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हर साल 70 लाख लोगों की मौत का कारण है वायु प्रदूषण

आज के वक्त में वायु प्रदूषण लोगों के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. ये एक अदृश्य और मूक हत्यारा है. वायु प्रदूषण से मरने वाले लोगों की संख्या वाकई भयावह है. हर वर्ष इससे करीब 70 लाख लोगों के मौत का जिम्मेदार है. इनमें करीब 6 लाख बच्चे शामिल हैं. कई पर्यावरणविद् और मानवाधिकार के लोगों की माने तो करीब  छह अरब से अधिक लोग इतनी प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हैं, जिसने उनके जीवन, स्वास्थ्य और बेहतरी को खतरे में डाल दिया है. इसमें एक तिहाई संख्या बच्चों की है.

जनकारों की माने तो लंबे समय तक इस हवा में सांस लेने से कैंसर, सांस की बीमारी और दिल की बीमारी जैसी समस्याएं होती हैं. इससे हर घंटे करीब 800 लोग मर रहे हैं. पर इसके बाद भी इसके स्वरूप पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा. इसके पीछे कारण है कि लोगों को इसकी भयावहता का पता नहीं लग रहा.

एक्सपर्ट्स की माने तो इस समस्या को रोका जा सकता है. इस दिशा में भारत और इंडेनेशिया में हो रहे कार्य तारीफ के काबिल हैं. इन दोनों देशो में ऐसे कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं जिनके जरिए लाखों गरीब परिवारों को खाना पकाने की स्वच्छ प्रौद्योगिकी अपनाने में मदद मिली, और कोयला आधारित विद्युत संयंत्रों को सफलतापूर्वक हटाया जा रहा है.

रेतीली चांदी (भाग-1) : मयूरी के ख्वाब जब हकीकत से टकराएं तो क्या हुआ

हवाईजहाज में प्रथम श्रेणी की आरामदायक सीट पर बैठ मयूरी ने चैन की सांस ली. आज वह महसूस कर रही थी कि जब दिल में उमंग हो और दिमाग तनावरहित, तो हर चीज कितनी अच्छी लगने लगी है. मानो हर तरफ वसंत खिल उठा हो. बगल की सीट पर बैठे मात्र 24 घंटे पहले ही जीवनसाथी बने राहुल को एक नजर देख उस ने चारों तरफ नजर दौड़ाई. अभी भी लोग अंदर आ कर अपनी सीटों पर बैठ रहे थे. एयर होस्टैसेस अपने काम में मुस्तैदी से लगीं यात्रियों की जरूरतें पूरी कर रही थीं, उन्हें उन की सीट बता रही थीं.

थोड़ी ही देर बाद जहाज का द्वार बंद होते ही माइक्रोफोन पर एनाउंसर की मधुर आवाज गूंजी, ‘‘कृपया अपनी सीट बैल्ट्स बांध लें. कुछ ही मिनटों में प्लेन टेकऔफ करने वाला है.’’

सब अपनीअपनी बैल्ट्स बांधने में लग गए. मयूरी को बैल्ट बांधने में असुविधा होते देख राहुल ने उस की मदद कर के अपनी सीट बैल्ट भी बांध ली. कुछ ही मिनटों में जहाज आकाश की ऊंचाइयों को छूता उसे अपने देश, अपने परिवार से दूर ले जा रहा था.

पिछले 24 घंटों से विवाह की आपाधापी व रातभर ट्रेन के सफर की भागदौड़ से थके राहुल और मयूरी अब थोड़ा बेफिक्र हो आराम से बैठ पाए थे. पिछले 2 दिनों में तेजी से घटे घटनाक्रम ने मयूरी को ज्यादा सोचनेसमझने का मौका ही नहीं दिया था. राहुल को आंखें बंद किए बैठे देख वह भी अपनी सीट पर सिर पीछे टिका कर शीशे से बाहर नीले आकाश में हाथभर की दूरी पर हवा में उड़तेइतराते बादलों को देखने लगी. बादलों के पीछे से आती सूरज की किरणों ने हर बादल के टुकड़े पर एक सिल्वर लाइनिंग सी बना दी थी, मानो हर बादल के पीछे चांदी सा चमकता साम्राज्य छिपा है. उस का जी चाहा कि हाथ बढ़ा कर वह उसे अपनी मुट्ठी में भर ले. पर हवा की तेजी से भी तेज, विचारों के पंछी कब उसे अपने साथ उड़ाते अतीत की ओर ले चले, उसे पता ही न चला…

देहरादून के पास ही एक कसबे में अपनी मां वसुंधरा व छोटी बहन मीठी के साथ रहते उस का बचपन युवा अवस्था में बदला ही था जब उस के पिता एक दलाल की मारफत कुछ लोगों के साथ खाड़ी देशों में कारपैंटर की नौकरी करने गए थे. बेरोजगार गरीब लोगों ने ज्यादा पैसा कमाने की चाह में अपनी जमीनजायदाद या पत्नी के गहने बेच कर किसी तरह दलाल की मांगी हुई पूरी रकम एडवांस में जमा कराई, तब उन्हें पासपोर्ट व वीजा मिला.

विदेश यात्रा के बीच में ही एक जगह पहुंचने पर उन्हें पता चला कि अब इस के आगे वे सब सीधे रास्ते न जा कर, समुद्र के रास्ते एक केबिन में छिपा कर पहुंचाए जाएंगे. उन सब को केबिन में भेड़बकरियों की तरह ठूंस कर जहाज चल दिया और वह दलाल वहीं से वापस हो लिया था. पर असंवैधानिक तरीके से दूसरे देश की सीमा में प्रवेश करते वक्त चैकिंग के समय वे दूसरे लोगों के साथ ही पकड़ लिए गए.

कुछ दिनों तक वहां की जेल से उन के पत्र भी आते रहे. हर पत्र में वहां की सजाएं व किसी तरह वहां से छुड़ाए जाने की अपील होती थी. पर अचानक ही पत्र आने बंद हो गए थे. कोई कहता, उन लोगों को कहीं और ले जा कर नजरबंद कर दिया गया है, कोई कहता वहां की सरकार ऐसे कैदियों को जिंदा ही नहीं छोड़ती है.

विदेश गए लोगों के परिजन शुरू में पुलिस में शिकायत करने भी गए, परंतु बिना रिश्वत लिए कोई कुछ सुनने को तैयार न था. इस अवैध धंधे में लिप्त लोगों ने पुलिस वालों को समयसमय पर मासिक सुविधाशुल्क दे कर अपना कारोबार सुचारु ढंग से चलाते रहने का पूरा इंतजाम पहले ही कर रखा था. इसीलिए उन के खिलाफ किसी ने कोई कार्यवाही करने की जरूरत ही नहीं समझी.

इस बीच, वह दलाल व उस का आलीशान औफिस और कार्यकर्ता सब गायब हो चुके थे. गरीब शिकायत करते भी तो किस की और किस से? सही जानकारी का अभाव, ज्यादा पैसा कमाने की चाह और सस्ते में चोरीछिपे पहुंचा देने की दलाल की पेशकश, उन गरीबों को मौत के मुंह तक पहुंचा आई थी. मन मसोस कर परिजन सबकुछ समय पर छोड़ चुप बैठ गए थे.

तब से वसुंधरा ने ही एक प्राइमरी स्कूल में जौब कर किसी तरह घर को संभाला था. अपने पैरों पर खड़ा होने लायक शिक्षा प्राप्त करते ही मयूरी भी नौकरी के लिए आवेदन भेजने लगी थी. कई जगहों पर योग्य होते हुए भी सिफारिश के अभाव में उसे नौकरी नहीं मिल सकी जिस से उस में निराशा व कुंठा घर करने लगी थी.

उन्हीं दिनों देहरादून के एक औफिस से नौकरी का नियुक्तिपत्र आया. शायद उसे राहुल से मिलाने के लिए ही था. पहले तो वसुंधरा बेटी को नौकरी करने अकेले दूसरे शहर भेजने को तैयार नहीं थी, पर मयूरी की अपील व घर की डांवांडोल आर्थिक स्थिति उसे अपने फैसले पर ज्यादा देर कायम नहीं रख सकी. वसुंधरा ने बेटी को जाने की इजाजत दे दी.

देहरादून पहुंच कर अपने औफिस में ड्यूटी जौइन कर के मयूरी बहुत खुश थी. औफिस के पास ही बने महिला होस्टल में उस ने एक कमरा ले लिया था. उस की रूमपार्टनर सारा मौडर्न युवती थी, जो कसबे से आई मयूरी को देख अपनी नाखुशी छिपा न सकी थी. कुछ दिनों के अबोले के बाद आखिर उस ने ही पहल करते हुए मयूरी से बातचीत शुरू कर दी. वह भी उसी औफिस में काम करती थी.

मां की बंदिशों से दूर, हर फैसला लेने को आजाद, जल्द हर सुखसुविधा पा लेने की ललक और साथ ही चौबीसों घंटे सारा जैसी तेजतर्रार युवती का साथ, मयूरी की जीवनशैली में बदलाव लाने के लिए काफी थे.

मयूरी एक निचले परिवार से जीवन का सफर शुरू कर के मेहनत व लगन से सफलता की सीढ़ी चढ़ते हुए इस जीवनशैली में पहुंची थी. पैसों की तंगी के चलते अभी तक जो चीजें उसे चांद छूने के समान लगती थीं, पैसा हाथ में आते ही अब सुलभ हो गई थीं. सारी तनख्वाह वह अपने शौक पूरे करने में ही खर्च कर देती. जल्द ही वह ग्रामीण शैली छोड़ मौडर्न तौरतरीके अपनाने लगी. जैसे नया पैसे वाला फुजूलखर्ची को ही अपना शान समझ बैठता है, कुछ उसी मानसिकता से मयूरी भी गुजर रही थी. इन बदलावों का श्रेय वह सारा को देते नहीं थकती थी जो समयसमय पर उसे आधुनिक चालचलन से दोचार करा कर बदलने को प्रेरित करती थी.

विदेशों में सारा के डैडी का खिलौनों का व्यापार और इंपोर्टएक्सपोर्ट के बिजनैस में एक देश से दूसरे देश घूमते रहते उस के भाई का हर माह उसे एक मोटी रकम खर्च करने के लिए भेजना, मयूरी को उस से ईष्यालु बना जाता. ऐसे में उसे अपनी गरीबी पर कोफ्त होती. पर इतने अमीर घर की सारा जब उसे ही अपनी सब से प्यारी सहेली कहती तो मयूरी को खुद पर फख्र होता. मयूरी अपनी नई दुनिया में इतना रम गई थी कि मां के भेजे पत्रों का जवाब देने का भी उसे खयाल न रहा.

एक दो महीने इंतजार करने के बाद भी जब मां को कोई जवाब नहीं मिला, न ही बेटी की कुछ खबर, तो एक दिन अचानक वसुंधरा बेटी से मिलने देहरादून पहुंच गई. वहां बेटी का बदला हुआ रूप उसे चौंका गया था. रिसैप्शन से किसी के उस से मिलने आने की खबर पा कर मयूरी फौरन नीचे पहुंची तो मां को सामने खड़ा पाया.

सीधीसादी, चुन्नी के साथ कुरतासलवार पहनने वाली मयूरी को टाइट जींस व छोटी सी नाममात्र की टीशर्ट पहने, साथ ही लंबे लहराते बालों को कटा कर छोटी सी पोनीटेल बांधे देख वसुंधरा उसे ऊपर से नीचे देखती रह गई. मां को यों देख मयूरी थोड़ा झेंपी, फिर मां से लिपट गई. ऊपर अपने कमरे में ले जाते हुए, इसे आजकल समय के साथ चलने की जरूरत बता कर, मयूरी ने मां को संतुष्ट करने की कोशिश की.

वसुंधरा को बेटी का यों बदलना अच्छा नहीं लगा था. मयूरी अभी भी तरहतरह से खुद को सही साबित करने के लिए तर्क पर तर्क दिए जा रही थी. मांबेटी को इत्मीनान से बात करने के लिए अकेला छोड़, सारा कुछ काम का बहाना बना कर बाहर चली गई थी.

उस के जाते ही वसुंधरा मयूरी से बोली, ‘बेटी, तुम घर से बाहर पहली बार निकली हो. दस तरह के लोग तुम्हें मिलेंगे. जो भी करना बहुत सोचसमझ कर करना. अपनी जरूरत पूरी करना अच्छा है और जरूरी भी पर फुजूलखर्ची नहीं होनी चाहिए. तुम अब कमाने लगी हो तो उस में से कुछ बचत करने की आदत भी डालो. मौडर्न होने में कोई बुराई नहीं है पर याद रखो, जिस्म की खूबसूरती उसे ढकने में ही है, न कि उस की नुमाइश करने में. यह सारा कैसी लड़की है?’

‘बहुत ही अच्छी है मां. अमीर परिवार की है पर घमंड जरा भी नहीं है. मेरी तो वह बहुत अच्छी दोस्त बन गई है,’ और फिर मयूरी उस के परिवार के बारे में विस्तार से बताती रही.

‘इतने अमीर घर की हो कर भी यहां क्यों नौकरी कर रही है?’

‘नौकरी तो वह अपने दम पर कुछ कमाने के लिए करती है. खाली बैठने से तो अच्छा ही है. फिर मां, बड़े लोगों से दोस्ती करने में हर्ज ही क्या है. वास्तव में उसी ने मुझे यह ड्रैस सैंस दिया है.’

‘बेटा, ये सब उच्च वर्गीय अमीरों के चोंचले हैं कि जितना ज्यादा पैसा, उतने ही कम कपड़े,’ मां उसे बीच में टोकती हुई बोली.

‘ओह मां, आप भी क्या बेकार की बातें ले बैठीं. आजकल तो सभी लड़कियां ऐसे ही रहती हैं,’ मयूरी बुरा सा मुंह बना कर बोली, ‘दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है, पर आप चाहती हैं कि मैं फिर वही पुरानी बहनजी टाइप बन कर ही रहूं तो ठीक है.’

‘बेटा, मुझे गलत मत समझो. दुनिया चाहे कहीं पहुंच गई हो पर औरत के लिए वह आज भी नहीं बदली है. तुम से बस यही कहना है कि आगे कभी कोई गलत कदम न उठा लेना. बहकाने वाले तो बहुत मिल जाएंगे, संभालने वाला कोई नहीं मिलता. सारा तो अमीर घराने की है. उन के रहनसहन चालचलन और हमारे में बहुत फर्क है.’

वसुंधरा अपनी तरफ से बेटी को तरहतरह से समझा कर लौटती बस से वापस चली गई.

मयूरी ने मां की कुछ बातें समझीं, कुछ को उन के पुराने खयालों की सोच समझ कर एक कान से सुन कर, दूसरे से निकाल दीं. उस की जिंदगी उस की मनमरजी के अनुसार ही चलती रही. मां के समझाने से इतना असर जरूर हुआ कि उस ने कुछ पैसा घर भेजना व कुछ बैंक में जमा कराना शुरू कर दिया.

कुछ दिनों बाद सारा ने उसे बताया कि लंदन से उस के बड़े भाई राहुल बिजनैस के सिलसिले में दिल्ली आने वाले हैं. तब वे 2 दिनों के लिए उस के साथ मसूरी भी जाएंगे. उस ने मयूरी से भी साथ चलने व घूमने के लिए कहा.

‘अच्छा, मां से पूछ कर बताऊंगी.’

मयूरी के सहज ढंग से कहने पर सारा खिलखिला कर हंस पड़ी, ‘क्या दूध पीती बच्ची हो जो ये सब बातें भी अब मां से पूछ कर करोगी? कब तुम्हारी चिट्ठी वहां पहुंचेगी, कब वे जवाब देंगी. कोई फोन तो है नहीं तुम्हारे घर. तब तक तो राहुल भैया सब काम निबटा कर वापस भी जा चुके होंगे.’

उस के हंसी उड़ाने वाले अंदाज में हंसने से मयूरी झेंप गई.

‘नहीं, तब भी. औफिस से भी तो इतनी जल्दी छुट्टी नहीं मिलेगी,’ उस ने खुद का बचाव सा करते हुए कहा तो सारा चुटकी बजाते हुए बोली, ‘उस की तुम फिक्र मत करो, बौस से मैं बात कर लूंगी. वे मेरे डैडी के बहुत अच्छे दोस्तों में से हैं. मैं कहूंगी तो मना नहीं करेंगे.’

आखिर मसूरी घूमने की इच्छा तो मयूरी की भी थी. सो, सारा के जोर देने पर उस ने भी साथ चलने की हामी भर दी.

2 दिनों बाद मयूरी ने राहुल को पहली बार उस तीनसितारा होटल में देखा था जहां उस ने सारा व मयूरी को डिनर के लिए बुलाया था. किसी सीरियस बिजनैसमैन की जगह 25-30 वर्षीय अपटूडेट नौजवान राहुल को देख पहले तो वह उस से बातचीत में थोड़ा सकुचाती रही, पर उन दोनों के मधुर व्यवहार से वह प्रभावित हुए बिना न रह सकी थी.

खूबसूरत डिजायनर मोमबत्तियों का हलका उजाला, तरहतरह की जलतीबुझती रोशनियां, गूंजता सुरीला संगीत और डांसफ्लोर पर एकदूसरे में खोए से प्रेमी युगल…सब कुछ मयूरी के लिए नए थे. अनजाने ही वह उधर देखती खुद को राहुल के साथ डांसफ्लोर पर थिरकने की कल्पना कर उठी. तभी, मयूरी ने राहुल को अपने सामने खड़ा पाया जो उस की तरफ हाथ बढ़ाए उसे ही देख रहा था.

‘मे आई प्लीज?’

‘पर मुझे डांस नहीं आता,’ वह एकदम घबरा सी गई, मानो उस की चोरी पकड़ी गई हो.

‘कोई बात नहीं, मेरे साथ आइए, अपनेआप आ जाएगा,’ वह मुसकरा कर बोला.

उस की आवाज की कशिश व देखने का अंदाज मयूरी को अंदर से कहीं कमजोर बना रहा था. तभी सारा ने भी उसे जाने के लिए कहा और लगभग ठेल सा ही दिया. अगले 2 घंटे मयूरी के लिए सपने की दुनिया में सैर करने के समान थे. माहौल का असर उस पर हावी होता जा रहा था. उस का दिल चाह रहा था, काश, यह संगीत कभी न रुके और वह इसी तरह पूरी जिंदगी राहुल के साथ एक लय पर थिरकती उस के करीब बनी रहे. उस के जिस्म से आती भीनीभीनी खुशबू उसे मदहोश बना रही थी.

वहां से लौट कर भी मयूरी राहुल के खयालों में ही खोई रही थी. अगले 2 दिनों का मसूरी ट्रिप भी उस के लिए कई यादगार लमहे छोड़ गया था. राहुल के वापस जाने के बाद मयूरी को सबकुछ कितना खालीखाली सा लगता रहा था. सारा उस के मन की हालत समझ रही थी. और अब गाहेबगाहे उसे राहुल का नाम लेले कर छेड़ने से बाज नहीं आती थी.

ऐसे मौकों पर मयूरी के लाख झुठलाने पर भी उस के लाल होते गाल उस के दिल की भावनाओं की चुगली कर जाते. अनजाने ही उस की आंखों में राहुल जैसा जीवनसाथी पाने का एक छोटा सा सपना पलने लगा था.

सपनों पर किसी देश, समाज या धर्म का बंधन तो होता नहीं. ये तो बस मन में उठती भावनाओं का रूप होते हैं. देशविदेश घूमने की चाह व उच्च सामाजिक रुतबा पाने की ख्वाहिश शायद उस के सपनों के मूल में थी. पर उन की सामाजिक स्थिति के बीच जमीनआसमान का अंतर होने से कभीकभी उसे खुद पर ही झुंझलाहट भी हो आती कि क्यों वह ऐसे सपने देखती ही है जिन के पूरा होने की कोई उम्मीद ही न हो. क्या दोचार दिन साथ घूम लेने से ही वह उस की प्रेयसी हो जाएगी.

राहुल अमीर है, स्मार्ट है. कितने ही बड़ों घरों से उस के लिए रिश्ते आते होंगे. ऐसे में वह तो कहीं भी नहीं ठहरती. किंतु राहुल के सामने आने पर, उस की आंखों में अपने लिए कुछ खास सा भाव देख वह फिर दिल के हाथों मजबूर हो, उस की तरफ एक खिंचाव सा महसूस करने लगती. इधर वसुंधरा भी अब मयूरी के लिए अपनी जातबिरादरी में लड़का ढूंढ़ने लगी थी.

हर 2 महीने बाद राहुल दिल्ली आता तो देहरादून जरूर जाता. तब अकसर ही सारा व मयूरी के साथ कभी मसूरी, कभी सहस्त्रधारा आदि का प्रोग्राम बना कर घूमने निकल जाता. वहां सारा कभी उन्हीं के साथ रहती, कभी अलग घूमने निकल जाती. तब केवल वे दोनों व उन की तनहाइयां ही रह जातीं. पर राहुल ने कभी उस का बेजा फायदा उठाने की कोशिश नहीं की. जिस से मयूरी का उस पर यकीन बढ़ता गया, साथ ही आपस में हंसीमजाक भी. आखिर जाने से एक दिन पहले राहुल ने उस से अपने दिल की बात कह ही दी.

‘मुझ से शादी करोगी?’

इतने दिनों से जो बात उस के ख्वाबोंखयालों में मंडराती रहती थी, आज हकीकत में सुन कर पहले तो उसे यकीन ही नहीं हुआ, फिर मयूरी की पलकें झुक गईं और होंठों पर एक लजाई हुई मुसकराहट छा गई थी.

‘कुछ तो कहो?’ उस ने उस का चेहरा उठाते हुए पूछा.

‘अच्छा, मां से बात करो,’ कह कर उस ने सिग्नल दे दिया था.

देहरादून से वापस लौटते ही मयूरी को मां का भेजा पत्र मिला कि उन्होंने एक अच्छे संभ्रांत परिवार में उस का रिश्ता तय कर दिया है. केवल औपचारिक तौर पर वे लोग एक बार आमनेसामने लड़की को देखना चाहते हैं. तभी वे शगुन की रस्म भी कर देंगी. सो, अगली गाड़ी से ही वह घर आ जाए.

मां का पत्र पढ़ कर मयूरी थोड़ा पसोपेश में पड़ गई. अब वह मां को अपने दिल की बात कैसे बताए कि वह केवल राहुल को चाहती है व उसी से शादी करना चाहती है. मां का पत्र राहुल व सारा ने भी पढ़ा.

राहुल के चेहरे पर कई रंग आ कर चले गए. कुछ सोच कर वह बोला, ‘देख लो, फैसला तुम्हारे हाथ में है. एक तरफ तुम्हारी पसंद का देखापरखा तुम्हारा प्यार है, दूसरी तरफ एक अनजान परिवार जिसे न तुम ने पहले देखा है न बिलकुल जानती हो. बालिग हो, अपना फैसला खुद लेने का हक है तुम्हें. हम लोग यहीं कोर्ट में विवाह कर लेते हैं, बाद में मां को बता देंगे.’

‘पर इस तरह शादी कर लेने से मां को बहुत दुख होगा. हम दोनों बहनों के लिए उन्होंने बहुत दुख उठाए है.’ मयूरी के संस्कार उसे मां से बगावत करने से रोक रहे थे, पर अमीर राहुल से विवाह होने पर सुखसुविधा संपन्न जीवनयापन की चाह मां के फैसले के उलट करने को उकसा रही थी.

राहुल द्वारा कोर्टमैरिज के लिए जोर देने पर, उस से विवाह करने की दिली इच्छा होते हुए भी, वह मां को अंधेरे में रख कर यह विवाह नहीं करना चाहती थी. उसे वह ठीक नहीं समझ रही थी. वह विवाह तो करना चाहती थी पर मां की खुशी के साथ.

आखिर सोचविचार कर, एक बार मां को मनाने की कोशिश करने के लिए वह राहुल व सारा के साथ अगले ही दिन मां के पास जा पहुंची थी. वहां राहुल ने अपना परिचय देने के साथ ही मयूरी का हाथ भी मांग लिया तो वे इस प्रस्ताव से चौंक उठी थीं, ‘कहां तुम लोग और कहां हम. रिश्ता तो बराबरी वालों में ही अच्छा रहता है.’

‘बराबरी केवल पैसों से ही थोड़े न होती है. मुझे आप की बेटी बेहद पसंद है. आप फिक्र न करें, हमें कोई दानदहेज नहीं चाहिए?  बस, अपनी बेटी 3 कपड़ों में विदा कर दीजिएगा,’ राहुल ने अपील की.

‘पर तुम्हारे मातापिता भी आ जाते, तभी बात पक्की करते,’ वे असमंजस में पड़ कर बोलीं. इतने बड़े घर से बेटी का रिश्ता मांगा जाता देख वे थोड़ी हतप्रभ थीं, साथ ही उन्हें खुशी भी थी कि बेटी इतने बड़े संपन्न घर जा कर चैन से जिंदगी बसर करेगी.

‘हमारी मौम तो अब रही नहीं. हां, डैडी हैं, पर वे इस समय बिजनैस के सिलसिले में हौंगकौंग गए हुए हैं. सो, उन का आना तो फिलहाल संभव नहीं है. अपने डैडी से मैं खुद मयूरी को मिलाने ले जाऊंगा. तभी शादी का रिसैप्शन दिया जाएगा. अभी तो बस आप इजाजत दे दीजिए, ताकि मैं मयूरी से कोर्टमैरिज कर सकूं. क्योंकि 2 दिनों बाद ही मुझे भी बिजनैस की कई मीटिंग्स अटैंड करने फ्रांस जाना है और फिर शायद जल्दी आना नहीं हो पाएगा.’

‘पर इतनी जल्दी मयूरी का पासपोर्ट वगैरह कैसे बन पाएगा?’ वसुंधरा के मुंह से निकला.

‘वह मैं अरैंज करा दूंगा. मेरी जानपहचान है.’

राहुल ने कहा तो वसुंधरा को फिर इस रिश्ते के लिए न कहने की कोई वजह नहीं दिखी. उसे सबकुछ स्वप्न सा लग रहा था. वसुंधरा अपने रीतिरिवाजों के अनुसार विवाह की रस्में पूरी करवाना चाहती थी. पर पैसे व समय दोनों की बचत करने पर जोर दे कर राहुल कोर्टमैरिज करने के फैसले पर ही अड़ा रहा और दोचार जानपहचान वालों की मौजूदगी में उन लोगों ने एक हलफनामे पर हस्ताक्षर कर के विवाह की फौर्मेलिटीज पूरी कर दीं. वसुंधरा के बहुत मना करने पर भी राहुल डेढ़ लाख रुपए अपने यहां की ‘हक’ की रस्म के नाम पर उन्हें दे ही गया.  क्रमश:

क्या जो हसीन सपने मयूरी देख रही थी वाकई पूरे होने वाले थे या कुछ ऐसा होने वाला था जो कोई सोच भी नहीं सकता था.

शूरवीर बना कर्मवीर

अमिताभ बच्चन सिलवर स्क्रीन के ऐसे पहले अभिनेता हैं, जिन्हें उन के प्रशंसकों ने महानायक का खिताब दिया है. उन से मिलने के लिए हमेशा हजारों लोग लालायित रहते हैं. बिग बी के नाम से मशहूर बच्चन सोनी टीवी पर एक लोकप्रिय शो पेश करते हैं, जिस का नाम है ‘कौन बनेगा करोड़पति’. इस क्विज शो का इस समय 10वां सीजन चल रहा है.

इस सीजन की खास बात यह है कि इस में हर शुक्रवार को स्पैशल एपीसोड टेलीकास्ट किया जाता है, जिस में देश के कर्मवीर को हौट सीट पर बैठने का मौका मिलता है. कर्मवीर यानी ऐसी शख्सियत जिस ने अपनी मेहनत और हिम्मत के बल पर अपनी पहचान बना कर सफलता का नया मुकाम हासिल किया हो.

5 अक्तूबर, 2018 को जब कर्मवीर एपीसोड शुरू हुआ तो केबीसी और बिग बी के लाखोंकरोड़ों चहेते यह देख कर अचंभित हो गए कि जिस अमिताभ की एक झलक पाने, उन्हें छूने या उन से मिलने के लिए लोग पागलपन की हद से गुजर जाते हैं, वही अमिताभ बच्चन उस दिन अपने सामने कर्मवीर की हौट सीट पर बैठे शख्स को नतमस्तक हो कर प्रणाम कर रहे थे. दरअसल, शो में उस दिन एक असाधारण शख्स केबीसी की हौट सीट पर विराजमान थे.

प्रवीण तेवतिया नाम के इस असाधारण शख्स ने 10 साल पहले 26 नवंबर, 2008 को मुंबई के ताज होटल पर हुए आतंकी हमले में अपनी जान पर खेल कर डेढ़ सौ से अधिक लोगों की जान बचाई थी.

भारतीय नौसेना की मरीन कमांडो की मार्कोस यूनिट के जिस पहले कमांडो दस्ते ने एनएसजी कमांडो के आने से पहले ताज होटल पर मोर्चा संभाला था, प्रवीण उसी यूनिट का हिस्सा थे. मार्कोस दस्ते के इस कमांडो को आतंकवादियों की तरफ से दागी गई 4 गोलियां लगी थीं, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और इस जांबाज शूरवीर ने आतंकियों के हौसलों को तोड़ दिया.

प्रवीण तेवतिया ने केबीसी की हौट सीट पर बैठने के बाद साढ़े 5 लाख रुपए की रकम जीती, लेकिन उन्होंने 26/11 हमले के रेस्क्यू औपरेशन की जो कहानी सुनाई, उसे सुन कर लोगों के सामने उस काले दिन की घटना के दृश्य एक बार फिर से ताजा हो उठे. शूरवीर प्रवीण तेवतिया के साथ 26 नवंबर, 2008 को जो हादसा हुआ, उस भयावह रात की कहानी इंसान को झकझोर देने वाली है.

उस रात लगभग 8 बजे के आसपास 10 पाकिस्तानी आतंकवादियों ने समुद्र के रास्ते देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में प्रवेश किया. उस दिन भी मुंबई हमेशा की तरह से व्यस्त थी. दिन से ज्यादा रात में व्यस्त रहने वाली मुंबई में औफिस खत्म होने के बाद लोगों की भीड़ सड़कों पर थी. तभी इन 10 आतंकियों ने मुंबई को दहलाने के लिए एक खूनी साजिश को अंजाम दिया था.

रात 9 बज कर 20 मिनट पर आतंकियों ने दक्षिणी मुंबई के कई इलाकों में लोगों को अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया. सब से पहला हमला उन्होंने 9 बज कर 30 मिनट पर भीड़भाड़ वाले छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर किया. इस के बाद लियोपोल्ड कैफे, नरीमन हाउस, ताज पैलेस होटल, ओबराय ट्राइडेंट होटल, कामा अस्पताल, मेट्रो सिनेमा, टाइम्स औफ इंडिया बिल्डिंग और सेंट जेवियर कालेज के पीछे वाली लेन को आतंकवादियों ने अपना निशाना बनाया.

मुंबई पुलिस के जांबाज सिपाही, आतंकवाद विरोधी दल, नैशनल सिक्योरिटी गार्ड, नेवी के मार्कोस कमांडोज और मुंबई फायर ब्रिगेड ने मिल कर 3 दिन तक इन आतंकियों का सामना अदम्य साहस और शौर्य के साथ किया.

आतंकियों ने शुरू कर दिया था खूनखराबा

मुंबई की जमीन पर कदम रखते ही ये 10 आतंकवादी 2-2 के ग्रुप में 5 हिस्सों में बंट गए थे. आतंकवादी अपने खौफनाक कारनामों से देशीविदेशी मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींचना चाहते थे. इस के लिए उन्होंने विश्वप्रसिद्ध और मुंबई के बड़े होटल ताज और ओबराय को निशाना बनाया.

विदेशी लोगों से भरे बार लियोपोल्ड कैफे और यहूदियों का निवास नरीमन हाउस भी इन के निशाने पर था. भीड़ को निशाना बनाने के लिए 2 आतंकियों के एक ग्रुप ने सब से पहले सब से व्यस्त रेलवे स्टेशन छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (सीएसटी) पर हमला किया, जिस में करीब 60 लोगों की मौत हुई.

रात लगभग पौने 10 बजे 4 आतंकियों ने लियोपोल्ड कैफे पर अंधाधुंध गोलीबारी शुरू की. आतंकवादी 10 से 15 मिनट तक फायरिंग करते रहे, इस हमले में 10 लोगों की मौत हुई. इस के बाद आतंकवादियों ने गेटवे औफ इंडिया के सामने बने मुंबई की शान कहे जाने वाले ताज पैलेस होटल और पास में ही स्थित टावर होटल की तरफ रुख किया.

2 और आतंकवादी शोएब और उमर ला-पेट होटल के दरवाजे को बम से उड़ा कर ताज होटल के ग्राउंड फ्लोर में दाखिल हो गए. उन्होंने सब से पहले स्विमिंग पूल के आसपास खड़े 4 विदेशी मेहमानों को अपना निशाना बनाया और फिर अंदर बार और रेस्तरां की ओर बढ़ गए. रात के लगभग एक बजे आतंकवादियों ने होटल के बीच में डोम पर ब्लास्ट किया, जिस से वहां आग लग गई.

रात ढाई बजे तक भारतीय सेना के 2 ट्रक सैनिक वहां पहुंच गए, जिन्होंने मुख्य लौबी की ओर से होटल में प्रवेश कर के उसे अपने कब्जे में ले लिया. लेकिन उस समय तक आतंकी कमरों की तरफ जा चुके थे.

होटल स्टाफ ने बड़ी चतुराई के साथ होटल में मौजूद लोगों को अपने कमरों में ही बंद होने को कह दिया था. लेकिन होटल में लगी आग तब तक काफी भड़क चुकी थी. 10 बज कर 10 मिनट पर 2 अन्य आतंकवादी ओबराय ट्राइडेंट होटल में दाखिल हुए.

दोनों आतंकवादी होटल के मुख्य प्रवेश द्वार पर गोलीबारी करते हुए रिसैप्शन की तरफ बढ़ गए. उन्होंने होटल के रेस्तरां और बार की तरफ भी गोलीबारी की. आतंकवादियों ने होटल के स्पा में काम कर रहे 2 थाई लोगों की भी हत्या कर दी.

आतंकवादियों ने ताज होटल के ज्यादातर लोगों को बंधक बना लिया था. ओबराय ट्राइडेंट होटल में ज्यादातर विदेशी मेहमान आते थे. आतंकवादियों के निशाने पर यही लोग थे, ताकि उन के कारनामे की गूंज विश्व स्तर तक पहुंचे.

रात 12 बजे तक मुंबई पुलिस की स्पैशल टीम ने होटल को चारों ओर से घेर लिया था. पुलिस ने एक तरह से पूरी मुंबई को सील कर दिया. रात भर मुंबई पुलिस व सेना के जवान अलगअलग इलाकों में घुसे आतंकवादियों से लोहा लेते रहे. एक तरह से पूरी रात मुंबई में अफरातफरी का माहौल रहा.

सड़कों पर पुलिस की गाडि़यां और अस्पतालों की एंबुलेंस सायरन बजाती इधर से उधर दौड़ती रहीं. रहरह कर फिजाओं में गोलियों की गूंज और बम के धमाकों की आवाज से लोगों का कलेजा हलक को आ रहा था. भोर का उजाला होने से पहले ही सरकार ने अलगअलग स्तर पर आतंकवादियों की काररवाई का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए कई फैसले ले लिए.

पाकिस्तानी आतंकवादियों ने पांचसितारा होटलों से ले कर जिन स्थानों पर लोगों को बंधक बनाया था, उन्हें मुक्त कराने के लिए सरकार ने रात में ही एनएसजी के 200 कमांडोज को मुंबई रवाना करने का फैसला ले लिया था. लेकिन जब तक एनएसजी कमांडो औपरेशन शुरू नहीं करते तब तक हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा जा सकता था, इसलिए एनएसजी के आने तक नेवी के मार्कोस कमांडोज के एक दस्ते को मोर्चे पर भेजने का फैसला लिया गया.

मार्कोस कमांडोज का दस्ता पहुंचा पहले

27 नवंबर की सुबह 4 बजे भारतीय नौसेना के 16 मरीन कमांडोज, जिन्हें मार्कोस कमांडोज कहा जाता है, ने समुद्र में 8 किलोमीटर दूर बने अपने बेस से एक नाव में सवार हो कर मुंबई की ओर रुख किया. मार्कोस कमांडो की गिनती दुनिया के बेहतरीन कमांडोज में होती है.

ये सभी 16 कमांडोज एके 47 और एमपी 5 सब मशीनगन से लैस थे और उन की पेंट पर 9 एमएम की पिस्टल भी लगी थी. सभी के पास ग्रेनेड थे. बुलेटप्रूफ जैकेट पहने इन मार्कोस कमांडोज ने आतंकियों से निपटने के लिए सब से पहले ताज होटल पर मोर्चा संभाला.

आतंकवादी हमले के बाद आतंकियों से लोहा लेने के लिए मुंबई के टेरर स्पौट पर पहुंचा मार्कोस कमांडो का पहला विशेष दस्ता था, जिस ने आते ही आतंकवादियों पर प्रहार शुरू कर दिया. मार्कोस दस्ते ने 2 भागों में बंट कर मोर्चा संभाला. दस्ते की एक टीम लोगों को रेस्क्यू कराने के काम में जुटी तो दूसरी टीम ने आतंकवादियों को मुंहतोड़ जवाब देना शुरू किया.

उस समय तक आतंकवादी होटल ताज व होटल ओबराय ट्राइडेंट पर पूरी तरह अपना कब्जा जमा चुके थे. 8 मार्कोस कमांडोज की जिस टीम ने ताज होटल में मोर्चा संभाल कर औपरेशन शुरू किया, उस की अगुवाई 24 साल के कमांडो प्रवीण तेवतिया कर रहे थे.

प्रवीण तेवतिया की टीम ने आंसू गैस के गोले दागे. उसी दौरान टीम ताबड़तोड़ फायरिंग करते हुए ताज होटल के धुएं से भरे कोरिडोर को पार कर के भीतर प्रवेश कर गई. वहां पर कई लोग मरे पड़े थे. वहीं पर टीम की आतंकवादियों से भिड़ंत हुई. उस समय आतंकवादी चैंबर लाइब्रेरी में घुसे हुए थे. वहीं पर दोनों तरफ से गोलीबारी होने लगी.

मौका मिलते ही तेवतिया की टीम ने सब से पहले पहली मंजिल पर फंसे हुए लोगों को बाहर निकाला और फिर आतंकियों की तलाश में कमरों की तलाशी शुरू कर दी.

कमांडो प्रवीण पर चलाईं गोलियां

अपनी टीम में सब से आगे चल रहे तेवतिया लौबी के बगल में एक अंधेरे कमरे में दाखिल हुए. उन्हें नहीं पता था कि इस कमरे में पहले से ही आतंकवादी छिपे बैठे हैं. जैसे ही प्रवीण कमरे में 6-7 कदम अंदर घुसे, वहां घात लगाए बैठे आतंकियों ने उन के ऊपर फायरिंग कर दी. आतंकवादियों की एक गोली इन के कान को उड़ाती हुई निकल गई, जिस कारण दर्द का एक गुबार उठा और उन के हलक से चीख निकल गई. आतंकवादियों की तरफ से 3-4 राउंड फायर और हुए.

तब तक कमांडोज की पूरी टीम लौबी से दूर जा चुकी थी. प्रवीण उसी कमरे में जमीन पर ही गिरे पड़े रहे, उन के कान से खून लगातार बह रहा था. कमरे में वे अकेले फंसे हुए थे, आतंकियों ने उन्हें घेर रखा था. बचाव के लिए उन्होंने आंसू गैस का गोला फेंका, जिस के कारण वहां कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. प्रवीण दम साधे घायलावस्था में ही जमीन पर पड़े रहे क्योंकि वे जानते थे कि थोड़ी हलचल होती तो आतंकवादी गोली चला देते.

प्रवीण खून से लथपथ थे. वे यह जान पा रहे थे कि गोली किस दिशा से आ रही है. लिहाजा उन्होंने एक ग्रेनेड आतंकियों को निशाना बना कर उन्हीं की ओर फेंका, लेकिन इत्तफाक से वो फटा नहीं. प्रवीण तेवतिया समझ गए कि अगर जिंदा रहना है तो कमरे से निकलना होगा, लिहाजा उन्होंने जान की परवाह न करते हुए अपनी राइफल उठाई और उस कमरे से बाहर निकलने की जुगत में लग गए.

गोली आने वाली दिशा से बचते हुए वे खड़े हुए और बाहर की ओर भागे. लेकिन इसी बीच आतंकवादियों की 3 गोलियां इन की बुलेटप्रूफ जैकेट पर जा कर लगीं. इन में से एक उन के सीने में पेवस्त हो गई और शरीर को भेदती हुई बाहर निकल गई. वहीं एक गोली इन की गरदन के पास से गुजरी. तब तक बुरी तरह घायल होने के बावजूद वह कमरे से बाहर आ चुके थे. उस समय होटल के इस कमरे में 4 आतंकवादी मौजूद थे. बाहर निकलते ही साथियों ने उन्हें संभाला. गोली लगने के कारण इन के फेफड़े पूरी तरह से डैमेज हो चुके थे.

कमरे में धुआं और अंधेरा था. उन के साथियों ने आतंकवादियों को बेहोश करने के लिए गैस के गोले कमरे में फेंकने शुरू कर दिए. लगभग एक घंटे बाद मार्कोस लाइब्रेरी में दाखिल हुए, तब तक आतंकवादी खिड़की तोड़ कर किचन के रास्ते नई बिल्डिंग की ओर जा चुके थे.

आतंकवादियों के उस हिस्से से निकलने के बाद मार्कोस कमांडोज ने होटल के उस हिस्से में फंसे हुए लोगों को बाहर निकाला. घायल होने के बावजूद प्रवीण लगातार औपरेशन में जुटे रहे, लेकिन कुछ वक्त बाद जब शरीर से बहुत ज्यादा खून बह गया तो बेहोशी ने उन्हें अपने आगोश में ले लिया.

दिव्यांग हो गए प्रवीण

उस रात हुए हादसे में अपनी जांबाजी से प्रवीण तेवतिया ने सैकड़ों लोगों की जान तो बचा ली मगर उस के बाद उन की अपनी जिंदगी ने बेबसी की चादर ओढ़ ली. 26/11 के आतंकी हमले में जो हुआ, वह तो प्रवीण तेवतिया के साहस और जांबाजी की कहानी थी.

लेकिन इस के बाद जब इलाज होने पर उन्हें यह पता चला कि वह दिव्यांग हो चुके हैं, उन के फेफड़े औपरेशन के कारण कमजोर हो गए हैं और कनपटी पर गोली लगने के कारण उन के सुनने की क्षमता भी कम हो गई है तो फिर उन्होंने जो संघर्ष शुरू किया, वह इस जांबाज कमांडो की जीवटता की एक अलग कहानी है.

इस के बाद प्रवीण तेवतिया ने संघर्ष कर के अपनी जो पहचान बनाई और सफलता हासिल कर जो नया मुकाम बनाया, उसी के कारण अमिताभ बच्चन जैसे महानायक को भी प्रवीण तेवतिया को नमन करना पड़ा.

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के भटीना गांव के रहने वाले प्रवीण तेवतिया (32) ने साल 2007 में भारतीय नौसेना जौइन की थी. किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले प्रवीण तेवतिया के बडे़ भाई भी भारतीय सेना में हैं, इसलिए देशभक्ति और वतन पर जान देने का जज्बा उन्हें एक तरह से परिवार से संस्कार में मिला था.

नौसेना में बतौर कमांडो शामिल होने के बाद प्रवीण को कठिन प्रशिक्षण दिया गया और उन्हें मार्कोस की टुकड़ी में शामिल कर लिया गया. उन्हें नौसेना के समुद्री यानों पर तैनाती मिली. मार्कोस कमांडो की नौकरी के दौरान उन्हें कई बार समुद्री डाकुओं और हथियारबंद समुद्री तस्करों से लोहा लेने का मौका मिला था.

कई बार उन का समुद्र के रास्ते देश में घुसपैठ की कोशिश करने वाले संदिग्ध आतंकवादियों से भी सामना हुआ. हर बार शूरवीर प्रवीण तेवतिया ने अपनी जांबाजी का सबूत दिया था.

लेकिन नवंबर 2008 में उन्हें पहली बार मुंबई हमले के दौरान जमीन पर आतंकवादियों के खिलाफ हुए औपरेशन करने का मौका मिला था. इसी औपरेशन में प्रवीण तेवतिया ने अपनी जान पर खेल कर ताज होटल में फंसे सैकड़ों लोगों की जान बचाते हुए अपने सीने व कनपटी पर गोलियां खाईं.

करीबन 5 महीने तक अस्पताल में शूरवीर प्रवीण तेवतिया का इलाज चला. उन की 5 सर्जरी हुईं पर उन की हिम्मत नहीं टूटी. डाक्टरों ने हालांकि सारी उम्मीदें छोड़ दी थीं, लेकिन 5 महीने के कड़े संघर्ष के बाद आखिरकार वह ठीक तो हो गए लेकिन कान के पास गोली लगने की वजह से उन की सुनने की क्षमता प्रभावित हुई.

गोली लगने के बाद प्रवीण आंशिक तौर पर बधिर हो गए. सीने में गोली लग जाने के कारण उन के फेफड़े फटने से उन में कमजोरी आ गई थी और डाक्टरों ने उन्हें सलाह दी थी कि वह कोई ऐसा काम न करें, जिस से उन की सांस फूले. वे ऐसा कोई काम नहीं करें, जिस में औक्सीजन की ज्यादा जरूरत पड़े. उन्हें ऐसे क्षेत्रों में भी न जाने की सलाह दी गई थी, जो ज्यादा ऊंचाई पर हैं या जहां औक्सीजन की कमी हो.

नेवी में नहीं मिली एक्टिव ड्यूटी

कुछ महीनों के बाद जब वे पूरी तरह स्वस्थ हो गए तो उन्होंने फिर से नेवी में अपनी ड्यूटी जौइन कर ली लेकिन आंशिक दिव्यांग हो जाने के कारण इस शूरवीर कमांडो को नान एक्टिव ड्यूटी दे दी गई. हालांकि प्रवीण डेस्क जौब नहीं करना चाहते थे. वह खुद को फिट मानते थे. कुछ समय बाद प्रवीण ने नेवी पर्वतीय दल के लिए एप्लीकेशन भेजी, लेकिन मैडिकल ग्राउंड पर उन की अरजी खारिज कर दी गई. इस के बाद तो मानो प्रवीण पर खुद को फिट साबित करने का जुनून सवार हो गया.

उन्होंने किसी से कोई शिकायत नहीं की. प्रवीण बस यह चाहते थे कि हर कोई ये जाने कि वह वही शख्स हैं, जिस ने ताज होटल आतंकी हमले में लोगों को बचाने के लिए बतौर कमांडो काम किया था. वह नहीं चाहते थे कि लोग उन्हें भुला दें. प्रवीण स्वयं को और नेवी को यह साबित करना चाहते थे कि वह न केवल अपने हौसलों से बल्कि शारीरिक रूप से भी ड्यूटी के लिए फिट हैं.

यही सब करने के लिए उन्होंने धावक का प्रशिक्षण शुरू कर दिया. प्रैक्टिस करने के बाद वह मैराथन दौड़ में हिस्सा लेने लगे. ताज होटल के कर्मचारियों की मदद से प्रवीण मैराथन धावक प्रवीण बाटीवाला से मिले.

बनाना चाहते थे नया इतिहास

बाटीवाला ने लंबी दूरी की मैराथन में शामिल होने के लिए उन का हौसला बढ़ाया. जिस के बाद प्रवीण ने सन 2014 में मैराथन की ट्रेनिंग शुरू की. आखिरकार प्रवीण तेवतिया ने सन 2017 में 72 किलोमीटर लंबी खारदुंग ला मैराथन में हिस्सा ले कर मैडल जीत कर सब को चकित कर दिया.

हालांकि इस से पहले सन 2015 में उन्होंने मुंबई हाफ मैराथन में नेवी से अवकाश ले कर दूसरे नाम से हिस्सा लिया ताकि असफल होने पर उन की नेवी की उम्मीद न टूटे. उन्होंने सन 2016 में इंडियन नेवी हाफ मैराथन में भी भाग लिया था.

लेकिन सफलता ने उन के कदम 2017 में तब चूमे जब जयपुर में आयरनमैन हाफ ट्रायथलान में 1.9 किलोमीटर तैराकी, 90 किलोमीटर साइक्लिंग और 21 किलोमीटर दौड़ लगा कर एक नया मुकाम हासिल किया. इस जीत से प्रवीण को एक नई पहचान मिलनी शुरू हुई.

उन का अगला लक्ष्य मैराथन था. चूंकि वह मैराथन के लिए ज्यादा छुट्टियां नहीं ले सकते थे, इसलिए उन्होंने नेवी की नौकरी छोड़ने का फैसला कर लिया. जुलाई, 2017 में उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली और वह तैयारी में जुट गए.

कठिन मेहनत के बाद अक्तूबर 2017 में साउथ अफ्रीका की पोर्ट एलिजाबेथ सिटी में हुई आयरनमैन अफ्रीकन चैंपियनशिप प्रवीण ने घुटना चोटिल होने के बावजूद जीत ली. आयरनमैन ट्रायथलान चैंपियनशिप दुनिया की सब से कठिन और प्रतिष्ठित प्रतियोगिता मानी जाती है. आयरनमैन ट्रायथलान में 180.2 किलोमीटर तक साइकिल चलानी होती है.

भारत से प्रवीण समेत कुल 3 खिलाड़ी इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए पहुंचे. अन्य 2 खिलाड़ी कोच्चि और चेन्नई से थे. उन्होंने अपनी ट्रेनिंग देश के एकमात्र आयरनमैन कोच कोस्टुब राडकर की देखरेख में पुणे में की थी.

इस प्रतियोगिता में प्रवीण 110 किलोमीटर की साइकिलिंग कर चुके थे. तभी अचानक उन की साइकिल का गियर शिफ्टर टूट गया. चूंकि उन के जूते साइकिल के पैडल में फंसे हुए (क्लीज शूट) थे, इसलिए वह सड़क पर गिर गए. उन का घुटना लहूलुहान हो गया. साइकिल की चेन भी पूरी तरह मुड़ चुकी थी.

50 मीटर पीछे आ रही बाइक मेंटनेंस टीम ने गियर सिस्टम को पूरी तरह साइकिल से अलग कर दिया. इस के बाद साइकिल बिना गियर वाली रह गई.

आखिर खुद लिखी सफलता की कहानी

अब प्रवीण के सामने चोटिल घुटने से बिना गियर वाली साइकिल से 70 किलोमीटर दूरी तय करनी थी. पर उन्होंने हार नहीं मानी. तेज हवाओं और बिना गियर वाली साइकिल होने के बावजूद प्रवीण ने 7 घंटे 37 मिनट में 180 किलोमीटर साइकिलिंग पूरी कर ली और वे देश के पहले एकमात्र ऐसे आयरनमैन बने जो आर्म्ड फोर्स से थे.

9 सितंबर, 2017 को प्रवीण ने लद्दाख में 72 किलोमीटर लंबे खारदुंग ला मैराथन में हिस्सा लिया. प्रवीण ने इसे निर्धारित समय में पूरा कर पदक हासिल किया. उन्होंने 18,380 फीट की ऊंचाई पर 12.5 घंटे में मैराथन पूरी कर मैडल जीता.

प्रवीण ने लद्दाख में आयोजित जिस मैराथन को पूरा किया, वह अच्छे से अच्छे शख्स के लिए कर पाना आसान नहीं है. वहां औक्सीजन की मात्रा काफी कम होती है और अगर किसी का फेफड़ा पहले से ही क्षतिग्रस्त हो तो उस के लिए तो यह काम किसी चुनौती से कम नहीं होता.

प्रवीण का ऐसा करना बड़ी उपलब्धि थी लेकिन यह उन की मजबूत इच्छाशक्ति का ही परिणाम था कि उन्होंने इस कठिन मैराथन को निर्धारित समय में पूरा कर कीर्तिमान स्थापित किया. ऐसे बेजोड़ जज्बे को देश के हर नागरिक का सलाम जरूरी है. शूरवीर कमांडो प्रवीण अब एक अंतरराष्ट्रीय रेसर के रूप में अपनी धाक जमा चुके हैं.

अब फरवरी, 2019 में अमेरिका के अल्ट्रामैन खिताब को जीतना उन का लक्ष्य है. प्रवीण तेवतिया को 26/11 हमले के दौरान बहादुरी का परिचय देने के कारण 26 जनवरी, 2011 को तत्कालीन राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी पाटिल ने उन्हें शौर्य चक्र दे कर सम्मानित किया था.

वार पर वार (दूसरा भाग)

प्रीति ने तुरंत एतराज किया, ‘‘नहींनहीं, मेरा यह मतलब नहीं… मैं एक आम बात कह रही थी. तुम्हारे जैसी लड़कियां आजकल कहां मिलती हैं. आज बाहर की दुनिया में इतनी चमक है और पैसों की इतनी खनक है कि इस सब के लिए कोई भी लड़की अपनी इज्जत बेचने के लिए आमादा रहती है.

‘‘तुम बुरा मत मानो, मैं सच कहती हूं, आजकल की पढ़ीलिखी लड़कियों के लिए कुंआरापन बेकार का शब्द है. मौजमस्ती करना, ढेर सारा रुपया कमाना, चाहे जिस रास्ते से और समाज में एक हैसियत बनाना उन का मकसद होता है.’’

‘‘मैं क्या करूं?’’ नमिता ने अपने हाथ मलते हुए पूछा.

प्रीति मुसकराते हुए बोली, ‘‘हताश होने की जरूरत नहीं है, कुदरत किसी को भी इतना कमजोर नहीं बनाती कि उस के जिंदा रहने के सारे रास्ते बंद कर दे. जो उम्मीद का दामन उलट हालात में भी थामे रहते हैं, वे अपना लक्ष्य जरूर हासिल करते हैं.’’

प्रीति की बातों से नमिता को भले ही कोई राहत न मिली हो, पर बाद में उस ने जो सलाह दी, उस से नमिता को धुंधले अंधेरे में रोशनी की किरण दिखाई देने लगी. फिर भी एक डर बना रहा.

नमिता ने पूछा, ‘‘अगर मैं तबादले की अर्जी देती हूं तो उसे औफिस में ही देना पड़ेगा न? तब यह बौस का बच्चा क्यों उसे आगे भेजेगा?’’

‘‘बात तो तुम्हारी सही है, पर एक रास्ता फिर भी है. अर्जी की एक प्रति हम रजिस्टर्ड डाक से सीधे डायरैक्टर को भेज सकते हैं. दूसरी प्रति प्रौपर चैनल के जरीए भेजने के लिए औफिस में देंगे. झक मार कर उसे हैडर्क्वाटर भेजना पड़ेगा,’’ प्रीति ने बताया.

उन दोनों ने बहुत सोचसमझ कर एकएक शब्द चुन कर तबादले की अर्जी बनाई. एक प्रति डाक से हैडक्वार्टर भेज दी. हालांकि वह दिल्ली में ही था. दूसरी प्रति उसी दिन उस ने औफिस में जमा कर दी… धड़कते दिल से कि जब उस की अर्जी भूषण राज के सामने होगी तो वह क्या सोचेगा? क्या वह भड़क उठेगा और उसे बुला कर अनापशनाप कुछ सुनाएगा या फिर शांत रह कर कोई ऐसी चाल चलेगा कि नमिता धराशायी हो जाएगी और उस की उम्मीदों पर पानी फिर जाएगा?

उस दिन नमिता बहुत बेचैन रही. औफिस के साथियों से बातें करती थी, पर मन कहीं और अटका हुआ था. न उस के दिल की धड़कन की रफ्तार कम हो रही थी, न उस की बेचैनी. रहरह कर मन भूषण राज के इर्दगिर्द ही घूमने लगता था.

दुष्ट आदमी चाहे ऊपर से कितना ही मीठा दिखाई देता हो, प्यारीप्यारी बातें करता हो, पर अपनी दुष्टता से कभी बाज नहीं आता.

नमिता की अर्जी को देखते ही भूषण राज की नसों में खून की जगह आग बहने लगी. थोड़ी देर बाद ही उस ने नमिता को अपने चैंबर में बुलाया. वह डरतीकांपती उस के सामने पहुंची…

अपनी नजरों से नमिता के सारे बदन को नंगा करता हुआ वह बोला, ‘‘तो उड़ने का ख्वाब देख रही हो…’’

डर के मारे नमिता अपनी आंखें नहीं उठा पा रही थी.

‘‘तुम यह अवार्ड देने से पहले यह क्यों भूल गई कि तुम्हारी हालत पिंजरे में कैद पंछी की तरह है. बाज तुम्हारी रखवाली कर रहा है. पिंजरे का दरवाजा खुल भी जाएगा तो बाज की तेज निगाहों और उस की तेज रफ्तार से खुद को कैसे बचा पाओगी?’’

नमिता की रूह कांप कर रह गई. उस की आंखों के सामने अंधेरा सा छाता जा रहा था. उस की समझ में कुछ नहीं आया तो लरजती आवाज में उस ने दया की भीख मांगी, ‘‘मैं आप की बेटी जैसी हूं, मुझ पर दया कीजिए.’’

‘‘दया… क्या तुम मुझ पर दया कर सकती हो? बोलो, तुम भी एक लड़की हो, तुम्हारे पास भी भावनाएं हैं. क्या तुम मेरे दिल का हाल नहीं समझ सकती? तुम अपनी थोड़ी सी दया और प्यार की एक छोटी बूंद मेरे ऊपर टपका दो, फिर देखो, मैं तुम्हारे ऊपर दया की इतनी बारिश करूंगा कि तुम्हारी जिंदगी बदल जाएगी. बोलो, मंजूर है?’’ कह कर वह हंसा.

नमिता के पास उस की बात का कोई जवाब नहीं था. वह चुपचाप उस के चैंबर से बाहर निकल आई.

नमिता को हैडक्वार्टर में बैठे अफसरों पर पूरा भरोसा था. वहां के सारे अफसर पत्थरदिल नहीं हो सकते थे. संबंधित अफसर उस की अर्जी पर जरूर विचार करेंगे.

कई दिन बीत गए. नमिता की चिंता बढ़ती जा रही थी. वह औफिस का काम भी ढंग से नहीं कर पाती थी. भूषण राज उस की हालत को समझ रहा था. नमिता अभी मर्यादा की बाढ़ में बह रही थी. वह जानता था कि बाढ़ का पानी एक न एक दिन कम जरूर होगा.

नमिता की परेशानी के मद्देनजर भूषण राज ने उसे एक दिन समझाते हुए कहा, ‘‘क्यों अपनी जान सुखा रही हो तुम? कंचन काया को पत्थर मत बनाओ. मेरा कहना मान लो, तुम्हारा कुछ बिगड़ेगा नहीं…’’

नमिता फिर भी नहीं समझी. वह समझ कर भी नहीं समझना चाहती थी.

एक महीने बाद नमिता को पता चला कि बौस ने उस की अर्जी को हैडक्वार्टर भेज तो दिया है, लेकिन नोट में जोकुछ लिखा है, उसे सुन कर नमिता के पैरों तले जमीन ही खिसक गई. वह इनसान जो उस से प्यार करने का दावा करता था, उस के शरीर को भोगना चाहता था, बौस के मन में उस के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने और उसे पूरी तरह से बरबाद कर देने के लिए ये विचार किस तरह आए होंगे, यह नमिता की समझ से परे था.

प्रीति ने फाइल देखने के बाद नमिता को बताया था कि बौस ने उस की अर्जी पर क्या नोट दिया था. नमिता के कानों में कुछ शब्द पड़े, कुछ नहीं… वह बेहोश सी हो गई थी…

बस इतना समझ में आया कि वह कामचोर थी, अपना काम ढंग से नहीं कर पाती थी. अंगरेजी अच्छी नहीं थी. स्टेनोग्राफर होने के बावजूद डिक्टेशन नहीं ले पाती थी. टाइपिंग में भी ढेर सारी गलतियां करती थी. उसे सुधारने और ढंग से काम करने के तमाम मौके मुहैया कराए गए, पर वह अपने काम में सुधार लाने के बजाय और ज्यादा लापरवाही बरतने लगी थी.

शायद वह किसी अनजान लड़के के प्यार में गिरफ्तार थी, जिस से हमेशा मोबाइल फोन पर बातें करती रहती थी.

बौस ने आगे अपने नोट में लिखा था कि समझाने के साथसाथ उसे काम में सुधार लाने के तरीके भी सुझाए गए थे, पर सारी कोशिशें नाकाम हो गईं और नमिता में जरूरी सुधार नहीं आने के बाद उसे चेतावनी दी जाने लगी, जिस से घबरा कर उस ने दूसरे दफ्तर में अपने तबादले के लिए अर्जी दे दी थी.

नमिता की उम्मीद के सारे चिराग बुझ गए. दफ्तर के सारे साथियों की हमदर्दी उस के साथ थी, पर वे भी नमिता की तरह लाचार थे.

बौस के दुष्ट स्वभाव, गंदी हरकतों और भेडि़ए जैसी चालाकी से परिचित थे. उस ने बड़े अफसरों को अपनी मुट्ठी में कर रखा था. बेईमान था, पर अकेला सब माल हजम नहीं करता था. नियमित रूप से हैड औफिस जा कर अफसरों की सेवा करता रहता था. पैसे के बल पर सभी को उस ने अपने वश में कर रखा था. सालों से वह एक ही दफ्तर में जमा हुआ था. जिस के बारे में जो कुछ लिखता था, हैड औफिस के अफसर तुरंत उसे मान लेते थे.

नमिता के मामले में भी यही हुआ. एक हफ्ता भी नहीं बीता था कि हैड औफिस से नमिता की अर्जी का जवाब आ गया. उस के तबादले की अर्जी को खारिज करते हुए उस के खिलाफ विभागीय जांच शुरू कर दी गई थी और मजे की बात यह कि जांच अफसर भूषण राज को ही बनाया गया था.

नमिता इतनी थक चुकी थी कि वह बीमार रहने लगी थी. 2-3 दिनों तक वह औफिस नहीं आई. पर उस से क्या फायदा होगा? बीमारी के बहाने वह कितनी छुट्टी ले सकती थी. छुट्टी भी तो भूषण राज को ही मंजूर करनी थी. वह कोई और अड़ंगा लगा देता तो… नमिता के हाथ में क्या था? वह क्या कर सकती थी?

3 दिन तक छुट्टी पर रहने पर नमिता ने बहुतकुछ सोचा और बहुतकुछ समझने की कोशिश की. घर में किसी से बात नहीं की. पर क्या ज्यादतियों की कोई सीमा नहीं है… उस की भी कोई सीमा होगी. कोई किसी पर कितना जुल्म कर सकता है. हम जुल्म सहते चले जाते हैं, इसीलिए हमें और ज्यादा जुल्मों का सामना करना पड़ता है. अगर हम उस का मुकाबला डट कर करें तो शायद इस से छुटकारा मिल जाए. तुरंत नहीं तो थोड़े समय बाद…

जब नमिता 3 दिन बाद वापस दफ्तर आई तो खुश लग रही थी. मन को काफी हद तक उस ने काबू में कर लिया था. खुद को उस ने समझा लिया था कि चिंता करने से किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता था.

प्रीति ने नमिता को समझाया, ‘‘देखो नमिता, हालात अब गंभीर हो चुके हैं. भेडि़ए को ही अगर भेड़ की रखवाली के लिए नियुक्त किया जाए तो तुम समझ सकती हो कि भेड़ का क्या हश्र होगा. यहां तो भेडि़ए को भेड़ के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए कहा गया है.’’

‘‘तब…?’’ नमिता ने प्रीति से पूछा, शायद वह कोई राह बता सके. प्रीति पर वह बहुत ज्यादा यकीन करने लगी थी.

‘‘समझदारी से काम लो नमिता… अगर तुम नौकरी छोड़ती हो या जांच के बाद तुम्हें नौकरी से निकाल दिया जाता है तो दोनों में फर्क क्या है? दोनों हालात में तुम बेरोजगार हो जाओगी. तब तुम्हारे घर का सुखचैन, दो जून की रोटी, भाईबहनों की पढ़ाईलिखाई, तुम्हारी शादी, एक सुखभरी जिंदगी… सब खटाई में पड़ सकता है,’’ प्रीति बहुत धीरेधीरे उसे समझाने के अंदाज में बता रही थी.

(क्रमश:)

 

विदेशी समाज अमेरिका : धार्मिक पहचान से बढ़ता हेट क्राइम

हेट क्राइम कम होने का नाम नहीं ले रहे. दुनियाभर में धार्मिक अपराध के आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं. धार्मिक पूर्वाग्रह के चलते एक और भारतीय सिख को अमेरिका में बुरी तरह पीट दिया गया. अमेरिका के औरिगन में एक स्टोर पर काम करने वाले हरविंदर सिंह डोड पर 24 वर्षीय एंड्रू रैमजे ने हमला कर दिया. हरविंदर सिंह की दाढ़ी नोच ली, मुंह पर मुक्के मारे और नीचे गिरा कर लातों से पीटा. उस की पगड़ी उतार कर फेंक दी.

एंड्रू सिगरेट के रोलिंग पेपर खरीदने आया था, पर उस के पास पहचानपत्र नहीं था. हरविंदर सिंह ने उसे बिना पहचानपत्र के जाने को कह दिया. इस पर रैमजे ने उसे मारनापीटना शुरू कर दिया.

एंड्रू पर हेट क्राइम का मामला दर्ज किया गया है. अदालत में दायर दस्तावेजों के अनुसार श्वेत एंड्रू के मन में हरविंदर के धर्म को ले कर पूर्वाग्रह थे जिस के चलते उस ने उस पर हमला किया. इस से पहले अगस्त 2018 में भी 2 सिखों पर हमला किया गया था.

दुनियाभर में धार्मिक, नस्लीय अपराध बढ़ रहे हैं. फैडरल ब्यूरो औफ इंवैस्टिगेशन के अनुसार, औरिगन में 2016 से 20117 के दौरान 40 प्रतिशत घृणा अपराध बढे़ हैं. 2017 की वार्षिक रिपोर्ट बताती है कि इस वर्ष 7,175 धार्मिक, नस्लीय भेदभावपूर्ण हिंसा के मामले दर्ज किए गए. इन में 8,493 लोगों को शिकार बनाया गया.

2016 में 6,121 हेट क्राइम के मामले दर्ज हुए. 2015 में 5,850 केस दर्ज किए गए. यानी हर साल यह अपराध बढ़ रहा है. इन में धार्मिक, नस्लीय, लैंगिक, समलैंगिकों के साथ हिंसा के अपराध भी शामिल हैं.

नैशनल क्राइम विक्टिमाइजेशन सर्वे के मुताबिक, 2005 से 2015 के बीच ढाई लाख घृणा के मामले हुए. इन के अलावा ऐसे कितने ही मामले हिंसा होने के भय से दर्ज ही नहीं कराए गए.

अमेरिका में घृणा अपराध का पुराना इतिहास रहा है. 200 साल पहले अश्वेतों को श्वेतों की

नफरत का शिकार होना पड़ा था. अफ्रीकीअमेरिकनों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता था. यह उसी तरह था जैसे भारत में वर्णव्यवस्था के चलते दलितों, शूद्रों के साथ हुआ.

1950 और 1960 के दशकों के दौरान अश्वेतों के खिलाफ हिंसा आम थी. मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने नागरिक अधिकार आंदोलन शुरू किया. उन्होंने समानता के अधिकार के लिए कड़ा संघर्ष किया. अश्वेतों को वोट के अधिकार के साथ दूसरे समानता के अधिकार मिलने शुरू हुए.

असल में भारतीय लोग विदेशों में धर्म की गठरी अपने साथ ले कर गए. वे वहां अपनी अलग धार्मिक पहचान बना कर रखते हैं. इन लोगों ने वहां अपने अलग धर्मस्थल बना लिए. अलग धार्मिक पहचान रखनी शुरू कर दी. हिंदू लोग भले ही सूटटाई लगाते हों पर कई ऐसे हैं जो चोटी, तिलक लगाने में शर्म महसूस नहीं करते. सिख तो दाढ़ी रखते हैं और पगड़ी पहनते ही हैं.

ये लोग अपने धर्म, अपनी संस्कृति पर गर्व करते हैं और इस का सार्वजनिक तौर पर इजहार करने से भी नहीं चूकते. बस, यही धार्मिक पहचान दूसरे धर्म, संस्कृति वाले लोगों के मन में घृणा के भाव जगाती है.

मूल विदेशियों के मन में इन्हें अलग रखने के विचार उस वक्त और मजबूत बनते हैं जब ये लोग उन के सांस्कृतिक, धार्मिक कार्यक्रमों में खुद को शामिल नहीं करते. खुद के धर्म को दूसरों से श्रेष्ठ साबित करने की चेष्टा करते हैं.

हर धर्म अपने अनुयायियों की अलग पहचान बना कर रखता है. नाम, पहनावा, धार्मिक चिह्न धारण कर के रखना जैसे विविध तरीके हैं. मुसलिम जालीदार टोपी और दाढ़ी, ईसाई गले में क्रौस लटका कर रखते हैं. यह सब स्वार्थी लोगों द्वारा अपनीअपनी धार्मिक दुकानदारी चलाने के लिए होता है.

धार्मिक पहचान जान की दुश्मन

हेट क्राइम लोगों की धार्मिक, नस्लीय पहचान की वजह से होते हैं. आंकड़े इस बात के गवाह हैं. नैशनल क्राइम विक्टिमाइजेशन सर्वे के अनुसार, 60 प्रतिशत मामलों में नस्लीय, धार्मिक पहचान बनाए रखने वाले लोग हिंसा के शिकार हुए.

धार्मिक पहचान समाज को विभाजित करती है. लोग जिस देश में रहते हैं उस के अनुरूप बगैर धार्मिक पहचान के क्यों नहीं रह सकते. अगर हरविंदर सिंह दाढ़ी और पगड़ी नहीं पहने होते तो निश्चित ही उन पर हमला न होता. यह अलग धार्मिक पहचान ही नफरत का कारण बन रही है.

अर्जुन रामपाल और फरहान अख्तर : कौन किसके पद चिन्हों पर..?

बौलीवुड में कुछ भी संभव है. बौलीवुड से जुड़े लोगों के रिश्ते भी कपड़े की ही तरह बदलते रहते हैं. इतना ही नहीं बौलीवुड में फरहान अख्तर और अर्जुन रामपाल को अच्छा दोस्त माना जाता है. अर्जुन रामपाल ने फरहान अख्तर के साथ कुछ फिल्में भी की हैं. गत वर्ष फरहान अख्तर के साथ साथ अर्जुन रामपाल ने भी अपने 20 वर्ष के विवाह को तोड़ते हुए अपनी पत्नी को तलाक दे दिया था. फरहान ने अपनी पत्नी अधुना और अर्जुन रामपाल ने अपनी पत्नी मेहर जेसिका से सारे रिश्ते खत्म कर लिए. उसके बाद फरहान अख्तर ने जहां शिबानी दांडेकर के संग डेटिंग शुरू की, वहीं अर्जुन रामपाल ने दक्षिण अफ्रीकन मौडल गैब्रिएला डमेटि्एड्स के साथ डेटिंग शुरू की.

फरहान अख्तर अपनी प्रेमिका शिबानी दांडेकर के साथ छुट्टियां बिताकर भारत वापस लौटे हैं और शिबानी दांडेकर की उंगली में मौजूद अंगूठी से यह चर्चा गर्म है कि फरहान अख्तर और शिबानी दांडेकर ने सगाई कर ली है और अब किसी भी दिन दोनों के विवाह के बंधन में बंधने की खबरे भी आ सकती है. तो दूसरी तरफ चर्चाएं गर्म है कि अर्जुन रामपाल अपना घर छोड़कर अपनी प्रेमिका ग्रैबिएला के मुंबई में बांदरा में पाली हिल वाले घर में रहने चले गए हैं. जबकि मेहर जेसिका अपने दोनों बच्चों के साथ उसी पुराने फ्लैट में रह रही हैं. यूं तो फरहान अख्तर ने शिबानी दांडेकर के संग और अर्जुन रामपाल ने ग्रैबिएला के संग अपने रिश्ते की अब तक कोई घोषणा नहीं की है, मगर सोशल मीडिया पर यह खुलकर अपने प्यार का इजहार करने वाली तस्वीरें लगातार पोस्ट कर रहे हैं…

तो तीसरी बार प्यार में पड़े शरद मल्होत्रा

टीवी कलाकार शरद मल्होत्रा अपने आपको भाग्यशाली मानते हैं. 2016 में दिव्यंका त्रिपाठी और 2018 में पूजा बिस्ट के साथ प्यार में धोखा खाने के बाद अब उन्हें तीसरी बार प्यार नसीब हो गया है. सूत्रों के अनुसार इस बार शरद मल्होत्रा ने अपने प्यार के जाल में फैशन डिजायनर रिप्सी भाटिया को फांसा है. सूत्रों का दावा है कि 14 फरवरी 2019 के दिन रिप्सी भाटिया ने शरद मल्होत्रा के प्यार को कबूल किया. सूत्रों के अनुसार रिप्सी भाटिया ने शरद मल्होत्रा से सगाई की अंगूठी भी अपनी उंगली में पहन ली है. रिप्सी भाटिया ने इंस्टाग्राम पर हाथ में हाथ लिए (महिला की उंगली में अंगूठी नजर आ रही है) एक तस्वीर पोस्ट करते हुए 15 फरवरी को ही लिखा था, ‘‘इन लव…नाउ… एंड..फार एवर..’’

टीवी इंडस्ट्री से जुड़े सूत्र दावा कर रहे हैं कि शरद मल्होत्रा और पूजा बिस्ट के बीच रिश्ता टूटने के पीछे रिप्सी भाटिया रही हैं. रिप्सी भाटिया और शरद मल्होत्रा ने नया वर्ष दुबई में एक साथ मनाया था. उधर रिप्सी का दावा है कि वह और शरद मल्होत्रा एक वर्ष से भी अधिक समय से एक साथ हैं. और पहले दिन मिलते ही शरद ने उनके सामने शादी का प्रस्ताव रखा था. पर अभी तक इन लोगों ने शादी को लेकर कोई निर्णय नहीं लिया. जबकि शरद मल्होत्रा ने रिप्सी भाटिया की मां से भी मुलाकात कर ली है. हमें इंतजार है, उस दिन का जब दोनो अपनी शादी का ऐलान करेंगे.

तो अपने प्रोडक्शन हाउस के लिए आलिया भट्ट ने खरीदा फ्लैट!

पिछले कुछ माह से बौलीवुड में चर्चाएं गर्म रही हैं कि आलिया भट्ट ने अब अपने माता पिता से दूर रहने के लिए अपने लिए एक आलीशान फ्लैट खरीदा है. इस खबर अपनी प्रतिक्रिया देने की बजाय आलिया भट्ट ने चुप्पी साध रखी थी. लेकिन अब आलिया भट्ट ने इस तरह की खबरें चलाने वालों को कोसते हुए इस फ्लैट को खरीदने पर सफाई देने के साथ ही इस बात को उजागर कर गयीं कि वह ‘‘इटरनल सनशाइन प्रोडक्शन’’ नामक अपनी प्रोडक्शन कंपनी खोलकर फिल्म निर्माण में उतरने जा रही हैं.

जी हां! आलिया भट्ट ने कहा है -‘‘पिछले कुछ माह से मीडिया में मेरे द्वारा नए फ्लैट खरीदने को लेकर कई तरह की खबरें चलाई जा रही हैं. मैं सभी को बताना चाहती हूं कि यह खबर सही है कि मैने फ्लैट खरीदा है, मगर फ्लैट से जुड़ी बाकी खबर गलत फैलाई जा रही है. मैंने यह फ्लैट अपने परिवार से अलग रहने के लिए नहीं खरीदा है. मैने यह फ्लैट उसी बिल्डिंग में है, जिसमें मैं अभी रह रही हूं. मैंने यह घर अपने माता पिता व बहन के करीब रहने के लिए खरीदा है. इस घर की हर ईंट मैंने खुद के दम पर बनाई है. इस घर के अंदर का इंटीरियर डिजाइन से लेकर फर्नीचर वगैरह सब कुछ मैने अपनी पसंद का जमा किया है. यह मेरा घर है. मैं यहां रहती हूं. मैं इसे बदलने नहीं जा रही.’’

आलिया भट्ट ने आगे कहा है -‘‘यह कहना गलत है कि इस नए घर में मैं और रणबीर कपूर एक साथ रहने वाले हैं. हकीकत यह है कि मैं अपनी फिल्म प्रोडक्षन कंपनी ‘इटरनल सनशाइन प्रोडक्शन’शुरू करने जा रही हूं, जिसके औफिस के लिए इस फ्लैट को खरीदा है. अपनी प्रोडक्शन कंपनी के तहत काफी कुछ करने की योजना बना रही हूं. मेरी टीम इस पर काम कर रही है. जब सब कुछ ठोस रूप ले लेगा, तो मैं उसकी घोषणा करुंगी. मैं अपनी प्रोडक्शन कंपनी के तहत वैसी फिल्मों का निर्माण करना चाहूंगी, जिस तरह की फिल्में मैं स्वयं देखना पसंद करती हूं.’’

बिल्डर ही बदनाम क्यों

अपना घर चाहे सिर्फ 500 फुट का हो, हर साल, साल दर साल सपना बनता जा रहा है. देशभर में बनते मकानों को देख कर गृहिणियां सोचती हैं कि किसी दिन उन का भी अपना एक मकान होगा पर लगता है कि यह सपना उसी तरह का वादा है जैसे पंडितजी कहते हैं कि 21 बृहस्पतिबार को व्रत रखो, अच्छा पति अपनेआप मिल जाएगा.

जिद्दी सरकार, लालची बैंक, अस्थिर बाजार, बेईमान बिल्डर, ढुलमुल ग्राहक और अदालतों में देरी के कारण जो नुकसान हो रहा है वह औरतों के सपनों का है. जिन्होंने येन केन प्रकारेण मकान हथिया लिए वे तो खुश हैं पर बाकी मनमसोस रहे हैं. लाखों लोगों ने तो अपनी जमापूंजी भी लगा रखी है और महीनों बैंक को कर्ज व मूल भी देते हैं पर उन्हें मकान नहीं मिला है. देश के 11,000 बिल्डरों पर किए गए एक सर्वे से पता चला है कि 7,77,183 करोड़ रुपए के अधूरे मकान पड़े हैं जो कहीं पैसे की वजह से, कहीं बिल्डरों का दिवाला निकलने के, तो कहीं सरकारी नियमों के कारण पूरे बन कर बिक नहीं सके हैं.

इन बिल्डरों ने बैंकों के 4 लाख करोड़ रुपए देने हैं और इतने ही ग्राहकों के भी दबा कर बैठे हैं. दिल्ली के पास आम्रपाली गु्रप के हजारों मकान सुप्रीम कोर्ट ने बिल्डरों से ले कर नैशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कौरपोरेशन को दे दिए हैं पर इस सरकारी कंपनी का अपना रिकौर्ड खराब है. इस में भयंकर नुकसान और भ्रष्टाचार होता है. इस के ग्राहकों को अपना पैसा या मकान मिलेगा, यह भूल जाएं.

जो लोग पहले छोटे मकानों में रह कर पैसा बचा कर अपना बड़ा और अच्छा मकान बनाने की सोचते थे उन्होंने पैसा खर्चना शुरू कर दिया है और मकानों की मांग कम हो गई है. मुंबई में मकानों के दाम सालभर में 7% तक गिर गए हैं.

अपना मकान होना सपना ही नहीं, घर को सुरक्षा भी देता है. यह शान की नहीं, काम की बात है. बच्चों को अपने मकान में परमानैंट दोस्त मिलते हैं, कल को शादी करने में लाभ रहता है. अपने मकान पर पढ़ाई के लिए लोन मिल जाता है, किराए के मकान पर नहीं. अपना मकान दिलवाना सरकार का काम तो नहीं पर रोक तो न लगाए. अगर बिल्डर कुछ बेईमानी करते हैं, नियमों की अवहेलना कर के ज्यादा बना लेते हैं तो क्या हरज है? देश में नियमों से कौन चल रहा है? न सुप्रीम कोर्ट, न सीबीआई, न प्रधानमंत्री का कार्यालय, न राष्ट्रपति भवन. कोई भी ढंग का है? तो फिर बिल्डर ही क्यों बदनाम हों? जबकि उन का असर हर औरत, हर घर, हर बच्चे पर पड़ता है.

चना दाल कटलेट

सामग्री:

– चना दाल (3-4 घंटे भीगी हुई)

– हल्दी (½ छोटा चम्मच)

– लाल मिर्च पाउडर (½ छोटा चम्मच)

– हरी मिर्च (2)

– लहसुन (2-3)

– तेल (फ्राई करने के लिए)

– नमक (आवश्यकतानुसार)

बनाने की विधि

– एक मिक्सी जार लेकर चना दाल और सभी मसाले मिक्स कर लें.

– अब सभी को बढ़िया से पीस लें.

– एक पैन में तेल डालें.

– जब तेल गर्म हो जाए तो, पैन में तैयार कटलेट्स को अच्छे से तल लें.

– हरी चटनी के साथ गर्मा-गर्म परोसें.

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