाना ने इस सीरीज में एक शतक लगाने के बाद नाबाद 90 रन की बेहतरीन पारी भी खेली थी.

यही वजह है कि स्मृति मंधाना अब वनडे रैंकिंग में ऑस्ट्रेलिया की एलिस पेरी और मेग लैनिंग से ऊपर पहुंच गई हैं. वे साल 2018 से अब तक खेले गए 15 वनडे मैचों में 2 सेंचुरी और 8 हाफ सेंचुरी लगा चुकी हैं.

स्मृति मंधाना ने 47 वनडे मैचों में अब तक 1798 रन बनाए हैं. उन्होंने 10 अप्रैल, 2013 को अहमदाबाद में बंगलादेश के खिलाफ खेले गए मैच से इंटरनेशनल वनडे में डेब्यू किया था. वे तब से अब तक 47 वनडे मैच खेल चुकी हैं जिन में उन्होंने 41.81 की औसत और 83.78 के स्ट्राइक रेट से 1798 रन बनाए हैं.

स्मृति मंधाना ने हाल ही में आईसीसी महिला क्रिकेटर औफ द ईयर और वनडे प्लेयर औफ द ईयर का अवौर्ड जीता था. उन्हें वनडे टीम औफ द ईयर में भी शामिल किया गया था.

तंदूरी चिकेन रेसिपी

आवश्यक सामग्री :

– चिकन (800 ग्राम)

– दही (01 कप)

– कश्मीरी मिर्च पाउडर (02 छोटे चम्मच)

– अदरक का पेस्ट (02 बड़े चम्मच)

– लहसुन का पेस्ट (02 बडे चम्मच)

– गरम मसाला (1/2 चम्मच)

– सरसों का तेल (02 बड़े चम्मच)

– नींबू का रस (02 छोटे चम्मच)

– चाट मसाला (1/2 चम्मच)

– प्याज के छल्ले (स्वादानुसार)

– नींबू के छल्ले (इच्छानुसार)

– मक्खन (स्वादानुसार)

– नमक ( स्वादानुसार)

तंदूरी चिकन बनाने की विधि :

– सबसे पहले चिकन को अच्छी तरह से धो लें.

– इसके बाद एक चम्मच कश्मीरी लाल मिर्च पाउडर और एक चम्मच नींबू के रस को मिलाकर 30 मिनट   के लिए रख दें.

– दही को एक बारीक सूती कपड़े में बांध कर उसका पानी निचोड़ दें.

– इसके बाद दही को एक बर्तन में पलट लें और उसमें नींबू के रस में मिली हुई लाल मिर्च पाउडर, नमक, अदरक-लहसुन का पेस्ट, नींबू का रस, गरम मसाला पाउडर और सरसों का तेल मिला लें.

– सारी सामग्री को आपस में अच्छे से मिला लें और उसके बाद इसके लेप को कटे हुए चिकन पर लगा कर तीन-चार घंटे रख दें.

– सूखने के बाद इसे माइक्रोवेव अथवा तंदूर में 10-12 मिनट पका लें.

– पकने के बाद ऊपर से मक्खन लगाएं और एक बार फिर 03 मिनट तक पकाएं.

– लीजिये तंदूरी चिकन बनाने की विधि कम्लीट हुई.

– अब आपका चिकन तंदूरी तैयार है.

– बस इसके ऊपर चाट मसाला छिड़कें और प्याज के छल्लों और नींबू के छल्लों के साथ परोसें.

खांसी को ना करें नजरअंदाज, हो सकता है कैंसर

कैंसर आज भी एक गंभीर और जानलेवा बीमारी है. ज्यादातर मामलों में सही समय पर इसका पता नहीं चलता जिसके कारण सही समय पर इलाज ना मिलने के कारण यह कई लोगों को मौत का कारण बनती है. हालांकि कई बार इसके शुरुआती लक्षण से इसका पता नहीं लगता जिसके कारण इसका इलाज और मुश्किल होता है. पर हालिया स्टडी की रिपोर्ट में कैंसर की पहचान करने वाले लक्षण के बारे में बताया गया है, जिसकी मदद से आप समय रहते कैंसर की पहचान कर इलाज कर पाएंगे.

स्टडी की रिपोर्ट में ये बात सामने आई है कि हमेशा गले में खराश रहना या लगातार गले में परेशानी का रहना कैंसर का लक्षण है. रिपोर्ट के मुताबिक गले में में खराश के साथ कान का दर्द होना  और कुछ खाने यै सांस लेने में परेशानी होना लैरिंक्स कैंसर का लक्षण हो सकता है.

इस रिपोर्ट के माध्यम कैंसर के शुरुआती समय में इलाज में काफी मदद मिलेगी. स्टडी में शामिल जानकारों की माने तो लैरिंक्स कैंसर के लक्षणों के बारे में जानकारी दी गई है.

शोधकर्ताओं की माने तो इस स्टडी के माध्यम से ये पता चला है कि गले का बैठना लैरिक्स कैंसर का एक अहम लक्षण है. इसके अलावा बार बार गले में खराश रहने से कैंसर का खतरा काफी अधिक हो जाता है.

इस स्टडी में लगभग 800 से ज्यादा लैरिंक्स कैंसर से पीड़ित मरीजों को शामिल किया गया है. स्टडी की रिपोर्ट में सामने आया कि 5 फीसदी से ज्यादा लोगों को कैंसर लगातार गले में खराश रहने के कारण हुआ.

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