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टीवी बाजार के दोहन की मुश्किलें

भले ही बाजार में बच्चों के बहुत सारे गेम आ गए हैं, मल्टीप्लैक्स स्क्रीनों और डिजिटल खेल के साधनों में बढ़ोतरी हुई है, फिर भी बच्चों के बीच टीवी सब से अधिक लोकप्रिय है, क्योंकि डोरेमोन, पोकेमोन, टौम ऐंड जैरी, मोटूपतलू, छोटा भीम आदि कार्टून टीवी पर ही दिखाए जाते हैं.

बच्चों के बीच इन कार्यक्रमों का आकर्षण जबरदस्त है. इन की लोकप्रियता इतनी है कि कुछ बच्चे इन्हें देखे बिना खाना तक नहीं खाते हैं. अगर पेरैंट्स उन्हें ऐसा करने से रोकने की हिमाकत करता है तो दिनभर उन्हें बच्चों की नाराजगी झेलनी पड़ती है. कार्यक्रम की थीम के हिसाब से ऐनिमेशन व कार्टून किड्स चैनलों में सब से लोकप्रिय हैं, जबकि गैरकिड्स चैनलों में फिल्म को 40 प्रतिशत और सीरियल को 39 प्रतिशत लोग देखना पसंद करते हैं. विज्ञापनदाता बच्चों के मनोविज्ञान को बखूबी समझते हैं, इसलिए बच्चों के कार्यक्रमों के बीच बच्चों की पसंद के विज्ञापन देना उन की प्राथमिकताओं में शामिल है.

बार्क इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, टीवी से सब से ज्यादा प्रभावित होने वाले दर्शक वर्ग में 2 से 14 साल के बच्चे हैं, जिन की संख्या कुल दर्शकों के लगभग 20 प्रतिशत है जो सभी वर्ग के दर्शकों में सब से ज्यादा है. इस वजह से विज्ञापनदाताओं के लिए बच्चों की अहमियत बढ़ जाती है. उन के लिए बच्चों की दुनिया के मनोविज्ञान को समझना सब से ज्यादा जरूरी हो जाता है. विज्ञापनदाता ऐसे उत्पादों का विज्ञापन करना चाहते हैं, जो बच्चों को पसंद हों या वे बच्चों को आसानी से अपनी ओर आकर्षित कर सकें.

बार्क इंडिया की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सभी बच्चे किड्स चैनल नहीं देखते हैं. रिपोर्ट के अनुसार, कुछ बच्चे गैरकिड्स चैनल भी देखते हैं, क्योंकि भारतीय परिवारों में एकसाथ टीवी देखने का चलन है. चूंकि गैरकिड्स चैनल में मनोरंजन और फिल्म चैनल शामिल हैं, सो ऐसे कार्यकर्मों को देखने वाले दर्शकों की संख्या ज्यादा है. हालांकि, इस मामले में बार्क इंडिया की रिपोर्ट से पूरी तरह से इत्तफाक रखना मुश्किल है, क्योंकि बच्चे मजबूरी में ही फिल्म या टीवी सीरियल देखते हैं. उन की पहली पसंद किड्स कार्यक्रम ही हैं. आजकल तो ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले बच्चे भी कार्टून कैरेक्टर से अच्छी तरह वाकिफ हो गए हैं.

विज्ञापनदाता यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि बच्चों को किड्स चैनल ज्यादा पसंद हैं, इसलिए वे मनोरंजन चैनलों के बजाय बच्चों की पसंद वाले विज्ञापन किड्स चैनल पर दे रहे हैं. गैरकिड्स चैनल पर विज्ञापन देना उन की दूसरी पसंद है, क्योंकि जो उत्पाद बच्चों को एक बार पसंद आ जाते हैं उन चीजों को वे अपने पेरैंट्स से जिद कर के हासिल कर ही लेते हैं.

बार्क इंडिया की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कार्टून देखने वाले बच्चों में छोटी लड़कियों की संख्या लड़कों के मुकाबले लगभग आधी है. इसलिए विज्ञापनदाता लड़कों और लड़कियों दोनों की पसंद का खयाल रख रहे हैं. रिपोर्ट से यह भी पता चला है कि पुरुष और महिला दर्शक टीवी के कार्यक्रम देखने में औसतन 25 मिनट का समय देते हैं, जिस में पुरुष दर्शकों की संख्या महिला दर्शकों से लगभग 50 प्रतिशत ज्यादा है. इसलिए विज्ञापनदाता पुरुषों की पसंद वाले विज्ञापन ज्यादा देते हैं.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बच्चों में लड़के मनोरंजन, फिल्म और खेल देखना ज्यादा पसंद करते हैं, जबकि लड़कियां भक्ति, संगीत, लाइफस्टाइल, कला व संस्कृति और संगीत ज्यादा पसंद करती हैं. बच्चे आमतौर पर वयस्कों के व्यवहार की नकल करते हैं. इसलिए पुरुषों की पसंद की नकल भी किड्स के कार्यक्रमों में देखने को मिलती है. इस रिपोर्ट के मुताबिक, दिन में बच्चे सब से ज्यादा टीवी देखते हैं. शाम 6 बजे के बाद टीवी देखने वालों में बच्चों की संख्या कम हो जाती है. इस अवधि में वे या तो परिवार के लोगों के साथ टीवी देख रहे होते हैं या फिर उन का रिमोर्ट उन के हाथ में नहीं होता है. विज्ञापनदाता इस सचाई को जानते हैं, इसलिए वे बच्चों की पसंद के विज्ञापन दिन के कार्यक्रमों में दिखाना ज्यादा पसंद करते हैं.

हिंदी के कार्यक्रमों को तरजीह

टीवी चैनलों को 3 हिस्सों में बांटा जा सकता है. पहला किड्स, दूसरा मनोरंजन और तीसरा फिल्म. फिल्म पर आधारित सामग्री इस फेहरिस्त में सब से अधिक है. लेकिन किड्स चैनल को सीरियल की सामग्री प्रभावित नहीं करती है, लेकिन गैरकिड्स चैनल में सीरियल का सब से ज्यादा प्रभाव होता है और अवधि का अनुपात भी अधिक है. शहरी क्षेत्र के बच्चे क्षेत्रीय भाषा के मुकाबले हिंदी और अंगरेजी की सामग्री को तरजीह देते हैं. लेकिन इंगलिश भाषा की सामग्री को देखना वे ज्यादा पसंद करते हैं. इस वजह से वयस्कों के मुकाबले बच्चे इंगलिश में कोई भी कार्यक्रम देखने में ज्यादा सहज होते हैं. हालांकि ग्रामीण क्षेत्र के बच्चे हिंदी या क्षेत्रीय भाषा में कार्यक्रम देखना ज्यादा पसंद करते हैं.

भारत दुनिया में सब से ज्यादा फिल्में बनाने वाला देश है और टैलीविजन की उपलब्धता व इंटरनैट बाजार के मामले में यह विश्व में दूसरे स्थान पर है. बेशक, भारतीय मनोरंजन का बाजार बहुत बड़ा है और इस बाजार में लगभग सभी लोगों की कमोबेश हिस्सेदारी है. यह अलग बात है कि भारतीय मनोंरजन बाजार से निवेशकों को विश्वभर में सब से कम कमाई होती है. हौलीवुड में फिल्मों में निवेश करने वाले, भारत से आधी से कम फिल्में बना कर, भारतीय फिल्म निवेशकों से लगभग 13 गुना ज्यादा कमाई करते हैं.

भारत के टीवी उद्योग में मार्जिन चीन और ब्राजील की छोटी कंपनियों से आधा है. टीवी को छोड़ कर भारत का 1,26,210 करोड़ रुपए का मनोरंजन उद्योग असंगठित है. वैसे, टीवी का बाजार कुछ हद तक संगठित है.

फिलहाल, भारत में अधिकांश कंपनियां विज्ञापनदाताओं या ग्राहकों के साथ मोलभाव नहीं कर पाती हैं. भारत में तीनचौथाई विज्ञापन का नियंत्रण 15 वैश्विक कंपनियों के हाथों में है, जो दरों को न्यूनतम स्तर पर रखने में यकीन करती हैं. वैसे टीवी के कार्यक्रमों को देखने के एवज में ग्राहकों से शुल्क वसूला जाता है लेकिन यह निवेश करने वाली कंपनियों तक पूरी तरह से पहुंच नहीं पाता है. इसी वजह से कौमकास्ट या लिबर्टी ग्लोबल जैसी बड़ी मीडिया कंपनियां भारत में निवेश करने में रुचि नहीं ले रही हैं, जबकि डिज्नी जैसी कंपनी कम कमाई की वजह से भारत में अपने कारोबार के आकार को कम करने में लगी है. हालांकि, टीवी मनोरंजन उद्योग से जुड़ी कंपनियां ऐसी स्थिति को बदलना चाहती हैं. फिलहाल, करीब एक दर्जन कंपनियां इन क्षेत्रों में अपने उत्पाद व सेवाएं मुहैया करा रही हैं और वे विज्ञापन दरों में इजाफा कर के व मनोरंजन की सामग्री को बेच कर राजस्व को बढ़ाना चाहती हैं.

वर्ष 2009 में स्थापित ड्रीम थिएटर उपभोक्ता उत्पादों से कमाई बढ़ा रही है. इसी नक्शेकदम पर विश्व की सब से बड़ी मीडिया कंपनियों में से एक वौल्ट डिज्नी ने भी अपनी कमाई बढ़ाई थी, लेकिन इस में मुश्किल यह है कि इस की कमाई में उपभोक्ता उत्पादों का योगदान महज 4.8 अरब डौलर या 8 प्रतिशत है. जाहिर है इस तरीके से बहुत ज्यादा कमाई नहीं की जा सकती है.

भारत में छोटा भीम के तौलिया, टीशर्ट्स, घडि़यां, गेम्स, खिलौने आदि उत्पादों के जरिए कमाई की जा रही है. फिर भी कहा जा सकता है कि टीवी पात्रों के उत्पाद बना कर अरबोंखरबों रुपए की कमाई की जा सकती है. बहरहाल, पाइरेसी सहित कई दूसरे कारणों से भारत में इस बाजार का पूरी तरह से दोहन नहीं हो पा रहा है. इस के बावजूद, ड्रीम थिएटर जैसी लगभग आधा दर्जन नई कंपनियां भारतीय बाजार में आ गई हैं, जो डिज्नी इंडिया, बेनेट कोलमैन और वायकौम 18 को टक्कर दे रही हैं.

वर्ष 2009 में अस्तित्व में आई क्वान मनोरंजन उद्योग के क्षेत्र में राजस्व के नए सोर्स पैदा करने में मदद कर रही है. हर साल लगभग 3,200 करोड़ रुपए का टर्नओवर करने वाली यह कंपनी आज मनोरंजन उद्योग के क्षेत्र में जानापहचाना नाम है. क्वान केवल रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण जैसे 115 प्रतिभाशाली लोगों का ही प्रतिनिधित्व नहीं करती, बल्कि यह प्रतिभाओं, सूचना और विभिन्न रचनात्मक प्रतिभाओं का सम्मिलन स्थल है. क्वान की तरह श्योरवेव्ज नाम की कंपनी भी वर्ष 2011 से नए राजस्व स्रोत सृजित करने में मदद कर रही है.

टीवी क्षेत्र का दायरा आमतौर पर एक क्षेत्र, एक राज्य या एक देश तक सीमित होता है, जिस के कारण यह प्रसारकों और छोटी केबल कंपनियों के लिए राजस्व का स्रोत बन जाता है. इस साल की शुरुआत में श्योरवेव्ज ने स्काईनैट शुरू किया था. स्काईनैट एक ऐसा प्लेटफौर्म है जो टीवी पर प्रोग्रामेटिक को लाने की कोशिश कर रहा है. प्रोग्रामेटिक का औनलाइन खूब इस्तेमाल होता है, जिस में वैबसाइटों पर तुरंत सौफ्टवेयर की मदद से विज्ञापन लगाए जाते हैं.

टीवी का महत्त्व

कहा जा सकता है मनोरंजन उद्योग में टीवी का महत्त्व मनोरंजन के दूसरे विकल्पों से कहीं ज्यादा है. वर्तमान में टीवी को कमाई के दृष्टिकोण से काफी मुफीद माना जा सकता है. भारत में टीवी की उपलब्धता गांवगांव में हो गई है और बिजली की समस्या अब कमोबेश देशभर में नहीं है. जहां बिजली की समस्या है वहां भी गांव वाले अक्षय ऊर्जा या बैटरी की मदद से टीवी देख रहे हैं. जैसेजैसे टीवी देखने वालों की संख्या बढ़ रही है, वैसेवैसे विज्ञापनों में दिखाए जा रहे उत्पादों की बिक्री भी बढ़ रही है. आज ग्रामीण क्षेत्र के बच्चे भी छोटा भीम का तौलिया या डोरेमोन की तसवीर वाली पैंसिल का इस्तेमाल कर रहे हैं. गांव के युवा भी बिग बौस देखना पसंद करते हैं. विज्ञापनदाता इस सचाई से वाकिफ हैं. इसलिए वे ऐसे मौके का बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं, जिस का उन्हें फायदा भी मिल रहा है.

मेथी पनीर बनाने की रेसिपी

सामग्री :

– पनीर (250 ग्राम)

– मेथी (250 ग्राम)

– टमाटर प्‍यूरी (1/2 कप)

– लाल मिर्च (01 नग)

– गरम मसाला (01 छोटा चम्मच)

– धनिया पाउडर (01 छोटा चम्मच)

– लाल मिर्च पाउडर (01 छोटा चम्मच)

– तेल (फ्राई करने के लिये)

– नमक (स्‍वादानुसार)

मेथी पनीर बनाने की विधि :

– सबसे पहले मेथी के पत्तों को धो लें.

– उसके बाद पत्तों को भाग में बराबर-बराबर बांट दें.

– अब एक भाग वाले पत्‍तों को उबाल लें.

– उबालने के बाद उन्हें मिक्‍सर में महीन पीस लें.

– बाकी बचे मेथी के पत्तों को बारीक काट लें.

– अब पनीर को मनचाहे टुकड़े में काट लें.

– फिर एक पैन में तेल गर्म करें और उसमें पनीर को फ्राई कर लें.

– फ्राई करने के बाद पनीर के टुकड़ों को पानी में भिगो दें.

– इससे पनीर के टुकड़े नरम हो जायेंगे.

– अब एक कढ़ाई में दो छोटे चम्मच तेल डाल कर गरम करें.

– तेल गरम होने पर उसमें लाल मिर्च डाल कर तल लें.

– तली हुई मिर्चों को बाहर निकाल कर रख दें.

– उसके बाद तेल में टमाटर की प्यूरी डालें और थोड़ा सा फ्राई कर लें.

– अब कढ़ाई में नमक, गरम मसाला पाउडर, धनिया पाउडर और लाल मिर्च पाउडर डालें और थोड़ा सा भून लें.

– जब मसाला अच्छी तरह से भुन जाए, कढ़ाई में पिसी हुई मेथी और मेथी की पत्‍तियों को डालें और     चलाते हुए पकायें.

– मेथी अच्छी तरह से भुन जाने पर कढ़ाई में पनीर के टुकड़े डालें.

– अब इसे धीमी आंच में 2-3 मिनट पकायें और फिर गैस बंद कर दें.

– स्वादिष्ट मेथी पनीर की सब्जी तैयार है, इसे गर्मा-गरम निकालें और रोटी या पराठों के साथ पेश करें.

आलू पनीर रेसिपी

आवश्यक सामग्री :

– पनीर (300 ग्राम)

– आलू (04 उबले हुए)

– दही (1/2 कप)

– मेथी पत्ती (1/2 कप सुखाई हुई)

– घी (01 बड़ा चम्मच)

– प्याज (02 नग कटी हुई)

– अदरक (1/2 इंच टुकड़ा)

– हरी मिर्च (03 नग बारीक कटी हुई)

– टमाटर (04 बारीक कटे हुए)

– लहसुन पेस्ट (2 छोटे चम्मच)

– धनिया पाउडर (1/2 छोटा चम्मच)

– लाल मिर्च पाउडर (1/2 छोटा चम्मच)

– काली मिर्च पाउडर (01 चुटकी)

– बादाम (10 कटे हुए)

– किशमिश (15-16)

– पिस्ता (10-15 कटे हुए)

– केसर (01 चुटकी भीगी हुई)

– हरी धनिया (01 बड़ा चम्मच कटी हुई)

– नमक (स्वादानुसार)

आलू पनीर बनाने की विधि

– सबसे पहले उबले हुए आलुओं को काट लें.

– इसके बाद पनीर को भी मनचाहे साइज़ में काट लें.

– अब एक बड़े बाउल में दही, सूखी मेथी, लाल मिर्च पाउडर, धनिया पाउडर, कटे हुए आलू और पनीर डालें   और मिक्स कर लें.

– एक फ्राई पैन में घी डाल कर गर्म करें.

– घी गर्म होने पर उसमें प्याज डालें और भून लें.

– प्याज भुन जाने पर पैन में कटी हुई हरी मिर्च, अदरक लहसुन पेस्ट डालें और थोड़ा सा भून लें.

– फिर उसमें कटे हुए टमाटर और नमक डालें और उसे चला कर 2 मिनट के लिये ढ़क दें.

– 2 मिनट के बाद पैन में दही का मिश्रण डाल दें और चलाते हुए तब तक पकायें, जब तक पैन चिकनाई न छोड़ने लगे.

– अब पैन में काली मिर्च पाउडर, सूखे मेवे, केसर और एक कप पानी मिलायें और उबाल आने तक चलाते हुए पका लें.

– अब आपका आपका आलू पनीर की सब्‍जी तैयार है. अब इसे हरी धनिया से गार्निश करें और फिर पराठे या रोटी के साथ गर्मा-गर्म सर्व करें.

कहीं कोई आपका नंबर ट्रैक तो नहीं कर रहा ? ऐसे करें पता

कई लोग अक्सर शिकायत करते हैं कि तुम्हारा नंबर हमेशा बिजी आता है. कभी कौल ही नहीं लगता. कई बार ऐसा भी होता है कि आपके नंबर पर कोई कौल करता है और फोन पहुंच से बाहर बताता है. ऐसे में हो सकता है कि आपके मोबाइल नंबर को दूसरे नंबर पर रिडायरेक्ट किया गया हो. तो चलिए आज हम आपको 4 USSD कोड बता रहे हैं जिनकी मदद से आप यह पता कर सकते हैं कि कहीं आपका फोन किसी के द्वारा ट्रैक तो नहीं किया जा रहा है?

कोड *#62#

कई बार आपका नंबर no-service या no-answer बोलता है. ऐसे में इस कोड को आप अपने फोन में डायल कर सकते हैं. इस कोड की मदद से आप जान सकते हैं कि आपका फोन किसी दूसरे नंबर पर री-डायरेक्ट किया गया है या नहीं. कई बार आपका नंबर औपरेटर के नंबर पर री-डायरेक्ट हो जाता है.

कोड *#21#

अपने एंड्रायड फोन में इस कोड को डायल करके आप यह जान सकते हैं कि आपके मैसेज, कौल या कोई और डाटा को कहीं दूसरी जगह डायवर्ट तो नहीं किया जा रहा है. अगर आपके कौल कहीं डायवर्ट किया जा रहा होगा तो इस कोड की मदद से नंबर सहित पूरा डिटेल आपको मिल जाएगा. वह नंबर भी पता चल जाएगा जिस पर आपका कौल डायवर्ट किया गया है.

कोड ##002#

यह एंड्रायड फोन के लिए एक ऐसा कोड है जिसकी मदद से आप किसी भी फोन के सभी फौरवर्डिंग को डी-एक्टिव कर सकते हैं. अगर आपको लगता है कि आपका कौल कहीं डायवर्ट हो रहा है तो आप इस कोड को डायल कर सकते हैं.

कोड *#*#4636#*#*

इस कोड की मदद से आप अपने फोन के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं. जैसे- फोन में कौन-बैटरी है, वाई-फाई कनेक्शन टेस्ट, फोन का मॉडल, रैम इत्यादि. बता दें कि इन कोड को डायल करने पर आपके पैसे नहीं कटेंगे.

इस वेबसाइट पर जाकर पता करें सबसे सस्ता मोबाइल प्लान

TRAI (टेलिफोन रेगुलेटरी अथौरिटी औफ इंडिया) ने मोबाइल और लैंडलाइन यूजर्स के लिए एक खास सर्विस पेश कर दी है. अब यूजर्स को अलग-अलग जगह जाकर कंपनियों के प्लान तलाशने के जरुरत नहीं पड़ेगी. इससे कई कंपनियों के प्लान की तुलना केवल ट्राई की वेबसाइट (https://tariff.trai.gov.in) पर जाकर कर सकते हैं.

ट्राई के इस कदम से कंपनियों के प्लान्स में ज्यादा पारदर्शिता आएगी और एक ही जगह पर ज्यादा से ज्यादा जानकारी मिल सकेगी. अभी सभी मोबाइल नेटवर्क कंपनियां अपनी-अपनी वेबसाइट्स पर अपने प्लान्स की जानकारी देती हैं. अभी ऐसा कोई सरकारी प्लेटफौर्म नहीं है जहां अलग अलग कंपनियों के प्लान्स की तुलना की जा सके.

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ऐसे करें तुलना : सबसे पहले ट्राई की वेबसाइट (https://tariff.trai.gov.in) पर जाएं. इसके बाद आपके सामने जो पेज खुलेगा, उसमें आपको कुछ डिटेल्स डालनी होंगी. सबसे पहले आप किसके लिए प्लान तलाश रहे हैं. यहां मोबाइल या लैंडलाइन सिलेक्ट करें. इसके बाद प्रीपेड या पोस्टपेड कैसा प्लान देख रहे हैं वह सिलेक्ट कर लें. इसके बाद सर्कल भरना होगा जैसे दिल्ली, मुंबई आदि. हालांकि अभी यह इसका बीटा वर्जन है और ट्रायल चल रहा है तो अभी केवल इसमें दिल्ली सर्कल ही आ रहा है. इसके बाद औपरेटर्स सिलेक्ट कर लें, जिनके प्लान की तुलना करना चाहते हैं. जैसे JIO, Airtel, Idea, Vodafone आदि.

इसके बाद टेरिफ सिलेक्ट कर लें कि कौन से टेरिफ की तुलना करना चाहते हैं. फिर कितने रुपए से लेकर कितने रुपए के बीच में प्लान तलाश रहे हैं यह भर दें. इसके बाद किस तरह का डेटा (2G, 3G, 4G) आपको डेटा चाहिए और कितना चाहिए यह भर दें. इसके बाद कितने दिन की वैधता का प्लान आपको चाहिए यह भर दें. आपको प्लान में अगर अनलिमिटेड कौलिंग भी चाहिए तो यह भी भर दें. आपको अगर डेली डेटा वाला प्लान चाहिए तो यह भी भर दें कि रोजाना आपको कितने डेटा की जरुरत है.

अब इसके बाद सबसे नीचे आ रहे सबमिट पर क्लिक करें. इस पर क्लिक करते ही एक पौपअप विंडो खुलकर आपके सामने आएगी. इसमें आपके द्वारा भरी गई सभी जानकारी होंगी अगर सभी जानकारी ठीक हैं तो कन्फर्म पर क्लिक कर दें. अब आप जिन प्लान्स की तलाश कर रहे हैं वो आपके सामने होंगे. हालांकि अभी सभी कंपनियों के प्लान्स नहीं आ रहे हैं केवल Airtel के प्लान्स ही आ रहे हैं.

आम चुनाव 2019 सीरीज (पार्ट-3) : जनता जाने सरकार का लेखाजोखा

वर्ष 2014 के आम चुनाव में बहुमत से जीती भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनाई. अब वर्ष 2019 आ गया. पिछले चुनावी मैनिफैस्टो में भाजपा ने जो वादे किए थे, सरकार बनाने के बाद उन की अनदेखी की जाती रही. कुछ राज्यों, जिन में 3 भाजपाशासित प्रदेश भी शामिल हैं, की विधानसभाओं के लिए हुए हालिया चुनावों में भाजपा को मिली करारी हार से तो यही लगता है कि मतदाताओं का मूड 2014 जैसा नहीं है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली भाजपा सरकार में बीते 5 वर्षों में जनता के हित में क्या हुआ और क्या नहीं, इस की पड़ताल करती ‘सरिता’ की मुहिम जारी है. पिछले अंक में आप ने देश में भुखमरी से हुई मौतें, देश में बढ़ते कुपोषण के आंकड़े, जर्जर स्वास्थ्य सेवाओं वाला बीमार भारत देखा. इस अंक में हम मोदी राज में बेहाल शिक्षा व्यवस्था, खस्ताहाल सार्वजनिक परिवहन, खटारा सड़कों की वजह से दुर्घटनाओं में बढ़ोतरी और रेल हादसों से रूबरू होंगे.

जर्जर प्राथमिक शिक्षा

कुछ महीने पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्राथमिक शिक्षा से जुड़ा एक महत्त्वपूर्ण व ऐतिहासिक फैसला दिया था. हाईकोर्ट ने कहा था कि उत्तर प्रदेश के राजनेताओं, सरकारी अफसरों, कर्मचारियों और जजों को अपने बच्चों को सरकारी प्राइमरी स्कूलों में पढ़ाना होगा.

हाईकोर्ट ने ऐसा फैसला देश की जर्जर हो चुकी प्राथमिक शिक्षा को देखते हुए दिया था. उन स्कूलों की दुर्दशा को देखते हुए दिया था जहां देश के 70 फीसदी गरीब बच्चे पढ़ते हैं. वे वहां क्या पढ़ते हैं, कैसे पढ़ते हैं, पढ़ते हैं कि नहीं पढ़ते, ये बातें जब अदालत के संज्ञान में आईं, तब उस ने यह फैसला दिया कि अमीर और रसूखदार लोग अपने बच्चों को पब्लिक स्कूलों में पढ़ाने के बजाय देश के सरकारी स्कूलों में पढ़ाएं.

अदालत की सोच थी कि जब अमीरों और राजनेताओं के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ने लगेंगे, तब स्कूलों की जर्जर हालत में सुधार आएगा और इस का लाभ गरीब बच्चों को मिलेगा. लेकिन किसी अमीर ने, किसी नेता ने, किसी अधिकारी ने अपने बच्चे को वहां पढ़ने के लिए नहीं भेजा और न ही भेजेंगे क्योंकि देश की प्राथमिक शिक्षा का हाल बेहाल है.

गांवदेहातों में सरकारी स्कूलों की बिल्डिंग के नाम पर आज भी कई जगहों पर जर्जर ढांचे खड़े हैं, जो कब बच्चों के सिर पर ढह जाएं, पता नहीं. उन में बैठने के लिए बैंचकुरसी तक नहीं हैं. बच्चे आज भी बैठने के लिए घर से टाटपट्टियां ले कर आते हैं. ढहती दीवारों के डर से टीचर बाहर खुले में पेड़ों के नीचे क्लास लगाते हैं. शौचालयशौचालय की रट प्रधानमंत्री लगाते रहे, मगर आज भी तमाम स्कूलों में शौचालय नहीं हैं. मिडडे मील के नाम पर बच्चों को सिर्फ खिचड़ी और दलिया मिल रही है, जबकि सरकारी खजाने से दूध, फल, सब्जी के लिए करोड़ों रुपए निकाले जा रहे हैं.

हाईकोर्ट के फैसले पर यदि मोदी के मंत्री, सांसद भले ही अपने बच्चों को पढ़ने के लिए देश के सरकारी स्कूलों में न भेजते, मगर इतना ही सम्मान कर लेते कि स्कूलों की दशा सुधारने की दिशा में कोई ठोस योजना बन जाती, स्कूलों का मुआयना होता, शिक्षकों के खाली पड़े पदों पर नियुक्तियां हो जातीं, तो गरीब के बच्चे को भी शिक्षा पाने में सहूलियत हो जाती.

मगर मोदीराज के बीते पौने 5 सालों में ऐसा कोई काम नहीं हुआ. उलटे, उत्तर प्रदेश में जिस अध्यापक शिव कुमार ने प्राथमिक शिक्षा की जर्जर हालत की तरफ इलाहाबाद हाईकोर्ट का ध्यान खींचा था, जिस ने अदालत में याचिका दाखिल की थी, उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने उस अध्यापक को नौकरी से बरखास्त कर दिया.

सिर्फ उत्तर प्रदेश में नहीं, बल्कि पूरे देश में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति बेहद चिंताजनक है. हर बच्चे को शिक्षा प्रदान करने की जिम्मेदारी केंद्र और राज्य सरकारों की है, मगर शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के 9 वर्षों बाद भी देश में प्राथमिक शिक्षा का हाल दुरुस्त नहीं हुआ है, बल्कि मोदी राज में स्थिति और बदतर हुई है. बीते दिनों उत्तर प्रदेश के प्राथमिक शिक्षा केंद्रों से जुड़ी कई खबरें टीवी चैनलों पर छाई रहीं, जहां कक्षा 5 का विद्यार्थी अपना नाम तक नहीं लिख पाता है. वह गणित का साधारण जोड़घटाना नहीं कर सकता, हिंदी व इंग्लिश के अक्षरों को नहीं पहचान सकता.

शिक्षा : व्यवस्था में छेद

ऐनुअल स्टेटस औफ एजुकेशन रिपोर्ट – 2017 में देश के 24 राज्यों के 28 जिलों के आंकड़े शामिल किए गए हैं. यह रिपोर्ट कहती है कि ग्रामीण क्षेत्र के 21 प्रतिशत बच्चों को यह भी नहीं पता है कि उन के राज्य का नाम क्या है. सर्वेक्षण में पाया गया कि 57 प्रतिशत बच्चे साधारण गुणाभाग तक नहीं जानते.

बच्चों की बात छोडि़ए, वहां पढ़ाने वाले शिक्षकों की इतनी शिक्षा नहीं है कि वे बच्चों को उचित शिक्षा दे सकें, न कोई ट्रेनिंग, न कोई अनुभव. सिर्फ तनख्वाह पाने और टाइमपास करने के लिए वे आते हैं स्कूलों में.

गांव के प्राथमिक स्कूलों में टीचर बच्चों से अपने घर का काम करवाते हैं. शहरों के स्कूलों में भले कुछ पढ़ाई होती हो, हमारे गांवदेहातकसबों के सरकारी प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में पढ़ाई के नाम पर यही सब हो रहा है.

गरीब का बच्चा जब भूख से बिलबिलाता है तो स्कूल में मिलने वाली दलियाखिचड़ी के लालच में चला आता है और इंटरवल खत्म होते ही स्कूल से भाग खड़ा होता है. सच पूछिए तो मिडडे मील के लालच में ही ज्यादातर बच्चों के नाम स्कूलों में लिखाए जाते हैं, पढ़ाई करने के लिए नहीं. इन चीजों को देखने के लिए सरकार की ओर से कोई निरीक्षण प्रणाली विकसित नहीं की गई.

मोदी सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान के लिए हजारों करोड़ रुपए का बजट दिया, मगर यह पैसा कहां गया, कोई नहीं जानता क्योंकि सरकारी स्कूलों की दुर्दशा सब के सामने है. कहीं 200 बच्चों पर एक टीचर तैनात है तो कहींकहीं तो पूरा का पूरा विद्यालय शिक्षामित्र के सहारे चल रहा है. दिल्ली के ही प्राइमरी स्कूलों में नर्सरी कक्षाओं में डेढ़ सौ, दो सौ बच्चों पर एक शिक्षक है, जबकि मानक के अनुसार, 40 बच्चों पर एक शिक्षक होना चाहिए. ऐसे में क्या पढ़ाई और कैसी पढ़ाई?

देश में इस समय तकरीबन 13.62 लाख प्राथमिक विद्यालय हैं, परंतु इन में कुल 41 लाख शिक्षक ही तैनात हैं, जबकि देश में करीब 20 करोड़ बच्चों के नाम प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में दर्ज हैं. हालांकि, बच्चों की हाजिरी बहुत कम होती है. पूरे देश में करीब

1.5 लाख प्राथमिक विद्यालयों में 12 लाख से भी ज्यादा शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं. विकास का ढोल पीटने वाली मोदी सरकार बच्चों के भविष्य से कैसा खिलवाड़ कर रही है.

साक्षरता और शिक्षा के मामले में भारत की गिनती आज भी दुनिया के पिछड़े देशों में होती है. अगर हम अपने देश की तुलना आसपास के देशों से करें तो हम चीन, श्रीलंका, म्यांमार, ईरान से भी पीछे हैं. एसोचैम की एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि भारत यदि अपनी मौजूदा शिक्षा व्यवस्था में प्रभावशाली बदलाव नहीं करता है तो विकसित देशों की बराबरी करने में उसे 6 पीढि़यां लग जाएंगी यानी डेढ़दो सौ साल और.

भाजपा के सत्ता में आने के बाद 2014-2015 में सर्व शिक्षा अभियान के लिए 28,635 करोड़ रुपए आवंटित किए गए. वर्ष 2015-16 के बजट में 22 हजार करोड़ रुपए आवंटित हुए. करोड़ों रुपए सर्व शिक्षा अभियान के नाम पर निकल गए. कहां गया सारा पैसा? अगर प्राथमिक शिक्षा का स्तर सुधारने में इतना पैसा लगाया गया होता तो निश्चित ही देश के तमाम विद्यालय जगमगा रहे होते, वहां बच्चों के लिए बढि़या बिल्डिंग भी होती, कुरसीमेज, बिजली, पंखा, ब्लैकबोर्ड, किताबें, खेल का मैदान, शौचालय सबकुछ बन जाता, मगर नहीं बन पाया क्योंकि यह सारा पैसा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया.

हमारी सरकार शिक्षा व्यवस्था पर सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का सिर्फ 3.83 फीसदी हिस्सा खर्च करती है, जबकि अमेरिका 5.22 फीसदी, ब्रिटेन 5.72 फीसदी और जरमनी 4.95 फीसदी खर्च करता है और वहां यह पैसा सचमुच में बच्चों की पढ़ाई पर खर्च होता है. मगर हमारे यहां ज्यादातर भ्रष्टाचारियों की जेबों में चला जाता है.

सार्वजनिक परिवहन : खस्ताहाल

देश की एक बड़ी समस्या है परिवहन. आप सुबह काम के लिए घर से निकलें तो घंटों बस के इंतजार में खड़े रहना पड़ता है. लोकल ट्रेनें, मैट्रो और बसें यात्रियों से ठुंसी रहती हैं. सड़कें जाम से पटी पड़ी हैं, गड्ढों से भरी हुई हैं क्योंकि इन सड़कों पर सार्वजनिक वाहनों से कहीं ज्यादा निजी वाहनों का बोझ है.

नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने जनता को बुलेट ट्रेन का सपना दिखाया. इस परियोजना का फायदा देश की आम जनता को तो कतई नहीं होगा.

आम जनता को तो अपने रोजमर्रा के कार्य, औफिस या बाजार जाने के लिए बसें चाहिए, लोकल ट्रेनें, मैट्रो या सस्ते यातायात के साधन चाहिए, जिस को बढ़ाने की दिशा में मोदी सरकार ने बीते पौने 5 सालों में खास प्रयत्न नहीं किए.

आज इस देश में हर दिन औसतन 20 लोग सड़क हादसों में अपनी जान गंवा रहे हैं. दिल्ली में हर दिन सड़क हादसे में लगभग 3 जानें जा रही हैं. देशभर में सालाना करीब 1 लाख 35 हजार लोग सड़क हादसों का शिकार हो रहे हैं. सड़क दुर्घटनाओं का यह आंकड़ा दुनिया में सब से बड़ा है.

देश के सामने अपने नागरिकों की जान की हिफाजत की जिम्मेदारी में मोदी सरकार फेल हुई है.

चीन में एक हजार लोगों पर 6 बसें हैं, जबकि हमारे यहां 10 हजार लोगों के लिए 6 बसें. ऐसे में लोग बसों के दरवाजों पर न लटकें, छतों पर न बैठें तो क्या करें? कैसे पहुंचें अपने काम पर? आज सड़कों पर निजी वाहनों की संख्या 80 से 90 प्रतिशत है, जबकि सार्वजनिक वाहन मात्र 10 से 12 प्रतिशत ही हैं. जबकि निजी वाहन इस्तेमाल करने वाले मात्र 10 फीसदी लोग हैं और सार्वजनिक वाहन का इस्तेमाल देश की 80 फीसदी जनता करती है. यही वजह है कि बसों में, ट्रेनों में भयंकर भीड़ नजर आती है, जिस के चलते हर दिन सैकड़ों ऐक्सिडैंट होते हैं और लोगों की जानें जाती हैं.

छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में ओवरलोडेड, पुरानी व खटारा सड़कों पर बेतरतीब दौड़ती हैं. प्राइवेट और सरकारी बसों में यात्री ठूंसठूंस कर भरे जाते हैं. यात्रियों के बोझ से आधी झुकी ये बसें नियमों की परवा किए बगैर सड़कों पर दौड़ती हैं और दुर्घटनाग्रस्त होती हैं.

दिल्ली में डीटीसी के पास करीब 5 हजार 500 बसें हैं, जिन में से एक हजार बसें खराब पड़ी रहती हैं. साढ़े 4 हजार बसें दिल्ली वालों की जरूरत से बहुत कम हैं. दिल्ली को 11 हजार बसें चाहिए, मगर हैं आधी से भी कम. मुंबई और उस के आसपास के इलाकों में बसों का संचालन करने वाली बीईएसटी यानी बेस्ट के पास करीब 3 हजार 888 बसें हैं, जबकि मुंबई में 4,500 अतिरिक्त बसों की जरूरत है. देश के बड़े शहर जब बसों की किल्लत से जूझ रहे हैं, तो छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों का क्या हाल है, इस को समझना मुश्किल नहीं है.

अर्बन प्लानिंग के नियमों के मुताबिक, एक लाख लोगों की आबादी पर 40 बसें होनी चाहिए. लेकिन देश की राजधानी में ही एक लाख लोगों पर सिर्फ 28 बसें हैं. पूरे देश की बात करें तो 10 लाख की आबादी पर 131 बसें हैं, जबकि होनी चाहिए 500 बसें. अकेला कर्नाटक ऐसा राज्य है जहां 10 लाख की आबादी पर 393 बसें हैं, सब से बुरा हाल बिहार का है.

एक बस की उम्र औसतन 10 साल मानी जाती है. सड़क एवं परिवहन मंत्रालय की 2014-15 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार में 100 प्रतिशत बसें 10 साल से ज्यादा पुरानी हैं. पश्चिम बंगाल में करीब 68 प्रतिशत सरकारी बसें और तमिलनाडु में करीब 67 प्रतिशत बसें 10 साल से ज्यादा पुरानी हैं. भारत में सिर्फ पुणे महामंडल और पंजाब रोडवेज ऐसे ट्रांसपोर्ट निगम हैं, जिन के बेड़े में कोई भी बस 10 साल से पुरानी नहीं है. देश की ज्यादातर सरकारी बस संस्थाए नुकसान में चल रही हैं, चाहे वह डीटीसी हो या बेस्ट.

मोदी राज और रेल हादसे

सड़क सुरक्षा पर आधारित ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट में भारत की स्थिति सब से खराब है. यहां सड़क दुर्घटना में सब से अधिक मौतें होती हैं.

भारत सरकार के रिकौर्ड के अनुसार, 2016 में भारत में सड़क हादसों में करीब डेढ़ लाख (1,50,785) लोगों की मौतें हुईं. जिन में 85 फीसदी पुरुष और 15 फीसदी महिलाएं शामिल हैं. जबकि डब्ल्यूएचओ का दावा है कि 2,99,091 (करीब 3 लाख) लोगों ने सड़क हादसों में जान गंवाई है. जिस में मुख्यरूप से 5 से 14 साल के बच्चे और 15 से 29 साल के युवा हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि यही हाल रहा तो वर्ष 2020 तक भारत में होने वाली अकाल मौतों में सड़क दुर्घटना एक बड़ी वजह होगी. अनुमान के मुताबिक, तब प्रतिवर्ष 5 लाख 46 हजार लोग इस की वजह से मरेंगे.

रोड सेफ्टी ऐक्सपर्ट पीयूष तिवारी का कहना है कि भारत में हर साल करीब 3 लाख बच्चों की मौत हो जाती है. इस के 2 बड़े कारण हैं. पहला रोड इंजीनियरिंग डिजाइन का न होना और दूसरा, इमरजैंसी केयर का सही से प्रावधान न होना. नया मोटर व्हीकल अमेंडमैंट बिल राज्यसभा में फंसा हुआ है. जिस में पहली बार चाइल्ड सीट बैल्ट, एडल्ट अकाउंटिबिलिटी, स्कूल ड्राइवर, वैन ड्राइवर या फिर पेरैंट्स की बच्चों की सुरक्षा को लेकर ट्रेनिंग पर ज्यादा जोर दिया गया है.

20 अक्तूबर, 2018 यानी रामनवमी के दिन अमृतसर में रेल पटरियों पर खड़े हो कर रावण दहन देखने वाले लोगों को तेज गति से आती ट्रेन रौंदती हुई निकल गई. इस भयंकर हादसे में 61 लोगों की जानें चली गईं. मगर बीते पौने 5 वर्षों के कार्यकाल में रेल मंत्रालय ने रेल हादसों को रोकने की दिशा में एक भी कारगर कदम नहीं उठाया है.

मोदी सरकार में 15 ऐसे बड़े रेल हादसे हुए हैं जिन में हजारों जानें गईं. पौने 5 वर्षों के कार्यकाल में 2 रेल मंत्री आए, लेकिन फिर भी सिस्टम में सुधार नहीं आया. रेल हादसों को रोकने व बचाव की व्यवस्था बनाने के लिए कई समितियां और आयोग बन चुके हैं.

रेलवे के 1989 के कानून के पालन की जवाबदेही के लिए केंद्र सरकार जिम्मेदार है. रेलवे के परिचालन और सुरक्षा के लिए संसद द्वारा 1989 में बनाए गए कानून की धारा 151 और 153 के तहत लापरवाह अफसरों को 5 साल की सजा होनी चाहिए, मगर बीते पौने 5 सालों में देशभर में हुए तमाम हादसों के बावजूद किसी को सजा मिलते नहीं देखा गया. किसी विधायक, सांसद या मंत्री की जवाबदेही तय नहीं हुई. केंद्र और राज्यों के इंटैलिजैंस सिस्टम भी पूरी तरह फेल नजर आए. सच पूछिए तो मोदी राज में पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को वीआईपी ड्यूटी में लगा कर आम जनता को हादसों का शिकार बनने के लिए छोड़ दिया गया है.

शर्म आती है जब डिस्कवरी चैनल पर हम मुंबई की लोकल ट्रेनों में खचाखचभरी भीड़ के दृश्यों को देखते हैं और यात्रियों की परेशानियों पर अपना मनोरंजन करते हैं. विदेशी मीडिया हमें आईना दिखाता है कि देखो, कैसे तुम्हारे लोग ट्रेनों की छतों पर, खिड़कियों पर, दरवाजों पर लटके असुरक्षित यात्राएं कर रहे हैं,

कैसे तुम्हारी सरकार तुम्हारी जान से खेल रही है. लेकिन यह देख कर भी  हम न जागते हैं, न हमारी सरकार. हम आंखें मूंदे मोदीजी की बुलेट ट्रेन का सपना देख रहे हैं, आह!

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औक्सी ब्लीच का ऐसे करें इस्तेमाल

आपने औक्सी ब्‍लीच के फायदों के बारे में तो सुना ही होगा. आप बेहद अच्छी तरह से जानती हैं कि औक्‍सी ब्‍लीच एक प्री ब्‍लीच क्रीम है जो कि त्‍वचा की कोशिकाओं को औक्‍सीजन प्रदान करती है और उसे पोषण देती है. इसलिए हमने भी सोचा कि क्‍यों ना आज आपके साथ औक्‍सी ब्‍लीच को प्रयोग करने की विधि और उसके फायदों के बारे में जानकारी बांट ली जाए. तो आइये जानते हैं इसके बारे में.

क्‍या हैं फायदे औक्‍सी ब्‍लीच के?

  1. इसके साथ मिलने वाली प्री ब्‍लीच क्रीम चेहरे की टैनिंग हटाती है और चेहरे को जलने से भी बचाती है.
  2. यह 10 मिनट में त्‍वचा को ब्‍लीच कर देती है और ऐसा निखार लाती है कि आप के होश खो जाएं.
  3. इस क्रीम की कीमत भी खुद के बजट में होती है.

औक्‍सी ब्‍लीच कैसे प्रयोग करें?

  1. औक्‍सी ब्‍लीच के पैक में ब्‍लीच क्रीम, हाइड्रोजन पेराऔक्‍साइड और परसल्‍फेट होता है.
  2. इसको लगाने से पहले एक पैच टेस्‍ट लीजिये, जिसके लिये अपनी बाहों में थोड़ी सी ब्‍लीच क्रीम लगाइये. अगर कोई जलन, लाल चकत्‍ते दिखें तो यह क्रीम आपकी त्‍वचा के लिये अच्‍छी नहीं है.
  3. ब्‍लीच क्रीम में चुटकी भर एक्‍टीवेटर मिलाएं. इसे तकरीबन 2 मिनट के लिये मिलाएं और फिर चेहरे पर लगाएं, लेकिन आंखों की पलकों पर इसे ना लगाएं.
  4. 10 मिनट के बाद अपने चेहरे को पानी से धो लें. सनस्‍क्रीन लगाना बिल्‍कुल ना भूलें.
  5. अपने चेहरे को धोने के लिये एक कम कैमिकल वाला साबुन चुने, जो कि अच्‍छी क्‍वालिटी वाला हो.
  6. क्‍लींजिग, टोनिंग, माइस्‍चराइजिंग हर हफ्ते चेहरे की सफाई के लिये प्रयोग किये जाने वाले तरीके हैं.

अनजान शहर में मकान की तलाश

वैशाली ने एमबीए की पढ़ाई करने के लिए एक बड़े शहर के कालेज में ऐडमिशन लिया. वह शहर उस के लिए अनजान था. शुरुआत में वह एक हफ्ते होटल में रुकी. इस बीच उस ने स्थानीय अखबार में विज्ञापन दिया कि एक कमरा व किचन वाला फ्लैट किराए पर चाहिए. उस के पास कई मकानमालिकों के फोन आए. इन में से कालेज के नजदीक वाले मकान को उस ने पसंद किया.10 हजार रुपए मासिक किराया तय हुआ.

उस मकान में तमाम सुविधाएं तो थीं, लेकिन मकानमालिक के दोनों लड़कों का चरित्र अच्छा नहीं था. वे वैशाली से नजदीकी बढ़ाना चाहते थे. जब वैशाली ने उन्हें लिफ्ट नहीं दी, तो दोनों ने उसे अकसर परेशान करना शुरू कर दिया. उस के बाद वैशाली ने उस मकान को छोड़ दिया.

मीनल अविवाहित है. पिछले वर्ष उस की सरकारी नौकरी उस शहर में लगी जिसे उस ने कभी देखा नहीं था, और न ही वहां उस का कोई सगासंबंधी था. नौकरी जौइन करते ही उस ने अपने सहकर्मियों से मकान तलाशने को कहा. एक सहकर्मी ने उसे अपने मकान में एक कमरा देने की पेशकश की, तो वह तैयार हो गई. उसे मालूम नहीं था कि जहां वह मकान है, वह बदनाम महल्ले के करीब है. ऐसे में लोग उसे चरित्रहीन मानने लगे और उस पर कमैंट करने लगे. मजबूर हो कर उसे वह घर छोड़ना पड़ा.

जब कोई लड़की या महिला अपनी पढ़ाई या नौकरी की वजह से अनजान शहर में जाती है तो जरूरी नहीं कि वहां उस का कोई परिचित, रिश्तेदार हो जो मकान ढूंढ़ने में उस की मदद कर सके. ऐसे में जहां शहर और लोग दोनों अजनबी हों, मकान ढूंढ़ पाना बड़ा कठिन होता है. यदि मिल भी जाए, तो वह हर तरह से सुरक्षित होना चाहिए, वरना खतरों से घिरा मकान लेने से कभी भी कुछ भी हादसा हो सकता है.

कई बार महिलाएं जल्दबाजी में गलत मकान को चुन लेती हैं. सोचती हैं कि जब कोई अच्छी जगह मिल जाएगी तो बदल लेंगी.

ऐसा न करें चूंकि आप को वहां अकेली रहना है, इसलिए सोसायटी या महल्ला अच्छा होना चाहिए. गुंडेमवालियों की सोसायटी में चाहे जितना सस्ता मकान मिले, नहीं लेने में ही भलाई है. हाई सोसायटी वाली जगह किराया भले ही अधिक होता है, लेकिन वहां रहना सुरक्षित होता है.

आप को किसी भी कालोनी में मकान तलाशने के पहले उस कालोनी के बारे में पता लगा लेना चाहिए कि वहां किस तरह के लोग रहते हैं. वहां महिलाओं के लिए माहौल कैसा है? वह सुरक्षित है या नहीं. इसी प्रकार, यह पता लगा लें कि उस जगह के लोग चोर, उचक्के, झगड़ालू प्रवृत्ति के तो नहीं हैं.

यदि आप पढ़ाई की वजह से अनजान शहर में जा रही हैं तो उस कालोनी में मकान लें जहां से आप का कालेज नजदीक हो, आनेजाने के साधन हों. यदि आप अपने वाहन से जाना चाहें तो बात अलग है.

किराए पर मकान लेते समय पहली बार में ही सभी बातों को खुलासा कर लें. मसलन, किराया कितना होगा, एडवांस कितने महीनों का देना होगा, किराए में कौनकौन सी सुविधाएं शामिल होंगी. इस के अलावा, मकानमालिक से शर्तें भी पूछ लें. कई बार मकानमालिक अपने किराएदारों पर कई तरह के प्रतिबंध लगाते हैं, जैसे रात 10 बजे के बाद दरवाजे नहीं खोलते. कुछ मकानमालिकों को अकेली रह रही लड़कियों या महिलाओं के कमरे में लड़कों या पुरुषों का आना रास नहीं आता. सो, किराए का मकान लेने से पहले हर बात पर गौर कर लें ताकि बाद में पछतावा न हो.

राहुल का इनकम वादा

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने चुनाव जीतने पर देश के सभी गरीबों को मिनिमम गारंटेड इनकम यानी शर्तिया न्यूनतम आमदनी का वादा कर के वही किया है जो नरेंद्र मोदी ने 2014 के चुनाव के दौरान 15 लाख रुपए हरेक के अकाउंट में डालने की बातें घुमाफिरा कर कह कर किया था. इस तरह के चुनावी वादे असल में सड़क पर दवा या अंगूठी बेचने वालों के वादों ‘शर्तिया नामर्दी दूर होगी’, ‘धन टपकेगा’, ‘सारे कष्ट दूर होंगे’, ‘शराब से छुटकारा मिलेगा’, ‘प्रेमिका वश में आ जाएगी’ जैसे होते हैं.

जेब से थोड़े से पैसे गए या वोटिंग के दिन वोट गया, उस के बाद कौन पूछता है कि वादे का क्या हुआ? यह वादा, वैसे, पूरा करना असंभव नहीं है. जीने के लिए एक आम भारतीय को बहुतकुछ नहीं चाहिए होता, इसीलिए हमारी जनसंख्या इतनी बड़ी है. यहां की उपजाऊ जमीन खानेभर को कुछ न कुछ दे ही देती है. न्यूनतम आय का वादा पूरा करना, जीतने के बाद कांग्रेस के लिए यह कहना मुश्किल न होगा. मुख्य सवाल तो यह है कि कांग्रेस जीतेगी या नहीं.

देश की बड़ी जनता आज भी पंडों, संतों की सुनती है जो भाजपा के राज में अपना सुखमय भविष्य देखते हैं. उन की जो मौज इस राज में हो रही है, वह पहले नहीं होती थी. केवल पुराणों में ही इस का जिक्र है. निठल्लों को संत या जनता का मार्गदर्शक मान लेना, इस देश की बुरी हालत के लिए जिम्मेदार है. यहां तो पढ़ेलिखे भी तथाकथित चमत्कारों में भरोसा कर रहे हैं और लोगों को अपने पर कम, ऊपरवाले पर भरोसा ज्यादा है चाहे वह भाजपा का प्रधानमंत्री हो, कांग्रेस का. जब लोगों को अपने पर विश्वास न हो और वे सोचते हों कि अनाज खेतों में, सामान कारखानों में दैविक कृपा से पैदा होता है, तो उन के बीच इस तरह के वादे कारगर होते ही हैं.

राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी की किताब का पन्ना ले कर उन्हीं के चेहरे पर चिपका दिया है. वैसे, कई देशों में इस तरह की सुविधा है पर उन देशों में लोग मेहनत को महत्ता देते हैं और मुफ्त का खाना खाना अपमान समझते हैं. यूरोप से जो लोग उजाड़बंजर अमेरिका, आस्ट्रेलिया या अफ्रीका गए थे उन्होंने केवल अपनी मेहनत से उन जगहों को उपजाऊ बनाया जहां पत्थर या रेत ही थी.

उन्हें अपनी मेहनत पर भरोसा था. भारत के सैकड़ों गुजराती, दक्षिण भारतीय खाली हाथ विदेश गए थे और एक पीढ़ी में ही अमीर हो गए थे. उन्हें किसी ने मिनिमम इनकम गारंटी नहीं दी थी. जरूरत तो यह है कि देश की जनता को दुगनातिगुना काम करने के लिए उकसाया जाए. पर हम हर समय प्रार्थना करते नजर आते हैं कि ऊपर वाले दे, हे भगवान दे, हे राम दे, हे जयशंकर दे. और इसी लहजे में कहते हैं, हे नरेंद्र मोदी दे, हे राहुल गांधी दे. यह निर्भरता असल में हमारी कमजोरी की निशानी है. यही हमारी गुलामी, गरीबी औरी गंदगी का कारण है. राहुल गांधी इस वादे से चुनाव जीत पाएंगे या नहीं, लेकिन देश को निकम्मा बनाए रखने के पुनीत कार्य में उन्होंने अपनी आहुति तो दे ही दी है.

पाएं रूसी से छुटकारा

आजकल बालों में रूसी होना बेहद आम बात हो गई है. अक्सर हम सभी इससे निपटने के लिए अपने बालों पर केमिकल्स और शैम्पू का प्रयोग करते हैं और इससे हमें केवल अस्थायी तौर पर ही आराम मिलता है. नीचे कुछ प्राकृतिक उपाय दिए गए हैं जिनके द्वारा आप रूसी से छुटकारा पा सकते हैं.

ऐप्पल सीडर विनेगर : ऐप्पल सीडर विनेगर की अम्लीयता के कारण आपके सिर की त्वचा का पी एच बदल जाता है जिसके कारण फंगस बढ़ नहीं पाती. इससे रूसी कम होती है.

नारियल का तेल: 3 – 5 चम्मच नारियल का तेल बालों में लगायें तथा रात भर इसे ऐसे ही रहने दें. दूसरे दिन किसी कोमल शैम्पू से बाल धो लें.

नींबू: दो टेबलस्पून नींबू का रस अपने सिर की त्वचा पर लगायें और पानी से धो डालें. फिर एक चम्मच नींबू के रस को एक कप पानी में मिलाएं तथा शैम्पू करने के पश्चात इस पानी से सिर धो लें. नींबू के रस वाला पानी सबसे आख़िरी में डालें. नींबू की अम्लीयता के कारण आपके सिर की त्वचा का पी एच बैलेंस होता है जिससे रूसी नहीं होती. इन्‍हें खा कर दूर कीजिये सिर की रूसी

लहसुन: लहसुन में एंटी फंगल गुण होते हैं जो रूसी पैदा करने वाले बैक्टीरिया को दूर करते हैं. बालों को धोने से पहले अपने सिर की त्वचा पर पिसे हुए लहसुन और शहद से मालिश करें.

बेकिंग सोड़ा: अपने बालों को गीला करें और अपने सिर की त्वचा पर बेकिंग सोड़ा मलें. शैम्पू का उपयोग न करें. बेकिंग सोड़ा के कारण फंगस कम हो जाती है जिससे रूसी भी कम हो जाती है.

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