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वर्ल्ड कप के इस मैच पर फंसा पेंच

भारत और पाकिस्तान के क्रिकेट मैच का इंतजार इन दोनों मुल्कों के दर्शक बेसब्री से करते हैं और जब से ये दोनों देश आपस में बहुत कम मैच खेलने लगे हैं तब से तो किसी न्यूट्रल वेन्यू पर होने वाले इन के इक्कादुक्का मैचों को देखने का रोमांच अपनी हद पर होता है. लेकिन बहुत बार इन दोनों देशों के आपस में बिगड़ते रिश्तों का खमियाजा क्रिकेट को चुकाना पड़ता है. अब कुछ ही समय में इंगलैंड में वनडे मैचों का वर्ल्ड कप आने वाला है और भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाले मैच पर अभी से काले बादल मंडराने लगे हैं.

14 फरवरी को पुलवामा, जम्मूकश्मीर में हुए आतंकवादी हमले के बाद जब से इन दोनों देशों के बीच कड़वाहट बढ़ी है खासकर भारत में गुस्सा ज्यादा है तब से यह मांग उठने लगी है कि इस वर्ल्ड कप में भारत को पाकिस्तान के साथ मैच नहीं खेलना चाहिए. भारत में तो कई क्रिकेट संघों ने अपना विरोध जताते हुए पाकिस्तानी खिलाड़ियों की तसवीरें भी हटा दी हैं.

हालांकि, 19 फरवरी को आईसीसी की तरफ से बयान जारी कर के कह दिया गया है कि 30 मई से शुरू हो रहे वर्ल्ड कप के शिड्यूल में किसी तरह का बदलाव नहीं हो सकता है, लेकिन देश में इस वक्त तनाव के हालात को देख कर कई संगठन और पूर्व खिलाड़ी भी पाकिस्तान के साथ मैच नहीं खेलने की बात कर रहे हैं. पूर्व क्रिकेटर हरभजन सिंह ने कहा है कि भारत को 16 जून, 2019 को मैनचेस्टर में पाकिस्तान के खिलाफ नहीं खेलना चाहिए.

इस मसले पर बीसीसीआई से जुड़े एक सूत्र ने बताया कि भारत और पाकिस्तान के बीच मैच खेलने को ले कर आने वाले कुछ दिनों में हालात साफ हो जाएंगे. इस में आईसीसी को कुछ नहीं करना है. अगर भारत सरकार का निर्देश होगा कि हमें पाकिस्तान के साथ नहीं खेलना है तो हम नहीं खेलेंगे.

बीसीसीआई के एक और सूत्र ने बताया कि इस मामले में आईसीसी से कोई बात नहीं हुई है. अगर हालात ऐसे ही बने रहते हैं और भारत को  पाकिस्तान के साथ फाइनल मैच में खेलना हो और हम नहीं खेलते हैं तो पाकिस्तान को जीता माना जाएगा.

वैसे इस मसले पर आईसीसी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डेव रिचर्डसन ने कहा, “हमें अभी तक दोनों बोर्डों की ओर से मैच नहीं खेलने को ले कर कोई सूचना नहीं मिली है. हम ने भी दोनों बोर्डों को इस मामले में कुछ नहीं लिखा है.

“हमारी संवेदनाएं इस घटना (पुलवामा कांड) से प्रभावित हुए लोगों के साथ है. हम बीसीसीआई और पीसीबी समेत अपने सदस्यों के साथ हालात पर नजर बनाए हुए हैं. फिलहाल वर्ल्ड कप के तय कार्यक्रम के मुताबिक भारतपाक मैच समेत किसी भी दूसरे मुकाबले के नहीं खेले जाने के कोई संकेत नहीं है.

“भारतपाक मैच के टिकट के लिए सब से ज्यादा 4 लाख आवेदन मिल चुके हैं. हालांकि, ओल्ड ट्रैफर्ड (मैनचेस्टर) की दर्शक क्षमता सिर्फ 25 हजार है. इस से कई लोगों को निराशा होगी. दर्शक सिर्फ इंगलैंड से ही नहीं, बल्कि दूसरे देशों से भी यह मैच देखने आने वाले हैं. ऑस्ट्रेलियाइंगलैंड मैच के टिकट के लिए ढाई लाख और फाइनल मुकाबले के लिए 2 लाख, 60 हजार से ज्यादा आवेदन मिले हैं.”

डेव रिचर्डसन ने साफ बताया कि इंगलैंड में होने वाले भारतपाक मैच को देखने के लिए दर्शक कितने उतावले हैं. अब तो यही उम्मीद की जा सकती है कि जल्दी से यह खराब माहौल बदले और वर्ल्ड कप का यह सब से रोमांचक मैच बिना किसी रुकावट के खेला जाए.

मटर का हलवा

 सामग्री:

– मटर के दाने (500 ग्राम)

– घी (2-3 चम्मच)

– दूध (500 ग्राम)

– चीनी (150 ग्राम)

– किशमिश (8-10)

– बादाम (8-10 कटा हुआ)

– नारियल बुरादा (1/4 कप)

– काजू (8 से 10 कटा हुआ)

– मावा (1/2 कप)

– इलाइची पाउडर (1/2 चम्मच)

हलवा बनाने की विधि

– सबसे पहले मटर को धो लें और उसे अच्छे से धो कर छान ले.

– अब मिक्सर में मटर को डाले और थोड़ा सा दूध डालकर उसे दरदरा पीस ले.

– अब कढ़ाई गर्म करने के बाद इसमे घी डाले.

–  जब घी गरम हो जाये तो पीसी हुई मटर डाल दे और उसे 5-7 मिंनट तक भुने.

–  फिर उसमे 1 चम्मच और घी डाल दे और उसका पानी सूखने तक (8-10 मिनट) भूनते रहे.

–  फिर उसमे चीनी डाल दे और बाकि का बचा हुआ दूध डाल दे और उसे 4-5 मिनट तक पकाये.

– अब उसमे किशमिश, काजू, बादाम, और नारियल डाल दे और उसे मिलाये.

– फिर उसमे मावा डालकर 2-3 मिंनट तक पका ले.

-फिर उसमे इलाइची पाउडर डालकर के अच्छे से मिला ले और गैस बंद कर दे.

– अब आपकी मटर का हलवा बनकर तैयार है.

आम चुनाव 2019 सीरीज (पार्ट-4) : जनता जाने सरकार का लेखाजोखा

विश्व के सब से बड़े लोकतंत्र भारत में आम चुनाव होने जा रहे हैं. देशवासी देश व दुनिया को अपना संदेश देंगे. मौजूदा केंद्रीय सरकार ने चुनावों से पहले देशवासियों को जो सपने दिखाए थे, उन्हें वह पूरा कर पाई या नहीं, मतदाता इस पर अपना फैसला मतदान कर बताएंगे. हालांकि सत्ता में आने से पहले और फिर सत्ता में आ कर भारतीय जनता पार्टी की कथनी व करनी कैसी रही, इस का आकलन करना मुश्किल नहीं है. भाजपा नेता नरेंद्र मोदी की लीडरशिप में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार अपने कामकाज के दौरान किसानों, दलितों, अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलिमों के लिए कैसी रही, इस पर डालते हैं एक नजर.

2015 के बजट सत्र में नरेंद्र मोदी ने किसानों की आमदनी को दोगुना करने का लक्ष्य रखा था, तो देशभर के अर्थशास्त्री चौंके थे कि यह कैसे संभव होगा. अर्थशास्त्रियों का शक सही निकला क्योंकि अब तक सरकार ने इस दिशा में कुछ खास नहीं किया सिवा इस के कि इस बात को हर बजट में दोहे की तरह दोहराया गया था.

किसानों की हालत

कृषिप्रधान देश में किसानों की बदहाली आखिरकार क्यों लगातार बढ़ रही है. वर्ष 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने के लिए केंद्र सरकार ने एक समिति का गठन किया था, जिस समिति ने 2 साल बाद एक रिपोर्ट सरकार को सौंपी. यह रिपोर्ट बताती है कि किसानों का ध्यान बंटाने और उन्हें लुभाने के लिए नरेंद्र मोदी एक ऐसा वादा कर बैठे हैं जिस का पूरा होना किसी चमत्कार से भी मुमकिन नहीं.

द्य वर्ष 2022 तक आमदनी दोगुनी करने के लिए जरूरी है कि किसानों की आमदनी में सालाना 12 फीसदी की बढ़ोतरी हो जबकि हकीकत में किसानों की आमदनी 2 फीसदी भी नहीं बढ़ रही.

द्य सरकार की नीतियों से किसान खुश नहीं थे. सो नवंबरदिसंबर में हुए 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में किसानों का गुस्सा फट पड़ा जिस के चलते भाजपा औंधेमुंह लुढ़की.

द्य मौजूदा हकीकत यह है कि किसान नरेंद्र मोदी सरकार से मायूस हो गया है. हद तो तब हो गई जब 19 जुलाई, 2017 को कृषि मंत्री राधामोहन सिंह लोकसभा में इस बात से यह कहते मुकर गए कि प्रधानमंत्री ने ऐसी कोई बात नहीं की थी और न ही ऐसा कोई आश्वासन दिया था. तब देश के किसानों को समझ आ गया था कि मोदी सरकार किसान हितैषी तो कहीं से नहीं है जो अपने ही घोषणापत्र से मुकर रही है.

द्य अब जब लोकसभा चुनाव सिर पर हैं और किसान का मूड किसी भी कीमत पर बदलता नहीं दिख रहा तो सरकार के माथे पर पसीना है कि वह अब क्या करे. कर्जमाफी की सुगबुगाहट हुई लेकिन जल्दी ही नरेंद्र मोदी यह कहते पलटी मार गए कि यह कोई कारगर रास्ता नहीं है. अब बजट में किसानों को 6,000 रुपए सालाना देने की घोषणा की है जो नाममात्र है.

द्य नोटबंदी के वक्त नकदी की किल्लत ने किसानों को सालों पीछे ढकेल दिया है. वह पैसों की जरूरत के लिए अपनी पैदावार को औनेपौने भाव में बेचने को मजबूर हुआ था. नोटबंदी के झटके से किसान पूरी तरह उबर भी नहीं पाया था कि जीएसटी ने उस की रहीसही हिम्मत तोड़ दी, जिस के चलते कृषियंत्रों सहित तमाम उपकरण और खाद व बीज महंगे हो गए.

द्य डीजल के बढ़े दामों की मार ने तो उस की कमर तोड़ दी क्योंकि ट्रैक्टर का इस्तेमाल करना लगातार महंगा होता गया. सिंचाई की लागत भी बढ़ी. लेकिन उपज के दाम नहीं बढ़े. फिर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के वादे पर तो सोचना भी बेकार है.

किसान आत्महत्याएं

नरेंद्र मोदी सरकार का कार्यकाल इसलिए भी याद किया जाएगा कि इस में सब से ज्यादा किसान आंदोलन हुए. कश्मीर से ले कर कन्याकुमारी तक किसानों ने सड़कों पर आ कर धरनेप्रदर्शन किए. मध्य प्रदेश के मंदसौर में तो हालात इतने बेकाबू हो गए थे कि वहां प्रदर्शन कर रहे किसानों पर जून 2017 में पुलिस ने गोलियां तक चला दीं थीं जिस से आधा दर्जन किसान मारे गए थे.

यह किसान आंदोलन महाराष्ट्र के नासिक से शुरू हुआ था जिस में किसान सही दाम का अपना हक मांगते अपनी पैदावार सड़कों पर फेंक कर विरोध जता रहे थे. बदले में गोलियां और लाठियां मिलीं तो देशभर के किसान गुस्सा हो गए.

मोदी राज में किसानों की आत्महत्या की दर भी बढ़ी है. एक अंदाजे के मुताबिक, देश में हर दिन 35 किसान आत्महत्या कर रहे हैं. अंदाजा इसलिए कि मोदी सरकार किसानों की आत्महत्याओं को ले कर आंकड़े पेश ही नहीं कर रही.

पर यह सच छिपाने से छिप जाएगा, ऐसा कहने की भी कोई वजह नहीं. कृषि राज्यमंत्री पुरुषोत्तम रूपाला ने राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में बताया था कि साल 2015 तक के आंकड़े वैबसाइट पर उपलब्ध हैं, उस के बाद के नहीं हैं. सदन में पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक, 2015 में 3,097 किसानों ने आत्महत्या की थी और साल 2014 में कुल 1,163 किसानों ने खुदकुशी की थी.

अब यह न कोई पूछने वाला न कोई बताने वाला कि इस संवेदनशील मुद्दे पर रिकौर्ड रखना बंद क्यों कर दिया गया. गृह मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) को किस ने इस पर आंकड़े इकट्ठा न करने के निर्देश दिए और दिए तो क्यों दिए.

हैरानी और दिलचस्पी की बात यह भी है कि मई 2017 में नरेंद्र मोदी सरकार ने ही सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि किसानों की आमदनी और सामाजिक सुरक्षा बढ़ाने की तमाम कोशिशों के बाद भी साल 2013 से हर साल 12 हजार से भी ज्यादा किसान आत्महत्या कर रहे हैं. गौरतलब है कि किसानों की हालत को ले कर एक एनजीओ सिटीजन रिसोर्स ऐंड ऐक्शन इनीशिएटिव की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक याचिका के संबंध में केंद्र सरकार ने ये आंकड़े पेश किए थे.

अलगअलग एजेंसियों के आंकड़ों में थोड़ाबहुत अंतर होना स्वभाविक है लेकिन 2016 के बाद किसानों की खुदकुशी का कोई सरकारी आंकड़ा न होना बताता है कि सरकार अपनी नाकामी और निकम्मापन ढंकने के लिए किस हद तक किसानों के प्रति क्रूर हो सकती है.

दलितों का हाल

मोदी राज में किसानों के बाद सब से ज्यादा बदहाल दलित समुदाय के लोग हुए. उन्होंने भी किसानों की तरह जगहजगह उग्र प्रदर्शन किए. सवर्णों की गुंडई का दौर शुरू हो गया. जिस ने सनातनी वर्णव्यवस्था की याद दिला दी कि दलित यानी शूद्र आदमी नहीं जानवर हैं और हिंदू राज का मतलब यही है कि दलित दबंगों के हाथों पिटें.

यह एक नपीतुली साजिश पौराणिक वादियों की थी कि उन्होंने दलितों पर जीभर कर जुल्म ढाए और हर बार सरकार उन के हक में खड़ी दिखाई दी. दलित और सवर्णों की खाई बजाय पटने के, इतनी बढ़ी कि सदियों से वंचित और शोषित यह वर्ग त्राहित्राहि कर उठा. ‘सब का साथ सब का विकास’, दरअसल, सवर्णों का विकास और दलितों का विनाश साबित हुआ.

पिछले 5 सालों की कुछ प्रमुख घटनाओं पर नजर डालें तो तसवीर यों सामने आती है कि सत्ता सवर्णों की बांदी है :

– 11 जुलाई, 2016 को नरेंद्र मोदी के गृहराज्य गुजरात के ऊना में कुछ दलित युवकों को हिंदूवादियों ने जम कर, सरेआम धुना. वजह थी दलित युवकों द्वारा मरी गायों की चमड़ी निकालने से मना करना. दहशत फैलाने की गरज से ऊना में दलितों की पिटाई का वीडियो भी वायरल किया गया. इस अत्याचार के विरोध में युवा दलित नेता जिग्नेश मेवाणी ने आंदोलन किया तो उन्हें दलितों के साथसाथ मुसलमानों का भी साथ मिला क्योंकि वे भी गाय की चमड़ी और कथित तस्करी को ले कर कट्टरवादियों की ज्यादतियों का शिकार देशभर में हो रहे थे. जिग्नेश मेवाणी अब विधायक हैं.

– योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के एक महीने बाद ही सहारनपुर के शब्बीरपुर में मई 2017 में ठाकुरों ने दलितों की जम कर धुनाई की. दबंग ठाकुरों का एतराज अंबेडकर की शोभायात्रा को निकाले जाने पर था. दोनों गुटों के बीच हिंसक संघर्ष हुआ. दलितों को और दबाने के लिए ठाकुरों ने 5 मई को महाराणा प्रताप जयंती पर शोभायात्रा निकाली तो दलितों ने भी उन का जुलूस नहीं निकलने दिया. दलित नेता चंद्रशेखर रावण को मुख्य आरोपी बना कर जेल में ठूंस दिया गया.

– रोहित वेमुला की आत्महत्या साल 2015 की एक प्रमुख घटना थी. इस मामले में हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे दलित छात्र रोहित वेमुला ने 17 जनवरी, 2016 को आत्महत्या कर ली थी. इस विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद ने नवंबर 2015 में दलित छात्रों को छात्रावास से निलंबित कर दिया था. रोहित की आत्महत्या पर देशभर में बवंडर मचा था पर इस मामले से यह साबित तो हुआ था कि दलित छात्रों को एकलव्य की तरह प्रताडि़त किया जाता है ताकि वे उच्चशिक्षा ले कर मुख्यधारा से न जुड़ सकें.

– दिसंबर 2015 में हरियाणा के फरीदाबाद के गांव सुनपेड़ में सवर्णों ने दलित युवक जितेंद्र के घर में पैट्रोल छिड़क कर आग लगा दी. इस वीभत्स नरसंहार में 2 दलित बच्चे झुलस कर मर गए थे और बाकी सदस्य झुलस कर अपाहिज हो गए थे.

– महाराष्ट्र के पुणे में भीमा कोरेगांव की 200वीं सालगिरह पर बीते साल 1 जनवरी को हिंदूवादी संगठनों ने दलितों द्वारा आयोजित एक जलसे में उन पर हिंसक हमले किए थे. दलितों को तबीयत से धुना गया और उन की गाडि़यां जला दी गई थीं. जुल्म की इंतहा हो गई तो दलित भी सड़कोें पर आ गए और उन्होंने मुंबई पूरी तरह ठप कर दी. फिर देखते ही देखते पूरा महाराष्ट्र जातीय हिंसा की आग में जल उठा था.

ये कुछ चर्चित हादसे थे. मोदी राज में दलितसवर्ण बैर बेवजह नहीं बढ़ा था. जगहजगह सवर्णों ने दलितों पर तरहतरह के अत्याचार ढाए. आंकड़ों के आईने में देखें तो मोदी राज में दलित अत्याचार बेतहाशा बढ़े. नैशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो द्वारा जारी आंकड़ों पर गौर करें तो साल 2014 में अनुसूचित जाति के प्रति अपराधों के 40,401 मामले दर्ज किए गए थे, 2015 में 38,670 और फिर 2016 में 40,801 मामले दर्ज हुए.

इन आंकड़ों से जाहिर हुआ कि देश में हर 15 मिनट में कोई न कोई दलित अत्याचार का शिकार होता है. हालात बिगड़ते देख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक सभा में कहा था कि दलितों के बजाय मुझे मार लो. यह और बात है कि सवर्णों ने उन की इस दिखावटी भावुकता पर ध्यान ही नहीं दिया.

दलितों को मौब लिंचिंग की आड़ में मारा गया. कहीं दलित दूल्हों को घोड़ी पर नहीं बैठने दिया गया तो कहीं उन के जींस पहनने व मूंछें रखने तक पर उन की पिटाई की गई. ज्यादातर दलित अत्याचार भाजपा शासित प्रदेशों में हुए. मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, छत्तीसगढ़ और गुजरात इन में अव्वल थे. साल 2016 में देश के सब से बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में सब से ज्यादा 10,426 मामले इस तरह के दर्ज हुए जिन में से 1,065 दलित औरतों के बलात्कार के थे.

यह तो थी रूटीनी अत्याचारों की बात जिस के निर्देश धर्मग्रंथों में इफरात से हैं, लेकिन एट्रोसिटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने दलितों को इतना असुरक्षा से भर दिया कि उन्हें सड़कों पर आ कर इस फैसले का विरोध करना पड़ा जो उम्मीद के मुताबिक हिंसक ही रहा, क्योंकि जगहजगह सवर्णों ने उन्हें रोकने की कोशिश की थी. 2 अप्रैल की हिंसा में दर्जनभर दलित मारे गए थे. दलित हिंसा का इस बार केंद्र मध्य प्रदेश रहा था.

दलित प्रेम महज ड्रामा

सोशल मीडिया पर दलित विरोधी पोस्टें वायरल होती रहीं. कट्टरवादी जातिगत आरक्षण खत्म करने की मांग करते दलितों की योग्यता पर ताने कसने लगे तो एक बार फिर नरेंद्र मोदी को कहना पड़ा था कि देश से आरक्षण कोई खत्म नहीं कर सकता.

यह कोई दलितप्रेम या सहानुभूति नहीं थी. उत्तर प्रदेश में दलित अत्याचार बढ़ते देख भाजपा के कई दलित सांसदों ने अपनी ही सरकार के खिलाफ मोरचा खोल दिया था. इन में सावित्री फुले, छोटेलाल खरवार, यशवंत सिंह और अशोक दोहरे प्रमुख हैं. इन में से सावित्री फुले ने तो भाजपा से इस्तीफा ही दे दिया. मोदी और शाह की जोड़ी दलितों का भरोसा खो चुकी है. दलितों को ले कर उन के तमाम दावे खोखले साबित हुए हैं.

शुरू में भाजपा ने समरसता का ड्रामा किया था जिस के तहत दिग्गज भाजपा नेताओं ने दलितों के घरों में जा कर उन के साथ भोजन किया था और उज्जैन सिंहस्थ कुंभ के दौरान अमित शाह ने दलित संतों के साथ क्षिप्रा में डुबकी लगाई थी. इन ड्रामों की हकीकत सामने है कि भाजपा आखिरकार है तो ब्राह्मणों व बनियों की पार्टी, जिस के मुंह में राम और बगल में छुरी रहती है. मोदी राज में उस ने दलितों को गले लगाने के बहाने उन का गला काटने की साजिश रची.

अल्पसंख्यक और मुसलिम

गोधरा कांड के नायक रहे नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सभी की उत्सुकता इस बात में भी थी कि उन का रुख अल्पसंख्यकों और उन में भी खासतौर से मुसलमानों के प्रति क्या रहेगा. 2014 के चुनाव प्रचार में और उस के बाद भी नरेंद्र मोदी आरक्षण के मसले पर खामोश रहे थे. यह तटस्थता नहीं, बल्कि उपेक्षा थी जिस का सीधा सा मतलब यह निकला कि यूपीए सरकार ने जो कोशिशें अल्पसंख्यकों और मुसलमानों को आरक्षण देने के लिए की थीं उन फाइलों पर धूल की परत और जमने दी जाएगी. पर दबाव का नतीजा था कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद का सितंबर 2016 में दिया यह बयान कि करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल कर रहे किसी शैक्षणिक संस्थान को धर्म के आधार पर आरक्षण देने की अनुमति नहीं है.

नाम भले ही न लिया हो पर हर कोई गलत नहीं समझा कि कानून मंत्री का इशारा अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक दर्जा देने के विवाद पर है और इस पर सरकार का नजरिया बेहद साफ है कि वह ऐसा नहीं होने देगी. रविशंकर प्रसाद ने चतुराई दिखाते यह भी कहा था कि मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है और सुप्रीम कोर्ट का फैसला विरोधाभासी आया तो उस पर आगे चर्चा की जाएगी.

उत्तर प्रदेश में मदरसों पर लगाम कसते उन पर तरहतरह के नियम थोपे गए. 2017-18 में माहौल ऐसा रहा मानो मदरसों में आतंकवाद का पाठ पढ़ाया जाता हो.

2018 आतेआते मुसलमानों ने मोदी सरकार से आस छोड़ दी तो एक चौंका देने वाला कदम सरकार ने बीती 7 जनवरी को यह एलान करते उठाया कि गरीब सामान्य वर्ग को जो 10 फीसदी आरक्षण दिया जाएगा, उस के दायरे में मुसलमान भी होंगे.

यह मुसलमानों को कोई सुकून देने वाली बात नहीं है क्योंकि आरक्षण के पैमानों पर खरा उतरने के बाद भी मुसलिम नौजवानों को इक्कादुक्का नौकरियां ही मिलेंगी. वजह अशिक्षा है और गरीब सवर्णों की तादाद उस की शिक्षित आबादी से हजार गुना ज्यादा है. सपा नेता आजम खान की यह मांग भी नक्कारखाने में तूती सरीखी साबित हुई कि सवर्णों के आरक्षण में से 5 फीसदी हिस्सा मुसलमानों को मिले.

तकनीकी तौर पर इस मुद्दे पर काफी बहस की गुंजाइशें हैं कि इस से मुसलमानों को क्या, बल्कि किसी को भी कुछ नहीं मिलने वाला. मुसलमानों के प्रति उदारता दिखाने वाले इन्हीं नरेंद्र मोदी ने तेलंगाना विधानसभा के चुनाव के वक्त टीआरएस पर आरोप लगाते कहा था कि वह दलितों के अधिकार छीन कर और मुसलमानों से 12 फीसदी आरक्षण का वादा कर देश के साथ गद्दारी और संविधान निर्माता भीमराव अंबेडकर का अपमान कर रही है.

1 जनवरी को एक पत्रकार से बातचीत में नरेंद्र मोदी ने बड़ी मासूमियत से कहा था कि तीन तलाक का मसला सामाजिक है, धार्मिक नहीं. इस के पहले इस फैसले पर देशव्यापी बवाल मच चुका था जो संसद में भी जारी रहा.

बिलाशक तीन तलाक का कायदा हर औरत के लिए तकलीफदेह है, लेकिन ऐसी कुरीतियों को व्यापक नजरिए से देखने की हिम्मत नरेंद्र मोदी नहीं जुटा पाए. समाज सुधार और कुरीतियों के नाम पर दूसरे के धर्म में तो दखल देने से नहीं चूक रहे लेकिन हिंदू धर्म में क्या कुछ नहीं हो रहा, इस पर वे ध्यान नहीं दे रहे. हिंदुओं में कई कानूनों के वजूद में होने के बाद भी दहेज का चलन और प्रताड़ना ज्यों की त्यों क्यों है, इस पर भी सामाजिक तौर पर विचार वे करते तो वाकई उन के ज्ञानचक्षु खुल जाते.

चिंता बरकरार

तीन तलाक का कानूनी पहलू और भी ज्यादा चिंतनीय है जिस के तहत अब मुसलिम महिलाएं भी हिंदू महिलाओं की तरह तलाक के बाबत अदालत की चौखट पर एडि़यां रगड़ती नजर आएंगी. उन्हें गुजारा भत्ता मिलेगा या नहीं, यह भी स्पष्ट नहीं हो पा रहा है और यह भी कि तलाक देने वाले को अपराधी बता जेल क्यों भेजा जाए.

तीन तलाक का कानून वजूद में आने के सालों बाद पता चलेगा कि इस से किसे, क्या फायदा हुआ लेकिन फौरीतौर पर नरेंद्र मोदी कुछ मुसलिम औरतों से हमदर्दी दिखाते यह भी साबित कर गए हैं कि किसी भी धर्म में दखल लोकतांत्रिक तरीके से भी दिया जा सकता है.

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आश्रम बने अय्याशी के अड्डे : ऐसे होता था लड़कियों का शोषण

गंगा किनारे बसे धार्मिक शहर इलाहाबाद का अपना अलग धार्मिक महत्त्व है, जिसे घाट किनारे बैठे पंडे ज्यादा बेहतर जानते हैं. ये पंडे न केवल मुफ्त की दक्षिणा उड़ाते हैं, बल्कि इन्हें देश भर से आई महिलाओं के देह दर्शन भी फ्री में होते हैं. अलसुबह उठ कर पंडे अपनी पूजापाठ की दुकान का सामान ले कर अपने ठीए पर पहुंच जाते हैं और देर रात तक वहां मुफ्त का चंदन घिसते रहते हैं.

महेश प्रसाद अवस्थी भी एक ऐसे ही ब्राह्मण परिवार में पैदा हुआ था. उस का ही नहीं बल्कि उस के पूर्वजों का भी पुश्तैनी धंधा इलाहाबाद में गंगा किनारे पूजापाठ का था. बचपन से ही उस का घाट पर आनाजाना आम बात थी.

इस दौरान उसे समझ आ गया था कि देश भर से आए श्रद्धालु अपनी मरजी से मोक्ष मुक्ति के चक्कर में पैसा पंडों को देते हैं और घाट पर बैठ कर देखो तो चारों तरफ महिलाएं नहाती दिख जाती हैं.

किशोर होतेहोते महेश की यौन जिज्ञासाएं भी सर उठाने लगी थीं. वह नहाती महिलाओं को देखता था तो एक करंट सा उस के शरीर में दौड़ जाता था. डुबकी लगा कर जो महिलाएं गंगा के बाहर निकलती थीं, उन के गीले कपड़े शरीर से चिपक जाते थे. ऐसे में उस की नजरें अकसर महिलाओं के शरीर और खासतौर से उभारों पर टिक जाती थीं जो कपड़ों से ढके होने के बाद भी अनावृत से रहते थे.

यह उस की मजबूरी थी कि वह ऐसे दृश्य चुपचाप देखता भर रहे. इस की वजह यह थी कि पंडों को अपनी दुकान चलाए रखने के लिए काफी नियमधरम से रहना पड़ता है. अगर जरा सी भी बेचैनी या लंपटता वे उन महिलाओं के मामले में दिखाएंगे तो मुफ्त का पैसा मिलना तो बंद होगा ही, साथ ही पिटाई होगी सो अलग. इसलिए समझदार पंडे मंत्रोच्चारण करते समय आमतौर पर सिर तक नहीं उठाते और उठाते भी हैं तो इस तरह कि उन पर कोई आरोप न लगा पाए.

इलाहाबाद कहने को ही पवित्र और धार्मिक शहर है, नहीं तो वहां की गलियों में क्याक्या और कैसेकैसे पाप नहीं होते, यह सब महेश को काफी कम उम्र में ही समझ आ गया था. घाट से दूर शहर की गलियों तक में उस ने देखा था कि हर जगह अनाथ लाचार और बेबस औरतों का देह शोषण आम बात है जिस पर कोई कुछ नहीं बोलता.

ये वे औरतें होती हैं, जिन का कोई नहीं होता या जिन्हें उन के सगे वाले भीख मांग कर गुजारा करने गंगा मैया के हवाले कर जाते हैं. खुद भीख मांग कर पेट भरने वाली ये महिलाएं दूसरों की हवस पूरी करने के काम आती हैं, जिन में सभ्य शहरियों से ले कर पंडे, इलाके के गुंडे बदमाश और पुलिस वाले तक शामिल होते हैं.

गंगा घाट से पनपी बुरी आदतें

किशोर महेश पर अपने विशालकाय और प्रतिष्ठित अवस्थी परिवार की वर्जनाओं का दबाव था. वह एक अजीब से विरोधाभास में फंसा था कि जिन कामों को पाप बताया जाता है, वही इस धार्मिक शहर में इफरात से फलतेफूलते हैं. यह देख कर वह हैरान रह जाता था लेकिन घाट पर जब भी आता था तो अर्धनग्न सी महिलाओं को देख कर बेकाबू सा होने लगता था.

अवस्थी परिवार की इलाहाबाद में अपनी एक अलग साख है और देश भर में उन के यजमान फैले हुए हैं, जो उस का काफी सम्मान करते हैं. इस की वजह इस परिवार द्वारा ईमानदारी से पुरोहिताई करना है. महेश जैसेजैसे बड़ा होने लगा तो घाट पर उस की हरकतें उस के घर वालों को नागवार गुजरने लगीं. वह अब पूरी बेशर्मी से महिलाओं को देखता था, जिस पर महिलाएं ऐतराज जताने लगीं तो उस के घर वालों ने घाट पर उस का आनाजाना बंद कर दिया.

मगर यह समस्या का हल नहीं था, बल्कि उसे और बढ़ावा देने वाली बात थी जो बीते दिनों भोपाल में साबित हुई. बुजुर्ग महेश प्रसाद अवस्थी इन दिनों जेल में हैं. आरोप है उस ने कई मूकबधिर युवतियों का यौनशोषण और बलात्कार किया. इस मामले को ले कर खूब हल्ला भोपाल सहित देश भर में मचा.

जब घाट पर उस का आनाजाना बंद हो गया तो पढ़ाई पूरी करने के बाद महेश को सेना में नौकरी मिल गई. तबादले होतेहोते वह भोपाल आ गया और यहीं से रिटायर भी हुआ. भोपाल में उस की खास जानपहचान हो गई थी, लिहाजा उस ने यहीं बसने का फैसला ले लिया था.

ऊपर से सामान्य और कर्मकांडी पंडितों जैसा दिखने वाला यह बूढ़ा भीतर से कितना असामान्य और कुंठित है, इस का अंदाजा कोई नहीं लगा पाता था. रिटायरमेंट के बाद महेश को फिर किशोरावस्था के दिन याद आने लगे, जिन में वह उन्मुक्त हो कर घाट पर नहाती और नहा कर निकलती महिलाओं को देखता रहता था. और जब घाट से शहर जाता था तो लाचार और बेबस महिलाओं का खुलेआम यौनशोषण होते रोज देखता था.

खाली वक्त गुजारने और दूसरे रिटायर्ड मिलिट्री वालों की तरह कुछ करने की सूझी तो एक खुराफाती आइडिया उस के दिमाग में आया तो उस की बांछें खिल उठीं. यह आइडिया था अपाहिजों के लिए आश्रम खोलने का, जिस पर उस ने अमल भी कर डाला. उस के पीछे उस की असल मंशा क्या थी, यह कोई भी 14 साल तक समझ नहीं पाया.

जैसे इलाहाबाद में गंगा का धार्मिक महत्त्व है, वैसे ही भोपाल से 78 किलोमीटर की दूरी पर बसे शहर होशंगाबाद में नर्मदा नदी का है. फर्क सिर्फ इतना है कि नर्मदा किनारे पंडावाद कम है और यहां देश भर के श्रद्धालु नहीं आते. यहां मध्य प्रदेश और उस से सटे राज्यों महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान सहित छत्तीसगढ़ के श्रद्धालु इफरात से होशंगाबाद विभिन्न तीजत्यौहारों पर आते हैं.

होशंगाबाद के नजदीक मालाखेड़ी मोहल्ले में महेश ने मूकबधिरों के लिए एक हौस्टल खोल डाला. इस के लिए उस ने काफी भागादौड़ी की थी और कई सरकारी विभागों की परिक्रमा भी करनी पड़ी थी.

एक तो ब्राह्मण और ऊपर से रिटायर्ड मिलिट्री पर्सन, यह देख कर ही लोग मान लेते थे कि उस में समाजसेवा का जज्बा होना स्वाभाविक बात है. लिहाजा हर कहीं उस के काम आसानी से होते गए. जहां जरूरत पड़ी, वहां उस ने घूस भी दी और चापलूसी भी की.

मालाखेड़ी वाला उस का आश्रम यानी हौस्टल चल निकला. जल्द ही सामाजिक न्याय विभाग उस के आश्रम में मूकबधिरों को भेजने लगा. इस से महेश को खर्च चलाने में काफी सहूलियत हो गई, क्योंकि सरकारी विभाग छात्रों या मूकबधिरों को जिस आश्रम में भेजता है, उस आश्रम को उन का पूरा खर्चा भी देता है.

महेश ने हौस्टल में छात्रों की देखभाल के लिए कविता चौहान नाम की महिला को बतौर केयर टेकर रखा. यह साल 2000 की बात है. 17 साल में सैकड़ों मूकबधिर इस आश्रम में रहे, जिसे स्थानीय लोग विकलांगों का हौस्टल भी कहते थे.

सन 2017 में नामालूम वजहों के चलते यह आश्रम बंद हो गया तो महेश अवस्थी ने भोपाल की उपनगरी बैरागढ़ में एक दूसरा आश्रम खोल लिया, जिस का नाम उस ने साईं विकलांग एवं अनाथ सेवाश्रम रखा.

अब तक सरकारी विभागों सहित प्रदेश भर की सामाजिक संस्थाओं में महेश प्रसाद अवस्थी का नाम पहचाना जाने लगा था, इसलिए बैरागढ़ वाला आश्रम भी चल निकला. यहां भी जरूरत और वक्त के मारे मूकबधिरों की लाइन लगने लगी. इन में लड़कियों की संख्या ज्यादा होती थी.

70 साल के बूढ़े महेश प्रसाद अवस्थी के पापों का घड़ा शायद न फूटता, अगर होशंगाबाद निवासी मूकबधिर युवती पूजा (बदला नाम) पहल न करती और साइन लैंग्वेज की जानकार रीवा की रहने वाली श्रद्धा शर्मा उस की मदद न करतीं.

ऐसे खुला राज

इसी साल 10 फरवरी को 18 वर्षीय पूजा की शादी उस की तरह ही होशंगाबाद के मूकबधिर युवक अमित (बदला नाम) से हुई थी. ऐसी शादियों पर मीडिया खूब तवज्जो देता है. आम लोग भी अप्रत्यक्ष ही सही, मूकबधिरों की खुशी में शामिल हो जाते हैं. कई नेता और अधिकारी जो कभी इन की सुध तक नहीं लेते, वे भी मंडप में आशीर्वाद देने जरूर पहुंच जाते हैं, जिस से अगले दिन अखबारों में उन के नाम व फोटो छपे.

पूजा और अमित की शादी में पंडित इशारों में दोनों से बात करते विधिविधान से शादी संपन्न करवा रहा था. वे दोनों भी मंडप में बैठे अपनी साइन लैंग्वेज में आम दूल्हादुलहन जैसे बात कर रहे थे.

अमित शासकीय सेवा में है, इसलिए शादी के बाद इन दोनों को कोई खास दिक्कत पेश नहीं आई और दोनों दुनियाजहान से दूर अपना एक अलग जहां बसा बैठे. पूजा अब आम गृहिणियों की तरह घर संभालने लगी थी. अमित की इच्छा थी कि अगर पूजा बीए की पढ़ाई पूरी कर ले तो उसे भी सरकारी नौकरी मिल सकती है.

इस से घर की आमदनी तो बढ़ेगी, साथ ही पूजा का वक्त भी कट जाएगा. पूजा इस प्रस्ताव पर सहमत हो गई तो अमित ने उस का दाखिला होशंगाबाद के एक कालेज में करवा दिया.

गलत नहीं कहा जाता कि प्यार की कोई भाषा नहीं होती, बल्कि प्यार खुद अपने आप में एक भाषा होता है. यह बात अमित और पूजा को देख समझी जा सकती थी, जो नए जोड़ों की तरह एकदूसरे में डूबे रहते थे. अब इन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं रह गया था कि लोग उन के बारे में क्या सोचते हैं.

पूजा अमित को खुश रखने का हरसंभव कोशिश करती थी, लेकिन जाने क्यों अमित को उस के चेहरे पर अकसर एक उदासी सी दिखती थी. लगता था मानो वह कुछ कहना चाह रही हो, पर किसी वजह से कह नहीं पा रही है. इस बाबत अमित ने कई बार पूजा से पूछा भी, लेकिन वह हर बार टाल जाती.

पर वास्तव में पूजा अपने दिलोदिमाग और आत्मा पर एक बोझ ले कर जी रही थी. अमित अंदाजा भर लगा सकता था कि आखिर ऐसी कौन सी बात है, जो पूजा उस पर भी विश्वास नहीं कर रही है. लेकिन कुछ न कुछ बात जरूर है, इतना वह समझ गया था.

पूजा पर किसी तरह का दबाव न बना कर अमित ने प्यार से काम लिया तो एक दिन उस की बांहों में समाई पूजा के दिल का लावा आंखों के रास्ते बह निकला. अमित ने उसे प्यार दिया तो पूजा ने अपने साथ घटी सारी घटना बता दी, जिसे सुन कर अमित के होश उड़ गए.

पूजा ने रोते हुए बताया कि मालाखेड़ी आश्रम में जब वह रहती थी तो वहां के संचालक महेश प्रसाद अवस्थी ने कोई एकदो बार नहीं बल्कि सैकड़ों बार उस के साथ बलात्कार किया था और इस दौरान उसे भीषण नारकीय यातनाएं भी दी थीं.

सन 2004 में जब पूजा 9 साल की थी तब उसे महेश अवस्थी के मालाखेड़ी आश्रम भेजा गया था. 2 साल तो ठीकठाक गुजरे लेकिन इस के बाद बूढ़े महेश की नीयत उस पर बिगड़ने लगी. किशोर होती पूजा अब काफी कुछ समझने लगी थी, लेकिन वह लाचारी के चलते महेश का विरोध नहीं कर पाती थी, जो अकसर उस के नाजुक अंगों से छेड़छाड़ करता रहता था.

पूजा 10 साल की हो पाती, इस के पहले ही हैवान महेश ने इस कली को मसल डाला. विरोध करने पर वह उसे बुरी तरह मारतापीटता था. एक उम्मीद भरी निगाह उस ने केयरटेकर कविता पर डाली तो निराशा ही हाथ लगी.

कविता ने बजाय उसे सांत्वना देने के दोटूक कहा कि चुपचाप वह सब करती जाए, जो अवस्थी साहब कहते हैं. इतना ही नहीं, वह पूजा और दूसरी लड़कियों को सैक्स के बाबत उकसा कर उस के फायदे भी गिनाने लगी थी.

अमित पत्नी पर हुए अत्याचारों की दास्तान सुन कर दहल उठा, लेकिन वह कोई फिल्मी हीरो नहीं था जो आश्रम जा कर महेश प्रसाद अवस्थी की धुनाई कर उसे सबक सिखा पाता या उसे उस के किए की सजा दे पाता. इसलिए उस ने कानून का रास्ता चुन पूजा को इंसाफ दिलाने की पहल की.

अवस्थी के खिलाफ खोला मोर्चा

अमित का फैसला न केवल हिम्मत और समझ भरा था, बल्कि काबिलेतारीफ भी था. जिस में उस ने समझदारी दिखाते हुए पूजा को ही आम पतियों की तरह दोषी या अपवित्र नहीं माना, बल्कि उस ने उसे गले लगा कर वादा किया था कि महेश अवस्थी नाम के इस हैवान को सबक सिखाया जाना जरूरी है, जिस से उस के किए की सजा मिले, वरना यह पता नहीं कितनी और लाचारों का शोषण करता रहेगा.

लेकिन यह कोई आसान काम नहीं था. वजह हर कोई उन की भाषा नहीं समझ पाता, फिर इन के जज्बातों को कोई समझेगा, यह उम्मीद करना तो बेकार की बात है. हिम्मत के साथ इन्होंने श्रद्धा शर्मा से संपर्क साधा जो साइन लैंग्वेज की एक्सपर्ट हैं.

पूजा की आपबीती सुन कर श्रद्धा भी चौंक गईं. उन्हें पहले भी कुछ युवतियां इस तरह की शिकायत कर चुकी थीं, लिहाजा उन्होंने महेश अवस्थी के खिलाफ सुनियोजित तरीके से मोर्चा खोल डाला.

वह 14 सितंबर, 2018 का दिन था जब भोपाल के लिंक रोड नंबर-2 पर स्थित सामाजिक न्याय एवं नि:शक्त जन कल्याण विभाग के सामने कोई 36 मूकबधिर इकट्ठा हुए. इन में वे लड़कियां भी थीं जो कभी न कभी महेश अवस्थी की हवस का शिकार बनने के लिए मजबूर हुई थीं. श्रद्धा ने इन सब को इकट्ठा कर प्रदर्शन किया.

वहां मौजूद अधिकारियों से श्रद्धा शर्मा ने महेश अवस्थी पर 4 युवतियों के साथ बलात्कार का आरोप लगाया. इस के अलावा कुछ युवकों ने भी अपने साथ दुष्कर्म होने की बात कही.

भारी तादाद में मूकबधिरों को इकट्ठा देख उधर से गुजरने वाले राहगीरों की भीड़ भी वहां जमा होने लगी. वहां से चंद कदमों की दूरी पर स्थित प्रदेश कांग्रेस कार्यालय से कांग्रेस की प्रवक्ता शोभा ओझा भी उन के बीच पहुंच गईं.

खबर मिलने पर कई मीडियाकर्मी भी वहां पहुंच गए. हल्ला मचने की जानकारी मिलते ही हबीबगंज थाने के सीएसपी भूपेंद्र सिंह भी मौके पर पहुंच गए थे.

प्रदर्शनकारियों ने सीएसपी भूपेंद्र सिंह के सामने महेश प्रसाद अवस्थी का चिट्ठा खोला तो उन्होंने पीडि़त युवतियों की शिकायत पर साईं विकलांग एवं अनाथ सेवा आश्रम के संचालक महेश प्रसाद अवस्थी के खिलाफ बलात्कार और दुष्कृत्य की रिपोर्ट दर्ज कर ली. इतना ही नहीं, पुलिस ने उसे जल्द गिरफ्त में भी ले लिया.

इस पर लोगों को कुछ दिनों पहले का एक और मामला याद हो आया, जिस में भोपाल के ही अवधपुरी इलाके से एक ऐसे ही अनाथाश्रम के संचालक को ऐसे ही आरोपों में गिरफ्तार किया गया था.

अब कई बातें खुल कर सामने आईं, जिन में एक यह भी थी कि महेश प्रसाद अवस्थी के खिलाफ फरवरी, 2017 में एक मूकबधिर छात्रा ने अश्लील हरकतें करने की शिकायत की थी. तब कलेक्टर होशंगाबाद अविनाश लवानिया ने मालाखेड़ी आश्रम की जांच करवाई थी और अनियमितताएं पाए जाने पर उसे बंद करवा दिया था. होशंगाबाद पुलिस ने मालाखेड़ी आश्रम की केयरटेकर कविता चौहान को भी गिरफ्तार कर लिया था.

अय्याशी का अड्डा था आश्रम

जिस ने भी महेश की करतूत को सुना, थूथू की. लेकिन दूसरे दिन जब पीडि़ताओं ने अपनी आपबीती सुनाई तो वह गरुड़ पुराण में वर्णित किसी नर्क के चित्रण से कम नहीं कही जा सकती.

बैरागढ़ वाले आश्रम में 55 लड़कियां और 42 लड़के रह रहे थे, जिन का खुलेआम यौन शोषण होता था. इस घिनौने कृत्य में इस हौस्टल की केयरटेकर मीता मिश्रा भी उसी तरह शामिल थी, जिस तरह होशंगाबाद में कविता चौहान थी.

मीता का पति विजय मिश्रा और 19 वर्षीय बेटा अभिषेक मिश्रा भी मूकबधिर लड़कियों का दैहिक शोषण और बलात्कार करते थे. इन तीनों के अलावा पुलिस ने आश्रम के एक शिक्षक राकेश चौधरी को भी गिरफ्तार किया.

ये पांचों जेल में हैं लेकिन आश्रम में रहते इन्होंने जो जुल्म मूकबधिरों पर ढाए थे, उन्हें सुन कर शैतान भी हैरान रह जाएगा.

दुराचारियों के इस गैंग के सरगना महेश अवस्थी को जिस लड़की से बलात्कार करना होता था, उसे वह अपने कमरे में बुला कर उस से अपने पैर दबवाता था. इस दौरान वह लड़कियों के नाजुक अंगों से छेड़छाड़ करता रहता था. फिर सारे कपड़े उतार कर लड़की से मालिश करवाता था. वह लड़कियों से सैक्सी बातें भी करता था. बलात्कार करने के लिए वह लड़की को घसीट कर छत पर बने कमरे में ले जाता था और उसे नोचताखसोटता रहता था.

जो लड़की विरोध करती थी, उसे बुरी तरह मारापीटा जाता था. उस के शरीर पर पिटाई के निशान न बनें, इसलिए प्लास्टिक के डंडों का इस्तेमाल किया जाता था. महेश अवस्थी अकसर शराब के नशे में रहता था.

विजय मिश्रा तो महेश से भी ज्यादा क्रूरता करते हुए किस तरह लड़कियों की विकलांगता का फायदा उठाता था, इसे समझाते हुए लड़कियों ने बताया कि सुबह सभी को नहाने के लिए निर्वस्त्र खड़ा कर दिया जाता था. फिर विजय पाइप से पानी की धार उन के शरीर पर छोड़ता था. पानी की धार नाजुक अंगों पर ज्यादा छोड़ता था. इस दौरान वह शैतानों की तरह मुसकराता रहता था.

इतना ही नहीं, लड़कियों को इस तरह नहलाते समय वह उन से एकदूसरे के शरीर पर साबुन मलने के लिए कहता था. इस दौरान महेश प्रसाद अवस्थी कुरसी पर बैठा तमाशा देखा करता था. कई बार वह नहाती हुई लड़कियों में किसी एक को रोक कर उस के शरीर को सहलाता था. पर दरअसल इशारा होता था कि आज रात तेरा नंबर है. इस चुनी गई लड़की को मीता शाम को छत पर बने कमरे में छोड़ आती थी.

बापबेटे करते थे बलात्कार

मांबाप के काले कारनामों का विरोध करने के बजाय अभिषेक भी उन का हिस्सा बन गया था. अभिषेक कभी भी बाथरूम में घुस कर लड़कियों के नाजुक अंगों को दबातासहलाता रहता था. इस पर मीता और विजय उसे रोकतेटोकते नहीं थे.

यह नारकीय इंतहा ही थी कि अभिषेक जब चाहे, तब किसी भी लड़की के कपड़े उतार कर उसे नग्न कर देता था. जो लड़की उस की इन ज्यादतियों की शिकायत मीता से करती थी, उसे बजाय इंसाफ के मार मिलती थी.

अभिषेक भी चुनी हुई लड़की को छत पर बने कमरे में ले जा कर बलात्कार करता था यानी इन राक्षसों ने बाकायदा एक रेप रूम ही बना रखा था. एक रात जब अभिषेक एक लड़की का बलात्कार कर रहा था तभी उस का पिता विजय भी दूसरी लड़की को ले कर छत पर पहुंच गया. बेटे को बलात्कार करते देख उस ने उस के चले जाने का इंतजार किया और कमरा खाली हो जाने पर अपने साथ लाए शिकार का बलात्कार किया था.

14 साल की एक लड़की के साथ शिक्षक राकेश चौधरी अकसर बलात्कार करता था तो ऐसा लगता कि यह कोई आश्रम नहीं बल्कि चकलाघर है, जहां नियम, कायदे कानूनों को धता बताते आए दिन संदिग्ध लोग अपनी हवस इन मूकबधिरों से पूरी करते थे.

सभ्य समाज के इस क्रूर बर्बर और नारकीय चेहरे का कुछ ही हिस्सा हम यहां इसलिए बता पा रहे हैं कि लोगों को समझ आए कि कैसेकैसे राक्षस देश में मौजूद हैं, जो मूकबधिरों को 2 वक्त का खाना और सिर छिपाने की छत किन शर्तों पर देते हैं. ऐसा हर कहीं हो रहा है, होता है और लोग जानते हुए भी खामोश रहते हैं.

बात जहां तक महेश प्रसाद अवस्थी के आश्रमों की है तो साफ समझ आता है कि सरकारी विभागों खासतौर से सामाजिक न्याय विभाग के कई अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध है.

ये अधिकारी आश्रमों का निरीक्षण ही नहीं करते और यदि करते भी हैं तो काजू, किशमिश खा कर संचालक के मनमाफिक रिपोर्ट बना देते हैं. एवज में उन्हें नकदी घूस मिल जाती है. चिट्ठा उजागर होने से पहले महेश प्रसाद अवस्थी को एक लाख रुपए महीने की सरकारी इमदाद दी जा रही थी.

बहरहाल, यह हादसा आंखें खोल देने वाला है कि यौन कुंठित लोग कैसेकैसे समाजसेवा करते हैं. महेश प्रसाद अवस्थी की पत्नी किसी वजह से उसे छोड़ कर भाग गई थी.

लोगों की मांग है कि इन आरोपियों को फांसी की सजा होनी चाहिए और अगर इन्हें फांसी से कम सजा हुई तो वह सजा नहीं बल्कि इन के लिए ईनाम ही होगा. तारीफ की पात्र श्रद्धा शर्मा भी हैं, जो भोपाल में पढ़ते हुए मूकबधिरों के लिए जूझीं. उन से भी ज्यादा तारीफ का हकदार अमित है, जिस ने अपनी पत्नी के दर्द को समझा और उस के गुनहगारों को उन का असली मुकाम दिखाया. अब बारी अदालत की है कि वह इन हैवानों को कब सजा देती है?

बड़ी रकम पर छोटा दांव : सलमान क्या लूट पाया वो रकम

इसी साल 20 सितंबर की बात है. करण पटेल अपनी टोयोटा इटिओस कार से दिल्ली से अहमदाबाद जा रहा था. उस के आगे की सीट पर गजेंद्र राठौड़ बैठा हुआ था. कार करण पटेल चला रहा था.

करण गुजरात के मेहसाणा के रामपुरा गांव का रहने वाला था. वह गुजरात के अहमदाबाद की पी. विजय कुमार कंपनी में ड्राइवर था. यह कंपनी व्यापारियों का कैश कलेक्शन और मनी ट्रांसफर का काम करती थी. गुजरात में इस तरह का काम करने वालों को आंगडि़या कहते हैं. कंपनी में रोजाना करोड़ों रुपए का लेनदेन होता था. गजेंद्र राठौड़ भी इसी कंपनी में काम करता था और करण का साथी था.

उस दिन शाम करीब 6 बजे करण ने दिल्ली के चांदनी चौक से एक व्यापारी से पेमेंट ली थी. यह रकम गत्तों के कार्टन में भरी थी. हालांकि व्यापारी ने करण को यह नहीं बताया था कि रकम कितनी है, लेकिन व्यापारी की बातचीत से करण और उस के साथी गजेंद्र को यह पता चल गया था कि रकम करीब साढ़े 4 करोड़ रुपए है. करण को यह रकम अहमदाबाद स्थित अपनी कंपनी में पहुंचानी थी.

सड़क मार्ग से जाया जाए तो दिल्ली से अहमदाबाद का रास्ता बहुत लंबा है. कार से दिल्ली से रवाना हो कर पूरा राजस्थान पार करते हुए अहमदाबाद पहुंचने में लगभग 17 से 18 घंटे लग जाते हैं. करण के लिए यह कोई नई बात नहीं थी. वह पहले भी कई बार कार से दिल्ली से अहमदाबाद आताजाता रहा था. इस दौरान वह लगभग हर बार कंपनी की मोटी रकम लाता, ले जाता था. रकम हर बार करोड़ों में ही होती थी.

व्यापारी से पेमेंट लेने के बाद करण को उम्मीद थी कि वे लोग अगले दिन दोपहर तक अहमदाबाद पहुंच जाएंगे. उस दिन चांदनी चौक से निकल कर वह धौलाकुआं पहुंचा तो उस ने राहत की सांस ली. धौलाकुआं से होता हुआ वह दिल्ली जयपुर नैशनल हाइवे संख्या-8 पर जा पहुंचा. हाइवे पर पहुंच कर करण ने अपनी कार की स्पीड बढ़ा दी. हाइवे से उसे जयपुर, अजमेर होते हुए उदयपुर पहुंचना था और फिर अहमदाबाद निकल जाना था. दिल्ली-जयपुर के बीच बहरोड़ के आसपास उस का रात का खाना खाने का विचार था.

करण अपने साथी गजेंद्र से बातें करता हुआ मस्ती से कार चला रहा था. बीचबीच में वह किसी फिल्मी गीत की लाइनें गुनगुनाने लगता था. गुड़गांव निकल चुका था. हाइवे पर होते हुए कार रेवाड़ी जिले की सीमा में पहुंच गई थी. रात करीब साढ़े 8 बजे उस ने मोबाइल पर अपनी कंपनी के मालिक से बात की. इस के बाद वह कुछ दूर ही चला होगा कि कापड़ीवास गांव के पास उस ने अपनी कार के साइड मिरर से देखा कि 3 गाडि़यां कार के पीछे लगी हुई हैं.

अनायास आई मुसीबत

करण कुछ समझ पाता इस से पहले ही एक एंडेवर गाड़ी ने ओवरटेक कर के उस की साइड दबा दी. इस के बाद पीछे से अचानक ओवरटेक करती हुई होंडा सिटी कार सामने आ कर रुक गई. उसी दौरान पीछे से एक गाड़ी ने उस की कार को टक्कर मारी. इस से रास्ता बंद हो गया तो करण को गाड़ी रोकनी पड़ी.

करण की कार रुकते ही उन गाडि़यों से 10-12 लोग उतरे. उन में एक के पास राइफल और 2-3 के पास दूसरे हथियार थे. उन्होंने करण से कहा कि हम लोग कई दिन से तुम्हारा इंतजार कर रहे थे. इस के साथ ही बदमाशों ने करण और उस के साथी गजेंद्र को कार से नीचे उतार लिया. एक बदमाश ने करण की कार की ड्राइविंग सीट संभाल ली और दूसरा उस के साथ बैठ गया.

यह बात करीब पौने एक बजे की है. बदमाशों ने करण और उस के साथी गजेंद्र को होंडा सिटी कार में बैठा कर उन के हाथपैर व मुंह बांध दिए. बदमाशों ने उन के मोबाइल फोन छीन लिए थे. करण और उस के साथी गजेंद्र को अपनी होंडा सिटी में बैठा कर वे इधरउधर घुमाते रहे. रात करीब एक बजे उन लोगों ने करण और गजेंद्र को जयसिंहपुर खेड़ा बौर्डर के पास कार से उतार कर एक खेत में छोड़ दिया और चले गए.

जाते समय भी उन लोगों ने करण और गजेंद्र के हाथपैर और मुंह नहीं खोले थे. काफी मशक्कत के बाद दोनों ने अपने हाथपैर खोले. फिर वे हाइवे पर पैदल चलते हुए नजदीक के एक ढाबे पर पहुंचे. ढाबे पर किसी से मोबाइल ले कर करण ने सब से पहले कंपनी के मालिकों को वारदात की सूचना दी. बाद में 21 सितंबर की सुबह करीब साढ़े 6 बजे हरियाणा के रेवाड़ी जिले के थाना धारूहेड़ा को सूचना दी गई.

हाइवे पर साढ़े 4 करोड़ रुपए नकद लूटने की सूचना से धारूहेड़ा पुलिस भी सकते में आ गई. दिल्लीजयपुर हाइवे पर लूटपाट होना तो आम बात है. लेकिन इतनी बड़ी रकम की लूट पिछले कई सालों से नहीं हुई थी. इस मामले को ले कर थाना धारूहेड़ा और थाना कसौला के बीच जगह को ले कर विवाद था.

दरअसल जिस जगह करण और गजेंद्र को खेत में फेंका गया था, वह हरियाणा के थाना कसौला के इलाके में आता था. वारदात स्थल को ले कर विवाद यह था कि लूट की घटना गुड़गांव इलाके में हुई थी या थाना धारूहेड़ा के इलाके में. इस के अलावा लूटी गई रकम को ले कर भी संशय बना रहा कि लूटी गई रकम वास्तव में कितनी थी.

धारूहेड़ा पुलिस ने करण और गजेंद्र से की गई पूछताछ और वारदात स्थल को ले कर खींचतान के बाद 21 सितंबर को केस दर्ज कर लिया.

करण और गजेंद्र को पुख्ता रूप से यह जानकारी नहीं थी कि गत्तों के कार्टन में रखी रकम कितनी थी. वे केवल व्यापारी की बातचीत के आधार पर ही साढ़े 4 करोड़ रुपए होने का अनुमान लगा रहे थे.

पुलिस ने शुरू की जांच

मुकदमा दर्ज करने के बाद पुलिस कई ऐंगल से जांच में जुट गई. पहला ऐंगल तो यही था कि इतनी बड़ी रकम जो कार चालक और उस का साथी ले जा रहे थे, उन के पास सुरक्षा के नाम पर कुछ नहीं था. कंपनी का कोई अधिकारी या जिम्मेदारी आदमी भी उन के साथ नहीं था. दूसरा ऐंगल यह था कि लूट की यह वारदात वास्तव में हुई भी थी या नहीं. कहीं यह हेराफेरी का मामला तो नहीं था.

फिल्मी तरीके से हुई इस वारदात के सभी ऐंगलों को ध्यान में रख कर धारूहेड़ा पुलिस ने बदमाशों का पता लगाने के लिए गुड़गांव व दिल्ली पुलिस की मदद ली. दिल्ली के जिस व्यापारी से करण ने पेमेंट ली थी, धारूहेड़ा पुलिस उस से पूछताछ के लिए दिल्ली पहुंची, लेकिन वह व्यापारी नहीं मिला.

दिल्ली के चांदनी चौक में जिस व्यापारी की दुकान से करण ने पेमेंट लिया था, पुलिस वहां से ले कर वारदात स्थल तक लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकौर्डिंग की जांच में जुट गई. पुलिस का अनुमान था कि टोल प्लाजा और रास्तों में लगे सीसीटीवी की रिकौर्डिंग से ही अपराधियों की उन कारों का पता चल सकता है, जो करण की कार के पीछे लगी हुई थीं.

पुलिस को यह भी अंदेशा था कि वारदात के बाद बदमाश राजस्थान में जा सकते हैं, क्योंकि जयसिंहपुर खेड़ा के पास जहां खेत में करण और गजेंद्र को फेंका गया था, वह जगह हरियाणा राजस्थान बौर्डर पर थी. इस अंदेशे को ध्यान में रखते हुए धारूहेड़ा पुलिस ने राजस्थान पुलिस को भी सतर्क कर दिया.

धारूहेड़ा पुलिस लूट की वारदात की जांच में जुटी थी. इस के अगले दिन यानी 22 सितंबर को पुलिस को अहमदाबाद की पी. विजय कुमार कंपनी की वह कार रेवाड़ी इलाके में संगवाड़ी गांव के पास लावारिस हालत में खड़ी मिल गई, जो बदमाशों ने करण और गजेंद्र से लूटी थी. कार खाली थी. उस में कोई रकम नहीं थी. पुलिस को कार से बदमाशों और रकम के बारे में कोई सुराग नहीं मिला.

लूटी हुई कार बरामद हो गई थी, लेकिन अहमदाबाद की कंपनी के मालिक या उन का कोई अधिकारी वारदात के दूसरे दिन भी धारूहेड़ा नहीं पहुंचा. कंपनी के मालिकों से पुलिस की केवल मोबाइल पर ही बात होती रही. कंपनी के दिल्ली स्थित औफिस में भी कोई जिम्मेदार आदमी नहीं मिला.

तीसरे दिन भी यह वारदात पुलिस के लिए पहेली बनी रही. न तो पुलिस को ही लुटेरों का कोई सुराग मिला और न ही अहमदाबाद की कंपनी के मालिकों ने कोई दिलचस्पी दिखाई. इस के बाद पुलिस ने वारदात स्थल के आसपास घटना के समय इस्तेमाल किए गए मोबाइल फोन की छानबीन शुरू की.

जांच की दिशा बदलनी पड़ी

वारदात के चौथे दिन 24 सितंबर, 2018 को अहमदाबाद की कंपनी के प्रतिनिधि धारूहेड़ा पहुंचे. उन्होंने कार में साढ़े 4 करोड़ रुपए होने की बात कही. पुलिस ने उन से कई घंटे पूछताछ की. इस पूछताछ में भी पुलिस को कोई ऐसा सुराग नहीं मिला, जिस से बदमाशों का पता चल पाता.

कई दिनों की भागदौड़ के बाद धारूहेड़ा और दिल्ली पुलिस को लुटेरों के बारे में कुछ सुराग मिले. पता चला कि धारूहेड़ा इलाके में साढ़े 4 करोड़ रुपए लूटने वाले बदमाश दिल्ली के थे. इन सुरागों के आधार पर दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने मुखबिरों का जाल बिछा दिया.

सूचनाओं के आधार पर 3 अक्तूबर, 2018 को पुलिस ने दिल्ली के वजीराबाद इलाके से 32 वर्षीय बदमाश सलमान को पकड़ लिया. वह मर्सिडीज बेंज कार में सवार था. पुलिस के रोकने पर उस ने गाड़ी भगाने का प्रयास किया, लेकिन उसे दबोच लिया गया.

पकड़े जाने पर उस ने पिस्टल से पुलिस पर फायरिंग करने की भी कोशिश की. लेकिन पुलिस की घेराबंदी में वह फंस ही गया. पुलिस ने सलमान के कब्जे से पिस्टल और कारतूस भी बरामद किए. सलमान दिल्ली के वजीराबाद का रहने वाला है.

पुलिस ने सलमान से सख्ती से पूछताछ की तो साढ़े 4 करोड़ रुपए की लूट की वारदात का खुलासा हो गया. सलमान से पूछताछ के आधार पर पुलिस ने दिल्ली के जामा मसजिद इलाके की एक गली हवेली आजम खान में रहने वाले उस के चाचा के घर दबिश दी.

छोटे बदमाश बड़ी रकम

सलमान के चाचा के घर से अलमारी के पीछे टंगे 2 थैलों में भरी एक करोड़ 30 लाख रुपए की रकम बरामद की गई. रकम इतनी ज्यादा थी कि पुलिस को नोट गिनने के लिए मशीन का इस्तेमाल करना पड़ा. बाद में सलमान से 39 लाख रुपए और बरामद हुए.

दिल्ली पुलिस ने सलमान को अदालत में पेश कर 2 दिन के रिमांड पर लिया. रिमांड के दौरान पूछताछ में इस बात का पता चला कि सलमान अंडरवर्ल्ड डौन दाऊद इब्राहिम के गुर्गा रहे खलील अहमद का भतीजा है.

खलील पर 50 से ज्यादा मुकदमे दर्ज थे. वह जामा मस्जिद इलाके का कुख्यात बदमाश तो था ही. पुरानी दिल्ली इलाके का हिस्ट्रीशीटर भी था. दिल्ली के लाहौरी गेट इलाके में 20 मई, 2013 को खलील अहमद की गोली मार हत्या कर दी गई थी.

सलमान ने पुलिस को बताया कि उस ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से उर्दू में एमए किया था. पहले वह चांदनी चौक इलाके में ट्यूशन सेंटर चलाता था. ट्यूशन से उसे इतनी आमदनी नहीं हो पाती थी, जितनी जरूरतें पूरी करने के लिए होनी चाहिए थी. इसलिए धीरेधीरे उस का मन बच्चों को पढ़ाने से उचटता गया. बाद में वह निजी स्कूल में शिक्षक की नौकरी करने लगा. इस के साथ ही वह प्रौपर्टी डीलर का काम भी करता था.

इस बीच वह अपने चाचा खलील अहमद के गैंग के लोगों से मिलताजुलता रहता था. वे सलमान को उस के चाचा जैसा दबंग बनने के लिए उकसाते थे. अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने और अपना दबदबा बनाने के लिए वह शिक्षक होते हुए भी चाचा के गैंग के बदमाशों के साथ अपराध की दुनिया में चला गया. बाद में सलमान ने अपना खुद का गिरोह बना लिया और छोटीबड़ी वारदातें करने लगा.

कुछ समय पहले सलमान को पता लगा था कि चांदनी चौक इलाके के व्यापारियों से माल के भुगतान के रूप में बड़ी रकम एकत्र कर के गुजरात ले जाई जाती है. इस के बाद सलमान ने एक बार में ही मोटा हाथ मारने की योजना बनानी शुरू कर दी. इस के लिए उस के गिरोह के बदमाश गुजरात को मनी ट्रांसफर करने वाली कंपनियों के औफिसों की रैकी करने लगे. पुख्ता सूचना के आधार पर सलमान ने अपने गिरोह के साथ 20 सितंबर, 2018 को चांदनी चौक से ही गुजरात नंबर की उस कार का पीछा करना शुरू किया, जिसे करण पटेल चला रहा था. दिल्ली से निकलने के बाद सलमान और उस के साथी करण पटेल की गाड़ी लूटने के प्रयास में जुट गए.

गुड़गांव से आगे कापड़ीवास के पास हाइवे पर अंधेरे इलाके में उन्होंने अपनी कारों से ओवरटेक कर करण पटेल की कार रोक ली और हथियार दिखा कर करण और उस के साथी को अपनी कार में बंधक बना लिया. सलमान के गिरोह के बदमाशों ने करण पटेल की कार अपने कब्जे में ले ली और वहां से वापस दिल्ली आ गए.

सलमान भी दिल्ली चला गया जबकि उस के गिरोह के बदमाश करण और उस के साथी गजेंद्र को होंडा सिटी कार में बंधक बना कर हाइवे पर इधरउधर घुमाते रहे. बाद में वे इन दोनों को हरियाणा राजस्थान बौर्डर पर जयसिंहपुर खेड़ा के पास एक खेत में फेंक कर चले गए.

साढ़े 4 में से 2 करोड़ ही मिले

सलमान से पूछताछ के आधार पर धारूहेड़ा पुलिस ने दिल्ली पुलिस के सहयोग से 6 अक्तूबर को दिल्ली के विजय पार्क के रहने वाले कमरूद्दीन और नांगलोई इलाके में निहाल विहार के रहने वाले सोहनवीर को गिरफ्तार कर लिया. इन में कमरूद्दीन दिल्ली पुलिस की चौथी बटालियन में हवलदार था.

धारूहेड़ा पुलिस ने दोनों को न्यायाधीश के समक्ष पेश कर 5 दिन के रिमांड पर लिया. इन दोनों से पूछताछ में पता चला कि सलमान ने लूट की रकम में से कमरूद्दीन को 10 लाख रुपए और सोहनवीर को 22 लाख रुपए दिए थे. पुलिस ने कमरूद्दीन से 9 लाख 7 हजार रुपए और सोहनवीर से 2 लाख रुपए बरामद कर लिए.

बाद में धारूहेड़ा पुलिस गिरोह के सरगना सलमान को प्रोडक्शन वारंट पर धारूहेड़ा ले कर आई और अदालत से 5 दिनों के रिमांड पर लिया. सलमान की निशानदेही पर पुलिस ने लूट की वारदात में इस्तेमाल की गई एक कार उत्तर प्रदेश के हापुड़ से बरामद की. इस के अलावा 5 लाख रुपए भी बरामद किए गए.

बाद में पुलिस ने सलमान की निशानदेही पर ही 11 लाख 80 हजार रुपए और बरामद किए. सलमान ने पुलिस को बताया कि गिरोह का सरगना होने और गुजरात रकम भेजे जाने की सूचना उस की खुद की होने की वजह से उस ने लूटी गई रकम में से ढाई करोड़ अपने पास रखे थे और बाकी करीब 2 करोड़ रुपए वारदात में शामिल सदस्यों को बांट दिए थे.

पुलिस ने तीनों आरोपियों से लगभग 2 करोड़ रुपए बरामद किए. अदालत में पेश कर तीनों आरोपियों को 14 अक्तूबर को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. पुलिस पूछताछ में सलमान गिरोह के कुछ बदमाशों के नाम पता चले, जिन की तलाश की जा रही थी. इन में कुछ प्रौपर्टी डीलर भी शामिल हैं.

जांच में पुलिस के सामने यह बात आई कि करण पटेल की कार से 4 करोड़ 31 लाख रुपए सलमान सहित 7 बदमाशों ने मिल कर लूटे थे. वारदात में 2 कारें इस्तेमाल की गई थीं. पुलिस के लिए बाकी रकम की बरामदगी बड़ी चुनौती थी. क्योंकि सलमान और 2 अन्य गिरफ्तार आरोपियों से पुलिस को इस रकम के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिल सकी.

गुजरात की मनी ट्रांसफर कंपनी के कर्मचारियों से साढ़े 4 करोड़ रुपए की लूट होने के बावजूद इतनी मोटी रकम कार में बिना किसी सुरक्षा के लाने ले जाने का सिलसिला अभी भी नहीं थमा है. दिल्ली के चांदनी चौक से लग्जरी कार में हवाला के साढ़े 3 करोड़ रुपए ले जा रहे 2 युवकों को 6 अक्तूबर को राजस्थान पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्तक यानी एटीएस ने सिरोही जिले में पकड़ा था.

यह रकम अहमदाबाद ले जाई जा रही थी. पुलिस ने यह रकम जब्त करने के बाद आयकर विभाग को सौंप दी. इस कार में हैंडब्रेक के पास एक गुप्त चैंबर बना हुआ था, जिस में 2-2 हजार के नोटों की गड्डियां भरी थीं.

पुलिस ने कार में सवार गुजरात के महसाना निवासी पंकज व दिनेश से पूछताछ की. उन्होंने बताया कि वे एक कुरियर कंपनी के लिए काम करते हैं. कंपनी के मैनेजर ने उन्हें दिल्ली भेजा था. वे लोग दिल्ली के चांदनी चौक से एक आदमी से साढ़े 3 करोड़ रुपए की रकम ले कर अहमदाबाद जा रहे थे.

करोड़ों रुपए की खेप सुरक्षित पहुंचाने के लिए नोटों के बंडलों में जीपीएस सिस्टम भी लगा हुआ था. एटीएस के एडीजी उमेश मिश्रा ने बताया कि मुखबिर से सूचना मिली थी कि दिल्ली से आबूरोड हो कर हवाला की मोटी रकम गुजरात ले जाई जाएगी. इस सूचना के आधार पर सिरोही जिले में स्वरूपगंज इलाके में नाकेबंदी कर संदिग्ध कार की तलाशी ली गई. तलाशी में कार में बने गुप्त चैंबर से रकम बरामद हुई.

कमला हैरिस की उड़ान

क्या अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए डैमोक्रेटिक पार्टी का उम्मीदवार बनने के लिए कमला हैरिस की कोशिश भारतीय जनता पार्टी को आर्थिक नुकसान पहुंचाएगी? शायद हां. भारतीय मूल की तमिल मां और जमैकन पिता की अमेरिकी संतान कमला हैरिस को अपनी दावेदारी घोषित करते ही पैसा मिलना शुरू हो गया है. इस में से बहुत पैसा वे भारतीय देंगे जिन्होंने 2014 से पहले भारतीय जनता पार्टी को दिया था.

अमेरिका के चुनावों में रेस और रिलीजन काफी हावी रहते हैं. वहां भी लोग नीतियों से ज्यादा नेताओं के व्यक्तित्व को वोट देने के चक्कर में गलत राजनीतिबाजों को चुनते रहते हैं. अमेरिका में सिविल वार में यूनियन और कौन्फैड्रेट की लड़ाई के बाद गुलामी तो बंद हो गई पर कालों के प्रति घृणा कम नहीं हुई और कालों के साथ भारत के दलितों का सा व्यवहार होता है.

ऊंचे, अमीर, योग्य गोरों की तरह भारतीय मूल के अमेरिका में नागरिक बने पैसे वाले अपनेआप को आम कालों, हिस्पैनिकों और यहां तक कि चीनियों से भी बेहतर समझते हैं. वे अपने सवर्ण होने का गौरव व दंभ अपने साथ भारत से बांध कर ले गए थे और चूंकि कमला हैरिस में ब्राह्मण खून है, इसलिए भारतीय मूल के सफल सवर्ण अपना जो पैसा नरेंद्र मोदी पर लगा रहे थे, शायद, अब कमला हैरिस पर लगाएंगे. कमला हैरिस को राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने के लिए डैमोक्रेटिक टिकट लेने के लिए लाखों डौलर जमा करने होंगे और ये सिर्फ गोरे अमेरिकी देंगे, इस में शक है. उन्हें भारतीय मूल के लोगों पर भी बहुत निर्भर रहना होगा.

यह कोई जरूरी नहीं कि कमला हैरिस पहली बाधा भी पार कर पाएं पर उन का चुनाव में उतरना ही भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए काफी है. ये लोग भारत में नरेंद्र मोदी को समर्थन इसीलिए कर रहे थे कि वे उन की ऊंची जातियों के दंभ पर मोहर लगा रहे थे ताकि अमेरिका में वे कह सकें कि वे दूसरे भारतीयों से अलग हैं. अब वे कमला हैरिस पर दांव लगा रहे हैं.

जीवन के सूर्यास्त में बड़ी अहम है सैक्स की भूमिका

अकेलेपन की टीस बेहद पीड़ादायक होती है. इस के एहसास की पीड़ा तब तक इंसान को महसूस नहीं होती है जब तक वह इस का भुक्तभोगी न हो. इस अकेलेपन को दूर करने का सब से बड़ा संबल है, एक साथी या जीवनसाथी का होना. साथी की जरूरत जवानी में तो होती ही है पर बुढ़ापे में अधिक होती है. चाहे स्त्री हो या पुरुष, जिंदगी की अन्य जरूरतों की तरह ही शारीरिक जरूरत भी हर इंसान की एक अहम जरूरत है, जो यौवन में ही नहीं, यौवन की दहलीज के पार भी महसूस होती है.

वृद्धावस्था में किसी की शादी की बात सुन कर अकसर हम सब चौंक जाते हैं. उसे दोषी करार देते हैं. पर क्यों? इस के पीछे क्या कारण है, उस ओर हम ध्यान नहीं देते. ‘एक महिला ने 62 साल की उम्र में अपना विवाह बड़ी धूमधाम से किया…’ अखबार में छपी इस खबर ने कुछ पाठकों को जरूर चौंका दिया होगा पर यह घटना न तो असामान्य है, न अमानवीय. मानसिक, सामाजिक, शारीरिक और भावनात्मक रूप से अकेले रहने की टीस से नजात पाने के लिए हर इंसान बेचैन रहता है. वह इस कैद से बाहर निकल कर, खुली आबोहवा में सांस ले कर जीना चाहता है. क्या यह अपराध है?

बचपन और किशोरावस्था में इस अकेलेपन के एहसास से इंसान पूरी तरह से अनभिज्ञ रहता है. जवानी में उम्र के जोश और उत्साह के उन्माद में डूबा रहता है. इस भागदौड़ में कब उस की जवानी बीत जाती है, उसे पता ही नहीं चल पाता है. जब वह वृद्धावस्था में कदम रखता है, तो इस सत्य से रूबरू होता है. और जब उसे इस का एहसास होता है, तो वक्त के सारे पंछी उस के हाथों से उड़ चुके होते हैं.

यह एकाकीपन क्या है, क्या होता है, इस का विश्लेषण किया गया. इस से होने वाले नुकसान के बारे में रिसर्च करने पर परिणामस्वरूप बहुत सारे तथ्य सामने आए. समाज के अलगअलग वर्गों और समुदायों के लोगों से बातचीत की गई.

मुंबई के उपनगर बोरीवली की एक मनोचिकित्सक डा. सुमन कालरा, 18 वर्षों से साइकेट्रिक क्लिनिक चला रही हैं. जाहिर है इस विषय में उन्हें प्रगाढ़ अनुभव है. मेरे प्रश्न पर वे मुसकराती हैं और फिर विस्तार से बताती हैं, ‘‘मेरे पास तरहतरह के रोगी आते हैं. उन में जो 50 साल से अधिक उम्र वाले हैं, चाहे पुरुष हों या स्त्री, उन के रोग का मुख्य कारण देखा गया है, ‘जीवन का एकाकीपन.’ यही उन्हें सब से ज्यादा तकलीफ देता है.

‘‘जब धीरेधीरे सभी सगेसंबंधी, मित्र, रिश्तेदार उन्हें छोड़ कर अपनेअपने परिवार में व्यस्त होने लगते हैं, तो बुढ़ापे की ओर अग्रसर, ये एकाकी या चिरकुंआरे लोग, समाज में अलगथलग पड़ जाते हैं और अकेलापन उन के जीवन में दंश देना शुरू कर देता है, जो उन्हें धीरेधीरे असामान्य बना देता है.’’

सैक्स की आवश्यकता और उस की अनिवार्यता को पूरी तरह स्वीकारती, स्त्रीरोग विशेषज्ञ, डा. रति माथुर बताती हैं, ‘‘जीवन क्या है? परिस्थितिस्वरूप आते बदलाव का नाम ही जीवन है. उम्र के अनुसार शारीरिक बदलाव होते हैं, और यही बदलाव नईनई जरूरतों को जन्म देते हैं. शारीरिक जरूरतों की भी एक खास उम्र हुआ करती है जब विपरीत सैक्स के प्रति अनायास ही चाहेअनचाहे आकर्षण पैदा होने लगता है और उस का साथ अनायास ही अच्छा लगने लगता है. लेकिन 50 की उम्र के बाद, शरीर की सैक्स की मांग कम होने लगती है. ऐसे समय में मानवीय भावनाओं की मांग ज्यादा अहम हो जाती है.’’

डा. रति ने काफी सुलझे हुए तरीके से हमें समझाया कि बढ़ती उम्र में कई वजहों से सहवास की अभिलाषा अवश्य कम हो जाती है पर ‘साथ’ की अभिलाषा खत्म नहीं होती और ‘साथ’ न मिलने पर भावनात्मक पीड़ा होने लगती है.

एक विदेशी फर्म की मार्केटिंग मैनेजर कादंबरी सहाय 59 साल की हैं. अविवाहित कादंबरी को अब अपना अकेलापन खलने लगा है. पारिवारिक जिम्मेदारियां और अपने छोटे भाईबहनों को पढ़ानालिखाना तथा उन की शादी का उत्तरदायित्व भी कादंबरी ने ही उठाया है, जिन के लिए उन्होंने अपनी शादी और अपना भविष्य दांव पर लगा दिया था. अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह निभाने के बाद विडंबना ऐसी कि अब वही अपने लोग, जिन के लिए कादंबरी ने अपनी वैवाहिक आवश्यकता की कुर्बानी दी, उन को गैरजरूरी व भार समझने लगे हैं.

अगले साल रिटायर होने के बाद आने वाला अकेलापन सोच कर कादंबरी कांप उठती हैं. मुंबई में अपना फ्लैट है. घर में आराम के सभी साधन मौजूद हैं. बैंक बैलेंस भी अच्छाखासा है, पर साथ रहने वाला कोई नहीं है.

शारीरिक जरूरतों की बात पर कादंबरी बिना किसी लागलपेट के कहती हैं, ‘‘देखिए, जीवन का एक अटूट हिस्सा है सैक्स. पर मानवीय भावनाओं को मैं ज्यादा अहम मानती हूं. जब अपनों से दिल टूट जाता है, तो ऐसी जिंदगी का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता. इसीलिए अब मैं जिंदगी को पूरी तरह से जीने में यकीन करने लगी हूं. महिला मित्रों के साथसाथ मेरे कुछ पुरुष मित्र भी हैं.

‘‘हम लोग आउटिंग पार्टियां करते रहते हैं, एंजौय करते हैं. पर जब मैं उस टीस के बारे में सोचती हूं, जो मेरे भाईबहन ने मुझे दी है, जिन के लिए मैं ने अपना जीवन कुर्बान कर दिया है, तो बहुत तकलीफ होती है, बहुत अकेलापन सा लगने लगता है.’’ यह कहने के साथ उन की आंखें भर आईं.

कादंबरी के साथ काम करने वाली उन की ही तरह अविवाहित, फ्लोरिया डिसूजा ने बताया, ‘‘मैं व्यक्तिगत रूप से शारीरिक संबंध को बहुत ज्यादा अहमियत नहीं देती हूं, पर सैक्स की इच्छा को दबा कर दफन करने में भी विश्वास नहीं करती हूं. जहां तक सैक्स की बात है, मुझे अच्छी तरह से याद है कि मेनोपौज तक, जब मैं 48 साल की थी, उन दिनों तक मैं इसे बहुत महत्त्वपूर्ण समझा करती थी.

‘‘यह भी सच है कि अकेलेपन की वजह से सैक्स की इच्छा सामान्य से कुछ अधिक ही हुआ करती है. शायद यह असुरक्षा की भावना रहती होगी या फिर वृद्ध होने के एहसास का भय, पता नहीं? वैसे यह मेरा व्यक्तिगत विचार है.’’

सूरत में अपना क्लिनिक चलाने वाले डा. राहुल जैन से जब जीवन में आने वाले अकेलेपन व सैक्स पर बात हुई, तो उन्होंने बताया, ‘‘मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, इसलिए हम सभी को ही परिवार व समाज की आवश्यकता तो होगी ही. अकेलापन जिंदगी को दीमक की तरह खाने लगता है. परंतु मैडिकल साइंस का कुछ और ही कहना है.

‘‘मैडिकल साइंस के हिसाब से, कभीकभी इस का कारण शरीर के कुछ खास हार्मोन्स की गैरमौजूदगी भी हुआ करती है. फ्राइब्रायडो या एडीनी मायेसिस की समस्या अकसर महिलाओं में सैक्स की इच्छा को परोक्षरूप से और बढ़ा देती है. यह बदलाव पुरुषों में भी आता है, पर महिलाओं में कुछ ज्यादा ही आता है. यह विशेष बदलाव महिलाओं में व्यग्रता, अति संवेदनशीलता और अधीरता को बढ़ा देता है. भावनाएं बेचैनी का रूप धारण कर लेती हैं और यही बदलाव धीरेधीरे आदत में परिवर्तित हो जाया करता है. फलस्वरूप, सैक्स की इच्छा बारबार उठती रहती है. इसे मैडिकल की भाषा में पीएमएम यानी पोस्ट मैंस्टुअल मूडस्विंग कहते हैं.

मशहूर जरमन गाइनीकोलौजिस्ट ई डब्लू फेब्रक्स की चर्चित पुस्तक ‘स्पींस्टर ऐंड देअर डिजायर्स’ में लिखा है कि जो भी स्त्री या पुरुष अधिक उम्र तक अविवाहित रहते हैं, वे प्राकृतिक नियमों की अवहेलना और उल्लंघन करते हैं. प्राकृतिक नियमों को तोड़ कर जो अविवाहित रहने का फैसला करते हैं, वे अपने प्रति अन्याय करते हैं.

सैक्स इंसान के जीवन की आवश्यकता ही नहीं, अनिवार्यताओं में एक है. सैक्स इंसान की कुंठाओं को रिलीज कर उसे सामान्य बने रहने में सहायता करता है और साथी पति या पत्नी, को समाज में स्थान और प्रतिष्ठा दिलाता है.

मुंबई की एक संस्था है महाराष्ट्र नारी उत्थान मंडल जिस ने विधवा विवाह और तलाकशुदा महिलाओं का दोबारा विवाह कराने का बीड़ा उठाया है. इस मंडल की संचालिका ममता राज्याध्यक्ष, महिलाओं के अविवाहित रहने की घोर विरोधी हैं. 17 साल से इस मंडल का संचालन कर रही ममता अब तक 250 से भी अधिक पुनर्विवाह करवा चुकी हैं. इन में ज्यादातर महिलाएं ऐसी हैं जिन्हें शादी के लिए राजी करना टेढ़ी खीर था.

ममता बताती हैं, ‘‘एक ओर तलाकशुदा स्त्रियां, अपनी एक शादी के टूटने से ही इतनी विचलित और भयभीत हो उठती हैं कि दोबारा विवाह करने और किसी दूसरे पुरुष के साथ जीवन बिताने को सोच पाना भी उन्हें कठिन सा लगने लगता है तो दूसरी ओर विधवाओं की अलग ही समस्याएं हैं. पति की मृत्यु के बाद वे अपने पति की याद में खोईखोई सी रहती हैं. उन के लिए किसी और व्यक्ति के साथ रहने या शारीरिक संबंध बनाने व शादी करने की बात उन्हें रास ही नहीं आती.’’

उन्होंने आगे बताया कि दोनों ही मामलों में उन्हें बहुत ही जद्दोजेहद करनी पड़ती है, पर वे इसे भी एंजौय करती हैं. वे कहती हैं, ‘‘कार्य जितना कठिन होता है, उस की संतुष्टि उतनी ही अधिक हुआ करती है. मुझे ऐसी महिलाओं को प्रेरित करने में ऐंडवैचर सा आनंद मिलता है.’’

संख्या की दृष्टि से अविवाहित महिलाओं और पुरुषों की एक बड़ी तादाद मैट्रो शहरों में रह रही है. कारण चाहे जो भी हो, कभी जिंदगी की व्यस्तता होती है, तो कभी कोई सही जीवनसाथी  का न मिल पाना या फिर प्रेम में विफलता का सदमा. पर अविवाहित लोगों का जीवन, उम्र के अंतिम पड़ाव में बहुत ही दुखदाई हो जाता है.

उम्र के उस पड़ाव पर, जब किसी साथी की सब से ज्यादा जरूरत हुआ करती है, अकेलापन मिले तो आप समझ सकते हैं कि यह उसे कितनी टीस देगा. शारीरिक भूख की तृष्णा भले ही उस उम्र में कम हो पर भावनात्मक रूप से तितरबितर सा उस का जीवन अवश्य उसे कचोटता रहेगा. और अकेलेपन के लिए हो रहे पछतावे की आग उसे क्षणक्षण जलाती रहती है.

कुंआरे रहने वाले लोग, अपनेआप को भले ही तरहतरह की तसल्लियों से समझाते रहें, अपने इस निर्णय की सराहना करते रहें, पर जब आसपास का एकाकीपन उन्हें डंसता होगा, तो एक पछतावे की आह अवश्य उन के हृदय से उठती होगी. दरअसल, सचाई तो सचाई ही है. सचाई से आंख चुराई जा सकती है, पर मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है.

अंडों की पीली जरदी ही नहीं बल्कि इस के छिलके भी हैं गुणकारी

बहुत कम लोग जानते होंगे कि अंडे के खोल से सजावट की जाती है. अंडे में एक छोटा सा छेद कर के उस में भरा सारा तरल पदार्थ निकाल लिया जाता है. फिर अंडे के इस खाली खोल को अच्छी तरह साबुन मिले पानी के घोल से धोने के बाद व्हिस्की से स्टरलाइज कर धूप में सुखा लिया जाता है.

थोड़ी सतर्कता बरती जाती है कि अंडे का खोल फूट न जाए. फिर उस पर पैंसिल या ब्रश से तरहतरह के रंग किए जाते हैं, चेहरे के आकार उकेरे जाते हैं. रुई से इन की दाढ़ीमूंछें बनाई जाती हैं, चोटियां बना कर हैट पहनाए जाते हैं. फिर मनमुताबिक डिजाइन पर स्पार्कल लगा कर इन्हें ईस्टर के मौके पर सजावटी टोकरियों में रखा जाता है. क्रिसमस के मौके पर इन्हें क्रिसमस ट्री पर सजाया जाता है. अंडे का खोल इस तरह से फेंकने से पहले भी अपनी कीमत अदा कर जाता है.

इडिना स्टेनले बागबानी की शौकीन हैं. उन का मानना है कि पौधों के लिए अंडे के छिलके बढि़या जैविक खाद का काम करते हैं. अंडे के छिलके यदि ओवन में सुखा लिए जाएं और अच्छी तरह इन सूखे छिलकों को चूरा कर लें या इन का पाउडर बना कर मुरगियों के खाने के दाने में मिला दिया जाए तो यह मुरगियों के लिए काफी पौष्टिक आहार साबित होगा. कैल्शियमयुक्त अंडे के छिलकों को यदि मुरगियों को खाने के लिए दिया जाए तो मुरगियों के अंडों की जरदी अच्छी व ज्यादा पौष्टिक होगी क्योंकि इस में प्रोटीन की मात्रा ज्यादा होगी. जिन मुरगियों को ऐसा भोजन दिया जाता है उन के अंडे ग्राहकों की पहली पसंद होते हैं क्योंकि उन में प्रोटीन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है.

अंडे के छिलकों का प्रयोग अच्छी खेती के लिए खाद के रूप में या मुरगी के दाने के लिए तो किया ही जाता है, बरतन साफ करने के लिए भी इन्हें एक बढि़या स्क्रबर के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. बरतनों में धूल चिपक गई हो, चिकनाई हो तो इन्हें अच्छी तरह क्रश कर लें और मसलने के बाद बरतन धो कर साबुन के घोल में मिला लें. फिर इन छिलकों से बरतन रगड़ें और फिर देखें, कैसे चकाचक साफ होते हैं आप के बरतन.

यदि सिंक का पाइप बंद हो गया है तो परेशान होने की जरूरत नहीं है. बस, अंडे के छिलकों को अच्छी तरह क्रश कर सिंक की नाली में छोड़ दें. ऊपर से नल चलाएं. आप देखेंगे धीरेधीरे सारा पाइप इन छिलकों की सहायता से साफ हो जाएगा. इसी प्रकार ये छिलके पक्षियों के बरतनों को भी बखूबी साफ कर देते हैं.

अंडे के छिलकों में कैल्शियम की बहुतायत होती है. छिलकों को अच्छी तरह पीस कर पक्षियों के दानों में मिलाने से यह काफी पौष्टिक भोजन बन जाता है.

बागबानी में भी करें इस्तेमाल : यदि आप ने टमाटर, बैगन या शिमलामिर्च के पौधे लगाए हैं, पर पौधे बढ़ नहीं पा रहे हैं तो इस का मतलब है कि पौधों में खुराकी तत्त्वों की कमी है. इन्हें कैल्शियम, नाइट्रोजन और फासफोरस की जरूरत है. कैल्शियम की कमी अंडे के छिलकों के इस्तेमाल से दूर की जा सकती है. इस के सेवन से जमीन की उर्वरशक्ति को बल मिलता है. इसलिए जब भी टमाटर, बैगन या शिमलामिर्च की पौध लगाएं, खासतौर पर गमलों में, तो सब से पहले निचली एक तह, अंडों के मसले हुए छिलकों की डालें, दूसरी परत मिट्टी की. फिर नतीजा देखिए आप की बगिया में पौष्टिक सब्जियां उगने लगेंगी.

कपड़ों के दागधब्बे दूर करें : अंडे के छिलकों से कपड़ों के दागधब्बे भी छुड़ाए जा सकते हैं. बस, इन छिलकों को अच्छी तरह पीस लें. इस पाउडर को दागधब्बे वाले कपड़े पर बुरक दें. उस पर गरम पानी डालें. थोड़ी देर में दाग हलके हो कर छूट जाएंगे.

बागबानी में कीटनाशक का काम : यदि आप के बगीचे में फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीट हैं, तो अंडे के मसले हुए छिलके बहुत मददगार हो सकते हैं. दरअसल, इन कीटों का नीचे का भाग मुलायम और समतल होता है, जब ये मसले गए छिलकों पर चलने की कोशिश करते हैं तो शरीर कट जाता है, ये मरने लगते हैं और पौधों के करीब नहीं आ पाते.

खाद में उपयुक्त : खाद की उर्वरता को और भी पौष्टिक बनाने में सक्षम पाए गए हैं अंडों के छिलके. यदि कंपोस्ट खाद घर पर तैयार कर रहे हैं तो उस मिश्रण में अंडे के छिलके मिला दीजिए, वह खाद पौधों के लिए और भी पौष्टिक हो जाएगी.

उम्र के साथ ऐसे बदलता है व्यक्ति का सैक्स बिहेवियर

शादीशुदा जिंदगी में दूरियां बढ़ाने में सैक्स का भी अहम रोल होता है. अगर परिवार कोर्ट में आए विवादों की जड़ में जाएं तो पता चलता है कि ज्यादातर झगड़ों की शुरुआत इसी को ले कर होती है. बच्चों के बड़े होने पर पतिपत्नी को एकांत नहीं मिल पाता. ऐसे में धीरेधीरे पतिपत्नी में मनमुटाव रहने लगता है, जो कई बार बड़े झगड़े का रूप भी ले लेता है. इस से तलाक की नौबत भी आ जाती है. विवाहेतर संबंध भी कई बार इसी वजह से बनते हैं.

मनोचिकित्सक डाक्टर मधु पाठक कहती हैं, ‘‘उम्र के हिसाब से पति और पत्नी के सैक्स का गणित अलगअलग होता है. यही अंतर कई बार उन में दूरियां बढ़ाने का काम करता है. पतिपत्नी के सैक्स संबंधों में तालमेल को समझने के लिए इस गणित को समझना जरूरी होता है. इसी वजह से पतिपत्नी में सैक्स की इच्छा कम अथवा ज्यादा होती है. पत्नियां इसे न समझ कर यह मान लेती हैं कि उन के पति का कहीं चक्कर चल रहा है. यही सोच उन के वैवाहिक जीवन में जहर घोलने का काम करती है. अगर उम्र को 10-10 साल के गु्रपटाइम में बांध कर देखा जाए तो यह बात आसानी से समझ आ सकती है.’’

शादी के पहले

आजकल शादी की औसत उम्र लड़कियों के लिए 25 से 35 के बीच हो गई है. दूसरी ओर खानपान और बदलते परिवेश में लड़केलड़कियों को 15 साल की उम्र में ही सैक्स का ज्ञान होने लगता है. 15 से 30 साल की आयुवर्ग की लड़कियों में नियमित पीरियड्स होने लगते हैं, जिस से उन में हारमोनल बदलाव होने लगते हैं. ऐसे में उन के अंदर सैक्स की इच्छा बढ़ने लगती है. वे इस इच्छा को पूरी तरह से दबाने का प्रयास करती हैं. उन पर सामाजिक और घरेलू दबाव तो होता ही है, कैरियर और शादी के लिए सही लड़के की तलाश भी मन पर हावी रहती है. ऐसे में सैक्स कहीं दब सा जाता है.

इसी आयुवर्ग के लड़कों में सैक्स के लिए जोश भरा होता है. कुछ नया करने की इच्छा मन पर हावी रहती है. उन की सेहत अच्छी होती है. वे हर तरह से फिट होते हैं. ऐसे में शादी, रिलेशनशिप का खयाल उन में नई ऊर्जा भर देता है. वे सैक्स के लिए तैयार रहते हैं, जबकि लड़कियां इस उम्र में अपनी इच्छाओं को दबाने में लगी रहती हैं.

30 के पार बदल जाते हैं हालात

महिलाओं की स्थिति: 30 के बाद शादी हो जाने के बाद महिलाओं में शादीशुदा रिलेशनशिप बन जाने से सैक्स को ले कर कोई परेशानी नहीं होती है. वे और्गेज्म हासिल करने के लिए पूरी तरह तैयार होती हैं. महिलाएं कैरियर बनाने के दबाव में नहीं होती. घरपरिवार में भी ज्यादा जिम्मेदारी नहीं होती. ऐसे में सैक्स की उन की इच्छा पूरी तरह से बलवती रहती है. बच्चों के होने से शरीर में तमाम तरह के बदलाव आते हैं, जिन के चलते महिलाओं को अपने अंदर के सैक्सभाव को समझने में आसानी होती है. वे बेफिक्र अंदाज में संबंधों का स्वागत करने को तैयार रहती हैं.

पुरुषों की स्थिति: उम्र के इसी दौर में पति तमाम तरह की परेशानियों से जूझ रहा होता है. शादी के बाद बच्चों और परिवार पर होने वाला खर्च, कैरियर में ग्रोथ आदि मन पर हावी होने लगता है, जिस के चलते वह खुद को थका सा महसूस करने लगते हैं. यही वह दौर होता है जिस में ज्यादातर पति नशा करने लगते हैं. ऐसे में सैक्स की इच्छा कम हो जाती है.

महिला रोग विशेषज्ञा, डाक्टर सुनीता चंद्रा कहती हैं, ‘‘हमारे पास बांझपन को दूर करने के लिए जितनी भी महिलाएं आती हैं उन में से आधी महिलाओं में बांझपन का कारण उन के पतियों में शुक्राणुओं की सही क्वालिटी का न होना होता है. इस का बड़ा कारण पति का मानसिक तनाव और काम का बोझ होता है. इस के कारण वे पत्नी के साथ सही तरह से सैक्स संबंध स्थापित नहीं कर पाते.’’

नौटी 40 एट

40 के बाद की आयुसीमा एक बार फिर शारीरिक बदलाव की चौखट पर खड़ी होती है. महिलाओं में इस उम्र में हारमोन लैवल कम होना शुरू हो जाता है. उन में सैक्स की इच्छा दोबारा जाग्रत होने लगती है. कई महिलाएं अपने को बच्चों की जिम्मेदारियों से मुक्त पाती हैं, जिस की वजह से सैक्स की इच्छा बढ़ने लगती है. मगर यह बदलाव उन्हीं औरतों में दिखता है जो पूरी तरह से स्वस्थ रहती हैं. जो महिलाएं किसी बीमारी का शिकार या बेडौल होती हैं, वे सैक्स संबंधों से बचने का प्रयास करती हैं.

40 प्लस का यह समय पुरुषों के लिए भी नए बदलाव लाता है. उन का कैरियर सैटल हो चुका होता है. वे इस समय को अपने अनुरूप महसूस करने लगते हैं. जो पुरुष सेहतमंद होते हैं, बीमारियों से दूर होते हैं वे पहले से ज्यादा टाइम और ऐनर्जी फील करने लगते हैं. उन के लिए सैक्स में नयापन लाने के विचार तेजी से बढ़ने लगते हैं.

50 के बाद महिलाओं में पीरियड्स का बोझ खत्म हो जाता है. वे सैक्स के प्रति अच्छा फील करने लगती हैं. इस के बाद भी उन के मन में तमाम तरह के सवाल आ जाते हैं. बच्चों के बड़े होने का सवाल मन पर हावी रहता है. हारमोनल चेंज के कारण बौडी फिट नहीं रहती. घुटने की बीमारियां होने लगती हैं. इन परेशानियों के बीच सैक्स की इच्छा दब जाती है.

इस उम्र के पुरुषों में भी ब्लडप्रैशर, डायबिटीज, कोलैस्ट्रौल जैसी बीमारियां और इन को दूर करने में प्रयोग होने वाली दवाएं सैक्स की इच्छा को दबा देती हैं. बौडी का यह सैक्स गणित ही पतिपत्नी के बीच सैक्स संबंधों में दूरी का सब से बड़ा कारण होता है.

डाक्टर मधु पाठक कहती हैं, ‘‘ऐसे में जरूरत इस बात की होती है कि सैक्स के इस गणित को मन पर हावी न होने दें ताकि सैक्स जीवन को सही तरह से चलाया जा सके.’’

रिलेशनशिप में सैक्स का अपना अलग महत्त्व होता है. हमारे समाज में सैक्स पर बात करने को बुरा माना जाता है, जिस के चलते वैवाहिक जीवन में तमाम तरह की परेशानियां आने लगती हैं. इन का दवाओं में इलाज तलाश करने के बजाय अगर बातचीत कर के हल निकाला जाए तो समस्या आसानी से दूर हो सकती है. लड़कालड़की सही मानो में विवाह के बाद ही सैक्स लाइफ का आनंद ले पाते हैं. जरूरत इस बात की होती है कि दोनों एक मानसिक लैवल पर चीजों को देखें और एकदूसरे को सहयोग करें. इस से आपसी दूरियां कम करने और वैवाहिक जीवन को सुचारु रूप से चलाने में मदद मिलती है.

खेल बजट से होगा क्या

अगले साल टोक्यो में होने वाले ओलिंपिक खेलों को देखते हुए वर्ष 2019-20 के अंतरिम बजट में सरकार ने खेल बजट के लिए 2216.92 करोड़ रुपए देने का ऐलान किया है यानी पिछली बार के 2,002.72 करोड़ रुपए के मुकाबले इस वर्ष खेल बजट 10 फीसदी बढ़ा है.

स्पोर्ट्स अथौरिटी औफ इंडिया यानी साई को 55 करोड़ रुपए अतिरिक्त दिए जाने की घोषणा की गई है. साई का बजट 395 करोड़ रुपए से बढ़ा कर 450 करोड़ रुपए किया गया है.

खिलाडि़यों के प्रोत्साहन के लिए 63 करोड़ रुपए से बढ़ा कर 89 करोड़ रुपए कर दिया गया. खिलाडि़यों को दी जाने वाली पुरस्कार राशि में भी बढ़ोतरी की गई है. पिछली बार 316.93 करोड़ रुपए की राशि थी लेकिन इस बार 411 करोड़ रुपए दिए जाने की घोषणा की गई है.

‘खेलो इंडिया’ राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत खेलों के विकास के लिए 50.31 करोड़ रुपए बढ़ाया गया यानी अब यह 550 करोड़ रुपए से 601 करोड़ रुपए कर दिया गया है. वहीं नैशनल स्पोर्ट्स फैडरेशन यानी एनएसएफ के पिछली बार 245.13 करोड़ रुपए के मुकाबले घटा कर इस बार फैडरेशन के लिए 245 करोड़ रुपए कर दिया गया है.

आम चुनाव के मोरचे पर फतह करने के मकसद से मोदी सरकार से अंतरिम बजट से यही उम्मीद थी. लोकलुभावन बजट में सब को थोड़ीथोड़ी रेवड़ी बांटी गई हैं. खेलों के विकास के लिए सरकार कितनी गंभीर है, यह तो दिखता है क्योंकि क्रिकेट को छोड़ हर खेल पिछड़ा हुआ है. राष्ट्रीय खेल हौकी तो बहुत पीछे छूट गया है. भारतीय फुटबौल टीम के कप्तान सुनील छेत्री ने भी चिंता जाहिर की है कि हम कहां खड़े हैं. हमें केवल सैफ कप जीतने पर खुश नहीं होना चाहिए. यहां पर सुनील छेत्री जमीनी बात कह रहे हैं.

भारत में फुटबौल की स्थिति ऐसी है कि विश्वकप में हम क्वालीफाई तक नहीं हो पाते. ऐसा लगता है कि फुटबौल पर सरकार ने बैन लगा रखा है. फुटबौल के अलावा जिम्नास्टिक, तैराकी, ऐथलैटिक्स आदि में भारत चीन, जापान, कोरिया आदि से बहुत पीछे है. हां, कुश्ती व कबड्डी में हम थोड़े बेहतर हुए हैं लेकिन चीन व जापान का मुकाबला फिर भी नहीं कर सकते.

युवाओं के इस देश में खेलों में युवा आगे नहीं आ रहे हैं. उन के पास इतने पैसे ही नहीं हैं कि वे खेलों को चुन सकें. घर की आर्थिक स्थिति खराब है. ऐसे में वे घर की स्थिति देखें या फिर अपना खेल. वे चुपचाप अपने सपने को खत्म कर रोजीरोटी के जुगाड़ में लग जाते हैं ताकि परिवार का पेट भर सकें.

इतनी बड़ी आबादी में इक्कादुक्का मांबाप अपने बच्चों को खेलने के लिए प्रोत्साहित तो करते हैं लेकिन जब ट्रेनिंग व लाखों रुपए की बारी आती है तो वे भी पीछे हट जाते हैं.

दरअसल, अब कोई भी खेल सस्ता नहीं रहा है. हर खेल के प्रशिक्षण के लिए लाखों रुपए खर्च होते हैं और जरूरी नहीं कि प्रशिक्षण समाप्त होने के बाद वह सैलेक्ट हो जाए क्योंकि यहां भी राजनीति बहुत है साहब.

इस में कुछ हद तक मातापिता की भी गलती मान सकते हैं क्योंकि वे भी वही पुराने ढर्रे को फौलो कर रहे हैं कि ‘पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब…’ इसलिए वे भी चाहते हैं कि बच्चे पढ़ेंलिखें और किसी सरकारी नौकरी में लग जाएं. जाहिर है ऐसे में यहां खेलों का विकास संभव नहीं लगता.

दूसरे देशों में स्कूल लैवल से ही बच्चों को खेलों की ट्रेनिंग दी जाती है. हमारे यहां तो स्कूलों में कबड्डी, खोखो या कभीकभार दौड़ करा कर औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं. शहरों के प्राइवेट स्कूलों में खेलों के साधन तो दिखते हैं पर मैदान नहीं. गांवकसबों में मैदान तो हैं पर उपकरण या पैसा नहीं. न कोच, न साधन, ऐसे में खेलों का विकास कैसे संभव है. पहले इन इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है.

सरकार को जिस खेल में पैसा दिखता है उसी पर वह ज्यादा जोर लगाती है. क्रिकेट, लौन टैनिस, बैडमिंटन आदि में सरकार भी मोटी रकम कमाती है, क्योंकि इन खेलों को बड़ीबड़ी कंपनियां स्पौंसर करती हैं. खिलाड़ी भी इस में मालामाल हो जाते हैं. इन के प्रचारप्रसार में भी मोटी रकम खर्च की जाती है.

ऐसा नहीं है कि बाकी खेलों में प्रतिभा की कमी है. गांवकसबों में प्रतिभाओं की कमी नहीं है पर इन प्रतिभाओं को निखारने वाला, चुनने वाला, देखने वाला व परखने वाला नहीं है.

बजट में रकम बढ़ा देने से कुछ नहीं हो सकता. कुछ करना है तो खेलों से राजनीति, दलाली और नौकरशाहों की दखलंदाजी, धांधलेबाजी को बंद करना होगा. बजट के पैसे भ्रष्टाचार और धांधलियों में कहां उड़ जाते हैं, पता ही नहीं चलता और इस में मुंह ताकता रहता है खेल और खिलाड़ी.

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