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क्या प्रधानमंत्री का नया चेहरा बनेंगे गडकरी

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी इन दिनों जो कुछ बोल रहे हैं, उसे केवल सुर्खियां बटोरने के लिए नहीं कहा जा सकता. उन के बयानों की अहमियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह उन के बयानों को अनसुना करने को मजबूर हैं.

‘‘सपने दिखाने वाले नेता लोगों को अच्छे लगते हैं, लेकिन दिखाए हुए सपने अगर पूरे नहीं किए तो जनता उन की पिटाई भी करती है. इसलिए, सपने वही दिखाओ जो पूरे हो सकते हैं. मैं सपने दिखाने वालों में से नहीं हूं, जो भी बोलता हूं, वह डंके की चोट पर बोलता हूं.’’

चुनावी मौसम में मोदी कैबिनेट के केंद्रीय सड़क व परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का ऐसा बयान ‘सपनों के सौदागर’ पर सीधा और तीखा हमला है.

दूसरा मौका था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के पूर्व कार्यकर्ताओं को संबोधन का, जब बेबाक बयानों के योद्धा गडकरी बोले, ‘‘जो लोग अपना घर नहीं संभाल सकते, वे देश नहीं संभाल सकते.’’ यह पहली बार नहीं है जब नितिन गडकरी ने अपनी ही सरकार और प्रधानमंत्री पर चोट की है, वे इस से पहले भी कई अवसरों पर ऐसे तीखे बयान दे चुके हैं.

गडकरी के बयानों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की चुप्पी आश्चर्यजनक है. जहां मोदीशाह की जोड़ी के सामने भाजपा के दूसरे बड़ेबड़े नेता कभी कुछ नहीं बोल पाए, वहां नितिन गडकरी लगातार ऐसी हिमाकत कैसे कर रहे हैं, यह विश्लेषण का विषय है.

गडकरी के वार से चुप्पी क्यों

मोदी सरकार में अपने कामकाज में दूसरों से बेहतर प्रदर्शन करने वाले गडकरी के बयानों ने भाजपा में हलचल मचा दी है.

माना जा रहा है कि भाजपाई किले के अंदर आजकल मोदीशाह रक्षात्मक स्थिति में हैं और आक्रामक तरीके से बयानबाजी कर रहे नितिन गडकरी के पीछे कोई ताकत काम कर रही है. गडकरी के बयानों के निहितार्थ गहरे हैं और मोदी के लिए इस में स्पष्ट संकेत छिपा है. यह बात ठीक है कि नितिन गडकरी ने अब तक कोई मोरचा नहीं खोला है, लेकिन वे ऐसा कभी नहीं करेंगे, इस की गारंटी कोई नहीं दे रहा है.

कहना गलत न होगा कि 5 वर्षों में जनता और आरएसएस दोनों पर से मोदी लहर उतर चुकी है. इस की बड़ी वजह है दरअसल, 2014 में सत्ता में आने की छटपटाहट में नरेंद्र मोदी ने जनता के आगे सपनों के बड़ेबड़े तंबू तान दिए. अब उन तंबुओं में बड़ेबड़े छेद हो चुके हैं. मोदी के दिखाए सपनों में से ज्यादातर पूरे ही नहीं हो सकते थे, मगर फिर भी दिखाए गए ताकि कैसे भी हो, सत्ता पर काबिज हुआ जा सके.

वह जनता जिस के वोट से सरकार तय होती है, उस में से 70 प्रतिशत लोग गरीब हैं, उस में ज्यादातर अनपढ़ और बेरोजगार हैं, ऐसे में जब मोदी ने उन को 15-15 लाख रुपए का लालच दिखाया, 2 करोड़ रोजगार हर साल देने का वादा किया, आय दोगुनी कर देने का लालच दिया, कौशल विकास का नारा दिया, तो सब निहाल हो गए. भावुकता, अतिविश्वास और अच्छे दिन की उम्मीद में लोगों ने मोदी को सिरआंखों पर बिठा लिया और सत्ता सौंप दी.

जनता से किए मोदी के वादे कभी पूरे ही नहीं होने थे, इस सत्य पर नितिन गडकरी के उस बयान ने ठप्पा लगा दिया था, जब फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर के साथ बातचीत के दौरान मराठी में बोलते हुए गडकरी कह गए, ‘हम ने वादे तो कर दिए थे, हमें क्या पता था कि हम सत्ता में आ जाएंगे और वादे पूरे करने होंगे.’

इस बातचीत का वीडियो खूब वायरल हुआ और मोदीशाह पर भारी गुजरा. फिर भी दोनों चुप्पी साधे रहे. वे सच को नकारते भी कैसे.

हाल ही में 5 राज्यों के चुनावों में जब पांचों राज्यों में भाजपा की लुटिया डूबी, तब भी नितिन गडकरी यह कहने से नहीं चूके कि – ‘नेतृत्व को जीत का श्रेय और हार की जिम्मेदारी दोनों लेनी चाहिए. अगर मैं पार्टी अध्यक्ष हूं और मेरे सांसद व विधायक ठीक से काम नहीं कर रहे हैं तो यह किसी और की नहीं, मेरी ही जिम्मेदारी होगी.’

गडकरी के निशाने पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह थे. गडकरी के वार से शाह तिलमिलाए तो जरूर, मगर बोल कुछ नहीं पाए.

संघ से खास नजदीकियां रखने वाले नितिन गडकरी अपनी साफगोई के लिए जाने जाते हैं. पर यह समझना भूल होगी कि वे बिना सोचेसमझे कुछ भी बोल देते हैं. वे जो कुछ भी बोलते हैं उस के माने होते हैं. वे नागपुर के रहने वाले हैं, जहां संघ का आधार है. ऐसे में गडकरी किस की शह पर अपने बेबाक तेवर दिखा रहे हैं, यह समझना मुश्किल नहीं है.

असदुद्दीन ओवैसी का ट्वीट

एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी ने नितिन गडकरी के हालिया बयान – ‘सपने दिखाने वाले नेता लोगों को अच्छे लगते हैं, लेकिन दिखाए हुए सपने अगर पूरे नहीं किए तो जनता उन की पिटाई भी करती है, इसलिए सपने वही दिखाओ जो पूरे हो सकते हैं…’ पर ट्वीट करते हुए कहा, ‘‘पीएम मोदीजी, सर, गडकरी आप को आईना दिखा रहे हैं और वह भी बड़ी चतुराई से.’’

ओवैसी के ट्वीट का असर यह हुआ कि भाजपा के प्रवक्ताओं को सफाई देनी पड़ी कि नितिन गडकरी का बयान विपक्ष के नेताओं के लिए था, न कि नरेंद्र मोदी के लिए, क्योंकि प्रधानमंत्री जी सपने नहीं दिखाते हैं, सपने पूरे करते हैं.

क्या अकेले पड़ गए हैं मोदी-शाह

भाजपा खेमे से जो खबरें छनछन कर आ रही हैं, उन से तो यही लगता है कि पार्टी के भीतर मोदीशाह की जोड़ी अकेली पड़ गई है. संघ और पार्टी से उन की दूरी लगातार बढ़ती जा रही है. भाजपा के बड़े नेताओं से भी उन्हें कोई खास सपोर्ट नहीं मिल रहा है.

भाजपा के बड़े नेताओं की बात करें तो वित्त मंत्री अरुण जेटली लगातार बीमार चल रहे हैं. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज किन कारणों से अगला चुनाव नहीं लड़ना चाहतीं, यह अभी स्पष्ट नहीं हुआ है. शायद उन्हें शिकायत होगी कि 5 वर्षों में मोदीजी खुद तो 150 देशों की यात्राएं कर आए, मगर विदेश मंत्री होने के बावजूद उन्हें एक बार भी साथ चलने का न्योता नहीं दिया.

उधर गंगा प्रोजैक्ट पर बुरी तरह फेल रहीं उमा भारती से जब यह प्रोजैक्ट छीन कर नितिन गडकरी को दे दिया गया, तो उन्होंने भी चुनाव न लड़ने का ऐलान कर दिया है. पार्टी के वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी अपना अपमान भला क्योंकर भूलने लगे? आडवाणी साहब को बड़ी उम्मीद थी कि चलो प्रधानमंत्री न बन पाए, तो कम से कम राष्ट्रपति की कुरसी पर ही बैठ जाएंगे, मगर उन की यह कामना मोदीजी ने पूरी ही नहीं होने दी. ऐसे में आडवाणी साहब का आशीर्वाद अब नरेंद्र मोदी को नसीब होगा, ऐसा सोचना भी खामखयाली है. रह गए राजनाथ सिंह, तो गंभीर, सभ्य और शालीन नेता ‘बड़बोलों’ के बीच चुप रहने और दूर रहने में ही ज्यादा समझदारी मानते हैं. मनोज तिवारी, स्मृति ईरानी, पीयूष गोयल, प्रकाश जावड़ेकर, देवेंद्र फड़णवीस, वसुंधरा राजे जैसे नेता नितिन गडकरी के आगे तो बौने हैं ही, न संघ के अंदर न पार्टी में ही इन की कोई पूछ है.

संघ का प्लान बी

हिंदुत्व, राममंदिर और जनता से जुड़े मुद्दों पर आलोचना का सामना कर रही मोदीशाह की जोड़ी के खिलाफ नितिन गडकरी अगर इतने बोल्ड बयान दे रहे हैं, तो यह संघ के समर्थन और निर्देश के बिना तो नहीं हो सकता. ऐसे में उन के बयान से एक बड़ा संदेश यह आ रहा है कि संघ उन की मारफत सरकार को चेताना चाहती है. राजनीतिक गलियारों में भी इस बात के कयास लगाए जाने लगे हैं कि अगर नरेंद्र मोदी-अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा को 2019 में बहुमत नहीं मिला तो फिर नितिन गडकरी का नाम आगे किया जा सकता है. इसे कई लोग तो संघ के प्लान बी के तौर पर देख रहे हैं.

2014 के आम चुनावों के समय संघ हिंदुत्व को बड़ा मुद्दा बनाना चाहता था. हिंदू राष्ट्र और राममंदिर उस के मुख्य मुद्दे थे. मगर उस वक्त गडकरी की तुलना में 2002 के मुसलिम विरोधी दंगों की वजह से मोदी हिंदुत्व का बड़ा चेहरा लग रहे थे. गुजरात की छवि हिंदुत्व की प्रयोगशाला की भी थी, इन सब ने मिल कर 2014 में मोदी को गडकरी से आगे कर दिया. मगर सत्ता में आने के ठीक पहले और बाद मोदी अपनी हिंदुत्व वाली छवि को पीछे छोड़ते हुए विकास पुरुष की छवि बनाने में लग गए.

हालांकि, इस का कोई बहुत ज्यादा फायदा न उन्हें हुआ, न देश को और न गरीब जनता को. हिंदुत्व और विकास के बीच मोदी उलझ गए, जिस के चलते न तो विकास हुआ और न भारत हिंदू राष्ट्र बन पाया. इस ने संघ को बुरी तरह निराश किया. वे अच्छे प्रवचन जरूर देते रहते हैं.

अब फिर लोकसभा चुनाव सामने है. ऐसे में शाहमोदी के खिलाफ गडकरी के तीखे बयान भाजपा में नेतृत्व परिवर्तन की सुगबुगाहट के तौर पर देखे जा रहे हैं. सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी मोदी को ही निशाने पर लेते हुए यह कहते हैं कि जनता से उतने ही वादे करने चाहिए, जितने पूरे किए जा सकें, तो वहीं वे यह कहने से भी नहीं चूकते हैं कि मैं उतने ही वादे करता हूं जो मैं पूरे कर सकूं.

भूतल परिवहन मंत्री के तौर पर नितिन गडकरी को बेहद सक्षम मंत्रियों में गिना जाता है. इस के अलावा भी उन की कई उपलब्धियां हैं. नितिन गडकरी पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं और वे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुके हैं. उन के पास उमा भारती के तबादले के बाद जल संसाधन मंत्रालय का भी प्रभार है. भाजपा का ‘160 क्लब’ भी अब सक्रिय हो चुका है, यह उन लोगों का गुट है जो मोदी के नेतृत्व में 160 या उस से कम सीटें आने की स्थिति में सत्ता परिवर्तन का राग छेड़ेगा.

नागपुर के रहने वाले मराठी ब्राह्मण नितिन गडकरी को संघ का प्रियपात्र माना जाता है. ऐसे में अगर 2019 में मोदी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है, तो नितिन गडकरी शीर्ष पद के लिए अपनी दावेदारी पेश कर सकते हैं.

कैसा है मोदी-शाह और गडकरी का रिश्ता

मोदी कैबिनेट में नितिन गडकरी को भले ही सड़क व परिवहन मंत्रालय जैसी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई हो और उमा भारती के गंगा सफाई में निष्फल रहने के बाद गंगा सफाई परियोजना भी उन्हें दे दी गई, मगर इस का मतलब यह हरगिज नहीं है कि वे मोदीशाह की गुडबुक में भी हैं. सरकार में रहते हुए सरकार पर टीकाटिप्पणी गडकरी और मोदी के संबंधों में दूरियों को ही उजागर करती है.

2014 में जब भाजपा भारी बहुमत से जीत कर सत्ता में आई थी, तब नितिन गडकरी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, लेकिन उन की चाह की परवा न करते हुए मोदीशाह की जोड़ी ने देवेंद्र फड़णवीस को महाराष्ट्र की गद्दी सौंप दी, जो महाराष्ट्र की राजनीति में गडकरी के सामने बच्चे थे. इस ने गडकरी के मन में खटास पैदा की. हालांकि केंद्रीय मंत्री का पदभार ग्रहण करने के बाद गडकरी ने एक अच्छा जनसेवक होने की अपनी छवि बनाने में बड़ी कामयाबी हासिल की. उन की देखरेख में देश में बहुत तेजी से नैशनल हाईवे बने. अगर गडकरी की इच्छा पर उन्हें महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बना दिया जाता, तो शिवसेना से उन के बेहतरीन संबंधों का फायदा भाजपा को खूब होता, जो देवेंद्र फड़णवीस या मोदीशाह के बस की बात ही नहीं है.

गडकरी और शिवसेना के आपसी संबंध कितने मधुर हैं, इस का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि शिवसेना की ओर से ऐसे बयान आने शुरू हो चुके हैं कि अगर गडकरी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए सामने आता है, तो वह भाजपा का समर्थन करेगी. शिवसेना के इस रुख से मोदीशाह की जोड़ी सहमी हुई है.

मोदी शाह और गडकरी के बीच रिश्ते मधुर नहीं हैं, बल्कि रिश्ते बनाए रखना मजबूरी है. याद होगा कि जब 2009 में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, वेंकैया नायडू और अनंत कुमार को पीछे छोड़ते हुए मराठी ब्राह्मण नितिन गडकरी को पार्टी का अध्यक्ष बनाया था, तब नरेंद्र  मोदी भाजपा के एकलौते मुख्यमंत्री थे, जो नितिन गडकरी को शुभकामनाएं देने दिल्ली नहीं पहुंचे थे.

भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद नितिन गडकरी भाजपा से अलग हुए संजय जोशी को भाजपा में वापस ले आए थे. कभी भाजपा प्रचारक के तौर पर मोदी और संजय जोशी की दोस्ती हुआ करती थी, जो बाद में राजनीतिक दुश्मनी में बदल गई. बाद में मोदी संजय जोशी को देखना भी पसंद नहीं करते थे. ऐसे में जब नितिन गडकरी ने संजय जोशी को 2012 में उत्तर प्रदेश का चुनाव संयोजक बनाया तो मोदी को यह पसंद नहीं आया था. नरेंद्र मोदी ने धमकी दी कि संजय जोशी को नहीं हटाया गया, तो वे चुनावप्रचार के लिए उत्तर प्रदेश नहीं जाएंगे. पर गडकरी ने उन की नहीं सुनी और मोदी उत्तर प्रदेश में चुनावप्रचार करने नहीं गए.

गडकरी के अध्यक्ष रहते तब उत्तर प्रदेश में भाजपा बुरी तरह हारी थी. इस के बाद हुआ 2012 का मुंबई अधिवेशन, जिस में मोदी ने संजय जोशी के पार्टी से इस्तीफे की मांग रख दी. हालांकि नितिन गडकरी को लगा कि मोदी उन के इस्तीफे की मांग पर अड़ेंगे नहीं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इस अधिवेशन के लिए संजय जोशी तो दिल्ली से ट्रेन पकड़ कर मुंबई पहुंच गए, लेकिन नरेंद्र मोदी अहमदाबाद से मुंबई जाने के बदले उदयपुर चले गए. आखिर में गडकरी को न चाहते हुए भी संजय जोशी का इस्तीफा लेना पड़ा था, तब कहीं जा कर नरेंद्र मोदी मुंबई अधिवेशन में शामिल हुए. इस बात की फांस भी कहीं न कहीं तो गडकरी के सीने में अभी तक धंसी हुई है.

सब को साथ ले कर चलने का बड़ा गुण है गडकरी में गडकरी ने अपने मंत्रालय के कामकाज से तो नाम कमाया ही है, इन 5 सालों में उन्होंने अपनी ऐसी छवि बनाई है, जो काम करवाने में भी माहिर है और जिसे समझौतों से भी परहेज नहीं है. इस से बढ़ कर जो गुण गडकरी में है, वह है मिलनसारिता का. नितिन गडकरी मौजूदा समय के कार्यकर्ताओं के बीच बेहद लोकप्रिय हैं. आज जब कुछ नेताओं के दरवाजे कार्यकर्ताओं के लिए नहीं खुलते हैं, वहीं गडकरी हर रोज देररात तक भाजपा के सैकड़ों कार्यकर्ताओं से मिलते देखे जाते हैं.

नितिन गडकरी के संबंध सभी दलों के राजनेताओं से अच्छे बताए जाते हैं. यहां तक कि उन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तक से उन के संबंध बेहतर बताए जाते हैं.

26 जनवरी को नितिन गडकरी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ राजपथ पर गुफ्तगू करते हुए देखे गए. शिवसेना के साथ उन की नजदीकियां किसी से छिपी नहीं हैं. बल्कि मोदी के नाम पर लगातार रार ठान रही शिवसेना गडकरी का नाम अगले लोकसभा चुनाव में पीएम पद के प्रत्याशी के तौर पर उछाल रही है. यानी, अगर अगले लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा बहुमत से कुछ पीछे ठिठक जाती है और दूसरे दलों से समर्थन की जरूरत पड़ती है तो ऐसे में नितिन गडकरी को आगे प्रोजैक्ट किया जा सकता है.

आस्तीन का सांप

उस दिन गुरुवार था. तारीख थी 2018 की 13 दिसंबर. कोटा के विशेष न्यायिक मजिस्ट्रैट (एनआई एक्ट) राजेंद्र बंशीलाल की अदालत में काफी भीड़ थी. वजह यह थी कि एक नृशंस हत्यारे को उस के अपराध की सजा सुनाई जानी थी. हत्यारे का नाम लालचंद मेहता था और जिन्हें उस ने मौत के घाट उतारा था, वह थीं बीएसएनएल की उपमंडल अधिकारी स्वाति गुप्ता. लालचंद मेहता उन का ड्राइवर रह चुका था. उस के अभद्र व्यवहार को देखते हुए स्वाति गुप्ता ने घटना से 2 दिन पहले ही उसे नौकरी से निकाला था.

3 साल पहले 21 अगस्त, 2015 की रात को लालचंद ने स्वाति की हत्या उन के घर के बाहर तब कर दी थी, जब वह औफिस से लौट कर घर पहुंची थीं. लालचंद ने स्वाति गुप्ता पर चाकू से 10-15 वार किए थे. इस केस में गवाहों के बयान, पुलिस द्वारा जुटाए गए सबूत और अन्य साक्ष्य अदालत के सामने पेश किए जा चुके थे. दोनों पक्षों के वकीलों की जिरह भी हो चुकी थी. सजा के मुद्दे पर बचाव पक्ष के वकील ने कहा था, ‘‘आरोपी का परिवार है, उसे सुधरने का अवसर देने के लिए कम सजा दी जाए.’’

जबकि लोक अभियोजक नित्येंद्र शर्मा तथा परिवादी के वकील मनु शर्मा और भुवनेश शर्मा ने दलील दी थी कि आरोपी लालचंद मेहता मृतका स्वाति का ड्राइवर-कम-केयरटेकर था. परिवादी पक्ष ने उस की हर तरह से मदद की थी, लेकिन उस ने मामूली सी बात पर जघन्य हत्या कर दी थी. इसलिए अदालत को उस के प्रति जरा भी दया नहीं दिखानी चाहिए.

विशेष न्यायिक मजिस्ट्रैट राजेंद्र बंशीलाल जब न्याय के आसन पर बैठ गए तो अदालत में मौजूद सभी लोगों की नजरें उन पर जम गईं. गिलास से एक घूंट पानी पीने के बाद न्यायाधीश ने एक नजर भरी अदालत पर डाली. फिर फाइल पर नजर डाल कर पूछा, ‘‘मुलजिम कोर्ट में मौजूद है?’’

‘‘यस सर,’’ एक पुलिस वाले ने जवाब दिया जो लालचंद को कस्टडी में लिए हुए था.

न्यायाधीश राजेंद्र बंशीलाल ने अपने 49 पेजों के फैसले की फाइल पलटते हुए कहना शुरू किया, ‘‘अदालत ने इस केस के सभी गवाहों को गंभीरतापूर्वक सुना, प्रस्तुत किए गए साक्ष्यों को कानून की कसौटी पर परखा, जानसमझा. बचाव पक्ष और अभियोजन पक्ष की सभी दलीलों को सुना. तकनीकी साक्ष्यों का गहन अध्ययन किया. पूरे केस पर गंभीरतापूर्वक गौर करने के बाद अदालत इस नतीजे पर पहुंची कि लालचंद मेहता ने स्वाति की हत्या बहुत ही नृशंस तरीके से की. यहां तक कि जब उस का चाकू हड्डियों में अटक गया, तब भी उस ने चाकू को जोरों से खींच कर निकाला और फिर वार किए. निस्संदेह यह उस का गंभीर, जघन्य और हृदयविदारक कृत्य था.’’

इस केस का निर्णय जानने से पहले आइए जान लें कि 35 वर्षीय गजेटेड औफिसर स्वाति गुप्ता को क्यों जान गंवानी पड़ी.

बुधवार 20 अगस्त, 2015 को रिमझिम बरसात हो रही थी. रात गहरा चुकी थी और तकरीबन 9 बज चुके थे. बूंदाबादी तब भी जारी थी. घटाटोप आकाश को देख कर लगता था कि देरसवेर तूफानी बारिश होगी.

कोटा शहर के आखिरी छोर पर बसे उपनगर आरके पुरम के थानाप्रभारी जयप्रकाश बेनीवाल तूफानी रात के अंदेशे में अपने सहायकों से रात्रि गश्त को टालने के बारे में विचार कर रहे थे, तभी टेलीफोन की घंटी से उन का ध्यान बंट गया. उन्होंने रिसीवर उठाया तो दूसरी तरफ से भर्राई हुई आवाज आई, ‘‘सर, मेरा नाम दीपेंद्र गुप्ता है. मेरी पत्नी स्वाति गुप्ता का कत्ल हो गया है. हत्यारा मेरा ड्राइवर-कम-केयरटेकर रह चुका लालचंद मेहरा है.’’

हत्या की खबर सुनते ही थानाप्रभारी के चेहरे का रंग बदल गया. उन्होंने पूछा, ‘‘आप अपना पता बताइए.’’

‘‘ई-25, सेक्टर कालोनी, आर.के. पुरम.’’

‘‘ठीक है, मैं फौरन पहुंच रहा हूं.’’ कहते हुए थानाप्रभारी ने फोन डिसकनेक्ट कर दिया. बेनीवाल पुलिस फोर्स के साथ उसी वक्त घटनास्थल की तरफ रवाना हो गए. उस समय रात के करीब साढ़े 9 बज रहे थे.

थानाप्रभारी बेनीवाल अपनी टीम के साथ 15 मिनट में दीपेंद्र गुप्ता के आवास पर पहुंच गए. उन के घर के बाहर भीड़ लगी हुई थी. बेनीवाल की जिप्सी आवास के मेन गेट पर पहुंची. जिप्सी से उतर कर जैसे ही वह आगे बढ़े तो एकाएक उन के पैर खुदबखुद ठिठक गए. गेट पर खून ही खून फैला था. उन्होंने बालकनी की तरफ नजर दौड़ाई तो व्हीलचेयर पर बैठे एक व्यक्ति को लोग संभालने की कोशिश कर रहे थे, जो बुरी तरह बिलख रहा था.

स्थिति का जायजा लेने के बाद थानाप्रभारी बेनीवाल ने फोन कर के एसपी सवाई सिंह गोदारा को वारदात की सूचना दे दी. इस से पहले कि बेनीवाल तहकीकात शुरू करते, एसपी तथा अन्य उच्चाधिकारी फोटोग्राफर व फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट के साथ वहां पहुंच गए..

एसपी सवाई सिंह गोदारा और उच्चाधिकारियों के साथ थानाप्रभारी बेनीवाल बालकनी में व्हीलचेयर पर बैठे बिलखते हुए व्यक्ति के पास गए. पता चला कि दीपेंद्र गुप्ता उन्हीं का नाम था. बेनीवाल के ढांढस बंधाने के बाद उन्होंने बताया, ‘‘सर, फोन मैं ने ही किया था.’’

दीपेंद्र गुप्ता ने उन्हें बताया कि उस की पत्नी स्वाति गुप्ता बीएसएनएल कंपनी में उपमंडल अधिकारी थीं. लगभग 9 बजे वह कार से घर लौटी थीं.

जब वह मेनगेट बंद करने गई तभी अचानक वहां छिपे बैठे उन के पूर्व ड्राइवर लालचंद मेहता चाकू ले कर स्वाति पर टूट पड़ा और तब तक चाकू से ताबड़तोड़ वार करता रहा जब तक स्वाति के प्राण नहीं निकल गए. चीखतीचिल्लाती स्वाति लहूलुहान हो कर जमीन पर गिर पड़ीं.

दीपेंद्र की रुलाई फिर फूट पड़ी. उन्होंने सुबकते हुए कहा, ‘‘अपाहिज होने के कारण मैं अपनी पत्नी को हत्यारे से नहीं बचा सका. बादलों की गड़गड़ाहट में हालांकि स्वाति की चीख पुकार और मेरा शोर भले ही दब गया था, लेकिन जिन्होंने सुना वे दौड़ कर पहुंचे, लेकिन तब तक लालचंद भाग चुका था.’’

एक पल रुकने के बाद दीपेंद्र गुप्ता बोले, ‘‘संभवत: स्वाति की सांसों की डोर टूटी नहीं थी, इसलिए पड़ोसी लहूलुहान स्वाति को तुरंत ले अस्पताल गए, लेकिन…’’ कहतेकहते दीपेंद्र का गला फिर रुंध गया.

‘‘स्वाति को बचाया नहीं जा सका. मुझ से बड़ा बदनसीब कौन होगा. जिस की पत्नी को उस के सामने वहशी हत्यारा चाकुओं से गोदता रहा और मैं कुछ नहीं कर पाया?’’

वहशी हत्यारे की करतूत और लाचार पति की बेबसी पर एक बार तो पुलिस अधिकारियों के दिल में भी हूक उठी.

एसपी सवाई सिंह गोदारा ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘हत्यारे के बारे में मालूम है. वह जल्द ही पुलिस की गिरफ्त में होगा.’’ उन्होंने बेनीवाल से कहा, ‘‘बेनीवाल, मैं चाहता हूं हत्यारा जल्द से जल्द तुम्हारी गिरफ्त में हो. अभी से लग जाओ उस की तलाश में.’’

इस बीच फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट और फोटोग्राफर अपना काम कर चुके थे.

‘‘…और हां,’’ एसपी ने बेनीवाल का ध्यान वहां लगे सीसीटीवी कैमरों की तरफ दिलाते हुए कहा, ‘‘इस मामले में लालचंद को पकड़ना तो पहली जरूरत है ही. लेकिन सीसीटीवी फुटेज भी खंगालो, फुटेज में पूरी वारदात नजर आ जाएगी.’’

पुलिस की तत्परता कामयाब रही और देर रात लगभग 2 बजे आरोपी लालचंद को रावतभाटा रोड स्थित मुरगीखाने के पास से गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने उस के कब्जे से हत्या में इस्तेमाल किया गया चाकू भी बरामद कर लिया.

इस बीच दीपेंद्र गुप्ता की रिपोर्ट पर भादंवि की धारा 402 और 460 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया था. गुप्ता परिवार ने खुद पाला था मौत देने वाले को मौके पर की गई पूछताछ के बाद पुलिस ने स्वाति गुप्ता की लाश मोर्चरी भिजवा दी. पोस्टमार्टम के बाद स्वाति का शव अंत्येष्टि के लिए घर वालों को सौंप दिया गया.

पुलिस के लिए अहम सवाल यह था कि आखिर इतनी हिंसक मनोवृत्ति के व्यक्ति को दीपेंद्र गुप्ता ने ड्राइवर जैसे जिम्मेदार पद पर कैसे नौकरी पर रख लिया. लालचंद पिछले 20 सालों से दीपेंद्र गुप्ता के यहां नौकरी कर रहा था. आखिर उसे किस की सिफारिश पर नौकरी दी गई थी. पुलिस ने यह सवाल दीपेंद्र गुप्ता से पूछा ‘‘उस आदमी के बारे में तो अब मुझे कुछ याद नहीं आ रहा.’’ दीपेंद्र गुप्ता ने कहा, ‘‘उस का कोई रिश्तेदार था, जिस के कहने पर मैं ने लालचंद को अपने यहां नौकरी पर रखा था. लालचंद झालावाड़ जिले के मनोहरथाना कस्बे का रहने वाला था. शायद उस का सिफरिशी रिश्तेदार भी वहीं का था.’’

बेनीवाल ने पूछा, ‘‘जब वह पिछले 20 सालों से आप को यहां काम कर रहा था तो जाहिर है काफी भरोसेमंद रहा होगा. फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि आप ने उसे नौकरी से निकाल दिया.’’

‘‘उस में 2 खामियां थीं…’’ कहतेकहते दीपेंद्र गुप्ता एक पल के लिए सोच में डूब गए. जैसे कुछ याद करने की कोशिश कर रहे हों.

वह फिर बोले, ‘‘दरअसल, उसे एक तो शराब पीने की लत थी और दूसरे वह परिवार की जरूरतों का रोना रो कर हर आठवें दसवें दिन पैसे मांगता. शुरू में मुझे उस की दारूबाजी की खबर नहीं थी. पारिवारिक मुश्किलों का हवाला दे कर वह इस तरह पैसे मांगता था कि मैं मना नहीं कर पाता था. लेकिन स्वाति को यह सब ठीक नहीं लगता था.

दीपेंद्र गुप्ता ने आगे कहा, ‘‘स्वाति ने मुझे कई बार रोका और कहा, ‘बिना किसी की जरूरत को ठीक से समझे बगैर इतनी दरियादिली आप के लिए नुकसानदायक हो सकती है.’ लेकिन मैं ने यह कह कर टाल दिया कि कोई मजबूरी में ही पैसे मांगता है.’’

बेनीवाल दीपेंद्र की बातों को सुनने के साथसाथ समझने की भी कोशिश कर रहे थे. दीपेंद्र ने आगे कहा, ‘‘लेकिन…लालचंद ने शायद मेरी पत्नी स्वाति की आपत्तियों को भांप लिया था. कई मौकों पर मैं ने उसे स्वाति से मुंहजोरी भी करते देखा. मैं ने उसे आड़ेहाथों लेने की कोशिश की. लेकिन उस की मिन्नतों और आइंदा ऐसाकुछ नहीं करने की बातों पर मैं ने उसे बख्श दिया.’’

दीपेंद्र गुप्ता से लालचंद के बारे में काफी जानकारियां मिलीं. लालचंद पिछले 20 सालों से गुप्ता परिवार के यहां काम कर रहा था. अपंग गुप्ता के लिए उसे निकाल कर नए आदमी की तलाश करना पेचीदा काम था.

दरअसल, दीपेंद्र गुप्ता भी एक सफल बिजनैसमैन थे, लेकिन जीवन में घटी एक घटना ने सब कुछ बदल कर रख दिया. दीपेंद्र गुप्ता को उन के दोस्त विनय गुप्ता के नाम से जानते थे. कभी शैक्षिक व्यवसाय से जुड़े दीपेंद्र का लौर्ड बुद्धा कालेज नाम से अपना शैक्षणिक संस्थान था. लेकिन सन 2011 में चंडीगढ़ से कोटा लौटते समय हुए एक रोड ऐक्सीडेंट में उन्हें गंभीर चोटें आईं. ऊपर से इलाज के दौरान उन्हें पैरालिसिस हो गया. तब उन्हें अपना संस्थान बेचना पड़ा.

उन की पत्नी स्वाति गुप्ता उपमंडल अधिकारी थीं, जिन का अच्छाखासा वेतन घर में आता था. इस के अलावा गुप्ता ने अपने आवास के एक बड़े हिस्से को किराए पर भी दे दिया, जिस से मोटी रकम मिलती थी. लालचंद मेहता को दीपेंद्र गुप्ता ने सन 2003 में ड्राइवर की नौकरी पर रखा था. उन की शादी स्वाति से सन 2004 में हुई थी, यानी लालचंद मेहता उन की शादी के एक साल पहले से ही उन के यहां नौकरी कर रहा था.

दीपेंद्र गुप्ता के व्हीलचेयर पर आने के बाद लालचंद सिर्फ ड्राइवर ही नहीं रहा, बल्कि गुप्ता का केयरटेकर भी बन गया. एक तरह से अब दीपेंद्र गुप्ता लालचंद पर निर्भर हो गए थे. लालचंद ने उन की इस लाचारी का फायदा उठाया. वह शराब पी कर घर आने लगा था. गुप्ता के सामने ही स्वाति से बदतमीजी से पेश आने लगा था. अब वह पैसे भी दबाव के साथ मांगने लगा था. उस पर गुप्ता की इतनी रकम उधार हो गई थी कि अपनी 2 सालों की तनख्वाह से भी नहीं चुका सकता था.

उस की दाबधौंस 20 अगस्त, 2015 को दीपेंद्र गुप्ता के सामने आई. उस समय वह दारू के नशे में धुत था. उस की आंखें चढ़ी हुई थीं और स्वाति से अनापशनाप बोल कर पैसे ऐंठने पर उतारू था.

आजिज आ कर स्वाति ने डांटा था लालचंद को पानी सिर से गुजर चुका था. इस से पहले कि गुप्ता कुछ कह पाते, स्वाति ने उसे दो टूक लफ्जों में कह दिया, ‘‘तुम्हें इतना पैसा दिया जा चुका है कि तुम सात जनम तक नहीं उतार सकते. तुम परिवार की जरूरतों के बहाने पैसे मांगते हो और दारू में उड़ा देते हो. फौरन यहां से निकल जाओ. आइंदा इधर का रुख भी मत करना.’’

एसपी सवाई सिंह गोदारा ने इस मामले की सूक्ष्मता से जांच कराई. इस केस में चश्मदीद गवाह कोई नहीं था, लेकिन तकनीकी साक्ष्य इतने मजबूत थे कि उन्हीं की बदौलत केस मृत्युदंड की सजा तक पहुंच पाया.

घर में लगे सीसीटीवी कैमरों में पूरी वारदात की फुटेज मिल गई थी, जिस में लालचंद स्वाति गुप्ता पर चाकू से वार करता हुआ साफ दिखाई दे रहा था.

जांच के दौरान मौके से मिले खून के धब्बे, चाकू में लगा खून और पोस्टमार्टम के दौरान मृतका के शरीर से लिए गए खून के सैंपल का मिलान कराया गया. मौके से मिले फुटप्रिंट का भी आरोपी के फुटप्रिंट से मिलान कराया गया. इन सारे सबूतों को अदालत ने सही माना.

न्यायाधीश राजेंद्र बंशीलाल ने सारे सबूतों, गवाहों और दोनों पक्षों के वकीलों की जिरह सुनने के बाद 49 पेज का फैसला तैयार किया था. अभियुक्त लालचंद को दोषी पहले ही करार दे दिया गया था. 13 दिसंबर, 2018 को उसे सजा सुनाई जानी थी.

न्यायाधीश ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा, ‘‘इस में कोई दो राय नहीं कि लालचंद मेहता ने जिस तरह स्वाति की जघन्य हत्या की, वह रेयरेस्ट औफ रेयर की श्रेणी में आता है. लेकिन इस के साथ ही हमें यह भी देखना होगा कि उस ने केवल स्वाति की हत्या ही नहीं की बल्कि अपाहिज दीपेंद्र गुप्ता का सहारा भी छीन लिया. साथ ही उन की मासूम बेटी के सिर से मां का साया भी उठ गया.’’

न्यायाधीश राजेंद्र बंशीलाल ने आगे कहा, ‘‘सारी बातों के मद्देनजर दोषी लालचंद को मृत्युदंड और 30 हजार रुपए जुरमाने की सजा देती है.’’

फैसला सुनाने के बाद न्यायाधीश अपने चैंबर में चले गए.

जज द्वारा सजा सुनाए जाने के बाद पुलिस ने मुलजिम लालचंद मेहता को हिरासत में ले लिया. अदालत द्वारा मुलजिम को मौत की सजा सुनाए जाने पर लोगों ने संतोष व्यक्त किया.

वार पर (पहला भाग)

नमिता एक हंसमुख और खुशमिजाज लड़की थी. उस के चेहरे की मासूमियत किसी का भी मन मोह लेती थी. उस के गुलाबी होंठ हमेशा मीठी मुसकराहट के दरिया में छोटी नाव की तरह हिचकोले खाते रहते थे. आंखों की पुतलियां सितारों की तरह नाचती रहती थीं. उस के चेहरे और बातों में ऐसा खिंचाव था, जो देखने वाले को बरबस अपनी तरफ खींच लेता था.

पर पिछले कुछ दिनों से नमिता के चेहरे की चमक धुंधली पड़ती जा रही थी. होंठों की मुसकराहट सिकुड़ कर मुरझाए फूल की तरह सिमट गई थी. आंखों की पुतलियों ने नाचना बंद कर दिया था. आंखों के नीचे काले घेरे पड़ने लगे थे.

नमिता समझ नहीं पा रही थी कि वह अपनी जिंदगी की कौन सी बेशकीमती चीज खोती जा रही थी. सबकुछ हाथ से फिसलता जा रहा था.

नमिता के दुख की वजह क्या थी, यह वह किसी को बता नहीं पा रही थी… लोग पहले कानाफूसी में उस के बारे में बात करते रहे, फिर खुल कर बोलने लगे.

सीधे उसी से पूछते, ‘क्या हुआ है नमिता तुम्हारे साथ जो तुम ग्रहण लगे चांद की तरह चमक खोती जा रही हो?’

नमिता पूछने वाले की तरफ देखती भी नहीं थी, सिर झुका कर एक फीकी मुसकराहट के साथ बस इतना कहती थी, ‘नहीं, कुछ नहीं…’ शब्द जैसे उस का साथ छोड़ देते थे.

इस तरह के हालात कब तक चल सकते थे? नमिता किसकिस से मुंह छिपाती? अनजान लोगों से नजरें चुरा सकती थी, पर अपने घरपरिवार, परिचितों और औफिस के साथियों की निगाहों से कब तक बच सकती थी? उन की बातों का कब तक जवाब नहीं देती?

आखिर टूट ही गई एक दिन… सब के सामने नहीं… औफिस की एक साथी थी प्रीति. उम्र में उस से कुछ साल बड़ी.

एक दिन एकांत में जब उन्होंने नमिता से प्यार भरी आवाज में भरोसा देते हुए पूछा तो नमिता रोने लगी. सब्र का बांध टूट चुका था.

फालतू का पानी बह जाने के बाद जब नमिता ठीक हुई तो उस ने धीरेधीरे अपनी परेशानी की वजह को बयान कर दिया, जिसे सुन कर प्रीति हैरान रह गई थी.

नमिता स्टेनोग्राफर थी और औफिस हैड भूषण राज के साथ जुड़ी थी. भूषण राज अधेड़ उम्र का सुखी परिवार वाला शख्स था. औफिस में उस की अपनी पर्सनल असिस्टैंट थी, पर डिक्टेशन और टाइपिंग का काम वह नमिता से ही कराता था. काम कम कराता था, सामने बिठा कर बातें ज्यादा करता था. वह उसे मुसकराती नजरों से देखा करता था.

पहले नमिता भी मुसकराती थी और उस की बातों का जवाब भी देती थी, पर धीरेधीरे नमिता की समझ में आ गया कि भूषण राज की नजरों का मतलब कुछ दूसरा था, इसलिए वह सावधान हो गई.

जब वह कोई बेहूदा बात कहता तो वह अंदर से डर कर सिमट जाती, पर बाहर से अपनेआप को संभाले रहती कि सूने कमरे में कोई अनहोनी न हो जाए.

नमिता यह तो नहीं जानती थी कि भूषण राज के तहत काम करते हुए वह कितनी महफूज है या वह जिंदगी का कौन सा सुख उसे देगा या उस के घरपरिवार के लिए क्या करेगा, पर वह इतना जरूर जानती थी कि केंद्र सरकार के औफिस की यह पक्की नौकरी उस के लिए बहुत जरूरी थी. उस का 3 साल का प्रोबेशन था. 2 साल पूरे हो चुके थे. एक साल बाद उसे कन्फर्मेशन लैटर मिल जाएगा, तब उस की पक्की नौकरी हो जाएगी.

नमिता मिडिल क्लास परिवार की लड़की थी. मांबाप के अलावा घर में एक छोटा भाई और बहन थी. पापा एक प्राइवेट फर्म में अकाउंटैंट थे. सीमित आमदनी के बावजूद उन्होेंने नमिता को ऊंची पढ़ाई कराई थी.

घर में बड़ी होने के नाते नमिता अपने मांबाप की आंखों का तारा तो थी ही, साथ ही साथ उम्मीद का चिराग भी कि पढ़ाई पूरी करते ही कोई नौकरी मिल जाएगी तो घर की हालत में थोड़ा सुधार आ जाएगा. छोटे भाईबहन की पढ़ाई अच्छे ढंग से चलती रहेगी.

नमिता ने अपने मांबाप को निराश नहीं किया. बीए में दाखिला लेने के साथसाथ वह एक प्राइवेट इंस्टीट्यूट से शौर्टहैंड का कोर्स भी पूरा करती रही.

जैसे ही वह कोर्स पूरा हुआ, उस ने एसएससी का इम्तिहान दिया और आज अपनी मेहनत की बदौलत वह सरकारी नौकरी कर रही थी.

नमिता की चुप्पी ने भूषण राज की हिम्मत बढ़ा दी. उस ने और ज्यादा चारा फेंका, ‘‘अगर तुम चाहोगी तो तुम्हारे भाईबहन पढ़लिख कर अच्छी सर्विस में आ जाएंगे. मैं उन्हें आगे बढ़ने में मदद करूंगा.’’

नमिता ने अपनी निगाहें उठाईं और भूषण राज के लाललाल फूले गालों वाले चेहरे पर टिका दीं. उस की आंखों में दुनिया का सारा प्यार नमिता के लिए उमड़ रहा था. पर इस प्यार में उसे भूषण राज के खतरनाक इरादों का भी पता चल रहा था.

‘‘तुम चिंता मत करो. मैं तुम्हारे भाईबहन को गाइड करूंगा कि उन्हें प्रोफैशनल कोर्स करना चाहिए या सामान्य कोर्स कर के प्रतियोगी परीक्षा के जरीए लोक सेवा में आना चाहिए. मैं ने कई लोगों को गाइड किया है और आज कई लड़के ऊंची सरकारी नौकरी में हैं.’’

पर नमिता गुमसुम सी बैठी रही, उठ कर भाग नहीं सकती थी. न तो वह उसे खुल कर मना कर सकती थी, न अपने मन का दर्द किसी से कह सकती थी.

जब नमिता ने कोई जवाब नहीं दिया तो वह बोला, ‘‘अच्छा, तुम बोर हो रही होगी… एक काम करो, चलो, एक डीओ का डिक्टेशन ही ले लो.’’

नमिता जब तक अपना पैड और कलम संभालती, वह अपनी कुरसी से उठ कर खड़ा हो गया और मेज की दाहिनी तरफ आ गया और कुछ सोचने का बहाना करते हुए नमिता की कुरसी के बाएं सिरे पर आ कर खड़ा हो गया. फिर दाहिनी तरफ नमिता के बाएं कंधे पर तकरीबन झुकते हुए बोला, ‘‘हां लिखो… माई डियर…’’ फिर एक पल की चुप्पी के बाद, ‘‘नहीं, यह छोड़ो. लिखो डियर श्री…’’ फिर भूषण राज की सूई तकरीबन अटक गई और वह ‘माई डियर’ या ‘डियर श्री’ से आगे नहीं बढ़ पाया.

यह शायद नमिता की खूबसूरती या उस के बदन का कमाल था कि पलभर में ही उस की सांसें फूलने लगीं और वह नमिता की चिकनी पीठ को लालसा भरी निगाहों से ताकते हुए लंबीलंबी सांसें लेने लगा. जब वह ज्यादा बेकाबू हो गया तो कसमसाते हुए नमिता के सिर पर हाथ रख कर बोला, ‘‘हां, क्या लिखा?’’

नमिता के शरीर में एक लिजलिजी लहर समा गई.

मजबूरी इनसान को हद से ज्यादा सब्र वाला बना देती है. नमिता के साथ भी यही हो रहा था. वह अपने बौस की ज्यादतियों का शिकार हो रही थी, पर उस का विरोध नहीं कर पा रही थी. न शब्दों से, न हरकतों से…

नतीजा यह हुआ कि भूषण राज के हाथ अब नमिता के सिर से होते हुए उस की गरदन को गुदगुदाने लगे थे और कभीकभी उस के गालों तक पहुंच जाते थे. फिर कई बार उस की पीठ को सहलाते, जैसे कुछ ढूंढ़ने की कोशिश कर रहे हों. उस की ब्रा के ऊपर हाथ रोक कर उस के हुक को टटोलते हुए ऊपर से ही खोलने की कोशिश करते, पर नमिता कुछ इस तरह सिकुड़ जाती कि वह अपनी कोशिश में नाकाम हो कर कुरसी पर जा कर बैठ जाता और कहता, ‘‘निम्मी…’’ आजकल वह प्यार से उसे निम्मी कहने लगा था, ‘‘तुम कुछ हैल्प क्यों नहीं करती? तुम समझ रही हो न… मैं क्या कहना चाहता हूं?’’

पर नमिता झटके से उठ कर खड़ी हो जाती और बाहर निकल जाती.

नमिता किस मुसीबत में फंस गई थी? क्या करे, क्या न करे? वह रातदिन सोचती रहती. जब से भूषण राज ने उस की पीठ को सहलाना शुरू किया था और उस के गालों को उंगलियों के बीच फंसा कर कभी धीरे से तो कभी जोर से चिकोटी काट लेता था, तब से वह और ज्यादा डरने लगी थी.

भूषण राज जब इस तरह की हरकतें करता तो नमिता अपने शरीर को मेज पर टिका देती कि कहीं उस के हाथ उस गोलाइयों को न लपक लें. वह हर मुमकिन कोशिश करती कि भूषण राज उस के साथ कोई गलत हरकत न करने पाए, पर शिकारी भेडि़ए के पंजे अकसर उस के कोमल बदन को खरोंच देते.

एक दिन तो हद हो गई. भूषण राज ने उस के दोनों गालों पर हाथ फिराते हुए आगे की तरफ से ठोढ़ी और गरदन को सहलाना शुरू कर दिया, फिर धीरेधीरे हाथों को आगे बढ़ाते हुए उस के गालों की तरफ झुक आया. जब उस की गरम सांसें नमिता के बाएं गाल से टकराईं तो वह चौंकी, झटके से बाईं तरफ मुड़ी तो भूषण राज का मुंह सीधे उस के होंठों से जा लगा.

उस ने भूखे भेडि़ए की तरह नमिता के दोनों होंठ अपने मुंह में भर लिए. इसी हड़बड़ी में उस के हाथ नमिता की छाती को मसलने लगे. पलभर के लिए वह हैरान सी रह गई. जब उस की समझ में आया तो उस ने झटका दे कर अपनेआप को छुड़ाया और धक्का दे कर उसे पीछे किया.

भूषण राज पीछे हटते हुए मेज से टकराया और गिरतेगिरते बचा.

नमिता कमरे से बाहर जा चुकी थी. अपनी सांसें काबू करने में उसे बहुत देर लगी. उस की आंखों के सामने अंधेरा सा छा गया था. उस का दिल और दिमाग दोनों सुन्न से हो गए थे. कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे?

उधर भूषण राज अपनी सांसों को काबू में करते हुए मन ही मन खुश हो रहा था कि एक मंजिल उस ने हासिल कर ली थी, अब आखिरी मंजिल हासिल करने में कितनी देर लग सकती थी.

नमिता के पास अब 2 ही रास्ते बचे थे. या तो वह नौकरी छोड़ देती या भूषण राज के साथ समझौता कर उस के साथ नाजायज रिश्ता बना लेती. पहला रास्ता आसान नहीं था और दूसरा रास्ता अपनाने से न केवल बदनामी होती, बल्कि उस की जिंदगी भी तबाह हो सकती थी.

भूषण राज उस का ही नहीं, पूरे औफिस का बौस था. नमिता को अब जब भी बौस उसे अपने कमरे में बुलाता, जानबूझ कर देरी से जाती. बारबार कहने के बावजूद भी नमिता कुरसी पर नहीं बैठती, बल्कि खड़ी ही रहती, ताकि जैसे ही बौस अपनी कुरसी से उठ कर खड़ा हो और उस की तरफ बढ़े, वह दरवाजे की तरफ सरक जाए.

भूषण राज चालाक भेडि़या था. उस ने अपना पैतरा बदला. अब वह नमिता को किसी सैक्शन से कोई फाइल ले कर आने के लिए कहता. वह फाइल को ले कर आती तो कहता, ‘‘देखो, इस में एक लैटर लगा होगा… पिछले महीने हम ने मुंबई औफिस से कुछ जानकारी मांगी थी. उस का जवाब अभी तक नहीं आया है. एक रिमाइंडर बना कर लाओ… बना लोगी?’’ वह थोड़ी तेज आवाज में कहता, जैसे धमकी दे रहा हो.

नमिता जानती थी कि भूषण राज जानबूझ कर उसे तंग करने के लिए यह काम सौंप रहा था, ताकि काम न कर पाने के चलते वह उसे डांटडपट सके.

‘‘मैं कर लूंगी सर,’’ कहते हुए वह बाहर निकल गई.

भूषण राज अपनी कुटिल मुसकान के साथ मन ही मन सोच रहा था, ‘कहां तक उड़ोगी मुझ से? पंख काट कर रख दूंगा.’

नमिता ने सब्र से काम लिया. वह संबंधित अनुभाग के अधीक्षक के पास गई और अपनी समस्या बताई. कार्यालय अधीक्षक समझदार था. उस ने नमिता का रिमाइंडर तैयार करा दिया. वह खुशी खुशी फाइल के साथ रिमाइंडर ले कर भूषण राज के चैंबर में घुसी. वह किसी फाइल पर झुका हुआ था, चश्मा नाक पर लटका कर उस ने आंखें उठाईं और त्योरियां चढ़ा कर पूछा, ‘‘तो रिमाइंडर बन गया?’’

‘‘जी सर, देख लीजिए,’’ नमिता आत्मविश्वास से बोली. उस की अंगरेजी और टाइपिंग दोनों अच्छी थीं. भूषण राज ने सरसरी तौर पर लैटर को देखा और घुड़क कर बोला, ‘‘तो ऐसे बनाया जाता है रिमाइंडर? तुम्हें कोई अक्ल भी है.

‘‘यह देखो, यह फिगर गलत है. यह कौलम तो बिलकुल सही नहीं बना है. इस का प्रेजेंटेशन ठीक नहीं है… और यह कौन से फौंट में टाइप किया है… जाओ, दोबारा से बना कर लाओ, वरना समझ लो, अभी प्रोबेशन में हो.

‘‘मन लगा कर काम करो, वरना जिंदगीभर इसी ग्रेड में पड़ी रहोगी. कभी प्रमोशन नहीं मिलेगा.’’

नमिता कुछ देर तो सहमी खड़ी रही. उस की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि ड्राफ्ट में क्या गलती थी. वह तकरीबन रोंआसी हो गई. 2 साल तक भूषण राज ने भले ही उस से एक पैसे का काम नहीं लिया था, पर बातें बहुत मीठी की थीं. अब अचानक उस के बरताव में आए इस बदलाव से नमिता हैरान थी.

अब यह रोज का नियम बन गया था. भूषण राज नमिता को रोज कोई न कोई मुश्किल काम बता देता. वह सही ढंग से काम कर भी देती, तब भी उस के काम में नुक्स निकालता, जोरजोर से सब के सामने उसे डांटता, उस को जलील करता.

‘‘तो यह है तुम्हारी परेशानी की वजह,’’ प्रीति ने लंबी सांस ले कर कहा, ‘‘समस्या बड़ी है… तो क्या सोचा है तुम ने? क्या तुम समझती हो कि इस तरह की लड़ाई से तुम खुद को बचा पाओगी? नामुमकिन है… मैं ने इस दफ्तर में तकरीबन 10 साल गुजारे हैं. मैं उस की एकएक हरकत से वाकिफ हूं.

‘‘मैं जब यहां आई थी, तब शादीशुदा थी. वह केवल कुंआरी लड़कियों पर नजर डालता है. 10 सालों में मैं ने बहुतकुछ देखा है… कितनी लड़कियों को मैं ने यहीं पर हालात से समझौता करते हुए देखा है, कितनी तो जबरदस्ती उस की हवस का शिकार हुई हैं.’’

‘‘मेरे लिए यह अच्छी नौकरी और इज्जत दोनों ही जरूरी हैं. मैं दोनों में से किसी को खोना नहीं चाहती. नौकरी जाने से मेरे मांबाप, भाई और बहन की जिंदगी पर असर पड़ेगा. इज्जत खो दी, तो फिर मेरे जीने का क्या मकसद…’’ नमिता की आवाज में हताशा टपक रही थी.

प्रीति ने उस के हाथ को थामते हुए कहा, ‘‘इस तरह निराश होने से काम नहीं चलेगा. क्या तुम किसी लड़के को प्यार करती हो?’’

नमिता ने चौंकती नजरों से प्रीति को देखा. उस के इस अचानक किए गए सवाल का मतलब वह नहीं समझी, फिर सिर झुका कर बोली, ‘‘उस हद तक नहीं कि उस से शादी कर लूं. कालेज में इस तरह के प्यार हो जाते हैं, जिन का कोई गंभीर मतलब नहीं होता. बस, एकदूसरे के प्रति खिंचाव होता है. ऐसा ही पहले कुछ था… 2 लड़कों के साथ, पर अब नहीं, लेकिन आप ने क्यों पूछा?’’

‘‘यही कि शिद्दत से किसी को प्यार करने वाली लड़की के कदम जल्दी किसी और राह पर नहीं चलते. मैं ऐसा समझ रही थी, शायद तुम अपने प्यार की खातिर भूषण राज के मनमुताबिक नरमदिल नहीं हो पा रही हो, वरना रुपएपैसे के साथसाथ जवानी का मजा कौन लड़की नहीं उठाना चाहती.’’

नमिता के सीने पर जैसे किसी ने घूंसा मार दिया हो. वह कराहते हुए बोली, ‘‘तो क्या मैं भूषण राज के नीचे लेट जाती?

क्या किसी को प्यार न करने वाली लड़की इज्जतदार नहीं होती?’’

ताकि कम टूटे कलह का कहर

अपने नाम के मुताबिक सलोनी वाकई सलोनी है. 14 वर्षीया इस किशोरी का मासूम चेहरा देख बीती 30 नवंबर के पहले तक कोई और तो क्या, उस के साथ पढ़ने वाले बच्चे भी अंदाजा नहीं लगा पाते थे कि वह कितने बड़ेबड़े तूफानों से जूझ रही है.

बोलती सी आंखों वाली सलोनी 30 नवंबर को स्कूल से लौटते वक्त रहस्यमय ढंग से गायब हो गई थी. हैरानी की बात यह भी थी कि उस के घर 55-बी, साकेत नगर, भोपाल से उस का लिटिल फ्लौवर स्कूल महज 200 मीटर की दूरी पर स्थित है. स्कूल की छुट्टी होने के बाद काफी देर तक सलोनी घर नहीं पहुंची तो उस के दादा एस के सिन्हा स्कूल जा पहुंचे.

स्कूल से उन्हें पता चला कि सलोनी छुट्टी होने के बाद अपनी एक सहेली के साथ चली गई थी. इस पर हैरानपरेशान एस के सिन्हा ने पहले तो इधरउधर उसे ढूंढ़ा, फिर थकहार कर नजदीकी बाग सेवनिया थाने में उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखा दी.

अवयस्क बच्चियों से ज्यादतियों के मामलों में भोपाल शहर काफी बदनाम हो चुका है, इसलिए सलोनी के यों लापता होने पर शाम तक शहर में तरहतरह की चर्चाएं होनी स्वाभाविक बात थी. सोशल मीडिया पर उस के गायब होने की पोस्ट वायरल हुई, तो लोग पुलिस प्रशासन को कोसते नजर आए.

पर हादसा कुछ और था

2 दिनों तक काफी गहमागहमी रही. सलोनी का न मिलना एक और हादसे की तरफ इशारा कर रहा था. पुलिस वालों ने उसे ढूंढ़ने की हर मुमकिन कोशिश की, लेकिन सलोनी नहीं मिली.

फिर 1 दिसंबर को जब नाटकीय तरीके से सलोनी मिली तो मामला घरेलू कलह का निकला. सलोनी को किसी ने अगवा नहीं किया था बल्कि वह अपनी मरजी से घर छोड़ कर गई थी और एक और हैरत की बात यह थी कि वह अपने घर से महज 50 मीटर की दूरी पर स्थित एक सूने मकान में थी जिसे एक ठेकेदार संजीव गुप्ता गोदाम की तरह इस्तेमाल करते हैं, उन की पत्नी ज्योति ने सलोनी को देखा था.

दरअसल, सलोनी 2 दिनों से भूखीप्यासी इस सूने मकान में रह रही थी. इस दौरान उस ने कुछ खायापिया नहीं था, जिस के चलते उस के होंठ नीले पड़ गए थे. पुलिस वालों ने ज्योति की खबर पर सलोनी को पुचकार कर पकड़ा तो एक कलहकथा सामने आई जिस का खमियाजा सलोनी भुगत रही थी.

सलोनी के पिता जसवंत सिन्हा टैलीकाम का कारोबार करते हैं. 4 साल पहले उन्हें लकवा मार गया था. अपने पापा को बेहद प्यार करने वाली सलोनी उस वक्त मुसीबतों, परेशानियों और तनाव से घिर गई जब उस की मम्मी पापा से झगड़ा कर मायके पटना चली गईं और फिर वापस नहीं आईं.

परिवार संयुक्त था, लेकिन सलोनी के हिस्से में बजाय मां की सहानुभूति या लाड़प्यार के, वह प्रताड़ना आई जो अकसर फिल्मों में दिखाई जाती है जिसे देख कर अच्छेअच्छों के दिल दहल जाते हैं कि मांबाप की कलह का कहर बच्चों पर कैसेकैसे टूटता है और उन के दिलोदिमाग पर कैसा बुरा असर डालता है.

मां के मायके जाते ही दादादादी, चाचाचाची और बूआ का गुस्सा सलोनी पर उतरने लगा. अदालत में दिए अपने बयान में सलोनी ने बताया कि जैसे ही मम्मीपापा के झगड़े के बाद मम्मी मायके गईं तो घर के बाकी बड़े जैसे उस के दुश्मन बन बैठे. उस पर तरहतरह की बंदिशें लगाई जाने लगीं और तरहतरह के असहनीय ताने मारे जाने लगे.

दादा बोलते थे कि बुढ़ापे में यह आफत कहां से आ गई. चाची कहती थीं कि जाओ, अपनी मां के पास जा कर रहो. बूआ दादी से शिकायत करती थीं कि उस की कई लड़कों से दोस्ती है, उसे डांटा करो. एक बार उसे पटना भेजा भी गया लेकिन 2 महीने बाद ही मम्मी ने उसे वापस भोपाल भेज दिया था.

मासूम सलोनी की यह उम्र पक्षियों की तरह उड़ने की थी लेकिन घर वालों के तानों और प्रताड़ना से परेशान हो कर वह भयंकर तनाव और अवसाद से घिर गई थी. पापा की तरफ देखती थी तो उस का कलेजा मुंह को आता था. सलोनी ने बताया कि ऐसे में वह किसी से अपना दुखदर्द शेयर नहीं कर पाती थी. लिहाजा, उस ने घर छोड़ने का फैसला ले लिया और जाने के पहले एक पत्र भी लिख कर अलमारी में रख दिया था कि उसे ढूंढ़ने की कोशिश की गई तो वह आत्महत्या कर लेगी.

सलोनी की यह कहानी सुन पत्थर दिल कहे जाने वाले पुलिस वालों की भी आंखें भर आईं. इस का दोषी उन्होंने सिन्हा परिवार को और उस में भी खासतौर से सलोनी के मम्मीपापा को माना जिन्होंने अपनी कलह में बेटी की मानसिक स्थिति पर ध्यान नहीं दिया.

सलोनी मिल गई तो हर किसी ने राहत की सांस ली, सिवा सलोनी के जिस की समस्या हल नहीं हुई है, बल्कि उजागर भर हुई है. हालफिलहाल घर वाले नरमी से पेश आ रहे हैं, लेकिन क्यों और कब तक आएंगे, इस का अंदाजा सलोनी से बेहतर कोई और नहीं लगा सकता.

कोई अछूता नहीं

पतिपत्नी की कलह का धर्म, जाति या आमदनी से कोई संबंध है, ऐसा कहने की कोई वजह नहीं. भोपाल में ही बीती 5 नवंबर को ऐसी ही कलह का एक और मामला सामने आया था जिस से यह साबित हुआ था कि भले ही सिन्हा परिवार संभ्रांत, प्रतिष्ठित और पैसे वाला था लेकिन कलह के मामले में मुन्ना गौड़ से पीछे नहीं था.

पेशे से मजदूर मुन्ना गौड़ इस दिन अपने एक दोस्त रमेश के साथ घर आया तो पत्नी कमला उस से झगड़ बैठी. रमेश बाहर खड़ा इन की तूतूमैंमैं खत्म होने का इंतजार करता रहा लेकिन कलह रुकरुक कर जारी रही. इसी दौरान उस की निगाह मुन्ना गौड़ की 3 साल की बेटी गुडि़या पर पड़ी जो मम्मीपापा की तेज आवाजें सुन कर रोने लगी.

बेटी को रोता देख गुस्साया मुन्ना बाहर आया और गुस्से में उसे भी बेरहमी से पीट दिया और उसे खामोश रहने की डांट पिला कर अंदर चला गया. कलह में बेट?ी के रोने की खलल उसे बरदाश्त नहीं हो रही थी.

गुडि़या मारे डर के चुप तो हो गई लेकिन थरथर कांपती, सुबकती रही. इस पर रमेश उसे गोदी में उठा कर अपने घर ले आया. इधर पतिपत्नी की कलह थमी तो बाहर आ कर उन्होंने गुडि़या को देखा तो वह गायब थी. घबराए मुन्ना ने पहले तो इधरउधर उसे ढूंढ़ा, लेकिन वह नहीं मिली, तो सीधे पुलिस थाने जा कर रिपोर्ट दर्ज करा दी.

मामला 3 साल की मासूम की गुमशुदगी का था, इसलिए आशंकित पुलिस वालोें ने फुरती दिखाई और मुन्ना के साथ गुडि़या को ढूंढ़ने में लग गई. यह खोजबीन कोई 15 घंटे तक चली, लेकिन गुडि़या नहीं मिली, तो मुन्ना की हालत देखने लायक थी जिस के चेहरे पर अब हवाइयां उड़ रहीं थीं.

मुन्ना के साथ पुलिस रायसेन जिले तक गई थी और वहां भी बच्ची नहीं मिली, तो किसी अनहोनी की आशंका से घबरा उठी. रायसेन से वापस लौटते वक्त पुलिस वालों ने रास्ते में विसर्जन घाट पर ढुंढ़ाई की तो गुडि़या रमेश के यहां मिल गई.

गनीमत यह थी कि वह सहीसलामत थी. पुलिस वालों ने रमेश से पूछताछ की तो उस ने सच उगल दिया कि चूंकि मुन्ना और उस की पत्नी घर के अंदर बुरी तरह से झगड़ रहे थे, इसलिए वह गुडि़या को अपने साथ ले आया था. सच जान कर और बच्ची को सहीसलामत देख कर पुलिस वालों ने राहत की सांस ली, लेकिन मुन्ना गौड़ को कलह के बाबत तगड़ी झाड़ लगाई.

यह मामला भी आया गया होे गया लेकिन अपने पीछे एक अहम सवाल यह छोड़ गया कि मांबाप की कलह के शिकार बच्चों का क्या दोष है, जिन्हें बेवजह एक मानसिक प्रताड़ना, डर, अवसाद और खौफ से गुजरना पड़ता है. मांबाप की कलह से ग्रस्त बच्चों पर क्या और कैसा असर पड़ता है, यह हर कोई जानता है कि वे या तो एकदम दब्बू हो जाते हैं या फिर असामान्य रूप से हिंसक हो उठते हैं.

ऐसे बच्चों में न तो आत्मविश्वास रह जाता और न ही वे सहज तरीके से रह पाते हैं. वे हर वक्त भयभीत रहते हैं और मांबाप की कलह का असर उन पर जिंदगीभर देखने में आता है.

‘‘डरेसहमे मासूम बचपन से कोई उम्मीद करना बेकार है,’’ भोपाल के एक नामी मनोचिकित्सक विनय मिश्रा कहते हैं, ‘‘अभिभावकों को चाहिए कि वे अगर कलह पर काबू पाने में असमर्थ हैं तो कलह के शांत हो जाने पर बच्चों पर अतिरिक्त ध्यान दें जिस से उन का कम से कम नुकसान हो और वे भयमुक्त हो कर अवसाद की हालत में जाने से बचें.’’

ऐसे संभालें बच्चों को

पतिपत्नी में विवाद और कलह बेहद स्वाभाविक बात है जिस के चलते वे बच्चों पर इस के पड़ने वाले दुष्प्रभावों को न तो देख पाते हैं और न ही समझ पाते हैं. सलोनी और गुडि़या की मानसिक स्थिति को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता.

जिन मांबाप से बच्चों की सुरक्षा की उम्मीद रहती है अगर वे ही जानवरों की तरह लड़े तो बच्चों का आत्मविश्वास डगमगा जाता है, उन का बचपन छिन जाता है, उन की मासूमियत पर डर और आतंक का ग्रहण लग जाता है. कई बार तो बच्चे खुद को ही मांबाप की कलह का दोषी मानते ग्लानि का शिकार हो जाते हैं. यह एक घातक मनोस्थिति है जिसे कलह में डूबे मांबाप नहीं समझ पाते कि वे बच्चे से कैसा खिलवाड़ कर रहे हैं.

अकसर कलह थमने के बाद मांबाप का ध्यान भयभीत बच्चों की तरफ जाता है और ऐसी स्थिति में वे अलगअलग तरह की प्रतिक्रियाएं अपने स्वभाव के मुताबिक देते हैं. कुछ लाड़प्यार दिखाते बच्चे को भींच लेते हैं. लेकिन इस से बच्चे का डर खत्म नहीं हो जाता, उलटे, और बढ़ जाता है. वजह, उन्हें एहसास रहता है कि यह सब थोड़े से वक्त के लिए है, इस के बाद तो मांबाप को फिर वही सब करना है जो थोड़ी देर पहले वे कर रहे थे. इसलिए यह बनावटी लाड़प्यार हिम्मत देने के बजाय उन्हें और भयभीत करता है.

कुछ मांबाप बच्चों पर ही अपनी भड़ास निकालते उन्हें मारनेपीटने लगते हैं. दरअसल, वे एक क्रूर तरीके से अपनी कमजोरी, झेंप या शर्मिंदगी कुछ भी कह लें, दूर कर रहे होते हैं. उन्हें लगता है कि ऐसा करने से बच्चे की निगाह में उन की इमेज एक नायक या संरक्षक की बनी रहेगी. पर वे भूल जाते हैं कि बच्चे की निगाह में वे सब से बड़े खलनायक बन चुके होते हैं.

कुछ मांबाप आत्मग्लानि के चलते बच्चों से मुंह छिपाते उन्हें उन के हाल पर छोड़ कर अपने कामधाम में लग जाते हैं. ऊपर बताई दोनों स्थितियों की तरह यह तीसरी स्थिति भी कम नुकसानदेह बच्चों के लिहाज से नहीं होती जो मांबाप से कुछ ऐसा चाहते हैं जिस से उन के दिलोदिमाग में बैठा खौफ कम हो और वे मांबाप में वह सुरक्षा ढूंढ़ सकें जिस की उन्हें जरूरत होती है.

यह ठीक है कि बच्चे मांबाप की कलह से बचे नहीं रह सकते लेकिन कलह के थमने के बाद के प्रभावों से तो उन्हें मांबाप ही बचा सकते हैं, जो उन की ही जिम्मेदारी है.

कोलोरैक्टल कैंसर बचाव ही उपाय

कोलोरैक्टल कैंसर (सीआरसी) बड़ी आंत का कैंसर होता है. यह आंत गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट का एक अलग हिस्सा होती है. बड़ी आंत के लगभग सभी कैंसर कोशिकाओं के छोटे गुच्छे के तौर पर शुरू होते हैं, जिसे एडेनोमेटस पौलिप्स कहा जाता है. हालांकि, इन पौलिप्स को कैंसर में तबदील होने में काफी साल लग जाता है.

सीआरसी दुनियाभर में महिलाओं में होने वाला तीसरा और पुरुषों में चौथा सब से आम कैंसर है. हालांकि, दुनियाभर में भौगोलिक क्षेत्रों के आधार पर इस में फर्क देखा जाता है. आधे से ज्यादा सीआरसी के मामले विकसित देशों में देखे गए हैं, लेकिन स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी की वजह से सीआरसी से होने वाली सब से ज्यादा मौतें ज्यादातर कम विकसित देशों में होती हैं. भारत में ऐसे कैंसर के मामले पश्चिमी देशों की तुलना में करीब 7 से 8 गुना कम होते हैं, लेकिन पिछले कुछ दशकों से भारत में भी सीआरसी के मामले बढ़ रहे हैं.

कैसे पहचानें

ऐसे कैंसर के अभी तक कोई खास लक्षण या संकेत नहीं मिले हैं. कुछ ऐसे लक्षण हैं जो इस बीमारी के शक को बढ़ाते हैं, जैसे मल में खून का आना, मल त्याग की आदतों में बदलाव, लगातार पेट से जुड़ी परेशानियां (दर्द, ऐंठन), वजन का तेजी से घटना, एनिमिया, थकान महसूस होना आदि.

क्यों होता है यह कैंसर

ज्यादातर मामलों में यह साफ नहीं होता है कि कोलोनिक कैंसर के क्या कारण हैं. कोलोन कैंसर वैसी हालत में होता है जब बड़ी आंत की लाइनिंग कोशिकाओं में आनुवंशिक ब्लूप्रिंट (डीएनए) में बदलाव होता है. आनुवंशिक बदलाव नए सिरे (अधिकांश मामलों में) से पैदा हो सकते हैं, लेकिन यह जन्मजात और परिवार से आनुवंशिक तौर पर भी हो सकता है. ये जन्मजात जीन म्यूटेशंस कैंसर का जरूरी कारण नहीं बनते हैं, लेकिन कैंसर के खतरे को काफी बढ़ा देते हैं.

जोखिम बढ़ाने वाले जन्मजात कैंसर सिंड्रोम के आम रूप हैं : एचएनपीसीसी वंशानुगत गैरपौलिपोसिस कोलोरैक्टल कैंसर सिंड्रोम और फैमिलिया एडेनोमेटस पौलिपोसिस (एफएपी).

आहार में कम फाइबर, ज्यादा रैडमीट व कैलोरी के सेवन, धूम्रपान, आरामतलब जीवनशैली और वजन का बढ़ना आमतौर पर कोलोनिक कैंसर के होने में भूमिका निभाते हैं.

दूसरी वजहें जो कोलोनिक कैंसर की आशंका को बढ़ाती हैं, उन में 50 वर्ष से ज्यादा उम्र, अफ्रीकी-अमेरिकन नस्ल, कोलोरैक्टल कैंसर या पौलिप्स का व्यक्तिगत इतिहास, आंत में सूजन जैसे- अल्सरैटिव कोलाइटिस और आंत से जुड़ी बीमारियां, मधुमेह, मोटापा, कैंसर के बाद कराई गई रैडिएशन थेरैपी आदि शामिल हैं.

कैसे रोकें इसे

कैंसर की रोकथाम का कोई तय तरीका नहीं है, लेकिन कुछ तरीके हैं जिन्हें अपना कर कैंसर के जोखिम को कम किया जा सकता है. बड़ी आंत के कैंसर के जोखिम को इस से संबंधित जोखिमकारकों का प्रबंधन कर कम किया जा सकता है और ये व्यक्ति के कंट्रोल में भी होते हैं –

  • वजन को कम रखें. खासतौर पर कमर के चारों ओर वजन बढ़ाने से बचें.
  • तेज चलने, रोजाना व्यायाम के जरिए शारीरिक गतिविधियों को बनाए रखें.
  • फलों व सब्जियों का सेवन रोज करें. ज्यादा कैलोरी, रैडमीट के सेवन से परहेज करें.
  • अल्कोहल व सिगरेट का सेवन बिलकुल न करें.
  • हालांकि यह वैज्ञानिक तौर पर साबित नहीं है लेकिन फिर भी कैल्शियम, मैग्नीशियम व विटामिन डी इस कैंसर को न होने देने में मदद कर सकते हैं.

एनएसएआईडीएस (नौन-स्टेरौयडल ऐंटी-इन्फ्लेमैटरी ड्रग्स) बहुत से अध्ययनों में पाया गया है कि जो लोग एस्प्रिन और दूसरी इन्फ्लेमैटरी दवाइयों, जैसे आईब्रूफेन और नैप्रोक्सिन का सेवन करते हैं, उन्हें आंत का कैंसर या पोलिप्स होने का खतरा कम रहता है लेकिन लंबे समय तक इस के सेवन से इस का फायदा नहीं होता है, इसलिए इस की सलाह नहीं दी जाती है.

स्क्रीनिंग जांच

सीआरसी ज्यादातर पौलिप्स के कई वर्षों में धीरेधीरे कैंसर में तबदील होने की वजह से होते हैं. ऐसे में इस कैंसर को रोकने या जल्द पता लगाने के लिए जांच कराना बेहतर है.

स्क्रीनिंग या जांच कार्यक्रम में आसान जांच के साथ स्वस्थ व्यक्तियों की बड़ी आबादी शामिल होती है. इस से शुरुआत में या कैंसर के पहले स्तर पर बीमारी का पता लगाने में मदद मिलती है.

सीआरसी की जांच में व्यापक आबादी के बीच नौन इन्वैसिव स्टूल टैस्ट और इन्वैसिव कोलोनोस्कोपिक टैस्ट्स के साथ संगठित स्क्रीनिंग कार्यक्रम शामिल हैं. स्टूल टैस्ट (मल जांच) की स्क्रीनिंग में खून की मात्रा की जांच की जाती है. इस के लिए की जाने वाली सामान्य जांचें हैं : गुआयाक फीकल औकल्ट ब्लड टैस्ट (जी-एफओबीटी) और फीकल इम्यूनोकैमिकल टैस्ट (एफआईटी).

मौजूदा सुझावों के आधार पर सीआरसी जांच में फीकल औकल्ट ब्लड का पता लगाने के लिए एफआईटी को पहला विकल्प बताया गया है और इस के लिए खानेपीने की पाबंदी की जरूरत नहीं होती है. यह ज्यादा संवेदनशील परीक्षण है.

दूसरी नौन इन्वैसिव तकनीक भी उपलब्ध हैं, जैसे कि फीकल डीएनए एनालिसिस. ये परीक्षण एडेनोमा और कोलोरैक्टल कैंसर कोशिकाओं में मौलिक्यूलर बदलाव की पहचान करते हैं. हालांकि, ज्यादा लागत होने की वजह से इन परीक्षणों का उपयोग कम किया जाता है.

फीकल परीक्षण के बाद सिगमोएडोस्कोपी और कोलोनोस्कोपी जैसी इन्वैसिव जांच पौलिप्स और कैंसर का पता लगाने के साथ ही साथ तुलनात्मक रूप से शुरुआती अवस्था में उसे हटा सकती हैं. इस के साफ प्रमाण हैं कि दीर्घावधि में फौलोअप जांच के दौरान कोलोनोस्कोपी कोलोनिक कैंसर से होने वाली मृत्युदर में कमी आई है. लेकिन इस के सुखद अनुभव नहीं होने की वजह से आम आबादी फीकल टैस्ट्स को तरजीह देती है और फीकल टैस्ट के पौजिटिव आने के बाद ही कोलोनोस्कोपी कराई जाती है.

:डा. प्रदीप जैन

तो रणबीर कपूर और विक्की कौशल की फिल्मों की हो गयी अदला बदली

बौलीवुड में कब क्या होगा, यह पहले से कोई नहीं बता सकता. यूं भी भारत में माना जाता है कि भारतीय राजनीति और बौलीवुड में कुछ भी संभव है. जी हां कुछ समय पहले तक फिल्म निर्माता रोनी स्क्रूवाला की अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा की बायोपिक फिल्म में अंतरिक्ष यात्री का किरदार विक्की कौशल निभा रहे थे, जबकि रोनी लाहरी की शहीद उधम सिंह की बायोपिक फिल्म में उधम सिंह का किरदार रणबीर कपूर निभा रहे थे. मगर परदे के पीछे ऐसा कुछ घटित हुआ कि अब दोनों कलाकारों की फिल्मों की अदला बदली हो गयी है.

मतलब यह कि अब रोनी स्कूवाला निर्मित अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा की बायोपिक फिल्म में रणबीर कपूर और रोनी लाहरी निर्मित तथा शुजीत सरकार निर्देशित शहीद उधमसिंह की बायोपिक फिल्म में विक्की कौशल अभिनय करेंगे.अब यह बदला बदली क्यों हुई, इसको लेकर कई तरह की चर्चाएं हैं. कुछ लोगों का मानना है कि ‘राजी’ और ‘उरी’ जैसी सफल फिल्मों में विक्की कौशल के अभिनय को देखकर फिल्मकार शुजीत सरकार को अहसास हुआ कि शहीद उधम सिंह का किरदार रणबीर कपूर की बजाय विक्की कौशल ज्यादा बेहतर ढंग से निभा सकते हैं.

इसलिए सुजीत सरकार ने विक्की कौशल के सामने उधम सिंह की बायोपिक फिल्म का आफर रखा, जिसे विक्की कौशल ने तुरंत लपकते हुए अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा की बायोपिक फिल्म करने से साफ इंकार कर दिया. वास्तव में विक्की कौशल की दिली तमन्ना रही है कि उन्हे शुजीत सरकार के साथ काम करने का अवसर मिले. जब विक्की कौशल ने रोनी स्क्रूवाला की फिल्म छोड़ दी और उधर रणबीर कपूर के पास कोई फिल्म नहीं रही, तो रोनी स्क्रूवाला ने अंतरिक्ष यात्री राकेश षर्मा की बायोपिक फिल्म में अभिनय करने के लिए रणबीर कपूर से संपर्क कर लिया.

मजेदार बात यह है कि सुजीत सरकार का दावा है कि उन्होने उधम सिंह के किरदार के लिए कभी भी रणबीर कपूर को साइन नहीं किया था. वैसे जब गत वर्ष इस फिल्म की घोषणा की गयी थी, उस वक्त उधम सिंह के किरदार के लिए इरफान खान का नाम चर्चा में आया था. पर इरफान खान की बीमार होने के बाद रणबीर कपूर का नाम चर्चा में आया. पर अब शुजीत सरकार ने स्वीकार किया है कि उधम सिंह का किरदार विक्की कौशल निभाएंगे.

सुजीत सरकार कहते हैं-‘‘मैं लंबे समय से शहीद उधम सिंह की कहानी बयां करने का इंतजार कर रहा था.यह कहानी मेरे दिल के काफी करीब है. इस किरदार के लिए हमें ऐसे कलाकार की जरुरत थी, जो कि अपना दिल और आत्मा देते हुए मेरे साथ कहानी कहे. विक्की इसके लिए एकदम फिट हैं. मैंने उसका काम और काम के प्रति समर्पण देखा है. मुझे खुशी है कि वह इस फिल्म से जुड़े हैं.’’

मलाई पनीर रेसिपी

सामग्री

– 250 ग्राम पनीर

– 2 प्याज़

– 3 हरी मिर्च

– 1 टी स्पून हरा धनिया

– 1 टी स्पून धनिया पाउडर

– 1/4 टी स्पून हल्दी पाउडर

– 1/4 टी स्पून लाल मिर्च पाउडर

– 1/4 टी स्पून गरम मसाला

– 2 टी स्पून तेल

– 1/2 कप मलाई

-1/2 टी स्पून जीरा

– 1 टी स्पून अदरक लहसुन पेस्ट

नमक (स्वादानुसार)

बनाने की विधि

– सबसे पहले प्याज़ को ले और मिक्सी में डालकर बारीक़ पीस ले.

– साथ ही हरी मिर्च को भी अच्छे से पीस ले.

– अब एक कढ़ाई में तेल डालकर गरम करे.

– गरम तेल में प्याज़ का पेस्ट डालकर अच्छे से भूने साथ ही नमक भी डालें.

– जब प्याज़ का रंग हल्का ब्राउन हो जाए तो उसमे अदरक लहसुन का पेस्ट डाले और मिलाएं.

– सारे मिश्रण को अच्छे से मिक्स करे और उसमे हल्दी, लाल मिर्च, धनिया, गरम मसाला, जीरा डालकर अच्छे से मिलाए. इस मिश्रण को 5 मिनट तक भूनें, लगातार कलछी से चलाते रहे.

– इस मिश्रण में क्रीम डाले और चलाए.

– 2 मिनट के बाद इसमें कटे हुए पनीर के टुकड़े डाले और 2-3 मिनट तक पकाए और सब्ज़ी को लगातार चलाते रहे.

– कुछ देर बाद आपका स्वादिष्ट और लाजवाब मलाई पनीर बनकर तैयार है इसपर ऊपर से धनिया पत्ते डालकर बाउल में निकाले और सभी को सर्वे करें.

तो अब नहीं लगेगी दांतो पर लिपस्टिक

जब हम अपने होठों पर लिपस्टिक लगाते हैं तो हमारा होठ और चेहरा दोनों ही निखर उठता है. खूबसूरत होठों पर खूबसूरत मुस्कान चेहरे पर एक नई रौनक लेकर आती है. पर अगर उन्हीं होठों की लाली दांतों पर दिखें तो आपको और आपके सामने बैठे इंसान को अजीब लगता है. ऐसे में आपको कुछ उपाय अपनाना चाहिए ताकि लिपस्टिक को दांतों से दूर रखा जा सके. आप सोच रही होंगी कि कैसे तो बता दें कि लिपस्टिक को दांतों से दूर रखना इतना भी मुश्किल नहीं है. बस कुछ आसान टिप्स अपनाकर आप ऐसा कर सकती हैं.

मैट लिपस्टिक लगायें

मैट लिपस्टिक से दांतों पर लिपस्टिक नहीं लगती क्योंकि मैट लिपस्टिक में ग्लॉस नहीं होता.

इंडेक्स फिंगर से हटाएं ऐक्स्ट्रा लिपस्टिक

ये तरीका अजीब जरूर है पर यह तरीका आसान और बेहद कारगर है. अपनी इंडेक्स फिंगर को मुंह में डालें और धीरे धीरे बाहर निकाल लें. दांतों पर लगी लिपस्टिक ऊंगली में लगकर बाहर निकल जाएगी.

टिश्यू पेपर का इस्तेमाल करें

सबसे पुराना तरीका है ये दांतों से लिपस्टिक के दाग हटाने का. दोनों के होंठों के बीच टिश्यू पेपर रखें और होठों को दबायें. इससे स्मजीनेस भी दूर हो जाएगा और ऐक्स्ट्रा लिपस्टिक भी.

लिप ब्रश का करें इस्तेमाल

लिप ब्रश से लिपस्टिक लगाने के दो फायदे हैं. इससे दांतों पर लिपस्टिक नहीं लगती और लिपस्टिक भी एक समान होठों पर लगती है.

लिप लाइनर लगाना न भूलें

लिपस्टिक लगाने से पहले लिपलाइनर जरूर लगायें. इससे लिप्सिटक बाहर नहीं फैलती और दांतों पर भी नहीं लगती. आपके होंठ भी खिले खिले नजर आते हैं.

लिप बाम लगाना न भूलें

लिपस्टिक लगाने से पहले लिप बाम लगाना न भूलें. इससे होठों पर अच्छे से लिपस्टिक लगेगी.

स्ट्रा का इस्तेमाल करें

अगर आप किसी पार्टी में गई हैं तो कोल्ड ड्रिंक्स पीने के लिए स्ट्रा का इस्तेमाल करें.

टच पर करना न भूलें

पार्टी के बीच में वाशरूम जाकर टच अप करना न भूलें.

धर्म परिवर्तन दूसरी शादी के लिए

हरियाणा के पूर्व उप मुख्यमंत्री चंद्रमोहन उर्फ चांद मोहम्मद का सफर और फिजा से शादी की शहनाई ठीक से बजी भी नहीं थी कि इस में एक नाटकीय मोड़ आ गया. चांद मोहम्मद ने जहां फिर से हिंदू धर्म स्वीकार करने की बात कही वहीं ला कमीशन ने शादी के लिए धर्म परिवर्तन करने वालों पर रोक लगाने के लिए एक सुझाव पेश कर दिया.

ला कमीशन ने अपने सुझाव में इसलाम द्वारा प्रदत्त 4 शादियों की इजाजत को इसलामी रूह के विपरीत बताते हुए इसे खारिज कर दिया. सरकार को सौंपी अपनी 227वीं रिपोर्ट में ला कमीशन ने इस को स्पष्ट करते हुए कहा कि इस का मकसद एक से ज्यादा शादियों की इजाजत से फायदा उठाने के लिए इसलाम कबूल करने का ढोंग रचाने वालों का रास्ता रोकना है. कमीशन ने अपने विचार के समर्थन में तर्क दिया है कि एक से अधिक शादी पर ज्यादातर देशों में कानूनी पाबंदी है. उस के अनुसार तुर्कों में यह पूरी तरह गैर कानूनी है जबकि मिस्र, सीरिया, ईरान, उरदन, इराक, यमन, मोरक्को, पाकिस्तान और बंगलादेश में यह प्रशासन अथवा न्यायालय के नियंत्रण में है. ला कमीशन की इस साफगोई से उलेमा संतुष्ट नहीं हैं और वे इसे इसलाम के विरुद्ध बता कर इस का विरोध कर रहे हैं. इस से स्थिति काफी जटिल हो गई है.

ला कमीशन की इस रिपोर्ट से पूर्व जस्टिस कुलदीप सिंह और जस्टिस आर.एम. सहाय पर आधारित सुप्रीम कोर्ट की 2 सदस्यीय खंडपीठ 10 मई, 1995 को सरला मुद्गल आदि के मामले में एक अहम फैसला दे कर यह बात अच्छी तरह स्पष्ट कर चुकी है कि हिंदू शादी जो हिंदू कानून के तहत की गई हो, केवल उसी कानून में दर्ज बुनियादों के आधार पर निरस्त होगी. जब तक इस कानून में दर्ज किसी बुनियाद के हवाले से हिंदू शादी निरस्त नहीं होती, उस समय तक जोड़े में से किसी एक को दूसरी शादी करने का हक हासिल नहीं होगा.

तब सुप्रीम कोर्ट की उक्त खंडपीठ के सामने 4 याचिकाएं विचाराधीन थीं. मामला मीना माथुर की याचिका से अदालत के सामने आया. मीना माथुर जितेंद्र माथुर की शादी 27 फरवरी, 1978 में हुई थी और इन के 3 बच्चे थे. 1988 में जितेंद्र माथुर ने इसलाम कबूल कर के सुनीता निरोला से शादी कर ली. मीना माथुर का कहना था कि उन्होंने धारा 494 के तहत काररवाई से बचने के लिए ही इसलाम कबूल किया है.

याचिका दाखिल करने वाली एक अन्य वादी गीता रामी रानी ने अदालत से कहा कि हिंदू रीतिरिवाज के अनुसार उस की शादी प्रदीप कुमार से हुई थी, जो दिसंबर 1991 में दीपा नाम की एक महिला को ले कर फरार हो गया और इसलाम धर्म कबूल कर उस से शादी कर ली. एक अन्य वादी सुष्मिता घोष ने अपनी याचिका में कहा कि उस की शादी 10 मई, 1984 को जी.सी. घोष के साथ हिंदू रीतिरिवाज के तहत हुई थी. 20 अप्रैल, 1992 को मेरे शौहर ने बताया कि वह मेरे साथ नहीं रहना चाहता और दबाव डाला कि मैं पति जी.सी. घोष को तलाक देने के लिए राजी हो जाऊं. सुष्मिता घोष इस के लिए तैयार नहीं हुई तो जी.सी. घोष ने इसलाम धर्म कबूल कर लिया और वनीता नाम की एक अन्य महिला से शादी की तैयारी करने लगा. इस बीच सुष्मिता ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया कि उस के शौहर को वनीता घोष के साथ शादी करने से रोका जाए.

अदालत ने इन तीनों याचिकाओं को एक सामाजिक संस्था कत्यानी की अध्यक्ष सरला मुद्गल की याचिका के साथ जोड़ दिया और यह पूरा मामला इन्हीं के नाम से प्रचारित हुआ. खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा, ‘हिंदू शादी कानून’ की विभिन्न धाराओं से स्पष्ट है कि हिंदू कानून एक बीवी रखने के नियम का सख्ती से पालन करता है. इस कानून के तहत की जाने वाली शादी उसी सूरत में अमान्य करार दी जाएगी, जब इस कानून की धारा 13 के तहत बयान की जाने वाली कोई बुनियाद मौजूद हो. इस कानून के तहत की जाने वाली शादी इस सूरत में भी बाकी रहती है, जब कोई शौहर दूसरी बीवी के लिए इसलाम धर्म कबूल कर लेता है. धर्म परिवर्तन करने वाले किसी ऐसे व्यक्ति की दूसरी शादी इस बीवी के हवाले से गैर कानूनी करार दी जाएगी जिस ने इस से पहले हिंदू कानून के तहत शादी की है और अब भी हिंदू धर्म पर कायम है… इसलाम धर्म कबूल करने और इस के बाद दूसरी शादी हिंदू कानून के तहत की गई शादी के निरस्त करने का कारण नहीं बनती. धर्म परिवर्तन करने वाले की दूसरी शादी हिंदू कानून का उल्लंघन होगा और भारतीय दंड संहिता की धारा 494 के तहत यह शादी नाजायज करार दी जाएगी.’’

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का अनुमोदन लली थामस मामलों में भी होता है. इन दोनों मामले में सुप्रीम कोर्ट का आदेश स्पष्ट तौर पर कबूल इसलाम धर्म करने का ढोंग रचाने वालों का मनोबल गिराता नजर आता है. इस कानून के आधार पर शौहर के इसलाम धर्म कबूल करने के बाद उस की बीवी से उस का रिश्ता स्वत: नहीं टूटता है और इस तरह के किसी भी व्यक्ति के खिलाफ धारा 494 के तहत कानूनी काररवाई की जा सकती है जो सजा का कारण बन सकती है, लेकिन आश्चर्य इस बात पर है कि सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट आदेश भी इस को खत्म करने में सहायक नहीं बन सका. अब हिंदू मैरिज एक्ट में एक और धारा जोड़ कर इस बीमारी को जड़ से उखाड़ फेंकने का प्रयास किया जा रहा है. इस बाबत यह कितना सहायक होगा, अभी इस पर कुछ कहना संभव नहीं है.

जहां तक मुसलिम पर्सनल ला का मामला है, मुसलिम पर्सनल ला के विशेषज्ञों के सामने किसी पसर्नल ला के तहत की जाने वाली शादी किसी अन्य धर्म को कबूल  कर लेने के बाद स्वत: निरस्त (फस्ख) नहीं हो जाती. हिंदू मैरिज एक्ट में यह व्यवस्था पैदा की जाए कि धर्म परिवर्तन करने वाला शौहर भी तलाक के लिए अदालत में अपील कर सके. वर्तमान कानून में यह सुविधा केवल बीवियों को ही हासिल है. हिंदू मैरिज एक्ट में यह बात कही गई है कि यदि शौहर अपना धर्म बदल ले तो इस आधार पर बीवी तलाक का मुकदमा दायर कर सकती है कि उस के शौहर ने धर्म बदल लिया है लेकिन शौहर को यह हक हासिल नहीं है कि वह अदालत से कहे कि उस ने अपना धर्म बदल लिया है और बीवी पुराने धर्म पर कायम है इसलिए उसे तलाक की इजाजत दी जाए, क्योंकि अब एकसाथ रहना उन के लिए संभव नहीं रह गया है. यह हक न मिलने की सूरत में शौहर को बीवी के अदालत जाने का इंतजार करना पड़ेगा. यदि वह ऐसा नहीं करती है तो इस के सिवा कोई उपाय नहीं होगा कि शौहर की पूरी जिंदगी संकट में गुजरे.

जहां तक इसलाम धर्म द्वारा 4 शादियों की इजाजत की बात है तो इस की इजाजत इसलाम धर्म देता है लेकिन यह केवल इजाजत है, इस का यह अर्थ नहीं है कि हर मुसमलान 4, 3 या 2 बीवियां रखे. इसलाम धर्म ने यह इजाजत सशर्त दी है. इसीलिए उलेमा का मानना है कि सशर्त शादी की इजाजत पर ला कमीशन की रोक का सुझाव इसलाम विरोधी है. उन के सामने जिन देशों को उदाहरण के तौर पर ला कमीशन ने पेश किया है वे देश मुसलमानों के लिए प्रेरणा का स्रोत नहीं हो सकते. इसलिए कौन देश क्या कर रहा है, यह उस का अपना मामला है.

ला कमीशन ने भारतीय मामलों में एक से ज्यादा शादी पर अपना पक्ष पेश करते हुए कहा कि यहां मुसलमानों में एक से ज्यादा शादी का रिवाज बहुत आम नहीं है और एक से ज्यादा बीवियां रखने वालों की संख्या बहुत कम है. आमतौर पर भारतीय मुसलिम समाज में एक से अधिक शादी को बुरी निगाह से देखा जाता है और ऐसे व्यक्ति को उस के परिवार से बाहर के लोग अच्छी नजर से नहीं देखते हैं. इस के बावजूद कमीशन ने कहा कि फिलहाल ऐसी कोई तबदीली समाज में नहीं आ रही है और यह कि धार्मिक उलेमा इस सिलसिले में कानून में किसी सुधार के लिए तैयार नहीं हैं. धार्मिक तौर पर अति संवेदनशील मामला होने के कारण इस बाबत देश को किसी सुधार की इजाजत नहीं दी गई है. उलेमा मानते हैं कि जो लोग केवल शादी के लिए धर्म परिवर्तन करते हैं उन पर तो कानून का शिकंजा कसा जाए लेकिन जो लोग सोचसमझ कर इसलाम धर्म कबूल कर शादी करते हैं, उन्हें इस की इजाजत दी जानी चाहिए, अन्यथा ला कमीशन का यह सुझाव मुसलिम पर्सनल ला में हस्तक्षेप और गैरकानूनी एवं अलोकतांत्रिक है.

हम तो सच ही बोलेंगे…

किरण मजूमदार शा बायोकौन कंपनी की मैनेजिंग डाइरैक्टर और जानी मानी हस्ती हैं जिन की कही बात दूर तक जाती है और शायद इसीलिए उन्होंने ट्विटर पर अपना अकाउंट बना लिया, जिसे 14 लाख लोग फौलो करते हैं. अपनी सही बात बहुतों तक पहुंचे, इसीलिए उन्होंने नरेंद्र मोदी की टे्रन-18 जो दिल्ली से उन की संसदीय सीट वाराणसी के बीच चलनी शुरू हुई है और यह दावा किया जा रहा है कि 180 किलोमीटर की स्पीड पर चल रही है, पर एक सादा सा कमैंट कर दिया.

असल में पुलवामा की घटना के दिन ही नरेंद्र मोदी ने इस टे्रन का उद्घाटन किया था पर यह अगले ही दिन लौटते हुए रास्ते में खराब हो गई. इस पर किरण मजूमदार शा ने पूरी साफगोई के साथ कह डाला कि यह सरकारी इंटैग्रल कोच फैक्टरी की कार्यकुशलता का नमूना है. बस इतना कहना था कि उन पर सैकड़ों मोदी भक्त बरस पड़े. किसी ने कहा कि किरण शा कांग्रेस से राज्यसभा सीट चाहती हैं, किसी ने उन्हें विजय माल्या सा घोषित कर दिया, तो किसी ने उन्हें शेमलैस कहा, कुछ ने उन की कंपनी बायोकौन को घसीटना शुरू कर दिया, किसी ने उन्हें मानसिक बीमार घोषित कर दिया.

बेचारी किरण शा अपनी सफाई देतेदेते थकने लगीं और अंत में उन्होंने एक नए ट्वीट में माफी भी मांगी पर भगवाई ट्रोलों ने उन्हें फिर भी नहीं छोड़ा और उन के खेद पर और ज्यादा जोर से हमला जारी रखा. उन्हें अरबन नक्सल कहा गया और सलाह दी गई कि अपने काम से काम रखें. असल में यह आलोचना हुई इसलिए कि यह ट्रेन नरेंद्र मोदी के नाम के साथ जुड़ी है और दूसरों को मांबहन की भद्दी गालियां देने वाले अपने आराध्य से जुड़ी किसी भी बात पर भड़क उठते हैं. वे जानते हैं कि सच को छिपाने का सब से अच्छा तरीका है कि सच बोलने वाले को डांटो, गालियां दो, उस का इतिहास खोलो.

दिल्ली प्रैस की पत्रिकाएं यह अकसर झेलती हैं जब वे लोगों के भ्रम तोड़ कर उन्हें सच की तसवीर दिखाने की कोशिश करती हैं पर चूंकि पत्रिकाओं का प्लेटफौर्म ट्विटर की तरह का नहीं है, गालियां पत्रों, फोन वालों तक सीमित रहती हैं और एक गाली देने वाले के साथ दूसरे गाली देने वाले जुड़ नहीं पाते. किरण मजूमदार शा को समझना चाहिए कि ट्विटर जैसा प्लेटफौर्म लोकतांत्रिक नहीं है. यहां बहस नहीं होती. यहां गालियां दी जाती हैं और एक पूरा वर्ग गालियां देने में ऐक्सपर्ट हो गया है. यहां झूठ का जम कर प्रचार होता है और अगर अपना उल्लू सीधा करने वालों को जरूरत हो तो सैकड़ोंहजारों रीट्वीट एक झूठ के होते हैं और सच बालने वालों की बात दब कर रह जाती है.

लोकतंत्र में हरेक को कहने की छूट है पर यह छूट लोकतंत्र को बल तब ही देती है जब सत्य कहने पर भीड़ न टूटे. हमारा लोकतंत्र और हमारी विचारों की स्वतंत्रता आज उन के हाथों में गिरवी रखी जा चुकी है, जो किसी भी तरह सच को छिपा कर पाखंड और झूठ के सहारे उस समाज को थोपना चाहते हैं, जिस में अंधविश्वास, पूजापाठ, तंत्रमंत्र, अज्ञान, कुतर्क, गंद, गरीबी, वर्णव्यवस्था का भेद, औरतों को पैर की जूती, विधवाओं का सिर मुंडाना, गोत्रों के हिसाब से विवाह आदि कानूनन थोपे जा सकें. किरण मजूमदार शा जैसे साफ शब्दों में सही बात कहने वालों को अंधभक्तों का आक्रमण तो सहना ही होगा. किरण मजूमदार शा को सलाह तो यही है कि ऐसा प्लेटफौर्म जो बकवास को फिल्टर न कर सके, उन की उपस्थिति के लायक ही नहीं है. उन्हें ट्विटर, फेसबुक, व्हाट्सऐप आदि छोड़ देने चाहिए और कुछ कहना हो तो समाचारपत्रों और पत्रिकाओं का सहारा लेना चाहिए जहां जिम्मेदार संपादक बैठे होते हैं.

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