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निर्णय : भाग 1

शुभ्रा नितिन के रोषपूर्ण व्यवहार और अक्खड़पन को समझ न पाती. कलह के खंजरों से वह शारीरिक व मानसिक दोनों रूप से लहूलुहान हो रही थी. लेकिन नितिन का रवैया, जो उस के लिए रहस्य बना हुआ था, आज प्याज की परतों की तरह खुलने लगा था.

आज सुबह औफिस जाने से पहले फिर नितिन ने उस पर हाथ उठाया. शुभ्रा समझ ही नहीं पाई कि उस का दोष क्या है. बेबात पर नितिन का हाथ उठना उस की समझ से परे हो जाता है. अपनी तरफ से शुभ्रा भरसक यह प्रयत्न करती है कि नितिन को किसी भी तरह का कोई मौका न दे, पर नितिन तो कोई न कोई कारण ढूंढ़ ही लेता है. लगता है कि उसे किसी दोष पर नहीं, बस, मारने के लिए ही मारा जाता है.

शुभ्रा सोचती थी कि पाश्चात्य देशों में तो लोग बड़ी सभ्यता से पेश आते होंगे. यहां आने से पहले उस ने न जाने क्याक्या सपने पाले थे. हिंदुस्तान में शादी के समय के नितिन में और आज के नितिन में कितना फर्क था. उसे पा शुभ्रा फूली न समाई थी. 2 हफ्ते ही तो साथ रहे थे. फिर नितिन उसे जल्दी ही ‘स्पौंसर’ करने को कह कर विदेश चला गया था.

महीनों बीत गए थे पर नितिन ने उसे ‘स्पौंसर’ नहीं किया था. कोईर् न कोई कारण लिख भेजता था और वह उस के हर बहाने को सत्य समझ रंगीन सपनों की चिलमन से भविष्य में झांकती रही. पति को तो भारतीय आदर्शानुसार तथाकथित परमेश्वर के रूप में ही स्वीकारा था न, तो फिर अन्यथा की गुंजाइश का प्रश्न ही नहीं उठता था, और फिर 2 ही हफ्तों का तो साथ था, जो पलक झपकते ही बीत गए थे. शादी की गहमागहमी, संबंधों का नयापन व 2 हफ्तों के रोमांचकारी मिलन ने कुछ समझनेबूझने का समय ही कहां दिया था. एक सपने की तरह समय गुजर गया और बाद में वह सिर्फ उसी की खुमारी में जी रही थी.

आखिर 2 साल के बाद नितिन ने शुभ्रा को ‘स्पौंसर’ किया था. अब यहां आने पर वैवाहिक संबंध एक पहेली बन कर रह गया है.

शुभ्रा एक आह से भर उठी और रसोई का कूड़ा समेट कर अपार्टमैंट बिल्ंिडग के ‘इंसिनरेटर’ की ओर चल पड़ी.

शुभ्रा इंसिनरेटर में कूड़ा डाल कर वापस आ रही थी कि नीचे के फ्लैट से तेज होती हुई आवाज ने उस का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया. वह उस तरफ ज्यादा ध्यान न दे कर अपने फ्लैट का दरवाजा बंद करने ही जा रही थी कि बेहूदे ढंग से कहे गए अपने नाम को सुन कर वह चौंक पड़ी और बगल से निकल रही सीढि़यों की रेलिंग पर आ कर खड़ी हो गई.

शुभ्रा अचंभित थी कि उस का नाम क्यों लिया गया है. वह तो यहां ज्यादा किसी को जानती भी नहीं. अभी कुछ ही हफ्ते तो हुए हैं उसे हैमिल्टन, कनाडा में आए हुए.

नीचे के फ्लैट वाली तमिल लड़की रूपा कह रही थी, ‘‘मेरा तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं. मैं ने तो इमिग्रेशन वालों को कह दिया था कि वे तुम्हें एयरपोर्ट से बाहर ही न आने दें, तुम यहां पहुंच कैसे गए? शुभ्रा की बच्ची भी पता नहीं कैसे एयरपोर्ट से बाहर निकल आई. मैं ने तो उस का भी पक्का इंतजाम किया था. हम दोनों के मांबाप ने जबरदस्ती तुम से मेरी शादी कर दी थी. निकल जाओ यहां से.’’

शुभ्रा इस के आगे कुछ नहीं सुन सकी. उस का सिर चकराने लगा. रेलिंग हाथ से छूटने लगी. किसी तरह वह अपने को खींचती हुई अपार्टमैंट के अंदर लाई और सोफे पर बेजान सी गिर पड़ी. उस का मन अन्य दिनों की अपेक्षा कहीं अधिक भारी हो उठा. वह ऐसी मानसिक व शारीरिक थकान से गुजर रही थी, जिस का संबंध दिनभर के कामों की थकान से नहीं बल्कि संपूर्ण जीवन की दूभरता से था. यह ऐसी थकान नहीं थी जो एक रात अच्छी नींद के बाद पिंड छोड़ दे, यह जीवन की वह थकान थी जो शायद सार्थकता के अभाव में मृत्यु के साथ ही खत्म हो. उस का हृदय विचलित हो उठा था.

उस के दिमाग की नसें फूल कर फटने को तैयार थीं. लग रहा था जैसे कोई उस के सिर पर हथौड़े मार रहा है. शून्य दिमाग और आंखें पथरा सी रही थीं. सीने में एक हिचकी उभरी और फिर आंसू आंखों की कगारों का बांध तोड़ कर निकलने लगे.

अभी तक तो शुभ्रा की सोच पर हड़ताल का ताला पड़ा हुआ था. पर अब स्थिति के पारदर्शी होने पर रहरह कर फुरहरी दौड़ी जा रही थी. उफ, जाने अब क्या होगा.

नितिन तो एकदम बबूल के वृक्ष निकले. अपना पत्ता भी ऊंट के मुंह तक नहीं पहुंचने देते और दूसरे की चूनर भी अपने कांटों से उलझाए रखते हैं.

जाने कितनी बातें, जिन का रहस्य आज तक उस की समझ में नहीं आया था, प्याज की परतों की तरह खुलने लगीं. आज उसे अपने पति का व्यवहार समझ में आया. अब उसे पता चला कि नितिन क्यों उस से खिंचेखिंचे रहते हैं. क्यों खीझे रहते हैं. क्यों बेबुनियाद बातों को तूल दिए रहते हैं? अपने जिन दोषों को वह अपने अंतर के दर्पण में बारबार देखने का प्रयत्न कर रही थी, अब उसे समझ में आया कि वह उन्हें क्यों नहीं देख पा रही है. क्योंकि जिस का अस्तित्व नहीं होता है वह दिखाई भी नहीं देता है.

अभी तक कलह के कारणों में अपने दोषों की तार्किकता न पा कर भी वह अपने को दोषी ठहरा स्वयं को क्षतविक्षत कर रही थी. नितिन के अमानुषिक व्यवहार से और कलह के खंजरों से शारीरिक व मानसिक दोनों ही रूप से वह लहूलुहान हो रही थी. जिन दोषों को नितिन ने उस पर थोप दिया था, उन्हें उस ने बारबार तार्किकता की कसौटी पर कसने पर किसी भी तरह तर्कसंगत न पाने के बावजूद भी अपने ऊपर थोप लिए थे, ओढ़ लिए थे. उन ओढ़ी हुई चादरों की परतों को वह एकएक कर के झंझोड़ने लगी.

सोच रही थी, नितिन के व्यवहार से तो ऐसा नहीं लगा था कि वह मातापिता के कहने पर जबरन शादी कर रहा है. जब बूआ ने नितिन के लिए सुझाया था  तब दोनों ही पक्ष कितने खुश थे. काश, उस के पिता ने उस समय नितिन के बारे में कोई जांचपड़ताल की होती. गिनेचुने हफ्तों के लिए ही तो नितिन आया था. चट मंगनी पट ब्याह. सात समंदर पार बैठे इन धूतर्ोें की जांचपड़ताल का समय ही कहां था और फिर किसी ने उस की आवश्यकता भी तो नहीं समझी थी.

नितिन के घर वाले और स्वयं नितिन ने भी तो उसे भलीभांति देख कर पसंद किया था. रही उस की पसंद, तो नितिन देखने में खूबसूरत, भलाचंगा, पढ़ालिखा, अच्छा कमाताधमाता था. और क्या चाहिए था उसे? इस परिस्थिति की तो उस ने सपने में भी कल्पना नहीं की थी.

विचारों की शृंखला बढ़ती जा रही थी, शुभ्रा अतीत में खोई जा रही थी, ‘नितिन के किसी भी हावभाव से मुझे इस बात का आभास भी न हुआ था. अगर नितिन ने मातापिता के जोर देने पर शादी की भी तो इस में मेरा क्या दोष? मुझे किस जुर्म की सजा दी जा रही है? क्या मातापिता की इच्छा, रूपा से दूरी और मेरे कुंआरेपन के नएपन में नितिन इतना डूब गया था कि उस ने उस के अंजाम पर विचार ही नहीं किया. या नितिन एक बड़ा ऐक्टर है और उस की गतिविधियां एक सोचीसमझी हुई कुटिल साजिश का अंश हैं? पर क्यों? नितिन को ऐसा कर के आखिर क्या मिला?’

शुभ्रा अभी भी नितिन के सलोने मुखौटे का आवरण उठा, उस के अंदर की वीभत्सता झांकने का साहस नहीं जुटा पा रही थी. पर कुहरा छंट रहा था, धुंध की परतें बिखर रही थीं. सत्य की किरणें उन्हें छिन्नभिन्न कर रही थीं, न समझ में आने वाली ग्रंथियां खुल रही थीं.

अब उसे यह समझ में आया कि नितिन उसे एयरपोर्ट पर लेने क्यों नहीं आए थे. काफी देर वह वहां इंतजार ही करती रही थी. फिर एक भलेमानस, काउंटर पर काम करने वाले कर्मचारी, ने उस के पति के घर का फोन नंबर मिलाया था. कोई जवाब न मिलने पर उस ने सोचा कि शायद रास्ते में देर हो गई हो. टोरंटो एयरपोर्ट से हैमिल्टन शहर है भी तो शायद 50-60 किलोमीटर. वह चुपचाप कुरसी पर बैठ कर इंतजार करने लगी थी.

पर जब ज्यादा समय बीत गया तो शुभ्रा घबरा गई. उस ने उसी कर्मचारी से फिर फोन करने का निवेदन किया, पर दूसरी ओर कोई फोन ही नहीं उठा रहा था.

हार कर शुभ्रा ने अपनी मौसेरी बहन की बचपन की दोस्त निशि को, जो टोरंटो में ही रहती थी, फोन किया. उस ने स्थिति सुन शुभ्रा को ढाढ़स बंधाया और उसे लेने एयरपोर्ट पहुंच गई.

शुभ्रा काफी घबराईर् हुई थी, क्योंकि पहली बार विदेश आई थी. यहां तो किसी को जानतीपहचानती भी नहीं थी. पति पता नहीं क्यों नहीं पहुंचे.

निशि ने बहुत चाहा कि वह उसे पहले अपने घर ले जा कर, खिलापिला कर फिर हैमिल्टन पहुंचा आएगी. पर शुभ्रा अपने घर जाने के लिए उतावली थी. वह समझ नहीं पा रही थी कि उस के पति को क्या हुआ. दुर्घटना की दुर्भावनाओं ने उस के मन के इर्दगिर्द जाल बिछाना शुरू कर दिया था. सो, वह जल्दी से जल्दी घर पहुंचना चाह रही थी. अगर नितिन घर पर नहीं भी हैं तो भी वहीं इंतजार करना चाह रही थी. उस की समस्या का समाधान तो वहीं हो सकता था.

निशि और उस का पति अखिलेश उसे हैमिल्टन छोड़ गए थे. नितिन घर में ही मिल गया था. उस ने गलत तारीख की बात कह कर अपनी अनुपस्थिति का हवाला दे दिया और बात आईगई हो गई थी. पर अब नितिन का दरवाजा खोलने पर आश्चर्यभरा चेहरा समझ में आया. जिस को वह सुखद आश्चर्य समझ बैठी थी वह तो नितिन का रोषमिश्रित दुखद आश्चर्य था.

शुभ्रा को अब यह भी समझ में आया कि रूपा क्यों उस से बात नहीं करना चाहती थी. 2-3 बार सीढि़यों, एलिवेटर व लांडरी रूम में आमनासामना होने पर शुभ्रा ने शिष्टाचारवश व अपने स्वदेशी होने के नाते ‘हैलो’ कहा था पर रूपा ने उसे हर बार नजरअंदाज किया था जबकि बिल्ंिडग की दूसरी कैनेडियन औरतें उस से बड़ी शालीनता से पेश आती हैं.

कई बातों के अर्थ, जिन्हें वह समझ नहीं पा रही थी, आज उन्हीं अर्थों के सांप पिटारियों से निकलनिकल कर उसे डस रहे हैं और वह क्षतविक्षत हो रही है. नितिन की बेवजह अवहेलना व यहां तक कि उस के बेकारण हाथ उठने पर भी उसे इतना दर्द नहीं हुआ था जितना इस क्षण वह यह असहनीय दर्द झेल रही है.

दरवाजे की घंटी लगातार बज रही थी. शुभ्रा ने मुंह पोंछ अपने को संभाला और घर का दरवाजा खोला तो सामने बिल्ंिडग के सुपरिंटैंडेंट मिस्टर जौनसन खड़े थे. नितिन ने रसोईघर के नल की शिकायत की थी, वही ठीक करने आए थे. शुभ्रा ने नीची निगाहों से उन का स्वागत कर, उन्हें किचन में जाने का रास्ता दिया, पर वह खुद कुछ देर उसी तरह खड़ी रह गई. पर ज्यादा देर उस की बेजान टांगें यह भार न सह सकीं. उन में हरकत हुई और उन्होंने ही उसे घसीट कर सोफे पर ला पटका.

मिस्टर जौनसन को कुछ समय पहले के रूपा द्वारा किए गए शोरशराबे का तो पता था पर यह नहीं पता था कि शुभ्रा ने वह सुना है. पर अब शुभ्रा का चेहरा देख वे सब समझ गए थे. नल ठीक करते हुए पिता के समान जौनसन का हृदय शुभ्रा के लिए कचोट रहा था.

शुभ्रा की शालीनता व सद्व्यवहार से वे शुरू से ही प्रभावित थे, इसीलिए अपने को न रोक पाए. शुभ्रा के पास आ धीरे से उस के सिर पर हाथ रख कर बोले, ‘‘अगर मैं तुम्हारी किसी भी तरह की कोई भी मदद कर सकता हूं, तो बेटी, मुझे बता देना.’’

उन के पिता के समान इस व्यवहार से शुभ्रा और भी द्रवित हो गई. किसी तरह अपने आंसुओं को रोक कर शुक्रिया में केवल सिर ही हिला पाई.

मन का दुख बहुत एकाकी होता है. किसी के साथ उसे बांटना बहुत मुश्किल होता है.

सोफे पर शुभ्रा का शरीर तो निष्क्रिय था, पर दिमाग निष्क्रिय न रह सका. वह अभी तक कारण न जानने के कारण ही नितिन का दुर्व्यवहार झेलती रही. कई बार वह शादी के समय के नितिन और आज के नितिन में आए अंतर को न समझ पाती थी. नितिन के प्रति अपने व्यवहार की विवेचना कर कई बार सोचती थी कि उस ने कहां और क्या गलती की है जो नितिन इतना भड़काभड़का सा रहता है. और जब वह कहीं कुछ समझ न पाई तो उस ने यही निष्कर्ष निकाला कि शायद नितिन को नौकरी की कोई परेशानी है या आर्थिक परेशानी है जो वह इस छोटी सी अवधि के संगसाथ में बता नहीं पा रहा है, सो, इस विचार से भ्रमित शुभ्रा नितिन के प्रति, उस के सारे दुर्व्यवहारों के बावजूद, और भी नम्र, सहनशील होती गई.

अब सबकुछ जानने के  बाद शुभ्रा का आत्मसम्मान जाग उठा. भारतीय नारी अबला कही जाती है, पर वही नारी समय आने पर शक्ति की प्रतीक भी बन जाती है. वह प्रेम के लिए अपना सबकुछ निछावर कर सकती है, यहां तक कि कई बार प्यार के नाम पर पायदान की तरह पड़ी रह सकती है, जहां हर आतीजाती बार उसे पैरों से रौंदा जाता है. पर जिस दिल में उस के लिए स्नेह का ही अभाव है, क्या वह उसी के घर में सिर्फ भौतिक सुखसुविधाओं के लिए, सिर्फ जीने के लिए ही पड़ी रहे? सिर्फ ईंटगारे की चारदीवारी का ही घर तो उस ने नहीं चाहा था. जिस पुरुष को उस ने अपना समझा था, जब वही उस का अपना नहीं रहा तो बाकी रहा क्या?

शुभ्रा की आंखों में जैसे गहरा काला धुआं भर उठा. असमंजस ने एक  बार फिर कचोटा. एक बड़ा प्रश्न मुंहबाए खड़ा हो चिढ़चिढ़ा कर पूछने लगा, ‘क्या अब जीवनभर अकेले ही रहना पड़ेगा?’

पर फिर शुभ्रा खुद ही बोल उठी, ‘क्या पुरुष के साथ मिल नारी ग्यारह व छिटकते ही इकाई हो जाती है?’

वह आगे सोचने लगी, ‘जीवन की जरूरतों के अतिरिक्त व्यक्ति का खुद का भी अपना एक अस्तित्व होता है. व्यक्ति किसी वांछित परिणाम या उद्ेश्य के लिए ही जीवित नहीं रहता. जीवन के प्रत्येक क्षण का अपना एक अलग महत्त्व है, क्योंकि प्रत्येक क्षण का अपना एक छोटा सा ही सही परंतु एक संपूर्ण ब्रह्मांड होता है.’

शुभ्रा ने भरेमन से एक निश्चय लिया, स्वतंत्रता जो जंजीर से बंधी थी उसे तोड़ वास्तविक रूप से स्वतंत्र होने का. एक सूटकेस में अपने कपड़े व जरूरत की चीजें पैक कीं. एक बार सोचा, निशि दीदी को फोन कर दे, पर दूसरे ही क्षण मन में आया कि नितिन नहीं चाहता था कि वह कभी किसी को फोन करे. वैसे भी निशि दीदी तो अभी काम पर ही होंगी. शुभ्रा नितिन के घर आने से पहले ही यहां से निकल जाना चाहती थी.

शुभ्रा निचली मंजिल पर बने मिस्टर जौनसन के औफिस में गई. दरवाजे पर दस्तक देते ही मिस्टर जौनसन ने दरवाजा खोला. उन्होंने शुभ्रा को आदर से कुरसी पर बैठाया व सामने की कुरसी पर बैठ कर प्रश्नभरी नजरों से उसे देखते हुए कहा, ‘‘बेटी, अब बताओ, कैसे आई हो और मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं?’’

शुभ्रा हिचकिचाते हुए बोली, ‘‘मुझे आप से एक सहायता चाहिए.’’

‘‘हांहां, बताओ, बेटी.’’

‘‘क्या आप मुझे टोरंटो में मेरे मित्र के घर तक छोड़ सकते है?’’

वेलेंसिया की भूल: भाग 2

वेलेंसिया की भूल: भाग 1

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आखिरी भाग

रीमा वलीप अपने बड़े भाई शैलेश वलीप के साथ गोवा के मडगांव के संगम तालुका में रहती थी. परिवार के नाम पर वह सिर्फ बहनभाई ही थे. रीमा का भाई शैलेश वलीप भी उसी शौप में सिक्योरिटी गार्ड था. लेकिन वह आपराधिक प्रवृत्ति का था.

यह बात जब शौप मालिक को पता चली तो उस ने शैलेश को नौकरी से निकाल दिया. इस के बाद वह घर पर ही रहने लगा. उस का सारा खर्च रीमा पर ही था. वह बहन से पैसे लेता और सारा दिन अपने आवारा दोस्तों के साथ इधरउधर मटरगश्ती करता था. कभीकभी वह बहन रीमा से मिलने मैडिकल शौप पर भी जाता था.

वहीं पर उस की मुलाकात वेलेंसिया फर्नांडीस से हुई थी. पहली ही नजर में वह उस पर फिदा हो गया था. चूंकि उस की बहन रीमा वलीप की दोस्ती वेलेंसिया से थी, इसलिए उसे वेलेंसिया के करीब आने में अधिक समय नहीं लगा.

अब वह जब भी अपनी बहन से मिलने मैडिकल स्टोर आता तो वेलेंसिया से भी मीठीमीठी बातें कर लिया करता था. सहेली का भाई होने के नाते वह शैलेश से बात कर लेती थी.

कुछ ही दिनों में शैलेश वेलेंसिया के दिल में अपनी एक खास जगह बनाने में कामयाब हो गया था. वेलेंसिया जब उस के करीब आई तो शैलेश की तो जैसे लौटरी लग गई थी. क्योंकि वेलेंसिया के पैसों पर शैलेश मौज करने लगा था. इस के अलावा जब भी उसे पैसों की जरूरत पड़ती तो वह उधार के बहाने उस से मांग लिया करता था.

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वेलेंसिया उस के भुलावे में आ जाती थी और उसे पैसे दे दिया करती थी. इस तरह वह वेलेंसिया से लगभग एक लाख रुपए ले चुका था. वेलेंसिया उसे अपना जीवनसाथी बनाने का सपना सजा रही थी, इसलिए वह शैलेश को दिए गए पैसे नहीं मांगती थी.

अगर वेलेंसिया के सामने शैलेश की हकीकत नहीं आती तो पता नहीं वह वेलेंसिया के पैसों पर कब तक ऐश करता रहता. सच्चाई जान कर वेलेंसिया का अस्तित्व हिल गया था. वह जिस शख्स को अपना जीवनसाथी बनाने का ख्वाब देख रही थी, स्थानीय थाने में उस के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज थे.

यह जानकारी मिलने के बाद वेलेंसिया को अपनी गलती पर पछतावा होने लगा. उसे शैलेश से नफरत होने लगी और वह उस से दूरियां बनाने लगी.

इसी बीच नवंबर, 2018 में एक दिन वेलेंसिया का रिश्ता कहीं और तय हो गया. शादी की तारीख सितंबर 2019 तय हो गई. शादी तय हो जाने के बाद वेलेंसिया ने शैलेश वलीप से अपनी दोस्ती खत्म कर दी और उस से अपने पैसों की मांग करने लगी.

एक कहावत है कि चोट खाया सांप और धोखा खाया प्रेमी दोनों खतरनाक होते हैं. वेलेंसिया को अपने से दूर जाते हुए देख शैलेश का खून खौल उठा. एक तो वेलेंसिया ने उसे उस के प्यार से वंचित कर दिया था, दूसरे वह उस से उधार दिए पैसे की मांग कर रही थी.

पैसे लौटाने में वह सक्षम नहीं था. इसलिए आजकल कर के वह वेलेंसिया को टाल देता था. शैलेश अब वेलेंसिया से निजात पाने का उपाय खोजने लगा. इसी दौरान योजना बनाने के बाद उस योजना को अमलीजामा पहनाने का सही मौका मिला 6 जून, 2019 को.

6 जून को जब उसे यह जानकारी मिली कि वेलेंसिया आज अपनी ड्यूटी के बाद मौल से शौपिंग करेगी. इस के लिए उस ने एटीएम से पैसे भी निकाल लिए हैं. इस के बाद शैलेश का दिमाग तेजी से काम करने लगा.

अपनी योजना को साकार करने के लिए शैलेश अपने दोस्त देवीदास गावकर के पास गया और उस से यह कह कर उस की स्कूटी मांग लाया कि उसे एक जरूरी काम से गोवा सिटी जाना है. स्कूटी की डिक्की में उस ने वेलेंसिया की मौत का सारा सामान, नायलौन की रस्सी और प्लास्टिक की एक बड़ी थैली रख ली थी.

स्कूटी से वह वेलेंसिया के मैडिकल शौप के सामने पहुंच कर उस का इंतजार करने लगा. उस ने वहीं से वेलेंसिया को फोन मिलाया तो न चाहते हुए भी उस ने शैलेश की काल रिसीव कर ली. शाम 8 बजे वेलेंसिया अपनी ड्यूटी पूरी कर शौप से बाहर निकली तो वह स्कूटी ले कर उस के पास पहुंच गया और उस का पैसा लौटाने के बहाने उसे अपनी स्कूटी पर बैठा लिया.

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पैसे मिलने की खुशी में वेलेंसिया अपने जन्मदिन की शौपिंग करना भूल गई. अपनी स्कूटी पर बैठा कर वह उसे एक सुनसान जगह पर ले गया. रास्ते में उस ने वेलेंसिया को जूस में नींद की गोलियों का पाउडर डाल कर पिला दिया, जिस के कारण वेलेंसिया जल्द ही बेहोशी की हालत में आ गई थी.

वेलेंसिया के बेहोश होने के बाद शैलेश ने उस के हाथपैर अपने साथ लाई नायलौन की रस्सी से कस कर बांध दिए और उस के गले में उस का ही दुपट्टा डाल कर उसे मौत की नींद सुला दिया.

वेलेंसिया को मौत के घाट उतारने के बाद शैलेश वलीप ने उस के पर्स में रखे रुपए निकाल कर उस का मोबाइल फोन कुछ दूर जा कर झाडि़यों में फेंक दिया था.

शैलेश वलीप अपनी योजना में कामयाब तो हो गया था लेकिन अब उस के सामने सब से बड़ी समस्या थी, शव को ठिकाने लगाने की. शव गांव के करीब पड़ा होने के कारण उस के पकड़े जाने की संभावना ज्यादा थी और बिना किसी की मदद के अकेले उसे ठिकाने लगाना उस के लिए संभव नहीं था.

ऐसे में उसे अपने दोस्त देवीदास गावकर की याद आई. वह तुरंत गांव वापस गया. देवीदास को पूरी बात बताते हुए जब उस ने शव ठिकाने लगाने में उससे मदद मांगी तो देवीदास गावकर के चेहरे का रंग उड़ गया. पहले तो देवीदास इस के लिए तैयार नहीं हुआ, लेकिन जब शैलेश ने उसे 2 हजार रुपए शराब पीने के लिए दिए तो वह फौरन तैयार हो गया.

उस ने अपने घर से एक सफेद चादर ली और घटनास्थल पर पहुंच कर वेलेंसिया का चेहरा बिगाड़ कर उस के शव को पौलीथिन में डाला. फिर वह थैली चादर में लपेट ली और उसे स्कूटी पर रख कर घटनास्थल से करीब 10 किलोमीटर दूर ले जा कर केपे पुलिस थाने की सीमा में फातिमा हाईस्कूल के जंगलों में डाल दिया.

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शैलेश वलीप और देवीदास गावकर से पूछताछ कर उन के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201 के तहत मुकदमा दर्ज कर उन्हें मडगांव कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया गया.

देवदासी देह शोषण की लंबी दास्तान

लेखक: कैलाश जैन

महिलाएं सभ्य समाज की धुरी होती हैं. लेकिन भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को देख कर लगता है कि यह धुरी दिनबदिन कमजोर होती जा रही है. पुरुष प्रधान समाज ने अपनी सारी परंपराएं और प्रथाएं स्त्रियों के शोषण हेतु निर्मित की हैं. बाल विवाह हो, सतीप्रथा हो या विधवा का सामाजिक जीवन, हर मुकाम पर शोषण की शिकार महिलाएं ही हैं.

स्त्री के देहशोषण की ऐसी ही एक अमानवीय परंपरा का नाम है, ‘देवदासी प्रथा.’ वर्तमान में इस परंपरा का स्वरूप, देवदासी को मात्र धर्म द्वारा अनुमोदित वेश्या का दर्जा दिलाने का रह गया है.

इस वर्ष की शुरुआत में नैशनल लौ स्कूल औफ इंडिया यूनिवर्सिटी, मुंबई और टाटा इंस्टिट्यूट औफ सोशल साइंसेज, बेंगलुरु द्वारा देवदासी प्रथा पर 2 अध्ययन किए गए. कर्नाटक देवदासी अधिनियम 1982 के 36 वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी राज्य सरकार द्वारा इस कानून के संचालन हेतु नियमों को जारी करना बाकी है.

1988 में आंध्र प्रदेश सरकार ने भी इस प्रथा को गैरकानूनी घोषित कर दिया था. बावजूद इस के, वर्ष 2013 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने बताया था कि अभी देश में 4,50,000 देवदासियां हैं.

इस का मतलब है कि इस कुप्रथा को खत्म करने के लिए केवल नाममात्र की पहल की गई है और माना जा रहा है कि अब यह कुप्रथा कर्नाटक से निकल कर गोवा तक पहुंच गईर् है. इतना ही नहीं, यह तेजी से फैल भी रही है.

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भारत में देवदासी प्रथा के प्रचलन का इतिहास बहुत पुराना है. आर्यों के भारत आने से पहले से ही यह प्रथा यहां जारी थी. एक धारणा के अनुसार, जब मूर्तिपूजा के विकास के साथ मंदिरों का निर्माण प्रारंभ हुआ, तब उपासना की विधियों, तंत्रमंत्र के प्रभाव में काफी वृद्धि हुई. धर्म को जब राज्याश्रय प्राप्त हुआ तो वैभव प्रदर्शन से परिपूर्ण भव्यविराट, पूजाअर्चना के आयोजन होने लगे. ऐसे आयोजनों की भव्यता को बढ़ाने के लिए नृत्य और गायन में पारंगत सुंदर नवयौवनाओं का उपयोग किया जाने लगा. अनुमान है कि यहीं से देवदासी परंपरा की शुरुआत हुई होगी.

सेवा अर्चना करना था उद्देश्य

तीसरी शताब्दी के पूर्वार्द्ध में यह प्रथा अधिक जोरों से प्रचलन में आई. लेकिन उस समय तक इस का स्वरूप विशुद्ध धार्मिक था. पल्लव व चोल वंश के शासकों के शासनकाल में यह प्रथा काफी फलीफूली. उस समय देवदासियों को नृत्यकला, संगीतकला आदि का प्रामाणिक प्रतिनिधि मान कर उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था.

जानेमाने इतिहासकार एडगर थर्स्टन ने अपनी पुस्तक ‘कास्ट्स ऐंड ट्राइंस इन सदर्न इंडिया’ में भारत में देवदासी प्रथा पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि 11वीं सदी में चोल वंश के राजा चोल के शासनकाल में तंजौर के राजेश्वर मंदिर में 400 देवदासियां थीं. इसी प्रकार गुजरात के सोमनाथ मंदिर में 500 देवदासियां होने के प्रमाण मिलते हैं. प्रारंभ में देवदासियों के क्रियाकलापों का स्वरूप विशुद्ध धार्मिक आयोजन तथा नृत्य व संगीत द्वारा मंदिरों में सेवाअर्चना करने तक सीमित था.

घिनौनी जिंदगी

विजयनगर साम्राज्य के दौरान देवदासी प्रथा के महत्त्व का अवमूल्यन होना प्रारंभ हुआ. धीरेधीरे उन का कार्य मंदिर में देवी की सेवा करना भर नहीं रह गया, बल्कि राजाओं और सामंतों की कामवासना को शांत करना भी हो गया. इस नैतिक पतन में देवदासी क्रमश: सरकारी मुलाजिम, पुजारी, पैसे वाले लोगों के भोगविलास की वस्तु बनती गई और आज स्थिति यह है कि देवदासियां एक प्रकार से धार्मिक मान्यताप्राप्त वेश्याओं की घिनौनी जिंदगी व्यतीत कर रही हैं.

ऐसे बनती देवदासियां

भारत में देवदासी प्रथा मुख्यतया कर्नाटक में बारवाड़, बीजापुर, महाराष्ट्र के कोल्हापुर तथा उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में प्रचलित है. अन्य सामाजिक कुप्रथाओं की भांति यह प्रथा भी समाज के कमजोर और दलित वर्गों में ही अधिक व्याप्त है. देवदासी प्रथा का मुख्य केंद्र कर्नाटक राज्य के सौदंती (बेलगांव) कसबे में एक पहाड़ी पर स्थित देवी यल्लम्मा का मंदिर है. प्रतिवर्ष माघ माह की पूर्णिमा को यहां एक विराट मेला लगता है.

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इस मेले में हर साल करीब 4-5 वर्ष की अबोध बालिकाओं को देवी को समर्पित कर ‘देवदासी’ बना दिया जाता है. एक अनुमान के अनुसार, पिछले 40 सालों में करीब 3 लाख बालिकाएं देवदासी बनाई जा चुकी हैं.

अपनी पुत्रियों को देवी यल्लम्मा के चरणों में समर्पित कर देवदासी बना दिए जाने का प्रमुख कारण है, मनौती अथवा मन्नत. जैसे घर में किसी की बीमारी ठीक होने, किसी संकट के टलने पर लोग मनौती पूरी करने के लिए अपनी कन्या को देवदासी बना देते हैं, उसी प्रकार पुत्रहीन दंपती पुत्रप्राप्ति की मनौती पूरी होने पर अपनी पुत्री को देवी को समर्पित कर देते हैं. इस के अतिरिक्त किसी के सिर के बाल चिपक जाने, जिसे ‘जटा बनना’ कहा जाता है, को भी मां यल्लम्मा का निमंत्रण मान कर उसे देवदासी बना दिया जाता है.

विवाह मगर किस से

कन्या को देवी यल्लम्मा के चरणों में समर्पित करते समय जो रस्में पूरी की जाती हैं वे सारी वैवाहिक रस्मों से मिलतीजुलती होती हैं. समर्पण वाले दिन देवदासी बनने वाली कन्या को मंदिर से 3 मील दूर स्थित जोगुला बणी नामक कुएं के जल से स्नान करवाया जाता है. उसे निर्वस्त्र अवस्था में नीम की पत्तियों की एक माला पहनाई जाती है और उसी स्थिति में एक जुलूस के साथ पैदल मंदिर तक लाया जाता है.

मंदिर पहुंचने पर बालिका को दोबारा नहलाया जाता है और मंदिर की परिक्रमा करवाई जाती है. इस के बाद पुजारी द्वारा पूजा व आरती की जाती है. फिर पुजारी उस कन्या का विवाह देवी के साथ संपन्न करवाता है एवं कन्या को मंगलसूत्र प्रदान करता है. यह मंगलसूत्र इस बात का प्रतीक होता है कि उस बालिका का विवाह देवी के साथ हो चुका है और अब उसे किसी पुरुष से विवाह करने का अधिकार नहीं है.

देवदासियों की सामाजिक जिंदगी अत्यंत दयनीय होती है. विवाह के अधिकार से वंचित होने के बाद भी वे किसी एक पुरुष के साथ अधिकतम 2 वर्ष की अवधि तक ही रह सकती हैं. लेकिन इस दौरान पैदा हुए बच्चे अवैध ही माने जाते हैं.

अधिकांश देवदासियां महानगरों में दलाल के माध्यम से वेश्यावृत्ति कर अपना जीवनयापन करती हैं. यौवन के अवसान के बाद इन के समक्ष दालरोटी की समस्या हमेशा मुंहबाए खड़ी रहती है. इसलिए प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था में देवदासियां अकसर भीख मांग कर अपना गुजारा करती हैं.

देवदासी प्रथा के उन्मूलन तथा उन की दशा सुधारने के लिए सरकार ने समयसमय पर कई कानून बनाए लेकिन अन्य सामाजिक समस्याओं की तरह देवदासी प्रथा के उन्मूलन हेतु भी केवल कानून बना देना ही पर्याप्त नहीं है. इस के लिए शिक्षा और ज्ञान का प्रचारप्रसार बहुत जरूरी है. सामाजिक जनजागरण के साथ कानूनों का सख्ती से पालन किया जाना भी जरूरी है.

इतनी छोटी उम्र में ही पीरियड आने से बहुत चिंतित हूं, मैं क्या करूं ?

सवाल

मेरी बेटी केवल साढ़े 11 वर्ष की है. लगभग 4 महीने पहले ही पीरियड आया है. 3-4 दिनों तक रक्तस्राव हुआ, परंतु उस के बाद नहीं हुआ.  इतनी छोटी उम्र में ही पीरियड आने से बहुत चिंतित हूं और यह सोच कर भी कि एक बार पीरियड होने के बाद क्यों बंद हो गया. उचित सलाह दें?

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जवाब

पीरियड्स 11 से 15 वर्ष तक कभी भी शुरू हो सकते हैं. कभीकभी ये रैगुलर नहीं होते. लेकिन, चिंता न करें. जैसेजैसे वह बड़ी होती जाएगी, पीरियड रैगुलर हो जाएंगे. छोटी उम्र में पीरियड होने से आप की चिंता स्वाभाविक है. आज की जीवनशैली व खानपान की वजह से लड़कियों में पीरियड्स जल्दी शुरू हो जाते हैं. फिर भी यदि आप को कोई और परेशानी दिख रही हो तो किसी स्त्रीरोग विशेषज्ञ से दिखा लें.

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जानें, क्यों फिर से राखी सावंत हुई बुरी तरह ट्रोल

फिल्म इंडस्ट्री की ड्रामा क्वीन राखी सावंत अपने बयानों के कारण काफी मशहूर रहती है. आए दिन राखी सावंत का कोई न कोई बयान सुर्खियों में छाए रहता है. जी हां अपने बयानों की वजह से राखी सावंत काफी मशहूर है. ये सोशल मीडिया पर भी काफी एक्टिव रहती हैं. आपको बता दें, एक बार फिर से राखी सावंत के बयानों की वजह से सोशल मीडिया पर उन्हें  ट्रोल किया जा रहा है.

हाल ही में राखी सावंत ने अपनी शादी की खबर से फैंस को हैरान कर दिया था. अब राखी ने एक वीडियो शेयर किया है. इसमें एक बच्ची है जो कह रही है कि राखी सावंत मेरी मम्मी है.

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राखी सावंत ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर ये  वीडियो शेयर करते हुए लिखा, ‘दोस्तों,  मेरे फैंस ये मेरी बेटी है. प्लीज इसको अपना आशीर्वाद दें’. इस पर यूजर्स ने इन्हें जमकर ट्रोल करना शुरु कर दिया है. फैंस का कहना कि राखी आप कौन से एप से अपने फोटो को ही बच्चे का फोटो बनाती हैं. इसके साथ ही कई अच्छे और बुरे कमेंट भी आए हैं.

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इसके पहले राखी ने अपनी कई तस्वीरें शेयर की थी जिसमे वो शादी के जोड़े में नजर आयी पर अब तक उनके पति की कोई तस्वीर देखने को नहीं मिली है. राखी का कहना है कि उनके पति रितेश बिजनेसमैन है और लंदन में रहते है. राखी के अनुसार उनके पति मीडिया और लाइमलाइट से दूर रहना चाहते है. इसलिए उन्हें कैमरे के सामने आना पसंद नहीं है.

बायोइन्फार्मेटिक्स में कैसे बनाएं बेहतरीन करियर

आज कल हर छात्र यही चाहता है कि कौलेज खत्म होते ही उसे एक अच्छी सी नौकरी मिल जाये. उसके लिये अधिकतर बच्चे प्रोफेशनल कोर्स की तरफ अपना रुख अपना रहे हैं पहले बच्चे साइंस स्ट्रीम का मतलब सिर्फ डौक्टर या इंजीनीयर बनना ही समझते थे लेकिन अब ऐसा नहीं है क्योंकि अब इनके आलावा और भी कई कोर्सेज होते है. ऐसा ही एक कोर्स है बायोइन्फार्मेटिक्स जिसके बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं.

बायोइन्फार्मेटिक्स होता क्या है

यह जिव विज्ञान का नया क्षेत्र है यह कोर्स इन्फोर्मेशन टेक्नोलौजी और बायोटेक्नोलौजी से मिलकर बना है. यह एक स्पेशलाइज्ड कोर्स  है. इसके माध्यम से जीन खोजना, जिनोम असेंबली, ड्रग डिजाइन, ड्रग डिस्कवरी, प्रोटीन स्ट्रक्चर अलाइनमेंट, प्रोटीन स्ट्रक्चर प्रिडिक्शन आदि क्षेत्रों में इसका प्रयोग किया जा रहा है इसका इस्तेमाल खासतौर पर मौलिक्यूलर बायोलौजी में होता है. यह  एक कम्प्यूटर टेक्निकल एप्लिकेशन है.

जरूरी योग्यता  

साइंस स्ट्रीम से 12  वीं पास करके इसमें दाखिला लिया जा सकता है. भारत में इसकी बढ़ती संभावनाएं हैं. ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन में इस विषय के साथ आपको माइक्रोबायोलौजी, फार्मेसी, वेटेनरी साइंस, मैथ्स और फिजिक्स इन सभी के बारे में जानना आवश्यक होता है.

इसमें आप  B.Sc इन बायोइन्फरमेटिक्स ,B .Tech इन बायोइन्फार्मेटिक्स ,B.Sc (Hons.) इन बायोइन्फरमेटिक्स और BE इन बायोइन्फार्मेटिक्स की पढ़ाई कर सकते हैं.

भारत में बढ़ती संभावनाएं

भारत में बायोइन्फार्मेटिक्स का क्षेत्र अत्यधिक तेजी से आगे बढ़ रहा है. इसकी अनुलम्ब वृद्धि का कारण यह है कि इस क्षेत्र में आईटी और बायोटेक्नोलौजी के बीच सुंदर समन्वय है. भारत की जैव-विविधता, मानव संसाधन, इंफ्रास्ट्रक्टरल  सुविधाओं तथा सरकारी पहल को देखते हुए आनेवाले वर्षों में भारत बायोइन्फार्मेटिक्स क्षेत्र  में काफी आगे तक जायेगा और भारत को नई उपलब्धियां भी दिलवाएगा. आईडीसी द्वारा किए गए अध्ययन से पता चलता है कि भारत में बायोसाइंस विकास की अपार संभावनाएं है.

क्या करते हैं बायोइन्फोर्मेटिस्ट

इस फील्ड में कंप्यूटर टेक्नोलौजी के जरिए बायोइन्फोर्मेटिस्ट बायोलौजिकल डेटा का एनालिसिस करते है. इसके साथ ही इनका काम डेटा स्टोरेज करना भी होता है और डेटा को एक-दूसरे से मिलाना भी. इसके माध्यम से खासतौर पर किसी पौधे के जीन्स में किस प्रकार के परिवर्तन करना, जानलेवा बीमारी के लिए उत्तरदायी जीन्स समूह का पता करना, औषधि निर्माण में सहायता आदि में किया जाता है. यह एक उभरता हुआ इंटरडिसिप्लिनरी रिसर्च क्षेत्र है तथा जिंदगी की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए इसका उपयोग लगातार बढ़ता जा रहा है.

हक के बदले लाठी, सीएम योगी का ये कैसा न्याय

ऐसा पहली मर्तबा नहीं हो रहा है इससे पहले भी हम अन्नदाताओं के सीने छलनी होते देख चुके है. सियासतदानों के वादों और चुनावी घोषणा पत्रों में किसानों की हिमायतगार बनने वाले ये नेता हमेशा से ही इस वर्ग से फरेब करते आए हैं. ताजा मामला है उन्नाव से. जहां पर किसान अपनी जमीन का उचित मुआवजा मांगने के लिए सड़कों पर आ गए थे. किसानों का आंदोलन बढ़ता देख यूपी पुलिस ने निहत्थों पर वार करना शुरू कर दिया. पुलिस की लाठी ने बिना भेदभाव किए सबकों एक तराजू में तौल दिया. कौन बुजुर्ग, कौन महिला सबको मारकर तितर-बितर किया गया. हो सकता हो इसमें प्रशासन का ये कहना हो कि शांति व्यवस्था बनाने के लिए ऐसा करना पड़ा. हम उस चर्चा में जाकर आपका और अपना समय व्यर्थ ही बर्बाद नहीं करूंगा. खास बात तो यह है कि जिस वक्त किसानों और पुलिस के बीच ये सब हो रहा था उस दौरान सीएम योगी गोरखपुर में किसानों को ही संबोधित कर रहे थे.

प्रदर्शनकारी किसानों ने जेसीबी और गाड़ी पर पथराव किया. इसके बाद जिला प्रशासन की तरफ से 12 थानों की पुलिस और कई कंपनी पीएसी को मौके पर भेजा गया. इसके साथ ही सिटी मजिस्ट्रेट के नेतृत्व में तहसील विभाग के अधिकारी भी मौके पर पहुंचे. दरअसल, प्रशासन शनिवार को किसानों की जमीन पर जेसीबी चलवाए जाने के बाद किसान उग्र हो गए. किसानों ने नाराज होकर जेसीबी पर पथराव कर दिया. बताया जा रहा है कि मौके पर अब भी भारी फोर्स तैनात है.

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किसानों का आरोप है कि 2005 में बगैर समझौते के उनकी जमीनों को अधिगृहित कर लिया गया था, लेकिन बदले में उसका मुआवजा नहीं दिया जा रहा. इसके विरोध में हम सड़क पर उतरे हैं. असल में, पूरा मामला यूपीएसआईडीसी की ट्रांस गंगा सिटी का है, जहां किसान अधिग्रहण की शर्तें पूरी नहीं किए जाने के कारण लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.

जिस योजना के लिए किसानों की जमीन अधिग्रहित की गई है उसकी नींव 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में पड़ी थी. यहां पर ट्रांस गंगा हाई टेक योजना बनी थी. करीब ढाई साल पहले उन्नाव के जिलाधिकारी ने आश्वासन दिया था कि वे इसके लिए विशेष दल गठित कर मामले का निपटारा कराने का प्रयास करेंगे. मगर अब तक प्रशासन की तरफ से कोई संतोषजनक नतीजा सामने नहीं आ पाया है, जिसकी वजह से किसान आंदोलन पर उतर आए हैं. इस तरह विकास परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण में पारदर्शिता न बरते जाने या फिर अधिग्रहीत भूमि के मुआवजे की रकम का संतोषजनक भुगतान न हो पाने की वजह से देश के विभिन्न हिस्सों से किसानों और आदिवासियों के आंदोलन उभरते रहे हैं.

कई बार ऐसे आंदोलन हिंसक रूप भी अख्तियार कर लेते रहे हैं. हालांकि पहले के मुकाबले अब भूमि अधिग्रहण कानून को काफी पारदर्शी बनाने का प्रयास किया गया है. इसमें मुआवजे की रकम भी बाजार भाव से अधिक रखी गई है. किसानों की मंजूरी के बिना भूमि अधिग्रहण नहीं किया जा सकता. लेकिन हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है. भूमि अधिग्रहण के लिए प्रशासन बल का प्रयोग या फिर मनमानी करता है. उसमें मुआवजे की रकम पर भी अड़चनें देखी जाती हैं. उन्नाव में बन रहे गंगा ट्रांस सिटी के मामले में भी ऐसी ही तकनीकी दिक्कतें हैं.

भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव से अब मुआवजे की रकम बाजार भाव से अधिक तो मिलने लगी है, पर इसके भुगतान में जिस तरह सरकारी अमले का भ्रष्ट आचरण अड़चनें पैदा करता है, वह किसी से छिपा नहीं है. इसे लेकर उत्तर प्रदेश प्रशासन पर कुछ अधिक अंगुलियां उठती रही हैं। इसलिए उन्नाव में किसानों के मुआवजे के भुगतान में विलंब हुआ है या फिर उन्हें उचित मुआवजा नहीं मिला है, तो उनका रोष समझा जा सकता है.

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क्या है ट्रांस गंगा प्रोजेक्ट

इस प्रोजक्ट के तहत 1156 एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई थी. इस जमीन पर लो राइड बिल्डिंग खड़ी की जाएंगी. जिनकी ऊंचाई लगभग 100 से 140 मीटर तक होगी. प्रोजक्ट रिपोर्ट के अनुसार पर्यावरण को देखते हुए हर दो बिल्डिंग बीच ग्रीन लैंड बनाया जाएगा. जिससे कि लोगों को शुद्ध हवा मिल सके. इसके अलावा यहां पर हर प्रकार की सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी. साथ ही आप इन इमारतों से गंगा नदीं का नजारा भी देख सकते हैं.

प्रेम तर्पण : भाग 3

कभी उसे बच्चे चिढ़ाते कि अरे, इस की तो मम्मी ही नहीं है ये बेचारी किस से कहेगी. मासूम बचपन यह सुन कर सहम कर रह जाता. यह सबकुछ उसे व्यग्र बनाता चला गया. बस, हर वक्त उस की पीड़ा यही रहती कि मैं क्यों इस परिवार की सगी नहीं हुई, धीरेधीरे वह खुद को दया का पात्र समझने लगी थी, अपने दिल की बेचैनी को दबाए अकसर सिसकसिसक कर ही रोया करती.

युवावस्था में न अन्य युवतियों की तरह सजनेसंवरने के शौक, न हंसीठिठोली, बस, एक बेजान गुडि़या सी वह सारे काम करती रहती. उस के दोस्तों में सिर्फ पूर्णिमा ही थी जो उसे समझती और उस की अनकही बातों को भी बूझ लिया करती थी. कृतिका को पूर्णिमा से कभी कुछ कहने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी. पूर्णिमा उसे समझाती, दुलारती और डांटती सबकुछ करती, लेकिन कृतिका का जीवन रेगिस्तान की रेत की तरह ही था.

कृतिका के घर के पास एक लड़का रोज उसे देखा करता था, कृतिका उसे नजरअंदाज करती रहती, लेकिन न जाने क्यों उस की आंखें बारबार कृतिका को अपनी ओर खींचा करतीं, कभी किसी की ओर न देखने वाली कृतिका उस की ओर खिंची चली जा रही थी.

उस की आंखों में उसे खिलखिलाती, नाचती, झूमती जिंदगी दिखने लगी थी, क्योंकि एक वही आंखें थीं जिन में सिर्फ कृतिका थी, उस की पहचान के लिए कोई सवाल नहीं था, कोई सहानुभूति नहीं थी. कृतिका के कालेज में ही पढ़ने आया था शेखर. कृतिका अब सजनेसंवरने लगी थी, हंसने लगी थी. वह शेखर से बात करती तो खिल उठती. शेखर ने उसे जीने का नया हौसला और पहचान से परे जीना सिखाया था. पूर्णिमा ने शेखर के बारे में घर में बताया तो एक नई कलह सामने आई. कृतिका चुपचाप सब सुनती रही. अब उस के जीवन से शेखर को निकाल दिया गया. कृतिका फिर बिखर गई, इस बार संभलना मुश्किल था, क्योंकि कच्ची माटी को आकार देना सहज होता है.

कृतिका में अब शेखर ही था, महीनों कृतिका अंधेरे कमरे में पड़ी रही न खाती न पीती बस, रोती ही रहती. एक दिन नौकरी के लिए कौल लैटर आया तो परिवार वालों ने भेजने से इनकार कर दिया, लेकिन इस बार कृतिका अपने संकोच को तिलांजलि दे चुकी थी, उस ने खुद को काम में इस कदर झोंक दिया कि उसे अब खुद का होश नहीं रहता  परिवार की ओर से अब लगातार शादी का दबाव बढ़ रहा था, परिणामस्वरूप सेहत बिगड़ने लगी. उस के लिए जीवन कठिन हो गया था, पीड़ा ने तो उसे जैसे गोद ले लिया हो, रातभर रोती रहती. सपने में शेखर की छाया को देख कर चौंक कर उठ बैठती, उस की पागलों की सी स्थिति होती जा रही थी.

अब कृतिका ने निर्णय ले लिया था कि वह अपना जीवन खत्म कर देगी, कृतिका ने पूर्णिमा को फोन किया और बिलखबिलख कर रो पड़ी, ‘पूर्णिमा, मुझ से नहीं जीया जाता, मैं सोना चाहती हूं.’ पूर्णिमा ने झल्ला कर कहा, ‘हां, मर जा और उन लोगों को कलंकित कर जा जिन्होंने तुझे उस वक्त जीवन दिया था जब तेरे ऊपर किसी का साया नहीं था, इतनी स्वार्थी कैसे और कब हो गई तू  तू ने जीवन भर उस परिवार के लिए क्याक्या नहीं किया, आज तू यह कलंक देगी उपहार में ’

कृतिका ने बिलखते हुए कहा, ‘मैं क्या करूं पूर्णिमा, शेखर मेरे मन में बसता है, मैं कैसे स्वीकार करूं कि वह मेरा नहीं, मैं तो जिंदगी जानती ही नहीं थी वही तो मुझे इस जीवन में खींच कर लाया था. आज उसे जरा सी भी तकलीफ होती है तो मुझे एहसास हो जाया करता है, मुझे अनाम वेदना छलनी कर जाती है, मैं तो उस से नफरत भी नहीं कर पा रही हूं, वह मेरे रोमरोम में बस रहा है.’ पूर्णिमा बोली, ‘कृतिका जरूरी तो नहीं जिस से हम प्रेम करें उसे अपने गले का हार बना कर रखें, वह हर पल हमारे साथ रहे, प्रेम का अर्थ केवल साथ रहना तो नहीं. तुझे जीना होगा यदि शेखर के बिना नहीं जी सकती तो उस की वेदना को अपनी जिंदगी बना ले, उस की पीड़ा के दुशाले से अपने मन को ढक ले, शेखर खुद ब खुद तुझ में बस जाएगा. तुझ से उसे प्रेम करने का अधिकार कोई नहीं छीन सकता.

कृतिका को अपने प्रेम को जीने का नया मार्ग मिल गया था, शेखर उस की आत्मा बन चुका था, शेखर की पीड़ा कृतिका को दर्द देती थी, लेकिन कृतिका जीती गई, सब के लिए परिवार की खुशी के लिए माधव से कृतिका का विवाह हो गया. माधव एक अच्छे जीवनसाथी की तरह उस के साथ चलता रहा, कृतिका भी अपने सारे दायित्वों को निभाती चली गई, लेकिन उस की आत्मा में बसी वेदना उस के जीवन को धीरेधीरे खा रही थी और वही पीड़ा उसे आज मृत्यु शैय्या तक ले आई थी, उसे ब्रेन हैमरेज हो गया था.

रात हो चली थी. नर्स ने आईसीयू के तेज प्रकाश को मद्धम कर दिया और कृतिका की आंखों में नाचता अतीत फिर वर्तमान के दुशाले में दुबक गया. पूर्णिमा ने माधव से कहा कि कृतिका को आप उस के घर ले चलिए मैं भी चलूंगी, मैं थोड़ी देर में आती हूं. पूर्णिमा ने घर आ कर तमाम किताबों, डायरियों की खोजबीन कर शेखर का फोन नंबर ढूंढ़ा और फोन लगाया, सामने से एक भारी सी आवाज आई, ‘‘हैलो, कौन ’’

‘‘हैलो, शेखर ’’

‘‘जी, मैं शेखर बोल रहा हूं.’’

‘‘शेखर, मैं पूर्णिमा, कृतिका की दोस्त.’’

कुछ देर चुप्पी छाई रही, शेखर की आंखों में कृतिका तैर गई. उस ने खुद को संभालते हुए कहा, ‘‘पूर्णिमा… कृतिका… कृतिका कैसी है ’’ पूर्णिमा रो पड़ी, ‘‘मर रही है, उस की सांसें उसी शेखर के लिए अटकी हैं जिस ने उसे जीना सिखाया था, क्या तुम उस के घर आ सकोगे कल ’’ शेखर सोफे पर बेसुध सा गिर पड़ा मुंह से बस यही कह सका, ‘‘हां.’’ कृतिका को ऐंबुलैंस से घर ले आया गया. घर के सामने लोगों की भीड़ जमा हो गई, सब की आंखों में उस माटी में खेलने वाली वह गुडि़या उतर आई, दरवाजे के पीछे छिप जाने वाली मासूम कृति आज अपनी वेदनाओं को साकार कर इस मिट्टी में छिपने आई थी.

दरवाजे पर लगी कृतिका की आंखों से अश्रुधार बह निकली, शेखर ने देहरी पर पांव रख दिया था, कृतिका की पुतलियों में जैसे ही शेखर का प्रतिबिंब उभरा उस की अंतिम सांसों के पुष्प शेखर के कदमों में बिखर गए और शेखर की आंखों से बहती गंगा ने प्रेम तर्पण कर कृतिका को मुक्त कर दिया.

सर्दियों में ऐसा हो आपका मेकअप

सर्दियों का मौसम शुरू होते ही हमें अपनी स्किन की चिंता सताने लगती है. क्योंकि सर्दियों में हमारी त्वचा रूखी व बैजान होने लगती है. और सोने पर सुहागा  होती  है यह बात कि यही सीजन होता है त्योहारों और शादियों का. ऐसे में हमारी थोड़ी सी भी लापरवाही हमें दूसरों के सामने शर्मिंदा कर सकती है. तो जरूरी है की आप अपना मेकअप भी मौसम के अनुसार ही करें. जिससे की आपकी त्वचा खराब न हो. अगर आपको शादी में जाना है और आप हैवी मेकअप करना चाहती हैं तो और ध्यान की जरूरत हो जाती है क्योंकि त्वचा की ऊपरी परत के नीचे स्थित तैलीय ग्लैंड्स सर्दियों के मौसम में इनएक्टिव हो जाते हैं. ऐसे में ठंड और सर्द हवाएं त्वचा को रूखा बनाती हैं. इसलिए आपके मेकअप में भी बदलाव की जरूरत होती है. तो जानते हैं कैसा हो सर्दियों में आपका मेकअप –

क्लीनिंग -मेकअप करने से पहले अपने फेस को पूरी तरह क्लींजिंग मिल्क से साफ कर लें .इससे आपकी त्वचा अच्छे  से मौश्चराइज  हो जाएगी और रूखी भी नजर नहीं आएगी.

सनस्क्रीन – सर्दियों में भी एसपीएफ युक्त सनस्क्रीन का इस्तेमाल करना नहीं भूलें.अगर आप ज्यादा एसपीएफ के होने से त्वचा को नुकसान पहुंचने के डर से सनस्क्रीन नहीं लगाती हैं, तो आप बच्चों की सनस्क्रीन भी लगा सकती हैं, इससे आपकी त्वचा सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से सुरक्षित रहने के साथ ही मुलायम भी रहेगी.

फाउंडेशन – अपनी स्किन टोन से मिलता हुआ फाउंडेशन लगाए सर्दियों में त्वचा ड्राई होती है इसलिये   ठंड के मौसम में हमेशा क्रीम बेस फाउंडेशन का ही इस्तेमाल करें. बेस और कौम्पेक्ट पाउडर को अच्छी तरह से स्किन में ब्लेंड करें. लाइट, मैट व शाइनी फाउंडेशन के अलावा हल्की शिमर वाली टिंटेड पाउडर सर्दियों में अच्छा लुक देता है.

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आंखों का मेकअप – सर्दियों के मौसम में घेरे रंग बहुत फबते है इन दिनों में स्मोकी आंखों का चलन जोरू पर है.  पर्पल हर टाइप की स्किन पर फबता है इसलिये इसका इस्तेमाल किया जा सकता है आंखों को डार्कर लुक देने के लिए काले रंग का आईलाइनर लगाएं.  अपने आउटफिट से मेल खाते हुए अलग-अलग रंगों को मिला सकती हैं.

आईशैडो में गोल्डन, चौकलेट ब्राउन, ब्रोंज, गाढ़ा लाल, मैरून, पीला, बेरी, ग्रे स्मोकी लुक देने के लिए बेहतर होता है.

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होठों का रखें मुलायम–  इस मौसम में हमेशा लिपस्टिक लगाने से 10-15 मिनट पहले होठों पर लिप बाम जरूर लगाएं. इससे आपके होठों में नमी बनी रहेगी. आजकल सभी को लाल, भूरा, ब्राइट पिंक, बेरी, प्लम कलर लिपस्टिक के ये  शेड्स खूब भा रहे हैं. लाल लिपस्टिक का इस्तेमाल करते वक्त आंखों का मेकअप हल्का ही रखें. ब्राउन आईलाइनर, लाइट ब्राउन शैडो और ब्लैक मस्कारा का कौम्बिनेशन लाल लिपस्टिक के साथ सभी पर अच्छा लगेगा. गोरी त्वचा पर शीयर शेड्स और सांवली पर बोल्ड लिपस्टिक  शेड्स खूब फबते हैं.

नाखून – नाखूनों पर पिंक, डार्क औरेंज, ब्लैकबेरी, कौपर व रस्ट कलर का नेल पौलिश लगाएं.

वो लौट कर आएगा : भाग 3

शरद रोज सुबह नौ बजे अपने औफिस के लिए निकल जाता था और शाम को छह बजे वापस लौटता था. वापसी में वह कभी गर्मागरम समोसे तो कभी ताजी बनी जलेबी सबके लिए लेता आता था. एक बार विजय सिंह ने उसको टोका भी कि ‘ये क्या फिजूलखर्ची करते हो…?’

वो कहने लगा, ‘बाबूजी, अपना तो कोई है नहीं… आप लोगों से जो स्नेह मिला है इसी से कुछ लाने की हिम्मत हो जाती है… अगर आपको बुरा लगता है, तो कल से….’ वह कहते-कहते उदास सा हो गया.

‘अरे, अरे… मेरा यह मतलब नहीं था बेटा… तुम तो गलत समझ बैठे….’ विजय सिंह ने जल्दी से कहते हुए समोसे का पैकेट उसके हाथों से ले लिया और नीलू को खाली प्लेट लाने के लिए आवाज लगायी.

नीलू किचेन से प्लेट के साथ-साथ चाय की ट्रे भी ले आयी. उसने आंगन में बिछी टेबल पर चाय रख दी और अपने पापा के हाथ से पैकेट लेकर समोसे प्लेट में निकालने लगी.

विजय सिंह और शरद टेबल के साथ पड़ी कुर्सियों पर बैठ गये. सर्दियों की शुरुआत थी. हवा में हल्की-हल्की ठंडक महसूस होने लगी थी. ऐसे में शाम के वक्त खुले आंगन में बैठकर चाय की चुस्कियों के साथ गर्मागर्म समोसों का लुत्फ लेने के लिए नीलू और उसकी मां भी अपने-अपने चाय के प्याले हाथ में लेकर आ गयीं. शरद काफी देर तक सबके साथ बैठा बतियाता रहा.

‘और बताओ बेटा… औफिस में मन रम गया तुम्हारा…? काम कैसा चल रहा है…?’ चाय पीते हुए विजय सिंह ने शरद से पूछा था.

‘ठीक चल रहा है बाबूजी… सारा दिन लोगों से मिलते-जुलते ही बीत जाता है… लाइफ इन्शोरेंस के बारे में लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं है…. कुछ लोग तो समझने को ही तैयार नहीं होते हैं कि इन्शोरेंस का फायदा जीवन भर तो होता ही है, मरने के बाद परिवार को भी दरकने से बचा लेता है… लोगों को समझा पाना बड़ा मुश्किल काम है बाबूजी… उनको लगता है कि लाइफ इंशोरेंस से उनको क्या फायदा…. उनके मरने के बाद उनके परिवार वाले ही मौज में रहेंगे, जीते जी उन्हें तो बस पैसा ही भरते रहना है…’ कह कर शरद हंसने लगा.

‘हा..हा..हा, ये बात तो है बेटा…’ विजय सिंह भी शरद की बातें सुनकर हंसने लगे. कुछ देर की खामोशी के बाद विजय सिंह अचानक बोले, ‘तुमने तो डबल एमए किया है न बेटा….?’

‘हां बाबूजी… पहले इतिहास विषय लेकर और फिर अंग्रेजी विषय से…’ शरद ने बताया.

‘फिर तो तुम्हारी अंग्रेजी काफी अच्छी होगी…?’ विजय सिंह ने उत्सुकता से पूछा.

‘हां बाबूजी… ठीक-ठाक ही है… बाबूजी, आप तो जानते ही हैं कि प्राइवेट कम्पनियों में सारे काम अंग्रेजी में ही होते हैं… अंग्रेजी बोलने-पढ़ने वालों की यहां ज्यादा पूछ है… निवेशकों से डील करना….क्लाइंट्स से बात करना… उनको तरह-तरह की स्कीमें समझाना… बिना अंग्रेजी के तो कुछ हो ही नहीं पाता…. मगर आप क्यों पूछ रहे हैं?’ शरद ने उनकी उत्सुकता का कारण जानना चाहा.

विजय सिंह सोच की मुद्रा में थे. शायद कुछ पूछना चाहते थे मगर झिझक रहे थे. उनको चुप देखकर शरद फिर पूछ बैठा.

‘क्या बात है बाबूजी… आप बिना संकोच के कहिए…’

‘सोच रहा था… तुमसे कैसे कहूं….’ विजय सिंह कहते-कहते हिचकिचाए.

‘कैसी बात कर रहे हैं बाबूजी… कहिए न क्या बात है?’

‘अगर तुम घंटा-पौना घंटा नीलू को अंग्रेजी में मदद कर सको तो…. तुम तो जानते ही हो इसकी परीक्षा में बस चार महीने बचे हैं… यह बड़ी परेशान रहती है…. और ये भाषा मेरे बस की तो है नहीं….’

‘आप भी पिताजी… मैं पढ़ लूंगी न… आप इन्हें क्यों परेशान कर रहे हैं….?’ नीलमणि पिता की बात सुनकर बीच में बोल पड़ी. शरद से अंग्रेजी पढ़ने की बात सुनकर वह अचकचा गयी थी.

‘क्यों मुझसे पढ़ते हुए डर लगेगा क्या….’ शरद ने उसकी ओर पलट कर हंसते हुए पूछा.

‘मैं क्यों डरने लगी आपसे…?’ वह छूटते ही बोली.

‘भई सोच लो… थोड़ा सख्त मास्टर हूं… पढ़ा तो दूंगा मगर सबक ठीक से याद नहीं किया तो पीट भी दूंगा… वह भी डंडे से…’ शरद हंसते हुए बोला, ‘मां जी, इसके लिए तेल चुपड़ कर एक डंडा तैयार कर दीजिए… कल से ही क्लास शुरू करता हूं…’ शरद की बातें सुनकर सभी जोर-जोर से हंसने लगे और नीलू शरमा कर अपने कमरे में भाग गयी.

दूसरे ही दिन से नीलमणि शरद से पढ़ने लगी. शरद लिटरेचर बहुत अच्छी तरह समझाता था. न जाने कितनी अंग्रेजी की कविताएं शरद को कठंस्थ थीं. अंग्रेजी साहित्यकारों के उम्दा-उम्दा कोट उसे रटे हुए थे. चार महीने की मेहनत ने नीलमणि का अंग्रेजी के प्रति सारा डर समाप्त कर दिया. परीक्षा का रिजल्ट आया तो किसी को विश्वास ही नहीं हुआ. नीलू को अंग्रेजी में नब्बे प्रतिशत अंक प्राप्त हुए थे. खुशी के मारे उसके तो पैर ही जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. शाम को विजय सिंह घर लौटे तो नीलू ने लपक कर उनका मुंह मोतीचूर के लड्डू से भर दिया और खुशी के मारे उनके सीने से चिपक गयी.

‘सब शरद बाबू की मेहनत है… आ जाएं तो उनको मिठाई खिलाना…’ विजय सिंह बेटी के सिर पर हाथ फेरते हुए बोले.

‘जी, पिता जी…’ कहती हुई नीलू यह सोच कर किचेन में चाय बनाने की लिए भाग गयी कि शरद भी बस आता ही होगा.

हंसी-मजाक, छेड़छाड़ के बीच ग्रेजुएशन के आखिर वर्ष में भी नीलमणि शरद से अंग्रेजी पढ़ती रही. शरद नीचे उसके कमरे में ही उसे पढ़ाया करता था. बीच-बीच में कभी चाय तो कभी किसी और चीज के बहाने उसकी मां चक्कर लगा जाती थी. विजय सिंह भी काफी देर तक आंगन में ही कुर्सी डाले बैठे रहते थे, मगर धीरे-धीरे उनकी तरफ से ध्यान हटा कर दोनों अपने-अपने कामों में बिजी हो गये. शरद पर उन्हें भरोसा था. ऑफिस से लौट कर शरद नीचे ही बाथरूम में हाथ-मुंह धोकर विजय सिंह के साथ चाय पीता था और फिर नीलू को पढ़ाने बैठ जाता था. वह नौ बजे तक पढ़ाता रहता था. फिर खाने के लिए  होटल निकल जाता और चहल-कदमी के बाद करीब दस-साढ़े दस तक लौट कर अपने कमरे में चला जाता था.

साल निकल गया. नीलमणि ने ग्रेजुएशन भी फर्स्ट डिविजन में किया. यह सब शरद की कोचिंग का नतीजा था कि नीलू अंग्रेजी में इतनी बेहतर हो गयी थी. अब वह एमए भी अंग्रेजी विषय लेकर ही करना चाहती थी. समय बीतता गया. पढ़ते पढ़ाते नीलू और शरद एक दूसरे के करीब आ गये. दोनों को पता ही न चला कि कब वे एक-दूसरे को अपना दिल दे बैठे. शरद अक्सर उसे पढ़ाते-पढ़ाते उसकी नीली-नीली आंखों में खो जाता था. बोलते-बोलते उसके शब्द गुम हो जाते और नीलमणि उसके इस पागलपन पर खिलखिला कर हंस पड़ती थी.

‘अरे, इस तरह क्या देखते हो मुझे…? क्या कभी कोई लड़की नही देखी…?’ वह धीरे से पूछती.

‘देखी तो है… पर इतने करीब से कभी नहीं देखी….’

‘अच्छा-अच्छा लेक्चरर साहब… आगे पढ़ाइये…’ नीलू ने हौले से उसकी नाक पकड़कर हिला दी.

‘नीलू… तुम्हारी आंखें बहुत खूबसूरत हैं… बिल्कुल गहरे समन्दर की तरह…’ वो अब भी उसकी आंखों में डूबा हुआ था… ‘ये इतनी गहरी क्यों हैं नीलू…?’ वो धीरे से फुसफुसायाय.

‘ताकि तुम डूब मरो इनमें… समझे… बुद्धूराम… अब पढ़ाते हो या मैं बंद करूं किताब…?’ नीलू ने किताब समेटनी चाही.

‘अरे, अरे बाबा… पढ़ा तो रहा हूं…’ उसने किताब खोलकर सामने कर ली और पढ़ाने लगा.

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