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चलो! डांसर को मंत्री बनाएं

भाजपा के प्रवक्ता कमलानंद चौराहे पर मिल गए वे ‘चौराहे’ पर गोल चक्कर लगा रहे थे. मित्र कमलानंद को चक्कर लगाता देख कांग्रेस के प्रवक्ता रामानंद ने आश्चार्य से उसकी और देखा और मद्धम स्वर में कहा-मित्रवर! क्या बात है तुम चौराहे पर निरंतर चक्कर लगाए जा रहे हो, क्या बात है..

कमलानंद मुस्कुराए कहा – तुम गहरी बात नहीं समझोगे..यह एक टोटका है..

रामानंद – मित्र ! जरा खुलासा करो… मैं समझा नहीं !

कमलानंद – क्या तुम सपना चौधरी को जानते हो.

रामानंद – ( कुछ सोचते हुए ) मैं महिमा चौधरी को जानता हूं परदेश और ये मेरा घर यह तेरा घर फ्रेम महिमा चौधरी.

कमलानंद ठठाकर हंस पड़े – यार तुम्हारा आई क्यू बड़ा कमजोर है मैं महिमा नहीं सपना चौधरी की बात कर रहा हूं.

रामानंद गंभीर हो गया फिर कुछ सोचते  कुछ  बनते हुए कहा- अच्छा, मित्र तुम ही बताओ…   कौन है यह सपना चौधरी…   क्या तुम्हारी कोई खासुलखास है जो चौराहे पर चक्कर लगा टोटका कर रहे हो.

कमलानंद गंभीर थे बोले – मैं चौराहे पर चक्कर और टोटका करके मशहूर डांसर सपना चौधरी को भाजपा की राजनीति में प्रवेश के लिए बाध्य कर दूंगा.

रामानंद ने छेड़ा, – इससे क्या लाभ होगा मित्र राजनीति में सपना जाये या महिमा तुम्हें हमें क्या लाभ…..

कमलानंद बोले – लगता है तुम टीवी न्यूज़ और अखबार नहीं पढ़ते हो… अन्यथा ऐसा नहीं कहते बल्कि सपना चौधरी का नाम सुनकर स्वयं भी डांस करने लगते. सपना चौधरी एक बड़ा नाम है आज…

रामानंद मुस्कुराता कमलानंद की और तक रहा था उसके कंठ से बमुश्किल नि:सृत हुआ तो तुम्हारे टोटके का सबब क्या है ?

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वह सब छोड़ो…कमलानंद ने रामानंद का हाथ हाथों में लेकर कहा – मित्र!आज सपना कांग्रेस और भाजपा दोनों राजनीतिक दलों को आकर्षित कर रही है दोनों ही दल चाहते हैं सपना चौधरी उसकी टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़े.

रामानंद की आंखें गोल – गोल घूमने लगी

अच्छा ! तो सपना चौधरी एक डांसर का इतना महत्त्व ?

कमलानंद ने कहा – और मैं और तुम मिल कर चलो सपना को राजनीति में घसीट लाते हैं अगर हमने उसे राजनीति में लाने और टिकट दिला लड़ाने मैं भूमिका अदा की तो समझो कारू का खजाना हाथ लग गया.

ओह… तो मित्र तुम इस खातिर चौराहे पर चक्कर लगाकर टोटका कर रहे हो….

रामानंद को सब कुछ समझ आ गया.

कमलानंद ने रामानंद का हाथ जोर से दाब कर कहा, – मित्र, यह सुनहरा अवसर है हम माला -माल हो जाएंगे . मेरा कहा मानो.. मैं ने सब संरजाम कर लिया है….

रामानंद मन ही मन खुश हुआ मन में खुशियों के लड्डू फूटने लगे क्योंकि वह समझ गया था कि कमलानंद इस मामले में बडा खिलाड़ी है जरूर उसे  भाजपा के किसी बड़े नेता ने इस काम में लगाया होगा….

कमलानंद ने कहा – सुनो सफलता हमारा कदम चूमने तत्पर है बस हमें आगे बढ़ना है चलो….

रामानंद चुपचाप उसके साथ हो लिया दोनों सपना चौधरी के घर पहुंचे .सपना नृत्य में निमग्न थी…उसकी डांस करामाती स्टेप देख कर रामानंद तो अवाक रह गया .

आधा घंटा नृत्य प्रैक्टिस के पश्चात सपना चौधरी कुर्सी पर पसर गई एक शख्स उसके पास अटेंशन मुंद्रा में मानो इशारे का इंतजार करता खड़ा था .

कमलानंद और रामानंद दोनों आगे बढ़े और उसकी ओर मुखातिब हुए कमलानंद ने कहा- आपसे सीक्रेट बात करनी है अमित शाह का संदेश लाया हूं आपको भाजपा…..

सपना ने कमलानंद को बीच में रोक दिया और चटकती आवाज में बोली तो मैं चुनाव लड़ू यह ऑफर लाए हो .

रामानंद मौके की तलाश में था उसने कहा – देवी ! मैं भी… कुछ कहना चाहता हूं …कांग्रेस…

अच्छा तो कांग्रेस ने भी औफर भेजा है सपना चौधरी ने कहा – मगर मैं साफ साफ कहती हूं मैं चुनाव नहीं लड़ना चाहती….

कमलानंद का मानो दिल टूट गया- इतना अच्छा औफर… आप ठुकरा रही हो….

रामानंद – स्मृति ईरानी को देखो…राज करोगी राज, सपना.

क्या मैं केंद्र में मंत्री बन सकती हूं सपना ने आचार्यवत कहा.

हां हां क्यों नहीं ! कमलानंद ने कहा.

बिल्कुल राहुल आप को मंत्रिमंडल में लेंगे. रामानंद ने कहा.

तो मैं सोचूंगी मुझे कुछ समय दो सपना चौधरी कुर्सी पर से उठ खड़ी हुई उसके हाव-भाव बदल गए .

सोचो मत… समय हाथ से निकल जाएगा रामानंद ने सपना की आंखों में आंखें डाल कर कहा अभी चलो…

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सपना केंद्रीय मंत्रिमंडल का सपना देखती उठ खड़ी हुई. कमलानंद और रामानंद सपना चौधरी को लेकर अपने आलाकमान से मिलाने चल पड़े.

बरबाद करता सोशल कट्टरवाद 

‘‘बौद्धों ने कभी सिर मुड़ाना नहीं छोड़ा सिखों ने भी सदैव पगड़ी का पालन किया मुसलमान ने न दाढ़ी छोड़ी, न ही 5 बार नमाज ईसाई संडे को चर्च जरूर जाता है फिर हिंदू अपनी पहचान संस्कारों से क्यों दूर हुआ…

कहां लुप्त हो गए-जनेऊ, शिखा, यज्ञ, शस्त्र, शास्त्र, नित्य मंदिर जाने का संस्कार…

हम अपने संस्कारों से विमुख हुए, इसी कारण हम विलुप्त हो रहे हैं.

अपनी पहचान बनाओ, अपने मूल संस्कारों को अपनाओ.’’

इस तरह की एक नहीं, बल्कि दर्जनों भड़काऊ पोस्ट नरेंद्र मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने के बाद सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं जिन के असल माने यही हैं कि आम लोगों ने उन्हें और भाजपा को सिर्फ  और सिर्फ हिंदुत्व के मुद्दे पर चुना है. देश का विकास हो, रोजगार के मौके बढ़ें, नई फैक्टरियां और कारखाने लगें, पुल और सड़कें बनें, अन्नदाता किसानों की बदहाली दूर हो और स्कूल व अस्पताल बनें, ये सब लोगों की प्राथमिकता में नहीं रह गए हैं. लोगों की प्राथमिकता यह है कि मोदीजी कश्मीर समस्या सुलझाने के नाम पर सेना का मनमाना इस्तेमाल करें, देश में मुसलमानों की हालत और बदहाल हो और हिंदू सिर्फ कट्टर बनें ही नहीं, बल्कि दिखें भी.

इस बाबत भी बाकायदा सोशल मीडिया पर ही नरेंद्र मोदी से अपील की जा रही है कि वे घाटी में कश्मीरी पंडितों को बसाएं, आतंकवादियों को खदेड़ें और समान नागरिक संहिता लागू करें. समान संहिता लागू कराने में वे हिंदू विवाह विधि को भी नहीं छोड़ेंगे, यह पक्का है, जिस में पुजारियों को मोटी दक्षिणा मिलती है.

अगर नरेंद्र मोदी वाकई इसलिए चुने गए हैं तो ऐसा होना भी मुमकिन है. लेकिन इस के बाद क्या…? इस सवाल का जवाब शायद ही कोई दे पाएगा. सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस के बाद मोदीजी से कहा जाएगा कि देश को बाकायदा हिंदू राष्ट्र घोषित करते हुए जातिगत आरक्षण खत्म करें जिस से हिंदुओं के इस देश में फिर से विधिवत वर्णव्यवस्था नए रूप में बहाल हो सके. यह सब से बड़ा एजेंडा है हिंदू राष्ट्र का क्योंकि कट्टर हिंदू आज किसी बात से परेशान है तो अछूतों व उन के मुद्दों के सामाजिक, राजनीतिक बढ़ते रुतबे के कारण.

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जिन्हें इस बात और सवर्णों की मंशा पर शक हो उन्हें ज्यादा से ज्यादा वक्त सोशल मीडिया पर बिताना चाहिए. वहां नफरत के शोले इफरात से फौरवर्ड हो रहे हैं जिन का मकसद यह है कि देश को पहले इसलाममुक्त किया जाए, फिर बाकी का एजेंडा घोषित किया जाएगा. आइए, ऐसी ही एक और पोस्ट पर नजर डालें जिस से साबित होता है कि देश हिंदू राष्ट्र बनने की तरफ तेजी से अग्रसर हो रहा है-

‘‘मुसलिम ने मोदी से कहा 10-15 मिनट के लिए पुलिस हटा दो एक भी हिंदू नहीं बचेगा तो मोदी ने बोला हटाई तो थी गुजरात से 7-8 मिनटों के लिए…’’

इस से आगे 10-12 लाइनें और हैं जिन्हें यहां लिखना व प्रकाशित करना सही नहीं है.

क्या हैं माने

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इन मैसेजों से स्पष्ट है कि देश में कितनी कट्टर मानसिकता के लोग मौजूद हैं. इन संदेशों में 2 तरह की बातें कही जा रही हैं. पहली यह कि अब हिंदुओं को जागना होगा और दूसरी, मुसलमान इस देश के सब से बड़े दुश्मन हैं. जिन का सफाया नरेंद्र मोदी ही कर सकते हैं. तमाम और मुद्दों को हाशिए पर रखते उन्हें दोबारा चुना गया है ताकि 2024 तक देश हिंदू राष्ट्र बन सके. कैसे नरेंद्र मोदी मुसलमानों को सबक सिखा सकते हैं, इस का भी उदाहरण गोधरा कांड के जरिए दिया जा रहा है.

सोशल मीडिया बिलाशक लोगों की मानसिकता और भावनाओं को समझने का सब से बड़ा प्लेटफौर्म है. इन दिनों इस पर जो मैसेज वायरल हो रहे हैं उन से लगता है कि आम लोगों की नरेंद्र मोदी से अपेक्षाएं सिर्फ कश्मीर मुद्दे और मुसलमानों तक ही सिमटी हुई हैं. लेकिन यहां यह याद रखा जाना चाहिए कि इस तरह की पोस्ट बनाने वाले मुट्ठीभर सवर्ण हैं और वही इन का प्रचारप्रसार कर रहे हैं. उन के पास समय और भक्ति की कमी नहीं है.

गरीब, दलितों और मुसलमानों का बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं करता क्योंकि वह जैसेतैसे अपना पेट पालने में जुटा है.

यहां यह सवाल बड़ा दिलचस्प है कि इन धार्मिक और कट्टरवाद फैलाती पोस्टों का राजनीति से क्या संबंध है और हिंदीभाषी राज्यों में भाजपा को जो अप्रत्याशित सफलता मिली क्या उस में दलितों और मुसलमानों की भागीदारी या झुकाव भाजपा की तरफ नहीं था? भाजपा अगर सिर्फ सवर्णों और हिंदूवादियों की पार्टी है, जिस का मकसद हिंदू राष्ट्र का निर्माण करना है तो क्या उस से दलितपिछड़े भी सहमत हैं? अगर हैं, तो क्या वे समाज में अपनी वैदिककालीन स्थिति स्वीकारने को भी तैयार हैं?

निश्चितरूप से 2019 लोकसभा चुनाव के नतीजे देख इस का जवाब स्पष्ट रूप से कोई नहीं दे सकता क्योंकि भाजपा ने ‘सब का साथ सब का विकास’ की बात भी प्रमुखता से कही थी. ऐसे में यह कह पाना मुश्किल है कि दलित व पिछड़ों ने उसे इन में से किस मुद्दे पर वोट दिया, हिंदू राष्ट्र निर्माण के लिए या फिर विकास के लिए.

जानबूझ कर माहौल बिगाड़ने पर उतारू हो आए सवर्ण इतिहास को भी तोड़मरोड़ कर पेश कर रहे हैं कि हिंदुओं के इस इकलौते देश में बच्चों को औरंगजेब, हुमायूं और अकबर जैसे मुगल शासकों की गाथाएं पढ़ाई जाती हैं. महाराणा प्रताप, शिवाजी और रानी लक्ष्मीबाई नहीं पढ़ाए जाते, इस से बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है. पिछले दिनों एक न्यूज चैनल की डिबेट में भाजपा के एक प्रवक्ता इस बात पर बेहद आक्रामक हो कर इस बाबत दलीलें देते हुए भी दिखाई दिए.

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ये और इस तरह की बातें कितने बड़े पैमाने पर अब की जाने लगी हैं, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक पोस्ट में तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को ही मुसलिम साबित कर दिया गया है, ठीक उसी तरह जिस तरह 2014 के पहले से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को मुसलमानों का वंशज बताते यह साबित कर दिया गया कि उन के दादा यानी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी तो फिरोज गांधी, बल्कि जवाहरलाल नेहरू के पिता मोतीलाल नेहरू भी मुसलमान थे. यानी नरेंद्र मोदी के पहले तक अप्रत्यक्ष रूप से शासन मुसलमानों का ही रहा है और अब हिंदुओं की बारी है. भाजपा सरकारें योगी और मोदी के खिलाफ महसूस की जाने वाली पोस्ट पर तुरंत पुलिस कार्यवाही शुरू कर देती हैं पर इन को छू भी नहीं रहीं.

राजनीति धर्म को ज्यादा ताकत देती है या धर्म राजनीति को, यह बात कतई सोचने की नहीं रह गई है क्योंकि 2019 का चुनाव धार्मिक मुद्दों पर लड़ा गया था और राहुल गांधी का तमाम वक्त खुद को हिंदू साबित करने की कोशिश में जाया हुआ था.

नरेंद्र मोदी हिंदुत्व के नायक के तौर पर पेश किए गए और अब उन की भूमिका को यह कहते विस्तार दिया जा रहा है कि बालाकोट एयर स्ट्राइक तो एक ट्रेलर भर था, असली फिल्म तो अभी बाकी है. यानी 2024 तक जम्मूकश्मीर से कानून की धाराएं 370 और 35-ए खत्म हो जाएंगी और देश हिंदू राष्ट्र बनने की दिशा में निर्णायक कदम उठा चुका होगा. अफसोस की बात तो यह है कि इस दुष्प्रचार में नरेंद्र मोदी को राजनीति के नहीं, बल्कि हिंदुत्व के नायक और अवतार के रूप में पेश किया जा रहा है.

इस धार्मिक ड्रामे का मकसद बेहद साफ है कि बाद में जो होगा सो होगा, लेकिन हालफिलहाल तो मुसलमानों को इतना दबा दिया जाए कि वे सालों तक सिर न उठा पाएं. इस बवंडर में कोई लोकतंत्र  और संविधान की बात नहीं कर रहा और जो कर रहे हैं वे साफतौर पर यह भी कहने लगे हैं कि अगर देश है तो आखिरकार हिंदुओं का ही, फिर इस पर तर्ककुतर्क क्यों?

निशाने पर दलित

भाजपा के प्रचंड बहुमत में आने और नरेंद्र मोदी के फिर प्रधानमंत्री बनने से बौराए सवर्ण एक तीर से दूसरा मुख्य निशाना साध रहे हैं. ऊपर बताई पहली पोस्ट में जिन धार्मिक प्रतीकों और कर्मकांडों को अपनाने की बात की गई है वे दलितों के लिए कभी नहीं रहीं. 2014 के पहले से ही दलितों के हाथ में छोटेमोटे देवीदेवता थमा दिए गए थे लेकिन उस के बाद के 5 साल में तो दलितों के छोेटेछोटे मंदिरों की बाढ़ सी देशभर में आ गई. इन सब में राम, कृष्ण, विष्णु, लक्ष्मण को पूजने का अधिकार दलितों व पिछड़ों को नहीं दिया गया है. वे बहुत स्थानीय देवीदेवता पूजते हैं.

यह षड्यंत्र सालों से बड़े पैमाने पर रचा जा रहा था जिस का आंशिक खुलासा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यह कहते किया था कि हनुमान दलित थे और फिर हनुमान को ही हथियार की तरह इस्तेमाल करते उन्होंने बड़े फख्र से लोकसभा चुनावप्रचार में यह भी कहा था कि उन के (मुसलमानों) के पास अली है तो हमारे (हिंदुओं के) पास बजरंग बली है. रामायण व महाभारत में जिस तरह का उल्लेख हनुमान के बारे में है, वह वही है जो आदित्यकाल में ही मोदी ने कहा.

बात कतई नई नहीं है. मुगलकाल के दौर से ही दलितों को मुसलमानों से धर्म के नाम पर लड़वाया जाता रहा है. दलित भी यह सोच कर मुसलमानों से भिड़ जाया करते थे कि ऐसा करने से ऊंची जाति वाले हिंदू खुश हो कर उन्हें अपना लेंगे और मुख्यधारा से जुड़ने का मौका देंगे जिस से वे भी स्वाभिमान और आत्मसम्मान से जी सकेंगे. हालांकि ऐसा कभी नहीं हुआ. सेनाओं से बढ़ते दलितों और पिछड़ों को दुत्कार ही मिली है.

इस में शक नहीं कि 2014 और 2019 दोनों आम चुनावों में कुछ दलितों ने भाजपा को वोट दिया लेकिन इस का यह मतलब नहीं निकाला जा सकता कि इस समुदाय ने ऊंची जाति वाले हिंदुओं की यह शर्त स्वीकार कर ली है कि भैरव, शनि, काली, राहू, केतु और नंदी जैसे देवीदेवता तुम ले लो और विष्णु, राम और कृष्ण हमारे रहेंगे. शिव को सभी लोग इच्छानुसार पूज सकते हैं लेकिन दलित बस्तियों में उन का भी मंदिर नहीं होगा.

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इतना ही नहीं, यह बात भी अब किसी से छिपी नहीं रही है कि दलित जातियों के देवीदेवताओं और महान पुरुषों के पूजापाठ का चलन भी तेजी से बढ़ रहा है. कबीर, रैदास और विश्वकर्मा सहित तमाम दलित विचारकों की जयंतियां सरकारी स्तर पर समारोहपूर्वक मनाई जाने लगी हैं. भीमराव अंबेडकर भी नहीं बख्शे गए हैं जिन्हें दलित समुदाय अपना भगवान मानता है और बाकायदा उन की पूजा करने लगा है.

दिक्कत यह है कि दलित समुदाय ही पिछले 5 सालों में 2 फाड़ हो गया है. उत्तर प्रदेश के नतीजों ने साफ कर दिया है कि बसपा वहीं ज्यादा जीती है जहां जाटव, चमार समुदाय के लोग ज्यादा हैं. बाकी दलितों, वाल्मीकि, निषाद वगैरह ने थोक में भाजपा के राष्ट्रवाद के नाम पर उसे वोट दिए हैं.

इन समीकरणों के दूरगामी परिणाम जब निकलेंगे तब क्या होगा, इस सवाल से पहले देश के मौजूदा कट्टर होते माहौल पर चिंता की जानी जरूरी है जिस में सवर्ण वर्णव्यवस्था थोपने पर उतारू हो रहे हैं और अब तो बड़े फख्र से ऊंची जाति वाले यह भी कहने लगे हैं कि अगर नरेंद्र मोदी मंदिर जाते हैं, पूजापाठ, हवन, अभिषेक करते हैं तो इस में हर्ज क्या है. यह तो हम हिंदुओं के लिए गर्व की बात है कि आजादी के बाद पहला प्रधानमंत्री हमें मिला जो अपने धर्म और संस्कृति को सम्मान सार्वजनिक रूप से देता है.

हर्ज ही हर्ज

ये मुट्ठीभर ऊंचे हिंदू, दरअसल, भरे पेट हैं जिन्हें देश, संविधान और लोकतंत्र जैसे शब्द बकवास लगते हैं. ये चाहते हैं कि धरती, आसमान, हवा, पानी सहित अंतरिक्ष भी इन का रहे और मुसलमान या तो खदेड़ दिए जाएं या फिर दलितों की तरह इतने दबा दिए जाएं कि कम से कम 2050 तक तो सिर न उठा पाएं.

इन ऊंची जाति वालों की मंशा आरक्षण खत्म करने की है और इस बाबत ही वे सोशल मीडिया पर आरक्षण विरोधी पोस्ट वायरल किया करते हैं जिन का मकसद दलितों की हिम्मत तोड़ना होता है. कुछ बुद्धिमान दलित ही इस चाल को समझ पाते हैं और दूसरे दलितों को खतरे से आगाह भी कर रहे हैं. अब इस दिलचस्प जंग में कौन कितना कामयाब रहा, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा.

लेकिन हार देश और अर्थव्यवस्था रहे हैं जिन की परवा या चिंता किसी को नहीं कि जब बेरोजगारी का बम फट रहा है तो अब हालात क्या हो सकते हैं. जिस तेजी से जातिवाद और धार्मिक द्वेष बढ़ रहा है वह कभी अगर दंगों की शक्ल में सामने आया तो क्या होगा. पश्चिम बंगाल में तो आएदिन हिंसा होने लगी है. यह सोचना फुजूल की बात है कि वहां तृणमूल और भाजपा कार्यकर्ता लड़तेमरते हैं, बल्कि यह लड़ाई कट्टर हिंदुओं और निचले हिंदुओं के बीच की है जिस में भाजपा अपना फायदा लोकसभा चुनाव में 18 सीटों की शक्ल में उठा चुकी है. अब उस की नजरें विधानसभा चुनाव पर हैं.

नरेंद्र मोदी लोगों के रोल मौडल बनें, यह कतई हर्ज की बात नहीं. हर्ज की बात है निरंकुश होते कट्टरवादियों पर किसी अंकुश का न होना. आज जो लोग सोशल मीडिया पर द्वेष फैलाते हल्ला मचा रहे हैं वे ही कल सड़कों पर भी आ सकते हैं. इस खतरे से परे नरेंद्र मोदी और अमित शाह का देवताओं की तरह मुसकराते, सबकुछ खामोशी से देखते रहना एक विस्फोट को आमंत्रण है जिस के जिम्मेदार उन से ज्यादा वे सवर्ण होंगे जो माहौल खराब कर रहे हैं.

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मेरे पति शहर में कौलगर्ल्स के साथ समय बिताते हैं, क्या करूं?

सवाल

मेरे पति हाल ही में अधिकारी पद से सेवानिवृत्त हुए हैं. मेरे 2 बच्चे हैं जो शादीशुदा जिंदगी बिता रहे हैं और दूसरे शहर में रहते हैं. पति नौकरी से रिटायर्ड हुए तो सोचा अब बाकी की जिंदगी चैन से बिताएंगे. मगर पति के बदले व्यवहार से हैरान हूं. दरअसल, पति महीने में 2-4 दिन दूसरे शहर जाते हैं और वहां कौलगर्ल्स के साथ समय बिताते हैं. ये सब मुझे उन के मोबाइल से पता चला है. दूसरी बड़ी परेशानी घर पर आए दिन होने वाली पार्टियां हैं, जिन में खानेपीने के साथ शराब का दौर भी खूब चलता है और पार्टी में साथ देने ननदें भी आ जाती हैं, जो आसपास ही रहती हैं. कभीकभी लगता है कि ये सारी जानकारी अपने बच्चों को दे दूं, पर फिर यह सोच कर नहीं देती कि अपने पिता के इस घिनौने चेहरे को देखने के बाद पिता और बच्चों के आपसी रिश्ते खराब हो जाएंगे. मैं ने पति को कई बार समझाने की कोशिश की पर जवाब यही मिलता है कि सारी उम्र तुम सभी के लिए बिता दी अब बस अपने लिए जीऊंगा. मुझे कोई रास्ता नहीं दिख रहा है कि किस तरह पति को सही रास्ते पर लाऊं. कृपया बताएं मैं क्या करूं?

जवाब

बढ़ती उम्र के साथ न तो चाहतें कम होती हैं और न ही शारीरिक जरूरतें. यह अच्छा है कि आप के बच्चे अपने पैरों पर खड़े हैं और अच्छी जिंदगी बिता रहे हैं. तब तो आप के पास भी समय होगा कि आप भी खुल कर पुरानी यादों को ताजा करें और पति के साथ अधिक से अधिक समय बिताएं.

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बेहतर होगा कि आप भी खुद को बुजुर्ग न समझ कर जमाने के साथ चलिए. सजिएसंवरिए,पति के साथ फिल्म देखने, मौल घूमने, शौपिंग आदि करने से आप को भी पति का सामीप्य पसंद आने लगेगा. पति में थोड़ा परिवर्तन आए तो उन्हें प्यार से समझाबुझा सकती हैं. आप अपनी ननदों से भी कह सकती हैं कि उन का घर पर तभी स्वागत किया जाएगा जब शराब आदि बुरी चीजों से वे दूर रहें. बेहतर होगा कि आप भी उनकी पार्टी में शामिल रहें, मगर इस शर्त पर कि वहां शराब का दौर नहीं चलेगा.

इस सब के बावजूद पति और ननदें सही रास्ते पर आती न दिखें तो आप सख्ती से पेश आ सकती हैं. बात बिगड़ती दिखे तो बच्चों से सारी बात शेयर कर सकती हैं.

वैसे, इस उम्र में विवाहित पुरुष अथवा स्त्री दोनों को ही एकदूसरे की जरूरत अधिक होती है, क्योंकि यह उम्र आने तक बच्चे भी सैटल हो कर अपनेअपने परिवार व कैरियर बनाने में व्यस्त हो जाते हैं. पति के साथ अधिक से अधिक रहेंगी तो उन्हें भी आप का साथ भाएगा और संभव है कि वे सही रास्ते पर आ जाएं.

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ऐसे बनाएं एप्पल मास्क

क्या आप अपनी त्वचा के बारे में दिनभर सोचती रहती हैं? क्या आपकी त्‍वचा थकी हुई और बेजान सी लगने लगी है तो एप्‍पल मास्‍क आपके लिए काफी फायदेमंद हो सकता है. सेब में विटामिन ए, बी, सी और एंटीऔक्‍सीडेंट गुण पाए जाते हैं, जो कि आपकी त्‍वचा को तुरंत ही गंदगी से राहत दिलाने में कारगर होते हैं. अपनी त्वचा पर तुरंत निखार लाने के लिये आप एप्‍पल मास्‍क बना कर लगा सकती हैं. आइये जानते हैं एप्‍पल मास्‍क और उससे मिलने वाले सौंदर्य लाभ के बारे में.

ऐसे बनाएं एप्‍पल मास्‍क

एक सेब लीजिये और उसके गूदे को चेहरे पर पीस कर 20 मिनट लगाइये. इसके बाद चेहरे को पानी से धो लीजिये. धोने के बाद चेहरे पर क्रीम लगा लीजिये. यह मास्‍क हर तरह कि स्‍किन पर काम करता है और लाभ भी पहुंचाता है.

चेहरे से काले धब्‍बे और झाइयां मिटाने के लिये आप आधा सेब काट कर उसका पेस्‍ट बना कर क्रीम वाले दूध के साथ मिक्‍स कर के चेहरे पर लगा सकती हैं.

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एप्‍पल मास्‍क के सौंदर्य लाभ

  1. एप्‍पल मास्‍क सनबर्न से निजात दिलाते हैं. इसमें ग्‍लाईकोलिक एसिड होता है जो कि त्‍वचा के पोर्स को अंदर से साफ करता है. साथ ही ये त्‍वचा से डेड स्‍किन को साफ कर के त्‍वचा को गोरा बनाता है.

2. झाइयां मिटाने मे इसका कोई जवाब नहीं. साथ ही अगर त्‍वचा पर मुंहासों ने परेशान कर रखा है तो भी एप्‍पल मास्‍क बहुत लाभदायक होता है.

3. रोजाना सेब खाने से झुर्रियां नहीं पड़ती.

4. आंखों के डार्क सर्कल कम करने के लिये आप एप्‍पल का स्‍लाइस काट कर उसे आंखों पर लगा सकती हैं.

5. यह त्वचा पर तेल को भी कम करता है. मुंहासों के लिये एप्‍पल मास्‍क बहुत ही फायदेमंद है. यह त्‍वचा को नमी प्रदान करता है.

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वाल रैक से दें अपने घर को स्टाइलिश लुक

घर की सजावट में दिवारें सबसे अहम होती हैं. अक्सर पुराने समय में खाली दिवारों पर तस्वीरें लगा दी जाती थीं, जिससे  दीवारें खिल उठती थीं.

वैसे ही समय के साथ वाल डेकोरेशन में और चीजें जुड़ने लग गई है. आपकी दीवारों को सजाने के लिए आज टिप्स बताते हैं.

  1. आज दीवारों पर तस्वीर के बजाय वाल रैक ने ले ली है. ये जगह भी कम लेती है और देखने में भी बहुत स्टाइलिश लगती है.
  2. आप चाहें तो खुद की पसंद से भी वाल रैक बनवा सकती हैं लेकिन बाजार में भी आपको कई तरह के डिजाइन में वाल रैक आसानी से मिल जाएंगे.
  3. छोटे घर के लिए आप मल्टीपर्पज वाल रैक का बखूबी इस्तेमाल कर सकती हैं, जिसमें शोपीस और किताबें भी रखी जा सकती हैं.
  4. ऐसे घरों के लिए स्लाइडिंग डोर वाले रैक बैस्टऔप्शन है. घर का इंटीरियर रौयल लुक का है तो इसके साथ मैचिंग वालनट वुडेन कार्विंग वाल रैक बहुत अच्छे लगते हैं. वाल रैक में आप महंगी क्राकरी या फिर डेकोरोटिव आइट्म्स भी रख कर सकती हैं.

कर्नाटक का नाटक खत्म, नया नाटक शुरू

कर्नाटक में सियासी घमासान के बीच कांग्रेस और जेडीएस की सरकार गिर तो गई पर इस से पहले इतना नाटक होगा और इस के नायक और खलनायक इतने जल्दी जल्दी बदलेंगे इस का अनुमान उन्हें ही था जिन्हें राजनीतिक नाटक के रंगमंच को पलपल बदलते रंगों से रंगने में महारत हासिल हो.

बहरहाल, इस राजनीतिक उठापठक में सरकार के पक्ष में 99 जबकि भाजपा के पक्ष में 105 विधायक रहे. इस हार के साथ जहां पूर्ववत सरकार के नेताओं के चेहरे बुझे हुए थे, वहीं  भाजपा नेताओं के चेहरे पर खुशी साफ दिखाई दे रही थी.

नहीं मिला विधायकों का साथ

मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी को संख्या बल का साथ नहीं मिला और उन्हें विश्वास मत प्रस्ताव पर 4 दिन की चर्चा के खत्म होने के बाद हार का मुंह देखना पड़ा. विधानसभा में पिछले बृहस्पतिवार को उन्होंने विश्वास मत का प्रस्ताव पेश किया था.

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विधानसभा अध्यक्ष के आर रमेश कुमार ने ऐलान किया कि 99 विधायकों ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया है जबकि 105 सदस्यों ने इस के खिलाफ मत दिया है. इस प्रकार यह प्रस्ताव गिर गया.

कुरसी क्या राजनीति छोड़ सकता हूं: कुमारस्वामी

नतीजों से उदास हो कर मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने मीडिया से बातचीत में कहा,”विश्वास मत की कार्यवाही को लंबा खींचने की मेरी कोई मंशा नहीं थी. मैं विधानसभा अध्यक्ष और राज्य की जनता से माफी मांगता हूं. चर्चा चल रही है कि मैं ने इस्तीफा क्यों नहीं दिया और कुरसी पर क्यों बना हुआ हूं? जब विधानसभा चुनाव का परिणाम आया था, मैं राजनीति छोड़ने की सोच रहा था.”

कुमारस्वामी ने कहा कि मुझे कुरसी की चिंता नहीं है और न ही लालच. मैं तो आज भी कुरसी क्या राजनीति तक छो़ड़ सकता हूं.

राहुल गांधी का तंज

कर्नाटक में राजनीतिक घटनाक्रम पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने तंज कसते हुए कहा,”उन के लालच की आज जीत हो गई. लोकतंत्र, ईमानदारी और कर्नाटक की जनता हार गई…”

इस बीच बेंगलुरु में धारा 144 लगा दिया गया है. पब, शराब की दुकानें 25 तारीख तक बंद कर दी गई हैं. इस बात की पुष्टि करते हुए बेंगलुरू के पुलिस आयुक्त आलोक कुमार ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा,”अगर कोई भी नियमों का उल्लंघन करता हुआ पाया जाता है, तो सख्त कार्रवाई की जाएगी.”

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अगली सरकार किस की

सरकार गिरने के बाद अब भाजपा सरकार बनाने का दावा पेश करेगी. इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कुमारस्वामी ने कहा है कि देखते हैं यदुरप्पा कितने दिनों तक सरकार बचा कर रख पाते हैं.

बहरहाल, यह तय है कि सरकार भाजपा की ही बनेगी पर जिस तरीके से वहां की सरकार को अस्थिर किया गया, सियासी पासे से राजनीति की बिसात बिछा कर शहमात का खेल खेला गया उस से यह तय जरूर हो गया कि नेताओं के लिए जनता नहीं कुरसी प्यारी है. तो क्या अब मध्य प्रदेश की बारी है?

क्या बढ़ती उम्र से डरते हैं सलमान खान ?

हाल ही में सलमान खान की फिल्म ‘भारत’ ने बौक्स औफिस पर कई नए रिकौर्ड बनाए और जमकर कमाई की. आपको बता दें, जल्द ही सलमान खान अपनी अगली फिल्म ‘दबंग 3’ के साथ दर्शकों के बीच होंगे. पिछले दो भागों की तरह सलमान की ये फिल्म भी एक्शन से भरपूर है.

सलमान खान के लिए इतने एक्शन सीन करना कितना मुश्किल है, इस बारे में सलमान खान ने हाल ही में खुलासा किया है. मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक सलमान ने बताया कि इस उम्र (53 वर्ष) में एक्शन करना उनके लिए काफी मुश्किल है. इतना ही नहीं कई बार बढ़ती उम्र उन्हें परेशान भी करती है.

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सलमान ने कहा, वैसे तो हमेशा से एक्शन करता आ रहा हूं इसलिए मेरी बौडी को इसकी आदत है लेकिन एक वक्त के बाद ये परेशान कर देते हैं. क्योंकि हर एक एक्शन सीन की कम से कम 5-6 बार रिहर्सल करनी पड़ती है. इसमें बहुत गिरना पड़ना शामिल है. हर एक सीन में इतनी एनर्जी चाहिए होती है कि सीन करते करते ही थक जाते हैं, जब तक को चोट न लग जाए हम करते रहते हैं.

 

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वहीं, जब सलमान से पूछा गया कि क्या कभी उन्हें भी बढ़ती उम्र का डर सताता है? तो इसके जवाब में उन्होंने कहा, बढ़ती उम्र किसी को भी डरा सकती है. आपको पहले से ज्यादा हार्ड वर्क करना होता है. आपको हमेशा अपना बेस्ट देना होता है. तुम पहले की तरह अनुशासनहीन नहीं रह सकते.

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इस एक्ट्रेस को लौन्च करेंगे करण जौहर, आलिया भट्ट से है ये कनेक्शन

अपनी फिल्मों में नए कलाकारों को लगातार ब्रेक देते आ रहे फिल्मकार करण जौहर अब ‘नेटफ्लिक्स’ ओरीजनल के तहत बना रहे वेब फिल्म ‘‘गिल्टी’’ में किआरा अडवाणी के साथ आकांक्षा रंजन को ब्रेक दे रहे हैं. सूत्रों के अनुसार 25 वर्षीय आकांक्षा रंजन और किआरा अडवाणी दोनों के किरदार इस फिल्म में बराबर के हैं. इस फिल्म की शूटिंग दिल्ली में की जा चुकी है. कुछ हिस्सा मुंबई में फिल्माया जाना है. फिर सितंबर माह में ‘नेटफ्लिक्स’ पर आएगी.

कनिका ढिल्लों लिखित और रूचि नारायण निर्देशित फिल्म ‘‘गिल्टी’’ छोटे शहर की लड़की द्वारा कौलेज की धड़कन बन चुके लड़के पर बलात्कार का आरोप लगाने के पीछे के सच के कई पहलुओं का चित्रण करती है. छोटे शहर की लड़की (आकांक्षा रंजन) द्वारा कौलेज के इस लड़के पर बलात्कार का आरोप लगाए जाने के बाद लड़के की प्रेमिका व संगीतकार (किआरा अडवाणी) इस मामले सवाल उठाती है कि असली दोषी कौन है? पूरी फिल्म लड़के की प्रेमिका व संगीतकार (किआरा अडवाणी) के नजरिए से चलती है.

 

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मशहूर अदाकारा आलिया भट्ट की दोस्त आकांक्षा रंजन की परवरिश कुछ हद तक फिल्मी माहौल में ही हुई है. आकांक्षा रंजन, “इंडियन टेलीवीजन अकादमी’’ के संस्थापक अनु व शशि रंजन की बेटी हैं. शशि रंजन कुछ सीरियलों का निर्माण कर चुके है.

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मौडलिंग की दुनिया में आकांक्षा रंजन एक जाना पहचाना नाम है. वह फैशन डिजायनर मनीश मल्होत्रा, नीता लुल्ला और विक्रम फडनवीस के लिए मौडंलिंग कर चुकी हैं. वह अंकित तिवारी के सिंगल गाने ‘‘तेरे दो नैन’’ में अपराशक्ति खुराना के साथ नजर आ चुकी हैं. सोशल मीडिया पर फैशनिस्टा के रूप में उनकी पहचान है. सुभाष घई के एक्टिंग सकूल ‘‘व्हिशिलंग वूड’’से अभिनय मे डिप्लोमा हासिल करने के अलावा ‘इंडियन टेलीवीजन अकादमी’ से एक वर्ष का अभिनय का कोर्स कर चुकी हैं. वह टीएलसी के फैशन सीरीज ‘‘डिकोडेड’’ का भी हिस्सा रह चुकी हैं. और अब वह औडीशन देने के बाद फिल्म ‘‘गिल्टी’’ से जुड़ी हैं.

ज्ञातब्य है कि आकांक्षा रंजन की बड़ी बहन अनुष्का रंजन ने 2015 की असफल रोमांटिक कौमेडी फिल्म ‘‘वेडिंग पुलाव’’ से बौलीवुड में कदम रखा था, पर फिर कुछ हुआ नहीं.

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यात्रा में बचें ठगी से

भारत में पर्यटकों को ठगने का एक लंबा इतिहास रहा है. लेकिन हां, बदलते दौर के साथ ठगी का चेहरा भी बदल गया है. इस ने अब गुरूकंटाल, ट्रैवल एजेंट, गाइड, दुकानदार, अजनबी दोस्त और टैक्सी ड्राइवरों की शक्लें अख्तियार कर ली हैं. कुछ बानगियों पर गौर फरमाएं. मार्च 2016 में जयपुर के करधनी थाने में एक युवक ने विदेश यात्रा के दौरान एटीएम से पैसे निकालने का मामला दर्ज करवाया. इस मामले में युवक सऊदी अरब गया था जहां उस ने अरब के जैता शहर से ट्रांजैक्शन किए. उस के कुछ देर बाद उस मोबाइल पर एक मैसेज आया कि 1,777 डौलर यानी तकरीबन

1 लाख 20 हजार रुपए निकाल लिए गए. ऐसी घटना आप के साथ भी हो सकती है. अक्तूबर 2015 में अजमेर में एक फाउंडेशन सोसायटी के बैनर तले कई बुजुर्गों को धार्मिकयात्रा कराने का सपना दिखा कर कुछ लोग हजारों रुपए ले कर फरार हो गए. इस के लिए कुछ लोगों ने 2 दिन पूर्व घरघर जा कर परचे बांटे थे. कुछ लोग इन के झांसे में आ गए और जब यात्रा पर जाने की बारी आई तो पछताने के अलावा उन के पास कुछ नहीं बचा था.

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10 जनवरी, 2014 हिमाचल प्रदेश के शिमला में गुजरात से आए दो विकसित जोड़ों को शिमला बेस्ड ट्रैवल एजेंसी ने लूट लिया. 12 दिनों के पैकेज के एवज में पूरा शहर घुमाने के लिए 34 हजार रुपए ले कर दूसरे दिन ही एजेंट फरार हो गए. मामला मनाली थाने में दर्ज है. दरअसल, जब मौल में सिल्वी ने अपने क्रैडिट कार्ड से भुगतान किया तभी उस के कार्ड की क्लोनिंग कर ली गई. इस पर्यटक ने जब तक अपना खाता चैक किया तब तक उस की पूरी जमापूंजी निकाली जा चुकी थी. पर्यटकों से ठगी की ये तो महज बानगी हैं. आएदिन पर्यटकों के साथ ठगी के मामले किसी न किसी अखबार की सुर्खियां बनते रहते हैं. फिर वह घटना चाहे दिल्ली की हो या आगरा, राजस्थान या बिहार की. देश के लगभग हर पर्यटन स्थल के नजदीकी थानों में पर्यटकों से ठगी की सैकड़ों शिकायतें दर्ज हैं. इसलिए आप भी कहीं पर्यटन का मन बना रहे हैं तो जरा सावधान रहें.

ट्रैवल एजेंटों से रहें सावधान

अकसर हम समय बचाने के लिए अपनी यात्रा की योजना किसी ट्रैवल एजेंट के माध्यम से बना लेते हैं. एजेंट हमें ऐसे लुभावने पैकेज देते हैं कि हम उन पर सहज ही भरोसा कर लेते हैं. ट्रैवल एजेंट बस, टैक्सी, गाइड से ले कर होटल और खाने तक का चुनाव स्वयं करते हैं और इस तरह से वे हमारी पूरी यात्रा नियंत्रित करते हैं. दिल्ली में बतौर सौफ्टवेयर इंजीनियर एक कंपनी में काम कर रहे अनूप गंगवार ने पर्यटन की योजना बनाई. इस के लिए उन्होंने पुरानी दिल्ली की एक ट्रैवल एजेंसी से संपर्क किया. एजेंसी ने उन्हें जयपुर की यात्रा का लुभावना पैकेज थमा दिया. अनूप जयपुर के उस होटल में पहुंचे जहां उन का कमरा बुक था. पूछने पर वहां के मैनेजर ने उन्हें बताया कि आप के नाम से होटल में कोई कमरा बुक नहीं हुआ है. आननफानन उन्होंने अपने ट्रैवल एजेंट को फोन किया. फोन स्विच औफ मिला. काफी देर हो चुकी थी. वे ठगे जा चुके थे. इसलिए पहले अच्छी तरह से जांचपड़ताल कर लें तभी ट्रैवल एजेंटों को पैसा दें.

चुनें सही गाइड

अनजान और नए शहरों में अकेले घूमना न तो संभव होता है और न ही सुरक्षित माना जाता है. ऐसे में एक गाइड की जरूरत तो पड़ती ही है. बहुत लोग बिना गाइड के भी घूमतेफिरते हैं, लेकिन जिज्ञासु किस्म के पर्यटक घूमने के साथ जानकारी जुटाने के लिए गाइड को प्राथमिकता देते हैं. लेकिन यह भी सच है कि आजकल फर्जी गाइडों के ठगी के किस्से आम हो चले हैं. इसलिए यह बहुत माने रखता है कि आप सही गाइड का चयन करें. नई जगह पर गाइड का काम बिलकुल वैसा ही होता है जैसे अंधे के लिए लकड़ी का सहारा. इसलिए हमेशा रजिस्टर्ड, लाइसैंसधारी और सरकारी गाइडों पर ही भरोसा करना चाहिए.

गुरूकंटालों से बचें

कुछ समय अगर आप किसी धार्मिक स्थल में बिताने की सोच रहे हैं तो आप को अधिक सावधान रहने की जरूरत है. क्योंकि इन स्थलों में भले ही आप को चमत्कारिक दर्शन न हों लेकिन फर्जी पंडों के दर्शन जरूर हो जाएंगे. ये पूरे गेटअप में ठगी के लिए तैयार रहते हैं. पंडे कई बार इतनी सफाई से ठगते हैं कि ठगे हुए व्यक्ति को एहसास भी नहीं हो पाता कि वह ठगा जा चुका है. जटाओं और गेरुए वस्त्रों से सजे बाबाओं को देख कर अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है कि साधु कौन है और शैतान कौन. ठगी के इस खेल में पंडे देशीविदेशी पर्यटकों में जरा भी फर्क नहीं करते हैं. यानी दोनों की जेबों के लिए इन के पास एक ही कैंची रहती है. बाकायदा सब के अपनेअपने इलाके बंटे होते हैं. लोग गंगा स्नान, क्रियाकर्म के लिए आते हैं. पापपुण्य के चक्कर में पंडे उन्हें फंसाते हैं कि वे खुद को उन के चरणों में समर्पित कर देते हैं. उन को अपने पापों से छुटकारा मिले न मिले, पंडों के कमंडल अवश्य भर जाते हैं.

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लुटेरे टैक्सी ड्राइवरों से सावधान

कोई भी यात्रा बिना आटोटैक्सी के मुमकिन ही नहीं है. टैक्सी ड्राइवर ही कम से कम समय में नईनई जगहों तक पहुंचा कर आप का कीमती समय बचाते हैं. कई बार तो ये गाइड का काम भी कर लेते हैं. लेकिन सभी टैक्सी ड्राइवर ऐसे नहीं होते हैं. कुछ ऐसे भी होते हैं जो आप को ठगने का काम करते हैं. वे कम दूरी को घुमाफिरा कर इतना लंबा कर देते हैं ताकि बेहिसाब किराया वसूला जा सके. कई टैक्सी ड्राइवर आप को ऐसे होटलों में ले जाते हैं, जहां उन की पहले से ही सैटिंग होती है. वहां पहुंचते ही वे अपना कमीशन ले कर रफूचक्कर हो जाते हैं और किसी घटिया होटल में आप उसे कोसने के सिवा कुछ नहीं कर पाते.

कई टैक्सी ड्राइवर नाम के लिए टैक्सी चलाते हैं, उन का असली काम ठगी का होता है. जहां नया पर्यटक देखा, उसे कहीं छोड़ने के बहाने अपने इलाके में ले जा कर अपने गैंग के साथ न सिर्फ लूटते हैं बल्कि कई बार महिला यात्रियों के साथ बदसलूकी भी करते हैं. ऐसे में इन ठगों से बचने के लिए सरकारी कैब या रेडियो टैक्सी पर ही भरोसा करें.

फेरीवालों से बचें

कई बार ट्रैफिक लाइट और फुटपाथ पर वैंडर किताब, घड़ी, चश्मों से ले कर कई तरह की चीजों को ब्रैंडेड बता कर बेचने की कोशिश करते हैं. कुछ लोग ऊंची कीमत में इन से कुछ ऐसा खरीद लेते हैं जो बाद में नकली निकलता है. दिल्ली के कनाट प्लेस में तो यह नजारा आम है.

हर अजनबी दोस्त नहीं

अकसर ट्रेन और बसों में ऐसे दिलचस्प इंसानों से मुलाकात हो जाती है जो हंसमुख और बातूनी किस्म के होते हैं. इन का बात करने का तरीका इतना अच्छा और प्रभावी होता है कि कई लोग इन से जानपहचान बना लेते हैं. नतीजतन, औपचारिक मुलाकात एक मुकम्मल साथी होने तक पहुंचने लगती है. धीरेधीरे वह अजनबी आप से कई जानकारियां ले लेता है. इन्हीं जानकारियों की बदौलत आप ठगे जाते हैं. इन हालात में इन की शिकायत भी नहीं हो सकती क्योंकि उस अजनबी द्वारा दी गई सभी जानकारियां गलत होती हैं. इसलिए अनजान शहर में किसी से इतनी जल्दी दोस्ती नहीं करनी चाहिए.

दुभाषिए का रखें इंतजाम

नए इलाकों में भाषाई समस्या भी ठगी का कारण बन जाती है. अपनी बात सही तरह से न समझा पाने के कारण ठग किस्म के लोग इस कमजोरी का काफी फायदा उठाते हैं. आप किसी को अपनी जबान में कुछ और समझाते हैं और सामने वाला कुछ और ही समझ जाता है. इस गलतफहमी में पता चलता है कि आप ठगी का शिकार हो चुके हैं. इसलिए इस समस्या से नजात पाने के लिए किसी गाइड या दुभाषिए की मदद जरूर लें.

मुद्रा बदलने के दौरान चौकसी

इस तरह की ठगी का शिकार विदेशी पर्यटक अधिक होते हैं. किसी भी विदेशी पर्यटक का पहला काम देश में मुद्रा को बदलना होता है. इस के लिए ये मनी ऐक्सचैंजर की मदद लेते हैं. कई बार ऐसा होता है कि लंबी लाइनों से बचने के लिए विदेशी सैलानी किसी ऐसे मनी ऐक्सचैंजर की मदद ले लेते हैं जो गैरकानूनी तरीके से यह काम कर रहे होते हैं. इस तरह से सैलानी अपनी असली मुद्रा गंवा बैठता है और हाथ आती है तो नकली करैंसी, जिस से वह कुछ भी खरीद नहीं सकता. इसलिए ध्यान रखना चाहिए कि मुद्रा का ऐक्सचैंज लाइसैंसी ऐक्सचैंजर से किया जाए. कुल मिला कर पर्यटन के दौरान अगर किसी भी तरह की अनहोनी या ठगी से बचना चाहते हैं तो जरा सावधानी बरतें.

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सावन में शिव भक्ति की आड़ में अंधविश्वास

सावन भगवान शिव के लिए जाना जाता है इस बार सावन में चार सोमवार पड़ेंगे जिसकी शुरुआत हो चुकी है…श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ेगी और शिवालयों को सजाया जाएगा साथ ही इस बार भी लोग अपनी श्रद्धानुसार व्रत रखेंगे और भगवान शिव का दूध से अभिषेक करेंगे,लेकिन इस श्रद्धा की आड़ में जो अंधविश्वास फैल रहा है उसका क्या? सबकी अपनी-अपनी श्रद्धा होती है..मैं किसी की श्रद्धा पर सवाल नहीं उठा रही लेकिन यदि अंधभक्त बनकर भक्ति करेंगे तो यह भी ठीक नहीं…

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आज समाज में कितनी गरीबी है,लोग लाचार हैं ,बेबस हैं उनको अपने बच्चों को कुछ खिलाने के लिए पैसे नहीं हैं,घर में अन्न का एक दाना नहीं है…छोटे-छोटे बच्चे दूध के लिए तरसते हैं तो क्या भगवान पर ज्यादा दूध चढ़ाने से वो खुश होंगे? भगवान ने तो कभी नहीं कहा कि मुझपर ही दूध चढ़ाओ तभी मैं प्रसन्न होउंगा. मेरे हिसाब से तो अगर थोड़ा सा भी दूध श्रद्धानुसार चढ़ा लो और कुछ गरीबों को दो.. दूध को बर्बाद न करो यही सच्ची भक्ती होती है. हम मंदिरों में फूल- मालाएं चढ़ाते हैं फिर क्या होता है उन्हें एक साइड करके फेंक दिया जाता है और वो भी बर्बाद होतें हैं फिर उन्हीं फूल-मालाओं को जानवर खाते हैं जिससे वो भी बिमार होते हैं या फिर तो वो सड़ जाते हैं जिससे और भी ज्यादा बिमारियां होने का खतरा बनता है….इतना ही नहीं मंदिर भी गंदा हो जाता है क्या भगवान को गंदगी पसंद है? मंदिर को जितना साफ रखा जाए उतना ज्यादा अच्छा होता है. भला ये इस किस तरह की श्रद्धा है जिसमें इतने नुकसान है और वस्तुओं की बर्बादी के साथ-साथ लोगों की बिमारी भी है. भक्ति करना गुनाह नहीं है लेकिन ऐसी भक्ति का भी कोई मतलब नहीं है. भगवान की भक्ति के लिए जरूरी नहीं है कि आप ढेर सारे माला-फूल चढ़ाए और दूध चढ़ाए..आपका मन साफ होना चाहिए और सच्ची भक्ति मन से होनी चाहिए तभी ईश्वर भी प्रसन्न रहते हैं.सादगी से जो भक्ति होती है उससे अच्छी भक्ति तो हो ही नहीं सकती है.

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माना कि सावन में  ये मान्यता है कि सावन के सोमवार का व्रत करने से लोगों की मनोकामना पूरी होती है  यहां  तक की लड़किया सोलह सोमवार का व्रत करती हैं अच्छा पति पाने के लिए….आप सब करिए लेकिन इतना भी अंध भक्त मत बनिए की सबकुछ भगवान पर ही छोड़ दें. कुछ अच्छे कर्म करिए. अगर आपके मन में पाप है,आपका मन साफ नहीं तो फिर कितना भी पूजा-पाठ कर लें कभी भी आपकी मनोकामना पूरी नहीं होगी.अच्छे कर्मों का फल भगवान देते हैं. मेरे हिसाब से तो माता-पिता की सेवा से अच्छा कोई भी कर्म नहीं. उनकी सेवा करना ही आपकी सबसे बड़ी भक्ति है…लेकिन मैं ये भी नहीं कहती की आप भगवान की बिल्कुल भी भक्ती न करें उनकी भी अपनी श्रद्धानुसार करें बस चीजों को बर्बाद किए बिना.सावन में कावड़िए भी अपनी भक्ती करते हैं.मैं उनकी भक्ती को भी गलत नहीं ठहरा रहीं हूं क्योंकि मेरे इस लेख से किसी के भी धर्म या भक्ति को ठेस पहुंचाने का उद्देश्य बिल्कुल भी नहीं है.

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