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जेएनयू और बीएचयू : धार्मिक विचारधारा के अखाडे बन गये शिक्षा के मंदिर

जेएनयू और बीएचयू का देश की शिक्षा व्यवस्था में अहम योगदान रहा है. राजनीतिक विचारधारा की लड़ाई में दोनो ही विश्वविद्यालय पिस रहे है. विचारधारा की राजनीति अब ओछी बयानबाजी पर उतर आई है. जहां भगवा समर्थक जेएनयू को ‘सेक्स का अड्डा’ बता रहे है वही बीएचयू में भाषा को धर्म से जोडकर संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के सहायक प्रोफेसर डाक्टर फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध किया जा रहा है. पूरा समाज धर्म के आधार पर विभाजन रेखा पर खड़ा है. धार्मिक विभाजन वोट बैंक की राजनीति लिये भले ही मुफीद हो पर समाज के विकास की दिशा में किसी हालत में उचित नहीं माहौल नहीं है.

तमाम लोग बीएचयू में डाक्टर फिरोज खान की नियुक्ति को भले ही समर्थन कर हो पर क्या ऐसे माहौल में वह पढ़ा पाएंगे ? जेएनयू में पढ़ चुके छात्र आज तमाम प्रतिष्ठित पदों पर है. क्या ऐसे आरोप के बाद शान से वह यह कह सकते है कि वह जेएनयू में पढ़े है ? वोट बैंक की ओछी राजनीति ने दोनो ही प्रतिष्ठित विश्वद्यिालयों की छवि को मिट्टी में मिला दिया है. यहां के पढ़ने वाले छात्र किस तरह की पहचान लेकर जाएंगे यह सोचने का विषय है. जेएनयू में पढ़ने वाली लड़की क्या सम्मान से अपना जीवन गुजर कर पायेगी?  चरित्रहनन से जुड़े यह वह सवाल है जिनके जबाव किसी के पास नहीं है.

राजनीति में वैचारिक स्तर पर विरोध एक बात है और वैचारिक विरोध को लेकर चरित्रहनन की राजनीति एक अलग मोड़ पर समाज को ले आई है. जिनके घेरे में शिक्षा के मंदिर कहे जाने विश्वद्यालय अब आ गये है. हमारे देश में शिक्षा का स्तर वैसे भी कहां से कहा जा रहा है यह देखने वाली बात है. धार्मिक ट्रस्ट द्वारा संचालित कालेजों की घटनाएं बताती है कि समाज किस दिशा में जा रहा है. शाहजहांपुर में संत और भाजपा सरकार में मंत्री रहे स्वामी चिन्मयानंद का अपने ही कालेज की लडकी से नंगे होकर मसाज कराने की घटना का भी जेएनयू की तरह विरोध हुआ होता तो पीडित लडकी को न्याय मिल जाता.

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में संकीर्ण मानसिकता के छात्रों द्वारा संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान विभाग में डां फिरोज खान के एसिस्टेण्ट प्रोफेसर नियुक्त हो जाने का सिर्फ उनके मुस्लिम होने के कारण विरोध किया जा रहा है. जबकि विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि डा. फिरोज खान इस पद के लिए सारी जरूरी शर्तें पूरी करते हैं. विरोध करने वाले छात्रों का यह भी कहना है कि यह नियुक्ति विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना मालवीय जी की सोच के अनुकूल नहीं है. मदन मोहन मालवीय ने कहा था, ’भारत सिर्फ हिन्दुओं का देश नहीं है. यह मुस्लिम, इसाई व पारसियों का भी देश है. यह देश तभी मजबूत व विकसित बन सकता है जब भारत में रहने वाले विभिन्न समुदाय आपसी सौहाद्र के साथ रहेंगे.’ मालवीय जी की यह कोशिश रही कि दुनिया भर से भिन्न-भिन्न विचारधाराओं के विद्वानों को लाकर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में उनसे अध्यापन कराया जाए. ऐसे में विरोध करने वाले छात्रों को सोचना चाहिए कि क्या वाकई में मालवीय जी उनके तर्क से सहमत होते ?

घातक निकली बीवी नंबर 2 : भाग 2

दुकानदार अवधेश ने जो बताया, उस से साफ हो गया कि दरोगा पच्चालाल के साथ जो युवक था, वह उन का काफी करीबी था. इस जानकारी के बाद टीम ने दरोगा के खास करीबियों पर ध्यान केंद्रित किया. इस में उस की पत्नी किरन, दरोगा के 4 बेटे और कुछ अन्य लोग शामिल थे. पच्चालाल के बेटों से पूछताछ करने पुलिस टीम रामकुंड, सीतापुर पहुंची.

पूछताछ में सत्येंद्र, महेंद्र, जितेंद्र व कमल ने बताया कि उन के पिता का न तो किसी से विवाद था और न ही जमीनजायदाद का कोई झगड़ा था. सौतेली मां किरन से भी जमीन या मकान के बंटवारे पर कोई विवाद नहीं था. सौतेली मां किरन अपने बच्चों के साथ कानपुर में रहती थी.

पच्चालाल दोनों परिवारों का अच्छी तरह पालनपोषण कर रहे थे. चारों बेटों को उन्होंने कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दी थी. सत्येंद्र ने यह भी बताया कि 6 महीने पहले पिता ने उस की शादी धूमधाम से की थी.

शादी में सौतेली मां किरन भी खुशीखुशी शामिल हुई थीं. शादीबारात की सारी जिम्मेदारी उन्होंने ही उठाई थी. शादी में बहू के जेवर, कपड़ा व अन्य सामान पिता के सहयोग से उन्होंने ही खरीदा था. किरन से उन लोगों का कोई विवाद नहीं था.

जितेंद्र और किरन आए संदेह के घेरे में

मृतक दरोगा पच्चालाल के बेटों से पूछताछ कर पुलिस टीम कानपुर लौट आई. इस के बाद यह टीम थाना नवाबगंज के सूर्यविहार पहुंची, जहां दरोगा की दूसरी पत्नी किरन किराए के मकान में रहती थी. पुलिस को देख कर किरन रोनेपीटने लगी. पुलिस ने उसे सांत्वना दी. बाद में उस ने बताया कि दरोगा पच्चालाल ने उस से तब प्रेम विवाह किया था, जब वह बेनीगंज थाने में तैनात थे. दरोगा से किरन को 3 संतानें हुई थीं, एक बेटा व 2 बेटियां.

किरन रो जरूर रही थी, लेकिन उस की आंखों से एक भी आंसू नहीं टपक रहा था. उस के रंग, ढंग और पहनावे से ऐसा नहीं लगता था कि उस के पति की हत्या हो गई है. घर में किसी खास के आनेजाने के संबंध में पूछने पर वह साफ मुकर गई. लेकिन पुलिस टीम ने जब किरन के बच्चों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि जितेंद्र अंकल घर आतेजाते हैं, जो पापा के दोस्त हैं.

पुलिस टीम ने जब किरन से जितेंद्र उर्फ महेंद्र यादव के बारे में पूछताछ की तो उस का चेहरा मुरझा गया. उस ने घबराते हुए बताया कि जितेंद्र उस के दरोगा पति का दोस्त था. वह रोडवेज बस चालक है और रोडवेज कालोनी में रहता है. पूछताछ के दौरान पुलिस टीम ने बहाने से किरन का मोबाइल ले लिया.

पुलिस टीम में शामिल सर्विलांस सेल के प्रभारी शिवराम सिंह ने किरन के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि दरोगा की हत्या के पहले व बाद में किरन की एक नंबर पर बात हुई थी.

उस मोबाइल नंबर की जानकारी जुटाई गई तो पता चला वह नंबर जितेंद्र उर्फ महेंद्र का था. पच्चालाल के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स में भी जितेंद्र का नंबर था.

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दूसरी पत्नी बनी हत्या की वजह

जितेंद्र शक के घेरे में आया तो पुलिस टीम ने देर रात उसे रोडवेज कालोनी स्थित उस के घर से हिरासत में ले लिया और थाना सजेती ले आई. उस से दरोगा पच्चालाल की हत्या के संबंध में पूछताछ की गई तो उस ने हत्या से संबंधित कोई जानकारी होने से इनकार कर दिया.

हां, उस ने दोस्ती और दरोगा के घर आनेजाने की बात जरूर स्वीकार की. जब पुलिस ने अपने अंदाज में पूछताछ की तो जितेंद्र ज्यादा देर तक टिक नहीं पाया और उस ने दरोगा पच्चालाल की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया.

जितेंद्र उर्फ महेंद्र यादव ने बताया कि किरन से उस के नाजायज संबंध बन गए थे. दरोगा पच्चालाल को जानकारी हुई तो वह किरन को प्रताडि़त करने लगा. पच्चालाल प्यार में बाधक बना तो उस ने और किरन ने मिल कर उस की हत्या की योजना बनाई.

योजना बनाने के बाद उन्होंने एक लाख रुपए में दरोगा की हत्या की सुपारी निजाम अली को दे दी, जो विधूना का रहने वाला है. निजाम अली ने उसे पसहा, विधूना निवासी राघवेंद्र उर्फ मुन्ना से मिलवाया. इस के बाद तीनों ने मिल कर 2 जुलाई की रात दरोगा की हत्या कर दी और फरार हो गए.

पुलिस टीम ने जितेंद्र की निशानदेही पर विधूना से निजाम अली तथा पसहा गांव से राघवेंद्र उर्फ मुन्ना को गिरफ्तार कर लिया. इन तीनों को थाना सजेती की हवालात में डाल दिया गया. इस के बाद पुलिस टीम सूर्यविहार, नवाबगंज पहुंची और यह कह कर किरन को साथ ले आई कि दरोगा पच्चालाल के हत्यारे पकड़े गए हैं.

किरन थाना सजेती पहुंची तो उस ने अपने प्रेमी जितेंद्र तथा उस के साथियों को हवालात में बंद देखा. उन्हें देखते ही वह सब कुछ समझ गई. अब उस के लिए पुलिस को गुमराह करना मुमकिन नहीं था. उस ने पति की हत्या में शामिल होने का जुर्म कबूल कर लिया. जितेंद्र ने दरोगा पच्चालाल का लूटा गया पर्स, घड़ी व मोबाइल भी बरामद करा दिए, जिन्हें उस ने घर में छिपा कर रखा था.

चूंकि दरोगा पच्चालाल के हत्यारों ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया था, इसलिए पुलिस ने मुंशी अजयपाल को वादी बना कर भादंवि की धारा 302, 201, 394 तथा 120बी के तहत जितेंद्र उर्फ महेंद्र, निजाम अली, राघवेंद्र उर्फ मुन्ना तथा किरन के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कर लिया.

7 जुलाई को एसएसपी अखिलेश कुमार ने प्रैस कौन्फ्रैंस की, जिस में उन्होंने हत्या का खुलासा करने वाली टीम को 25 हजार रुपए देने की घोषणा की. उन्होंने गिरफ्तार किए गए दरोगा के हत्यारों को पत्रकारों के सामने भी पेश किया, जहां हत्यारों ने अवैध रिश्तों में हुई हत्या का खुलासा किया.

पच्चालाल गौतम सीतापुर जिले के थाना मानपुरा क्षेत्र के गांव रामकुंड के रहने वाले थे. उन के परिवार में पत्नी कुंती देवी के अलावा 4 बेटे सत्येंद्र, महेंद्र, जितेंद्र व कमल थे. पच्चालाल पुलिस विभाग में दरोगा के पद पर तो तैनात थे ही, उन के पास खेती की जमीन भी थी, जिस में अच्छी पैदावार होती थी. कुल मिला कर उन की आर्थिक स्थिति अच्छी थी. घर में किसी तरह की कोई कमी नहीं थी.

पच्चालाल की पत्नी कुंती देवी घरेलू महिला थीं. वह ज्यादा पढ़ीलिखी तो नहीं थीं, लेकिन स्वभाव से मिलनसार थीं. कुंती पति के साथसाथ बच्चों का भी ठीक से खयाल रखती थीं. पच्चालाल भी कुंती को बेहद चाहते थे, उन की हर जरूरत को पूरा करते थे. लेकिन बीतते समय में इस खुशहाल परिवार पर ऐसी गाज गिरी कि सब कुछ बिखर गया.

सन 2001 में कुंती देवी बीमार पड़ गईं. पच्चालाल ने पत्नी का इलाज पहले सीतापुर, लखनऊ व कानपुर में अच्छे डाक्टरों से कराया. पत्नी के इलाज में दरोगा ने पानी की तरह पैसा बहाया, लेकिन काल के क्रूर हाथों से वह पत्नी को नहीं बचा सके. पत्नी की मौत से पच्चालाल खुद भी टूट गए और बीमार रहने लगे.

जैसेजैसे समय बीतता गया, वैसेवैसे पत्नी की मौत का गम कम होता गया. पच्चालाल ड्यूटी और बच्चों के पालनपोषण पर पूरा ध्यान देने लगे. पच्चालाल का दिन तो सरकारी कामकाज में कट जाता था, लेकिन रात में पत्नी की कमी खलने लगती थी. पत्नी के बिना वह तनहा जिंदगी जी रहे थे. अब उन्हें अहसास हो गया था कि पत्नी के बिना आदमी का जीवन कितना अधूरा होता है.

सन 2002 में दरोगा पच्चालाल को हरदोई जिले के थाना बेनीगंज की कल्याणमल चौकी में तैनाती मिली. इस चौकी का चार्ज संभाले अभी 2 महीने ही बीते थे कि पच्चालाल की मुलाकात एक खूबसूरत युवती किरन से हुई. किरन अपने पति नरेश की प्रताड़ना की शिकायत ले कर चौकी आई थी.

किरन के गोरे गालों पर बह रहे आंसू, दरोगा पच्चालाल के दिल में हलचल मचाने लगे. उन्होंने सांत्वना दे कर किरन को चुप कराया तो उस ने बताया कि उस का पति नरेश, शराबी व जुआरी है. नशे में वह उसे जानवरों की तरह पीटता है. वह पति की प्रताड़ना से निजात चाहती है.

खूबसूरत किरन पहली ही नजर में दरोगा पच्चालाल के दिलोदिमाग पर छा गई. उन्होंने किरन के पति नरेश को चौकी बुलवा लिया और किरन के सामने ही उस की पिटाई कर के हिदायत दी कि अब वह किरन को प्रताडि़त नहीं करेगा. दरोगा की पिटाई और जेल भेजने की धमकी से नरेश डर गया और किरन से माफी मांग ली.

इस के बाद दरोगा पच्चालाल हालचाल जानने के बहाने अकसर किरन के घर आनेजाने लगे. वह किरन से मीठीमीठी बातें करते थे. किरन भी उन की रसीली बातों में आनंद का अनुभव करने लगी थी. किरन का पति नरेश घर आने पर ऐतराज न करे, यह सोच कर पच्चालाल ने उस से दोस्ती गांठ ली. दोनों की नरेश के घर पर ही शराब की महफिल जमने लगी. पच्चालाल उस की आर्थिक मदद भी करने लगे.

कोच के सामने पहलवानों से भिड़ गए विद्युत जामवाल

दरअसल, विद्युत जामवाल की फिल्म ‘कमांडो 3’ 29 नवंबर को सिनेमाघरों में दिखाई देगी. उसी फिल्म के प्रमोशन के लिए विद्युत जामवाल यमुना नदी किनारे बने इस अखाड़े में आए थे, जिसे भारत के मशहूर पहलवान रहे मास्टर चंदगीराम ने बनवाया था. विद्युत जामवाल ने इस मौके पर अपनी फिल्म ‘कमांडो 3′ के बारे में बताया और मैट और मिट्टी के अखाड़े पर कुछ उभरते पहलवानों के साथ कुश्ती के दांव भी आजमाए.

उत्तर प्रदेश पुलिस में डीएसपी पद पर कार्यरत  पहलवान जगदीश कालीरमन ने विद्युत जामवाल का स्वागत किया और उन्हें नई फिल्म के लिए शुभकामनाएं दीं. साथ ही’ कुश्ती और मार्शल आर्ट्स में समानता बताते हुए कहा कि कोई भी खेल हमारे शरीर को तो फिट रखता ही है, देश को भी मजबूत बनाता है. अब तो बहुत सी फिल्मों में खेल और खिलाड़ी की जिंदगी के बारे में बता कर लोगों का सार्थक मनोरंजन किया है.

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विद्युत् जामवाल तो आते ही छा गए थे. फिल्मी हीरो पर उन का खिलाड़ी मन पूरी तरह हावी था. अखाड़े में उन्होंने मिट्टी को समतल बनाने के लिए उन्होंने फावड़ा उठा लिया और अपने सफेद कपड़ों के खराब होने की भी परवाह नहीं की. एक पहलवान को तो उन्होंने किसी पेशेवर पहलवान की तरह पटक दिया था. इस के बाद विद्युत जामवाल ने मैट पर असली पहलवानों की असली कुश्ती देखी, जबकि जगदीश कालीरमन ने लाइव कमेंट्री की.

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अपनी फिल्म से ज्यादा विद्युत जामवाल ने नई पीढ़ी को स्ट्रांग बनने की सलाह दी और महिला पहलवानों की हिम्मत और जज्बे की खूब तारीफ की. उन्होंने कहा कि सिर्फ जिम में जाने और बौडी बनाने से देश मजबूत नहीं बनता है, बल्कि वह देश आगे बढ़ता जिस में पुरुष वहां की महिलाओं का सम्मान करते हैं और उन पर आई मुसीबत में उन का साथ देने के लिए खड़े होते हैं.

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पहलवान इस जज्बे में बाजी मार जाते हैं. हर गुरु अपने शिष्य को खेल के साथसाथ महिलाओं की इज्जत करना भी सिखाता है. महिलाओं को भी यह नहीं सोचना चाहिए कि क्योंकि वे महिलाएं इसलिए कमजोर हैं, बल्कि उन के पास तो अपनी बातों से पुरुषों को भरमाने की ऐसी ताकत होती है कि मनचले को बातों में लगाया और उसे सबक सिखाया. आप चिल्लाइए और देखिए कि मनचला कैसे वहां से रफूचक्कर होगा.

इस सीन की वजह से कृति खरबंदा ने छोड़ी फिल्म ‘चेहरे’

हाल ही में खबर आई थी अमिताभ बच्चन और इमरान हाशमी स्टारर की आने वाली फिल्‍म ‘चेहरे’ में कृति खरबंदा काम नहीं करेंगी. खबरों के अनुसार उन्हें इस फिल्म से निकाल दिया गया है.  वैसे इसकी वजह बताई जा रही थी कृति के नखरे. दरअसल ‘हाउसफुल 4’ में नजर आ चुकीं कृति जल्द ही अपनी आने वाली फिल्‍म ‘पागलपंती’ में भी नजर आने वाली हैं. कृति के पास काफी बड़े स्‍टार्स की फिल्‍में हैं.

अब खबर ये है कि इस फिल्‍म में कृति के काम न करने की वजह कुछ और है. रिपोर्टस के अनुसार कृति के ये फिल्‍म छोड़ने की वजह लंबा इंटीमेट सीन है. एक सीन में कृति को एक को-एक्‍टर के साथ काफी इंटीमेट सीन करना था. साथ ही उन्‍हें इस सीन में लिपलौक भी करना था,  जबकि इमरान हाशमी यह सब एक दूसरे कमरे से देखने वाले थे.

कृति को यह बताया नहीं गया था कि यह सीन इस तरह से शूट किया जाएगा, या शायद कृति को लगा कि इस तरह के बेहद इंटीमेट सीन की जरूरत नहीं है. ऐसे में मेकर्स से कुछ देर चर्चा और बहस करने के बाद कृति ने फिल्‍म छोड़ने का फैसला कर लिया.

लेकिन कृति खरबंदा ने इस खबर पर अपनी कोई  रिएक्शन नहीं दी है. इसी बीच फिल्‍म के प्रोड्यूसर आनंद पंडित ने एक ट्वीट के जरिए लिखा कि कृति और मेकर्स ने आपसी सहमति से इस फिल्‍म से अलग हुई हैं.

डीएचएफएल : दिवालियापन के लिये नोटबंदी जिम्मेदारी

उत्तर प्रदेश बिजली विभाग में पीएफ यानि प्राविटेंड फंड घोटाले से चर्चा में आई डीएचएफएल को जिस समय अखिलेश सरकार ने पीएफ निवेश के लिये चुना उसकी क्रेडिट रेटिंग 5 स्टार थी. पीएफ के पैसे को निजी सेक्टर में निवेश को सरकार के द्वारा अनुमति प्राप्त है. सरकारी कानून के अनुसार ही पीएफ का पैसा निजी सेक्टर में निवेश किया गया. पीएफ का पैसा निजी क्षेत्र में इस लिये निवेश किया गया क्योंकि निजी बैंक की ब्याजदर अधिक थी.

2017 से जो पैसा डीएचएफएल में निवेश किया गया ब्याज सहित करीब 41.22 सौ करोड़ हो गया था. इनमें से डीएचएफएल ने 18.55 सौ करोड़ रूपये बिजली विभाग को वापस कर दिया. बचा हुआ 22.67 सौ करोड़ रूपए डीएचएफएल इस लिये नहीं दे पाया क्योंकि कोर्ट ने डीएचएफएल के खातों से भुगतान पर रोक लगा दी. सवाल उठाता है कि 2017 में जो डीएचएफएल फाइव स्टार रेटिंग वाली कंपनी थी वह 2019 में दिवालिया कैसे हो गई ?

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डीएचएफएल  के दिवालिया होने की कहानी नोटबंदी और हाउसिंग सेक्टर में आये नये कानूनों से जुड़ी हुई है. 2016 में केन्द्र सरकार ने नोटबंदी की और हाउसिंग सेक्टर के लिए नए नियम कानून बना दिये. डीएचएफएल ने ज्यादातर कर्ज डेवलपर्स सेक्टर में लगाये थे. नोटबंदी और रियल स्टेट में नये कानून बनने से डेवलपर्स कर्ज का पैसा डीएचएफएल को वापस नहीं कर पाए. इससे कंपनी की हालत खराब हो गई. इससे डीएचएफएल में निवेश करने वालों का भरोसा टूटा और उन सभी ने एक साथ अपना जमा पैसा वापस मांगना शुरू कर दिया.

ऐसे में डीएचएफएल का मामला कोर्ट गया और कोर्ट ने डीएचएलएफ के खातों को सीज कर दिया. जिससे डीएचएफएल उत्तर प्रदेश के बिजली विभाग को पीएफ का जमा पैसा नहीं दे पाया. अगर नोटबंदी और रियल स्टेट सेक्टर में नये कानून से डेवलपर्स उबर गए होते और उनका बिजनेस खराब नहीं हुआ होता तो डीएचएफएल की यह हालत नहीं होती. वह बिजली विभाग के पीएफ के पैसों का भी भुगतान कर रही होती. डीएचएफएल ने 18.55 सौ करोड़ रूपये बिजली विभाग को वापस कर दिया था. इससे यह पता चलता है कि कंपनी की नीयत में खोट नहीं थी. रियल स्टेट कारोबार फेल होने से कंपनी की हालत खराब हो गई.

पीएफ के पैसों का निजी सेक्टर में निवेश सरकार की एक पौलसी के तहत किया गया है. यह निवेश भी पेंशन बंद होने से जुड़ा हुआ है. सरकार अगर पेंशन देती रहती तो ऐसी हालत नहीं आती. सरकार ने पेंशन योजना बंद करने के बाद तय किया कि पीएफ के पैसों का कुछ हिस्सा निजी सेक्टर में निवेश किया जायेगा. इसकी वजह यह थी कि निजी सेक्टर में ब्याजदर अधिक थी. पेंशन बंद होने के बाद सरकार कर्मचारी को पीएफ का पैसा एकमुष्त देने लगी. पैसा निजी सेक्टर में लगाकर ज्यादा लाभ लेने की मानसिकता से ही बिजली विभाग का पैसा डीएचएलएफ में निवेश किया गया. सरकार को इसका लाभ भी मिला. जब डीएचएलएफ के बैंक खातों पर रोक लगी तभी यह परेशानी सामने आई.

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उत्तर प्रदेश सरकार ने इस मामले की सीबीआई जांच के लिये कहा पर अभी तक सीबीआई को जांच नहीं दी गई. अभी तक प्रदेश सरकार की ईओडब्ल्यू ही जांच कर रही है. पूरे मामले में जिस भ्रष्टाचार का दावा किया जा रहा है वह कमीशन की रकम भर है. हर निजी क्षेत्र अपने यहां निवेश पर कमीशन देता है. ऐसे में पूरे मामले में भ्रष्टाचार का कोई बड़ा मामला सामने नही आयेगा. सरकारी बैंक भी जब दिवालिया होते है तो बैंक खाते में जमा केवल 1 लाख तक ही रकम ही वापस होती है. ऐसे में अगर डीएचएफएल दिवालिया हो गई तो यह कितना पैसा वापस मिलेगा. यह देखने वाली बात होगी ?

नब्बे के दशक ‘आंखियों से गोली मारें’ को नए ट्विस्ट के साथ किया गया लौन्च

1978 की चर्चित बी आर चोपड़ा की फिल्म‘‘पति पत्नी और वह’’ का रीमेक जूनो चोपड़ा लेकर आ रही हैं, जिसमें कार्तिक आर्यन, भूमि पेडणेकर और अनन्या पांडे की अहम भूमिकाएं हैं. यह फिल्म इन दिनों काफी सूर्खियां बटोर रही है. फिल्म का ट्रेलर भी काफी पसंद किया गया. तो वहीं फिल्म का गीत ‘‘धीमे धीमे..’’ सोशल मीडिया पर छाया हुआ है. नेटिजन्स पर ‘डांस लाइक चिंटू त्यागी’ के जरिए डांस चैलेंज कर रहे है. ‘‘धीमे धीमे‘‘ में अभिनेता के कदमों ने इंटरनेट को पागल बना दिया है और ऐसा लग रहा है कि यह तिकड़ी दर्शकों के लिए इस पार्टी सीजन में कुछ और नए सिग्नेचर स्टेप्स दिखाएगी.

मजेदार बात यह है कि इस फिल्म में फिल्मकार ने नब्बे के दशक के गीत ‘‘आंखियों से गोली मारे..’’ को एक नया ट्विस्ट के साथ रखा है, जो कि बाजार में आते ही लोकप्रिय हो गया. इस गीत को बुधवार को दिल्ली में कार्तिक आर्यन, भूमि पेडनेकर और अनन्या पांडे ने लांच किया. यह एक डांसिंग नंबर है, जिस पर फिल्म में कार्तिक अपनी पत्नी ’भूमि और ’वो’ अनन्या के साथ थिरकते हुए नजर आ रहे हैं. नृत्य निर्देशक फराह खान द्वारा निर्देशित यह गाना सदाबहार सुपरस्टार को आदर्श ट्रिब्यूट है. रीक्रिएटेड गाना एक पेप्पी डांस ट्रैक है, जिससे आज की युवा पीढ़ी रिलेट करती है. इस गीत को संगीतकार तनिष्क बागची के निर्देशन में मीका सिंह और तुलसी कुमार ने स्वरबद्ध किया है.

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‘‘टी-सीरीज’’के भूषण कुमार कहते हैं- ‘‘गीत ‘अंखियों से गोली मारे’ मेरा निजी पसंदीदा गाना है, चूंकि इसमें 90 के दशक का जादू आधुनिक ट्विस्ट के साथ है,  इसलिए यह गाना ढ़ेर सारी यादें वापस लेकर आता है. कार्तिक, अनन्या और भूमि ने इस गाने के साथ पूरा न्याय किया है. हमें उम्मीद है कि दर्शक आधुनिक संस्करण को भी पसंद करेंगे.”

रचनात्मक निर्माता जूनो चोपड़ा (बीआर स्टूडियोज) का कहना है- ‘‘कार्तिक,  अनन्या,  भूमि और फराह ने सेट पर पूरा आनंद लिया. हमें उम्मीद है कि जैसे हमारे पहले गीत को सभी का प्यार मिला है वैसे ही बहुत प्यार और प्रशंसा इस गीत को भी मिलेगा.”

नृत्य निर्देशक फराह खान कहती हैं- ‘‘अंखियों ऐ गोली मारे एक आइकौनिक सौन्ग है और मैं इसे करने के लिए सहमत हुई, क्योंकि जूनो एक प्रिय दोस्त हैं. आशा है कि यह नया फुट टैपिंग वर्जन दर्शकों को अपील करेगा जिस तरह से मूल गीत ने किया था. हमने इसे हटकर और दिलचस्प बनाने की कोशिश की है लेकिन सौन्ग असल मजा पहले जैसा ही है.’’

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जबकि अभिनेता कार्तिक आर्यन कहते हैं- “यह मेरा पसंदीदा गीत  है. मैं इसे सुनते व टीवी पर  देखते हुए बड़ा हुआ हूं. हम सभी उनकी डांस स्टाइल के फैन रहे हैं. मैं बहुत खुश हूं कि मुझे अपनी फिल्म में इस गीत पर नृत्य करने का मौका मिला. इसके अलावा, मैं हमेशा फराह मैम की धुनों पर डांस करना चाहता था और मुझे खुशी है कि यहां मेरी यह इच्छा भी पूरी हुई. उन्होंने हमें बहुत ही कूल और मजेदार मूव्स दिए हैं.’’

सर्दियों में रूखेपन को ऐसे कहें बाय बाय

कई बार रूखी त्वचा के वजह से चेहरे पर ड्राई पैचेस होने लगते हैं जो अलग से ही चेहरे पर दिखने लगते हैं. ड्राई स्किन की वजह से मेकअप भी जल्दी सेट नहीं होता और चेहरे की खूबसूरती भी ढल जाती है. रूखी त्वचा को ठीक करने के लिए महिलाएं तरह तरह के फेसमास्क का इस्तेमाल करती हैं, जिसका असर कुछ दिन तक ही रहता है. लेकिन कुछ ऐसे नेचुरल फेस मास्क है जिन्हें आप आसानी से घर पर बना सकती हैं. इन फेस मास्क की मदद से त्वचा में लंबे समय तक नमी बनी रहती है.

आइए जानते हैं त्वचा में नमी बनाने के लिए कुछ घरेलू उपाय-

एलोवेरा फेस मास्क

एलोवेरा में कई औषधीय गुण पाए जाते हैं जो शरीर और त्वचा दोनों के लिए फायदेमंद माना जाता है. इसमें पाए जाने वाले एंटीऔक्सीडेंट से चेहरे की कई समस्याएं दूर हो जाती हैं. एलोवेरा के इस्तेमाल से चेहरे में नमी आती है और जरूरी पोषण भी मिलता है.

एलोवेरा का फेस मास्क बनाने के लिए एलोवेरा जेल निकाल लें. इसमें खीरा का जूस मिला लें. इस मास्क को आप फेस वश के बाद चेहरे पर लगाएं और कुछ देर के लिए छोड़ दें. इससे चेहरे का रूखापन तो दूर होगा ही साथ ही चेहरे पर ग्लो भी नजर आने लगेगा.

एवोकाडो फेस मास्क

फलों का सेवन सेहत के लिए फायदेमंद होता है. फलों से सेहत तो अच्छी रहती ही है, चेहरे पर भी चमक बनी रहती है. एवोकाडो पोशक तत्वों से युक्त होता है जो त्वचा को स्वस्थ बनाने में फायदेमंद होता है. यह ड्राई और डैमेज स्किन को हटाकर त्वचा को कोमल बनाता है. एवोकाडो फेस मास्क बनाने के लिए 2 चम्मच मैश किए हुए एवोकाडो लें. उसमें एक चम्मच शहद और एक चम्मच गुलाबजल डाल कर अच्छे से मिला लें. चेहरा क्लीन करने के बाद इस मास्क को चेहरे पर लगाएं. 10 मिनट बाद इसे हल्के गुनगुने पानी से धो लें.

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स्ट्रौबेरी फेस मस्क

स्ट्रौबेरी से स्किन मुलायम ही नहीं बल्कि ग्लोविंग भी नजर आती है. इसमें मौजूद विटामिन सी त्वचा के रुखेपन को दूर करने में मद्द करती है. इसके इस्तेमाल से स्किन में जमे डेड सेल्स भी निकला जाते हैं. स्ट्रॉबेरी फेसमास्क के लिए 2-3 बड़े स्ट्रौबेरी को मैश करें फिर इसमें शहद और एक चम्मच ओटमिल यानी दलिया मिलाएं. इसका पेस्ट बना लें और 20 मिनट के लिए चेहरे पर लगा कर छोड़ दें. इसके बाद इसे ठंडे पानी से धो लें. इस मास्क को आप हफ्ते में 2 बार जरूर लगाएं.

पपीता फेस मास्क

पपीता सेहत और खूबसूरती दोनों के लिए ही बेहतरीन माना जाता है. पपीता में पोटेशियम होता है जो त्वचा को हाईड्रेट और खूबसूरत बना कर रखता है. यह त्वचा में मौजूद डेड सेल्स, दाग-धब्बे को साफ करने में भी मदद करता है.

पपीता फेस मास्क बनाने के लिए एक कप पके पपीता का पेस्ट बनाएं. इसमें एक चम्मच शहद और एक चम्मच नींबू का रस मिलाएं. अब इस फेस मास्क को त्वचा पर लगाएं और 10 मिनट बाद पानी से धो लें. आप इसे हर 2 दिन में इस्तेमाल कर सकती हैं.

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केला और चंदन फेस मास्क

बनाना फेस मास्क ड्राई स्किन को नमी पहुंचा कर उसे चमकदार बनाने में मदद करता है. इससे त्वचा का रूखापन तो खत्म होता ही है,  झुर्रियों जैसी समस्या भी खत्म होने लगती है. यह स्किन को टाइट रखने में भी मदद करता है.

बनाना फेस मास्क बनाने के लिए 1 पका हुआ केला लें. उसे अच्छे से मैश करें. अब उसमें एक चम्मच शहद, एक चम्मच जैतून का तेल और आधा चम्मच चंदन पाउडर मिला दें. अब इस मास्क को त्वचा पर लगाएं. जब यह अच्छे से सूख जाएं तब हल्के गुनगुने पानी से धो लें.

एक अच्छी रूम पार्टनर क्यों है जरूरी

अक्सर ऐसा होता है कि लड़कियां घर से बाहर रहती हैं जौब के लिए या पढ़ाई के लिए….कोई फ्लैट लेकर रहता है तो कोई हौस्टल में तो कोई पीजी में,जहां उन्हें कोई न कोई लड़की जरूर ऐसी मिलती है जो उनके साथ रूम को शेयर करती है. और ऐसा करना पड़ता है क्योंकि सभी जानते हैं कि बाहर अकेले रहना परिवार से दूर कितना मुश्किल है.शायद इसी कारण से ऐसी व्यवस्था ने जन्म लिया है….एक लड़की जब घर से दूर बाहर अकेले रहती है तो कुछ परेशानियां भी आती हैं लेकिन ऐसे में अगर कोई उसका साथ देने वाला हो तो उसे वो परेशानियां उठाने में ज्यादा दिक्कत नहीं होती है.हां ये बात लाज़मी है कि हमेंशा कोई अच्छा रूम पार्टनर मिले ये जरूरी नहीं है लेकिन अब ये आपको तय करना होगा कि आप अपनी रूम पार्टनर से कितना अच्छा रिश्ता बना कर रखती हैं क्योंकि भले ही आपके उस शहर में कितने ही दोस्त बन जाए लेकिन जब आप रूम में होती हैं कभी बीमार पड़ती हैं…कभी किसी बात से आप परेशान होती हैं, कभी घर वालों की याद आती है तो ऐसे में उस वक्त आपके पास सिर्फ एक इंसान होता है जो आपको संभाल सकता है और आपका साथ दे सकता है. आप बीमार हैं तो आपका ध्यान भी रख सकता है..वो आपका रूम पार्टनर ही होता है.

अब आप खुद भी अगर उसके साथ वैसा ही व्यवहार रखेंगी तभी आपको भी उसकी तरफ से वैसा ही प्यार, सानिध्य, अपनापन और व्यवहार मिलेगा. क्योंकि वहां हमारा परिवार नहीं होता और ना ही उस वक्त तुरन्त कोई दोस्त आपकी मदद के लिए आ पाते हैं सिर्फ आपकी रूम पार्टनर ही होती है जो बाहर आपका सुख-दुख बांटती है और साथ ही आपकी मदद भी करती है.  इसलिए एक अच्छा रूम पार्टनर होना जिंदगी में बहुत ही जरूरी है.

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अगर आप कौलेज में हैं और कोई पढ़ाई में आपको मदद चाहिए तो ऐसे में आपकी रूम पार्टनर आपकी मदद कर सकती है. आप औफिस में जौब करती हैं तो आप कभी-कभी फ्रस्टेट हो जाती हैं… वर्क लोड से परेशान हो जाती हैं तो ऐसे में आप औफिस में तो फ्रस्टेशन उतारेंगी नहीं तो आप रूम आकर अपनी रूम पार्टनर से अपनी बातें शेयर कर सकती हैं. वो आपको सलाह भी देगी कि तुम्हें क्या करना चाहिए साथ ही आपका साथ भी देगी. लेकिन फिर वही बात कि आप अपना रिश्ता अपनी रूम पार्टनर से कितना अच्छा बना कर रखती हैं ये उसपर डिपेन्ड करता है. और कभी-कभी आप रूम में रहकर एक-दूसरे से अपनी गौसिप्स भी शेयर कर सकती हैं जैसा कि अमूमन हर लड़की की आदत होती है…इसमें तो कोई शक नहीं है.

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आपने क्या खाया क्या नहीं खाया इस बात का ध्यान भी रूम पार्टनर रखती हैं… रूम मेट होने के नाते कुछ टाइम बाद आप दोनों ही एक-दूसरे का खयाल रखने लगती हैं.ऐसा होना जरूरी भी है क्योंकि वहां पर आपका परिवार मौजूद नहीं होता जो हर वक्त आपके साथ हो. ये छोटी सी जिंदगी में मस्ती भरी कुछ यादें होती हैं…  जब आप अपनी जिंदगी में आगे बढ़ जाते हैं तो वही बातें जो आपने अपनी रूम मेट के साथ मस्ती के साथ बिताए होते हैं वो यादें सब याद आती हैं. औऱ हम अपने उस वक्त के दोस्तों से या अपने लाइफ पार्टनर से शेयर करते हैं कि जब हम हौस्टल में थे ऐसा किया करते थें. और शायद इसलिए ही एक अच्छी रूम पार्टनर पहुत जरूरी है.

दलदल : भाग 1

मात्र 24 साल की छोेटी सी उम्र में वह 2 बड़े हादसे झेल चुकी थी. पहली घटना उस के साथ 20 वर्ष की उम्र में घटी थी. तब वह बीकौम कर रही थी. उम्र के इस पड़ाव में युवाओं का किसी के प्यार में पड़ना आम बात होती है. 111828 कच्ची उम्र की सोच भी कच्ची होती है और इस उम्र में युवाओं के लिए सही निर्णय लेना लगभग असभंव होता है.

मिलिंद उस का पहला प्यार था. वह भी उसी के कालेज में पढ़ता था और एक साल सीनियर था. पढ़ाई के दौरान होने वाला प्यार मात्र मौजमस्ती के लिए होता है. यह सारे युवा जानते हैं. एकदूसरे को भरोसे में लेने के लिए वे बड़ेबड़े वादे करते हैं, लेकिन जब उन के बीच शारीरिक संबंध कायम हो जाते हैं, तो उस के बाद सारे वादे धरे के धरे रह जाते हैं. तब प्यार के बंधन ढीले पड़ने लगते हैं. फिर प्यार में कटुता पनपती है, दूरियां बढ़ती हैं और कई बार इस की परिणति बहुत दुखद होती है.

मिलिंद के साथ शारीरिक संबंध बनाने के बाद उसे पता चला कि वह एक बदमाश किस्म का युवक है. छोटीमोटी लूटपाट, मारपीट ही नहीं, वह युवतियों के साथ जोरजबरदस्ती भी करता था. जो युवती उस के झांसे में नहीं आती, उसे वह अपने मित्रों के माध्यम से अगवा कर उस की अस्मिता के साथ खिलवाड़ करता. कालेज में वह बहुत बदनाम था, लेकिन किसी युवती ने अभी तक उस पर कोई दोष नहीं मढ़ा था, इसीलिए उस की हिम्मत दिनोदिन बढ़ती जा रही थी.

नित्या के लिए यह स्थिति बहुत कष्टकारी थी. न तो वह किसी को अपनी मनोस्थिति बता सकती थी और न ही किसी से सलाह ले सकती थी. मिलिंद के चंगुल से निकल भागने का कोई उपाय उसे नहीं सूझ रहा था.

लेकिन परिस्थितियों ने उस का साथ दिया. चूंकि मिलिंद नित नई युवतियों पर फिदा होने वाला युवक था, नित्या से उस ने खुद ही दूरियां बनानी शुरू कर दीं. वह मन ही मन बड़ी खुश हुई. धीरेधीरे एक साल बीत गया और नित्या ने बीकौम भी कर लिया.

अगले साल उस ने मांबाप को मना कर दूसरे शहर में एमबीए जौइन कर लिया. होस्टल में जगह न मिलने के कारण पेइंगगैस्ट के रूप में एक कमरा किराए पर ले कर रहने लगी. पैसा बचाने के लिए उस ने अपना रूम एक दूसरी युवती के साथ शेयर कर लिया. सुरक्षा की दृष्टि से भी यह जरूरी था.

नए शहर में आ कर नित्या ने ठान लिया था कि वह किसी लफड़े में नहीं पड़ेगी. बस, अपनी पढ़ाई पर ध्यान देगी. लेकिन जहां खुला माहौल हो, भंवरे और तितलियां एक ही बाग में स्वछंद घूमफिर रहे हों, प्रकृति का रोमांच उन के दिलों को गुदगुदा रहा हो, तो वसंत के फूलों की सुगंध से वे कैसे बच सकते हैं और मधुमास के अभिसार से अछूते कैसे रह सकते हैं. पेड़पौधों और फूलपत्तों पर जब वसंत का निखार आता है, तो जवां दिल एक हुए बिना नहीं रह सकते.

वह बहुत सोचसमझ कर जीवन के अगले चरण में अपने कदम रख रही थी. उस की रूममेट शिखा बहुत बातूनी और चंचल थी. वह हर वक्त प्यारमुहब्बत की बातें करती रहती थी. नित्या उस की बातें सुन हलके से मुसकरा भर देती या उसे झिड़क देती, ‘‘अब बस कर, कुछ पढ़ाई की तरफ भी ध्यान दे ले.’’

‘‘पढ़ाई कर के क्या मिलेगा? अंत में शादी ही तो करनी है. अभी जवानी है, प्यार का मौसम है, तो क्यों न उस का भरपूर मजा लिया जाए?’’ वह अंगड़ाई ले कर कहती.

नित्या बस, मुसकरा कर रह जाती. प्यार के खेल की वह पुरानी खिलाड़ी थी, लेकिन उस ने शिखा को अपने पहले प्यार के बारे में कुछ नहीं बताया था. वह उन कड़वी यादों को अपने दिल से निकाल देना चाहती थी.

यों ही हंसीमजाक में दिन गुजरते रहे. एक दिन शिखा ने पूछ ही लिया, ‘‘नित्या, सचसच बता, क्या तेरे मन में प्यार की भावना नहीं उमड़ती या तेरे साथ कोई हादसा हुआ है, जो तू प्यार के नाम से बिदकती है?’’

नित्या चौंक गई, क्या शिखा को उस के बारे में कुछ पता चल गया है या वह केवल कयास लगा रही है. उस ने कहा, ‘‘तू क्या समझती है, सारी युवतियां एकजैसी होती हैं? मेरा एक लक्ष्य है. मुझे पढ़ाई कर के मांबाप के सपनों को पूरा करना है.’’

‘‘बस कर, तू मुझे क्यों बना रही है? प्यार के मामले में सारी युवतियां एकजैसी होती हैं. जवान होने से पहले ही चारा खाने के लिए उतावली रहती हैं. मुझे तो लगता है, तूने चारा खा लिया है. अब बन रही है.’’

‘‘मैं ने क्या किया है या क्या करूंगी, यह तू मेरे ऊपर छोड़ दे. तू अपनी सोच,’’ नित्या ने बात को टालने का प्रयास किया.

शिखा लापरवाही से बोली, ‘‘मुझे अपने बारे में क्या सोचना? मैं ने तो अपना बौयफ्रैंड बना भी लिया है. तू अपनी फिक्र कर…’’ उस के चहरे से खुशी टपक रही थी, हृदय उछल रहा था. सपनों के उड़नखटोले में बैठ कर वह किसी और ही दुनिया में विचरण कर रही थी.

नित्या को उस के बौयफ्रैंड के बारे में जानने की कोई उत्सुकता नहीं थी, लेकिन एक कसक सी उस के मन में उठी. प्यार में ठोकर न खाई होती तो उस का भी कोई बौयफ्रैंड होता. उसे शिखा से जलन हुई. परंतु फिर उस ने अपना मन कड़ा किया. क्या फिर से आग में कूदने का इरादा है. शिखा को जो करना है, करे. वह अपने पथ पर अडिग रहेगी. पुरानी चोट क्या इतनी जल्दी भूल जाएगी?

लेकिन एक जवान युवती, जब घर से दूर अकेली रहती है, तो उस की भावनाएं बेलगाम हो जाती हैं. वह केवल अपने लक्ष्य पर ही ध्यान केंद्रित नहीं रख पाती. दूसरी चीजें भी उसे प्रलोभित करती हैं. कोई भी युवा अपने मन को चंचल होने से नहीं रोक सकता. नित्या भी अपने हृदय की भावनाओं और मन की चंचलता को दबाने का प्रयास करती, लेकिन शिखा की बातें सुनसुन कर वह मन से कमजोर पड़ने लगी थी. जब भी शिखा उस से अपने अफेयर और बौयफ्रैंड के बारे में बात करती तो उस के हृदय में कांटे से गड़ने लगते. सोचती, इतनी सुंदर दुनिया में वह अकेले ही चलने के लिए क्यों मजबूर है? यह उम्र क्या तनहाइयों में आहें भरने के लिए होती है?

कालेज में हर दूसरी युवती अपने बौयफ्रैंड के साथ नजर आती. एक बस वही अकेली थी. कितना खराब लगता था उसे. उस की फ्रैंड्स उसे चिढ़ातीं, ‘‘यह देखो, ठूंठ, इस पर जवानी का फूल अभी तक नहीं खिला है.’’

धीरेधीरे उस का मन विचलित होने लगा. पुरानी कड़वी यादें समय की परतों के नीचे दब सी गईं. नई भावनाओं ने जल की लहरों की तरह उस के हृदय में उछाल लेना शुरू कर दिया, जैसे कोई नया तूफान आने वाला था. नए तूफान को रोकने का उस ने प्रयास नहीं किया, वह कमजोर हो गई थी. प्यार के मामले में हर युवती बहुत कमजोर होती है. प्यार के नाम पर कोई भी युवक उसे किसी भी तरफ झुका सकता है. नित्या दूसरी बार झुकने के लिए अपने मन को तैयार कर रही थी.

सहेलियों के बीच वह एक ठूंठ सिद्ध हो चुकी थी. उस ने तय कर लिया, अब वह फूल की तरह कोमल बन कर दिखाएगी. उस ने अपने दिमाग को इधरउधर दौड़ाया. कई युवकों के चेहरे उस के मस्तिष्कपटल पर दौड़ने लगे, लेकिन उस ने तय किया कि वह किसी क्लासमेट या कालेज के किसी युवक से दोस्ती नहीं करेगी. मिलिंद भी उस के कालेज का लड़का था, वह कितना छिछोरा और बदमाश निकला. इस बार वह किसी नौकरीशुदा व्यक्ति से दोस्ती करेगी.

उस ने अपना मन अपने मकान में रहने वाले किराएदारों की तरफ केंद्रित किया. जिस मकान में वह रहती थी, उस में कई किराएदार थे. ज्यादातर कालेज की युवतियां थीं, कुछ आईटी प्रोफैशनल भी थे. कुछ अन्य नौकरी करने वाले थे. राहुल नित्या के कमरे के बिलकुल सामने रहता था. वह जब भी सामने पड़ता, उसे देख कर मुसकरा देता. पहले वह तटस्थ रहती थी, लेकिन जब उस के मन की भावनाओं ने पंख फैलाने शुरू किए, तो उस के होंठों पर भी मुसकान की मीठी झलक दिखाई देने लगी. युवकयुवती के बीच एक बार मुसकान का आदानप्रदान हो जाए, तो दूरियां कम होने में वक्त नहीं लगता.

राहुल से रिश्ता बनाते समय उसे तनिक भी खयाल नहीं आया कि वह एक बार प्यार में धोखा खा चुकी है. इस बार ठोंकबजा कर राहुल को परख ले, जब प्यार की चिनगारी हृदय को जलाने लगती है, तो सारी सावधानी और समझदारी धरी की धरी रह जाती है.

बात बढ़ी, तो बढ़ती ही चली गई. दोनों एक ही बिल्डिंग में रहते थे, इसलिए उन के मिलने में कोई व्यवधान भी नहीं था. स्वच्छंद रूप से दिनरात जब भी मन करता, वे मिल लेते. उन के बीच की सारी दूरियां बिना किसी देरी के समाप्त हो गईं.

शिखा को उस के अफेयर के बारे में पता चलते देर न लगी. पूछा, ‘‘नित्या, तू तो बड़ी तेज निकली. इतनी जल्दी बौयफ्रैंड बना लिया. कल तक तो प्रेम के नाम पर नाकभौं सिकोड़ती थी.’’

नित्या ने सिर झटकते हुए कहा, ‘‘क्यों, क्या मैं प्यार नहीं कर सकती? आखिर सामान्य युवती हूं. मन में भावनाएं हैं, इच्छाएं हैं और हृदय में कामनाएं मचलती हैं. जब तक मन का दरवाजा नहीं खुलता, बाहर की हवा की सुगंध मनमस्तिष्क में नहीं घुसती, तब तक कामदेव के बाण किसी को घायल नहीं करते. मैं ने भी तुझ से सीख ले कर मन की आंखें खोल दीं, हृदयपटल को खोल कर ‘उसे’ प्रवेश करने की अनुमति दे दी. फिर तो तुम जानती ही हो, प्रेम की चिनगारी भड़कने में देर नहीं लगती.’’

‘‘पर तुम ने राहुल को क्यों पसंद किया. तुम्हारे क्सासमेट भी तो हैं?’’

‘‘तुम नहीं समझोगी. साथ में पढ़ने वाले युवकों में गंभीरता नहीं होती. उन का भविष्य अनिश्चित सा रहता है. पूरी तरह से वे मांबाप पर निर्भर रहते हैं. राहुल नौकरीशुदा है. वह मेरा खर्च उठा सकता है.’’

‘‘क्या करता है वह?’’

‘‘शायद किसी आईटी कंपनी में ऐग्जिक्यूटिव है. मैं ने पूछा नहीं है.’’

‘‘नौकरी वाला बौयफ्रैंड पसंद किया है, तो क्या तुम उस से शादी करने की सोच रही हो?’’

‘‘क्या हर्ज है, अगर वह तैयार हो जाए,’’ नित्या ने लापरवाही से कहा.

‘‘तुम ने बात की है?’’

‘‘कर लूंगी, अभीअभी तो प्यार हुआ है. कुछ दिन एंजौय करने दो.’’

शिखा  गंभीर हो गई, ‘‘नित्या, एक बात अच्छी तरह समझ लो, प्यार अगर मौजमस्ती के लिए है, तो इस में सबकुछ जायज है, पर अगर शादी कर के घर बसाने के उद्देश्य से तुम राहुल से प्यार कर रही हो, तो संभल कर रहना. पहले शादी कर लो, फिर अपना तन उस को समर्पित करना. आजकल शादी के नाम पर युवक बहलाफुसला कर युवतियों का सालों शोषण करते हैं और जब उन का मन भर जाता है, तो युवती को ठोकर मार कर भगा देते हैं. युवतियां भावुक होती हैं. वे बहुत जल्दी युवकों की बातों पर विश्वास कर लेती हैं और बाद में पछताती हैं. तुम राहुल से साफसाफ बात कर लो कि वह क्या चाहता है और तुम भी अपने दिल की बात उस के सामने रख दो कि तुम उस से शादी करना चाहती हो, वरना बाद में पछताओगी.’’

नित्या के मन में बात खटक गई. शिखा सच कह रही थी. प्यार कोई खेल तो है नहीं, जो केवल मनोरंजन के लिए खेला जाए. ऐसा प्यार वासना का खेल बन जाता है. उस ने खुद को धिक्कारा…. उसे क्या कभी अक्ल नहीं आएगी. एक बार लुट चुकी है और दूसरी बार लुटने को तैयार है. जीवनभर क्या वह प्यार के नाम पर अलगअलग युवकों के हाथों अपने शरीर को नुचवाती रहेगी, अपनी अस्मिता तारतार करवाती रहेगी?

उसे अफसोस होने लगा कि प्यार में वह इतनी जल्दबाजी क्यों करती है, दो दिन की बातचीत और मीठीमीठी बातों में आ कर उस ने खुद को राहुल के चरणों  में समर्पित कर दिया.

अगली मुलाकात में उस ने राहुल से पूछ लिया, ‘‘राहुल, तुम ने अपने बारे में कभी कुछ नहीं बताया, जबकि मैं अपने बारे में तुम्हें सबकुछ बता चुकी हूं.’’

‘‘क्या जानना चाहती हो मेरे बारे में?’’ उस ने संशय से पूछा.

‘‘मैं तुम्हारे नाम के सिवा क्या जानती हूं.’’

‘‘क्या तुम्हारे लिए इतना जानना पर्याप्त नहीं है कि मैं तुम्हारा प्रेमी हूं?’’

‘‘प्यार की अंतिम परिणति शादी होती है, इसलिए एकदूसरे के घरपरिवार के बारे में जानना भी जरूरी है,’’ नित्या ने अपने मन की बात कही.

राहुल ने टालने के भाव से कहा, ‘‘तुम कहां बेमतलब की बातों में पड़ी हो. दुनियादारी के लिए सारी उम्र पड़ी है. अभी प्यार का मौसम है, जी भर कर प्यार कर लो और उस की सुगंध अपने तनबदन में भर लो. प्यार की खुशबू से जब तनमन नहाने लगता है, तो बाकी चीजें गौण हो जाती हैं. अभी तुम केवल मेरे बारे में सोचो और मैं तुम्हारे बारे में… बस,’’ उस ने नित्या को बांहों में समेटने की कोशिश की.

नित्या ने प्यार से उसे अलग करते हुए कहा, ‘‘तुम अपनी मीठीमीठी बातों से  टालने की कोशिश मत करो. मेरे लिए यह जानना काफी अहम है कि मैं ने जिस व्यक्ति से प्यार किया, वह जीवन में कितनी दूर तक मेरा साथ देगा. पुरुष और स्त्री को बांधने का सूत्र प्रेम होता है और जब वह सूत्र शादी के बंधन में बंध जाता है तो यह अटूट हो जाता है.’’

‘‘क्या दकियानूसी बातें कर रही हो. जब हम स्वेच्छा से एकदूसरे के साथ रह रहे हैं, तो बीच में शादी कहां से आ गई?’’

‘‘राहुल, तुम बात को समझने का प्रयास करो. अब हम बच्चे या किशोर नहीं हैं, पूरी तरह से बालिग हैं. लिवइन रिलेशनशिप केवल वासना की पूर्ति का एक आधुनिक बहाना है, वरना समाज में इस तरह के कृत्य अवैध रूप से पहले भी चलते थे और आज भी चल रहे हैं. लेकिन परिवार और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों के साथ अगर पतिपत्नी का रिश्ता निभाया जाए, तो सभी सुखी रहते हैं.’’

नित्या ने सोचसमझ कर बहुत गंभीर बात कही थी. उस में अब परिपक्वता झलक रही थी, क्यों न हो आखिर? ठोकर खाने के बाद तो मूर्ख भी अक्लमंद हो जाते हैं. इस के बाद भी अगर नित्या को अक्ल न आती, तो कब आती?

राहुल चिंतित हो गया, फिर बोला, ‘‘यार, तुम ने भी अच्छाखासा रोमांटिक मूड खराब कर दिया. मैं बाद में इस मुद्दे पर बात करूंगा,’’ फिर वह अपने औफिस चला गया.

नित्या को उस की यह बेरुखी अच्छी नहीं लगी. वह समझ गई थी कि राहुल उस के साथ केवल शारीरिक संबंध बनाने तक ही रिश्ता कायम रखना चाहता है. इस के अलावा वह किसी और जिम्मेदारी के प्रति गंभीर नहीं है, पर बिना किसी जिम्मेदारी के यह रिश्ता भी कोई रिश्ता है. क्या यह एक प्रकार की वेश्यावृत्ति नहीं है? बिना प्रतिबद्धता और सामाजिक बंधन के युवती एक युवक के साथ रहे या दो के साथ, क्या फर्क पड़ता है? इस में पारिवारिक और सामाजिक प्रतिष्ठा कहां है. युवती को तो अपनी अस्मिता लुटा कर ही यह सब करना पड़ता है. बदले में उसे क्या मिलता है? युवक के चंद मीठे बोल, कुछ उपहार लेकिन सामाजिक सुरक्षा इस में कहां है? उसे लांछनों के साथ समाज में जीवित रहना पड़ता है.

ज्योतिषी, ढोंगी बाबा और गुरुमां बन रहे जी का जंजाल

 लेखक: सौमित्र कानूनगो

पिछले दिनों न्यूज 18 की वैबसाइट पर एक अजीब सी खबर पढ़ने में आई. सितंबर 2018 को दिल्ली के एक पुलिसकर्मी विजय समरिया ने एयर इंडिया की मैनेजर सुलक्षणा नरूला के गुमशुदा होने पर उसे ढूंढ़ने से इनकार कर दिया.

दरअसल, विजय समरिया ने महिला के लड़के से उस की कुंडली मंगवा कर अपने ज्योतिष को दिखाई जिस में 19 अप्रैल तक उस महिला को ‘महादशा’ है यानी उस का बुरा समय है, ऐसी बात सामने आई. इत्तफाक से विजय समरिया की भी महादशा 19 अप्रैल को ही खत्म हो रही थी. उस के बाद से इस पुलिसकर्मी ने 19 अप्रैल तक महिला को ढूंढ़ने से इनकार कर दिया और परिवार वालोें को यह आश्वासन दिया कि 19 अप्रैल तक हम दोनों की महादशा खत्म होने के बाद मैं उन्हें कभी भी आसानी से ढूंढ़ लूंगा.

महिला के बेटे अनुभव को एक पुलिसकर्मी के ऐसी बात करने पर बड़ी हैरानी हुई. उन्होंने बताया कि पुलिसकर्मी ने महिला की महादशा शांत करने के उपाय के तौर पर उसे बगलामुखी देवी की मूर्ति, जो छतरपुर मंदिर में है, की पूजा करने के लिए कहा. बाद में यह केस क्राइम ब्रांच को सौंप दिया गया. महादशा खत्म हुए एक साल बीत गया है, लेकिन अब तक महिला का कुछ पता नहीं चल सका है.

आज के इस वैज्ञानिक दौर में जहां एक तरफ हम चंद्रयान 2 का परीक्षण कर रहे हैं, एक पुलिसकर्मी का इस तरह की बात करना कितनी हैरानी पैदा करता है. अगर हमारी कानून व्यवस्था में लोग ज्योतिष के माध्यम से घटनाओं को सुलझाने लग जाएं तो क्या हम सच में उन पर भरोसा कर सकते हैं? और यह बात सिर्फ एक निश्चित व्यवसाय तक ही सीमित नहीं है. ध्यान से देखने पर मालूम पड़ता है कि अंदरूनी तौर पर हमारे समाज का एक बड़ा वर्ग, चाहे वह गांव में निवास करता हो या शहर में, आज भी इन कुरीतियों से बंधा हुआ है.

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ज्योतिष विद्या का इतिहास

मुझे इस पुरानी विद्या के इतिहास के बारे में जानने की जिज्ञासा हुई तो मैं मुंबई शहर के दादर स्टेशन गया. वहां से थोड़ी दूरी पर कुछ ज्योतिष सड़क किनारे अपनी पोथी और एक छोटी सी तख्ती लिए बैठे रहते हैं. वे महज 51 रुपए में हर आतेजाते व्यक्ति का भविष्य उन के हाथों की लकीरों के माध्यम से बताते हैं. उन के अनुसार यह विद्या 322 साल पुरानी है.

उन से कुछ कदमों की दूरी पर गीताप्रैस गोरखपुर नाम की एक गाड़ी में किताबें व अंगूठी, मालाएं, ब्रेसलेट आदि सामान बिकता है. उस दुकान के मालिक कहते हैं कि 322 साल तो बहुत ही कम समय है. ज्योतिष विद्या के बारे में तुलसीदासजी हनुमान चालीसा में कह गए हैं कि यह विद्या तो तब से है जब से दुनिया शुरू हुई है.

इंटरनैट पर खोजेंगे तो पता चलेगा कि तुलसीदास द्वारा हनुमान चालीसा 15वीं शताब्दी में लिखी गई थी. मतलब आज से लगभग 400 वर्ष पहले, और खगोलशास्त्रियों द्वारा बताया जाता है कि दुनिया की शुरुआत लगभग 3.5 अरब साल पहले हुई है. अगर मान लिया जाए कि यह विद्या 8,000 वर्ष पुरानी है तब भी दुनिया की शुरुआत से ही इस विद्या का अस्तित्व है, यह बात सिद्ध नहीं होती है. आप खुद ही सोचिए, जिस विद्या पर ये लोग इतना विश्वास करते हैं, उस के होने के समय में ही इन ज्योतिषियों और पंडितों में विरोधाभास है, तब वे हमारा भविष्य बताएं, यह बात कितनी तार्किक है?

वहीं, कुछ पंडित, जिन के पूर्वज इस विद्या के जानकार रहे हैं, बताते हैं कि विज्ञान द्वारा हमारे यहां गणनाओं की खोज तो बाद में हुई, पर ये गणनाएं तो त्रेता युग और द्वापर युग से चली आ रही हैं. ज्योतिष में विज्ञान की तरह हम किसी चीज का प्रमाण तो नहीं दे सकते जिस को देखा जा सके पर उस में आंतरिक ज्ञान है. वे विज्ञान और ज्योतिष विद्या के बीच के फर्क को कुछ इस तरह बताते हैं कि जो हृदय में है वह ज्ञान है और जो दिमाग में है वह विज्ञान है. आप का काम एक बार दिमाग न भी हो, तो भी चल जाएगा पर हृदय होना जरूरी है. आत्मा, अगर होती है, वहीं बसती है.

वैज्ञानिक परीक्षण में फेल ज्योतिष विद्या

ज्योतिष विद्या को जानने वाले लोगों के बड़ेबड़े दावे अकसर फेल होते रहे हैं, वह भारत में चुनाव के नतीजे हों या फिर इंदिरा गांधी की हत्या.

इस विद्या के एक वैज्ञानिक परीक्षण में 14 साल से ज्यादा अनुभव वाले 27 भारतीय ज्योतिषियों का परीक्षण भी किया गया, जिस में वे उचित कुंडली के साथ 100 मानसिक रूप से स्वस्थ और 100 मानसिक रूप से विकलांग बच्चों में फर्क नहीं बता पाए.

मनोवैज्ञानिक इवान केली और आस्ट्रेलियन खगोलशास्त्री डा. ज्यौफ्री डीन के 2,000 विषयों पर 45 सालों तक किए गए गहन शोध में यह पाया गया है कि ज्योतिष विद्या महज अनुमान पर टिकी विद्या है.

ज्योतिषियों और पंडितों के अनुसार उन्हें न मानना भगवान को न मानने के बराबर है और अगर आप उन्हें नहीं मान रहे हैं, मतलब, आप के ग्रहों की दशा खराब है. जबकि ये खुद अपनी नियति के मारे हैं और अगर ये खुद उपाय लगा कर अपनी नियति नहीं बदल सकते तो यह सोचने वाली बात है कि हमारी जिंदगी के फैसले हम इन पर किस तरह छोड़ सकते हैं.

यहां एक और बिंदु सोचने वाला है कि आखिर यह उपाय है क्या चीज कि जिस से हमारे जीवन की परेशानियां हल हो जाती हैं.

यंत्र में मंत्र है

ज्योतिषियों का दावा है कि गृह और नक्षत्रों की स्थिति के बदलने से उन का प्रभाव हम इंसानों के जीवन और पृथ्वी पर घटने वाली घटनाओं पर पड़ता है. इस प्रभाव के कारण ही हमारे जीवन में परेशानियां आती हैं और उस के लिए हम उपाय सुझाते हैं. वह उपाय पूजा हो सकती है, जैसे महादशा, कालसर्प दोष, साढ़े साती, मंगल दोष आदि या आप किसी संत, बाबा या माता के पास जा सकते हैं जिसे ईश्वर का इष्ट हो. और भी आसान तरीका है कि आप कोई यंत्र धारण कर अपने जीवन की परेशानियों को सुलझा सकते हैं.

इन यंत्रों की दुकान चलाने वाले पंडित बताते हैं कि हमारे ऋषिमुनियों को दुनिया कि दुर्गति के बारे में पहले से ही पता था, इसलिए उन्होंने पहले ही इन यंत्रों में मंत्र फूंक दिए हैं. उन की दुकान में हर समस्या के लिए अलग यंत्र है. अंगूठी, ब्रेसलेट, माला आदि की बेसिक रेंज से ले कर आप को महंगे से महंगा यंत्र भी उपलब्ध हो सकता है. टीवी और इंटरनैट पर भी इस का खूब प्रचारप्रसार आप देख सकते हैं और फोन पर या औनलाइन और्डर कर जो भी यंत्र ज्योतिष द्वारा आप को सुझाया गया हो, वह आप खरीद सकते हैं.

हालांकि कलियुग की वजह से इन यंत्रों का 30 से 40 प्रतिशत ही प्रभाव रह गया है. उन से यह पूछने पर कि आज के दौर में जहां कोई भी प्रोडक्ट 99.99 प्रतिशत से कम फायदा दे ही नहीं रहा है वहां इन यंत्रों का 30 से 40 प्रतिशत ही प्रभाव रह गया है, तो फिर इन्हें पहन कर क्या फायदा होगा? वे कहते हैं, ‘‘ऋषिमुनियों के समय में ये यंत्र भी 100 प्रतिशत फायदा देते थे और सच कहूं तो कलियुग के हिसाब से 30 से 40 प्रतिशत भी इन यंत्रों का प्रभाव कुछ कम नहीं है.’’

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इस विषय पर बात करते हुए 11वीं और 12वीं कक्षा को विज्ञान पढ़ाने वाले शिक्षक सतीश राजपूत बताते हैं, ‘‘मेरे बहुत से स्टूडैंट्स एग्जाम के समय लौकेट, अंगूठी या तावीज पहन कर आते हैं. उन का व उन के परिवार वालों का ऐसा मानना है कि इस लौकेट या ब्रेसलेट को पहन लेने से एग्जाम में अच्छे नंबर आ सकते हैं. आजकल टीवी और इंटरनैट पर ज्योतिष और उन के द्वारा बताए जा रहे यंत्रों के विज्ञापन द्वारा कई लोग ऐसी बातों को सच मानने लगे हैं. मैं हैरान हूं इस बात से कि हम अपने बच्चों को किस गलत दिशा में ले कर जा रहे हैं.’’

जरा सोचिए कि आप इस बात के लिए कितने तैयार हैं जब कल को हमारे बच्चे सिर्फ माला, तावीज या कोई ब्रेसलेट पहन कर अपनी पढ़ाई छोड़ दें और उम्मीद करने लगें कि वे बिना पढ़े सिर्फ इन यंत्रों की शक्ति से एग्जाम में पास हो जाएंगे. इस के विपरीत, क्या हमें बच्चों को मेहनत का सबक नहीं सिखाना चाहिए? क्या ब्रेसलेट, माला या अंगूठी की जगह हमें उन के हाथों में ऐसी किताबें नहीं थमानी चाहिए जो उन्हें एक अच्छा जीवन जीने को प्रेरित करें?

ऐसा करने के लिए पहले हमें खुद इन विज्ञापनों और ऐसी विचारधारा के प्रति सतर्क रहना होगा. नियम 7 (5) द केबल टैलीविजन नैटवर्क रूल्स 1994 के मुताबिक, ऐसे किसी भी प्रोडक्ट का विज्ञापन, जिसे चमत्कारी, विशेष या अलौकिक बताया जा रहा हो और जिसे प्रमाणित करना मुश्किल हो, का प्रसारण वर्जित है. फिर भी ऐसे विज्ञापन आते हैं और शायद आते रहेंगे. यहां किसी और को नहीं, हमें ही इन के प्रति जागरूक हो कर सतर्क रहने आवश्यकता है.

अंधश्रद्धा रखने का भयानक अंजाम

महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति एक स्वयंसेवी संस्था है जो समाज में स्थापित अंधविश्वास, काला जादू या अमानवीय ढंग से किसी का इलाज करने जैसी कुरीतियों के खिलाफ कार्यरत है. इस संस्था के मुख्य कार्यकर्ता नंद किशोर तलाशीलकर, मुक्ता दाभोलकर, सुनीता देवलवार, वंदना शिंदे और मयूर गायकवाड़ से बातचीत करने से हमें पता चला है कि कई बार यह अंधश्रद्धा बहुत ही भयानक घटनाओं को अंजाम देती है.

मुंबई के खार क्षेत्र में रहने वाली महिला, जो कौर्पोरेट में किसी अच्छे पद पर कार्यरत थी, का अपने भाई से प्रौपर्टी का कुछ विवाद चल रहा था. घर में उस के ससुर को अस्थमा की बीमारी थी और सास आर्थ्राइटिस की मरीज थीं. तो, कोर्टकचहरी के चक्कर और घर को भी संभालने में महिला व उस के पति बहुत परेशान हो रहे थे. तब उन के किसी रिश्तेदार ने सुझाया कि एक गुरुमां हैं, उन के पास जाओगे तो वे आप की समस्या को सुलझा सकती हैं. मेरी भी कुछ समस्याएं थीं जो उन के पास जाने के बाद से सुलझ गईं.

ये दोनों जब अपनी समस्या गुरुमां के पास ले कर गए तो उस ने कहा, ‘‘मैं साईं बाबा से बात करती हूं और 12 साल तपस्या करने के बाद मुझे यह शक्ति प्राप्त हुई है. वे जो उपाय बताएंगे तुम्हारी समस्या के बारे में, वह मैं तुम्हें बताऊंगी.’’

इस बीच, महिला के ससुर का प्रमोशन हो गया और उन की अस्थमा की प्रौब्लम भी थोड़ी कम हो गई. इन लोगों को यह लगा कि गुरुमां के पास जाने से हमारी समस्याएं कम हो रही हैं. गुरुमां पर उन्हें विश्वास हो गया. फिर उपाय के तौर पर गुरुमां ने इस महिला से कहा कि यह सब आप के पिछले जन्म के बुरे कर्मों की वजह से हो रहा है और इसे ठीक करने के लिए मुझे पूजा करनी पड़ेगी. गुरुमां ने आगे कहा कि इस जन्म में तुम्हें अब मैं जो बोलूंगी वही करना है.

जो भी उस महिला ने अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के लोगों को पूजा के बारे में बताया वह सब बहुत भयानक था. गुरुमां ने उस से यह कहा कि यह पूजा करनी है तो मुझे तेरे घर पर आ कर रहना होगा. गुरुमां ने उस के पति को बताया कि पिछले जन्म में यह एक वेश्या थी. इस के बाद गुरुमां उस के घर में 9 महीने तक रही और रात के 2 बजे के करीब पूजा के नाम पर उसे नंगा कर के उस के शरीर पर जोर से चप्पल मारती थी. पूछने पर कहती थी, बाबा ने मुझ से कहा है कि पिछले जन्म में तू वेश्या थी, तो यह दोष तेरा इस जन्म में निकालने के लिए ऐसा करना जरूरी है. उस ने इसी प्रकार से उस महिला पर बहुत सारे शारीरिक अत्याचार किए.

गुरुमां ने उसे यह बात किसी को भी बताने से मना किया और यह भी कहा कि अगर उस ने किसी को बताया तो फिर इस पूजा का प्रभाव कम हो जाएगा. किसी से बात न करने और कौंटैक्ट में न रहने की शर्त के कारण उस को अपनी नौकरी भी छोड़नी पड़ी. उस ने महिला से यह भी कहा कि अगर वह यह सब नहीं करेगी तो उस की बच्ची का स्कूल में बलात्कार होगा.

ये लोग इन सब बातों को मान लेते थे क्योंकि इन्हें उस पर पूरी तरह विश्वास हो गया था. ऐसा करते हुए उस ने इन लोगों से डायमंड, सोने की चेन, और 12 लाख रुपए भी लिए. बहुत समय बीत जाने के बाद भी जब किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो रहा था, तब इस महिला को गुरुमां पर शक होने लगा.

गुरुमां पूजा के वक्त महिला को अपनी आंखें बंद रखने के लिए कहती थी. एकदो बार जब उस की आंख खुली तो उस ने देखा कि गुरुमां उस का वीडियो बना रही थी. तब उस का शक और बढ़ गया और उस ने अपने पिताजी, जो रत्नागिरी में रहते थे, को यह बात बताई. पिताजी के माध्यम से ही इस संस्था को इस बात की खबर लगी. तब संस्था के नंदकिशोर, अनीस और मुक्ता दाभोलकर उस महिला के घर गए. मुक्ता दाभोलकर ने उस महिला और परिवार वालों की कांउसलिंग की. तब जा कर परिवार वाले गुरुमां के खिलाफ शिकायत करने के लिए तैयार हुए और गुरुमां को पुलिस ने गिरफ्तार किया.

संस्था के संस्थापक डा. दाभोलकर ने 18 साल पहले ‘एंटी सुपरस्टीशन ऐंड ब्लैक मैजिक बिल’ का सूत्रपात किया था और इस बिल को वे महाराष्ट्र स्टेट असैंबली में पारित करवाने के लिए 14 साल से संघर्ष कर रहे थे. इस बिल का कई हिंदू संगठनों और संस्थानों द्वारा कड़ा विरोध किया गया. 20 अगस्त, 2013 को किन्हीं अज्ञात व्यक्तियों द्वारा डा. दाभोलकर की गोली मार कर हत्या कर दी गई.

उन्हें याद करते हुए सुनीता देवलवार कहती हैं, ‘‘आज का माहौल ऐसा है कि हम तार्किक कम हो कर अंधविश्वासी ज्यादा हो रहे हैं. जरा सा कोई हमारे खिलाफ कुछ कहता है तो हिंसा का रास्ता अपना लेते हैं. मेरा यह मानना है कि मारना है तो विचारों से ही विचारों को मारो. डा. दाभोलकर का बलिदान व्यर्थ नहीं है, बल्कि उन के बलिदान ने हमें इन कुरीतियों के खिलाफ ज्यादा हिम्मत से खड़े होने के लिए प्रेरित किया है.’’

आखिरकार, दिसंबर 2013 को महाराष्ट्र सरकार द्वारा एंटी सुपरस्टीशन ऐंड ब्लैक मैजिक बिल को पास कर दिया गया.

 अपने पैरों पर खड़े रहिए

कई माध्यमों द्वारा हम लोगों को  अंधविश्वास की राह में धकेला जाता है. इस तरह के विज्ञापन आप हर रोज अखबारों, टीवी और न्यूज चैनलों में देखते होंगे. आप के शहर के रेलवे स्टेशन, गली और नुक्कड़ पर भी कई लोग इस तरह का सामान बेचते मिल जाएंगे. झूठी आस्था का प्रचार और प्रोडक्ट्स का व्यापार करने वाले लोगों ने आप के डर और आस्था का फायदा उठा कर धर्म को धंधा बना लिया है.

स्वामी विवेकानंद ने कहा था, ‘‘मैं एक बार को तुम सब का नास्तिक कहलाना पसंद करूंगा पर अंधविश्वासी नहीं. धर्म में कोई चमत्कार नहीं है. चमत्कार का व्यापार और अंधविश्वास हमेशा से कमजोरी की निशानी हैं. ये हमेशा से पतन और मृत्यु की निशानी हैं. इसलिए, इन से सावधान रहिए, मजबूत बनिए और अपने पैरों पर खड़े रहिए.’’

अंधश्रद्धा के जाल से निकलेें

हमें पहले भी कितने ही ढोंगी बाबाओं, तांत्रिकों, संतों और गुरुमां जैसी महिलाओं के बारे में पता चलता रहा है. फिर आखिर क्या वजह है कि हम लोग इस तरह की अंधश्रद्धा का शिकार हो जाते हैं?

मनोचिकित्सक डा. श्रीकांत रेड्डी बताते हैं, ‘‘भारतीय संस्कृति में सालों से हमें जब भी कोई समस्या आती है, किसी न किसी के अजूबे सहारे की जरूरत महसूस होती है, जैसे सब से पहले तो हम भगवान की ओर देखते हैं और अगर भगवान न मिले तो फिर भगवान के दूत, जो बाबा या साधु हैं, की शरण ले लेते हैं. यह अंधश्रद्धा हमारे सामाजिक विश्वास तंत्र से उपजती है.

‘‘अंधश्रद्धा की सीख हमें बचपन से ही मिलने लगती है, जैसे हमें बताया जाता है कि बिल्ली का रास्ता काट देना अपशगुन होता है. इस तरह की सीख एक वक्त के बाद हमारा मजबूत विश्वास बन जाती है. यह बात हमारे दिमाग में इस तरह घर कर जाती है कि सामान्य विचारों से हम उस को नहीं सुलझा सकते.

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मैं यह मानता हूं कि जो लोग मनोवैज्ञानिक रूप से मजबूत हैं, वे जीवन में किसी भी समस्या कीतरफ प्रौब्लम सौल्विंग ऐटिट्यूड रखते हैं. वे हार नहीं मानते और खुद से समस्या को सुलझाने की हर संभव कोशिश करते हैं. पर जो लोग मनोवैज्ञानिक रूप से कमजोर हैं उन में प्रौब्लम सौल्विंग ऐटिट्यूड और खुद पर विश्वास बहुत कम होता है. इसलिए वे दूसरों पर आसानी से भरोसा कर लेते हैं.’’

समस्या के समाधान पर वे कहते हैं कि इस से निकलने में वक्त लगेगा पर लोगों को लगातार जागरूक करते रहना होगा तब जा कर हम कुछ सालों में बदलाव देख पाएंगे. उन के मुताबिक, इस में सरकार की भी अहम भूमिका है. क्योंकि नियम तो बन जाते हैं पर उन का पालन होना भी जरूरी है.

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