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जलेबी बनाने की रेसिपी

सामग्री :

– मैदा 2 कप (200 ग्राम)

– शक्कर 02 कप (400 ग्राम)

– ख़मीर (1/2 छोटे चम्मच)

– रंग ( 1/2 छोटा चम्मच)

– केसर ( 01 चुटकी)

– रिफाइंड तेल (तलने के लिये)

जलेबी बनाने की विधि :

– सबसे पहले ख़मीर को 1/2 कप गुनगुने पानी में 10 मिनट के लिये भिगो दें.

– ख़मीर भीगने के बाद एक बर्तन में मैदा, रंग और ख़मीर का घोल डालें, और पानी की सहायता से घोल   लें.

– इसके बाद घोल को ढ़क कर 10-12 घंटे के लिये रख दें.

– 0-12 घंटे में मैदे के घोल में खमीर उठ आयेगा.

– अब चाशनी की तैयारी कर लें, चाशनी के लिए शक्कर में 02 कप पानी डालें और फिर इसे गैस पर गर्म     करें.

– जब पानी में शक्कर पूरी तरह से घुल जाये, इसमें केसर मिला दें.

– इसके बाद इसे धीमी आंच पर 2 मिनट तक पकने दें, इसके बाद गैस बंद कर दें.

10% अगड़ों को आरक्षण, सामाजिक विभाजन कायम रखने का हिंदू एजेंडा

संसद में सवर्णों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का बिल पारित करा कर वर्णव्यवस्था की समर्थक भाजपा सनातनी जाति व्यवस्था के रूप को कायम रखने में कामयाब रही है.

‘आरक्षण हटाओ, देश बचाओ’ का नारा लगाने वाले सवर्ण अचानक इस निर्णय से खुशी से झूम उठे हैं पर असल में यह फैसला पहले से विभाजित समाज में एक और सामाजिक वर्गीकरण है. अब सवर्णों में गरीबों की एक दलित जाति बना दी गई है. तय है कि सवर्णों में भेदभाव की एक और दीवार खड़ी दिखाई देगी.

बिना किसी होहल्ले के सरकार अचानक गरीब अगड़ों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव ले कर आई और अगले 3 दिनों में उसे लोकसभा व राज्यसभा से बिना किसी विरोध के पारित करवा लिया. बिल भारी बहुमत से पास हुआ. लोकसभा में बिल के पक्ष में 323 वोट और विपक्ष में मात्र 3 वोट पड़े जबकि राज्यसभा में पक्ष में 165 और विपक्ष में 7 वोट ही पड़े. जाहिर है, लगभग सभी विपक्षी दलों ने इस बिल का समर्थन करने का फैसला किया ताकि कल उन पर कोई आरोप न लगे.

लोकसभा चुनावों से 3 महीने पहले आए सरकार के इस फैसले को कहने को सवर्ण वोटों को खुश करने के रूप में देखा जा रहा है पर यह उस का सनातनी एजेंडा है जो सवर्णों को खुश करने के लिए भी लौलीपौप का काम करेगा.

इस आरक्षण से सामाजिक भेदभाव की खाई पटने के बजाय और चौड़ी हो जाएगी. गरीब अगड़ों के आंकड़ों के बिना संसद में पारित किया गया यह बिल पहले से जारी जातिव्यवस्था के शिकार वर्गों के आरक्षण को खत्म करने और जातियों की खाई को और बढ़ाने के लिए काफी है.

इस आरक्षण के मसौदे में गरीबों के लिए आय की सीमा निर्धारित की गई है. इस में सालाना 8 लाख रुपए से कम वार्षिक आय, 5 एकड़ से कम जमीन का मापदंड रखा गया है. पहली ही नजर में आरक्षण के दायरे में लाए गए सभी लोगों को गरीब बताना धोखा है.

इस पर विवाद शुरू हो गया है. सवर्णों के लिए 8 लाख रुपए आय की सीमा अधिक है. एक तरफ 4 लाख सालाना आय वाला शख्स आयकर देता है और आयकर देने वाला वर्ग मलाईदार श्रेणी में माना जाता है तो फिर 8 लाख कमाने वाला सवर्ण गरीब कैसे कहलाएगा.

सरकार के पास इस बात के आंकड़े नहीं हैं कि कितने लोग इस आरक्षण के दायरे में आएंगे. सालाना 8 लाख रुपए की कमाई वाले कितने लोग हैं? अनुमान है कि अगड़ी जातियों का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा इस आरक्षण के दायरे में होगा.

यह आरक्षण जातियों में प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या को और बढ़ाना शुरू कर देगा. अब सब जातियां अपनीअपनी आबादी के हिसाब से आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाने की मांग करने लगेंगी. केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने ओबीसी के लिए 54 प्रतिशत और कुल आरक्षण 90 प्रतिशत करने की मांग की है.

दरअसल, आरक्षण देश में हमेशा से एक संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा रहा है. खासतौर से, 1991 में मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के बाद से आरक्षण की राजनीति खूब चलने लगी. गरीबों को आरक्षण देने की मांग उठने लगी और कई बार इस के प्रयास भी हुए.

पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिंह राव ने अपने कार्यकाल में मंडल आयोग की रिपोर्ट  के प्रावधानों को लागू करते हुए अगड़ी जातियों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की थी पर सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने इसे खारिज कर दिया था.

सवर्णों को आरक्षण देने के पीछे अभी कई सवाल हैं. इस आरक्षण से क्या पहले से आरक्षित दलित, पिछड़ी जातियां नाराज हो कर सामाजिक विद्रोह नहीं छेड़ देंगी? वे भाजपा के खिलाफ नहीं उठ खड़ी होंगी? अगर अगड़ी जातियां इस लौलीपौप से भाजपा के पास आ भी गईं तो क्या वह उन के बूते 2019 की चुनावी वैतरणी पार कर सकेगी? सरकार केवल 2019 की सोच रही है. उसे उस के अगले 20-30 वर्षों में पड़ने वाले असर की कोई चिंता नहीं है.

पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में संघ की नीति का रूप सामने आया जब दलित जातियां एट्रोसिटी के चलते भाजपा सरकार से खासी नाराज हुईं. अदालत के फैसले के खिलाफ दलितों ने भारत बंद भी किया था. पिछले साल मार्च में सुप्रीम कोर्ट ने एससी, एसटी एक्ट में बदलाव करते हुए कहा था कि मामलों में तुरंत गिरफ्तारी नहीं की जाएगी. शिकायत मिलने पर तुरंत मुकदमा भी दर्र्ज नहीं होगा. पहले एसपी स्तर का पुलिस अधिकारी मामले की जांच करेगा.

विरोध के चलते केंद्र सरकार इस के खिलाफ अगस्त में बिल ले कर आई. इस के जरिए पुराने कानून को बाहर कर दिया गया. दलितों की नाराजगी दूर करने की कोशिश की गई तो इस एक्ट से सवर्ण नाराज हो गए थे.

कहने को मोदी सरकार का गरीब सवर्णों के लिए आरक्षण उन के आर्थिक उत्थान के लिए है लेकिन दरअसल, यह भाजपा की नीतियों के अनुसार धर्मजनित जन्मजात जातिव्यवस्था को बनाए रखने के लिए है. संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की बात नहीं है.

सदियों से जातिव्यवस्था के चलते वंचित तबके के शैक्षिक और सामाजिक उत्थान के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई. इस आरक्षण से संविधान की मूल भावना खत्म होने के खतरे बढ़ गए हैं. पहले से ही सदियों की जातिवादी संकीर्ण सोच से समाज उबर नहीं पाया है.

सरकार 5 साल में ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं बना पाई कि सवर्ण गरीबों की सहीसही संख्या का पता चल सके. पिछड़ा वर्र्ग को आरक्षण देने के लिए पहले से मंडल कमीशन बना था, उस की रिपोर्ट सरकार के पास थी.

भाजपा ने इस बिल से अपने परंपरागत अगड़ी जातियों खासतौर से ब्राह्मणों को खुश करने की कोशिश की है जो एससी, एसएटी एक्ट पर अध्यादेश लाने को ले कर पार्टी से नाराज बताए जा रहे थे. 3 हिंदीभाषी राज्यों में यह ब्राह्मणों का विद्रोह था जिस ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में तख्ता पलट दिया. इन के झूठे, खोखले विकास के प्रचार के सहारे जनता भ्रमित थी. एससी, एसटी एक्ट से अगड़ों की नाराजगी ने भाजपा को जमीन पर ला दिया. दरअसल यह हार दलितों व पिछड़ों के कांग्रेस में लौट जाने की वजह से हुई है. ऊंची जातियां शोर मचा रही हैं पर वे वोट भाजपा को ही देंगी.

सुप्रीम कोर्ट ने एमआर बालाजी बनाम स्टेट औफ मैसूर मामले में सितंबर 1962 में फैसला दिया था कि किसी भी स्थिति में आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए. इस फैसले का आधार कोर्ट ने मैरिट को कुंठित न होने देना बताया था. तब से ले कर आज तक लगभग हर फैसले में यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट की 9 सदस्यीय संविधान पीठ ने इंद्रा साहनी मामले में भी इसे बहाल रखा.

सभी वर्गों के युवाओं को आज नौकरियों की सख्त जरूरत है. सरकार ने संसद में बताया भी है कि 24 लाख पद आज भी खाली पड़े हैं. पर सवाल वही है कि आरक्षण कानून के बाद भी इन पदों को भरने की कोई मंशा नहीं दिखाई देती.

भाजपा सरकार जाति, धर्म के दायरे से बाहर निकल ही नहीं पाई है. उस के हर फैसले में कहीं न कहीं हिंदुत्व का साया चिपका हुआ है. संविधान में आरक्षण का मूल उद्देश्य खो गया है. आरक्षण का मकसद जातीय भेदभाव खत्म कर बराबरी स्थापित करना था. पर सरकार के इस ताजा कदम से जातीय विभाजन और बढे़गा.

दरअसल, इस कदम से मोदी सरकार ने मैरिट के तर्क को ही खत्म कर दिया है. आज आरक्षण ही सब को चलाएगा तो मैरिट के आधार पर यानी योग्यता की बदौलत नौकरी की बात नहीं होगी. सब आरक्षण की बैसाखी पर सवार रहेंगे. यह देश के लिए भी नुकसानदायक कदम होगा. जो अगड़ी जातियां अब तक मैरिट को महत्त्व देने की बात कह आरक्षण का विरोध करती आई थीं वे भी अब आरक्षण का लौलीपौप देख चुप हो गई हैं.

EXCLUSIVE : अली फजल ने बताया न्यूड तस्वीरें वायरल होने का पूरा सच

‘फुकरे ’, ‘फुकरे रिटर्न’, ‘हैप्पी भाग जाएगी’, ‘विक्टोरिया एंड अब्दुल’ सहित कई फिल्मों व वेब सीरीज ‘मिर्जापुर’ में अपने बेहतरीन अभिनय की वजह से राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोहरत बटोर चुके अभिनेता अली फजल के ऊपर आरोप लग रहा है कि उन्होंने सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए सोशल मीडिया पर अपने ‘न्यूड फोटो’ वायरल किए हैं. जबकि अली फजल इस बात से साफ इंकार करते रहे हैं. मगर मीडिया के अलावा अब अली फजल के फैन्स भी सवाल उठाने लगे हैं कि आखिर अली फजल को अपनी न्यूड फोटो वायरल करने की जरुरत क्यों महसूस हुई?

जिस वक्त यह न्यूड फोटो चर्चा का विषय बना, उस वक्त अली फजल अलीगढ़ में ‘‘अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी’ के ‘फिल्म साज’ कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे थे. अलीगढ़ से वापस आते ही अली फजल ने इस मसले पर ‘सरिता’ पत्रिका के लिए हमारे साथ खुलकर एक्सक्लूसिव बात की.

अली फजल ने इस न्यूड फोटो के वायरल होने के पीछे की पूरी कहानी बयां करते हुए कहा- ‘मैंने कोई प्रचार नहीं किया. बल्कि मैं तो सोशल मीडिया का शिकार हो गया. लोगों ने सब कुछ उल्टा कर दिया. मैंने यह निजी वीडियो निकाले थे, जिसे मैंने अपने निजी इंस्टाग्राम अकाउंट पर पोस्ट किया था. मुझे इस बात का यकीन ही नहीं था कि मेरे निजी पोस्ट को लोग राष्ट्रीय खबर बना देंगे. वास्तव में बतौर निर्देशक मैं एक लघु फिल्म बना रहा हूं. पर मैं इस लघु फिल्म को लेकर कोई जानकारी फिलहाल नहीं देना चाहता. इस लघु फिल्म की प्रोडक्शन फोटो भी काफी टची है. हमें डर है कि यदि एक फोटो भी बाजार में आ गयी, तो हमारी फिल्म का पूरा विषय उजागर हो जाएगा. आप भी समझते हैं कि हर लघु फिल्म कौंसेप्ट पर आधारित होती है. लघु फिल्मों में कलाकार मायने कम रखते हैं. लेकिन हमारे प्रोडक्शन के एक लड़के ने एक तस्वीर सोशल मीडिया पर डाल दी. मैं उस पर नाराज भी हुआ. मैंने वीडियो पोस्ट किया, जिसमें मैने कहा कि हमारे प्रोडक्शन के एक लड़के ने जो कुछ किया, वह सम्मानजनक नहीं है. यह वीडियो मैंने अपनी यूनिट से जुड़े लोगों के लिए डाला था. उसके बाद मैंने वेब सीरीज ‘मिर्जापुर’ की अपनी एक तस्वीर इंस्टाग्राम पर पोस्ट की. यह तस्वीर टौपलेस है, जिसे लोगों ने राष्ट्रीय खबर बना दी. कुछ पत्रकारों ने लिख दिया कि अली फजल इस बात से नाराज हैं कि उनकी न्यूड तस्वीर सोशल मीडिया पर आ गयी है. मुझे इसकी खबर कल उस वक्त मिली, जब मैं अलीगढ़ में ‘अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी’ के एक समारोह में था. मेरी समझ में आया कि बेवजह मेरी धज्जियां उड़ रही है. कुछ लोगों को लगा कि यह प्रचार का तरीका है. इससे मुझे अपने आप पर गुस्सा आया कि मैं इस तरह की ओछी पब्लिसिटी क्यों करुंगा? मेरी समझ में नहीं आ रहा कि मैं कितना खुद की सफाई दूं.’

तो अब आपकी समझ में आया होगा कि सोशल मीडिया नुकसान कर रहा है? इस सवाल पर अली फजल ने कहा-‘पहली दफा मुझे इस बात का अहसास हुआ. पहली दफा मुझे अहसास हुआ कि सोशल मीडिया खासकर इंस्टाग्राम पर मैं जो कुछ डालूंगा, वह काफी सोच समझकर डालूंगा. मुझे इस बात का अहसास नहीं था कि लोग मेरी सोशल मीडिया की पोस्ट को भी इतना तवज्जो देते हैं या मीडिया मेरे सोशल मीडिया पोस्ट पर नजर रखता है. अब तक तो मैं सोशल मीडिया पर अपने दोस्तों व परिवार से जुड़े लोगों को ध्यान में रखकर ही हर चीज पोस्ट करता रहा हूं.  मैं कोई बड़ा स्टार नहीं हूं. लगता है कि वेब सीरीज ‘मिर्जापुर’ की वजह से लोग मुझे इतना जानने लगे हैं कि वह मेरी सोशल मीडिया की पोस्ट पर भी ध्यान देने लगे हैं. मेरी समझ में आया कि अब मैं ‘इग्नोर’ किया जाने वाला कलाकार नहीं रहा. आप इंस्टाग्राम पर देखेंगे, तो मैं बहुत सी चीजें अपने लिए या मुझे समझने वाले अपने दोस्तों के ही लिखता रहता हूं. मैंने अब तक आम लोग या मीडिया के लिए कभी कुछ भी इंस्टाग्राम पर पोस्ट नहीं किया.’

पर आप यह कैसे भूल गए कि ट्विटर या इंस्टाग्राम आदि सोशल मीडिया तो हर आम इंसान के लिए है? इस सवाल पर अली फजल ने कहा-‘अब तक मैं इतना समझदार नहीं था. अब तक मैं सिर्फ ट्विटर को लेकर ही सावधान रहता था.’

चेहरे की स्क्रबिंग है जरूरी

स्क्रबिंग से चेहरा साफ नजर आता है और दाग धब्‍बे भी गायब होने लगते हैं. इसे आप हफ्ते में एक या दो बार कर सकती हैं. स्‍क्रब करते वक्‍त चेहरे को जोर-जोर से न रगड़े. स्‍क्रब हमेशा गोलाई में करना चाहिये. आप चाहें तो बाजार से कोई अच्‍छा स्‍क्रब खरीद सकती हैं बस खरीदते वक्‍त अपनी स्‍किन टाइप जरुर जांच लें. या फिर घर पर ही होममेड स्‍क्रब बना कर प्रयोग कर सकती हैं. स्‍क्रब दानेदार होना चाहिये क्‍योंकि उसी से आपके पोर्स खुलेंगे और गंदगी बाहर निकलेगी.

स्‍क्रबिंग करने से चेहरे को कौन-कौन से लाभ मिलते हैं इसके बारे में आइये जानते हैं इस लेख में.

साफ त्‍वचा

स्‍क्रबिंग से चेहरा एकदम से साफ हो जाता है और उस पर से गंदगी, तेल और पसीना निकल जाता है. आप घर पर ब्राउन शुगर और शहद मिला कर चेहरे की स्‍क्रबिंग हफ्ते में दो बार कर सकती हैं.

मृत कोशिकाएं हटाए

चेहरे पर मृत कोशिकाओं की परत देखने में बहुत ही खराब लगती हैं. स्‍क्रब कर के आप उस चेहरे की चमक बढाएं स्‍क्रब करने से चेहरा ग्‍लो करने लगता है. ग्‍लो पाने के लिये घर पर कच्‍चे चावल को दूध में 2 घंटे के लिये भिगो कर पीस लें. फिर उससे चेहरे को स्‍क्र करें. आपका चेहरा ग्‍लो करने लगेगा.

त्‍वचा बनाए स्‍मूथ

खूबसूरत त्‍वचा के लिये स्‍मूथ त्‍वचा पाना जरुरी है. इसके लिये पिसा बादाम, 2 चम्मच शहद और दूध की मलाई मिक्‍स कर के स्‍क्रब तैयार करें. इसे प्रयोग कर के चेहरा स्‍मूथ बनाएं. चेहरे का रंग संवारे आप जैसे ही स्‍क्रबर करना शुरु करेंगी, आपका चेहरा धीरे धीरे और ज्‍यादा साफ नजर आने लगेगा.

डार्क पैच हटाए

जब चेहरे पर स्‍क्रबिंग नहीं की जाती तो चेहरे पर डार्क रंग के पैच दिखने लगते हैं. इससे चेहरा काला दिखने लगता है. पर अगर आप 1 चम्‍मच दही में कूंची हुई अखरोठ डाल कर चेहरे की स्‍क्रबिंग करेंगी तो आपको रिजल्‍ट अच्‍छा मिलेगा. इससे आप घुटने, कोहनियां और गर्दन की गंदगी साफ कर सकती हैं.

मुंहासे के दाग मिटाए

2 चम्‍मच बेकिंग सोडा और पानी मिक्‍स कर पेस्‍ट बनाएं और चेहरे पर कुछ देर लगाने के बाद पानी से धो लें.

चीनी माओं से सीखें पेरेंटिंग कला : टाइगर मॉम के टाइगर बच्चे

चीन से निकला एक वीडियो गेम आजकल दुनिया के कई देशों काफी लोकप्रिय है. भारतीय बच्चों को यह गेम डराता है क्योंकि इस गेम में दिखने वाली टाइगर मॉम अपने डिजिटल बच्चे के आगे एक कठोर लक्ष्य रखती है और अगर डिजिटल बच्चा उस लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाता है तो मां उसका वध करके दूसरा डिजिटल बच्चा पैदा करती है और उसके सामने भी वही लक्ष्य रखती है. जब तक उसका कोई डिजिटल बच्चा उस मिशन को पूरा नहीं कर लेता, तब तक बच्चों का वध चलता रहता है. ऐसा गेम हम भारतीय माएं तो डर के मारे अपने बच्चों को खेलने न दें, लेकिन चीनी माएं अपने बच्चों को ऐसे ही गेम्स खेलने के लिए प्रेरित करती हैं. चीनी बच्चे भी इस तरह के गेम्स खूब चाव से खेलते हैं और उसमें जीतने के लिए पूरी ताकत लगा देते हैं.

आखिर अपने बच्चों के लिए ऐसे गेम्स चीन क्यों बनाता है? दरअसल इस तरह के खेल चीनी बच्चों के लिए महज खेल नहीं होते, बल्कि उनके जीवन-लक्ष्य को प्राप्त करने का एक ऐसा रास्ता है, जिनके जरिए उनके अंदर दृढ़ संकल्प पैदा होता है. अनुशासन और कठोर श्रम के साथ लक्ष्य तक पहुंचने की जिद बच्चे में पैदा करने के लिए चीनी माएं टाइगर मॉम बन जाती हैं. यही वजह है कि आज दुनिया के देशों पर चीनी प्रतिभा छायी हुई है.

एक रिपोर्ट के अनुसार अमरीका में ज्यादातर टॉप जॉब्स में चीनी युवा आसीन हैं. पढ़ाई के लिए अमरीका या अन्य यूरोपीय देशों में जाने वाले दस चीनी बच्चों में से सात बच्चे वापस ही नहीं लौटते, क्योंकि विदेश में उनके उत्कृष्ठ प्रदर्शन को देखते हुए उन्हें टॉप जॉब्स में आसानी से टॉप पोजिशन हासिल हो जाती है.

चीन की जनसंख्या दुनिया के सभी देशों से सबसे ज्यादा है. अधिक जनसंख्या का मतलब है जीवन जीने के लिए अधिक प्रतियोगिता. अधिक संघर्ष. अधिक श्रम. चीनी बच्चों को शुरू से ही कठोर श्रम और संघर्ष के लिए माएं तैयार करती हैं. वे उनके आगे लक्ष्य निर्धारित करती हैं कि तुम्हें यह बन कर दिखाना है और उस लक्ष्य को पाने के लिए माएं उनको कठोर अनुशासन में रखते हुए लगातार प्रेरित भी करती हैं, इसीलिए वे कहलाती हैं टाइगर मॉम.

जनसंख्या के लिहाज से चीन के बाद भारत का दूसरा स्थान है, मगर जिस तरह चीनी युवाओं को दुनिया के तमाम देशों में अच्छी नौकरियों में अच्छा स्थान और वेतन प्राप्त है, वैसा भारतीय युवाओं को नहीं है. कारण छिपा है हम भारतीयों की परवरिश में.

रोहन का आठवीं का इम्तहान शुरू हो गया है. उसकी मां ने उपवास शुरू कर दिये हैं, रोज की उनकी पूजा का समय भी थोड़ा बढ़ गया है. भोर में ही उठ जाती हैं और नहा-धो पूजा में बैठ जाती हैं. घंटे भर हाथ जोड़ कर भगवान से प्रार्थना करती हैं कि बेटे की परीक्षाएं अच्छी हों और वह अच्छे अंकों से पास हो जाए तो वह एक सौ एक रुपये का प्रसाद चढ़ाएंगीं. रोहन तैयार होकर निकलता है तो मां उसके माथे पर बड़ा सा तिलक लगाती है, दही-शक्कर खिलाती है, भगवान के आगे हाथ जुड़वाती है और फिर वह स्कूल के लिए रवाना होता है.

साल भर मां ने अपने लाडले को पढ़ने के लिए डांट तक न लगायी. उसने उसकी पढ़ाई की सारी जिम्मदारी स्कूल और ट्यूशन पढ़ाने वाले मास्टरजी डाल कर रखी और उसकी परीक्षा के समय भगवान पर जिम्मा डाल दिया कि बेटे को पास करवाओ. इसके एवज में एक लालच भी दिया कि अगर बेटा पास हो गया तो एक सौ एक रुपये का प्रसाद चढ़ाऊंगी. कैसा हास्यास्पद है यह पूरा विवरण, मगर क्या यह सच नहीं है? क्या अधिकांश भारतीय घरों में माएं ऐसा ही नहीं करतीं?

आयुषमान के बोर्ड के पेपर्स चल रहे हैं. परीक्षा-कक्ष में पहुंचने से पहले उसे काली बाड़ी मन्दिर में देखा जाता है. सुबह बड़ी देर तक वह मां काली की मूर्ति के आगे दंडवत पड़ा रहता है. बड़ी देर तक मुंह ही मुंह में बुदबुदाते हुए पास होने की प्रार्थनाएं करता है.

मोहम्मद कैफ ने जुमा की नमाज के बाद दुआ में हाथ उठाये और बोला, ‘मेरे मौला, बारहवीं की नय्या किसी तरह पार लगा दो, पूरे रोजे रखूंगा, पांचों वक्त पाबंदी से नमाज अदा करूंगा.’

इम्तहान के वक्त सुरिन्दर वालिया भी गुरुद्वारे जाना नहीं भूलता. हम भारतीय अपना छात्र जीवन ऐसे ही बिताते हैं. एक एक कक्षा ईश्वर-ईश्वर करके पार करते हैं तो उसके बाद भी जीवन में हर काम ईश्वर भरोसे ही करते हैं. ईश्वर पर ही किसी काम के होने-न होने की जिम्मेदारी डालते हैं, मगर खुद इस जिम्मेदारी से हमेशा बचे रहना चाहते हैं. हमारे मन का हो गया तो ईश्वर का धन्यवाद करते हैं, न हुआ तो कहते हैं कि ईश्वर की मर्जी. स्कूलों में रोज सुबह प्रार्थना सभाएं होती है. नर्सरी कक्षा से बच्चे के दिल-दिमाग में यह बिठाने की कोशिश होती है कि ईश्वर ही सबसे बड़ा गाइड है, उसी की इच्छा सर्वोपरि है, उसकी इच्छा के बिना तुम्हारे जीवन में कुछ नहीं हो सकता. स्कूल में, घर में हर जगह उसे यही बातें सुनने को मिलती हैं और बड़े होने से लेकर मृत्यु तक हम भारतीय इन्हीं विचारों से ओतप्रोत रहते हैं.

आप पूछेंगे कि इन बातों में क्या खराबी है? ये तो संस्कारवान लोगों की पहचान हैं. अगर एक मां अपने लाडले के अच्छे भविष्य के लिए उपवास रखती है, व्रत करती है, उसको भगवान के नाम का टीका लगाती है, दही-शक्कर खिला का परीक्षा के लिए भेजती है तो इसमें गलत क्या है? ये तो भारतीय माएं सदियों से करती आ रही हैं. जी हां, हम भारतीय माएं बस यही एक काम सदियों से करती आ रही हैं. हमने खुद अपना भूत, वर्तमान, भविष्य भगवान के भरोसे रखा, अब अपने बच्चों का भविष्य भी भगवान पर छोड़ दिया है. हम भारतीय माएं अपने बच्चों की परवरिश बिल्कुल वैसे ही करती हैं, जैसे कि हमारे मां ने हमारी की. हम वही आदतें अपने बच्चों में डालती हैं जो हमारे अन्दर हमारी मां ने डालीं. हमारे बच्चे बड़े होकर जब मां-बाप बनेंगे तो वह यही चीजें आगे अपने बच्चों में प्रसारित करेंगे.

अधिकांश भारतीय परिवारों में ऐसा ही चल रहा है. बहुत कम ऐसे परिवार हैं जहां बच्चों को किसी लक्ष्य के प्रति बचपन से प्रेरित किया जाता हो. उन्हें कठोर अनुशासन में रख कर उनसे कठोर श्रम करवाया जाता हो. अब तो मास्टर जी की बेंत भी नहीं उठती, कि पता नहीं कब कौन बच्चा जाकर पुलिस कम्प्लेंट कर दे. मगर चीन में ऐसा नहीं है. वहां घर में, स्कूल में, ट्यूशन में बच्चों को अनुशासन में रखते हुए हर पल बेहतर करने की प्रेरणा दी जाती है. इसके लिए बेंत की जरूरत नहीं है. यह चीजें प्रेम से भी संभव हैं, अच्छी किताबों, प्रेरणादायक किस्सों और खेल-खिलौनों से भी सम्भव हैं.

हम अपनी कामयाबी-नाकामयाबी की पूरी जिम्मेदारी ईश्वर पर मढ़ कर जवाबदेही से बच जाते हैं, मगर चीनी बच्चे अपनी हार के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानते हैं. जवाबदेही तय होने के कारण ही वे अपने लक्ष्य को प्राप्त कर पाते हैं. बच्चे की बेहतर परवरिश के लिए आवश्यक है कि घर में कुछ नियम-कायदे बनाए जाएं. साथ ही सुनिश्चित करने की कोशिश करें कि आपका बच्चा उन नियम-कानूनों का पालन करे. बचपन से ही बच्चे को अनुशासन प्रिय बनाने की कोशिश की जानी चाहिये. हालांकि सीमाएं निर्धारित करने के साथ व्यवहार में लचीलापन होना चाहिए.

चीन में बनने वाले वीडियो गेम्स की तरह यहां भी बच्चों के लिए कुछ ऐसे ही खेल ईजाद किये जाने चाहिएं क्योंकि खेलों का व्यापक असर बच्चों के दिमाग पर पड़ता है. चीनी बच्चों के दिल में यह बात बचपन से बैठ जाती है कि अगर वे अपने चुने हुए लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाये तो वे अपने घर, समाज से निष्कासित कर दिये जाएंगे. वे अपनी हर कामयाबी और नाकामयाबी का जिम्मेदार खुद को मानते हैं, किसी ईश्वर पर वह यह भार नहीं डालते. वे अपना मिशन पाने के लिए कठोर प्रयास करते हैं.

चाइनीज माओं के पालन-पोषण का तरीका ही चाइनीज बच्चों की सफलता की वजह है. वास्तव में परवरिश अर्थात पेरेंटिंग एक कला है, और इसे भारतीय माओं को चाइनीज माओं से सीखना चाहिए ताकि वे भी अपने बच्चों का भविष्य बेहतर बना सकें. हालांकि हम पूरी तरह चीनी तरीकों को नहीं अपना सकते क्योंकि हम मानते हैं कि बच्चे के सम्पूर्ण विकास के लिए पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद-व्यायाम भी बहुत जरूरी है, मगर इसके साथ अनुशासन होना भी जरूरी है. बच्चे के दिमाग में यह बात साफ होनी चाहिए कि अगर वह नाकाम हुआ है तो इसका जिम्मेदार वह खुद है. कोई और नहीं. ईश्वर तो कतई नहीं.

फेसवाश करते समय न देहराएं इन गलतियों को

अपने चेहरे को साफ सुथरा रखने के लिए हम फेसवाश करते हैं जो कि स्किन केयर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. लेकिन कई बार फेसवाश करने में भी हम गलतियां कर जाते हैं. यदि आप फेस वाशिंग का सही तरीका नहीं अपनाएंगे तो इससे चेहरे पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है. तो आइए जाने कि फेसवाश करते समय आपको किन गलतियों को नहीं दोहराना है.

फेस वाइपिंग

यह एक अच्छा तरीका है लेकिन ज्यादा फेस वाइपिंग (चेहरे को पोंछना) करने से भी त्वचा की ऊपर की परत खराब हो सकती है और त्वचा की निचली कमजोर परत को प्रदूषण और सूर्य की तेज धूप का सामना करना पड़ सकता है. एक्सपर्ट सुझाव देते हैं कि एक दिन दो बार से ज्यादा फेस वाइपिंग नहीं करनी चाहिए यदि जरुरत हो तो चेहरे को पानी से धो लें और ठीक तरह से फेस वाश करें.

सही तापमान के पानी का इस्तेमाल

ज्यादा गरम पानी आपके चेहरे की स्किन को खराब कर सकता है और ज्यादा ठंडा पानी भी स्किन के लिए सही नहीं है. चेहरे की स्किन को किसी भी प्रकार के नुकसान से बचाने के लिए उसे गुनगुने और सुहाते हुए पानी से धोना ही बेहतर है.

ज्यादा न रगड़ें

कुछ लोग मानते हैं कि ज्यादा रगड़ने से त्वचा ज्यादा साफ होती है लेकिन वे गलत हैं. बल्कि यह ज्यादा नुकसानकारी है क्योंकि इससे त्वचा की ऊपर की अच्छी स्किन उतर जाती है और ड्राई स्किन रह जाती है. आराम से साफ करें ज्यादा रगड़ें नहीं.

त्वचा की ऊपर की परत या खाल उतारना

यह भी एक महत्वपूर्ण चीज है जिस पर लोग ध्यान नहीं देते हैं. या तो वे ज्यादा खाल उतार लेते हैं जिससे स्किन को नुकसान होता है और या वे इस पर ध्यान ही नहीं देते हैं जिससे मुंहासे और झाइयां होती हैं.

मेकअप को हटाना बहुत जरुरी

यह बात कई बार और कई जगह कही जाती है लेकिन लोग इस पर ध्यान नहीं देते हैं. मेकअप को हटाना सिर्फ पसंद पर निर्भर नहीं है बल्कि यह बहुत जरूरी है. इसे इस प्रकार से समझे कि आपको अपनी स्किन को सांस लेने देना है लेकिन वह मेकअप के आवरण में सांस नहीं ले पाती हैं.

टमाटर की बिरयानी

सामग्री

– दालचीनी (2 इंच का टुकड़ा)

– इलायची (4)

– सौंफ (2 चम्मच)

– प्याज (1 बड़ी, बारीकी से कटी हुई)

– हरी मिर्च पेस्‍ट (2 चम्‍मच)

– अदरक लहसुन पेस्ट (2 चम्‍मच)

– टमाटर (4 बड़े, बारीक कटे)

– कश्मीरी लाल मिर्च पाउडर (1 छोटा चम्‍मच)

– मिर्च पाउडर (2 चम्मच)

– हल्दी पाउडर (1 छोटा चम्मच)

– गरम मसाला पाउडर (1 छोटा चम्‍मच)

– नमक (स्वादानुसार)

– चीनी (2 चम्मच)

– हरी धनिया (1/4 कप  बारीक कटी)

–  पुदीने के पत्ते (1/4 कप, बारीक कटे हुए)

– नारियल का गाढा दूध (1 कप)

– पानी (2 कप / 500 मिलीलीटर)

बनाने की विधि –

– सबसे पहले बासमती चावल को धो कर पानी में 30 मिनट के लिये भिगो लें.

– फिर उसे छान कर किनारे रख दें.

– अब कढाई में तेल गरम करें, उसमें दालचीनी, सौंफ और इलायची डालें.

– अब इसमें प्‍याज और हरी मिर्च डालें.

– जब यह गोल्‍डन हो जाए तब उसमें अदरक लहसुन का पेस्‍ट डालें.

– फिर इसमें सभी मसाले, नमक और शक्‍कर डालें और 30 सेकंड तक चलाएं.

– फिर इसमें टमाटर मिक्‍स करें और सभी चीजों को मिला कर 5 मिनट तक पकने दें.

– जब टमाटर गलने लगे, तब उसमें धनिया और पुदीना पत्‍ती मिलाएं और तुरंत चलाएं

– अब अपना राइस कुकर का कटोरा लें, उसमें मसाला और भिगोया हुआ चावल, नारियल का दूध और पानी मिलाएं.

– इसे अच्‍छे से मिक्‍स करें और पानी को थोड़ा चख लें.

– अब राइस के कटोरे को एलेक्‍ट्रिक कुकर में रखें और पकाएं.

– एक बार चावल हो जाने पर इसे रायते के साथ सर्व करें.

जुड़वा भाई प्रियांश व श्रेयांश का सच बना मौत की वजह

शर्मसार कर देने वाला जुड़वा भाइयों की हत्या का मामला 12 फरवरी 2019 का है. चित्रकूट के सद्गुरु पब्लिक स्कूल से दोपहर 12.25 बजे पिस्टल की नोंक पर उन का अपहरण हुआ था. 2 बदमाशों ने इन बच्चों को उठाया था. अपहरण के बाद 20 लाख रुपए की फिरौती भी वसूली गई, इस के बावजूद बच्चों की हत्या कर दी गई. वह भी महज इसलिए कि जब इन बच्चों से पूछा गया कि क्या वे उन्हें पहचान लेंगे तो इन बच्चों ने हां कह दिया था. यही डर आरोपियों के मन में बैठ गया और जुड़वा भाइयों को जिंदा ही पत्थर बांध कर नदी में फेंक दिया गया.

मध्य प्रदेश के चित्रकूट से अगवा हुए 5 साल के जुड़वा बच्चों की हत्या के बारे में जिस ने भी सुना, उस का दिल रो पड़ा. बच्चों के शवों को जब परिजनों ने देखा तो वे फूटफूट कर रोने लगे. बच्चे उसी यूनीफार्म में थे, जिस में उन्होंने 12 फरवरी को तैयार कर के स्कूल भेजा गया था. उन के हाथपैर जंजीर से बंधे हुए थे.

हालांकि घटना को अंजाम देने वाले 6 गुनाहगारों को पुलिस ने पकड़ लिया है. इन में से रामकेश यादव इन बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता था, जबकि पद्म बजरंग दल के संयोजक का भाई है. बाकी आरोपी बांदा व हमीरपुर के रहने वाले हैं. पद्म और लकी इंजीनियरिंग के छात्र हैं. आरोपियों ने इस कांड को अंजाम देने के लिए बाइक और बोलैरो कार का इस्तेमाल किया था. बाइक पर ‘राम राज्य’ लिखा था, जबकि बोलैरो कार पर भाजपा का झंडा था.

रीवा जोन के आईजी चंचल शेखर ने बताया कि बच्चों की तलाश के लिए पुलिस के 500 जवान लगाए गए थे, लेकिन फिर भी इन बच्चों को बचाया नहीं जा सका. गुनाहगारों ने पहले बच्चों के आरोपी लकी के चित्रकूट में बने किराए के घर में 2 दिन के लिए रखा था.

यह किराए का कमरा एक सुनसान जगह पर था और आरोपी खुद को बाहर से बंद रखते थे ताकि किसी को यहां छिपे होने का शक न हो. बाद में वे जुड़वा भाइयों को बांदा के अटर्रा इलाके में एक दूसरे किराए के घर में ले गए थे, जहां उन्होंने हत्या से पहले तक बच्चों को छिपाए रखा था.

गैंग के सदस्य काफी होशियार थे. टेक सेवी इंजीनियरिंग स्टूडेंट स्पूफिंग ऐप के जरीए नंबर छिपाते थे. इस तरह वह साइबर पुलिस से एक कदम आगे की योजना बना कर खुद को बचाने में कामयाब रहे थे. फिरौती मांगने के लिए वे अपने सेल फोन का इस्तेमाल नहीं करते थे बल्कि अजनबियों और राहगीरों से जरूरी बात कह कर फोन मांगते थे तब बात करते थे.

आईजी चंचल शेखर का कहना है कि जब एक राहगीर को इन मोटरसाइकल सवारों की बात पर शक हुआ तो उस ने मोटरसाइकिल की तसवीर उतार ली. पुलिस ने जब फोन पर संपर्क किया तो संबंधित व्यक्ति ने आरोपियों की मोटरसाइकिल की तसवीर मुहैया करा दी. जब पुलिस ने तहकीकात की तो बाइक रोहित द्विवेदी की निकली. वह बबेरू थाना इलाके का रहने वाला निकला और पुलिस एकएक कर 6 आरोपियों को गिरफ्तार करने में सफल रही. पर तब तक आरोपी फिरौती के 20 लाख रुपए लेने के बाद दोनों बच्चों को यमुना नदी में फेंक चुके थे.

आरोपियों को डर था कि बच्चों ने उन्हें पहचान लिया है और बच्चे राज खोल देंगे, जिस से उन की गिरफ्तारी होना तय है. हालांकि 20 लाख रुपए मिलने के बाद आरोपी बच्चों को छोड़ने का मन बना रहे थे लेकिन छोड़ने से पहले उन्होंने बच्चों से सवाल किया कि पुलिस पूछेगी तो क्या वह उन्हें पहचान लेंगे तो इस पर बच्चों ने मासूमियत से हां में जवाब दे दिया. आरोपियों ने दोनों बच्चों की पीठ पर पत्थर बांधने के साथसाथ हाथपैर भी लोहे की जंजीरों से बांध दिए और नदी में फेंक दिया.

आरोपियों ने पुलिस को बताया कि उन्होंने वीडियो गेम के जरीए बच्चों को अपने कब्जे में रखा और बच्चों से उन की अच्छी दोस्ती भी हो गई थी. फिर भी बच्चों को मारने से पहले इन गैंग वालों का दिल नहीं पसीजा.

जुड़वा बच्चों प्रियांश और श्रेयांश के पिता बृजेश रावत ने कहा कि मेरे बेटों को जिंदा ही नदी में फेंक दिया. फिरौती भी ले ली और बच्चों को खत्म भी कर दिया. केवल पैसों के लिए.

बृजेश रावत कहते हैं कि अपहरणकर्ताओं ने बच्चों से पिता की 18-19 फरवरी की शाम 4 बजे के आसपास बात कराई थी. आरोपियों ने 2 करोड़ की फिरौती मांगी थी और 20 लाख रुपए 19 फरवरी को गुनाहगारों को दे भी दिए थे.

वे आगे कहते हैं कि आरोपियों को फांसी पर लटका देना चाहिए. ऐसे लोग समाज में रहने लायक नहीं हैं.

बता दें कि अपहरण करने वालों में सीतापुर का रहने वाला टीचर रामकेश यादव है. वह इन बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने घर जाता था. उस ने ही अपने साथियों से कहा था कि इन बच्चों के पिता के पास बहुत पैसा है. टीचर रामकेश ने ही मुख्य आरोपी पद्म शुक्ला के साथ साजिश रची थी. आरोपी पद्म शुक्ला का छोटा भाई विष्णुकांत बजरंग दल का एरिया कोआर्डिनेटर है. इस केस में विष्णुकांत का कोई रोल नहीं है पर इस वारदात में कार और बाइक का इस्तेमाल किया गया.

हत्या करने से पहले अपहरणकर्ताओं ने शुरुआती 4 दिनों तक इन जुड़वा बच्चों को जगह बदलबदल कर रखा था. फिरौती की रकम मिलने के बाद जुड़वा भाइयों की पानी में डुबो कर हत्या कर दी.

बांदा जिले के मरका घाट में मंदिर के पास दोनों भाइयों को जंजीर से बांधा और फिर एक और जंजीर से पत्थर बांध कर घाट के नीचे फेंक दिया.

इन जुड़वा मासूमों की हत्या के बाद चित्रकूट में सैकड़ों लोगों ने सद्गुरु सेवा ट्रस्ट में तोडफ़ोड़ की. पुलिस ने लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले दाग कर भीड़ को खदेड़ा. इस लाठीचार्ज में 12 लोग घायल हो गए. अनहोनी की आशंका को देखते हुए इलाके में 1500 पुलिस वाले तैनात किए गए हैं.

परिवार से मुलाकात करने के बाद शिवराज सिंह चौहान ने अपने ट्विटर हैंडल से लिखा कि मैं सोना चाहता हूं, लेकिन आंखों में नींद नहीं है, मन बेचैन है, कैसे शांति पाऊं, यही सोच रहा हूं. अभी प्रियांश और श्रेयांश दोनों बेटों के पिता से मिल कर आ रहा हूं. मेरी अंतरात्मा रो रही है, मन दर्द से भरा हुआ है आखिर कोई इतना हृदयहीन कैसे हो सकता है कि मासूम बच्चों को जिन के पिता ने उन्हें बचाने के लिए फिरौती दे दी थी, उन को मारने में हाथ भी न कांपे…

मुख्यमंत्री रह चुके शिवराज सिंह चौहान ने यह भी लिखा कि मानवता शर्मसार हुई है, संवेदनाएं मर गई हैं. जब उन के पिता का दर्द देखा तो नि:शब्द हो गया, कहने को शब्द नहीं थे. पिता की एक ही मांग है कि अपराधियों को ऐसी सजा दी जाए कि फिर कोई दूसरे बच्चे प्रियांश और श्रेयांश की तरह तड़पातड़पा कर न मारे जाएं.

वहीं मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा कि गाड़ी में किस का झंडा लगा था, यह सामने आ गया है. इस घटना के पीछे जरूर कोई राजनीति है. अपराधी कहां से आ रहे थे? इस के पीछे किस का हाथ है…? विपक्ष डरा हुआ है, क्योंकि उन के लोग इस में शामिल हैं. जल्द ही सब साफ हो जाएगा. मैं ने बच्चों के पिता बृजेश रावत से फोन पर बात की है. मुझे इस घटना का दुख है. इस वारदात में शामिल गुनाहगारों को नहीं बख्शा जाएगा.

पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का कहना है कि घटना को किसी और दिशा में मोड़ दिया जा रहा है, ताकि भ्रम बना रहे और अपनी असफलता को छिपा सकें.

वहीं समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार हर मोरचे पर नाकाम है. कानून व्यवस्था के नाम पर जंगलराज है. अपराधी बेखौफ हैं. प्रदेश के नागरिक भयभीत हैं. उन की सुरक्षा प्रशासन तंत्र से नहीं, बल्कि अपराधियों, माफिया गिरोह की मेहरबानी पर निर्भर हो गई है.

मुख्यमंत्री कमलनाथ ने शपथ लेते ही दावे किए थे कि अब अपराधी या तो जेल में होंगे या फिर प्रदेश छोड़ कर चले जाएंगे. लेकिन सचाई यह है कि अब तो दूसरे राज्यों के अपराधी भी उत्तर प्रदेश को सुरक्षित पनाहगाह मानने लगे हैं. दुख है कि अब मांबाप बच्चों को स्कूल भेजने से भी डरेंगे.

पकड़े गए आरोपियों के नाम

1- राजीव द्विवेदी उर्फ रोहित, निवासी भभुआ, बबेरू, बांदा.

2- पद्म शुक्ला, जानकी कुंड, रघुवीर मंदिर के सामने, नयागांव, चित्रकूट, सतना.

3- आलोक सिंह उर्फ लकी सिंह तोमर, निवासी ग्राम तेदुरा, बिसंडा, बांदा.

4- विक्रमजीत सिंह, बिलपुर, थाना बहिलपुर, जिला जमुआ, बिहार.

5- रामकेश यादव, निवासी छेरा, बांदा.

6- पिंटू उर्फ पिंटा, निवासी गुरदहा, हमीरपुर, उत्तर प्रदेश.

सियासी संदेश के लिये ‘पांव पखार’ का महात्म

त्रेतायुग में अयोध्या के राजाराम को सियासी षडयंत्र का शिकार होकर जब वनवास पर जंगल जाना पड़ा तो उनको शबरी के जूठे बेर खाकर समाज में बराबरी का संदेश देना पड़ा. कलयुग में प्रधानमंत्री भी राजा का प्रतीक होता है. प्रधानमंत्री और भाजपा नेता नरेन्द्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में कुंभ में 5 सफाई कर्मचारियों के पैर धो कर त्रेतायुग के संदेश को दोहराने का काम किया. त्रेतायुग से कलयुग तक समाज के वंचित वर्ग को ऐसे प्रतीक सम्मान के ही हकदार हो रहे है. जिस तरह से रामायण में शबरी का महिमामंडन कर वंचित समाज को सम्मान का संदेश देने की कोशिश की गई उस तरह से कलयुग में 5 सफाई कर्मचारियों के पैर धेने पोछने से बराबरी का संदेश देने की कोशिश की जा रही है.

कुंभ में जिन 5 सफाई कर्मचारियों के पैर धो की साफ तौलिये से प्रधानमंत्री ने पोछा वह सभी खुद को ध्न्य समझ रहे हैं. जिस तरह से शबरी ने खुद को धन्य समझ लिया था. इन 5 कर्मचारियों में 3 पुरूष और दो महिलायें थी. इन सभी को खास तरह से बने अत्याधुनिक लाउंज में बैठाया गया. पानी मंगवाकर प्रधानमंत्री ने थाली में इनके बारीबारी से पांव धोए. उसके बाद सफेद तौलिया से पैरों को पोछा और उपहार देकर हालचाल पूछे शबरी की तरह अभिभूत थे. इनमें बांदा के प्यारेलाल,  चौबी और संभल के होरी लाल और कोरबा की ज्योति प्रमुख थे. ज्योति ने बताया कि पीएम से इतने सम्मान की उम्मीद नहीं थी. उन्होने सोंचा भी नहीं था कि देश के प्रधानमंत्री उनके पैर धुल कर पोछेंगे.

यह लोग इस सम्मान को पाकर अपनी खुशियां बांटने की तैयारी में हैं. यह इनके जीवन का महत्वपूर्ण क्षण हो सकता है पर बाकी सफाई कर्मचारियों की हालत जस की तस ही है. पांव पखारने की इस कड़ी में शामिल लोगों की खुशी और समान का गुणगान वैसे ही हो रहा जिस तरह से रामायण में शबरी का गुणगान हुआ. इसके बाद भी वंचित समाज त्रेतायुग से लेकर कलयुग तक छुआछूत और भेदभाव का शिकार क्यों हो रहा है इस पर विचार करने की जरूरत है. चुनावी साल में दलित वर्ग में संदेश देने की कोशिश कितनी प्रभावी होगी यह चुनाव के बाद पता चलेगा. कलयुग में शबरी का प्रतिनिधित्व करने वाले इन 5 सफाई कर्मचारियों की कहानी से देश भर के सफाई कर्मचारियों की समस्याओं पर क्या प्रभाव पडेगा? असल सम्मान तभी होगा जब सफाई कर्मचारियों की परेशानियों के लिये सरकार ठोस कदम उठायेगी.

सफाई कर्मचारियों के ‘पांव पखारने’ के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कुंभ की सफलता में उनके योगदान के महत्म का गुणगान किया. असल में इस पांव पखारने के जरीये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सफाई और स्वच्छता अभियान, गांव में खुले में शौच का बंद हो जाना और घर घर शौचालय का बन जाना जैसे मुद्दों का प्रचार करना था. चुनावी साल में ऐसे काम नये नहीं हैं. भारतीय जनता पार्टी ही नहीं दूसरे दलों के नेता भी ऐसा करते रहे हैं. दलितों के घर जाना झोपडी में खाना ऐसे काम चुनावी साल में खूब  दिखते हैं. भाजपा के भी बडे नेता भी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले दलितों के घर खाना खाने का अभियान पहले चला चुके हैं. ऐसे दिखावे के अभियान से दलित और वंचित समाज को क्या लाभ होता है इसको देखना जरूरी है.

प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने स्वच्छता अभियान को अपना सबसे प्रमुख काम मान कर बड़ी योजना बनाई. जिसके तहत गांव को खुले में शौच मुक्त करने का काम शुरू हुआ. जिसको सरकारी बोली से ओडीएपफ मुक्त गांव कहा जाने लगा. सरकारी आंकडो में 70 फीसदी गांव ओडीएपफ मुक्त बताये जा रहे हैं. गांवों में घरघर शौचालय बन गये हैं. जिन गरीबों के पास रहने के लिये घर नहीं था उनको शौचालय बनाने के लिये पैसा दिया गया. जैसे शौचालय बने है उनको प्रयोग होना संभव नहीं है. शौचालय के लिये बने गढ्ढे ऐसे नहीं हैं जो सही तरह से काम करें. सरकारी योजना को सफल बनाने के लिये बड़े पैमाने पर आंकडे दिये गये है. जो हकीकत से दूर है.

कुंभ के 5 सफाई कर्मचारियों के पांव धो कर प्रधानमंत्री ने सुर्खियां बटोर ली है. चारों तरफ इस बात का महिमामंडन हो रहा है कि पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने सफाई कर्मचारियों को ऐसा स्नेह दिया है. वह भूल जाते है कि त्रेतायुग में राम भी शबरी के बेर खाकर ऐसा संदेश दे चुके है. इसके बाद भी वंचित समाज को बराबरी का दर्जा नहीं मिला. समाज में छुआछूत अभी भी है. तमाम मंदिरों में दलितों का प्रवेश वंचित है. दलितों को पुजारी बनने का अधिकार नहीं है. उनके साथ गैरबराबरी का व्यवहार होता है. उत्तर प्रदेश में ही तमाम ऐसी घटनायें ‘योगीराज’  में ही घट चुकी हैं जिनसे पता चलता है कि छुआछूत और भेदभाव किस तरह से कायम है. सहारनपुर में दलित सवर्ण हिंसा इसकी बड़ी बानगी है.

सफाई कर्मचारी निश्चित तौर पर सफाई की नींव है. आजादी के बाद के साल क्या हुआ इस मुद्दे से इतर अगर 5 साल के ‘मोदी राज’  की बात करे तो सफाई कर्मचारी बड़ी संख्या में हादसों का शिकार हुये हैं. यह लोग सीवर सफाई के दौरान सीवर के अंदर जाने की वजह से मरे. ज्यादातर सफाई कर्मचारी ठेके पर काम कर रहे थे. मरने के बाद उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं था. सरकार ने सफाई और स्वच्छता अभियान पर भले ही लाखों करोड़ों खर्च कर दिया हो पर सीवर साफ करने वाले सफाई कर्मचारियों के लिये कोई ठोस योजना नहीं बनाई. कुंभ में 5 प्रधानमंत्री कर्मचारियों के पांव धूल कर वाहवाही भले ही मिल गई हो पर सीवर साफ करने में मरने वालों के सवाल अभी भी जबाव की तलाश में हैं.

पीरियड्स पर बनी इस भारतीय फिल्म को मिला औस्कर अवौर्ड

‘औस्कर 2019’ के विजेता घोषित किए जा चुके हैं. भारतीय प्रतिनिधि फिल्म के रूप में भारतीय फिल्मकार रीमा दास की फिल्म ‘विलेज रौक स्टार’ भले ही ‘औस्कर चयन समिति’ ने बाहर कर दिया था, मगर ‘औस्कर 2019’ पुरस्कार प्राप्त करने वाली फिल्मों में भारतीय फिल्मकार गुनीत मोंगा की डाक्यूमेंटरी फिल्म ‘पीरियडः एंड आफ सेंटेंस’ को डाक्यूमेंटरी कैटेगरी में सर्वश्रेष्ठ फिल्म के  ‘औस्कर अवार्ड 2019’ से नवाजा गया. वैसे इस फिल्म का निर्देशन ईरानी अमरीकन फिल्मकार रयाक्ता जहताबची और  मैलिसा बर्टन ने किया है.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘मसान’ और ‘लंच बाक्स’ जैसी फिल्मों का निर्माणकर शोहरत बटोर चुकी गुनीत मोंगा ने ‘पीरियड्सः एंड आफ सेंअेंस’ के लिए औस्कर  पुरस्कार जीतने के बाद ट्वीट करते हुए अपनी खुशी का इजहार करते हुए लिखा- ‘हम जीत गए. इस धरती पर मौजूद हर लड़की यह जान ले कि वह देवी है. हमने सिख्या एंटरटेनमेंट को पहचान दिलायी है.’

फिल्म ‘पीरियडः एंड आफ सेंटेंस’ के लिए पुरस्कृत होने पर निर्देशक रयाक्ता जहताबची ने कहा- ‘मुझे यकीन नहीं होता कि पीरियड्स पर बनी फिल्म ने औस्कर जीता है.’

भारतीय पृष्ठभूमि पर बनी 26 मिनट की अवधि वाली इस फिल्म में औरतों के पीरियड्स/मासिक धर्म के मुद्दे को उठाया गया है. फिल्म की कहानी के केंद्र में हापुड़ स्थित एक गांव की वह महिलाएं हैं, जिन्हे पीरियड्स के दौरान इस्तेमाल करने के लिए सेनेटरी पैड्स उपलब्ध नहीं है. ऐसे में तमाम औरतों को पीरियड्स के दौरान कई तरह की बीमारियां अपने चपेट में ले लेती हैं, जिससे उनकी मौत तक हो जाती है. फिल्म में इस बात का भी जिक्र है कि पीरियड/मासिक धर्म के दौरान लड़कियां स्कूल भी नही जा पाती हैं.पर एक दिन उनके गांव में सेनेटरी पैड की मशीन लगती है. तब उनमें जागरूकता आती है और फिर गांव की महिलाएं सेनेटरी पैड के प्रति दूसरी औरतों में जागरूकता फैलाने के साथ ही सेनेटरी पैड बनाने का काम करना शुरू कर देती हैं. पर गांव की औरतों के लिए यह सब आसान नहीं होता. गांव के रूढ़िवादी पुरूष उनके सामने विरोध की दीवार बनकर खड़े हो जाते हैं. पर वह हार नहीं मानती.विदेशों में भी उनकी चर्चा होती है और उनके सेनेटरी पैड को ‘फ्लाय’ यानी कि ‘एफ एल वाय’ नाम दिया जाता है.

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