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आशीर्वाद (दूसरा भाग)

पिछले अंक में आप ने पढ़ा था: शादी के बाद मेनका को पता चला कि उस का पति अमित हरिद्वार के किसी गुरुजी का परम भक्त है. सुहागरात पर जब अमित ने मेनका को गुरुजी की लिखी एक किताब के उपदेश सुनाए तो वह ठगी सी रह गई. बाद में उन की एक बेटी भी हो गई पर अमित का अपने गुरुजी के प्रति मोह न छूटा. इस से मेनका की गुरुजी के प्रति नफरत बढ़ती जा रही थी. एक दिन अमित ने मेनका को हरिद्वार ले जाने की जिद की. अब पढि़ए आगे…

‘‘मैं नहीं जाऊंगी. तुम पता नहीं क्यों बारबार मुझे अपने गुरुजी के पास ले जाना चाहते हो जबकि मैं किसी गुरुवुरु के चक्कर में नहीं पड़ना चाहती. अखबारों में और टैलीविजन पर आएदिन अनेक गुरुओं की करतूतों का भंडाफोड़ होता रहता?है,’’ मेनका बोली.

‘‘सभी गुरु एकजैसे नहीं होते. आज मैं ने जब गुरुजी से फोन पर कहा कि आप के दर्शन करना चाहता हूं तो उन्होंने कहा कि मेनका को भी साथ लाना. हम उसे भी आशीर्वाद देना चाहते हैं.’’

‘‘मुझे किसी आशीर्वाद की जरूरत नहीं है. तुम ही चले जाना.’’

‘‘मैं ने गुरुजी को वचन दिया है कि तुम्हें जरूर ले कर आऊंगा. तुम्हें मेरी कसम मेनका, तुम्हें मेरे साथ चलना होगा. अगर इस बार भी तुम मेरे साथ नहीं गईं तो मैं वहीं गंगा में डूब जाऊंगा,’’ अमित ने अपना फैसला सुनाया.

यह सुन कर मेनका कांप कर रह गई. वह जानती थी कि अमित गुरुजी के चक्रव्यूह में बुरी तरह फंस चुका है. उस पर गुरुजी का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा है. वह भावुक भी है. अगर वह साथ न गई तो हो सकता है कि गुरुजी अमित को इतना बेइज्जत कर दें कि उस के सामने डूब कर मरने के अलावा कोई दूसरा रास्ता न बचे.

मेनका को मजबूरी में कहना पड़ा, ‘‘ऐसा मत कहो… मैं तुम्हारे साथ हरिद्वार चलूंगी.’’

अमित के चेहरे पर मुसकान फैल गई, ‘‘यह हुई न बात. मेनका, तुम्हें गुरुजी से मिल कर बहुत अच्छा लगेगा. वहां मुझे, तुम्हें और पिंकी को आशीर्वाद मिलेगा.’’

मेनका ने कोई जवाब नहीं दिया.

एक हफ्ते बाद अमित मेनका और पिंकी के साथ हरिद्वार जा पहुंचा. रेलवे स्टेशन से बाहर निकल कर उस ने एक आटोरिकशा किया और गुरुजी के आश्रम जा पहुंचा. शिष्यों ने उन के लिए एक कमरा खोल दिया.

सामान रख कर अमित ने मेनका से कहा, ‘‘कुछ देर आराम कर लेते हैं. शाम को गुरुजी से मिलेंगे और आरती देखेंगे. 2-3 दिन हरिद्वारऋषिकेश घूमेंगे.’’

शाम को तकरीबन 6 बजे अमित मेनका व पिंकी के साथ गुरुजी के कमरे के बाहर इंतजार में बैठ गया. कुछ देर बाद शिष्य ने उन को कमरे में भेजा.

कमरे में पहुंचते ही अमित ने हाथ जोड़ कर गुरुजी के चरणों में सिर रख दिया. मेनका ने भी चरण छू कर प्रणाम किया.

‘‘सदा सुखी रहो, सौभाग्यवती रहो,’’ गुरुजी ने आशीर्वाद दिया, ‘‘तुम्हारे घर में अपार सुख और वैभव आ रहा?है मेनका. तुम्हें जल्दी पुत्र रत्न भी प्राप्त होगा.

‘‘यह तुम्हारा पति अमित बहुत भोला और सीधासादा सच्चा इनसान है.’’

मेनका कुछ नहीं बोली.

गुरुजी ने मेनका की ओर देखते हुए कहा, ‘‘शाम की आरती में जरूर शामिल होना.’’

‘‘जी गुरुजी,’’ अमित ने तुरंत जवाब दिया.

शाम को साढ़े 7 बजे आश्रम के मंदिर में खूब जोरशोर से आरती हुई. गुरुजी और शिष्य आरती में लीन थे.

प्रसाद ले कर कमरे में लौट कर अमित ने कहा, ‘‘मुझे तो यहां आ कर बहुत अच्छा लगता है मेनका. तुम्हें कैसा लगा?’’

‘‘ठीक है.’’

कुछ देर बाद एक शिष्य ने आ कर कहा, ‘‘गुरुजी मेनका को बुला रहे हैं.’’

‘‘अभी आ रही है,’’ अमित बोला.

‘‘जाओ मेनका. लगता है, गुरुजी तुम्हें कुछ खास आशीर्वाद देना चाहते हैं.’’

‘‘मैं अकेली नहीं जाऊंगी,’’ मेनका ने कहा.

‘‘अरे मेनका, हम तो भाग्यशाली हैं. गुरुजी हमें बुला कर दर्शन और आशीर्वाद दे रहे हैं. बहुत से लोग तो इन से मिलने को तरसते रहते हैं. जाओ, देर न करो. पिंकी यहीं है मेरे पास,’’ अमित ने कहा.

मेनका को अकेले ही जाना पड़ा. वह धड़कते दिल से नमस्कार कर गुरुजी के सामने बैठ गई.

तख्त पर बैठे हुए गुरुजी ने उस की ओर देख कर कहा, ‘‘मेनका, तुम्हारा भविष्य बहुत ही उज्ज्वल है. जरा अपना हाथ दिखाओ. हम देखना चाहते हैं कि तुम्हारा भाग्य क्या कह रहा है?’’

मेनका ने न चाहते हुए भी गुरुजी की तरफ अपना हाथ बढ़ा दिया. उस की कोमल हथेली पकड़ कर गुरुजी गंभीर मुद्रा में खो गए.

मेनका के दिल की धड़कनें बढ़ने लगीं. उसे यह सब जरा भी अच्छा नहीं लग रहा था.

‘‘देखो मेनका, जब तक अमित तुम्हारे पास है तुम्हें बहुत सुख मिलेगा, पर…’’ कहतेकहते गुरुजी रुक गए.

‘‘लेकिन क्या गुरुजी…?’’ मेनका चौंकी.

‘‘अमित ज्यादा दिनों तक तुम्हारी जिंदगी में नहीं रहेगा. वह तुम्हारी जिंदगी से काफी दूर निकल जाएगा. बिना पति के पत्नी की हालत कटी पतंग की तरह होती है. यह तुम भी अच्छी तरह जानती हो. मुझे अमित और तुम्हारे बीच के संबंध के बारे में पूरी जानकारी है. जो तुम चाहती हो, वह नहीं चाहता.’’

‘‘गुरुजी, इस में गलती पर कौन है?’’ मेनका ने पूछा.

‘‘गलती पर कोई नहीं है. अपनेअपने सोचने का ढंग है. मैं तुम्हारे मन की हालत समझ रहा हूं. तुम एक प्यासी नदी की तरह हो मेनका. तुम सुंदर ही नहीं, बहुत सुंदर हो, पर तुम्हारे रूप का असर अमित पर जरा भी नहीं पड़ रहा है. अमित इस समय मेरे प्रभाव में है. अगर मैं चाहूं तो वह कभी भी सबकुछ छोड़ कर मेरी शरण में आ सकता है,’’ गुरुजी ने मेनका की ओर देखते हुए कहा.

‘‘आप कहना क्या चाहते हैं?’’

‘‘मेनका, तुम जितनी सुंदर हो, अमित उतना ही भोला है. वह तुम्हारी इच्छाओं को आज तक समझ नहीं पाया. तुम्हारा यह सुंदर रूप देख कर मेरी प्यास बढ़ गई है. मैं भी एक प्यासा सागर हूं,’’ कहते हुए गुरुजी ने मेनका की हथेली चूमनी चाही.

मेनका को लगा, जैसे उस के शरीर में कोई बिच्छू डंक मार देना चाहता है. उस ने एक झटके से अपना हाथ छुड़ा कर कहा, ‘‘यह क्या कर रहे हैं आप? यहां बुला कर आप ऐसी हरकतें करते हैं क्या?’’

‘‘मेनका, तुम्हें मेरी बात माननी होगी, नहीं तो तुम्हारा अमित तुम्हें छोड़ कर मेरी शरण में आ जाएगा. उस के बिना क्या तुम अकेली रह लोगी?’’

‘‘मैं अकेली रह लूंगी या नहीं, यह तो बाद की बात है, लेकिन मैं आप की असलियत जान चुकी हूं. इस देश में आप की तरह अनेक ढोंगी व पाखंडी गुरु हैं जिन के बारे में अखबारों में छपता रहता है.

‘‘अमित भोला है, पर मैं नहीं. मैं तो यहां आना ही नहीं चाहती थी. मुझे तो अमित की कसम के सामने मजबूर होना पड़ा. अब मैं आप के इस आश्रम में नहीं रहूंगी,’’ मेनका ने गुस्से में कहा.

यह सुनते ही गुरुजी खिलखिला कर हंस पड़े. मेनका हैरान सी गुरुजी की ओर देखती रह गई.

‘‘सचमुच तुम बहुत समझदार हो मेनका, तुम भोली नहीं हो. मैं तो तुम्हारा इम्तिहान ले रहा था. मैं यह देखना चाह रहा था कि तुम कितने पानी में हो. अब तुम जा सकती हो,’’ गुरुजी ने मेनका की ओर देखते हुए कहा.

मेनका बाहर निकली और तेजी से कमरे में लौट आई. आते ही मेनका ने कहा, ‘‘अब हम यहां नहीं रहेंगे.’’

‘‘क्यों, क्या बात हुई?’’ अमित ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘यह तुम्हारे गुरुजी भी उन ढोंगी बाबाओं की तरह हैं जो पकड़े जा रहे हैं. असलियत खुल जाने पर जिन की जगह आश्रम में नहीं, जेल में होती है. कई गुरु जेल में हैं. देखना, किसी न किसी दिन तुम्हारा यह ढोंगी गुरु भी जरूर पकड़ा जाएगा.’’

‘‘क्या हुआ? कुछ बताओ तो सही? तुम तो गुरुजी के पास आशीर्वाद लेने गई थीं, फिर क्या हो गया जो तुम गुरुजी के लिए ऐसे शब्द बोल रही हो?’’

‘‘मैं तो पहले ही यहां आने के लिए मना कर रही थी. पर तुम्हारी कसम ने मुझे मजबूर कर दिया,’’ कहते हुए मेनका ने पूरी घटना सुना दी.

अमित कुछ कहने ही वाला था, तभी एक शिष्य ने कमरे में आ कर कहा, ‘‘अमितजी, आप को गुरुजी बुला रहे हैं.’’

अमित शिष्य के साथ चल दिया.

मेनका धड़कते दिल से कमरे में बैठी रही. उस की आंखों के सामने बारबार गुरुजी का चेहरा और वह सीन याद आ रहा था, जब गुरुजी ने उस का हाथ पकड़ कर चूमना चाहा था. उस के मन में गुरुजी के प्रति नफरत भर उठी.

कुछ देर बाद अमित लौटा और बोल उठा, ‘‘मेनका, यह तुम ने अच्छा नहीं किया जो गुरुजी की बेइज्जती कर दी. गुरुजी ने तो तुम्हें आशीर्वाद देने के लिए बुलाया था लेकिन तुम ने गुरुजी की शान में ऐसी बातें कह दीं, जो नहीं कहनी चाहिए थीं. अब तुम्हें मेरे साथ चल कर गुरुजी से माफी मांगनी पड़ेगी.’’

यह सुन कर मेनका समझ गई कि गुरुजी ने अमित से झूठ बोल दिया है. वह बोली, ‘‘अमित, यहां आ कर तो मैं बेइज्जत हुई हूं. गुरुजी ने जो हरकत मेरे साथ की है, उस के बाद तो मैं ऐसे गुरु की शक्ल भी देखना नहीं चाहूंगी. माफी मांगने का तो सवाल ही नहीं उठता है.’’

अमित का भी पारा ऊपर चढ़ने लगा. वह मेनका को घूरता हुआ बोला, ‘‘मेनका, मुझे गुस्सा न दिलाओ. मेरे गुरुजी झूठ नहीं बोलते. मेरे साथ चल कर तुम्हें माफी मांगनी पड़ेगी.’’

‘‘मुझे नहीं जाना तुम्हारे ढोंगी गुरु के पास.’’

अमित अपने गुस्से पर काबू न रख सका. उस ने एक जोरदार थप्पड़ मेनका के मुंह पर दे मारा और कहा, ‘‘मैं तुम्हारी शक्ल भी देखना नहीं चाहता…’’

‘‘मैं यहां से चली जाऊंगी अपनी बेटी को ले कर. आज की रात किसी होटल में रुक जाऊंगी. कल सुबह होते ही बस या टे्रन से वापस मेरठ चली जाऊंगी. तुम चाहे जितने दिन बाद आना.

‘‘देख लेना किसी न किसी दिन इस ढोंगी गुरु की पोल भी खुलेगी और यह भी जेल में पहुंचेगा.’’

मेनका ने एक बैग में अपने व पिंकी के कपड़े भरे और पिंकी को गोद में उठा कर आश्रम से बाहर निकल गई.

मेनका एक होटल में पहुंची और एक कमरा ले कर बिस्तर पर कटे पेड़ की तरह गिर पड़ी.

आश्रम के कमरे में बैठे अमित को बारबार मेनका पर गुस्सा आ रहा था. मेनका ने गुरुजी की बेइज्जती कर दी. वह माफी मांगने भी नहीं गई. वह बहुत हठी है. न जाने खुद को क्या समझती है वह. चली जाएगी जहां जाना होगा, वह तो अब उस से कभी बात नहीं करेगा. उसे ऐसी पत्नी नहीं चाहिए जो गुरुजी और उस की बात ही न सुने. इस के लिए उसे तलाक भी लेना पड़े तो वह पीछे नहीं हटेगा.

(क्रमश:)

क्या मेनका और अमित की शादी वाकई तलाक के कगार तक जा पहुंची थी? क्या मेनका ने गुरुजी से माफी मांगी? पढि़ए अगले अंक में…

अधर में शिवराज

हालिया चुनावी हार से सदमे में डूबे शिवराज सिंह चौहान अपनी मौजूदा स्थिति को सहज तरीके से नहीं ले पा रहे हैं. अब उन्हें अपनी ही पार्टी से दरकिनार होने का भय सता रहा है.

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व भाजपा के वरिष्ठ नेता शिवराज सिंह चौहान 16 जनवरी को उज्जैन में थे, लेकिन इस बार हमेशा की तरह उन्होंने प्रसिद्ध महाकाल मंदिर में जा कर पूजापाठ और अभिषेक नहीं किया. उन के इर्दगिर्द पहले की तरह अधिकारियों, नेताओं और पत्रकारों का जमावड़ा नहीं था, बल्कि उन के समर्थक के तौर पर इनेगिने भाजपा कार्यकर्ता ही थे. शिवराज सिंह को अब जनता में भगवान दिखने लगा है.

यह स्वभाविक है कि 13 साल मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान विपक्ष के नेता भी नहीं हैं. वे विधायक ही रह जाते अगर भाजपा आलाकमान उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नहीं बनाता. हालांकि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने 2 और हारे राज्यों के मुख्यमंत्रियों राजस्थान से वसुंधरा राजे सिंधिया और छत्तीसगढ़ से रमन सिंह को भी पार्टी उपाध्यक्ष बनाया है जिस का मकसद इन तीनों को राज्यों से निकालना है. राष्ट्रीय राजनीति में लाना ही इस फैसले का मकसद है, यह लोकसभा चुनाव के वक्त पता चलेगा.

यह भी सच है कि प्रदेश के लोगों ने पूरी बेरहमी से भाजपा और शिवराज सिंह को नहीं नकारा है बल्कि 230 में से 109 सीटेें दे कर भाजपा और उन का थोड़ाबहुत लिहाज किया है. लेकिन आम लोगों को उन पर तरस ही आता है और दिलों में हमदर्दी भी पैदा होती है जब वे यह देखते हैं कि शिवराज सिंह चौहान अभी भी मुख्यमंत्रीपना छोड़ नहीं पा रहे हैं यानी अपनी स्थिति को सहज तरीके से नहीं ले पा रहे हैं. इस चक्कर में वे और असहज हो उठते हैं. वे कभी खुद को बाहुबली बताते हैं तो कभी कहते हैं कि टाइगर अभी जिंदा है.

पार्टी ने भी मुंह फेरा

भाजपा के यूज ऐंड थ्रो कल्चर का शिकार होने से शिवराज सिंह चौहान भी खुद को बचा नहीं पा रहे हैं.

वे चाहते हैं कि पार्टी की जो साख मध्य प्रदेश में बची है उस का श्रेय उन्हें ही दिया जाए, जबकि अमित शाह और नरेंद्र मोदी की जोड़ी अब उन से धीरेधीरे और कूटनीतिक तरीके से किनारा करने में लोकसभा चुनाव के मद्देनजर अपना फायदा देख रही है. इस में मोदीशाह का साथ अब तक हाशिए पर पड़े दूसरी पंक्तिके महत्त्वाकांक्षी नेता दे रहे हैं. इन में भी ब्राह्मण लौबी प्रमुख है जिस के अपने सटीक तर्क शिवराज सिंह चौहान को ले कर हैं.

भारी पड़ी ब्राह्मण लौबी

हार के बाद कई वजहें सभी ने गिनाईं लेकिन उमा भारती के नजदीकी माने जाने वाले नेता रघुनंदन शर्मा ने दोटूक कह डाला कि शिवराज सिंह चौहान का ‘माई के लाल’ वाला बयान और वायरल हुआ वीडियो हार की वजह रहा.

इस वीडियो में शिवराज सिंह चौहान दलितों के एक समारोह में हाथ उठा कर यह कहते नजर आ रहे हैं कि जब तक वे हैं तब तक कोई माई का लाल आरक्षण नहीं हटा सकता. इस वीडियो से नाराज सवर्णों ने भाजपा को वोट नहीं दिया और अपनी अलग पार्टी सपाक्स बना ली. चुनाव में उतर कर सपाक्स कुछ खास नहीं कर पाई, लेकिन उस ने भाजपा को खास नुकसान पहुंचाया.

शिवराज सिंह चौहान विपक्ष का नेता बनना चाहते थे लेकिन ब्राह्मण खेमे ने दूसरे नाम इस पद के लिए उछालने शुरू किए. इस पद के लिए जो 3 नाम उछले, हैरत की बात यह है कि वे सभी ब्राह्मणों के थे. मसलन, नरोत्तम मिश्रा, राजेंद्र शर्मा और गोपाल भार्गव.

जब बात मतदान के जरिए नेता प्रतिपक्ष चुनने की होने लगी तो मध्य प्रदेश का मसला निबटाने की जिम्मेदारी अमित शाह ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह को सौंपी जो भोपाल आए और पंडित गोपाल भार्गव को नेता प्रतिपक्ष बनवा गए.

16 जनवरी को उज्जैन में ही उन्होंने फिर अपनी मंशा जता दी कि वे प्रदेश की जनता की सेवा अपनी जान जाने तक करते रहेंगे. यह कोरी भावुकता नहीं थी लेकिन इसे व्यावहारिकता भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि धीरेधीरे शिवराज सिंह का कद पार्टी में बौना होता जा रहा है.

दिग्विजय जैसा हो रहा हाल

चमत्कारों में यकीन करने वाले शिवराज सिंह चौहान बारबार कमलनाथ सरकार को अल्पमत वाली सरकार कहते उस के गिरने का अंदेशा जताते रहते हैं क्योंकि कांग्रेस सरकार 2 बसपा, 1 सपा और 4 निर्दलीय विधायकों के समर्थन से चल रही है.

न केवल शिवराज सिंह चौहान, बल्कि पूरी भाजपा के सभी नेता कमलनाथ सरकार जल्द गिराने की बात कहते रहते हैं. लेकिन कमलनाथ के कानों पर ऐसे बयानों से जूं तक नहीं रेंगतीं. उलटे, कमलनाथ हर कभी भाजपा को अपना घर देखने की सलाह दे कर जता देते हैं कि 4-6 भाजपा विधायक फोड़ कर कांग्रेस में शामिल करना उन के लिए मुश्किल बात नहीं.

अब शिवराज सिंह चौहान अपनी उपयोगिता और महत्त्व दोनों बनाए रखना चाहते हैं. लेकिन इस के लिए उन के साथ किसी राष्ट्रीय नेता का समर्थन या आश्वासन नहीं है. भले ही शिवराज खेमे में 50 विधायक गिनाए जाते हों पर कांग्रेस और भाजपा में यह मौलिक और सनातनी फर्क कई बार उजागर हो चुका है कि भाजपा अपने नेताओं को पनपने नहीं देती.

इस का एक बेहतर उदाहरण मध्य प्रदेश की धाकड़ और फायरब्रैंड साध्वी उमा भारती हैं जिन्हें हुबली कांड के पहले मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देना पड़ा था. उमा भारती ने साल 2003 के चुनाव में भाजपा की शानदार वापसी मध्य प्रदेश में कराई थी लेकिन जब मुकदमे से निबट कर वे वापस आईं तो आलाकमान ने उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री नहीं बनाया. इस से गुस्साईं उमा भारती ने अपनी अलग भारतीय जनशक्ति पार्टी बना ली थी, लेकिन भाजपा का वोटबैंक वे नहीं तोड़ पाई थीं, इसलिए खामोशी से भाजपा में वापस आ गई थीं और अब केंद्रीय मंत्री हैं.

डेयरी और खेती हैं विकल्प

अब शिवराज सिंह चौहान क्या करेंगे, यह सवाल या जिज्ञासा अच्छेअच्छों को मथे डाल रही है. उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए जाने का फैसला आरएसएस का ज्यादा प्रतीत होता है क्योंकि वह लोकसभा चुनाव तक इन तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों को होल्ड पर रखना चाहता है. इस पद ने शिवराज सिंह का कद बढ़ाने के बजाय घटाया ही है क्योंकि यह सम्मान है तो वह छत्तीसगढ़ में 90 में से महज 15 सीटें हासिल कर भाजपा की फजीहत कराने वाले रमन सिंह को भी बख्शा गया है और 200 में से 73 सीटें लाने वाली वसुंधरा राजे को भी.

जाहिर है यह लोकसभा चुनाव तक के लिए एक वैकल्पिक व्यवस्था है. इस में शिवराज सिंह चौहान का रोल अहम इसलिए भी है कि वे आरएसएस के ज्यादा नजदीक हैं और उन के भविष्य के बारे में आखिरी फैसला मोहन भागवत को ही करना है जो 3 राज्यों की हार के बाद से खामोश हैं. हर कोई उन की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहा है. जब तक वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसे ऋषिमुनि नहीं बोलेंगे, तब तक, बस, बयानबाजी और कयासबाजी होती रहेगी.

यदि आरएसएस ने भी शिवराज सिंह को उन की प्रतिष्ठा व लोकप्रियता से परे उन की इच्छा के मुताबिक जगह नहीं दी तो उन के पास एकलौता रास्ता या सुनहरा मौका विदिशा का अपना जमींदारों जैसा फार्महाउस और डेयरी की देखभाल करने का बचेगा जिसे मुख्यमंत्री रहते उन्होंने दिल से बनाया है. आरोप या चर्चा यह भी है कि विदिशा में बैस टीला गांव से ले कर ढोलाखेड़ी तक की अधिकतर जमीनें शिवराज ने खरीद रखी हैं. जमीनों की पैदावार और विदेशी नस्लों वाली भैसों के दूध से ही उन्हें करोड़ों की आमदनी हो रही है.

कई मानों में दिग्विजय सिंह और शिवराज सिंह की हालत एक सी है. दिग्विजय सिंह अपने बेटे जयवर्धन सिंह की खातिर राहुल गांधी की घुड़कियां सुनते रहे थे तो अब अगर शिवराज सिंह भी कार्तिकेय को राजनीति में लाने की सोच रहे होंगे तो उन्हें भी कई समझौते करने पड़ेंगे. लेकिन ब्राह्मण लौबी उन का वजूद खत्म करने पर आमादा हो आई है, इस से वे कैसे निबटेंगे, यह देखना दिलचस्पी की बात होगी.

नाथ से भी खा रहे मात

हकीकत में कमलनाथ हर लिहाज से शिवराज सिंह पर भारी पड़ रहे हैं. इस की वजह कमलनाथ का तजरबा और प्रशासनिक क्षमता है. अपने चहेते छिंदवाड़ा से विधायक दीपक सक्सेना को प्रोटेम स्पीकर बनाते वक्त भी उन्होंने सख्त तेवर दिखाते शिवराज सिंह से कहा था कि मुझे कायदेकानून मत सिखाइए, मैं खुद लोकसभा का प्रोटेम स्पीकर रह चुका हूं. चुनाव के पहले जब भाजपाइयों ने कमलनाथ और शिवराज सिंह चौहान की दोस्ती की अफवाह उड़ाई थी और खुद शिवराज सिंह ने उन्हें दोस्त कहा था तो बेरुखी दिखाते कमलनाथ ने उन्हें नालायक दोस्त करार दिया था.

पहली दफा राजनीतिक दुर्दशा का शिकार हो रहे कल के इस कद्दावर नेता की हालत त्रिशंकु जैसी होती जा रही है, तो बात कतई हैरानी की नहीं, बल्कि एक सबक ही है कि चढ़ते सूरज को सभी सलाम करते हैं.  द्य

सिरफिरा आशिक

काफी हताश होने के बाद आखिर कन्नू लाल ने तय कर लिया कि अब वह अपने बेटे लल्लू को तलाश करने में समय बरबाद नहीं करेगा और इस के लिए पुलिस की मदद भी लेगा. यह बात उस ने अपनी पत्नी और रिश्तेदारों को भी बताई. फिर उसी शाम वह अपने पड़ोसी भानु को ले कर लुधियाना के थाना डिवीजन नंबर-2 की पुलिस चौकी जनकपुरी जा पहुंचा.कन्नू लाल मूलरूप से गांव मछली, जिला गोंडा, उत्तर प्रदेश का रहने वाला था. कई साल पहले वह काम की तलाश में अपने किसी रिश्तेदार के साथ लुधियाना आया था और काम मिल जाने के बाद यहीं का हो कर रह गया था. काम जम गया तो कन्नू लाल ने गांव से अपनी पत्नी कंचन और बच्चों को भी लुधियाना बुला लिया था.

लुधियाना में वह इंडस्ट्रियल एरिया में लक्ष्मी धर्मकांटा के पास अजीत अरोड़ा के बेहड़े में किराए का कमरा ले कर रहने लगा था. कन्नू लाल के 4 बच्चे थे, 2 बेटे और 2 बेटियां. बड़ी बेटी कुसुम 20 साल की थी और शादी के लायक थी. कन्नू लाल का सब से छोटा बेटा वरिंदर उर्फ लल्लू 11 साल का था, जो कक्षा-4 में पढ़ता था.

27 जुलाई, 2017 को लल्लू दोपहर को अपने स्कूल से लौटा और खाना खाने के बाद गली में बच्चों के साथ खेलने लगा. यह उस का रोज का नियम था. कन्नू की पत्नी कंचन और बाकी बच्चे घर में सो रहे थे. शाम करीब 4 बजे कंचन ने चाय बना कर लल्लू को बुलाने के लिए आवाज दी.

लेकिन लल्लू गली में नहीं था. लल्लू हमेशा अपने घर के आगे ही खेलता था, दूर नहीं जाता था. कंचन ने गली में खेल रहे बच्चों से पूछा तो सभी ने बताया कि लल्लू थोड़ी देर पहले तक उन के साथ खेल रहा था, पता नहीं बिना बताए कहां चला गया. चाय पीनी छोड़ कर सब लल्लू की तलाश में जुट गए.

शाम को जब लल्लू को पिता कन्नू लाल काम से लौट कर घर पहुंचा तो वह भी बेटे की तलाश में जुट गया. पूरी रात तलाशने के बाद भी लल्लू का कहीं पता नहीं चला. सभी यह सोच कर हैरान थे कि आखिर 11 साल का बच्चा अकेला कहां जा सकता है. इस के पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था.

अगला दिन भी लल्लू की तलाश में गुजरा. शाम को कन्नू लाल ने लल्लू की गुमशुदगी पुलिस चौकी में दर्ज करा दी. ड्यूटी अफसर हवलदार भूपिंदर सिंह ने धारा 146 के तहत कन्नू की गुमशुदगी दर्ज कर के यह सूचना अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी. साथ ही लल्लू का हुलिया और उस का फोटो आसपास के सभी थानों में भेज दिया गया.

लल्लू की तलाश में न तो पुलिस ने कोई कसर छोड़ी और न उस के मातापिता और रिश्तेदारों ने. पर लल्लू का कहीं से कोई सुराग नहीं मिला. कन्नू लाल गरीब मजदूर था, जो दिनरात मेहनत कर के अपने बच्चों का पालनपोषण करता था, इसलिए फिरौती का तो सवाल ही नहीं था. हां, दुश्मनी की बात सोची जा सकती थी.

दुश्मनी के चक्कर में कोई लल्लू को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर सकता था, इसीलिए पुलिस बारबार कन्नू से यह पूछ रही थी कि उस का किसी से लड़ाईझगड़ा तो नहीं है. लल्लू को गुम हुए एक सप्ताह गुजर चुका था पर कहीं से भी उस का कोई सुराग नहीं मिला.

घटना के 9 दिन बाद अचानक कन्नू लाल के मोबाइल फोन पर एक शख्स का फोन आया. फोन करने वाले का कहना था कि लल्लू उस के कब्जे में है. अगर बेटा सहीसलामत और जिंदा चाहिए तो 2 लाख रुपया बैंक एकाउंट नंबर 0003333 में डलवा दो. लल्लू मिल जाएगा.

कन्नू लाल ने तुरंत इस फोन की सूचना पुलिस को दे दी. अब मामला केवल लल्लू की गुमशुदगी का नहीं रह गया था. उस का अपहरण फिरौती के लिए किया गया था सो पुलिस हरकत में आ गई. एडीसीपी गुरप्रीत सिंह के सुपरविजन में एक टीम का गठन किया गया, जिस का इंचार्ज एसीपी वरियाम सिंह को बनाया गया. पुलिस ने पहले दर्ज मामले में धारा 365 और 384 भी जोड़ दीं.

अपहरण के 9 दिन बाद 4 अगस्त को लल्लू के पिता कन्नू लाल के मोबाइल पर फोन कर के 2 लाख रुपए फिरौती मांगने के बाद फोनकर्ता ने नंबर स्विच्ड औफ कर दिया था. जांच आगे बढ़ाते हुए कन्नू लाल के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई गई. साथ ही उस के फोन को सर्विलांस पर भी लगा दिया गया.

काल डिटेल्स से पता चला कि कन्नू लाल को स्थानीय बसअड्डे से फोन किया गया था. यह सोच कर तुरंत एक पुलिस टीम वहां भेजी गई कि हो न हो कोई संदिग्ध मिल जाए, क्योंकि बसअड्डा क्षेत्र काफी बड़ा और भीड़भाड़ वाला इलाका था. पास में ही रेलवे स्टेशन भी था. लेकिन वहां पुलिस को कुछ नहीं मिला.

पुलिस यह मान कर चल रही थी कि लल्लू का अपहरणकर्ता जो भी रहा हो, वह कन्नू लाल का कोई नजदीकी या फिर रिश्तेदार ही होगा. क्योंकि अपहरणकर्ता ने जो 2 लाख रुपए की फिरौती मांगी थी, वह कन्नू लाल की हैसियत देख कर ही मांगी थी.

भले ही कन्नू लाल गरीब था, पर अपने बच्चे के लिए 2 लाख का इंतजाम तो कर ही सकता था. इस के लिए उसे गांव की जमीन भी बेचनी पड़ती तो वह भी बेच देता. अपहर्त्ता जो भी था, कन्नू के परिवार को गांव तक जानता था.

इस सोच के बाद पुलिस ने कन्नू लाल और उस के परिवार के हर छोटेबड़े सदस्य से पूछताछ की. कुछ खबरें पड़ोसियों से भी ली गईं. मुखबिरों का भी सहारा लिया गया. आखिर अंदर की बात पता चल ही गई. इस से पुलिस को लगने लगा कि अब वह जल्द ही अपरहणकर्ता तक पहुंच कर लल्लू को सकुशल बचा लेगी.

कन्नू लाल के परिवार से पता चला कि कुछ दिन पहले उन का अजमल आलम से झगड़ा हुआ था. 30 वर्षीय अजमल आलम उन के पड़ोस में ही रहता था और कपड़े पर कढ़ाई का बहुत अच्छा कारीगर था. उस की कमाई भी अच्छी थी और उस का कन्नू के घर काफी आनाजाना था. वह उस के परिवार के काफी करीब था और सभी बच्चों से घुलामिला हुआ था. खासकर कन्नू की बड़ी बेटी कुसुम से. 7 साल पहले जब अजमल आलम की उम्र करीब 22-23 साल थी और कुसुम की 14 साल तभी दोनों एकदूसरे के करीब आ गए थे.

अजमल मूलरूप से गांव भयंकर दोबारी, जिला किशनगंज, बिहार का रहने वाला था. 7 साल पहले उस ने खुद को अविवाहित बता कर कुसुम को अपने प्रेमजाल में फांस लिया था. इस के 2 साल बाद उस ने कुसुम से शादी करने का झांसा दे कर उस से शारीरिक संबंध भी बना लिए थे. यह सिलसिला अभी तक चलता रहा था.

कह सकते हैं कि उस ने 7 वर्ष तक कुसुम का इस्तेमाल अपनी पत्नी की तरह किया था. अजमल से कुसुम के संबंध कितने गहरे हैं, यह बात कन्नू और उस की पत्नी कंचन को भी पता थी.

उन की नजरों में अजमल अविवाहित था और अच्छा कमाता था. वह कुसुम से बहुत प्यार करता था और शादी करना चाहता था. कन्नू लाल और उस की पत्नी कंचन को इस पर कोई ऐतराज नहीं था. फलस्वरूप जैसा चल रहा था, उन्होंने वैसा चलने दिया. उन लोगों ने न कभी बेटी पर कोई अंकुश लगाया और न अजमल को अपने घर आने से रोका.

जून 2018 में अचानक किसी के माध्यम से कंचन और कुसुम को पता चला कि अजमल पहले से ही शादीशुदा और 2 बच्चों का बाप था. इतनी बड़ी बात छिपा कर वह कुसुम के साथ लगातार 7 सालों तक दुष्कर्म करता रहा था.

हकीकत जान कर मांबेटी के होश उड़ गए. उस समय अजमल अपने कमरे पर ही था. कुसुम और कंचन ने जा कर उस के साथ झगड़ा किया और उस की खूब पिटाई की. यह बात मोहल्ले की पंचायत तक भी पहुंची. पंचायत के कहने पर कंचन ने अजमल को धक्के मार कर मोहल्ले से बाहर निकाल दिया.

अजमल ने भी वहां से चुपचाप चले जाने में ही अपनी भलाई समझी. क्योंकि मोहल्ले वालों के सामने हुई जबरदस्त बेइज्जती के बाद वह वहां नहीं रह सकता था, इसलिए वह अपना सामान लिए बिना मोहल्ले से चला गया था.

यह कहानी जान लेने के बाद पुलिस को लगा कि लल्लू के अपहरण के पीछे अजमल का ही हाथ हो सकता है. कुसुम वाले मामले में उस की काफी बेइज्जती हुई थी. यहां तक कि उसे अपना घर भी छोड़ कर भागना पड़ा था. बदला लेने के लिए वह कुछ भी कर सकता था.

कन्नू के परिवार के पास अजमल का फोन नंबर था. पुलिस ने वह नंबर सर्विलांस पर लगवा दिया और उस की लोकेशन ट्रेस करने की कोशिश करने लगी.

कन्नू को किए गए पहले फोन के 2 दिन बाद फोन कर के उस से दोबारा पैसों की मांग की गई. इस बार फोन कैथल, हरियाणा से आया था. पुलिस टीम फोन की लोकेशन ट्रेस करते हुए जब कैथल पहुंची तो कन्नू को दिल्ली से फोन किया गया. इस बार फोन करने वाले ने रुपयों की मांग के साथ कुसुम से बात करने की भी इच्छा जताई तो साफ हो गया कि लल्लू के अपरहण में अजमल का ही हाथ है. इस के बाद वह कन्नू को बारबार मैसेज करता रहा.

अजमल को पकड़ने के लिए पुलिस की टीमों ने कैथल व दिल्ली में एक साथ 15 जगह रेड डाली लेकिन कुछ हाथ नहीं लगा. अब तक की जांच में सामने आया कि जो बैंक खाता नंबर उस ने फिरौती के पैसे डलवाने के लिए दिया था, वह लुधियाना के एक युवक का था.

खास बात यह कि उस युवक से अजमल की दूरदूर तक कोई जानपहचान नहीं थी. फिर भी पुलिस ने उसे शक के दायरे में ही रखा. आखिर लंबे चले इस चोरसिपाही के खेल के बाद पुलिस ने अजमल की फोन लोकेशन का पीछा करते हुए उसे 8 अगस्त को दिल्ली से धर दबोचा.

अगले दिन 9 अगस्त को पुलिस ने अजमल को अदालत में पेश कर के लल्लू की बरामदगी और आगामी पूछताछ के लिए उसे 5 दिन के पुलिस रिमांड पर ले लिया. पूछताछ के दौरान अजमल ने बताया कि लल्लू की हत्या उस ने उसी दिन यानी 27 जुलाई को ही कर दी थी और उस की लाश को सतलुज नदी में बहा दिया था.

उस ने बताया कि मोहल्ले से बेइज्जत होने के बाद वह अपनी बहन के पास कैथल चला गया था. लेकिन कुसुम के बिना उस का मन नहीं लग रहा था. उस ने कुसुम से प्यार किया था और वह भी उसे प्यार करती थी, लेकिन अब उस ने बेवफाई की थी.

उस का मन बारबार कहता था कि कुसुम और उस की मां से बेइज्जती का हिसाब लिया जाए. इस के लिए वह लुधियाना छोड़ कर जाने के डेढ़ महीने बाद 27 जुलाई को ट्रेन से लुधियाना आया. दोपहर को जब लल्लू स्कूल से वापस घर जा रहा था तो उस ने उसे रोक कर साथ चलने को कहा, लेकिन उस ने मना कर दिया और घर जा कर अपनी बहन को उस के आने की सूचना दी.

बाद में जब लल्लू खेलने के लिए घर से बाहर निकला तो उस ने लल्लू को घुमाने का लालच दिया और आटो में बिठा कर सतलुज नदी पर ले गया. नदी पर पहुंच कर अजमल ने लल्लू को नदी में नहाने और तैरना सिखाने के लिए उकसाया.

जब लल्लू नहाने के लिए कपड़े उतार कर अजमल के साथ दरिया में घुसा तो अजमल ने नहाते समय लल्लू की गरदन पकड़ कर उसे पानी में डुबो कर मार दिया और उस की लाश पानी में बहा कर बस द्वारा वापस कैथल चला गया. बाद में वह दिल्ली पहुंच गया था. वहीं से वह कन्नू को फोन पर एसएमएस भेजता था.

अजमल की निशानदेही पर पुलिस ने सतलुज में गोताखोरों की टीम को उतारा. पर लल्लू की लाश नहीं मिली. बरसात के दिन होने के कारण नदी में पानी का तेज बहाव था. ऐसे में संभव था कि लाश पानी में तैरती हुई कहीं दूर निकल गई हो. पुलिस लल्लू की लाश को कई दिनों तक नदी में दूरदूर तक तलाशती रही लेकिन लाश नहीं मिली.

रिमांड की अवधि खत्म होने के बाद 13 अगस्त, 2018 को अजमल को फिर से अदालत में पेश कर के न्यायिक हिरासत में जिला जेल भेज दिया गया. खेलखेल में लल्लू की गुमशुदगी से शुरू हुआ यह ड्रामा अंत में इतने भयानक अंजाम तक पहुंचेगा, इस बात की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी.  ?

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कुसुम परिवर्तित नाम है.

उपमा मिक्स ढोकला

सामग्री

– 3/4 कप उपमा रेडी मिक्स आटा

– 1/4 कप गाढ़ा दही

– 1/2 कप कुनकुना पानी

– 1 छोटा चम्मच इनो फ्रूट साल्

– 1 बड़ा चम्मच रिफाइंड औयल

सामग्री तड़के की

–  1 छोटा चम्मच राई

– 1 छोटा चम्मच जीरा

– थोड़ा सा हींग पाउडर

– 9-10 करीपत्ते

–  2 हरीमिर्चें बीच से चीरी हुईं

– 1 बड़ा चम्मच रिफाइंड औयल

बनाने की विधि

– उपमा रैडी मिक्स आटे में दही और गुनगुना पानी मिला कर 10 मिनट के लिए ढक कर रख दें.

– यदि पानी कम लगे तो थोड़ा और मिला लें.

– फिर इस में गुनगुना रिफाइंड औयल और ईनो फू्रट साल्ट मिलाएं.

– चिकनाई लगे डब्बे में10 मिनट भाप में पकाएं.

– तड़का लगा कर मनचाहे आकार में काट कर सर्व करें.

पोटैटो चंक्स विद वड़ा पाउडर मिक्स

सामग्री

– 2/3 कप वड़ा पाउडर मिक्स

– 20 छोटे आलू उबले

– 2 बड़े चम्मच हरी चटनी

– 2 छोटे चम्मच अदरक व हरीमिर्च पेस्ट

– थोड़ी सी धनियापत्ती बारीक कटी

– चंक्स तलने के लिए रिफाइंड औयल

–  नमक स्वादानुसार

बनाने की विधि

– रैडी मिक्स वड़ा पाउडर के आटे को पानी से गाढ़ा घोल कर ढक कर 15 मिनट रखें.

– प्रत्येक उबले आलू में बीच में थोड़ा चीरा लगा कर हरी चटनी लगा दें.

– वडे़ वाले मिश्रण में अदरक व हरीमिर्च पेस्ट, धनियापत्ती व नमक मिलाएं.

– प्रत्येक आलू को इस मिश्रण में डिप कर तेल में सुनहरा तल लें.

– चटनी या सौस के साथ सर्व करें.

जानिए सुबह से पानी पीने के फायदे

अच्छे स्वास्थ की चाबी है पानी. अगर आप हमेशा स्वस्थ रहना चाहते हैं तो जरूरी है कि आप खूब पानी पिएं. पानी का भरपूर इस्तेमाल आपको कई तरह की बीमारियों से दूर रखता है, साथ में कई महत्वपूर्ण अंगों की भी रक्षा करता है. शरीर के तापमान को नियंत्रित करने में भी पानी का अहम योगदान है.

सुबह जागने के बाद सबसे पहले पानी पीना जरूरी होता है. चूंकि रात में सोने के बाद हम पानी नहीं पीते, सुबह तक शरीर में पानी की जरूरत आ पड़ती है. इसलिए जरूरी है कि सुबह में जागते ही पानी पीया जाए. इस खबर में हम आपको सुबह में जागते ही पानी पीने के फायदों के बारे में बताएंगे.

सुबह जागते ही पानी पीने से शरीर में मौजूद बहुत से विषैले पदार्थ बाहर निकल जाते हैं. इससे खून साफ होता है. स्वच्छ खून से त्वचा पर चमक रहती है.

शरीर की इम्यूनिटी के लिए भी पानी काफी लाभकारी होता है. जानकारों की माने तो सुबह खाली पेट पानी पीने से सिर दर्द, शरीर दर्द, ह्रदय की बीमारियों, तेज ह्रदय गति, एपिलेप्सी, अत्यधिक मोटापे, अस्थमा, टीबी, किडनी व यूरीन की बीमारियां, उल्टी, गैस, डायबिटीज, डायरिया, पाइल्स, कब्ज, कैंसर, आंख, नाक, कान और गले संबंधी परेशानियां नहीं होती.

अगर आप अपना वजन कंट्रोल में रखना चाहते हैं तो सुबह जागते ही पानी पीना बेहद जरूरी है. ऐसा करने से शरीर की मेटाबौलिज्म एक्टिविटीज अच्छे से होती हैं और शरीर की नई कोशिकाओं का निर्माण भी होता है. मांसपेशियां मजबूत होती हैं, मासिक धर्म, आंखों, पेशाब और किडनी संबंधी कई समस्याएं शरीर से दूर रहती हैं.

स्वस्थ दांतों का राज

मुसकुराता चेहरा हर किसी को अच्छा लगता है और मुसकराहट का आकर्षण बढ़ाते हैं इंसान के साफ, सेहतमंद दांत. चेहरे को खूबसूरती सिर्फ आंखें व आप के होंठ ही नहीं बयां करते बल्कि मोती जैसे चमचमाते दांत भी चेहरे और मुसकान को सुंदर बनाते हैं. ऐसे में चेहरे और मुसकान को तरोताजा रखने के लिए दांतों की सेहत के बारे में हरेक को जानकारी होनी जरूरी है.

दांतों में दिक्कतें कैसीकैसी और क्यों हो सकती हैं, साथ ही उन का हल क्या है, इन सब व इन के अलावा दांतों की सेहत से जुड़ी और भी बहुत सी जानकारी से आप भी रूबरू हों.

दांत क्यों होते हैं खराब

जब दांत पर अम्ल का हमला होता है तो दांत की ऊपरी परत यानी एनेमल समय के साथसाथ हटनी शुरू हो जाती है. इस के बाद दूसरी पूरत यानी डैंटीन भी हटनी शुरू हो जाती है. फिर नस यानी पल्प अम्ल के संपर्क में आ सकती है. तब रूट कैनाल के उपचार की जरूरत पड़ती है.

बीमारी पनपने के क्या हैं संकेत

ठंडे या गरम पदार्थ से दांतों में तकलीफ महसूस होना, दांत का दर्द जो आता व जाता है, ऐसा दर्द जो रात को जगाए रखता है और जबड़े में या चारों ओर सूजन होना आदि दांतों में रोग के पनपने के इशारे हैं.

किन कारणों से होता है नुकसान

तंबाकू चबाने से दांत घिस जाते हैं. चोट लगने की वजह से दांत टूट सकते हैं. खानपान की गलत आदतें, जैसे मीठा खाने के बाद दांत साफ न करने से दांतों को नुकसान पहुंचता है. ब्रश न करना या ब्रश करने का गलत तरीका अपनाने से भी दांतों को नुकसान पहुंचता है. स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों, जैसे डायबीटिज, सूखा मुंह, कई दवाओं का सेवन करने आदि से भी दांतों को क्षति पहुंचती है.

कैसे रोकें

हर 6 महीने में बीडीएस या एमडीएस डाक्टर से दांतों की जांच कराई जानी चाहिए. सुबह व शाम का खाना खाने के बाद ब्रश करना चाहिए. ब्रश करने का तरीका सही होना चाहिए, इस के लिए डाक्टर से जानकारी ली जा सकती है. दांत अगर खराब हो गए हैं तो जल्द ही उन में फिलिंग करवा लेनी चाहिए.

खाने में अधिक अम्ल वाले पदार्थ, कोला व अधिक मीठे पदार्थ का सेवन कम करना चाहिए. मसूढ़े छोड़ने की स्थिति में या सर्जरी के बाद इंटरडैंटल ब्रश का प्रयोग करना चाहिए आदि.

रूट कैनाल का उपचार

रूट कैनाल के उपचार में संक्रमित नसों को निकाल कर कैनाल को साफ किया जाता है, फिर कैनाल को निष्क्रिय पदार्थ से भर दिया जाता है और उस के बाद मसाला भर दिया जाता है. पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद कि दांत पूरी तरह संक्रमण रहित हो गया है व दांत के आसपास दर्द व सूजन नहीं है, दांत के ऊपर कैप लगाई जाती है. कभीकभी एंटीबायोटिक्स और दर्दनिवारक दवाओं की जरूरत पड़ सकती है.

रूट कैनाल का उपचार लगभग 1 से 5 सिटिंग में पूरा होता है. इस के बारे में दांत की स्थिति देख कर दांतों का डाक्टर ही बता सकता है.

कब तक चलेगा रूट कैनाल द्वारा उपचारित दांत

आमतौर पर रूट कैनाल द्वारा उपचारित दांत 8-10 वर्ष तक चल सकता है. यदि दांत में कोई समस्या आती है तो कैप को निकाल कर फिर रूट कैनाल का उपचार कर कैप लगाई जा सकती है. इस में दांत को नुकसान नहीं पहुंचता है.

क्या है दांतों की ब्लीचिंग

ब्लीचिंग दांतों को साफ, सफेद व चमकदार बनाने का तरीका है. जिन लोगों के दांत पीले या पीलेभूरे की तरह हैं, उन के लिए यह तरीका काफी फायदेमंद है. धब्बे जो सौफ्टड्रिंक या तंबाकू पीने से या दवाओं के सेवन से होते हैं, उन का इस तरीके से उपचार किया जा सकता है?

कैसे की जाती है ब्लीचिंग

इस के 3 तरीके हैं – इनऔफिस ब्लीचिंग, होम ब्लीचिंग और सफेद करने वाले टूथपेस्ट.

इनऔफिस ब्लीचिंग : यह एक घंटे की प्रक्रिया है. इस में ब्लीचिंग का पदार्थ सामने के ऊपर व नीचे वाले दांतों से बाहरी भाग पर लगाया जाता है. ब्लीचिंग के प्रभाव को गहराई से व जल्दी करने के लिए लेजर लाइट या ब्लीचिंग और्क का इस्तेमाल किया जाता है. इस प्रक्रिया में 20 मिनट लगते हैं. 2-3 बार ऐसा करने के बाद असर दिखाई देने लगता है. इस से कुछ देर के लिए मसूढ़ों पर खुजली हो सकती है.

होम ब्लीचिंग : इस में डैंटिस्ट एक ट्रे देता है जिस में ब्लीचिंग पदार्थ (10 से 12 फीसदी कार्बेमाइड परऔक्साइड) डाल कर प्रयोग किया जाता है. 7 से 14 दिनों के लिए इस का प्रयोग किया जाता है. इस में खर्चा कम होता है. लेकिन डाक्टर की देखरेख में न होने के चलते इस में परेशानी आ सकती है.

दांत सफेद करने वाले टूथपेस्ट : इन का प्रभाव थोड़ा व कुछ समय के लिए होता है. इनऔफिस ब्लीच के बाद इन टूथपेस्ट का प्रयोग किया जा सकता है, ताकि दांतों को सफेद व चमकदार रखा जा सके.

दांतों का रंग 2 तरह से खराब हो सकता है-

  • बाहरी तौर पर, जैसे कौफी, चाय, शराब या भोजन में केसर के सेवन से.
  • अंदरूनी तौर पर, जैसे पानी में अधिक फ्लोराइड होने से, एंटीबायोटिक्स जैसे ट्रैट्रासाइक्लीन अधिक लेने से, दांतों पर चोट लगने से (यदि नस को नुकसान पहुंचता है), आनुवंशिकता जो एनेमल को प्रभावित करती है. दांतों का रंग बदलना उम्र से भी संबंधित हो सकता है.

उपचार के लिए क्या करें

बाहरी तौर पर खराब हुए दांतों की सफाई की जा सकती है. अंदरूनी तौर पर खराब दांतों का उपचार डैंटिस्ट से कराएं. यदि जरूरी होता है तो आप के दांत की ऊपरी परत (एनेमल) की 0.5-1.5 एमएम परत हटा कर पोर्सलेन विनियर या कंपोजिट विनियर लगाया जा सकता है.

पोर्सलेन व कंपोजिट विनियर में से अच्छा कौन

कंपोजिट विनियर में दांत को कम घिसना पड़ता है, लेकिन यह कम समय चलता है और रंग भी बदल सकता है. पोर्सलेन विनियर का रंग जल्दी नहीं बदलता और यह अधिक समय चलता है. लेकिन यह महंगा पड़ता है और दांतों को अधिक घिसना पड़ता है.

बहरहाल, हर उम्र के इंसान को अपने दांतों को सेहतमंद रखने के लिए जरूरी यह है कि वह सुबह व रात को सोने से पहले ब्रश करे. इस से दांत साफ रहेंगे. बच्चों में तो बचपन से ही यह आदत डाल देनी चाहिए.

:प्रोफैसर डा. महेश वर्मा

(पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित लेखक मौलाना आजाद इंस्ट्टियूट औफ डैंटल साइंसेज, दिल्ली में डायरैक्टर व प्रिंसिपल हैं)   

पिंपल से पाएं छुटकारा

क्‍या अब आप भी अपने चेहरे पर निकलने वाले पिंपल से तंग आ चुकी हैं और कई उपाय करके थक चुकी हैं. आपको किसी भी उपाय का संतोषजनक परिणाम नहीं मिल रहा तो कुछ ऐसे घरेलू उपचार कीजिये जिससे यह निकलना बंद हो जाए. वैसे अगर यह ज्‍याद मात्रा में निकल रहे हैं, तो किसी अच्‍छे त्वचा विशेषज्ञ का परामर्श लें. चेहरे पर एक्‍ने तभी होते हैं, जब ब्‍लैकहेड होते हैं और यह तब होता है जब त्‍वचा के पोर्स में तेल जमा हो जाता है. आइये जानते हैं कि हम पिंपल को किस तरह से दूर कर सकते हैं.

– संतरा ना केवल स्‍वास्‍थ्‍य के लिये ही अच्‍छा माना जाता है बल्कि इसका छिलका पिंपल को भगाने में भी काफी लाभदायक होता है. इसके छिलके को पीस लीजिये और उसमें कुछ बूंदे गुलाब जल की मिला कर चेहरे पर नियमित रूप से लगाएं.

– नींबू का रस और मूंगफली का तेल मिला कर अपने चेहरे पर लगाएं जिससे चेहरे पर ब्‍लैकहेड ना होने पाए.

– मिंट का रस अपने चेहरे पर रात भर लगाए रखें, जिससे पिंपल से राहत मिले.

– मेथी की पत्‍तियां लें और उसका पेस्‍ट बना लें. इस पेस्‍ट को रोज रात में 15 मिनट के लिये अपने चेहरे पर लगाएं और उसके बाद चेहरे को धो लें.

एक फेस वाश बनाइये जिसमें नींबू का रस और कच्‍चा दूध मिलाइये. इससे अपने चेहरे को साफ कीजिये.

– टमाटर के गूदे को लेकर अपने चेहरे पर 45 मिनट तक लगाए रखिये और उसके बाद चेहरा धो लीजिये.

– गुलाबजल लीजिये और उसमें चंदन पाउडर मिला कर चेहरे पर लगाइये. उसके बाद चेहरे को 20 मिनट के बाद धो लीजिये.

– जायफल के कुछ टुकड़े लें और उसमें कुछ बूंद कच्‍चे दूध का मिला कर अपने मुहासे पर लगा दें. इसको लगाने के बाद दो घंटे बाद चेहरा धो लें.

– दालचीनी पाउडर और शहद के मिश्रण को बना कर अपने चेहरे के पिंपल पर रात को सोने से पहले लगाएं. उसके बाद सुबह उठ कर चेहरा हल्‍के गरम पानी से धो लें. ऐसा रोज करने पर पिंपल में कमी हो जाएगी.

– हल्‍दी पाउडर लें और उसमें नीम की पिसी हुई पत्‍ती मिलाएं. इस पेस्‍ट को चेहरे पर लगाएं तथा आधा घंटे तक छोड़ने के बाद चेहरा धो लें.

आशीर्वाद (पहला भाग) : क्यों टूटे मेनका के सारे सपने

दोपहर का खाना खा कर मेनका थोड़ी देर आराम करने के लिए कमरे में आई ही थी कि तभी दरवाजे की घंटी बज उठी.

मेनका ने झल्लाते हुए दरवाजा खोला. सामने डाकिया खड़ा था.

डाकिए ने उसे नमस्ते की और पैकेट देते हुए कहा, ‘‘मैडम, आप की रजिस्टर्ड डाक है.’’

मेनका ने पैकेट लिया और दरवाजा बंद कर कमरे में आ गई. वह पैकेट देखते ही समझ गई कि इस में एक किताब है. पैकेट पर भेजने वाले गुरुजी के हरिद्वार आश्रम का पता लिखा हुआ था.

मेनका की जरा भी इच्छा नहीं हुई कि वह उस किताब को खोल कर देखे या पढ़े. वह जानती थी कि यह किताब गुरु सदानंद ने लिखी है. सदानंद उस के पति अमित का गुरु था. वह उठतेबैठते, सोतेजागते हर समय गुरुजी की ही बातें करता था, जबकि मेनका किसी गुरुजी को नहीं मानती थी.

मेनका ने किताब का पैकेट एक तरफ रख दिया. अजीब सी कड़वाहट उस के मन में भर गई. उस ने बिस्तर पर लेट कर आंखें बंद कर लीं. साथ में उस की 3 साल की बेटी पिंकी सो रही थी.

मेनका समझ नहीं पा रही थी कि उसे अमित जैसा अपने गुरु का अंधभक्त जीवनसाथी मिला है तो इस में किसे दोष दिया जाए?

शादी से पहले मेनका ने अपने सपनों के राजकुमार के पता नहीं कैसेकैसे सपने देखे थे. सोचा था कि शादी के बाद वह अपने पति के साथ हनीमून पर शिमला, मसूरी या नैनीताल जाएगी. पहाड़ों की खूबसूरत वादियों में उन दोनों का यादगार हनीमून होगा.

मेनका के सारे सपने शादी की पहली रात को ही टूट गए थे. उस रात वह अमित का इंतजार कर रही थी. काफी देर के बाद अमित कमरे में आया था.

अमित ने आते ही कहा था, ‘देखो मेनका, आज की रात का हर कोई बहुत बेचैनी से इंतजार करता है पर मैं उन में से नहीं हूं. मेरा खुद पर बहुत कंट्रोल है.’

मेनका चुपचाप सुन रही थी.

‘सदानंद मेरे गुरुजी हैं. हरिद्वार में उन का बहुत बड़ा आश्रम है. मैं कई सालों से उन का भक्त हूं. उन के उपदेश मैं ने कई बार सुने हैं. उन की इच्छा के खिलाफ मैं कुछ भी करने की सोच ही नहीं सकता.

‘मैं ने तो गुरुजी से कह दिया था कि मैं शादी नहीं करना चाहता पर गुरुजी ने कहा था कि शादी जरूर करो तो मैं ने कर ली.’

मेनका चुपचाप अमित की ओर देख रही थी.

अमित ने आगे कहा था, ‘देखो मेनका, आज की रात हमारी अनोखी रात होगी. हम नए ढंग से शादीशुदा जिंदगी की पहली रात मनाएंगे. मेरे पास गुरुजी की कई किताबें हैं. मैं तुम्हें एक किताब से गुरुजी के उपदेश सुनाऊंगा जिन्हें सुन कर तुम भी मान जाओगी कि हमारे गुरुजी कितने ज्ञानी और महान हैं.

‘और हां मेनका, मैं तुम्हें एक बात और भी बताना चाहता हूं…’

‘क्या?’ मेनका ने पूछा था.

‘मेरा तुम से एक वादा है कि तुम मां जरूर बनोगी यानी तुम्हें तुम्हारा हक जरूर मिलेगा, क्योंकि गुरुजी ने कहा है कि गृहस्थ जीवन में ब्रह्मचर्य व्रत को तोड़ना पड़ता है.’

मेनका जान गई थी कि अमित गुरुजी के जाल में बुरी तरह फंसा हुआ है. उस के सारे सपने बिखरते चले गए थे.

अमित एक सरकारी दफ्तर में बाबू के पद पर काम करता था. जब भी उसे समय मिलता तो वह गुरुजी की किताबें ही पढ़ता रहता था.

एक दिन किताब पढ़ते हुए अमित ने कहा था, ‘मेनका, गुरुजी के प्रवचन पढ़ कर तो ऐसा मन करता है कि मैं भी संन्यासी हो जाऊं.’

यह सुन कर मेनका को ऐसा लगा था मानो कुछ तेज सा पिघल कर उस के दिल को कचोट रहा है. वह शांत आवाज में बोल उठी थी, ‘मेरे लिए तो तुम अब भी संन्यासी ही हो.’

‘ओह मेनका, मैं मजाक नहीं कर रहा हूं. मैं सच कह रहा हूं. अगर तुम गुरुजी की यह किताब पढ़ लो, तुम भी संन्यासिनी हो जाने के लिए सोचने लगोगी,’ अमित ने वह किताब मेनका की ओर बढ़ाते हुए कहा था.

‘अगर इन गुरुओं की किताबें पढ़पढ़ कर सभी संन्यासी हो गए तो काम कौन करेगा? मैं गृहस्थ जीवन में संन्यास की बात क्यों करूं? अगर तुम्हारी तरह मैं भी संन्यासी बनने के बारे में सोचने लगूंगी तो हमारी बेटी पिंकी का क्या होगा? बिना मांबाप के औलाद किस तरह पलेगी? बड़ी हो कर उस की क्या हालत होगी? उस के मन में हमारे लिए प्यार नहीं नफरत होगी. इस नफरत के जिम्मेदार हम दोनों होंगे.

‘जिस बच्चे को हम पालपोस नहीं सकते, उसे पैदा करने का हक भी हमें नहीं है और जिसे हम ने पैदा कर दिया है उस के प्रति हमारा भी तो कुछ फर्ज है,’ मेनका कहा था.

अमित ने कोई जवाब नहीं दिया था.

एक दिन दफ्तर से लौट कर अमित ने कहा था, ‘मेनका, मेरे दफ्तर में 3 दिन की छुट्टी है. मैं सोच रहा हूं कि हम दोनों गुरुजी के आश्रम में हरिद्वार चलेंगे.’

‘मैं क्या करूंगी वहां जा कर?’

‘जब से हमारी शादी हुई है, तुम एक बार भी वहां नहीं गई हो. अब तो तुम मां भी बन चुकी हो. हमें गुरुजी का आशीर्वाद लेना चाहिए… वे हमारे भगवान हैं.’

‘मेरे नहीं सिर्फ तुम्हारे. जहां तक आशीर्वाद लेने की बात है, वह भी तुम ही ले लो. मुझे नहीं चाहिए किसी गुरु का आशीर्वाद.’

‘मेनका, मैं ने फोन कर के पता कर लिया है. गुरुजी अगले एक हफ्ते तक आश्रम में ही हैं. तुम मना मत करो.’

‘देखो अमित, मैं नहीं जाऊंगी,’ मेनका ने कड़े शब्दों में कहा था.

अमित को गुरुजी से मिलने के लिए अकेले ही हरिद्वार जाना पड़ा था.

3 दिन बाद अमित गुरुजी से मिल कर घर लौटा तो बहुत खुश था.

‘दर्शन हो गए गुरुजी के?’ मेनका ने पूछा था.

‘हां, मैं ने तो गुरुजी से साफसाफ कह दिया था कि आप की शरण में यहां आश्रम में आना चाहता हूं… हमेशा के लिए. गुरुजी ने कहा कि अभी नहीं, अभी वह समय बहुत दूर है. कभी मेनका से बात कर उसे भी समझाएंगे.’

‘वे भला मुझे क्या समझाएंगे? क्या मैं कोई गलत काम कर रही हूं या कोई छोटी बच्ची हूं? तुम ही समझते रहो और आशीर्वाद लेते रहो,’ मेनका ने कहा था.

तभी मेनका को पिंकी के रोने की आवाज सुनाई पड़ी. पिंकी नींद से जाग चुकी थी. मेनका उसे थपकियां दे कर दोबारा सुलाने की कोशिश करने लगी.

शाम को अमित दफ्तर से लौट कर आया तो मेनका ने कहा, ‘‘आज आप के गुरुजी की किताब आई है डाक से.’’

इतना सुनते ही अमित ने खुश हो कर कहा, ‘‘कहां है… लाओ.’’

मेनका ने अमित को किताब का वह पैकेट दे दिया.

अमित ने पैकेट खोल कर किताब देखी. कवर पर गुरुजी का चित्र छपा था. दाढ़ीमूंछें सफाचट. घुटा हुआ सिर. चेहरे पर तेज व आंखों में खिंचाव था.

अमित ने मेनका को गुरुजी का चित्र दिखाते हुए कहा, ‘‘देखो मेनका, गुरुजी कितने आकर्षक और तेजवान लगते हैं. ऐसा मन करता है कि मैं हरदम इन को देखता ही रहूं.’

‘‘तो देखो, मना किस ने किया है.’’

‘‘मेनका, तुम जरा एक कप चाय बना देना. मैं अपने गुरुजी की यह किताब पढ़ रहा हूं,’’ अमित बोला.

मेनका चाय बना कर ले आई और मेज पर रख कर चली गई.

अमित गुरुजी की किताब पढ़ने में इतना खो गया कि उसे समय का पता ही नहीं चला.

रात के साढ़े 8 बज गए तो मेनका ने कहा, ‘‘अब गुरुजी को ही पढ़ते रहोगे क्या? खाना खा लीजिए, तैयार है.’’

‘‘अरे हां मेनका, मैं तो भूल ही गया था कि मुझे खाना भी खाना है. गुरुजी की किताब सामने हो तो मैं सबकुछ भूल जाता हूं.’’

‘‘किसी दिन मुझे ही न भुला देना.’’

‘‘अरे वाह, तुम्हें क्यों भुला दूंगा? तुम क्या कोई भूलने वाली चीज हो…’’ अमित ने कहा, ‘‘ठीक है, तुम खाना लगाओ… मैं आता हूं.’’

मेनका रसोई में चली गई.

रात के 11 बजे थे. मेनका आंखें बंद किए बिस्तर पर लेटी थी. साथ में पिंकी सो रही थी. अमित आराम से बैठा हुआ गुरुजी की किताब पढ़ने में मगन था. तभी वह पुरानी यादों में खो गया.

कुछ साल पहले अमित अपने दोस्त से मिलने चंडीगढ़ गया था. दोस्त के घर पर ही गुरुजी आए हुए थे. तब पहली बार वह गुरुजी के दर्शन और उन के प्रवचन सुन कर बहुत प्रभावित हुआ था.

कुछ महीने बाद अमित गुरुजी के आश्रम में हरिद्वार जा पहुंचा था. आश्रम में गुरुजी के कई शिष्य थे जो आनेजाने वालों की खूब देखभाल कर रहे थे.

अमित उस कमरे में पहुंचा जहां एक तख्त पर केसरी रंग की महंगी चादर बिछी थी. उस पर गुरुजी केसरी रंग का कुरता व लुंगी पहने हुए बैठे थे. भरा हुआ शरीर. गोरा रंग. चंदन की भीनीभीनी खुशबू से कमरा महक रहा था. 8-10 मर्दऔरत गुरुजी के विचार सुन रहे थे. अमित ने गुरुजी के चरणों में माथा टेका था.

कुछ देर बाद अमित कमरे में अकेला ही रह गया था.

‘कैसे हो बच्चा?’ गुरुजी ने उस से पूछा था.

‘कृपा है आप की. आप के पास आ कर मन को बहुत शांति मिली. गुरुजी, मन करता है कि मैं यहीं आप की सेवा में रहने लगूं.’

‘नहीं बच्चा, अभी तुम पढ़ाई कर रहे हो. पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़े हो जाओ. यह आश्रम तुम्हारा ही है, कभी भी आशीर्वाद लेने आ सकते हो.’

‘जी, गुरुजी.’

‘एक बात का ध्यान रखना बच्चा कि औरत से हमेशा बच कर रहना. उस से बचे रहोगे तो खूब तरक्की कर सकोगे, नहीं तो अपनी जिंदगी बरबाद कर लोगे. ब्रह्मचर्य से बढ़ कर कोई सुख संसार में नहीं है,’ गुरुजी ने उसे समझाया था.

उस के बाद जब कभी अमित परेशान होता तो गुरुजी के आश्रम में जा पहुंचता.

विचारों में तैरतेडूबते अमित को नींद आ गई और वह खर्राटे भरने लगा.

2 महीने बाद एक दिन दफ्तर से लौट कर अमित ने कहा, ‘‘मेनका, अगले हफ्ते गुरुजी के आश्रम में चलना है.’

‘‘तो चले जाना, किस ने मना किया है,’’ मेनका बोली.

‘‘इस बार मैं अकेला नहीं जाऊंगा. तुम्हें भी साथ चलना है.’’

पुलवामा : एक और हमला

सीमापार के आतंकियों के साथ स्थानीय युवाओं का घालमेल, विस्फोटकों की भारी खेप का आना और हमारी इंटैलिजैंस एजेंसियों को इस की भनक तक न मिलना देश की सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है. सरकार को अब सोचने की जरूरत है कि हम कहां और क्यों चूक रहे हैं.

14 फरवरी के दिन को दुनिया प्यार के त्योहार के रूप में मनाती है, मगर इसी दिन पुलवामा में पाकिस्तान की सरपरस्ती में फलफूल रहे आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद के आतंकी आदिल अहमद डार ने नफरत और हिंसा का जो तांडव किया, उस से पूरा देश आक्रोशित है. देशभर में बदला लो के

स्वर गूंज रहे हैं. पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हुए हमले में 40 जवान शहीद हो गए. जवानों के शवों को देख कर हर आंख भीग गई. हर जबान से यही निकला कि बस, अब बहुत हुआ. अब इन आतंकियों को छोड़ना नहीं है.

देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने शहीद जवानों के ताबूतों को जब कंधा दिया, वह पल पूरे देश को रुला गया. पुलवामा की घटना और इस से पहले हुई दूसरी घटनाएं कई सवालों को जन्म देती हैं. कई राजनेताओं ने पुलवामा की घटना को मोदी सरकार की विफलता करार दिया है तो कई इसे खुफिया विभाग की नाकामी बता रहे हैं.

जम्मूकश्मीर की मुफ्ती सरकार के गिरने के बाद से वहां राष्ट्रपति शासन लागू है, ऐसे में राज्य की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है. देश में इस समय चुनावी माहौल है. हर विपक्षी नेता इस वक्त केंद्र की मोदी सरकार को घेरने में लगा है. ऐसे में इस तरह की घटना ने प्रधानमंत्री की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तो सवाल उठा दिया है कि चुनाव से ऐन पहले यह घटना क्यों हुई? ममता का इशारा किस की तरफ है, यह स्पष्ट है.

गौरतलब है कि एलओसी में लश्कर ए तैयबा और जैश ए मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों की गतिविधियां जाड़े की शुरुआत के साथ ही तेज हो जाती हैं. बर्फबारी के दौरान जब चारों ओर सन्नाटा पसर जाता है, वह वक्त भारत में आतंकी घुसपैठ के लिए सब से माकूल होता है. यह समय खुफिया एजेंसियों के सब से ज्यादा चौकस रहने का होता है.

खुफिया खबर थी कि दिसंबर महीने में सीमापार से 21 आतंकी कश्मीर में घुसपैठ कर चुके हैं, जिन की तलाश जारी है. इन में से 3 खूंखार आतंकी आत्मघाती हमला करने में माहिर हैं. हो सकता है पुलवामा अटैक करने वाला आदिल अहमद डार उन में से ही एक हो, जिस ने 14 फरवरी को सीआपीएफ की बस से आरडीएक्स से भरी अपनी मारुति ईको वैन टकराई.

जिस आदिल अहमद डार का नाम आतंकी के रूप में सामने आया है, वह पुलवामा का ही निवासी था. उस का पिता गुलाम हसन डार पुलवामा में घरघर जा कर कपड़े बेचने का काम करता है. गरीब परिवार का आदिल अपने भाई समीर डार के साथ पिछले साल मार्च से गायब था. स्थानीय थाने में उस की गुमशुदगी दर्ज है, मगर उसे ढूंढ़ने की कोशिश स्थानीय पुलिस ने नहीं की.

आदिल जैसे कितने स्थानीय लड़के आतंकी संगठनों के साथ मिल गए हैं, कितने रोजीरोटी की तलाश में राज्य से बाहर पलायन कर गए हैं, इस की कोई पुख्ता जानकारी स्थानीय पुलिस, सेना या खुफिया विभाग को नहीं है. यह हमारी नाकामी और नाकारी है.

पत्थरबाजों पर नकेल जरूरी

इस में शक नहीं कि जम्मूकश्मीर में पाकिस्तान से सहानुभूति रखने वालों की कमी नहीं है. पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से इन लोगों को हथियार और बारूद मिलता है. आतंकी संगठन यहां के स्थानीय युवाओं के संपर्क में रहते हैं और इन को कई तरह के लालच दे कर, धर्म का वास्ता दे कर, जिहाद की बातें कर के बरगलाने का काम करते हैं ताकि आतंकियों के खिलाफ कोई कार्यवाही होते ही इन स्थानीय युवकों के जरिए प्रतिक्रिया पैदा की जा सके और शहर में गड़बड़ी फैलाई जा सके.

यही वे लोग हैं जो सेना और पुलिस पर पत्थर फेंकते हैं. यही वे लोग हैं जिन के जरिए आतंकी हमले कराए जाते हैं.

जम्मूकश्मीर के अंदरूनी हालात खराब हैं, मगर इस का सटीक अंदाजा केंद्र सरकार को नहीं है. सेना एक आतंकी को मारती है, और उस की जगह 4 पैदा नहीं हो जाते हैं, इस की क्या गारंटी है. पुलवामा में 40 जवानों की शहादत सामूहिक रूप से सामने आई है, तो हम चौंक रहे हैं. जब मौतें इकट्ठा होती हैं तो संख्या बड़ी दिखती है. संवेदना ज्यादा उपजती है, मगर पिछले करीब 4 वर्षों से कश्मीर में औसतन हर हफ्ते एक सैनिक मर रहा है और उस की लाश खामोशी से ताबूत में रख कर उस के घर भेज दी जाती है. कहीं कोई संवेदना नहीं उपजती.

हमले कैसे हो रहे हैं? सीमा को पार कर के आतंकी क्यों घुस पा रहे हैं? इतनी भारी मात्रा में विस्फोटक सामग्री और हथियार कैसे आ सकते हैं? कश्मीरी युवा क्यों और कैसे आतंकी संगठनों की बातों में आ कर बहक रहे हैं? सवाल सैकड़ों हैं. अगर आतंकी हमलों का जिम्मेदार पाकिस्तान और उस की शह पर पनप रहे आतंकी संगठन हैं तो वे कामयाब क्यों हो रहे हैं, इस का जवाब हमें अपने से पूछना चाहिए. दुश्मन से आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वह आप को कोई नुकसान नही पहुंचाएगा? वह तो नुकसान पहुंचाने का मौका तलाशता ही रहता है. सवाल हमारी मुस्तैदी का है.

क्या जम्मूकश्मीर को ले कर हमारी राजनीतिक नीतियां दुरुस्त हैं? क्या हमारी खुफिया एजेंसियां ठीक काम कर रही हैं? क्या स्थानीय पुलिस चुस्त है? क्या सेना और अर्धसैनिक बलों को वे सभी सुविधाएं हासिल हैं, जिन के चलते वे हमारे बौर्डर की सुरक्षा पुख्ता कर सकते हैं?

पुलवामा हमले के बाद जम्मूकश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने स्वीकार किया है कि लापरवाही हुई है. पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल विक्रम सिंह भी मानते हैं कि कहीं न कहीं लापरवाही हुई है. उन्होंने कहा कि ऐसे हमले सतर्कता, स्टैंडर्ड औपरेशन प्रोसीजर का पालन कर के ही रोके जा सकते हैं.

साफ दिख रहा है कि इस केस में यह नहीं किया गया जबकि, हमले के बहुत स्पष्ट इनपुट मिले थे. अगर देश की सीमाओं को सुरक्षित करना है तो राज्यपाल सत्यपाल मलिक और पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल विक्रम सिंह की इन बातों पर गहन चिंतन की जरूरत है.

खुफिया एजेंसियों पर सवाल

14 फरवरी को पुलवामा में आदिल अहमद डार विस्फोटकों से भरी मारुति ईको वैन ले कर निकला. उस ने सेना की बसों के समानांतर अपनी गाड़ी रखी और मौका पाते ही एक बस से अपनी गाड़ी टकरा दी. इस टक्कर में हम ने अपने 40 जवान खो दिए. लड़ाई के मोरचे पर खोए होते तो उन की वीरता और उन की शहादत पर देश का सीना गर्व से फूल जाता, मगर हम ने उन्हें अपनी गलती से खो दिया.

हमारी खुफिया फेल थी, इसलिए हम ने उन्हें खो दिया.

हमारी नीतियां फेल थीं, इसलिए हम ने उन्हें खो दिया.

हमारी राज्य पुलिस फेल थी, इसलिए हम ने उन्हें खो दिया.

जम्मूकश्मीर जो देश का सब से संवेदनशील इलाका है, जिस की सीमा पर आएदिन गोलाबारी होती है, जहां आतंकी घुसपैठ होती है, वहां हमारी खुफिया एजेंसियों का हाल यह है कि इतनी भारी मात्रा में विस्फोटक शहर में बिना किसी रोकटोक के पहुंच गया, और पुलिस का हाल यह है कि सेना की बसों के साथसाथ एक ऐसा व्यक्ति विस्फोटकों का जखीरा ले कर चल पड़ा जिस की गुमशुदगी की रिपोर्ट स्थानीय थाने में दर्ज है और किसी ने उस को नहीं पहचाना या किसी चैकपोस्ट पर उस की गाड़ी नहीं रोकी गईं, तो, इस से ज्यादा निकम्मापन और शर्मनाक क्या हो सकता है?

एक आम शहरी कब आतंकी बन जाता है? कब सीमापार के आतंकी गिरोहों के साथ उस की मीटिंग्स होने लगती हैं? कब हथियारों और विस्फोटकों का जखीरा उस के पास पहुंच जाता है? कब वह सेना की रेकी कर लेता है? कब वह गाड़ी में बारूद भर कर उन के साथ निकल पड़ता है? इन तमाम बातों की भनक आखिर देश की खुफिया एजेंसियों को क्यों नहीं लगी? इस का कोई जवाब न तो राज्य पुलिस के पास है, न ही राज्य के खुफिया विभाग के पास और न राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पास.

पुलवामा हमले के बाद देश की इंटैलिजैंस एजेंसियों पर सवाल उठने लगे हैं. आखिर हम कहां चूक रहे हैं, क्यों चूक रहे हैं? कहा तो यह भी जा रहा है कि राज्य पुलिस को कुछ खुफिया इनपुट मिले थे कि जवानों पर हमले हो सकते हैं, बावजूद इस के चैकिंग का काम ठप पड़ा था. खबर है कि पुलवामा हमले के लिए जैश पिछले एक साल से तैयारी कर रहा था. पर यह खबर कहां से आई, यह कोई नहीं बता रहा. हां, जैश ए मोहम्मद ने प्राइवेट ट्विटर अकाउंट पर 33 सैकंड का एक वीडियो भी जारी किया था, जिस में आतंकी हमले की संभावना जताई गई थी. इस वीडियो में सोमालिया का एक आतंकी गु्रप बिलकुल इसी अंदाज में सेना पर हमला करता नजर आ रहा है, जैसा कि पुलवामा में किया गया. इस वीडियो के आखिर में धमकीभरे अंदाज में बाकायदा कश्मीर का नाम लेते हुए कहा जा रहा है कि ‘इंशाअल्लाह, यही कश्मीर में होगा’. इस वीडियो में सुरक्षाबलों पर हमले की स्पष्ट चेतावनी थी, फिर भी इस हमले को रोक पाने में हम असमर्थ रहे.

गौरतलब है कि जम्मूकश्मीर में आतंक की शुरुआत 90 के दशक में हुई थी. 1990 से ले कर अब तक राज्य में आतंकी हमलों में 5,777 से ज्यादा जवान शहीद हो चुके हैं. सुरक्षाबलों की कार्यवाहियों में 21,562 आतंकी मारे गए हैं. इस के अलावा आतंकी हमलों में 16,757 नागरिकों की जानें जा चुकी हैं.

नियमों में ढील का नतीजा

पुलवामा में आत्मघाती हमले में जवानों के शहीद होने के बाद उन कारणों का पता लगाने की कोशिशें तेज हो चुकी हैं, जिन की भेंट देश के इतने सपूत चढ़ गए. इन में से एक बड़ा कारण है यातायात नियमों में ढिलाई बरतने का, जिस के चलते ही सुरक्षा में सेंध लगी. दरअसल, 2002-03 से पहले जवानों के काफिले को कड़ी सुरक्षा के बीच ले जाया जाता था. जब जवानों का काफिला रास्तों से गुजरता था, उस वक्त कोई स्थानीय नागरिक या स्थानीय वाहनों के गुजरने पर रोक होती थी. सारा सिविलियन ट्रैफिक रोक दिया जाता था. इस दौरान एक पायलट व्हीकल सिविलियन गाडि़यों को हाईवे से दूर रखने का काम करता था.

लेकिन 2002-2005 के बीच राज्य में मुफ्ती मोहम्मद सईद की सरकार के दौरान इन नियमों में ढिलाई कर दी गई क्योंकि इस से आम लोगों को बहुत असुविधा होती थी. सईद सरकार ने फैसला किया कि इस नियम को खत्म किया जाए. केंद्र सरकार ने भी सईद के तर्क को सही माना और सुरक्षा ढीली कर दी गई.

हालांकि, इस के साथ सुरक्षा में दूसरे बदलाव किए गए. अब सिविलियन गाडि़यां सुरक्षाबल की गाडि़यों के साथ निकलती थीं, लेकिन पूरे रास्ते पर सुरक्षाबल वाहनों की जांच करते थे. 2014 के बाद भी यह नियम चलता रहा. फिर इस बार कहां चूक हो गई कि विस्फोटक से भरी गाड़ी सीआरपीएफ की बस के साथ चलती रही औैर किसी को कानोंकान खबर नहीं हुई?

सवाल यह भी है कि कश्मीर के पुलवामा में एकसाथ इतने बड़े समूह में जवानों को मूव कराने की क्या मजबूरी थी.

सेना के एक आला अधिकारी की मानें तो जवानों को हजारहजार की टोली में भेजा जाना चाहिए था. मगर पुलवामा में तो सारे नियमों को ताक पर रख कर 2,547 जवानों का काफिला 78 बसों में रवाना कर दिया गया.

जवानों को एयरलिफ्ट क्यों नहीं

श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग भूस्खलन और बर्फबारी की वजह से करीब हफ्तेभर से बंद था. कश्मीर के 2,200 लोग जम्मू में फंसे थे, जिन में से बहुत छात्र भी थे, जो गेट परीक्षा देने के लिए कश्मीर के दूरदराज के इलाकों से जम्मू आए थे. वायुसेना के सी-17 ग्लोबमास्टर विमान ने 8 से 12 फरवरी के बीच अपनी 4 दिनों की उड़ानों में कुल 538 लोगों को एयरलिफ्ट किया था.

इसी बीच, खुफिया एजेंसियों ने बड़ा अलर्ट जारी करते हुए कहा कि आतंकी जम्मूकश्मीर में सुरक्षाबलों के डिप्लौयमैंट और उन के आनेजाने के रास्ते पर हमला कर सकते हैं. खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट में कहा गया था कि किसी भी सीआरपीएफ के कैंप और पुलिस के कैंप पर आतंकी बड़ा हमला कर सकते हैं, इसलिए सभी सुरक्षाबल सावधान रहें. इस के साथ ही बिना सैनिटाइज किए किसी एरिया में ड्यूटी पर न जाएं.

जम्मू में सैकड़ों जवान कैंपों में थे, जिन के रहनेखाने में परेशानी सामने आ रही थी. ट्रांजिट कैंपों में जवानों की भीड़ बढ़ती जा रही थी. आईजी अजय वीर सिंह चौहान, सीआरपीएफ, जम्मू सैक्टर का कहना है कि हम ने एयरफोर्स से मांग की थी कि फंसे हुए जवानों को जम्मू से एयरलिफ्ट किया जाए. मगर उन की कोई सुनवाई नहीं हुई.

सीआरपीएफ जवानों को भी छात्रों की तरह एयरलिफ्ट किया जा सकता था,बशर्ते केंद्र सरकार सीआरपीएफ अधिकारियों के विमान मुहैया करवाने के निवेदन को मान लेती.

कहा जा रहा है कि अधिकारी एक हफ्ते तक विशेष विमान की मांग करते रहे थे, मगर किसी के कान पर जूं न रेंगी. वित्तीय कारणों का हवाला दिया गया. मजबूर हो कर 14 फरवरी की सुबह जवानों से भरी 78 बसों के काफिले को श्रीनगर रवाना किया गया.

हैरानी की बात है केंद्र सरकार के पास अपने जवानों को बेहद प्रतिकूल परिस्थितियों में काम करने के लिए भेजने के वास्ते पैसे का अभाव है और हमारे प्रधानसेवक इन पौने 5 सालों में लगभग 84 विदेशी दौरे कर आए, जिन में करीब 280 मिलियन डौलर यानी 2 हजार करोड़ रुपया खर्च हो गया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्त्वाकांक्षी योजनाओं के प्रचारप्रसार में केंद्र सरकार ने 5,200 करोड़ रुपये खर्च कर दिए. अब अगर इन दोनों खर्चों को मिला दें तो पौने 5 साल के कार्यकाल में केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री के विदेश दौरों और योजनाओं के प्रचार में करीब 7,200 करोड़ रुपए खर्च किए हैं. कोई जवाब दे कि 7,200 करोड़ की इस रकम से कितने समय तक सीआरपीएफ और बीएसएफ जैसे अर्धसैनिक बलों के आवागमन के लिए हवाईसेवा उपलब्ध कराई जा सकती थी?

दूसरी बात यह है कि जम्मूकश्मीर जैसे क्षेत्रों में सुरक्षा बलों के बड़े जत्थे के आवागमन के लिए एक एसओपी यानी स्टैंडर्ड औपरेशन प्रोसीजर है. काफिला गुजरने से पहले संबंधित इलाके की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार रोड ओपनिंग पार्टी (आरओपी) इस के लिए हरी झंडी देती है. आरओपी में सेना, जम्मूकश्मीर पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवान शामिल होते हैं. आरओपी ने यह क्लीनचिट दी थी या उस पर दबाव डाल कर यह क्लीनचिट दिलवाई गई, यह जांच का विषय है.

ढिंढोरा पीटने से क्या फायदा

हम अपने घर की सफाई करते हैं तो क्या महल्लेभर में या बिरादरीभर में होहल्ला मचा कर करते हैं? क्या स्मार्टफोन पर अपने सफाई कार्यक्रम का वीडियो अपलोड करते हैं? क्या फोटो खिंचवा कर अखबारों में छपवाते हैं या मीडिया वालों को बुला कर हाथों में झाड़ू ले कर पोज देते हैं? या फिर अपने से जलन रखने वाले पड़ोसी को दिखाते हैं, बताते हैं कि लो जी, आज हम अपना घर साफ कर रहे हैं. ऐसा तो हम हरगिज नहीं करते. बस, हर सुबह झाड़ू उठाते हैं और पूरे घर को झाड़पोंछ कर साफ कर देते हैं, कीड़ेमकोड़ों को मार देते हैं, उन के बनाए गंदे जाले उतार देते हैं और घर को रहने लायक बना लेते हैं. आखिर यह सीधीसरल बात मोदी सरकार की समझ में क्यों नहीं आई?

आप पूछेंगे कि घर की सफाई से मोदी सरकार का क्या लेनादेना? सीधा लेनादेना है जनाब. यह देश हमारा घर है. इस को साफ रखना सरकार का काम है. यहां रहने वालों को सुरक्षित जीवन देना सरकार की जिम्मेदारी है. सुरक्षा को चाकचौबंद रखना और यहां गंदगी व बीमारी फैलाने वाले खतरनाक कीड़ों को मारबुहारना सरकार का कर्तव्य है. मगर ये सारे काम चुपचाप किए जाते हैं, होहल्ला मचा कर नहीं.

दुनिया को दिखानेबताने की जरूरत नहीं है कि आज हम अपना घर साफ करने जा रहे हैं. फोटो खिंचवा कर सर्कुलेट करने, वीडियो बना कर अपलोड करने या फिल्में बना कर दुनिया के आगे ढोल पीटने की जरूरत नहीं है कि लो जी, हम ने अपना घर साफ कर लिया.

मोदी सरकार इस कदर बड़बोलेपन की शिकार है कि छोटीछोटी बातों को भी बढ़ाचढ़ा कर कहने व गोपनीय रखी जाने वाली बातों को भी ढोल पीटपीट कर बताने से बाज नहीं आती है. इसे अपनी पीठ खुद थपथपाने का शौक है. अपना गुणगान आप गाने की आदत हो गई है इसे और इस का बुरा नतीजा भुगत रहे हैं हमारे जवान और देश की मासूम जनता.

गहन विश्लेषण की जरूरत

पुलवामा में सीआरपीएफ के जवानों पर आतंकी हमला या मोदी सरकार में इस से पहले जवानों पर हुए तमाम हमले किन कारणों से हुए, इस का विश्लेषण करने की जरूरत है. सर्जिकल स्ट्राइक जैसी कार्यवाहियां यूपीए के शासनकाल में भी होती रहीं, मगर उन का होहल्ला कभी नहीं मचा. उस की गाथा नहीं गाई गई. सेना और खुफिया के गुप्त अभियान के तहत जम्मूकश्मीर और एलओसी पर कितने ही आतंकियों को मार गिराया गया और देश की सुरक्षा सुनिश्चित की गई. मगर मोदी राज में हुए सर्जिकल स्ट्राइक की कहानी दुनियाभर ने सुनी. उन्हें चीखचीख कर सुनाई गई.

नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के भाषण सर्जिकल स्ट्राइक के व्याख्यान के बिना पूरे ही नहीं होते थे. ऐसा लगता था जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पहली बार पाकिस्तान पर कोई सर्जिकल स्ट्राइक हुई है. बढ़चढ़ कर दुनिया को बताया गया कि हम ने सर्जिकल स्ट्राइक की, इतने आतंकियों को मारा. क्या यह बताने की जरूरत थी? उधर पाकिस्तान कहता रहा कि यह कोई सर्जिकल स्ट्राइक नहीं, बल्कि सीमा पर हुई मामूली झड़प थी, जिस में उन के सिर्फ 2 जवान मारे गए.

सच तो यह है कि जम्मूकश्मीर जैसी सीमा के संवेदनशील राज्यों में आतंकियों को ठिकाने लगाने के लिए सेना और खुफिया एजेंसियों के संयुक्त और गुप्त अभियानों की जरूरत है, बिना शोर किए चुपचाप काम करने की जरूरत है, न कि मोदीमार्का सर्जिकल स्ट्राइक की.

घाटी में वर्ष 2017 से चलाए जा रहे ‘औपरेशन औल आउट’ की गाथा भी सर्जिकल स्ट्राइक जैसी ही गाई जा रही है. इस का जितना प्रचार हो रहा है, उस को सुन कर दहशतगर्दों के साथसाथ स्थानीय युवा भी उत्तेजित हो रहे हैं, बौखलाहट से भरे जा रहे हैं. असुरक्षा की भावना से ग्रस्त हो गए हैं. इन में से कितने बौखलाहट में गलत तरफ मुड़ गए हैं या मुड़ जाएंगे, कहा नहीं जा सकता.

बेहतर होता कि आतंकियों को चिह्नित कर के चुपचाप उन का सफाया किया जाता, क्योंकि मोरचे जीतने के लिए वीरता गीत गाने से गुप्त कूटनीतिक चालें ज्यादा मुफीद होती हैं. मगर मोदी के बड़बोलेपन को क्या कहें, अब तो अगला लोकसभा चुनाव भी सिर पर है, ऐसे में उपलब्धियां गिनवाने की मजबूरी उन के सामने है.

मसूद को रिहा करना बड़ी भूल

पुलवामा की साजिश रचने वाला जैश ए मोहम्मद का सरगना मौलाना मसूद अजहर वही आतंकी है जिसे कंधार विमान हाईजैक के दौरान रिहा करना पड़ा था. मौलाना मसूद अजहर को साल 1994 में पहली बार गिरफ्तार किया गया था. कश्मीर में सक्रिय आतंकी संगठन हरकत उल मुजाहिदीन का सदस्य होने के आरोप में उस वक्त उस की श्रीनगर से गिरफ्तारी हुई.

मौलाना मसूद अजहर की गिरफ्तारी के बाद जो कुछ हुआ, उस का शायद किसी को अंदाजा भी नहीं था. अजहर को छुड़ाने के लिए आतंकियों ने 24 दिसंबर, 1999 को 180 यात्रियों से भरे एक भारतीय विमान को नेपाल से अगवा कर लिया और विमान को कंधार ले गए. भारतीय इतिहास में यह घटना ‘कंधार विमान कांड’ के नाम से दर्ज है.

कंधार विमान कांड के बाद भारतीय जेलों में बंद आतंकी मौलाना मसूद अजहर, मुश्ताक जरगर और शेख अहमद उमर सईद की रिहाई की मांग की गई और यात्रियों की जान बचाने के लिए 8 दिनों बाद 31 दिसंबर को आतंकियों की शर्त मानते हुए भारत सरकार ने मसूद अजहर समेत तीनों आतंकियों को छोड़ दिया. इस के बदले में कंधार एयरपोर्ट पर अगवा रखे गए विमान को बंधकों समेत छोड़ दिया गया.

मसूद अजहर की रिहाई के बाद पाकिस्तान चौड़ा हो गया और उस की शह पा कर ही मसूद अजहर ने फरवरी 2000 में जैश ए मोहम्मद आतंकी संगठन की नींव रखी, जिस का मकसद था भारत में आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देना और कश्मीर को भारत से अलग करना. उस वक्त सक्रिय हरकत उल मुजाहिदीन और हरकत उल अंजाम जैसे कई आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद में मिल गए. खुद मसूद अजहर भी हरकत उल अंसार का महासचिव रह चुका है. साथ ही, हरकत उल मुजाहिदीन से भी उस के संपर्क थे.

इस में शक नहीं कि मसूद के आतंकी संगठन को जहां पाकिस्तानी सेना का पूरा सपोर्ट है, वहीं चीन भी उस को पूरा सपोर्ट करता है और उस का इस्तेमाल भारत को परेशान करने के लिए करता है. भारत जहां मौलाना मसूद अजहर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकी घोषित कर उस के संगठन जैश ए मोहम्मद को बैन करने की मांग लंबे समय से उठा रहा है, वहीं चीन यह मानने को तैयार ही नहीं है कि मसूद आतंकी है. जैश ए मोहम्मद को भारत ने ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन, अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र भी आतंकी संगठनों की सूची में शामिल कर चुका है.

हालांकि अमेरिका के दबाव के बाद पाकिस्तान ने भी साल 2002 में इस संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया था, मगर अंदर ही अंदर पाकिस्तानी सेना का पूरा सपोर्ट जैश को मिलता रहा. भारत मसूद अजहर के प्रत्यर्पण की पाकिस्तान से कई बार मांग कर चुका है. लेकिन पाकिस्तान हर बार सुबूतों के अभाव का हवाला देते हुए इस मांग को नामंजूर कर देता है.

भारत को अब अपने पड़ोसी देशों पकिस्तान और चीन से टक्कर लेने व उन को कड़ा सबक सिखाने के लिए तैयार हो जाना चाहिए. सांप को दूध पिलाने से वह अपनी प्रवृत्ति नहीं छोड़ देगा, पुलवामा के बाद तो हमें यह बात अच्छी तरह समझ में आ जानी चाहिए. पर यह भी याद रखना होगा कि युद्ध में छोटाबड़ा नहीं होता, मजबूत और कमजोर होता है.

पाकिस्तान भी परमाणु बमों से लैस देश है. उस की सेना में 6 लाख से ज्यादा सैनिक हैं और उस के पास ढाई हजार से ज्यादा टैंक हैं. युद्ध चाहे एकतरफा हो, नुकसान दोनों का होगा.

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