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दुनिया के  मुसलमान अपनों के  शिकार

मुसलमानों की हत्याओं के आंकड़े भयावह हैं. पिछले 15 वर्षों में कोई 3 करोड़ मुसलमान इसलामिक देशों में मारे जा चुके हैं. कहीं आतंकवाद के नाम पर तो कहीं गौहत्या के नाम पर मुसलमान मर रहे हैं. वे दूसरी कौमों के हाथों भी मारे जा रहे हैं और अपनी ही कौम की साजिशों के शिकार भी हो रहे हैं. दुनिया की दूसरी सब से बड़ी कौम की इतनी बड़ी तबाही पर विश्व समुदाय क्यों खामोश है, इस की गहन पड़ताल करती यह रिपोर्ट.

26 अक्तूबर को उत्तरपश्चिमी सीरिया में अमेरिका के विशेष बलों की कार्रवाई में इसलामिक स्टेट यानी आईएस के सरगना अबू बकर अल बगदादी को मार गिराया गया. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मुताबिक बगदादी एक क्रूर और हिंसक व्यक्ति था, लिहाजा उस का खात्मा भी क्रूर और हिंसक तरीके से हुआ. उसे एक ऐसी सुरंग में उस के 3 बेटों के साथ उड़ा दिया गया, जहां से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था. कहा तो यह जा रहा है कि बगदादी ने स्वयं को बारूद से उड़ा लिया, लेकिन इस दावे में कितनी सचाई है, यह कहना मुश्किल है. दुनियाभर का मीडिया बस वही देखसुन रहा है, जो अमेरिकी मीडिया सुना रहा है.

बगदादी एक कथित इसलामिक स्टेट का मुखिया था और पिछले 5 वर्षों से अंडरग्राउंड था. बगदादी 2010 में इसलामिक स्टेट औफ इराक ऐंड सीरिया यानी आईएसआईएस का नेता बना था. इराक के सामर्रा में निम्नमध्यवर्गीय सुन्नी परिवार में 1971 में जन्मे बगदादी का असली नाम इब्राहिम अल-ऊद अल-बदरी था. दुनिया ने उसे अल बगदादी के नाम से जाना. उस का परिवार अपनी धर्मनिष्ठता के लिए जाना जाता था.

बगदादी के परिवार का दावा है कि जिस कबीले से पैगंबर मोहम्मद थे, उसी कबीले से वह भी है. यानी यह परिवार पैगंबर मोहम्मद का वंशज होने का दावा करता है. वर्ष 2004 तक बगदादी बगदाद के पास तोबची में अपनी 2 पत्नियों और 6 बच्चों के साथ रहा. वह स्थानीय मसजिद में पड़ोस के बच्चों को कुरान की आयतें पढ़ाया करता था. उसी दौरान बगदादी के चाचा ने उसे मुसलिम ब्रदरहुड जौइन करने के लिए प्रेरित किया और बगदादी तत्काल ही रूढि़वादी और हिंसक इसलामिक मूवमैंट की तरफ आकर्षित हो गया. जिहादी विचारधारा की ओर अधिक झुकाव रखने के कारण वह इराक के दियाला और सामर्रा में जिहादी पृष्ठभूमि के केंद्रों में से एक केंद्र के रूप में उभरा. वह 2003 में इराक में अमेरिकी घुसपैठ के बाद बागी गुटों के साथ अमेरिकी फौज से लड़ा था. वह पकड़ा भी गया और 2005-09 के दौरान उसे दक्षिणी इराक में अमेरिका के बनाए जेल कैंप बुका में रखा गया था.

2010 में बगदादी इराक के अलकायदा का नेता बन गया. बीते कई सालों से अमेरिका को उस की तलाश थी. इस बीच कई बार ऐसी खबरें उड़ीं कि बगदादी मारा गया, मगर बाद में उस ने कोई न कोई वीडियो जारी कर अपनी मौत की खबरें झुठला दीं.

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अब बगदादी की मौत का सेहरा अपने सिर बांधने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि बगदादी की मौत के बाद दुनिया अब बेहतर और सुरक्षित है. लेकिन क्या सचमुच बगदादी के मारे जाने से आतंकवाद का सफाया हो गया है? यह स्वीकार किए जाने में कोई हर्ज नहीं कि ओसामा बिन लादेन के बाद बगदादी का मारा जाना आतंकवाद के खिलाफ एक बड़ी जीत मानी जा सकती है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ओसामा बिन लादेन को मारने के बाद भी न अलकायदा खत्म हुआ और न ही आतंकवाद. इसी तरह बगदादी की मौत के बाद आईएस या आतंकवाद खत्म हो जाएगा, ऐसा नहीं है. जब तक मुसलमानों के कब्जे में तेल के भंडार हैं, यह लड़ाई खत्म होने वाली नहीं है. अस्तित्व और वर्चस्व की यह लड़ाई वह अपनों से भी लड़ रहा है और गैरों से भी.

दुनियाभर में अगर किसी कौम के लोग बड़ी संख्या में हताहत हो रहे हैं, तो वह है मुसलमान कौम. न हिंदू, न सिख, न ईसाई, न यहूदी, न पारसी. यदि पूरी दुनिया में कोई सब से ज्यादा मारा जा रहा है तो वह मुसलमान है. जमीनों पर वर्चस्व की चाह में उन के धर्मगुरु और कौम के लीडर्स उन्हें आपस में भी लड़वा रहे हैं, मरवा रहे हैं और दूसरी कौमों के हाथों भी मुसलमान मारे जा रहे हैं. एक ओर मुसलिम देश ईसाई और बौद्ध देशों की राजनीतिक साजिशों के शिकार हैं तो दूसरी ओर वे खुद अपनी कौम के दुश्मन बने हुए हैं.

सदियों से जारी इसी कत्लोगारत के चलते मिडिल ईस्ट आज पूरी तरह तबाही की कगार पर पहुंच चुका है. अफगानिस्तान, सीरिया, म्यांमार, चीन, भारत, पाकिस्तान, अमेरिका कहीं भी आम और गरीब मुसलमान सुरक्षित नहीं हैं. पाकिस्तान में मुसलमान बम धमाकों और आतंकी हमलों में मारे जा रहे हैं. जितने बम धमाके हिंदुस्तान में नहीं हुए, उस से ज्यादा पाकिस्तान में हुए, और लगातार हो रहे हैं, जिस में वहां रहने वाले बहुसंख्यक मुसलमान ज्यादा मारे जाते हैं. पाकिस्तान के स्कूलों में घुस कर आतंकी गोलीबारी करते हैं, मासूमों को मौत की नींद सुला देते हैं.

अफगानिस्तान में मुसलमान मारे जा रहे हैं. वहां तालिबान उन्हें कत्ल कर रहे हैं. सीरिया में मुसलमानों की हत्या हो रही है. यमन में मुसलमान मर रहे हैं. इराक, लीबिया, कतर हर जगह मुसलमान मारे जा रहे हैं. ये सभी इसलामिक देश हैं. मुसलमानों की हत्याओं के आंकड़े भयावह हैं.

पिछले 15 वर्षों में लगभग 3 करोड़ मुसलमान इसलामिक देशों में मारे जा चुके हैं. दुनियाभर के मानवाधिकार संगठन कानों में तेल डाले बैठे हैं. शांति के लिए नोबेल पुरस्कार लेने वाले महान लोगों की आंखें इस अशांत और असुरक्षित कौम की ओर नहीं देखती हैं. एक कौम की इतनी बड़ी तबाही पर विश्व समुदाय की यह खामोशी आश्चर्यचकित करने वाली है.

भारत में मुसलमान पर हमला होता है तो हम हिंदूवादी संगठनों और सत्ता को दोषी ठहरा देते हैं, लेकिन सोमालिया में कौन मार रहा है मुसलमानों को? बलूचिस्तान में कौन मार रहा है मुसलमानों को? वे कौन हैं जो अल्लाहहुअकबर कह कर लोगों का कत्ल करते घूम रहे हैं? क्या अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, लेबनान, यमन और मिस्र को बजरंग दल, नरेंद्र मोदी, योगी आदित्यनाथ, भाजपा या हिंदू महासभा ने बरबाद किया है? या वहां दंगा करने के लिए आरएसएस के लोग जाते हैं? नहीं. दरअसल, मुसलमान कहीं खुद अपने हत्यारे बने हुए हैं, तो कहीं वे अन्य कौमों की साजिशों के शिकार हैं.

मुसलिम देशों में अज्ञानता और अशिक्षा के चलते जाति के छोटेछोटे खांचों में बंटे मुसलमान ही मुसलमान को मार रहे हैं. उन के धर्म और धार्मिक नेताओं ने उन्हें ऐसे अंधकूप में धकेल दिया है कि वे शिया और सुन्नी के नाम पर अपनी ही कौम के लोगों को मारकाट रहे हैं. उन्होंने जन्नत और जिहाद के नाम पर आपस में ही कत्लोगारत मचा रखी है. मुसलमान खुद अपनी कब्रें खोद रहे हैं. वे खुद को जमींदोज कर रहे हैं.

दुनियाभर में ईसाईयत के बाद दूसरी सब से बड़ी संख्या मुसलमानों की है, मगर अफसोस कि उन में नई दृष्टि नहीं है. वजह यह है कि मुसलमान अपनी हर समस्या का समाधान 1,400 साल पीछे लिखे अपने धर्मग्रंथों में तलाशते हैं, जबकि बाकी दुनिया आगे आने वाले 1,400 सालों में झांक रही है.

मुसलमान सदियों पुरानी कबीलियाई संस्कृति को जी रहे हैं. अपनी उत्पत्ति के समय यह समुदाय लड़ाकों का समुदाय था और आज भी वह लड़ाका ही बना रहना चाहता है. हालांकि मोहम्मद साहब ने इसलाम को एक शांतिपूर्ण धर्म बताया था, उन की शिक्षाएं भी शांति स्थापित करने के मकसद से थीं मगर अफसोस कि इसलाम के मानने वालों के बीच शांति रहस्यमयी रूप से गायब है. इसे विडंबना ही कहिए कि आज दुनियाभर में मुसलमानों की पहचान या तो तालिबान के नाम से है या आतंकवाद के नाम से.

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मुसलमान को आतंकवादी बनाया किस ने?

सदियों से मुसलमान अपने धर्मगुरुओं की साजिश का शिकार बनते आए हैं. धर्मगुरु जहां उसे शिया और सुन्नी के खांचों में बांट कर इस धर्म की उत्पत्ति के वक्त से लड़वा रहे हैं, वहीं ईसाईयत भी उसे नेस्तनाबूत करने में कोई कोरकसर नहीं रखना चाहती है. इन दोनों कारणों ने मुसलमानों के माथे पर आतंकी का ठप्पा लगा रखा है.

आम और गरीब मुसलमान, जो चैनोअमन से जिंदगी बसर करना चाहता है, दोनों तरफ से मारा जा रहा है, जगहजगह से खदेड़ कर भगाया जा रहा है. उस से जीवन जीने के मामूली संसाधन तक छीने जा रहे हैं. रोटी, कपड़ा, मकान और शिक्षा से वह महरूम है, फिर चाहे सीरिया, लीबिया, अफगानिस्तान या म्यांमार के मुसलमानों की बात हो या रोहिंग्या, वीगर या उइगर मुसलमानों की. ये आम गरीब लोग हैं जिन का दुनिया की राजनीति से कोई वास्ता नहीं है, जिन्हें तेल भंडारों से कोई मतलब नहीं, जिन्हें जीने के लिए सिर्फ दोवक्त की रोटी, एक छत और कुछ मामूली संसाधन चाहिए, पर आज यही गरीब और अशिक्षित मुसलमान दुनियाभर में राजनीति का शिकार हैं. यही गरीब मारे जा रहे हैं.

विश्व जनसंख्या में ईसाई समुदाय 32 फीसदी की हिस्सेदारी के साथ आज सब से ऊपर है. इस के बाद मुसलमान हैं, जिन की हिस्सेदारी विश्व जनसंख्या में 24 फीसदी है. उल्लेखनीय बात यह है कि ईसाई और इसलाम हमेशा से एकदूसरे के कट्टर शत्रु रहे हैं. ईसाई देश मुसलिम देशों की जमीनों व संपत्तियों पर अपना हक जमाने की ख्वाहिश रखते हैं. खासतौर पर मुसलिम देशों में मौजूद तेल के भंडारों पर ईसाई समुदाय की गिद्ध नजर है.

मिडिल ईस्ट में तेल के बहुमूल्य भंडार थे, जिसे दुनिया को बेच कर भरपूर पैसा मुसलिम नेताओं, व्यापारियों और धर्मगुरुओं ने कमाया. वे चाहते तो इस पैसे से अपनी कौम की तसवीर बदल सकते थे. वे ईसाई देशों की तरह तकनीकी और वैज्ञानिक उन्नति कर सकते थे. अपने देशों को शिक्षा और आधुनिकता की राह पर डाल सकते थे. मगर, उन्होंने तेल के पैसों से दूसरे देशों से सिर्फ जंगी जहाज, हथियार और गोलाबारूद ही खरीदा. जबकि ईसाई कौम ने अपनी उत्पत्ति के बाद से आधुनिकता को अपनाया, अपनी शैक्षिक उपलब्धियों को बढ़ाया, वैज्ञानिक रूप से तरक्की की और चांदतारों तक जा पहुंचे.

ईसाईयत में भी प्रोटैस्टैंट और कैथोलिक ईसाइयों के बीच मनमुटाव रहता है, मगर इन के बीच अब कई सौै सालों से उस तरह की जंग नहीं होती जैसी कि शिया और सुन्नी समुदायों के बीच होती है. मुसलमान कौम ने सदियों से शियासुन्नी के नाम पर बेवजह का गदर मचा रखा है और ईसाईयत ने अपने फायदे के लिए इस आग में हमेशा घी डालने का काम किया है.

अमेरिका और रूस जैसे ताकतवर देशों ने जब देखा कि मुसलिम देशों में मुसलिम कौम कबीलों में बंटी हुई है और आपस में ही लड़ीमरी जा रही है, तो उस को और ज्यादा तबाही की ओर ढकेलने के लिए और उस के तेल के भंडारों पर कब्जा पाने के लिए उन्होंने उन की आपसी लड़ाई को और भड़काया. उन्हें ज्यादा से ज्यादा हथियार और गोलाबारूद मुहैया करवाया.

अब इस साजिश में चीन भी कूद पड़ा है. इन 3 मजबूत और ताकतवर देशों ने मिल कर दुनियाभर में मुसलमानों के सफाए का अभियान छेड़ रखा है. बाकी के छोटेबड़े तमाम देश, जो अपनेअपने स्वार्थवश इन 3 ताकतवर देशों की हां में हां मिलाने के लिए मजबूर हैं, इस खूनखराबे पर चूं तक नहीं करते. आज अगर मुसलमानों की कत्लोगारत पर विश्व समुदाय चुप्पी साधे बैठा है, मानवाधिकार संगठन खामोश हैं, तो उस की जड़ में इसलाम और ईसाईयत की सदियों पुरानी दुश्मनी ही एकमात्र वजह है.

ईसाईयत और इसलाम का झगड़ा पुराना

ईसाईयत और इसलाम की लड़ाई बहुत पुरानी है. यहूदी, ईसाई और मुसलिम तीनों ही धर्मों के उदय का स्रोत एक ही है. ये तीनों ही धर्म हजरत इब्राहिम को अपना पितामह मानते हैं. इन तीनों में यहूदी धर्म सब से पुराना है. यहूदियों का इतिहास कोई 4 हजार साल पुराना है, जिस की शुरुआत पैगंबर इब्राहिम, जिन्हें अबराहम के नाम से भी जाना जाता है, से मानी जाती है. पैगंबर इब्राहिम ईसा से 2,000 वर्ष पूर्व हुए थे. इब्राहिम के पहले बेटे का नाम हजरत इसहाक और दूसरे का नाम हजरत इस्माईल था. दोनों के पिता एक थे, लेकिन मां अलगअलग थीं. हजरत इसहाक की मां का नाम सराह था और हजरत इस्माईल की मां हाजरा थीं.

इब्राहिम के पोते का नाम हजरत याकूब था. याकूब को इसराईल के नाम से भी पुकारा जाता था. याकूब उर्फ इसराईल ने ही 12 जातियों और कई कबीलों को मिला कर एक सम्मिलित राष्ट्र इसराईल बनाया था. याकूब उर्फ इसराईल के एक बेटे का नाम यहूदा (जूदा) था. यहूदा के नाम पर ही उस के वंशज यहूदी कहलाए और उन का धर्म यहूदी धर्म कहलाया. आदम से इब्राहिम और इब्राहिम से मूसा तक यहूदी, ईसाई और इसलाम सभी के पैगंबर एक ही हैं. यहूदी अपने ईश्वर को यहोवा कहते हैं और उन की धर्मभाषा इब्रानी है, जिसे हिब्रू भी कहते हैं.

इब्राहिम की ही वंशावली में आगे ईसा मसीह हुए और उन के द्वारा ईसाई धर्म का उदय हुआ. ईसाईयत के उदय के बाद यहूदियों को यातनाएं दी जाने लगीं. 7वीं सदी में मोहम्मद साहब ने ईसाईयत से अलग इसलाम की शुरुआत की. इसलाम के आगाज के बाद यहूदियों की मुश्किलें ज्यादा बढ़ गईं. तुर्क और मामलुक शासन के समय यहूदियों को अपने देश इसराईल से भी पलायन करना पड़ा. यहूदियों के हाथ से उन का अपना राष्ट्र जाता रहा.

मई 1948 में इसराईल को फिर से यहूदियों का स्वतंत्र राष्ट्र बनाया गया. दुनियाभर में इधरउधर बिखरे यहूदी आ कर इसराईली क्षेत्रों में बसने लगे. वर्तमान में भी एकमात्र यहूदी राष्ट्र इसराईल अरबों और फिलिस्तीनियों के साथ कई युद्धों में उलझा हुआ है.

मुसलिम दुनिया का इतिहास लगभग 1,400 वर्ष पुराना है. इस धर्म का भौगोलिक विस्तार मध्य एशिया, मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका, दक्षिणी इटली, इबेरियन प्रायद्वीप से ले कर उत्तरपश्चिम भारत तक फैला. मध्यपूर्व दुनिया का वह इलाका है जहां ताकतवर मुसलिम देशों की खेमेबंदी बहुत तगड़ी है. लेकिन वहां रूस और अमेरिका के साथ चीन की भी सक्रियता काफी है. इन तीनों देशों की नजरें इस इलाके के तेल भंडारों पर सदियों से गड़ी हुई हैं. ये तीनों ही राष्ट्र नहीं चाहते कि मुसलमान देश कभी भी एकजुट हों, या उन के बीच कभी शांति बहाल हो. वे इन को हमेशा लड़ाए रखना चाहते हैं और इसीलिए इन्हें ज्यादा से ज्यादा हथियार मुहैया करवाते हैं.

धार्मिक कट्टरता ने मुसलमानों का नुकसान किया

मुसलमान अपनी धार्मिक कट्टरता छोड़ने को तैयार नहीं हैं. उन्होंने हमेशा आधुनिकता से अपना दामन बचाया. वे अपनी सदियों पुरानी परंपरा को ही बरकरार रखना चाहते हैं. शिक्षा के लिए वे आज भी अपने 1,400 साल पहले लिखे धर्मग्रंथ की ओर ही देखते हैं. वे नई वैज्ञानिक खोजों, शिक्षाओं, तकनीक से आज भी दूर हैं. मुसलमानों के आदर्श डा. अब्दुल कलाम जैसे जहीन और काबिल वैज्ञानिक कभी नहीं रहे. उन के आदर्श आतंकी सरगना ओसामा बिन लादेन और अल जवाहिरी ही बने रहे.

इसलाम के ठेकेदार अपनी कौम के लोगों को बस 5 वक्त नमाज पढ़ने की नसीहतें देते हैं, औरतों को परदे में रहने की हिदायत देते हैं, लोगों के अंदर अल्लाह का खौफ पैदा करते हैं, जिहाद, जन्नत और जहन्नुम के रास्ते बताते हैं. वे अपने बच्चों को हथियार चलाने की ट्रेनिंग देते हैं और अल्लाह की राह में अपनी जान कुरबान कर देने की नसीहतें देते हैं.

भारत के मुसलमान लीडरों की बात करें तो वे लाउडस्पीकर पर मसजिदों से अजान देने की इजाजत चाहते हैं. वे इन लाउडस्पीकरों से कभी यह मांग नहीं करते कि उन के बच्चों को भी अच्छे स्कूलकालेज में ऐडमिशन दिया जाए, उन के इलाकों में अच्छे अस्पताल खोले जाएं, उन के युवाओं को नौकरियां दी जाएं. वे कभी इन बातों के लिए जिहाद करते नजर नहीं आते.

मुसलमान किसी भी देश का हो, वह बिजली, पानी, घर, शौचालय जैसी मूलभूत जरूरतों के लिए आवाज उठाते नहीं देखा गया. उन के रहनुमाओं और इसलाम के ठेकेदारों ने कभी नहीं कहा कि मुसलिम कौम को जीवनयापन के लिए जरूरी साधन उसी तरह दिए जाएं जैसे दूसरे मजहब के लोगों को मुहैया हैं, ताकि उन की दिमागी तरक्की हो सके.

कबीलियाई संस्कृति को जीने वाले मिडिल ईस्ट के मुसलमान हथियार जमा करते हैं और उन को चलाने की ट्रेनिंग अपने बच्चों को देते हैं. वे मातम मनाते हैं. छातियां पीटते हैं. सड़कों पर अपना खून बहाते हैं. अंगारों पर चलते हैं. दरअसल, वे अपने धर्म से आगे कुछ सोचते ही नहीं हैं, और यही उन की तबाही, गरीबी और पिछड़ेपन का वास्तविक कारण है. इस कौम को अमेरिका, रूस, चीन, जापान जैसे देशों की साजिशों ने जितना नुकसान पहुंचाया है, उस से ज्यादा नुकसान उन लोगों ने किया है जो इस कौम के नेता रहे हैं या वर्तमान में हैं. यही कमोबेश पूरी दुनिया के मुसलमानों का सच है.

ईसाई, जिन की जनसंख्या आज दुनिया में सब से ज्यादा यानी विश्व की जनसंख्या की 32 फीसदी है, आधुनिकता को अपना चुके हैं. वे वैज्ञानिक और तकनीकी सोच रखने वाले हैं. वे हथियार से कम, दिमाग से ज्यादा वार करते हैं. उन का मंत्र है – फूट डालो, राज करो. वहीं, इसलाम को मानने वाले 170 करोड़ लोग विश्व की जनसंख्या के 24 प्रतिशत हैं, जो यदि मुसलिम देशों में रह रहे हैं तो आपसी दुश्मनी में मर रहे हैं और अगर चीन, जापान, अमेरिका, इसराईल, रूस, म्यांमार या भारत में हैं तो ईसाई, यहूदी, यजीदी, हिंदू और बोधि के हाथों प्रताडि़त हैं.

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बाहर कम, जेल में ज्यादा

भारतीय जेलों में मुसलमान कैदियों का अनुपात 21 प्रतिशत है, जबकि जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक देश की आबादी में मुसलमान सिर्फ 13.4 फीसदी हैं. जम्मूकश्मीर, पुदुचेरी और सिक्किम के अलावा देश के अमूमन हर सूबे में मुसलमानों की जितनी आबादी है, उस से अधिक अनुपात में मुसलमान जेल में हैं. जेल में बंद करीब 90 फीसदी मुसलिम कैदियों पर नशे का व्यापार करने, चोरी, लूट जैसे मामले चल रहे हैं. गंभीर अपराधों में बंद मुसलमानों की संख्या काफी कम है. यह स्थिति ठीक वैसी है जैसी अमेरिकी जेलों में अश्वेत कैदियों की है. अमेरिकी जेलों में कैद 23 लाख लोगों में आधे अश्वेत हैं जबकि अमेरिकी आबादी में उन का हिस्सा सिर्फ 13 फीसदी है.

दुनिया के मुसलमान अपनों के शिकार दूसरा भाग पढ़िए अगले अंक में

पश्चिम एशिया, अफ्रीका, सीरिया, म्यांमार, अफगानिस्तान और चीन में मुसलमानों की स्थिति की विवेचना.

यक्ष प्रश्न : निमी को क्यों बचाना चाहती थी अनुभा

अनुभा ने अस्पताल की पार्किंग में बमुश्किल गाड़ी पार्क की. ‘उफ, इतनी सारी गाडि़यां… न सड़क में जगह, न पार्किंग स्पेस में. गाड़ी रखना भी एक मुसीबत हो गई है. कहीं भी जगह नहीं है. अब तो लोग फुटपाथों पर भी गाडि़यां पार्क करने लगे हैं. सरकारी परिसर हो या निजी आवासीय क्षेत्र, हर जगह एकजैसा हाल. इस के बावजूद लोग गाडि़यां खरीदना बंद नहीं कर रहे हैं,’ यही सब सोचती वह अस्पताल की सीढि़यां चढ़ रही थी.

दूसरी मंजिल पर सेमीप्राइवेट वार्ड में अनुभा की सहेली कम सहकर्मी भरती थी. उसे किडनी में पथरी थी. उसी के औपरेशन के लिए भरती थी. कल उस का औपरेशन हुआ था. अनुभा आज उसे देखने जा रही थी.

सहेली से मिलने और उस का हालचाल पूछने के बाद जब अनुभा उस के बिस्तर पर बैठी तो उस ने कमरे में इधरउधर निगाह डाली. सेमीप्राइवेट वार्ड होने के कारण उस में 2 मरीज थे. दूसरी मरीज भी महिला ही थी. उस ने गौर से दूसरी मरीज को देखा, तो उसे वह कुछ जानीपहचानी लगी. उस ने दिमाग पर जोर दे कर सोचा. वह मरीज भी उसे गौर से देख रही थी. उस की बुझी आंखों में एक चमक सी आ गई जैसे कई बरसों बाद वह अपने किसी आत्मीय को देख रही हो.

दोनों की आंखें एकदूसरे के मनोभावों को पढ़ रही थीं और फिर जैसे अचानक  एकसाथ दोनों के मन से दुविधा और संकोच की बेडि़यां टूट गई हों अनुभा चौंकती सी उस की तरफ लपकी, ‘‘निमी…’’

मरीज के सूखे होंठों पर फीकी सी मुसकराहट फैल गई, ‘‘तुम ने मुझे पहचान लिया?’’

निम्मी के स्वर से ऐसा लग रहा था जैसे इस दुनिया में उस का कोई जानपहचान वाला नहीं है. अनुभा अचानक आसमान से आ टपकी थी, वरना वह इस संसार में असहाय और अनाथ जीवन व्यतीत कर रही थी.

‘‘निमी, तुम यहां और इस हालत में?’’ अनुभा ने उस के हाथों को पकड़ कर कहा.

निमी का नाम निमीषा था, परंतु उस के दोस्त और सहेलियां उसे निमी कह कर बुलाते थे.

अनुभा एक पल को चुप रही, फिर बोली,  ‘‘तुम्हें क्या हुआ है? मैं ने तो कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन तुम्हें इस हालत में देखूंगी. तुम्हारी सुंदर काया को क्या हुआ… चेहरे की कांति कहां चली गई?  ऐसा कैसे हुआ?’’

निमी ने पलंग से उठ कर बैठने का प्रयास किया, परंतु उस की सांस फूलने लगी. अनुभा ने उसे सहारा दिया. पलंग को पीछे से उठा दिया, जिस से निमी अधलेटी सी हो गई.

‘‘तुम ने इतने सारे सवाल कर दिए… समझ में नहीं आता कैसे इन के जवाब दूं. एक दिन में सबकुछ बयां नहीं किया जा सकता… मैं ज्यादा नहीं बोल सकती… हांफ जाती हूं… फेफड़े कमजोर हैं न. ’’

‘‘तुम्हें हुआ क्या है?’’ अनुभा ने पूछा.

‘‘एक रोग हो तो बताऊं… अब तुम मिली हो, तो धीरेधीरे सब जान जाओगी. क्या तुम्हारे पास इतना समय है कि रोज आ कर मेरी बातें सुन सको.’’

‘‘हां, मैं रोज आऊंगी और सुनूंगी,’’ अनुभा को निमी की हालत देख कर तरस नहीं, रोना आ रहा था जैसे वह उस की जान हो, जो उसे छोड़ कर जा रही थी. उस ने कस कर निमी का हाथ पकड़ लिया.

निमी के बदन में एक सुरसुरी सी दौड़ गई. उस के अंदर एक सुखद एहसास ने अंगड़ाई ली. वह तो जीने की आस ही छोड़ चुकी थी, परंतु अनुभा को देख कर उसे लगा कि उसे देखनेसमझने वाला कोई है अभी इस दुनिया में. फिर कोई जब चाहने वाला पास हो, तो जीने की लालसा स्वत: बढ़ जाती है.

‘‘तुम्हारे साथ कोई नहीं है?’’ अनुभा ने आंखें झपकाते हुए पूछा, ‘‘कोई देखभाल करने वाला… तुम्हारे घर का कोई?’’

निमी ने एक ठंडी सांस लेते हुए कहा,  ‘‘नहीं, कोई नहीं.’’

‘‘क्यों, घर में कोई नहीं है क्या?’’

‘‘जो मेरे अपने थे उन्हें मैं ने बहुत पहले छोड़ दिया था और जीवन के पथ पर चलते हुए जिन्हें मैं ने अपना बनाया वे बीच रास्ते छोड़ कर चलते बने. अब मैं नितांत अकेली हूं. कोई नहीं है मेरा अपना. आज वर्षों बाद तुम मिली हो, तो ऐसा लग रहा है जैसे मेरा पुराना जीवन फिर से लौट आया हो. मेरे जीवन में भी खुशी के 2 फूल खिल गए हैं, जिन की सुगंध से मैं महक रही हूं. काश, यह सपना न हो… तुम दोबारा आओगी न?’’

‘‘हांहां, निमी, मैं आऊंगी. तुम से मिलने ही नहीं, तुम्हारी देखभाल करने के लिए भी… तुम्हारा अस्पताल का खर्चा कौन उठा रहा है?’’

निमी ने फिर एक गहरी सांस ली, ‘‘है एक चाहने वाला, परंतु उस ने मेरी बीमारियों के कारण मुझ से इतनी दूरी बना ली है कि वह मुझे देखने भी नहीं आता. कभीकभी उस का नौकर आ जाता है और अस्पताल का पिछला बिल भर कर कुछ ऐडवांस दे जाता है ताकि मेरा इलाज चलता रहे. बस मेरे प्यार के बदले में इतनी मेहरबानी वह कर रहा है.’’

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उस दिन अनुभा निमी के पास बहुत देर नहीं रुक पाई, क्योंकि वह औफिस से आई थी. शाम को आने का वादा कर के वह औफिस आ गई, परंतु वहां भी उस का मन नहीं लगा. निमी की दुर्दशा देख कर उसे अफसोस के साथसाथ दुख भी हो रहा था. उसे कालेज के दिन याद आने लगे जब वे दोनों साथसाथ पढ़ती थीं…

निमीषा और अनुभा दोनों ही शिक्षित परिवारों से थीं. अनुभा के पिता आईएएस अफसर थे, तो निमी के पिता वरिष्ठ आर्मी औफिसर. दोनों एक ही क्लास में थीं, दोस्त थीं, परंतु दोनों के विचारों में जमीनआसमान का अंतर था. अनुभा पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों व मान्यताओं को मानने वाली लड़की थी, तो निमी को स्थापित मूल्य तोड़ने में मजा आता था. परंपराओं का पालन करना उसे नहीं भाता था. नैतिकता उस के सामने पानी भरती थी, तो मूल्य धूल चाटते नजर आते थे. संभवतया सैनिक जीवन की अति स्वछंदता और खुलेपन के माहौल में जीने के कारण उस के स्वभाव में ऐसा परिवर्तन आया हो.

निमीषा बहुत बड़ी अफसर बनना चाहती थी, परंतु अनुभा को पता नहीं था कि वह क्या बन गई? हां, वह शादी भी नहीं करना चाहती थी. उस का मानना था शादी का बंधन स्त्री के लिए एक लिखित आजीवन कारावास का अनुबंध होता है. तब युवाओं के बीच लिव इन रिलेशनशिप का चलन बढ़ने लगा था. निमी ऐसे संबंधों की हिमायती थी. कालेज के दौरान ही उस ने लड़कों के साथ शारीरिक संबंध बना लिए थे.

इस का पता चलने पर अनुभा ने उसे समझाया था, ‘‘ये सब ठीक नहीं है. दोस्ती तक तो ठीक है, परंतु शारीरिक संबंध बनाना और वह भी शादी के पहले व कई लड़कों के साथ को मैं उचित नहीं समझती.’’

निमी ने उस का उपहास उड़ाते हुए कहा,  ‘‘अनुभा, तुम कौन से युग में जी रही हो? यह मौडर्न जमाना है, स्वछंद जीवन जीने का. यहां व्यक्तिगत पसंद से रिश्ते बनतेबिगड़ते हैं, मांबाप की पसंद से नहीं. इट्स माई लाइफ… मैं जैसे चाहूंगी जीऊंगी.’’

अनुभा के पास तर्क थे, परंतु निमी के ऊपर उन का कोई असर न होता. कालेज के बाद दोनों सहेलियां अलग हो गईं. अनुभा के पिता केंद्र सरकार की प्रतिनियुक्ति से वापस लखनऊ चले गए. अनुभा ने वहां से सिविल सर्विसेज की तैयारी की और यूपीएससी की गु्रप बी सेवा में चुन ली गई. कई साल लखनऊ, इलाहाबाद और बनारस में पोस्टिंग के बाद अब उस का दिल्ली आना हुआ था. इस बीच उस की शादी भी हो गई. पति केंद्र सरकार में ग्रुप ए अफसर थे. दोनों ही दिल्ली में तैनात थे. उस की 10 वर्ष की 1 बेटी थी.

अनुभा को निमी के जीवन के पिछले 15 वर्षों के बारे में कुछ पता नहीं था. उसे उत्सुकता थी, जल्दी से जल्दी उस के बारे में जानने की. आखिर उस के साथ ऐसा क्या हुआ था कि उस ने अपने शरीर का सत्यानाश कर लिया… तमाम रोगों ने उस के शरीर को जकड़ लिया. वह शाम होने का इंतजार कर रही थी. प्रतीक्षा में समय भी लंबा लगने लगता है. वह बारबार घड़ी देखती, परंतु घड़ी की सूइयां जैसे आगे बढ़ ही नहीं रही थीं.

किसी तरह शाम के 5 बजे. अभी भी 1 घंटा बाकी था, परंतु वह अपने सीनियर को अस्पताल जाने की बात कह कर बाहर निकल आई. गाड़ी में बैठने से पहले उस ने अपने पति को फोन कर के बता दिया कि वह अस्पताल जा रही है. घर देर से लौटेगी.

अनुभा को देखते ही निमी के चेहरे पर खुशी फैल गई जैसे उस के अंदर असीम ऊर्जा और शक्ति का संचार होने लगा हो.

अनुभा उस के लिए फल लाई थी. उन्हें सिरहाने के पास रखी मेज पर रख कर वह निमी के पलंग पर बैठ गई. फिर उस का हाथ पकड़ कर पूछा, ‘‘अब कैसा महसूस हो रहा है?’’

निमी के होंठों पर खुशी की मुसकान थी, तो आंखों में एक आत्मीय चमक… चेहरा थोड़ा सा खिल गया था. बोली, ‘‘लगता है अब मैं बच जाऊंगी.’’

रात में अनुभा ने अपने पति हिमांशु को निमी के बारे में सबकुछ बता दिया. सुन कर उन्हें भी दुख हुआ. अगले दिन सुबह औफिस जाते हुए वे दोनों ही निमी से मिलने गए. हिमांशु ने डाक्टर से मिल कर निमी की बीमारियों की जानकारी ली. डाक्टर ने जो कुछ बताया, वह बहुत दर्दनाक था. निमी के फेफड़े ही नहीं, लिवर और किडनियां भी खराब थीं. वह शराब और सिगरेट के अति सेवन से हुआ था. अनुभा को पता नहीं था कि वह इन सब का सेवन करती थी. हिमांशु ने जब उसे बताया, तो वह हैरान रह गई. पता नहीं किस दुष्चक्र में फंस गई थी वह?

खैर, हिमांशु और अनुभा ने यह किया कि रात में निमी के पास अपनी नौकरानी को देखभाल के लिए रख दिया. हिमांशु नियमित रूप से उस के इलाज की जानकारी लेते. उन के कारण ही अब डाक्टर विशेषरूप से निमी का ध्यान रखने लगे थे. वह बेहतर से बेहतर इलाज उसे मुहैया करा रहे थे.

इस सब का परिणाम यह हुआ कि निमी 1 महीने के अंदर ही इतनी ठीक हो गई कि अपने घर जा सकती थी. हालांकि दवा नियमित लेनी थी.

जिस दिन उसे अस्पताल से डिस्चार्ज होना था वह कुछ उदास थी. उस का सौंदर्य पूर्णरूप से तो नहीं, परंतु इतना अवश्य लौट आया था कि वह बीमार नहीं लगती थी.

अनुभा ने पूछा, ‘‘तुम खुश नहीं लग रही हो… क्या बात है? तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि ठीक हो कर घर जा रही हो?’’

निमी ने खाली आंखों से अनुभा को देखा और फिर फीकी आवाज में कहा, ‘‘कौन सा घर? मेरा कोई घर नहीं है.’’

‘‘अपने दोस्त के यहां, जो तुम्हारा इलाज करवा रहा था…’’

एक फीकी उदास हंसी निमी के होंठों पर तैर गई, ‘‘जो व्यक्ति मुझ से मिलने अस्पताल में कभी नहीं आया, जिसे पता है कि मेरे शरीर के महत्त्वपूर्ण अंग बेकार हो चुके हैं. वह मुझे अपने घर रखेगा?’’

‘‘फिर वह तुम्हारा इलाज क्यों करवा रहा था?’’

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‘‘बस एक यही एहसान उस ने मेरे ऊपर किया है. मेरे प्यार का कुछ कर्ज उसे अदा करना ही था. वह बहुत पैसे वाला है, परंतु एक बीमार औरत को घर में रखने का फैसला उस के पास नहीं है. उसे रोज अनगिनत सुंदर और कुंआरी लड़कियां मिल सकती हैं, तो वह मेरी परवाह क्यों करेगा. वैसे मैं स्वयं उस के पास नहीं जाना चाहती हूं. मैं किसी भी मर्द के पास नहीं जाना चाहती. मर्दों ने ही मुझे प्यार की इंद्रधनुषी दुनिया में भरमा कर मेरी यह दुर्गति की है… मैं किसी महिला आश्रम में जाना चाहूंगी,’’ उस के स्वर में आत्मविश्वास सा आ गया था.

अनुभा सोच में पड़ गई. उस ने हिमांशु से सलाह ली. फिर निमी से बोली, ‘‘तुम कहीं और नहीं जाओगी, मेरे घर चलोगी.’’

‘‘तुम्हारे घर?’’ निमी का मुंह खुला का खुला रह गया.

‘‘हां, और अब इस के बाद कोई सवाल नहीं, चलो.’’

अनुभा और हिमांशु को मोतीबाग में टाइप-5 का फ्लैट मिला था. उस में पर्याप्त कमरे थे. 1 कमरा उन्होंने निमी को दे दिया. निमी अनुभा और हिमांशु की दरियादिली, प्रेम और स्नेह से अभिभूत थी. उस के पास धन्यवाद करने के लिए शब्द नहीं थे.

निमी के पिता आर्मी औफिसर थे. मां भी उच्च शिक्षित थीं. आर्मी में रहने के कारण उन्हें तमाम सुविधाएं प्राप्त थीं. पिता रोज क्लब जाते थे और शराब पी कर लौटते थे. मां भी कभीकभार क्लब जातीं और शराब का सेवन करतीं. उन के घर में शराब की बोतलें रखी ही रहतीं. कभीकभार घर में भी महफिल जम जाती. निमी के पिता के यारदोस्त अपनी बीवियों के साथ आते या कोई रिश्तेदार आ जाता, तो महफिल कुछ ज्यादा ही रंगीन हो जाती.

निमी बचपन से ही ये सब देखती आ रही थी. उस के कच्चे मन में वैसी ही संस्कृति और संस्कार घर कर गए. उसे यही वास्तविक जीवन लगता. 15 साल की उम्र तक पहुंचतेपहुंचते उस ने शराब का स्वाद चोरीछिपे चख लिया था और सिगरेट के सूट्टे भी लगा लिए थे.

ग्रैजुएशन करने के बाद निमी ने मम्मीपापा से कहा, ‘‘मैं यूपीएसी का ऐग्जाम देना चाहती हूं.’’

‘‘तो तैयारी करो.’’

‘‘कोचिंग करनी पड़ेगी. अच्छे कोचिंग इंस्टिट्यूट डीयू के आसपास मुखर्जी नगर में हैं.’’

‘‘क्या दिक्कत है? जौइन कर लो.’’

‘‘परंतु इतनी दूर आनेजाने में बहुत समय बरबाद हो जाएगा. मैं चाहती हूं कि यहीं आसपास बतौर पीजी रह लूं और सीरियसली कंपीटिशन की तैयारी करूं… तभी कुछ हो पाएगा,’’ निमी ने कहा.

मम्मीपापा ने एकदूसरे की आंखों में एक पल के लिए देखा, फिर पापा ने उत्साह से कहा,  ‘‘ओके माई गर्ल. डू व्हाटएवर यू वांट.’’

‘‘किंतु यह अकेले कैसे रहेगी?’’ मम्मी ने शंका व्यक्त की.

‘‘क्या दकियानूसी बातें कर रही हो. शी इज ए बोल्ड गर्ल. आजकल लड़कियां विदेश जा रही हैं पढ़ने के लिए. यह तो दिल्ली शहर में ही रहेगी. जब मरजी हो जा कर मिल आया करना. यह भी आतीजाती रहेगी.’’

‘‘यस मौम,’’ निमी ने दुलार से कहा. जब बापबेटी राजी हों, तो मां की कहां चलती है. उसे परमीशन मिल गई. उस ने 1 साल का कन्सौलिडेटेड कोर्स जौइन कर लिया और मुखर्जी नगर में ही रहने लगी.

जैसाकि निमी का स्वभाव था, वह जल्दी लड़कों में लोकप्रिय हो गई. कोचिंग में पढ़ने वाले कई लड़के उस के दोस्त बन गए. सभी धनाढ्य घरों के थे. उन के पास अनापशनाप पैसे आते थे. आएदिन पार्टियां होतीं. निमी उन पार्टियों की शान समझी जाती थी.

लड़के उस के सामीप्य के लिए एड़ीचोटी का जोर लगा देते. दिन, महीनों में नहीं बदले, उस के पहले ही निमी कई लड़कों के गले का हार बन गई. उस के बदन के फूल लड़कों के बिस्तर पर महकने लगे.

बहुत जल्दी उस के मम्मीपापा को उस की हरकतों के बारे में पता चल गया. मम्मी ने समझाया, ‘‘बेटा, यह क्या है? इस तरह का जीवन तुम्हें कहां ले जा कर छोड़ेगा, कुछ सोचा है? हम ने तुम्हें कुछ ज्यादा ही छूट दे दी थी. इतनी छूट तो विदेशों में भी मांबाप अपने बच्चों को नहीं देते. चलो, अब तुम पीजी में नहीं रहोगी… जो कुछ करना है हमारी निगाहों के सामने घर पर रह कर करोगी.’’

‘‘मम्मी, मेरी कोचिंग तो पूरी हो जाने दो,’’  निमी ने प्रतिरोध किया.

‘‘जो तुम्हारे आचरण हैं, उन से क्या तुम्हें लगता है कि तुम कोचिंग की पढ़ाई कर पाओगी… कोचिंग पूरी भी कर ली, तो कंपीटिशन की तैयारी कर पाओगी? पढ़ाई करने के लिए किताबें ले कर बैठना पड़ता है, लड़कों के हाथ में हाथ डाल कर पढ़ाई नहीं होती,’’ मां ने कड़ाई से कहा.

‘‘मम्मी, प्लीज. आप पापा को एक बार समझाओ न,’’ निमी ने फिर प्रतिरोध किया.

‘‘नहीं, निमी. तुम्हारे पापा बहुत दुखी और आहत हैं. मैं उन से कुछ नहीं कह सकती. तुम अपने मन की करोगी, तो हम तुम्हें रुपयापैसा देना बंद कर देंगे. फिर तुम्हें जो अच्छा लगे करना.’’

निमी अपने घर आ तो गई, परंतु अंदर से बहुत अशांत थी. घर पर ढेर सारे प्रतिबंध थे. अब हर क्षण मां की उस पर नजर रहती.

शराब, सिगरेट और लड़कों से वह भले ही दूर हो गई थी, परंतु मोबाइल फोन के माध्यम से उस के दोस्तों से उस का संपर्क बना हुआ था.

जब फोन करना संभव न होता, फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सऐप के माध्यम से संपर्क हो जाता. लड़के इतनी आसानी से सुंदर मछली को फिसल कर पानी में जाने देना नहीं चाहते.

लड़कों ने उसे तरहतरह से समझाया. वे सभी उस का खर्चा उठाने के लिए तैयार थे. रहनेखाने से ले कर कपड़ेलत्ते और शौक तक… सब कुछ… बस वह वापस आ जाए. प्रलोभन इतने सुंदर थे कि वह लोभ संवरण न कर सकी. मांबाप के प्यार, संरक्षण और सलाहों के बंधन टूटने लगे.

निमी ने बुद्धि के सारे द्वार बंद कर दिए. विवेक को तिलांजलि दे दी और एक दिन घर से कुछ रुपएपैसे और कपड़े ले कर फरार हो गई. दोस्तों ने उस के खाने व रहने के लिए एक फ्लैट का इंतजाम कर रखा था. काफी दिनों तक वह बाहरी दुनिया से दूर अपने घर में बंद रही.

पता नहीं उस के मांबाप ने उसे ढूंढ़ने का प्रयत्न किया था या नहीं. उस ने अपना फोन नंबर ही नहीं, फोन सैट भी बदल लिया था. मांबाप अगर पुलिस में रिपोर्ट लिखाते तो उस का पता चलना मुश्किल नहीं था. उस के पुराने फोन की काल डिटेल्स से उस के दोस्तों और फिर उस तक पुलिस पहुंच सकती थी, परंतु संभवतया उस के मांबाप ने पुलिस में उस के गुम होने की रिपोर्ट नहीं लिखाई थी.

निमी का जीवन एक दायरे में बंध कर रह गया था. खानापीना और ऐयाशी, जब तक वह नशे में रहती, उसे कुछ महसूस न होता, परंतु जबजब एकांत के साए घेरते उस के दिमाग में तमाम तरह के विचार उमड़ते, मांबाप की याद आती.

न तो समय एकजैसा रहता है, न कोई वस्तु अक्षुण्ण रहती है. निमी ने धीरेधीरे महसूस किया, उस के जो मित्र पहले रोज उस के पास आते थे, अब हफ्ते में 2-3 बार ही आते थे. पूछने पर बताते व्यस्तता बढ़ रही है. दूसरे काम आ गए हैं. मगर सत्य तो यह था उन के जीवन में एकरसता आ गई थी. अनापशनाप पैसा खर्च हो रहा था. मांबाप सवाल उठाने लगे थे. निमी की तरह बेवकूफ तो थे नहीं, उन्हें अपना कैरियर बनाना था. कुछ की कोचिंग समाप्त हो गई, तो वे अपने घर चल गए. जो दिल्ली के थे, वे कभीकभार आते थे, परंतु अब उन के लिए भी निमी का खर्चा उठाना भारी पड़ने लगा था.

निमी वरुण को अपना सर्वश्रेष्ठ हितैषी समझती थी. एक दिन उसी से पूछा, ‘‘वरुण, एक बात बताओ, मैं ने तुम लोगों की दोस्ती के लिए अपना घरपरिवार और मांबाप छोड़ दिए, अब तुम लोग मुझे 1-1 कर छोड़ कर जाने लगे हो. मैं तो कहीं की न रही… मेरा क्या होगा?’’

वरुण कुछ पल सोचता रहा, फिर बोला, ‘‘निमी, मेरी बात तुम्हें कड़वी लगेगी, परंतु सचाई यही है कि तुम ने हमारी दोस्ती नहीं अपने स्वार्थ और सुख के लिए घर छोड़ा था. यहां कोई किसी के लिए कुछ नहीं करता, सब अपने लिए करते हैं. अपनी स्वार्थ सिद्धि के बाद सब अलग हो जाते हैं, जैसा अब तुम्हारे साथ हो रहा है.

यह कड़वी सचाई तुम्हें बहुत पहले समझ जानी चाहिए थी. हम सभी अभी बेरोजगार हैं, मांबाप के ऊपर निर्भर हैं, कैरियर बनाना है. ऐसे में रातदिन हम  भोगविलास में लिप्त रहेंगे, तो हमारा भविष्य चौपट हो जाएगा.’’

अपनी स्थिति पर उसे रोना आ रहा था, परंतु वह रो नहीं सकती थी. आगे आने वाले दिनों के बारे में सोच कर उस का मन बैठा जा रहा था. वह समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे?

‘‘मैं क्या करूं, वरुण?’’ वह लगभग रोंआसी हो गई थी, ‘‘नासमझी में मैं ने क्या कर डाला?’’

‘‘बहुत सारी लड़कियां जवानी में ऐसा कर गुजरती हैं और बाद में पछताती हैं.’’

‘‘तुम ने भी मुझे कभी नहीं समझाया, मैं तो तुम्हें सब से अच्छा दोस्त समझती थी.’’

वरुण हंसा, ‘‘कैसी बेवकूफी वाली बातें कर रही हो. तुम कभी एक लड़के के प्रति वफादार नहीं रही. तुम्हारी नशे की आदत और तुम्हारी सैक्स की भूख ने तुम्हारी अक्ल पर परदा डाल दिया था. तुम एक ही समय में कई लड़कों के साथ प्रेमव्यवहार करोगी, तो कौन तुम्हारे साथ निष्ठा से प्रेमसंबंध निभाएगा… सभी लड़के तुम्हारे तन के भूखे थे और तुम उन्हें बहुत आसान शिकार नजर आई. बिना किसी प्रतिरोध के तुम किसी के भी साथ सोने के लिए तैयार हो जाती थी. ऐसे में तुम किसी एक लड़के से सच्चे और अटूट प्रेम की कामना कैसे कर सकती हो?’’

वरुण की बातों में कड़वी सचाई थी. निमी ने कहा, ‘‘मैं ने जोश में आ कर

अपना सब कुछ गवां दिया. दोस्त भी 1-1 कर चले गए. तुम तो मेरा साथ दे सकते हो.’’

वरुण ने हैरान भरी निगाहों से उसे देखा, ‘‘तुम्हारा साथ कैसे दे सकता हूं? मैं तो स्वयं तुम से दूर जाने वाला था. 1 साल मेरा बरबाद हो गया. इस बार प्री ऐग्जाम भी क्वालिफाई नहीं कर पाया. तुम्हारे चक्कर में पढ़ाईलिखाई हो ही नहीं पाई. घर में मम्मीपापा सभी नाराज हैं. ऐयाशी और मौजमस्ती छोड़ कर मैं ईमानदारी से तैयारी करना चाहता हूं. मैं तुम से कोई वास्ता नहीं रखना चाहता. वरना मेरा जीवन चौपट हो जाएगा.’’

निमी ने उस के दोनों हाथों को पकड़ कर अपने सीने पर रख लिया, ‘‘वरुण, मैं जानती हूं मैं ने गलती की है. मछली की तरह एक से दूसरे हाथ में फिसलती रही, परंतु सच मानो मैं ने तुम्हें सच्चे मन से प्यार किया है. जब कभी मन में अवसाद के बादल उमड़े मैं ने केवल तुम्हें याद किया. मुझे इस तरह छोड़ कर न जाओ.’’

‘‘निमी, तुम समझने का प्रयास करो, मैं ने अगर तुम्हारा साथ नहीं छोड़ा, तो मेरा भविष्य मेरे रास्ते से गायब हो जाएगा. मुझे कुछ बन जाने दो.’’

‘‘मैं तुम से प्यार की भीख नहीं मांगती. प्यार और सैक्स को पूरी तरह से भोग लिया है मैं ने परंतु पेट की भूख के आगे मनुष्य सदा लाचार रहता है. मेरे पास जीविका का कोई साधन नहीं है. जहां इतना सब कुछ किया, मेरे प्यार के बदले इतना सा उपकार और कर दो. रहने के लिए 1 कमरा और पेट की रोटी के लिए दो पैसे का इंतजाम कर दो. मैं वेश्यावृत्ति नहीं अपनाना चाहती,’’ निमी की आवाज दुनियाभर की बेचारगी और दीनता से भर गयी थी.

वरुण अपने दोस्तों की तरह कठोर नहीं था. उस के अंदर सहज मानवीय भाव थे. वह काफी संवेदनशील था और निमी के प्रति दयाभाव भी रखता था, परंतु उस के लिए वह अपना भविष्य दांव पर नहीं लगा सकता था. अत. कुछ सोच कर बोला, ‘‘तुम प्राइवेट नौकरी कर सकती हो?’’

‘‘हां, मेरे पास और चारा भी क्या है?’’

‘‘तो फिर ठीक है, तुम इसी फ्लैट में रहो. इस का किराया मैं दे दिया करूंगा. मैं अपने पिता से बात कर के तुम्हें किसी कंपनी में काम दिलवा दूंगा, जिस से तुम्हारा गुजारा चल सके.’’

‘‘मैं तुम्हारा एहसान कभी नहीं भूलूंगी.’’

वरुण ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘या तुम अपने घर चली जाओ.’’

निमी ने आश्चर्य से उसे देखा. फिर बोली, ‘‘कौन सा मुंह ले कर जाऊं उन के पास? क्या बताऊंगी उन्हें कि मैं ने इतने दिन क्या किया है? नहीं वरुण, मैं उन के पास जा कर उन्हें और परेशान नहीं करना चाहती.’’

वरुण के पिता सरकारी विभाग में अच्छे पद थे. उस ने पिता से कह कर निमी को एक प्राइवेट कंपनी में लगवा दिया. क्व20 हजार महीने पर. निमी का जो लाइफस्टाइल था, उस के हिसाब से उस की यह सैलरी ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर थी, परंतु मुसीबत की घड़ी में मनुष्य को तिनके का सहारा भी बहुत होता है.

निमी ने उन्मुक्त यौन संबंधों से तो छुटकारा पा लिया, परंतु वह शराब और सिगरेट से छुटकारा नहीं पा सकी. एकांत उसे परेशान करता, पुरानी यादें उसे कचोटतीं, मांबाप की याद आती, तो वह पीने बैठ जाती.

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वरुण जब भी उस से मिलने आता, वह उस की बांहों में गिर कर रोने लगती. वह समझाता, ‘‘मत पीया करो इतना, बीमार हो जाओगी.’’

‘‘वरुण, एकाकी जीवन मुझे बहुत डराता है,’’ वह उस से चिपक जाती.

‘‘मातापिता के पास वापस चली जाओ. वे तुम्हें माफ कर देंगे,’’

वह कई बार निमी से यह बात कह चुका था, पर हर बार निमी का यही जवाब होता, ‘‘कौन सा मुंह ले कर जाऊं उन के पास? वे मुझे क्या बनाना चाहते थे और मैं क्या बन बैठी… माफ तो कर देंगे, परंतु समाज को क्या जवाब देंगे.’’

‘‘वही, जो अभी दे रहे होंगे.’’

‘‘अभी वे मुझे मरा समझ कर माफ कर देंगे, परंतु उन के पास रह कर मैं उन्हें बहुत दुख दूंगी.’’

‘‘एक बार जा कर तो देखो.’’

‘‘नहीं वरुण, तुम मेरे मांबाप को नहीं जानते. वे मुझे माफ नहीं करेंगे. अगर उन्हें माफ करना होता, तो अब तक मुझे ढूंढ़ लिया होता. यह बहुत मुश्किल नहीं था. उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट भी नहीं की होगी,’’ वरुण के समझाने का उस पर कोई प्रभाव न पड़ता.

यथास्थिति बनी रही. बस वरुण सिविल सर्विसेज की तैयारी में निरंतर जुटा रहा. इस का परिणाम यह रहा कि वह यूपीएससी परीक्षा पास कर गया.

जब वरुण ट्रेनिंग के लिए जाने लगा तो निमी ने कहा, ‘‘अब तुम पूरी तरह से मुझ से दूर चले जाओगे.’’

‘‘वह तो जाना ही था,’’ वरुण ने उसे समझाते हुए कहा. निमी के मन में बहुत कुछ टूट गया. वह जानती थी, वरुण उस का नहीं हो सकता है,

फिर भी उस के दिल में कसक सी उठी. वह खोईखोई आंखों से वरुण को देख रही थी. वरुण ने उस के सिर को सहलाते हुए कहा, ‘‘देखो, निमी, मेरा कहना मानो, अब भटकने से कोई फायदा नहीं. तुम ने अपने जीवन को जितना गिराना था, गिरा लिया. अब सावधानी से उठने की कोशिश करो. तुम्हारी तनख्वाह बढ़ गई है. कुछ बचा कर पैसे जोड़ लो और किसी लड़के से शादी कर के घर बसा लो. मेरी तरफ से जो हो सकेगा मैं मदद करूंगा.’’

निमी ने जवाब नहीं दिया. अगले कुछ दिनों में वरुण मसूरी चला गया. निमी पूरी तरह टूट गई. उस ने अपनी सोच पर ताले लगा लिए. जैसे वह सुधरना ही नहीं चाहती थी.

1 साल की ट्रेनिंग के दौरान वरुण उस से मिलने केवल एक बार आया और रातभर उस के साथ रुका. तब भी उस ने निमी को घर बसाने की सलाह दी. परंतु वह चुप ही रही.

कई साल बीत गए. वरुण की पोस्टिंग हो गई थी. वह एक जिले का कलैक्टर बन गया था. उसे छुट्टी नहीं मिलती थी या दिल्ली आ कर भी वह उस से मिलना नहीं चाहता था, परंतु हर माह वह एक अच्छी राशि निमी के खाते में जमा करा देता था.

निमी ने तय कर लिया था कि वह शादी नहीं करेगी. वरुण उस का नहीं है, फिर भी उस का इंतजार करती थी. इंतजार जितना लंबा हो रहा था, उस के शराब पीने की मात्रा भी उतनी ही बढ़ती जा रही थी. फिर पता चला कि वरुण की शादी किसी चीफ सैक्रेटरी की आईएएस बेटी से हो गई है. निमी के अंदर जो थोड़ी सी आस बची थी, वह पूर्णरूप से टूट गई. उस की शराब की मात्रा इतनी ज्यादा हो गई कि अब वह दफ्तर भी नहीं जा पाती थी.

वरुण से उस का कोई सीधा संपर्क नहीं था. कभीकभी वरुण के पिता का नौकर उस के हालचाल पूछ जाता था. वही वरुण के बारे में बताता था और उस के बारे में वही वरुण को खबर करता होगा.

अत्यधिक शराब के सेवन से उस की तबीयत खराब रहने लगी. वरुण के पिता का नौकर लगभग रोज उस के पास आने लगा था. एक दिन उसी के सामने निमी को खून की उलटी हुई. उसे आननफानन में अस्पताल में भरती करवाया गया.

मैडिकल रिपोर्ट से यह साबित हो गया था कि अत्यधिक शराब के सेवन से उस के सारे अंदरूनी अंग खराब हो गए हैं. वरुण ने अपने नौकर के माध्यम से उसे सेमी प्राइवेट वार्ड में भरती करवा दिया था. इलाज का सारा खर्च वह भेज रहा था, परंतु कभी मिलने नहीं आया.

उस के इलाज में कोई कमी नहीं थी, परंतु उस का दुख उसे खाए जा रहा था जैसे वह किसी बीमारी से नहीं, अपने दुख से ही मरेगी, परंतु इसी बीच संयोग से अस्पताल में अनुभा प्रकट हुई और उस के जीवन में अभूतपूर्व परिवर्तन आ गया. अब वह ठीक हो कर घर आ गई थी. घर तो आ गई थी, परंतु किस के  घर? उस का अपना घर, संसार कहां था?

यक्ष प्रश्न अभी भी उस के सामने खड़ा था. अब आगे क्या? 35 वर्ष की अवस्था में अब वह कोई युवती नहीं थी. बीमारी ने उस की सुंदरता को काफी हद तक क्षीण कर दिया था. नौकरी हाथ से जा चुकी थी, वरुण से भी व्यक्तिगत संपर्क टूट चुका था.

हिमांशु केंद्र सरकार में उच्च अधिकारी थे. उन्होंने अपने प्रयासों से निमी को एक संस्था से जोड़ दिया. यह संस्था अनाथ बच्चों की देखभाल और उन्हें शिक्षा प्रदान करती थी. कुछ दिन तक निमी अनुभा के घर पर रही. फिर उस की संस्था ने उसे एक घर लीज पर दिलवा दिया. साफसफाई के बाद जिस दिन निमी ने अपने घर में प्रवेश किया, तब अनुभा और उस के पति के कुछ दोस्त मौजूद थे. छोटी सी पार्टी रखी गई थी.

शाम को पार्टी के बाद जब अनुभा निमी को छोड़ कर जाने लगी, तो निमी ने कहा, ‘‘मैं फिर अकेली हो जाऊंगी.’’

‘‘नहीं, तुम अकेली नहीं हो. हम सब तुम्हारे साथ हैं. पहले जो लोग तुम से जुड़े थे, वे स्वार्थवश जुड़े थे. इसीलिए तुम पतन की राह पर चल पड़ी थी. अब तुम्हारे सामने एक लक्ष्य है, बच्चों का भविष्य सुधारने का. इस लक्ष्य को ध्यान में रखोगी और अपनी पिछली जिंदगी के बारे में विचार करोगी, तो तुम एकाकी जीवन जीते हुए भी कभी गलत रास्ते पर नहीं चलोगी.’’

निमी ने शरमा कर सिर झुका लिया. अनुभा ने उस का चेहरा ऊपर उठाया. उस की आंखों में आंसू थे. कई वर्षों बाद उस की आंखों में खुशी के आंसू आए थे.

जस्टिस रंजन गोगोई की तिरुपति में आस्था

कायदे से तो इस पर लिखा तो करारा व्यंग चाहिए लेकिन दिलचस्पी और हैरानी की तमाम हदें लांघती यह खबर थी कि चीफ जस्टिस औफ इंडिया रंजन गोगोई अपने कार्यकाल के दौरान ही तिरुपति मंदिर पहुंचे थे. वहां उन्होंने सपत्नीक वेंकेटेश्वर के दर्शन किए. हालांकि फोटोग्राफरों का माहौल देखकर लग ऐसा रहा था कि वे दर्शन करने नहीं बल्कि देने पहुंचे थे एक व्यक्ति विशेष से परे देखें तो लोग किसी भी मंदिर में करने नहीं बल्कि दर्शन देने ही जाते हैं क्योंकि पत्थर की मूर्ति तो बेचारी कहीं जाना तो दूर अपनी जगह से हिल भी नहीं सकती इसलिए भगवान जिसे चाहे उसे दर्शनों के लिए बुला लेता है और कहा भी यही जाता है.

जो लोग शिर्डी जाते हैं वे कहते हैं कि बाबा ने बुलाया है जो भक्तगन वैष्णोदेवी जाते हैं वे तो झूमते नाचते गाते कहते हैं कि ‘चलो बुलावा आया है माता ने बुलाया’ है तो इस तरह कोई खुद अपनी मर्जी से देव स्थान नहीं जाता बल्कि इसलिए जाता है कि भगवान ने उसे बुलाया या याद किया होता है.

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शायद श्री रंजन भी उन्हीं विष्णु के अवतार है, जिनके अवतार राम हैं. जिनकी जन्म भूमि के विवाद का  क्योंकि राम भी उन्हीं के अवतार हैं जिनके जन्म स्थान के विवाद के चर्चित मुकदमे का फैसला सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने दिया था. तिरुपति का माहौल उनके पहुंचते ही वैदिक कालीन सा हो गया. जस्टिस गोगोई का स्वागत मंदिर ट्रस्ट ने पूरे वैदिक रीतिरिवाजों से किया, वैदिक मंत्रोच्चार भी किया गया और स्वागत भजन भी गाये गए.

हर कोई जानता है कि जस्टिस रंजन गोगोई सीजेआई होने के नाते कोई मामूली हस्ती या शख्सियत नहीं होते. इस सर्वोच्च संवैधानिक पद का अपना अलग रुतबा और गरिमा होती है.

यह जस्टिस रंजन गोगोई की कीर्ति का ही प्रताप था कि तिरुपति में उनका ऋषि मुनियों जैसा स्वागत सत्कार हुआ.  विशेष धार्मिक क्रियाएं हुई, खुद उन्होंने पूजा आरती की और वेंकेटेश की पालकी यात्रा को कांधा भी दिया.

यह वही तिरुपति मंदिर है, जिसके ट्रस्ट ने फैसले के दूसरे दिन ही अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए 1 करोड़ रुपए देने की घोषणा की है. इसके बाद तो कई धार्मिक संस्थाओं ने इस तरह की दिलचस्पी दिखाई.

जस्टिस रंजन गोगोई इसलिए भी याद किए जाएंगे कि उन्होंने सरकार को ट्रस्ट के जरिये मंदिर निर्माण का भी आदेश दिया है. लेकिन क्या लोकतन्त्र में सरकारों को मंदिर बनाना चाहिए, क्या देश में और कोई तुक का काम नहीं क्या और क्यों किसी अदालत ने सरकार को कभी यह कहा कि वह बेरोजगारी दूर करने कुछ करे, नए नए कारखाने और फैक्टरियां लगाए, सड़कें बनाए, किसानों को अपनी पैदावार का वाजिब दाम दिलाये वगैरह वगैरह.

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न्याय के बारे में यह कथन मशहूर है कि न्याय होना ही नहीं चाहिए, होना दिखना भी नहीं चाहिए. न्यायधीशों का व्यक्तिगत व्यवहार इस बात की पुष्टि करें, यह भी आवश्यक है. सच और कड़वा सच तो यह है कि आदमी एक बार बिना आस्था के रह सकता है लेकिन बिना रोटी के नहीं, पर शासन की प्राथमिकता मंदिर हो चली है तो कोई क्या कर लेगा.

तिरुपति के मंदिर की तरह अयोध्या के मंदिर में भी अघोषित जातिगत भेदभाव नहीं होगा इस बात की कोई गारंटी नहीं है दूसरे घोषित तौर पर यह तिरुपति मंदिर पैसे वालों के लिए है. जहां वीआईपी दर्शन की फीस 10 हजार रुपए कर दी गई है. अगर आप यह फीस अफोर्ड कर सकते हों तो आपको दर्शन की लाइन में नहीं लगना पड़ेगा.

राम मंदिर : अब ट्रस्ट के लिए झगड़ा

अयोध्या के राममंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद अब संतो में ‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ में शामिल होने की होड़ लग गई है. अयोध्या के संत ही नहीं विश्व हिन्दू परिषद और राम जन्मभूमि न्यास भी चाहता है कि राममंदिर बनाने के लिये गठित होने वाले सरकारी ‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ में उनका प्रभाव बना रहे. ‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ में शामिल होने के लिये संतों के कई गुट बन गये हैं. इनमें से एक गुट का कहना है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ट्रस्ट का अध्यक्ष बनाया जाएगा. वह मुख्यमंत्री के रूप में नहीं गोरक्षापीठ के मंहत के रूप में ट्रस्ट में शामिल हो. योगी आदित्यनाथ का पक्ष लेने वाले अयोध्या के राम मंदिर के संघर्ष में गोरक्षापीठ के महत्व को बताते हैं. गोरखपुर की गोरक्षा पीठ राममंदिर निर्माण के संघर्ष में 1949 से सक्रिय है. इस पीठ के मंहत दिग्वविजय नाथ, मंहत अवैद्य नाथ भी राम मंदिर निर्माण में संघर्ष करते रहे है.

राममंदिर बनाने के लिये आन्दोलन करने से पहले ही विश्वहिन्दू परिषद ने रामजन्मभूमि न्यास का गठन किया था. राममंदिर निर्माण की जिम्मेदारी रामजन्मभूमि न्यास की थी. ऐसे में रामजन्मभूमि न्यास चाहता है कि ‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ में उसकी हिस्सेदारी सबसे अधिक हो. राम जन्मभूमि न्यास और विश्व हिन्दू परिषद राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के करीबी संगठन है. संघ का जिस तरह से केन्द्र सरकार पर प्रभाव है उसको देखते हुए यह साफ है कि राममंदिर के लिये बनने वाले ‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ में विश्व हिन्दू परिषद और रामजन्मभूमि न्यास की हिस्सेदारी सबसे अधिक होगी. अयोध्या में संतों की एक ऐसी लौबी भी है जो विश्वहिन्दू परिषद और रामजन्मभूमि न्यास की विरोधी है. संतों की यह लौबी चाहती है कि ‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ में विश्व हिन्दू परिषद और रामजन्मभूमि न्यास की भूमिका सीमित ही रहे. परेशानी की बात यह है कि यह खुलकर इसका विरोध नहीं कर सकते. अयोध्या के इन संतो को लगता है कि अगर सरकार का विरोध करेंगे तो सरकार उनको ‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ में जगह नहीं देगी.

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‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ में शामिल होने की खींचतान का कारण राममंदिर से होने वाली कमाई है. जो संत इस बोर्ड में शामिल नहीं हुआ उसके अयोध्या का प्रभावशाली संत नहीं माना जायेगा. विश्वहिन्दू परिषद का मानना है कि रामजन्मभूमि न्यास में ही कुछ बदलाव करके सरकारी ‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ बना दिया जाए. विहिप इसके लिये अपने पूर्व अध्यक्ष अशोक सिंघल की सोच भी बताने लगी है. अशोक सिंघल नहीं चाहते थे कि ऐसे किसी बोर्ड में सरकारी हस्तक्षेप हो. विहिप का विरोध करने वाले दूसरे संत चाहते है कि ‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ के बनाने में सरकार का अधिकार पूरा हो. नाम ना छापने की शर्त पर अयोध्या के एक संत कहते है कि विहिप अब चाहती है कि ‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ पर उसका पूरा अधिकार हो. जिससे आने वाले समय में केन्द्र और प्रदेश सरकार भाजपा के खिलाफ आ जाए तो भी रामंदिर पर विहिप का अधिकार बना रहे.

राम मंदिर बनाने वाला ‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ सबसे बड़ी संस्था होगी. इसमें करोड़ो रूपए आएंगे. अयोध्या में संत चाहते हैं कि इसमें उनकी हिस्सेदारी बनी रहे. महंत धर्मदास चाहते हैं कि राम की पूजा का अधिकार उनको मिले. तपस्वी छावनी के उत्तराधिकारी महंत परमहंस दास का विवाद चर्चा में है. वह कहते है कि जब तक उनको सुरक्षा नहीं मिलेगी वह वापस अयोध्या नहीं आएंगे. ऐसे में साफ है कि राममंदिर बनाने के लिये गठित होने वाले ‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ को बनाना सरल नहीं है. बोर्ड में सरकार का हस्तक्षेप संघ भी नहीं चाहता है. उसे खतरा है कि सरकार बदलने के साथ उसका प्रभाव खत्म हो सकता है. अगर विश्वहिंदू परिषद या रामजन्मभूमि न्यास का प्रभाव ‘बोर्ड औफ ट्रस्ट’ पर रहेगा तो भाजपा की सरकार जाने के बाद भी संघ का प्रभाव बना रहेगा.

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कौमेडी आफ एरर वाली फिल्म ‘‘गुड न्यूज’’ का ट्रेलर लांच

यूं तो स्पर्म/शुक्राणु को लेकर 2012 में सुजौय घोष ने फिल्म ‘‘विक्की डोनर’ का निर्माण निर्देशन किया था, जिसमें आयुष्मान खुराना और यामी गौतम बैनर तले वह ‘सरोगसी और स्पर्म की अदला बदली’ पर फिल्म ‘‘गुड न्यूज’ लेकर आ रहे हैं. जिसे ‘कौमेडी आफ एरर’ भी कह सकते हैं. राज मेहता निर्देशित फिल्म ‘‘गुड न्यूज’’ में अक्षय कुमार, करीना कपूर खान, दिलजीत दोसांज और कियारा अडवाणी जैसे कलाकार हैं. 27 दिसंबर को सिनेमाघरों में पहुंचने वाली इस फिल्म का ट्रेलर थी. फिल्म ‘‘गुड न्यूज’’ स्पर्म पर ही आधारित फिल्म है, पर विस्तार के साथ है. यह ‘आईवीएफ तकनीक और स्पर्म की अदला बदली पर है. इसे सहजता से समझना हो तो यह सरोगसी पर फिल्म है. फिल्म की टैग लाइन है- ‘‘साल का सबसे बड़ा नासमझ’’. मगर फिल्मकार ने सीधे सरोगसी की बात करने की बजाय इसे ‘कौमेडी आफ एरर’ बनाते हुए स्पर्म की अदला बदली से हास्य के क्षण पैदा किए हैं.

राज मेहता निर्देशित फिल्म ‘‘गुड न्यूज’’ के ट्रेलर से जो कहानी समझ मे आयी, उसके अनुसार अक्षय कुमार और करीना कपूर खान दोनो पति पत्नी है, जिनका सरनेम बत्रा है, जबकि दिलजीत दोसांज और कियारा अडवाणी पति पत्नी हैं और इनका भी सरनेम बत्रा है. यह कहानी अपने बच्चे का गर्भ धारण करने के लिए ‘इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ)’ के लिए जाने वाले इन्हीं दंपतियों के इर्दगिर्द घूमती है. हालांकि गलती से इनके शुक्राणु एक-दूसरे के साथ मिश्रित हो जाते हैं, जिससे एक प्रफुल्लित व हास्यप्रद भ्रम पैदा होता है.

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दस साल बाद अक्षय व करीना की वापसीः

अक्षय कुमार और करीना कपूर खान इस फिल्म में दस साल बाद एक साथ वापस आ रहे हैं. इससे पहले अक्षय कुमार और करीना कपूर खान ने ‘अजनबी’, ‘ऐतराज’, ‘कमबख्त इश्क’ और ‘टशन’ जैसी फिल्में एक साथ कर चुके हैं. जबकि दिलजीत दोसांज और कियारा अडवाणी पहली बार इस फिल्म में एक साथ नजर आएंगे.

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ऋषिकेश मुखर्जी  से प्रेरित

करण जौहर ने कहा- ‘‘मुझे ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्में बहुत पसंद हैं. मैं हमेशा से ऐसी फिल्में बनाना चाहता था, लेकिन धर्मा प्रोडक्शन ने कभी इस तरह की फिल्म नहीं बनाई. जब मैं अक्षय कुमार के घर एक फिल्म की कहानी सुनाने गया, तो मैं एक बड़ी फिल्म के साथ गया था, क्योंकि वह एक मेगा फिल्म स्टार है. पर अक्षय की खासियत है कि वह सामग्री के लिए खोज करते है. वह कभी भी स्केल, औपुलेंस या निर्देशक की तलाश नहीं करते. वह एक सुपरस्टार हैं, जिसने हमेशा पहली बार निर्देशकों का समर्थन किया है और यह एक फिल्म स्टार के लिए दुर्लभ है. यह उनकी पहली 23 वीं फिल्म है, जिसमें उन्होंने एक नए निर्देशक राज मेहता के साथ काम किया. वह कभी नही पूछते कि निर्देशक कौन हैं. जबकि ‘धर्मा प्रोडक्शन’ने राज मेहता के रूप में 16वें नए निर्देशक को ब्रेक दिया है.’’

अक्षय कुमारः स्लाइ आफ लाइफ स्टोरी

इस फिल्म से जुड़ने की चर्चा करते हुए अक्षय कुमार ने कहा-‘‘राज मेहता निर्देशित यह फिल्म ‘स्लाइस आफ लाइफ स्टोरी है’. वास्तव में करण जोहर मेरे घर पर मुझे एक फिल्म की कहानी सुनाने आए थे, उन्होंने पूरे तीन घंटे कहानी सुनायी. उसके बाद मैंने करण जौहर से पूछा कि इसके अलावा वह क्या बना रहे हैं. तो उन्होंने कहा कि वह ‘गुड न्यूज’ बना रहे हैं. इसके बाद करण जैहर ने मुझे ‘गुड न्यूज’ की  कहानी दो मिनट में बतायी. मैंने कहा कि यह तो ‘स्लाइस आफ लाइफ स्टोरी है, मैं यह फिल्म करना चाहूंगा.

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करीना कपूरः परफैक्ट कहानी व किरदार

करीना कपूर ने कहा-‘‘यह एक परफैक्ट फिल्म है. जब राज ने मुझे यह स्क्रिप्ट सुनाई, तो मुझे लगा कि मैं भूमिका के लिए परफैक्ट हूं. मुझे स्क्रिप्ट बहुत पसंद आयी. यह बहुत ही हास्यास्पद है. मैं हंसना बंद नही कर पा रही थी. फिर धर्मा प्रोडक्शन के साथ जुड़ना था. इस फिल्म के साथ जुड़ने वाली मैं पहली कलाकार थी.

बतौर निर्माता शशांक खेतान की यह पहली और बतौर निर्देशक राज मेहता की यह पहली फिल्म है.

फिल्म के सह निर्माता शशांक खेतान ने निर्देशक राज मेहता की चर्चा करते हुए कहा-‘मैं बहुत भावुक हूं. राज ने मेरे सहायक के तौर पर फिल्म ‘हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया’ की थी. तब से हम एक साथ हैं. मैं बहुत खुश हूं कि मैं उनके द्वारा निर्देशित उनकी पहली फिल्म का हिस्सा हूं.’

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राज मेहता ने कहा- ‘‘मैं खुद को भाग्यशाली मानता हूं कि मुझे धर्मा प्रोडक्शन के लिए दिग्गज कलाकारों के अभिनय से सजी इस फिल्म को निर्देशित करने का अवसर मिला. मेरे लिए तो यह मेरे सपने के पूरे होने जैसा है.’’

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करण जौहर का बड़ा ऐलान

बौलीवुड में हीरो और हीरोईन की पारिश्रमिक राशि पर मतभेद के सवाल पर करण जैहर ने बड़ा बयान देते हुए कहा- हमारे प्रोडक्शन हाउस ‘धर्मा प्रोडक्शन’ में हर किसी को, फिर चाहे वह हीरो हो या हीरोइन हो या कोई तकनीशियन हो, उसकी कला, शिल्प व क्षमता के अनुसार उचित मानधन दिया जाता है. हम सभी यहां पर कला और वाणिज्य दोनों के लिए हैं. हमारी नारी प्रधान फिल्मों ने हमेशा यह सुनिश्चित किया है कि हमारे यहां कोई असमानता नही है. हम तो धीरे धीरे पारिश्रमिक राशि के अलावा लाभ में  भी हिस्सा देने का प्रयास कर रहे हैं. आगे चलकर आप देखेंगे कि धर्मा प्रोडक्शन’ की फिल्म में निर्माता के रूप में महिला कलाकार का भी नाम है.’’

इस खास मौके पर कपिल शर्मा ने शेयर की ये तस्वीरें

मशहूर कौमेडियन और अभिनेता कपिल शर्मा  जल्द ही अपने फैंस को खुशखबरी देने वाले हैं. जी हां कपिल शर्मा के घर बहुत जल्द ही एक नन्हा मेहमान आने वाला है. वो जल्द ही पापा भी बन जाएंगे.

आपको बता दें कि कपिल ने पिछले साल दिसंबर में अपनी गर्लफ्रेंड गिन्नी चतरथ के साथ शादी रचाई.हाल ही में कपिल की पत्नी गिन्नी चतरथ ने अपना बर्थडे सेलिब्रेट की. इसी खास मौके पर कपिल ने कुछ तस्वीरों को शेयर कर उन्हें बधाई दी हैं.

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गिन्नी को बर्थडे विश करते हुए कपिल ने लिखा, जन्मदिन की बहुत बधाई मेरी सबसे अच्छी दोस्त गिन्नी, जो अब एक बेबी की मां बनने जा रही हैं. ढेर सारा प्यार और आशीर्वाद.” कपिल और गिन्नी एक दूसरे को कौलेज टाइम से ही जानते हैं. ‘हस बलिए’ में एक जोड़ी के रूप में उन्होंने एक साथ काम किया था.

हाल ही में कपिल और गिन्नी बेबीमून के लिए कनाडा रवाना हुए थे, जहां की तस्वीरों को उन्होंने अपने फैंस के साथ शेयर किया था. एक तस्वीर में कपिल अपनी पत्नी का हाथ थामे कनाडा की सड़कों पर टहलते नजर आए.

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तमसो मा…

दिल्ली कांग्रेस के नए अध्यक्ष और पूर्व कोषाध्यक्ष सुभाष चोपड़ा के सामने चुनौती आम आदमी पार्टी या भाजपा से निबटने के लिए रणनीति बनाने, संगठन को मजबूती देने या दिल्ली में कांग्रेस की खोई साख हासिल करने की कम, पार्टी दफ्तर राजीव भवन में रोशनी का इंतजाम करने की ज्यादा है.

दिल्ली कांग्रेस की कंगाली और बदहाली का आलम यह है कि उस के पास बिजली का 2 लाख रुपए का बिल भरने के लिए भी पैसा नहीं है. इस जले पर नमक छिड़कने के लिए बिजली कंपनी डिस्काम वाले हर कभी कनैक्शन काट देते हैं जिसे मुद्दत से आधी पगार पर काम कर रहा मौजूदा डेढ़ दर्जन कर्मचारियों का स्टाफ झुग्गीझोंपड़ी वालों की तरह जुगाड़तुगाड़ कर काम चला लेता है. हालांकि, सुभाष चोपड़ा चाहें तो खुद यह रकम अदा कर सकते हैं. बहरहाल, दिल्ली में कांग्रेस तभी रोशन होगी जब कांग्रेस 70 में से कम से कम 20 सीटें विधानसभा में ले आए.

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भरत मिलाप के माने

अपने बुद्धिमान और भूतपूर्व शक्तिशाली मित्रनुमा शत्रुओं से खुद उन के यहां मिलने जाने का वैदिककालीन रिवाज उत्तर प्रदेश के महंत मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने भी निभाया और दीवाली के बहाने सपा संस्थापक मुलायम सिंह से मिल कर अटकलों का बाजार गरमा दिया. मुलायम सिंह की हालत इन दिनों वैसी ही है जैसी डाक्टर बिरादरी में दंत चिकित्सकों की होती है कि कोई मरीज आ गया तो बल्लेबल्ले, वरना कालेज के जमाने की सहपाठिनों की मधुर स्मृतियों या मोबाइल पर वांछितअवांछित वीडियो देख वक्त काटते रहो.

लगाने वालों ने अंदाजा लगा लिया कि हो न हो, इस मुलाकात का संबंध जरूर अयोध्या और राम से ही है क्योंकि सर्दी के मौसम में यह मुद्दा गरम ही रहता है. रामदूत अतुलित बलधामा को साक्षात अपने भवन में आया देख गदगद मुलायम ने कहीं हिंदुत्व की भावुकता में आ कर  अपने कवचकुंडल के दान का वचन तो नहीं दे दिया, यह तो वही जानें, लेकिन यह बात ज्यादा अहम है कि अयोध्या के मद्देनजर हमेशा की तरह अभी भी भगवा खेमे को पिछड़ों की जरूरत ज्यादा है, दलितों की होती तो योगी, मायावती के महल में जाते.

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भूपेश का ड्रामा

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने दीवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा पर दुर्ग जिले में अपने हाथ पर सौंटा, जिस का वर्तमान नाम कोड़ा है, सार्वजनिक रूप से खाया ताकि राज्य में खुशहाली रहे और उन के अपने पाप या कष्ट कटें.

धर्म के नाम पर खुद को कष्ट देने का रिवाज नया नहीं है. लेकिन अगर इस से खुशहाली आती हो तो सभी मुख्यमंत्रियों को रोजरोज खुद को इस सौंटे से पिटवाना चाहिए. सभी मंत्रियों, अधिकारियों और कर्मचारियों को भी कार्यालयीन समय में सौंटे से पीटा जाना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए जिस से खुशहाली आए. सौंटा खाते हुए वीडियो दिखा कर जनता को निरुत्तर किया जा सकता है.

अब कौन भूपेश बघेल को समझाए कि 15 वर्षों बाद कांग्रेस को जनता की सेवा करने का मौका मिला है तो उसे बेहूदे पाखंडों में वे जाया न करें, जिन के चलते भाजपा चलता हुई है.

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फिर बन गए…

आजादी के सालों बाद तक पंचायतों में सरपंच का चुनाव बड़े सौहार्दपूर्ण माहौल में हुआ करता था. गांव के 20-30 लोग पेड़ के नीचे बैठ कर किसी दबंग, रसूखदार के नाम पर हाथ ऊपर उठा देते थे और मिनटों में आसपास के गांवों में बिना किसी मीडिया या सोशल मीडिया के सहारे खबर पहुंच जाती थी कि इस बार फलां ठाकुर साहब या नंबरदार ने सरपंच बनने की अनुकंपा की है.

दूसरे क्षेत्रीय दलों की तरह जनता दल (यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव भी इसी प्रचलित पद्धति से संपन्न हुआ. नीतीश कुमार फिर सर्वसम्मति से दिल्ली के मावलंकर हाल में साल 2022 तक के लिए इस अहम पद की जिम्मेदारी लेने को बिना किसी मानमनौव्वल के मान गए. बिहार में 2020 में विधानसभा चुनाव होने हैं और हालिया विधानसभा  उपचुनाव में उन की पार्टी जैसेतैसे 5 में से केवल एक ही सीट जीत पाई है. देखना दिलचस्प होगा कि राष्ट्रवाद और सत्ता विरोधी आंधी को नीतीश कैसे रोक पाएंगे.

सर्दियों में इन 3 बीमारियों से ऐसे बचें

सर्दियों का मौसम आते ही हर कोई ठण्ड से बचने के लिये अपने गर्म कपड़े निकालने लगता है. वैसे तो सर्दियों का मौसम बहुत ही खुशनुमा होता है. कोहरे की सफेद चादर ओढ़े हुए सुबह होना, बागों में अलग अलग रंग के फूल खिलना लेकिन फिर भी हमें एक डर अंदर से सता रहा होता है कि कहीं हम बीमार न हो जाएं. क्योंकि सर्दियों के मौसम में खांसी, जुकाम की समस्या तो आम बात है लेकिन कुछ ऐसी बीमारियां है जो सर्दी के मौसम में ही हमें अपनी जकड़ में ले लेती हैं. तो आइए सर्दी में सबसे आम बीमारियों को जानें.

हाइपोथर्मिया

हमारे शरीर का नार्मल तापमान 37  डिग्री होता है लेकिन अगर सर्दियों में  शरीर का ताप 34-35 डिग्री से नीचे चला जाए तो उसे हाइपोथर्मिया कहते हैं. यह ठंडे मौसम या ठंडे पानी में जाने से होता है व शरीर में पानी की कमी होने के कारण  भी होता है, इसमें हाथ-पैर ठंडे हो जाते हैं, सांस लेने में तकलीफ होती है. हार्ट बीट सामान्य से बढ़ जाती हैं व बीपी कम हो जाता है. अगर शरीर का तापमान कम हो जाए तो मृत्यु भी हो सकती है. हाइपोथर्मिया से बचने के लिये शरीर को गर्म कपड़ों से ढक के रखें मोजे, दस्ताने पहनना न भूले और ठंड में बाहर व्यायाम करते समय ध्यान रखें. इससे बचने के लिये शरीर का तापमान सामन्य रखना बहुत जरूरी होता है.

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बेल्स पाल्सी

इसे फेसियल पेरालिसिस कहते है. इस बीमारी में चेहरे की माशपेशियों में कमजोरी आ जाती है. इससे एक तरफ का चेहरा मुरझाया और टेढ़ा लगता है. इसकी वजह से पीड़ित एक ही तरफ से हंस पाता है व ग्रस्त चेहरे की तरफ की आंख भी बंद नहीं हो पाती. यह सर्दियों में बड़ा सामान्य है. कान के पास से सेवेंथ क्रेनियल नस गुजरती है, जो तेज ठंड होने पर सिकुड़ जाती है. जिसकी वजह से यह बीमारी होती है. खासकर ड्राइविंग करने वालों, रात में बिना सिर को ढके कहीं जाने वालों में इसका खतरा बढ़ जाता है, इसलिए मफलर का प्रयोग करें, गाड़ी के शीशे बंद रखें. यह अस्थायी समस्या है जिसे ठीक होने में छः महीने तक का समय लगता है यह वायरल इन्फेक्शन के बाद होने वाला रिएक्शन भी हो सकता है.

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सर्दियों में होते हैं सबसे ज्यादा हार्ट अटैक-

वैसे तो हार्ट अटैक किसी भी मौसम में हो सकता है लेकिन सर्दियों में होने की संभावना सबसे ज्यादा होती है. कई कारण हो सकते हैं जो सर्दियों में इस संभावना को और प्रबल करते हैं. जैसे बैरोमेट्रिक दबाव, नमी, हवा, और ठंड. ये ठंडा मौसम हमारे शरीर पर नकारात्मक असर डालता है जिससे नर्वस सिस्टम की गतिविधियां बढ़ जाती हैं, हमारा  रक्त गाढ़ा हो जाता है और रक्त वाहिकाएं सिकुड़ जाती हैं. इससे कई नकारात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं, जिसके चलते हार्ट अटैक होने की संभावना ज्यादा होती है.

इन 3 पुराने चीजों से सजाएं अपने घर को

अगर आप अपने घर के पुराने सामान को बेकार समझती हैं या इन सामान को आप फेंकना चाहती हैं तो ऐसा बिल्कुल न करें, क्योंकि आज हम आपको बताएंगे कि आप पुराने सामान से कैसे अपने घर को नए तरीके से सजा सकती हैं.

प्लेट– बेकार पड़े प्लेट को फेकने से अच्छा है उसको खूबसूरत तरीके से घर में सजाया जाए. इससे घर सुंदर दिखेगा. आप इन प्लेटस को रंगिन कपड़ों या पेपर से कवर कर घऱ के दीवारों में सजा सकती हैं.

बैग–  पुराने बैग को फेंकने की बजाय उस में आर्टिफिशिल फूल लगा कर दीवार में सजा सकती हैं. आप चाहें तो  बेकार पड़े बैग लेकर इनकी मदद से वर्टिकल गार्डन भी तैयार कर सकती हैं. ये आपके घर को नया लुक देगा.

कांच की बोतलें– कांच की बोतल ज्यादातर घरों में होती ही हैं. लोग इसे कवाड़ में बेच देते हैं या उनको फेंक देते हैं. मगर इनको फेंकने से अच्छा है की इन में आप छोटे फूल लगा सकती हैं.

जानिए, मसूर की खेती कैसे करें

मसूर एक ऐसी दलहनी फसल है, जिस की खेती भारत के ज्यादातर राज्यों में की जाती है. मसूर फसल तैयार होने में भी 130 से ले कर 140 दिन लेती है. ऐसे में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के वैज्ञानिकों ने मसूर की नई प्रजाति विकसित की है जो कम दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. धान के बाद खाली खेती में मसूर की बोआई अक्तूबर माह के मध्य के बाद किसानों को करनी चाहिए.

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के आनुवांशिकी एवं पादप प्रजनन विभाग के कृषि वैज्ञानिकों की मानें तो राज्य उपसमिति की बैठक में प्रथम किस्म छत्तीसगढ़ मसूर-1 को प्रदेश के लिए अनुमोदित किया गया है. यह किस्म 88-95 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है, जिस की औसत उपज 14 क्विंटल है.

इस किस्म के पुष्प हलके बैंगनी रंग के होते हैं. इस के 100 दानों का औसत वजन 3.5 ग्राम होता है. छत्तीसगढ़ मसूर-1 किस्म, छत्तीसगढ़ में प्रचलित किस्म जेएल-3 की अपेक्षा 25 फीसदी अधिक उपज देती है.

मसूर की खेती के लिए जमीन को पहले से तैयार कर लें. पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें और 2-3 जुताइयां देशी हल से कर के पाटा लगा कर एकसार कर लें.

मसूर की खेती के लिए बीजोपचार जरूरी होता है. इस के लिए 10 किलोग्राम बीज को 200 ग्राम राइजोबियम कल्चर से उपचारित कर के बोना चाहिए.

मसूर में सिंचाई की कम जरूरत पड़ती है लेकिन इस के बाद भी इस की पहली सिंचाई फूल आने से पहले करनी चाहिए. धान के खेतों में बोई गई मसूर की फसल में सिंचाई फली बनने के समय करनी चाहिए.

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वैज्ञानिकों की मानें तो अच्छी फसल की पैदावार के लिए मिट्टी का पीएच मान 5.8-7.5 के बीच होना चाहिए. अधिक क्षारीय व अम्लीय मिट्टी मसूर की खेती के लिए सही नहीं है.

कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक, पहली सिंचाई शाखा निकलते समय बोआई के 30-35 दिन और दूसरी सिंचाई फलियों में दाना भरते समय बोआई के 70-75 दिन बाद करनी चाहिए.

ध्यान रखें कि पानी ज्यादा न होने पाए. अगर मुमकिन हो तो टपक विधि यानी स्प्रिंकलर से सिंचाई करें या खेत में स्ट्रिप बना कर हलकी सिंचाई करना फायदेमंद रहता है. ज्यादा सिंचाई करने से मसूर की फसल में गलने की समस्या आती है.

छत्तीसगढ़ में मुख्य रूप से दुर्ग, कवर्धा, राजनांदगांव, बिलासपुर, कोरिया, धमतरी कांकेर समेत रायपुर जिलों में की जाती है, जिस से वर्तमान में इस की खेती तकरीबन 26.18 हजार हेक्टेयर में की जाती है, जिस का उत्पादन 8.72 हजार टन है और औसत पैदावार 333 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है. इस की बोआई अक्तूबर से नवंबर माह के बीच सही होती है. 80 फीसदी फलियां पकने पर कटाई की जानी चाहिए.

मुनाफा कमाना है तो बोइए मसूर की नई किस्म. छत्तीसगढ़ राज्य के लिए यह किस्म काफी मुफीद पाई गई है.

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