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किडनी पर हो रहा है प्रदूषण का बुरा असर

देश के कई शहरों में प्रदूषण की स्थिति भयावह हो गई है. इससे लोगों में तरह तरह के रोगों का खतरा बढ़ रहा है. प्रदूषण से प्रभावित होने वाले अंगों में फेफड़े, आंख, त्वचा प्रमुख हैं. हाल ही में हुए एक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि पर्यावरण में फैले कुछ प्रदूषक तत्व किडनी के लिए बेहद खतरनाक हैं.

अमेरिका में हुए इस अध्ययन से खुलासा हुआ कि पर एंड पौलीफ्लोरोअल्काइल सबस्टांसेस (पीएफएएस) औद्योगिक प्रक्रियाओं और उपभोक्ता उत्पादों में इस्तेमाल होने वाले नॉन बायोडिग्रेडेबल (स्वाभाविक तरीके से नहीं सड़ने वाले) पदार्थों का एक बड़ा समूह है और ये पर्यावरण में हर जगह मौजूद हैं.

शोधकर्ताओं ने आगे बताया कि हम दूषित मिट्टी, पानी, हवा और खाने के जरिए पीएफएएस के संपर्क में आते हैं. जिसका सीधा असर हमारी किडनी पर होता है. शोधकर्ताओं ने कहा कि किडनी बेहद संवेदनशील अंग हैं खास कर बात जब पर्यावरणीय विषैले तत्वों की हो जो हमारे खून के प्रवाह में प्रवेश कर जाते हैं.

अनुसंधानकर्ताओं ने 74 अध्ययनों को देखा जिसमें पीएफएएस के संपर्क से जुड़े कई प्रतिकूल प्रभावों के बारे में बताया गया है. इन प्रभावों में गुर्दों का सही ढंग से काम न करना, गुर्दे के पास की नलियों में गड़बड़ी और गुर्दे की बीमारी से जुड़े चयापचय मार्गों का बिगड़ जाना शामिल है.

जंक फूड से होता है डिप्रेशन, जानिए और भी खतरे

आज अधिकतर लोग तनाव से पीड़ित हैं. खासकर के शरही क्षेत्र में रहने वाले कामगर लोगों में ये बीमारी खासतौर पर देखी जा रही है. इसके लिए लोगों का बेकार लाइफस्टाइल तो जिम्मेदार है ही, साथ में लोगों का खानपान भी एक प्रमुख कारण है. आज लोगों में जंकफूड खाने की प्रवृति अधिक हुई है. शहरी क्षेत्रों में लोगों के खानपान का ठीकाना होता नहीं है जिसके कारण उन्हें ना चाहते हुए भी जंकफूड की ओर बढ़ना पड़ता है. हाल ही की एक स्टडी में ये बात सामने आई कि जंकफूड के अधिक सेवन से लोगों में तनाव बढ़ रहा है.

अमेरिका में हुई इस स्टडी में करीब ढाई लाख लोगों को शामिल किया गया. इसमें उनके खानपान का खासा ध्यान रखा गया. स्टडी के मुताबिक जंकफूड का सेवन करने से ना सिर्फ बाइपोलर डिसऔर्डर होता है बल्कि डिप्रेशन का खतरा भी अधिक होता है.

इसके अलावा स्टडी में ये बात भी सामने आई कि अधिक मात्रा में शुगर का सेवन करने से लोगों में बाईपोलर डिसऔर्डर के होने का खतरा अधिक हो जाता है. इसपर जानकारी देते हुए स्टडी में शामिल जानकारों का कहना है कि लोगों को ख्याल रखना चाहिए कि डाइट का मानसिक सेहत पर क्या असर हो रहा है. मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए हेल्दी डाइट का होना जरूरी है.

जानकारों का मानना है कि अभी इस क्षेत्र में और अधिक शोध होना बाकी है, पर पूर्व में हुए शोधों के नतीजों की माने तो जंक फूड से डिप्रेशन का खतरा बढ़ता है.

पालक सैंडविच

सामग्री

– काली मिर्च (1/4 टी स्पून)

– स्वीट कार्न (1 टी स्पून)

– भुना जीरा पाउडर (1 टी स्पून)

– नीबू का रस (2 टी स्पून)

– पालक (2 कप)

– मक्खन (2 टी स्पून)

– नमक (स्वादानुसार)

बनाने की विधि

– पालक सैंडविच बनाने के लिए सबसे पहले पालक के पत्तो को लें और अच्छे से धोकर साफ कर लें.

– अब उनमे से पानी निकाल दें और चाकू की मदद से पालक के पत्तो को अच्छे से काट लें.

– अब एक कढ़ाई में मक्खन डालकर गरम करें.

– इसमें पालक के कटे हुए पत्ते, स्वीट कौर्न, नमक, काली मिर्च, जीरा पाउडर डालकर अच्छे से मिक्स करें.

– इस मिश्रण को 2 मिनट तक भूनें.

– कुछ देर मिश्रण को पकने के लिए गैस पर छोड़ दें.

– अब इस मिश्रण में निम्बू का रस डालें और दोबारा अच्छे से मिलाएं.

– अब एक ब्रेड स्लाइस ले उसपर मक्खन लगाए अब इसपर बना हुआ मिश्रण रखे और चारो तरफ फैलाए.

– अब इसपर दूसरी ब्रेड रख कर इसे ढक दें.

– सारे मिश्रण से इसी तरह सैंडविच बनाकर रख लें.

– इतना करने के बाद सैंडविच मेकर को ले और गरम कर लें.

– बने हुए सैंडविच को इसमें लगाए और 2-3 मिनट तक ग्रिल करें.

– सभी सैंडविच के साथ ऐसा ही करे कुछ ही देर में आपके स्वादिष्ट और लजीज पालक सैंडविच बनकर   तैयार है इन्हे सभी को सर्वे करें.

फेस पाउडर लगाने का यह है सही तरीका

चेहरे पर स्‍टेप बाई स्‍टेप फेस पाउडर लगाना चाहिये जिससे वह आर्टिफीशियल ना लगे. फेस पाउडर लगाने से चेहरा रूखा और खुरदुरा लगने लगता है. ज्‍यादा फेस पाउडर के प्रयोग से चेहरे पर पिंपल आदि निकल आते हैं. आइये जानते हैं कि फेस पाउडर को किस प्रकार से चेहरे पर लगाया जाना चाहिए.

किस प्रकार से लगाएं फेस पाउडर

फेस पाउडर के सही रंग का चुनाव करें. फेस पाउडर भूरे और सफेद रंग में आते हैं. आपको फेस पाउडर अपनी स्‍किन टोन के रंग के हिसाब से चुनना चाहिये. अगर आप गोरी हैं और आपने सफेद रंग का फेस पाउडर चुन लिया तो आपका चेहरा काला दिखने लगेगा.

मेकअप से पहले कैसे लगाएं सही बेस कंसीलर

अगर आप फेस पाउडर का प्रयोग कर रही हैं, तो कंसीलर का प्रयोग करना ना भूलें. हमेशा लूज पाउडर का प्रयोग करें और कम्‍पैक पाउडर का यूज ना करें.

नेचुरल लुक पाएं

ज्‍यादा मेकअप चेहरे का प्राकृतिकपन खो देता है. फेस पाउडर लगाने का सबसे अच्‍छा तरीका है कि आप उसे कम से कम ही लगाएं. पाउडर को हल्‍का सा गाल पर, थोड़ा सा ठुड्डी पर और चेहरे के टी जान पर लगाएं.

ब्‍लोटिंग पेपर का प्रयोग

चेहरे पर अगर ज्‍यादा पाउडर लग गया हो, तो उसे ब्‍लोटिंग पेपर से साफ करें. इससे आपक चेहरा मेकअप से भरा हुआ नहीं दिखेगा.

अंडरआर्म की टैनिंग दूर करने के असरदार तरीके

ठंडी हो या गर्मी सूरज की किरणें पूरे शरीर का रंग काला कर देती है. इस दौरान आपके अंडरआर्म में टैनिंग होने की संभावना बढ़ जाती है. काला अंडर आर्म देखने में बहुत ही बदसूरत लगता है और यह दूसरों पर बुरा प्रभाव छोड़ता है. मगर कुछ ऐसे घरेलू तरीके हैं, जिनकी सहायता से आप अपने अंडर आर्म की टैनिंग से निजात पा सकती हैं. आइये जानते हैं कि कैसे साफ करें अपने अंडरआर्म को

शहद और नींबू

नींबू को काट कर उसे निचोड़ लें और फिर उसके छिलके में अंदर की ओर शहद की कुछ बूंद डालें. अब इससे अपने अंडरआर्म को हल्‍के हाथों से रगडें. ऐसा महीने भर करने से आपके अंडरआर्म का कालापन निकल जाएगा.

आलू

आलू के टुकडे़ को जब त्‍वचा पर रगड़ा जाएगा तो अंडरआर्म का कालापन दूर हो जाएगा.

एलोवेरा

अगर घर पर एलोवेरा का पेड़ हो तो आप उसके जैल को अंडरआर्म पर रोजाना लगा सकती हैं. इससे अंडरआर्म का कालापन दूर हो जाएगा.

दूध और हल्दी

दूध और हल्दी पेस्‍ट को अंडरआर्म पर हफ्ते में एक बार लगाएं और इसका जादू देखें.

गुलाब जल और नींबू

नींबू एक ब्‍लीचिंग एजेंट है इसलिये इसे सीधे प्रयोग करने से बचना चाहिये. आप रोज वाटर और नींबू के रस को एक साथ मिक्‍स कर के टैनिंग वाली जगह पर लगा सकती हैं.

सहवाग का डर सही साबित हुआ

कल भारत और औस्ट्रेलिया के बीच विशाखापटनम में पहला इंटरनेशनल ट्वेंटी20 मैच खेला गया था. उस से पहले इस सीरीज को ले कर एक विज्ञापन बनाया गया था. उस विज्ञापन में क्रिकेटर रहे वीरेंद्र सहवाग बेबी सीटर बने दिखाई देते हैं और वे औस्ट्रेलिया टीम की ड्रैस पहने कुछ गोरे बच्चों से घिरे रहते हैं. विज्ञापन में उन्हें भारत के जीतने का पक्का भरोसा होता है पर आखिरी में वे यह कहते हुए भी अपना डर जाहिर करते हैं कि कहीं मेहमान खिलाड़ी उन के अरमानों पर पानी न फेर दें.

औस्ट्रेलिया ने वीरेंद्र सहवाग का डर सही साबित कर दिया. बड़े सितारों से सजी भारतीय टीम आखिरी गेंद तक खिंचे कम स्कोर वाले पहले टी20 इंटरनेशनल क्रिकेट मैच में हार गई. इस मैच में भारत ने पहले बल्लेबाजी की थी और सलामी बल्लेबाज शिखर धवन उर्फ ‘गब्बर’ को बाहर बैठा दिया था. उन की जगह केएल राहुल को मौका दिया गया था.

पर भारत की शुरुआत अच्छी नहीं रही. सब से पहले रोहित शर्मा जल्दी आउट हो गए. उन्होंने 8 गेंदों पर 5 रन बनाए और वे जेपी बेहरनडार्फ की गेंद पर स्कूप करने की कोशिश में शार्ट फाइन लेग पर आसान सा कैच दे बैठे.विराट कोहली भी 24 रन बना कर ए. जंपा की गेंद पर लांग आन पर कैच दे बैठे जबकि उस के बाद ऋषभ पंत महज 3 रन बना कर अपनी ही गलती से रन आउट हो गए.

इस बीच केएल राहुल ने दूसरा छोर संभाला हुआ था. उन्होंने 35 गेंदों पर अपने टी20 इंटरनेशनल कैरियर का 5वां अर्धशतक पूरा किया, लेकिन इस के तुरंत बाद वे कूल्टर नाइल की गेंद पर आसान सा कैच दे बैठे. कूल्टर नाइल ने अपने इसी ओवर में नए बल्लेबाज दिनेश कार्तिक को भी आउट कर दिया था. उन्होंने एक रन बनाया था.

इस मैच में महेंद्र सिंह धौनी से बड़ी उम्मीद थी पर उन्होंने भी निराश ही किया. वे आउट तो नहीं हुए पर उन की धीमी बल्लेबाजी के चलते भारत आखिरी के 11 ओवरों में केवल 50 रन ही बना सका जबकि पहले के 9 ओवरों में भारत ने 76 रन बटोरे थे. इस तरह से हमारी टीम 7 विकेट पर 126 रन तक ही पहुंच पाई.
127 रनों के टारगेट का पीछा करने उतरी ऑस्ट्रेलियाई टीम की शुरुआत अच्छी नहीं रही थी. 5 रन के स्कोर पर उस के मार्कस स्टोइनिस और आरोन फिंच के रूप में 2 विकेट गिर गए थे.

इस के बाद एम. शार्ट और ग्लेन मैक्सवेल ने पारी को संभाला. एम. शार्ट ने 37 रन बनाए जबकि ग्लेन मैक्सवेल ने 43 गेंदों पर 56 रनों की शानदार पारी खेली.यह मैच कभी भारत के पक्ष में जा रहा था तो कभी ऑस्ट्रेलिया के पक्ष में. आखिरी ओवर में तो रोमांच हद पर हो गया था.

दरअसल, औस्ट्रेलिया को आखिरी के 2 ओवरों में 16 रन चाहिए थे. जसप्रीत बुमराह ने 19वें ओवर में केवल 2 रन दिए और पीटर हैंडसकॉम्ब व नाथन कूल्टर नाइल को आउट कर के भारतीय खेमे में मैच जीतने की उम्मीद जगा दी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

मैच के आखिरी ओवर में उमेश यादव की पहली गेंद पर एक रन बना तो ए. रिचर्डसन ने दूसरी गेंद पर चौका लगा दिया. उन्होंने तीसरी गेंद पर 2 रन और चौथी गेंद पर एक रन बनाया. आखिरी की 2 गेंदों में मेहमान टीम को जीत के लिए 6 रन चाहिए थे. तब पैट कमिंस बल्लेबाजी कर रहे थे. उन्होंने 5वीं गेंद पर चौका लगाया और आखिरी गेंद पर 2 रन लेते हुए इस रोमाचंक मैच को जीत लिया.

इस तरह औस्ट्रेलिया ने भारत पर 3 विकेट से रोमांचक जीत दर्ज कर 2 मैचों की सीरीज में शुरुआती बढ़त बना ली है.

LIC पौलिसी खरीदते वक्त कहीं आप भी तो नहीं करते ये 5 गलतियां

सरकार की ओर कई बार गाइडलाइन जारी की जाती हैं कि‍ बीमा एजेंट ग्राहक को हर बात सच-सच बताएं. इसके बाद अगर कोई पॉलि‍सी लेना चाहे तो ठीक और न लेना चाहे तो एजेंट उसे फोर्स नहीं कर सकते. इसके बावजूद एजेंट कई तरह की बातें और तरकीब लगा ग्राहक को पॉलि‍सी बेच देते हैं. ऐसे में हम आप को बता रहे हैं जीवन बीमा एजेंट की ओर से अपनाई जाने वाली ऐसी तरकीबें, जि‍नसे हर ग्राहक को अलर्ट रहना चाहि‍ए.

  1. यह एक बढ़िया निवेश विकल्प है

अक्सर बीमा एजेंट पॉलि‍सी बेचने के लि‍ए कहते हैं कि‍ यह पॉलि‍सी एक अच्छा नि‍वेश वि‍कल्प भी है. लेकि‍न इस दौरान सबसे पहले आपको सोचना होगा कि‍ आप पॉलि‍सी नि‍वेश के लि‍ए ले रहे हैं या फि‍र अच्छे कवर के लि‍ए. इसके बाद भी पॉलि‍सी की शर्तों को ठीक से पढ़ें और सि‍र्फ एजेंट के कहने पर ही पॉलि‍सी को नि‍वेश का अच्छा तरीका मानकर न खरीद लें.

  1. नहीं कराने होंगे मेडिकल टेस्ट

पॉलि‍सी कई तरह की होती हैं. ऐसी कई पॉलि‍सी हैं जि‍नमें मेडि‍कल टेस्ट नहीं कराने होते, लेकि‍न इन पॉलिसीज में कवर बहुत कम होता है. इसमें पहले तो आपको कहा जाएगा कि आप पूरी तरह ठीक हैं, लेकिन अगर भविष्य में आपको कुछ हो जाता है (मृत्यु) तो पूरी छानबीन होती है. इसके बाद आपके नॉमिनी को बता दिया जाता है कि‍ आपको कोई बीमारी थी, जि‍सके बारे में आपने बीमा कंपनी को नहीं बताया था. ऐसे में नॉमि‍नी को क्लेम नहीं मिलेगा. वहीं, जि‍न पॉलि‍सीज में कवर ज्यादा होता है उनमें मेडि‍कल टेस्ट कराना जरूरी होता है.

  1. इससे ज्यादा रिटर्न कहीं नहीं मिलेगा

15-18 फीसदी के बीच रि‍टर्न देने की बात एकदम झूठ है. क्‍‍‍‍‍‍‍‍योंकि‍ कोई भी कंपनी वो प्राइवेट हो या सरकारी कभी इतना रि‍टर्न नहीं दे सकती. वहीं, जो उत्पाद बड़ी आबादी के लिए चलाए जा रहे हों उनमें इतना रिटर्न देना मुश्किल है. ऐसे में साफ है कि‍ एजेंट झूठ बोल रहा है.

  1. इसमें निवेश करने के लिए ये आखिरी हफ्ता है

ये बीमा एजेंटो का वो झूठ है जो ज्यादातर लोगों पर काम कर जाता है. चाहे लोग पढ़े-लिखे, अनपढ़, स्त्री, पुरुष सभी इस चिंता में आकर कि इतनी बढ़िया स्कीम फिर नहीं मिलेगी, पॉलिसी खरीद लेते हैं.

  1. सर ये एलआईसी का यूनिट लिंक्ड प्लान है, तो रिटर्न पक्का है

अगर आप इस बात पर यकीन करते हैं तो दुनिया में किसी भी बात पर विश्वास कर लेते होंगे. दुनिया में किसी भी यूलिप में गारंटीड रिटर्न नहीं मिलता. अगर आप पारंपरिक यूलिप प्लान लेते हैं तो आप गारंटीड रिटर्न हासिल कर सकते हैं. हालांकि ये सबसे कम दरों पर रिटर्न देते हैं. तो ये बात जान लें कि आप यूलिप प्लान एसबीआई, एचडीएफसी, एलआईसी, आईसीआईसीआई या किसी से भी लें तो जोखिम पूरी तरह आपका ही होगा तो सावधान रहें.

राजनीतिक दंगल में उतरीं फिल्में

लोकसभा चुनाव से लगभग 3 महीने पहले 11 जनवरी को ‘द ऐक्सिडैंटल प्राइम मिनिस्टर.’ फिल्म रिलीज हुई. इस से पहले इस फिल्म का ट्रेलर पिछले वर्ष 27 दिसंबर को जारी हुआ. जिस के बाद से भाजपा और कांग्रेस आमनेसामने थीं. दोनों के बीच कई दिनों तक तकरीबन हर टीवी चैनल, अखबार और सोशल मीडिया पर ऐसी जबानी जंग छिड़ी रही जिस से हर घर को पता चल गया कि मनमोहन सिंह के बारे में बनी ‘द ऐक्सिडैंटल प्राइम मिनिस्टर’ फिल्म जल्दी ही थिएटरों की शोभा बढ़ाने वाली है.

कांग्रेस ने इसे भ्रामक प्रचार, मनमोहन सिंह को बदनाम करने की साजिश बताया तो भाजपा की ओर से कहा गया कि यह कहानी है कि कैसे एक परिवार ने देश को 10 साल तक बंधक बना कर रखा. तब कई फिल्म समीक्षकों ने कहा कि इस चुनाव में नया ट्रैंड शुरू होगा. आम चुनाव तक कई बायोपिक रिलीज होने वाले हैं जो इस बात का संकेत है कि वोट के लिए फीचर फिल्में इस्तेमाल की जाएंगी.

वे समीक्षक गलत नहीं थे. पिछले चुनाव में सोशल मीडिया का इस्तेमाल हुआ था, इस बार फीचर फिल्मों का होगा. चुनावों को ध्यान में रख कर इस महीने 4 बायोपिक रिलीज हुए हैं. उन के पीछे एक राजनीतिक मकसद है कि आखिर फिल्में दर्शकों की सोच को प्रभावित करती हैं.

हर शुक्रवार फार्मूला फिल्में परोसने वाले बौलीवुड को पिछले कुछ समय से अचानक बायोपिक का चस्का लग गया है. कुछ राजनीतिक दल चुनाव के मौसम में चुनावप्रचार के लिए इस का जम कर इस्तेमाल कर रहे हैं. इस साल के पहले महीने में ही अब तक 4 बायोपिक प्रदर्शित हो चुके हैं, चुनाव तक कई और आने वाले हैं.

‘उरी द सर्जिकल स्ट्राइक’ तो डेढ़ सौ करोड़ कमा कर सौ करोड़ी क्लब में ऐंट्री पा चुकी है. पहले लगा था कि कहीं सिर्फ भाजपा वालों का यह नया चुनावी हथकंडा तो नहीं है, मगर अब लगता है कि कई पार्टियां फिल्मों का अपनी बात वोटरों तक पहुंचाने के लिए इस्तेमाल कर रही हैं. इन में भाजपा सब से आगे है. इस के साथ यह भी सवाल उठने लगा है कि ये राजनीतिक बायोपिक चुनावी लाभ पहुंचाने में कहां तक सफल होंगे.

ये फिल्में चुनावी रूप से कितनी सफल होंगी, यह अभी से कहना मुश्किल है मगर ये फिल्में अपनी पब्लिसिटी खुद कर लेती हैं. फार्मूला फिल्मों को अपने प्रचार के लिए कोई न कोई कंट्रोवर्सी गढ़नी पड़ती है. मगर राजनीतिक बायोपिक के साथ तो कंट्रोवर्सी खुद खिंची चली आती है. उन को टीवी, अखबार और सोशल मीडिया चटखारे लेले कर उछालता है. सो, हींग लगे न फिटकरी और पब्लिसिटी पूरी.

वोट की खातिर फिल्में

वैसे अभी चुनाव के लिए फिल्मों के इस्तेमाल के सिलसिले में जो हिंदी फिल्में सामने आ रही हैं उन्हे देख कर लगता है कि यह भाजपा खेमे की पार्टियों द्वारा वोट के लिए फिल्मों के इस्तेमाल की सुनियोजित कोशिश है. जैसे, ‘द ऐक्सिडैंटल प्राइम मिनिस्टर’.  कांग्रेस पार्टी और उस की सरकार के 10 वर्ष तक प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह को बदनाम करने की कोशिश है.

यह फिल्म दिखाती है कि मनमोहन सिर्फ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के हाथों की  कठपुतली मात्र थे. स्वतंत्ररूप से वे कोई फैसला नहीं ले पाते थे. इस के साथ रिलीज हुई ‘उरी द सर्जिकल स्ट्राइक’ मोदी सरकार की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि सर्जिकल स्ट्राइक के बारे में थी जिसे विपक्ष फर्जीकल स्ट्राइक कहता है. यह फिल्म यह दिखाने की कोशिश है कि मोदी सरकार किस तरह साहसी फैसले लेने की क्षमता रखती है.

‘मणिकर्णिका – द क्वीन औफ झांसी’ के जरिए भाजपा ने अपने राष्ट्रवाद के एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश की है. ‘ठाकरे’ के जरिए भाजपा की सहयोगी पार्टी शिवसेना ने हिंदुत्व की विचारधारा को लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया है. यह भाजपा के प्रचार का पैटर्न है. आप सोच रहे होंगे कि सारा तामझाम हो और मोदी

न हों, यह भला कैसे संभव है. मोदी के बिना भाजपा का प्रचार आगे बढ़ ही नहीं सकता. आप को बता दें कि चुनाव से पहले मोदी पर भी फिल्में दिखाई जाएंगी.

‘द ऐक्सिडैंटल प्राइम मिनिस्टर.’ फिल्म तो साफसाफ भाजपा की करतूत नजर आती है. फिल्म के निर्देशक विजय रत्नाकर गुट्टे हैं. यह उन की पहली फिल्म है. बता दें कि बीते अगस्त महीने में विजय रत्नाकर गुट्टे को 34 करोड़ रुपए से ज्यादा की वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) धोखाधड़ी मामले में गिरफ्तार किया गया था. गुट्टे चीनी कारोबार से जुड़े उद्योगपति रत्नाकर गुट्टे के बेटे हैं. रत्नाकर गुट्टे ने 2014 में महाराष्ट्र के परभणी जिले के गंगाखेड़ से भाजपा गठबंधन की तरफ से 2014 का विधानसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन वे हार गए थे.

गुट्टे की गिरफ्तारी ऐसे समय में हुई है जब उन के पिता की कंपनी पर 5,500 करोड़ रुपए की बैंक धोखाधड़ी का आरोप लगा है. इस तरह, उन के भाजपा से रिश्ते हैं. इसलिए भाजपा के आधिकारिक फेसबुक और ट्विटर अकाउंट से फिल्म के ट्रेलर को साझा किया गया. इस के बाद से कांग्रेस और आम आदमी पार्टी की ओर से भाजपा पर निशाना साधा गया.

दूसरी तरफ कांग्रेस नेताओं ने अनुपम खेर अभिनीत फिल्म ‘द ऐक्सिडैंटल प्राइम मिनिस्टर’ को अपनी पार्टी के खिलाफ भाजपा का दुष्प्रचार करार दिया. इस के बाद, महाराष्ट्र यूथ कांग्रेस के नेताओं ने धमकी दी थी कि फिल्म रिलीज होने से पहले वे इस की स्क्रीनिंग चाहते हैं और अगर उन की मांग पूरी नहीं की गई तो वे इस फिल्म को देश में कहीं भी रिलीज नहीं होने देंगे. उधर, फिल्म में मनमोहन सिंह का किरदार निभा रहे अनुपम खेर ने कहा कि यह मेरा अब तक का सब से बेहतरीन अभिनय है.

‘यह एक राजनीतिक फिल्म है,’ फिल्म को ले कर शुरू हुए विवाद पर खेर ने कहा, ‘यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मामला है. हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते हैं, लेकिन बात जब इसे लागू करने की होती है तो सभी लोग पीछे हट जाते हैं.’

अनुपम खेर की दलील के बावजूद यह गंभीर राजनीतिक फिल्म नहीं, बल्कि प्रोपेगंडा फिल्म है. इस की ट्रैजडी यह है कि प्रोपेगंडा फिल्म बनने में भी यह फेल हो गई है. यानी फिल्म ने प्रोपेगंडा करने की कोशिश की है मगर यह कोशिश पूरी तरह असफल हो गई. मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार संजय बारू की किताब पर आधारित पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के राजनीतिक जीवन पर बनी इस फिल्म के ट्रेलर रिलीज होने के बाद जैसा होहल्ला मचाया गया था, फिल्म में वैसा कुछ भी नहीं है. साफ शब्दों में कहें तो यह बेहद ही कमजोर फिल्म है.

फिल्म में वही है, जैसा लगभग उस समय सरकार को ले कर धारणा थी. फिल्म में सोनिया गांधी पर निशाना साधा गया है. सत्ता के 2 केंद्र हैं, पीएम पर एक परिवार का दबाव है, गठबंधन की मजबूरियां हैं. यह बात लगभग हर जबान पर थी. मनमोहन सिंह दूसरे कार्यकाल में लगातार कमजोर होते चले गए. पहले कार्यकाल के बाद उन्हें  ‘सिंह इज किंग’ कहा जाता था, लेकिन बाद में उन्हें अंदर ही अंदर कमजोर किया जाता रहा. फिल्म में ऐसा ही दिखाया गया है.

दर्शकों के लिहाज से कहें तो जो थोड़ीबहुत राजनीतिक रुचि रखते हों वही इसे देख सकते हैं. पूरी कहानी बिखरी हुई है और कई बार यह एक पौलिटिकल डौक्युमैंट्री टाइप की लगती है, फीचर फिल्म नहीं.

इस के साथ ही ‘उरी द सर्जिकल स्ट्राइक’ भी रिलीज हुई. फिल्म पाकिस्तान के खिलाफ भारत द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक पर है. 18 सितंबर, 2016 को उरी हमले में भारतीय सेना के 19 जवान शहीद हुए थे, जिस के जवाब में भारतीय सेना ने पाकिस्तान में सर्जिकल स्ट्राइक की थी. फिल्म उसी रात की कहानी को परदे पर ले कर आई है. सर्जिकल स्ट्राइक सेना का अभियान था, मगर मोदी सरकार ने इसे राजनीतिक रूप से भुनाने की पूरीपूरी कोशिश की.

फिल्म में परेश रावल, कीर्ति कुल्हारी, यामी गौतम और मोहित रैना ने अहम भूमिका निभाई है. ऐक्टर विक्की कौशल की फिल्म ‘उरी द सर्जिकल स्ट्राइक’ ने बौक्सऔफिस पर काफी धमाल मचा रखा है.

राजनीतिक रंग

भाजपा की राज्य सरकारें इस से मनोरंजन कर माफ कर सकती हैं. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने फिल्म ‘उरी द सर्जिकल स्ट्राइक’ को प्रदेश में टैक्सफ्री कर दिया है. टिकट के दाम कम हो जाने से ज्यादा से ज्यादा दर्शक सिनेमाघरों की ओर रुख कर रहे हैं.

यह फिल्म हालिया रिलीज हुईं कंगना रनौत की ‘मणिकर्णिका’ और नवाजुद्दीन सिद्दीकी की ‘ठाकरे’ को टक्कर दे रही है. इस फिल्म का ‘हाउज द जोश’ डायलौग काफी फेमस हो रहा है. यह फिल्म बौक्सऔफिस पर धूम मचा रही है, मगर इस के साथ रिलीज हुई ‘द ऐक्सिडैंटल प्राइम मिनिस्टर.’ का तो बौक्सऔफिस पर ऐक्सिडैंट ही हो गया, बहुत कम कमाई हुई. कुल मिला कर लोग अच्छी फिल्म पसंद करते हैं, प्रोपेगंडा नहीं. प्रोपेगंडा भी हो तो मनोरंजन की चाशनी में लिपटा हुआ.

वोट के लिए भाजपा शहीदों को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही. रिपब्लिक डे के मौके पर रिलीज हुई कंगना रनौत की रानी झांसी पर बनी फिल्म ‘मणिकर्णिका’ को भाजपा के एजेंडे का हिस्सा माना जा रहा है. ‘पद्मावत’ की तरह ही करणी सेना ‘मणिकर्णिका’ का विरोध करने की धमकी दे रही थी. हालांकि, जहां ‘पद्मावत’ की रिलीज से पहले दीपिका ने चुप्पी साधी थी, वहीं, कंगना रनौत ने करणी सेना की धमकियों का मुंहतोड़ जवाब दिया. वे फिल्म की निर्देशक भी हैं.

करणी सेना ने आरोप लगाया कि फिल्म में झांसी की रानी के किरदार को गलत तरीके से दिखाया गया है. फिल्म में दिखाया गया है कि रानी लक्ष्मीबाई का ब्रिटिश सैनिक के साथ अफेयर था. इस के अलावा फिल्म में रानी लक्ष्मीबाई को एक गाने में डांस करते हुए भी दिखाया गया है.

फिल्म की मेकिंग के दौरान ब्राह्मणों के संगठन सर्व ब्राह्मण महासभा ने फिल्म का विरोध किया था. इस कंट्रोवर्सी से पद्मावत तो सुपरडुपर हिट हो गई मगर ‘मणिकर्णिका’ बहुत ज्यादा सफल नहीं हो पाई.

‘मणिकर्णिका’ के प्रदर्शित होने पर इन विवादों पर विराम लग गया. इस फिल्म के कणकण में कंगना हैं. इसे देखते हुए कम ही मौके ऐसे आते हैं जब वे फ्रेम में नहीं होतीं और जैसे ही आप का ध्यान इस पर जाता है, वे ओज से भरा कोई संवाद बोलती हुई दोबारा नजर आने लगती हैं. इस सब के बावजूद ‘मणिकर्णिका’ में वह चीज गैरमौजूद है जिसे फिल्म का दिल कहा जा सके.

अगर यह फिल्म किसी भी वजह से देखी जानी चाहिए तो वह केवल इस का रानी लक्ष्मीबाई पर आधारित होना और उन की भूमिका में कंगना रनौत का जानदार अभिनय है. भाजपा इस में अपना एजेंडा इस तरह लाई है कि रानी युद्ध के मैदान में ‘हर हर महादेव’ का उद्घोष कर फिरंगियों पर टूट पड़ती हैं. बीजेपी समर्थकों का दावा है कि यह फिल्म भी ‘द ऐक्सिडैंटल प्राइम मिनिस्टर.’ की तरह पार्टी को फायदा पहुंचाएगी.

बाल ठाकरे का महिमामंडन

शिवसेना के नेता संजय राउत निर्मित ‘ठाकरे’ विशुद्ध प्रोपेगंडा फिल्म है जो बाल ठाकरे का महिमागान करती है और केवल शिवसेना की विचारधारा में यकीन करने वालों को ही रास आएगी. ठाकरे के पास कभी कोई पौजिटिव कार्यक्रम नहीं था. मराठी मानुस की रक्षा के नाम पर उन्होंने कभी दक्षिण भारतीयों को मुंबई से भगाने का अभियान चलाया, कभी उत्तर भारतीयों को निकालने का. कभी मुसलमानों के खिलाफ लड़े. नएनए विवाद पैदा करना ही उन की लोकप्रियता का राज था.

‘सामना’ की तरह ही ‘ठाकरे’ में बाल ठाकरे के हर विरोधी की आलोचना की गई है और उसे शिवसेना प्रमुख से कमतर दिखाया गया है. बाल ठाकरे के कई मोनोलौग फिल्म में हैं जो कि ‘सामना’ में लिखे उन के संपादकीय की तरह ही विवादास्पद बातें करते हैं.

लोकतंत्र में विश्वास न रखने से ले कर हिटलर जैसा होने की उन की ख्वाहिश तक को फिल्म में जोरशोर से रेखांकित किया गया है. दक्षिण भारतीयों को निशाना बनाने के लिए दिए उन के नारे ‘बजाओ पुंगी, हटाओ लुंगी’ से ले कर ऐंटीमुसलिम बातें भी खूब कही गई हैं.

फिल्म में शिवसैनिकों द्वारा हिंसा किए जाने वाले दृश्यों को बारबार महिमामंडित किया गया है और उन के द्वारा बाल ठाकरे के विरोधियों की हत्या तक करने को आराम से दिखा दिया गया है. यह प्रोपेगंडा फिल्म आखिर तक अपने सुप्रीमो और उन के सैनिकों द्वारा की गई हिंसा को सही बतलाती है और उसे किसी तरह की कोई हिचक इस पार्टी के हिंसक इतिहास को परदे पर चित्रित करने में नहीं होती. यह फिल्म ज्यादा चली नहीं, यह इस बात का संकेत है कि वोटर अब समझदार हो गया है. उसे हिंसा नहीं, विकास चाहिए.

चुनावी प्रोपेगंडा

भाजपा कांग्रेस को मांबेटे की पार्टी कहती है. जबकि वह खुद नरेंद्र मोदी का वनमैन शो बन गई है. उन के बिना भाजपा का प्रचार संभव ही नहीं है. इसलिए चुनावप्रचार के लिए मोदी पर फिल्म न बने, यह कैसे हो सकता है. ओमंग कुमार के निर्देशन में मोदी पर बनी फिल्म का फर्स्टलुक लौंच कर दिया गया है.

मूवी में विवेक ओबेराय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रोल में दिखेंगे. करीबन 2 साल बाद विवेक किसी बौलीवुड फिल्म में नजर आएंगे. ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ फिल्म की रिलीज डेट का अभी ऐलान नहीं हुआ है मगर चुनाव के पहले रिलीज करने की कोशिश की जा रही है. इस बीच, फर्स्ट पोस्टर सामने आने के बाद विवेक के लुक पर बहस छिड़ गई है.

सोशल मीडिया पर एक सैक्शन ऐसा भी है जिसे विवेक ओबेराय ‘पीएम मोदी’ के लुक में बिलकुल भी पसंद नहीं आ रहे. इस सैक्शन वाले ऐक्टर को ट्रोल कर रहे हैं. लोगों ने तो विवेक की कास्टिंग पर भी सवाल उठा दिया है. पीएम मोदी के रोल में विवेक को साइन किए जाने से नाराज एक खेमा मेकर्स के खिलाफ बयानबाजी कर रहा है. उस खेमे का मानना है कि इस रोल के लिए परेश रावल को चुना जाना चाहिए था. इस तरह मोदी के प्रशंसकों में ही जंग शुरू हो गई है.

लोगों ने विवेक के फर्स्टलुक पोस्टर पर नकली, फोटोशौप्ड और हैवी मेकअप बताया है. सोशल मीडिया पर मेकर्स को सुझाव भी मिल रहे हैं. एक यूजर ने लिखा, ‘विवेक के बजाय इस रोल के लिए परेश रावल को कास्ट किया जाना चाहिए था.’ कुल मिला कर विवेक की कास्टिंग पर खुलेआम निराशा जाहिर की जा रही है. ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ को विवेक ओबेराय के पिता सुरेश ओबेराय और संदीप सिंह ने प्रोड्यूस किया है. मूवी को 23 भाषाओं में रिलीज किए जाने की तैयारी है. फिल्म का बजट करीब 200 करोड़ रुपए बताया जा रहा है.

कई जानकार मानते हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले सिनेमाहौल में ‘मोदीमोदी’ की गूंज सुनाई देगी. प्रधानमंत्री मोदी के किरदार से जुड़ी कम से कम 4 फिल्में रिलीज होंगी. किसी फिल्म में प्रधानमंत्री के तौर पर लीड हीरो, तो किसी में गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर तो किसी फिल्म में रणनीतिकार और चिंतक, तो किसी में कड़े फैसले लेने वाले के रूप में प्रधानमंत्री मोदी बड़े परदे पर दिखेंगे.

वहीं, बसपा समर्थक भी बायोपिक के चक्कर में उलझ गए हैं. यूट्यूब पर एक फिल्म ‘द ग्रेट लीडर कांशीराम’ रिलीज हुई है. इस फिल्म को अपलोड किए जाने के 2 दिनों के अंदर अलगअलग चैनलों पर 2 लाख लोग देख चुके हैं. यह फिल्म ग्वालियर शहर के 23 वर्षीय फिल्मकार अर्जुन सिंह ने बनाई है. वही इस फिल्म के प्रोड्यूसर भी हैं.

यह फिल्म डायरैक्टर की जेब के पैसे और लोगों की फंडिग से बनी है. इस पर कुल खर्चा 45 लाख रुपए के आसपास है. इस में कोई स्टार नहीं है, न ही इस का संगीत किसी जानेमाने संगीतकार ने दिया है और न ही अखबारों, पत्रिकाओं या चैनलों पर इस की कोई चर्चा हुई.

ग्वालियर के अलावा महाराष्ट्र के कुछ सिनेमाहौल में यह फिल्म आई और देखते ही देखते उतर गई. अर्जुन सिंह बताते हैं, ‘आखिरकार जब फिल्म की लागत वसूल नहीं हुई, कर्ज उतारने के मकसद से मैं ने इसे यूट्यूब पर जारी कर दिया.’ उन्हें लगता है कि इस तरह उन का कुछ पैसा वापस आ जाएगा और वे अपना कर्ज चुका पाएंगे.

दक्षिण भारत भी पीछे नहीं

दक्षिण भारत तो सिनेमा का स्वर्ग है जहां फिल्मी सितारे देवता की तरह पूजे जाते हैं. वहां वोट के लिए बायोपिक न बने, यह कैसे हो सकता है. वहां भी वोट के लिए बायोपिक बन रहे हैं. गैरकांग्रेसवाद के मसीहा और तेलुगू फिल्मों के सुपरस्टार व आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एन टी रामाराव की बायोपिक की चर्चा पिछले काफी समय से चल रही थी. 9 जनवरी को इस फिल्म को बड़े स्तर पर आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में रिलीज कर दिया गया. वहीं, तमिलनाडु में लगभग 1,000 स्क्रीन्स पर जबकि कर्नाटक और केरल में भी यह बायोपिक रिलीज की गई है.

एन टी रामाराव के जीवन पर 2 हिस्सों में बायोपिक बनाई गई है. यह इस बायोपिक का पहला भाग है और दूसरा भाग फरवरी में ही रिलीज होने की उम्मीद है. इस फिल्म का निर्देशन कृष जगारलामुडी ने किया है. फिल्म में एनटीआर का रोल उन के बेटे नंदमूरि बालकृष्ण ने निभाया है. जबकि बौलीवुड ऐक्ट्रैस विद्या बालन ने उन की पत्नी बासवतारकम नंदमूरि के किरदार में नजर आई हैं. वहीं, बाहुबली फेम राणा दुग्गुबाती आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू की भूमिका में है.

फिल्म को ले कर सोशल मीडिया पर जम कर रिऐक्शन आ रहे हैं. इन में बालकृष्ण और विद्या की ऐक्टिंग के अलावा, फिल्म की स्टोरी और स्क्रीनप्ले की तारीफ की जा रही है. कई लोग तो इसे बालकृष्ण के कैरियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन भी बता रहे हैं. एनटीआर फिल्मों के बाद आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर भी सफल रहे और 3 बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे.

इस फिल्म के जवाब में लक्ष्मी एनटीआर बनी है. लक्ष्मी पार्वती एनटीआर की दूसरी बीवी थी. उस का मानना है कि चंद्रबाबू ने एनटीआर की पीठ में छुरा घोंपा. इस कारण इस फिल्म के निर्माता रामगोपाल वर्मा एक बार फिर से विवादों में आ गए हैं.

उन की आने वाली फिल्म ‘लक्ष्मी एनटीआर’ का चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी जम कर विरोध कर रही है. फिल्म का एक गाना रिलीज किया गया है जिस का कई सारे नेता विरोध कर रहे हैं और उस पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं. टीडीपी के कार्यकर्ताओं ने इस फिल्म के पोस्टर जला दिए थे. इस बाबत टीडीपी नेता एस वी मोहन रेड्डी ने रामगोपाल वर्मा के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है.

फिल्म के एक गाने के रिलीज किए जाने के बाद ही यह विवाद खड़ा हो गया. टीडीपी के समर्थकों का आरोप है कि इस गाने में आंध्र प्रदेश के सीएम एन चंद्रबाबू नायडू की गलत छवि दिखाई गई है. उन्हें विलेन की तरह पेश किया गया है. बता दें कि चंद्रबाबू नायडू, एनटीआर के दामाद हैं. शिकायत में यह कहा गया है, ‘गाने में दिखाया गया है कि चंद्रबाबू नायडू ने अपने ससुर एनटी रामाराव को धोखा दिया था. रामगोपाल वर्मा ने एक गाना रिलीज किया है जो कि मानहानिपूर्ण है. यह चंद्रबाबू नायडू को गलत रोशनी में दिखाता है.

आंध्र प्रदेश का प्रमुख विपक्षी दल वीएसआर कांग्रेस ने भी एक बायोपिक बनाया है यह उस के नेता जगन मोहन रेड्डी के पिता वीएसआर रेड्डी के बारे में है. कुल मिला कर बायोपिक के दौर में अब यह देखना कि बायोपिक के इस दंगल में कौन जीतता है.

फिल्मों के जानकार कहते हैं कि फिल्में किताबों की तुलना में ज्यादातर लोगों तक पहुंचती हैं, इसलिए उन का असर भी ज्यादा होगा. वे दर्शकों की सोच को प्रभावित भी करती हैं. बहरहाल, यह तो आने वाला चुनाव ही बताएगा कि फिल्में चुनाव में वोटरों को कैसे प्रभावित करती हैं और कितना.

राममंदिर पर भाजपा का नया पैतरा, झांसे में क्यों आएगी जनता

राममंदिर के साथ भाजपा का करीबी रिश्ता रहा है. भारतीय जनता पार्टी बनने के बाद राममंदिर आंदोलन के सहारे ही 2 लोकसभा सदस्यों वाली यह पार्टी सत्ता की हकदार बन सकी. 2014 के पहले तक भाजपा ने हर बार प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में यह बात कही कि जिस दिन जनता केंद्र में भाजपा को बहुमत दे देगी, राममंदिर बन जाएगा.

2014 में देश में नरेंद्र मोदी की अगुआई में भाजपा की सरकार पूरे बहुमत के साथ बनी. राममंदिर समर्थक जनता को यह उम्मीद बंधी कि अब राममंदिर बन कर रहेगा. भाजपा के अपने कार्यकर्ता भी यह मान रहे थे कि राममंदिर निर्माण का इस से बेहतर समय शायद आगे न मिल सके. अयोध्या में सभासद से ले कर देश के राष्ट्रपति तक और प्रधानमंत्री से ले कर मुख्यमंत्री तक हर महत्त्वपूर्ण पद पर भाजपा के ही पदाधिकारी हैं.

इस के बाद भी सालदरसाल गुजर गए. 5 साल बीत गए. 2019 के आमचुनाव की तैयारी शुरू हो गई. अब भाजपा को राममंदिर की याद आई. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक प्रार्थनापत्र दे कर मांग कर ली कि अयोध्या में गैरविवादित जमीन का अधिग्रहण वापस कर दिया जाए, जिस में सरकार राममंदिर बनाने की शुरुआत कर सके.

यह वह मांग है जिस का भाजपा अब तक विरोध करती रही है. राममंदिर के आसपास की जमीन का अधिग्रहण कोर्ट ने राममंदिर बनाने के उद्देश्य से नहीं किया है. राममंदिर के आसपास सुरक्षा कारणों के तहत इस जमीन का अधिग्रहण किया गया था. ऐसे में इस बात की उम्मीद बेहद कम है कि कोर्ट गैरविवादित जगह का अधिग्रहण वापस कर दे.

जमीन वापसी की वजह

अयोध्या में गैरविवादित जमीन पर मंदिर निर्माण की पहल मोदी सरकार की कोई अपनी मूल योजना नहीं है. गैरविवादित जगह पर ‘मंदिर शिलान्यास’ के प्रयास पहले भी तमाम बार हो चुके हैं. फर्क यह है कि पहले राम जन्मभूमि न्यास और विश्व हिंदू परिषद राम जन्मभूमि के अलावा किसी जगह पर शिलान्यास को राजी नहीं थे, अब वे मोदी सरकार के साथ खड़े नजर आ रहे हैं. अगर विवादित स्थल से अलग मंदिर की बात पर राम जन्मभूमि न्यास और विश्व हिंदू परिषद पहले ही तैयार होते तो यह मसला पहले हल हो गया होता. गैरविवादित जमीन के अधिग्रहण को वापस करने से जनता के बीच यह संदेश देने की कोशिश होगी कि सरकार मंदिर बनाने के लिए कदम उठा रही है.

1989 में विवादित स्थल से दूर राममंदिर शिलान्यास के लिए उस समय की केंद्र की राजीव गांधी सरकार ने इजाजत दे दी थी. यह जगह 313 एकड़ विवादित भूमि से अलग थी. राम जन्मभूमि न्यास, विश्व हिंदू परिषद और भाजपा के कुछ नेता राजीव गांधी की बात से सहमत नहीं थे. उन का तर्क था कि हिंदू समाज को राममंदिर निर्माण केवल रामजन्म भूमि की जगह पर ही स्वीकार होगा. वह चुनाव का साल था. भाजपा राममंदिर के आंदोलन को ले कर आगे चल रही थी. राजीव गांधी की चुनाव में हार हुई. सरकार के सत्ता से बाहर होने के कारण राजीव गांधी उस दिशा में आगे प्रयास नहीं कर पाए.

1989 के लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र में वी पी सिंह की सरकार बनी. 1991 में चंद्रशेखर के प्रधानमंत्री कार्यकाल में भी इस योजना पर काम हुआ, पर सफलता नहीं मिली. उस समय भी राम जन्मभूमि न्यास और विश्व हिंदू परिषद अपनी इस बात पर अड़े थे कि विवादित स्थल से अलग शिलान्यास का कोई मतलब नहीं है.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में कल्याण सिंह ने भी गैरविवादित जगह पर ही रामकथा पार्क की परिकल्पना की थी. वे भी अयोध्या के चौमुखी विकास को आगे बढ़ाना चाहते थे. राम जन्मभूमि न्यास, विश्व हिंदू परिषद और भाजपा के कुछ नेता इस पक्ष में नहीं थे. कल्याण सिंह पर यह आरोप भी लग रहा था कि मुख्यमंत्री रहते कल्याण सिंह कारसेवा आंदोलन का समर्थन नहीं कर रहे थे. वे बीच का रास्ता निकालना चाहते थे. भाजपा से अलग होने के बाद कल्याण सिंह ने विस्तार से इन मुद्दों पर अपनी राय बताई थी.

कारसेवा के दबाव में कल्याण सिंह के कार्यकाल में ही अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाया गया. कल्याण सिंह की सरकार बरखास्त हुई. इस के बाद बहुत सारी कानूनी पेचीदगियां बढ़ गईं. कोर्ट ने विवादित जगह के आसपास की जमीन का भी अधिग्रहण कर लिया था. अब मोदी सरकार चाहती है कि विवादित जगह को छोड़ कर बाकी जमीन को अधिग्रहण मुक्त कर दिया जाए, जिस जगह पर सरकार राममंदिर निर्माण कर सके. मोदी सरकार के पक्ष में यह बात जरूर है कि अब राम जन्मभूमि न्यास और विश्व हिंदू परिषद विवादित राम जन्मभूमि स्थल से ही राममंदिर बनाने की मांग पर पीछे हटते दिख रहे हैं. अब यह मामला कानूनी रूप से इतना पेचीदगीभरा हो गया है कि राह निकलती नहीं दिखती.

खत्म होता भरोसा

2014 के लोकसभा चुनाव के समय नरेंद्र मोदी की अगुआई में जितने भी वादे किए गए वे पूरे नहीं किए गए. सरकार बनने के बाद किसी न किसी बहाने उस बात को टाल दिया गया. राममंदिर को तो भाजपा अपने चुनावी एजेंडे में ही नहीं मानती है. नोटबंदी, जीएसटी, महंगाई, बेरोजगारी जैसे मुद्दे हवा में रहे. नोटबंदी के बहाने तमाम तरह की बातें बारबार कही गईं पर नोटबंदी से क्या लाभ हुआ, सरकार बता नहीं पाई. जीएसटी लागू करते समय टैक्स को सरल करने और एक देश एक टैक्स की बात कही गई. जीएसटी बहुत ही अधिक उलझा हुआ बना दिया गया. नोटबंदी से पहले बैंक खुद को सेवक समझ कर काम करते थे, अब बैंक केवल फीस वसूल करने का जरिया बन गए हैं. ऐसे में जनता बैंकिंग सिस्टम से परेशान हो चुकी है.

हर वादे की ही तरह राममंदिर के वादे पर भी लोगों को लग रहा है कि सरकार उस के साथ सही पक्ष नहीं रख रही है. ऐसे में गैरविवादित जगह का अधिग्रहण खत्म होने से भी जनता को कोई राहत नहीं समझ आ रही है. चुनाव को करीब देख कर सरकार के इस कदम को जनता चुनावी कदम मान रही है. उसे सरकार की नीयत पर अब भरोसा नहीं रहा. ऐसे में साफ लगता है कि राममंदिर पर भाजपा के इस पैतरे का जनता पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

हर सरकार के वादे की अपनी एक अहमियत होती है. मोदी सरकार चूंकि जनता से किए वादों पर खरी नहीं उतरी, इसलिए अब नए वादों पर जनता को भरोसा नहीं है. ऐसे में साफ है कि केंद्र सरकार के इस कदम के झांसे में आ कर जनता राममंदिर के नाम पर भाजपा को वोट नहीं देने वाली.

खूबसूरती पर बदसूरती का वार : सुप्रिया के साथ क्या हुआ

घटना इंदौर के एमआईजी थाना क्षेत्र की है. 13 सितंबर को रात के करीब 10 साढ़े 10 बजे का वक्त था. उस समय इंदौर की सांघी नगर कालोनी की सड़कों पर बहुत ज्यादा ट्रैफिक था. सड़क पर चल रहा हर कोई एकदूसरे से आगे निकलने की जल्दबाजी में नजर आ रहा था लेकिन उन सब के बीच एक शख्स एक मल्टीस्टोरी बिल्डिंग के बाहर चुपचाप खड़ा था.

वह वहां किस उद्देश्य से खड़ा था, कोई नहीं जानता था. लेकिन उस के हावभाव और बेताब निगाहों को देख कर इतना अनुमान तो लगाया ही जा सकता था कि वह किसी खास मकसद से किसी को तलाश रहा है.

उस युवक का नाम था कमलेश साहू और वह मूलरूप से सागर जिले का रहने वाला था. कमलेश कोठारी मार्केट के एक प्रतिष्ठित होटल में काम करता था. वहां खड़े हो कर वह सुप्रिया जैन नाम की युवती का इंतजार कर रहा था, जो मध्य प्रदेश के ही गुना जिले की रहने वाली थी. सुप्रिया इंदौर में एक साप्ताहिक अखबार में नौकरी करती थी.

कमलेश साहू का इंतजार जल्द खत्म हो गया. सुप्रिया एक युवक के साथ एक्टिवा स्कूटर पर आती दिखी. उस युवक को देख कर कमलेश के चेहरे पर शिकन आ गई. जब सुप्रिया युवक से विदा होते समय हंसहंस कर बातें कर रही थी तो कमलेश के दिमाग में कई तरह के प्रश्न उठ रहे थे.

युवक के चले जाने के बाद सुप्रिया मल्टीस्टोरी बिल्डिंग में दाखिल हो गई. इस बिल्डिंग के फ्लैट नंबर 208 में वह अपने भाई संजय के साथ रहती थी. बिल्डिंग में दाखिल होने के बाद सुप्रिया कुछ ही सीढि़यां चढ़ी थी कि अचानक उसे कुछ याद आ गया तो वह वापस बाहर सड़क पर आ गई.

यह देख कर वहां से जा रहे कमलेश के कदम रुक गए. वह सुप्रिया को देखने लगा. सुप्रिया जब वापस लौट कर अपनी बिल्डिंग में दाखिल हुई, तो अचानक कमलेश को न जाने क्या सूझा कि वह फुरती से सुप्रिया की तरफ बढ़ा और झपट्टा मार कर उस के बाल और हाथ पकड़ कर उसे बाहर खींच लिया.सुप्रिया ने उस से खुद को छुड़ाने की काफी कोशिश की, लेकिन वह कामयाब नहीं हो सकी.

इंदौर के विजयनगर का क्षेत्र कोचिंग करने आए युवकयुवतियों से भरा रहता है. यहां रहने वाले अधिकांश लड़केलड़कियों के बीच दोस्ती होती है. कई का आपस में चक्कर भी चलता रहता है, इसलिए वे कभीकभी झगड़ भी पड़ते हैं. आए दिन उन के आपस के झगड़े देखने को मिल जाते हैं, इसलिए सुप्रिया व कमलेश की लड़ाई को देखने के बाद भी लोग अनदेखा कर वहां से गुजरते रहे.

इसी बीच 2 बाइक सवार युवक भी यह तमाशा देखते हुए आगे बढ़ गए. लेकिन कुछ दूर जाने पर उन्हें लड़की के चीखने की आवाज सुनाई दी तो वे वापस लौट आए और सुप्रिया के साथ झगड़ा कर रहे कमलेश को रोकने के लिए आगे बढ़े.

कमलेश अपने साथ दरांत लाया था. दोनों युवकों को देख कर उस ने चमकीला दरांत दोनों युवकों की ओर लहराया तो वे दोनों वहां से भाग गए और कुछ दूर जा कर दरजन भर युवकों को इस मामले की खबर दे दी.

इस के बाद पूरी भीड़ सुप्रिया को बचाने के लिए दौड़ी. लेकिन कमलेश के हाथ में हथियार देख कर किसी की भी आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं हुई. कमलेश सुप्रिया की छाती पर बैठ गया और उस पर दरांत से कई वार कर दिए. इत्तफाक से उसी समय हैडकांस्टेबल झंवर सिंह भदौरिया तथा कांस्टेबल जैनेंद्र उधर से गुजर रहे थे. लोगों की भीड़ देख कर वे दोनों रुक गए. उन्होंने आगे जा कर देखा तो जमीन पर लहूलुहान पड़ी लड़की को देख कर सन्न रह गए.

दोनों पुलिसकर्मियों ने हिम्मत कर के किसी तरह कमलेश को दबोच लिया और यह सूचना टीआई तहजीब काजी को दे दी. टीआई जल्द ही मौके पर पहुंच गए. उन्होंने आननफानन में घायल युवती को अपोलो अस्पताल भेज दिया.

मौके पर पकड़े गए आरोपी कमलेशसे खून से सना दरांत जब्त कर उसे थाने लाया गया. इस के साथ ही उस के खिलाफ भादंवि की धारा 307 के तहत मामला दर्ज कर लिया गया. पुलिस को यह जानकारी मिल चुकी थी कि घायल युवती का नाम सुप्रिया है और वह गुना की रहने वाली है.

इस मामले की जानकारी सुप्रिया के घर वालों को दी गई तो वे उसी समय इंदौर के लिए रवाना हो गए. लेकिन जब तक वह इंदौर पहुंचे, तब तक सुप्रिया की मौत हो चुकी थी. इस के बाद कमलेश के खिलाफ आईपीसी की धारा 302 का मामला दर्ज कर लिया गया.

टीआई तहजीब काजी ने इंदौर के डीआईजी हरिनारायण चारी को घटना की जानकारी दी तथा उन के निर्देश पर काररवाई शुरू कर दी. सुप्रिया इंदौर के एक समाचारपत्र से जुड़ी थी, इसलिए इस हत्याकांड को ले कर मीडियाकर्मियों में भी आक्रोश था.

पुलिस अधिकारियों ने किसी तरह उन्हें समझाया. पोस्टमार्टम में सुप्रिया के शरीर पर 38 गहरे घाव मिले, जिस से यह लग रहा था कि कमलेश के दिल में सुप्रिया के प्रति गहरी नफरत रही होगी. इसीलिए उस ने उस पर इतने वार किए. सुप्रिया से उस की नफरत का कारण क्या था, लोग समझ नहीं पा रहे थे. सुप्रिया के परिवार वाले भी कमलेश को नहीं जानते थे.

सुप्रिया के साथ काम करने वाले लोगों ने भी न तो कमलेश को कभी सुप्रिया से मिलतेजुलते देखा था और न ही उस के साथ औफिस आतेजाते. इस हत्या की कहानी जानने के लिए टीआई तहजीब काजी ने जब कमलेश से पूछताछ की तो एक जुनूनी आशिक की चौंका देने वाली कहानी सामने आई.

24 वर्षीया सुप्रिया जैन मूलरूप से मध्य प्रदेश के गुना जिले की रहने वाली थी. वह पढ़ने में होशियार थी. सन 2005 में सुप्रिया का कक्षा 6 में दाखिला खुरई के नवोदय विद्यालय में हुआ था. उस की कक्षा में सागर जिले के गणेशगंज शाहपुरा का रहने वाला कमलेश साहू भी पढ़ता था.

दोनों की आपस में अच्छी दोस्ती हो गई थी. उस समय कमलेश को इश्कमोहब्बत की समझ नहीं थी, लेकिन साल भर हौस्टल में रह कर वह काफी कुछ दुनियादारी सीख गया था.

इसलिए पहला साल खत्म होतेहोते वह साथ पढ़ने वाली सुप्रिया को मन ही मन दिल दे बैठा. उस समय उस में इतना साहस नहीं था कि वह सुप्रिया के सामने अपनी मोहब्बत का इजहार कर सके.

10वीं-12वीं क्लास तक आतेआते मासूम सी दिखने वाली सुप्रिया में एक युवती का पूरा रूप विकसित हो चुका था. इसी के चलते कमलेश सुप्रिया का दीवाना सा हो गया. 2012 में किसी तरह हिम्मत कर के उस ने एक दिन सुप्रिया के सामने अपनी मोहब्बत का इजहार कर दिया.

सच्चाई यह भी थी कि जहां सुप्रिया खूबसूरत थी वही कमलेश साधारण शक्लसूरत का था. शायद इसी वजह से सुप्रिया ने उस की मोहब्बत एक झटके में ठुकरा दी. कमलेश 7 सालों से खामोश रह कर सुप्रिया को मोहब्बत कर रहा था, इसलिए सुप्रिया का इनकार उस से सहन नहीं हुआ. उस ने क्लास में ही जान देने के लिए अपनी कलाई काट ली.

यह देख कर सुप्रिया डर गई. इसलिए एक दोस्त की हैसियत से वह कमलेश से बात करने लगी. या यूं कहें कि कमलेश का मन बहलाने के लिए उस ने झूठमूठ कमलेश की मोहब्बत का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. कुछ महीने बाद पढ़ाई पूरी कर दोनों अपनेअपने घर चले गए, जिस के बाद उन का संपर्क पूरी तरह टूट गया.

कमलेश से बचने के लिए सुप्रिया ने अपना मोबाइल नंबर भी बदल लिया. सुप्रिया का एक भाई इंदौर में रहता था, जिस की वजह से सुप्रिया कालेज की पढ़ाई करने इंदौर आ गई. यहां आ कर उस ने ग्रेजुएशन की डिग्री ली और एक मीडिया हाउस में नौकरी करने लगी. अपने दीवाने कमलेश साहू को सुप्रिया तो पूरी तरह भूल चुकी थी, लेकिन कमलेश उसे नहीं भूला था. वह लगातार सुप्रिया की तलाश कर रहा था.

इस तरह कहीं पता नहीं चला तो वह सुप्रिया को सोशल मीडिया पर तलाशने लगा. आखिर उस ने फेसबुक के माध्यम से उसे ढूंढ ही लिया. फेसबुक प्रोफाइल से पता चला कि वह इन दिनों इंदौर में है. इंदौर आने के बाद सुप्रिया के रंगढंग बदल चुके थे. फेसबुक पर उस ने अपने कई फोटो डाल रखे थे, जिन्हें देख कर कमलेश ने इंदौर आ कर उस से मिलने की ठान ली.

कमलेश के पिता की आय बहुत ज्यादा नहीं थी. इस के बावजूद जब कमलेश ने इंदौर जा कर पढ़ाई करने की जिद की तो पिता ने पैसों का इंतजाम कर दिया. पढ़ाई के बहाने वह सुप्रिया को तलशने लगा. इतने बड़े इंदौर में सुप्रिया को कैसे तलाशे, यह बात उस की समझ में नहीं आ रही थी. इस के लिए भी उस ने फेसबुक की मदद ली.

आमतौर पर युवा फेसबुक पर हमेशा अपनी लोकेशन लाइव ही नहीं रखते बल्कि दोस्तों के संग पार्टी मनाने जाएं या फिल्म देखने, अपना स्टेटस भी लाइव रखते हैं. सुप्रिया भी ऐसा करती थी. फेसबुक पर सुप्रिया की लोकेशन देखदेख कर कमलेश इंदौर की सड़कों पर साइकिल से घूम कर उसे खोजने लगा. फेसबुक लोकेशन से उस ने अंदाजा लगा लिया कि सुप्रिया विजयनगर इलाके में कहीं रहती है.

पिछले डेढ़ साल से वह दिनरात सुप्रिया को सड़कों पर तलाशते हुए भटकता रहा. इसी दौरान उस ने एक दिन सुप्रिया को मैसेंजर पर फ्रैंड रिक्वेस्ट भेजी. कमलेश का फोटो देखते ही सुप्रिया उसे पहचान गई. स्कूल में कमलेश द्वारा कलाई काट लेने वाली बात भी उसे याद थी. लेकिन उसे लगा कि वह नासमझी का दौर था, अब वह समझदार हो गया होगा. इसलिए उस ने उस की फ्रैंड रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली.

इस के बाद कमलेश को तो मानो सारा जहां मिल गया. उसे लगा कि शायद सुप्रिया को अब अपनी पुरानी गलती का अहसास हो चुका होगा, इसलिए उस ने 2 दिन बाद ही उस के साथ पुरानी बातें दोहरानी शुरू कर दीं. वह प्रतिदिन उसे कईकई मैसेज भेजने लगा. जबकि सुप्रिया उसे कैरियर बनाने के लिए समझाती थी.

इतना ही नहीं, उस ने सुप्रिया से कहा, ‘‘मैं जानता हूं कि तुम बहुत सुंदर हो. लेकिन चिंता मत करो पैसा कमाने के बाद मैं भी औपरेशन से अपना रंगरूप ठीक करवा लूंगा.’’

ऐसी बातों से सुप्रिया समझ गई कि कमलेश के दिल से इश्क का भूत अभी उतरा नहीं है, इसलिए उस ने कमलेश को अपने फेसबुक एकाउंट से ब्लौक कर दिया. इधर पढ़ाई के नाम पर इंदौर आए कमलेश ने 2 बार सीए की परीक्षा दी, लेकिन असफल रहने पर उस ने एक होटल में वेटर की नौकरी कर ली. वह रात में होटल में काम करता और दिन भर साइकिल ले कर इंदौर सी सड़कों पर सुप्रिया को खोजता रहता.

अब वह सुप्रिया के फेसबुक एकाउंट पर भी नजर रखने लगा था. इसी के चलते एक दिन उस ने फेसबुक पर सुप्रिया की लोकेशन देख कर उसे एक पब में देख लिया. लेकिन उस के सिर पर आसमान तब टूट पड़ा, जब उस ने देखा कि सुप्रिया किसी लड़के के साथ बैठी शराब पीते हुए सिगरेट का धुआं उड़ा रही है.

कमलेश काफी शातिर था सो उस समय वह सुप्रिया के सामने नहीं गया. वह पहले चुपचाप सुप्रिया का घर देखना चाहता था ताकि भविष्य में उसे खोजने के लिए परेशान न हो. इस तरह उस ने पहले तो सुप्रिया का पीछा कर के सांघी कालोनी में उस का ठिकाना देखा और फिर वहां से पीछा कर के उस के औफिस तक भी पहुंच गया.

वह रोज औफिस आतेजाते सुप्रिया का पीछा करने लगा. इस दौरान उस ने देखा कि सुप्रिया की दोस्ती कई लड़कों से है, इसलिए वह जब भी सुप्रिया को किसी लड़के के साथ हंसते हुए या बातें करते देखता तो उस का खून खौल उठता.

सुप्रिया के बदले हुए रंगढंग देख कर वह यह बात अच्छी तरह से समझ गया था कि सुप्रिया अब शायद ही कभी उस की मोहब्बत स्वीकार करे. इसलिए कमलेश सुप्रिया को जितनी मोहब्बत करता था, उस से उतनी ही नफरत भी करने लगा.

इतना ही नहीं, उस ने तय कर लिया था कि सुप्रिया अगर उस की नहीं हुई तो वह उसे किसी और की भी नहीं होने देगा. इसलिए सुप्रिया का पीछा करते समय वह हमेशा पीठ पर एक बैग टांगे रहता था, जिस में रखे दरांते पर वह रोज धार लगाता था. घटना वाले दिन भी वह सुप्रिया के घर के बाहर खड़ा हो कर उस के औफिस से लौटने का इंतजार कर रहा था. वह कई बार उस की हत्या की सोच चुका था, लेकिन हर बार उस की मोहब्बत उस के हाथ बांध देती थी.

उस रोज सुप्रिया एक युवक के साथ घर लौटने के बाद कुछ देर तक घर के बाहर खड़ी हो कर उस से हंसहंस कर बातें करती रही, फिर बड़ी अदा से उसे बाय कर के बिल्डिंग में चली गई. यह देख कर कमलेश को लगा कि अब सुप्रिया उसे पसंद नहीं करेगी, क्योंकि उस की दोस्ती हाईफाई लोगों से है.

कुछ सोच कर कमलेश वहां से वापस जाने ही वाला था कि अचानक सुप्रिया फिर बाहर आ गई. इस के बाद कमलेश ने तय कर लिया कि ऐसी लड़की को सबक सिखाना जरूरी है. जब वह उस की नहीं हुई तो वह उसे किसी और के लायक भी नहीं छोड़ेगा. वह बिल्डिंग के गेट पर पहुंच गया और उस पर टूट पड़ा. अपने साथ लाएं दरांत से वह उस पर वार पर वार करने लगा.

पुलिस ने कमलेश से पूछताछ के बाद उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

 — कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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