मोदी-सरकार में जिस तरह देश की बड़ी और सम्मानित संस्थाओं की गरिमा खत्म हुई है, ऐसा इस देश के इतिहास में कभी नहीं हुआ. यह बात आइने की तरह साफ है कि सत्ता की लालसा में केन्द्र की जांच एजेंसियों को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे मोदी-शाह लोकसभा चुनाव 2019 से पहले अपने राजनीतिक विरोधियों को कानून के शिकंजे में कस देना चाहते हैं. चुनाव प्रचार से दूर रखने के लिए वह उन्हें जेल में ठूंस देना चाहते हैं. चुनावी रणभेरी बजने के साथ ही केन्द्रीय जांच एजेंसियां खूब सक्रिय दिखने लगी हैं. अखिलेश यादव, मायावती, राबर्ट वाड्रा के बहाने से गांधी परिवार और अब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मोदी-शाह के निशाने पर हैं और सत्ता की कठपुतली बनी सीबीआई जिस तरह मोदी-शाह के राजनीतिक मकसद साधने में अपनी इज्जत गंवा रही है, यह चिन्ता का विषय है. हैरानी की बात है कि आज एक व्यक्ति की सत्ता-लोलुपता के आगे देश की सम्मानित संस्थाएं अपनी गरिमा की रक्षा नहीं कर पा रही हैं!

कभी सुना था कि किसी राज्य की पुलिस ने पूछताछ के लिए आये सीबीआई के अधिकारियों को गिरफ्तार कर थाने पर बिठा लिया. कभी सुना था कि राज्य पुलिस की इतनी हिम्मत हो गयी कि उसके सिपाहियों ने सीबीआई अधिकारियों के कौलर पकड़ कर उनसे धक्का-मुक्की, मारपीट कर डाली. मगर कोलकाता में ऐसा हुआ. केन्द्र सरकार के अधीन देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी के अधिकारी 3 फरवरी 2019 को पश्चिम बंगाल की पुलिस के हाथों न सिर्फ जलील हुए, पीटे गये, बल्कि गिरफ्तार करके घंटों थाने में बिठाये गये. यही नहीं कोलकाता सीबीआई के संयुक्त निदेशक पंकज श्रीवास्तव तो मारे डर के तीन घंटे तक अपनी तेरह वर्षीय बेटी और पत्नी के साथ घर के अंदर बंद रहे. शर्मनाक! मोदी-राज में यह ताकत और यह इज्जत रह गयी है देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई की!

सत्ता के चाबुक ने सीबीआई को इतना निरीह कर दिया है कि आज जो चाहे उसे लतिया रहा है. कोई भी राज्य उसकी एंट्री पर बैन लगा रहा है. उसके अधिकारियों को बंधक बना रहा है. कोलकाता की हालिया घटना स्वतंत्र भारत के इतिहास की बड़ी और दुर्भाग्यपूर्ण घटना है, जिसने सीबीआई के काम करने के ढंग पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. केन्द्र ने इशारा किया और सीबीआई बिना वारेंट दौड़ी चली गयी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खास अधिकारी पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार को गिरफ्तार करने और वहां उनकी पुलिस के हाथों पीटी गयी. चुनावी रैलियां चल रही हैं. ममता बनर्जी ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के हेलिकॉप्टर को बंगाल में उतरने की परमिशन नहीं दी, योगी आदित्यनाथ के रैली करने में अड़ंगा लगाया तो सीबीआई को भेजा गया उन्हें डराने के लिए. मगर बंगाल की शेरनी ने दांव उलट दिया और उनकी दहाड़ के आगे सीबीआई भीगी बिल्ली बन गयी.

सीबीआई को तोताबनाने का नतीजा है पश्चिम बंगाल की घटना

सीबीआई के लिए ‘तोता’ शब्द का इस्तेमाल खुद देश की शीर्ष अदालत ने किया था. एक वक्त था जब देश में कहीं क्राइम की छोटी से छोटी घटना होने पर भी जनता सीबीआई जांच की मांग करने लगती थी. यह भरोसा था सीबीआई की निष्पक्षता पर, उसकी जांच पर, उसके काम करने के तरीके पर. मगर आज यह मांग मंद पड़ चुकी है. जाहिर है इस संस्था पर से आमजनता का भरोसा उठ चुका है. हाल में जिस तरह सीबीआई के वरिष्ठ अधिकारी खुद भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे देखे गये और जिस तरह सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा को मोदी-सरकार ने अपमानित और प्रताड़ित कर फुटबौल की तरह इधर से उधर उछाला है, उसके बाद इस संस्था की कोई साख बची नहीं है. छप्पन सालों की कमाई इज्जत मिट्टी में मिल चुकी है. पश्चिम बंगाल की घटना के बाद जब लोकसभा में देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह सीबीआई विवाद पर जवाब दे रहे थे, तो पूरे विपक्ष ने एकजुट होकर  सीबीआई को ‘तोता है’, ‘तोता है’ कहकर अपमानित किया.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था पिंजरे में बंद तोता

राजनीतिक इशारे पर काम करने वाली सीबीआई को सुप्रीम कोर्ट ने ‘पिंजरे में बंद तोता’ कहा था. यह सीबीआई के लिए शर्म की बात होनी चाहिए थी, बावजूद इसके उसने अपनी दशा और दिशा नहीं सुधारी. गौरतलब है कि कोयला खदान आवंटन घोटाले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस जांच एजेंसी को ‘पिंजरे में बंद तोता’ की संज्ञा दी थी. उस सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत को पता चला था कि सीबीआई ने राजनीतिक दबाव में आकर अपनी रिपोर्ट में कई बदलाव किये हैं और रिपोर्ट को अदालत में पेश किये जाने से पहले उसकी कॉपी तत्कालीन कानून मंत्री को भी दिखायी गयी है.

सीबीआई राजनीतिक इशारे पर काम करने के लिए इसलिए मजबूर है क्योंकि आजादी के सात दशक बाद भी इसे स्वतंत्र संस्था का दर्जा नहीं दिया गया. यह केन्द्र सरकार के अधीन संस्था है. संस्था का निदेशक हर मामले में प्रधानमंत्री को रिपोर्ट देने के लिए मजबूर है. केन्द्र सरकार कभी भी इस संस्था को अपने चंगुल से निकलने नहीं देना चाहती क्योंकि चुनाव के वक्त विरोधियों को सताने के लिए उसके हाथ में सीबीआई से बेहतर हथियार कोई नहीं है. यही वजह है कि सीबीआई कभी भी राजनेताओं से जुड़े किसी केस में ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाती है. यहां सत्ता में बैठे और सत्ता से जुड़े लोगों के केस सालों-साल लटकाये जाते हैं और मौका देखकर ओपन किये जाते हैं. केन्द्र के इशारे पर विरोधियों पर कार्रवाइयां होती हैं. यानी कुल मिला कर कहा जाये तो सीबीआई केन्द्र सरकार का पपलू है जो उसकी ही बोली बोलता है. सीबीआई के पूर्व निदेशक (स्व.) सरदार जोगिन्दर सिंह ने एक साक्षात्कार में कहा था, ‘जांच एजेंसी के पास एक वकील रखने का अधिकार तक तो है नहीं. गिरफ्तारी हो या चार्जशीट, हर बात के लिए सरकार से मंजूरी लेनी पड़ती है. इस इंतजार में कई बार साक्ष्य नष्ट हो जाते हैं. अफसोस की बात है कि आजादी के इतने सालों बाद भी यह जांच एजेंसी डीएसपीई एक्ट के तहत चल रही है. सीबीआई को पूर्ण स्वायत्तता प्रदान करने के लिए इसे संवैधानिक दर्जा देना जरूरी है. इस एजेंसी को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाने का एकमात्र यही तरीका है.’

दरअसल राजनीतिक ताकतें सीबीआई को कभी स्वतन्त्र एजेंसी नहीं बनने देंगी. वह हमेशा अपने हथियार की तरह ही इसका इस्तेमाल करना चाहती हैं. कांग्रेस ने भी अपने वक्त में इसका दुरुपयोग किया और अब मोदी-शाह खुलेआम इसका दुरुपयोग कर रहे हैं. यही कारण है कि बीते दिनों आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल सरकारें सीबीआई के मामले में केन्द्र को दी अपनी सहमति वापस ले चुकी हैं. यानि अब सीबीआई को इन राज्यों में कार्रवाई करने से पहले राज्य सरकार से अनुमति लेना होगी. इसके पीछे जांच एजेन्सी के पास संवैधानिक दर्जा न होना एक बड़ा कारण है. सीबीआई धीरे-धीरे एक बदनाम संस्था बन गयी है. वह दिन दूर नहीं जब देश के अच्छे और ईमानदार आईपीएस अधिकारी सीबीआई या इसके समकक्ष संस्थाओं में अपनी तैनाती ही नहीं चाहेंगे.

सीबीआई संवैधानिक या असंवैधानिक

सीबीआई भारत सरकार के अंतर्गत काम करती है. इसकी स्थापना 1941 में स्पेशल पुलिस इस्टेब्लिशमेंट के तौर पर आंतरिक सुरक्षा की देखरेख के उद्देश्य से की गयी थी और 1963 में संस्था का नाम बदलकर सीबीआई (सेंट्रल ब्यूरो औफ इन्वेस्टिगेशन) रखा गया. एक अप्रैल 1963 को सीबीआई एक एग्जीक्यूटिव और्डर के तहत बनी थी. दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेबलिसमेंट (डीएसपीई) एक्ट-1946, के तहत सीबीआई के गठन या उसके अधिकार क्षेत्र की बात कही जाती है. खास बात है कि डीएसपीई एक्ट में ‘सीबीआई’ शब्द ही नहीं लिखा है. इस एक्ट में संशोधन हुए, मगर सीबीआई नाम फिर भी शामिल नहीं हो सका. संविधान के किसी भी चैप्टर में सीबीआई के गठन का कहीं कोई प्रावधान ही नहीं है. यही वजह है कि ‘केन्द्रीय जांच एजेंसी’ को आज भी संवैधानिक दर्जा हासिल नहीं है, लिहाजा इसको कभी भी पूर्ण स्वायत्ता हासिल नहीं हुई. इतने सालों से सीबीआई केन्द्र सरकार के अधीन ही कार्य करती रही है. वर्ष 2013 में सीबीआई के अधिकारों को गुवाहाटी हाई कोर्ट में चुनौती दी गयी थी. तब गुवाहाटी कोर्ट ने अपने फैसले में सीबीआई को असंवैधानिक करार दे दिया था. गुवाहाटी हाईकोर्ट ने छह नवंबर 2013 को अपने फैसले में कहा था कि सीबीआई संवैधानिक संस्था नहीं है. इसके पास किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने का अधिकार नहीं है. संविधान के अनुसार केन्द्र सरकार ऐसी एजेंसी या फोर्स नहीं रख सकती. कोर्ट ने कहा था कि अगर सीबीआई को पुलिस की तरह अधिकार देने हैं, तो उसे संविधान की ‘समवर्ती सूची’ में शामिल करना होगा. मगर केन्द्र सरकार ने तुरत-फुरत इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाकर स्टे ले लिया था. तब से लेकर अब तक सुप्रीम कोर्ट में वह अपील पेंडिंग चल रही है. चूंकि सरकार को स्टे मिल गया था, इसलिए सीबीआई अपना काम कर पा रही है. सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई की संवैधानिकता से सम्बन्धित केस में सरकार हर बार नई तारीख ले लेती है. केन्द्र सरकार किसी भी कीमत पर इस पर अपना कब्जा छोड़ने को तैयार नहीं है और यही वजह है कि सीबीआई ‘तोते’ की छवि से बाहर नहीं निकल पा रही है. पूर्ण स्वायत्तता न होने के कारण जांच एजेंसी को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. उसे हर बात में केन्द्र सरकार की मंजूरी लेनी पड़ती है, जिससे मामलों की जांच में देरी होती है, नतीजा अधिकारी कोर्ट की फटकार भी खाते हैं. उनके लिए एक ओर कुआं, दूसरी ओर खाई वाली स्थिति है. इससे बचाव का एक ही तरीका है कि जांच एजेंसी को पर्याप्त स्वायत्तता और अधिकार दिये जायें.

संविधान सभा के सदस्यों की राय

संविधान सभा के सदस्य नजीरुद्दीन अहमद और डौक्टर बी.आर. अम्बेडकर ने देश में सीबीआई जैसी एक केन्द्रीय संस्था होने की बात कही थी. उनका कहना था कि ऐसी एजेंसी केन्द्र सरकार की ‘संघ सूची’ के विषयों में शामिल रहेगी. इसका काम आपराधिक मुकदमे दर्ज करना या अपराधी को गिरफ्तार करना नहीं होगा, बल्कि यह एजेंसी केन्द्र सरकार के पास विभिन्न अपराधों की जो सूचनाएं आती हैं, उन्हें क्रॉस चैक करने का काम करेगी. एजेंसी के पास सिर्फ अंतरराज्यीय अपराधों की तुलना कर उसकी रिपोर्ट केन्द्र सरकार को देने का अधिकार था. पुलिस, जो कि ‘राज्य सूची’ का विषय है, उसकी तर्ज पर यह जांच एजेंसी न तो किसी को गिरफ्तार कर सकती थी और न ही किसी से पूछताछ करने का हक इसे था. आज सीबीआई को किसी को गिरफ़्तार करने, जांच करने या पूछताछ का जो भी अधिकार मिला है, वह डीएसपीई एक्ट के तहत सम्भव हो सका है. मगर राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण सीबीआई को मिले इस अधिकार का नाजायज इस्तेमाल ही ज्यादा होता रहा. राजनीतिक विरोधियों को डराने के लिए केन्द्र सरकार ने सीबीआई का जम कर दुरुपयोग किया. सीबीआई निदेशक की नियुक्ति चूंकि प्रधानमंत्री की सहमति पर होती थी, लिहाजा वह सत्ता शीर्ष के आदेशों को मानने के लिए भी बाध्य होता है. न माने तो फुटबॉल की तरह किसी और जगह उछाल दिया जाता है. आलोक वर्मा मामले से यह स्पष्ट हो चुका है. बोफोर्स मामले से लेकर राफेल मामले तक नजर डाल लें, सीबीआई के कामकाज पर केन्द्र सरकार की मनमानी स्पष्ट दिखायी देगी.

विनीत नारायण मामले से मिली थोड़ी मजबूती

सुप्रीम कोर्ट ने विनीत नारायण मामले में सीबीआई निदेशक को थोड़ी मजबूती देने का काम किया था. इस फैसले के बाद सीबीआई निदेशक का कार्यकाल न्यूनतम दो साल कर दिया गया था. इसके बाद यह उम्मीद की गयी थी कि अब जांच एजेंसी का निदेशक केन्द्र सरकार के दबाव में आकर काम नहीं करेगा. सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद ही सीबीआई निदेशक की नियुक्ति के लिए एक तीन सदस्यीय चयन समिति का गठन हुआ, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता विपक्ष और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस शामिल होते हैं. तीनों की सहमति से सीबीआई निदेशक की नियुक्ति होती है. इसके बावजूद सीबीआई में राजनीतिक हस्तक्षेप थमा नहीं. हाल में जिस तरह सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को जबरन कुर्सी से उतारने के लिए सीवीसी तक का दुरुपयोग किया गया, वह शर्मनाक था. आलोक वर्मा राफेल मामले में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू करना चाहते थे, जो मोदी-सरकार को मंजूर नहीं था. ऐसा मामला जो मोदी-शाह के गले की हड्डी बना हुआ है और 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की मिट्टी पलीद कर सकता है, उसकी जांच भला सीबीआई के तेजतर्रार निदेशक आलोक वर्मा को कैसे करने दी जा सकती थी? लिहाजा पहले उन पर भ्रष्टाचार का आरोप उनके ही अधीनस्त अधिकारी राकेश अस्थाना के जरिये लगवाया गया और फिर दोनों के बीच लड़ाई भड़का कर ऐसा सीन क्रियेट किया गया ताकि उस बहाने से आलोक वर्मा को उनके पद से हटाया जा सके. साफ है कि केन्द्र सरकार न तो सीबीआई को स्वतन्त्र रूप से किसी मामले की जांच करने का अधिकार देने को तैयार है और न ही अपने खिलाफ कोई कार्रवाई उसे मन्जूर है. सीबीआई आज भी सत्ता की गुलाम हैऔर यही कारण है कि पिछले साल आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल सरकार ने अधिकारिक तौर पर सीबीआई को अपने राज्य में जांच करने और छापा मारने के लिए दी गयी सामान्य सहमति भी वापस ले ली. इन राज्यों का आरोप है कि सीबीआई निष्पक्ष जांच एजेंसी नहीं है. यह एजेंसी केन्द्र सरकार के इशारे पर राजनीतिक विरोधियों को जानबूझकर प्रताड़ित करती है.

खूब प्रताड़ित किये गये आलोक वर्मा

सीबीआई के निदेशक सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करते हैं तो जाहिर है सत्ता के खिलाफ अगर कोई मामला बनता है तो इसकी जांच की अनुमति सीबीआई को प्रधानमंत्री की ओर से तो कभी मिल नहीं सकती. हां, कोर्ट के आदेश से सीबीआई चाहे तो कुछ कर सकती है, मगर उसमें भी सरकार ढेरों पेंच पैदा कर देती है, लिहाजा सरकार के खिलाफ जांच के मामलों में सीबीआई इंच-इंच दूरी भी बमुश्किल तय कर पाती है. फिर कैसे सम्भव था कि राफेल जैसा मामला जो 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी-शाह और उनकी एनडीए सरकार की मिट्टी पलीद कर सकता है, उसकी जांच सीबीआई के तेजतर्रार निदेशक आलोक वर्मा कर लें? ये बात आलोक वर्मा को भी समझनी चाहिए थी, मगर वे भी क्या करते, उनके पास भी समय बहुत कम था. 31 जनवरी को अपने रिटायरमेंट के पहले ही वह इस मामले में एफआईआर दर्ज कर लेना चाहते थे, ताकि जांच शुरू हो सके. राफेल सहित भ्रष्टाचार के कई और मामले थे, जिनकी जांच आलोक वर्मा करना चाहते थे, कुछ में तो एफआईआर दर्ज भी हो चुकी थी. मगर इन मामलों में आरोपी या तो सत्ता में बैठे थे, या फिर सीबीआई के अन्दर ही मौजूद थे. तो ऐसे में आलोक वर्मा को आगे बढ़ने का मौका क्योंकर दिया जाता? लिहाजा, उन्हें भ्रष्टाचार के आरोप में लम्बी छुट्टी पर भेज दिया गया. वे इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चले गये तो सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें सीबीआई निदेशक के पद पर पुन: बहाल कर दिया. लेकिन मोदी-सरकार तो तय किये बैठी थी कि किसी भी कीमत पर आलोक वर्मा को कोई भी फाइल नहीं खोलने देगी, लिहाजा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें वहां से हटवाने का आखिरी दांव चला और अपनी अध्यक्षता में गठित एक उच्चस्तरीय समिति में 2:1 के फैसले से वर्मा को कुर्सी से फिर उतार खड़ा किया. अबकी बार उन्हें छुट्टी पर नहीं भेजा गया, बल्कि उनका तबादला करते हुए उन्हें अग्निशमक सेवा, नागरिक सुरक्षा और होम गार्ड का महानिदेशक बना दिया गया. मगर आलोक वर्मा को सरकार का यह फैैसला मंजूर नहीं हुआ और हताशा में उन्होंने सरकारी सेवा से इस्तीफा दे दिया.

अपने किये पर परदा ढापे रखने के लिए देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी के प्रमुख की जितनी फजीहत मोदी-सरकार ने की है, वह निन्दनीय है. सीबीआई में हुई यह पूरी उठा-पटक यह बात भी साफ कर ही देती है कि राफेल बहुत बड़ा घोटाला है. इसीलिए इसके खुलासे को रोकने के लिए आलोक वर्मा जैसे अधिकारी को कुर्सी से उतार कर बेइज्जत किया गया. यह घटना देश के लिए चिन्ता का विषय है. लोकतन्त्र के लिए सोच का विषय है.

कार्यमुक्त होने के बाद आलोक वर्मा ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा था, ‘झूठे, अप्रमाणित और बेहद हल्के आरोपों को आधार बनाकर मेरा ट्रांसफर किया गया. ये आरोप उस एक शख्स ने लगाये हैं, जो मुझसे द्वेष रखता है. सीबीआई उच्च सार्वजनिक स्थानों में भ्रष्टाचार से निपटने वाली एक प्रमुख जांच एजेंसी है, एक ऐसी संस्था है जिसकी स्वतंत्रता को संरक्षित और सुरक्षित किया जाना चाहिए. इसे बिना किसी बाहरी प्रभावों यानी दखलअंदाजी के कार्य करना चाहिए. मैंने संस्था की साख बनाये रखने की कोशिश की है, जबकि इसे नष्ट करने के प्रयास किये जा रहे हैं. इसे केन्द्र सरकार और सीवीसी के 23 अक्टूबर, 2018 के आदेशों में देखा जा सकता है जो बिना किसी अधिकार क्षेत्र के दिये गये थे और जिन्हें रद्द कर दिया गया.’

आलोक वर्मा के बारे में बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी का बयान भी गौर करने लायक हैं, जिन्होंने कहा कि वर्मा बेहद ईमानदार हैं, उनकी छवि साफ-सुथरी है, उन्होंने सीबीआई निदेशक से पहले दिल्ली पुलिस आयुक्त के पद पर भी ईमानदारी के साथ काम किया है. स्वामी ने पी. चिदंबरम से जुड़े केस का जिक्र करते हुए कहा कि आलोक वर्मा पर जिस अधिकारी राकेश अस्थाना ने भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है, उसने तो खुद चिदंबरम वाले मामले की फाइल लटका रखी थी, आलोक वर्मा ने ही उस केस में चार्जशीट फाइल करायी थी.

सुब्रमण्यम स्वामी भाजपा नेता हैं, किसी कांग्रेसी ने ये बात कही होती तो उसमें सियासत तलाशी जाती, केस-मुकदमों के मामले में सुब्रमण्यम स्वामी कागजात के धनी माने जाते हैं, अगर उन्होंने राकेश अस्थाना पर उंगली उठायी और आलोक वर्मा की छुट्टी पर सवाल उठाये तो मामले की गम्भीरता को समझा जा सकता है. वर्मा-अस्थाना कांड के चलते सीबीआई की साख को तो नुकसान पहुंचा ही, इस पूरे प्रकरण से मोदी-सरकार की नीयत और कर्मों का खुलासा हुआ. हालिया कोलकाता प्रकरण में ममता बनर्जी से हुई केन्द्र की तीखी नोकझोंक सोने पर सुहागा हो गयी. ममता बनर्जी ने जहां खुल कर मोदी सरकार पर हमला बोला, वहीं पूरे विपक्ष को एकजुट करके अपनी ताकत भी बढ़ा ली. इस घटना में कोलकाता के अन्दर सीबीआई अधिकारी जिस तरह सरेआम पीटे और गिरफ्तार किये गये, उसने इस संस्था की साख लगभग खत्म कर दी है.

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